Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Jun 25 - New Formula - शून्य (0) होने का अद्भुत एवं सरल सूत्र! ईश्वर दिखाई क्यों नहीं देता?
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- 0:02रघुवर प्रसाद बाबा वह इतनी व्याट सुनता है।
- 0:18तो इस विराट सत्ता को जुडक लेता है, वो अवश्य ही उससे ज्यादा
- 0:26विराट होगा। आप कहते हैं कि वह हर जरिये में
- 0:35समय। फिर नजर क्यों नहीं आता?
- 0:46कौन सी शक्ति है उस विराट सत्ता को?
- 0:53जो कण कण में व्याथ है उसे ढक लेती है।
- 1:03वह नजर आता क्यों है? यह अंतिम सवाल है, बस इससे आगे
- 1:14कोई सवाल बचता नहीं। ज़रा गौर से सुनिए प्रश्न बड़ा
- 1:25क्रांतिकारी है अमावस्या की रात को कभी आसमान की तरफ आँखें उठाकर
- 1:41देखना। बड़े चमकते हुए महँत से तारिक में
- 1:47नजर आएँगे लेकिन सुबह देखोगे तो तारे गायब
- 2:06हो जाते हैं। क्या वो सच में?
- 2:10गायब हो गए। क्या वो तारे सच में गायब हो गए?
- 2:18नहीं तो क्या हुआ? सूर्य के प्रकाश में उन्हें ढका
- 2:26नहीं। उन्हें देखने से बाधा पहुंचाई,
- 2:36अवरोध पहुंचाए। जैसे तुम्हारी आंख आंख बहुत बड़ी
- 2:44है। उस रेत के कण से जो तुम्हारी
- 2:50आँखों में पड़ जाता है और इतनी बड़ी आंख होते हुए भी वह छोटा सा
- 2:55रेत का कण तुम्हें देखने नहीं देता, तुम आँखों को मसलते हो।
- 3:07आँखों में आंसू आ जाते है क्या हुआ क्या आँखों ने देखा ना बंद कर
- 3:17दिया नहीं वह जो अवरोध था जो के जर्रापुला था।
- 3:25यद्यपि आँख से बहुत ही छोटा है, लेकिन आपके देखने की क्षमता को
- 3:31अवरुद्ध कर देता है सूर्य निकलता है सूर्य का प्रकाश।
- 3:45चाँद तारे तो वहीं रहते हैं, चाँद तारा कहीं जाता है, बस चाँद तारा
- 3:53प्रकट नहीं होता, सूर्य के प्रकाश में होता है।
- 4:03अगर तुम किसी सेंटिफिक लैब में जाकर देखना चाहोगे तो दिन के महा
- 4:11उजाले में भी तुम सितारों को देख पाओगे।
- 4:20क्या हुआ? वह लैब विशेष तौर से तैयार की गई
- 4:26होती है, जो सूर्य के प्रकाश को भी अवरोध कर देती है।
- 4:33तुम कुएं के भीतर चले जाओ। वहाँ से आपको तारे साफ़ नजर
- 4:38आएँगे। तुम चकित रहोगे क्या हुआ कुएं के
- 4:51गहरे गड्ढे में छापकर? तुम्हें साफ दिखेंगे ये तार कहीं
- 5:00गए नहीं। साइंटिफिक लैब में जाकर तुम
- 5:07देखोगे। ये तारें तो हैं उस उसी।
- 5:10तरह से जैसे रात को दिखे थे आप? उतनी ही चमकील।
- 5:15है। तुमने पूछा पुत्र इतनी विराट
- 5:24सत्ता को डकने वाली कोई महा विराट सत्ता होगी ना शुद्र होता है वो
- 5:31रख लेता है जो। हम ऐसा ही समझते हैं।
- 5:45हमारे उस का डांगी है तो फिर परमात्मा की शक्ति को कौन ढक लेता
- 5:56है? बुद्धि?
- 6:11बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम जीस बुद्धि को शिक्षित,
- 6:18प्रशिक्षित और ज्यादा शार्प बनाने की चेष्टा करते हो, वही बुद्धि
- 6:23तुम्हारा दुश्मन हो जाती है, तुम्हें पता भी नहीं चलता।
- 6:34जीस बुद्धि को तुम पाल रहे थे पोस रहे थे सूचनाओं की संख्याओं को
- 6:45संख्याओं को बढ़ा रहे थे। वही तुम्हारी विराट के रस को चखने
- 6:53में बाधा बन जाएगी। यही विडंपना है और आई तो होड़ लगी
- 7:06है। धन को पदवी को जमीन जायदाद को
- 7:18पाने के लिए होड़ लगे। संसार की किसी भी वस्तु को पाने
- 7:23के लिए होड़ लगे तो समझ में आता है।
- 7:28लेकिन परमात्मा के लिए होड़ रखे कुछ असहज मालूम पड़ता है।
- 7:37आज परमात्मा की तरफ होड़ रखे है, प्रत्येक ज्ञानी चाहता है।
- 7:46की लोग मुझे सुन क्योंकि मैं ही तो हूँ ज्ञानी एक चूहे को हल्दी
- 7:58की गांठ मिल गयी थी और वह पंसारी बन बैठा था।
- 8:07चूहे को हल्दी की गांठ मिल गई थी, उसने पंसार की दुकान खोली थी।
- 8:14बस ऐसे ही तुम हो, तुम्हें कुछ छोटा सा सूत्र मिल जाता है, जब भी
- 8:24वो तुम्हारा नहीं होता। और तुम उसको कॉपीराइट करा लेते हो
- 8:39अभी कल ही मैं गीत सुन रहा था। रामायण का गीत है तो काफी।
- 8:55ये तो मेरा है बस इसी भ्रांति ने तो मैं मार डाला।
- 9:04इसी भ्रांति ने तुम्हारा चैन सुकून सुकसुरूर छीन लिया।
- 9:15यह मेरा है, कपिराइट है, लोग कपिराइट करा लेते हैं, उन्हें
- 9:28वास्तविकता का पता नहीं होता तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं।
- 9:36किसी ईमानदार वैज्ञानिक से पूछोगे, किसी ईमानदार कवी से
- 9:40पूछोगे, इतनी सुंदर पंक्तियाँ तुम्हारे पास कहाँ से आई?
- 9:48वह अगर ईमानदार होगा तो कहेगा ऊपर से आए।
- 9:54मैंने बनाई किसी अज्ञात लोक से आई ये पंक्तियाँ मेरी ईजाद नहीं है।
- 10:02बस भीतर उतरी और मैंने कलमबद्ध कर दी।
- 10:09महान वैज्ञानिक भी यही बात कहते रहे।
- 10:13हमने कुछ नहीं खोजा। किन्हीं अज्ञात लम्हों में
- 10:17किन्हीं फुर्सत के लम्हों में ये शब्द बार बार मैं बोलता हूँ और आप
- 10:21इस शब्द को पोटली मार लेना किन्हीं अज्ञात फुर्सत के लम्हों
- 10:28में वह उतरा। वह सदा ही फुर्सत के लम्हों में
- 10:35उतरता है। तब तक नहीं उतरता जब तक कि तुम
- 10:44बीज़ी हो। नॉन बिज़नेस की अवस्था में,
- 10:50फुर्सत के लम्हों में और धीरे से आज टपकता है वैज्ञानिक भी कभी
- 11:05फुर्सत के लम्हों में बैठा उसके ऊपर से टपका।
- 11:13खोज हो गई। सभी खोजें आती हैं।
- 11:18कोई चार शब्द कवि के हर्जन में आए खोज हो गई।
- 11:26कभी अगर उसी का पीरा दिखता है तो मोर है।
- 11:35अपनी मूडता का परिचय देता है। सच्चा व्यक्ति कहेगा, मैंने नहीं
- 11:47लिखा जीस से एम् लिखे इस से रहना जब फरमाई।
- 11:56बागना ने कहते हैं, जब जी को लिखते हुए जो ये शब्द लिख रहा है,
- 12:04ये उसके नहीं जीस ए लिखे तिस सर नाम उसके सर की खोज नहीं है।
- 12:13जीब फुरमाए। जैसे जैसे उसका हुक्म हुआ जैसे
- 12:18जैसे वो झड़ा सच्च कांड से वैसे ही चला गया।
- 12:33मेरे इसमें कुछ नहीं सच्चा व्यक्ति ऐसा है की बोलेंगे?
