Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Jun 25 - सारे बुद्ध पुरषों का सार! आपके जीवन का सार! जैदकृषणमुर्ति के जीवन की कुछ अनकही बातें!
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- 0:07बाबा जी प्राण आपने कभी? जी दो कृष्णमूर्ति के बारे में
- 0:21कुछ नहीं बोला। कृपया उनका मार्ग भी हमें समझाइए
- 0:28क्योंकि वो कहते हैं कि किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है।
- 0:38किसी गुरु की किसी धर्म की, किसी जाति की किसी समाज और व्यवस्था की
- 0:45जरूरत नहीं है। दूसरा प्रश्न है मुझे कभी कभी ऐसा
- 0:59लगता है। कि आप ओशो की नकल करते हैं विचार
- 1:08चुरा लिए जब तक तुम वहाँ पर नहीं पहुँच जाओगे।
- 1:21विचारों का घमासान तुम्हें ऐसे ही संघर्ष करने पर जुटा रहेगा।
- 1:35हमने जहाँ पहुंचना है वो स्थान एक है।
- 1:42और उस स्थान पर आकर प्रत्येक व्यक्ति जो देखता है वह समान है।
- 1:52उस अनुभव को बोरता कैसी है इसमें थोड़ा फर्क है।
- 2:00कोई कन्नड़ बोलेंगे, मलयालम बोलेंगे पंजाबी, हिंदी, संस्कृत
- 2:08या फ़्रेंच या इंग्लिश वगैरह जो भी है लेकिन अगर कोई अंग्रेज भी
- 2:17वहाँ पहुंचता है वो देखेगा वही। जो किसी ये तो कृष्णमूर्ति ने
- 2:27देखा उसने देखा या किसी ने भी देखा?
- 2:36अनुभव का कोई फर्क नहीं। अनुभव के व्याख्यान का फर्क है।
- 2:44अब आपने कहा मुझे लगता है कि नकल करते हैं वो शोक।
- 2:49क्या आपको यह नहीं लगता कि ओशो जिदु कृष्णमूर्ति के नकल करते
- 2:53हैं? और क्या आपको ये नहीं लगा कि
- 2:59जिद्दू कृष्णा मूर्ति अष्टावकर की नकल करते हैं?
- 3:03पाथलिस पाथ यही तो अष्टावकर कहते हैं, कहीं जाना नहीं है, ठहरना
- 3:11है, भीतर उतरना है। अनुभव के साथ विचार भी अगर मिल
- 3:21जाए तो कुछ बुरा नहीं है। अनुभव समान होता है और कबीर तो
- 3:31यहाँ तक कहते हैं सभ्य स्याने एक मत।
- 3:37अनुभव समान होता है। सभी सयानों का मूर्ख अपनों अपने
- 3:44मूर्खों का विचार अलग अलग होता है।
- 3:46विजाव जैसे मार्क का कुछ और कहेगा नीच से और चारवाक ये कुछ और
- 4:00कहेंगे, इनके तो विचार ही भिन्न हो गए।
- 4:04वो कहता है कोई नहीं है यहाँ लेने देने का ऋण ले लो, मुकर जाओ।
- 4:14घी फिरो मार्क किस कहते हैं परमात्व नहीं है आपके सो कॉल्ड
- 4:23आचार्य कहते हैं लाइटर मेंट नहीं हैं।
- 4:29मैंने जो पहला शब्द कहा। उस स्थल को छूने से पहले वैचारिक
- 4:34नवासन में तुम उलझ के रह जाओगे, जो आज है तुम्हारे साथ कितना भी
- 4:42कोई बोल ले कितना भी कोई बोल के चला गया तुम्हारे कान पे जू नहीं
- 4:47रहेंगे क्या सीखे तुम? तुम एक दूसरे की नकल करते ही
- 4:59पाओगे सबको और फिर अगर तुम कृष्ण को देख लो तो कृष्ण में तो सब
- 5:12समाहित कर दोगे तुम? कबीर को भी नानक को भी, मीरा को
- 5:18भी यदु कृष्णमूर्ति भी वही होंगे। एष्टा बकर भी सबको समाहित कर देते
- 5:29हैं। कृष्णा।
- 5:35हे तुम्हारा प्रश्न पुत्र खोपड़ी से आया वह प्रश्न खोपड़ी से ऐसे
- 5:41ही प्रश्न आते हैं, इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ, प्रश्न मत करो,
- 5:48क्योंकि प्रश्न कभी खत्म नहीं होंगे।
- 5:51अंतहीन श्रृंखला का अंतहीन धागा है।
- 5:56ये कृष्णमूर्ति के बारे में सुन लो।
- 6:08अगर आप गौर से देखोगे तो लगेगा कृष्णमूर्ति गुरु गोविन्द सिंह की
- 6:14नकल कर रहे हैं। कृष्णमूर्ति कहते हैं, किसी
- 6:18शास्त्र की आवश्यकता नहीं। गुरु गोविन्द सिंह भी यही कहते
- 6:22हैं। कृष्णमूर्ति कहते हैं, किसी गुरु
- 6:27की आवश्यकता नहीं। गुरु गोविन्द सिंह भी यही कहते
- 6:31हैं। किसी गुरु की आवश्यकता नहीं और
- 6:36देखिए गोबिंद सिंह कहते हैं कि शस्त्र की आवश्यकता है गुरु माननो
- 6:42ग्रंथ ग्रंथ को गुरु मानलो और जिददू कहते हैं कि ग्रंथ की भी
- 6:48कोई आवश्यकता नहीं। बात ठीक है।
- 6:51बात उनकी भी ठीक है तो किसको सही कहा जाए?
- 6:59अब हम मूल वैचारिक सिद्धांत पे आते हैं।
- 7:05असल में बात क्या है? असल में बात है कि अपने भीतर
- 7:09जाना। भीतर जाने में अगर तुम उलझते हो
- 7:16तो तुम्हे मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ेगी।
- 7:23जीसको मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ेगी।
- 7:29उसको कहीं से तो मार्गदर्शन लेना होगा।
- 7:34वह किताबों से ले। फिर अगर किताबों से मार्गदर्शन
- 7:37नहीं मिलता तो फिर कहाँ से फिर जयवत गुरु से ले सभी बातें।
- 7:48अध्यात्म में जाकर कहीं न कहीं इकट्ठी भी होती है और ढूंढती भी
- 7:52है। यह बिल्कुल रेलवे लाइन की तरह है।
- 7:59जो काँटा होता है मिल भी जाते हैं, अलग अलग भी हो जाते हैं वो
- 8:05कांटे बदलने वाला व्यक्ति। कांटा बदल देता है।
- 8:12दूसरे पद पर आएगी रेल गाड़ी कांटा जोड़ देता है, इस प्लेटफार्म पे
- 8:19आएगी सब उसके हाथ में आता है। तुलनात्मक अध्ययन करना, कंपैरिजन
- 8:31करना कम से कम अध्यात्म में तो नहीं होता क्यों नहीं होता?
- 8:44अध्यात्म में तुम्हें वहीं पहुंचना होता है जहाँ सभी पहुंचते
- 8:50हैं। अब देखिए तुमने ताजमहल पे जाना है
- 8:57कोई दक्षिण से आए कोई उत्तर से आए।
- 9:03कोई पश्चिम से आये, कोई पूर्व से आये अन्य अन्य दिशाओं से सभी
- 9:07आएँगे। कोई कह सकेगा सही मार्ग क्या है?
- 9:13दक्षिण वाला अपना मार्ग बताएगा उत्तर वाला अपना पूर्व और पश्चिम
- 9:17वाला अपना लेकिन पहुंचना एक जगह पे।
- 9:24कोई किसी की नकल करे क्यों करेगा? तो फिर तुम्हारी बात का जवाब देते
- 9:32हैं कृष्ण। असल में कृष्ण एक ऐसी विभूति है।
- 9:40जो सबको समाहित कर लेते हैं। कहीं भी कोई प्रश्न उमड़ता
- 9:45घुमड़ता है तो कृष्ण उसे सर्व कर देते हैं, क्योंकि कृष्ण सभी का
- 9:53संयोजन है। सभी रास्ते यहाँ आकर बैठते है।
- 10:02ये जंक्शन है। कृष्ण मूर्ति कहते है, पाथ लेस,
- 10:13पाथ और स्टापक क्या कहते है? तुम ही हो, कहीं जाना नहीं, कोई
- 10:21यात्रा नहीं। अपने तक पहुंचने के लिए क्या कोई
- 10:25यात्रा करनी होती है जहाँ ग्रुप की आवश्यकता खत्म हो जाती है?
- 10:35हम्म पाथलेस बात है यह ऐसा रिश्ता यह ऐसी मंजिल।
- 10:42जो खुद ही रस्ता है जो ऐसा रस्ता जो खुद ही मंजिल है फिर क्या
- 10:49करोगे? तुम बोले शाह कहते हैं दिल के
- 10:57आईने में। है बसी तस्वीरें यार जब चारा
- 11:03गर्दन झुकाई देख ले कहाँ जाना है भाई तो सभी रस्ते बेकार बिल्कुल
- 11:15बेकार। प्रथम वीडियो में मैंने बोला इससे
- 11:21समझ जाओ बड़ा अच्छा होगा मत ढूंढो, भगवान को ढूंढना उसे होता
- 11:29है जो तुम नहीं होते, तुमसे अलग कुछ होता है जो तुम ही हो उसे
- 11:37ढूंढना थोड़ा होता है। उसमें तो उतरना होता है और मैं
- 11:45यही आपको उतरने की ही विधि कह लो। आप बोलने के ढंक हैं।
- 11:52क्या करें? समस्त वीडियो में बताये।
- 11:57अपने ही भीतर उतरना होगा। कहीं जाना नहीं, कहीं आना नहीं
- 12:03है, कोई गाड़ी नहीं पकड़नी, कोई फ्लाइट नहीं लेनी, कोई पैदल नहीं
- 12:08चलना, कोई जरिया नहीं देखना कैसे जाए, यही बात बाबा लाने कहते है।
- 12:22क्या कहते हैं सुनी है, अगर गौर से सुनोगे तो समझ जाओगे इन शब्दों
- 12:28को गौर से समझ लेना। इसमें कृष्णा जिदूमूर्ति
- 12:34जिदूमूर्ति भी मिलेंगे। एक्स्ट्रा भी मिलेंगे।
- 12:43क्या कहते हैं ज़ोर न जुगती छोटे संसार किसी भी युक्ति के अंदर।
- 12:58इन बंधरों से छूटने का कोई ज़ोर नहीं है।
- 13:03पाथलस पाथ तो हो गया और क्या हो गया?
- 13:07कोई युक्ति नहीं लड़नी जैसे जैसे व्यक्ति जटिल होता जाएगा।
- 13:13अब इन शब्दों को ढंग से समझ लेना। जैसे जैसे व्यक्ति हृदय से ऊपर
- 13:19उठेगा, अस्तित्व से ऊपर उठेगा, हृदय और हृदय से ऊपर उठेगा खोपड़ी
- 13:24और 1 दिन आज तुम खोपड़ी ही हो गए हो, तुम्हें खोपड़ी से नीचे उतरना
- 13:30आता ही नहीं। तुम प्रेम की तस्वीर कभी बन ही
- 13:36नहीं सकते। तुम हर चीज़ को सिक्र रखना चाहते
- 13:44हो। कोई धनी व्यक्ति अपने बेटे से
- 13:51छुपाता है कि मेरे पास कितना है? पता ना लग जाए ऐसे भला पिता अपने
- 13:58पुत्र से छुपाए कि मेरे पास क्या है, कितना है ये शोभा देता है
- 14:10लेकिन अपनी अपनी फिलॉसोफिकल लाइन्स है।
- 14:13तुम दार्शनिक सिद्धांतों में उलझ गए ईश्वर के नाम पे तो गुरु नानक
- 14:25कहते हैं कि किसी भी युवती में कोई भी जोर नहीं है।
- 14:32कोई भी युवती। कोई भी पद्धति, कोई भी वे छूटें
- 14:40संस्था लिबरेशन में कामयाब नहीं होती क्यों?
