Latest / Baba ji Vijay Vats / 29 Mar 26 - संकट में घिर जाने पर ब्रह्मांड से विनती कैसे करें? नाक, आज्ञा चक्र और सहस्त्रार का संतुलन।
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- 0:17प्यारे बाबा आहो वह नमन चारमबंदन यथापंडे तथाप।
- 0:37इसे अपने अनुभव से समझाते हुए प्रवचन के अंत में आपने कहा कि
- 0:45ब्राह्मण से कैसे विनती करनी है ये मैं किसी अन्य वीडियो में
- 0:52बताऊँगा प्रसंग लंबा है। जब हम किसी संकट में घर जाएं, कोई
- 1:02ऐसी तकलीफ हो जाए। ब्राह्मण चेतन है, इसका पूरा का
- 1:08पूरा विज्ञान है। मैं किसी अन्य वीडियो में मखाति
- 1:12होऊंगा। बाबा ये रहस्य समझाने की।
- 1:16कृपया हमें कृतार्थ करें। स्वामी प्रेम आकाश गोपाल सिंह
- 1:36अहंकारी व्यक्ति, समाज, देश विश्व के लिए ही कलंक नहीं होता।
- 1:53वर्ण। स्वयं के लिए भी कलंक होता है, वह
- 2:03खुद तो डूबता ही है बाकियों को भी ले डूबता है।
- 2:19अहंककारी व्यक्ति अहंकारिय यानी इलूशन से ग्रस्त था।
- 2:31आइए हम प्रश्न पर जाते हैं यथापिण्ड है तथा ब्राह्मण।
- 2:45यह सारा यूनिवर्स इंटर मेंगल्ड है आपस में गोसा हुआ है एक ज़ंजीर की
- 2:55तरह है और इसकी एक नजीर की कड़ी। दूसरी के साथ जुड़ी हुई है।
- 3:03यह अनंत विस्तार है। संतो ने जितना कहा जा सकता था
- 3:13उतना कहा लेकिन किसी भी संत ने। इसे समझा नहीं और वह समझा जा नहीं
- 3:27सकता। अगर कोई इस बात का प्रचार करे की
- 3:37मेरी समझ में आ गया और मैं समझा दूंगा।
- 3:42तो वह मूर्ख है, क्योंकि अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार में बहुत
- 3:57बड़े बड़े दावे कर देता है, जो उसके वश में न्योते पूरे करना है।
- 4:10इतने बड़े बड़े दाव हैं। मैंने बहुत बार कहा जो मिट्टी का
- 4:23एक कण नहीं बना सकता, वह परमात्मा होने का।
- 4:32यह अहंकार है और अहंकार व्यक्ति एक प्रलंक है, स्वयं के ऊपर भी,
- 4:44क्योंकि अहंकार का स्वयं का दुख होता है।
- 4:50अहंकारी व्यक्ति को वो दुख भोगना पड़ता है, समाज के लिए भी क्योंकि
- 4:55उसके क्रिया खिलाफ़ समाज को भी दुख देते है, विश्व को भी दुख
- 5:04देते है। जब तुम संकटों से घर जाओ जब
- 5:18तुम्हें चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा न चलाएं तो सुब्रमण्य के
- 5:32आगे फरियाद कर। हम सभी उसके बाल बच्चे हैं, वह हम
- 5:42सब का पिता है ये। अंधरा घना छ रहा।
- 6:00तेरा इंसान घबरा रहा ये अँधेरा घना छ रहा।
- 6:17तेरा इंसान घबरा रहा हो रहा बेखबर कुछ ना आता नजर सुख का सूरज छुपा।
- 6:37जा रहा है तेरी रौशनी में जो दम तो अमावस को कर दे।
- 6:53पूनम? नेकी पर चले और बदी से टले ताकि
- 7:04हँसते हुए निकले दम। ए मालिक तेरे बंदे हम।
- 7:21प्रत्येक इंसान के दो तल होते हैं।
- 7:28एक तल में वह शुद्र होता है, दूसरे तल में वह भ्रमण होता है।
- 7:41यह सारा ब्राह्मण एक है। जब शुद्रता में आता है तो वह
- 7:53स्वार्थी हो जाता है। यह वराटता में आता है।
- 8:01तो वह बांटने वाला हो जाता है। दाता और प्रत्येक व्यक्ति के ये
- 8:13दो तल होते हैं। क्षुद्र के तल पर आकर वह कमजोर
- 8:23होता है। शूद्र के तल पर आकर वह पाप भी
- 8:33करता है, पुण्य भी करता है और विराट के तल पर जाकर वह असीम हो
- 8:44जाता है। अनंत हो जाता है।
- 8:50उसका कोई और छोर नहीं रहता। सुद्र के दल पर आदमी पाप भी करता
- 9:05है। कुछ पाप छोटे मोटे होते हैं, कुछ
- 9:13पाप जाने अनजाने होते हैं, कुछ पाप जान बूझ कर के जाते हैं, बहुत
- 9:19बड़े होते हैं। और परमात्मा की कर्म व्यवस्था का
- 9:30नियामक लाल नियम उसको उसका फल उसी प्रकार से देते है।
- 9:43प्रत्येक व्यक्ति को अपने किए हुए कर्मों का फर्ज भुगतना पड़ता है।
- 9:52वह चाहे क्षुद्र हो, चाहे परमात्मा अवतरित हो गया हो, कृष्ण
- 10:01हो, राम हो। रामकृष्णा यह शुद्र व्यक्ति
- 10:10प्रत्येक व्यक्ति को अपने किए हुए कर्मों का फल फोकना होता है।
- 10:15इस शर्क में ले लो ऐसा। और परमात्मा ने यह है जो
- 10:31इन्स्ट्रुमेंट दिया है। इससे बहुत सी गलतियाँ भी होती
- 10:38हैं। यह खोपड़े कई बार फैसले गलत ले
- 10:47लेते हैं, जो मानवता के लिए भी गलत होता है और मनुष्य के लिए भी
- 10:58गलत होता है। मानवता और मनुष्यता में कोई फर्क
- 11:07नहीं है, मनुष्यता की चैन ही मानवता कहलाती है।
- 11:19मनुष्य मनुष्य मनुष्य की लंबी कथा मानवता में तब्दील हो जाती है।
- 11:30पहली बात हर। कर्म का फल निश्चित है, उसका फल
- 11:39आता है और करता को भोगना होता है। दूसरी बात मैंने कही प्रत्येक
- 11:50व्यक्ति के दोतल होते हैं। एक तल होता है सीमित लिमिटेड
- 11:59शुद्धा दूसरा तल होता है बराट असीम कोई बार वार नहीं है उसका।
- 12:14जब व्यक्ति सूत्र से विराट में जाता है तो वह भगवान हो जाता है।
- 12:29बड़े सरल शब्दों में समझाने की चेष्टा कब?
