Latest / Baba ji Vijay Vats / 31 Dec 24 - "होनी" कैसे अपना "होनी" का दायित्व निभाती है? छठी इंद्री कैसे जागृत होगी? गीता का ज्ञान!
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- 0:19कर्मण्य वाध का रस थे माँ फलेशु कदाचन।
- 0:27इसे अगला शब्द माँ कर्मफल हेतुर वर्मा।
- 0:34ते संगो अस्तो कर्मणे वहाँ जाके देखो कौन करता है?
- 1:02अंधा व्यक्ति सूरज के बारे में कभी नहीं जान सकता।
- 1:11बुद्धि अंधी है, बुद्धि के तल पे बैठे बैठे तुम जो भी निर्णय
- 1:23करोगे। वो गलत होगा क्योंकि बुद्धि अंधी
- 1:30है, बुद्धि के पास आँखें नहीं सारे यंत्र हैं, बुद्धि के पास
- 1:40आँखें नहीं। और अगर आँखें न हो तो दर्शन नहीं
- 1:49होता है और अगर दर्शन न हो तो शंका नहीं मटती यही शंका है
- 2:02अर्जुन को। यही शंका है समस्त विश्व का
- 2:15बुद्धि के तल पर बैठे बैठे तुम सूर्य के बारे में जो भी कुछ
- 2:24कहोगे पूछोगे। प्रश्न करोगे उस वाले तुम गए
- 2:39क्योंकि प्रकाश क्या है? ये आँखों से कभी देखा नहीं गया।
- 2:45अंधे ने कभी प्रकाश का दर्शन किया नहीं तुमने भी आज तक।
- 2:54उस विशाल आनंद का दर्शन नहीं किया क्योंकि ये दर्शन करने का यंत्र
- 3:03है। सूर्य का दर्शन होता है आँखों से।
- 3:17और परमात्मा का दर्शन होता है। छठी इन्द्र से तुम्हारी पांच
- 3:26इन्द्रियां काम करती हैं, छठी इन्द्र काम नहीं करते हैं।
- 3:33वह भी जगी नहीं। कैसे जगी।
- 3:38बहुत बार समझाया, बहुत बार संतों ने समझाया भेतो उतरो भाई भेतरो
- 3:49भाई भेतर उतरो। छठी इंद्रिय जगेगी।
- 3:55भीतर उतरने से और कोई ढंग है नहीं, इसलिए तुम दूसरे ढंग तलाशो
- 4:11ही न करो। लेकिन लाख समझाने के बाद भी अंधा
- 4:27कभी नहीं समझ सकता कि बसंत में पीला रंग होता क्या है?
- 4:38सुबह के सूरज की उगती हुई लाली कितने प्यारे होते हैं ये रंग
- 4:49बरंगे पक्षी तुम्हें कितना आनंद देते हैं।
- 5:00आँखों के बिना यह तुम कभी न जान पाओगे और तुम ये मत सोचना कि छठी
- 5:15इंद्रिय है नहीं। तो कभी होगी भी नहीं।
- 5:20यह मत समझना छठी इंद्रिय होती तो किसी के भी नहीं, लेकिन जगानी
- 5:29पड़ती है। जगाओगे कैसे देखो मैं कितनी बार
- 5:36बोल चुका हूँ? न कुछ करने में जगह है।
- 5:47अब तो मैंने दूसरा अध्याय भी शुरू कर दिया है।
- 5:53पहला अध्याय है कुछ न करो। अध्यात्म की शुरूआत यहाँ होती है
- 6:07क्योंकि जो पाना चाहते हो वह खोया नहीं है, भूला है।
- 6:19तुमने भी स्मरण कर दिया है तुमने गँवाया नहीं है लॉस्ट नहीं किया
- 6:31है रिमेम्ब्रेंस खो गई है जैसे तुम्हारी ताली गुम हो जाए कुंजी।
- 6:45कुंजी गुम हो जाए। ताला नहीं खुलेगा तो तुम आसपास
- 6:56देखते हो, जेबों में हाथ मारते हो, इधर उधर देखते हो, तलाशते हो।
- 7:05कहीं रख के भूल गया हूँ मैं कहाँ रखी है तुम तलाशते हो सबसे पहला
- 7:16काम होता है अध्यात्म में जो व्यक्ति चलना चाहता है और
- 7:23अध्यात्म में तुम सभी चलना चाहते हो।
- 7:27क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने संसार के पदार्थों में वो
- 7:36सुख जिसे हम आनंद कहते हैं वो पा लिया हो।
- 7:43कुंजी सबकी। खो गई है भूल गए हो कहीं रख के
- 7:54लेकिन ध्यान रखना कुंजी है कहीं ना कहीं पड़ी होगी कभी थी
- 8:01तुम्हारे पास। आज तुम रख के भूल गए हो तो पहले
- 8:07कृष्ण कोशिश करते हैं अर्जुन को बातों से समझाने की और बातों से
- 8:14समझाने का अर्थ है याद दिलाने की कोशिश करते हो देखो।
- 8:22ज़रा तुमने कहीं मेज़ के ऊपर तो नहीं रख दी, अलमारी के भीतर तो
- 8:28नहीं रख दी? चाबी, जेबों वगैरह को देख लो, ये
- 8:35जो कोड तुमने उतारा है उसमें देख लो।
- 8:41कृष्ण यह समझाने की चेष्टा करते हैं कि किसी तरह से अर्जुन को याद
- 8:47आ जाए तो कृष्ण भलीभाँति जानते हैं कि तुमने खोया नहीं है?
- 9:01तुम भूले हो तुम अपने स्वभाव को भूले हो और तुम्हारा स्वभाव है
- 9:10आनंद तुमने आनंद को खोया नहीं है, तुम आनंद को भूले हो।
- 9:20अब दो बातों में बड़ा गहना पार्क है और इन दो बातों में तुम इतने
- 9:27उलझेंग कि संसार की छोटी छोटी समस्याएं भी तुम्हें पहाड़ जैसी
- 9:37लगती हैं। जब घर की चाबी खो गई हो, भूल गए
- 9:46हो विस्मण हो गए हो तो फिकर लगा रहता है कहाँ जाऊंगा, कहाँ
- 9:53बैठूंगा कहाँ विश्राम करूँगा। क्योंकि सब घर के अंदर है, बाहर
- 10:02की गर्मी से तप्त हुए भीतर जाओगे तो एसी मिलेगा, बाहर की सर्दी से
- 10:09तप्त हुए ठिठुरते हुए भीतर जाओगे। तो हीटर है गर्मी गर्म कपड़े भीतर
- 10:21पड़े हैं, तुम्हारा बेड भी भीतर है सोने के लिए दिन में थक जाओगे,
- 10:27रात को विश्राम काम करोगे घर के अंदर।
- 10:33और घर के मुख्य द्वार की चाबी तुमसे खो गई है, भूल गए हो तुम रख
- 10:38के, बस यही तुम्हारी दिक्कत है और कृष्ण तुम्हें समझाने की चेष्टा
- 10:47करते हैं हे अर्जुन तुमने उसे खोया नहीं?
- 10:54तुम उससे बोले हो सिर्फ तो याद करो कहीं वहाँ तो नहीं रखिए कहीं
- 11:03वहाँ तो नहीं रखिए। हर बात को इशारे से समझाने की
- 11:09चेष्टा करते हैं कृष्ण? क्योंकि कृष्ण ने जान लिया है और
- 11:16जिसने जान लिया है वो बड़ी ही सरलता से आपको पहुंचा देगा।
- 11:22जिसने जाना नहीं है, वह आपको असहज कर देगा, वह आपको उलझा देगा।
- 11:33कृष्ण ज्ञानी है, उन्होंने जान लिया है आनंद इसने खोया नहीं है
- 11:45थोड़ी देर के लिए भूल गया है। थोड़ी देर के लिए आनंद से दूर चला
- 11:50गया है। कैसे आनंद के पास आ जाए, लेकिन
- 11:59तुम 1000 1000 तरह की तरकीब में देते हो, फिर उसके करीब कैसे चला
- 12:05जाऊं? फिर उससे दूर कैसे आया?
