Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 Mar 25 - Meditation Secrets- मुक्त कौन होता है सूक्ष्म देहि या कारण शरीर? Full Practical Video!
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- 0:07पहले छोटा सा प्रश्न क्या पेड़ पौधे भी मुक्त होने की आकांक्षा
- 0:23रखते हैं? आज बोलने की इच्छा नहीं थी, आराम
- 0:29करने की इच्छा थी। वैसे भी बहुत से लोगों ने मुझे
- 0:34पूछा है बाबा आप थके थके से लगते हो?
- 0:42ठीक है उनके पास जो भोजन में तीन बार लिया करता था दूध वो मैंने दो
- 0:49बार कर दिया है। जीने की अभिलाषा बची नहीं, ऐसे
- 1:00प्रश्न मत पूछा करो क्या पेड़ पौधे भी?
- 1:09मुक्त होने की इच्छा रखते हैं। यह प्रश्न पूछने योग्य नहीं है।
- 1:21प्रश्न पूछने योग्य यह है कि तुम दुखी हो, क्या मैं सुखी हो सकता
- 1:32हूँ? और कैसे सुखी हो सकता हूँ, यह
- 1:35प्रश्न बिल्कुल सटीक क्वेश्चन है, तो मैंने लिखा जीवन के संबंधित
- 1:48प्रश्न पूछा करो। अगर ऐसे ही प्रश्न पूछना चाहते हो
- 1:56तो चैनल को छोड़ दो और मैंने उन्हें ब्लॉक कर दिया।
- 2:10इन्हें इतना भी ख्याल नहीं हूँ। कि मैं तुम्हारी मस्तिष्क की
- 2:19खुजलाहट के लिए आनंद की बलि नहीं दे सकता हूँ न अपने, न तुम्हारे
- 2:28पूछो हम आनंद तक कैसे पहुँचेंगे? सवाल जायज?
- 2:35सवाल का जवाब दूंगा, चाहे मैं किसी भी हालत में हूँ, ऐसी ऐसी
- 2:43प्रश्न पूछने है। बड़ी बड़ी खोपड़ी धारी बैठे हैं
- 2:53आईएएस की पत्नियों से। त्यागपत्र देकर बैठे हैं।
- 2:58अष्टावक्र का अपनिषद का गीता का व्याख्यान कर रहे है।
- 3:03डेक्कन कोपड़ी से ये प्रश्न भी उनसे ही पूछने लायक है।
- 3:12आगे से ध्यान रखना मैंने वैसे ब्लॉक कर दिया है ऐसे प्रश्न मेरे
- 3:19से मत पूछा करो, एक बात को समझ लो तुम दुखी हो और मैंने 1000 बार
- 3:29कहा है, मैं भी दुखी था। किसी वक्त मैं भी दुखी था और मेरे
- 3:35भीतर भी आकांक्षा थी कि कैसे इस दुख से मुक्त हो जाऊं और हो गया
- 3:44तुम भी दुखी हो, पहले मान लो कि हम दुखी हैं।
- 3:51यही तुम्हारी दुविधा है, तुम मानते नहीं कि हम दुखें और बड़ी
- 3:57से बड़ी दुविधा और अर्जुन यही है भीतर से लड़ झगड़ के आए हैं।
- 4:04पति पत्नी जूत पटांग होके आए हैं। और बाहर हाथों में हाथी डाले
- 4:14मुस्कराये हुए ठहाके लगाता हूँ, तुम दिखावा करना चाहते हो कि हम
- 4:21खुश हैं, मैं कहता हूँ तुम जैसे हो वैसे क्यों नहीं दिखावा करते?
- 4:32तुम दुखी हो, दुखी हो बिलकुल पता लगता है साफ तुम्हें भी पता है
- 4:39तुम दुखी हो अन्यथा ऐसे ही प्रश्न क्यों करते पेड़ पौधे मुक्ति की
- 4:45बात सोचते हैं कि नहीं सोचते हैं? क्या तुम मुक्त हो के मुक्त
- 4:55व्यक्ति भी ऐसे प्रश्न नहीं पूछता?
- 5:02ये तुम्हारी मूडता की निशानियाँ है।
- 5:09तुम्हें तो मैंने ब्लॉक कर दिया, दूसरों के लिए ये सन्देश प्रश्न
- 5:14पूछो, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी को सुखी देखना चाहता हूँ, सुखी बनाने
- 5:22का हर संभव प्रयास करता हूँ। तुम भी प्रश्न ऐसा पूछो जिससे तुम
- 5:31सुखी हो जाओ जब मैं जाऊं इस संसार से विदा होके तब मुझे प्रसन्नता
- 5:43होगी। एक संघासन चढ़ चले एक बंदी जात
- 5:49चंचल मैं खुशी खुशी जाऊं जीस लिए मैंने, ईश्वर ने मुझे भेजा मेरा
- 6:01काम हो गया पूरा। अगर तुम ऐसे ऐसे प्रश्न पूछोगे तो
- 6:10तुम्हारा ही वो वक्त जो मैं आनंद लेने के ढंग बता सकता था, ये खराब
- 6:18हो जाएगा, दूसरों का भी खराब हो जाएगा।
- 6:20तुम गुनहगार हो? और क्या तुम गुनहगार बनना चाहोगे?
- 6:27सारी मानवता के प्रति तुम गुनहगार बनना चाहोगे और मेरे भी गुनहगार
- 6:33हो मैं मस्ती में झूम रहा हूँ तुमने क्या लेना है प्रश्न पूछ
- 6:36के। प्रश्न पूछो मैं कैसे सुखी हो
- 6:44जाऊं? एक ही प्रश्न पूछने लायक है तो
- 6:49कोई बिरला कभी कभी पूछता है प्रश्न तो ये भी ठीक है?