- 14:47क्योंकि लिबरेशन ही कोई नहीं है। बाबा कहते हैं बंधन ही कोई नहीं
- 14:56है तो तोड़ोगे किसे कहने के ढंग हैं, अलग अलग ढंग हैं, कोई किसी
- 15:07की नकल नहीं करता और कोई किसी की नकल करेगा तो खुद को धोखा देगा ये
- 15:12समझ लेना। कोई किसी की नकल करेगा तो खुद को
- 15:21धोखा देगा। क्यों?
- 15:25क्योंकि जिसकी नकल कर रहा है वह तो अपने भीतर जा के रसपान करना
- 15:31शुरू कर दिया उसने। लेकिन नकल करने वाला रस वान तो कर
- 15:35नहीं सकेगा। नकल करने वाला काहे की नकल करेगा
- 15:42शब्दों की और शब्दों में रस होता नहीं, शब्द रस से विहीन होते हैं।
- 15:50शब्दों से कभी रस मिला है। हालांकि तुम यही समझते हो के
- 15:54शब्दों में रस है नाम को तुमने शब्दों में डाल लिया है।
- 15:59अब कोई क्या करे, कितना ही कोई मग्ज खपाई कर ले, तुम नाम से नहीं
- 16:03छूट सकते, तुम गुरु से नहीं छूट सकते।
- 16:08बहुत से मोड़ पढ़े लिखे लोग मैंने देखे।
- 16:13कि बस गुरु ही सब कुछ है। अगर तुम गुरु से भी चिपट जाओ तो
- 16:26गुरु भी तुम्हारे लिए बंधन हो जाएगा।
- 16:30जैसे कल ही मैंने कहानी सुनाई। गौतम के लिए महावीर वर्धमान ही
- 16:39बंद हो गए। बात निपटने की बात निपटने की है,
- 16:50बात क्लिंगनेस की है। तुम आसमान से गिरो, लेकिन खजूर
- 16:56में अटक जाओ, धरती पे तो नहीं आएगा फिर क्या करना होगा?
- 17:10कोई किसी की नकल नहीं करता और अगर कोई किसी की नकल करता है उसके
- 17:15भीतर से वो आनंद का। संगीत नहीं उभरता।
- 17:23किसका नुकसान करेगा? मैं रोज़ समझाता हूँ, अगर क्रोध
- 17:28करोगे तो अपने ही पात्र में गंदगी इकट्ठी करोगे तो पात्र किसका खराब
- 17:36हुआ? तो मर बुद्धिस् को अच्छी तरह
- 17:40जानते हैं। बुद्ध के ऊपर थूक भी जाता है, कोई
- 17:43व्यक्ति गालियां भी निकाल लेता है, तुम्हें क्या पता बुद्ध को
- 17:47बड़ी बुरी बुरी गालियां निकालेंगे।
- 17:52किस संत को गालियां नहीं निकालेंगे?
- 17:55और गालियों से ही छुटकारा हो जाए तो भला संत है या तो टांग देते
- 18:01हो। तुम मंसूर को काट देते हो, ईसा
- 18:06मसीह के हाथों में कीलें ठोक देते हो।
- 18:10फिर भी वो कहते हैं ऑल गॉड फॉर कीपथम।
- 18:14विकास दे डोंट नो व्हाट दे आर डूइंग इनको क्षमा कर देना,
- 18:19क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं बात चिपकाहट की है और बात
- 18:29किसी चीज़ की है ही नहीं। मुख्य मुद्दा है चिव का हट
- 18:38किलिंगनेस फिर वो तुम्हें धर्मपत्नी के साथ हो।
- 18:43तुलसीदास को अपनी धर्मपत्नी से हो जाता है रत्नाभली चिवकाहट हो गए।
- 18:54धृतराष्ट्र को अपने पुत्र से हो जाता है दुरंगन चिपकाट कहाँ आई थी
- 19:07इसका कोई पता नहीं, ये तुम्हें खोजना होगा कि मेरी चिपकाट है।
- 19:12मुझे रोज़ प्रश्न आ जाते हैं बाबा कहाँ उलझ गए पता नहीं वो आनंद की
- 19:18स्वर धर्मी तो गोजते नहीं अनाहत तो शुरू हो गया बंसरी बहती है,
- 19:27लेकिन उस बंसरी जहाँ से बहती है। उस उदगम स्रोत तक पहुँच नहीं पाता
- 19:34तो कोई चपकाहट है। पुत्र देखो चपकाहट क्या है और सब
- 19:42बाहरी चपकाहटों से तुम छूट जाओगे तुम हज़ारों करोड़ रुपए के मालिक
- 19:47हो, अच्छे पिता के पुत्र हो। अमीर है पिता ने जैसा तैसे
- 19:54तुम्हारे लिए कमाया लेकिन तुम सब छोड़ छोड़ के जैन मणि हो जाते हो
- 19:59तो पिता माथी के अपराध मरता है लेकिन तुम?
- 20:10अगर अपने शरीर के साथ ही चिपटे रहे धन को छोड़ दिया चिपकाहटे एक
- 20:16तो है नहीं माना तुमने घर छोड़ दिया ठीक माना तुमने धन छोड़ दिया
- 20:25ये भी ठीक माना तुमने आयश की कुर्सी छोड़ दी ये भी ठीक।
- 20:32माना तुमने पीएम से इस्तीफा दे दिया, ये पूछे लेकिन अगर तुम
- 20:41मुख्य बिंदु से चिपके रहे, जिसे हमने छूटना है?
- 20:47जो मुख्य चिपकाहट है व्यक्ति की भोग है तुम लाख दुनिया को छोड़ दो
- 20:57खेतों खलियानों को छोड़ दो, बाग बगीचों को छोड़ दो, अपनी सारी
- 21:01मलकियत को छोड़ दो, बैंक बैलेंस को छोड़ दो।
- 21:06तुम सिरम डालो जैन मुनि हो जाओ, श्वेत वस्त्रधारी बन जाओ।
- 21:16क्या मामला हल हो गया? अध्यात्म का मामला हल नहीं हुआ।
- 21:20ये सब कुछ भी रख लेते कृष्ण की तरह।
- 21:25वो कृष्ण बड़े अजूबे हैं। वो कहते हैं ऐसा ही रहने दो
- 21:30तुम्हारा क्या बिगड़ता है आसपास तो है एक नया सबक।
- 21:375000 साल पहले कृष्ण हमें दे गए, हम उलझते ही भर रहे हैं।
- 21:46तुमने सब छोड़ दिया किसी भी धर्म के तुम पैरोकार बन गए या तुम
- 21:55फॉलोवर बन गए अनुयायी बन गए। फिर एक नया धंधा शुरू हो गया।
- 22:05गुरु लोग कहते हैं मेरे ही पांव को पकड़े रहना जीस, टमाटर को
- 22:10मैंने हाथ लगा दिया लोग ऐसे पागल वो टमाटर को बाजार में ₹5 का ₹10
- 22:20का मिल जाये। लेकिन 1,00,00,000 में खरीदने को
- 22:26तैयार है। क्या है भाई?
- 22:31पोल खुलता है उम्रकैद की सजा हो जाती है, कैद में बंद हैं, जेल
- 22:37में बंद हैं। और भक्त माह जाते हैं, जूतियां
- 22:40उतारते हैं, जेल के आगे नतमस्तक होते हैं, छिप काहट नहीं गई, ये
- 22:52छिप काहट मन की छिप काहट? माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर
- 23:09आशा तृष्णा न मरी कह गए भक्त कबीर सन्तों ने बड़े गहरे गहरे शब्द
- 23:15बोल के आपको समझाने का प्रयास किया।
- 23:22कोई किसी की नकली यहाँ करता नहीं और अगर कोई करेगा तो खुद का ही
- 23:29बिगाड़ेगा। ये छोड़ देना इसका मुख करण आज समझ
- 23:42लो। ठीक से ऋषियों ने धन को छोड़ देना
- 23:47दान का बड़ा महत्त्व बताया और पंडितों ने इसका प्रचार बहुत
- 23:53किया। इस मीडिया की तरह।
- 23:58और जो प्रचार किया जाता है, तुम्हारे हृदय में वो बात हरम
- 24:01जाती है, तो दान का बड़ा महत्त्व बड़ा प्रचार यह दान का प्रचार
- 24:12क्यों किया? लिंगगनेस को हटाना है तो यह एक
- 24:17कायदे की तरह काम करेगा। पीएचडी तक पहुंचना है तो कायदे की
- 24:23तरह काम करेगा। ए अनार तो तुम कम से कम इतनी तो
- 24:29हिम्मत जुटाओ के धन को छोड़ सको। चिपकाहट को छोड़ सको धन से तुम
- 24:37बड़े गहरे से चिपके होते हो धन के लिए भूमि के लिए जर जोरो जमीन के
- 24:44लिए कतलोहारित हो जाते हैं भाई भाई से लड़ पड़ता है।
- 24:51बहन बहन से लड़ पड़ती है, बहन भाई से लड़ पड़ता है, ये क्या है,
- 24:57चिपकाहट पता है संघ नहीं जाना। लेकिन फिर भी तो ऋषियों ने बताया
- 25:09कि चिपकाहट को शुरू करें तो जैसे। आड़ा अनार ऊडा उठ हम कहते है ए
- 25:23बीसीसी कैट बी बॉल इससे हर चीज़ के अल्फाबेट है समझाने के लिए
- 25:33बच्चे को समझाने के लिए। तो संतो ने कहा कोई शिक्षा के लिए
- 25:40बच्चा और कोई अध्यात्म की शिक्षा के लिए बच्चा तो कहाँ से शुरू
- 25:45करें? बात मुख्य क्या है छोड़ना शिव
- 25:49काहट को छोड़ना तो कहाँ से शुरू करें?
- 25:52धन से बड़ा प्रेम है। बड़ी मशक्कत से कमाया धन को छोड़
- 25:59दो, जो पिता के 4000 करोड़ को छोड़ देता है ध्यान से समझना बात।
- 26:14जो पिता के 4000 करोड़ को छोड़ देता है उसको तुम बहुत सम्मान
- 26:22देते हो। तुम ये नहीं जानते कि उसने पिता
- 26:27का 4000 करोड़ छोड़ा खुद कमा के छोड़ते।
- 26:31फिर समझाती बुध को तुम मान तो बहुत दे देते हो लेकिन मैं इस बात
- 26:36के ऊपर मान नहीं देता क्योंकि वो उसका नहीं था।
- 26:40वो कपिलवस्तु का था, वो उसके पिता का था, अगर कोई दूसरा बेटा होता
- 26:49जैसे महावीर का दूसरा भाई था। तो पिता ने ज़रा भी नहीं कहा अगर
- 26:55दूसरा होता तो कहते ठीक है तुम जाना जाओ मैं दूसरे को संभला
- 27:01दूंगा तुम खुद का कमाया हुआ अगर छोड़ो तो वो है दान।
- 27:12समझाई बात पिता था, उनके एक बच्चा था माता पिता के वह कुसंगति में
- 27:25पड़ गए। कुसंगति में पड़ गया।
- 27:30अमीर से बहुत पैसा बहुत था। जमीन जायदाद बहुत ही एसो।
- 27:36आराम के सब साधन थे तो वह बच्चा को संगति में पढ़कर धन का नाच
- 27:46करने लगा। माता पिता ने कहा आप क्या करें?