- 12:12इन्हीं प्रश्नों ने तुम्हारे वो सुनहरी पल स्वर्णिम क्षण जो परम
- 12:23लुत्फ में गुजर सकते थे। रोने धोने में, चिल्लाने में
- 12:32हाहाकार करने में बेकार करती है। तुम अगर कहती हो कि कोई बात नहीं
- 12:41अगले जन्म में मिल जाएगा। उससे अगले में मिल जायेगा।
- 12:46जल्दी क्या है? ठीक है अगले में मिल जायेगा उससे
- 12:53अगले में मिल जायेगा उससे अगले में मिल जायेगा।
- 12:59लेकिन जो उन दो जन्मों की तीन जन्मों की पांच जन्मों की तुम
- 13:04देरी करोगे, उन पांच जन्मों में जो तुम तड़पोगे जो कष्ट तुम
- 13:13उठाओगे, वह व्यर्थ का कष्ट होगा। अज्ञानी व्यक्ति जो कष्ट उठाता है
- 13:25वह व्यर्थ का कष्ट उठाता है तुम तड़पते हो उस आनंद की एक झलक के
- 13:36लिए झलक के लिए। सतोरी तक के लिए तुम जल के लिए
- 13:41तुम तड़प जाते हो, और कृष्ण कहते हैं, अष्टावक्र कहते हैं तुमने
- 13:52खोया कहाँ है? तो यहीं से शुरुआत करते हैं
- 13:57कृष्ण, क्योंकि जानते हैं। कि खोया नहीं है।
- 14:06यह जीस तल पर आकर कांप रहा है। उस तल पर अपने से दूरी बनाई है
- 14:13उसने और जो भी अपने से दूरी बना लेता है वह कंपेगा।
- 14:21ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, सभी विकार बदले लेने की भावना ये सब उसके
- 14:33भीतर उपज जाएगी। ये परिणाम है तुम्हारा स्वयश्य
- 14:38दूर होने का। अर्जुन कब रहा है और कोई कारण
- 14:44नहीं। यही कारण है कि वह अपने से दूर हो
- 14:48गया है। अब अर्जुन को कहते हैं कृष्ण तुम
- 14:53अपने से दूर हो गए हो, अपने करीब चले जाओ।
- 15:00और अर्जुन पूजते हैं। भगवान मैं अपने से करीब कैसे चाहु
- 15:08अब ये प्रश्न कोई पूछने वाला है नहीं, लेकिन अर्जुन पूछते हैं
- 15:15अज्ञानी। हमेशा ऐसे ही प्रश्न किया करते
- 15:18हैं और ज्ञानी जानते हैं के अज्ञानियों के प्रश्न कैसे होते
- 15:29हैं? निस्सन्देह?
- 15:34जिसने सूरज को देखा नहीं, वह सूरज के बारे में जो भी प्रश्न पूछेगा,
- 15:46वह भटकाने वाला होगा। बस बात यहाँ आके खत्म होती है कि
- 15:53उसको आंखें मिल जाएं। लाख बातों को समझाने की बजाए अगर
- 16:02अंधों को आँखें दे दी जाएं तो फिर वो कोई प्रश्न नहीं करेगा।
- 16:10अंधा प्रश्न ही तब करता है क्योंकि उसके पास आँखें नहीं हैं
- 16:17कल के प्रवचन में मैंने कहा कि मैं जोड़ देता हूँ कि तुम आँखें
- 16:26ले लो। तुम ज़ोर देते हो कि कोई बात
- 16:30नहीं, आँखें ले लेंगे ज़रा बताना गिर गिट रंग कैसे बदलती है अब ना
- 16:39अंधे को रंगों के बारे में पता है ना अंधे ने गिर गिट देखी है।
- 16:47ना गिरगिट कैसे रंग बदलती है ये अंधा जानता है लेकिन प्रश्न पे
- 16:51प्रश्न दागे चला जा रहा है। संत की यही भीतर की आकांक्षा होती
- 17:04है। कैसे तुम आँखें पालो लेकिन जैसे
- 17:15कि तुमने आँखें न पाने की धार ही रही हो पक्का निश्चय ही कर लिया
- 17:25हो। तुम दृढ़ संकल्पित हो कि हमने
- 17:28आँखें तो पानी नहीं है बिना आँखों के ही हमने देखना है यह मुश्किल
- 17:34नहीं है असंभव है बिना आँखों के तुम नहीं देख सको, कृष्ण कहते
- 17:44हैं। तू छठी इन्द्र को जगाके तू जो पूछ
- 17:52रहा है, तुम्हारा सारा पूछना उसका कारण एक ही है कि तुम अंधे हो,
- 18:02मैं तुझे आँखों की तरकीब बताता हूँ, वो अपना ले।
- 18:07आँखें मिल जाएंगी फिर तू कोई प्रश्न नहीं पूछेगा, लेकिन अर्जुन
- 18:17आँखों को पाने की कोई चेष्टा नहीं करता।
- 18:21प्रश्न दागे चला जाता है और आखिर में।
- 18:27कृष्ण को वो ही करना पड़ता है जो गुर करता है।
- 18:33कृष्ण अर्जुन को आँखें दे देते हैं।
- 18:39उस एक पल की सतोरी में जलकर सतोरी की होती हो।
- 18:47स्पष्ट हो जाता है कि सत्य क्या है और तत्क क्षण अर्जुन कहता है,
- 18:56हे प्रभु मैंने आपको बड़ा विश्वास दिया, मैंने बड़ा तंग किया, आपको
- 19:02प्रश्न पूछ पूछ कर। बात तो कुछ भी नहीं सच है कि मेरे
- 19:08पास आँखी नहीं सच है कि मैं अज्ञानी था मैं भूल गया था समृद्ध
- 19:21लब्ध हो। नष्टों मौका महू के वश में हुआ
- 19:27भांति भांति के अनर्गल प्रश्न कर रहा था, जो प्रश्न करने बनते नहीं
- 19:35थे और तुम अपनी जगह बिल्कुल ठीक थे।
- 19:38गुरू अपनी जगह ठीक ही होता है। शिष्य प्रश्न करता है और देखिये
- 19:47गुरु के भीतर की करुणा बच्चा कितनी ही तोतरी बातें करके समझ आए
- 20:00या न आए माँ उसे पुचकारते ही रहते हैं।
- 20:05ठीक है बेटा, मैं समझ गई तुम क्या कहते हो, उसे समझ आये न आये बस
- 20:20ऐसे ही गुरु होता है। तुलसीदास ने कहा है जो बालक कह
- 20:28तोतरी वाता लेखक सिध पितु और माता जैसे बालक तोतरी भाषा बोलता है,
- 20:39समझ नहीं आता? माँ और बाप उस तोतरी भाषा को सुन
