Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 May 25 - क्यों कहा जाता है कि संत के शरीर छोड़ने पर रोना मत? Deep Silence में सोचने से क्या होता है?
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- 0:01नितिन खोसला, जालंधर से बाबा जी प्राण मैं जब टोटल साइलेंस में
- 0:19बैठता हूँ। तो कभी कभी आपको डीप लविंग
- 0:27वाइब्रेशन अपने दिल से भेजता हूँ। क्या ये वाइब्रेशन आपको और सारे
- 0:38संसार को रिसीव हो जाते हैं? या यह एक फ्रूटलेस एक्सर्साइज़
- 0:49है? आइए इसे समझते हैं बहुत तलों की
- 1:03गहराइयों से। शांत हो के सुनना जब आप गहरा है,
- 1:10प्रश्न भी गहरा है। मैं रोज़ बोलता हूँ कि तीन तल
- 1:18हैं, पहला तल बुद्धि का। दूसरा तल हृदय का और तीसरा तल
- 1:29जहाँ तुम स्वयं विराज में हो, तीन तल पहली तल पे बुद्धि काम करती है
- 1:44दूसरे तल पे भावनाएं। बुद्धि सतुलतम भावनाएं हैं विचार
- 1:53सतुल भावनाएं हैं और भावनाएं सूक्ष्म तम विचार हैं और इन दोनों
- 2:03में आपसी तालमेल है। तुम्हारे विचार गलत तो तुम्हारी
- 2:09भावना ही गलत हो जाए, तुम्हारी भावना ही गलत तो तुम्हारे विचार
- 2:15भी गलत हो जाएंगे। और इन दोनों के साथ बंदे हैं
- 2:21हमारे सूक्ष्म शरीर और सुर शरीर। हम उनको बहुत गहरे से ले लेना।
- 2:29विचार और भावनाओं इन दोनों के साथ जुड़े हैं।
- 2:34हमारा सतबुल शरीर और हमारा सूक्ष्म शरीर और ये दोनों आपस में
- 2:41गुथे हुए हैं। वैसे ही जैसे विचार और भावनाओं
- 2:48आपस में गुत्थी हुई हैं, वैसे ही देयही यानी सूक्ष्म शरीर और देय
- 2:59यानी कि सोल शरीर ये आपस में जुड़े हुए हैं।
- 3:04संबंधित इसलिए जब्त हमारे मन पे तनाव आएगा, बुद्धि पे तनाव आएगा
- 3:12तो हृदय में भी विकृत भावनाएँ आ जाएंगी और विचार तथा भावनाओं के
- 3:19दूषित होने से। तुम्हारा शरीर भी विकृत हो
- 3:24जायेगा, देह भी और देह भी। ये चारों इंटर कनेक्टेड हैं।
- 3:31अब इसको पहले आप इसी को समझ लेना ये समझने जैसी बात है।
- 3:37मैंने कहा ये है, समझने जैसी बात है।
- 3:41यह अनुभव जैसी बात नहीं है। अनुभव तो आएगा।
- 3:45तीसरा रिज़ल्ट ये दो तल हम पहले इनको निपटा लें।
- 3:54पूछा है नितिन खोसला ने? कि जब मैं डीप साइलेंस में जाता
- 4:01हूँ तो एक तल पे जाके आपके प्रति लगिंग भावनाएँ विस्तृत करता हूँ।
- 4:21ठहलाता हूँ क्या वो आप तक पहुंचती हैं और इनका दूसरा मतलब क्या वो
- 4:31सारे संसार तक पहुंचती हैं क्योंकि मैं सीमित भी हूँ और
- 4:37असीमित भी हूँ? मेरे दो रूप हैं, लेकिन बहुत सारा
- 4:45पसंदी से के लिए वस्तु में रूप एक है।
- 4:54जे मैं। बा हर टोंडा जे है मैथन बा हर
- 5:14टोंडा। तंदर आना समाया जे मैं ते हूँ
- 5:35अंदर तोड़ा। त्यौहार की से दी माया।
- 5:53जी मैं तनु बाहर टूटा त अंदर कौन समाया जी, मैं तनु।
- 6:03अंदर कूड़ा तब बाहर किस भी मया अंदर तू मैं बाहर तू।
- 6:27अंदर तू मैं बाहर तू देखा हर थ तेरा साया।
- 6:49अंदर तू हैं बाहर तू वे खहर था तेरा साया।
- 7:07मैं भी तुम्हें हैं, तुम भी तुम्हें, मैं भी तुम्हें।
- 7:22तुम भी तुम फरता फरक न आया रखता फरक न।
- 7:46बाहर तू एम् अंदर तू एम् वेखां हर्थां तेरा सायां मैं भी मैं हाँ
- 8:05मैं भी तू एम् तूं भी तू। कैसे कह रहे हो दोनों एक बात मैं
- 8:12भी मैं हूँ, तुम भी मैं हूँ ये भी कह सकते हो, मैं भी तुम हैं, तुम
- 8:21भी तुम हैं। भृत्ता फर्क न नजर फल भृत्ता फर्क
- 8:30न नजर आया कोई भेद न हुआ इसे अभेद्य व्यक्त सब वेद की दीवारों
- 8:39का ढह जानो। भेद रहित अवस्था फिर से तुम
- 8:51अद्वैत भी कह सकते हो। सभी संतों ने शब्दावली अलग प्रयोग
- 8:59की। किसी ने गायन पद्धति अपनाई।
- 9:06किसी ने गद्दी की भाषा, किसी ने गद्दी की भाषा लेकिन महिमामंडन
- 9:13उसी एक का जो अज्ञात है, अभी ध्यान से समझना।
- 9:21संत लाकवार पुकारना है कि वह अज्ञात है।
- 9:31तुम्हें समझ नहीं आता वह अज्ञात है तो फिर उसे ढूंढना इसलिए तो
- 9:40फिर ये शब्द क्यों? ये शब्द बड़े क्षुद्र हैं, बड़े
- 9:44तुच्छ हैं। ये ढूंढना क्यों?
- 9:50ये ढूंढना बेकार है क्योंकि कहाँ ढूंढोगे एक अर्थ में देखा जाए तो
- 10:04वह सब जगह है रत्ता फेदना आया। ज़रा भी वेदना मिला एक अर्थ में
- 10:15देखा जाए तो सब जगह पर है। एक अर्थ में देखा जाए तो सब जगह
- 10:22तुम। एक दशा ऐसी आती है भीतर जाके जब
- 10:29तुम कहते हो हम ब्रह्मस्वा मैं ही मैं हूँ और एक दूसरी स्थिति भी
- 10:39आती है जहाँ जाके तुम कहते हो तत्वा मशीष यत तुम ही तू है।
- 10:48लेकिन दोनों में भेदक है, शब्दों का शब्दों से इसे समझाया नहीं जा
- 10:56सकता। यद्यपि समझाने की चेष्टा कर रहे
- 11:00हैं, इशारे भी कर रहे हैं। इशारों से पार भी जा रहे हैं।
- 11:07ऐसी ऐसी सूक्ष्म पद्धतियां निर्माण हो गई हैं कि जो तुम्हें
- 11:13शब्दों से पार घसीट लेते हैं, उन् मुनि अवस्था मन से पार ले जाना,
- 11:22भावनाओं से पार ले जाना। जब तुम बैठते हो साइलेंस में टोटल
- 11:33साइलेंस में वो मुकाम कौन सा मुकाम बहुत गहरा है ना तुम विचार
- 11:42में होते हो? ना तुम हृदय की भावनाओं में होते
- 11:47हो जहाँ डीप साइलेंस है, वहाँ तुम्हारा वजूद है, तुम वहाँ हो
- 11:56जाते हो रे बड़ी सुंदरता स्थिति है।
- 12:03काव्यात्मक से जहाँ से कविता फूंकती जहाँ से गीत झरता जहाँ से
- 12:16रस बिखरता, जहाँ से ठंडी मादक हवाएं चलती।
- 12:23और यहाँ से तुम तुम्हारा हृदय झूम झूम जाता है, तुम वहाँ पहुँच जाते
- 12:30हो और देखना कहने में तो ऐसा ही आएगा कि मैं बिखेरता हूँ।
- 12:42लविंग वाइब्रेशन प्यार भरी प्यार भरी सुंदर सुंदर सुरीली तरंगों
- 12:55को। क्या तुम्हें महसूस होती है?
- 12:59अब देखिए अगर तो तुमने उस स्थिति में जाकर जहाँ जाकर विचार खत्म
- 13:12जहाँ जाकर भावना है खत्म इन दोनों से पार।
- 13:17जो तुम्हारा अपना असली स्वरूप है, जिसे कृष्ण भगवान स्थिति प्रज्ञा
- 13:23कहते हो, तुम प्रज्ञा में सिद्ध हो जाते हो, बिलकुल नहीं मिलती
- 13:31लेकिन उससे कहीं दूर तुम वहाँ खड़े होते हो।
- 13:36और वहाँ खड़े होना भी बाकी शादी से कम नहीं क्योंकि अगर तुम वहाँ
- 13:43तक चले गए तो याद रखना किसी ना किसी दिन वह प्यार भरा पैगाम
- 13:50तुम्हें खींच ही लेगा तुम्हें खींच जाने को मजबूर होना ही
- 13:54पड़ेगा। ये अपनी प्यारी वस्तर है।
- 13:59वहाँ से जो तरंगें उठती है, वह बिल्कुल डीप तल से नहीं आती।
- 14:10इससे डीप व्यस्त तल के ये बात बड़ी गहरी है।
- 14:14जैसे जैसे मैं बोलूं वैसे वैसे उसके संग चलते रहें जहाँ से तुमने
- 14:23लगिंग वाइब्रेशन से भेजी, वहाँ तक ही पहुँचेंगे मैक्सिमम।
- 14:32और जब तुम वहाँ मिल गए, एक मिक हो गए, कैसे हम कहते हैं, यक सा हो
- 14:38गए उसके साथ एक आकार होगा, तो वहाँ से तो स्वाभाविक तिरंगे उठती
- 14:45हैं, समस्त अस्तित्व के लिए उठती हैं, सदा उठ रही है।
- 14:50हर वक्त उठ रही है। अगर वहाँ से उगते ही तरंगें बस
- 15:03तुम थोड़ी दूर हो, ज्यादा दूर नहीं हो, तुमने बुद्धि को क्रॉस
- 15:10किया, तुमने कृत्य को क्रॉस किया। तुम उस स्थिति में पहुंचे, जीस
- 15:20स्थिति में न विचार बचे न भावनाओं बचे तो ये तरंगें न तो भावनाओं
- 15:26हैं, न विचार है तो फिर क्या फेंकता है, क्या ब्रॉडकास्ट होता
- 15:32है, क्या इवैबरेट होता है? वह होता है तुम्हारे अपने होने का
- 15:38स्वरूप, वहाँ से निकलते हुए सूक्ष्म तरंगें जिन्हें हम आसानी
- 15:44तरंग है, अब इसका मोरल समझ लो जहाँ से उठेंगी तरंगें विस्तीरण
- 15:54होंगी। फैलाव ले लेंगे, वहीं तक पहुंचेगी
- 15:58वो तरंगे जितनी डीपेस्ट तुमने तरंगे बनाई उतनी डीपेस्ट वो मेरे
- 16:05तक पहुंचेगी और मेरे तक पहुंचने के बाद।
- 16:15हम तो फायदे होंगे, इसके एक तो तुम्हें फायदा होगा।
- 16:22सबसे बड़ा जीस पात्र में ऐसी ये तरंगें निकलीं।
- 16:29आपने देखा किसी पात्र में अमर्त्य डाल दिया जाए।
- 16:34तो कितना सुगंध कितना मृत्युंजय वातावरण होगा वहाँ उस पात्र में
- 16:48काल दूर दूर वो भागेगा जहाँ मृत्य होगा।
- 16:55और अगर उस पात्र में हम सिवरेज का गाँधी राज़ दें तो क्या होगा?
