Latest / Baba ji Vijay Vats / 30 Sep 25 - शुरुआत में पूजा किसकी और क्यों की जाती थी? मान्यताएं कैसे उपजी और इसके क्या प्रभाव रहे?
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- 0:15किशोर कुमार गुप्ता चरण पर स्वगंज भारत भूमि स्वर्ण योग से दृढ़ युग
- 0:38में कैसे आ गया? बड़ा सुंदर सवाल है पुत्र भारत
- 0:58भूमि स्वर्ण युग से द्रिद्र युग में क्यों आ गए, कैसे आ गए?
- 1:16कल्पनाओं और मान्यताओं के कारण भारत सोने की चिड़िया हुआ करता
- 1:33था, लेकिन करता था। आज दर्दता की चिड़िया प्राणविहीन,
- 1:48पारथ, सड़ी गली परंपराओं को सिर के ऊपर डवे हुए।
- 1:57गंदगी के ढेर टोकर आज कल नवरात्र चल रहा है।
- 2:11इन नवरात्रों के कारण ही हम स्वर्ण कार्यों से द्रि द्रुवाद
- 2:18में पहुंचे। यद्यपि तो हमेशा अमृतकाल को हो गए
- 2:28और ये भी ध्यान रखें कि जो कहते हैं कि अमृतकाल आ गया, कोई झूठ
- 2:35नहीं बोलता, उनके लिए अमृतकाल आ गया।
- 2:45अपनी बात करते हैं तुम्हारी बात 320 ईस्वी से 550 ईस्वी तक गुप्त
- 3:07काल। और गुप्त काल था स्वर्णकार।
- 3:14जब कोई सभ्यता अपने पीक पैंट पे चली जाती है तो एक भय होता है, एक
- 3:25डर होता है। और डर ये होता है कि कहीं हम यहाँ
- 3:31से नीचे न घर पड़ें, फिसल न जाए। धाम से धरती के ऊपर न घर पड़ें
- 3:43आसमान की। ऊंचाइयों को छू लिया है।
- 3:46हमने कोई वॉल केला ऐसी थी गुप्तकार स्वर्णकार कहा जाता है,
- 4:01गुप्त वंश में ये शुरू हुई वहाँ के राजा।
- 4:07बहुत समझदार थे, लेकिन एक पीढ़ी समझदार हो जाए, दो पीढ़ी चार बड़ी
- 4:16समझदार हो जाए और कितना भी कमा ले गवाओं पोत तो एक ही बहुत होता है।
- 4:30वह सब विचार जाएगा। हमारे शास्त्रों में एक कहावत है
- 4:38बूत कपूत तो क्यों धन संचय पूत सबूत तो क्यों धन संचय।
- 4:48तुम धन संचय क्यों करते हो? शास्त्र में लिखा है कि धन संचय
- 4:58मत करो। अपनी ग्रह मुझसे बहुत लोग प्रश्न
- 5:05पूछ लेते हैं। अपनी ग्रह ना करेंगे तो बच्चों को
- 5:09क्या देके जाएंगे? क्या बच्चे अपंग पैदा होंगे?
- 5:14अब वाहिज पैदा होंगे, लूले लंगड़े पैदा होंगे, मन्थ बुद्धि पैदा
- 5:19होंगे, उनमें कोई कुशलता नहीं होगी।
- 5:29अगर फसल तूफानों से न टकराएं, ओलावृष्टि से अतिवृष्टि से
- 5:42अल्पवृष्टि से सामना न करें। तेज धूप, कम धूप।
- 5:47विपरिक परिस्थितियों का अगर फसल सामना न करे तो वह फसल कमजोर हुआ
- 5:55करती है। वो मानव ही क्या जिसने तूफानों से
- 6:02टकराना सीखा? वो मानव ही क्या जिसने पत्थरों की
- 6:11छातियाँ चीर कर रास्ते नहीं बनाए? तुमने प्रश्न बड़ा शानदार पूछा
- 6:27पुत्र के लिए दुनिया तुम्हारी कर्जदार है हिंदुस्तान के।
- 6:42आज समस्त विश्व में यही झगड़ा है। ऋग्वेद में पूजा तो सदा सी चलती
- 6:56रहे, महाभारत काल में भी अगर पूजा का विधान था।
- 7:04जब कृष्ण और शिशु पाल की टकराहट है।
- 7:07अग्र पूजा यानी सम्मान। सबसे पहला सम्मान किसे दिया जाए?
- 7:17लेकिन एक बात समझले ना गौर से। पूजा होती थी ऑथेंटिसिटी की
- 7:25प्रमाणिक वायु की, अग्नि की, आकाश के, पृथ्वी के और जल के चाँद
- 7:40तारों की। ग्रह नक्षत्रों की और ये सब थे।
- 7:51इनका वजूद हमें दिखता था तो इंद्र की पूजा है, वायु की पूजा है,
- 8:06अग्नि की पूजा है। दूध देने वाली गायों की पूजा हुई
- 8:17जो हमें पोषण देते हैं। अन्न की पूजा हुई, अन्न को ब्रह्म
- 8:23कहा गया। व्यक्ति तब तक समीता अर्थ।
- 8:31तुमसे कितना ही आदिमानव कह लो उसके शरीर के ऊपर चाहे वस्त्र न
- 8:39हो वो चाहे नग्न हो, लेकिन उसमें बुद्धिमानी थी, समझदारी थी।
- 8:47आज चाहे तुम 10 बार कपड़े रोज़ बदल लो।
- 8:52लेकिन भेजे में अगर मूडता भरी होगी तो वस्त्रों से तुम समझदार
- 8:58नहीं होंगे। गौर से समझना पुत्र तुम्हारे और
- 9:06तुम्हारे आने वाली। पीढ़ियों के लिए बड़ा शानदार
- 9:14सब्जेक्ट, तुमने पूछा गुप्तकार में हम सोने के अम्बार हिमालय
- 9:29पर्वत जितना सोना था भारत के पास। और दूसरे मुल्क के दरिद्र थे।
- 9:35हमने सब भांति तर्की क्यों करे जब सार्थकता से जब प्रमाणिकता से
- 9:51ऑथेंटिसिटी से हम। कल्पनाओ में आ गए।
- 9:55मैं नेताओं में आ गया तो हम घिर। बस यही एक कहानी है हमारे खाक
- 10:12होने की निशानी बस यही एक कहानी है।
- 10:20हम बड़े समृद्ध थे, हम बड़े समृद्ध थे और ध्यान रखना समृद्ध
- 10:34हम भौतिक का की। वजह से नहीं, आध्यात्मिकता की वजह
- 10:40से भी हम समृद्ध थे। अभी इस आंकड़े को याद रखना 320
- 10:49ईसवी से 550 यह वो काल था और जब जब भी ऐसा काल होगा, मानवता अपनी
- 11:06भौतिकता और आध्यात्मिकता की चरम ऊंचाइयों को छूएगी इन शब्दों को
- 11:13आप सर्कल में। जब जब भी ऐसा काल आएगा, जैसे
- 11:21गुप्त काल तो मानवता क्या भौतिकता क्या आध्यात्मिकता अपनी चर्म?
- 11:36ऊंचाइयों पे पहुंचेगी, पीठ पे पहुंचेगी ज्यादा से ज्यादा क्या
- 11:46होता था हम इन प्रकृति के बनाने वालों को हमने देखा नहीं।
- 11:55हर व्यक्ति बड़ा ईमानदार था। अब गौर से सुनना बात जो मैं
- 12:00सुनाने जा रहा हूँ तुम्हें किसी शास्त्र में मिले कि नहीं?
- 12:05इसे ही शास्त्र बना लेना, क्योंकि ये रहस्य की बातें हैं।
- 12:14एक रहस्यमय शक्ति। की सदा ही मान्यता रही है व्यक्ति
- 12:22के मन में जिसने जल बनाया, वायु बनाई, पृथ्वी बनाई, आकाश बनाया।
- 12:37अभी नहीं बनाया। सूर्यचंद्र नक्षत्र ये सब बनाया
- 12:41है तो आदि मानव गुप्त काल में गुप्त काल से पहले की बात करता
- 12:54हूँ। मैं इतना प्रोस्परस हुआ इतनी
- 12:57खोजें की उसने। अगर वह खोजें न करता अग्नि जैसी
- 13:07चीजों की पहिए जैसी चीजों की और बहुत सी ऐसी चीजें जो बाद में
- 13:14परिष्कृत होकर आज क्या कुछ बन गया है?