- 20:43के हँसते हैं, प्रसन्न होते हैं, वो उसकी तोतरी बातों का भी लुत्फ
- 20:49उठाते हैं। ऐसे गुरु लुत्फ उठाता है
- 20:58अज्ञानियों की अज्ञानता। लेकिन भीतर से ये चाहता है कि
- 21:08शिष्य को आँखें मिल जाएं तो इसका सारा कष्ट तिरोहित हो जाएगा।
- 21:23गुरु की सारी प्रज्ञा इस बात के अंदर लग जाती है कि तुम्हें आँखें
- 21:30दे दे और तुम्हारी सारी प्रज्ञा इस बात पर लगती है कि पहले मेरी
- 21:35बात का जवाब दे दो, गुरु जानता है।
- 21:41इसकी बात का जवाब दे दूंगा और सो बातें खड़ी हो जाएंगी।
- 21:50भ्रम तो तभी मटेगा जब आँखों से देख लेगा, इसलिए सच्चे संत कहते
- 21:57हैं मेरी कहा मानना मत। जो मैंने कहा उसे जानना सच्चा संत
- 22:06तुम्हें कहता है मेरे पास आने की आवश्यकता कहाँ है क्योंकि जो मेरे
- 22:15भीतर से मैंने पाया? वो ही तुम तुम्हारे भीतर से पा
- 22:19सकते हो, झूठा संत जमावड़े खड़े करता है, जमात इकट्ठे करता है, वह
- 22:35संत नहीं होता। जो कम्युन स्थापित करें वो संत
- 22:41नहीं होता क्योंकि फिर वो जानता नहीं है कि मिलता है अकेले में
- 22:50हाँ इकट्ठे में संबोधित किया जा सकता है।
- 22:58इकट्ठा होना सिर्फ तभी तक आवश्यक है जब तक गुरु सभी को इकट्ठा
- 23:05बैठकर समझा दे। उसके बाद आप घर चले जाओ।
- 23:12कृष्ण ने भी अकेले हो के पाया। आपको भी अकेले हो के मिलेगा।
- 23:23अकेले में झड़ता है, वो रस अकेले में मिलती है, वो शांति है, जीसको
- 23:30पीकर सारी तृष्णाएं समाप्त हो जाती हैं।
- 23:34सारी अग्नियां बूझ जाती हैं, सब प्रश्न घर जाते हैं और वहाँ जाकर
- 23:43तुम पाओगे, जो करता है वो ही करता है।
- 23:52अज्ञानियों का क्या है अज्ञानी तो कल को ये भी कहेंगे आज कहते हैं
- 23:57मैं करता हूँ परमात्मा है ही नहीं, कल अज्ञानी कहना शुरू कर
- 24:05देंगे यह बनाया ही मैंने मैंने ही रचना की है मैं सर्जन हॉर्न।
- 24:16बिल्कुल कह देंगे, लेकिन बना नहीं पाएंगे।
- 24:20ध्यान रखना गुरू की भरपूर कोशिश होती है कि आप प्रश्न पूछने की
- 24:34बजाय आँखें जगाओ, आँखें पर कुछ करो।
- 24:41प्रकट हो सकती हैं क्योंकि गुरु की आँखें प्रकट हुई हैं, इसलिए
- 24:48गुरु को कोई संदेह नहीं बखूबी जानता है।
- 24:52गुरु की आँखें प्रकट होती हैं। देखने वाली तुम्हारी भी आँखें
- 24:58प्रकट होंगी। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ
- 25:05और गुरु ने तुमसे लेना भी क्या होता है गुरु को तरस आता है तुम
- 25:12दैनीय दशा में भटक रहे हो, तुम्हारी स्थिति तरस योग्य है।
- 25:20और गुरु तुम्हारी इस स्थिति को देख नहीं पाता।
- 25:27गुरु कहता है काहे को ये बोझ का ठोकरा इसमें गंदगी भरी है, काहे
- 25:35को ढो रहे हो पटक दो इसको। लेकिन तुम ढोए ही चले जाते हो यह
- 25:44मैं का गंदगी से भरा हुआ ठोकरा जन्मो जन्मो से तुम ढो रहे हो कब
- 25:50भटकोगे से बेला आ गया है। इसको फेंक दो, इसमें कुछ नहीं है
- 26:01जीसको तुम हीरे, मोती, जो हरा से भरा हुआ टोकरा समझते हो वह गंदगी,
- 26:07मल, मूत्र से भरा हुआ टोकरा तुम ये जानते नहीं क्योंकि तुम्हारे
- 26:11पास आँखें और आँखों के बिना कौन देखेगा।
- 26:17इस टोकरी में है क्या वहाँ जाओ प्रश्न तुम कर आओ, मैं इसलिए नहीं
- 26:31कहता कि मैं तुम्हारे प्रश्न का जवाब नहीं दे सकता।
- 26:34प्रश्न का जवाब अगर मैं नहीं दे सकता तो और कौन दे सकता है?
- 26:40मैं ही तुम्हारे प्रश्नों का जवाब दे सकता हूँ, वरना मैं तुम्हारी
- 26:45समस्याओं का निदान भी मैं ही कर सकता हूँ और कोई नहीं कर सकता मैं
- 26:51दृढ़ संकल्पित हूँ। मेरे को ज़रा भी भ्रम नहीं है और
- 27:03मैं यही चाहता हूँ कि तुम अपनी आँखों से जब तक नहीं देखोगे तब तक
- 27:10तुम्हारे भीतर की अंतरात्मा का कोई न कोई कोना बोलता रहेगा कहीं।
- 27:18मैंने गलती तो नहीं खरी कहीं वो कोना छूट गया हो, उस कोने के भीतर
- 27:25हो तुम्हारे मन का कोई अंश शोर गुल मचाता रहे कहा।
- 27:39लेकिन जब तुमने अपनी आँखों से देख लिया तो फिर मन ठहर जाएगा, शोर
- 27:45पढ़ने हमेशा रहेगा। अगर तुम किसी की कही हुई बात को
- 27:51मानोगे। तो तुम्हारा मन सदा ही शोर करता
- 27:56रहेगा। कितनी ही आस्था को तुम प्रकट कर
- 28:00लो, लेकिन आस्था का वो अंश तुम प्रकट नहीं कर सकते जहाँ जाकर
- 28:07सारे संदेह मिट जाते हैं, वह तो दर्शन से ही मिटेंगे।
- 28:13आस्था से नहीं मटेंगे विश्वास से नहीं मटेंगे जब तक न देखूं अपनी
- 28:24नैनी, तब तक न मानु गुरु के कहने। तुम्हें भूख लगी है तुम्हारी भूख
- 28:37तुम्हारे भोजन खाने से मटे के गुरु यह जानता है, तुम कहो कि मैं
- 28:44भूखा हूँ और गुरूजी आपने खा लिया है मुझे बता दो।
- 28:50कि आपकी भूख क्या सिमटे गुरु कहेगा?