- 12:36कित्ते अखंड पा कित्ते के के उठ उठ जा कितने लोग आए उन्होंने कहने
- 12:53की चेष्टक? और उन्होंने कहा कि और कह कह के
- 13:03वो चले भी गए लेकिन उस परमात्मा का पारवार।
- 13:14इस क्षुद्रवृद्धि में समाता, तुम ये मत कहा करो, मुझे समझ नहीं आ
- 13:22रहा है क्योंकि उसकी बात समझ में आती ही नहीं।
- 13:35और जो तुम कहते हो, हाँ, मैं समझ गया बस मैं भीतर से हसता हूँ कि
- 13:48इसकी खोपड़ी समझ गई वरना वह तो समझ में आता है।
- 13:57अगर गागर कहे के हाँ, मैं समझ गई समुद्र मेरे में कैसे समा सकता
- 14:02है? तो सागर हाँ से और ये आखिरी सवाल
- 14:09है सागर के लिए। हँसने योग्य।
- 14:17अगर गागर कहे मैं समझ गई कैसे सागर मेरे भीतर समायेगा तो सागर
- 14:26हँसे हँसने के सिवा। और कोई चारा नहीं कहते कह के उठ
- 14:42जा कहते आँखें अखंड पा कहते कह के उठ उठ जा।
- 14:54हमारे से पहले भी बहुत लोग आए और हम आज नहीं कल चले जाएंगे।
- 15:04उसके बाद भी लोग आए। यह सिलसिला चलता ही रहेगा।
- 15:16आते रहेंगे जाते रहेंगे। निहेत स्वार्थ हेतु बोलते भी
- 15:22रहेंगे, लेकिन ध्यान रखना निहेत स्वार्थों को ध्यान में रखकर।
- 15:35आय तल्क जिसने भी जो बोला और आगे जो भी कोई बोल पाएगा, उसमें से वह
- 15:45कुछ ले के नहीं जाएगा। यहीं छोड़ जाएगा सब कुछ।
- 15:53इसलिए ध्यान रखना यह मन कहेगा जोड़ लो पतंजलि, महावीर, बुद्ध
- 16:06जैसे श्रेष्ठतम पुरुष कहेंगे, अपरिग्रह जोड़ों मत।
- 16:14जोड़ो मत, बस सिर्फ अपने शरीर के पालन पोषण के लिए रोग का उपचार
- 16:29करने के लिए विद्या कमाने के लिए। इतना सा कमा लो और यह काफी है और
- 16:44ध्यान रखना जो धन नहीं कमाना चाहता उसके भीतर से।
- 16:59पर महात्मा को पानी की बरहा की अग्नि जल गई।
- 17:08वह नाभी पड़ेगा तो कोई बात नहीं, लेकिन इसको एक नियम की तरह मत ले
- 17:15लेना। समाज में तुम पिछड़ जाओगे, ध्यान
- 17:24रखना मैं जो बोल रहा हूँ उसको बड़े सेंसिटिव तरीके से समझो, मैं
- 17:33तुम्हें हरी झंडी नहीं दे रहा की तुम सुस्त हो जाओ, ले ही हो जाओ।
- 17:38यद्यपि मन तो यही चाहता है कि मैं लेटा रहा हूँ नहीं संसार में आए
- 17:52हो तो इस शरीर का भरण पोषण करो। और अगर तुम्हे अपनी वासनाएँ पूरी
- 18:03करनी है तो इतसा कमाओ साईं इतना दीजिए जा मैं कोटा मैं भी भूखा न
- 18:16रहूं साधु न भूखा जा। कुछ ऐसे लोग भी तुम्हारे दर्द में
- 18:24हैं। बुद्धि जैसे जो तख्त उतार को
- 18:31ठोकरा गया है। उस चुभते हुए कांटे को जानने के
- 18:40लिए कि यह कांटा है, क्या वह चुभ रहा है?
- 18:47फिर उनके भिक्षा पात्र में कुछ डाल देना, जिससे उनका शरीर गति
- 18:54मान रहा है। शरीर के बिना तुम अपने अंतरिम
- 19:02लक्ष्य पे पहुँच नहीं सकोगे। मेरे शब्द थोड़े से मुश्किल आराम
- 19:11से समझना। इससे सरल शब्दों का उपयोग हो भी
- 19:17नहीं सकता तो कर्तव्य कर्म कर और शेष बचता हुआ वक्त।
- 19:35अपनी उस बिरहा की आग को बुझाने में लगाते हैं जो किसी मीरा में
- 19:43जगती है जो किसी नानक में जगती है, दादू में जगती है, कबीर में
- 19:49जगती है। व्यर्थ की बातों में म तोली अगर
- 20:08भीतर से इतना बेरहा उठ गया मीरा कितनी पड़ी है?