- 13:20उसने उड़ी हुई सीढ़ियों को देखा और कल्पनाओं को साकार रूप दे
- 13:25दिया। पहले वह मानता था यह प्रश्न बड़ा
- 13:33बड़ा प्रभावी है। इसे अवश्य सुनो, नास्तिक भी सुनो।
- 13:39नास्तिक तो अवश्य ही सुना आदिमानव प्रमाणिक चीजों की पूजा करता था
- 13:57तो उसने नदियों को माँ कहा, सूरज को देवता का नमन किया।
- 14:07आकाश तारों को चंद्रमा, धरती को वायु अग्नि को उसने देवता कहा और
- 14:17इन सब के बनाने वालों को इन्द्र प?
- 14:24यह उस वक्त की बात कह रहा हूँ। मैं जिसे हम हर एक वैदिक काल कहते
- 14:33हैं, इसलिए ऋग्वेद में तुम्हें इंद्र का नाम मिलेगा।
- 14:41हे इन्द्रा। ऐसा कर दो ऐसा कर दो तो वक़्त आया
- 14:53320 इशू का। वो उससे पहले हो चूके थे तब तब की
- 15:05जरूरत बिगड़ चुका था। वैदिक काल के बाद ऋगवेद के बाद।
- 15:13बुद्ध ने आके मान्यताएँ तोड़ी, बुद्ध ने कहा ये तुम्हारा गलत है
- 15:21मानना ये तुम्हारी मान्यताएँ है, वहाँ से कुछ तरक्की होनी शुरू में
- 15:31है। भारत सदा से विश्व करूँ रहा है
- 15:36क्योंकि यहाँ के लोग खोजित हैं, यहाँ की जमीन, यहाँ का वायु मंडल,
- 15:43यहाँ का वातावरण यहाँ के मौसम बड़े शानदार हैं।
- 15:49छः ऋतुमा होती हैं और छः कि छः यहाँ होती हैं।
- 15:54भारत हर प्रकार से विश्वपुरु था। हर प्रकार की फसल यहाँ होती है,
- 16:06लेकिन बस राजा ही। झूठे हो गए।
- 16:15जनता श्रद्धा से ही आज्ञाकारी रही।
- 16:20राजाओं ने पड़े हुए लोगों के साथ मिलकर पाखंड बिखरे, झूठ बोले।
- 16:32फिर बंटवारे हुए हुए मल्टीफर्केशन हुए विकास के नाम के ऊपर
- 16:46केटगॉरीज़ बनी गई, ब्राह्मण बनाये, शूद्र बनाये, क्षत्रे भवेश
- 16:53बनाए। इन सब चीजों के अंत से मैं नहीं
- 16:59जाऊंगा। मैं अपनी बात पर थोड़ा सा आगे
- 17:03बढूंगा व्यक्ति जो चीज़ दिखती थी उसकी पूजा करता था।
- 17:11हे वाजू देवता हे अग्नि देवता हे जल देवता जो गाय हमें पोषण देती
- 17:19थी, दूध देती थी, उसे माता कहा गया।
- 17:22ये उस वक्त की बात है। गउ पाल गउ को पालने वाला।
- 17:30भगवान कृष्ण मशीनरी नहीं होती थी और कोई काम धाम नहीं होते थे।
- 17:38खेती बाड़ी करलो गऊ का बच्चा हल जोतेगा।
- 17:49और गौ दो देखे गौ की पूजा माँ के रूप में जो देता है वह देवता जो
- 18:00पोषण करता है वह माता ये परिभाषा है आदि मानव।
- 18:10कितना भी नंगा हो, लेकिन वह अंधभक्त कभी नहीं रहा।
- 18:24नंगा था। लेकिन उसका दिमाग शतरंज की चालें
- 18:28बिछाने में नहीं लगता था, बस उसे अपने पेट भरना था, टंडन था, और
- 18:39शत्रु से बचाव करना था। प्रकृति की मार बढ़ती।
- 18:48वह कहता इंद्रक्रूप हो गया, परमात्मा क्रूप हो गया, पानी का
- 18:57देवता कुपित हो गया, जल थल हो गया।
- 19:01ऐसी मान्यता थी लेकिन इसके पार। मन के किने गहरे कोनों में एक बात
- 19:09सदा से मान के हृदय में रही कि इन सब चीजों को बनाने वाला इस
- 19:15राष्ट्र सृष्टि को बनाने वाला भी कोई है उसको।
- 19:21उन्होंने नाम दिया इंद्र। अब देखा तो किसी ने नहीं देखा तो
- 19:28आज भी किसी ने नहीं किसी ने देखा है तो मुझे पता था मेरी बात को
- 19:36ध्यान से सुन लेना सृष्टि कब बनी? वे लेना पाया पंडती जे लिखे वेद
- 19:50पुराण ये कब बनी, किसने बनाई, कौन छवाब बनाने वाला, न इसे राम जानते
- 19:59हैं, न इसे कृष्ण जानते हैं। जिनको तुम पूछते हो उनमें से किसी
- 20:05ने भी इसे देखा नहीं, ना मैंने देखा ना कृष्ण ने देखा ना परशुराम
- 20:11ने देखा। आज तक जीतने भी विद्वान हुए
- 20:15आस्तिक या नास्तिक? उन्होंने परमात्मा को कभी नहीं
- 20:19देखा ये बात समझ लेना। इसलिए आज का मानव विक्षिप्त सी
- 20:31अवस्था में पागल हुआ हुआ घूमता है।
- 20:34उसने जहाज बना लिया। उसने अणु बम बना लिया, उसने
- 20:39हाइड्रोजन बम बना लिया, लेकिन वह मूड करने से घना होता चला गया।
- 20:46मान्यताएँ बढ़ते ही चली गईं, दर्द बढ़ता ही गया, जूं जूं दवा की।
- 20:57काश काश यह प्राणी अपने भीतर होता था, लेकिन इसके पास सुरक्षित
- 21:11वातावरण नहीं था जंगली जानवर थे। हिंसक पशु थे, जमीन पर रेंगने
- 21:20वाले सांप थे, भिक्षु थे, कीड़े थे, इनसे बचाव जरूरी था इसलिए
- 21:25विश्वामित्र को अगर अपने भीतर उतरना पड़ा तो दशरथ की शरण लेनी
- 21:30पड़ी कि कृपा करके अपने दोनों पुत्र मेरे साथ भेज दीजिए।
- 21:36हैं, यज्ञ करने जा रहा हूँ। ये है वो यज्ञ अग्नि जिसकी बात
- 21:41कृष्ण करते हैं। जप यज्ञ अपने भीतर के उस स्थान
- 21:51में उतर जाना जहाँ आनंद ही आनंद का महोत्सव है।
- 22:04आज मानव धरती पे किसी को भी गुजता है वह नास्तिक था।
- 22:09वह आस्तिक था या कोई भी था? लेकिन एक बात को हृदय पे लिख लेना
- 22:16जीस परमात्मा की तुम कल्पना करते हो उसे देखा किसे ने?