- 28:54बिल्कुल तुम भी खाना खा लो, भूख मट जाएगी प्यास क्या सिमटी तुम भी
- 29:01पानी पी लो, प्यास सिमट जाएगी। लेकिन गुरु बहुत कोशिश करने के
- 29:11बाद भी तुम संभल नहीं पाता। समझ नहीं पाते।
- 29:16एक 1979 की बात है। शायद मैं यहाँ से दिल्ली, आग्रा
- 29:30वगैरह जाया करता था। शहर के भीतर हमारी दुकान थी।
- 29:39शूज, औजारी वगैरह। खरीदारी करने के लिए मैं दिल्ली
- 29:46और उसके बाद आग्रा जाया करता था। कभी कभी दीपावली से पहले चला
- 29:57जाता। कभी कभी सर्दी का मौसम आने पे चला
- 30:02जाता हूँ। सर्दी में डिमांड बढ़ जाती है।
- 30:05जूतों वगैरह के ओजारी के एक छोटी सी बात अपने जीवन के है।
- 30:17आओ तुमको सितारों पे ले चलो। दिल झूम जा ऐसी बहारों में ले
- 30:46चलूँ आओ आ जो तुमको। सितारों है ले चलो दिल।
- 31:03जो मज़ा। ऐसी बहारों में ले चलो।
- 31:17हजूर, मैं यहाँ से जाता। दिल्ली से आग्रा और आग्रा हर बार
- 31:32का मिरर। ये कर्म था मैं अपना सामान पहले
- 31:38होटल में रख देता हूँ, एक कमरा बुक करा लेता हूँ पता नहीं 1 दिन
- 31:44कोना पड़े, 2 दिन रखना पड़े और उसके बाद।
- 31:53मैं फिर खरीदारी वगैरह करता, लेकिन सबसे पहले मैं ताजमहल देखने
- 31:57जाता। आग्रा मुझे बड़ा प्यारा लगता था।
- 32:011979 की बात है जस्ट बिफोर एनलाइटनमेंट तब मैं भी आपकी ही
- 32:08तरह मूर्ख था। मैं भी मूर्ख था और जो मूर्ख रहा
- 32:17हो उसे ही मूर्ख क्या करता है क्या सोचता है उसे ही तो पता
- 32:24होगा, इसलिए मैं बखूबी तुम्हें जानता हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे
- 32:29स्तर पर। बहुत वक्त बिताए हैं।
- 32:35मैं बड़ामास्टर हूँ इन चीजों का इसलिए बखूबी तो मैं पकड़ लेता हूँ
- 32:41कि तुम कहाँ चालाकी करने की चेष्टा करते हो।
- 32:49एक बार। सर्दी का मौसम है, सर्दियों को से
- 32:54ज्यादा पड़ने शुरू हो गयी। स्टॉक खत्म हो गया पर मैं आग्रा
- 33:02के लिए निकल पड़ा, मेरा शोक भी था, शोक इसलिए था।
- 33:11कि वो जो घटना 1917 में घटी ट्रेन तो मैं बाबरो की तरह फिरता हूँ,
- 33:18मैं देखता कहीं शायद कोई मिल जाए बहुत तलाश है कोई नहीं मेरा।
- 33:26जो मेरी बात का समाधान मुझे दे दे, शंका मुझे कोई थी ही नहीं।
- 33:32हल कोई कर सकता नहीं था। बहुत भटका हर किसी से पूछा सभी
- 33:42टाल मटोल कर गए हैं। टेढ़े मेढ़े जवाब सभी ने दिए हैं।
- 33:52अहंकारियों के अहंकार टूट गए। कुछ कुछ ने तो यह भी कह दिया कि
- 34:00तुम्हें स्वपन आया होगा? मैं हँस पड़ता हूँ, मैं उन्हें
- 34:08क्या बताऊँ अभी जब मैंने वीडियो डाला एनलाइटनमेंट का तो मुझे बड़े
- 34:14कमेंटेड हैं और उन कमेंटों में यही लिखा था।
- 34:17बाबा यू अरे इन हैलो सेनशन यू हॅव नॉट टच्ड एक्सटसी?
- 34:24ठीक है मगज खपाई का अर्थ भी क्या है?
- 34:31जीस तल् पे तुम हो वहीं उसी तल् के ऊपर बैठे कमेंट करोगे यह मैं
- 34:36अच्छी तरह से जानता हूँ, उसके उपरांत तुम कोई कमेंट कर भी नहीं
- 34:41सकता। मजबूरी है तुम्हारी।
- 34:47तड़पता था इसीलिए है और कुछ घर में जरूरत है और कोई था नहीं जो
- 34:55खरीदारी अच्छी कर सके। मेरी पसंद कुछ लोगों को जचती थी,
- 35:02ठीक बैठती थी। इसलिए मैं ही जाके बूट वगैरह,
- 35:09लोफर वगैरह बूट का नाम होता है। लोफर बिना फिते के वो मैं आग्रा
- 35:18से जाके लेके आता हूँ, आग्रा मेन सेंटर है।
- 35:23चप्पल का कानपुर और भुटों का आग्रह उस बार भी मैं गया, लेकिन
- 35:33दीपावली के बाद गया और जब मैं होटल में रुका।
- 35:42मैंने स्नान किया, उसके बाद मैंने पेंट कमीज़ डाली।
- 35:47उस वक्त मैं पेंट कमीज़ पहना करता था।
- 35:50थोड़ी थोड़ी सर्दी, एक शार्ट डाल लिया, चल पड़ा तैयार हो गया।
- 36:01वहीं एक व्यक्ति रुका हुआ था। उसी होटल में मुझसे पूछने लगा भाई
- 36:10साहब आपने किधर जाना है? मैंने कब देखो अभी तो मैं?
- 36:20ताजमहल को निहार कर आऊंगा। यह मेरा प्रत्येक वार का फिक्स
- 36:27कार्यक्रम है। मैं आता हूँ होटल में रुकता हूँ,
- 36:31स्नान ध्यान करता हूँ और चल फिर मैं जाकर ताजमहल के दर्शन करता
- 36:36हूँ। मुझे बड़ा प्यारा लगता है।
- 36:41ताजमहल को देखकर बहुत बार मेरी आँखें डब डब आयीं।
- 36:47इतना प्यारा अजूबा अगर किसी ने नहीं देखा तो वह वैसे ही आया और
- 36:52वैसे ही जला गया। लेकिन आज मैं ये नहीं मानता।
- 36:59आज मैं ये मानता हूँ एक भीतर का अजूबा है, जिसने वो नहीं देखा वह
- 37:04संसार में आया और चला गया। उसकी जिंदगी बेकार गई।
- 37:09आज ताजमहल प्राइऑरटी में आज प्राइऑरटी में भीतर का ताजमहल।
- 37:17जिसने वो नहीं देखा वहाँ जाकर आँखें डब डब जाती हैं।
- 37:23अश्क बिखेरने लगती हैं आँखें तब ताजमहल प्राइऑरटी पर था मैंने कहा
- 37:35मैंने तो ताजमहल जाना है भईया। अच्छा तो ऐसा है कि हम यहाँ से
- 37:42रिक्शा कर लें, कराया बच जाएगा। दोनों का किराया भी उतना ही लेगा,
- 37:49एक का कराया भी उतना ही लेगा। मैंने भी उधर जाना है।
- 37:54मैंने बस ताजमहल से थोड़ा आगे जाना है।
- 37:58आप ताजमहल रुक जाना, मैं आगे निकल जाऊंगा और अपना किराया भी।
- 38:08थोड़ा लगेगा। मैंने कहा ठीक है, हम दोनों
- 38:15रिक्शा पे बैठ गए हैं। रिक्शा वाला चलाओ कोई मुसलमान था
- 38:25रिक्शा चालक रास्ते में हम बातें कर रहे थे जब दो व्यक्ति हूँ।
- 38:40कोई परिचय न हो तो बातें सहज ही हो जाती हैं और वैसे भी मन बोलता
- 38:46रहता है अज्ञानी का तो मैं भी अज्ञानी वो भी अज्ञानी खूब बातें
- 38:54करते करते चले। मैंने कहा तुम कहाँ जा रहे हो?
- 38:59तो मैं यह हूँ, मेरे गुरुदेव हैं, उनके दर्शन करने चला हूँ।
- 39:14मैंने कहा कहाँ है? वो अच्छे हैं, पहुंचे हैं, हाँ
- 39:20बहुत पहुंचे हैं। मैं उनको जब तक मैं न देख लूँ
- 39:25जैसे आप ताज मेरे को जब तक न देख लूँ, तुम्हारा मन भरता नहीं, वैसे
- 39:31जब तक मैं उनके दर्शन न कर लूँ, तब तक मेरा मन नहीं भरता।
- 39:38यानी कच्छा तो। आग तो भीतर थी, आज तक की एक
- 39:45गुत्थी सुलझ न पाई थी। वो बात भीतर फंसी हुई थी।
- 39:51कौन था वो, कौन था वो भीतर के अंतः?