- 12:39जाता भी क्या है? सत्य बोलने में क्या हरजा तुम
- 12:46जोड़ बोल। के लोगों को कुछ देर के लिए
- 12:48मूर्ख। बना सकते हो लेकिन ध्यान रखना
- 12:51उससे बड़े मूर्ख तुम पहले हो जाओगे तभी तुम मूर्ख का कर पाओगे।
- 12:58लोगों को मूर्ख बढ़ाने से पहले बड़ा मूर्ख खुद होना पड़ता है।
- 13:03लोगों को दुख देने से पहले पहले खुद दुखी होना पड़ता।
- 13:08है। सुखी आदमी दूसरे को दुख नहीं दे
- 13:11सकता। दुखी व्यक्ति दूसरों को दुख दे
- 13:18सकता है। बुद्ध किसी को दुख नहीं दे सकते।
- 13:25महावीर किसी को दुख नहीं दे सकते, कारण कारण के वो सुखी और जीस दिन
- 13:31तुम भी सुखी हो जाओगे। उस दिन तुम किसी को दुख नहीं।
- 13:39पूछ लेते हैं बाबा आप की निंदा करते हो, प्रेमानंद की निंदा करते
- 13:45हो, आचार्य प्रशांत की निंदा करते हो, यहाँ तक की बहुत बड़े बड़े
- 13:57गुणी ज्ञानियों की निंदा करते। मैंने कभी निंदा नहीं की, मैंने
- 14:07मूढ़ता की निंदा की। मैंने अंधविश्वासों की निंदा की,
- 14:19जो आपने थोप लिया और वह गलत था। राधे राधे करते रहो, राम राम करते
- 14:28रहो, मैंने सिर्फ उसे काटा क्योंकि वह झूठ थी।
- 14:41मैं सत्य बताना चाहती हूँ, उससे झूठ की निंदा हो जाए तो मैं क्या
- 14:46करूँ? इसमें मेरा कोई भी तो किशोर नहीं
- 14:51है। मैं जानता हूँ भले से जानता हूँ
- 15:07नहीं मिलेगा सपनों से शब्द बुद्धि की देन और बुद्धि उस विराट को
- 15:16ढकने में सहायता करती। जीस बुद्धि के प्रकाश से सूर्य के
- 15:22प्रकाश से दिल में तारे लुप्त हुए दिखाई पड़ते हैं।
- 15:28उसी बुद्धि के प्रकाश से उसके शार को होने से तुम्हें तुम्हारा
- 15:34स्वयं नजर नहीं आता। बस।
- 15:40बड़ी अजीब सी बात लगेंगी, लेकिन सकते हैं।
- 15:50सूफी संतो ने कहा जैन फकीर होने कहा।
- 15:57आनंदित होना चाहते हो। विराट को खोज रहे हो तो बुद्धि को
- 16:06बाहर के आना, जहाँ जूतियों को उतारते हो, बस बुद्धि की इतनी ही
- 16:11जगह है। क्योंकि ये बुद्धि ही तो है जो
- 16:21आपकी जिज्ञासा और रसधार पीने की यात्रा में बाधा बनती।
- 16:30फकीर के पास जाओगे अखंड आनंद की प्राप्ति के लिए और अगर बुद्धि को
- 16:41साथ लेके गए तो फिर मत जाना घर बैठे रहना आराम करो।
- 16:51लेकिन विडंबना है की हम बुद्धि को साथ लेके जाते हैं और यह समझ लेके
- 16:57जाते हैं के यह बुद्धि हमें समझाते, यही हम गलती खा जाते हैं।
- 17:07सारी मानवता बागलों की तरफ भड़क रही है, उस आनंद के रस के बिना तो
- 17:14उसका मात्र कारण है बुद्धि बुद्धि ना हो तो तुम भर को।
- 17:26बुद्धि को एक तरफ हटा दोगे, फुर्सत के लम्हे आ जाएंगे और वह
- 17:34विराट आपके भीतर उतर जाएगा। कोई समस्या भी तो नहीं है, हर जगह
- 17:41मौजूद है। जर्रे जर्रे में है उसको उतरने
- 17:45में तकलीफ क्या है और सूरज को बादल ढक लेते हैं चाँद तारों को
- 17:58सूरज ने ढक लिया और सूरज को बादल ढक लेते हैं।
- 18:04आप इतने अंधकार से घिरे हुए हो तुम अगर भरे दिन में कहूँ के तारे
- 18:14हैं तो गलत नहीं है क्योंकि तुम्हें तारे दिखते हैं।
- 18:21इसलिए मैं सभी ज्ञानी जनों को प्रणाम करता हूँ, चारबाग को भी जो
- 18:27कहते कर्म सिद्धांत नहीं, मार्कस को भी जो कहता परमात्मा नहीं,
- 18:33आचार्यों को भी जो उपनिषदों की व्याख्या करते हैं।
- 18:44उपनिषद के ऋषियों ने जाग्य बल्क ने जीस तल को छुआ।
- 18:54उससे कोसों दूर बैठे हैं। ये लोग बुद्धि के तल पे विराजमान
- 19:01हैं। ऐसे ही सर लोग होते हैं।
- 19:06लेकिन मूल्यों की बात है, आज बुद्धि के मूल्यों को लोग समेत
- 19:11थे। कोई जमा न था जब रस को लोग समझते
- 19:19थे और तब लोकस्य आने थे। शहर से बहुत वो कुठिया डाल लेते
- 19:27हैं, वहाँ एकांत में बैठते हैं, फुर्सत के लम्हों में अपने भीतर
- 19:36उतरते रसपान को करते हैं। आज वो जवानी चले गए, आज बुद्धि का
- 19:45बोल पाला है जिसके पास जितना ज्यादा शब्द कोश है।
- 19:54वह उतना बड़ा ज्ञानी। यद्यपि बात उलटी है, जिसके पास
- 20:01जितना बड़ा शब्दकोश है, वह उतना अंधकार में है।
- 20:11तुम्हे पता नहीं है वो उतने दुखी है।
- 20:15बस अपने दुख को देख। नहीं पाते।
- 20:20यही कारण है जीस दिन तुम्हें तुम्हारी जंजीरों का पता चल जाएगा
- 20:26कि मैं बंधा हुआ हूँ उसी दिन से तुम जंजीरों को तोड़ने में व्यस्त
- 20:34हो जाओगे। फिर उपाय ढूंढोगे नेसेसिटी इस दी
- 20:39मदर ऑफ इन विच जरूरत कार्ड की माँ है।
- 20:50जीस दिन पता चल गया कि मैं तो बंदा हूँ उस दिन कैसे मुक्त हो
- 20:56जाऊं। इसकी चेष्टा करनी शुरू कर दो।
- 21:05आज बुद्धि का बोलबाला है। इसलिए सिख कलयुग कहते।
- 21:10हैं वो सतयुग गया। जब शुद्ध सोने की कीमत होती थी,
- 21:20आज तो लोहे को सोना समझ लिया गया। वो जमाने गए जब ऋषि बाहर एकांत
- 21:33में। एक कुटिया के भीतर अकेला बैठा
- 21:42अपने भीतर उतर जाता, डूबकी मारता और रस का सेवन करने लग जाता।
- 21:46उससे बड़ा जन्नत है कहाँ तुम भी जब थक जाओगे ऊहा पोह से जब भी कोई
- 21:55थक जाता है। तो आखरी क्षण उसके लिए है, सदा है
- 22:03वो आखरी क्षण है तुम्हारा अपना होना, तुम्हारे स्वयं का होना आज
- 22:13तो तुम शब्दों से बात कर सकते हो। लेकिन अनुभव से ये नहीं बोल रहे
- 22:19तुम मैं कहता हूँ कि ठीक है चार वाक मेरा वही प्रसिद्ध वचन जो
- 22:30देखा नहीं, वो होता नहीं। तो फिर दिन में अगर सूर्य उग जाता
- 22:38है और तारे दिखने बंद हो जाते हैं तो क्या तारे नहीं होते?
- 22:45जीस व्यक्ति ने दिन में तारे नहीं देखे होंगे, वह कहेगा नहीं?
- 22:49तारे होते। तारे देखने के लिए या तो किसी
- 22:55वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जाना पड़ेगा या फिर रात का इंतजार
- 22:59करना। होगा।
- 23:02तारे दिख जाएंगे तारे कहीं गए नहीं।
- 23:05वस्तु ठोर की ठोर? दादू दूजा को नहीं दूजी मन की तो।
- 23:14दौड़ मिटी संख्या के वस्तु ठोर के ठोर तुम्हारे पर शब्द है और कोई
- 23:31ऊपर से उतरा शब्द कवि के हृदय में।
- 23:35तो उसने फौरन काफी रद्द करा दिया। यह मेरा है, इसलिए मैं तुम्हें
- 23:44कहता हूँ कभी एकांत की क्षण में बैठ जाना बिलकुल निर्भार हो के
- 23:54निर्बोज हो के। अकेले बिल्कुल अकेले नितांत अकेले
- 24:05और ठहर जाना मन हो जाना बिल्कुल मन हो जाना।
- 24:16ध्यान रखना एक सूत्र भी है अगर कोई व्यक्ति रोज़ एक घंटा सिर्फ
- 24:23मौन हो जाता है, जो कि तुम्हारा स्वभाव सिर्फ मौन है, परम मौन है
- 24:31अगर कोई। व्यक्ति।
- 24:331 घंटे के लिए सिर्फ मौन हो जाता है और कुछ नहीं करता कर्तव्य कर्म
- 24:40करता है, परिवार का पोषण करता है काम धाम करता है, सिर्फ एक घंटा
- 24:48मौन हो के बैठ जाता है, तो तुम्हें कुछ करने की आवश्यकता
- 24:51नहीं। कोई जुगती करने की आवश्यकता नहीं,
- 24:55कोई विज्ञान भैरव तंत्र के 112 विधियों की कोई जरूरत नहीं।
- 25:01जोर न जोगती छोटा संसार किसी युगती में कोई जोड़ नहीं।
- 25:07वह तुम्हारी बेड़ियों को हर रहे। बस एकांत में बैठ जाना, 1 घंटे के
- 25:15लिए मौन किसी गुरु से कोई मंत्र न लेके आना, ये धोखेबाज है, ये
- 25:21चालबाज है, ये लोग कह देते हैं बाबा पांडाल क्यों नहीं लगा देते?