- 22:22और न ही कोई देख सकेगा, न कोई जाना न कोई जान सकेगा, वह सदा
- 22:32अनजाना सा ही बच जाएगा। आदिमानव झूठा नहीं था।
- 22:44सच्चा था। आज सुरक्षा के घेरे बड़े प्रबल हो
- 22:49गए हैं। हिंसा के जानवरों को हमने मार
- 22:51दिया। हमने अपने रैन बसेरे बना लिए,
- 22:57बड़े सुरक्षित हैं, केले हैं। उनमें एक कीड़ी भी नहीं घुस सकती।
- 23:05हमारी इच्छा के बिना खीड़ी की तो बात छोड़ कीड़ी नहीं घुस सकती।
- 23:14वह वो वेला थी। जब व्यक्ति को बौद्धिक का ज्ञान
- 23:23नहीं था यानी तुम्हारी सूचना ही नहीं थी।
- 23:27तुम्हारी न्यूरॉन जो खालिद आज ठसाठस से भरे पड़े हैं, ये सर लोग
- 23:36या चार लोग ये तुम्हारे शास्त्र? यह तुम्हारे गीता पर से गोरखपुर
- 23:40के लिखे हुए गबोर शंक इनका धंधा है भाई
- 23:57तुम गाथनें किसी की कहलो? लेकिन एक बात सदा ही सत्य की
- 24:05कसौटी पर खरी उतरेगी कि तुम्हारे कितने ही बड़े परमात्मा जिनको तुम
- 24:12नवी कहते हो, जिनको तुम। अवतार कहते हो तीर्थंकर कहते हो
- 24:21उनमें से कभी किसी ने उन अज्ञात हाथों को देखा नहीं और इतना ही
- 24:31नहीं कोई देख भी न सपेगा। बस उसके बारे में इतासा ही कहा जा
- 24:39सकता है। उस परमात्मा को न राम ने देखा, ना
- 24:46कृष्ण ने देखा, ना मोहम्मद ने देखा, ना ईशान ने देखा बस।
- 24:56सिर्फ महसूस किया कि देर इज़ सम एक्सट्रॉर्डिनरी पावर कोई अदृश्य
- 25:08ताकत है जो इस सारे विषयों को संचालित कर रही है।
- 25:18एक तरह से सबने महसूस किया। आज का बंदा भी ये महसूस करता है।
- 25:26हम लौट चले उन्हीं बातों में। अब बाकी तो सब था, जल बह रहा था
- 25:36उसे नमस्कार कर सूर्य जो सामने है उनका धन्यवाद दे दो अंधेरा छंटा
- 25:46उजाला हुआ हम कोई काम धाम कर सकेंगे।
- 25:52वायु बहती है उसे प्रणाम कर लो, अग्नि तुम्हारे सामने इसे नमन कर
- 26:00लो, जल है, वायु है, आकाश है, अग्नि है।
- 26:12और माँ धरती है ये सब है और दिखते हैं कोई कल्पना नहीं, कोई पाखंड
- 26:24नहीं, कोई मान्यता नहीं, कोई थोपी हुई।
- 26:29किसी प्रकार का इल्यूज़न ने फिर एक झुकाया, जबकि व्यक्ति ने काम
- 26:38करना सीख लिया। खेती बाड़ी सीख ली, अन्य अन्य
- 26:45कुशलता के काम सीख लिए। धीरे धीरे और एक वक्त ऐसा आया
- 26:51गुप्त काल में गुप्त वंश में जब हिंदुस्तान देख घर में सोने के
- 26:57सिक्के पूरे होते थे, खदानें लगी होती थी, उसी काल में चीन का एक
- 27:06यात्री। गुप्तकाल में चीन का एक यात्री
- 27:16जहाँ भारत आया फयान उसका नाम भारत की शोहरत देखकर वह जंक हो गया।
- 27:30उस वक्त शासन का चंद्रगुप्त द्वितीय और वह जात्री भारत के घर
- 27:39घर में घूमा और उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी।
- 27:44चिन वे हाल। आप ध्यान से सुन लेना बात का भारत
- 27:54यथार्थ की पूजा करता था। जल है तो जल की नदियां हैं, दिखता
- 28:01है, हवा है तो हवा महसूस होती है, चाहे ना दिखते हो।
- 28:06आंधी तूफ़ान आते हैं इसलिए पवित्र जल था गंगा का अभी करोना काल में
- 28:17बड़ा नीला जल हो गया था। तुमने देखा ना नीचे सिक्का बड़ा
- 28:24हो साफ नजर आता है। क्योंकि एक बंदा ही है जो सब
- 28:30विकृत कर देता है, तो उसने देखा है कि यहाँ तो सब हरियाली है।
- 28:47कुछ भी मिश्रित नहीं है और ऐसे प्यार और सुखद वातावरण में मानव
- 28:55रहता था उसकी कल्पना से परात बलखातिबले।
- 29:05मस्ती में खेलें थपेड़ों से मिल के गाले नीले गगन के तले।
- 29:25धरती का प्यार फले ऐसे ही जग में आती है सुबह ऐसे ही शाम ढले।
- 29:44नीले गगन के तले धरती का प्यार कले।
- 29:54फल खाती बेलें, मस्ती में खले बेडम से मिल के कल।
- 30:03ऐसा वातावरण था फाहियान चौंक गया हर घर जहाँ जाता अतिथि सत्कार
- 30:08होता वहाँ से चला अतिथि देवो बाबा, अतिथि का सत्कार करो प्रचुर
- 30:16मात्रा में अन्न धन था, यह वो वेला था।
- 30:21जो हिंदुस्तान ने एक बार पीक छोड़ दिया कारण राजा ध्यान से सुन लो।
- 30:37इस समृद्धि का कारण क्या था? राजा राजा और उसके मंत्री?
- 30:47अगर कुछ ही के लोग चाहें परशर्वे हूँ ईमानदार हूँ तो वह देश आकाश
- 31:00की ऊंचाइयों को छू सकता है। तब कौन था और कौन नहीं था?
- 31:10एक नहीं था, चाणक्य नहीं था और जब जब चाणक्य इस धरती पर आए तब तक
- 31:21विनाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं हुआ।
- 31:24तुम जीस चाणक्य की बातों पर अमल करते हो सावधान चाणक्य ने जितनी
- 31:33गुंडागर्दी यहाँ फैलाई, अपने अहम्कार के कारण कोई बात सत्य कह
- 31:41दी नन्द ने। और नन्द दासवंश से थे।
- 31:52ब्राह्मण कैसे स्वीकार कर ले कि दासवंश का कोई व्यक्ति छोटी जाति
- 32:00का कोई व्यक्ति राज़ करे? और ब्राह्मण को अपमानित करे।
- 32:06उसने चोटी खोल ली। लंबी चोटियां थी।
- 32:09उसकी कहते हैं उसकी चोटी तीन फिट थी।
- 32:22कोई बात ऐसी हो गई? मौर्य वंष की बात मैं गुप्त काल
- 32:30की बात नहीं कर रहा मौर्य वंष की बात जहाँ ऐसे अहम्कारी व्यक्ति
- 32:38शासन को चलाएं। वह मुल्क ज्यादा देर काट नहीं
- 32:42सकता और देखिये मोरूवंश का खत्म हो गया, महारथी आए लेकिन सब
- 32:56चाणक्य की भेंट चढ़ गए क्योंकि सब इन्हे चाणक्य की नीतियों का
- 33:00प्रयोग किया। सावधान देशवासियों, चाणक्य की
- 33:05किताबों को फाड़ दो, आग लगा दो जब जब चाणक्य रहे और खुद भी कोई सरल
- 33:17नहीं मरा उसको आग लगा दी गई सुबंधु ने।
- 33:22वह आधा जला और आधा तड़पता रहा। छह महीने तक वो तड़पता रहा, उसे
- 33:28झुलसती भी आपने कोई आ जाता उसके मुँह में मुर्गी डाल लेता वह
- 33:33जिंदा रह लिया। ऐसी शतरंज की मुहर्रम बिछाने वाले
- 33:41व्यक्तियों का ऐसा ही परिणाम होता है।
- 33:45पहियाँ ने लिखा, भारत में लोग बढ़े हैं, सरल और धार्मिक है।
- 33:56उसने लिखा कि अपराध। न के बराबर होते हैं और जो की
- 34:02अपराध करता है उसको कठोर दंड नहीं दिया जाता।
- 34:07सहज दंड दिया जाता है क्योंकि अपराध कम तर्क श्रेणी के होते
- 34:11हैं। आय तो अपराध बड़े गौर होते हैं।
- 34:15ये सब राजा की ही प्रपा है। यथा राजा तथा प्रजा मास नहीं
- 34:19खाते। शाकाहार जय उस वक्त की बात करता
- 34:24हूँ मैं फहयान लिखते हैं गुप्तवंश प्रगुप्त का शासन सिथर और समृद्ध
- 34:32था। भारतवर्ष ने भौतिक समृद्धि और
- 34:44आत्म समृद्धि की जो ऊँचाईयां और गहराइयां नापी बस धरती पर आज तक
- 34:54वह नाप नहीं पाया। ऋषि थे।
- 34:59आध्यात्मिकता चरम पे थी, भौतिकता चरम पे नहीं थी, लोगों को मांग के
- 35:06खाना पड़ता था, लेकिन शांति थी। क्यों?
