Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Nov 25 - उस तल पर जाकर व्यक्ति अहिंसक क्यों हो जाता है? कृष्ण की हिंसा का गूढ़ सत्य! Must Watch Baba Ji Vijay Vats Satsang
Transcript
- 0:00एक दुविधा का निवारण कीजिए प्रभु आप कहते हैं कि आत्मतत्व तक
- 0:12पहुंचने के बाद व्यक्ति अहिंसक हो जाता है।
- 0:19जैसे वो तो आत्म तत्व तक पहुंचे, अहिंसक हो गए, महावीर आत्म तत्व
- 0:30तक पहुंचे। अहिंसा परमा धर्म अहिंसक हो गए।
- 0:40लेकिन कृष्ण आत्म तत्व परमात्मा तत्व तक पहुंचते हैं, फिर इतनी
- 0:50हिंसा क्यों होने देते हैं? क्यों इतनी हिंसा करवातें हैं?
- 0:57और सिर्फ अर्जुन से ही महाभारत नहीं करवातें खुद भी हिंसक है।
- 1:05अपने ही मामा कंस की हत्या कर देते हैं, अपनी ही बुआ के बेटे
- 1:11शिशु पाल का वध कर देते हैं। जरासंध को हम रवा देते कृपया करके
- 1:24इस दुविधा का निवारण करने का कष्ट कर प्रभु प्रसाद।
- 1:39प्रश्न बिल्कुल सटीक है। उस तल पर पहुंचने वाला व्यक्ति
- 1:48अहिंसक हो जाता है, कारण कारण को वो जान लेता है।
- 1:57कि जब किसी की हिंसा हो ही नहीं सकती, जब कोई मर ही नहीं सकता तो
- 2:06फिर हिंसा उसके लिए व्यर्थ हो जाती है।
- 2:13सूक्ष्म प्रश्न है, सूक्ष्म ही उत्तर है।
- 2:19आराम से समझिएगा। उस पर आदमी जाकर अहिंसक होता
- 2:25क्यों अहिंसक इसलिए होता है कि वह जान लेता है?
- 2:34जो मरता है वह शरीर? और तुम हिंसा करते हो शरीर को, मन
- 2:41को, विचारों को भावना, बुद्ध, महावीर, संत कृष्ण ये जान लेते
- 2:52हैं कि मैं। ना मन हो, ना विचार, ना भावना हो,
- 3:01ना शरीर, ना इंद्रिया हूँ तो इसलिए अगर ये मरेंगे तो मेरा तत्व
- 3:12बचा रहता है। दूसरे मायने में हिंसा हो ही नहीं
- 3:18सकती। कृष्ण जानते हैं बुध भी जानते
- 3:24हैं, महावीर भी जानते हैं। जो भी इस स्थल पर पहुंचा सभी
- 3:30जानते हैं। हिंसा हो ही नहीं सकती।
- 3:35पर हिंसा करते हो? थोड़ा मजेदार स्वाद है।
- 3:45जब हिंसा हो ही नहीं सकती तो हिंसा करते क्यों हैं?
- 3:49क्योंकि हिंसा हो ही नहीं सकती। इसीलिए इंसा करते हैं समझेगा इस
- 3:55बात का महाभारत के युद्ध में अर्जुन का प्रहार है।
- 4:04कैसे मरूंगा अपनों को पितामह को? गुरुदेव को सभी भाइयों को मेरे
- 4:17अपनों को मैं कैसे मारूं और कृष्ण उसे कहते हैं।
- 4:23पहला शब्द हे अर्जुन। जिनके लिए शोप नहीं करना चाहिए,
- 4:32तो उनके लिए शोप करता है, बहुत सी बातें होती हैं, वार्तालाप होता
- 4:42है। अर्जुन समझ नहीं हो सकता क्योंकि
- 4:44ये बुद्धि की समझ की बात है। यह बात है अनुभव से समझने की तो
- 4:53कृष्ण पूरी गीता बोल देते हैं, लेकिन अर्जुन ही समझ में नहीं
- 4:59आती। जो व्यक्ति उस स्थल पर पहुँचता
- 5:04है, वह अहिंसा के इसलिए हो जाता है।
- 5:08काहे करनी है हिंसा? जब हिंसा हो ही नहीं सकती, इसलिए
- 5:15अहिंसा हो जाता है, फिर हिंसा क्यों करता है?
- 5:22हिंसा इसलिए करता है कि अगर मैं इसको मार दूंगा तो भी ये मरेगा
- 5:27नहीं। फिर हिंसा ही कर दो।
- 5:32क्यूँ करता है हिंसा? क्योंकि कुछ लोग ऐसे होते हैं
- 5:39जिनको अगर मार ना दिया जाए तो शांति नहीं।
- 5:51थोड़ा सा मधोल को देखिये भीष्म पिता महादेव व्रत बड़े भीषण
- 6:05धर्माधर कोई मुकाबला नहीं उनका। और करो।
- 6:13द्रोण तो सभी के मास्टर हैं और अर्जुन तीरों से ही वध करेगा।
- 6:23तीरों के सिवा उसके पास कोई अस्त्र शस्त्र रहे?
- 6:34अर्जुन समझता है कि हिंसा हो सकती है।
- 6:41कृष्ण जानते हैं कि हिंसा हो नहीं सकती, बस यही फरक दोनों है।
- 6:50कृष्ण। उस स्तर पर चले गए जहाँ जाके देख
- 6:54लिया कि हिंसा हो ही नहीं सकती, लेकिन अर्जुन उस क्षेत्र से
- 7:03अनविज्ञ है, अभी जानते नहीं उस क्षेत्र को वहाँ पहुंचे नहीं उसको
- 7:09छुआने। उसको दूर से भी देखा।
- 7:13इसलिए अर्जुन भय के मारे कंपरे है और उस भय से कांपते हुए अर्धों को
- 7:22देखकर कृष्ण कहता है तू क्षत्रिय पुत्र है।
- 7:28इस तरह युद्ध के मैदान में कितने शौर्य और कितने शोक से आया था?
- 7:36लेकिन अब क्या हो गया? अचानक इन सभी लम्बी कतारों को
- 7:43देखकर अचानक से क्या हो गया? अचानक से कैसे मारूंगा इनको?
- 7:57तो फिर कृष्ण कहते तुम क्षत्रिय नहीं ये बातें?
- 8:04क्षत्रियों वाली है नहीं, ये बातें कह रहे हो वाली तुम
- 8:11क्षत्रिय पुत्र हो और मैं तुम्हे जो करने के लिए कह रहा हूँ उसे कह
- 8:26गाढ़ी धनुष उठा और इनको वेद दे इनको मात्र।
- 8:32अर्जुन कप रहा है। कृष्ण कह रहा है कि तू भयग्रस्त
- 8:37है, लेकिन अर्जुन बड़ा शानदार व्यक्ति है।
- 8:41कृष्ण चुनते हैं। कृष्ण कहते हैं ही अर्जुन ए पार्थ
- 8:57तो कायरता की बातें युद्ध स्थल में आकर क्यों करने लगा?