- 6:57इससे अच्छे प्रश्न तो ये भी ठीक है?
- 7:00मेरी बेटी बीमार मेरा बेटा बीमार अंत और द्वंद्व में है।
- 7:05क्या करूँ ये प्रश्न पूछने लायक है लेकिन ये तो बिलकुल नहीं।
- 7:12ये तो खोपरे के खुजलात है, क्योंकि ये प्रश्न पूछने लायक
- 7:17इसके लिए है। ये बिमारी से ग्रस्त हूँ, इतने
- 7:22वर्ष से बीमार हूँ पुत्र, बीमार, पुत्री, बीमार ये बीमार वो बीमार
- 7:30क्योंकि मैं भी जानता हूँ कि मैं उस स्तर पर जाकर प्रभु के दरबार
- 7:35में फरियादी लगा सकता हूँ। और वह कभी कभी मान भी लेता है।
- 7:45ये प्रश्न तुम्हारा ठीक है, लेकिन ये प्रश्न तो बिल्कुल नाजायज है।
- 7:52मत पूछा करो चलो। हम असली प्रश्न पे चले आप जो
- 8:04बोलते हैं बाबा सूक्ष्म शरीर के बारे में और सूक्ष्म के कारण शरीर
- 8:18के बारे में। यह पुरातन ग्रंथों से मेल नहीं
- 8:25खाता। बाबा सूक्ष्म शरीर तो कुछ कुछ दही
- 8:32के साथ मेल खा जाता है। कारण शरीर बिल्कुल ही मैं नहीं
- 8:38करता। बिल्कुल अलग है क्या कारण है क्या
- 8:47कुछ कारण शरीर के बारे में हमें और विस्तार से खोलकर बताने की
- 8:53कृपा करेंगे बिल्कुल। आओ शुरुआत करें पहले मैंने आपको
- 9:02बताया कि यह यात्रा जड़ से परम चेतनता की यात्रा है, पत्थर से
- 9:14भगवान की यात्रा। और इसको मैं दे ही कहता हूँ, जो
- 9:24यात्रा करता है, परमात्मा की भी यात्रा नहीं करता।
- 9:28परमात्मा क्षेत्र है, अचल है, अटल है, अकंप है।
- 9:35यात्रा करता है देही और देही होता है वासनाओं का, समृतियों का,
- 9:41भावनाओं का, कल्पनाओं का ये सब समूह मात्र देही है जब पत्थर से
- 9:50शुरू हुई। देही बिल्कुल सूक्ष्म था, देही
- 9:58बढ़ता गया, बढ़ता गया, बढ़ता गया, मानव शरीर में आ गया और देही बहुत
- 10:04बड़ा हो गया। एक शब्द मैंने और भी बोला है
- 10:12जिससे एक कारण शरीर कहता हूँ मैं। उस देही के साथ एक फूसे के रूप
- 10:19में कारण शरीर चलता है, वह विद्युत है चेतना वह चेतना संग
- 10:34संग चलती है। देही जहाँ जाएगा वह चेतना का
- 10:40हल्का साबुन उसके साथ जाएगा। यात्रा देही की है तो यात्रा कारण
- 10:51की भी है। ये भी समझ लेना।
- 10:54यात्रा एक नहीं थी। दही भी यात्रा करता है और कार्य
- 11:02शरीर उसके संग संग रहता है। एक फूस के तौर पर आज स्थिति यह
- 11:11है। देही बड़ा विराट हो गया तुम्हारा
- 11:17पूरा अचेतन भर गया है देही से सब उसके भीतर भरा पड़ा है तो मैंने
- 11:27बताया था कि देही। के बिलकुल साथ ही चिपका बड़ा कारण
- 11:32सही है, वह एक छोटी सी बूंद जो देही के संग संग चलती है, सब
- 11:40जन्मो में वह देही के कर्मों की साक्षी है, अब आप समझ लो।
- 11:50आप साक्षी कहते हो परमात्मा को नहीं साक्षी है दही के साथ लगी
- 12:00हुई वो छोटी भूत चेतना की वो भूत। वो साक्षी है और वो देही के साथ
- 12:09रहती है। सदा यानी आपके साथ रहती है सदा
- 12:15इसलिए आपके सभी कर्मों पर हर वक्त उसका ध्यान रहता है।
- 12:21वह जो आप वो जीसको परमात्मा कहते हो वह तो निर्लिप्त है।
- 12:28वह तो आनंद में मौज में है, लेकिन यह जो चेतना है, यह है तो आनंद,
- 12:39लेकिन यह देखती है आपके सभी कर्मों को आपकी बहुत सूक्ष्म बात
- 12:44है। समझने वाले समझ जाएंगे और जो नहीं
- 12:49समझे वो बार बार सुनेंगे तो समझेंगे।
- 12:55परमात्मा सर्वत्र है, हर जगह है। बिन ना में ना ही कोठा कोई स्थान
- 13:07ऐसा नहीं जहाँ परमात्मा नहीं है, लेकिन यह चेतना की एक बूंद देही
- 13:20के साथ रहती है। मुक्ति इसे होनी है।
- 13:26अब ठीक से समझ लो तो मुक्ति गिनते किसके हो यह चेतना की एक बूंद
- 13:35जिसे कबीर कहते हैं बूंद समानि सम्बन्ध में।
- 13:42इशारे तो किये संतो ने लेकिन इशारों को खोला किसने खोला, किसने
- 13:55परमात्मा निर्लिप्त है? वह सर्वशक्तिमान भी है,
- 14:02सर्वव्यापक भी है, सर्वज्ञ भी है, आनंद का सागर है।
- 14:18लेकिन यहाँ उसकी बात नहीं हो रही है।
- 14:22यहाँ हम बात करते हैं मुक्ति और बंधन की देही के साथ वह चेतना की
- 14:34छोटी सी बूंद हर जन्म में रहती है।