- 20:12अनपढ़, दादू, कबीर कितना पड़े? कागज कलम छुआ नहीं कबीर कहते है
- 20:27मैंने तो कागज और कलम छुआ भी है ये खोपड़ी अगर लिटरेट ना हो इस
- 20:38खोपड़ी में अगर सूचना ही ना हो। तो आपका कुछ नहीं बिगड़ने वाला।
- 20:52इस खोपड़ी में सिर्फ इतना सा सूचना हो जितना तुम्हारी गुरुदेव
- 20:58ने। तुम में वह जगती हुई आग बिरहा की
- 21:05उसको बुझाने के लिए मार्ग दिया है, बस उतने से शब्दों बहुत, वह
- 21:15तो बुजानी ही पड़ती है अन्यथा तुम जलते रहो।
- 21:25दो तल होते हैं। पहले तल पर आदमी सीमित होता है,
- 21:34सीमित व्यक्ति पुण्य भी करेगा, पाप भी करेगा।
- 21:40निश्चित पुण्य भी और पाप भी। अनजान में करेगा।
- 21:46उसे समझने वह बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुआ।
- 21:58वह अभी जानता नहीं, उससे गलतियाँ होंगी।
- 22:02ह्यूमन इज़ टू एरर्स इंसान से गलती होती है?
- 22:08भगवान से गलती नहीं होती। जो इस कल्प रहेगा, वह गलती भी
- 22:17करेगा। इसलिए उन गलतियों का प्रायश्चित
- 22:22मत करना, क्योंकि आदमी जैसे ही काम करता है।
- 22:31परमात्मा की सृजना में एक ऐसा सुपर सेंसिटिव कंप्यूटर तुम्हारे
- 22:37भीतर अचेतन मन में फीड है। जो तुम्हारी सभी क्रियाकलापों को
- 22:42स्टोर कर लेता है, वह बीजों की तरह फिर बीज उगते हैं, प्रोसेसिंग
- 22:50में आते हैं और 1 दिन वृक्ष बन जाते हैं।
- 22:531 दिन फूल लगते हैं और फिर फल रखते हैं।
- 22:58फल पहले कच्चे और फिर पके होते हैं।
- 23:02जब फल पक जाता है तो धरती पर घर जाता है और वह तुम्हें खाना ही
- 23:08पड़ता है। खट्टा हो, मीठा हो, स्वाद हो,
- 23:15अन्न हो। कड़वा हो करेले जैसा नीम जैसा
- 23:24मीठा हो शहद जैसा। प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना ही
- 23:40पड़ता है क्योंकि यह जो शक्ति पैदा होगी यह तुमसे कुछ ना कुछ
- 23:47करवाएगी, फिर तुम कुछ अच्छा भी करोगे कुछ।
- 23:59यह उस श्रेणी की बात मैं कर रहा हूँ जहाँ तुम सीमित होते हो और
- 24:08सीमित व्यक्ति अपने ही पापों के। जब रिएक्शन बन के आते हैं,
- 24:15प्रतिक्रियाएं आती हैं तो वो ले जाते हैं।
- 24:24मूल प्रश्न पे आ गए हैं। जब गलती इतनी भयंकर हो गई वह ना
- 24:36तो भोगती जाती है। और नहीं छोड़ी जाती
- 24:54उसे अमावस्या की काली रात काले मेघों से युक्त।
- 25:03दुख दाई क्षण होते हैं, उनका हल नहीं मिलता था।
- 25:13पूछा है कि उस अवस्था में हम क्या करें?
- 25:19प्रमंड से प्रयास करो। भ्रमण कहाँ है?
- 25:31भ्रमण तुम्हारे ही भीतर का एक ऐसा हिस्सा है।
- 25:39जो उस विराट के साथ कनेक्ट ठहर जाओ, दुखी हो, बहुत दुखी हो, इतने
- 25:57दुखी हो जिससे हम कह देते हैं। अरे अरे स्टोक्स अरे यार।
- 26:07इतने दुखी हो गए तुम और तुम्हें कहीं भी अंधेरे के सिवा नजर नहीं
- 26:16आता कुछ? दो ही तरीके पहला अगर कहीं
- 26:31तुम्हारे आस पास कोई प्रबुद्ध व्यक्ति बैठा है सच में प्रभुद्ध
- 26:38है। उसके पास चले जाना वह तुम्हें
- 26:43रास्ता बता देगा। अगर कुछ भी न मिले तुम्हें अंधेरा
- 26:52घना हो, हाथ को हाथ भी न दिखता हो।
- 26:56तुम कहीं जा भी नहीं सकते, बड़े फंस गए हो।
- 27:02तो फिर अपने भीतर उतर आना, भीतर उतर के तुम फरियाद करना हाथों को
- 27:24सर क्या? नाक के सी तुम्हें यह नाक बिलकुल
- 27:40तीसरे आंख के पैर ले जाएगा नाक का अगला हिस्सा।
- 27:49तीसरी आंख के पैदल आए और यहीं ऊपर जाकर ससुराल में आ जाए।
- 28:01यह एक कनेक्टिव पॉइंट है। इसे फिर समझ लो नाक का अगला
- 28:10हिस्सा। जो बुद्ध ने कहा कि सास को आते
- 28:15जाते देखो इस नाक का अगला हिस्सा अगर तुम बिलकुल पैदल रेखा फेचोगे