- 27:58किसी मित्र से सुझाव लिया कोई काम धाम भी विशेष नहीं करता।
- 28:04डरता है मुशक से महीनों से तो उसके मित्र ने कहा आप मेरे पास वे
- 28:09दिया करो। तरीका बदला दिया।
- 28:15मैं इसको कोई काम नहीं करूँगा। यहाँ बढ़िया कुर्सी के ऊपर
- 28:20बैठाऊंगा आराम से कुछ नहीं करना है, सिर्फ ये देखना है कौन आया,
- 28:24कौन चला गया नाम लिख लेना उसका। इतना सा काम और बच्चा इतनी
- 28:33मुश्किल तो बड़े आराम से कर लेता तो माँ बाप ने का पुत्र तू ऐसा कर
- 28:39तेरे से कुदाली नहीं खोदी नहीं जाती जमीन?
- 28:45तुम्हारे एक का मित्र है तेरा अंकल है वहाँ चला जाएगा, उनके
- 28:48ऑफिस में बैठ जाएगा, तेरे को तनख्वाह दे देंगे तेरे को थोड़ी
- 28:55सी काम करने की आदत पड़ जाएगी यहाँ तुम लगातार रोज़ आलसी होते
- 29:04चले जाओगे। संस्कार आलस के पढ़ जाएंगे तो अभी
- 29:09से ऐसा है तो वृद्धावस्था में क्या होगा?
- 29:13तो उसकी समझ में आई बात ठीक है, अब हो गया।
- 29:19सुबह बैठा अब बैठ रूम में तो थोड़ा सा मुश्किल होता है।
- 29:23जो इधर टांग मार ली है, उधर टांग मार ली है।
- 29:27उनके लिए बैठना बहुत मुश्किल होता है और सच पूछो तो बैठना बहुत
- 29:32मुश्किल सभी के लिए होता है। कोरोना में मेरे पास लोग आते,
- 29:36उससे पहले लोग आते। अरे बाबा आनंद तो तुम्हारा।
- 29:42मैंने कहा ईश्वर करे तुम्हारे लिए भी यही हो जाए और ईश्वर ने प्रयास
- 29:47सुन ली करो ना आ गया बड़े मज़े से लेटे रहते हो।
- 29:5324 घंटे एक ही आसन में एक ही। कहीं जाना नहीं है, कहीं आना नहीं
- 30:00है, वहीं खाना, दाना सब पहुँच जाता है।
- 30:04मैंने कहा हाँ, ई शुक्रिया, आपके लिए भी ऐसा हो जाए।
- 30:08ठीक है ना? हाँ हाँ बिल्कुल ठीक है।
- 30:13कोरोना का अलग है, लखनऊ आ गया। तो 21 दिन का लॉकडाउन लगा।
- 30:21पहली बार उन्हें का बड़ी मौज बनी भाई बैठ के फ़िल्म देखेंगे,
- 30:28कार्टून देखेंगे, गेम खेलेंगे, आनंद लेंगे।
- 30:35खाएंगे पिएंगे मुँह छुड़ाएंगे, कहीं जाना नहीं, काम धाम सब बंद
- 30:39है ठीक है, लेकिन मन कहाँ टिकने देता है?
- 30:46एक 2 घंटे के मन तो भटकाता है, मन कहता है बाहर देखाई थोड़ा गाँधी
- 30:52चौक में क्या है? जवाहरलाल चौंक में कहा, थोड़ा
- 30:57देखे और बाहर निकले तो पुलिस वालों ने पीटा, पिछवाड़ा लाल कर
- 31:05दिया, किसी तरह लंगलाते वगैरह आए टकोर वगैरह की।
- 31:14लेकिन टिकते कहाँ है? पांच 4 दिन टिके रहे फिर फिर बाहर
- 31:21पुलिस वालों ने मार मार के डडू आसन कराए।
- 31:27डडू बन कर चलो उछलो ऐसे उछल उछल के घर जाओ।
- 31:32तो टांगड़ियाँ टूट गई सबकी लेकिन मन कहाँ मानता है?
- 31:38मेरे पास फ़ोन आया बाबा तुम कैसे बैठे हुए थे साल से?
- 31:43अरे ये तो आधा हो गया, यहाँ तो कुछ दिन ही नहीं बैठ जाता।
- 31:4921 दिन ऐसा लगता है। 21 युग बीते जाएंगे।
- 31:56अच्छे नहीं मिलता। मन ने कहा वहाँ चलो, हम वहाँ चले
- 32:01गए। मन ने कहा वहाँ चलो वहाँ चले गए।
- 32:03हमें पता ही नहीं था कि हम सारे दिन में कितना चक्कर लगा देते
- 32:08हैं। और तुम्हे आराम से बड़ा देखते
- 32:10हैं, बड़ा मौज है। मैंने कहा ये मौज सबसे मुश्किल
- 32:14है, यह आती है तुम्हारी मुशक्कत से नहीं आती, ये उसकी कृपा से आती
- 32:23है। बड़ा भ्रम टूट गया।
- 32:29नहीं बाबा ये तो बड़ा मुश्किल है और ऊपर से कुछ खाना पीना कोई
- 32:37स्वाद नहीं, कोई गाँधी चौक में कचौड़ी बन रही है वहाँ खा ले कोई
- 32:44यहाँ मोहिनी शर्मा के। समोसे बढ़िया बनते हैं, वहाँ खा
- 32:49लें, कहीं कोई जाता नहीं। बीकानेर की दुकान से रसमलाई खा
- 32:57लें, तुम्हारा मन भड़काता है। मीरा कहती है, मेरो मन पड़ो हरामी
- 33:16और मन अगर हरामजादगी न करे तो तुम कुछ क्षण में ही अपने उस बिंदु पर
- 33:29पहुँच जाओगे। जिसे अष्टावक्र कहते हैं तुम्हारा
- 33:34होना, स्वयं का होना, जिसे पथलेस कहते हैं जतू कृष्ण बुद्धि कृष्ण
- 33:46कहते हैं सती प्रज्ञा। भगवान महावीर कहते हैं, कैवल्या
- 33:53और बुद्ध कहते हैं निर्भण कबीर कहते हैं सूरज देव नान कहते हैं
- 34:05खुमारि शब्द अलग हैं, शान एक हैं जहाँ पहुंचते हो।
- 34:12तो इन शब्दों को आपस में लड़ाना ही मत तो उन शब्दों को लड़ाया
- 34:15जाते हो। वो कित्ते को हमारी से मिलेगा?
- 34:19वो कहता नहीं स्थिति प्रागिता से मिलेगा।
- 34:22अब पता तो कुछ है नहीं तुम्हें तीसरा बीच में फुदक पड़ता है नहीं
- 34:29केवल इससे मिलेगा। और के छोड़ो, अंडरवन से मिलेगा।
- 34:39मूर्खों की सभा में ऐसा ही होता है।
- 34:44कोई किसी की नकल नहीं करता और नकल करता है तो स्वयं को धोखा देता
- 34:49है। जीसको ये भी नहीं पता कि दूसरे की
- 34:53नकल करके। तुम कुछ सीखें, बटोर सकते हो,
- 35:01लेकिन आनंद के दांव खेलकर आनंद को खोकर कुछ सिक्कों को बटोरा तो
- 35:08क्या बटोरा, राख बटोरी, बसम बटोरी।
- 35:16आनंद खोया, चैन खोया करार खोया अब ये राजनीतिक लोग गदियों के लिए
- 35:23कितनी त्राहि त्राहि करते हैं, मिलता क्या है?
- 35:30पूछना किसे मरते हुए राजनैतिक को बे शर्ते को गुलज़ारी लाल नंदा ना
- 35:35हो सिर्फ गुलज़ारी लाल नंदा कहेंगे बड़े मज़े से गुजरी बड़ा
- 35:42आनंद पिया बड़ा रस पिया। और जल्दी जल्दी ऐसे प्राइम
- 35:51मिनिस्टर कहाँ आते हैं? कुतुहल बिखेरते ही रहते हैं, फुदक
- 35:57फुदक करते ही रहते हैं उधर चलो उधर चलो उत्तर चलो चलो जहाज़ उठाओ
- 36:04वहाँ चलो चलो हेलिकॉप्टर उठाओ वहाँ चलो।
- 36:09इसको तुम चैन समझते हो इसको तुम ऐश कहते हो, ऐश तो खार ले जाता है
- 36:18शांत और तुम्हें ऐश का नामोनिशान भी पता है।
- 36:22दूर से भी दर्शन नहीं होता तुम्हें?