- 14:37चाहे तुम पत्थर थे, पौधे थे। एक कोसी अजीब थे, बहू कोसी अजीब
- 14:45थे, चलने वाले प्राणी थे, उड़ने वाले प्राणी थे जल चर नव चर अथाल
- 14:55चर। सभी के साथ वो चिपकी रहती है और
- 15:04सभी के भीतर दे ही विद्यमान हैं। दे ही अलग अलग हैं और दे ही के
- 15:12साथ चेतना की वो बूंद भी अलग अलग है।
- 15:17अब इसको ठीक से समझने का प्रयास करना है नहीं अपनी पूरी शक्ति और
- 15:28विद्ववत्ता का इस्तेमाल कर लिया। पूरे दर्शन का इस्तेमाल कर लिया।
- 15:36तुम बार बार सुन अगर समझ नहीं आयी तो दे ही प्रत्येक का एक वो जानवर
- 15:43है, पेड़ है, मनुष्य है, आदमी है, स्त्री है, पक्षी है, पशु है,
- 15:52जलेचर है, तलेचर है, नाभचर है। दे ही सब के भीतर अलग ठीक आगे
- 16:04सुनते और चेतना की वो गूंद भी अलग है।
- 16:15सबको मिली है वह चेतना की एक बूंद और चेतना की वो बूंद दे ही से
- 16:28मुक्त हो जाए, इसे ही मुक्ति कहते हैं।
- 16:33अगर आप कहते कि शास्त्रों में नहीं लिखा है तो मैं शास्त्रों का
- 16:37तो जिम्मेवार हूँ। शस्त्र मैंने लिखे भी मैं
- 16:42जिम्मेवार अपनों जैसे मैंने देखा वैसे मैंने बोल दिया।
- 16:50तुम मानो न मानो तुम्हारी मर्ज है कोई बंदिश नहीं सुनो, न सुनो यह
- 16:59भी तुम्हारी मर्ज है सब प्राणियों के दे ही अलग।
- 17:12सब के दे ही अलग सब की यात्राएं अलग और सभी यात्रियों के ये बूंद
- 17:23जिसे चेतना की बूंद कहते हैं वो भी सबकी अलग।
- 17:30वह विराट। तो एक है समझ में नहीं आएगा, मैं
- 17:38जानता हूँ, लेकिन जैसा मैं मानता नहीं, मैं जानता हूँ, मैंने देखा
- 17:48वो आपको बता रहा हूँ। हर चीज़ समझ में नहीं आती।
- 18:00आइंस्टीन भी जब बात करते हैं तो प्रकृति क्यों नहीं करता है?
- 18:06आइंस्टीन बात करते हैं ही ही का मतलब परमात्मा ही इज़ नॉट ओनली
- 18:12अननोन। वह सिर्फ़ जाना ही नहीं गया।
- 18:19बट ऑल्सो अनोनुबल। लेकिन जाना जायेगा बात परमात्मा
- 18:27की करते हैं, सेंसर की नहीं करते हैं।
- 18:33तुम कह सकते हो कि सिद्धांतों की करते हैं, चलो हम मान लेते हैं कि
- 18:39सिद्धांतों की भी करते हैं, लेकिन मैं बात कर रहा हूँ आत्मा की।
- 18:49देही और देही के साथ साक्षी रूप में चिपती हुई चेतना वह निर्लिप्त
- 18:56नहीं है, यह बात समझ लो। यह बड़ी मजेदार बात है।
- 19:03यहाँ सभी उलझ जाते हैं। आके अगर संत निर्लिप्त।
- 19:08सदा की बात करते हैं तो वो परमात्मा की बात करते हैं, वो सदा
- 19:21निर्लिप्त है, तुम्हारे में समाया हुआ है।
- 19:34तोहे संग समय है सर्वव्यापी उसकी बात करते हैं जो सब जगह व्याप्त
- 19:44है। सर्वव्यापी सदा पलेपा।
- 19:54तोहे संग सवार तोहे संग काहे रे। यह बात करते हैं परमात्मा, गुरु
- 20:17तेग बहादुर। वह सर्वव्यापी है, सब जगह है,
- 20:25सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है। अलेफा है निर्लिप्त है, वह लिप्त
- 20:33नहीं होता और आपके मज़े की बात बताऊँ, वह समग्र का साक्षी है,
- 20:44सिर्फ आपका नहीं। अब यहाँ बात समझनी मुश्किल हो
- 20:49जाएगी। साक्षी तो है वो साक्षी ऐसा है
- 21:03जैसे सीसी टी वि कैमरा सीसी टी वि कैमरा को देखने के लिए।
- 21:11विद्युत की आवश्यकता होती है। विद्युत वो है, चेतना वो है,
- 21:17एनर्जी वो है ये परमात्मा की बात है सर्वव्यापी सदा अलेप्पा तोहे
- 21:25संग समाई काहे रे बन खोजन जाए? लेकिन हम आज परमात्मा की बात नहीं
- 21:34कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं मुक्ति की, हम
- 21:39बात कर रहे हैं। कारण से मुक्ति से होती है, देह
- 21:44को तो नहीं होती, देह तो खुर जाता है।
- 21:48का ही मुक्ति समझने जैसी बात है, अगर समझोगे तो जो खुर ही गया, जो
- 21:59मिट ही गया, जो खा के ही हो गया, उसकी कष्ट मुक्ति?
- 22:13जो देही के साथ साक्षी रूप में विद्यमान है।
- 22:18लिप्तता से लिप्तता से ही साक्षी हुआ जा सकता है।
- 22:28अगर वो लिप्त ना हुआ आपके साथ लिप्त यानी कनेक्टेड।
- 22:35तो वह आपका साक्षी तो नहीं हो सकेगा?