- 35:14राजा राम जैसे थे, राजा कृष्ण जैसे थे।
- 35:17आपने अयोध्या में कोई भिक्षुक नहीं देखा होगा, मांगने वाला कोई
- 35:22कोई, कोई कोई जैसे आज अमेरिका शायद तुम नहीं जानते, कोई व्यक्ति
- 35:29भीख नहीं मांग सकता, अगर कोई व्यक्ति भीख मांगेगा।
- 35:33तो वह ऐसे नहीं मांगे जैसे तुम्हारे यहाँ आकर गाल पकड़ लेते
- 35:38हैं। भिक्षा पत्र के आगे पश्तोल लगी
- 35:45होती है, भिक्षा देता है कि नहीं? ऐसे भिक्षा नहीं थे।
- 35:52अमेरिका में पीठ के पीछे लिखा होता है एम हंगरी प्लीज़ डोनेट
- 35:59में मुझे दान, मैं भूख हूँ, मैं बेरोजगार मुझे दंड, मैं निर
- 36:10आश्रित हूँ। मुझे धन दे दो, पीठ के ऊपर लगाना
- 36:13पड़ता है। यहाँ तो जिन लोगों को पीठ के ऊपर
- 36:18चिपका के चलना चाहिए, वो लोग सुंदर सुसज्जित कपड़ों में राज़
- 36:25कर रहे हैं। मैं कहानी कहता हूँ, गुप्तवंश के
- 36:34वंश में जो हुआ हुआ, कितने झगड़े, तूफान हुए, कितने लोग मारे गए,
- 36:41लाखों की संख्या में और अहंकार के कारण मारे गए हम प्रसंग में लौट
- 36:48चले। वह जो देखा नहीं वह अज्ञात, वह
- 36:55अज्ञे तो झूठ बोलते नहीं व्यक्ति आज तो सारे चैनल के ऊपर देखिये,
- 37:04झूठ बोल रहे हैं लोग परमात्मा के बारे में।
- 37:11मरकर मैं स्वर्ग गया, मैं नरक गया, यमदूत ले गए, यमराज ले गए।
- 37:18इन पाखंडी लोगों को कम से कम उम्र जेल होनी चाहिए।
- 37:26जब स्वर्ग नर्क दट इस मेंडर स्टेट तो तुम भौगोलिक स्थान बनाकर लोगों
- 37:33को गुमराह क्यों करते हो? अगर कहीं मैं शासन व्यवस्था को
- 37:42संभाल लेता हूँ लेकिन लोभ नहीं होता और लोभ के बिना।
- 37:51शासन व्यवस्था संभाली नहीं जा सकती।
- 37:54जीस व्यक्ति ने अपने वस्त्र उतार दिए हो और मात्र लगोट पहन लिया
- 37:59हो। वह देश पर राज़ क्यों करना
- 38:01चाहेगा? बस अपना कर्तव्य था संसार को भारत
- 38:07को बेड़ियों से आजाद करना। और एक अम्बार की दिशा देना वह कर
- 38:13दिया और फिर कोई मरे, कोई जलाये कोई बात नहीं।
- 38:20गाँधी जी छः बार सूट नहीं बदलते थे, बदल सकते थे, उनका बाप चीफ
- 38:28मिनिस्टर था। करमचंद दीवान था।
- 38:33अंग्रेजों का रास्ता कोई कमी ना थी, बैरिस्टर थे लंदन से पड़े
- 38:42छोटी सी घटना सुना दो 1906 के बाद है।
- 38:52वो ही दिन अक्टूबर 2 बड़ी प्यारी कहानी है।
- 39:01शायद आपको किसी को तुम्हें न मिले।
- 39:06अक्टूबर 2 को महात्मा गाँधी और विनायक ने मोहनदास से कहा, हैप्पी
- 39:17बर्थडे कहाँ हूँ? यदपि 14 वर्ष छोटे थे।
- 39:28लेकिन मित्रता में उम्र नहीं देखी जाती तो विनायक से बोले मोहन
- 39:36विनायक तू कष्ट न करें। इन बातों से उनकी अहिंसा यहीं से
- 39:42प्रकट होती है। तू कष्ट न कर मैं आता हूँ।
- 39:51मोहन किसी काम से उलझ गए, देरी हो गई।
- 39:54मोहन को जाने वाले बहुत हैं, गाँधी की बात हो रही है।
- 40:00एक मोहन भगवान कृष्ण को भी कहते हैं जो मोह लेता है, थोड़ी देर हो
- 40:08गई। 2 अक्टूबर कातिल 1906 हम परादीन
- 40:17थे, अंग्रेजों के यहाँ से कोई वीजा नहीं लगता था।
- 40:23एक यही बोल के परमिशन लो और चले जाओ।
- 40:29गाँधी जी अमीर थे, गाँधी जीके पास श्रद्धा खूब पैसा रहता था, एक
- 40:36अकेला खर्चने वाला और पूरी की पूरी तनख्वाह अंग्रेज बहुत
- 40:42तनख्वाह देते थे। अपने करिंदों को सदा खुश रखते थे
- 40:51और उस वक्त बहुत सा धन भेजा जाता है।
- 40:56गाँधी जी खुले हाथों से खाते बांटते जश्न मनाते।
- 41:04गाँधी का जीवन किसी प्रकार के अभाव में नहीं गुजरा।
- 41:10राजकुमारों की तरह उन्होंने जीवन बताया।
- 41:14खूब मज़े से मस्ती से मौज से किसी तरह के मोहताज नहीं है।
- 41:20उन्होंने भिक्षापत्र नहीं उठाया। यह सत्यवाद भिक्षा पात्र उठाना
- 41:26कोई गर्व की बात नहीं तो जब देरी हो गई तो सावरकर में धैर्य की कमी
- 41:38थी, सावरकर में सहिष्णुता की शक्ति नहीं थी।
- 41:48इम्युनिटी कम थी, सहनशीलता कम थी, ज्यादा इंतजार न कर पाए तो
- 41:55उन्होंने अपनी वो कढ़ाई रख दी। लोहे की कढ़ाई में पकाते थ्रू
- 42:01छोटी सी कढ़ाई। तुने झींगा मछली पकाने लगा और जब
- 42:13तक माहौल पहुंचे झींगा मछली पक रही थी।
- 42:21हल्की हल्की। तुम तो सुगंध कहोगे, लेकिन
- 42:30दुर्गंध क्यों? अरे क्या कर रहा है विनायक मछली
- 42:38खाएंगे आज तुम्हारे जन्म दिन है। मोहन बोले मैं तो नहीं खाता, तुम
- 42:47क्या लेके आये हो मैं तुम्हारे लिए, देखो क्या लेके आया आओ बैठ
- 42:51के खाये कहते मैं तो थोड़ा सा ही खाऊंगा, बस मैंने अपने लिए खाना
- 42:57बना लिया है। जींका जींगा अच्छे तेज मसाले खाये
- 43:04करते थे। सावरकर और तेज मसाले खाने वाले
- 43:10असहिष्णु होते हैं, इसलिए तो मैं बार बार में कहता हूँ, देखिये
- 43:14मुझे 13 वर्षों के नमक निकालने। और डॉक्टर्स ने बड़ी चेतावनी दी
- 43:19आयोडीन की कमी हो जाएगी, तुम पागल हो जाओगे, अब पंग हो जाओगे, मैंने
- 43:27कहा कुछ नहीं होगा जो दूध में पीता हूँ उसमें पॉइंट फोर सिक्स
- 43:33मिलीग्राम नमक होता है। दट इस सुफ्फिसिएंट फायरऑनक।
- 43:38बच्चा कैसे जिंदा रहता है? दूध में हर तत्व होता है वह दट।
- 43:45इस नेसेसरी फॉर और बॉडी वह बनानी वाला कमजोर वैज्ञानिक नहीं है
- 43:54तुमसे तुम कोई बहुत बड़े वैज्ञानिक नहीं है।
- 43:59तुम तो खोज भी नहीं सके। उसने बना भी दिया और तुम कभी बना
- 44:06नहीं हो सकोगे तुम खोज भी नहीं हो सकोगे।