- 9:05ऐसा तो तू कभी भी न था। लेकिन अर्जुन मान लेते हैं अर्जुन
- 9:15बहस नहीं करते, डिस्कशन नहीं करते, प्रतिवादन नहीं करते, कृष्ण
- 9:23की बात को नामंजूर नहीं करते हैं, मान जाते हैं।
- 9:29हाँ, मैं कार्पण दोषो वह स्वभाव कायरता के स्वभाव के कारण परीक्षा
- 9:41मितवाम धर्म समर विषय का आपसे पूछता हूँ मुझे धर्म का मरम
- 9:49बताइए। मेरा कर्तव्य क्या है?
- 9:52मेरा धर्म क्या है? यश्रय से अनिश्चित रोहितन में जो
- 9:59मेरे लिए इस वक्त शुभ है वो मुझे बताइए, शिष्य से अहम मैं तुम्हारा
- 10:08शिष्य हूँ। शरदना देती हूँ समर्पण हुआ हूँ,
- 10:11तुम्हारे शादी माँ चान और पन्नमा मेरी रक्षा करो, मुझे मार्गदर्शन
- 10:23करो, मुझे क्या करना चाहिए मैं कब रहा हूँ।
- 10:30आपने ठीक मापा, भीतर से कंपन बड़ा गहरा है और ये कंपन मृत्यु का है।
- 10:38मैं क्षत्रिय हूँ, ये वृक्षिक और क्षत्रिय को मृत्यु से डरना नहीं
- 10:42चाहिए ये वृक्षिक लेकिन मैं डर रहा हूँ।
- 10:50कृष्ण मूल नब्ज को हाथ लगा देते हैं, दुख तिरप को क्योंकि कृष्ण
- 10:57जानते हैं कि जो मरेगा वह ना तो गुरु द्रुण मरेगा।
- 11:06ना बीसों का तामा मरेगा ना 18 सोनी से ना मरेगी इसलिए कृष्ण तो
- 11:12बेगरे से अपने नारायणी सेना को भी भेज देते हैं क्योंकि दुर्योधन ने
- 11:19कृष्ण की ही नारायणी से ना मांगी थी।
- 11:25क्यों भेज देते हैं? हम अपने अंगरक्षकों को दूसरे के
- 11:32पास नहीं भेजते जहाँ मृत्यु का खतरा लेकिन कृष्ण अपनी नारायणी
- 11:38सेवा को क्यों भेज देते हैं? क्योंकि कृष्ण जानते हैं यहाँ कोई
- 11:44मर्द नहीं। एवरीथिंग इस इमर्ट अभी विज्ञान तो
- 11:57कहता ही मैटर कैन नीदर बी क्रिएटेड नोर कैन बी जस्ट।
- 12:08और कृष्ण पहले से ही 5000 साल पहले बोल चूके हैं नैनम चंदन की
- 12:13शस्त्रानी नैनम दा की बाप का नैनम क्लेगन्ता को न शूरशिति मारो ता।
- 12:24खर्जुन तो वो तत्व है जो न कटता, न जलता, न भीगता न सूखता।
- 12:37अश्चर्य है, आकलेद है, असोश्य है, अकाट्य है और दराया है।
- 12:43अदर है अमृत इसीलिए हिंसा कर देते हैं कृष्ण कृष्ण ने कंस को मारा।
- 13:05तुम क्या समझते हो? कृष्ण जानते नहीं थे कि कंस नहीं
- 13:08मरेगा। बिलकुल जानते तुम क्या समझते हो
- 13:13कि कृष्ण जानते नहीं थे कि शिशु पर नहीं मरेगा?
- 13:17बिलकुल जानते हो, फिर भी क्यों मारते हैं?
- 13:22क्योंकि वह भीतर की शक्ति? जीस उपकरण के पास आती है।
- 13:29जब करण देह के पास आती वह देह हिंसक है।
- 13:47चीतना अहिंसक है, कान्शस्नस अहिंसक है और यह बॉडी पंचभोतक
- 13:55शरीर ये हिंसक है। कृष्ण जानते हैं जब ये चेतना
- 14:02संलग्न हो जाती है इन पंचभोतक शरीरों के।
- 14:06साथ मन के साथ एक आत्म साध लेती है, तो यह ढाँचा हिंसक हो सकता है
- 14:18चेतना नहीं अगर कोई व्यक्ति इतना हिंसक हो गया।
- 14:25तो जब अर्जुन पूछते हैं फिर इनका हल क्या है?
- 14:33जब कोई मर ही नहीं सकता फिर उसे मारू क्यों?
- 14:39कृष्ण कहते हैं जब कोई मर ही नहीं सकता इसीलिए ही उसको मार दो
- 14:45क्योंकि वो मर नहीं। उसकी चेतना की शक्ति जब इस ढांचे
- 15:01के साथ जुड़ेगी, मनुष्य के साथ जुड़ेगी, चित्र के साथ जुड़ेगी।
- 15:09तो चेतना की कॉन्शसनेस इसके साथ जुड़कर हिंसा का फैलाव करेगी,
- 15:21क्योंकि चेतना के बिना यह ढाँचा एक क्षण के लिए भी स्वास्थ्य नहीं
- 15:26बन सकता। तुमने कहा उस स्थल पर गया हुआ
- 15:32व्यक्ति बाबा आप कहते हैं कि अहिंसक हो जाता है, बिल्कुल
- 15:36अहिंसक हो जाता है। कृष्ण इसलिए कहते हैं कि को मार
- 15:42दे क्योंकि ये मरेंगे। तू जो कंपराह है, ये व्यर्थ का
- 15:51कंपराह है, यह तेरा भ्रम है कि ये मर जाना है ना तू मरेगा भश ना
- 16:02मरेगा? ना मरेगी।
- 16:07सारी सोच इसलिए मैंने अपनी नारायणी सेवा को उधर मैं जानता
- 16:15हूँ कि नारायणी से ना कभी नहीं मरेगा जो मरेगा बाहर का मटेरियल
- 16:22है। और सही बात तो पूछो तो मटेरियल भी
- 16:27कहाँ मरता है? आज विज्ञान कहता मैटर के नीदर भी
- 16:31क्रिएट यह भौतिक पदार्थ भी तो नहीं मरता, फिर मरता क्या है?
- 16:42मरता है। ये ढांचा स्कैटर हो जाता है,
- 16:49चिन्ह भी चिन्ह हो जाता है। जैसे हम किसी मूर्ति को खंडित
- 16:54करते हैं उसका ज़रा ज़रा हम अलग कर दे पीस दे मुझको और वह रेत बन।
- 17:02है तो ढांचा बिखरता है। मर्ता कुछ आत्म तत्व मर सकता नहीं
- 17:16मैटर मर्ता नहीं फिर मर्ता कौन? मरता है दोनों के संवाद से जो ये
- 17:24शरीर काम करता है, ये ढांचा स्कैटर हो जाता है जैसे आपने देखा
- 17:31पूरी मिर्च होती है। मशीन के बीच में से आप गुजार देते
- 17:35हो तो मिर्च रह जाती है। मेरे से तो रह जाती है लेकिन चुरा
- 17:42बन के रह जाती है। ऐसे ही ये रहेगा लेकिन अपने अपने
- 17:49पदार्थों में विलीन हो के रहेगा माटी माटी में मिल जाएगा हवा हवा
- 17:56में। पानी, पानी में अग्नि, अग्नि में
- 18:01आकाश, आकाश में पंच भौत के तत्व पंच भौत में मिल जाएगा, इसका क्या
- 18:06बिगड़ेगा? कुछ नहीं बिगड़ेगा।
- 18:11तो मरा कौन मरा ढांचा मरा ढांचा। फिगर फिगर मारती ना तो मैटर मरता
- 18:29ना आतम तत्व मरता तो फिर मरता कौन?
- 18:36कुछ तो मरता ही है ना? मरता है।
- 18:39ये ढांचा ढांचा नहीं रहता। वह अपने मूल रूप में चला जाता है
- 18:49और उसका मूल रूप है पंचबोधक तत्व पदार्थ।
- 18:56अभी ये सभी पदार्थ एकमुश्त होकर इकट्ठे हो गए।
- 19:02फिर ये अभी घर जाएंगे। मरेगा कुछ भी नहीं इसलिए मैं कहता
- 19:09हूँ सिर्फ पर आत्मा ही अमर नहीं है।
- 19:15कदार्थ हुई अमर। ये गलती मत खा जाना नैनम सिदंती
- 19:21शस्त्र प्राणी उस आत्मा को कह रहे है नहीं।
- 19:25कृष्ण कहते है यहाँ मरता तो कुछ है ही नहीं, मैटर भी तो नहीं
- 19:30मरता। मैटर कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर
- 19:37कैन बी डिस्ट्रॉइड कृष्ण कहते हैं, यहाँ मर्ता कुछ तो क्यों
- 19:46घबरा रहा है? अर्जुन ये जो ढांचा कप रहा है ये
- 19:50भी ढांचा कप रहा है। तू तो अकाम को भीतर है, मैं देख
- 19:55रहा हूँ, तू नहीं जानता क्योंकि तू अज्ञानी मैं ज्ञानी में जानता
- 20:01हूँ, इसीलिए हे अर्जुन मैं तुझे वह तत्व दिखाता हूँ जो तू है।
- 20:11और फिर उससे आगे वो तत्व दिखाता हूँ जो मैं हूँ।
- 20:16ये बड़ा प्यारा साफ़ कृष्ण कहते हैं, मैं तुझे वो तत्व दिखाता हूँ
- 20:22जो तू है और कृष्ण उसे अपना आपा दिखा देते हैं।
- 20:34आत्म बोध जीसको हो जाता है, वह अहिंसक हो जाता है, आत्म बोध ही
- 20:44जीसको हो जाता है। वह जान लेता है कि अर्जुन यह
- 20:49ढांचा नहीं है। जिसे पार्थ कहते हैं भगवान कृष्ण
- 20:55जिसे कुंतीनंदन कहते हैं भगवान कृष्ण जिसे अर्जुन कहते हैं भगवान
- 21:01कृष्ण वो ये ढांचा है कृष्ण उस अन्त।
- 21:10चेतना को संबोधित करके मुझे कहते हैं हे पार्थ, ये ढांचा मैं नहीं
- 21:18हूँ। कृष्ण कहते हैं तू भी नहीं मरेगा,
- 21:22पार्थ में गुरु द्रवण मरेंगे। मरेगा तो ये जो पंचभौतिक तत्व
- 21:37इकट्ठे हो गए हैं, इनका ढांचा जो इकट्ठा हो गया है वह टूटेगा, वह
- 21:45स्केटर होगा, वह। बेलगांव में आ जाएगा।
- 21:52अभी संबंध बना सभी का फिर संबंध टूट जाएगा।
- 21:56सभी यही कुछ है, इसे ही तुम मृत्यु कहते हो और इसे ही तुमने
- 22:03जन्म माना। जन्म में सभी पदार्थ जुड़ जाते
- 22:08हैं आप उसमें और मृत्यु में सभी पदार्थ अलग अलग हो जाते हैं।
- 22:15बस यही है जन्म और मौत का खेल। कृष्ण भी मारते हैं।
- 22:24अपने सगे मामा को मार देते हैं। कृष्ण अपने बुआ के बेटे शिशु पाल
- 22:31को मार देते हैं, लेकिन ध्यान रखना अकारण नहीं मारते।
- 22:40कंस को इसलिए मारते की वो निर्दोष बच्चों को।
- 22:46पैदा होते ही उठाता है और उन मासूम नेरीह बेज़बान बच्चों को
- 22:53दीवार से भटक के मार देता है। बे कसूरों को मार देता है और ये
- 23:00सबसे बड़ा कसूर। इसलिए मैं कहता हूँ कि अगर
- 23:09औरंगजेब ने कोई प्राप्त किया प्राप्त तो बहुत किया, लेकिन सबसे
- 23:16बड़ा प्राप्त किया जो छोटे, नन्हें दो गुरु गोबिंद सिंह के
- 23:22पुत्र सात और 9 साल। उसको जो मार दिया जिनको यही नहीं
- 23:30पता कि धर्म होता क्या है? यह जघन्य अपराध था।
- 23:39इससे प्रत्येक व्यक्ति की रोग कब? बच्चे को मार दिया निर्दोष, निरीह
- 23:49बच्चे को मार दिया मूक था बेज़ुबान था बोलना और तुम
- 23:57परमात्मा को अल्लाह को कुर्बानी देते हो मासूम।
- 24:02मेमने ले लाती और तुम कहते हो अल्लाह को प्यारी है कुरबान, छंद
- 24:15अधूरा रह जाता है, अल्लाह को प्यारी है, कुरबान बिल्कुल ठीक।
- 24:20लेकिन कुर्बानी मेमने की नहीं निर्दोष मेमने की नहीं।
- 24:25उस दुष्ट अहंकार की जो तुम हो, तुम अपने आपकी दुष्टता को कुर्बान
- 24:33करने की खिरक में मासूमों की। और इसे तुम धार्मिक करते रहते हो।
- 24:47यही बात अर्जुन और कृष्ण के मध्य में हो रही है।
- 24:52वार्तालाप यही तुमने पूछा पुत्र जब उस तलक पर गया हुआ व्यक्ति।
- 25:05बिल्कुल अहिंसक हो जाता है तो कृष्ण उस स्तर पर गए, क्या उससे
- 25:11भी पार चले गए, भगवान हो गए? फिर वो अहिंसा क्यों करते हैं?