- 17:04वह पात्र से दुर्गंध आएगा, उस पात्र के पास से भी।
- 17:09लोग निकलना पसंद नहीं करेंगे। पहला पात्र उस गुलशन की तरह है,
- 17:19उस बाग की तरह है, उस बगीचे की तरह है जिसके गामन से उठती है
- 17:28खुशबू। जिसके गर्व से उमड़ती है सुगंधा
- 17:39और तुम्हें बड़ी प्यारी लगती है। देखिए नासा फूटे तो सबकी वही और
- 17:51जीस पात्र में होता है नफरत घृणा विचार।
- 17:58भावनाओं तो जैसा होता है वैसा ही वो पात्र हो जाता है।
- 18:08पात्र में गंदगी डालोगे, दुर्गंध आएगी, पात्र में अमृत डालोगे,
- 18:15सुगंध आएगी। और मृत्युंजय होगी वो वह काल को
- 18:21जीत लेंगे। बस तुम उस मृत्युंजय स्थिति से
- 18:26थोड़ा सा दूर हो अगर थोड़ी सी छलांग लग गई, बस एक कदम आगे तुम
- 18:33उस अवस्था में पहुँच जाओगे। जहाँ मृत्यु को जीत लिया जाता है,
- 18:38मृत्युंजय उसे कहते हैं, महामृत्युंजय जाप वहाँ पहुंचने के
- 18:45बाद जो गुंजार होता है, वो अमृतत्व से भरा होता है, उसी
- 18:52स्थिति को कहते हैं भगवान कृष्ण वो कटता नहीं।
- 18:55मरता नहीं गलतानी सोकता नहीं जलता नहीं, उसी स्थिति को वह मृत्यु जय
- 19:04मृत्यु वहाँ तक पहुंचती नहीं तुम्हारे कलह क्लेश, तुम्हारी
- 19:10जीवन की पद्धति शैली। वहाँ नहीं पहुंचती तुम्हारी
- 19:18चिंताएं चिंतनाएं वहाँ नहीं पहुंचती चिंताएं तो तुम समते हो,
- 19:27तुम सबको चिंता होती है चिंतनाएं। ये चिंत नहीं कहें ये राम राम
- 19:35राधे राधे गोपाल वह गुरु सतनाम, अल्लाह गॉड, ये चिंत नहीं है, तुम
- 19:45चिंतन करते हो, मनन करते हो। वह वहाँ तक नहीं पहुंचता।
- 19:53जब आग नहीं पहुंचती, वो तुम्हारी चिंतनय कैसे पहुंचेगी?
- 19:59तुम्हारे शब्द कैसे पहुँचेंगे? जब कोई तीर नहीं पहुंचता, शस्त्र
- 20:04नहीं पहुंचता तो तुम्हारे शब्द कैसे पहुँचेंगे?
- 20:10इसलिए उस स्थिति को शब्द तीर्थ कहा गया।
- 20:13वह शस्त्र से काटा नहीं जाता। शब्द तीर्थ है, शब्द वहाँ पहुँच
- 20:18नहीं सकते और तुम्हारी सारी हरदासी शब्द है यह अभावनाएं इससे
- 20:27पर कुछ भी नहीं। इसलिए तुम्हारी सब अरदासी व्यर्थ
- 20:35से धोते उस नाभ का काम नहीं करती जो अल्टीमेट है।
- 20:43उस तक पहुँच जाए जो किनारा है। इसलिए संत कहते हैं सब नवों को
- 20:51छोड़ दो। संत तुलसीदास कहते हैं कलयुग केवल
- 20:59नाम अधारा, सुमर सुमर नर उतर हीं पारा।
- 21:05बस वो सर्वरण का अर्थ चुग गए और नाम का अर्थ चुग गए।
- 21:09मैंने बड़े विस्तार से दोनों को नाम बताए स्मरण हो जाए अचानक तुम
- 21:16बैठो प्रे में काफी याद आ गई अचानक तुम बैठो प्रे में की क्या
- 21:23करोगे? तुम किसी काम नहीं करते हो, सीईओ
- 21:32हो, किसी पे मैनेजिंग डायरेक्टर हूँ, तुम कोई नक्शा बना रहे हो
- 21:39अचानक? वो याद आ जाती है।
- 21:49बहुत शायद माथे उन्हें भला क। अचानक ये क्या हो गया, उछल कयामत
- 22:20की इच्छा। ला गया उछलकर कयामत।
- 22:32की। साला गया वही।
- 22:40शान का खाया, लग गया वो ही ज़िन्दगी का सब।
- 22:57लग गया कोई शाम टेबल के ऊपर था नक्शा देख ले क्या किया जाए, कैसे
- 23:11मोड़ घोड़ किए जाए तुम मस्त हो। बहुत शादमा थे उन्हें हम भूल गए
- 23:19उन्हें तुम्हें सुमरण बताता हूँ सुमरण कैसे होता है, तुम तो याद
- 23:29को सुमरण कहते हो तुम याद खुद करते हो राम राम राम राम।
- 23:35नहीं, यश मर्णू उस प्रेमिका की तरह याद आई तुम सीईओ हो, तुम एमडी
- 23:43हो, तुम कुछ भी हो, तुम डीएमओ, तुम अचानक बैठे अपनी कुर्सी
- 23:49वॉल्वन चेयर के ऊपर। और सामने तुम्हारी नक्शा तुम कृषि
- 23:54प्रोजेक्ट का निर्माण कर रहे हो और तुम्हें याद ही नहीं है के
- 24:02अगले पल क्या हो जाएगा। तुम इन लकीरों को बांधने चले हो?
- 24:12और अचानक से तुम्हें उसकी याद आ जाती है।
- 24:15प्रेमी हो, प्रेमिका हो और तुम्हारी वितरिक जरूर सच्चा जाता
- 24:20है तो मदहोश हो जाती हो, तुम्हारी कलम छूट जाती है।
- 24:33तुम शांत हो जाते हो, तुम्हारा दिमाग काम करना बंद कर देता है।
- 24:41क्या हुआ कोई प्रेम की तरंग कहीं से आई और उसने तन बदन को घेर
- 24:49दिया। उसने तुम्हें चहुँ ओर से घेर लिया
- 24:54और तुम्हें अपना आपक हो बैठा है, मन मस्त हुआ हुआ।
- 25:07फिर क्यों बोला मानो मस्त हुआ फिर क्यों बोला?
- 25:18फिर हाथ में पेंसिल छूट जाती है। तुम लक्षण ही बना सकोगे।
- 25:25ये होता है। तुम करते हो सुमरण और सुमरण और
- 25:32स्वर्ण का ये पैरलल तो हो सकते हैं लेकिन मिलते नहीं है।
- 25:45पूछा है मैं ये जो लविंग वाइब्रेशन छोड़ता हूँ क्या वो
- 25:56आपको मिल जाती हैं? यह संसार उनसे प्रभावित होता है,
- 26:01बिलकुल होता है। अब देखिए क्यों कहते हैं लोग।
- 26:09कि नफरत मत फैलो पहले नफरत फैलाना, उस पात्र में गंदगी को
- 26:16डालने के समान जो पात्र तुम हो तुम्हारा मस्तिष्क अर्थ गंदगी का
- 26:24ढेर हो गया। इसमें ईर्ष्या, द्वेष, बदला।
- 26:30इनकी भावना इसमें ऐसा कोई क्षमा का भाव नहीं है।
- 26:40क्षमा का भाव आएगा जब तुम लविंग तरंगों से भर जाओगे।
- 26:48प्यार भरी रंगों से भरा हुआ मन क्षण करने में योग होता है।
- 26:53इसलिए शास्त्रों में लिखा क्षमा वीरस्य पोषणम वह व्यक्ति वीर
- 26:58कहलाता है, इसलिए भगवान महावीर को वीर कहा गया है।
- 27:05नाम उनका वर्धमान था। महावीर उनकी उपाधि थी, अलंकार था
- 27:14जो संतो को उन्हें देना पड़ा। वह वीर, जो क्षमा करता, वह वीर जो
- 27:22अपने अपराधी को भी क्षमा करते थे। कृष्ण कहते हैं, लक्षणों को देखना
- 27:30तुम्हें पता चल जाएगा। कौन संत कौन असंत यही रक्षण ईसा
- 27:38के हाथों में कीड़े ठोंकी जा रही है।
- 27:45बड़े ही दर्द में है। ज़रा सोचिये उस दशा को शरीफ के
- 27:53ऊपर ढंगे हुए हिस्सा बड़ी गुलमेख ठोंक दी गई है।
- 28:02लकड़ी की उस सलीप में और इतना भारी व्यक्ति उन कीलों से ठहर गया
- 28:10है। देखिये कैसा मकान होगा, कैसा
- 28:16दृश्य होगा? 170 सीक्लों का मानो इन किरों के
- 28:25सहारे खड़ा है, इसे चिपकाया नहीं गया।
- 28:33कितनी व्यथित करूण गाथा? क्या तुम्हारे हृदय में आंसू नहीं
- 28:40आते? क्या तुम्हारी आँखों में अश्क
- 28:45नहीं उड़ते? क्या दर्द से तुम्हारा जीरा कमता
- 28:49नहीं ऐसे एक व्यक्ति को तड़पा तड़पा के मारना।
- 28:59जिन्होंने तड़पा के मारा, उसका मुख्य कारण वो तो लोग थे ही लेकिन
- 29:07उन लोगों ने 30 दिनार में उसके प्रिय शिष्य उदास को खरीद लिया
- 29:13था। और जो दास एक बार पैसे के लालच
- 29:19में तो आज पैसे के लालच में तो आज के राजनीति आ जाते है।
- 29:26ये लो भाई वित्त मंत्रालय संभाले हम तुम्हें माफ़ कर देते है।
- 29:34तुमने लाख गुना किया माफ़ भगवान हैं, हम आओ थोड़ा त्रिवेणी संगम
- 29:45कर लो और उस पार आ जाओ हमारे साथ खड़े हो जाओ।
- 29:49जैसे हम दूध के नहाये वैसे तुम भी दूध के नहाये हो जाओ, लेकिन भीतर
- 29:56तो कुछ न बदला, बाहर का लेबल बदला।
- 30:01पगड़ी नीली से सफेद हो गई। यह सफेद से गैरवा हो गई।
- 30:06कोई फर्क नहीं पड़ता। हृदय न बदला, ईसा का हृदय बदल
- 30:16जाता है। क्यों बदल जाता है?