- 36:30जिसने असल आनंद का दर्शन नहीं किया।
- 36:33नहीं पिया एक बूंद वह तुम कपड़े बदलने वालों को देख कर कहेगा।
- 36:40बड़ी ऐश है सोने के वस्त्र डाल रखे हैं तुमको कि क्या ऐसी ही
- 36:45सीखिए? लेकिन संत जान लेता है कि जिसे ये
- 36:53ऐश कहता है वो आनंद की बर्बादी के दावों पे मिली हुई ऐश और जिसका
- 37:01आनंद खोया उसका सर्वस्व खोया। जिसने आनंद की दांव कीमत पर सुख
- 37:09साधन जुटा दिए, उसने समझो हीरो के बदले कंकड़पत्थर जुटा लिए।
- 37:17ये तुम्हारी एश तुम्हारी इंद्रियों से लिए गए स्वाद,
- 37:23कंकड़पत्थर हैं। और तुम्हारे आत्म तत्व में
- 37:27तुम्हारा ठहर जाना यह तुम्हारा आनंद का सिक्का है, ये हीरा है
- 37:40जिसे हीरा में जाता है वो ठहर ही जाता है तुम्हें हीरा मिला नहीं।
- 37:46तुम मेरी स्थिति को यहाँ देख कर ये बड़े मज़े में है, लेकिन तुम
- 37:51भी ऐसे मज़े में हो सकते हो तुम कॉम्पिटिशन मत करना तो मुझे।
- 38:03महानता मत देना इस मसले में तुम भी बिल्कुल जैसे मैं हूँ वैसे हो
- 38:12सकते हो, कोई कमी नहीं, अपने मुकाम पर ही जाना है, वो कबीर के
- 38:19हिसाब से जाओ। नानक के हिसाब से जाओ कृष्ण के
- 38:22हिसाब। वह मीरा के वह महावीर बुद्ध के वह
- 38:30कृष्णमूर्ति के वह ओशो के वह किसी भी हिसाब से तुमने स्वयं तक
- 38:38पहुँचना है सती प्रज्ञा होना। मार्ग क्या है ये तय नहीं करता।
- 38:48पहुंचते कहाँ हो ये बात मूल्यवान है और कहाँ पहुंचते हो पदार्थ
- 38:57जुटा के तुम सुख चैन? के साधन जुटा के बढ़िया पिल्लों
- 39:03के ऊपर लेट जाते हो। यह तुम्हारी भीतरी आकांक्षा है या
- 39:12कंकड़पत्थर के बिछोड़ों पर लेट के उस आनंद की स्थिति में मगन होकर
- 39:16रहना चाहते हो? तुम तब तक पिलोज को अभिमान देते
- 39:23रहोगे जब तक तुमने एक पल का कंकड़ पत्थर के विचिरण पर लेट कर एक पल
- 39:34का आनंद नहीं रखा तब तक तुम्हें पिलोज बड़े अच्छे लगेंगे।
- 39:41जब तुमने कंकड़ पत्थर के ऊपर लेट कर एक क्षण का वो रस भी लिया तब
- 39:46तुम्हें सब बेकार हो जाएगा। मेरा कहती है सोली ऊपर सेज पिया
- 40:00भी किस से भी मिल न होय। यह सूली के ऊपर सूलों के ऊपर
- 40:11सोलों की है। बिछौना उसके ऊपर लेटना होता है,
- 40:20उनके ऊपर लेट के उसका परमात्मा का द्वार मिलता है।
- 40:25मुश्किल तो बड़ा है इसलिए तो तुम निभा नहीं पाते।
- 40:36वह बुलाता तो है लेकिन तुम्हें सुनाई नहीं पड़ता।
- 40:43और ये फासला तुमसे कभी मिटाया नहीं जाता, वह बुलाता रहता है।
- 40:49तुम समझ नहीं पाते ये कौन है जो आवाज लगा रहा है जहाँ अपेक्षा
- 40:59अधिकार तथा ईर्ष्या है। वहाँ प्रेम नहीं है और तुम्हारा
- 41:07प्रेम बिल्कुल ऐसा है। अब इन तीन शब्दों का समझ लेना
- 41:15सबसे पहला अपेक्षा। तुम किसी से प्रेम की अपेक्षा
- 41:21करते हो, किन्हीं बहुमूलक्षणों में यद्यपि वो प्रेम ऊपर से उतरा
- 41:26होता है और उसने तुम्हें प्रेम से देखा तो तुमने उसके ऊपर अधिकार
- 41:36घोषित कर दिया। जैसे आपातकाल लगा दिया गया।
- 41:44किसी ने प्रेम से देखा और वो प्रेम से उसने नहीं देखा, प्रेम
- 41:50से देखा परमात्मा ने, वह बना सिर्फ निमित्त।
- 41:58उस नीमत ने परमात्मा का हो, आनंद जीके तुम्हें प्रेम से देखा, तुम
- 42:06अपेक्षा करने लगे, मुझे सदा ही ऐसे प्रेम से देखता रहेगा।
- 42:13कभी नफरत से नहीं देखेगा। प्रेम बड़ा अच्छा लगता है, इज्जत
- 42:17भी फैलाती है तुम नफरत हो, अच्छा तुम्हें प्रेम लगता है बड़ी
- 42:25हैरानी की बात है फैलातें हो तुम नफरत आज।
- 42:33घृणा और अच्छा लगता है तुम्हें अब प्रेमी प्रेमिका की यही मुसीबत
- 42:42है। किन्हीं उन पहले क्षणों में दो
- 42:46आँखें मिलीं और चार हो गईं वो भरबस मिली थी।
- 42:53कोई क्षण आया था ऐसा भाग्यशाली जब ऊपर से वो प्रेम उतरा ब्रह्मांड
- 43:00से सत्यखंड से और तुम्हारे भीतर से गुजरता हुआ तुम्हारे प्रेमी या
- 43:10प्रेमिका में समा गया? वह भी अविश्चित हो गया या हो गई?
- 43:21अब तुम कहते हो कि मुझे प्रेम हो गया है, फिर तुम अपेक्षा करते हो,
- 43:27यह स्त्री या पुरुष मुझे सदैव ऐसे ही प्रेम देता रहेगा।
- 43:34वह अपेक्षा धीरे धीरे इन बातों को बढ़े ध्यान से सुन रहे तुम्हारे
- 43:38काम की तुम्हारी ज़िन्दगी की बातें है ये ये फलसी से कल बातें
- 43:44नहीं। कृष्णमूर्ति कहते हैं, प्रेम से
- 43:54शादी में बंध जाओ, प्रेम है तो शादी में बंध जाओ।
- 44:00कृष्णमूर्ति जानते हैं, अच्छी तरह से जानते हैं, प्रेम उतरता है ऊपर
- 44:09से तुम्हारी खुद की पैदाइश सुप्रेम नहीं होती।
- 44:15तुम्हारी खुद की पैदाइश को नफरत है, मैं तुम्हारी खुद की है किसी
- 44:22के नाम के ऊपर किसी द्वंद के ऊपर तुम घृणा फैला दो नफरत फैला दो,
- 44:30कोई नहीं रोकता। तो ऊपर से प्रेम उतरा और
- 44:38कृष्णमूर्ति ये कहते हैं कि जब तक वो प्रेम न हो तब तक तुम शादी मत
- 44:42करना, बंधन में मत बंधना, वह किसी और प्रेम की बात करते हैं जो कभी
- 44:47कभी किसी बरले में उतरता। जो किसी हिर में उतर जाता है, जो
- 44:55किसी राधा में उतर जाता है और राधा मिल जाती कृष्ण और हीर मिल
- 45:02जाती रांझा और हीर कहती है। हिर ना खै कोई रांझण रांझण कर दी
- 45:16मैं कहा पे रांझण हुई मैं हिर नहीं हूँ मुझे हीर के नाम से मत
- 45:22पुकारो मुझे रांझा को मैं रांझे का नाम लेती लेती रांझा ही हो गई
- 45:28हूँ। बस यही था तुम्हारे सुमरण का
- 45:31रहस्य तुम वहगुरु वहगुरु करते करते तुम वहगुरु स्वयं ही हो जाओ
- 45:39क्या हो पाया फिर तुम अल्लाह अल्लाह करते, राम राम करते राम
- 45:46राम हो जाओ राम। राम मय हो जाओ नहीं राम ही हो जाओ
- 45:56वहगुरु वहगुरु करते करते तो वहगुरु हो जाओ कोई भी राम जपते
- 46:03जपते। तुम वही हो जाओ जिसका नाम तुम जप
- 46:09रहे हो। अहीर ने जपा रांझे को अहीर कहती
- 46:14है मुझे हीर न कहो हीर मट जाती है वहाँ जहाँ प्रेम होता है मुझे
- 46:24राँझा को। क्योंकि मैं रांझे से एकमित हो
- 46:29गई, मैं रांझे में बूंद की तरह समा गई जैसे समुद्र में समाती है
- 46:34वो मैं खुद ही रांझा हो गई, अब हीर कहाँ बची?
- 46:40अब हीर का नामो निशान मच गया, मुक गया।
- 46:44यही कहती है खीर लेकिन तुम समेत कुछ हो यही संत कहते हैं कि
- 46:52तुम्हारा वजूद कैसे मिटे, जैसे राधा का वजूद मिला मिटा तुम्हें
- 46:57राधा का नाम कहीं नजर आया सारे महाभारत में।
- 47:03राधा का नाम कहीं चिप रहा है। कहीं कहीं राधा दिखी दिखी तो कौन
- 47:15दिखी 16,108 रानियों दिखी 16,100 रानियों?
- 47:21जो नरकासुर के चंगुल से छुड़ाई गई थी और आठ रंगी जिनको ब्याह के
- 47:25लेके आए थे उनमें रुक्मणी जामा, वंती सुभद्रा क्षमा करना ये सब
- 47:39रानियाँ जो भुवा के लेके आए थे कृष्ण इनमें राजा कहाँ है?
- 47:47क्यों राधा का नाम क्यों नहीं आया?
- 47:48मुझसे लोग पूछ लेते है बाबा तुम्हें ही बताओ ये खोपड़ी
- 47:53तुम्हारे पास है। हीर जिंदा की और हीर को हीर के
- 48:00नाम से बुलाया जाता। तो हीर कहती ना मुझे मत भलाओ हीर
- 48:07के नाम से हीर कहाँ रहती? मैं तो राँझा हो गई।
- 48:15अर्ध नारिक का रूप देखा आपने शिवता, बस वो यही व्याख्यान करता
- 48:20है। शिव नहीं समाई, पर्वती ने पार्वती
- 48:25समाई शिव ने शिव ने कभी प्रार्थना नहीं किया, पार्वती ने मांगा शिव
- 48:30को बार को और वह उसमें समा गई अर्धनारी के बहुत से आपने।
- 48:39व्याख्याएं की बहुत सी आपने डेफिनिशन रचीं, लेकिन सही
- 48:45डेफिनिशन। उसकी ये ये पार्वती इतने प्रेम
- 48:49में पड़ गई कि शिव के साथ एकाकार होके अर्ध नारीश्वर बन गई।
- 48:56ऐसा ही किर के साथ। हीर तो जिंदा थी तो हीर के नाम से
- 49:01पुकारी गई। अगर राधा भी जिंदा होती तो ऐसा ही
- 49:05होता। हीर ने कहा नहीं आप मुझे हीर मत
- 49:08पुकारो। ती दो नहीं मैं राँझा मुझे राँझा
- 49:12को हीर न। रामचंद्रन राजन करती मेहता आपकी
- 49:19रांझण हुई मुझे रांझा कहो, मैं रांझा हो गई हूँ पार्वती कहती मैं
- 49:25अर्ध नारी सर मैं शिव हो गई हूँ मुझे शिव कहो पार्वती कोई न कहे
- 49:30उमा कोई न कहे। और अगर राधा जीवित होती तो राधा
- 49:37भी यही बोलती आज राधे राधे कहने वालों से राधा भी यही बोलती मत
- 49:44कहो राधा राधा मिट गयी मुझे लोग पूछ लेते राधा का नाम क्यों?
- 49:51जब राधा मिट ही गयी तो उसका नाम क्या है?
- 49:54राधाकृष्णन् ही तो हो गई, जो मिट गया उसका नाम कहूँ वह कृष्ण ही हो
- 50:03गई कृष्णमयी नहीं हो गई इसको समझ लेना, आप राममयी होना और चीज़ है,
- 50:11अलगाव बना रहता है। राम अलग सीता अलग राममयी होने का
- 50:19मतलब है कि राम अलग रह गया, अभी कुछ वेद है और सीता अलग है राधा
- 50:30अगर तुम राधा का नाम जपते हो। तो राधा अगर कहीं बैठी वो गुस्से
- 50:34होते होंगे, वो तुम्हें कहती होगी मत कहो मुझे राधा मैं कब की गुम
- 50:42हो चुकी मैं कब की फनाह हो चुकी मैं कब की मिल चुकी समुद्र में कब
- 50:48की मिल चुकी बूंद? अब तुम उसे ढूंढोगे कहा जो बूंद
- 50:53मिल गई समुद्र में ज़रा ढूंढ़ के दिखाओ फिर से वो ही बूंद कभी नहीं
- 50:59मिलेंगे भाई तुम्हें वह बूंद गई गई तो श्रद्धा के लिए गई और तुम
- 51:06हो के राधे राधे पुकारना चाहते हो?
- 51:10कोरी लफाजी अब तुम्हे बीसिक इसके भीतर की समझ आई बात क्या है?