- 25:17इसीलिए अहिंसा करते हैं? क्योंकि आतम तल पर जाकर व्यक्ति
- 25:21देख लेता है। जो मरता है वो ढांचा है, ना
- 25:25पदार्थ मरता है, ना चेतना मरता है, ढांचा मरता है इसलिए?
- 25:37क्या फायदा इनको मारने का? क्योंकि यह मरेंगे तो है नहीं।
- 25:43ढांचा मरेगा ना पदार्थ मरेगा ना आत्मतत्व मरेगा फिर मार क्यों
- 25:51देते हैं? इसीलिए ही मार देते हैं जब मरेगा
- 25:55ही नहीं और जे अपनी। शैतानियों को छोड़ेगा कि नहीं तो
- 26:01फिर इसका हल क्या है? ऐसे ही छोटे बच्चों को मरवाते
- 26:06जाए। ऐसे ही भव्यचारियों को ऐसे ही
- 26:14मूर्खों को अज्ञानियों को। करने दें जो वो करते हैं।
- 26:22नहीं यही कृष्ण कहते हैं जब वो मर नहीं सकता कोई व्यक्ति इसलिए
- 26:30मारना व्यर्थ है लेकिन थोड़ा सिक्के को पलटिए।
- 26:37कृष्ण कहते हैं जब मर ही नहीं सकता व्यक्ति तो शैतान व्यक्ति को
- 26:44मार देना चाहिए क्योंकि वो मरता तो है लेकिन ध्यान रखना, ये बात
- 26:49बुद्धि से नहीं होनी चाहिए। यह बात कृष्ण की तरह अनुभव से
- 26:55यानी जिसने जान लिया मैं मनुष्य भावना बुद्धि से पार शरीर से पार
- 27:08पंचभौतिक तत्वों से पार। वह नए मरने वाला तत्व हूँ, वह
- 27:16योग्य हो जाता है किसी की हिंसा करने के लिए बड़ा प्यारा शब्द है।
- 27:22किसी ने बोला नहीं वह हिंसा करता नहीं फिर से समझाता हूँ।
- 27:31तुम असल में संतो के शब्दों को भी अपने ही ढंग से डाल लेते हो।
- 27:36यही तो मुड़ता करते हैं फिर गुरु किसी और ढंग से बोल रहा है, तुम
- 27:43तोड़ मरोड़ के किसी और ढंग से पेश करते थे।
- 27:48कृष्ण कहते हैं, कोई मरता नहीं। उस स्थल पर जाकर व्यक्ति अहिंसक
- 27:55हो जाता है क्योंकि कोई मरता नहीं।
- 27:59इसलिए फिर किसी को मारोगे भी क्यों अहिंसक परम अहिंसक हो जाता
- 28:06है? महावीर उस स्थल पर पहुंचे, पर हम
- 28:08नहीं सकोगे। कीड़ों को भी बचाते चलते हैं पांव
- 28:12से पानी को छान के पीते हैं क्योंकि जब कोई मरता ही नहीं है
- 28:25तो फिर मारने की। जो करम है वो बेकार है, मारना
- 28:35होगा ही नहीं ये मरेगा और फिर मारते क्यों है?
- 28:43इसीलिए की ये मरता तो है नहीं। और शैतानी से भी बाज नहीं आता अगर
- 28:54दुर्योधन अपनी शैतानी से बाज आ जाता।
- 28:56कृष्ण खुद गए कृष्ण कहते देखो तुम्हारे ऊपर कोई।
- 29:03कृष्ण जानते थे कि इनमें से कोई पहुंचा नहीं, उस सतल को सिर्फ
- 29:08मैंने छुआ है तो मैं ही शांति दूत बन के जाऊंगा, अब मैं कोशिश
- 29:16करूँगा। और कृष्ण ने कहा कि युद्ध तब होना
- 29:20चाहिए जब सारे शांति के दरवाजे बंद हो रहे हैं, उससे पहले युद्ध
- 29:25नहीं होना चाहिए। दुर्लभन से कहा कि तू पांच गांव
- 29:33दे पांच गांव। पांच भाई, एक एक गांव, पांच रहते
- 29:39हैं गिरोधन चिल्लाता अरे ग्वाली, तुम पांच गांवों की बात करता मैं
- 29:50सुई की नोक के बराबर इसको जगा। जिसके लिए महाभारत हुआ 40,00,000
- 30:03लोग मर गए वो जमीन आज भी वहीं पड़ी इतबार न हो तो जाके देख लो
- 30:13कुरुक्षेत्र। किसके लिए वध हुआ?