- 28:25तो ये तीसरा नेत्र। और तीसरे नेत्र से ऊपर तुम जाओगे
- 28:34यह सहस्त्र एक ही स्ट्रेट लाइन में नाक के शीत, तीसरा नेत्र और
- 28:46सहस्त्र ये तीनों चीजें। इनका एक कनेक्टेड रेखा भी है जब
- 29:01तुम इस प्रकार हाथ जोड़ के मैंने पहले भी बताया था ऐसे रख लो।
- 29:08कि इसके बीच का जो ये गैप है ये नाक के सिद में आए तो ये बिंदु
- 29:23आपस में कनेक्ट हो जाएंगे। उस वक्त तुम जो भी कुछ अपनी व्यथा
- 29:33है वो कहो। बोल दो परमात्मा के आगे मैं घोर
- 29:39संकट में हूँ, मैं दुखी हूँ, मैं कष्ट में हूँ, मैंने पाप किया है
- 29:48स्वीकार करना है स्वीकार कर लूँ। इसे ही कन्फेक्शन कहा ईसा ने कोई
- 30:01नहीं है तुम्हारे आस पास तुम अकेले हो, तुम हो और भ्रमण है,
- 30:09तुम्हारा ही बैराट रूप भ्रमण सब जगह है।
- 30:15उसके आगे अपनी व्यथा को और 245 मिनट के लिए लगातार अपनी व्यथा को
- 30:29दोहराते रहो। आज एक धर्म चला है।
- 30:38बी के कहते सुबह उठकर तुम कहो मेरे से ज्यादा खुशहाल व्यक्ति हो
- 30:44कोई यह एक साइकोलॉजिकल व्यवस्था है।
- 30:56इसके मानने से तुम सूखी कतई नहीं होगे, वरन सजा रहोगे तो दुखी है।
- 31:05बस यह उस पोलिश जैसा है जो हमने गंधली दीवार के ऊपर पैंट कर दिया।
- 31:16लेकिन दीवार भीतर से काली है, गंदी है कुछ नहीं होगा, तुम लाख
- 31:29साल भी करते हो। ऐसे ही लोग निहित स्वार्थों के
- 31:37अधीन होकर पाप कर्म करते हैं। केत्ते मूर्ख मल पख खा ये हैं ये
- 31:56गंदा खाना खाते हैं। बाबा नानक कहते हैं जब जीव असंख्य
- 32:11गलबड़ हत्या का नाम बहुत से लोग लोगों के गल काट देते हैं, दूसरों
- 32:18को और खुद के गाल को कटवाने से डरते हैं।
- 32:24लेकिन एक्शन का रिएक्शन तो आएगा ही आएगा, यह तो दूसरों की गर्दन
- 32:29काटने से पहले सोचना चाहिए। मैंने कहा अहंकार ही व्यक्ति,
- 32:37देश, समाज और यहाँ तक के स्वयं के लिए भी कलंक होता है।
- 32:47असंक गलवड़ हत्या कमा ये उसकी कमाई है दूसरों का गला काटना असंक
- 32:58पापी पाप कर जा, बहुत से पापी हैं।
- 33:02जो पाप करते करते चले जाते हैं। असंक कुड़यार कूड़े फेरा असंक
- 33:12मलेक्ष मलपकखा असंक निंदक सिर कर ही पार।
- 33:22नानक नीच गया। विचार नानक कहते हैं या नीचों का
- 33:30विचार किया? वह किसी का कुछ बिगाड़ते हैं।
- 33:39और अपना भी बिगाड़ लेते हैं। अगर इता सा पाप हो गया है भयंकर
- 33:49भारी तो पाप भूमि से भी भारी होता है।
- 34:01क्रोध अगन से तेज है पाप भूमि से बाज जड़ से पतला ज्ञान है कलंक,
- 34:18काजल से काज ऐसे व्यक्ति कलंक होते हैं।
- 34:23मैंने कहा। वह काजोल से भी ज्यादा काले होते
- 34:27हैं। तो जब कभी ऐसा मर हला जाए, तुम घर
- 34:36जाओ, चारों तरफ तुम्हें कोई मार्ग न दिखे।
- 34:47कोई एक रोशनई रेज ना दिखे कोई चारों तरफ अंधकार अंधकार अमावस्या
- 34:56के रात में ऊपर से काले घने में एक।
- 35:05तो तुम उस परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करना हे सच्चे पाश्य हे
- 35:14परम पिता परमात्मा मेरे से ये गुण मैंने किया है।
- 35:25मैं इस गुनाह को स्वीकार करता हूँ, मुझे कोई रास्ता दिखाओ, मैं
- 35:38कैसे निकलूं इस व्याधि से? यही फरियाद अर्जुन ने कृष्ण से की
- 35:49थी। कार्यप्रण्य दोषों का स्वभाव
- 35:58परछामिताम धर्म समूह चेता। जश्रय से निश्चितिंग रोहितन में
- 36:08शिष्य से अहम शादीमानत पर पन कायरता के स्वभाव के वशी।
- 36:21हे माधव, हे भगवान मैं घर गया हूँ मैं कहाँ पर हूँ और आपसे विनती
- 36:36करके पूछता हूँ। यज्ञ से अनिश्चित मेरे लिए क्या
- 36:46श्रेष्ठ कर रहा है इस वक्त की मैं इस अव्यादी से पार हो जाऊं?