- 44:12जीसको जट से उसकी दी हुई जीवा से ही कह देते हो परमात्मा नहीं है
- 44:19क्या मोल लगता है वह कोई मोल मांगता भी नहीं है तुमसे दाता दे
- 44:23लेंदा थकपा जुगा जुगांतरकईखा। तीन सैफयान 399 में निकला और 405
- 44:39छः वर्ष लगे। उसे चंद्र गुप्ता द्वितीय से
- 44:44मिला, जिसे विक्रमादित्य भी कहते है।
- 44:49उसे चन्द्रगुप्त द्वितीय भी कह देते हैं।
- 44:52विक्रमादित्य विक्रमी संपत्ति भी उनके नाम से बना है जो हम पंचांग
- 44:57देखते हैं। जीस पंचांग का मैं विवरण दे रहा
- 45:08था विक्रमे संपत्ति। वह ईसा से 57 वर्ष पहले बताया गया
- 45:16है। 56 वर्ष आठ महीने एक सख्त संपत्ति
- 45:22चलता है जो हमारा राष्ट्रीय पंचांग है वो ईसा से 78 साल बाद
- 45:31में शुरू होता है। अब आइए यह कहानी उलझ जाती है।
- 45:37इतिहासकार दिमाग छोड़ देते हैं। इतिहासकार पिछली बातों को बट्टे
- 45:49खाते डाल देते हैं। वो कहते हैं, बस यहीं से शुरू
- 45:54होता है जहाँ से अगर शुरू होता है तो विक्रमी संबंध ईसा के पूर्व
- 46:03नहीं ईसा के पश्चात शुरू होना चाहिए तो हमारे पंचांग।
- 46:10जो बनते हैं वो ज्यादा इतिहास की खोज नहीं करते।
- 46:16वह स्टार से की परिक्रमाओं को देखते हैं इसलिए उनका कुछ लेना
- 46:23देना भी नहीं हैं, लेकिन इतिहासकार यहाँ ले जाते हैं।
- 46:31विक्रमी समेत विक्रमादित्य ने शकों को हराया।
- 46:37इस खुशी में मनाया गया, लेकिन यह बात गलत है।
- 46:49विक्रमी संपत अगर ठीक से इतिहास को देखा जाए, जो जानते हैं जो
- 46:55बुद्धि से सोचेंगे वो तो कुछ जानते हैं जो अपने भीतर उतरेंगे,
- 47:03वह सही बता सकेंगे कि क्या हुआ? यह विक्रमादित्य जीसको आप द्वितीय
- 47:10कह देते हो? यह सात्वाँ विकर्मादित्य सात में
- 47:15पीढ़ी थी विक्रमादित्य यह शुरू हुई।
- 47:20यह शुरू हुई 57 वर्ष पहले। ईसा से 57 वर्ष पहले ये शुरू हुई।
- 47:36इसका नाम था करण यह पहला विक्रमादित्य पड़पोता सडपोता आगे
- 47:44लगाए जण कर्ण के पुत्र हुए शक। और शाक्य के हुए दंभ, दंभ के
- 47:51कनिष्क, कनिष्क के यथार्थ, यथार्थ के पुष्कम और सात में हुए
- 47:56विक्रमांकित छह पुष्पें पहले जा चुकी थीं और पहली पुष्प ने।
- 48:08इस संवत का निर्माण किया। यह संवत पहेली कर्ण संवत के नाम
- 48:16से जाना जाता था। बाद में विक्रम विक्रमादित्य के
- 48:22नाम से जाना जाने लगा। कर्ण के नाम से शुरू हुआ।
- 48:27जो 57 वर्ष से पहले जन्म उसके बाद और भी पीढ़ियां हैं।
- 48:34कारण के बाद शासन संभालना शासक ने फिर दंभ ने फिर कनिष्क ने फिर
- 48:40यथार्थने पुर पुष्पम ने फिर संभालना इसने।
- 48:49जो हमारे असली विक्रमादित्य है हम मानते हैं इसको, लेकिन इसका
- 48:55राज्यकाल हैरानी की बात है। ये पागलों का क्षेत्र है ना
- 49:01विक्रमी संबद्ध को। तो हराया क्षकों को और उस खुशी
- 49:09में मनाया गया और विक्रमादित्य का राज्य कब?
- 49:16ये जानकर आपको बड़ी हैरानी हो। 40 साल राज़ किया उसने 375 ईस्वी
- 49:22से ईस्वी पूर्व नहीं ईस्वी से। 415 ईसवी तक 40 वर्ष तक
- 49:30विक्रमादित्य उसको द्वितीय कह देते हो लेकिन है वो सप्तम 57
- 49:44वर्ष पहले वास्तव में ये शुरू हुआ।
- 49:53सिर्फ अपनी भारतभूमि को अधिमान देने के लिए यह पंडितों की
- 50:00जालसाजी है। यह याद में किया गया विक्रमादित्य
- 50:08की सातवीं पीड़ित ऊपर के। पूर्वज लेकिन शुरू किया
- 50:14विक्रमादित्य ने। ये बात ठीक है।
- 50:1857 वर्ष पहले ईसा से पूर्व इनके पूर्वज थे जो पहले राजगद्दी पे
- 50:25बैठे। उनकी यादगार में शुरू किया गया ना
- 50:30के क्षकों को हराने के कारण खुशी में खुशी थी उनकी यादगार में जैसे
- 50:37हम पटेल की यादगार में आज तस्वीर बनाते हैं तो पटेल तो है नहीं, वो
- 50:43तो 50 में चले गए हैं। लेकिन पटेल की यादगार में आज
- 50:49मूर्ति बना दी। इतिहास कहता है वो 1950 में विदा
- 50:57हो गया। ऐसे ही विक्रमादित्य बड़ा समझदार
- 51:01व्यक्ति था। ऐसा शानदार राजा था वो।
- 51:06कि उसने सातवीं पीढ़ी से शुरू किया और उसकी यादगार से यह
- 51:14विक्रमी संपतवाना इतिहासकार कह देते हैं कि वह विश्वामित्र क्षमा
- 51:23कर विक्रमादित्य। पौत्र था या पुत्र था, ये हमें
- 51:30पता नहीं। विक्रमादित्य प्रथम का पुत्र था
- 51:36या पुत्र था, हमें पता नहीं, लेकिन ये द्वितीय था।
- 51:42पहले छह को खबर है, अब सुनिए। सत्य ये है कि ईसा से 57 वर्ष
- 51:49पहले उज्जैन की राजधानी भारतवर्ष की उसकी राजगद्दी पर बैठे राजा।
- 52:00कारण इसलिए एक शब्द आपको बता दूँ। यह संबंध जुड़ेगा आपके पंचांग के
- 52:08साथ पहले तिथि फिर वार, फिर योग तीन फिर नक्षत्र।
- 52:24करण यह कारण उसका नाम है जो पंचांग में पांच मांग है।
- 52:36पहले तिथि क्या है, दूसरा वार क्या है, तीसरा नक्षत्र क्या है?
- 52:43चौथा योग क्या है और पांचवा करण क्या है?
- 52:46बिलकुल अंतिम में धकेल दिया। करण करण पहला विक्रमादित्य था
- 52:56पहला, विक्रमादित्य। उसकी जादूगर में बनाएगा, किसी
- 53:02खुशी से नहीं बनाएगा हम हराया जरूर विक्रमादित्य ने शकों को यह
- 53:09है बिलकुल ठीक है। इतिहास यहाँ तक ठीक है और 375 से
- 53:14415 ईसवी तक याद। राज़ किया उसने 40 साल तक ये आपकी
- 53:22बहुत सी गुत्थियां सुलझ जाएंगी, क्योंकि मैंने अपने अंतश में जाकर
- 53:27इतिहास को खंगाला और बहुत देर खंगालने के बाद यह शक्ति निकलकर
- 53:34सामने आया। कि कहाँ खो गए वो?
