Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Apr 25 - सविकल्प समाधि कैसे घटित होती है? समाधि के समय महापुरुष के दर्शन करने से क्या होता है?
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- 0:00अनुपमा नीदरलैंड से बाबा कल आपने फ़ोन पे कहा एम नॉट फॉर ऑल एम नॉट
- 0:15फॉर ऑल एम फॉर। दी इअर्स दट।
- 0:22लिसेन एंड दी हार्ट्स दट। सिक बाबा क्या आप सबके लिए नहीं
- 0:36बोल रहे? नहीं, मैं सब के लिए नहीं बोल रहा
- 0:47इसलिए मैंने आपके प्रश्न के जवाब में ये बात कही।
- 0:50आई ऍम नॉट फरर ओनली टू इयर्स। दैट लिसन ओनली टू हर्ड्स दैट
- 1:05सीक्स अगर तुम दोनों में से हो तो मुझे सुन लो मुझे वो कान चाहिए।
- 1:21जो सुनना चाहते हैं और मुझे वो हृदय चाहिए जो खोज में तड़पता हो।
- 1:31बिरहा की अग्नि जिसके भीतर प्रज्वलित हो रही हो।
- 1:41इसके अलावा मुझे कोई और नहीं चाहिए।
- 1:45खोपड़ी की खुजलाहटों के लिए मेरे पास मत आना।
- 1:53आपका भी वक्त जाया होगा, मेरा तो होगा।
- 2:07जो पहले से ही पानी से नहाया हुआ है, गले तक पानी भरा हुआ है उसको
- 2:17पानी का ऑफर करने का फायदा क्या है?
- 2:22नहीं ना पहले तुम संसार की अगनी में।
- 2:26जब संसार का स्वाद चखो अगर शांति मिले, आनंद मिले तो संसार में ही
- 2:41गुम हो जाओ अगर न मिले। तो बाहर आ जाओ, मेरे पास आओ, बस
- 2:50मैं यही कहना चाहता हूँ। आई ऍम नॉट फॉर आवर ओनली फॉर
- 3:01इयर्स। दट।
- 3:06लिसेन एंड फॉर हॉग्स दट। सिक्स।
- 3:15अगर तुम्हारा हृदय खोज नहीं रहा और कान सुनने को बेताब नहीं।
- 3:24तो मेरी वीडियो आते ही क्यों करते हैं?
- 3:32इसका मतलब तुम्हें अभी भूख ही नहीं, तुम्हारी चाहत कुछ और है
- 3:47तुम ढूंढ से कुछ और हो। तुम कुछ और ढूंढ रहे हो तुम्हारी
- 3:58चाहतें कुछ और ढूंढ रही हैं बड़ी कॉम्प्लीमेंट है बड़ी दुविधा है,
- 4:06बड़ी द्वंद है इस द्वंद में तुम खिचे खिचे रहते हो।
- 4:16अनुपमा पुत्री तुम्हारे हृदय को ठेस लगी तो क्षमा चाहता हूँ,
- 4:31लेकिन मैं ऐसे ही लोगों कर लिया हूँ।
- 4:35पानी अगर ये बात कहे मैं प्यासों के लिए हूँ तो मेरी दृष्टि में
- 4:41गलत ना होगा? भौजनगर कहे की मैं भूखों के लिए
- 4:45हूँ तो मेरी दृष्टि में कोई पाप ना है।
- 4:59और फिर यू अरे नॉट बाउंड मुझे सुनो ना सुनो तुम मेरी गिरफ्त में
- 5:15नहीं हो मेरी तरफ से तुम आजाद हो। ये बात किसी से भी पूछ लेना,
- 5:32एकांत में बैठ के इसको गहराई तलक सोचना समझना क्या मुझे उन लोगों
- 5:43के लिए बोलना चाहिए जिनके कान सुनने को बेताब नहीं?
- 5:51जिनके हृदय है बिरहा की अग्नि में जल नहीं रहे, जो इंतजार कर रहे
- 5:59हैं तो कब आए हैं, कितने सावन बीत गए हैं?
- 6:25भूल गए सावरिया आवन कह गए आज गुना आए आवन कह गए।
- 6:45आज हम ना ले ना ही मोरी खबर यार। सावरिया अगर हृदय इस अगर अग्नि
- 7:09में जल रहा है तो मैं तुम्हारे लिए आऊंगा।
- 7:16अगर कान। उस साजन की पुकार को इंतजार कर
- 7:23रहे हैं। कब वो बरसे कब वो बोले तो मैं
- 7:28तुम्हारे लिए हूँ और अगर तुम्हें इंतजार नहीं मत भटकना, वक्त बड़ा
- 7:39कीमती होता है। कहीं तो लगाओ संसार को ही भोग लो
- 7:53भोंगा हुआ भी व्यर्थ नहीं होता। तुम्हें कुछ सीख दे के जाता है।
- 8:01या तो कहेगा भोग व्यर्थ हैं, या तो कहेगा भोग शास्त्र है।
- 8:07दोनों में से कोई तो सीख मिलेंगे, लेकिन वक्त को खराब मत करना वक्त
- 8:14बड़ा अमल्य है एताश खेलना। इस शतरंज खेलना ये व्यर्थ के
- 8:23कामों में ज़िन्दगी का उलझाना मत। यहाँ शतरंज की चाल कोई भी नहीं
- 8:33जीता है तुम गलती में हो फिर? शतरंज की दोनों तरफ़ बैठे हुए
- 8:41हैं। खिलाड़ी समझते हैं मैं जीत गया और
- 8:45मैं हार गया, लेकिन दोनों को ही नहीं पता होता।
- 8:49दोनों हार जाते हैं यहाँ कोई जीतता नहीं, यहाँ सिकंदर भी हार
- 8:54जाता है। और डाइजेनिज भी हार जाता है, ये
- 9:02बड़ी युवी सी बात लगेंगी तुम्हें तुम कहो की बेटी डाइजेनिज तो जीत
- 9:11गया नहीं, वो भी हार जाता है। सिकंदर भी हार जाता है।
- 9:20डायग्नोस कैसे हार जाता है क्योंकि उसे हार कर मिलता है,
- 9:31इशारों का फर्क है सिकंदर जीना चाहता है सिकंदर कठा करना चाहता
- 9:40है। किसकी इच्छाएं पूरी हुई?