- 36:58ऐसे ही तुमने ऐसे ही विकट परिस्थिति में पांच 4 मिनट के लिए
- 37:05प्रार्थना करेंगे। दो तरीके हैं अगर तो कोई पक्का
- 37:17यकीन है तुम्हें? कि यह उस तल पर पहुंचा हुआ
- 37:28प्रबुद्ध व्यक्ति तो उसके आगे अपना दुःख है।
- 37:39प्रातन काल में राजा। राज्य करते थे और राजा से गलतियाँ
- 37:45होनी है, स्वभाविक है। लेकिन जब इतना घर जाते थे कि उनका
- 37:51भार सहा नहीं जाता था क्योंकि पाप भूमि से भारी होता है।
- 37:59भूमि देख लो कितने भारी? तो फिर वह निकल पड़ते अपने
- 38:08गुरुदेव के पास जो दूर कितने किलोमीटर दूर निर्जन वन में अकेला
- 38:16बैठा है अपनी झोपड़ी में। जिसकी इच्छा बड़े बड़े धनपति करता
- 38:32है। सोने की लंका का मालिक रावण भी
- 38:37करता है। मतलब साफ है।
- 38:45सोने की लंका भी मिल जाए तो सुख नहीं मिला करता।
- 38:53यद्यपि तुम्हारा मन कहता है कि देखें तो सोने की लंका बनाएं तो
- 39:01फिर देखें। लेकिन जिसके पास सोने की लंका है
- 39:11वह रावण कहता है। खदानिल उंपनर जरे।
- 39:23निकुंज होतरे वसन विमुक्त धुरमती सदा शिरहसमंजलिवान।
- 39:41कदा नीलम पर निरझरी निकुंज कोतरे वसन बिमुक्त धुरमती सदा
- 39:54शिरहसमंजलि। विलो लो लो लोचनो ललाम बाल लगन का
- 40:09विलो लोलो लोचनो ललाम बाल लगन का। शिवे की मंत्र मुचरण कदा।
- 40:24सुखी वहाँ म्यां हे प्रब। गंगा के किनारे छोटी सी कोठियां
- 40:34के भीतर बैठा हुआ मैं। कब सिर के ऊपर जो मैंने बताया
- 40:42आपको शिरेस्तमंजलि वाहन सिर के ऊपर अंजलि बांधकर तुमसे फरियाद
- 40:53करूँगा। बिलोल लोल लोचनों आँखों से मेरे
- 40:59घर ज़रा आंसू बहते हैं ललाम बाल लग्न का शिवेति मंत्रमुक्तचरण शिव
- 41:08शिव इसेबकार करता हुआ। कदा सुखी।
- 41:13वहाँ मैं हूँ मैं कब सुखी होऊंगा। मतलब साफ है रावण सोनी की लंका का
- 41:25मालिक पवन उसको पंखा झूलती है मृत्यु उसके पांव में।
- 41:33कहीं से कोई खतरा नहीं कि लौकी का मालिक त्रिभुवन का मालिक किसके
- 41:45लिए रो रहा है, सुख के लिए रो रहा है।
- 41:52शिवायति मंत्रम उचरण कदा सुखी वहाँ म्यान हे प्रभु मैं कब सुखी
- 42:02आऊंगा एक बहुत बड़ा संदेश। राजा रावण तुम्हें देकर गए सोने
- 42:16की लंका का मालिक भी सूखे नहीं होता।
- 42:26सूखे कौन होता है? रावण फ़रियाद करता है।
- 42:38हे भगवान शिव हे शाश्वत हे सदा रहने वाले आध सच जुगाद सच हे भी
- 42:48सच नानक हुसे भी सच। मेरे ऊपर कृपा कब होगी?
- 43:01मैं तेरे समर में कब डूबूंगा कब तू मुझे याद करेगा कब तेरी यादों
- 43:08में मैं नीर बहाऊंगा छोटी सी कुटीर में बैठकर?
- 43:18आँखों से आंसू बहाता हुआ मैं तेरे समड़ में मगन हुआ लीन हुआ कब सुखी
- 43:27होऊंगा यही है सुख का कार्य? जब तुम उसकी याद में आंसू बहत हो
- 43:44और तुम उसकी याद में आंसू कब बहत हो जब वह तुम्हें याद करता है अगर
- 43:55वह तुम्हें याद नहीं किए। तो फिर तुम संसार में खोए रहोगे?
- 44:04पहले वह याद करता है तुमने देखा तुम्हारी बिना पूछे आनंदनाथ शुरू
- 44:13हो जाता है और डॉक्टरी से टेनेटस की बिमारी करते।
- 44:20और बहुत से डॉक्टर मेरे पास आ जाते हैं।
- 44:24यह बिमारी तो नहीं है? हम एएनटी स्क्वैशिष्ट हैं, फिर यह
- 44:30क्या है? ये बंद कैसे होगा?
- 44:32मैंने कहा बंद मत करो, इसका स्वाद चखो।
- 44:37यह परमात्मा तुम्हें पुकार रहा है उसके घर से पुकारना आई तुम नित्य
- 44:46कर्म भी करो, कर्तव्य कर्म भी करो और तुम उसकी याद में भी खो जाओ
- 44:54क्योंकि उसने तुम्हें पुकारा है। और जब उसकी पुकार एक बार आने रखती
- 45:04है तो जिनको नाद शुरू हो गया वो जानते है जो कभी हटता नहीं
- 45:11चौबीसों घंटे। जैसे संत कहता है सदा दिवाली
- 45:18सादकी और आठों पहर आनंद अनंतनाद अपने आप में एक सुख दाई क्षण है।
- 45:34भजमन रामचरण, सुख दा भजमन रामचरण, सुख दा।
- 45:56यह राम की राम ने तुम्हें याद किया, तुम उसे याद मत करना,
- 46:05तुम्हें इंतजार करना कि वह तुम्हें याद करे।
- 46:11क्योंकि तुम्हारे याद करने से कुछ नहीं होता।
- 46:15एनर्जी लेसनेस के सिवा तुम थक जाओगे और तुम्हारे याद करने से
- 46:23होता भी क्या है इसे तुम जानते ही नहीं उसको याद करोगे भी तो कैसे
- 46:30करो? नाम उसका कोई है ना यह व्यर्थ की
- 46:38बकवास यह लोग धंधा करने वाले, व्यापारी निहित स्वार्थों के अधीन
- 46:47और मैंने पहले ही बताया। एक रेत का कण यहाँ से कोई कभी
- 46:53लेके नहीं गया और यहाँ से कोई कभी लेके नहीं जाएगा, यहीं छोड़
- 46:58जाएगा। फिर भी इसे मूडता की पराकाष्ठा
- 47:06कहा जाए या ना कहा जाए। बिल्कुल कहा जाए, यह है मूडता की
- 47:13पराकाष्ठा पता है नहीं जाएगा साथ पता है पड़ोसी भूखा है पता है
- 47:25मेरे सामने। सड़क के ऊपर कोई भूखा नंगा सर्द
- 47:34रात कांप रहा है। पेट खाली फिर भी तुम मज़े से रजाई
- 47:44लेकर सो जाते हो। एक शायर ने कहा है जहाँ भी जीस भी
- 47:53बस्ती में जहाँ भी जीस भी बस्ती में कोई भी भूखा सोता है वहाँ
- 48:02बस्ती ही बस्ती से खुदा नाराज होता है बिल्कुल ठीक बात है।
- 48:13जटखबों, खरबों के खजाने लिए हुए आपसी कॉम्पिटिशन में उलझते
- 48:19जाएंगे। उस गरीब का क्या होगा, जिनका
- 48:23छीनकर इन्होंने एक नंबर होना चाहा है?