- 22:40जैसे ही आप अपने भीतर जाओगे थोड़ा यहाँ पर संकों में ज्यादा साफ
- 22:46करने में लगा हूँ। तो मैंने पहले भी बताया चेतन आएगा
- 22:54फ्राइड के हिसाब से अब चेतना आएगा, अचेतन आएगा सामूहिक अब
- 22:59चेतना आएगा और फिर सामूहिक चेतना आएगा कॉन्शस सबकॉन्शस अनकॉन्शस।
- 23:09कलेक्टिव अनकॉन्शियस कलेक्टिव कॉन्शियस ये सारे आ गए हैं पांच
- 23:20के पांच आ गए हैं दे ही दे ही क्या है मुक्ति किसे होती है?
- 23:37बड़ा गहरा प्रश्न है। तुम कहोगे ये शास्त्रों से मेल
- 23:42नहीं खाता। इस शास्त्रों से तो भाई ई इज़
- 23:46इक्वल टु एम सी स्क्वेयर भी मेल नहीं खाता।
- 23:52अल्बर्ट आइंस्टीन ने जो खोजा। कहाँ शास्त्रों में लिखा मिलेगा
- 23:59तुम्हें? तुम अपनी पार्टी मार सकते हो कि
- 24:04वेदों में लिखा है। नहीं लिखा कोई किताब सर्वज्ञ नहीं
- 24:13है। साइंस भी सर्वज्ञ नहीं है।
- 24:18कहीं और परमात्मा को भी पूरा पूरा सब किसी ने नहीं जाना और कभी जान
- 24:25नहीं सके। अगर आपके दिमाग में यह बात है कि
- 24:30परमात्मा को आदि ऋषियों ने जान लिया था तो तुम भूल करता वो कभी
- 24:37जाना नहीं गया और कभी जाना नहीं जाएगा।
- 24:40वो परमात्मा है। अन्नोन एंड अननोन ओवर एबल मुक्ति
- 24:53किसके होती है? वह जो देही पनपता गया, पनपता गया
- 25:00उसके साथ मैंने बहुत पहले बताया, आपको बड़े विस्तार से बताया एक
- 25:05चेतना की बूंद लगी। उसके साक्षित्व के लिए जो उसके
- 25:11सभी कर्मों को रिकॉर्ड करते ये कहाँ से आया कौन लेके आया ये
- 25:22कैमरा रखा कहाँ था ये द्रव्य कहाँ रखा था, ये बातें मुझसे मत पूछो।
- 25:28मुझे कुछ नहीं पता। परमात्मा ने कहा इतना सारा संसार
- 25:33रखा हुआ था कहाँ से निकाल के ले आये थे, पूछने जैसी बातें नहीं,
- 25:38मैं जानता भी नहीं हूँ और कोई भी नहीं जानता है न कोई जान सकेगा।
- 25:46एक सत्य बताता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा, मैं कहता हूँ आंखन
- 25:51देख शस्त्र में तो ये लिखी नहीं बात तुम कहते हो शस्त्र में नहीं
- 25:57लिखी तो बिलकुल नहीं लिखी इज़ इक्वल टु एम सी स्क्वायर नहीं
- 26:03मिलेगा आपको शस्त्र में। क्वांटम थ्योरी नहीं मिलेंगे आपको
- 26:10शास्त्रों में वैज्ञानिक शास्त्रों में क्वांटिंग थ्योरी
- 26:15नहीं मिलेंगे। वह एक ही वक्त पर पार्टीगल एंड
- 26:21वेव्स बहुत साथ थे आप। ऑल्सो पार्टिकल एंड वेव बोथ आर।
- 26:32देर इन ए सिंगल मोमेंट इन इन ए सिंगल मोमेंट उसी वक्त में यह
- 26:41पार्टिकल भी है और वेव भी है। कहाँ लिखा था प्राणों?
- 26:47शास्त्रों में विज्ञान के प्राण्य शास्त्रों में कहाँ क्वांटम लिखा
- 26:52था? इसका मतलब तुम प्राणों शास्त्रों
- 26:57को मंत्र होगा, आज क्वांटम का आविष्कार हुआ।
- 27:04तो प्राणी से चिपटे तो हो गया। छोड़ना पड़ेगा इस इक्वल टु ऐफ़ सी
- 27:12स्केयर तो क्या प्राणों से चमटे रहे नहीं, नया खोज लिया तो नए का
- 27:19उपयोग किया और आज हमने क्या खुशी बना लिया इस स्टोरी के ऊपर?
- 27:25एटम बम का निर्वाण हुआ एटोमिक पावर प्लांट खड़े हुए और ये जो
- 27:34कैंटम थ्योरी जो खोजी गई कौन से वैज्ञानिक किताब में लिखा है?
- 27:42कौन से वैज्ञानिक के शस्त्र में लिखा है?
- 27:47बस ऐसा ही धर्म है धर्म पूरा कभी नहीं खोजा गया।
- 27:55अब मैं धर्म के बारे में नॉट ओनली अननोन।
- 28:01बट ऑल्सो अननोनबल ना धर्मपुरा कभी खोजा ना धर्मपुरा कभी खोजा चा पाय
- 28:11का मनुष्य कहें मैं अपनी छोटी सी खोपड़ी से।
- 28:21उस विराट को जान जाऊं मुश्किल नहीं असंभव है।
- 28:28बिल्कुल वही बात है जो सोक्रेटिस वृद्ध व्यक्ति जा रहा एक छोटा
- 28:34बच्चा रो रहा। तो उसने पूछा बेटे क्या रोता है?