- 9:42आज एक भी व्यक्ति है, थोड़े से गिनती चुनती के लोग जिनकी इच्छाएं
- 9:49पूरी हुई, थोड़े से धरती के ऊपर आए और चुपचाप चले गए, विदा हो गए।
- 10:00बस ये वो लोग थे जिनकी इच्छाएं पूरी हुईं, बाकी सब छटपटाते
- 10:09तड़पते यहाँ से विदा हो गए, कोई नहीं जीता।
- 10:21सब हारे हैं ना प्रजा जीतती है ना राजा जीतता है सभी हार जाते हैं
- 10:34ना भोगी जीतता है ना योगी जीतता है, दोनों हार जाते हैं।
- 10:43बस इशारों का फर्क है। आंख लग गई, दोहे पख लग गई।
- 11:01और दरवख्त लग गई लगीवाले कधे भी न समझे तेरी के में आंख लग गई।
- 11:19जोगी हार कर। वो पाता है, योगी उसमें युक्त हो
- 11:27जाता है, फना हो जाता है और भोगी भोगी से दूर बना रहता है।
- 11:39उसको देखता है मात्र। वह भी हार जाता है क्योंकि उसमें
- 11:50उसे मिलता नहीं और योगी को मिल जाता है लेकिन उसको खुद को हारना
- 11:57पड़ता है। बहुत गौर से।
- 12:00फुर्सत के लम्हों में जान ना देखना, विचारना अगर तुम्हें मिल
- 12:05गया तो भी हार के मिलेगा। अगर तुम्हें नहीं मिला तो तुम हार
- 12:14ही गए। बड़ी गहरी बात है।
- 12:24तुम्हें दार्शनिक सी लगेंगी, लेकिन दार्शनिक है नहीं, यह सत्य
- 12:30है। यहाँ हारने वाला तो हारता ही है।
- 12:38जीतने वाला भी हार जाता है। समाज हमें जीने नहीं देता।
- 12:57बाबा क्या करें श्रेषा? समाज तुम्हें जीने से रोकता भी
- 13:15नहीं बैठे। गौर से देखोगी तो 99 प्रतीक्षात
- 13:25बातें। तुम्हारे मन और तुम्हारे समाज ने
- 13:32बनाई है। 99% बंधन तुम्हारे समाज और
- 13:39तुम्हारे मन के खुद की ईजाद है। 1% बंधन कानून का है।
- 13:48वो तो हमें मानना पड़ेगा। कानून के सब पाबंद हैं।
- 13:57कानून तो हमें मानना पड़ेगा, उसका उल्लंघन हम नहीं कर सकते, हमें
- 14:06करना भी नहीं चाहिए। लेकिन ये समाज कहाँ से टपक पड़ा?
- 14:19समाज क्या है? कुछ लोगों का झुंड?
- 14:26लेकिन ध्यान रखना, पुत्र, दूसरों के लिए तुम भी समाज में शामिल हो
- 14:35और दूसरे तुम्हारे लिए समाज में शामिल हैं, यह अनोखा बंधन है अजीब
- 14:44सा बंधन है। तुम किसी के लिए बंधन हो समाज
- 14:51बनकर और वो तुम्हारे लिए बंधन है, समाज बनकर ये समाज है क्या?
- 15:00कुछ भी नहीं। सामाजिक भय है भय के अतिरिक्त कुछ
- 15:09भी नहीं है वास्तव में समाज है ही नहीं पागल मान्यताओं का एक झुंड
- 15:26और तुम जब चाहे छोड़ सकते हो। कानून को तो नहीं जोड़ सकते कानून
- 15:32में तो हम बंदे हैं कहीं भी लेकिन समाज ऐसा है मैंने तुमसे कहा
- 15:47समाज। और तुम्हारा स्वय तुम्हारा मन 99%
- 15:56बंधन इसके बने हैं। इनके कारण तुम दुखी हो और मुझे
- 16:02रोज़ पूछते हो, मैं दुखी हूँ बाबा।
- 16:07लेकिन तुम्हें ये नहीं पता कि दुख तुम्हारा बनाया हुआ है, थोपा हुआ
- 16:14है, नकली है ये सच में नहीं है। ओनली इमेजिंग मशीन कल्पना है।
- 16:26ज़रा गौर से देखना गहराई में जाना समाज तुम्हें क्या कहता है?
- 16:38कुछ परंपराएं जो चार लोगों ने निश्चित कर दी, उनको लाँघना समाज
- 16:48को न गाना होता है। बस यही है ना?
- 16:54चार लोगों ने जबरदस्त हैं बना दी वो समझदार थे, वो मूड थे, वो पागल
- 17:05थे। चार लोगों ने जो व्यवस्थाएँ बना
- 17:10दी उनको लग्न समाज का उल्लंघन मानते हो, जबकि वह अवस्था है,
- 17:20कानून नहीं है, ध्यान रखना कानून को लाँघना।
- 17:28वास्तविक उत्पाद है, लेकिन समाज को लांघना उत्पाद ही नहीं है।
- 17:42तुम्हारे मन का डर है। अब देखिये समाज ने कितनी चीजें
- 17:51थॉपी तुम पर ज़रा गोश्त से देखना खंगाल लो एक बात को ध्यान से समझ
- 18:02लो। एक समाज के अनुसार चलता है, वो
- 18:10समाज की भगत होती है, एक समाज के विरुद्ध चलते हैं, वो बगावती होते
- 18:17हैं, लेकिन एक तीसरी भी परिस्थिति है।
- 18:30ना समाज से विरुद्ध जाना है, बगावती नहीं होना, ना समाज को
- 18:35मानना है क्योंकि समाज कोई कानून नहीं, समाज का व्यय तुम्हारे
- 18:44दिमाग पर न जाने किसी ने थोप दिया।
- 18:48और यह एक संस्कार की तरह तुम्हें जकड़ गया समाज का है, तुम्हारी
- 19:00मान्यता है ना तो उपद्रवी होना है।
- 19:09खुराफाती नहीं बढ़ना है। तुम्हे समाज को तोड़ने की चेष्टा
- 19:16नहीं करनी है और समाज के अनुसार भी नहीं चल रहा है तो क्या करें?
- 19:26सत्य के अनुसार चलो सत्य के अनुसार चलो कानून की व्यवस्था के
- 19:36भीतर रहते चलो। कानून तो तुम्हें 1% बंधन देता
- 19:41है। मैं पहले कह चुका हूँ 99% बंधन
- 19:47तुम्हारे समाज और मन के भय अगर मैंने ऐसा कर दिया तो ऐसा हो
- 19:54जाएगा। मैंने बहुत से लोग समाज के भय से
- 20:00आत्महत्या करते थे थे जबकि समाज सिर्फ भय है।
- 20:09इसके अलावा कुछ भी नहीं। ना तो तुमने विध्वंसक बनना है?