- 40:02उसे ढूंढ लेना चाहते थे भीतर आग जलती ही रहती थी।
- 40:09धीमी धीमी हर घड़ी दिल। में तेरी उल्फत कै।
- 40:26धी मैं धी मैं। चिराग जलते हैं याद मैं तेरी।
- 40:42जाग जाग के हाँ, रात भर कर बैठें बदलते हैं।
- 40:58ऐसी ही बाबरों जैसी मेरी स्थिति भीतर से हमेशा रहती।
- 41:04बाहर प्रकट गणना अब तो बंद कर दिया था क्योंकि थक चुका था, कोई
- 41:09नहीं मिला, कोई नहीं मिला। उसकी बात सुनकर मैंने कहा, अगर
- 41:21मैं भी साथ चहु तो कोई ऐतराज तो नहीं है नहीं नहीं भैया चलो कुछ
- 41:29मेरी उम्र से थोड़ा सा पांच 7 साल मेरे से बड़ी उम्र का था।
- 41:37तो ठीक है, मैं भी दर्शन करना चाहता हूँ।
- 41:43हम दोनों चले गए ताजमहल से आगे निकल गए।
- 41:49कोई दो या तीन किलोमीटर आगे है। उसकी छोटी सी झोंपड़ी थी।
- 41:56एक साइड के अंदर आनंद में मगध हमने जूते उतारे, हाथ धोए, भीतर
- 42:08चले गए, बैठ गए, प्रणाम किया। वहाँ एक व्यक्ति पहले से बैठा रो
- 42:21रहा था, हमने देखा क्या माजरा है? कुछ और लोग भी बैठे थे।
- 42:32आसपास झोंपड़ी भरी हुई थी। कुछ बाहर भी बैठे थे, काफी रस था।
- 42:42काफी रस का मतलब झोंपड़ी के हिसाब से 2025 लोग होंगे।
- 42:49वह रो रहा था, गुरुदेव। मेरे चरण आप थोड़ा सा अगर मुझे आप
- 43:06के चरणों का छुआ दे दो तो मैं निहाल हो जाऊं।
- 43:16और अगर मरना ही है तो यहीं मर जाऊं।
- 43:24मैं सब सुन रहा था, लेकिन हैरान था।
- 43:26मुझे कोई बात समझ नहीं आ रही थी। क्या मार रहा है कोई पता नहीं।
- 43:33कोई पुराना शिष्य रहा उनका। गुरु कहता है देखो आज आखिरी दिन
- 43:42है तुम जीव भर के निहार लो बस कल का सूरज तुम देखने को ओके।
- 43:52बात तो गंभीर थी। मेरे भीतर भी चोट लगी है।
- 43:59ये क्या कह रहे हैं गुरुदेव विशाल मस्तिष्क लम्बी दाढ़ी, उलझे हुए
- 44:10केस। जैसे मुद्दों से संवारे ना हो।
- 44:16बाल ऐसे उलझो और छोटा सा धुना टप रहा था।
- 44:27उसमें बड़ा सा खून्ट लगा था। लकड़ी का जल रहा था।
- 44:33भभूति लगाई हुई थी। आग सेक रहा था, मस्त था, शिष्य
- 44:41बोल रहा था गुरु से। कि मुझे यही समाहित कर लो।
- 44:48अगर मैंने मर ही जाना है, रात को तो मेरी इच्छा है कि आपके ही
- 44:54चरणों में कुटिया में प्रण दे दूँ।
- 44:58वह व्यक्ति समर्पित था और तैयार था बाद में पता चला।
- 45:05जब वह चला गया, गुरूजी ने कहा कि अब आप जाओ, वह चला गया, मेरा मन
- 45:14वहाँ से उठने को नहीं करते थे। यह बैठा ही रहा।
- 45:20जो मेरे साथ व्यक्ति था उसका मन भी वहाँ से उठने को नहीं करता था।
- 45:26सभी चले गए, दर्शन के लिए आए थे हम दोनों बैठे रहे, वह व्यक्ति भी
- 45:31चला गया। अब तक हम समझ गए थे कि मद्राक
- 45:39क्या है? बहुत दिन पहले करीब।
- 45:48महीने भर पहले उसने बता दिया था कि अगले महीने की इस तारीख को
- 45:56आपकी मृत्यु हो जाएगी। आज वो तारीख आ गई थी और आज आखिरी
- 46:03दिन था रोज़ वो आया कर कल। आखिरी बार दर्शन करके अपने गुरु
- 46:08के आँखों से आंसू थम नहीं रहे थे। रो रहा था उनके पांव पर सिर रखा
- 46:15हुआ था मुझे यही आज्ञा दे दो प्राण यहीं छूट जाएं गुरु चरणों
- 46:21में। गुरूजी बोले कि अब आप घर चले जाओ।
- 46:33हर चीज़ का वक्त और स्थान निश्चित होता है।
- 46:38इतनी ही बात कहें के गुर चुप हो गया।
- 46:43और यह बात मेरे भीतर उतर गई। हर चीज़ का वक्त और समय और स्थान
- 46:52निश्चित होता है। ये क्या बोल रहे हैं कुछ समझ में
- 46:57आया मैं भी अज्ञा नहीं था। जब सब चले गए, हम दोनों रह गए।
- 47:06हमने पूछा भी नहीं और गुरुदेव बोले कि एक महीना पहले इस व्यक्ति
- 47:15को। मैंने बताया था कि जितना तू धर्म
- 47:18कर्म करना है, जितना ध्यान साधना करनी है, कर ले, मेरा शिष्य है बस
- 47:28तेरी ज़िन्दगी के इतने दिन बाकी हैं फिर ये शरीर मच जाएगा।
- 47:35अधेड़ उम्र का व्यक्ति था कोई 55 साल की उम्र 5560, इसके बीच में
- 47:42उसकी उम्र रही होगी घर परिवार के सभी दायित्वों से मुक्त दो बच्चे
- 47:51थे। दोनों शादीशुदा थे।
- 47:56आज आखिरी दिन भी आया था वो रोजा आया था एक महीना पहले उसे बता
- 48:03दिया था और एक महीने तक उसने अपने मन के सारे अरमान दान, पुण्य।
- 48:13साधना अपने भीतर उतरने की साधना किया करते थे।
- 48:17वो पहली बार मुझे उस व्यक्ति से पता चला के नाम जाप वगैरह कुछ
- 48:25नहीं होता। सबसे पहले सवकुस व्यक्ति ने दिया
- 48:30रत्नागिरि उसका नाम था। जब उसके मुख से निकला कि नाम जब
- 48:41बकवास है, जैसे गाली निकाल दी, वैसे राम राम कर दिया तो मैं चक
- 48:50तू हुआ। हमने तो सुना था भगवान का नाम
- 48:54लेने से जीवा पवित्र हो जाती है, तब कुछ पवित्र नहीं होती, सब
- 49:00पवित्र है, यहाँ अपवित्र कुछ है नहीं, मैं बोलता चला गया।
- 49:11मेरी जीवा बोलने में असमर्थ थी। जैसे बोलती बंद हो जाती है, तालू
- 49:18से चिपक गई थी, वह ही बोल रहे थे गुरुदेव रत्नगरी।
- 49:26इस व्यक्ति की रात्रि को मृत्यु हो जाएगी।
- 49:29मृत्यु कैसे होगी आग लगने से? आग लगने से कैसे लगेंगी आँख?