- 25:28लोगों का भला हो जाएगा। बड़ी सी पांडाल लगा किया करो।
- 25:33लाखों लोग बैठेंगे और लाखों लोग लाभान भी तो होंगे।
- 25:39मैंने कहा लिखन जो पांडाल में जाके बैठे, बड़ी बड़ी पांडाल में
- 25:47जाके बैठे। लाखों की तादाद में जाके बैठें।
- 25:53क्या वो लाभान्वित हो गए? ये एक धनता है।
- 26:02अगर किसी दिन मैं भी ऐसा करूँ तो मुझे छोड़ देना।
- 26:08मैं धंधेबाज हो गया मैंने व्यापार की दुकान खोल।
- 26:15ली। बस ये व्यापार की दुकानें है कुछ
- 26:23नहीं अगर कुछ होता। घर में आराम करते हैं।
- 26:36हीरोपयो गांठ घटिया हीरोपयो। गांठ घटिया बार बार को क्यों
- 27:00खोलें? मन मस्त हुआ।
- 27:06आखिर क्यों हो हो? ये जानते हैं दो ही लोग इनका कुछ
- 27:27नहीं तो स्वार्थ अगर बड़ा सा भंडार लगाएं।
- 27:33तो घने से लोग और चढ़ावा गाना सा होगा।
- 27:42मैं इनकी ट्रिक्स सब जानता हूँ। ये आपका दुख दूर करने के लिए नहीं
- 27:53बैठे हैं। ये अपनी संख्या बढ़ाने के लिए
- 27:57बैठे हैं। इसीलिए।
- 27:58ज्यादा संख्या में लोग आएँगे ज्यादा चढ़ावा चिड़ेगा लेकिन फिर
- 28:04भी मैंने मूर्ख क्यों कहता हूँ? क्योंकि चढ़ावा साथ कहाँ जाएगा?
- 28:17तो मैंने कहा एकांत में बैठ जाना 1 घंटे के लिए।
- 28:28और सोचना उस उपनिषद के ऋषि की तरह सोचना जैसे यज्ञ वल्क ने कभी शोख
- 28:38था सोचना। तुम्हारा यहाँ क्या है, देखिए
- 28:51तुम्हारा वही होता है जो तुमने बनाया है।
- 28:58इन शब्दों को कृपा करके ध्यान से सुन लेना तुम्हारे जीवन में बड़ा
- 29:02परिवर्तन आ जायेगा सत्य झूठ में तो आप सदा ही चल रहे हो इन
- 29:12महासंतों ने तुम्हारी बुद्धि हार ली है, अपने वश में कर ली है।
- 29:21बहुत तरह के आपको ढंग दिए जाते हैं जबकि बाबा की नकल करते हैं ये
- 29:28लोग और बाबा कहते हैं जोड़ना जुगती छूटह सन सा और ये जुगती
- 29:34बताते हैं ये लो पांच न? मेरे पास राधास्वामी आ गए।
- 29:41बाबा आप तो रोज़ नित्य नई बात करते रोज़ नई बात रोज़ नई बात
- 29:49हर्पल नई बात। मैं तो सत्संग में जाता था, वही
- 29:55रुकाट बजता है। एक ऐसे बोलता था रिकॉर्ड नहीं
- 30:00कहता था, ग्रामीण आदमी था वही रुकाट बोलता है, वही शब्द होते
- 30:06हैं गिनी चुनी पहले से लाखों बार सुने गए।
- 30:12वो ही वो ही फिर रुकाट लग जाता है।
- 30:17अब तो रोज़ ही नई बात बोलते। है नहीं का भाई उनका धंधा है।
- 30:31अगर वास्तव में उन्होंने जप जी को पढ़ा होता गोना होता।
- 30:36हृदय में उतारा होता अस्तित्व तक पहुंचे होते।
- 30:42ये एक धागा है अन्नतनाद का इसका एक छोर पकड़ लेना और इसके मूल
- 30:48उदगम तक पहुँच जाना। लेकिन ऐसे गुरु मैंने देखे कल
- 30:54परसों की बात है। रोज़ नए गुरु आ जाते हैं क्योंकि
- 31:02ये धंधा बढ़िया है। मैं भी कहता हूँ आज के बेरोजगारी
- 31:08के जमाने में अगर तुम्हारे पास कोई धंधा नहीं तो बस बाबा बन जाओ।
- 31:20ये धंधा बहुत बढ़िया है। वह लाइव बैठे थे उनके पास एक
- 31:28भागता था, बड़े दूर से आया बाबा मेरे भीतर आनंद की आवाज़ गूँजती
- 31:35है। और वह जो गुरु बैठे हैं, उन्होंने
- 31:45फटा पुराना कुर्ता पहन रखा है। तुम्हें आकर्षित करने की ढांग है।
- 31:59चाहे ये मेकअप कर लिया जाए, दाढ़ी को पीला कर लिया जाए।
- 32:05जूड़े को पीला कर लिया जाए, आँखों गालों पर लाली लगा ली जाए, चंदन
- 32:17लगाया है। शांति के लिए तो भीतर शांति नहीं
- 32:22है क्या? अगर भीतर शांति होती तो बाहर से
- 32:27ही चंदन की क्या आवश्यकता पड़ती थी?
- 32:30अभी कल ही मुझे किसी ने प्रश्न पूछ लिया बाबा तुम इतनी गर्मी के
- 32:34अंदर ये घर मफलर क्यों रखते हो सर?
- 32:42बड़ा प्यारा सवाल पहली बार शास्त्रों से निकलकर मेरे जीवन पे
- 32:46आया हूँ ज्यादा बेहतर सवाल समझता हूँ मैं क्योंकि प्रत्येक सवाल जो
- 32:56तुम पूछो। उससे तुम्हारे जीवन की समस्या का
- 32:59निदान होना चाहिए हल होना चाहिए, शास्त्रों की बात का निदान होना
- 33:03ही चाहिए, इसलिए मैं शास्त्रज्ञ प्रश्नों को नज़रअन्दाज़ कर देता
- 33:09हूँ बहुत बार। मैंने कहा पुत्र प्रश्न तो आपने
- 33:16बहुत बढ़िया पूछा और देखते हो और ऐसा नहीं है कि जब मैं बोलता हूँ
- 33:24तो दिखावे के लिए मेकअप की तरह इस्तेमाल नहीं करता।
- 33:27इसको ना ही दाढ़ी को जूड़े को पीला करता हूँ।
- 33:36ना ही लाली या चंदन लगाता हूँ, ना ही झुक झुक के प्रणाम करता हूँ,
- 33:42ना ही इकठ विकठ करता हूँ। ये सब मीडिया तंत्र के डकौंसले
- 33:47हैं लेकिन सत्य तो ये है कि दो कारणों से।
- 33:55एक तो मैं जो शक्ति देता, जो गरमाइश देता कार्बोहाइड्रेट उसका
- 34:04सेवन नहीं करता, रोटी नहीं खाता तुम्हे पता है मैं दूध का सेवन
- 34:10करता हूँ, उसमें कार्बोहाइड्रेट कम होता है।
- 34:16इतनी गरमाइश नहीं लेता और कम मात्रा में लेता हूँ।
- 34:19अल्पाहार दूसरा कारण बड़ा वृहद है।
- 34:30जैसे ही तुम ध्यान में पहुंचोगे अब ध्यान की।
- 34:34गहराइयों में जाओगे। साधना करने वाले साधक इन शब्दों
- 34:42को ध्यान से सुनने उन्हें ठंडी लगने लगेंगी।
- 34:48हो सकता है उनका शरीर कांपने लग जाए।
- 34:55क्योंकि शरीर से लगाव टूटेगा। जैसे ही तुम अपने भीतर गए ध्यान
- 35:04में यही तो होता है जैसे भीतर गए तुम्हारे शरीर से उतना ही लगाव
- 35:09टूटा और जैसे शरीर से लगाव टूटा। वैसे ही शरीर को हिट देने वाले ये
- 35:21यंत्र कम हिट पैदा करते हैं तो तुम्हे ठंडी लगती है।
- 35:28अब देखिये यहाँ कोई पंखा एक के ऊपर चल रहा है कोई एसी भी नहीं।
- 35:35बिल्कुल बिना इसी के और एक के ऊपर पंखा इसके भीतर मैं बैठा हूँ रोज़
- 35:42ऐसा ही होता। है।
- 35:52कारण कारण मैं उस तत्व में चला जाता हूँ जहाँ शरीर से बेलगाम हो
- 35:58जाता है। मैं इतना कंजूस हूँ कि मैं उस
- 36:06तत्व के बिल्कुल आखिरी छवर पे बैठ जाता हूँ।