- 53:38इनको तो ये भी नहीं पता कि पुत्र था ये कैसे हो सकता है कि पता ही
- 53:43ना लगे पुत्र कौन पौत्र कौन दादा कौन बाप कौन ऐसा होता है क्या
- 53:51नहीं। लेकिन ये चूक गए इन इतिहासकारों
- 53:56को कुछ पता नहीं। सत्य में यह कि 57 वर्ष ईसा से
- 54:01पूर्व करण नाम का राजा उज्जैन के ऊपर शासन किया करता था।
- 54:10वह सातवीं पीढ़ी थी इस विक्रमादित्य की।
- 54:16और इसने उसकी यादगार में इसको शुरू किया।
- 54:20इत्तेफाक से जब शुरू किया तब इन्होंने क्षकों को हराया भी था।
- 54:28ये बात कहानी जुड़ जाए, बात अलग है कर्ण के राजकाल में।
- 54:37शंकर की स्मृति चिन्ह के अलावा और कोई देवी देवता नहीं होता था।
- 54:46यह भी एक प्रतीक था जैसे हम कोई चिन्ह बना लें।
- 54:52देखिये मेल और फीमेल के लिए हम एक प्रतीक बनाते हैं गोलाकार के नीचे
- 55:02अगर प्लस का निशान दे दें और गोलाकार के ऊपर अगर टेढ़ा तीर का
- 55:08निशान बना दें तो यह मेल और फीमेल को दर्शाते हैं।
- 55:12ना? बस बिल्कुल इसी तरह परमात्मा का
- 55:16उस अज्ञात शक्ति का प्रतीक चिन्ह यह गोलाकार पिंड बना दिया गया।
- 55:23यह आपको बहुत पराणा मिलेगा, यह तो आपको हजारों हजारों हजारों साल तक
- 55:29मिलेगा। भगवान राम ने भी शिव यानी जो सत्य
- 55:37है, जो शाश्वत है, उसकी आराधना की थी रावण पर विजय प्राप्त हेतु।
- 55:50ठीक आप समझ गए इतिहास में माथापच्ची बहुत होती है, लेकिन
- 55:56मैंने क्योंकि ये सत्य खंगाले हैं और दूर तक मैं गया हूँ राम का
- 56:04राज्य भी मैंने देखा। कृष्ण का राज्य भी मैंने देखा।
- 56:08भिकारी बहुत कम हुआ करते थे और वो भिखारी भिखारी की तरह लगते नहीं।
- 56:15इसलिए जब द्वारका में प्रवेश किया उसके मित्र सुदामा ने तो लोगों को
- 56:23गिना आई जब उसने कहा। मैं कृष्ण के बचपन का दोस्त हूँ,
- 56:33तो वो वहाँ से अरे कहाँ राजा कृष्ण भगवान और कहाँ तुम फटे हाथ
- 56:42चल भाग यहाँ से। उस वक्त सुदामा जैसा वस्त्रधारी
- 56:51दाढ़ी बढ़ी हुई है फटेहाल कोई व्यक्ति था ही नहीं द्वारका में
- 57:03और भी सुनिए ताला क्यों नहीं लगता था रामराज?
- 57:09रामराज में ताला इसीलिए नहीं लगता था कि सब भर बैठ खाते थे और ऐसा
- 57:19था तब का तंत्र अगर किसी घर में आज खाने के लिए कुछ नहीं है तो
- 57:23पास वाले घर से मांग लो। अब ये प्रथा थी कि उसको वापस नहीं
- 57:29करना पड़ेगा। कोई लेन देन का सम्बन्ध नहीं है
- 57:33तो हमारे पास नहीं है। पड़ोसी से ले आओ, पड़ोसी के पास
- 57:37नहीं है, उससे ले आओ तो कौन चोरी करेगा, किसकी चोरी करेगा, मांग लो
- 57:41जाके मिल जाएगा। सोना, चांदी, हीरे जौहरा तब
- 57:50मांगने से मिल जाते थे, इतना खुशहाल था, हम कह देते हैं रामराज
- 57:57लेके आएँगे, लेकिन रामराज बहुत मुश्किल है।
- 58:03पर खाने की वस्तुएं दे दी जाती थीं और मोल भाव नहीं किया जाता
- 58:09था, ना ही मोल भाव लिया जाता था। जरूरत है भाई भूखा है परिवार तो
- 58:16भाई ले जा वहाँ से जितनी जरूरत है।
- 58:21उसको पता है अगर मेरे खत्म हो गया तो मैं पास वाले से मांग लूँ,
- 58:25सामने से मांग लो, किसी को इंकार नहीं वो ताला कौन लगाई, किस पर
- 58:30लगाई सभी का सांझा है, घर अलग है। परिवार की तरह रहते थे।
- 58:40ये होता है रामराज इसे ही कहते हैं वसुधैव को डंपकम ऐसे ही कृष्ण
- 58:47के राज़ में भी होता था और सदैव वो ही जनता खुशहाल होती है जहाँ
- 58:52अलग से सिंधु को न हो। ये मेरी बात को नोट कर लेना जीस
- 58:57सब वक्त तुम्हारी तिजोरियां अलग होने लगी।
- 59:00आज की तरह दुर्भक्ष छा जाएगा भूख से लोग तब कोई नहीं मरता था लेकिन
- 59:08आज मरते हैं सबसे ज्यादा अन्न आज। और आज ही भूख से ज्यादा लोग मरते
- 59:15हैं, क्यों? क्योंकि यह अन्न को स्टोर करने
- 59:19वाले पैदा हो गए। लोग ही लोग पैदा हो गए।
- 59:23बाबा नानक का वंड झको यह मूल मंत्र भूल गए लोग वसुधै कुटुम्बगम
- 59:31हमारे ऋषियों ने। ये बोल गए तो हम चले करण के खाल
- 59:39सब कोई देवी देवता की मूर्ति नहीं थी, ना कोई दुर्गा पूजा थी, ना
- 59:44कोई हनुमान था, ना कोई साला सा धाम होता था ना कुछ नहीं होता था।
- 59:53ये सब बाद में बना है। लालच के वश जैसे आज मैं कोई पिंडी
- 59:58खेड़ी कर दूंगा तो उसकी आज नहीं 200 400 साल बाद पूजा होनी शुरू
- 1:00:03हो जाएगी। यहाँ तो वट वृक्षों को और वृक्षों
- 1:00:08को पूजा जाता है या तो झंडों को पूजा जाता है।
- 1:00:12ऐसा काल विला हो गया। आज तो समझिये परमात्मा को प्रतीक
- 1:00:18के रूप में पूजा जाता था और प्रतीक हमने मान लिया था।
- 1:00:23जैसे हम फीमेल और मेल को आज मान ले तो मान लिया तो सब जानते ही
- 1:00:29हैं। ऐसे ही शंकर की पिंडी तब परमात्मा
- 1:00:38के प्रतीक रूप में गढ़ी गई थी। वह स्वर्प मान्यति इसलिए आपको
- 1:00:45पुरातन धरती के गहरे। काल खंडों में शिव की यह स्मृति
- 1:00:54चिन्ह मिलेगा ही मिलेगा। कहीं चले जाओ तो अंत भक्तों वह
- 1:01:00दावा मत करने लग जाना कि यहाँ तो बंदर हुआ करता था।
- 1:01:11यह सिर्फ प्रतीक था, परमात्मा का है, किसी धर्म का नहीं, समझो किसी
- 1:01:19धर्म का नहीं, शिव की पिंडी का शिव मैंने शाश्वत जो सदा से है आध
- 1:01:26सच जुगाद सच। है भी सच नानक और से भी सच उसी का
- 1:01:33प्रतीक बना लिया हमने जैसे हम लड़ाई झगड़ा शुरू कर दे।
- 1:01:41बेल के चक्कर के ऊपर तीर नहीं था, ये तीर दो थे तो झगड़ा शुरू हो
- 1:01:46गया। यह प्लस का निशान नहीं था।
- 1:01:50यह माइनस का निशान था तो झगड़ा शुरू हो गया।
- 1:01:53ना प्रतीकों पर ही बहस होती है। प्रतीकों पर ही लाई झगड़े होते
- 1:01:58हैं। प्रतीकों पर ही खून खराबे होते
- 1:02:01हैं और प्रतीकों के ऊपर आज गदियों पर बैठे हैं लोग।
- 1:02:07तुम्हारे खून चूस रहे हैं कभी वो कर उडा दिया कभी वो कर कटा दिया
- 1:02:16और अंत में बात सुनो जाएगा। इनके साथ भी कुछ नहीं।
- 1:02:23जब तिलक तुम मेरे पास नहीं पहुँच जाते।
- 1:02:29चैन न आएगा करार न आएगा आनंद का वो रस न आएगा जीसको पीने के बाद
- 1:02:40व्यक्ति ठहर जाता है भाग दौड़ भीतर की खत्म तो बाहर की।
- 1:02:46बाहर की भागदौड़ बताती है कि भीतर से तुम सिधर नहीं।
- 1:02:52यू आर नॉट स्टेबल इंटरनली भीतर वह जो एक्सटसी है।
- 1:03:04आनंद की चरम सीमा आनंद का चरम बिंदु है।
- 1:03:10समुद्रों के समुद्र बहते हैं भीतर आपने बाहर के समुद्र तो देखा
- 1:03:16लेकिन भीतर का वो अमृत कुंड कहाँ देखा?