- 30:20इसका कारण है भीतर से उठते ही वो लगिंग मोबाइल अक्शैन।
- 30:28जो वो दुनिया के लिए फैलातें हैं उनका खुद का कल्याण हो जाता है और
- 30:34जितनी दूर तिलक जाती है वो लबिंग के तरंगें उतनी दूर तक के इलाके
- 30:41को इफेक्ट करते हैं। इसलिए मैं तुम्हें और बात बता
- 30:44दूँ। संत जब शरीर छोड़ता है तो उसके
- 30:51भीतर का देह ही विस्फोटित हो जाता है और उसके भीतर भरा है अमृत।
- 30:58वह उस पात्र की तरह बिखर जाता है। जब मांडा फूट गया तो उसमें जो है
- 31:04वो बिखरेगा। बांडा फूट गया, घड़ा फूट गया तो
- 31:11उसमें जो है वो बिखरेगा और उनके भीतर क्या है?
- 31:15अमृत अमृत फैलता है इसलिए संत जब छोड़ता है अपने शरीर को।
- 31:24वह बर्तन जब फूटता है तो तरंगें प्रेम की तरंगें विस्तृत होती
- 31:32हैं, फैलती हैं, फैलाव लेती हैं और आस पास की तरंगें इतनी मदद हो
- 31:39जाती है। तुम्हारी आँखों से अश्क बहने
- 31:46लगेंगे काहे के अश्क दो तरीके से बहते हैं जब दुख का इम्तहान हो
- 31:55जाए तब भी अश्क व्यक्त और जब सुख का इम्तहान हो जाए।
- 32:02तब भी अश्क रहते हैं तो संत के शरीर छोड़ने से सुख का अंत होगा।
- 32:10तुम्हारा आनंद का अंत होगा। जो आनंद तुमने कभी छठा नहीं था,
- 32:14आज वो भांडा फूटेगा। इसलिए संत को शरीर छोड़ते हुए।
- 32:22आसपास ही जो लोग होंगे वो प्रभावित हो जाएंगे और बहुत लोगों
- 32:28की राहें बदल जाएंगी। बहुत लोगों को भीतर इतना अमृत बरस
- 32:34जायेगा कि उनकी लाइफ ही बदल जाएगी।
- 32:37क्यों? कहा गया कि संत के शरीर छोड़ने पर
- 32:41होना मत? दुखी हो के मत रोना, क्योंकि ये
- 32:51बड़ा सुखद वातावरण है। अमृत का फैलना और तुम्हारा रोना
- 32:59तुम जब रोओगे तुम कंसीव नहीं कर सकोगे उस अमृत को।
- 33:05इसलिए स्थिर बने रहना उस स्थिति में यद्यपि मुश्किल होगा कोई दुख
- 33:12से रोएगा चिपकाहट है कोई आनंद से रोएगा।
- 33:19अहो भाव से रोएगा। लेकिन आंसू भरभस निकल आएँगे आँखों
- 33:25से लेकिन उस स्थिति में शांति के गरीब होना बड़ा यूज़फुल है।
- 33:35वो तुम्हारी जिंदगी को आमूलचूल अंतरंग तक वितरी तलों तक
- 33:39परिवर्तित कर जाएंगे। और वह जो तरंग की एक बूंद जिससे
- 33:48मैं आनंद कहता हूँ कि एक बूंद पी लो, सिर्फ वह बहुत मात्रा में तुम
- 33:53पी लोगे, तुम्हारा रोवां रोवां उसको पी जायेगा।
- 33:59और तुम तो क्षण बदलने शुरू हो जाओगे।
- 34:06क्या हुआ? गौतम के साथ?
- 34:09बहुत दूर तक जाती है ये तरंग वो तुमसे बड़ा प्यार था वर्धमान
- 34:18महावीर। उन्हें पता था ये चिपटा हुआ है
- 34:24किनारे पे खड़ा और जब मैं शरीर छोड़ूंगा तो यह अमृत कलश हटेगा और
- 34:36दूर दूर तनक उसकी तरंगे फैलेगी। अगर इसके सामने शरीर छोड़ दिया तो
- 34:46यह होयेगा शरीर नहीं छोड़ने देगा। इसकी चिपका हट मुझे भी बरबस शरीर
- 34:58छोड़ने से रोक सकती है। क्योंकि कुछ बंधन ऐसे होते हैं
- 35:04जीस शिष्य ने सारी उम्र सेवा की वह रोक सकता है उन्होंने दूर भेज
- 35:12दिया। दूर भेजने का कारण ही ये था।
- 35:19वह कोई करनाहीन व्यक्ति नहीं थे और जानते थे अगर ये पास होगा तो
- 35:25मुझे भी शरीर छोड़ने में थोड़ी सी तकलीफ होगी।
- 35:29यह चिपट जाएगा, यह ऐसा रोएगा, बुरी तरह से रोएगा और इससे अच्छा
- 35:36इसको भाई। और उन्होंने कहा आज भिक्षा तू
- 35:39लेके आएगा, आज कोई दूसरा से नहीं जायेगा, चला गया आहो भाव समझा कि
- 35:49आज मेरी ड्यूटी लग गई है सब पात्र उठा के चला सब गांवों से भिक्षा
- 35:55मांगना था। और बाद में वृक्ष के नीचे बैठे
- 36:04हुए वर्धमान ने पूछा पुत्र कौन सा नक्षत्र चला है?
- 36:19प्रभु हस्त नक्षत्र चला है। हस्त नक्षत्र में शरीर को त्याग
- 36:25करना उससे इतनी तरंगे प्रवाहित नहीं होती।
- 36:30ये समझना ये वैज्ञानिक कारण हस्त नक्षत्र में अगर कोई शरीर छोड़ेगा
- 36:37अमृत को फोड़ेगा कलश को तो उस कलश से झरता हुआ अमृत।
- 36:42थोड़ी दूर तक जायेगा, बस वहीं वहीं तक जायेगा ऐसा समझो।
- 36:47हस्त नक्षत्र में ऐसा अवगुण संत संतो के लिए अपगुण संसार के लिए
- 36:57गुण हस्त नक्षत्र में नहीं छोड़ना है।
- 37:04इससे अगला नक्षत्रण अब थोड़ी सी एक बात और बताते हैं।
- 37:14एक नक्षत्र करीब 1 दिन का होता है।
- 37:18काफी वक्त बीत गया था नक्षत्र को हस्त को।
- 37:22और एक घड़ी बाकी थी 24 मिनट तो उसके बाद चित्रा नक्षत्र आ जाता।
- 37:32हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाख, अनुराधा, चेष्टा ऐसे चलते हैं
- 37:36नक्षत्र करीब एक 1 दिन का। उसके बाद चित्र उसके बाद स्वाति
- 37:50जो स्वाति नक्षत्र में शरीर छोड़ता है वह बड़ा शांत रहता है,
- 37:56बड़ी दूर तलक उसके किरने जाते हैं।
- 38:00लेकिन हस्त से कहीं ज्यादा चित्रा, बढ़िया तो महावीर ने सोचा
- 38:081 दिन और विलंब कर देना ठीक ना होगा।
- 38:15मैंने आज भेजा ही श्री है। प्राण तो आज ही छोड़ने होंगे मटका
- 38:22तो आज ही फोड़ना होगा देही को आज ही मिलाना होगा देही तो खाक हो
- 38:31चुका था देही के साथ जो मैंने कहा चिंतन के घर किसी हुंध होती है।
- 38:37बस उसको सागर में उड़ेलना था, इतना सा काम करना था और जब वो
- 38:46छोटी सी चेतना की बौंद बौंद सामान्य संबंध में जब समुद्र में
- 38:52समा जाएगी इतना वृहत। आनंद का पैगाम वहाँ फैलेगा उससे
- 39:01तुम झूम झूम जाओगे, उससे तुम्हारी गुणवत्ता भीतर ही बदल जाएगी।
- 39:08संत जब छोड़ता है शरीर को उससे 3 दिन पहले व्यवस्था शुरू हो जाती
- 39:13है। प्राकृतिक।
- 39:15संत हुक्म देता है कि शरीर को मिटाने की व्यवस्था कर लो।
- 39:25प्रकृति प्रकृति को अलग होती है, उसके प्रकृति उपाय करना शुरू कर
- 39:31देती है, धीरे धीरे तोड़ना शुरू कर देती है।
- 39:35जैसे कहीं से इलेक्ट्रिक कनेक्शन तोड़ना हो तो जहाँ जहाँ से भी
- 39:40तोड़नी है तारे वहाँ वहाँ से हल्के प्रश्न कटाया जाएगा कि बाद
- 39:46में कट मार देंगे। उसी ढंग से सारी व्यवस्था इसको
- 39:52करने में 3 दिन लग जाते हैं। उसके बाद एक दम से मेन स्विच को
- 40:00ऑफ करना होता है। ये आपको समझा रहा हूँ आपकी भाषा
- 40:04में आज यही भाषा उपलब्ध है, इसलिए?