- 36:11यहाँ से वो मज़ा भी आता रहे स्वयं का और यहाँ से बोला भी जा सके।
- 36:18दोनों गांव में थे उधर से उठाऊ आनंद को और इधर से बिखेरु आनंद
- 36:26को। वहाँ जाके तो व्यक्ति मौन हो जाता
- 36:31है पर मौन लेकिन तुम्हें बोल के बताना भी है फिर मैं अपना ढंग
- 36:42अपनाता हूँ। जहाँ तक मौन रहा जा सकता है।
- 36:47और जहाँ से बोलना शुरू हुआ जा सकता है, इसलिए कभी कभी आप बोलते
- 36:53बोलते मुझे डुबकी लगाते पाओगे ऐसा लगेगा जैसे शराब पी लिया, मैं
- 37:01बिल्कुल उसकी गवार पे बैठा हूँ थोड़ा सा छुटका।
- 37:08के जुबां लड़खड़ाई कदम बह के मस्ती का सुरूर चढ़ा, आनंद ने
- 37:18खुमारी बरसाई, झरनों की तरह मेघ बरसा।
- 37:26कलियाँ मुख खोलते हुए सुगंधी बिखेरते हुए नजर आईं।
- 37:32मैं बिल्कुल उसे जंक्चर और बैठ बैठाया जाता हूँ जहाँ पर मौन
- 37:38टूटता है और तुम बोल सकते हो, इन्द्रियों से तुम लगाव कर सकते
- 37:43हो। मैं इतना किर्शी हूँ इस मामले में
- 37:51इतना कंजूस हूँ क्रिपण हूँ बिलकुल उस पॉइंट से थोड़ा सा ऊपर
- 37:58तुम्हारे हित में भी है क्योंकि बहुत ऊपर से बोलेंगे।
- 38:04तो आचार्य प्रशांत हो जाऊंगा विकास दिव्य धरती हो जाऊंगा।
- 38:13इनके पास वोकबुलरी बहुत ही ज्यादा है जीतने सर लोग हैं।
- 38:19वोकबुलरी बहुत ज्यादा होती है और तुम वोकबुलरी से ही प्रभावित होते
- 38:24हो। तो जो सिक्का चलेगा वही तो मान्य
- 38:31होगा ना तो आज सिक्का चलता है मुकाबले का।
- 38:36तुम्हारे पास कितनी सूचनाएं हैं और जो व्यक्ति नई सूचना देता है
- 38:41उसको अधिमान दिया जाता है। जैसे आज राजनीति में हो गया।
- 38:47जो जितना झूठ बोलेंगे उसको उतनी ही बड़ी पद भी मिल जाएगी जितनी
- 38:55प्रतिशोध की ज्वालाओं को पैदा करेगा।
- 39:02आग को बिखेरेगा, नफरत को फैलाएगा, उसको पुरस्कृत किया जाएगा ये आज
- 39:10का सिक्का आज यही सिक्का प्रचलन में।
- 39:16है। यही तुमने संतत्व के लिए भी मान
- 39:24लिया है। जिसके पास ज्यादा सूचनाएं हैं वही
- 39:32ज्यादा पहुंचा हुआ है जबकि तुम्हें पता नहीं सूचनाएं तो
- 39:37ज्ञान तक पहुंचने में बाधा है। मैंने पहले ही बताया जैसे प्रकाश
- 39:45के उदय होने पर तारे लुप्त नहीं होते, डाक दिए जाते हैं सूरज के
- 39:56निकलने से। वैसे ही तुम्हारा हाल है।
- 40:03तुमने पूछा, पुत्र कि जब जरे जरे? में वो है।
- 40:10तो फिर वो ढक कैसे लिया जाता है? कैसे वृहद शक्ति के पीछे?
- 40:17ढकने वाली कोई महावरिहदय शक्ति है नहीं, महावरिहदय शक्ति नहीं है,
- 40:24सिर्फ महावरुद्धता है, अवरोध करती।
- 40:30है तुम्हें समझा दिया सूक्ष्म से पूछता है।
- 40:42कोई प्रश्न है? चल आगे चल तो मैं बिलकुल वहाँ से
- 40:52बोलता हूँ, जहाँ से बोलना शुरू हुआ जा सकता है।
- 40:59और शुभ भी है आपके लिए कल्याणकारी बिलकुल समय पे बैठा होता हूँ।
- 41:06बहुत से लोग जब मैं बोलता हूँ तो मन्नत मानने लग जाती है।
- 41:19क्योंकि उन्होंने सुना है प्राचीन ऋषियों से कि ऐसा व्यक्ति जो अपने
- 41:26उस तल को छू लिया है, उसके सामने बैठ के अगर कोई मन्नत मान ली जाए
- 41:30तो पूरी हो जाती है। तुमने सुना है ठीक भी है, लेकिन
- 41:46इसको अगर मेरे पास आके अगर तुम मेरी मौजूदगी मैं तुम उस मन्नत को
- 41:53मान लोगे, मुझे कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- 41:58क्योंकि उस वक्त मैं इतना विराट होता हूँ कि मैं होता नहीं हूँ,
- 42:03वही होता है और तुम्हें कोई जरूरत नहीं होती बोलने की तुम सिर्फ मन
- 42:10ही मन में या मन्नत मानो कि प्रभु हे विराट।
- 42:18इस रचना के मालिक इस सृष्टि करता मैं इस तकलीफ से दो चार हो रहा
- 42:28हूँ, मेरी इस तकलीफ को दूर करने का उपाय करो, मुझे कहने की
- 42:36आवश्यकता नहीं। क्योंकि मेरे पास आके हो गए।
- 42:44बाघों के पास श्याके ही फूलों की सुगंध को नासा फूटों में सुंघा जा
- 42:51सकता है। दूर बैठे तो कल्पनाओं के लोक के
- 42:55सुगंध तुम्हारे भीतर उठेंगे। इसलिए ड्रामेबाजी नहीं करता।
- 43:02मैं पंडाल नहीं लगाता क्योंकि मैं जानता हूँ इनके दुकानदारी है।
- 43:14वही एक शब्द, वही पांच नाम, वही चार नाम।
- 43:24जपते रहो, जपते रहो तुम्हारी शक्ति खोती रहेंगी, तुम थक जाओगे
- 43:32और तुम उसको आनंद समझोगे यद्यपि होगी वो मोर्चा एनर्जीलेसनेस।
- 43:41तुम जपते जपते राम राम राथे राधे या पाछ ना मैं जानता नहीं हूँ
- 43:49पांच ना मैंने कोशिश भी नहीं की। जब मैं जानता हूँ के शब्दों में
- 43:55वो आता नहीं है अखरा नालों, वकर जड़ा।
- 44:00शब्दातीत जो है उसके बारे में मैं क्यों जानूं?
- 44:10शब्दों में जो आ जाता है वह शब्दातीत नहीं है।
- 44:17इसलिए पांच नाम कौन से होते हैं? बहुत से शिष्य हैं मेरे जो राधा
- 44:23स्वामी पंथ से छोड़ के आए बड़े वजह से पूछ सकता हूँ और पता चल
- 44:27जाएगा, लेकिन आगे ये समझदार लोग हैं, समझदार नहीं है, लोग भी हैं
- 44:35आगे मत बताना। पाप लगेगा क्योंकि अगर उसने आगे
- 44:42बता दिया तो मेरे पास कौन आएगा? संख्या घटेगी, संख्या बल घटेगा और
- 44:51मेरे पास चिढ़ावा कम होगा। फिर गुलक में से क्या निकलेगा?
- 44:56ठन ठन को पार। लेकिन मुझे गालों की जरूरत है,
- 45:03मुझे वो खजाना मिल गया। इसको पाने के बाद किसी और प्रकार
- 45:08के द्रव्य की जरूरत नहीं रह जाती। हंसा पायो मानसरोवरु हंसा पायो
- 45:32मानसरोवरु। ताल तलैया मन मस्त हुआ फिर क्यों
- 45:49बोले मन मस्त हुआ फिर क्यों? वो बोले जरूरत क्या है?
- 46:03जितना वक्त तुम पदार्थों को इकट्ठा करने में गुजार देते हो।
- 46:09काश वो वक्त। मैं तुमने फुर्सत के लम्हे पैदा
- 46:15किए। उस महासरोवर में उस आनंद में
- 46:30विलीन हो सकते थे जीस आनंद को पाने के बाद कुछ और पाना शेष नहीं
- 46:36रह जाता। लेकिन ये हमारी भाग्यहीनता है
- 46:46कैसे? ऐसे नकली गुरु पैदा हो गए?