- 1:03:19अमृत खान कहाँ देखा? कहानी है धोबी की बेटी राजा की
- 1:03:36कमी ढो रही थी, उसने कुछ लगा हुआ देखा।
- 1:03:41उसने कहा कि जरूर ही राजा की बुरी चीज़ तो खत्म है।
- 1:03:45इसने अवश्य ही कोई स्वादिष्ट पदार्थ खाया होगा और हमें तो कभी
- 1:03:49स्वादिष्ट पदार्थ मिलता है तो धोबी की बच्ची ने सोचा और उसने।
- 1:03:57राजा की उस कमीज को चाट लिया चूस लिया वह क्या था, वह क्या था, वह
- 1:04:10अमरतरस था, तुम क्या समझते हो? रैदास के हाथ लगने से पानी
- 1:04:26बदबूदार नहीं रहता, अमर तो बन जाता है, यहीं तुम्हें मालूम नहीं
- 1:04:32है। मैंने कहा ज़रा थोड़ा मेरे पास आ
- 1:04:37जाओ। दूर रह कर ना करो।
- 1:04:56तू करी बाजा दूर रह कर ना करो बात करी बाजा।
- 1:05:35ना करो बातें करी बाजा। सर्द जाँकों से बारिश का माहौल
- 1:05:54है। घने में एक जायब बरस रहा है।
- 1:05:58वह अमृत कबीर कहते हैं नाचो अमृत का ठंडी हवाएं बहती हैं, अब ना
- 1:06:15नाचोगे तो कब नाचोगे? सर्द जोकों से धधकते हैं बदन में
- 1:06:29शोले, सर्द जोकों से। धधकते बदन में शोले जान ले लेगी
- 1:06:55यह बरसात। करी बाजा जान ले लेगी ये बरसाती
- 1:07:13करी बाजा कर ना करो बात करी बाजा। थोड़ा मेरे समय।
- 1:07:38मैंने कहा थोड़ा मेरे समीपाओ, बस एक एक झलक निहार लो मेरी एक झलक
- 1:07:53और तुम्हारी झोली। सोने हीरे जारातों से भरती जाके
- 1:08:00तुम खाली झोली नहीं जाओगे भरी झोली जाओ पर इतनी भरी होगी बाहर
- 1:08:05नहीं निकल जाएगा थोड़ा मेरे करीब आ जाओ करीब आके दीदार करो।
- 1:08:13निहार लो कुछ किता चैन किता सरोज किता आनंद कितना ठहराव थोड़ा देखो
- 1:08:24तो बुद्धि को एक तरफ़ बाहर रखा ना जहाँ जूते।
- 1:08:36यह रस तुमने कभी पिया नहीं और जिसने इस रस को पिया, उसने अपनी
- 1:08:42नाव की पतवार मेरे हाथों से। अलमयी सब कुंजिया अलमयी सब
- 1:09:03कुंजिया तियाँ कर चलियाँ सरदारी। अलय माई सांप गुंजिया फिर तुम खुद
- 1:09:18अपनी पतवार अपने पास नहीं रखोगे अलय माई शाम गुंजिया तो यहाँ कर
- 1:09:24चली, आ सरदारी, हमने सरदारी कर ली जितनी कर ली।
- 1:09:33फिर नाग वो चलाएगा और तुम देखना कितने मज़े से नाग चलती है, मंजिल
- 1:09:40भी आ जाएगी और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 1:09:43किस जरूर में भीगा यह रास्ता? बस तुम्हें तभी पता चलेगा जब तुम
- 1:09:54मेरे आगोश में जाओगे। एक प्रतीक बना लिया गया था ऐसा ही
- 1:10:06जैसा आज। इसको किसी और रूप में भी बनाया जा
- 1:10:09सकता था। यह कोई परमानेंट ट्रेड मार्क नहीं
- 1:10:12है, जो किसी ने रजिस्टर्ड करा दिया हो, ऐसा कुछ नहीं है।
- 1:10:19बना दिया, बना दिया। भगवान राम ने भी टेड़ा मेडा ऐसा
- 1:10:23ही बना दिया था जैसा बन गया। उस विराट का कोई आकार तो है नहीं
- 1:10:33तो जो बना दोगे ठीक है बस तुम्हारी मान्यता शुद्ध होनी
- 1:10:38चाहिए, लेकिन इसके दुष्परिणाम आए दुष्परिणाम क्या है कि हम
- 1:10:46मूर्तियों के साथ चिपट गए? हमने ज़रा भी नहीं सोचा नवरात्रों
- 1:10:52का भक्त है, पवित्र भोजन खाये लेकिन जिसके ऊपर आरूण है दुर्गा
- 1:10:59वह तो मांस के सिवा कुछ खाता नहीं।
- 1:11:03हमने दुर्गा से कभी पूछना है? मैंने दुर्गा से पूछा यह क्या बोल
- 1:11:10के धंधा है? क्यों?
- 1:11:12लुभाती हो लोगों को? फिर वो ही काम फिर वो ही।
- 1:11:19शा वही काम। वो ही तनह आई है।
- 1:11:31फिर वो ही शा तुमने भी यही काम शुरू कर दिया।
- 1:11:36प्रेम नन्द। द्वारा तो मैं तो बोली नहीं बाबा
- 1:11:43ऐसे नहीं। ये तो एक कल्पना है।
- 1:11:50लोग मुझे इस कल्पना में याद करना चाहते हैं, तुम वैसा ही रूप धर
- 1:11:55लेती हो यो यम यम। जो जो जीस स्वभाव से मेरी पूजा
- 1:12:03करेगा, मैं उसको उसी की श्रद्धा में बढ़ोतरी करवा दूंगा।
- 1:12:13मैं क्या नहीं कर सकता? ये सब कर सकता है, तुम दुर्गा के
- 1:12:19रूप में कहो। तुम काली के रूप में कहोगे, तुम
- 1:12:26नवदुर्गा के रूप में कहोगे, तुम हनुमान के रूप में हो किसी देवी
- 1:12:32देवता 36,00,00,000 देवी देवता, उसी रूप में वो स्थिर कर देगा।
- 1:12:40तुम पत्थर के रूप में कहोगे पत्थर में कर देगा, पानी में कहोगे पानी
- 1:12:44में कर देगा जीस, जीस स्वभाव से जिसमें तुम अपनी चेतना को डुबो
- 1:12:50सकते हो इन्सर्ट यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली बस वह बता दो परमात्मा
- 1:12:58उसी में तुम्हारी वृद्धि को। गहराई दे देंगे।
- 1:13:06पा ठीक जिसका आकार न ये न मंदिर, न मशीद।
- 1:13:13कुछ भी नहीं था। नेपाल के भीतर राजा को ही
- 1:13:28परमात्मा मान लिया जाता था। अभी जब राजा का वध हुआ प्रभार
- 1:13:35समित तब तक राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था।
- 1:13:41कम से कम वो जीवित तो है, पत्थर तो नहीं है और आप ये मत सोचिएगा
- 1:13:50के पशुपतिनाथ लाखों साल पुराना है नहीं, बस उसी काल का है।
- 1:13:57तीन 400 ईसवी का इससे ज्यादा नहीं है।
- 1:14:01बहुत पहले का ही है जब ये प्रतीकों को मूर्ति रूप में डाल
- 1:14:07लिया गया। प्रतीक तक तो ठीक हेच टू।
- 1:14:12वो तो बिलकुल ठीक चलो हमने मान लिया लेकिन आगे जो गड़बड़ हुई।
- 1:14:1952। भैरव बना लिये ये बना लिया वो बना
- 1:14:22लिया, ये गड़बड हो गया। फिर तुम एक से चूक गए, अनेक में
- 1:14:27उलझ गए। तुम्हारी बुद्धि मल्टीडायमेंशनल
- 1:14:30हो गई और मल्टीडायमेंशनल बुद्धि वहाँ पहुँच नहीं सकती इसलिए मैंने
- 1:14:37तुम्हें कहा। पहले सारी ऊर्जा को समेट लो,
- 1:14:41एकाकार कर लो, देखिए धूप बिखरी पड़ी है, तुम कॉन्वेक्स लंच के
- 1:14:48द्वारा उस धूप को इकट्ठी एक बिंदु पर कर लेते हो, आग लगा देते हो,
- 1:14:54ऐसा ही तुम्हारी श्रद्धा के साथ भी होता।
- 1:14:59तुम किसी भी देवता को मान लो, कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम पत्थर को भी
- 1:15:05मान लो। दाना ने पत्थर को भी मान लिया।
- 1:15:09सनातन ने बहुत से उपाय बताए। मूर्तियां बनाई, अलग अलग
- 1:15:14मूर्तियां बनाई एक ही मंदिर में कितनी मूर्तियां होती है?