- 28:44एथेंस के सागर के किनारे खड़ा हुआ बच्चा रो रहा है।
- 28:51बच्चा कहता बाबा भूखा प्यासा सुबह से लगा हूँ।
- 28:58मेरी इस कोली में मेरे इस पात्र में ये है सागर समापन ये बाहर
- 29:08फेंकने की बहुत कोशिश किया हूँ, लेकिन ये खाली नहीं होता है।
- 29:17सोक्रती से लिखते हैं कि मैं थर्राया हूँ मैं, प्रथम बार किसी
- 29:24बच्चे ने मुझे कब आया? मैंने सोचा यही तो हम कर रहे हैं।
- 29:35सोक्रतीज़ लिखते हैं कि यही तो हम कर रहे हैं।
- 29:39शब्दों से शब्दों के पास जो विराट है उसको जानने की कोशिश में लगे
- 29:46हैं, जाना जायेगा वो? तो मेरे भीतर का एक बहुत बड़ा
- 29:52असत्य टूट गया इस बच्चे के कारण और यहीं बस नहीं हुई।
- 29:59मैंने कहा बेटा तू भूखा प्यासा है, तेरे लिए ये खाना ला देता
- 30:06हूँ, खा लिया। सो, कृति से लिखता है कि उस बच्चे
- 30:13ने कह नहीं मैं इस समुद्र को इस प्यारी में समा कर ही रहूंगा।
- 30:30सौकृत इस आश्चर्यजनक अवस्था में खड़े थे और उस बच्चे ने उस प्याली
- 30:37को समुद्र के भीतर फेंक दिया। चलो इस प्याली में तो समुद्र नहीं
- 30:46समा सकता। यह प्याली तो समुद्र में समर सकती
- 30:50है ना चलो झंझट में कोई तो समाया तो सो क्रेडिट्स कहते हैं कि मैं
- 31:00आई गॉट एनलाइटनमेंट ऐट दट पार्ट उस वक्त मुझे अनुभव हो गया।
- 31:12मिटकर मिलेगा तुम समा दो उसमें अपने आपको तुम में वो नहीं समा
- 31:18पायेगा। बूंद को ही समुद्र में समाना
- 31:22होगा। उस बच्चे ने मुझे वह सबक दे दिया
- 31:31जो बड़े से बड़े धर्म ग्रंथों की कतार पूरी की।
- 31:37पूरी मनोचनों के रूप में रखी हुई किताबें मुझे नहीं दे सकी।
- 31:42उस बच्चे ने दो अल्फाज़ में। मुझे वह सत्य शौक दिया और मैं
- 31:51मुक्त हुआ। आई गॉट एनलाइटन छोटे बच्चे के
- 31:57मैंने पहुँच चूका है तेरे कारण मैं उस स्तर पे पहुंचा।
- 32:06जो सत्य है वो सत्य है। परात्म ऋषियों ने नहीं लिखा इसका
- 32:13मतलब यह नहीं कि जो लिखा वो ही सत्य है।
- 32:18उससे आगे का कोई सत्य नहीं नहीं, ऐसा नहीं है।
- 32:23तुम सनातन को महान तो कह सकते हो, समग्र नहीं कह सकते।
- 32:29सनातन को महान तो कह सकते हो, समग्र नहीं कह सकते, समग्र वो है
- 32:35भी नहीं। कभी बनेगा भी और कोई धर्म कभी
- 32:40समग्र नहीं होता। होगा।
- 32:49विज्ञान के सिद्धान्त विज्ञान तो कह सकते हैं, लेकिन सर्वज्ञ नहीं
- 33:01कहना सकते। सभी कुछ वो नहीं जान पाने का कभी
- 33:06भी दे ही दे ही के साथ एक चेतना की बूंद फ्रॉम दी वेट बिगिनिंग चल
- 33:23रही है, मुक्ति देही के नहीं होनी।
- 33:29मुक्ति देही से उस चेतना की बूंद की हुई है।
- 33:35बस यही भ्रम तुम में समाया हुआ है।
- 33:40इसलिए मैंने बहुत पहले कहा था कि आपको।
- 33:49देन वक्त आएगा जब आपको सातवाँ दर्शन खड़ा करना होगा, वह दर्शन
- 33:57होगा बाबा का दर्शन, सातवाँ ये खट दर्शन।
- 34:06अरे नॉट रेसफिशिएंट टोटली हो सकता है कोई आठवाँ दर्शन बनाने वाला भी
- 34:14निकल आए हो। मैं इस बात से इन्कार नहीं करता
- 34:17हूँ, लेकिन खट दर्शन से सातवाँ तो आपको मानना ही पड़ेगा।
- 34:231 दिन 1 दिन आएगा ऐसा। संख्या योग न्याय, वैशेषिक,
- 34:30मीमांसा, वेदान्त सांख के प्रणेता कपिल योग के पास अंजलि।
- 34:44न्यायिक गौतम वै शिषि केकनाद और मी मानसा के जैमनी और वेदांत के
- 34:54महर्षि वादरायन और सात में तुम नाम रख लेना।
- 35:04ओह, बाबा का साथ में वहाँ से चली एक भूत मुक्त उसे होना है देही को
- 35:22मुक्त नहीं होना है, देही को तो गलना है।
- 35:27और गलने वाला कभी मुक्त नहीं होता, क्योंकि गलने वाला तो गया
- 35:32मुक्त थोड़ी हो, देखिए तुम मुक्त होना चाहते हो तो बंधन क्या है?
- 35:40हथकढ़ी हथकढ़ी को खोल लिया जाएगा तो मुक्त तुम होगे न?