- 46:49हैं। इसलिए मैंने कहा आज ज्ञान के लिए
- 46:54भी दौड़ हो रही है, जबकि ज्ञान मिलता है ठहरने से।
- 47:04और आज ज्ञान के लिए भी दौड़ सिक्के कमाने हों, पदवी कमानी
- 47:11हों, संसारिक पद प्रतिष्ठा लेनी हो तो दौड़ना ठीक एकमात्र कारण
- 47:17है। दौड़ मेहनत करो लेकिन खुद तक
- 47:21पहुंचना हो। तुम रात्रि को खुद तक पहुंचते हो।
- 47:26मतलब क्या करते हो, नींद कर लिया, कोई प्रयास करते हो, सहज हो जाते
- 47:34हो, रिलैक्स हो जाते हो, छोड़ देते हो और तुम अपने आप में चले
- 47:39जाते हो। यही तो यात्रा कहते हैं, स्टाव
- 47:41करके तुम हो। तुम हो भाई तुमने खोजना क्या है
- 47:50जब तेरा गर्दन झुकाई देख ली दिल के आईने में थी।
- 47:54तस्वीरें यार क्या पाना क्या खोना?
- 48:04लेकिन जब तक तुम्हें वो चैन सुकून का सागर नहीं मिलता, तब तक तो
- 48:11पाना ही पड़ेगा। तब तक किसी से गुरु के पास जाना
- 48:18तो तुम्हें बटका ही ना? जो तुम्हें जुड़ाई ना जो तुम्हें
- 48:22ठहराए और ये नाम, धाम सब भटकाने की बगाने की योजनाएं हैं, जो
- 48:30तुम्हें ठहरा दे, वास्तव में ठहरा दे नथ्थिंग टु डू कुछ नहीं करना
- 48:35भाई तुम कर भी कुछ नहीं सकते। मैं यज्ञबल की बात कर रहा था।
- 48:45उपनिषदों का वह महान शंथ जो गार्गी के प्रश्नों का उत्तर
- 48:53देता। है।
- 48:59कभी अगर पढ़े लिखे हो तो वृद्धारण्य के उपनिषद को पढ़ना है
- 49:04उसमें गार्गी और याज्ञा बल का संवाद।
- 49:08आएगा। तो गार्गी सवाल पूछते।
- 49:13हैं। जैसे तुम सवाल पूछते हो।
- 49:22महर्षि यह विश्व किस पर टिका हुआ है?
- 49:32तुम भी पूछते हो इस संसार को किसने बनाया?
- 49:40तुम कहते हो प्रकृति नहीं। प्रकृति को किसी ने बनाया तुम
- 49:47कहते हो भगवान फिर तुम पूछते हो कि भगवान को कुछ ना बनाये बस आगे
- 49:57जा के चुप होना पड़ता है। आगे जाके यज्ञ बलक भी मौन हो
- 50:02जाते। है।
- 50:03यही प्रश्नकार भी ने कहा। हे यज्ञ बलक।
- 50:15यह सारा अस्तित्व किसके ऊपर खड़ा है?
- 50:20आधार क्या है? तो यज्ञ बल के कहते हैं हे गार्गी
- 50:26यह आकाश पर खड़ा है तो फिर यह आकाश किस पे खड़ा है?
- 50:38बिलकुल तुम्हारी तरह प्रश्न पूछती है यज्ञ?
- 50:47या गबर को समझ जाते हैं। प्रश्नों का कभी कोई अंतिम मूत्र
- 50:52होता है। जो बात अनुभव से समझ में आ सकती
- 50:58है, वह शब्दों से समझाई जा सकती है नहीं।
- 51:04तो यज्ञ बल्क बोलते हैं, गार्गी ऐसे प्रश्न मत करो कि तुम्हारा
- 51:09दिमाग भ्रष्ट हो जाए, तुम्हें ब्रेन हेमरेज हो जाए, बस तुम ऐसे
- 51:17ही प्रश्न करते हो। और तुम सोचते हो, जीस दिन किसी ने
- 51:22हमारे इस प्रश्न का जवाब दे दिया उसको हम गुरु मान लेंगे तो मोरू।
- 51:25को। माँ मोरू खोजने चले थे।
- 51:31अमृत रस के प्यारे को गठड़ी में बांध लाए सूचनाओं को।
- 51:38और बन गए सर और रोज़ी रोटी को कमाने लगे जो धड़म से गिर जाओगे
- 51:46और तुम्हारे संग कुछ ना जायेगा मृत्यु तुम्हें बता देती है
- 51:50तुम्हारा क्या और तुम्हारा क्या नहीं है।
- 51:56बहुत से लोग मुझे तर्क देते हैं। औलाद के लिए तुम्हें पता है बड़ी
- 52:06से बड़ी प्रतिभाएं अभाव से उत्पन्न हुए अब्राहम लिंकन
- 52:15झोंपड़ी से उठे व्हाइट हॉउस में। प्रतिभाएं उत्पन्न होती हैं,
- 52:21तूफानों से और तुम इंतजाम करते हो तुम्हारे बच्चों के आराम?
- 52:30का? तो ध्यान रखना बच्चे तुम्हारे
- 52:35गोबर गणेश में हो गए। क्योंकि जिन फसलों ने तूफान, ओले
- 52:44बारिश, हवाएं, तेज धूप इन सबको बर्दाश्त नहीं किया उनमें बीज भी
- 52:52नहीं लगेगा। ऐसा ही किसान के साथ हुआ था।
- 52:56किसान केंद्र का भगवान तुमने कभी खेती की नहीं, खेती तो मैंने की
- 53:04है पसीना तो मैंने बहाया क्या तुम ऐसा नहीं कर सकते कि 1 साल?
- 53:13मुझे मेरे हिसाब से खेती कर लेना हाँ बताओ पुत्र मैं वैसे ही कर
- 53:19दूंगा जब मैं कहूं बारिश हो जाए जब मैं कहूं बारिश न हो तन्ने हो
- 53:27जब मैं कहूं हवा तेज न चले तो चले।
- 53:31जब मैं कहूं, सूर्य निकले तो निकले जब मैं कहूं ना निकले तो ना
- 53:34निकले, घोर ठंडी की अवस्था आ जाए वहीं कर देना, भगवान बोले हाँ
- 53:42वैसा ही कर दूंगा। और किसान ने कहा।
- 53:51लो किया, धरती को बरस जाओ, बरस गया, खाद दे दी गई, बारिश का पानी
- 54:00लग गया, धूप निकाल दो धूप निकाल दी बीजंकृत हुआ।
- 54:08नन्ही सी कोंपने फूटी रोज़ बढ़ती गई, पौधा बन गया, पौधा बन गया,
- 54:18ऊंचा हो गया और ऊंचा हो गया। किसान अपनी फसल को देखता।
- 54:26न तूफान मांगा, न ओले मांगे, न तेज धूप मांगी, न तेज बारिश
- 54:33मांगी, सब सहजता से मांगा और सहजता से ही परमात्मा देता चला
- 54:39गया। किसान रो जाता हूँ।
- 54:46अपनी फसल को देख कर उसका कलेजा खून बढ़ जाता।
- 54:50हीमोग्लोबिन बढ़ जाता, आनंद से रस विभोर हो जाता।
- 54:56हे मारे की तेरी बड़ी कृपा है तुने मेरा कहना मान लिया मैं पहले
- 55:00ही कहता था तुमने कभी खेत जोता नहीं, मैं रोज़ मशक्कत करता हूँ।
- 55:07खून का पसीना करके बहाता हूँ देख मेरे कपड़े लत पत हुए हैं पसीने
- 55:14से तू क्या जानता खेती क्या होती है तू मेरे ढंग से चला तो देख
- 55:20वसले किसान के सिर के ऊपर से। इतनी ऊंची उठ गई किसान के सर से
- 55:29बहुत ऊंची उठ गई किसान, बोला भगवान देख ये होती है खेती जिसके
- 55:46पैर न फटी बेबाई सो क्या जानें फिर पराई?
- 56:02जिसके प्रेरणा फटी विभाई सो क्या जानें पीर परा।
- 56:18किसने कभी खेती नहीं की? जीसको कभी कांटा नहीं चुभा, जिसके
- 56:25खोने से पसीना नहीं निकला। वे क्या जानें मशक्कत क्या होती?
- 56:31है। अब तू मेरे ढंग से चला अब तू देख।
- 56:38मेरे सर से दो दो फोटो ऊपर निकल गई या बलिया प्रभु मुस्कुराए?