- 48:29उनकी संपत्ति तुमने ट्रंको में कैद कर लिया, उनकी संपत्ति में
- 48:35तुमने अपने नाम लिख लिया, उनकी संपत्ति तुमने बैंकरों में जमा कर
- 48:40दिया और वो भूखे मरे जाते हैं क्योंकि वो कमजोर है।
- 48:49वो नंगे हैं, सर्द मौसम में उनके शरीर पे कपड़ा नहीं और तुम उनका
- 49:00मजाक उड़ाते हो? लेकिन ध्यान रखना, सोने की लंका
- 49:10का मालिक रावण भी दुखी है। तुम दुखी इसलिए हो कि तुमने किसी
- 49:20का हक। अपने बैंक अकाउंट में डालिए अपने
- 49:29संदूकों में, डालिए तुमने गरीब व्यक्ति का हक दिया नहीं, इसलिए
- 49:35मैं तुमसे कहता हूँ तुम कहीं भी जा रहे हो।
- 49:40अगर रास्ते में कोई बेकमंगा भूखा मिल जाए और तुम्हारे पास टिफिन
- 49:49में रोटी हो तो उसे खिला के फिर जाना और कोई सर्दी में ठिठुरता
- 49:56हुआ व्यक्ति मिल जाए। तो अपने शरीर से गर्म चादर उतार
- 50:04के उसे दे देना तुम पाओगे तुम जहाँ जाओगे तुमने अगर एक दान
- 50:14किया, तुम्हें 10 मिल जाएगा। दे दुन्या 70 आठ यह एक फॉर्मूला
- 50:27नहीं है। तुम्हारे मन को बहलाने के लिए इसे
- 50:31प्रैक्टिकल करना। और मैं भी यहाँ हजारों व्यक्ति इस
- 50:42पर इस फॉर्मूला को अडॉप्ट करके धन्य हो गया।
- 50:49के बाबा जिंदगी जीते थे, मरे मरे। अब जिंदगी जीने का स्वाद आया और
- 51:00सिर्फ मनुष्य ही नहीं परमात्मा ने यह जो सरजना की है यह सब के लिए
- 51:10की है। सगले जी है जनता का दाता।
- 51:16सब जीव जंतु का बताता है और उसने यह सारी सृजना सब जीवों के निमित
- 51:28किया और तुमने सबके हक खा लिया। तुम्हारे पेट भर जाएंगे, निश्चित
- 51:41रूप से तुम्हारे शरीरों के ऊपर कीमती वस्त्र होंगे।
- 51:50तुम्हारे ऊपर कीमती शॉल जो होगी और तुम्हारी जनाज़े में भी सोने
- 52:01के कफन होंगे, सोने के जनाज़े होंगे।
- 52:12लेकिन उस सोने के जनाजे के भीतर पड़े पड़े भी तुम दुखी हो क्या
- 52:24यही फरियाद करता है रब? रावण को सब मिल गया और तुम रोज़
- 52:33कथा सुनते हो? तुम्हें समझी नहीं आया क्योंकि
- 52:40तुम बुद्धि से सोचते हो, बुद्धि से बांटा भी जा सकता है।
- 52:48बुद्धि से छीना भी जा सकता है। बुद्धि बड़ी गणित लग गया है।
- 52:56इसके भ्रम में मत आना। जब कोई नेक विचार आए, उसे तुरंत
- 53:01कर देना तुरंत ऐट दी। स्पॉट ऐट दी मोमेंट।
- 53:09और जब कोई बुरा विचार आए उसे पोस्टपोन कर देना करेंगे, कल
- 53:13करेंगे तुम पाओगे, जिंदगी खुशहाल हो, अच्छा विचार है ये तुरंत
- 53:26क्रियान्वित कर देना। बुरा विचार आए उसे पोस्टपोनड कर
- 53:31देना स्थगित कल तक के लिए स्थगित और तुम पाओगे के जिंदगी में सुकून
- 53:39आ गया। जब जीवन आपदाओं से भर जाए, कमियों
- 53:57से भर जाए, दुखों से भर जाए और ध्यान रखना ये शब्द लिख लो।
- 54:06जब तक व्यक्ति अपने ही अंत स्थल में जाकर स्वयं को रिकॉग्नाइज
- 54:13नहीं करता, तब तक वह व्यक्ति कुछ भी कर ले, सुखी नहीं होगा।
- 54:23जाप कर ले, पाठ कर ले, पूजा कर ले, स्वाध्याय कर ले, दान कर ले,
- 54:29पुण्य कर ले, कुछ भी कर ले, बड़ी गद्दी मिल जाए, बड़ी सोचने मिल
- 54:35जाए, आई ए एस कर लो, आई पीएस कर लो।
- 54:42कुछ भी गद्दी नशीं हो जाओ कितनी भी सूचनाएं तुमने धरती की इकट्ठी
- 54:49कर ली। ये तो आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- 54:52में भी तुमसे ज्यादा है लेकिन क्या वो सुखी है?