- 35:47तुम बचे रहोगे ना मुक्त हो के हाँ तो बस ऐसी ही वो बूंद बची रहती है
- 35:59मुक्त होती है वो बूंद चेतना जो देही के साथ साथ चली सारे कर्मों
- 36:07की साक्षी रही। कर्म बढ़ते गए, बढ़ते गए, बढ़ते
- 36:12गए कितना ही अचेतन भर गया हो और फिर नई जगह होती गई घटती गई घटती
- 36:18गई 1 दिन देही बिल्कुल गल गया रह गई सर्फ़ चेतना की बूंद।
- 36:29और चेतना की बूंद क्या हुआ, बूंद सामान्य संबंध में वह समुद्र में
- 36:38समा गई तो वो तो रही न राख कौन हुआ राख हुआ देही?
- 36:47और जो मिट गया ऐसे तो शरीर भी राख हुआ।
- 36:53ऐसे तो फिर सूक्ष्म शरीर में देख ही विनाश होगा, लेकिन कुछ बचता है
- 37:02जिसे मुक्त होना है। और देखिए जो मुक्त होता है वो बचा
- 37:06रहता है। अब इस बात को ध्यान में रखें, जो
- 37:12गल जाता है वो तो मुक्त नहीं होता है, वह तो गल गया, वैनिश हो गया,
- 37:17खत्म हो गया, उसकी मुक्ति कैसी? उसकी तो समाप्ति हुई बंधन की
- 37:26समाप्ति हुई हम मानो लेकिन जो बंधन में था उसकी तो समाप्ति नहीं
- 37:34हुई। मैंने जब ये सिद्धांत रखा बहुत से
- 37:39लोगों को हम नहीं मानते बाबा। मैंने कहा कोई फर्क नहीं पड़ता,
- 37:44शक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता, न मानो कोई बात युद्ध थोड़ी है, लोग
- 37:51तो परमार्थ में तक्को भी नहीं मानते, चेतना तक को नहीं मानते
- 37:58तुम अगर ये बात नहीं मानोगे तो कोई फर्क थोड़ी पड़ेगा।
- 38:03मार्क्स के न मानने से परमात्मा मर नहीं जाता।
- 38:10नीत से के कहने से ही इज़ दैट गॉड इज़ दैट परमात्मा मरना ही नहीं
- 38:18जाता। चार वाक्य के कहने से ऋण कृतवा
- 38:23खत्म विभूत यदा जीवित, सुखी जीवित बसमभूत से देहस्य पुनआदमनम कुतहा
- 38:33ऋण लेने वाला और देने वाला दोनों बसम हो जाते हैं।
- 38:38कोई नहीं बचता इसलिए रहन लो, मौज करो, घी पीओ या शराब पीओ ना
- 38:47मांगने वाला बचेगा, ना लेने वाला देने वाले बचेगा।
- 38:53दोनों ही खत्म हो जाएंगे। चारबाग के ये कहने से कर्म
- 39:00व्यवस्था खत्म नहीं होती। कर्म व्यवस्था वैसे ही रहेंगी
- 39:08तुमने किसी का छीन लिया, कर्म बन गया देना पड़ेगा।
- 39:17कर्म से नजारा होनी ही होगी लाख चिलाई चार वाक लाख चिलाई मार्कर्स
- 39:30नीच से न वो मरा, न उसे इंकार किया जा सकता।
- 39:38न ही कर्म व्यवस्था का इंकार होता है।
- 39:41चार वक्त भले ही कितना ही पीटता है, जो सत्य है, वह सत्य है।
- 39:58हम चले अपने प्रश्न के। मुक्ति देही के नहीं देही का तो
- 40:08अस्तित्व मटता है चेतना का अस्तित्व नहीं मटता समझना बात को।
- 40:20आखिर में जब दे ही गल जाता है तो वो जो नर झरा कहते हैं भगवान
- 40:25महावीर कै वाले की स्थिति में बूंद अकेली रह जाती है।
- 40:34कै वाले किसका उस बूंद का? अब तक तो देही के साथ था वो।
- 40:44अब तक के बल्ले नहीं था। अब तक तो निर्माण नहीं था।
- 40:52अब तक तो दही के साथ था निर्माण हुआ तब?
- 40:59जब दे ही गधों और जब दे ही मिल जाएगा, खाक हो जाएगा जैसे पदार्थ
- 41:13खाक हो गया। शरीर के पांचों तत्व गलने के बाद
- 41:18बस में होने के बाद पांचों तत्वों में मिल जाते हैं।
- 41:23ऐसे ही देही अपने अपने तत्वों में सुमार हो जाता है।
- 41:27मिल जाता है तो केवल ये होता किसका है?
- 41:35केबल ना तो दे ही का होता है ना ही सोल शरीर का होता है, केबल
- 41:44होता है। उस चेतना का जो बूंद चली थी, वो
- 41:50अकेली रहती है। पहले देही के साथ थी अब देही के
- 41:54बिना। निर्वाणु से चेतना का होता है।
- 42:00पहले देही के साथ थी, अब निवृत्त हो गई, अब अलग हो गई तो फिर क्या
- 42:08करेंगे? अगर देही भस्म हो गया अभी बुद्ध
- 42:13का देही भस्म नहीं हुआ, थोड़े से कर्म बाकी हैं चाहे वो करूणा से
- 42:18युक्त ही क्यों न हो, मुक्ति किसकी?
- 42:25देही के नहीं देही के तो गल न भस्म।
- 42:32मुक्ति उस बूंद की चेतना की वो बूंद जिसने देही के साथ सारा सफर
- 42:39तय किया, वह अब मुक्त हो गई क्योंकि देही गल गया।
- 42:47नर्शरा हो गई। जो कर्म उसके साथ थे, जिनका
- 42:50साक्षी होकर उसने गठन किया, जिसके कारण वह बना देही।
- 42:59अगर ये चेतना की बूंद न होती तो साक्षी कौन होता?