- 49:42आग में जल के भस्म हो जाएगा सम से 12।
- 49:54मैंने कहा मैं गुरुदेव कल आ सकता हूँ मैं क्योंकि रात को यहीं पर
- 49:59हूँ, कल भी यहीं पर हूँ, हाँ पुत्र आ सकते हो यहाँ कोई पाबंदी
- 50:06थोड़ी है, वहाँ से कोई टिकट थोड़ा लगती है।
- 50:14उनकी मुस्कराहट में अजू सी खिलखिलाट दी बच्चों जैसी मासूमियत
- 50:27रात्रि को यह व्यक्ति जल के मर जाएगा, प्रारब्ध क्रम फल चुका है।
- 50:35इसका आज आकरेतन है। भोग तो भुगतने ही पड़ते हैं,
- 50:45प्रारब्ध का लिखा कोई टाल नहीं सकता।
- 50:50इस तरह के वचन वह बोले जा रहे थे आज भी मेरे मस्तिष्क में अंकित है
- 50:55उनकी वाणी। प्रारब्ध का लिखा कोई मिट नहीं
- 51:02सकता, क्या होगा? बहुत देर वो बोलते रहे, मंत्र
- 51:18मुग्ध हुए हम सुनते रहे। महाराज बोरे रत्नागिरि और हम
- 51:26सुनते रहे अक्समाते उन्होंने कहा, अब आप जाओ, मैंने चना स्पर्श
- 51:32किया, उन्होंने कोई मनाही नहीं दी।
- 51:43चरण स्पर्श किए माथे से लगाएं। चरण राज़ को माथे से लगाया चल
- 51:49पड़ा लेकिन ताजमहल मैं उसे ना देख सका अगले दिन देखूँगा।
- 52:01अगले दिन मैंने फिर आना था क्योंकि महाराज ने कहा था कि यह
- 52:08व्यक्ति रात को जल के मर जाएगा। भयानक मृत्यु है, इसके यही योग
- 52:15है। प्रारप्ति का फल यही कहता है।
- 52:18देखिए। हम इसी बात पे बोल रहे हैं कर
- 52:22मन्ने बाध्य का रास्ते म फले शू कदा चना माँ कर फल हेतुर भुरमा
- 52:31तेसंगो अष्टव कर्मणे। हे अर्जुन तू निष्काम और सह काम
- 52:51इन कर्मों को पहचान ले, कर्म तो तुझे करने पड़ेंगे।
- 53:00कुछ भी कर करना तो पड़ेगा। जब तक जान है ये शक्ति है तब तक
- 53:06शक्ति कुछ न कुछ कराएगी तुझसे फिर तू करता है कि उसे करने देता है,
- 53:13बस यही अधिकार है तेरे पास। इस शब्द का अर्थ गलत कर लिया
- 53:21अधिकार है तेरे पास कर्म करने का कैसे?
- 53:26या तो तू कर या उसे करने दे अगर तू उसे करने देगा।
- 53:36तो भीतर भीतर भीतर उतरता जाएगा अपने स्वभाव में और मैंने बताया
- 53:42बहुत बार बताया तो स्थान भी आ जाएगा, जहाँ पर परमात्मा के आदेश
- 53:49सुने जाते हैं। अब मेरे भीतर ये कई हिस्सा कि मैं
- 53:59अपना काम निपटाऊं मेरे भीतर की तृष्णा ऐसा लगता था कि आज शांत हो
- 54:06जाएगा। जीस तलाश में मैं था वह कौन था?
- 54:15जिसने एक इतने भारी व्यक्ति को उठाके भटक दिया।
- 54:19कुछ तो था खोपड़ी मानने को ही तैयार नहीं थी कि कुछ नहीं था।
- 54:28भ्रम था, ऐसा था, वैसा था नहीं, कुछ नहीं था, बिल्कुल ठीक था, सही
- 54:33था। बहुत घबराया।
- 54:38मैंने पैंट शर्ट जो पहन ली थी और गाड़ी के धूल भीतर प्लेटफार्म में
- 54:42सारा धूल जम गया था और कपड़े सारे झाड़े।
- 54:48मैंने दिल घबराने लगा तो मैं लेट गया।
- 54:52जो बेंच होते हैं प्लेटफार्म के ऊपर बाहर मार्केट में चला गया,
- 55:02वहाँ जाकर सामान खरीदा अगले दिन फिर दिन में चला गया सामान खरीदा
- 55:07सारा सामान मैंने खरीद लिया वापस आया।
- 55:14साँझ हो चुकी थी। मैंने कहा अब गुरुदेव के पास जाना
- 55:18चाहिए। मेरा मन उस वक्त का इंतज़ार कर
- 55:24रहा था कि देखें इस व्यक्ति में कुछ है।
- 55:32यही व्यक्ति मेरी गुंडी को खोल सकता है और कोई नहीं आज तक कोई
- 55:37नहीं मिला। सब बातें में आने वाले मिले,
- 55:40सिद्धांत बताने वाले मिले जो शास्त्रों में लिखे थे।
- 55:44शास्त्रों का हवाला दे दे के बताने वाले मिले खुद का अनुभव कभी
- 55:48किसी ने अन्य बताया? फलाशास्त्र में यह लिखा
- 55:55फलाशास्त्र में यह लिखा और मैं तंग आ चुका था।
- 55:58इस बकवास से पहली बार एक ऑथेंटिक प्रश्न मुझे मिला, जिसकी बातों पर
- 56:06मैं यकीन कर सकता था। उसके बोलने का ढंग उसके बैठने का
- 56:14रंग जीस भाँति मस्ती में वो बैठा कभी भजन गाने लगता कभी बैठा बैठा
- 56:24नाचने लगता, गर्दन मारने लगता। ऐसे उसके खाओ खाओ जैसे तैसे मैं
- 56:35वहाँ पहुँच गया कुटिया में फिर मैंने प्रणाम किया, जूते उतारे,
- 56:42हाथ धोए, बाहर एक कुंड पड़ा होता था।
- 56:50बेहतर चला गया, प्रणाम किया बैठ क्या मैंने देखा एक वृद्धा स्त्री
- 57:00एक? कोई 50 वर्ष के करीब के से एक
- 57:10जवान कोई करीब 25 वर्ष के करीब का लड़का और एक छोटी बढिया बैठी थी।
- 57:21रो रहे थे। मैं चुप के बैठ गया।
- 57:29वो कह रहे थे गुरूजी बहुत भयंकर आग लगी, हमने कोशिश की, भौजी ने
- 57:38हमें पता भी न चला। रात्रि को अर्धरात्रि के बाद जब
- 57:45घू निद्रा में सारा जगत सोया हुआ तो आग भड़क गई और वो माँ बोल रही
- 57:58थी कि मेरा पुत्र जल के बसम हो गया।
- 58:02उसी की बात कर रहे थे। मैं समझ गया।
- 58:10खूब रोए, सभी ने अपने मन की भड़ास निकाली।
- 58:14वही हुआ करो चीज़ जो तो आपने कहा कुछ देर बैठे रहे।
- 58:24उसके बाद वो अच्छे नहीं गए। आज वो विक्की मेरे साथ नहीं था,
- 58:32आज मैं अकेला था, मैंने हाथ जोड़ के प्रणाम किया।
- 58:40मैंने कहा, गुरुदेव। क्या मैं कुछ आपसे पूछ सकता हूँ?