- 51:21इरादा के इसलिए जिक्र नहीं आया। इरादा कुछ बोलती भी नहीं।
- 51:28राधा कृष्ण में मिल गई। जैसे बोंध समुद्र में मिल जाती
- 51:34है, राधा की चेतना छोटी है कृष्ण की चेतना विराट जैसे बोंध समुद्र
- 51:41में समा जाती है, वैसे ही राधा कृष्ण में समा गई कृष्ण विराट है
- 51:46अस्तित्व में। ऐसे ही ही राँजा में समाटी राजा
- 51:53विराट है और हीर बोंध है। सभी प्रेमिकाएं।
- 52:03मैंने कल के प्रवचन में कहा कि ये स्त्रियाँ ही कोण विलीन होती हैं
- 52:10क्योंकि स्त्री समर्पण है और समर्पण जो है समर्पण की मूर्ति वो
- 52:17ही विलीन हो सकती है। अटैकिंग प्रवृत्ति का व्यक्ति,
- 52:21मनुष्य पुरुष। वह विलीन नहीं हो सकता।
- 52:27समुद्र तो वैसा ही रहेगा। वह विराट समर्पित हृदय वाली
- 52:33स्त्री होती है, इसलिए स्त्रियां ही समुद्र में मिली, बूंद ही
- 52:39मिली, समुद्र में और बूंद खो गई। राधा हो गई, राधा का नाम नहीं,
- 52:46हीर जीती है तो इसे हीर के नाम से पुकारना तो हीर कह रहे हैं मेरे
- 52:52नाम से मत पुकारो अब मुझे रांझा करो अब मैं रांझा हो गई जैसे बूंद
- 52:57कह उठी हो उसे ऐसा। कि मुझे बूंद मत कहो, मैं सागर हो
- 53:03गई और यह उसकी महत्ता भी है। बूंद से समित्र हो जाना, ये उसकी
- 53:11महत्ता है। इसी के लिए ही तो इतनी मशक्कत की
- 53:15थी मिट जाना इसके लिए। तुमने अपने अरमानों की बलि दे दी
- 53:33और उसमें फना हो गए तुम्हारे अरमान खाक हो गए।
- 53:40बस अब वही बचा, बाकी न मैं रहा बाकी न मैं रहा, न मेरी आरजू रही,
- 53:53न मेरी कोई तमन्ना रही, न मेरा अस्तित्व रहा।
- 53:59बस तू ही तू हो क्या बूँद ही मिलती है।
- 54:07स्त्री समर्पित भाव ही मिल सकता है, अटैकिंग भाव नहीं मिल सकता,
- 54:14इसलिए स्त्रियाँ ही खोती हैं स्त्रियों का मार्ग समर्पण का
- 54:20मार्ग। स्त्री मन कह रही लेकिन अक्सर
- 54:25स्त्री का मन स्त्री ही होता है। स्त्री मन ही होता है, पुरुष का
- 54:29मन पुरुष मन ही होता है, गुम होता है स्त्री मन इसलिए राधा का जिक्र
- 54:38नहीं मिलेगा। हीर कहती मुझे मत कहो, हीर।
- 54:45कोई भी प्रेमिका मिट जाती है। जब तुम्हें प्रेम हुआ तुमने सामने
- 54:51देखा तो प्रेमी प्रेमिका से अपेक्षाएं बांध लेता है कि सदा
- 54:57मुझे ऐसे ही प्रेम करे। प्रेमिका भी ऐसे ही उपेक्षा करती
- 55:00है। यद्यपि प्रेम उसके हाथ में नहीं
- 55:03होता, ऊपर से उतरता है सच कंड से आता है, उसके दरबार से आता है
- 55:07प्रेम आता ही उसके दरबार से तो प्रेम उतरा और कोई ठिकाना नहीं
- 55:15प्रेम का उसके दरबार से प्रेम से लगता है।
- 55:20तुम्हारे सच्च खंड से तुम्हारे आँखों में छलक जाता है और आँखों
- 55:25से छलक के दूसरों की आँखों में समा जाता है और स्त्री तुमसे
- 55:30संभावित हो जाती है। पुरुष स्त्री से संभावित हो जाता
- 55:34है और तुम उस क्षण में एक में एक हो जाते हो एक में।
- 55:40एक हो जाते हो, अर्ध नरेश्वर की तरह इसे प्रेम कहते हैं तो फिर
- 55:48क्या होगा? तुम अपेक्षाएं करोगे सदा मुझसे
- 55:50ऐसे ही प्रेम करते हो। डब्ल्यू राम की घरवाले ने पूछा,
- 55:58धर्मपत्नी ने क्या तुम मुझे ऐसे ही प्रेम करते रहोगे?
- 56:04तो डब्ल्यू राम बोला बिलकुल बिलकुल दिला शक तुम्हें कोई शक है
- 56:09क्या? लेकिन हो नहीं याद आया।
- 56:16बस एक बात बता दो क्या तुम अपनी माँ की तरह तो दिखना नहीं शुरू हो
- 56:21जाओगी? आज से 3040 साल बाद बस वो ही
- 56:27तुम्हारा प्रेम भी ऐसा ही है तुम अपेक्षण करते हो, तुम चाहते हो
- 56:33यही रांग यही चेहरा? यही मोहरा यही घनी काली नाभिन
- 56:39जैसी जुलते है। ये सब कुछ बना रहे है।
- 56:47कहाँ बना रहता है? जिसपे तुम मंत्र मुग्ध हुए थे वह
- 56:51शरीर रोज़ बोलता है, बदलता है। पल पल बदलता है और दब्बडू राम
- 57:04कहते तुम अपनी माँ जैसी तो नहीं हो जाओगी, मैं सदा ही ऐसा प्रेम
- 57:11करता रहूँगा। बिलकुल ये तात्कालिक घोषणाएं हैं।
- 57:15जो प्रेमी कहता है कि मैं तुम्हारे लिए तारा भी तोड़ लूँगा,
- 57:18इसके बाप कर आ जाते है तारा कितना भरा है तुम्हें पता है पृथ्वी से
- 57:24हजारों गुणा भारी हैं तारे और कितनी दूर है कौन जायेगा यहाँ से?
- 57:29और जाने के लिए कोई साइकिल नहीं जाती, कोई मोटरसाइकिल नहीं जाती।
- 57:34कोई रॉकेट नहीं पहुंचते, तारों के ध्रुव तारे के कितने रॉकेट बजाए
- 57:37आपने मग्गल तक जाने में तुम्हारी पति निकल रही है और योगी क्षण में
- 57:49चला जाता है? तुम चंद्रमा तक जैसे तैसे पहुंचे
- 57:59और बात करते हो। द्रोप की 440 बिजली की गति से
- 58:073,00,000 किलोमीटर पर सेकंड की रफ्तार से जहाज बनी।
- 58:12तो 440 वर्षों में पहुंचोगे और इतनी उम्र तो होती ही नहीं रहती।
- 58:25अपेक्षा अपेक्षाएं करना उसके बाद अधिकार करना तुम्हारा अधिकार हो
- 58:33जाता है। और ऐसा विशेषता पुरुष मन ही करता
- 58:37है समझ लेना बात को पुरुष मन की बात करता हूँ पुरुषों से जा के
- 58:42कालरो में आत्म दे देना की कॉलर पकड़ के क्या तू मुझे भागा क्यों
- 58:49था छोड़ दे अरे? पुरुषमन भगोड़ा है, स्त्रीमन ठहर
- 59:04जाती है तुमने देखा कभी स्त्री बैठी हो ऐसे जैसे मूर्ति बैठी हो
- 59:09तुमने देखा कभी पुरुष भटकता हुआ छोटा बच्चा भी कितना हो छोर को
- 59:13मचाता है अगर पुरुष घर में ना हो बच्चा?
- 59:17मेल न हो तो स्त्री पुत्र के लिए तड़पती है इसलिए तड़पती है कि
- 59:22स्त्री का मन ठहरा हुआ होता है और छोटा बच्चा वह कोई न कोई
- 59:32अव्यवस्था करता ही रहेगा। कभी कुछ तोड़ दिया, कभी कुछ तोड़
- 59:36दिया खटपट, खटपट स्त्री बच्चा ऐसी नहीं करती, बैठ जाएगी, आराम से
- 59:45बैठ जाएगी, लेकिन पुरुष बच्चा ऐसे करें इसलिए स्थितियों को पुरुष
- 59:51अच्छे लगते हैं। और पुरुषों को ठहरा हुआ मन स्त्री
- 59:56अच्छी लगती बच्ची, इसलिए बाप को बेटे से इतना प्रेम और माँ को
- 1:00:03बेटे से इतना प्रेम और कोई कारण साइकोलॉजिकल कारण है।
- 1:00:09यह ठेहराव और उपद्रव का कारण है। तो किसी ने तुम्हें प्रेम किया,
- 1:00:13तुम्हें अपेक्षा हो गई अपेक्षा से अधिकार पैदा होता है तो हम अधिकार
- 1:00:18करने लगे, उसका अधिकार है मेरा, तुम कहीं नहीं जाओगी मुझसे छोड़कर
- 1:00:23और तुम्हारे फेरों में तो ये वचन दिया जाता है देखो ये वचन मत देना
- 1:00:27जब ये दूसरा वचन आ जाए ना। तुम मुझे छोड़कर अकेली कहीं नहीं
- 1:00:32जाओगे, तुम कहो तुम जाओ भाड़ में, हम तो चले तो सिंदूर भरने से पहले
- 1:00:41ही उठ खड़े हो तुम कहना हम तो शादी करेंगे भाई ये पंडित जी
- 1:00:46महाराज को करो पिता। और हम तो शादी करेंगे कोर्ट में,
- 1:00:50वहाँ कोई किसी तरह के बंधन नहीं होते, कोई साथ वचन वहाँ नहीं लिए
- 1:00:55जाते तुम ज़रा जा कर देख और फिर भी जाना तो वहीं पड़ेगा मान्यता
- 1:01:02नहीं है। मान्यता है कोर्ट में कोर्ट मैरिज
- 1:01:06भी करवानी होगी तुम्हे। कितना ही ब्राह्मण से फेरे दिलवा
- 1:01:11लो। ब्राह्मण सात वचन लेगा और दूसरे
- 1:01:15वचन में कहेगा तो मुझे छोड़कर अकेली नहीं जाओगी, कहीं कोई सामान
- 1:01:20लेना हो, कहीं कोई काम हो, किसी सहेली के यहाँ हो, एकांत में नहीं
- 1:01:25जाओगी। और स्त्री को पता ही नहीं लगता है
- 1:01:30क्या बोलता है संस्कृति में बोलते हैं।
- 1:01:32मैंने बोला ना ये आते हैं, ना टेली वाले घोड़े ना तो भंडार
- 1:01:36मारेगी। ये गाली भी निकल जाती है।
- 1:01:38अब मैं गाली बार बार तो आपको क्या बताऊँ?