- 43:07कोई न होता है। ये देही अलग होता है और साक्षी
- 43:13उसको देखने वाला अलग होता है। वह साक्षी की चेतना की बूंद इस
- 43:20देही को बढ़ते हुए देखती है, रोज़ बढ़ता है, रोज़ बढ़ता है, रोज़
- 43:24बढ़ता है। पत्थर से चला बिलकुल नगले जीवन
- 43:30चेतना तो समय भी है वहाँ से पेड़ पौधे अमीबा आगे आगे बढ़ते जाओ
- 43:43चलने वाले प्राणी उड़ने वाले प्राणी।
- 43:46जल में रहने वाले सब फिर आ गया मानव शरीर, ये होता सभी प्रभु की
- 43:56कृपा के कारण देखिए प्रभु की कृपा के कारण सब खुशी होता है।
- 44:02कर्मी आवे कपड़ा नदरी मुक्त। क्या है जो तुम्हारी कृपा से हुआ
- 44:09है? तुम्हारी कृपा से जो हुआ वो तो
- 44:17उड़ता है क्योंकि एक क्षणिक है तुम अपनी महन से अपनी कृपा से।
- 44:27मजिस्ट्रेट बन गए। पीएम सीएम बन गए, लेकिन श्रद्धा
- 44:32के लिए थोड़ी बने अखंड नहीं हो मिट जाओगे तो यह एक मूलता का
- 44:40दूसरा नाम है। जज बन जाना सीएम बन जाना पीएम बन
- 44:44जाना आई एस बन जाना आई एस बन जाना ये मूडता का नाम है सदा के लिए जो
- 44:53हो जाए अखंड कैवल्य अकेला। जब देही मट जाएगा खाख हो जाएगा
- 45:04राख हो जाएगा नर जरा हो जाएगी सभी कर्मों की जोक इकट्ठे हुए थे उस
- 45:13चेतना के दर्शन की वजह से। वो गल जाएगा सर मैंने पिछले
- 45:28प्रसंग में भी आपको समझाया था बच जाएगी अकेली चेतना की वो भूत
- 45:38तुमने सुना बहुत बार। लेकिन समझ नहीं आया तुम्हें?
- 45:43कबीर ने बहुत बार बोला बूंद समान समन्ध में कौन सी बूंद दही तो
- 45:51नहीं समझता, फूल भी नहीं समता वह तो पदार्थों से बना है।
- 45:59देही भी नहीं समाता, चेतना के समुद्र में देही कैसे समा पायेगा,
- 46:07क्योंकि उसमें चेतना थोड़ी है, चेतना के समुद्र में क्या समा
- 46:14पायेगा, पानी के सागर में क्या समा पायेगा?
- 46:18हेच टू ओह फॉर्मूलेशन वाला पानी के बूथ एनएसीएल समा नहीं पाएगी,
- 46:27घुल जाएगी, मिल नहीं सकेगी और घुलना अलग बात है, मिलना अलग बात
- 46:35है, घुलना वो होता है। जीसको फिर से फिर से निकाल लिया
- 46:40जाए। नमक घुलता है पानी में लेकिन नमक
- 46:46को फिर से निकाला जा सकता है समुद्र के पानी से बूंद घुलती
- 46:54नहीं पानी में। बूंद मिलती है पानी में और फिर
- 46:58ढूंढ के दिखा दो उस बूंद को जो बूंद पानी में मिल गई समुद्र में
- 47:06उसको फिर ढूंढ के दिखा दो, आप उसकी बूंद को नहीं ढूंढ पाओगे,
- 47:12लेकिन नमक को ढूंढ पाओगे। घुलने में और मिलने में ये फर्क
- 47:17है। जो घुल गई वो फिर से ढूंढ जाएगी
- 47:26जो मिल गई फिर से नहीं ढूंढ पाओगे।
- 47:29यही फर्क है बड़ा लम्बा चौड़ा फर्क है।
- 47:34चेतना मिलती है, समा जाती है और फिर ढूंढ नहीं पाते तुम कृष्ण को
- 47:43अगर आज चाहोगे तो समुद्र में ढूँढना नहीं मिलेगा।
- 47:48मीरा को, कबीर को, नानक को? चैतन्य को शंकर को नहीं ढूंढ
- 47:55पाओगे। वह बूंद ही समुद्र हो गई।
- 48:00समुद्र के रूप में आज भी मौजूद हैं, लेकिन बूंद के रूप में नहीं
- 48:06ढूंढ सकोगे। उसे नमक को नमक के रूप में ढूंढ
- 48:11सकोगे। नमक तो कभी भी सुखाया जा सकता है।
- 48:18समझिए माधव समझाती है जब। मुक्ति होती है चेतना की उस बूंद
- 48:39की फ्रॉम दी वेरी बिगिनिंग देही के साथ विद्यमान रहती है अंत तक।
- 48:50देही के निर्माण के साथ शुरू होती है और देही के भस्मभूत होने के
- 49:00बाद वो कैब वाले हो जाती है और अकेली रह जाती है।
- 49:09निवृत्त हो जाती है उसे निर्वाण कहते हैं, मुक्त हो जाती है
- 49:14किस्से देही से मुक्ति उसकी होती है तुम्हारे शास्त्रों में लिखा
- 49:24है नहीं लिखा है। तुम्हारे शास्त्रों को न मैंने
- 49:30पढ़ा है न मैं शास्त्रों की बात बोलता हूँ, कोई कहीं से कोई क्लिप
- 49:40आ जाती है तो मैं अपने अनुभव के आधार पर उसको व्याख्या जरूर कर
- 49:45सकता हूँ। लेकिन शास्त्र मैंने पढ़ा नहीं,
- 49:47मैंने बहुत बार कहा था एक शास्त्र मैंने पढ़ा है एक शास्त्र मैंने
- 49:55पढ़ा ही नहीं जीया वो शास्त्र कौन सा अपने भीतर का वो शास्त्र?