- 30:22अज्ञानता अगर एक विज्ञानी होता उनमें से तो ये जो धन्यवाद ज्ञानी
- 30:35था ही ज्ञानी था। विद्र की बात सुनी नहीं, ओहदा भी
- 30:45तो होना चाहिए अनुभव के साथ साथ ओहदा भी तो होना चाहिए।
- 30:51अब विद्र की कोई बात मानता नहीं, दासी पुत्र है विद्र।
- 30:57वैसे धृतराष्ट्र का भाई है, तासी पुत्र है, वेद व्यास का पुत्र है,
- 31:08लेकिन उसकी बात मान्यता कौन है? कोई नहीं मानता जिसे मृत्यु कहते
- 31:14हो। इस ढांचे के बिखराव के अलावा कुछ
- 31:19भी नहीं है। ये ढांचा जब बिखर जाता है तुम
- 31:24कहते हो ये मर गया। इसका चेतना से संबंध भर मनन टूट
- 31:31जाता है तुम कहते हो मर गया। तो तुमने पूछा पुत्र, वहाँ जाकर
- 31:41व्यक्ति अहिंसक हो जाता है, अहिंसक का मतलब हिंसा हो नहीं
- 31:48सकती, इस संसार में हिंसा हो नहीं सकती।
- 31:54संतों के वचन बढ़े। गहरे होते हैं और अक्सर संतो के
- 32:00वचनों को आप मल्टी डाइमेंशनल रूप से ले सकते हो, परिभाषित कर सकते
- 32:08हो। इसलिए ऐसे आचार्यों का जन्म होता
- 32:11है कि संतो की भाषा कब मतलब। आप मल्टीडायमेंशन ले लोगे, दिमाग
- 32:20से गीता का अनुवाद करोगे, जबकि गीता का अनुवाद दिमाग से होता ही
- 32:29नहीं, जो तत्व वृद्धि में आता नहीं।
- 32:34बुद्धि से व्याख्यात कैसे होगा? लेकिन आचार्य लोग किसी निहित और
- 32:41स्वार्थ के कारण गीता की व्याख्या करने में लगे हैं।
- 32:51कृष्ण बिल्कुल नहीं कांपते हैं। अर्जुन काँवता है और जब अर्जुन
- 33:00कहता है कि अब मैं तुम्हारी ही शरण में हूँ प्रभु मुझे रास्ता
- 33:06दिखाइए, मैं दुविधा में हूँ और आप कहते हैं कि शंख आत्मा विनिश्चति
- 33:13मैं शंक्षाग्रस्त हूँ। कृपा करके मुझे से बाहर निकाल
- 33:18लिया तो कृष्ण उसके ऊपर शक्तिपात करके पहले अर्जुन को अपना रूप
- 33:29दिखाते हैं। अर्जुन को स्वयं का अर्जुन।
- 33:34जब अर्जुन स्वयं के अर्जुन को देख लेता है भीतर बैठे और ये देख लेता
- 33:40कि यह तो भारी खोल है। वह तो अब तक वस्त्रों को ही अपना
- 33:47होना माने बैठा था। वो कृष्ण बहुत समझाते हैं।
- 33:55वसांझी जृणानि यथा विहाय नवानि गणनाति नरो प्राणी तथा श्री रानी
- 34:03विहाय जृण अनन्याणी संयाति नवानिते।
- 34:10जैसे तुम पुराने वस्त्रों को उतार कर नए वस्त्र धारण कर लेते हो।
- 34:15बस यही है जन्म मृत्यु का खेल। इससे इला भी कुछ नहीं है।
- 34:24ये पंच भौतिक बिखर गया, तुमने नया पंच भौतिक ले लिया।
- 34:29तुम इसे जन्म और मृत्यु कहते हो। कृष्ण कहते हैं, यह जैसे पुराना
- 34:34वस्त्र आपने उतार दिया और नया पह लिया ऐसा है जो जानते हैं वह जो
- 34:45बोलते हैं, अज्ञानी लोग। उसके बहुत से मतलब कर लेते हैं,
- 34:50जबकि कृष्ण का मतलब तो एक ही है अज्ञानी उसके बहुत मतलब कर लेंगे।
- 35:00कारण कारण अज्ञान, अज्ञान। आता है।
- 35:07बुद्धि से बुद्धि उस तल को व्याख्यायित करने के लिए एडी चोटी
- 35:15का ज़ोर लगा देती है। लेकिन काश बुद्धि व्याख्यात कर
- 35:20सकती है। मसला है यह अनुभव का।
- 35:24बुद्धि की पकड़ में आगवानी इसलिए बुद्धि इसे व्याख्याय नहीं कर
- 35:29सकती, अंदाजा है अंदाजा लगा सकती है इधर उधर से शास्त्रों से पढ़कर
- 35:37बता सकती है, किसी ज्ञानी गुनी जन से सुनकर बता सकती है।
- 35:44लेकिन कृष्ण किसी की सुनी सुनाई किसी की, कहीं कहीं बात में लिखा
- 35:51लिखी की है नहीं देखा देखी बाद तुम कहते कागज़ की लिखी और मैं
- 36:00कहता आंखन देखे। कृष्ण कहते हैं, अभी तुम अपने आप
- 36:08को माने बैठे हो, अभी तुमने अपने आप को जाना नहीं है।
- 36:14अतः अर्जुन हे पार्थ मैं तुझे तेरा हो ना दिखाता हूँ?
- 36:22और कृष्ण अर्जुन को उसका हुनर दिखा देते हैं।
- 36:25चलिए ये तो है अर्जुन जब देखता है कि मैं शरीर नहीं विचार नहीं भाव
- 36:37नहीं मैं इन सबसे पार हूँ। तो होश में आता है ठोकर लग गई
- 36:49झटका लगा है प्रथम बार अपना आपका देखा था होश में आता है बंदा
- 36:56ठोकरें खाने के बाद। रंग लाती है, है न?
- 37:00पत्थर पेगिश जाने के बाद कृष्ण ने जब शक्तिपात किया तो उसने अपने आप
- 37:08का देखा ये जो तुम्हारी समस्याएं चल रही हैं, ये सारी समस्याएं नए
- 37:16जानने के कारण हैं। मानने के कारण नहीं है।
- 37:23मानने के कारण तो समस्याएं पैदा होती है, न जानने के कारण सारी
- 37:31समस्याएं पैदा होती है। जब तुम अपने आप को जान लेते हो तो
- 37:36सारे समाधान हो जाते हैं। इसलिए उस अवस्था को समाधि कहा
- 37:40गया। यहाँ सब समस्याओं का समाधान हो
- 37:46जाता है। कोई समस्या नहीं बचती ना विचार
- 37:50बचते। ना विकार बचते, ना विषया बचते कुछ
- 37:57नहीं बचता सारी समस्याओं का समाधान, ना रोग रहते ना पीड़ा
- 38:02रहती, ना क्लेश रहती ना संताप रहता सब मिट जाते एक के दर्शन
- 38:08करने से और वह एक का दर्शन क्या है शय, दर्शन?
- 38:15स्वदर्शन इसे आत्मनिरीक्षण भी कहा।
- 38:21कृष्ण ने आचार्य उपासना शौचम स्थिरम आत्म विनिग्रह।
- 38:33आत्म अवलोकन जो व्यक्ति कर लेता है उसके सारे दुखड़े मर जाते हैं
- 38:42आज तुम बहुत दुखड़ों से ग्रस्त हो आज तुम्हारा मन।
- 38:49गाड़ी से भी ज्यादा रफ्तार जहाज़ से भी ज्यादा रफ्तार से दौड़ रहा
- 38:54है और तुम इसकी दौड़ से तंग आ जाते हो।
- 39:01तुम्हारे शरीर में कांटा चुभ जाता।
- 39:03तुम दुखी होते हो, तुम्हें कोई रोग हो जाता छोटा बड़ा तुम दुखी
- 39:08होते हो। संत कहते हैं कि तुम अपने आप को
- 39:15जान लो, एक साधे सब सजा है सब समस्याएं खत्म।
- 39:22ना कोई रोग बचेगा, ना कोई संताप बचेगा, ना कोई पीड़ा, ना कोई
- 39:26दर्द, ना कोई क्लेश, ना कोई कष्ट, ना कोई चिंता, ना कोई चिंत ना कुछ
- 39:32हुई तो नहीं बचेगा। बचेगा शुद्ध क्या?
- 39:37लेकिन ये घटित होगा? जब तुम खुद को जानोग है आत्म तत्व
- 39:45दिखाया कृष्ण ने अर्जुन को और कृष्ण ने कहा अब तू ठहर है आत्म
- 39:56तत्व का दर्शन तुने कर लिया अब तू ठहर क्योंकि उस पेंट पे आ गया।
- 40:01जहाँ से आगे मैं तुझे अपना स्वरूप भी दिखा सकता हूँ परमात्मा का तो
- 40:06अभी तू ठेल ले मेरा विराट देख और कृष्ण अपने विराट स्वरूप में आ
- 40:15जाते हैं, अनंत स्वरूप में आ जाता है।
- 40:22उस विराटता में चले जाते उस विशालता में चले जाते, जिसका कोई
- 40:29आदी मध्य अंत नहीं है वहाँ पर चले जाते।
- 40:38और जब देखता है अर्जुन विराट स्वरूप को ध्यान रखना इन आँखों से
- 40:47वह विराट स्वरूप नहीं देखता। तुम जो मूर्तियाँ बनाई बैठे हो
- 40:54उससे वो विराट स्वरूप तुम्हारी आँखों से।
- 40:57नहीं दिखता तुम्हारी आँखों से इसलिए तुमने मूर्तियाँ बना लीं कि
- 41:01जो आँखों से दिखाई पड़े वही हम सच मानेंगे इसलिए तुमने मूर्तियों को
- 41:08भगवान मार दिया और मानते मानते मानते मानते तुम इतने ज्यादा बूढ़
- 41:14हो गए, तुम इतने ज्यादा मूढ़ हो गए?
- 41:17कि तुमने मूर्तियों को ही भगवान मान लिया, बस यही है मूर्खता
- 41:25तुम्हारी। वह आत्मतत्व अनुभव का मसला है
- 41:32अनुभव का विषय है। तुम उसे आँखों से देखना चाहते हो
- 41:39जैसे कानों से देखा नहीं जा सकता। ऐसे ही वह आत्म तत्व तुम्हारी
- 41:45आँखों से नहीं देखता। वह अनुभव की आँखों से दिखता है
- 41:49जिसे कृष्ण दिव्य चक्षु कहते हैं। चर्म चक्षुओं से वो दिखता नहीं,
- 41:53ये चमड़ी के चक्षुओं से नहीं दिखता वो।
- 41:57वह दिखता है दिव्य चक्षु तुम्हें दिव्य चक्षु उखार नहीं हो गया है।
- 42:07तुम्हारी उन पर पर्दा हो रहा है। फिर जब अपना विराट दिखाते हैं
- 42:18दीप्यचक्षु दे चूके हैं श्री कृष्ण अर्जुन को दिव्यचक्षु
- 42:23प्रदान कर चूके हैं और अर्जुन जब विराट कृष्ण का स्वरूप देखते हैं
- 42:31तो कांपने लग जाते हैं। थर थर।
- 42:34पहले मृत्यु से कांपते थे, अब विराटता से कांपते हैं कपड़े लग
- 42:42जाते हैं बंद करो भगवान मुझसे ये देखा नहीं जाता ये तो बड़ा बेशर
- 42:49है। इसे मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।
- 42:57तुम इसे हटाओ प्रभु पहली बार अर्जुन ने किताब किया।
- 43:05उससे पहले साखा कहता था, मित्र कहता था पहली बार किताब किया हे
- 43:12परम का। माँ, हे प्रभु, अपनी लीला को
- 43:17समेटिए यह मुझे बड़ा भय पैदा करवाती है।
- 43:22मैं इसे देख नहीं सकता। मेरी अद्रियां कप रही हैं, मैं
- 43:28भीतर से थर्रा रहा हूँ समेटिए अपनी लीला को।
- 43:35और कृष्ण हसते हुए कृष्ण अपनी लीला को समेट लेते हैं।
- 43:45आत्मज्ञान परमात्मज्ञान दोनों यकसन हो गया।
- 43:51देख लिया देखने का मतलब पहुंचना नहीं होता एक ध्यान में रख लेना
- 43:59तुम दूर से सूरज को देख लेते हो। इसका मतलब सूरज तक पहुँच नहीं
- 44:04जाते। दूर से 15,00,00,000 माइल्स अवे
- 44:10फ्रॉम अर्थ? सूरज को देख लेते हो तो इसका मतलब
- 44:14सूरज में चले जाकर विलीन नहीं हो जाते, देख लेते हो?
- 44:18ऐसे ही अर्जुन ने देखा, देखा और देखना सत्य है।
- 44:23चर्म चक्षु यह सूरज तो हमारी चर्म चक्षु से दिख जाता।
- 44:30लेकिन वह परमात्मा का अनंत स्वरूप बैराट स्वरूप चरम चक्षों से नहीं
- 44:35दिखता। दिव्य चक्षों से दिखता और दिव्य
- 44:39चक्षों से जब अर्जुन ने देखा विराट तो घबरा गया।
- 44:45समिट लो प्रभु इस लीला को समेट लो।
- 44:49मुझसे यह सहन नहीं होती और कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपनी रीला को
- 44:56समझ लिया। प्रथम बार यह शब्द के लिए उसे
- 45:03थर्राते हुए पार्थ के भीतर से। नष्टो मोह स्मारित लब्धा मुझे याद
- 45:14आया मैं कौन हूँ, मेरा मोह नष्ट हुआ जो गलतफहमी थी, जो भ्रम था,
- 45:21जो इल्ल्यूजन था वो डिस्ट्रॉइ हुआ मिट गया भ्रम।
- 45:30आँखें खोलीं सत्य का दर्शन हुआ हे प्रभु मेरा शीनश्या खत्म हो गया,
- 45:40मेरा इल्यूज़न नष्ट हो गया नष्टो मोह मोह एक इल्यूज़न है मोह एक
- 45:47ब्रह्म। स्मृति लब्ध हो तो तुम भी विराट,
- 46:01लेकिन तुम्हें याद नहीं ऐसा समझो कि तुम सोए हुए पर महात्मा हो और
- 46:10कृष्ण नानक। जगे हुए परमात्मा हैं कबीर रैदास
- 46:15जगे हुए परमात्मा है, तुम सोए हुए हो संत जगे हुए इतरस फर्क पर बड़ा
- 46:25भारी फर्क जग जाने से तुम्हारी सभी व्याथाएं सांता रोग कष्ट।
- 46:31क्रैश चिंता, तनाव भ्रम, भय सब खत्म हो जाये एक साथ है सब साथ है
- 46:44बस अपने आप को जान लो तुम कौन हो फिर कोई संताप, कोई रोग।
- 46:51कोई कष्ट, कोई क्लेश, कोई चिंता, कोई इतना कोई चिंतन तुम्हारे पास
- 46:58नहीं आएगी। तुमने पूछा पुत्र जो स्थल पे
- 47:08पहुँच गया वो अहिंसक हो जाता है। और कृष्ण फिर हिंसक क्यों हो गए?