- 20:20समाज कुछ लोगों का सम्मुख एक बात को मानता है, जरूरी नहीं कि तुम
- 20:26भी मानो कानून तो जरूरी है। कानून प्रतिबद्ध है तुम्हारे लिए।
- 20:36लेकिन समाज प्रतिबद्धता नहीं है। अगर तुम्हे कुछ ऐसा लग रहा है कि
- 20:46समाज तुम्हारी मनोवृत्ति या कार्य क्षमता के विपरीत जा रहा है, तो
- 20:52उसको। तोड़ो मत उसको लांघ जाओ क्या कहा
- 20:58मैंने समाज तुम्हें को भी ऐसा लगता है कि खलल डालता है हमारी
- 21:10स्वतंत्रता में। तो तुमने समाज को तोड़ा पर समाज
- 21:16की बातों को मानो मत, डू नॉट एक्सेप्ट अगर तुमने एक्सेप्ट कर
- 21:25लिया तो तुम गुलाम हो गए। अगर तुमने रिजेक्ट कर दिया
- 21:31रिजेक्ट। विध्वंसक रिएक्शन किया तो तुम
- 21:40उपद्रवी हो गए अगर तुम नोटर रहे, अपनी इच्छा के मुताबिक किया।
- 21:51समाज क्या कहेगा? बड़े दुख की बात है समाज तुम्हारे
- 22:02दिलों पर दिमागों पर इतना हावी हो गया है कि मुक्ति की बात छोड़ो,
- 22:13तुम समाज की मान्यताओं को तक नहीं।
- 22:17तोड़ पाए अपने मन की आंतरिक मान्यताओं को कैसे तोड़ पाऊ मैं
- 22:26तुम्हें जबरदस्ती समाज की व्यवस्था मान्यताओं को तोड़ने के
- 22:33लिए नहीं कहता हूँ। मैं तुम्हें उश्रृंकल नहीं बनाता
- 22:38हूँ, मैं तुम्हें स्वछिंद नहीं बनाता हूँ ध्यान रखना, मैं
- 22:45तुम्हें स्वतंत्र बनाता हूँ तुम पहले से ही कानून में आवध हो।
- 22:59ऑलरेडी यू आर बाउंड टु लाज जो हमने संविधान बनाया बस इतना सा
- 23:06हमने वादे काफी हैं, इसके अतिरिक्त समाज का बंधन लांघ जाना
- 23:17है। स्वीकार नहीं करना द्वित करना
- 23:21नहीं, सिर्फ लांग जाना है मानो मत समाज कहता है ये मत कहो ये मत करो
- 23:30ऐसा करना गलत समाज के बनाए हुए सिद्धांत।
- 23:40आज व्यक्ति भोगता है, सती प्रथा थी, अब क्या करे बेचारी, कोई
- 23:52विध्वस्त्र इसका पति उम्र क्या? तो चलो तुम भी जिंदा अग्नि में
- 24:00कूदो यह समाज की प्रथा थी, लेकिन कुछ समझदारों ने तो मैं समझाया कि
- 24:11नहीं ये गलत है। तुम तब तक जिंदा रखो जब तक
- 24:16तुम्हें प्रकृति जिंदा रखती है, वो तो चला गया, अपनी मृत्यु से
- 24:24चला गया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं के तुम सती हो जाओ।
- 24:31लेकिन समाज ने मान सम्मान दिया। यह झूठे सब जवाब दिखाए।
- 24:39बाद में तुम्हारी पूजा होगी, सती का मंदिर बनेगा, लोग फूल
- 24:46चढ़ाएंगे। अरे मरने के बाद भाई श्राद्ध करने
- 24:49का फायदा क्या होता है? मैं रोज़ कहता हूँ।
- 24:55अगर श्रद्धा है किसी के प्रति तो जीते जी उसकी सहायता करो, जीते जी
- 25:04उसकी जरूरतों को पूरा करो, मरने के बाद किसी को पानी में न
- 25:09पिलाना। कोई पितरवितर नहीं होता यहाँ पर
- 25:13ध्यान से सुन रहे, मैंने बहुत बार पहले भी कहा है यह पंडितों का
- 25:20जमावड़ा अपने लोभ के लिए स्वार्थ के लिए।
- 25:30तुम्हारे सुखु नाश कर देता है, तुम्हारे आनंद का हानन कर देता
- 25:37है, इससे तुम समाज कृत्य हो। कोई भी ऐसी प्रणाली जो हमारे
- 25:48संविधान में नहीं लिखे? उसको मत मानो सिर्फ मत मानो उसको
- 25:54लांग जन उसकी फिक्र ही मत करना वो ही समाज है और वो ज्यादा है।
- 26:01मैंने कहा 99% समाज है, तुम्हारे दिमाग के ऊपर 1% कानून है।
- 26:10और 1% कानून तो प्रत्येक व्यक्ति निभाता है, जो नहीं निभाता उससे
- 26:18कानून निपटे, लेकिन समाज से मत उलझो।
- 26:29समाज एक छाया की तरह है जिसका कोई वजूद नहीं है।
- 26:35ध्यान से समझना बात को जस्ट ए शैडो समाज एक छाया है।
- 26:45इसका कोई वजूद नहीं है। यह सिर्फ कल्पना है, यह तुम्हें
- 26:53डराता है तुम डरो मत, यह तुम्हें कहता है कि मुझे मानो इसे मत मानो
- 27:09क्या हर्जा। मुझे किसी लड़के से प्रेम हो गया
- 27:17था, लेकिन समाज आड़े आ गया। माँ बाप डर रहे थे।
- 27:33माँ बाप कहते समाज क्या कहेगा, लोग क्या कहेंगे?
- 27:40और मैं सिर्फ उसी से प्रेम करती थी।
- 27:45लोग क्या कहेंगे यही वो सोचते हैं ध्यान रखना।
- 27:53तुम्हारे माँ बाप ने जो सोचा लोग क्या कहेंगे?
- 27:59वो लोग भी यही समझते हैं कि लोग क्या कहेंगे?
- 28:02तो फिर समाज है कहाँ? सभी तुम एक दूसरे से डर रहे हो।
- 28:12और तुम जीने को स्वतंत्र हो, तुम्हारी जीने की स्वतंत्रता का
- 28:19हनन किसने किया? ज़रा गौर से सोच के बताना मुझे
- 28:23ऐसा नहीं। तुम्हारे जीने की स्वतंत्रता का
- 28:30हनन किसने किया? किसने तुम कहोगी समाज ने किया
- 28:40दूसरे लोग कहेंगे समाज ने किया तीसरे लोग कहेंगे समाज ने किया
- 28:44लेकिन ये समाज है कहाँ है? ये सामाजिक भ्रम है, इस भ्रम से
- 28:54लड़ो भी मत भ्रम है, छाया से कभी झगड़ा होता है क्या कभी शैडोज से
- 29:03झगड़ा होता है? कभी शैडोज से मार पिट होती नहीं
- 29:08होती ना तो छोड़ दो इसको बेस्ट ट्रीटमेंट समाज को मानो मत
- 29:19क्योंकि ये है ही नहीं। समाज तुम्हारी मान्यता है सत्य से
- 29:29विपरीत जो है नहीं, जिसका वजूद नहीं।
- 29:32जब मुझे कोई दिखा तो ये समाज कहाँ है?
- 29:36व्यक्ति हैं, समाज कहाँ है मुझे कोई बता दे।
- 29:44मेरी ज़िन्दगी में लाखों लोग ऐसे हजारों लोग ऐसे आए जिनसे मैंने
- 29:50कहा समाज कहाँ है मुझे दिखाओ कहाँ है समाज?
- 30:00मुझे इंगित करो की ये समाज जब भी उन्होंने इंगित किया व्यक्ति ही
- 30:07निकला और वह व्यक्ति तुमसे दुखी है क्योंकि वह तुम्हे समाज समझ
- 30:16रहा है और तुम दूसरों से दुखी हो। क्योंकि तुम मुझसे समझ रहे हो,
- 30:24देखिए ऐसा तो तुम जी नहीं पाओगे, ज़िन्दगी बड़ी कीमती है, ज़िन्दगी
- 30:37बहुत महत्वपूर्ण है। ज़िन्दगी किसी प्रयोजन के लिए है
- 30:44अगर अब ज़िन्दगी मिल ही गई है तो इसको अच्छे से जीरो और अच्छे से
- 30:52जीना क्या होता है? बेखो हो के जीरो, निडर हो के जीओ।
- 31:00आनंद से जियो, अहोभाव से जियो, डर से ना छिओ और तुमने तो ऐसे ऐसे डर
- 31:10बना लिए जिन डरों का वजूद ही नहीं है।
- 31:17ये समाज इनमें से एक है। अगर किसी को समाज मिल जाए तो मुझे
- 31:23जरूर दिखाना, मैं उसके पांव पकड़ लूँगा, किसी को भी समाज मिल जाए,
- 31:33कहीं चलता करता घूमता करता। हँसता खेलता लड़ता झगड़ता, कहीं
- 31:41समाज मिल जाए तो मुझे बता देना, हमेशा व्यक्ति ही मिलेगा और वह भी
- 31:49तुमसे ही डर रहा है तुमने कभी ये सोचा नहीं?