- 40:11मैं मजबूर हूँ आपको इसी भाषा में समझाने के लिए मरने की प्रक्रिया
- 40:17में 3 दिन लग जाते हैं 3 दिन इसलिए जैनियों ने रसम चौथा बनाया
- 40:26है, बस 3 दिन के बाद खत्म। रसम चौथा बिलकुल क्योंकि 3 दिन
- 40:35पूरे हुए तो उसके बाद कुछ भी ना बचा, बूंद समुद्र में मिल गई और
- 40:41अब इसको विदा करते है तो रसम चौथा जैनी में बना लेकिन सनातन इतनी
- 40:49दूर तक ज्ञान। सनातन से ज्यादा दूर तक इस मसले
- 40:55में पहुँच गए जैनी महावीर सनातन 13 दिन ले लेता है धीरे धीरे धीरे
- 41:04धीरे भूलने में भूलने में भूलता जाएगा, भूलता जाएगा।
- 41:10इधर उधर भटकेगा, शरीर को खोजेगा शरीर में फिर से आने की चेष्टा
- 41:14करेगा, इसलिए सनातन ने मुर्दे के दोनों पांव बांध दिए।
- 41:23अब ज़रा इस विज्ञान को देखना अगर मुर्दे के दोनों पांव हम बांध
- 41:27देंगे। तो नेगेटिव पॉज़िटिव एक हो गया,
- 41:33अब वो मुर्दा उसकी आत्मा चाहेगी भी तो शरीर में प्रवेश नहीं कर
- 41:39सके। अब ये मैंने जो कहा कि अगर आत्मा
- 41:50शरीर से बाहर ट्रैवलिंग कर रही है और वापस नहीं लौटी।
- 41:55तो फिर दोनों अंगूठों को चूदे ऑपोजिट ए आर जी नेगेटिव पोस्ट
- 42:01आदमी का तो औरत चूदे इन दोनों इनसे एस इससे एस चूदे।
- 42:10लेकिन हम तो बांध देते हैं कि यह आत्मस में प्रवेश ही न कर पाए।
- 42:15और नेगेटिव पोस्टी पहले से मिल गई।
- 42:19अब चाहने पर भी मुर्दा मुर्दा से चाहेगा क्योंकि अभी उसने पाया कुछ
- 42:24नहीं। अभी उसके लिए संसार सब कुछ अभी
- 42:27उसका जहाँ लूट गया, लेकिन 72 घंटे पहले से आहट शुरू हो जाती है
- 42:32मृत्यु की। संसारी को पता नहीं चलता, सन्यासी
- 42:36खुद आदेश देता है कि अब इकट्ठा कर लो सरसों, अब बचा तो कुछ है नहीं।
- 42:45देह ने भुगत लिया सब कुछ देहि गल गया रह गई वो बूंद जिसने समुद्र
- 42:53में। समाना है अब इस प्रोसेसर को खत्म
- 42:56करो तत्तिक्षण प्रकृति यवरात भ्रमण।
- 43:06इसका आदेश सुनकर वह अपनी प्रक्रिया शुरू कर देती है और इस
- 43:10काम में 3 दिन लगते हैं। बस यही 3 दिन थे जब नानक इस संसार
- 43:20से कटे रहे। जी एक सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन एक
- 43:26एवरी वे क्षमता समझाने का। अन्यथा 3 दिन नदी के अंदर डूब के
- 43:33रह जाना श्वास नहीं आएगा तो शरीर नहीं बचेगा।
- 43:36देखिये सिद्धांत संसार के सिद्धांत सबके लिए समान हैं, चाहे
- 43:45ज्ञानी है, चाहे अज्ञानी है। अगर ज्ञानी भी खोद गया तो भी वह
- 43:52जितनी व्यवस्था तक अपने देव को अपने स्वास्थ्य को रोक सकता है,
- 43:56उतनी व्यवस्था तक ही मौजूद रहेगा और जब श्वास होना बंद हो गया तो
- 44:01उसके सारे तंतु न्यूरॉन्स मरने शुरू हो जाएंगे।
- 44:08प्रक्रिया मरने की सेम शारीरिक क्योंकि शरीर की संगरचना सेम
- 44:13सिद्धांत सेम तो सांसारिक व्यक्ति के हम पांव के अंगूठे बाण देते
- 44:22हैं। क्योंकि संसारिक व्यक्ति लौटने की
- 44:27चिष्टा करेगा। अब देखिये अब दूसरी व्यवस्था में
- 44:33कैसे आशुतोष जी महाराज मैंने शायद दो ढ़ाई साल पहले एक वीडियो डाला
- 44:38था। मैंने कहा ये व्यक्ति कभी उठेगा
- 44:41नहीं। कितनों को और लेकर जाएगा इस भ्रम
- 44:45के होते हुए यह पता और मैंने सुना है एक साथ भी तो गई 3 दिन तक
- 44:57संभावना होती है लौट जाने की। लेकिन गृहस्थी की तो बहुत भी
- 45:03संभावना नहीं होती। गृहस्थी को तो कनेक्शन काटा होता
- 45:07है। प्रकृति में संत खुद अपना कनेक्शन
- 45:10काटने को आदेश देता है। यहाँ कुछ भी नहीं ऐसा हुआ यहाँ तो
- 45:15एक मिस हैपनिंग हो गई यहाँ निकलना था नाभि से।
- 45:21और महाराज निकल गए सहस्रा से सहस्रा से जब दे ही गल जाता है
- 45:26मैं आपको फिर समझा दू पहले बोला हुआ है और अकेली वो बहुत चेतना की
- 45:31रह जाती है तो वह निकलती है उसको रास्ता यही है।
- 45:37लेकिन अगर वो चाहेगा कि मैं देय ही को साथ लेकर निकल जाऊं तो फिर
- 45:43बहुत मामला खराब हो जाएगा। यही हुआ आशुतोष के साथ और मैंने
- 45:47तुम्हें कहा था वो कभी नहीं लौटेगा।
- 45:52अभी तक तो नहीं लौटा लौटने का इंतजार है।
- 45:56लौटने के इंतजार में ना जाने कितनी मम्मी से इजिप्ट के अंदर
- 46:03दफन की हुई हैं। कितने तुम्हारे मुसलमान और इसाई
- 46:09दफन की हुई हैं? एक कयामत आएगी, पर आत्म उठायेगा
- 46:14कोई कयामत नहीं होती। कोई परमात्मा नहीं उठता, कयामत
- 46:18होती है, जीते जी होती है कयामत उस प्रलय को कहते हैं जो तुम्हारा
- 46:25अहंकार मिट जाए, वह कयामत होगी तुम्हारे लिए वह प्रलय होगी
- 46:31तुम्हारे लिए एक गिजड़ के पीछे। शेर पड़ गया बहुत तेज भागा वो
- 46:40कहता देखो शेर भाई मुझे खा लेना लेकिन परले हो जाएगी मुझे खा खाते
- 46:47ही शेर बोला कैसे परला हो जाएगा कहता थोड़ी दूर तो चले जाने का
- 46:51मुझे दूर से समझाऊंगा तुम्हें कैसे हो जाएगा?
- 46:56उसने कहा चलो जब शेर इतना बुद्धिमान तो होता नहीं और शेर के
- 47:01ऊपर बैठने वाली सिंक वाहिनी कितने की समझदार होगी।
- 47:06समझलो जो शेर मास का आता है उसके ऊपर बैठने वाली की पूजा करने वाले
- 47:14लोग। दही और आलू खाते हैं।
- 47:20अब इन मूर्खों को बताएं क्या दुनिया को समृद्धि देने वाले
- 47:26लक्ष्मी उसका वाहन क्या बनाती है? उर्लू।
- 47:35और सबसे पहले पूजन करने वाले, सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क रखने वाले
- 47:42गणेश गण ईश प्रथम जिनकी वंदना होती है, उनकी सवारी का बनाती है।
- 47:51चूहा उनका वजन 1200 किलो इतनी मूड़ता को खंडित किया संतो ने
- 47:59लेकिन कमाल की बात है कि ना आप पर सुनार की हथौड़ी चली, ना लोहार का
- 48:07हथौड़ा चला ना ही किसी मजदूर का गण चला तुम्हारे ऊपर कुछ नहीं चला
- 48:13तुम्हारे ऊपर तुम बिल्कुल वैसे के वैसे हो गए इन्हें मूड कहते हैं
- 48:22ज़रा सोचो सींक वाहनी शेर के ऊपर बैठी और शेर तो घास नहीं कहता
- 48:28भाई। तो सिंह वाहिनी को जो ऊपर बैठी
- 48:35दुर्गा माँ इसको तो भरोसा ना पड़ेगा मांस क्या तर्क है
- 48:43तुम्हारे पास है? जवाब नहीं।
- 48:49दीज़ वर ओनली दी सिम्बोलिक, रेफ्रिजेंटेशन एंड अब्रेविएशन।
- 48:54यह प्रतीकात्मक चिन्ह है। जैसे हमने परमात्मा की एक छवि बना
- 49:00ली, मूर्ति बना ली। वह उस मूर्ति में नहीं आ गया, वह
- 49:05साकार नहीं हो गया। वह तो पर ब्रह्म निराकार है।
- 49:09उसका तो कोई आकार नहीं है, ना वो खाता है, ना उसको खाने की
- 49:13आवश्यकता है। तुम तो लड्डू गोपाल को खिला देते
- 49:19हो। मैंने कहा भाई ये जो खाता है ये
- 49:23निकलता कहाँ से है इसका वो दूसरा पार्ट कहाँ है?
- 49:29तो वक्त नाराज हो जाती है। मैंने कहा देखो ना तुम्हारे दिमाग
- 49:34में नहीं पाता इसको अमृत खिला दिया तुमने चलो इसने खा भी दिया
- 49:41तू ये निकलेगा कहाँ से? क्योंकि उसका आखिरी स्वत तो है
- 49:47नहीं। एनम फिर कहाँ से जाएगा तो इनको
- 49:55समझ नहीं आता ये बोमबत्तर जाते हैं जैसे ये बागेश्वर धाम वाले
- 50:00शेर मारते हैं। इनको समझ नहीं आता।
- 50:07की अब जवाब क्या दे? मैंने कहा तुम ऐसा करो, तुम्हारे
- 50:11पास हनुमान जी आते है मैंने हनुमान जी से पूछा हाँ से तुम
- 50:18बाबा तुम सो सकते हो, फिर मैंने कहा इनके गोठ लो।
- 50:24कहते गोठना को लग चुका है। किसी धार्मिक फैलाव को एक
- 50:34अंधविश्वास की तरह फैला देना संविधान के विरुद्ध है।
- 50:39धारा क्या लगती है? मैं कोई वकील नहीं हूँ, लेकिन ये
- 50:43सरेआम व्यक्ति कह रहा है। के हिंदू राष्ट्र बना देंगे और
- 50:47इसको कोई पकड़ते हैं। क्यों इसका आकार भाई है?