- 47:16कृषक, हिंसक कृष्ण हिंसक इसीलिए हो गए इसीलिए ही हो गए कि हिंसा
- 47:25हो ही नहीं सकते। जो व्यक्ति अहिंसा का हो गया वो
- 47:30भी जान गया कि हिंसा हो ही नहीं सकती, हिंसा होती है किसी के मर
- 47:38जाने से और यहाँ मरता तो कुछ है ही नहीं।
- 47:42भ्रम का मरणा भी कोई मृण होता है? भ्रम का मरणा भी कोई मरणा होता
- 47:49है, इसलिए प्रथम बार मैंने शबद दी है ब्रह्म, सत्यम जगत सत्यम
- 47:57ब्रह्म मिथ्या जो टूट जाए वह ब्रह्म मिथ्या है।
- 48:03भ्रम भी कोई। भ्रम का भी कोई होना होता है भ्रम
- 48:11का भी कोई एक्सिस्टेंस है? भ्रम का भी कोई अस्तित्व है नहीं?
- 48:17भ्रम का अस्तित्व था ये नहीं इसलिए प्रथम बाद मैंने शंकराचार्य
- 48:23के शब्दों को काटा। ब्रह्म सत्यम जगत सत्यम ब्रह्म
- 48:29मिथ्या, ब्रह्म मिथ्या है तुम्हारा यू आर ऑन रॉन्ग वे यू आर
- 48:37यू आर ऑन मिस्टेक भ्रम मृता है। क्योंकि वह मिथ्य है, न जगत मृता
- 48:52न ब्रह्म मृता तुमने कहा कि भीतर जा के व्यक्ति अहिंसक हो जाता है,
- 48:59अहिंसक तो होता है, वह जान लेता है कि हिंसा हो नहीं सकती?
- 49:04तो फिर हिंसा का प्रयास भी क्यों करना जब हो ही नहीं सकती जब हिंसा
- 49:11अहिंसक है, क्षमा करना जब हिंसा हो ही नहीं सकती, फिर करनी भी
- 49:20क्यों है? फिर दूसरा प्रश्न तुने पूछा लेकिन
- 49:24कृष्ण तो बहुत हिंसा करते हैं, खुद भी और हिंसा करवातें भी हैं
- 49:32भीम से? दुर्योधन का ये पट जाँध कड़वाते
- 49:38हैं जबकि गदा युद्ध में ये नीमों के विरुद्ध था।
- 49:43युधिष्ठिर से झूठ बनवा दिया जबकि यह नियमों के विरुद्ध था।
- 49:54कृष्ण जानते हैं कि हिंसा हो ही नहीं सकती, लेकिन ध्यान रखना अगर
- 50:00हिंसा करो। तो खोपड़ी से ये मानकर मत करना कि
- 50:07हिंसा हो ही नहीं सकती, इसलिए हिंसा कर दे फिर तुम्हारी हिंसा
- 50:13में और कृष्ण की हिंसा में बड़ा लॉट ऑफ डिफरेंस लॉट ऑफ गैप।
- 50:22दोनों में बड़ा जबरदस्त फासला होगा।
- 50:25कृष्ण ने जाना हिंसा हो नहीं सकती।
- 50:28फिर उसने हिंसा किया, तुमने सिर्फ माना कि हिंसा हो नहीं सकती।
- 50:34फिर तुमने हिंसा किया, लेकिन तुमने हिंसा किया।
- 50:39कृष्ण ने हिंसा करके विजय पाया कि हिंसा हुई नहीं, तुमने हिंसा करके
- 50:46यह नहीं पाया कि हिंसा हुई नहीं, तुमने हिंसा करके पाया कि हाँ
- 50:50हिंसा हो गई, मैंने मार दिया उसको तुम गलती में हो, हिंसा नहीं हो
- 50:58सकती। मैं न मरूँ मरे, संसार मैं ना
- 51:05मरूँ, मरे संसारा, क्यों मोहे मिला जिला बन हारा मुझे वो तत्व
- 51:12मिल गया। जो कभी मरता नहीं अगर है, अमर है,
- 51:16अकाट्य है, अछेत्य है, अकलिद्य है, अशूष्य है, इसीलिए पुत्र एक
- 51:26ही बात के दो अर्थ। अगर ये अर्थ मूर्ख के कान में पड़
- 51:33गए तो अनर्थ हो जाएगा। तुमने अर्थों का अनर्थ कर लिया जब
- 51:44गीता प्रथम बाल मौसेतो के हाथ में लगे।
- 51:52चीन के सर्वा सर्वे हैं जिसके दम पर आज चीन 18 ट्रिलियन डॉलर की
- 51:59अर्थव्यवस्था है। वो सर्वे सर्वे जहाँ से शुरू हुआ
- 52:05मैं उससे तंग उसके हाथ में जब गीता लगी और उसने गीता को पढ़ा।
- 52:12यहाँ कोई भी मारा नहीं जा सकता तो उसने गीता को सिर पे रख लिया और
- 52:17नाचने लगा। नाचने लगा, लेकिन कारण कुछ और था।
- 52:23मूड के हाथ में गीता बढ़ गई। नाचने लगा, बहुत खुश हुआ अच्छा
- 52:36सत्य हिंदुस्तान में ही है, विश्व गुरु है हिंदुस्तान बिल्कुल ठीक
- 52:46अगर ऐसा वहाँ। शास्त्र की पूजा होती है तो
- 52:50वास्तव में हिंदू धर्म बड़ा विराट है।
- 52:56सिर पर रखकर गीता को नाचा लेकिन गलत कारणों से नाचा उसको समझ नहीं
- 53:05आया खोपड़ी से नाचा। उसको पता ही नहीं चला कृष्ण किस
- 53:11स्थल से बोल रहे हैं। आज मउसे तुंग ने जब गीता बढ़ी
- 53:18उसकी हिंसा उन्हें करोड़ों लोग मार दिए थे।
- 53:23मउसे तुंग ने चाइना में क्रांति लाने के लिए।
- 53:27करोड़ों लोगों का गध कर दिया था एक ही रात में लाखों व्यक्ति मार
- 53:32दिए बड़े बड़े जमींदार और थोड़ा सा दंश्य था जो व्यक्ति।
- 53:43अज्ञान में किसी की हत्या करता है तो दंश से भीतर रह जाता है तो
- 53:49माउस से तुमने हत्याएं तो बहुत की, लेकिन दंश रह गया।
- 53:55वह दंश उसको दिन भर रातड़ पाई जाता था, लेकिन जैसे ही गीता हाथ
- 54:00में लगी, वह नाचने लगा। क्यों?
- 54:03उसकी हिंसा व्याधि हो गई, लीगलिसे हो गई आज मैं उससे तुम की हिंसा
- 54:14लीगलिसे हो गई, संविधानिक हो गई सर्वमान्यता प्राप्त कर गई।
- 54:20वो खूब नाचा। उसके मन का बोझ हल्का हो गया गीता
- 54:24से और वो गीता को प्रणाम किया है। उसने कहा, ऐसी किताब हिंदुस्तान
- 54:32में थी जो मेरे लिए बनी थी। आप गीता को पढ़ेंगे ना आपको
- 54:39लगेगा। यह गीता मेरे लिए बनी अर्जुन
- 54:45कहेगा मेरे लिए बनी मैं उससे तुम कहती हो मेरे लिए बनी जो पढ़ेगा
- 54:51वो कहेगा ये गीता मेरे लिए बोलिए भगवान ने।
- 54:58क्योंकि सत्य सभी के लिए होता है। साझा सत्य सबको जमता है, सबकी
- 55:05आत्मा को संतुष्ट कर देता है, सत्य ठंड का डाल देता है और आज
- 55:14बड़ा प्रसन्न हुआ मैं आवश्यकता हूँ।
- 55:17गीता ने उसकी हिंसा को लीगलिसे कर लिया स्टेप्ड सही ठहरा दिया कि
- 55:29तुमने हिंसा सही की नहीं, सही नहीं की तुम भी ऐसी हिंसा कर सकते
- 55:35हो। बिलकुल कर सकते हो।
- 55:41इस तरह के लोग हुए हिटलर ने 2,50,00,000 आदमी मार दिए बेकसूर
- 55:47यह होती मारती चंगेज ने मार दिए स्टालिन ने मार दिए मुसोलिन ने
- 55:53मार दिए। क्या मिलता है इनको आदमी को मारने
- 55:56में? इन्होंने कभी सोचा नहीं कि हम भी
- 55:59तो इनकी जगह हो सकते थे और मेरी जगह कोई दूसरा भी डिक्टेटर हो
- 56:04सकता था फिर क्या होता ये कभी सोचा नहीं इन्होंने जनता स्वयं
- 56:11मैं हूँ। और डिक्टेटर कोई और है इस दृष्टि
- 56:15से इन्होंने कभी नहीं सोचा। इसीलिए ये हिंसा पे हिंसा, हिंसा
- 56:20पे हिंसा किए जाते हैं और हिंसा कभी उखड़ ना जाए कभी पता ना चल
- 56:25जाए इनकी चालबाजों का इनके पापों का गड़ब खुल ना जाए।
- 56:30भंडा फोड ना हो जाए तो बड़े बड़े मीडिया रखते हैं जो भांडों की तरह
- 56:36इनका गुणगान दिन भर रात तो चौबीसों घंटे करते रहते हैं लेकिन
- 56:41सुनो ना बात भांडों की तरह गुणगान करने से असत्य सत्य में थोड़ा ही
- 56:48बदल जाता है। बाप पुण्य में थोड़े बदल जाता है।
- 56:52नहीं नहीं बाप तो बाप ही रहेगा, तुम 1000 बार कहो तुम एक बार कहो
- 57:00तुम अनंतवार कहो, बाप तो बाप ही रहेगा, तुम लाख ढकने की कोशिश करो
- 57:07डका नहीं जाएगा। बस ये तो वैसे है जैसे गोबर के
- 57:11ऊपर मलमूत्र के ऊपर तुम सैंट छिड़क दो, इतर छिड़क दो।
- 57:17इतर की खुशबू जब उड़ेगी तो मलमूत्र का दुर्गन्ध फिर से
- 57:24तुम्हारी नाश्ता पुटों को सताना शुरू कर दो।
- 57:31पुत्र हिंसा हो ही नहीं सकती, यह अनुभव है, यह कार्य नहीं है किसी
- 57:40का कृष्ण की गीता से सीख लिया, किसी ऋषि मुनि ने कोई वक्तव्य कह
- 57:46दिया। उससे सुन लिया तुम्हारे गुरुदेव
- 57:49ने कह दिया मुझ से सुन लिया, किसी और से सुन लिया तो ये लीगलिसे
- 57:55नहीं होगा तुम्हारे लिए लीगलिसे जब होगा जब तुम स्वयं जाके उस
- 58:01स्थल पर देखोगे की वास्तव में हिंसा नहीं हो सकती।
- 58:07फिर तुम्हारा अहिंसक हो जाना मान्यता नहीं होगी, फिर तुम्हारी
- 58:14अहिंसक हो जाना जानकारी नहीं होगी ज्ञान होगा, दर्शन होगा मैं कहता
- 58:23हूँ तुम इसे मानो। ये तल है अपने अंतःष में उतरो और
- 58:31जान जानने से सब बंधन कट जाएंगे। जब तुम देखोगे सत्य को तो
- 58:40तुम्हारी सभी व्याधियां सब बंधन कट जाएंगे।
- 58:45देखो मानो मत कहनक गुरुवन रन काट। कह नानक गुरु बंधन काटे कह नानक
- 59:14गुरु बंधन काटे। कह नानक गुरु बंधन खाते कह नानक
- 59:36गुरु। बंधन काटे बंधन काट बिछुरत आन
- 59:49मिलायो बिछुरत आन। मिला आयो ठाकुर तुम सरनाई आयो
- 1:00:05ठाकुर, तुम सरनाई। उतर गए हो मेरे मन का संसार उतर
- 1:00:24गए हो मेरे मन का संसार। संसा संसा संसा उतर गयो मेरे मन
- 1:00:45का संसा। जब तै धर शण पायो जब तै धर शण
- 1:00:55पायो ठाकुर तुम सरनाई आए सन से तब खत्म होगा जब दर्शन करो।
- 1:01:07मानने से संशय खत्म नहीं होगा, मानने से संशय हीन नहीं होगे।
- 1:01:15संशय हीन सिर्फ एक और एक ही ढंग से होता है, वो होता है सत्य का
- 1:01:22दर्शन। सत्य का दर्शन करने के बिना संशय
- 1:01:29से मुक्त हुआ नहीं जा सकता। सत्य का दर्शन करना ही होता है
- 1:01:36तभी संशय खत्म होता है। धन्यवाद।