- 31:55तुम एक दूसरे से डर रहे हो तो जी कौन रहा है ना तुम जी रहे हो ना
- 32:02वो जी रहा है उससे तुम्हारा खौफ है तुमको उसका खौफ है क्या इसको
- 32:07ज़िन्दगी करते हैं? किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो
- 32:14यार वो। हमको भी जीने का अंदाज़ सीखा दो
- 32:21यारो किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो हमको भी जीने का अंदाज़
- 32:30सीखा दो यारो प्यार लेते हैं। कहाँ से ये जमाने वाले हैं प्यार
- 32:43लेते हैं कहाँ से ये जमाने वाले उन गली कूचों का रस्सा तो दिखा दो
- 32:50यारों। प्यार लेते हैं कहाँ से ये जमाने
- 32:56वाले उन गली कूचों का रास्ता तो दिखा दो यारो किस तरह जीते हैं ये
- 33:03लोग बता दो यारो दर्द के नाम से वाकिफ ना जहाँ हो कोई।
- 33:12दर्द के नाम से वाकिफ ना जहाँ हो कोई ऐसी महफिल में हमें भी तो बता
- 33:19दो यार साथ देना हो तो पीने की आदत डालो।
- 33:30साथ देना हो तो पीने की आदत डालो वरना मैं खाने के मैं खाने का डर
- 33:42हमसे छुड़ा दो यारों। ये कैसा मुकाम भी है यहाँ जीने की
- 33:57कलावती है ये देख लो कि लाखों बंधनों से तुम बंधे हुए हो।
- 34:08और सभी बंधन नकली हैं, बस तुम ही अंधे हो गए हो तुमने आँख खोल के
- 34:19कभी देखा नहीं इन बंधनों को तुम्हारे दुख का मूल कारण यही है
- 34:26आँखें खोलो। देखो ये समाज कहाँ है तुम्हारी
- 34:36मानी हुई मान्यताएँ ठीक हैं या नहीं, कितनी मान्यताएँ तुम्हारी
- 34:43और कितनी मान्यताएँ समाज की इनको तोड़ना नहीं है।
- 34:47इनको मानना नहीं है बस और आज तुम इसको लांघोगे अब ये बात ध्यान से
- 34:57समझ लेना आज तुम इसको लांघोगे कर को, दूसरा डायर का इसको लागने का।
- 35:06और यह कोई कानून नहीं है। समाज एक अवस्था है, सरकमस्टैंसेस
- 35:15बदलते हैं, ज़माना बदलता है। समाज भी बदला जाना चाहिए लेकिन
- 35:22तुमने ज़माना बदल गया। समाज वही रखा तो ठहरी हुई चीज़
- 35:33में सड़ाध पैदा होती है। समाज आज सड़ा हुआ फल हो गया, गला
- 35:40हुआ जैसे पानी को हम मुद रख एक जगह पे रखते हुए सड़ाध मारे।
- 35:47तो समाज की व्यवस्थाएँ वहीं प्राणी वो ही है चाल बेढंकी जो
- 35:53पहले थी वो अब भी है कितनी परातम मान्यताओं को तुम ढो रहे हो, जबकि
- 36:04मान्यताएँ। जब बनाई गई तभी भी वो नहीं थी और
- 36:09आज भी उनका कोई वजूद नहीं। देखो अगर जीवन को जीना है तो मेरी
- 36:19एक बात हृदय में बसा लेना। जीना है तो सभी मान्यताओं को
- 36:30समाप्त कर दो। वो समाज हो या तुम्हारी खुद की
- 36:36मानसिकताएं हो डरो के। तो मरने से पहले मरोगे डरोगे तो
- 36:50मरने से पहले मरोगे। वीर एक बार मरता है, कायर रोज़
- 36:59रोज़ मरता है और सही पूछो तो कायर पल पल मरता है।
- 37:06वीर एक बार मरता है और अगर ठीक से मैं कहूं तो वीर कभी नहीं मरता,
- 37:13वीर अमर होता है, इसको समझ सको तो समझेगा कायर हर पल मरता है, हर
- 37:21क्षण मृत्यु होती है उसकी। हर क्षण टूटते हैं तुम्हारी, माने
- 37:28हुए झूठ तुम पल पल मरते हो कायर पल पल मरता है बहादुर बनो।
- 37:43इन मान्यताओं को तोड़ो मत मैं बार बार कर रहा हूँ शैडो से कभी झगड़ा
- 37:50नहीं होता छायाओं से डरना नहीं होता छायाओं को लग जाना होता है
- 37:57अब कोई छाया रास्ते में आ गई वृक्ष की छाया आ गई।
- 38:02किसी की भी छाया आ गई क्या उससे लड़ के जाते हो?
- 38:05तुम नहीं उसके ऊपर से चले जाते हो वो तो मैं कुछ नहीं कहती मान्यता
- 38:11तो मैं कभी कुछ नहीं कहती, सिर्फ तुम डरते हो।
- 38:16इन मान्यता से समाज इसी तरह की एक मान्यता है।
- 38:22और संत कहते हैं कि तुम मान्यताओं को तोड़ने का साहस जुटाओ, बहादुर
- 38:27बनो। ये बहुत बड़ी बहादुरी है।
- 38:34जो जो मान्यताएँ तुमने थोप ली वो समाज की थी या तुम्हारी अपनी थी।
- 38:43लेकिन मान्यता तुम्हारे लिए दुख का कारण है।
- 38:47मान्यता तुम्हारे लिए दुख का कारण है।
- 38:51वो समाज ने बनाई, वो तुमने अपनी खुद बनाई।
- 38:56इन मान्यताओं को तोड़ो मत। इनको सिर्फ लांघ जाओ, क्रॉस करो
- 39:05इनसे लड़ो मत समाज से लड़ना नहीं क्योंकि में बार बार कहता हूँ
- 39:12छायाओं से कभी लड़ा नहीं जाता जो है ही नहीं जैसे भ्रम है भ्रम एक
- 39:18छाया है। मैंने समझाया, आपको भ्रम से लड़ा
- 39:23नहीं जाता, भ्रम को देखा जाता है, लोग ब्रह्मों से लड़ने लग जाते
- 39:31हैं और सारी शक्ति वह हो जाती है जो ज़िन्दगी बदल कर प्यार के
- 39:37लम्हों में। गुजर शक्ति थी वो तुम लड़ाई
- 39:42झगड़ों में गुजार देते हो इन छायाओं को न लड़ना है, न अपना न
- 39:51छायाओं को लांघ जाना है बस वो ही समाज है मान्यता है समाज।
- 39:57और भी तुम्हारी बहुत सी मान्यताएँ हैं।
- 39:59प्रवचन बहुत लंबा हो जाएगा। इन मान्यताओं को ना लड़ना है ना
- 40:07इनको मानना है माने तो तुम पहले से बैठे हो संत यही सखाता है पहले
- 40:13साहस कर लो। समाज की मान्यताओं को लांघने का
- 40:21हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा। फिर तुम बहुत गहरी मान्यताओं को
- 40:29तोड़ पाने में समर्थ हो सकोगे। गहरी मान्यताएँ क्या हैं?
- 40:36मैं शरीर हूँ, मैं मान हूँ ये गहरी मान्यताएँ ये भी एक भ्रम है।
- 40:46ये सत्य नहीं है। भ्रम तो भ्रम होता है।
- 40:52तुम रस्सी में सर्प मान लो, ये भ्रम है और भ्रम सदा ही गलत होते
- 41:02हैं, भ्रम तोड़ने के लिए होते हैं, भ्रम अपनाने के लिए नहीं
- 41:10होते। अगर गलती से आपको भ्रम हो गया, जो
- 41:15कि है क्योंकि सारा संसार दुखी है और आज बड़ी अजीब सी परिस्थिति
- 41:26दुनिया के सामने आ गई है। जो हो नहीं वो दिखा दो दिखावा कर
- 41:33दो सारी दुनिया इसकी गृहस्थी से दुखी है तुम्हारी मान्यताएँ
- 41:43तुम्हारे लिए जी का जंजाल है रामकृष्णा।
- 41:46परमहंस की कहानी माँ की पूजा पर तिथि देखिये मूर्ति पूजा करके तुम
- 42:03उस तल पर पहुँच जाओगे। किसे सय विकल्प समाधि कहते हैं
- 42:10आनंद आएगा विलशक। लेकिन भ्रम नहीं टूटेगा।
- 42:18यह सत्य है मूर्ति पूजा करके आनंद तो तुम्हें आएगा समाधि लगेंगी अगर
- 42:28तुम बहुत ही ज्यादा जैसे मैं कहता हूँ इन्सर्ट यूरसेल्फ़
- 42:32कंप्लीट्ली। अपने आप को उसमें इन्सर्ट कर दो।
- 42:36तुम तो वो भी नहीं कर पाते, तुम तो मूर्ति पूजा करके पीछा छुड़ा
- 42:42लेते हो। किसी तरह अगर मूर्ति पूजा ही करने
- 42:47लगे तो फिर ढंग से कर लो कम से कम।
- 42:53एक पड़ाव पहले तो रुक जाओगे दीर्भिकल्प समाधि में न सही
- 42:58सबिकल्प समाधि में तो चले जाओगे और सबिकल्प समाधि में भी आनंद तो
- 43:04है, तुम्हारा भ्रम नहीं टूटा है, बस दी अल्टीमेट इल्लूशन।
- 43:12आखरी भ्रम अभी तोड़ना बाकी है सेविकल पर समाधि के आगे एक भ्रम
- 43:18तोड़ना बाकी रह जाता है, वो यही सबसे बड़ा भ्रम है।
- 43:22यहाँ बड़े साहस की जरूरत होगी। कारण लोग अध्यात्म के पथ पर न
- 43:28चले। कामधंधा करें।
- 43:34अध्यात्म के पथ पर चलने वाला वीर होता है।
- 43:40महावीर का किताब मिलता है वर्धमान को तो माँ की पूजा करते, सेवा
- 43:52करते, भोग लगाते। बड़े प्यार से चूरी बनाते हैं,
- 43:58चोरी खिलाते हैं। चुरी बनाते वक्त पहले खुद खा के
- 44:04देख लेते हैं रामकृष्णा परमहंस कभी थोड़ा सा मीठा और डाल देते
- 44:13हैं। कभी वैसे ही चलने देता है।
- 44:191 दिन वहाँ की कमेटी के किसी सदस्य ने देख लिया।
- 44:26अरे ये पुजारी बड़ा अनोखा देखा। यह तो माँ को भोग लगाने से पहले
- 44:34खुद खा लेते हैं, झूठा कर देता है, झूठा भोजन कराता है माँ को और
- 44:41ये बात है पहले खुद खा लेता है फिर फिर माँ को खिलाता है।
- 44:53हालांकि मूर्ति खाती है, ध्यान रख रहा हूँ।
- 44:57मूर्ति ने कभी नहीं खाया, कभी खाये की भी नहीं शिकायत कर दी।
- 45:09रानी रसमनी के पास गया मसला रानी रसमनी ने पूछा गदाधर उसका नाम
- 45:25मैंने सुना है तुम माता को झूठा भोग लगाते हो?
- 45:30नहीं, मैंने सुना है तुम पहले खुद खाते हो, फिर माँ को भोग लगते हो,
- 45:39हाँ ये तो ठीक है, क्यों लगाते हो तो झूठा हो जाता है देखो जहा
- 45:47प्यार इतना ज्यादा हो। वहाँ चख तो लेना चाहिए, मीठा कम
- 45:52ना हो, जो मुझे ही अच्छा ना लगा। कई बार मीठा रानी कई बार मीठा और
- 46:00डालना पड़ता है जो मुझे ही नहीं भाया, माँ को कैसे भाएगा?
- 46:08तो मैं थोड़ा मीठा और डाल देता हूँ।
- 46:11जब मेरे खाने योग्य हो जाता है तो मैं माता को खिलाता हूँ, उससे
- 46:17पहले तो मेरे खाने योग्य ही नहीं था।
- 46:19मैं माँ को कैसे कहलाता हूँ वह तो जगत जननी है।
- 46:26और मेरी माता भी ऐसे किया करती थी गधाधर बोले मुझे खिलाने से पहले
- 46:32खुद खा लिया करती थी। सच्ची माताएं ऐसी ही होती हैं,
- 46:36बच्चे के खाने योग्य भी है, ये देख लिया करती तो मेरी माँ भी ऐसे
- 46:43करती जब मुझे कोई चोरी कर लाती। पहले खुद खा के देख लेती, फिर कभी
- 46:49कभी थोड़ा सा और चीनी डालना पड़ता फिर मुझे खिलाती रानी रास्वानी के
- 46:57पास कोई जवाब नहीं था, वापस चली गई।
- 47:05प्रबुद्ध व्यक्तियों का जवाब होता भी नहीं, इसलिए प्रबुद्ध
- 47:10व्यक्तियों का तर्क मत करना, क्योंकि लेवल का फर्क है डायमेंशन
- 47:18का फर्क है, तुम जहाँ से बोल रहे हो।
- 47:21उस डायमेंशन पे वो नहीं खड़े हैं वो लांघ चूके हैं उनको पूजा करते
- 47:30हैं लेकिन सब कल्प समाधि में चले गए बड़े मस्त भजन गाते नाचते।
- 47:40वो ऐसा नहीं कि सुबह शाम जैसे आज के पुजारी करते हैं।
- 47:434:00 बजे मंदिर खुलेगा, 8:00 बजे बंद हो जाएगा, ऐसा नहीं था।
- 47:50वहाँ तो नाच चलता, गाना चलता, भजन चलते पूजा होती, आरती होती।
- 48:01नाचते लेकिन पता नहीं सुबह शाम 24 घंटे बीत जाएं और फिर कभी कभी दो
- 48:104 दिन जोत भी नजर आते। ऐसा थी उनकी पूजा।
- 48:22आनंद तो बहुत लेकिन कहीं कमी थी। जैसे आपको लगता है पदार्थों में