- 50:59यह कोई सुकरीब नहीं है जो उपद्रवी भाई को दंड देशकताएं बालीक कित
- 51:09बोलें अपनी मूड तब फैलाएंगे हम लाख बोलते जाएं इनकी अंधविश्वास
- 51:17और अंध श्रद्धा तोड़नी हम जानते हैं असंभव।
- 51:24चित्रा नक्षत्र आ गया। पता था कि चित्रा से आगे बिलकुल
- 51:30आगे स्वाति है जगत स्वाति सबसे बढ़िया नक्षत्र है।
- 51:34प्रण त्याग के लिए रहीम का एक दोहा भी है।
- 51:45कदली शीप भजंग, मुख स्वाति एक गुण तीन जैसी संगत बैठी है।
- 51:51तैसों ही फल दें एक स्वाति नक्षत्र के भीतर एक बूंद टपती
- 51:57आसमान से वह केले में सर्प के मुँह में शीप में पड़ जाए।
- 52:03तो एक जगह विष बन जाती है, एक जगह मोती बन जाती है और एक जगह पर बन
- 52:09जाती है स्वादिष्ट फर्क जैसी संकट बैठी है तैसों ही फल दें।
- 52:16स्वाति नक्षत्र सबसे शुभ है प्राण।
- 52:22जानते थे लेकिन बात तो गौतम के थे।
- 52:25एक व्यक्ति बिलकुल कगार पे है, छोटी सी आहट गुजर जाए, उसके पास
- 52:36बस इतनी सी आहट गुजर जाए। एक झोंका हवा का सर से रह जाए और
- 52:43वह प्रबुद्ध हो जाएगा। तो उसने कहा यहाँ इसके पास तो
- 52:51शरीर छोड़ना। ठीक ने उसको भेज दिया, वह वापस
- 52:53आया। पूछा एक घड़ी के बाद हाँ महाराज
- 52:58शुरू हो गया है। और प्रथम प्रहर में उन्होंने
- 53:01चित्रा के प्रथम प्रहर में प्राण छोड़ दिया।
- 53:06भीषण तिरंगे निकली और उस्तक को लुभान्वित करके और बहुत दूर खा
- 53:13गई। वह भागा।
- 53:16किसी ग्रामीण औरत ने बता दिया था तुम्हारे गुरूजी तो गए, शरीर छोड़
- 53:20गए, वह भागा सब भिक्षा फेंक दी उसने तेज़ी से भागा, रोता रोता
- 53:29भागा जाके देखा तो सब वही था। मुहर्त वत बैठे।
- 53:37भगवान महावीर बड़ा रोया, चलाया बड़ा रोया, चलाया एक छोटी सी
- 53:44परिचय दे गए थे, लिख कर अपने भाषा में रोएगा चिल्लाएगा बहुत कुछ जो
- 53:52इकट्ठा हुआ। मेरी क्लीनिंगनेस में वह बार
- 53:58निकलेगा और एक बार हल्का हो जाएगा।
- 54:00जब हल्का हो जाएगा तो पूछेगा मेरे लिए एक संदेश, चौबीसों घंटे पास
- 54:06रहने वाला व्यक्ति तो उनको ये छोटी सी परिचित मत।
- 54:13हरोया भड़ास निकल गया सब कैथरसिस हो गया चेतन अचेतन सब खाली चेतन
- 54:23अचेतन सब खाली रह के गया दही तो खाली हो गया बिल्कुल।
- 54:33बिल्कुल पॉइंट पे था वो उसको कहीं लेके नहीं जाना था उसका देही
- 54:40विलीन सब विलीन लेकिन एक मोह का सिर्फ एक मोह की चिपकाहट बन के रह
- 54:48गई तुम्हें नहीं पता तुम्हारी कौन सी चिपकाहट तुम्हें बांधे हुए?
- 54:53थोड़ा सा वक्त वक्त से ऑब्जर्व कर लिया था।
- 55:00उसने पूछा कोई संदेश पर्ची पकड़ाते हुए गुरूजी ने दे दिया
- 55:05पर्ची खोली, जल्दी से पढ़ा गौतम। नाव ने तुम्हें किनारे पे लगा
- 55:13दिया तने मैंने गुरु प्रेम ने गुरु की आज्ञा अनुसार तुम चले
- 55:22बिलकुल चले और तुम किनारे से लग गए हो अब छोड़ो नाव को किनारे पे
- 55:30कूद जाओ। बस तुम अपने मुकाम पे पहुँचे ही
- 55:34हुए हो अत्यदक्षण ज्ञान हो गया, बैठ गए, उन्होंने भी प्राणी छोड़
- 55:44दिया। गौतम गौतम भी प्रबुद्ध हो के
- 55:48प्राणी छोड़ दिया। दे ही पहले से ही गायब था दो गाय
- 55:54एक बार में कुछ बस एक अगड़ी के बाद समझ लो दो बूंदें इकट्ठी
- 56:04समुद्र में समा जाना शायद इतिहास की प्रथम वार की घटना।
- 56:10ऐसे कि वो हुआ नहीं। 3 दिन पूछा है ये बाबा 3 दिन तक
- 56:23कैसे रहे? पानी के भीतर और पानी के भीतर
- 56:26रहने का महत्त्व क्या है? कोई महत्त्व नहीं, पानी में रहे
- 56:29ही नहीं, पानी के किनारे बैठे उनके पांव।
- 56:33शीतल जल का आनंद ले रहे थे और उनके भीतर क्या हो रहा था, ये कोई
- 56:38देख नहीं रहा था। पास में मृदाना भी मृदाना भी
- 56:42सुगंध से भरपूर था क्योंकि जब टूटती है सब तारे तो पास वाला
- 56:49व्यक्ति तो सबसे ज्यादा। प्रभावित होता है और यह
- 56:58एनलाइटनमेंट की घटना थी। यह शरीर विसर्जन की घटना थी।
- 57:02ध्यान रखना शरीर विसर्जन की घटना नहीं।
- 57:05अब वो तो बाद में करतारपुर में आई थी।
- 57:09अभी तो वो प्रबुध हुए थे और प्रबुद्धता के भीतर बहुत कुछ कटता
- 57:15फटता है। वो उसको कह रहा था, हल्की हल्की
- 57:18मदहोसी उसके ऊपर भी छानने लगी। उसको भी समझ नहीं आया कि मुझे
- 57:23क्या करना चाहिए? कुछ देर की बेहोशी के बाद।
- 57:27उसे समझाया कि गांव वालों को खबर देनी चाहिए।
- 57:30आंधी रातों की नानक तो बाहर नहीं, तीन दिनों तक इंतजार किया गया।
- 57:41तीन दिनों के बाद वो बाहर आए प्रभुद होकर बाहर आए 72 घंटे।
- 57:46साईं बाबा के जीवन में भी ऐसा उल्लेख मिलता है।
- 57:50शरीर छोड़ के चले गए 72 घंटे तक इसका इंतजार करना।
- 57:54अगर मैं ना लौटूं तो मुझे दफन कर देना, आखिरी संस्कार कर देना,
- 58:02अंतिम संस्कार कर देना। 72 घंटे के बीच में लोग आएगा।
- 58:10ये 72 घंटे बड़े कीमती होते हैं। यह एक ऐसा समझो की परमात्मा के
- 58:18बनाए हुए संसार का एक विधान है। नियम है यह अध्यात्म का एक नियम
- 58:22है जैसे संसार के नियम है। अध्यात्म का नियम शरीर और चेतना
- 58:30के संबंध के लिए तो आत्म ज्ञानी होकर बाहर आए।
- 58:36आँखें खोलीं, 3 दिन के बाद आँखें खोलीं, सभी खुश हुए लेकिन नानक वो
- 58:44न थे। जो गए थे वो न थे।
- 58:51पूर्ण बदलाव हो गया था, उससे पहले उन्होंने सटोरी की झलक देखी और आज
- 58:57वो प्रबुद्ध हुए। इसलिए 3 दिन पूछा तुमने?
- 59:04कि 3 दिन का महत्त्व क्या है? यही महत्त्व है।
- 59:06ये एक नियम है। आध्यात्मिक व्यक्ति के भीतर वह
- 59:11बंधन टूटते टूटते टूटते टूटते स्थित प्रज्ञ की स्थिति तक आ जाना
- 59:18उसमें 72 घंटे लगते हैं। पहले से डिटरमाइन्ड होता है कमिंग
- 59:29इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज बिफोर किसी का जी शब्द हैं किसी महान
- 59:36पुरुष का। तो वह अपनी शैडो बिखेरने लगती है।
- 59:42जब शरीर से टूटेंगे कनेक्शन जहाँ जहाँ तुम्हारी वासनाएँ चिपती हुई
- 59:47हैं वो टूटेंगे तो एक मधुर जाल निकलेगा।
- 59:50सुगंध का वह वातावरण विस्तीर्ण होगा, प्यार का पैगाम लिए और साथ
- 59:57वाला व्यक्ति। सम्मोहित हो जाएगा।
- 1:00:01जब समाधि घटित हो रही हो, प्रबुद्धता हो रही हो तब भी उस
- 1:00:07व्यक्ति के करीब होना बड़ा शुभ होता है और जब परम समाधि हो रही
- 1:00:12हो जिसे महापरिनिर्वाण कहते हैं। कैवर्ली की परम अवस्था जहाँ
- 1:00:19व्यक्ति अकेला हो जाता है, उसके पास होना बड़ा क्षोभ है, आनंददायक
- 1:00:27है और स्वभाग्य की बात है और तीनों तत्व।
- 1:00:35तीसरे तल पे तो कोई वाइब्रेशन आती नहीं।
- 1:00:39ये देखिये वहाँ से कोई वाइब्रेशन नहीं उठती क्योंकि वाइब्रेशन उठने
- 1:00:45को जाए कि कहाँ सब जगह वो ही तो है प्रेम इधर से उधर तो होता
- 1:00:50नहीं। प्रेम तो ठोर की ठोर रहता है।
- 1:00:55दादू दूजा हो रही दूजी मन की दौड़ दौड़ गई संशय मटा।
- 1:01:01वस्तु ठोर की ठोर जहाँ जो कण है वहाँ वह रहेगा बस तुम कहाँ से लौट
- 1:01:11के आए कितनी दूर से तुम सैर सपाटक करके आए इस संसार में?