- 55:02आर्टिफीसियल इन्टेलिजेन्स सुखी है क्या नहीं सिर्फ सूचनाएं बस तुम
- 55:11इतह से ही हो क्या लोगों को तुम सूचनाएं बांट दोगे?
- 55:17सुख नहीं बांट सकोगे। और बात तो जनक सूखे मानस जन्म
- 55:27पाकर भी तुम सुख ना ले पाए तो मानस जन्म व्यर्थ गया।
- 55:34तुम्हारा कित्ते जीवन बेकार चले गए तुम्हारे?
- 55:40बहुत जनम बीते मेरे माथो ए जनम तुम्हारे लिए हर बार तुम कह देते
- 55:50हो लेकिन फिर फिर उल जाते हो, थोड़ा सा सीएम बनके देख लो, थोड़ा
- 55:57सा एम एलए बनके देख लो। एम सी बन के देखो पीएम बन के देखो
- 56:06इसी चाल बाजीयों में मन तुम्हें उलझाया जाता है मिलता विलुता कुछ
- 56:10भी नहीं तुम इस मन के मारी। इसकी चंचलता के संग संग हुए दुख
- 56:21भोगते रहते हो। कभी सुख ही नहीं होते।
- 56:27सुख की कामना रावण भी करता है। जब तुम अंधकार से गिर जाओ चारों
- 56:43तरफ घने काले बाद में परमात्मा से प्रार्थना कर क्या ये श्रेय से
- 56:59अनिश्चितता में? मुझे मार्गदर्शन कर जो मेरे लिए
- 57:09शुभकर है इस वक्त शिष्य से अहिंसा दिमाग तो हम पर नमा मैं आपका ही
- 57:18बच्चा हूँ। मुझे सही राह सही मार्ग दिखला दो
- 57:27प्रफु क्षमा मत मांगना इस संसार में क्षमा होता।
- 57:41क्षमा तो तुम ही तुम्हारे आप को कर सकते हो वो थोड़ा सा जुदा मसला
- 57:46है उसके लिए फिर पूरा प्रवेश इन चाहिए चाहूँ तो फिर पूछ लेना,
- 57:56लेकिन मैं कहता हूँ क्षमा मत करना अपने आप को।
- 58:00क्योंकि तुम क्षमा करके फिर फिर पाप करोगे, मोक्षदायिनी गंदा में
- 58:10डुबकी मत लगाना, क्योंकि डुबकी लगाने के बाद तुम फिर फिर पाप
- 58:15करोगे। और गंगा तुम्हारे पाप हर नहीं
- 58:20सके। बना पानी में नहाने से कभी पाप
- 58:26धुलते हैं? क्या कालिख धुल सकती है, महज धुल
- 58:31सकती है? पाप नहीं धुल सकते?
- 58:38तो क्षमा मत मांगना, रास्ता पूछने, रास्ता संत हो, संत न मिले
- 58:51तो अपने ही भीतर उतर जाओ। वह दुनिया का रखवाला सर्जन हारा।
- 58:58तुम्हारे भीतर ही तो बैठा है, उससे पूछ लो, वह तो सब जगह जहाँ
- 59:04तुम जाओगे वहाँ तुम्हारे संग संग चले, तुम उसे छोड़ नहीं सकता है।
- 59:15तो उससे फरियाद करना, मार्गदर्शन मांगना और जैसा मैंने तुम्हें
- 59:23पोस्चर बताया इस पोस्चर से श्वास की प्रथम नासिकपुट से ले के तीसरा
- 59:32नेत्र। और सह शरारत से जद में आ जाता है।
- 59:40फिर वह वैज्ञानिक पहलू है। फिर तुम अगर पूछना चाहो तो मैं
- 59:47तुम्हें ये भी सह विस्तार बता दूंगा।
- 59:50यह भी एक प्रवचन का मसला है। माफ़ यहाँ कोई किसी को नहीं कर
- 59:58सकता, माफ़ तो तुम ही अपने आप को कर सकते हो, वह तुम्हें मैं बता
- 1:00:04दूंगा, लेकिन तुम माफी मांगना मत हालांकि मन कहेगा।
- 1:00:14कि ये ठीक है, पाप में भी कर लो और माफी भी मांग लो फिर फिर पाप
- 1:00:22करो। हमारे हिंदू धर्म में ऐसे ही
- 1:00:28बकवासों की भरमार है। प्रायश्चित कर लो।
- 1:00:34गायत्री मंत्र का जप कर लो दशमान से हवन कर लो पापड़ों के लिए
- 1:00:44क्षमा मांग लो। जैन धर्म में भी ऐसा है।
- 1:00:49हिंदू धर्म जैन धर्म में ज्यादा फर्क नहीं है, पांच पीढ़ियों का
- 1:00:52फर्क है। मन्नू जी महाराज से सनातन शुरू
- 1:00:56हुआ और पाँचवीं पीढ़ी से ऋषभदेव से जैन धर्म शुरू हुआ।
- 1:01:02बस पिता से ही फर्क है एक ही पिता की संतान।
- 1:01:11एक पिता एकस के हम वारस एक ही वारस है एक ही हमारा पिता है तो
- 1:01:22निहत् सार्थों से बाई से बाई को लड़ा के आग जला के।
- 1:01:31कत्लोगारत करवा के खून सड़कों पर खिड़के जो ऐसे कुकृत्य किया करते
- 1:01:41हैं, उनके लिए कोई नर्क। परमात्मा ने बनाया नहीं, बस वो
- 1:01:52यहीं दुख भोगते रहते हैं जीवन नहीं जीवनोपरयंत हजारों जन्मों
- 1:02:02तक। वह पाप भोगते हैं, कोई गंभीर पाग
- 1:02:06नर्क नहीं होता, ना ही कोई स्वर्ग होता है।
- 1:02:10यही धरा स्वर्ग भी है और यही धरा नर्क भी है।
- 1:02:16तुम देखो यहाँ एक संत बैठा आनंद की ज़िन्दगी जीता है।
- 1:02:22और उसकी कोई चाहत नहीं और यहाँ एक राजा बैठा भिक्षा पात्र उठाए
- 1:02:30वोटों की भीख मांगता है, वह भी इस धरा पर है।
- 1:02:37ऐसे पाखंडी जालसाजी झूठ बोलने वाले लुटेरे।
- 1:02:43आपका धन द्रव्य छीनने वाले नाम दान देने वाले व्यापारी भी यहीं
- 1:02:53बैठे हैं। मैं जानता हूँ क्यों घट घट के अंत
- 1:03:01की जान? भले भरे की पीर पर मैं सबके भीतर
- 1:03:06विद्यमान हूँ और भीतर विद्यमान हूँ, इसलिए मैं सबको जानता हूँ।
- 1:03:13मैं जानता हूँ कि ये झूठे हैं, इन्हें कुछ मिला नहीं।
- 1:03:19अगर मिला होता तो इतने बड़े बड़े डेरे खड़े ना करते।
- 1:03:27सुख के लिए डेरों की आवश्यकता कहाँ होती?