- 1:01:40एक बार मैंने बता दी क्या गाली निकालते हैं।
- 1:01:45अब जो नहीं देता पैसा जो में कुछ डाल देता है, वो तो ठीक है, जो
- 1:01:50में कुछ नहीं डालता। वो कहता बाबा आगे उनके मोर पंख भी
- 1:01:54लगे होते है तो सारे इकट्ठे बोलते है बम बम बम, बम लहरी और बीच में
- 1:02:02अगर नहीं पैसा दोगे तो? अपेक्षा से अधिकार है।
- 1:02:14जिसने प्रेम किया अपेक्षा करके वो सदा ऐसे ही प्रेम करता या करती
- 1:02:18रही अधिकार हो जाता है, मुझे छोड़ के नहीं जाओगी, सिर्फ यही सांझ को
- 1:02:26सारा हिसाब ले लेती स्त्री वरुक्ष दिखाओ, मोबाइल सारी कॉल्स दिखाओ,
- 1:02:34डीटेल्स दिखाओ मैसेजस दिखाओ यह प्रेम है क्या प्रेम गहरी श्रद्धा
- 1:02:41होती है, गहरा विश्वास होता है श्रद्धा विश्वास हो।
- 1:02:48या बिना उसके बिना प्रेम फलित नहीं होता कहाँ कब, क्यों ये नहीं
- 1:02:58होता उसमें प्रेम, लेकिन तुम तो हिसाब से मांग लेते हो सर ये
- 1:03:04प्रेम है या व्यापार ये व्यापार है?
- 1:03:08तुम्हें भ्रम पड़ गया, फिर उससे क्या होता है?
- 1:03:12उससे क्लेश होता है। क्यों हिसाब पूछा तुमने फिर तुम
- 1:03:16हिसाब दो बराबर फिर मन में गोंद पैदा होता है, मन में तोड़ फोड़
- 1:03:24पैदा होती है फिर अदालत में। फिर तलाक की अर्जियां देते हो और
- 1:03:34दूसरे पुरुष और स्त्री से शादी कर लेते हो, बात तो वही है।
- 1:03:39स्त्री बदली तुमने पुरुष बदल लिया तुमने माँ ने कहाँ बदला?
- 1:03:45बात तो तुम्हारे मन के बदलने की थी तो छोड़ना था धन से शुरू करो
- 1:03:53फिर धन के बाद धन छोड़ के जैन मुनि मत बन जाओ, क्योंकि एक बहुत
- 1:03:59बड़ी चिपकाहट अभी बाकी है, जिसे संत कहता कि आखिर में तोड़ूंगा
- 1:04:04भाई। पहले इन संस्कारों को प्रबल करो,
- 1:04:07तुम छोड़ने के संस्कार प्रबल करो अब तक तुमने मूर्खता के संस्कार
- 1:04:15प्रबल किये थे। अब एक आखिरी अड़चन आएगा।
- 1:04:20आखिरी अड़चन जहाँ जाके बड़ी मुसीबत खड़ी होती है।
- 1:04:24जहाँ गुरु की आवश्यकता पड़ती है तुम कहते हो कृष्णमूर्ति गुरु
- 1:04:32गोबिंद सिंह फिर वशु फिर कबीर, फिर नानक और कृष्ण इनको कंपैरिजन।
- 1:04:45एक बड़ी चिपकाहट को तोड़ना ये गुरु का काम है।
- 1:04:52अगर तुम खुद से उस चिपकाहट को नहीं काट पाते जो कि देखिए, मैं
- 1:04:58इसे करीब की वसंभव ही मानता हूँ। जैसे तुम अपने पांवों के सहारे
- 1:05:06ऊपर उठ जाओ, आसमान में उठ सकोगे नहीं कोई लिफ्ट ही तुम्हे उठा पाए
- 1:05:15बस तुम यही तुम्हारी इच्छा है कि तुम अपने ही सारे।
- 1:05:18ऊपर आसमान में उठ जाओ नहीं उठ सको कोई लिफ्ट तुम्हें ऊपर ले जाएगी,
- 1:05:25वो लिफ्ट होगी। गुरु और जीवंत गुरु के शस्त्र के
- 1:05:33शद भी तुम्हें ऊपर नहीं लेके जाएंगे और ये कहते हैं कृष्ण
- 1:05:37मुक्त। न किसी पद्धति की जरूरत, न किसी
- 1:05:41गुरु की जरूरत, न किसी विधान की जरूरत, न किसी शास्त्र की जरूरत।
- 1:05:54गुरु गोविन्द सिंह कहते हैं कि शास्त्र की तो जरूरत है।
- 1:05:57जीवंत गुरु की जरूरत नहीं, सबके अपने अपने बुराइयां भी हैं और
- 1:06:03सइयां भी हैं। क्यों कहते हैं गुरु गोबिंद सिंह?
- 1:06:08क्योंकि उन्होंने जाम दिया है। ये नकली गुरु बन गए असली गुरु तो
- 1:06:13नमम पाश्चा गुरु थेग भादक। तप कर रहे थे।
- 1:06:18एकांत जोकने में बैठ और सभी कह रहे हैं मैं गुरु मैं गुरु मैं
- 1:06:23गुरु जो सच्चा गुरु था उसने तो छील के मोड़ा दिखा दिया कि मैंने
- 1:06:28तेरा जहाज पार लगाया, ये देख कितना काप हो गया माथन शाह तो इस
- 1:06:40कारण से उसने ये गुरु की गुरु डंभ समाप्त किया।
- 1:06:45उसने कहा बस गुरु मान्यता लेकिन ये भी श्रद्धा कितनी ही हो,
- 1:06:50शास्त्र बोल तो ना पायेगा ये मुश्किल खड़ी हो गई अब गुरु बोल
- 1:06:56तो पायेगा। लेकिन बड़ी मुश्किल है जब गुफाएं
- 1:07:00और इतने मोड लोग हैं। पढ़े लिखे कितने भी हो लेकिन पढ़े
- 1:07:05लिखे होने से भीतर की छींटवता बढ़ जाती है।
- 1:07:13यह तुमको कुछ नहीं। न्यूरॉन्स का ज्ञान बढ़ जाता है।
- 1:07:18ये ठीक न्यूरॉन्स में ज्यादा सूचनाएं पीड़ित हो जाती हैं।
- 1:07:24हो जाती हैं ये ठीक लेकिन तुम्हारी चेतना उठती है ऊपर ये
- 1:07:32किस मूर्ख ने कहती है? ये सर लोगों के इसका अंतर तो सर
- 1:07:37लोग जो सब जानते हैं उसकी चेतना तो बहुत ऊपर हो जानी चाहिए और
- 1:07:41सबसे पहले पहुंचना ही ए आई को चाहिए।
- 1:07:44वो सब जानता है तुमसे कहीं लाखों गुना ज्यादा जानता है।
- 1:07:49ये सर लोगों से या चार लोगों से लाखों गुना ज्यादा जानता है।
- 1:07:53सूचनाओं को ज्यादा संग्रहित होना चेतना का विकास नहीं गिना जाना
- 1:07:58चाहिए। मेरे इन शब्दों को आप स्वर्ण
- 1:08:00अक्षरों में लिखो। सूचनाओं का बहुत अधिक संग्रह
- 1:08:09तुम्हारे को भर सकता है। चेतन अचेतन को भर सकता है।
- 1:08:13लेकिन तुम्हारी चेतना को ऊपर ऊंचाइयों पर ले जाए, यह नहीं हो
- 1:08:20सकेगा। कभी इसलिए बड़े बड़े डॉक्टर बड़े
- 1:08:23बड़े इंजीनियर इन मुड़ों के पांव में पड़ जाते हैं और कितने ही से
- 1:08:29कहते हैं कर रहे हो। कितने ही इनके ऊपर।
- 1:08:33दावे चले जाएं। कितने ही जज जजमेंट बैठा दें,
- 1:08:41लेकिन फिर ये किसी राजनीतिक कारणों से क्योंकि बड़ा एक जो
- 1:08:48मुँह ढोंका पीछे लग गया। ये मत देखोगे, ये कौन है?
- 1:08:55ये कोई मिनिस्टर है या कोई इंजीनियर है या कोई डॉक्टर है या
- 1:09:00कोई कुछ है? इन सूचनाओं से कोई समझ नहीं
- 1:09:03चाहिए। इतना बड़े बड़े इंजीनियर और
- 1:09:07डॉक्टर मैंने पागल होते देखे है। पागलखानों में बंद देखे है मैंने
- 1:09:11देखे है। मेरा खुद का भाई डॉक्टर था, बड़ा
- 1:09:20ही कमिटेड सुसाइड उसने गाड़ी के नीचे से क्या करोगे, क्या करोगे
- 1:09:27सूचना? जब जीने का डंग नहीं आया और ये
- 1:09:37मूड तुम्हें जीने का डंग सिखाएं। क्या तुमने किसने बता दिया ये
- 1:09:41तुम्हें जीने का डंग नहीं बता सकते।
- 1:09:44जीने का डंग वो बताएगा जिसके जीवन में प्रेम उत और जिसके जीवन में
- 1:09:52प्रेम उद्रा उसके जीवन से वासना सुरोहित हो जाये यह समझ लेना
- 1:09:59जिसके जीवन में प्रेम उद्रा उसके जीवन में वासनाएँ सुरोहित हो
- 1:10:04जाएंगी। तो आखिरी जो चिपकाट है उसको
- 1:10:09तोड़ना होगा। जीस वासना की मैं बात करता हूँ
- 1:10:20मैं चिपकाहटों को वासना कहता हूँ ऐसा तो अगर देखा जाए कृष्णा
- 1:10:26मूर्ति के बारे में अब तुमने पूछ ही लिया तो मैं बता देता हूँ।
- 1:10:32कृष्णमूर्ति की फलाससी विवाह के मामले में बड़ी प्यारी कृति जो
- 1:10:39प्रेम पूर्ण स्वतंत्रता दे तो मैं वो विवाह ही शुभ है।
- 1:10:46प्रेम पूर्ण स्वतंत्रता इस शब्द को आप गांठ मात लेना।
- 1:10:52तुम्हें आजादी भी मिले अपने ढंग से जीने क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति
- 1:10:57अद्वितीय और प्रेम पूर्ण क्लेश करके प्रेमपूर्ण स्वतंत्रता जो
- 1:11:07तुम्हें होने देता है वह असली प्रेमी।
- 1:11:11कृष्णमूर्ति के साथ रोसलैंड राजगोपाल नाम की एक स्त्री थी।
- 1:11:1925 वर्षों तक उससे प्रेम संबंध रहे यद्यपि वो विवाहित थी।
- 1:11:27और उसके पति का नाम था राजगोपाल उसलैंड राजगोपाल 25 वर्षों तक और
- 1:11:35यहीं नहीं दांतों तले ऊँगली में दबा।
- 1:11:40अब तुम कहोगे ये तो बहुत नरक नरक वाला काम हो गया।
- 1:11:45इन 25 वर्षों के दौरान वह रोसलिंड राजगोपाल तीन बार गर्भवती हो गए।
- 1:11:55आँखें मत मूंदो तीन बार गर्भवती हुई और यहीं बस।
- 1:12:05कृष्णामूर्ति ने वो तीनों घर अब गिरा दिए।
- 1:12:10क्या कहोगे इसे? कृष्णामूर्ति की घरवाली बनते रही,
- 1:12:1625 वर्ष तक रही एक 2 दिन। उसका नाम था राजगोपाल की घरवाली
- 1:12:23थी। तीन बच्चे प्रेग्नेंट हुई, वो तीन
- 1:12:28बार, तीन बच्चे हुए और विश्वास सूत्रों से मुझे पता चला वो तीन
- 1:12:35बच्चे लड़कियां थे। खैर, उस वक्त ऐसा शक नहीं होता
- 1:12:41होगा। उस वक्त इतना भेदभाव नहीं था।
- 1:12:45वो तीनों गर्भ गिरा दिए गए। बात तो गर्व गिरनी होगी क्या एक
- 1:12:54एनलाइटन पर्सन ऐसा भी घनौना काम कर सकता है?