- 58:51उन्होंने कहा बिलकुल पूछो, मैंने कहा, गुरुदेव मेरे साथ हुई एक
- 59:02घटना घटी। क्या मैं उसका खुलासा ले सकता
- 59:08हूँ? आपसे वो सहज प्रवाह से बोलने लगे
- 59:15कि इस व्यक्ति की मृत्यु एक महीने पहले।
- 59:19मैं उस तल पर जा के देख ली, हालांकि मैं उस वक्त वो तल नहीं
- 59:23जानता था। वो खोजाबाद में जहाँ पर सब कुछ
- 59:28निश्चित प्रकट होता है जो होना होता है वह वहाँ से पता चल जाता
- 59:34है पर मैंने इसे बता दिया कि अब रोक तो कोई नहीं सकता।
- 59:41कोई नहीं रोक सकता। यह कर्मों की श्रृंखला यह होगा
- 59:46लेकिन तू अपने मन की मुराद पूरी कर ले, कोई दान, कोई पुण्य, कोई
- 59:52तीर्थ, कोई भजन, कोई सत्संग जो भी तेरे मन में।
- 59:59कहीं जाना है, चला जा कुछ खाना है खा ले आज ही के दिन महीने भर बाद
- 1:00:08तेरी मृत्यु हो जाएगी। उस तन पर जाकर पता चलता है।
- 1:00:22उसने मुझे बताया कि यह घटना ईश्वर की कृपा है।
- 1:00:32तुम जो बनना चाहते थे। वह तुम्हें बनाना नहीं चाहता था।
- 1:00:39एक एक जर्रा उसकी कमांड, उसके हाथ में प्रत्येक जर्रे से वो जुड़ा
- 1:00:45हुआ है अपने ढंग से बोल रहे थे वो प्रत्येक जर्रा उससे जुड़ा हुआ
- 1:00:51है। जैसे कठपुतली नाचाने वाले के
- 1:00:56हाथों में कठपुतलियां जुड़ी होती हैं।
- 1:00:59दागे के साथ अब बोल रहे थे। ऐसे ही प्रत्येक व्यक्ति उसके
- 1:01:06हाथों के साथ जुड़ा हुआ है। जैसा इशारा करता है, वह व्यक्ति
- 1:01:14वैसा नाचता है और यह इस वराट सृष्टि का संचालक और सृजन हारा।
- 1:01:23इसी ने बनाई यही मालिक है। दूसरा मालिक बनना चाहे तो भी
- 1:01:31मालिक है नहीं और आखिर में सत्य पता चल जाता है जब व्यक्ति मर
- 1:01:38जाता है कि इसका कुछ नहीं था, कोई सगा संबंध ही नहीं था, जो पदार्थ
- 1:01:44जोड़े इतनी मुस्कुला से झूठ कफ़र तोल के उसके साथ नहीं।
- 1:01:49जिनके लिए मरा उन्होंने बस कंधा ही दिया और कपाल ही फोड़ा।
- 1:01:58कोई किसी का नहीं, ये सब लेनदेन के चक्कर हैं।
- 1:02:12वह रात को मर गया, जल के मरा बुरी मौत मरा, एक करम कट गया, बहुत
- 1:02:21भारी था होना था इसे कोई टाल नहीं सकता था बस।
- 1:02:28इच्छाएं पूरी हो सकती थीं और उसने की खूब ध्यान किया, खूब भजन किया,
- 1:02:35खूब गीत गाये, तीर्थयात्राएं की जो भी उसके मन की बात थी और पता
- 1:02:43था कि आज रात। बस सुबह का सूरज मैं नहीं देखूंगा
- 1:02:49और देखा भी नहीं उसने यह उसकी माता थी या उसकी घरवाली थी या
- 1:02:53उसका पुत्र और पुत्र मेरा मन ठहर गया।
- 1:03:05कुछ तो उनके सांनिध्य में आकर ठहर ही जाता था।
- 1:03:09कुछ इस बात की वास्तविकता जो उसने कल बताई वो आज हो गया।
- 1:03:17जल के ही मरा लोग आते गए, जाते गए रोज़ दर्शन करने के लिए लोग आते
- 1:03:25थे जाते थे। दर्शनार्थ ही आते थे और चले जाते
- 1:03:32थे। वह अपना धुना तपता रहता।
- 1:03:34सर्दी होती या घर में धोना लगातार कब तक रहता?
- 1:03:44बस हम एक दो व्यक्ति और। रत्नागिरि संत बोले पुत्र आपसे
- 1:03:54क्या बताऊँ? अब इनको पता नहीं है ये मरा कैसे
- 1:03:59आग लगी कैसे? हमें वो बता रहा था उन्हें नहीं
- 1:04:06बताया क्योंकि ये ऐसा होना था और लाख चाहते नहीं टल पाते।
- 1:04:14कोई कारण बनना था। उन्होंने एक बहुत अजूबा आज तक भी
- 1:04:22वो मेरे भीतर छाप है सब हो गया है, लेकिन वो भीतर की छाप गई
- 1:04:29नहीं। ये जो हीटर होते हैं सर्दी का
- 1:04:35वक्त था। सर्द हवाएं चल रही थी, ठंडी थी।
- 1:04:43थोड़ी देर के लिए उसने हटर चलाया। कमरा गर्म हो गया।
- 1:04:50उसने हटर बंद कर दिया। होनी कैसे अपना?
- 1:04:57होने का दायित्व नभाती है, यह आपको बता रहा हूँ।
- 1:05:00उस दिन बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे वह हीटर को बंद किया, कमरा गर्म हो
- 1:05:10चुका था, सो गया परमात्मा को याद किया।
- 1:05:16सुबह तो नहीं उठूंगा। और जब उसकी जाख खुली किसी को कुछ
- 1:05:25नहीं पता क्या हुआ लेकिन बाबा को पता था क्या हुआ, कैसे बटन लगे थे
- 1:05:32बटन और उन बटनों को ऑफ करके। वह हो गया।
- 1:05:39एक छिपकली आई। वो उस बटन के ऊपर से नीचे चली गई
- 1:05:47और उस छिपकली के वजन से वह बटन नीचे हो गया जो हीटर का था।
- 1:05:57वह सोया पड़ा, भूख हीटर जलने लगा, जलने लगा, जलने लगा, तप्त हो गया,
- 1:06:08बहुत वह सोया रहा। उस छिपकली के भार से बटन ऑन हो
- 1:06:16गया। ऊपर से आई छिपकली बटन को नीचे कर
- 1:06:21के ऑनिंग कैसे अपना काम करती है? मैंने सोचा भी न था ऐसी दुर्घटना
- 1:06:31भी कभी हो सकती है। उसके बाद सब हो गया लेकिन आज भी
- 1:06:38जब मैं रात को सोता हूँ तो उसका जो प्लग होता है स्विच वो निकाल
- 1:06:46के सोता हूँ मुझे वो घटना गहरे मस्तिष्क में छम गई।
- 1:06:59जान बूझ कर विपत्ति कौन मोल ले? इतना बचाव आज तक इतना गहरा बैठ
- 1:07:08गया। वो अगर कोई मेरे कमरे में आएगा तो
- 1:07:12देखेगा। सर्दी का वक्त है, एटर दौड़ का
- 1:07:17है। ब्लोअर है, लेकिन मैं उसका जो बटन
- 1:07:22होते हैं स्विच वो निकाल कर सोता हूँ और छिप के लिए भी कोई भी नहीं
- 1:07:28है कौन जानें कहाँ से आ जाए ओह भीतर इतनी गहरी उतर गई अचेतन में।
- 1:07:36सब कुछ देखने के बाद भी जान बूझकर मृत्यु कौन मुँह ले?