- 1:03:32सुख के लिए 1001002 ₹200,00,00,000 की महल मंजिलें
- 1:03:37लेना कहाँ जरूरी होता है? यह ठग है।
- 1:03:45यह व्यापारी है और मैं इनके फायदे के लिए भी बोल रहा हूँ क्योंकि
- 1:03:51कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। आज नहीं कल।
- 1:03:58इनको भी भुगतना पड़ेगा वक्त तुम्हारा तो ये गंवाएंगे ही?
- 1:04:03ये मूर्ख ये नहीं जानते कि हम अपना भी वक्त गंवाते हैं और जब हम
- 1:04:09हजूरों को सौंप के जाएंगे गद्दीयों को वक्त उनका भी खराब हो
- 1:04:14जाएगा जो तुम्हारे गुरु सौंप के गए थे।
- 1:04:19वक्त उनका भी खराब हो गया। कोई नहीं पहुंचा।
- 1:04:23मैंने सब खंगाल लिया। इसलिए सबका वास्तविक चरित्र क्या
- 1:04:31है वो मैंने बेखौफ़ बोल दिया है। इनमें से न कोई पहुंचा है।
- 1:04:42यह एक गिरोह था डाकुओं का। इनमें छः सात लोग थे।
- 1:04:49उन्होंने अलग अलग स्थान पर जाकर ऐसे ही डेरे खो दिए।
- 1:04:55लूटपाट मचा रहे है। जैसे राजनीतिक ग्रो नहीं होते, ये
- 1:05:02अमित शाह है, ये नरेंद्र मोदी है, ये किरण अरिजुजु है।
- 1:05:17ये चौबे दुबे हैं नाम तो भूल गया मैं ये व्यर्थ की ही बकवास करता
- 1:05:24रहता है। हर वक्त और ये वैश्य जो गुणगान
- 1:05:30करती हैं। ये झूठ बोलते हैं और बाबा नानक
- 1:05:42कहते हैं जो उस शक्ति को बोलने की चेष्टा करता है, ये तो झूठ ही
- 1:05:49बोलते हैं वो जाने जीतते मुँह खाय।
- 1:05:56उनके मुँह के ऊपर जितनी जूतियां पड़ती हैं वो जानते हैं।
- 1:05:59बाद में तो ये डाकुओं के घरों हैं, राजनीतिक हैं, कुछ धार्मिक,
- 1:06:09धार्मिक हैं, आध्यात्मिक नहीं हैं।
- 1:06:11धर्म और अध्यात्म का फर्क मैं किसी वक्त समझाऊंगा।
- 1:06:14ये भी पूछ लेना ये भी कई प्रवचनों की लड़ाई है तो ये डाकुओं के घरों
- 1:06:23है, इनमे भ्रम है क्या? वहीं रावण, वारा, सोने की लंका
- 1:06:32जुड़ जाएगी। तो मैं सूखी हो जाऊंगा, लेकिन ये
- 1:06:37नहीं जानते कि सोने की लंका वाला भी परमात्मा से क्या मांगता है?
- 1:06:50कदा निलम्ब निरझरी निकुंज कोट रे वसंत।
- 1:07:25ललाम बाल लग्न का भिलोल लोल लोचनो ललाम बाल लग्न का शिवेति मंत्र
- 1:07:43मुचरण। कदा सुखी वहाँ में हूँ।
- 1:07:52गंगा नेल के किनारे बैठा हूँ कुटिया के भीतर हे शिव हे शाश्वत
- 1:08:02मैं तुम्हारी यादों में। कब खुऊंगा मैं कब सुखी होऊंगा?
- 1:08:11प्रमाण है कि राजा रावण भी सोने की लंका का मालिक सुखी नहीं हो
- 1:08:18सका और एक संत है जिसकी कोई यंका। कोई वासन नहीं, कोई विचार नहीं,
- 1:08:33कहीं जाना नहीं, कहीं आना नहीं, कुछ लेना, नहीं कुछ देना।
- 1:08:45अपनी मस्ती के आलम में खोया है, चौबीसों घंटे आठों पे है आनंद में
- 1:08:54रहता है। ना कछु।
- 1:09:03ले ना, ना कछु दे, ना ना कछु ले ना ना कछु।
- 1:09:20देना कबीरा मग्न कबीर मैं मन्नड़ो लाग्यो मेरा।
- 1:09:40हाँ। फकीर मैं फकीर मैं मनोरा जो मेरो
- 1:09:53रहा, जो सुख पा। राम भजन मैं जो सुख पायो, राम भजन
- 1:10:16मैं। सो सुख ना हीं अमीरी में, अमीरी
- 1:10:29में मनडोला जो मेरो रो फकीरी में। फकीरी में मंडरा क्यों?
- 1:10:43मेरा? धन्यवाद।