- 1:12:59यहाँ तक तो सुना था तुमने कि 16,108 राणियों के साथ कृष्ण के
- 1:13:10संबंध में ठीक, लेकिन कोई गर्भपात नहीं।
- 1:13:17किसी को गर्भ में बुलाकर और उसे टैंकी से कटवा देना, ये क्या हुआ
- 1:13:27और फैसला तुम खुद ही करो, मैंने बेहतर की बात सुना बता दिया।
- 1:13:32तीन बार गर्भवती हुई, तीनों बार गर्व को पूरा दिया गया।
- 1:13:36उसका नाम था रसलैंड राजकोपर। ये खुलासा कैसे हुआ?
- 1:13:47उसकी बेटी रसलैंड की बेटी अपनी किताब में खुलासा किया।
- 1:13:54कि मेरी माता तीन बार गर्भवती हुई, कृष्णमूर्ति से गर्भवती हुई
- 1:13:59और तीनों बार वो गर्व करा दिया गया।
- 1:14:04लाइव्स इन दी शैडो विथ जे कृष्णमूर्ति जे दो कृष्णमूर्ति ये
- 1:14:13लिखा उसकी पुत्री राधा राधा राजापाल उसकी बिलकुल अर्थी पुत्री
- 1:14:29है। उसने इस किताब में लिखा।
- 1:14:36इन दी शैडो विथ जय कृष्णमूर्ति किसी को दोष देते हुए उसने प्रिंक
- 1:14:48करवा ली मारती। किसी को किसी नाम पे दोष देते हो,
- 1:14:56किसी को किसी नाम पे दोष देते हो? जैनियों ने कृष्णा को साथ में नरक
- 1:15:01में डाल रखा है ये तुम्हारी सामाजिक व्यवस्थाएँ, चारित्रिक
- 1:15:06व्यवस्थाएँ, इनका धर्म से कोई भी संवेदन नहीं है।
- 1:15:17नहीं, तुम बिल्कुल इन चीजों को यकसंद कर लेते हो कि दोनों एक ही
- 1:15:23चीज़ में साधु और संत में बड़ा फर्क होता है, साधु होता है जिसने
- 1:15:30चरित्र का निर्माण किया। ये श्वेत साड़ी वाली है।
- 1:15:36बाहर से तो श्वेत है ना, मैं क्या करूँगा?
- 1:15:43ये साधु हैं, लेकिन संत में फर्क है।
- 1:15:51संत कोण जो चरित्र निर्माण नहीं करता।
- 1:15:56किसी भी प्रकार का ठप्पा नहीं लगाता।
- 1:15:59युधिष्ठिर कहते हैं, मैं सत्य बोलेंगे, कृष्ण कहते हैं नहीं
- 1:16:02चलेगा फिर तुम मरने को तैयार हो जाओ, झूठ बोलो, यहाँ झूठ बोलना
- 1:16:06पड़ेगा व्हेरएवर नेसेसरी यहाँ तुम मरोगे, अपने भाइयों को भी मार
- 1:16:12दोगे, तुम बड़े। तो मैं झूठ बोल रहा हूँ और बोलो
- 1:16:23बोलो तो मुख्य शत्रु मारा गया गुरुद्वारा क्या कहा?
- 1:16:33हतो अश्वथम गजो किम्बा गुंजरो तुम्हारा साधु
- 1:16:55संत नहीं है, चरित्र को साधना संत नहीं है, भला पुरुष है।
- 1:17:06बिलकुल ठीक संत है, खुद को जान लिया है, अपना विस्तार जान लिया
- 1:17:12है ये नहीं खुद को जानना ये है एनलाइटन खुद को जानना।
- 1:17:25और खुद के विस्तार को जानना ये है परमात्मा ये तीनों क्रमबद्ध आते
- 1:17:31हैं। साधु से पहले खुद को जानो यानी
- 1:17:40बुद्ध सबसे पहले गौतम से बुद्ध होना।
- 1:17:45और बुद्ध के आगे भी एक छोटा सा मार्ग रह जाता है।
- 1:17:51वो तुम्हें नहीं चलना होता है, वो परमात्मा खुद चलता है।
- 1:17:57बुद्ध परमात्मा हो गए लेकिन बुद्ध?
- 1:18:02ने परमात्मा को माना नहीं, क्योंकि परमात्मा की राह पे चले
- 1:18:06नहीं। उन्होंने इतना वक्त नहीं दिया
- 1:18:08इसलिए परमात्मा होने के लिए अब वो जूस से भर रहे हैं।
- 1:18:13के के जन्म और मिल जाए क्योंकि आगे की यात्रा थोड़े से भोग भी
- 1:18:17हैं। करुणा के कारण उन्हें भोगने
- 1:18:21पड़ेंगे। खुद की वासनाओं के कारण और खुद का
- 1:18:26फैलाव भी करना होगा। अंतरिम सत्य तो जानना ही होता है
- 1:18:29भाई इसके बिना मुक्ति नहीं मुक्ति यानी मोक्ष नहीं, मुक्ति और मोक्ष
- 1:18:36में यही फर्क है। मुक्ति तो हो गई तुम्हारी जब
- 1:18:39तुमने जान लिया, मैं देय नहीं हूँ।
- 1:18:41फिर इसको कैसे तोड़ोगे जनाब? जब तुम धन की संलिप्तता को
- 1:18:48छोड़ोगे कलिंगनिस को छोड़ोगे यह प्रथम कायदा है फिर धीरे धीरे
- 1:18:53छोड़ते छोड़ते छोड़ते छोड़ते अंतिम प्रणाम क्या है?
- 1:18:57तुम शरीर नहीं हो बड़ा मुश्किल होगा।
- 1:19:00तो मैं तो कोई गंधा भी मार जाए तो तुम आंखें लाल कर लेते हो, ऐसा
- 1:19:06नहीं चलेगा यह संतत्व नहीं, इस संसार में चलेगा फिर संसार की
- 1:19:12किंतु परन्तु मत करो और अगर उस मुकाम पर जाना है।
- 1:19:17तो फिर शरीर तुम नहीं हो इस एकलिंग न से भी आखिर में छूटना
- 1:19:22होगा ये है संबोधि इसको संबोधित कहते हैं बुद्ध के बराबर का सम
- 1:19:32आगे भी है कुछ। बोध से आगे का बोध भी है।
- 1:19:38समबोधि बोध से आगे का भी एक बोध है।
- 1:19:45कहीं तुम बुद्ध हो जाते हो और कहीं तुम बोध से परे भी हो जाते
- 1:19:49हो, वहाँ तक भी पहुंचना ये अंतरिम लक्ष्य।
- 1:19:56तुम आत्म हो तो आत्म एक सूत्र है और तुम विराट हो।
- 1:20:03विराट सूत्र नहीं है, विराट परम है, विराट अनंत है, कोई और सूत्र
- 1:20:09नहीं है उसका यहाँ तक जाना होता है।
- 1:20:11लास्ट। तो उषा कृष्ण मुक्ति के बारे में
- 1:20:16आपने ऐसा लगता है आप ओषों की नकल करते हो?
- 1:20:25ऐसे सब दूसरे की एक दूसरे की नकल करते पाएंगे?
- 1:20:30क्योंकि कबीर ने भी बात खत्म की। सभ्य स्या ने एक मत आखिर में जाके
- 1:20:36मत एक ही होगी जो बोलेंगे आखिरी सेंटर के बारे में केंद्र के बारे
- 1:20:40में वो हूबहू वही होगा, कोई नहीं कहेगा वो घृणा की मूर्ति है सभी
- 1:20:45कहने के वो आनंद की मूर्ति कोई नहीं कहेंगे वहाँ दुख है।
- 1:20:49सभी कहेंगे आनंद ही आनंद है, कोई नहीं कहेगा वहाँ घनी धूप है, सभी
- 1:20:54कहेंगे क्या बात है? घनी श्याम है, शांत है जो उसके
- 1:21:00मूल जो गुण हैं उनको घो नहीं बदले जाएंगे।
- 1:21:06इसलिए मूल गुण नहीं पता लगा। सत्य चित्त आनंद लोग मुझे कहते
- 1:21:11देते हैं कि निरंकारी कहते हैं ये नैनं चेदंती शस्त्रणी नैनं दाती
- 1:21:21पाब का ये कटता भी नहीं। यह गलता भी नहीं, जलता भी नहीं,
- 1:21:28यही भ्रम है तो मैं कहता हूँ बिल्कुल ठीक तुम्हारी सोच तो
- 1:21:33पोपड़ी से बहुत बढ़िया निकली लेकिन मुझे ये बता दो कि इसमें
- 1:21:37चेतन कहाँ है, सत्य चित चित कहाँ है, इसमें क्षेत्र कहाँ है और
- 1:21:43आनंद कहाँ है? ये दो चीजें चूक गया तुम्हारा
- 1:21:47निरंकार मिशन कहाँ है चेतना आकाश में कहाँ है चेतना बताओ और कहाँ
- 1:21:56है आनंद अगर आकाश में आनंद है तो तुम पकड़ लेती, आनंद को नहीं नहीं
- 1:22:04नहीं। यहाँ जो गया ये धर्म मुढ़ताओं ने
- 1:22:08बनाई ये धर्म नहीं है इसलिए मैं इनको सांप्रदायिक रहता हूँ।
- 1:22:12धर्म तो बस एक तुम्हारा स्वरूप है जो सत है सदा है ना बदलता है, ना
- 1:22:19बदला जा सकता है, ना कटता है, ना जलता है ना काँटा जलाया जा सकता
- 1:22:24है। वो तुम्हारा स्वभाव है, शर्त चित
- 1:22:30वो चेतन है, चेतन है का मतलब जब वो निकल गया तो सब गतिविधि समाप्त
- 1:22:39चेतना के होने से तुम में आती है जान।
- 1:22:42और चेतना के निकल जाने से तुम हो जाते हो।
- 1:22:45बेजान यह चेतना ही है, जो इस पदार्थ के शरीर को भौतिक शरीर को
- 1:22:54ऐसे घुमाती फराती है नचाती है इस चेतना के कारण आकाश कहाँ नाचता है
- 1:22:59बताओ मुझे? आकाश को नाचते कभी देखा तुमने अगर
- 1:23:04चेतना होती तो वो नाचता है ना बोलता ना चित्त आनंद कहाँ है आनंद
- 1:23:13कहाँ झूमा आकाश आनंद में कहा उसने बिखेरी मुस्कराहटों की आहटें।
- 1:23:22कहाँ वो ज़रा बताओ कोई है जो तुम्हारे पास ऐसे मूर्खता में मत
- 1:23:30ना तुम धर्मों का संचार किया करो कितने पानी तुमने पीछे लगा दिए और
- 1:23:36आगे की आगे बस जैसे सभी एनलाइटन हो गए हैं।
- 1:23:40सभी बुद्ध हो गए हैं, तुम गद्दी को संभालो, तुम गद्दी को तुम
- 1:23:44संभालो, सब मूड लोग हैं, मूड आनंद हैं बस आगे की आगे गद्दियाँ बट
- 1:23:52रही हैं, समझ नहीं आ रही है किसी को भी।
- 1:23:58कोई कृष्ण के शब्दों से लाभ उठा लेता है, कोई किसी के शब्दों से
- 1:24:03लाभ उठा लेता है। तुम लाभ उठाते रहो, तुम लाभ ही
- 1:24:07उठाने के योग्य रह जाओगे। उस आनंद को पीने के योग्य न हो
- 1:24:12जिससे खुमारी उमड़ती है। जीसको बाकी सब तृप्ति हो जाती है।
- 1:24:18फिर तुम डोलते नहीं भरते, मेरे पास बहुत से नृंकारी आ जाते थे।
- 1:24:23थपे ना जाए कितना ना होए आप आप नरंजन सोए मैं तुम चुप हो जाओ,
- 1:24:30मैं तुम्हारी निरंकारिता को अच्छी तरह से जानता हूँ निरंकारी मुझसे
- 1:24:37पूछ जाते। जाके वहीं ऐसा ऐसा का पाठ मुझसे
- 1:24:48सीख के चले जाते, खुद का तो कुछ पता नहीं है, अनुभव नहीं है अभी
- 1:24:52भी मेरे चैनल पे जदा करा आप रोज़ पाओगे?