- 1:01:15तुम्हें आते देर एवेर हो सकती है, तुम जितनी दूर निकल गए उतनी दूर
- 1:01:21आने में भी लग सकती है, लेकिन वह तुम्हें वहीं मिलेगा।
- 1:01:26जीसको छोड़ के जहाँ गए तो चेतना कहीं जाती आती नहीं है।
- 1:01:33श्री भगवान कृष्ण ने कहा कि आत्मा न जन्मति है, ना मरती, ना गति
- 1:01:40करती है, कहीं नहीं जाती जाती। वह तो अकंप है, निष्कंप है, वह
- 1:01:46परम ठहराव है, वह कहीं नहीं जाती, कहीं कहाँ जाएगी?
- 1:01:52क्योंकि जरे जरे में तो वो है जब जरे जरे में वो है तो उसके जाने
- 1:01:57का मार्ग देर इस नो स्पेस टु ट्रांसफर बताइए।
- 1:02:02कहाँ जाएगा? अजय उठ कर अब कहाँ जाइएगा जहाँ
- 1:02:20जाइएगा हमें। आइएगा अजय ही रोक कर अब कहाँ
- 1:02:34जाएगा जहाँ जाएगा हमें। बाहरों में सितारों में,
- 1:02:52ब्राह्मणों में, गैलेक्सीज़ में तुम्हारी आकाश गंगाओं में सब जगह
- 1:02:58धरे धरे में, रोम डोम में वही है। अंदर भी तुम्हें बाहर भी तुम्हें
- 1:03:12रत्ता फर्क न नजर आया, कोई फर्क नहीं जो देखने वाला चाहिए।
- 1:03:19आँखें देखने वाली हैं जो तुम्हें रंग पहचान में आएँगे।
- 1:03:23और आँखें बंद करके अंधा तो रंग नहीं पहचान सकता, तुम अंधे हो तुम
- 1:03:31रंग पहचान न सको, मैं उन लोगों को कहता हूँ जिनकी आँखें हैं नहीं।
- 1:03:42वो रंग को पहचानने की चिष्ठा करते हैं और बुद्धि और हृदय से रंग
- 1:03:47बेचाने नहीं जाते, जैसी आँखों के बिना रंग नहीं दिखते, वैसे ही
- 1:04:00दिव्य जिक्षु के बिना। वह विस्तार नहीं देखता जो
- 1:04:06तुम्हारा अपना है। बड़े मज़े की घटना घटती है।
- 1:04:09आखिर में क्या घटती है कि एक छोर पे तुम जब जाते हो, मेरे साथ यही
- 1:04:19हुआ? तो वहाँ जाकर जैसे ही आँखें
- 1:04:25तुम्हारी खुली तो सब भौतिक जगत रहेगा।
- 1:04:29यह बड़ी अद्भुत घटना है। यद्यपि तुम विश्वास मत कर लेना,
- 1:04:35तुम्हें वो कभी नहीं होना भी नहीं चाहिए।
- 1:04:39इसका आनंदम मानो। उस स्थिति में स्वयं उतरो जा के
- 1:04:43देखो, क्या यह है सिर्फ दिमाग से और हृदय के भाव से रंगों को
- 1:04:51पहचानने की कला न सीखो, यह बेकार है, आँखों को खोलने का इंतजाम
- 1:04:57करो। जो रंगों को अच्छे से बखूबी से
- 1:04:59देख सकती है। पहचान सकती है तो क्या होगा?
- 1:05:04सबसे पहले ये भौतिक जगत का फैलाव यह ठोसत्व सोलिडिटी यह आपको भूरती
- 1:05:14हुई नजर आयेगी। वाष्पी भूत होते।
- 1:05:17हल्के हल्के कान टूटेंगे और ठोस से ये बदलेगी जैसे बर्फ़ में से
- 1:05:26वाष्प निकलता है। ऐसा कुछ तो में ज्ञात होगा।
- 1:05:30श्वेत कण ये कण श्वेत होते हैं ये ध्यान में रखो।
- 1:05:37तो ये ठोसत्व, पिघलेगा, पिघलता, पिघलता पिघलता यह संसार का ठोसत्व
- 1:05:46है तो असली लेकिन क्योंकि तुमने अपना विस्तार देखना कि मैं वास्तव
- 1:05:53में कौन? तो उसके लिए यह प्रोसेसर होगी।
- 1:06:00मेरी भी यह प्रोसेसर एक ही बार में घटी, यह बड़े मज़े की बात है।
- 1:06:06मुझसे लोग पूछ लेते हैं बाबा ये आपको दो घटनाएं हैं।
- 1:06:10एक बार की घटी बिलकुल एक बार की घटी।
- 1:06:14पहले मैं अपने अंतःस्व में उतरा स्वयं को पहचाना, स्वयं को
- 1:06:20पहुंचाना पहचाना तो मुझे सब नजर आया ये दीवारें ये सामने बनी
- 1:06:28बाज़ार टॉम ये बैकसाइड के अंदर नंबरदारों की दीवार।
- 1:06:37यह दाएँ हाथ को गौशाला, मंदिर और दाएँ हाथ के इधर से गौशाला जहाँ
- 1:06:43पर गायें बिलकुल बेक साइड में, इधर उगी हुई फसल ज्वार और छोटे
- 1:06:52छोटे। यह बड़े बड़े द्रष्ट सामने भावना
- 1:06:56वृक्ष बिल्कुल साफ था। मैं चला जा रहा आदेश जैसे भीतर से
- 1:07:02किसी ने घेर लिया। मुझे पता ना था यह होगा पता भी
- 1:07:07नहीं होता। आतंक हल्का, हल्का स्वरूप सा तो
- 1:07:10रहा दो 3 दिन। लेकिन ये नहीं पता था कि ये होगा
- 1:07:15क्योंकि पहले कभी हुआ हो तो पता चला तुम्हें पहले कभी इस अज्ञात
- 1:07:20का दर्शन हुआ तो तुम्हें इस बात की समझ आए।
- 1:07:23अनीसा समझ आएगी कैसे अब मैं ला कह लूँ संत ला कहने की उसका हाथों
- 1:07:30में भाग डोर सुन तो। लेकिन तुम्हारे मन की तो वृत्ती
- 1:07:33ऐसी कि अज्ञात के हाथों में बागडोर हमें नहीं देना है, इट्स
- 1:07:37रिस्की वरी, रिस्की बात भी ठीक है, मन तो यही कहेगा, दिमाग तो
- 1:07:43यही कहेगा कोई भी दिमाग यही नहीं कहेगा कि छोड़ दो इट इस नॉट
- 1:07:50रिस्कलेस। इट इस ए रिस्की लेकिन घटित हुआ ना
- 1:07:59मैंने छोड़ा ना मैंने सोचा एकदम से विचार ठहर गए जैसे फिर वो
- 1:08:06निचाता है बाप उठा पांव रख लो। रख लिया।
- 1:08:12दूसरा पांव रख लिया शरद पूर्णिमा की औरत फुल मून था उडक प्यारा भाग
- 1:08:21हुआ ऊपर देखो ऊँगली उठाओ ऊँगली उठाई, चंद्रमा के साथ लगी ठंडा
- 1:08:27बना इतनी दूर। 3,84,000 किलोमीटर दूर है चंद्रमा
- 1:08:32और मैं कितनी दूर, मैं तो बहुत दूर हूँ, इतना ही दूर हूँ और पांच
- 1:08:40फुट छः इंच का कद कैसे छू पाऊंगा उसको?
- 1:08:47लेकिन उस दिन ये करामत भी हो गई वह ठोस मून मेरे पास आ गया।
- 1:08:54कैसे आया मैं इसका जवाब नहीं दे सकता।
- 1:08:59मैं समझता हूँ कि मेरा विस्तार होना शुरू हो गया।
- 1:09:02विस्तृत अवस्था में। मेरे शरीर की अंगुली ने चंद्रमा
- 1:09:07को छुआ। ठंडा था, बहुत ठंडा था, लेकिन
- 1:09:12पूर्ण व्याख्या इसे मत समझ लेना, जिसे मैं नहीं वर्णन कर सकता,
- 1:09:18उसको सिर्फ आपको अंदाजन बता सकता हूँ तो पहले कोई सोलिडिटी।
- 1:09:26पहली ये सारा ठोस अब तुम्हें ये किताबों में तो मिलेगा नहीं,
- 1:09:32क्योंकि किताबों में कितनों के साथ घटाएं, तुम जान ही सकते हो,
- 1:09:39ये शंकराचार्य की मूर्खता देखकर समझ आ जाता है।
- 1:09:44कि जब तुम्हे पता लग गया कि तुम विस्तरित हो अखंड भ्रह्मंड में और
- 1:09:52तुम ही भ्रह्मंड हो जत्थाकुंड तथा भ्रह्मंड क्या है?
- 1:09:57संतो ने बोला तो बहुत शब्दों में लेकिन हम समझ नहीं पाए।
- 1:10:02तो वे काहे कामना करेगा कि मैं पोत ही लेकर और मुंडन मिश्र के
- 1:10:08साथ या भारती के साथ विवाद करूँ? परमात्मा कैसा है?
- 1:10:15क्या ये व्याठ्यान में आता है? क्या ये शब्दों में आता है?
- 1:10:18फिर मैं इसे मूर्ख कहूँ या समीगार कहूँ?
- 1:10:23लोग मुझे कह देते हैं, आप देखो इतने बड़े औरदे के ऊपर मैंने क्या
- 1:10:26ओहदा होगा तुम्हारे हिसाब से मेरे हिसाब से कोई औरता नहीं, मैं
- 1:10:30बिलकुल सत्य बोल रहा हूँ। मेरे अनुभव से यह मूर्ख है मूर्ख
- 1:10:37यानी अज्ञान। इसने वो तल नहीं छूआ।
- 1:10:41जहाँ जाकर व्यक्ति अतिविस्तीर्ण हो जाता है और अतिविस्तीर्ण कहा
- 1:10:47जहाँ जाकर व्यक्ति उदघोष करता है, अहं ब्रह्मस्म जब तुम ब्रह्म हो
- 1:10:51गए हो, जाके कागजी थोथे पुलाव हैं, तुम्हारे तुमने कहा अहं
- 1:10:59ब्रह्मस्म? भ्रम कहाँ हुए?
- 1:11:03तुम तो अभी अपने ज्ञान का फैलाव करने में जुटे हो, झंडा उठाए हो
- 1:11:10के पकड़े कोई उसको मेरे साथ शस्त्र करें, शास्त्रों में मिल
- 1:11:14जाएगा तुम्हें जीवन इन निर्जीव शास्त्रों में तुम्हें जीवन मिल
- 1:11:18जाएगा। क्या शास्त्र बोलेंगे?