- 50:05जो वास्तविक गुरु है जो मैंने कल के प्रवचन में बोला।
- 50:10वास्तविक में असली में नकली में की बात नहीं है असली में उसको
- 50:18मैंने पढ़ा है, मैंने दूसरा कोई शास्त्र नहीं पढ़ा।
- 50:26पढ़ा होगा तो मैं उसको अधिमान नहीं देता।
- 50:33अब मैं पढ़ता हूँ। गीता को आपने देखा होगा।
- 50:38गीता के शलोक मेरे लिए बिल्कुल नहीं हैं।
- 50:44लेकिन नए नहीं हैं। गीता के शब्द नए हैं, लेकिन गीता
- 50:53के शब्दों के भीतर जो रहस्य है वो नया नहीं है और जो रहस्य को खोज
- 50:59लेता है उसके लिए गीता रहस्य नहीं रह जाती।
- 51:03उसके लिए गीता का हर शब्द वह जानता है।
- 51:10इसलिए शायद गीता के श्लोकों को मैं ठीक तरह से व्याकरण रूप में
- 51:19उपचारित न करता हूँ। संभव है जैसे 6 साल का वो बच्चा
- 51:29जितनी शुद्धता से बोल पाएगा, मैं उतनी शुद्धता से नहीं बोल पाऊंगा।
- 51:37लेकिन जीस खुली आँखों से मैंने उसे निहारा या वहाँ जाके बैठा उन
- 51:45प्रज्ञा में स्थापित हुआ वह बच्चा नहीं जा सकेगा, शायद उसे हजारों
- 51:53जन्म लग जाए तुम सीखा सकते हो यह माइंड की एक प्रकार से।
- 52:04पढ़ाई का क्षेत्र है, मानव को ट्रेनिंग दे रहे हो तुम मानव के
- 52:12न्यूरॉन्स को ट्रेंड कर रहे हो। गीता के सेतु से पटक पटक बोले का?
- 52:23जाने का कुछ नहीं जैसे चीनी भाषा कोई मेरे सामने बोले या तुम्हारे
- 52:31सामने बोले तुम समझ पाओगे बस ऐसे ही गीता के शब्द।
- 52:41गीता के शब्द समझ पाएगा लेकिन उसके भीतर का रहस्य उसके लिए वैसा
- 52:47ही होगा जैसे चाहिए निभाषा बिल्कुल अननोन शब्दों को जानेगा।
- 52:58शब्दों के भीतर के रहस्य को नहीं जानेगा।
- 53:03और असल में ज़िन्दगी खुशहाल होती है, आनंदित होती है, सुगंधित होती
- 53:10है रहस्य को पीने से रहस्य में उतरने से रहस्य में मिल जाने से
- 53:20रहस्य को। एकाकार होने में समाज आने में उस
- 53:30समुद्र के भीतर एकाकृत हो जाने में रस से गीता के शब्दों को
- 53:39कितना ही रच लो। लेकिन कृष्ण जीस तल से बोले भगवान
- 53:49वो तल तुम्हें नहीं मिलेगा बड़ा मुश्किल है।
- 53:53बीच में बड़ी अड़चनें आएंगी और सबसे बड़चन बड़ी अड़चन तो आखिर
- 53:59में। आखिर में तुम्हें बड़े से बड़ा
- 54:06त्याग करना होगा। शीश काट के हथेली पर रखना होगा।
- 54:18जो शीश तली पे रख न सके वो प्रेम गली में आई क्यों मेरे ख्याल में
- 54:34आपके प्रश्न का जवाब? कारण शरीर का विस्तार से मैंने
- 54:41वरन कर दिया है। कारण शरीर की मुक्ति होनी है देही
- 54:49के ने फिर भी कोई शंका रह जाए तो आप प्रश्न कर सकता।
- 54:57ये ज़िन्दगी के प्रश्न डांट पड़ती है उन लोगों को जो कूड़ा कचरा
- 55:13मेरे आगे रख देते हैं। बताओ बाबा ये क्या है?
- 55:18डांट पड़नी स्वाभाविक है, बहुत से प्रश्न हैं, पूछने को 1000 दुख
- 55:28रहे हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में, तब उनसे आँखें मूंदे खड़े हो उस
- 55:33कबूतर की तरह, जिसके सामने बिल्ली खड़ी।
- 55:37और वह आँखें मूँदे आगे से बहुत कम हो गए, लेकिन कुछ बचें उन्हें ऐसे
- 55:51ही एक एक करके मैं विदा कर दूंगा जिनके पास जाने योग्य हैं।
- 55:57उनके पास ही भेज दूंगा। हमसफाओ मानसरोवर हमसफाओ।
- 56:22मानसरोवर ताल चलैया। मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले मन
- 56:48मस्त हुआ, फिर क्या बोले? तेरा साहब है, घट माहि तेरा
- 57:10साहेब, घट माहि। बाहर नैना क्यों खोले मन मस्त हुआ
- 57:28हाँ फिर फिर क्यों बोला मन मस्त हुआ?
- 57:38फिर क्यों बोला, कहत कबीर सुनो भाई साधु कहत कबीर?
- 58:02सुनो भाई साधु कहत कबीर सुनो भाई साधु।
- 58:18सुनो भाई सादो सादो। कहत कबीर सुनो भाई साधू साहेब मिल
- 58:55गए। दिल ओले मन मस्त हुआ आया तो क्या
- 59:04बोल मन मस्त हुआ तो क्यों बोला? मन मस्त हुआ तब क्या वो धन्यवाद?