- 1:24:55पांच छः लोग ऐसे हैं जो कंटेंट को चुरा के एकदम से डिस्कनेक्ट हो
- 1:25:01जाते हैं। अनसबस्क्राइब कर देते हैं ये कौन?
- 1:25:03लोग वही लोग हैं जो कंटेंट चुरा के चले जाते हैं?
- 1:25:06इनके मित्र से तो कंटेंट आता है, ये वही लोग हैं।
- 1:25:14जिनके भीतर से कॅन्टेंट नहीं आया और मुझे पता भी लग जाता है बाबा
- 1:25:19इसने ऐसा किया, मैंने कहा अगर इसके बच्चे पलते हैं तो पल जाने
- 1:25:22दो, महंगाई घनी है भाई, अच्छे दिन चल रहे हैं तो चलने दो, कोई बात
- 1:25:29नहीं क्या फर्क पड़ता है। तृप्ति ना हुई सब मिल जाएगा।
- 1:25:38गलतियाँ मिल गईं, गुरु माता कहलाओगे, गुरु पिता कहलाओगे, सब
- 1:25:43कुछ कहलाओगे, लेकिन तुमने क्या सीखा क्या?
- 1:25:47गए। क्या चेतना का विकास हुआ?
- 1:25:50क्या जो तुम्हारा मुख्य लक्ष्य था?
- 1:25:55यही कबीर कहते है सब होता है, सब्र नहीं होता और सब्र ही उसकी
- 1:26:06पहचान। कबीर कहते हैं सब हो, पदार्थ हो,
- 1:26:15आस पास बरफ पूरा हो सब सब्र, संतोष न जब आवै संतोख, धन सब धन,
- 1:26:24दूध, समां बाकी के सब धन। दूध हो जाते हैं, माटी हो जाती
- 1:26:31हैं, राप हो जाते हैं। कहत कवि सुनो भाई।
- 1:26:52साधु कहत कवि सुनो भाई साधु कहत कवि।
- 1:27:16सुनो, भाई। साहब?
- 1:27:27मिल में। मिलहीं साहेब मिलहीं सबूरी में
- 1:27:43सबूरी में। मन डोला जो मेरे होरा फकीरी मैं
- 1:27:58फकीरी मैं मन डोला, जो मेरा। सब्र न है, तृप्ति न हुई बस
- 1:28:16ज्यादा शब्द मत लेना, लक्षण के रूप में एक सब्र ले लेना 30
- 1:28:23लक्षणों को। भी एक बार की भुला देना भगवान
- 1:28:29कृष्ण के 30 लक्षण हमानितुम दंभितुम हिंसा शांतिराज्यमं
- 1:28:36आचार्य उपश्रम शवचम् शरम आत्माविनय क्रहा 30 लक्षणों को भी
- 1:28:41भुला देना। एक लक्षण को ले।
- 1:28:46क्या मुख्य लक्षण को ले? अगर तृप्ति आ गई तो सब आ गया अगर
- 1:29:01तृप्ति ना आई। तो चारों तरफ पदार्थों का खजाना
- 1:29:05और उनमें तुम बैठे हो। तुम्हारे आसपास सोने, जोहरा, खीरे
- 1:29:14की खदानें भी हों और तुम उनके ऊपर मालिकाना हक भी को न रखते हो मगर
- 1:29:20सब्र नहीं है। वो नहीं है जिसे तुम साहेब कहते
- 1:29:25हो। साहेब मिला ही सबूरी में साहेब
- 1:29:36आनंद को कहते हैं रस, आनंद रस, सब्र नहीं आया तो रस भी नहीं आया।
- 1:29:46बस तुम एक लक्षण से ही परख देना छोड़ 230 लक्षणों को मैं एक लक्षण
- 1:29:53ही मुख्य आपको गना देता हूँ सब्र से मिलती है स्थायित्व सैरियम।
- 1:30:05सब्र से ही आता है। सब्र से ही तुम अमानितम मान की
- 1:30:16अपेक्षा न रखोगे क्योंकि सब्र में इतना मान मिल जायेगा तुम्हें
- 1:30:20परमात्मा के घर से। कि तुम्हें और मान की जरूरत नहीं
- 1:30:25होगी और सम्मान मिले इसकी अपेक्षा नहीं रखोगे।
- 1:30:29दम भी तुम दम भी नहीं आएगा। तुम्हें दम तो फोके मान को कहते
- 1:30:34हैं जो तुम हो नहीं कागजी मान जो आज के राजनीतिक व्यवस्थापक उच्च
- 1:30:40पदस्थ। ये कहते हैं वो दंभ है, हिंसा,
- 1:30:50अहिंसा, अहिंसा भी मत गुणो बड़ा सुंदर लक्षण है कमाल करते।
- 1:31:02जहाँ अनिका गणिका भी कर जाती हैं और सती सावित्रीयां मुख देखती रह
- 1:31:10जाती हैं। स्वेत सड़ी।
- 1:31:21अणका गणिका चली जाती है सच्चखंड में अपने अंत में और सदना कसाई
- 1:31:32चले जाते हैं, अमानक को दंभितों में हिंसा, शांति राज्य एवं।
- 1:31:45बड़ी शांति होती है। ये भी छोड़ो क्योंकि आनंद आएगा तो
- 1:31:52आनंद की छाया की तरह शांति भी आ जाएगी।
- 1:31:57आनंद की छाया है। आचार्यों के पास सुन आचार्य के
- 1:32:00पास भी बैठने की आवश्यकता है। तुम क्यों नकली आचार्यों के पास
- 1:32:06बैठते हो, जिनके पास पता नहीं, सिर्फ ज्ञान ही ज्ञान है, फोंका
- 1:32:16कहीं कुछ? अनुभव का लक्षण दिखाई देता हो।
- 1:32:21लगता नहीं कुक स्थरता नहीं आई मुख्य चीजों का अगर इन में तुम
- 1:32:28पाओगे अगर इन में तुम पाओगे एक चीज़ को मैंने कहा तुम एक चीज़ को
- 1:32:36जांच लेना क्या। तुम्हारे भीतर संतोष आ गया, तृप्त
- 1:32:44हो गए थे और तृप्ति को भी दूसरे पैमाने से एक ही पैमाना वो है
- 1:32:50क्या स्थिरता तृप्ति को पा के तुम सिथरे हो जाओगे?
- 1:32:57इन दो चीजों को देख लेना ज्यादा बस आपको मैंने रस निकाल दिया से
- 1:33:03तृप्ति को पाकर तुम फित्र हो जाओगे, ना हिल स्टेशन जाओगे ना
- 1:33:10विदेशों में जाओगे, ना कहीं दर्शन करने जाओगे, ना तीर्थों में जाओगे
- 1:33:15ना हज्जा मक्का मदी न जाओगे? नाह जी नाह तीर्थ स्थिर हो जाओ और
- 1:33:28तृप्त हो जाओ मुख्यतः है तृप्त हो जाओ।
- 1:33:32उसे स्थिरता जाएगी। धैर्य आचार्य हो उपासना शौचम
- 1:33:42शुद्धि की आवश्यकता नहीं है। हाँ मेरे चचा मेरे पास आते तो मैं
- 1:33:47कोई सिनान नहीं किया हो। मैंने कहा मैं बेतरी सिनान कर रहा
- 1:33:50हूँ तो फिर मेरे ठाकुर जी। इनके ऊपर तो तुम्हारी रिफ्लेक्शन
- 1:33:55पड़ गई। मैंने कहा इसे स्नान करवा लो, तुम
- 1:33:57भी स्नान करो, ये मूड होगा, ये काम चलता ही रहेगा।
- 1:34:03तुम कितनी बार स्नान करोगे तुम ब्राह्मणों पे किसी सुद्र की छाया
- 1:34:10पड़ जाती। तो मैंने कहा तुमने छेड़ना शुरू
- 1:34:13कर दिया था। इनको इनके घरों में घुस जाता है।
- 1:34:16तुम कितनी बार धोतियां बदलू के बताओ धोतियां बदलने में ही रह
- 1:34:20जाओ। तुम जानबूझ कर इनके घरों में
- 1:34:23प्रवेश कर देते दो चार लट्ठी पड़ जाएंगे।
- 1:34:28इन्हें तो स्नान करना पड़ेगा। आचार्य व पास में शौचम स्थैरियम
- 1:34:41आत्म पुनम कृपा, अपने आप का दर्शन जब स्थिरता आएगी तो आत्मदर्शन हो
- 1:34:47जाएगा। जब तुम ठहर जाओगे तो आत्मदर्शन हो
- 1:34:52जाएगा और जब तृप्त हो गए तो तृप्त होना ही इस बात का सूचक है कि
- 1:34:59तुम्हें आत्मदर्शन हो गया आत्मदर्शन के बिना तुम्हें तृप्ति
- 1:35:05नहीं आती। और आत्मदृष्ण से यहाँ के परमात्मा
- 1:35:09दर्शन वहाँ परमदृप्ति हो जाती है तो इन दो दो लक्षणों को ले लेना
- 1:35:19साहब मिले ही सबूरी में एक तो सब रह जाए और सब्र के साथ साथ।
- 1:35:26पर ये लक्षित होगी। उसकी छाया की तरह स्थिरता अब देखो
- 1:35:31छाया कितनी सित्र होती है देखा आपने?
- 1:35:35छाया बिल्कुल सित्र होती है बिशर्ते की छाया जहाँ से पैदा
- 1:35:43होती है वो ऑब्जेक्ट नहीं ले। और छाया वास्तव में देखा जाए तो
- 1:35:50एक मात्र रुकावट है प्रकाश की और कुछ भी नहीं इन दो चीजों को ले
- 1:35:59लेना। एक तो तुम तृप्त हुए।
- 1:36:06तृप्त हुए तो तुम तुम्हें मानसरोवर में क्या फिर तुम भटकोगे
- 1:36:14फिर सिरता है ठहर चौक? यही कबीर कहते है आखरी शब्द।
- 1:36:28हंसपयो मानसरोवर। हमसापयो मानसरोवर हमसापयो।
- 1:36:59सरोवर ताल तलैया, तलैया, ताल। तालित लेया क्यों डू ले मन मस्त
- 1:37:25हुआ हाँ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ हाँ हाँ फिर?
- 1:37:36क्यों बोले मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला?