Latest / Baba ji Vijay Vats / 23 Sep 25 - भाषा को भी छोड़ दो, यह भी एक मान्यता है! आपका मनगढ़ंत और असली परमात्मा? ऐसा नाम निरंजन होए।।
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- 0:20युक्तेश्वर सिंह चरस पर शो भैया आपने जो कौड़ियों का विस्तार
- 0:40किया? उसमें प्रत्येक पौड़ी के नीचे ऐसा
- 0:50नाम निरंजन होय, जे को मन जाने मन कोय सभी के पीछे।
- 1:04ये शब्द है, लेकिन आपने इन शब्दों की परिपूर्ण रूप से रहस्यत्मक ढंग
- 1:14से खुलासा नहीं किया? मेरी भीतरी अनकक्षा है कि आप इन
- 1:28शब्दों का गहरे रहस्यों में जाकर खुलासा करने का कष्ट करें बहुत
- 1:43सुंदर प्रश्न है, पर मैंने खुलासा इसलिए नहीं किया।
- 1:52कि कोई इन शब्दों को पूछे तो समझ आता है कि आप सुन रहे हो अन्यथा
- 2:10बातें व्यर्थ हो जाती हैं। बहुत अच्छा किया जो आपने पूछ लिया
- 2:19आइए हम इसके विस्तार में चलते हैं।
- 2:26ऐसा नाम निरंजन होय। जे को मन जाने मन को अनजान होता
- 2:43है, आंख में डालने वाला काजल कालिक हम उसे मैल भी कह सकते हैं।
- 2:56अक्सर काले को मैल के रूप में प्रायवाची समझ लिया जाता है
- 3:03क्योंकि शब्द हैं अब गहरे से सुनना तुम्हें समझ आएगी।
- 3:13दो। जो शब्द अपने आप में ही व्यर्थ
- 3:17हैं, उन शब्दों से परमात्मा कैसे मिलेगा यारा देखिये।
- 3:29हम कहते हैं कि सभी मान्यताओं को तोड़ दो।
- 3:35तो ध्यान रखना हम आखिर में आपसे कहेंगे जो कि आज कह रहा हूँ,
- 3:42भाषाओं को भी छोड़ दो, क्योंकि ये भी हमारी बनाई हुई मान्यताएँ हैं,
- 3:51फिर सोच समझना। बहुत ही गहरा अभ्यास है आपके चेतन
- 3:57में तह दर तह यह ऊंचा हिमालय बन गया है।
- 4:06प्रत्येक व्यक्ति के भीतर भाषाई मान्यताएँ हैं।
- 4:11कोई चीनी है तो उसके भीतर चीनी भाषा है, फ़ैंसीसी है।
- 4:16फ़्रेंच सी भाषा फ़्रेंच अंग्रेज है तो इंग्लिश भाषा पंजाब में
- 4:26रहता है। पंजाबी भाषा हिंदुस्तान में रहता
- 4:31है। हिंदी भाषा लेकिन ये भाषाएं आखिर
- 4:37हैं क्या? आइए थोड़ा सा खोलते हैं।
- 4:41हम जैसे जैसे गहरा जाऊंगा वैसे वैसे विस्तारित होता जाएगा।
- 4:48इसका अर्थ भाषा भी एक मान्यता है। हमने मान लिया ए अनार होता है,
- 5:05हमने मान लिया बी बैट होता है, सी बैट होता है।
- 5:14हालांकि बी का बैठ के साथ कोई भी तो संबंध नहीं है।
- 5:23चाइनीज भाषा में पूछो वो कहेंगे कोई संबंध नहीं है फ़्रेंच में
- 5:29पूछो। वो कहेंगे बी का बैट से क्या
- 5:33सम्बन्ध हुआ? बल्ला अपनी जगह है, उसको तुम
- 5:39मान्यता तो दे सकते हो, बी इज़ इक्वल टू बैट जैसे अलगेबराइक
- 5:46फोरमुलस को हम हाल करते हैं। क्वेश्चन को हल करते हुए मान्यता
- 5:52कर देते है सुपोज़ ए इस इक्वल टु सिक्स लेकिन ध्यान रखना ए इस
- 5:59इक्वल टु सिक्स इस नॉट ए लॉ। एक नियम नहीं है नियमों से पार
- 6:18हमें मान्यता है हमने मान लिया क्यों मान लिया कि हमने सवाल को
- 6:28हल करना था। अगर प्रथम पौड़ी पे कोई उलझ जाए,
- 6:32वो कहे कि मैं तो नहीं मानता इस इक्वल टु सिक्स तो अलजेब्रा का
- 6:41प्रोफेसर आगे नहीं चल पाएगा? ओके हमारे हाथ का नहीं, मानना तो
- 6:48पड़ेगा ही। संसार का ये नियम है ये ठीक के
- 6:59माना इस इक्वल टु नॉट सिक्स इस नॉट ए लॉ बट एक्सेप्शन इस देर यह
- 7:07अपवाद तो है आप किसी वक्त? इज़ इक्वल टु सेवेन भी मान सकते
- 7:12हो तो विस्तार से समझेंगे कि कोई भी भाषा भी हमारे सिर के ऊपर
- 7:24मान्यता ही रखी हुई है। वो भी बोझ का एक टोकरा है।
- 7:35तो हमने कहाँ जाना है? भाषाओं से दो बहुत दो जब भाषाएं
- 7:46तुम्हें मजबूर कर दें भाषा तुम्हें रस फैलाने में मजबूर हो
- 7:51जाए। भाषाएँ इन महंगी कवियों को सुनने
- 7:55में रसना प्रतीत हो और भाषाएँ असमर्थ हो के लड़ाम से गिर पड़ें,
- 8:02तो भाषाओं का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा क्योंकि।
- 8:10सच्चा सुख जिसे हम आनंद कहते हैं वह भाषाओं से बहुत दूर मौन में
- 8:19छिपा है और भाषा मौन नहीं है भाषा शोर है।
- 8:31जब तुम भाषाओं से थक जाओगे भाषा एक मान्यता है कोई भी भाषा हो वो
- 8:39चीनी हो, लैटिन हो। अंग्रेजी हो, हिंदी हो, पंजाबी
- 8:45हो, मराठी हो, तेलुगु हो, मलय कोई भी भाषा हो, ये सब हमारी
- 8:52मान्यताएँ हैं। हमने मान लिया क्यों मान लिया
- 9:02कन्वर्सेशन के कारण? इसके बिना संवाद न हो सके इसलिए
- 9:11यह आवश्यक है। अगर भाषा न बनाएंगे तो कन्वर्सेशन
- 9:16नहीं होगा और मानवता आगे नहीं बढ़ पाएगी।
- 9:21इसलिए यह। जरूरी भी है तो प्रत्येक ने अपनी
- 9:27भाषाएँ इजाद कर ली। मानव मानव को अच्छी तरह से समझा
- 9:35सकता है। कोई फ़्रेंच बोलता है तुम्हें समझ
- 9:41नहीं आती तुम कहोगे नो। आई डोन्ट नो फ़्रेंच।
- 9:48मैंने सीखी वो कहेगा फिर इंग्लिश शांति हाँ, इंग्लिश क्षमता इट्स
- 9:56इंटरनेशनल लैंगुएज तो वह इंग्लिश में संवाद करेगा।
- 10:07भाषा एक वाहन है आपके विचारों को आपकी भावनाओं को दूसरे व्यक्ति तक
- 10:16प्रवाहित करने के लिए। एक व्हीकल का काम करता है, एक
- 10:24वाहन का काम करता है। अगर भाषा ना हो तो संसार के काम
- 10:30को करना है। पशु कोई व्यापार नहीं कर पाता
- 10:35क्योंकि पशु के पास कोई सर्वमान्य बाजार नहीं।
- 10:42व्यक्ति ने भाषा आदमी ने भाषा को खोज लिया तो व्यापार करने लगा,
- 10:50लेकिन ध्यान रखना कई बार मान्यताएँ।
- 10:57जकड़ लेते हैं और आज मान्यताओं ने जकड़ ही लिया है।
- 11:05आज भाषाओं ने शब्दों ने हमें जकड़ लिया है।
- 11:08हम परमात्मा को शब्दों में बांध लिए हैं, भाषा में बांध लिए हैं।
- 11:16हम पांच नाम देते हैं भगवान के यह है जपते रहो और तुम पहुँच जाओगे
- 11:24तो इससे साफ पता लगता है न जब बुद्धू है क्योंकि भाषाएँ तो
- 11:30हमारी मान्यता है और मान्यताओं से कभी सत्य थोड़ी मिलाकर।
- 11:38शोर से मौन में पहुँच जाओगे, यह तो एक विडंबना ही मालूम पड़ती है
- 11:49दर्द से। दर्दहीनता में पहुँच जाओगे, यह
- 11:56बात जचती है, तुम्हें एनेस्थीसिया से पहुँच जाओगे, ठीक एनेस्थीसिया
- 12:04देंगे तो तुम दर्द से परे हो जाओगे लेकिन दर्द होगा तो दर्द से
- 12:10परे हो जाओगे। इट कैन बी पॉसिबल भाषा भाषा फिर
- 12:24समझा बड़ा बहुमूल्य शब्द पूछा तुने बजे भाषा हमारी मान्यता है।
- 12:35बाकी की मान्यताएँ तो हैं ही। कीचड़ की तरह हीरे पर भाषा भी एक
- 12:42मैल है। अंजन है कालिख है हमारे हीरे पर
- 12:50हमने जाना है बाबा कहते निर आंजन ऐसा नाम।
- 12:56निरंजन होय। वह मैल से रहित है, वह दूषित नहीं
- 13:06है, वह बदबू से परे वह निरमल है। गंग की धारा के सामान और तुमने
- 13:31वहाँ जाना है जहाँ मोह सब मोह ठहर गया, सब ठहर गया।
- 13:49उस ठहराव में बाजे नाद अनेक अशंका के तेवाबणार।
- 14:05दी अनस्ट्रिक्टेड सॉन्ग तुम कहो के ताली भी बजती है और आवाज़ भी
- 14:13नहीं आती। बड़ी मज़े की बात है बाजेनाद अनेक
- 14:20अशंका के ते बावण हारे। केते राग परिशुक केहण केते
- 14:28गावणहार वह राग रागनिया है, वह गाने वाले लोग हैं, गीतकार हैं।
- 14:45ऐसी मधुर संगीत की लहरें वहाँ हैं, लेकिन फिर भी बाबा कहते हैं
- 14:53मौन बड़ी उल्टी बात लगेंगी तुम्हें इसलिए बाबा कहते हैं।
- 15:03ऐसा नाम निरंजन होय, वह निर्मल मैल के बिना ऐसा नाम है नाम की
- 15:15बाद में करेगा जी को मन? जो मन से पार हुआ वो ही जान सकता
- 15:24है। जे को मानना जाने मन कोय, वही मन
- 15:29जान सकता है जो मन के पार हो गया भाषा की सुधरता है जैसे मैंने कल
- 15:37के प्रवचन में। सेठ का मैं और गुरु जीव का मैं इन
- 15:44दोनों में वर्क किया था। दोनों ही मैं बोलते हैं कृष्ण भी
- 15:49मैं बोलते हैं कोई अज्ञानी व्यक्ति भी मैं बोलता है, लेकिन
- 15:53दोनों के बोलने में बहुत विशाल अंतर है।
- 16:02एक में दुख को देता है एक में आनंद को देता है।
- 16:10कितना फर्क है परिणामों में उच्चारण में कोई फर्क नहीं
- 16:16अहंकारी भी कहेगा मैं। और कृष्ण भी कहते हैं अहम दोनों
- 16:25मैं तेरे पापों को माफ़ कर दूंगा। कुरान भी कहा गया, मैं बड़ा शमा
- 16:34श्री हूँ। तू तौबा कर और गुनाह ना कर मैं
- 16:49तुम्हें माफ़ कर दूंगा मैं तो परमात्मा भी मैं बोलता है अहंकारी
- 16:57भी मैं बोलता है, लेकिन तुम पहचान कैसे खाओ?
- 17:01नहीं तुम्हारे पास कोई जरिया नहीं।
- 17:08अगर हम प्याज का नाम आलू रख लेते हैं तो अगर हम कहते कि आलू दो भाई
- 17:21तो आप क्या देते हैं? प्रश्न को फिर सुन अगर हम प्याज
- 17:28का नाम आलू रख लेते या तो शुरू शुरू में हमने रखा नहीं तो गलती
- 17:35हो गई अगर हम प्याज का नाम आलू रख लेते।
- 17:42तो फिर हम कहते हैं ग्राहक से कहता भैया आपने क्या लेना है?
- 17:49कहते हैं हमने तो आलू लेना है तो दुकानदार क्या देता?
- 17:55प्याज देता है ठीक मान्यताएँ बढ़ती बढ़ती बढ़ती बढ़ती बढ़ती।
- 18:03दर्द बढ़ता ही गया जूं जूं तब आपकी मान्यताएँ, मान्यताएँ,
- 18:10मान्यताएँ और पहाड़ बन गए। अंबार बन गए।
- 18:12मान्य पंख आज तुम भूल गए कि शुरुआत हमने कहाँ से की थी।
- 18:26एक भावनाओं का विचारों का आदान प्रदान करने के लिए भाषाओं का
- 18:35निर्माण हुआ और आज तुमने भाषाओं से परमात्मा को खोजना शुरू कर
- 18:44दिया। आज संसार में जीतने झगड़े हैं।
- 18:57भाषाओं से पैदा हुए नामों के झगड़े अगर भाषा ना हो तो।
- 19:08ये सत्य है एक भाषा आदान प्रधान विचारों का और भावनाओं का उनका एक
- 19:18जरिया तो है लेकिन तुमको किसने कहा की भाषा परमात्मा का भी जरिया
- 19:26है? भाषा से विचार बदलते हैं, भाषा से
- 19:36भावनाएँ बदलती हैं, अगर उसी शब्द को तुमने कुछ और रख लिया होता,
- 19:46टमाटर का नाम तुमने आलू वघरा रख लिया होता।
- 19:50देखने में तो बराबर ही तो कोई टमाटर मांगता है तो तुम क्या देते
- 19:55हैं? ये तो आज है कि तुम्हारे अचेतन मन
- 20:00में कीचड़ इतना भर गया है क्या कि तुम मजाक करने लगते हो कि मांगना
- 20:08था लुपघारा? मांग लिया।
- 20:10टमाटर ये तुम्हारी सभी मान्यताएँ हैं और तुम्हारे ये जो गुरुशण है
- 20:20ना या धर्म के झगड़े हैं। हिंदू, मुसलमान, सिख ये इन्हीं
- 20:28नामों के शब्दों के झगड़े। और नाम नाम कभी पैदा हुए हमारी
- 20:39मान्यताओं से और कोई भाषा एक तो है नहीं।
- 20:47विश्व में कितनी भाषा है? विश्व में कुल 7000 भाषाएं हैं।
- 20:53करीब करीब और उनमें से 40% भाषाएं विलुप्त के कगार में हैं।
- 21:01बस खत्म होने को हैं आज खत्म हुई कल खत्म।
- 21:07और सिर्फ 23% भाषाओं को आंधी दुनिया की आबादी बोलते हैं, 2323
- 21:21भाषाओं को दुनिया की आंधी आबादी बोलते हैं आंधी आबादी।
- 21:27तेई मान्यताओं को स्वीकार करती है।
- 21:33इसका अर्थ ये हुआ तेई समान्यताएँ तो हैं ना।
- 21:39आंधी आबादी परमात्मा के 23 नाम तो मानती हैं।
- 21:47झगड़ा न होगा तो और क्या होगा? कोई अल्लाह कहेगा, कोई राम कहेगा,
- 21:55कोई राजा कहेगा और सभी कहेंगे हम ठीक हैं तो बाबा एक बड़ा सुन्दर।
- 22:07सबक देते हैं इस छंद में ऐसा नाम निरंजन होय अब नाम पर आते हैं
- 22:22तुमने नाम को भाषाएं समझ लिया। इतना तुम समझे नहीं क्योंकि इतनी
- 22:31बुद्धि है कि नाम हमारे ही तो रखे हुए हैं हमारे ही रखे हुए नामों
- 22:40से वह अनामी। वह नाम से परिणाम कैसे मिलेगा?
- 22:54कभी सोचा आपने जब भी आप राम राम करते हो, वह उरु सतनाम करते हो,
- 23:00अल्लाह करते हो? कभी सोचा कहिये तो भाषण जो कभी
- 23:06हमने ईजाद की थी कन्वर्सेशन के लिए और आज हम उन्हीं भाषाओं के
- 23:13जरिए परमात्मा को खोजने लगे हैं। कैन इट बी पॉसिबल ज़रा समझना, बैठ
- 23:20के आराम से समझदार लोग। जिनमें समझ है नहीं वो तो छोड़
- 23:24दो। वह इन शब्दों पर कांटा मारते और
- 23:35मेरी बातों को न सुना करो, इन मूड मतियो से मैंने कुछ।
- 23:47मुझे तुमसे कुछ बिना चाहिए मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो।
- 24:03ये परमात्मा की आवाज़ है। मुझे नहीं चाहिए तुमसे कुछ ये
- 24:08अल्लाह अल्लाह करने वाले तुम दूर रहो इस अल्लाह को एक तरफ रख के
- 24:17आना होगा मेरे पास मुझे तुमसे कुछ बिना।
- 24:25चाहिए मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो।
- 24:46मेरा दिल अगर कोई। दिल नहीं अगर तुम्हे समझी नहीं
- 24:53आती ना बात। उसे मेरे सामने तो और दो।
- 25:04उसे मेरे सामने छोड़ दो मुझे तुमसे।
- 25:14कुछ बिना चाहिए परमात्मा कहते हैं मेरे करीब आना है तो सिर की ये
- 25:23गचड़ी। ये भी मान्यता है तुम्हारी और
- 25:26सबसे बड़ी मान्यता तो यही है कहाँ मौन कहाँ भाषाओं का छोर बिलकुल
- 25:35विपरीत आलम है बिलकुल विपरीत छोर हैं एक साउथ है एक उत्तर है।
- 25:47तो परमात्मा कहते हैं, अगर ऐसी ही मूड़ताएं लेकर मेरे पास आना है तो
- 25:56तुम संसार के काम धाम कर लो, कोई पीसा टका कमर कोई काम धाम कर लो,
- 26:02क्यों व्रत की टक्करें मार रहे हो?
- 26:04कुछ नहीं मिलेगा। यह बड़ा, दयालु है और इतना दयालु
- 26:14है कि तुम्हें आगाह करता है कि नहीं मिलेगा नाम से वही विकास नाम
- 26:22इस नाइस नाम एक शो है। और परमात्मा एक कामना से पीस है,
- 26:31शांति है और शांति में शोर शराबा होता है।
- 26:35सब ठहर जाता है। जब योग हो जाता है जब तुम मिलते
- 26:45हो उस परमपिता परमात्मा से आत्मा। परमात्मा में समाहित हो जाती है
- 26:51तब सब ठहर जाता है। हेना मिलाना।
- 26:56कि रैना रुक जा रहा। तू ठहर जा।
- 27:07अरे चंदा बीते ना मिलन की, रैना आज चांदनी की नगरी में अरमानों।
- 27:25का मेला रुक जा जा रात ठहर जा रे। चंदा फिर तुम्हारी इच्छा होती है
- 27:43वक्त थम जाए। ठहर जाए ये रात रुक जा रात ये
- 27:53चलता हुआ चाँद भी ठहर जाए ठहर जा रे, चलता बीते न मिलानकी रहना।
- 28:03यह मिलन की रात यह योग की रात्रि बीतना जाए आज चांदनी की नगरी में
- 28:16आज बा मुश्किल अंधेरी की नगरी में चांदनी हुई है।
- 28:24अरमानों का मिला, अरमान पूरे हुए आज गिर गए।
- 28:30अरमान तृप्ति हुई और तृप्ति मिट गई।
- 28:42आज बहुत से ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने कभी वह प्रसाद खाया
- 28:49नहीं जिसे गुर प्रसाद कहते है और बांटने चले बस इसे हम अजूबा ही
- 28:59कहेंगे संसार। जो भाषा कन्वर्सेशन के लिए बनाई
- 29:06गई थी वो भाषा आज फिलॉसोफिकल परमात्मा के कारण प्रयोग होती है।
- 29:19और बड़े बड़े शंकराचार्य कहते हैं, आइए शास्त्रार्थ करें, काहे
- 29:26में करोगे? शास्त्रार्थ भाई शास्त्रार्थ
- 29:29करेंगे। शब्दों में शब्दों से तो परमात्मा
- 29:32नहीं मिलता, शब्द तो शुभ है। शब्दों से रात नहीं ठहर जाती,
- 29:44शब्दों से चाँद रुकना नहीं छोड़ता और शब्दों से अरमानों की नगरी में
- 29:51सुबह नहीं होती, चाँद नहीं करती। कोई सुगंध नहीं फैलती, कोई
- 29:58प्राणों के भीतर आनंद का तूफ़ान नहीं उमड़ता।
- 30:02इन सब चीजों से वंचित, नीरस से भरे भरे तुम कहते हो परमात्मा को
- 30:08पाने के लिए। मात्र एक छलावा देते हैं।
- 30:14ये लोग आपको आई, मैं आपसे एक मापदंड बताता हूँ।
- 30:26आप एनर्जी लेसनेस को आनंद समझे बैठे हो, ये गलती बहुत देर से कर
- 30:31रहे हो। कोई भी नाम लेते लेते तुम थक जाते
- 30:36हो और तुम सो जाते हो। तुम कहते हो बड़ा आनंद आया, जबकि
- 30:43आनंद का तुम्हें दूर दूर से भी पता नहीं है।
- 30:47आनंद होता कैसा है? यह है थकावट फिर तू एक सारे दिन
- 30:57पत्थर ढोने वाला तोड़ने वाला, बाहर ढोने वाला, पल्लेदार लेबर,
- 31:05वो भी थक जाती चूर चूर हो के सो जाती रात को तो क्या आनंद आता?
- 31:14आनंद कुछ और गहरी बात, शरीर थके ना थके उससे कोई संबंध नहीं है।
- 31:22आनंद शरीर मरे या जिए, उससे भी कोई आनंद का संबंध नहीं।
- 31:30आनंद का संबंध तुम्हारे से है तुमसे व्हाट यू अरे यू अरे सेल्फ
- 31:40जो तुम हो अपने होने में उसका संबंध है आनंद से लेकिन तुमने?
- 31:50ये परिभाषाओं शब्दों का इजाज क्या किया हमने?
- 31:55ये हमारे लिए जहर साबित हुए। संसार के मार्ग पर काम चलाऊ भाषा
- 32:04थी कि हम अपनी बातों को प्रस्तुत कर सकते हैं।
- 32:09लेकिन आज तुम्हारे जी का जंजाल बन गया है।
- 32:13आज तुम्हारे लिए असाध्येह रोग हो गया है इसलिए रोज़ मेरे पास मैसेज
- 32:21आते हैं बाबा ये मन बड़ा तंग करता है, मन बड़ा शोर करता है इस शोर
- 32:28में। हम उस मोन तक जाए तो जाएंगे कैसे?
- 32:38यह सारे संसार की तकलीफ है आज और ये भी याद रखना, ये तकलीफ का आगाज
- 32:48तुमने ही दिया। मुद्दत तो पहले तुम्हारे पूर्वजों
- 32:57ने इन शब्दों का आगाज किया था। सहूलियत के लिए शब्दों के प्रवाह
- 33:08से हम बता सकें हमें क्या चाहिए? कन्वर्सेशन के लिए यह जरूरी भी था
- 33:15और अगर भाषा ना होती तो व्यक्ति इतना उत्थान न होता, लेकिन उत्थान
- 33:20होकर भी एक बहुत शानदार हीरा गंवा दिया उसने।
- 33:30हमने चमचमाते हीरे तो पाए, लेकिन वो हीरा गंवा दिया जिसे आनंद कहता
- 33:39है पदार्थ और द्रव्य के हीरे तो तुमने पाए।
- 33:50सुविधाएं तो तुमने पायी पेलो तो तुमने गद्दे तो तुमने डर लग के
- 33:54पाये लेकिन चैन खो दिया, नींद खो दिया तुमने कभी सोचा इस मानवता ने
- 34:10विकास के नाम पर? जो खोया वह पुनः प्राप्त करने में
- 34:17कितना वक्त लगेगा यह विकास था या विनाश?
- 34:32जो क्रिया तुमसे तुम्हारा चैन छीन ले, आनंद छीन ले, स्वभाव छीन ले
- 34:45तुम्हे लम्पटी बन जाए कामी क्रोधी लोभी मोहग्रस्त।
- 34:54रोज़ मध्यपान करते हैं। मेरे से अमेरिका से लोग आ जाते
- 34:58हैं। मेरे पास कनाडा से बाहर से लोग आ
- 35:01जाते हैं। बात उलटी हो गई है।
- 35:05पत्नियां शिकायत करती थीं, आज कल पति शिकायत।
- 35:12अभी कुछ दिन पहले ही मेरे पास लोग आये है।
- 35:15कहते बाबा मैं तो शर्म नहीं देता लेकिन मेरी पत्नी हसते।
- 35:19क्या ये कोई हँसने की बात थोड़ी ज़माना बदल गया।
- 35:27तू भी बदल ए फलक तो आज स्त्री ने शराब पीने शुरू कर दी और शराब
- 35:37पीने शुरू करती तुम्हारा सारा मज़ा कर कर रहा हूँ क्या?
- 35:41जो मैंने पी तो। क्यों नशा?
- 35:46उतर गया हज़ूर का जो मैंने पी तो क्यों न उतर गया हज़ूर का?
- 35:57और ज़रा। सी दे दे साखी और ज़रा सी और।
- 36:03कैसे रहूं जो कि मैंने पी ही क्या होश?
- 36:08भी तक है बाकी। और।
- 36:12ज़रा सीधे दे साखी। और ज़रा मेरे पास लोग आ जाते है,
- 36:18स्त्री आ जाते है, हमारा पति शराब पीता है, मैंने कहा सीधा सदा हो
- 36:22पाया। पश्चिम में आज आदमी त्रस्त है
- 36:26स्त्री से, क्योंकि उसने बराबर का पैग थमा लिया है।
- 36:32जब आदमी पीने बैठता है तो ब्राफर पे सामने बैठ जाती है टू पैक्स,
- 36:39प्लीज़। और मेरा पहले भरना है मुझे प्यास
- 36:46कुछ ये ज्यादा जन्मो जन्मो की प्यास आज इंतकाम बन गई।
- 37:02पहला बैग इस तरह पी के है। सामने बैठ के अबर क्या हुआ है
- 37:07आदमी ने तो वा कर और स्त्री सामने बैठ के शराब पी और आदमी यहाँ
- 37:16शिकायत करता बाबा कोई इंतजाम मैंने कहा यही प्रश्न।
- 37:21बहुत साल पहले उसे पुरुष किया करता था।
- 37:31स्त्री बोलती थी, मेरा आदमी बहुत शराब पीता है, गालियां बकता है,
- 37:37उसका क्या करता है? आज बहुत पूछता है।
- 37:43क्या करूँ? ये तो बहक जाती है फिर जो हाथ में
- 37:47आता है वो चिमटा हो, बैरन हो, चकला हो, कुछ नहीं देखते, उपद्रवी
- 37:55बन जाती है, टेर्रोरिस्ट हो जाती है।
- 38:02स्त्री हो जा पुरुष मन में तो वही दबा हुआ है तुम्हारी सभ्यता ने
- 38:07तुम सब को मार दिया है सुपरह सुपरह दबाओ दबाओ देखो कहीं
- 38:16तुम्हारा असवी चेहरा कोई दूसरा न देख ले।
- 38:21तो भला अगर गोबर पर सेंट छिड़क दोगे तुम गोबर पर तुम केसर का
- 38:27सेंट छिड़क दोगे तुम्हे केसर थोड़ी गुजरेगा लफों पे मुस्कान
- 38:34तुम्हे खुशियाँ थोड़ी दे पाएंगी। आज दिखावे की दुनिया रह गई है।
- 38:41बस मीडिया खरीद लो, संस्थान खरीद लो लेकिन ध्यान रखना, उस संत की
- 38:49तरफ देखो जिसने कुछ नहीं खरीदा, जिसने सब फेंक दिया उसके लफों पे
- 38:58भी मुस्कराहट हो ना हो। लेकिन हृदय भरा पड़ा है, रस से
- 39:07हृदय रस से भरा पड़ा है तुमने सभ्यता के नाम पर आज कंगाली बटोर
- 39:20लिए। और वह संत जो तुम से बहुत दूर
- 39:26चाहे तुम में ही बैठा हो, लेकिन तुम्हारी पहुँच से बाहर है वह
- 39:36तुम्हारे ही शोरगुल के भीतर बैठा आनंद का लुत्थ फटेरा है।
- 39:45और दुखों की आग में तुम जल रहे हो, इसे तुम विकास कहते हो।
- 39:55घोड़ों के तबेले का एक घोड़ा मुझे कह रहा था बाबा यह आदमी बड़ा पागल
- 40:01हो गया है। मैंने कहा क्यों बैठा तबेरों का
- 40:09एक घोड़ा मुझे कह रहा था कि बाबा ये आदमी बड़ा पागल हो गया है, सभी
- 40:16आदमियों की बात करता हूँ। मैंने कहा बेटा क्यों कहता मैं
- 40:23अच्छा बना खड़ा हूँ? खा पी रहा हूँ, मौज में हूँ, आनंद
- 40:31में हूँ ऊपर पता नहीं ये क्या घूमने वाला लगा दिया मुझे सारा
- 40:36दिन डर ही लगता रहता है। मैंने कहा बेटा ये पंखा है ये
- 40:42गर्मी में। तुम्हें राहत तो देता है तो घोड़ा
- 40:48हँसा बाबा मेरे भीतर इम्युनिटी ही इतनी है।
- 40:53मुझे पंखे की जरूरत ही नहीं है। फिर ये क्यों लगाए हैं?
- 40:58क्या ये मेरी इम्युनिटी को कमजोर करना चाहते हैं?
- 41:02मैं निरुत्तर हो गया। प्रथम दवा बाबा निरुत्तर हो गए तो
- 41:08मैं याद नहीं वो दिन। वो भूलीदास ता।
- 41:22लो फिर याद आ गई के सामने घटा सी छा गई वो भूली दास्तां।
- 41:42लो फिर याद आ गई नजर के सामने गटा सी छगई।
- 41:58ये वट वृक्ष के नीचे। जून जुलाई के महीने में हमें
- 42:06हवाएं बड़ी ठंडी लगती थीं। बस हमें हमें याद है क्या हुआ
- 42:14तुमने कटवा दिए बेड? मैंने बड़े शराब दिए उन लोगों को
- 42:27मैं बहुत दुखी हूँ तुम बेच देते हो इंडस्ट्रियलिस्ट को जमीनों को।
- 42:42और लाखों की तादाद में तुम पेड़ कटवा सकते हो, याने तुम्हारे गले
- 42:50के ऊपर छुरी फेंकना ना खुद खाऊंगा, ना खाने दूंगा, ना जीऊंगा
- 42:57ना जीने दूंगा। ये भी कोई तो कहे, वैज्ञानिक से
- 43:07पूछो ये तुम्हारे जीवन के लिए जो जरूरी है वह ऑक्सीजन पैदा कौन
- 43:15करता है? यही वृक्ष ही तो पैदा करते हैं।
- 43:21अगर लाखों की तादाद में तुमने वृक्ष काटे तो ये भविष्य मलका के
- 43:28भविष्यवाणी करने वाले लोग चुप हो जाए।
- 43:34अगर तुमने कुछ लिखा तुम्हारे बाप व दादाओं ने कुछ लिखा।
- 43:39तो साइंटिस्ट पहले ही रह चूके हैं।
- 43:43अगर तुमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया तो तुम्हारा
- 43:50विनाश अवश्यम भाभी हवन गुरु पाणि पिता माता तरती महत इन्हीं तीनों
- 44:01चीजों को तुमने विकृत कर दिया और इन्हीं तीनों चीजों को बचाने के
- 44:05लिए संतो ने तुम्हें कहा और ये धंधा निरंतर जारी है और तुम
- 44:13इन्हें देशप्रेमी कहते हो। यह देशप्रेमी नहीं देखी तुम
- 44:29इंडस्ट्रीज अपनी चला, क्या ऐसा नहीं हो सकता?
- 44:37मैंने ऐसी इमारतें देखी हैं। जो इमारतों को बनाने वाले बड़े
- 44:42समझदार थे, उन्होंने पेड़ नहीं काटे।
- 44:46उन थपेड़ों को कंस्ट्रक्शन के ढांचे के बीच में ले लिया।
- 44:50स्ट्रक्चरल एरिया के बीच में वैसे ही जगह छोड़ दी।
- 44:53उन्होंने वैसे ही बना दिया और कंस्ट्रक्शन भी कर ली।
- 45:00ऐसी इमारतें मैंने देखी, लेकिन तुम तो एक पूरा छुरा लेके आओगे।
- 45:08आरा। जो धड़ा धड़े इनके सर काट देगा,
- 45:13मैं तुमसे कहूंगा तुम्हें आज सभी को विश्नोई भरना बनना होगा।
- 45:20विश्नोई धर्म का पालन करना होगा। विश्नोई शब्द विष्णु से बना था।
- 45:33जनम ब्रह्मा देतित है पालन तो विष्णु को करना।
- 45:43पर अगर पेड़ न रहेंगे तो पालन वो कैसे करेगा?
- 45:47वह तो क्षीर सागर में शेषनाग की शैया के ऊपर विश्राम करेगा और
- 45:54लक्ष्मी से पैर दबवाता रहेगा। वहाँ से व्यसनवी बने और उन्होंने
- 46:05इन पालन करने वाली मांओ को थपेड़ों को काटने नहीं दिया और
- 46:11थपेड़ों के आगे खड़े हो जाते है। मुझे काटो, मुझे काटो।
- 46:19फिर वृक्ष को काटना उन्होंने पेट नहीं काटने दिया।
- 46:26और जाने। कहा गए वो दिन?
- 46:36कहतेतते रिराह में नजरों को हम बिछाएंगे जाने कहाँ?
- 46:55गए। वो दिन कहते थे तेरी याद में
- 47:06नजरों को हम बिछाएंगे जाने कहाँ? भी?
- 47:16तुम रहो चाहेंगे तुमको उम्रभर तुमको न भूल पाएंगे।
- 47:33जाने कहाँ गए? वो दिन अपनी नजर।
- 47:43में। आज दिन भी अँधेरी।
- 47:51रात है अपनी नजर? में।
- 47:58आज दिन भी अँधेरी रात। है।
- 48:06यही है विकास। साया ही अपने साथ था।
- 48:14साया ही अपने साथ है। यही कालिख पहले थी।
- 48:22वही कालिख अब। ने कहा।
- 48:29गए वो दिन ऐसा। नाम निरंजन है निरंजन।
- 48:44यानी जिसमें कोई मैल नहीं, जिसमें कोई कालिख नहीं, जो शुद्ध बुद्ध
- 48:49निर्मल है, ऐसा ना वह ना तुम्हारे शब्द तो मल युक्त।
- 49:06यह तो तुम्हारी थोपना है तुमने अगर बैंगन का नाम भिंडी रखा होता
- 49:16तो आज तुम भिंडी ही मांगते तो क्या मिलता?
- 49:21अरे क्यों डरते हो बैंकड मिलता और क्या मिलता है?
- 49:26फिर बढ़ते बनाते और खाते ये सब तुम्हारी शरारत है जो तुमने
- 49:34शब्दों को परमात्मा की ओर रुख कर दिया।
- 49:40अनजान व्यक्तियों की शरारत जो उस स्तर पर पहुंचे नहीं, कोई पांच
- 49:47नाम बांटना शुरू कर दिया, कोई 1000 नाम बांटना शुरू कर दिया,
- 49:51कोई राम राम बांटना शुरू कर दिया, कोई राधे राधे बांटना शुरू कर
- 49:54दिया। पता है, नहीं के सिर्फ शब्द ही
- 49:57हमारी मान्यता है। भाषा ही हमारी ईजाद है।
- 50:01हमने ही तो ईजाद की है। परमात्मा की कोई भाषा होती है।
- 50:08अपने अपने हाथों के दिखे हुए ग्रंथ सिर पर उठाए फिरते हैं।
- 50:12यह भगवान ने लिखा है। भगवान ने कोई शास्त्र नहीं लिखा।
- 50:15भगवान ने एक ही शास्त्र लिखा है पर वो शास्त्र लिखा है।
- 50:19प्रकृति प्रकृति के अनुसार चलो बस वही शास्त्र है, तुम आनंद में
- 50:28रहोगे कभी प्रकृति की गोद में बैठते थोड़ी देर सोने का मज़ा
- 50:32लेना। हम बहुत सोये हैं वटवर की छाँव
- 50:37में, पीपल के छाँव में वैसी नींद जो आई वो पिल्लों पे नहीं आती वो
- 50:47कमाल की नींद होती थी। वृक्षों के पास से ऐसी किरणें
- 50:52निकलती थीं। पीपल के वृक्ष और वट वृक्ष के पास
- 50:56से जो हमें आयन द मग्न कर जाती थी वो दिन हम भूल गए और हमने आज मैन
- 51:09मेड। सब अख्तियार कर लिया।
- 51:12फूल हैं तो प्लस की की कृषि फैक्टरी में बने भूल गए हम उस
- 51:18गुलाब को जो धरती की छाती गर्भ को पाड के आए थे, उस खुशबू को भूल
- 51:25गया। आज हम भूल ही गए।
- 51:29आज कौन है जिसने आनंद की एक बूंद पी है?
- 51:35अरे बड़े शर्म की बात है, हमने अपना अस्तित्व ही कर दिया।
- 51:44हम लूट गए, हम पिट गए। मानवता लूटने की कगार पे नहीं है।
- 51:51मानवता कब की लूट चुकी है ऐसा नाम निरंजन और वह नाम इतना निर्मल है,
- 52:04उसमें कोई मल नहीं है, कोई कालक नहीं है, कोई कालका नहीं है और
- 52:09काल में कैसे कहते हैं। दुख, दर्द, संताप, चिंता, क्लेश,
- 52:17तनाव ये सब कालमय हैं, ये कालिख ही हैं, ये अंजन है और बाबा कहते
- 52:26नरा अंजन। जिसमें ना दुख है, ना दर्द है, ना
- 52:31तकलीफ है, ना द्वेष है, ना राग है, ना संताप है, ना विचार है, ना
- 52:38सोच है, ना चिंता है, ना चिंत नाएं हैं।
- 52:45बड़े मज़े की बात है। तुमने चिंता छोड़ दी चिन्तना शुरू
- 52:51कर दी परमात्मा का नाम करो चिन्तना से सभी दुख दूर होंगे
- 52:56तुमने दुख और बढ़ा दी किस सदृश की नजर लग गई सनातन संस्कृति को?
- 53:09कीचड़ के ऊपर हम और कीचड़ नए नए शब्द गढ़ थे।
- 53:15तहे पे तहे बैठाते गए हमें सबर न आया, पूरा हिमालय खड़ा हो गया।
- 53:25हमारी मान्यताओं का और ये मान्यताएँ मैन मेड थी।
- 53:32ईश्वर ने सिर्फ प्रकृति बनाई। मान्यताएँ तुमने बनाई।
- 53:41प्रकृति की गोद तले उसकी छाँव तले थोड़ा विश्राम करना सीखो जो बणो
- 53:50को काटे उसका सिर काट दो आज फिर विश्नोई धर्म को जाग जाने की
- 53:59जरूरत है। सोय मतरो।
- 54:02जो पेड़ काटे उसका असर करते क्योंकि पेड़ तुम्हारे बच्चों को
- 54:13बड़े खतरनाक रोगों से युक्त करते थे।
- 54:16ये कैंसर आइटिस वगैरह तो कुछ भी नहीं।
- 54:20ऐसे ऐसे भयंकर रोग पैदा होंगे अगर तुमने थपेड़ों को काट दिया अगर
- 54:26तुमने नदियों का पानी प्रदुषित तो हो गया है और भी प्रदुषित कर
- 54:30दिया, ऐसा नाम निरंजन है, उस नाम की व्याख्या करते हैं।
- 54:41वह कलुष्टा से हीन है, निर्मल शुद्ध है, पवित्र है वहाँ जो तल
- 54:49जहाँ पर तुम चले जाते हो निरंजन। जीस नाम के पास तुम पहुंचते हो
- 54:58वहाँ कोई दर्द नहीं है हमारे तो यहाँ दर्द होता है तुम लाख राजे
- 55:06राजे करते रहो। ये बकवासी लोग हैं जो कहते हैं कि
- 55:09हमारी गुर्दे ठीक हो गए। और मैं 1000 बार कह चुका हूँ कि
- 55:15तुम थोड़ा सा राधा रानी को छोड़कर और दूसरी रानी को बंद करके देखो
- 55:25ना फिर तुम्हें समझाएगी राधा रानी की कृपा क्या होती है?
- 55:33राधा नाम की कोई स्त्री कभी नहीं होती, सब बकवास हैं, प्रखंड हैं,
- 55:39ये तुम्हें मार्ग को भटकाने वाले लोग हैं तो तुम भटकना चाहते हो तो
- 55:47हमें कोई ऐतराज नहीं। मौत से भटको तुम स्वतंत्र हो।
- 55:55हम तुम्हें आजाद करने के नाम पर पराधीन नहीं करना चाहते, तुम कुएं
- 56:01में डूबना चाहते हो, तो छलांग मारो हमने क्या सुना?
- 56:10हम सिर्फ बताने वाले हैं भाई आगे कुआं है, ये राधे राधे से बात
- 56:15नहीं बनेगी। ये किशोरियां कुछ नहीं कर पाएंगी
- 56:25क्योंकि तुम्हारी मैन मेड हैं। जैसे के फूल कभी खेलते हैं बस वो
- 56:31तो खेले ही रहते हैं। ऐसा नाम निरंजन होय देखिए वहाँ की
- 56:42पहचान बताते हैं बाबा इसलिए सभी कौड़ियों के पीछे ये दो शब्द आपको
- 56:48मिलेंगे ऐसा नाम निरंजन होय। जे को मन जानें मन को जो मन से
- 56:57पार हुआ वही जानता है वही मन जानता है कि वहाँ है क्या बात
- 57:04पूछिए जिसने अपनी नगन आँखों से ताजमहल को देखा होगा वहीं तो
- 57:08वर्णन कर पाएगा। ताजमहल कहता है।
- 57:11ये पत्तियाँ हैं, ये तने हैं, ये फूल हैं, ऐसा ऐसा बना है संगेमरमर
- 57:20का है, एक पत्थर से बना है, दो मंजिला है, चार मीनारें हैं, ऐसे
- 57:25ही तो बता पाएगा नहीं, नहीं सैकड़ों बार ताजमहल को निहारा।
- 57:32पर मैं कभी तृप्ति नहीं हुआ। ताजमहल को देखकर इतना प्यारा बना
- 57:36हुआ है और मैं कहता हूँ, अब जिसने भारत में जन्म ले के ताजमहल नहीं
- 57:41देखा, उसने फिर कुछ भी नहीं देखा। यह एकमात्र कलाकृति।
- 57:54ऐसा नाम निरंजन होय जेको मन जाने मन सोय वहाँ का व्याख्यान है।
- 58:09वहाँ की पहचान बताई। बाबा ने तुम्हें निरंजन, वहाँ
- 58:15जाकर तो ना दुख होगा, ना दर्द होगा, ना पीड़ा होगी, ना चिंता
- 58:21होगी, ना तनाव होगा, ना चिंत ना होगी तुम वहाँ जाकर रात रात भी
- 58:27नहीं करोगे। राधे राधे बहुत पहले छूट जाता है
- 58:31कोई भी नाम दो परमात्मा का तुमने रख दिया अल्लाह रख दिया वह गुरु
- 58:38रख दिया राम रख दिया कृष्णा रख दिया राधे रख दिया कुछ भी रख
- 58:44दिया। बहुत दूर छूट जाते हैं वो फिर
- 58:52सन्नाटे में तुम्हें यात्रा करनी पड़ती है।
- 58:54सन्नाटा आनंदनाथ वो सन्नाटा है जिंकुर की आवाज वहाँ शब्द कुछ
- 59:04नहीं है, दोण है। अनहात की धुन गूंजती है लेकिन फिर
- 59:10धुन भी खत्म हो जाती है। अनहात के उदगम सथल के ऊपर वहाँ
- 59:17जाना है तुमने जहाँ पर अम्मा, वहाँ कोई शोर नहीं है।
- 59:25वहाँ कोई बोल नहीं रहा वहाँ कोई संवाद नहीं है वहाँ सिर्फ हक्म
- 59:30बैठा है और वो हुक्म करता है और उसकी हुक्म में आवाज है, बेअवाज़
- 59:40हुक्म है, उसका उसका संकल्प है सिर्फ।
- 59:44और ध्यान रखना संकल्प में आवाज़ नहीं आती जे को मन जाने मन को ऐसा
- 59:54नाम निरंजन होय। मलिनता से रहित।
- 1:00:00जब तुम वहाँ पहुँच जाओगे जीसको बाबा नाम कहते हैं, आखिर सब सुन
- 1:00:07लो मोरल के रूप में रस के रूप में बाबा कहते जब तुम उस नाम के पास
- 1:00:15पहुँच जाओगे। तो ना तो तुम्हें कोई पीड़ा होगी,
- 1:00:21ना दुख होगा, ना संताप होगा, ना क्लेश होगा, ना चिंता होगी, ना
- 1:00:26चिंतनय होगी, ना दर्द होगा, ना पीड़ा होगी, ना बीमार होगे, तुम
- 1:00:34तो और क्या होगा? आनंद होगा, खुमारी होगी, मस्ती का
- 1:00:48आलम होगा, चारों दिशाओं से लहराती हुई रिमझिम आनंद की बारिश होगी और
- 1:01:00तुम्हारा रोम रोम खेल उठेगा। जब तुम उसके पास पहुंचोगे जिसे
- 1:01:07बाबा नाम कहते हैं वहाँ जपना नहीं होता वहाँ जाना होता है उसको
- 1:01:16रेपेटिशन नहीं करना होता वहाँ पहुँचना होता है।
- 1:01:21इसलिए पूड़ियां बनाई बाबा ने सीढ़ियों के बिना तुम पहुंचोगे
- 1:01:26कैसे? पौड़ियों को जपना नहीं होता
- 1:01:34पौड़ियों को लाग जाना होता है बस तुम भी ख्याल रखना।
- 1:01:43क्योंकि यहाँ पागल बहुत बर्बाद गुलस्ता करने को बर्बाद गुलस्ता
- 1:02:01करने को बस एक ही उल्लू काफी है। बर्बाद घुलस न करने को बस एक ही
- 1:02:09उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है कौन सा धर्म है जीस पे
- 1:02:14उल्लू नहीं बैठा है कोई धर्म अपने आप को अछूता ना समझे।
- 1:02:22हर शक पे उल्लू बैठा है, अंजाम ही गुलस्ता क्या होगा फिर पता ही है
- 1:02:33तुम्हे अंजाम ही गुलस्ता क्या होगा बर्बादी?
- 1:02:39फिर न जियोगे न मरोगे की। का आलम औरुसपर आप का गम यत्नहाइ
- 1:02:59का आलम औरुसपर। का गम न जीते हैं, न मरते बताओ
- 1:03:20क्या करें हम? अकेले हैं चले आ जहाँ हो कहाँ
- 1:03:37आवाज़ दें? तुमको कहाँ हो अकेले चले आओ जहाँ।
- 1:04:02तुम तड़पों योग के लिए आत्मा परमात्मा में विलीन होने के लिए
- 1:04:10तड़पें जब तुम अकेले और अकेलेपन का दर्द तुम्हें सताएगा तो फिर
- 1:04:19ऐसे ही सरसंगीत भीतर से उतरेंगे। धन्यवाद।