- 48:31सुख तो है, लेकिन फिर भी कुछ नहीं मिला ऐसा लगता है।
- 48:38तो तुम कहीं और खोलते रहो धन में नहीं मिला तो चलो पदवी में मिल
- 48:44जाएगा, पदवी में नहीं मान सम्मान में मिल जाएगा लोग मुझे अवतार
- 48:49मानने इसमें मिल जाएगा लोग मुझे पांव पूजने लग जाए मेरे इसमें मिल
- 48:54जाएगा तुम जगह जगह तराशते हो, तो ये तलाशना तुम्हें एक सबक दे जाता
- 49:00है, तलाशना जरूरी है। सबक ये दे जाता है कि इन सब में
- 49:07कुछ नहीं है और वैराग्य के लिए ये अति जरूरी है।
- 49:14इसे अष्टावक्र बहु कहते हैं। तो राम किशन परमहंस पूर्ण तृप्त
- 49:22नहीं थे। यद्यपि प्रसन्न बहुत थे, लोभ
- 49:27त्यागती क्या था? उनका भतीजा हृदय उनके साथ रहता,
- 49:35वो लालची था। एक बार किसी सेठ ने कहा हृदय से
- 49:43पता था ये थोड़ा सा लोभी है किंतु राम कृष्ण परमहंस के इस अवस्था
- 49:49में दर्शन करा दे, उस अवस्था में दर्शन अगर किसी भी महान पुरुष का
- 49:55कर लिया जाए। फिर तुम्हें कुछ करने की आवश्यकता
- 49:59नहीं होती जैसे तुम किसी चीज़ को प्रत्यक्ष आँखों से निहार लो तो
- 50:08तुम्हारे संदेह मिट जाते हैं। समझाई बात।
- 50:18अगर भीतर कोई भ्रम हो और तुम नग्न आँखों से उसे देख लो, कि यह गलत
- 50:25है, तो तुम्हारा संध्या मट जाएगा और संदेह से ही तुम दुखी हो।
- 50:30शंख आत्मा विनिश्चित संदेह के कारण ही तुम दुखी हो।
- 50:41तुम खोजते हो हर जगह लेकिन मिलता नहीं है, ये जरूरी है रामकृष्णा
- 50:46परमहंस उस आलम तक पहुँच गए जहाँ से विकल्प समाधि लगती है।
- 50:55अभी निर्विकल्प नहीं आए थे। आनंद तो आता तृप्ति ना आती?
- 51:03अब देखिए ये दो शब्द हैं, ये दो शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं।
- 51:08पहली बार बता रहा हूँ सबकल्प समाधि में आनंद तो है।
- 51:17पदार्थों से ज्यादा है, पदार्थों में सुख है, आनंद नहीं है।
- 51:22अब इसको ध्यान से समझ लेना पदार्थों में सुख है, आनंद नहीं
- 51:27है, सब विकल्प समाधि में आनंद है, लेकिन।
- 51:33घना नहीं है अभी आनंद ने तुम्हें गहरा नहीं अभी आनंद में तुम समाई
- 51:41नहीं, कुछ बाकी है जो समाना शेष रह गया है उस से विकल्प समाधि
- 51:49होती है, अभी विकल्प पुश्ते हैं। अभी संकल्प उठते हैं और इस बात से
- 51:59थोड़ा थोड़ा दुखी भी थे। उस सेठ ने कहा, तू इस अवस्था में
- 52:06विजय दर्शन करवा दे। तो पैसे ले ले जो चाहे लालची का।
- 52:15उसने कहा मैं ₹10,000 दे दूंगा, उस वक्त का ₹10,000 दे दूंगा तेरे
- 52:22को कोई ज्यादा नहीं होता। पूरे संसार की मल्कियत भी सौंप दी
- 52:28जाए। अगर उस अवस्था को देखने के लिए तो
- 52:31कम पड़ेगी। असित गरिषमम स्यात का जलम
- 52:43सिन्धोपात्र सुरतर्व शाखा लेखनी पत्र भरवे लेखित यदि ग्रहीतवा
- 52:51शारदा सर्वकारम। तड़पि तब गुणाना में परम नहीं आती
- 52:57है, उसका वर्णन वखान नहीं किया जा सकता।
- 53:03यह वो अवस्था है। इसका गुणगान लिखा नहीं जा सकता।
- 53:07इसका मूल्य नहीं किया जा सकता। यह या तो मुफ्त मिलती है।
- 53:13या फिर धन से नहीं मिलते, मुफ्त ही मिलती है जैसे जीवन के लिए
- 53:20ऑक्सीजन फ्री मिलती है, बहुमूल्य चीजों का परमात्मा मूल्य नहीं
- 53:26लेता। आपसे परमात्मा किसी भी चीज़ का
- 53:28मूल्य नहीं लेता। सभी कुछ उसका बनाया हुआ बहुमूल्य
- 53:31ही है। अब मुरली ही है तो उसने कहा कि
- 53:36दर्शन करवा दे ₹10,000 ले ले, मेरे से लालच खा गया भीतर गया।
- 53:45उसने कहा जा के मामा कहा करता था मामा मामा।
- 53:54क्या बात है मामा, एक व्यक्ति आपके दर्शन करना चाहता है नहीं,
- 54:00नहीं, बगादो से नहीं मामा मैंने तो कह दिया जो बांध दे बैठ नहीं
- 54:09करना है बगादो से। मामा 10,000 रूपये दे रहा है और
- 54:17रामकृष्णा परमहंस उस अवस्था से बाहर आ गए।
- 54:22सब विकल्प समाधि से बाहर आ गए। बड़े दुखी हो गए हैं ये लोग।
- 54:29इन अवस्थाओं को व्यापार बना लेते हैं गंगा मैया की तरफ दौड़ पड़े,
- 54:39दुखी होकर बोले माँ तू इसका कोई इंतजाम क्यों नहीं कर देती?
- 54:44हरदा का यह मुझे बड़ा तंग करता है।
- 54:49यह लोभ ही है। यह लोगों को मुझे दर्शन करवाने ले
- 54:55आता है तो इसका कोई इंतजाम कर दे ना माता और उस अवस्था में।
- 55:09कहा गया एक शब्द प्रमंड के पास जाता है।
- 55:20बहुत बड़े थे। राम किशन हृदयराम से और बहुत पहले
- 55:26छोटी अवस्था में चले गए। राम कृष्ण परमहंस की मंशा नहीं
- 55:35थी, बड़ा दुखी हुआ है उसके जाने से ह्रदय ही तो मेरा था, ह्रदय था
- 55:46अब मेरी सेवा कौन करेगा? वहाँ तोतापुरी मैंने बहुत बार
- 55:54कहानी सुनाई, आपको कहता इसको छोड़ दे, जो थोड़ा सा कमीवेशी रहेंगी,
- 56:04पूरी हो जाएगी। इसको कैसे छोड़ दूँ?
- 56:10जस किश्ती ने मुझे भवसागर पार कराया, उस किश्ती को छोड़ दो
- 56:16तोतापुरी कहते हैं, कस्तियां किनारे पे लगाने के लिए होती हैं,
- 56:23चिपक जाने के लिए नहीं होती। समझ लेना, बात को कस्तियाँ
- 56:33प्यारों पे लगाने के लिए होती हैं, चिपक जाने के लिए नहीं होती
- 56:38तो मैं भी कहूंगा मेरे जाने के बाद चिपक मत जाना, मेरे होते हुए
- 56:44भी चिपक मत जाना मेरी बातों से लाभ उठा लेना।
- 56:48मार्गदर्शन ले लेना लेकिन चुपक बच्चा ऐसा ही महावीर के शिष्य के
- 56:58साथ हुआ था। गौतम के साथ कहानी बड़ी लंबी हो
- 57:02जाएगी। तो सा पूरी कहने लगा इसको छोड़
- 57:11दो, अगर निर्विकल्प चाहिए, बस आनंद ही आनंद चाहिए, जो कभी कभी
- 57:20तुम दुखी हो जाते हो, ये न हो तो फिर तुम सविकल्प से छलांग लगा के
- 57:27निर्विकल्प में आ जाओ। कैसे आऊं चलो मैं सखा देता हूँ गए
- 57:35बताओ कौन आया? विचार आये आगे कौन आया?
- 57:40एक वक्त आया कि माँ आ गई बहुत गहरे में जो हम।
- 57:47संस्कार हर वक्त जुटाती रहती हैं। वो हमारे बहुत गहरे में बैठ जाता
- 57:52है और वो आखिर में आया करता है। हमारी ये मान्यता है कि मैं शरीर
- 57:57हूँ, मैं मन हूँ ये आखिर में आएगा इसलिए तुम्हें इतना झंझोरती हैं
- 58:04ये क्योंकि तुमने जन्मो जन्मो से माना।
- 58:07कि मैं शरीर हूँ और ये संस्कार इतना प्रबल और गहरा हो गया कि ये
- 58:13तुम्हारे अंतर के अंत में बैठ गया।
- 58:18बॉटम ऑफ द एंटायर या फिर मैं आएगा।
- 58:26इसलिए जब तुम्हें कोई मृत्यु के बाद कहता है तो कब जाते हो?
- 58:32क्योंकि तुम शरीर हो, लोग ऐसे ही चिपके बैठे हैं कोई ख्यातियों से
- 58:42कि मैं साहूकार हूँ, एक नंबर का अमीर हूँ।
- 58:48मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ, मैं चीफ मिनिस्टर हूँ, मैं ये हूँ मैं वो
- 58:52हूँ लेकिन ये सब मान्यता हैं। बहुत गहरे में चली जाती हैं ये
- 59:02मान्यता। जिनको आप हर वक्त दोहराते हो तो
- 59:08आखिर में माँ आ गई, कहता माँ आ गई, तोतापुरी कहने लगे इसके सिर
- 59:16को काट दो, धड़ से अलग कर दो, अरे नहीं हो सका।
- 59:24कहते कैसे काटूं? जैसे तुने बनाई तुने बनाई भी तो
- 59:30कल्पना से भाई तो कल्पना से ही काट दो नहीं मेरे भाई साहस नहीं
- 59:40ये देखिए, साहस बड़ा कीमती है। साहस बटोरना पड़ेगा।
- 59:47इन भ्रमों को तोड़ने के लिए चाहे समाज का हो, चाहे तुम्हारी स्वै
- 59:51का हो, तुम्हारी स्वै का सबसे बड़ा भ्रम है या आखिर में आएगा
- 59:55मैं कौन? लेकिन समाज से शुरू करना होगा।
- 1:00:02समाज की मान्यताओं को मत मानो और फिर आखिर में आकर तुम्हारी
- 1:00:07मान्यताओं को भी मत मानो जानो सत्य क्या है यही मेरा संक्षेप
- 1:00:13में सभी वीडियो में आपको कहना होता है लेकिन फिर आखिरी दिन।
- 1:00:23राम किशन गए, उस स्थान पर कौन आया?
- 1:00:27सोतापुरी ने पूछा कहता माँ इसका सिर धड़ से अलग करता हूँ, मैं तो
- 1:00:36सुबह होते ही चला जाऊंगा देख सहस जूठा।
- 1:00:41कैसे कार्टून तलवार उठा ले कल्पना की और उसका सिर दर्द से अलग करता
- 1:00:46है। रामकृष्णा ने साहस जुटाया।
- 1:00:50बहुत साहस जुटाना पड़ता है, ध्यान रखना।
- 1:00:54ये मान्यताएँ ऐसे नहीं कटेंगी तुम कह तो देते हो बाबा आनंद नहीं
- 1:01:00आता, लेकिन देखो ये मान्यताओं को ये टूटती नहीं तुम्हारी तुमने
- 1:01:08क्या कुछ मान रखा है? लाखों लाखों मान्यताएँ हैं
- 1:01:13तुम्हारे भीतर बाहर अचेतन भरा पड़ा है मान्यताओं से।
- 1:01:19और तुम कहते हो बाबा सड़ांध आती है, सड़ांध आएगी ही, गंदगी इतनी
- 1:01:23भरी पड़ी है, सहस जुटाया रामकृष्णा ने भगत था माँ को,
- 1:01:31सिमरा था नचा था, भोग लगाया था। रात रात दिन दिन भर नाचा था गाया
- 1:01:38था, महिमा गाई थी और तलवार से उठाके सर धड़ से रख कर दिया और
- 1:01:44तत्क क्षण नर्वकल समाधि में पहुँच गए।
- 1:01:48तुम भी पहुँच ही जाओ ऐसा ही कुछ करना तुम्हारी बनाई हुई मान्यताओं
- 1:01:54को। तुम्हें ज्यादा से ज्यादा सब
- 1:01:57विकल्प समाधि में ले जाएंगे और सब विकल्प समाधि अंतरिम छोर रहे हैं।
- 1:02:06अंतिम भी नहीं है। अंतरिम भी नहीं है गौतम।
- 1:02:17चिपकज्ञा था गुरु ही उसके लिए शप था, बड़ी सेवा करता देन रात पांव
- 1:02:26दबाता रहता। महावीर कहते मेरे पांव दुखते नहीं
- 1:02:29हैं गौतम मतलब दबाओ इन्हें लेकिन दबा ही जाता।
- 1:02:36बड़ा मोह था बड़ा चिपकाहट था चिपकाहट कैसी कैसी हो जाती हैं
- 1:02:42देखो कोई प्रेमिका से चिपट जाता कोई प्रेमी से चिपट जाता कोई
- 1:02:52भगवान से चिपट जाता। कोई विष्णु भगवान से चिपड़ जाता
- 1:02:57है, कोई देवी माँ से चिपड़ जाता है लेकिन चिपकाहटे तो मैं आज़ाद
- 1:03:02नहीं होने देती। बस तुम्हारी स्वतंत्रता में अगर
- 1:03:06कोई बाधा है तो वो तुम्हारी मान्यताएँ चिपकाते हैं, इनसे
- 1:03:12मुक्त हो जाओ तुम मुक्त हो सदा। यू आर ऑलरेडी लिबरेटेड।
- 1:03:23बस इन मान्यताओं को हटाना है एक एक करके हटाते जाना है।
- 1:03:32तुम हल्के रोज़ होते जाओगे। और हल्के होते होते 1 दिन क्या
- 1:03:37होगा खो जाओगे। तुम्हें पता चलेगा कि मैं
- 1:03:42मान्यताओं का एक समूह था वसुता मैं जो था वो तो कभी मरा ही नहीं
- 1:03:49हूँ वसुता मैं जो सदा से रहा हूँ। वह तो साक्षी की तरह आज भी है।
- 1:03:56वह तो सोते जगते, काम करते, खाते पीते सदा ही तुम्हें निहारता रहता
- 1:04:02है, तुम्हारे सभी काम बराबर वो नोट करता है वह जागता हुआ वो तुम
- 1:04:10हो। पर महावीर ने कहा गो तुमसे गौतम
- 1:04:15तू इतना ज्यादा मोहम्मत किया कर मुश्किल आयेंगे तुझे लेकिन वो ही
- 1:04:23बात जीस नाभ ने किनारे लगा दिया उसको छोड़ू किस?