- 57:01अब गर्मी कर दे, धूप निकाल दे मेरी ये फसलें सुनहरी हो जाएं।
- 57:10बैसाखी गरीब थी। हमारे यहाँ गीत आता।
- 57:21है। मुक गी फसल दी, राखी जटा आई
- 57:25बसाखी। अब फसल की राखी करनी खत्म हो गई।
- 57:31कोई डंगर, कोई पशु घुस के फसल खराब न करते।
- 57:38बंदरों ने खाना कम होता है, उत्पाद ज्यादा मचाना होता है तो
- 57:46फसल बहुत ऊंची चली गई। धूप निकालते धूप निकल गई फसल सोने
- 57:53की सी रंगतली लहलहाने लगी, हल्की सी हवाएं चलती है।
- 57:59और किसान का कलेजा बढ़ जाता है। बड़ा खुश होता है हे भगवान
- 58:1413,00,00,000 करोड़ शुगर। तो उन्हें आज मेरी बात मान ले।
- 58:20बाबा कहते हैं कि उसकी बात मानो उसको हुक्म मत करो, उसका हुक्म
- 58:25मानो अगर हुक्म करोगे तो दुखी और रहोगे और अगर हुक्म मानोगे तो
- 58:29सुखी रहोगे। सीधा सा मंत्रालय।
- 58:39हुकुम आने वाला सदा सुखी होता है। हुकुम करने वाला हुकुमरण सदा दुखी
- 58:45होता है। यह उलटी बात लगेंगी, लेकिन सत्य
- 58:48है। फसल को काट लिया गया।
- 58:59उजार लाए गए श्रमिक बुलाए गए, फसल कट गई तो किसान कहने लगा अब के
- 59:11झाड़ देखना प्रभु जी। तुम्हें क्या पता किसानी होती
- 59:18क्या है? निंदा समझने वाले लोगों, मैं
- 59:25निंदा पाखंड की करता। हूँ निंदा झूठे बनाए हुए
- 59:33सिद्धांतों की करता हूँ। सत्य की तो निंदा हो भी नहीं हो
- 59:37सकती। फसल कट गई, फसल में एक भी दाना न
- 59:46निकला, एक भी दाना नहीं था गेहूं। का?
- 59:52एक भी दाना। बस चारा ही चारा था, किसान ने तो
- 1:00:02माथे पे हाथ मार लिया हे प्रभु तुने यह क्या किया?
- 1:00:10प्रभु कहते जैसे तुमने कहा पुत्र मैंने वही।
- 1:00:15उसके अतिरिक्त मैंने कुछ भी नहीं किया तो ये तो फल तो निकला नहीं,
- 1:00:21मैं क्या खाऊंगा? कहते यही घास खा लो, घास खा लो
- 1:00:28हाँ जो तुमने बीजा, वही तो काटो। वही तो खाओ ये तो सिद्धांत है
- 1:00:35कर्मों का अरे मालिक चलो ये तो बता दो कि ये हुआ कैसे?
- 1:00:46फसल तो बड़ी ऊंची थी, बस ये सूचनाओं को कहने वाले ऊंचे बड़े
- 1:00:51होते। इनका मीडिया बड़ा ऊंचा होगा।
- 1:00:58इनकी वीडियो बड़ी प्रभावी ढंग से सजाई जाएंगी।
- 1:01:02इनके आईटी स्पेशलिस्ट होते हैं। ये जो लोग कहते हैं बाबा आप क्यों
- 1:01:08नहीं करते हम बना के दे देते हैं? आप कुछ लेते नहीं तो हम भी आपसे
- 1:01:14कुछ मांगते नहीं। वे शुद्ध सेवा करेंगे।
- 1:01:21मैंने कहा बच्चा तुम्हारी मर्जी, लेकिन मैं नहीं घुमुंगा तुम्हें
- 1:01:26ये बनाओ। एक आध अच्छा लगे तो बना दिया,
- 1:01:35लेकिन ऐसे आई टी की टीम नहीं। आपको जानकर बड़ी हैरानी भी होगी
- 1:01:40और सुकून भी मिलेगा। पांच वर्ष से ज्यादा मुझे बोलते
- 1:01:45हो गए। मेरे पास जो काम करने वाले सेवक
- 1:01:49हैं, उन्होंने एक पैसा भी पराश्रमिक तौर पे नहीं लिया सेवा
- 1:01:57की और उनको मेवा भी मिले। जो सेवा करते हैं उनको मेवा भी
- 1:02:02मिलती। जिसकी सेवा करता है वह देता है।
- 1:02:10उसके हाथ बड़े विशाल हैं। मेरे हाथ तो छूटे हैं, छोटे छोटे
- 1:02:15हाथ उसके हाथ देखो मेरी सेवा करोगे तो पराश्रम में को उतना ही
- 1:02:22मिलेगा। अरे अगर उस विराट की सेवा करोगे
- 1:02:27तो पराश्रम में कितना मिलेगा मेहनताना?
- 1:02:30कितना मिलेगा विराट? इसलिए जो संसार नहीं तुम्हें दे
- 1:02:35सकता वह विराट तुम्हें दे सकता है उसके हाथ बहुत बड़े।
- 1:02:46तो मेरे इस चैनल पर कभी किसी ने ₹1 भी नहीं लिया बल्कि आपको
- 1:02:51हैरानी की बात बताऊँ, सेवा भी की और उल्टा दान भी किया।
- 1:03:00जब जरूरत पड़ी ये उलट आपका। जैसे हम ब्राह्मण को हमारे
- 1:03:07प्राचीन रिवाज था, उसमें तंत्र तो बहुत था लेकिन बगाड़ लिया गया।
- 1:03:12ब्राह्मण को पहले भोजन खिलाओ। भोजन खिलाने के बाद दक्षणा दो
- 1:03:17दक्षिणा क्यों के अहो भाग्य हैं हमारे तुमने हमारा भोजन स्वीकार
- 1:03:22किया। अब थोड़ी सी बात कह के आगे चलूँ
- 1:03:30यह एक नियम है अगर तुम किसी भ्रम वेता को जिसने वो ताल छोड़ दिया
- 1:03:40उसको कुछ दान दोगे तो वह। अनंत गुणा होकर तुम्हारे पास वापस
- 1:03:47लौटेगा। यह था इसके पीछे का रहस्य तो वो
- 1:03:52बुलाते थे ब्राह्मण को तुम बुलाते हो?
- 1:03:54आज लोभियों को जिनके पेट पहले से भरे पड़े, जिनकी गोगड़ें फूली हुई
- 1:04:01हैं, यहाँ हमारे थे एक। पंडित जी श्रद्धों में उनको खिला
- 1:04:07दिया ज्यादा अरे ज्यादा मालपुरा खा गया, पेट में दर्द हो गया और
- 1:04:12गालियां निकालने लगा। दुष्ट ने बहुत ज्यादा खिला दिया,
- 1:04:17पेट दर्द कर रहा। है।
- 1:04:19मैंने कहा तुमने खाया क्यों पंडित जी?
- 1:04:22अरे माल तो पे गाना था, पेड़ तो तुम्हारा था तो क्या करें?
- 1:04:29उस दुष्ट ने कहा एक और खालो, मैंने खा लिया स्वाद मैंने बगीची
- 1:04:37से कहा, जीस कमरे में बैठा था बगीची थोड़ा चूरम दे दो तुम्हारे
- 1:04:40पास है। पंडित जी का पेट दर्द ठीक हो
- 1:04:43जाएगा। बगित जी ने चूर्ण दे दिया, मैंने
- 1:04:48कहा ये लो पंडित जी ये चूर्ण खा लो, थोड़े से पानी से निगल लो
- 1:04:53इसको अरे प्रभु अगर इतनी ही जगह होती।
- 1:04:59तो मैं एक मालपुरा ही और न खा लेता, अब वृत्ति तो तुम्हारी ऐसी
- 1:05:04है क्या? खा का आशीर्वाद दोगे बददवाएँ निकल
- 1:05:12रही हैं वह पाप का बाघी जिसने तुम्हें बुलाया श्राद्ध के ऊपर।
- 1:05:18तुम्हारी आत्मा तो दुःख ही है यहाँ तुम्हारा पेट दर्द कर रहा
- 1:05:23है। दुष्क ने इतना फैला दिया कि पेट
- 1:05:27दुःख रहा है, लेकिन इस बात के भीतर एक गहन सिंचाई थी, कभी थी आज
- 1:05:34नहीं, आज मिलते कहाँ हैं? अगर कोई है तो वह कहीं कंधराओं
- 1:05:43में छुपा बैठा है, वह जानता है इन अज्ञानियों की फौज इन अज्ञानियों
- 1:05:49की भीड़ तुम्हें जीने नहीं देगी, तुम्हें चैन से बैठने नहीं देगी।
- 1:05:57तो छिप जाना बेहतर है। अगर कोई होता है एक खरबों खरबों
- 1:06:05अरबों अरबों में एक दीपक जलता है तो वह अपने उजाले को भीतर अपने
- 1:06:10कमरे में अपनी कुटिया में जला के रखता है, दरवाजा बंद कर देता है।
- 1:06:16बस आज ऑप्शन यही बचा है। लेकिन यह बात संतो के लिए कह गई
- 1:06:21थी। ब्रह्मलीन व्यक्तियों के लिए जो
- 1:06:23ब्रह्म के साथ एकाकार हो गई, जिन्होंने अपना स्वरूप जानकर
- 1:06:28विराटता के साथ संबंध स्थापित कर लिया।
- 1:06:33बात उनके लिए थी अगर जर्रा दोगे। तो टनो टनो पाओगे, एक जर्रा दोगे
- 1:06:40तो टनो टनो पाओगे? लेकिन आज इस बात को लोभ का विषय
- 1:06:44बना दिया गया है। ओके आज उस तल पे पहुँचकर बराट
- 1:06:55होने वाला व्यक्ति बचा ही नहीं। इसे ही कलयुग कहते।
- 1:07:00हैं दिखावा है, प्रसार है, प्रचार है, मीडिया है, झूठ बोलता है।
- 1:07:12जिसका प्रचार कर रहे वो भी झूठ बोलता है।
- 1:07:18और पतंजलि हूँ यज्ञ बल हूँ, बुद्ध हूँ, महावीर हूँ।
- 1:07:22इनका प्रथम वाक्य क्या है? अगर उस आनंद को पाना है तो सबसे
- 1:07:27पहला शब्द है सत्य सत्य सत्य सच बोलो सच जानो।
- 1:07:40सच में उतरो सच ही तुम्हारा जीवन, सत्य ही तुम्हारा हमारा आध सच
- 1:07:48जुगाद सच हे भी सच नानक होश भी सच यह प्रथम चरण था सभी संतो का।
- 1:07:57अगर तुम बोल सत्य ना पाए तो तुम्हारे आचरण में डलेगा कैसे?
- 1:08:10सत्य से शुरुआत करनी। होगी।
- 1:08:14सत्य बोलने से शुरुआत करनी होगी और एक वह जो सत्य है उसमें समाहित
- 1:08:20हो जाना पड़ेगा। यही है रास्ता मार्ग यही पड़ाव है
- 1:08:27तुम्हारा। मैंने कहा आराम से बैठ जाना, एक
- 1:08:35घंटा एक घंटा, आराम से बैठ जाना, मौन बैठ जाना।
- 1:08:42बैठ के विचार करना तुम्हारा यहाँ है क्या?
- 1:08:46और इस नियम को याद रखना जो तुमने बनाया वो तुम्हारा और जो तुमने
- 1:08:53कमाया वो तुम्हारा नहीं है माया महा ठगनी हम जाने।
- 1:09:03माया महाठगनी है आज तुम्हारी है कल किसी और की हो जाएगी उसके
- 1:09:10मालिक रोज़ बदलते रहते हैं माया महाठगनी हम जानें गौरव कहते हैं।
- 1:09:20यह माया महा ठगनी क्यों? क्योंकि आज तुम्हें ज़रासा देती
- 1:09:26है कि मैं तुम्हारी हूँ, कल किसी और की हो जाती है, यह ठग लेती है
- 1:09:33तुम्हें इसको गोरखनाथ कहते हैं कि यह माया।
- 1:09:39इसके झांसे में मत आ जाना। ये झांसा देने वाले आपके अस्तित्व
- 1:09:48को विकृत कर देते हैं। झांसे में मत आ जाना।
- 1:09:57ये खुद भी सोए हुए हैं। तुम ही तुम्हारे से तुम्हारी
- 1:10:03जागृति भी छीन लेंगे। सोचना तुम्हारा क्या।
- 1:10:11है। और एक नियम को याद रखना जो तुमने
- 1:10:16कमाया वो तुम्हारा नहीं। और अंत समय तुम्हें दिखला देता है
- 1:10:22तुम्हारा क्या जीस शरीर को तुम मैं कहते थे मेरा कहते थे, जीस
- 1:10:31विचार को तुम मैं कहते थे, मेरा कहते थे वो आखिर मिट्टी को पाता
- 1:10:36है। वह धरम से गिर जाता है, माटी में
- 1:10:40विलीन हो जाता है तो इस नियम को याद रखना जो तुमने बनाया व्हाट यू
- 1:10:49हैव करियर? एड्रेस वो तुम्हारा व्हाट यू हैव
- 1:10:55एंड वो तुम्हारा नहीं। जो तुमने बनाया क्रियेट किया, वह
- 1:11:01तुम्हारा और जो तुमने कमाया वह तुम्हारा नहीं है, तो फिर इसी
- 1:11:07सिद्धांत को साथ लेके आनंद के धागे की तरह मूलभूत उदगम स्रोत की
- 1:11:15तरफ चले जाओ। तुम पाओगे धीरे धीरे तुम्हारा
- 1:11:24क्या है सब खोता चला जायेगा। ये भी कमाया ये भी कमाया ये भी
- 1:11:31कमाया। तो बनाया क्या आखिर में तुम्हें
- 1:11:35पता चलेगा बनाया मैंने कुछ नहीं मैंने सिर्फ कमाया मसल्स कमाई, सब
- 1:11:46कमाया धन कमाया पद कमाया प्रतिष्ठा कमाई जय जयकार हुई सलाम
- 1:11:52हुए। लेकिन बनाया कुछ जब तुम्हें इस
- 1:12:02बात का पता चलेगा एकांत में बैठना है।
- 1:12:06रोज़ बैठ के अभ्यास करना, इसका कोई पांच नाम न जपना सत्य को
- 1:12:12खंगालना सत्य का अन्वेषण करना। सत्य की खोज करना मेरा क्या है?
- 1:12:20और इस बुनियादी सिद्धांतों पर खोज करना जो मैंने बनाया वो मेरा जो
- 1:12:28मैंने कमाया वो मेरा नहीं और इस सिद्धांत के ऊपर चलते चलते 1 दिन
- 1:12:33तुम। सब चीजों को छोड़ते चले जाओगे या
- 1:12:38वस्त्र मैंने कमाए बनाई यह शरीर मैंने कमाया, बनाया नहीं धन मैंने
- 1:12:46कमाया बनाया नहीं पद्वी मैंने कमाई प्रतिष्ठा गद्दी मैंने कमाई
- 1:12:52सब चीजें मैंने कमाई। बनाया नहीं एक एक चीजें छोड़ती
- 1:12:57चली जाएंगी और तुम उसे छूट देना जो तुमने बनाया नहीं जो तुमने
- 1:13:03कमाया वो तुम्हारा नहीं जो तुमने बनाया वो तुम्हारा।
- 1:13:09है। एक एक करके व्यर्थ छूटता जाएगा।
- 1:13:15और व्यर्थ इतना छूटेगा के बचेगा शून्य इसे ही कहते हैं नागार्जुन
- 1:13:22का शून्य बाद आखिर में बजेगा तुमने बनाया कुछ यह नाटक कर।
- 1:13:33यू अरे एर्नर तुमने सिर्फ और सब छूट जाएगा और रह जाएगा सब गिर
- 1:13:45जाएगा। जैसे ही सब गिर गया।
- 1:13:52वैसे ही तुम्हारी बुनियाद हिल जाएगी इस मैं के थोथेपन के और मैं
- 1:13:59गिरा जब मैं था तब हरी नहीं, मैं गिरा तो हरी आया।
- 1:14:10अब हरी है मैं ना जब तुम्हारा ये तोतापन गिर जाता है मैंने जो
- 1:14:19बनाया वो मेरा मैंने जो कमाया वो मेरा नहीं किसी और ने बनाया होगा।
- 1:14:25मैंने उसकी जेब से निकालकर अपनी जेब में डाल लिया।
- 1:14:32यह चोरी हुई और आखिर में तुम पाओगे तुम्हारा क्वेश्चन क्योंकि
- 1:14:40तुमने बनाया कुछ। और जब तुम सारे सहारे ये अवलंबन
- 1:14:47है, तुम्हारे तुम्हारे पद, प्रतिष्ठा तुम्हारी सारी डिग्रीज़
- 1:14:53तुम्हारी सारी नॉलेज तुम्हारा घर, संसार, पति, पत्नी, सारे रिश्ते
- 1:15:02अनाते मित्र। बंधु ये तुमने कमाए बनाए कुछ और
- 1:15:16जब सब ये तुम्हारे अवलंबन भी हैं, सहारे भी हैं।
- 1:15:23तुम कहते हो, ज्यादा से लोग इकट्ठे कर लो, क्योंकि जब विपत्ति
- 1:15:28कॉल आएगी तो ये काम पड़ेंगे। तुम्हें पता नहीं कि आखिरी
- 1:15:32विपत्ति होती है, मौत और कोई काम नहीं करता।
- 1:15:36है। जब मृत्यु आती है तो कोई शंग नहीं
- 1:15:42देता है। कोई काम नहीं पड़ता इकट्ठा तुम
- 1:15:48चाहे सारा जहान कर लो, तीन लोगों को इकट्ठा कर लो, समस्त विश्व और
- 1:15:54भ्रमण को इकट्ठा कर लो तो भी काम नहीं पड़ेगा।
- 1:15:57अंतवेला में सब भाग जाएंगे। और जब वो जाएंगे तो तुम साथ नहीं
- 1:16:04दे सकोगे। कोई किसी के संग दे पाया है कभी
- 1:16:11निरवलंब हो जाओगे निरवलंब बिना सहारे के सहारे टूट गए ना मित्र
- 1:16:19रहा ना बंधु। न सहारा, न सहारा और अब लंबन गिर
- 1:16:28गए तो तुम्हारी बनाई हुई। के महल अटारियां धड़म से गिर
- 1:16:34पड़ेंगी, ताश के पत्तों की तरफ बिखर जाएंगे।
- 1:16:36जैसे भूकंप के वक्त बड़ी बड़ी इमारतें धराशायी हो जाती है और
- 1:16:43तुम पाओगे सब मटिया मेट हो गया होना ही था।
- 1:16:48एल। क्योंकि कल्पनाओं के महल जब सजाये
- 1:16:51जाते हैं तो 1 दिन टूट ही जाया करते हैं।
- 1:16:58यथार्थ के महल बनाओ, कभी नहीं टूटेंगे, सोचते चले जाना तुम्हारा
- 1:17:07क्या? और इस पैमाने को याद रखना जो
- 1:17:10तुमने बनाया वो तुम्हारा जो तुमने कमाया वो तुम्हारा नहीं है आखिर
- 1:17:17में तुम पाओगे तुम हो ही नहीं। इसलिए एक सवाल पूछा था किसी मित्र
- 1:17:24ने बड़ा सुन्दर सवाल था। बाबा आखिर में क्या दिखता है?
- 1:17:29संत को? जो उसकी मूर्ति बंद हो जाती है वो
- 1:17:33चुप हो जाता है, महामोन में खो जाता है, वह आनंद ही चुप करा देता
- 1:17:42है आदमी। को।
- 1:17:44वह ऐसे समुद्र में छलांग लगा जाता है जहाँ की मस्त हवाएं उसे बोलने
- 1:17:51देती नहीं। जहाँ खुमारी इतनी गहन हो जाती है
- 1:17:56कि तूफानों की तरह तुम्हें चारों तरफ से घेर लेती है और फिर वरना
- 1:18:02मस्त हुआ। फिर क्या वो ले मन मस्त हुआ फिर
- 1:18:12क्या वो ले जब तुम्हे पता चल जाता है की तुम ही नहीं हो?
- 1:18:22तुम तुम्हारी कल्पना में थे वास्तव में तुम नहीं थे वास्तव
- 1:18:28में जो। है वो है।
- 1:18:30जिसका है उसका है न तुम हो न कुछ तुम्हारा है, यह है सत्य कल्पना
- 1:18:38की प्रणालियाँ पे तुम कितने ही महल अटारियों सजाते रहो।
- 1:18:44शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है ये भ्रम टूट जाता है तुम्हारा
- 1:18:561 दिन खंडहर हो जाएगा तुम भी और तुम्हारा यही सत्र है।
- 1:19:04पर सत्य से शुरू करना आज सच यही कहा सत्य से शुरू करना जुगाद सच
- 1:19:12जो जुगों जुगों से सत्य है उसको याद करना है भी सच वो आज भी सच है
- 1:19:19नान कहो सी भी सच वो सदा से सत्य ही रहेगा।
- 1:19:27क्या है जिसे देख लेता है? संत मूर्ति बंद हो जाती है, मौन
- 1:19:32हो जाता है लेकिन वो मौन बड़ा परम आनंद से भरा हुआ, कुमारी युक्त
- 1:19:38तुम्हारा, रूमा, रूमा तृप तो हो जाता है।
- 1:19:42तृप्त हो जाता है और जब तृप्त हो जाता है तो क्या खाक बोलोगे?
- 1:19:48अतरप्त व्यक्ति बोला करता है तृप्त व्यक्ति को तो बुलाया जाता
- 1:19:54है तृप्त के आगे तो तुम घुटने टेकते हो कि कुछ बोलो लओसे को मिल
- 1:20:01गया था। राजा ने फरमान भेजा, लाउसे कुछ
- 1:20:05बताओ जो तुमने देखा वो क्या था? लाउसी की तो खेचरे मुद्रा लगी हुई
- 1:20:13थी, बोले भी तो क्या बोले और बोले भी तो क्यों बोले तुम सारे दिन
- 1:20:19बोलते हो? तुम दुखी हो।
- 1:20:24इसका कारण तुम कभी समझ नहीं पाते कि तुम दुखी हो, इसलिए बोलते हो
- 1:20:31और तुम्हें समझ नहीं आता कि मेरे दुःख का कारण क्या है और तुम
- 1:20:36हरद्वार दरवाजे पे भटकते फिरते हो।
- 1:20:38तुम कहते हो कि धन के अभाव से मैं शायद दुखी।
- 1:20:42धन कमाते हो शायद पदवी के अभाव से दुखी हूँ।
- 1:20:47हम प्राइम मिनिस्टर राष्ट्रपति हो जाते हो, अमेरिका में त्रलोक की
- 1:20:52नाथ हो जाते हो? कहते हो मान सन्मान के कारण शायद
- 1:20:58दुखी। शायद सूचनाओं की कमी है।
- 1:21:01इसके कारण शायद ज्यादा डिग्रीज़ नहीं है।
- 1:21:04इसके कारण तो और तुम हरद्वार दरवाजे पे दस्तक देते हो, लेकिन
- 1:21:09पाते हो मिला सब जगह से खाली सोने सोने से वापस आ जाते हो।
- 1:21:19वहाँ जाकर तुम देखते हो न तो तुम्हारा कुछ है क्योंकि तुम ही
- 1:21:26नहीं हो तुम्हारी बनाई हुई सब अटारिया ताश के पत्तों की तरह
- 1:21:35खंडहरम में बदल जाती है। लेकिन तुम मस्त हो जाती हो, गिर
- 1:21:41जाए सब गिर जाए, व्यर्थ गिर ही जाना चाहिए और जब व्यर्थ गिरता है
- 1:21:47तो सार्थक प्रकट होता है और सार्थक क्या है?
- 1:21:52सार्थक है, आनंद है मन मस्त हुआ। फिर क्यों?
- 1:22:01वो बोले? मन मस्त हुआ।
- 1:22:08फिर क्या बोला क्या बोला? मन क्या बोले क्या बोले, मन मस्त
- 1:22:23हुआ फिर क्यों बोले? अगर वह सब जगह विद्यमान है, तो
- 1:22:30दिखाई क्यों नहीं पड़ता, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि का प्रकाश?
- 1:22:36तुम्हारी आँखों को चुंदिया देता है, तारे तो होते हैं आसमान में
- 1:22:43कभी गायब नहीं होते, लेकिन सूरज के कारण।
- 1:22:48तुम्हें वो दिखाई नहीं पड़ते वो सूरज कौन?
- 1:22:51वो तुम्हारी बुद्धि तुम्हारी स्नानक इसलिए बाबा ने पहला शब्द
- 1:22:56कह दिया और तुम उसे सुन नहीं पाए, तुम पढ़ते रोज़?
- 1:23:01हो? तुम्हारे भीतर कभी उतरा नहीं है
- 1:23:05शब्द। छः स स्याण प लखो वे तै क न चले
- 1:23:11नाल छः स स्याण प सेकड़ों हज़ारों चालाकियों को बर्तलों जाल बिछा
- 1:23:22लूँ। छः स्याण प लखो वे लाखो।
- 1:23:29तकनीक हों, कलाएं हों, तुम्हारे भीतर ज़ोर हों, इतना चल रहे ना उस
- 1:23:37आनंद तक नहीं पहुँच। पाओगे?
- 1:23:40पदार्थ इकट्ठा कर लोगे, डिग्रीज इकट्ठी कर लोगे?
- 1:23:45सूचनाएं इकट्ठी कर लोगे उसको चूक जाओगे जो बहू मूल्य।
- 1:23:49है दिखता नहीं है सब जगह क्यों क्योंकि तुम्हारी बुद्धि का
- 1:23:57प्रकाश। कोहरे ताल मिले, नदी के जल में
- 1:24:14नदी मिले सागर में सागर मिले कौन से जल में?
- 1:24:24कोई जाने ना होरे ताल मिले। नदी के जल में नदी मिले सागर में।
- 1:24:41सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना ताल मिले नदी के जल में और जगह
- 1:24:55मिल जाएगा तो पग में घुंघरू बांध जाएंगे।
- 1:25:02कंठ सुरेले स्वर से घाव उठेंगे, वीणा के मधुर स्वर संगीत लबद्ध हो
- 1:25:11जाएंगे वह जो जन्मो जन्मो से बिछड़ा हुआ था।
- 1:25:20पता न था, भूल गए थे याद आया। अनजाने होठों परिचय पहचाने गीत
- 1:25:37हैं। है जाने गीत है, कल तक जो थे
- 1:25:47बेगाने जन्मों के मित हैं। जन्मो के मित हैं, उम्मीदवारें
- 1:26:08बूंद छिपी के शुभ दल में कोई जाने।
- 1:26:15ना ओहरे ताल मिले, नदी के जल में नदी मिले, सागर में सागर मिले कौन
- 1:26:31सी जल में कोई जाने ना? कोहरे ताल मिले नदी के जल में।
- 1:26:40सारा विश्व प्यासा। है क्योंकि वह चाहिए जो भूल गया।
- 1:26:50है। उसके बिना तृप्ति नहीं होगी।
- 1:26:55लाख त्रव्यों को कमा लो, तृप्ति आएगी उसके मिल जाने से।
- 1:27:08सूरज को धरती। डर से धरती को चंद्रमा, धरती को
- 1:27:21चंद्रमा, पानी में सीप जैसे प्यासी हर आत्मा।
- 1:27:33प्यासी हर आत्मा उम्मीदवारें क्या होगा कौन से पल में क्या होगा कौन
- 1:27:49से पल में? क्या होगा कौन से पल में कोई जाने
- 1:27:56ना कोहरे का हाल मिले। नदी के जल में नदी मिले सागर में।
- 1:28:09सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना कोहरे ताल मिले नदी के जल में।
- 1:28:34धन्यवाद।