- 1:07:44जब आएगी वो आएगी ऐसे तो वह मरने के साधन बहुत हैं।
- 1:07:51गाड़ी आती हो, उसके आगे से निकल जाओ, बस गए।
- 1:07:56चपेट में आ गए। बुद्धि परमात्मा ने इसे लिया दी
- 1:08:01है। इसका इस्तेमाल सही विवेक के रूप
- 1:08:06से ढंग से करो। ऐसे वो हुआ इंसिडेंट, ऐसे आग लगी
- 1:08:13वो जल के मर गया। बहुत बुरी मौत मरा, अकेला था
- 1:08:21अकेले सोने की आदत थी उससे रात्रि को कभी ध्यान किया करता 3:00 बजे
- 1:08:28उठ के प्रभ मुहूर्त में उठ के, लेकिन उस दिन रात को ही।
- 1:08:35काम समाप्त हो गया। ब्रह्ममूर्थ आया ही उसकी
- 1:08:42धर्मपत्नी अलग कमरे में सोया करती है।
- 1:08:46उस व्यक्ति की माता अलग कमरे में सोया करती है।
- 1:08:52ये घटना घटी है। उसके बाद मैं बहुत बार गया, बहुत
- 1:08:59बार उससे बातें की, खुल के बातें की और उसने जो बातें की वह मेरे
- 1:09:05ज़हन में उतरती चली गई। मैं समझ गया था यह व्यक्ति
- 1:09:12संपूर्ण हो चुका है। यही मुझे बता सकता है ज़िन्दगी का
- 1:09:20जो ज्ञान मैं तुम्हें दे रहा हूँ यह उस बाबा रत्न रत्नागिरि के
- 1:09:31कृपा से है। उसने जो जो मुझे बताया।
- 1:09:39ध्यान उसी ने मुझे सिखाया, अन्यथा मुझे ध्यान के बारे में कुछ पता
- 1:09:49नहीं था। मैं तो कॉन्सन्ट्रेशन को ध्यान
- 1:09:52समझता था। जाप वगैरह भी उन्होंने बताये।
- 1:09:59वो भी भगवान शंकर के उपासक थे। दोना लगाते थे दोना लगाने वाले
- 1:10:03भगवान शंकर के ही होते हैं तो वो मुझे बताते थे कि आपत्तिकाल के
- 1:10:11वक्त या गायत्री का जाप करो या ओम नमो भगवते रुद्राय का जाप करो।
- 1:10:17उनका सिद्ध किया हुआ था। उसके बाद तो मैंने भी सिद्ध कर
- 1:10:19लिया। ऐसी घटना उस तल पर जाकर उस
- 1:10:29व्यक्ति ने देखा। इस तारीख को महीने बाद यह जलकर मर
- 1:10:35जाएगा। वो तो जानता था।
- 1:10:38बता दिया गया और वही कुछ हुआ। सारे परिवार को पता था आज इसका
- 1:10:45आखिरी दिन है, लेकिन कोई कुछ न कर सका।
- 1:10:50कोई कुछ न कर सका। वही कहानी बावत पुराण में आती है।
- 1:10:59जो ये किशोरियां तुम्हें सुनाती हैं, बताती हैं कैसे राजा
- 1:11:07परीक्षित को तक्षक नाग ने डस लिया था।
- 1:11:11कहने के बावजूद और जन्मे जय। जो परीक्षित का बच्चा था वो राज़
- 1:11:18कर रहा था, राजा था वो कहता मैं देखता हूँ कैसे दक्ष ना गाय का
- 1:11:24जगह जगह पे पहरे बिठा दिए उसने राजा था अर्जुन का पौत्र।
- 1:11:35परीक्षित उत्तरा के गर्व से जन्मा लेकिन बताने के बावजूद भी बचा न
- 1:11:52सका लेकिन। उन्होंने भी यही बात कही।
- 1:12:02मैं भी आपसे यही बात कहता हूँ, जो झूठे होते हैं वो इस डर से कि
- 1:12:09हमारा झूठ पकड़ा न जाए इसलिए तुमसे कहते हैं बस मान लो राधे
- 1:12:16राधे करते रहो। ऐसा मत कहो मान लो बस सब ठीक हो
- 1:12:23जाएगा लेकिन जो सच्चे होते हैं वो कहते हैं, देखो मेरी बातों को
- 1:12:33मैंने जिया, मैंने माना। मेरे अनुभव से तुम जी नहीं सकते,
- 1:12:40मेरे अनुभव से तुम जीना भी मत बेड़ियां, मेरी खुलीं तुम अपनी
- 1:12:49बेड़ियों को खुद खोलोगे ये है तरीका।
- 1:12:54अपनी बेड़ियों को खुद खोलोगे तो बेड़ियों से मुक्त हो जाओगे।
- 1:13:00अगर लिबरेशन चाहिए तो मुक्ति चाहिए इन बेड़ियों से जो आपने
- 1:13:06अपने सारे शरीर को बुरी तरह से बांध रखा है।
- 1:13:10न जाने कितनी मान्यताओं के सूक्ष्म धागों से तुम बंधे हो गए
- 1:13:14हो। तुम्हें वो पता नहीं है कितने
- 1:13:19सूक्ष्म और जबरदस्त बंधनों में तुम बंधे हुए हो और तुम्हें खुद
- 1:13:26मालूम है। ये कहानी कर्ब ने वात का रस थे,
- 1:13:39माँ फले शु गदाचन माँ कर्मफल, हेतुर, भुरमा, तेसंगो अश्व
- 1:13:51अकर्मणे हैं। हेयर तू अकरमण्य होने की चेष्टा
- 1:13:59भी न कर क्या मैं कुछ न करूँ? अगर तू उसके ऊपर सौंप देगा तो वह
- 1:14:06जो करवाएगा, वह ही भुगतेगा। फिर वह तुझे ऐसे स्थान पर ले
- 1:14:13जाएगा अगर तुने कुछ किया नहीं तो तू भुगते कभी नहीं उसका किसी अगले
- 1:14:22प्रवचन में। वैसे मैं पहले प्रवचनों में सब
- 1:14:25कुछ बता चुका हूँ अब क्योंकि श्रृंखला भक्त तरीके से बोल रहा
- 1:14:31हूँ। तो अगले प्रवचन में फिर कुछ मैं
- 1:14:33इशारा कहीं कर दूंगा, जो उस पर छोड़ कर चलता है।
- 1:14:39मैं उसे केंद्र में रख लेता है। सिद्धि प्रज्ञा जिसे कहते हैं
- 1:14:43शब्द बड़े गहरे हैं ध्यान से सुन उसके ऊपर जो छोड़कर अपनी।
- 1:14:50नैया के पतवार उसके हाथों में छोड़कर जो कर्म करता है वह उसे
- 1:14:58केंद्र में ले जाता है वह मालिक, वह मालिक की बात करता हूँ, यह कोई
- 1:15:04आसान खेल नहीं है, थोड़ा झांक के देखो।
- 1:15:09एक ग्रह तारे, नक्षत्र, सूरज ये जितनी आकाश गंगा हैं, उनके तारों
- 1:15:14को गिनती नहीं कर सकते आप और ये सब उसने बना दिया मैं उसकी बात
- 1:15:20करता हूँ, इन खोपड़ीधारी वैज्ञानिक की बात नहीं, मैं करता
- 1:15:27हूँ ये तो खोज भी ना पाएंगे। बनाना तो बहुत दूर की गोटी है,
- 1:15:33उसको तो भूल जाओ इसलिए कृष्ण कहते हैं तो वक्त को गँवा मत।
- 1:15:43उसी वक्त में तो दुखे भी हो सकता है।
- 1:15:45उसी वक्त में तो परम आनंद के। लहरों में डूब कर आनन्द भी मान
- 1:15:51सकता है। फिर डेरी क्यों डेरी क्यों करता
- 1:15:57है? गुरु भी मिल के साध हो रहे गुरु
- 1:16:04लात हो रहे। तेरी भी तमन्ना है मुक्त होने की
- 1:16:10मौसम भी सुहाना है, मैं के प्याले भी सामने पड़े हैं तू उठा और कटक
- 1:16:19जा और उस मदहोशी के आलम में नाच ग।
- 1:16:27जश्न मना उसके दिए हुए संसार का लुत्फ उठा।
- 1:16:34दो कुट पीला देसा किया। नौ खुद फिला दे साथी बाकी मेरे
- 1:16:59तेरोड़ दे। दो कुठ फिला दे सा किया बाकी मेरे
- 1:17:09ते रो दे दो कुठ फिला दे सा किया श्री कृष्ण गोविंद?
- 1:17:23हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:17:40हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण होविन्द हरे मुरारी।
- 1:17:59हेनाथ नारायण वसुदेव पितुमात स्वामी सखा हमारे।
- 1:18:17पितुमात स्वामी सखा हमार हे हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:18:34श्री? कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:18:46नारायण वासुदेव। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 1:19:05धन्यवाद।