- 1:11:21तुम्हारी बात का? जवाब किस शास्त्रों में बोलने की
- 1:11:25क्षमता है? वो तो पढ़ने पड़ेंगे तुम्हें और
- 1:11:28फिर अर्थ अपने दिमाग से निकालोगे और तुम्हारा दिमाग वही अर्थ
- 1:11:33निकालेगा जो तुम जानते हो पहले से ही अज्ञात के लिए कोई पता नहीं है
- 1:11:38तुम्हें क्या है? यह तो वही बता पाएगा जिसने वह
- 1:11:45प्रेम के तल छुए तो सबसे पहले मिट गई सोजत ड्यूटी।
- 1:11:55यह हट गया सा ठोस संसा। धीरे धीरे धीरे धीरे देखिए, साढ़े
- 1:12:03आठ के करीब का वक्त होगा। घड़े भी थे।
- 1:12:06मेरे पास इस घटना के साक्षी होते हैं।
- 1:12:10भगवान शिव की मौजूदगी में ये घटना घटी।
- 1:12:13ऐसी घटनाओं को देखने के लिए शिव को भी कैलाश से आना पड़ता है।
- 1:12:18ओशो भी संदेश चला गया, क्योंकि संदेश तो समस्त ब्रहमंड में
- 1:12:23जाएगा, अस्तित्व में जाएगा। मैंने वो से पूछा जब जेगानी आई
- 1:12:29मैंने कहा संबोधि के अक्षर में जब मैं विस्तृत हो के फैल गया तो
- 1:12:36क्या तुम थे मैं नहीं था? मुझे पता चल गया था कि कोई आज
- 1:12:44भ्रम हो गया है लेकिन मैं आई वास् इन दी जेल मेरे हाथ घड़ियाँ लगी
- 1:12:51हुई थी। मुझे नहीं पता वो कब हुआ।
- 1:12:56ओशो के शीशे की तरह से जानते। वह वक्त का मिलान कर सकेंगे।
- 1:13:0028 अक्टूबर रात्रि को करीब साढ़े 8:00 बजे मैंने शंकर जी से पूछा
- 1:13:11वक्त क्या था, मुझे पता है करीब करीब साढ़े आठ तक।
- 1:13:16लेकिन शंकर जी कहते हैं, उस वक्त में कौन सा वेला होता है?
- 1:13:19वक्त का वक्त तो ठहर जाता है, वक्त तो रुक जाता है, बस मस्ती ही
- 1:13:26मस्ती होती है सब तरफ इतनी मस्ती के खो जाता है व्यक्ति जीसको मान
- 1:13:33सरों पर मिल गया। वह फिर वक्त का हिसाब कहाँ
- 1:13:39रुकेगा? देह भान तक भूल जाता है, वक्त रुक
- 1:13:44जाता है इसलिए टाइमलैसनेस एक और ये दो बताई रिकग्निशन, बुद्धत्व
- 1:13:52की नहीं वक्त का? करीब साढ़े आठ का था।
- 1:13:57ये मुझे ज्ञात सोर्स से पता चला फैला और 2:00 बजे के करीब था, जब
- 1:14:04उस व्यक्ति किसान ने जो के हल जोतने के लिए आया था, उसने मुझे
- 1:14:09पीठ के ऊपर थपथपाया था। मैं स्टेचू मूर्तिवत् खड़ा था।
- 1:14:14कितने घंटे पिया उसने कितने घंटे में धीरे धीरे धीरे धीरे बिल्कुल
- 1:14:21कछुए की गति भी शायद हिस्से थे और बिल्कुल आखिरी पड़ाव पर पहुंचने
- 1:14:28के बाद सब खो गया। छक हो गया कुछ न बचा एक बचा वो
- 1:14:38आनंद और आनंद और आनंद और आनंद और उसको जानने वाला कोई परम आनंद में
- 1:14:47डुबकी दिए परम शीतलता के भीतर। गोते खाये हुए वह खुद ही खुद को
- 1:14:57देख रहा है। इसलिए उस अवस्था में जाके जनक
- 1:15:02स्वयं को प्रणब करते हैं। जनक कहते हैं मैं स्वयं को प्रणब
- 1:15:07करता हूँ। ये क्या तुक हुई?
- 1:15:12क्षुद्र विराट को प्रणाम करता है बस ये मतलब है इसका जनक शुद्र हैं
- 1:15:18शारीरिक रूप में और वहीं वह सभी शुद्र हैं जो ब्राह्मणीय हुए।
- 1:15:25जो अभी फैले नहीं वो चाहे शंकर हचारे को ना।
- 1:15:29जिन्हें अपने अनंत विस्तार का पता नहीं लगा वो शुद्र ही हैं।
- 1:15:33वो ब्राह्मण के घर में जन्म ले सकते हैं लेकिन होते शुद्र ही
- 1:15:37हैं। फैला ऐसा फैला जब किस्से मैं
- 1:15:48विवाद करूँ, मैं सदा ही कहता रहूँ।
- 1:15:51मेरे पास पोत ही लेके लोग आ जाते बाबा विवाद करें शस्त्रार्थ करें
- 1:15:55मैं उनके चरण झूम लेता हूँ, देखिए यही तो है ना आपकी इच्छा मुझको
- 1:16:00जीतना चाहते हो मैं हार गया और चुप हो जाते जलपान कर लो, बैठो
- 1:16:07विश्राम कर लो। और घर चले जाओ, ये पुतिया को
- 1:16:12क्यों बगल में दवाई कर रहे हो? मैं तुमसे जितना ही नहीं चाहता आई
- 1:16:22ऍम ऑलरेडी वेधर। मुझे तुमसे जीतने के लिए आवश्यकता
- 1:16:28है। मैं क्यों उसके बारे में शास्त्र
- 1:16:30करूँ? जिसके बारे में शास्त्र हो नहीं
- 1:16:32सकता। इतना पता नहीं था इतना पता नहीं
- 1:16:38था जिससे तुम शंकराचार्य कहते हो। कि मैं विस्तृत हूँ, एहम
- 1:16:49ब्रह्मस्म के तोहफा यह शब्दों का फैलाव था एक लिफाफा था लिफाफा
- 1:16:56लगता है मुझे जब बोले मैं कोई संकोच नहीं, इसको ये नहीं पता कि
- 1:17:03सारी शक्ति मेरी एम ओमनी पोटेंट सर्वशक्तिमान पर सर्वव्यापक मैं
- 1:17:10सब जगह मौजूद वह अपनी ख्याति को सर्वव्यापक करने में परिश्रम
- 1:17:16क्यों करेगा? झंडा उठाए कि मेरी प्रज्ञा को
- 1:17:21सार्वभौमिक मान्यता मिले। मैं तो उसे बुद्धू को लूँ।
- 1:17:27तुम चाहे कुछ भी कहते रहो सर वक्त सब जान लिया क्योंकि सब जगह वही
- 1:17:37है और वो साक्षी है जो भी जहाँ भी खोजा गया और जो भी जहाँ भी खोजा
- 1:17:44जाएगा वो उसको सब पता है। इसलिए सर्वज्ञ हो गया, सर्व
- 1:17:49व्यापक हो गया, सर्वशक्तिमान हो गया।
- 1:17:51वो कोई शक्ति जुटाने की चेष्टा न करेगा, वह नहीं कहेगा।
- 1:17:56भीड़ इकट्ठी कर लो, क्योंकि जो जान गया सारी शक्ति, मेरी सारी
- 1:18:02शक्ति मैं। और शक्ति जिसे पता चल गया कि सारी
- 1:18:07शक्ति में वो ही बोल सकेगा, इतनी कन्फर्मेशन बादशाह अहम तोम सर्व
- 1:18:14पापे भव मुख्य श्यामी मासूचा। सर्वथर्माण प्रत्यक्षमामीकम शरणम
- 1:18:22ब्रजमाम एकम, मैं एक हूँ और मैं एक ब्रह्म हूँ, मेरा विस्तार
- 1:18:29ब्रह्म है एको हम बस मैं ही हूँ तू मेरी शरण में आ जा सब घट लिया
- 1:18:37जहाँ तक उसने ले जाना था। ले गया अपना विस्तार पता चल गया
- 1:18:42कि जहाँ भौतिकता की ये सीमाएं लांघ जाता है व्यक्ति वहाँ
- 1:18:48तुम्हारा असरी विस्तार तुम्हारे सामने आ जाता है अखंड वह कोई खंड
- 1:18:52खंड नहीं कितना है कोई कौन मापेगा मापने वाला रहा नहीं माँ?
- 1:18:58कौन जानेगा कितने माइल्स मैंने यात्रा की कितनी देर लगी ये भी
- 1:19:02नहीं पता कुछ पता नहीं, बस शब्द खो गया भक्त हो गया होना खो गया।
- 1:19:18टाइमलेस स्वयं का होना जो मैं मानता था, मैं कौन धूल धूसरित हो
- 1:19:26गया मैं वो व्यापक सर्व व्यापक हो गया जिसकी न तो कोई।
- 1:19:33मेज़रमेंट है ना कोई व्याख्या है किसके लिए बहस करते हो आप?
- 1:19:40एक टांग वहाँ से पकड़ ली, एक टांग वहाँ से पकड़ ली ये देखो शास्त्र
- 1:19:44मिलिका वो कहता है ये देखो, इस शास्त्र सब मूर्खों की भाषा है
- 1:19:49मूर्खों को मुर्खों से लड़ा रहे हो।
- 1:19:52और मूर्खों की भाषा को फैला रहे हो और तुम चेष्टा करते हो पर
- 1:19:56आनंदमय हो जाए। ये कैसे होगा भाई इट इस इम्पॉसिबल
- 1:20:04ये तुम्हारे शब्दों का जवाब। कि तीन तल मैंने बताई तीसरे तल पर
- 1:20:11जाकी तो वह सर्वस्व हो जाता है, लेकिन तुम्हारा फायदा होगा अगर
- 1:20:20तुम्हारे पात्र के भीतर से आनंद की करनी जरेंगी, मानवता के प्रति
- 1:20:26या संसार के प्रति या ब्रह्म के प्रति।
- 1:20:29किसी व्यक्ति के प्रति या सर्व के प्रति तो तुम्हारा पात्र अवश्य ही
- 1:20:35अमृतमय हो जायेगा, वह अद्भुत सुगंति से झूमेगा, तुम्हारा
- 1:20:41कल्याण हो जायेगा और जिसका पात्र गंदगी से, ईशा से, द्वेष से, बदले
- 1:20:46की भावना से। गंदा हो गया है, उसमें तो मजबूर
- 1:20:53आएगा, दुर्गंध आएगी। इसलिए अगर तुम उस अवस्था में टोटल
- 1:20:58साइलेंस में उतरते हो और मुझे आप विस्तृत करते हो भावनाओं को।
- 1:21:08लविंगली भावनाओं को इमोशन्स को तो इसका पहला फायदा तुम्हें होता है।
- 1:21:16दूसरा फायदा मुझे भी होता है क्योंकि मेरे भी अचेतन में वो
- 1:21:21तरंगे आके भीड़ हो जाए। अगर मैं किसी का बुरा करूँगा, वह
- 1:21:25तरंगे मुझे मुझ के भीतर आके। जुड़ जाएंगे ऐसा मत समझना की मैं
- 1:21:31माफ़ कर दिया जाऊंगा नहीं या थोड़ा समझ लेना मैं किसी के बारे
- 1:21:37में भी गलत बोलता हूँ। उसका हृदय दुखता है।
- 1:21:41वह मुझे जो भी कुछ कहता है वह मेरे अचेत्र में फिट होता है।
- 1:21:47बिल्कुल वैसा ही और वैसा ही फलीभूत होता है, वैसे ही
- 1:21:52प्रोसेसिंग होती है जैसे बीज को अंकुरित और पेड़ बनने और फल देने
- 1:21:56तक होती है। सारा कुछ मेरे भीतर भी वही होता
- 1:21:59है लेकिन फर्क क्या पड़ता है? कृष्ण को कोई फर्क नहीं पड़ा।
- 1:22:06मुझे कोई फर्क नहीं क्योंकि मैं ना भोगने वाला ना करने वाला मैंने
- 1:22:12सत्य बोला किसी ने मुझे बदुआ दे दी दे दो।
- 1:22:17वह फलीभूत होगा, बिल्कुल होगा लेकिन वह मेरी आँखों के सामने
- 1:22:22गुजर जाएगा जब फल बन के आएगा। मैं उससे दुःखद स्थिति में नहीं
- 1:22:28आऊंगा, आग होगी। सफीर पे मैं होऊंगा सेंटर में
- 1:22:33आनंद में झूमता हुआ हम तो अपनी मस्ती में आग लगे, मस्ती में,
- 1:22:42सफीर पे सब आग लगी। इसलिए बेधड़क बोलता हूँ क्योंकि
- 1:22:48मैं जानता हूँ जिसके दिल दुखेंगे दुखेंगे शक्ति को सुन के दुखेंगे
- 1:22:53दुखेंगे। लेकिन शायद कोई करोड़ों में एक
- 1:22:57बदलाव हो जाए और वो बदलाव ही मेरा पुरस्कार वह आशीष देगा।
- 1:23:03तुम्हारे भीतर से आशीष होती है, कोई कारण वो भी तो भीड़ होती है
- 1:23:09और बहुत से लोगों के भीतर आशीष होती है।
- 1:23:11बाबा मुझे कहते हैं मैंने कहा मेरा तो वक्त हो गया, अब कहते हैं
- 1:23:16ये जो आशीष आ रही है। लोगों के हितों को शांति पड़ेगी।
- 1:23:22ये तुम्हारी उम्र को बढ़ा रहा है। कब तक बढ़ेगा?
- 1:23:26जब तक लोग आशीष देंगे तुमने इतना कॅन्टेंट छोड़ा जब जब जब तक लोग
- 1:23:32पढ़ेंगे, आशीष आएगा और यह तुम्हारे वीर संग्रहित हो जायेगा।
- 1:23:37जब तक के तुम्हारा हम इस शरीर को छोड़ नहीं देते।
- 1:23:42और वो बूंद समुद्र में समा नहीं जाती।
- 1:23:45मेरे ख्याल में मैंने सब कुछ बता दिया, साइंटिफिक के ढंग से भी बता
- 1:23:49दिया। 3 दिन का रहस्य भी बता दिया।
- 1:23:55पानी में डूबे नहीं थे वो पानी के किनारे पर।
- 1:24:01उस पानी में उनके पांव थे, ठंडक फैला रहे थे।
- 1:24:06पांव से ठंडक चलती है, हृदय शांत होता है, इसलिए हमने किनारे बनाए
- 1:24:16नदियों के वह बैठ। मैं हरिद्वार में ऐसे ही करता था
- 1:24:22जब जाता नदियां में पांव रख लेता हूँ, लोग ले जाते हैं आमों को,
- 1:24:29आमों को लटका देते हैं, मैं पांव को लटका लेता हूँ और बर्फ़ के
- 1:24:34पानी में ठंडे और मैं आनंद से ग्रसित हो जाता।
- 1:24:42और ठंडा पानी तुम्हारे हृदय को शांत करा देता है, तुम्हारे
- 1:24:46मस्तिष्क को शांत कर देता है और तुममें थोड़ा सा बदलाव होता है।
- 1:24:53ये टकरा के आती हुई हवाएं। तो में वो बदल जाती है।
- 1:24:57थोड़ा सा शायद आपको समझ आ गई हो क्या ये है सारा फिलोसोफिकल जी
- 1:25:12फिलोसोफिकल शब्दिक ढंग से? बोला तो शब्दों में पड़ेगा, लेकिन
- 1:25:17शब्दों के भीतर कुछ भीतर के उन तलों से लेबड तेबड के जो आती हैं
- 1:25:23वो चीजें हमारे भीतर जब प्रवेश करेंगी अंतः में तो तुम्हें पता
- 1:25:30चलेगा कुछ एक्स्ट्रा ऑर्डर ये है। ये शब्द शब्दों से पार भी हैं,
- 1:25:35कुछ कुछ दूर तक की खबर भी देते हैं लेकिन तुम्हें कोई श्राप दे
- 1:25:44तुम भड़क जाओगे कृष्ण को कोई श्राप दे, वो भड़केगा नहीं, वो
- 1:25:49जानता है मैंने किया। ओशो हवा से किया तो गंधारी कहती
- 1:25:55है जैसे मेरे सामने मेरे कुल का नाश हुआ कृष्ण तुम्हारी आँखों के
- 1:26:02सामने तुम्हारे कुल का नाश हो जाओ, मैं तुम्हें श्राप देती हूँ
- 1:26:07लेकिन कृष्ण तो कृष्ण कृष्ण कहते हैं माते।
- 1:26:12एवं मस्तुभवा ऐसा ही होगा पर वैसा ही होता है उनकी आँखों के सामने
- 1:26:19उनके पुत्र सांप के कारण जाम्बन्ती के पुत्र सांप उनके
- 1:26:26कारण। आपस में लड़ लड़ के मर गया है यदु
- 1:26:33वंश का खात्मा ऐसे तो धृतराष्ट्र का भी एक अंश बचा यौसु यौसु किसी
- 1:26:46दासी का पुत्र था। लेकिन अंशित था और हमको ऐसे ही दो
- 1:26:52चार लोग बचे। ये दो अंश के थे तो कोई जिक्र
- 1:26:59नहीं है। हमें इस बात की कोई फिक्र नहीं और
- 1:27:02उस पर उस तल पर गया हुआ व्यक्ति वो फिक्र करेगा।
- 1:27:07तुम ये समझना ही मत कोई फिक्र नहीं लाग लिपेट से बिल्कुल दो,
- 1:27:13उसने देख लिया सत्य क्या है? सब होगा विधान से होगा जो संसार
- 1:27:19का है, संसार के विधान से होगा। जो परमात्मा का है वो परमात्मा के
- 1:27:24विधान से होगा। सब चीजें वैसे ही चलती जाएंगी,
- 1:27:28लेकिन विधान में चलती। जाएंगी।
- 1:27:33श्री कृष्ण गोविंद हरे। मुरारी हैनाथ नारायण वा सुदेवा?
- 1:27:58पितुमातृ स्वामी सखा हमारे पितुमा स्वामी सखा।
- 1:28:19हमारे है ना तू नारायण वासुदेव हीर राजे दे हो गए मिले।
- 1:28:39हीरराजे दे हो गए मेले जी जो तुम कहते हो ना राधा और कृष्ण के।
- 1:28:50महाराज की बात यही हीराजे का है। इसका पैमाना है एक हो जाए।
- 1:29:00दोनों में से दो ना रहे तो राधा हो जाती, राधा का जीकर नहीं आता,
- 1:29:08कृष्ण ही रह जाते, बस वहाँ महा रास होता है।
- 1:29:14जहाँ सब जगह कृष्ण ही कृष्ण होते हैं, गोपलियां खो जाती हैं वहीं
- 1:29:20निधिवन का महा रास है। हीराजे दे हो गए मेले उल्ली हीर।
- 1:29:29टुंडे दीवले रांझा यारबुकल विच खेले रांझा यारबुकल विच खेले।
- 1:29:48मैनू सुध रही। हीना सार इश्क दिन मियाँ न मी
- 1:29:57बहार इश्क दिन मियाँ न मी बहार इश्क दिन मियाँ न मी।
- 1:30:07दोनों में से एक खो जाए राधा खो जाए कृष्ण बचे खीर खो जाए राँझा
- 1:30:19बचे तिदो नी मैं हूँ अखोरांझा। तीदो नी मेनू आँखों राँझ हीर न
- 1:30:32रांझण रांझण करती मेहता आप पे रांझण एक होया ये स्त्री ही क्यों
- 1:30:39खोती है? राधा खो जाती है, कहीं जिक्र
- 1:30:43नहीं। हीर खो जाती है और रांझा रह जाता
- 1:30:48है। राधा खो जाती है, कृष्ण रह जाते
- 1:30:52हैं, ये स्त्री ही क्यों खोती है ये इसका किसी अगले प्रोजेक्ट में
- 1:30:56ना बड़ी लंबी वीडियो पहले से ही हो चुकी है।
- 1:31:02श्री कृष्ण गोविंद। अरे मुरारी है नाथ नारायण व
- 1:31:18पितुमात स्वामी। सखा हमारे हिनाथ नारायण वासुदेव।
- 1:31:37श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी जिनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण
- 1:31:51गोविंद हरे मुरारी। हेनाथ नारायण वासुदेव पितुमात
- 1:32:01स्वामी सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे हेनाथ नारा।
- 1:32:13यन वासुदेव ईनाथ नारा यन वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद हरे, मुरारी
- 1:32:27ईनाथ, नारायण वासुदेव। धन्यवाद।