- 1:04:30अब चिपकाटी किसी भी तरह के हो सकते हो जरूरी नहीं की धन से ही
- 1:04:35चिपक जाओ तुम धन से न चिपको, तुम सिविकल्प समाधि से भी चिपक सकते
- 1:04:48हो, वहाँ भी आनंद तो है। लेकिन पूर्ण नहीं है, वहाँ भी
- 1:04:59बरकरार रहती हैं। तो हमारी मान्यता पूर्णमुक्त कब
- 1:05:03होगे? जब सभी मान्यताएँ खो जाएंगे समाज
- 1:05:09की। तुम्हारी खुद की और तुम्हारी
- 1:05:13बिल्कुल अंतरिम मान्यता है मैं हूँ कौन ये जानकर ये देखकर खुली
- 1:05:20आँखों से अपनी आँखों से अपने अनुभव से जब तुम देख लोगे मैं हूँ
- 1:05:27कौन? तो तुम्हारी मान्यताएँ ढोल दूसरे
- 1:05:33तो के बिखर जाएंगे और तुम वहाँ चले जाओगे जहाँ तुम सदा से हो तुम
- 1:05:43सदा से हो ऐसे ही हो कभी बिगड़े तिगड़े नहीं।
- 1:05:49कभी तुम पे धूल जमी नहीं, सभी भ्रम था।
- 1:05:57सत्य जो है वो आज प्रकट होगा और महावीर ने जीस धन प्राण छोड़ने से
- 1:06:05दहेज छोड़ने से। गौतम से कहा जा भिक्षा ले आ और
- 1:06:11बाद में प्राण छोड़ दिए, त्याग दिया एक छोटी सी पर्ची के ऊपर कुछ
- 1:06:22लिख के छोड़ गए गौतम आएगा रोयेगा। बड़ा चितकार करेगा, पुकार करेगा
- 1:06:28और लाने का नहीं देगा, फिर पूछेगा मेरे लिए संदेश ये पर्ची उसे दे
- 1:06:33देना, ये संदेश है गौतम किनारे लग गया था, लेकिन जिसने किनारे लगाया
- 1:06:44नाव ने उससे चिपक गया था। तुम भी ख्याल रखना, तुम्हारी
- 1:06:52मान्यताओं को तोड़ने वाले के साथ चिपक मत जान अन्यथा बात वही वही
- 1:06:58वही डाक के तीन पाथ तुम दुखी रहो। ऐसा ही हुआ।
- 1:07:07प्राण त्याग गए गौतम आया भिक्षा लेके आ रहा था, रास्ते में एक
- 1:07:15स्त्री मिली, गुरुदेव तो चले गए, प्राण त्याग दिए, झटका लगा, हाथ
- 1:07:24में भिक्षा पत्थर तक गिर गया। बागा जाके देखा सिर्फ शरीर पड़ा
- 1:07:33था चैतन्य चढ़ गई थी बहुत रोया बहुत रोया शिकवे शिकायतें की
- 1:07:43मैंने कितनी बार कहा गुरु जी? मेरे सामने प्राण त्यागना आपने
- 1:07:52फिर भी वही किया, रो धो लिया बहुत फिर पूछा मेरे लिए कुछ संदेश छोड़
- 1:07:59के हाँ जी तेरे लिए छोटी सी पर्ची दे गए हैं, ये पढ़ ले।
- 1:08:07गौतम ने जल्दी से पर्ची खोदे। उसमें लिखा था गौतम जीस नाव ने
- 1:08:20तुम्हें किनारे से लगाया। उसकी चपकाहट से तुम बंद करो, अब
- 1:08:28वो नाव चली गई तुम भी मुक्त हो जाओ, यही बंधन तुम्हें मुक्त नहीं
- 1:08:37होने देता था। अनीसा तुम मुक्त ही हो, तुम कैबल
- 1:08:41की स्थिति में सदा से हो। बस अब नाव जा चुकी थी नाव का, वो
- 1:08:50भी जा चुका था वो ही तो बंधन है, पढ़ते पढ़ते ही गौतम अपने भीतर
- 1:09:00चला गया, छलांग लग गई। सदा से जो है तुम भी वही हो।
- 1:09:09ये मान्यताएँ तुम्हें जीने नहीं देती अन्यथा तुम सदा से सागर हो
- 1:09:21सदा से मस्ती का। पुंजो हो तुम उस खुशबू का अनंत
- 1:09:28अंग है तुम्हारे भीतर और तुम दुखी दुखी से फिर रहे हो इन मान्यताओं
- 1:09:37को त्याग त्यागते अंतिम मान्यताओं को भी त्यागता।
- 1:09:45अंतिम भ्रम है तुम्हारा कि मैं कौन हूँ?
- 1:09:48बस ये जानना है जीस दिन तुमने जान गया कि मैं कौन हूँ वास्तव में
- 1:09:55कौन हूँ? माना तो बहुत कि मैं कौन?
- 1:10:01लेकिन जाना कभी नहीं। आज जान लोगे कि तुम कौन हो और जब
- 1:10:10तुम जान लोगे कि तुम कौन हो, तो तुम भागदौड़ में खत्म भागदौड़ में
- 1:10:16तुम रहमोगे नहीं, कुछ धन नहीं जुटा पाओगे।
- 1:10:21कुछ ख्याति, कुछ मान सम्मान, कुछ शिष्य ये सब त्याग हो गया था जीस
- 1:10:29समय पता चल गया मैं हूँ कौन उस दिन तुम ढे ढेरी हो जायेगा
- 1:10:34तुम्हारा अहंकार और तुम वहाँ पहुँच जाओगे।
- 1:10:40जहाँ सिर्फ अंध है जहाँ सिर्फ़ तुम हो, दूसरा कोई नहीं एको अहम
- 1:10:52द्वितीय नास्ति बस तुम ही हो एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति?
- 1:10:59यह अद्वैत जहाँ एक अवस्था है और वह तुम हो या कोई भी है तुम हो या
- 1:11:07भ्रम हो, कोई फर्क नहीं पड़ता तुम तो गए मान्यता गई तो तुम गए और जो
- 1:11:16वास्तव में तुम सदाश हो वह बचे जाओगे।
- 1:11:20और वो कौन हो? आनंद के पुंज हो, इसकी तलाश है।
- 1:11:25हर संसार के व्यक्ति को हर पल यही तलाश है।
- 1:11:30ये तलाश पूरी हो जाएगी। राधे राधे।
- 1:11:38शाम मिला दे राधे राधे शाम मिला दे।
- 1:11:48यहाँ मिलेगा शाम यहाँ। गोविंदा गोपाल हरे।
- 1:11:57राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हर मेरी नैया पार लगा दे
- 1:12:14गोविंदा गो। पाल हरे राधे राधे श्याम मिला दे
- 1:12:26गोविंदा गोपाल हरे। धन्यवाद।