- 1:15:19तुम किसी में भी इन्सल्ट हो सको अपने मनभावन प्रतीक को चुन लो,
- 1:15:27किस को चुनते हो, अपने मन से पूछो।
- 1:15:33तुम गंगा को मान लो, त्रिवेणी को मान लो, ब्रह्मपुत्र को मान लो,
- 1:15:39यमुना को मान लो, जीस समय भी तुम इन्सर्ट हो सकते हो और यही सन्देश
- 1:15:46भगवान रामनती। भगवान राम पहुंचे हुए थे।
- 1:15:54बहुत से लोग पूछ लेते हैं, पहुँच हुए व्यक्ति ने सुसाइड कर दिया,
- 1:16:00सब कुछ था, सब कुछ था, व्याधियाँ मिट गई थीं।
- 1:16:09दो पुत्र थे। भाई थे, भाई के बच्चे थे, माताएं
- 1:16:15थीं, सभी माताएं थीं, इतना बड़ा राजघराना था, इतना बड़ा परिवार था
- 1:16:22और राज़ था, जनता थी, सभी में प्रेम था, कोई उत्पाद नहीं था।
- 1:16:31कोई हिंसा नहीं होती थी, कोई अपराध नहीं होता था, सभी एक दूजे
- 1:16:37को बांट के खाते थे। बण्ड छको।
- 1:16:44जीस दिन धरती पर यह शब्द नानक का सार्थक हुआ।
- 1:16:49बण्ड छको। धरती को स्वर्ग होने में क्षण भी
- 1:16:54न लगेगा। मार्कस जैसे लोग फेल हो जाते हैं
- 1:17:01क्योंकि वो क्रांति करते हैं। अहिंसा के द्वारा अहिंसात्मक
- 1:17:06वृद्धि हो जाए और सभी बाँट के खाएं।
- 1:17:09एक दूजे के दर्द में सम्मिलित हूँ एक दूजे का दर्द पूछने नहीं जाएं,
- 1:17:15एक दूजे का दर्द कम करने जाए सह अनुमति चाहिए सहानुभूति जो सब वो
- 1:17:26महसूस करता वैसा तुम महसूस करो। तुम तो सिर्फ हालचाल कुछ नहीं
- 1:17:33जाते और कई लोग तो साथ लेने जाते, सहानुभूति नहीं होती।
- 1:17:45सहानुभूति उस दिन आएगी, जीस दिन उसके दर्द को तुम अपना दर्द समझो।
- 1:17:52तो मानवता के भीतर एक चीज़ की कमी दूसरे का नुकसान हो जाए तो हम
- 1:17:59हँसते हैं। यह किस बात का परिचायक है कि
- 1:18:05हमारी भीतर हिंसा भरी पड़ी है। हम दूसरों का नुकसान चाहते हैं।
- 1:18:12हमारे लिए सभी शत्रु हैं, तुम्हारा अहंकार सर्वोपरि होना
- 1:18:18चाहता है। वो चाहता है मेरे ऊपर से कोई न
- 1:18:21हो, बस मैं ही सबसे ऊपर हूँ। यही तानाशाही का मुख्य कारण बनता
- 1:18:27है। तुम समझ गए होंगे मैं कैसे धीरे
- 1:18:36धीरे चलाऊं जब तक मान्यताएँ नहीं थीं, बस परमात्मा का वजूद था,
- 1:18:44लेकिन वह कैसा एक आकार बना लिया गया?
- 1:18:48क्या हेच टू में पानी होता है? नहीं ना?
- 1:18:52क्या जो आकृति तुम मेल या फीमेल के लिए बना देते हो, उसमें स्त्री
- 1:18:57या पुरुष का कोई अंग होता है? नहीं ना बस ऐसे ही परमात्मा का एक
- 1:19:03प्रतीक बनाती है जैसा लिंग उसको देखो और देखो और वो याद आ जाए।
- 1:19:17जीसको देखने से उसका ख्याल आ जाए वह प्रतीक हमने बनाया, भीतर उतरता
- 1:19:24जाए, तुम्हारे संस्कार बनते जाए और जैसे ही तुम शिव की पिंडी को
- 1:19:29देखो। ख्याल आ गया वो ही।
- 1:19:53ज़िन्दगी का सवाल गया, ओय शा का ख्याल?
- 1:20:14उसको देखो सुबह उसके दरबार में जाओगे, साँझ उसके दरबार में जाओगे
- 1:20:23कोई त्रिकाल संध्या नहीं करनी है ये मूर्ख लोग आपको।
- 1:20:29पहले ही भरा पड़ा गुस्सा दिमाग में तुम्हारे निरु ठूस ठूस के भरे
- 1:20:33हुए हैं। ऊपर से कहते हैं जो त्रिकल संध्या
- 1:20:36करेगा वो बच जाएगा और त्रिकल संध्या सीखो मेरे से यह उल्लू का
- 1:20:42पट्टा कहाँ से आ गया? न्याय मैंने पहली बार सुना।
- 1:20:50हमें तो यही था गुरु घम यार हमसे दूँ।
- 1:21:05वो ही गम जिसे हम ने किस किस यत्न से निकाला था इस दिल से दूर।
- 1:21:27उछलकर उछलकर कयामत की छला गया उछलकर कयामत।
- 1:21:42की। चाला गया, वही शा, उनका ख्याल आ
- 1:21:55गया। हम बुजुर्गों की तस्वीरें लगाते
- 1:22:00हैं, घरों में। याद आ जाएं, उन्हें देखें, हम
- 1:22:04श्रद्धा से नमन हो जाएं। कितनी राते हैं आप जाके हमारे लिए
- 1:22:12कितना वक़्त हमारे लिए हमारे दुखों को हल करने में आपने बताया
- 1:22:19श्रद्धा से नमन हो जाते हैं। लेकिन आज कर्मकांड बन गया है,
- 1:22:32देखिये जो व्यक्ति ज्यादा लोप में फंस जाता है।
- 1:22:37किसी कारण से मैंने अपने पड़ दादा की बात बताई थी।
- 1:22:43लेकिन यह खराब नहीं करती, यह सहायता मांगते हैं।
- 1:22:46इसीलिए जो व्यक्ति पहुँच जाते हैं कहते हैं उसके सात पुश्ते तर जाते
- 1:22:51हैं। इन्हीं श्राद्धों में इन्हीं
- 1:22:59श्राद्ध में जो अभी बीत गए अभी नवरात्र चल रहे हैं।
- 1:23:03तीसरा है कि जो था है मुझे बताना बता भी क्यों करूँ?
- 1:23:14जो सारी सृजना का मालिक है वह देवी देवताओं को गुलाम कैसे हो
- 1:23:19सकता है? यह मेरी वलकियत।
- 1:23:27और याद रखना इन पहाड़ों वालियों के पास में चल, ठोकरों के सिवा
- 1:23:34कुछ नहीं। थकावट होगी, ठोकरियाँ मिलेंगी और
- 1:23:39तुम्हारी बुद्धि में भूसा बढ़ जाएगा।
- 1:23:42यह मान्यताएँ हैं या कल्पनाएँ? यही मैं कहना चाह रहा था जब तक
- 1:23:48कल्पनाएँ नहीं थीं, मान्यताएँ नहीं थीं, तब तक हिंदुस्तान सोने
- 1:23:53की जरूरत थी, समृद्धि थी, आनंद था, रस था।
- 1:24:00क्यों? क्योंकि झूठ नहीं था।
- 1:24:04मान्यता है झूठ परमात्मा ऐसा होता है शेर की स्वाद परमात्मा ऐसा
- 1:24:13होता है हाथ में डबल परमात्मा ऐसा है क्षीर सागर में शयन कर रहा है
- 1:24:18नाक से। बनाए तो थे ठीक है नियत से लेकिन
- 1:24:28अंधभक्तों की जय जयकार। जानें क्या क्या तुम लेते हैं
- 1:24:33अर्थ निकालने वाले आचार्य कोई कम पड़े।
- 1:24:38क्या लिखा है वो झट से बताएंगे। मैं बता दूंगा कहते हैं और क्या
- 1:24:44बताते हैं? खा के बताते हैं, ज़रा सोचिए
- 1:24:48आँखों वाला अंधा अगर कॉन्फिडेंस तब लाएगा तो यही कहेगा ना आरे रंग
- 1:24:54के छे टाँगे होती हैं? और लाल रंग के चार होती हैं और
- 1:24:58गैरवे के आठ होती हैं तो फिर वो बहस बाजी करेंगे।
- 1:25:02आँख किसी के पास नहीं और आँखों वाला पास में खड़ा हो के सुन और
- 1:25:09लुत्थ फलेगा। हम तो लुत्थ उठाया करते हैं आपके
- 1:25:14गप्पो। हमें कोई अफसोस नहीं होता।
- 1:25:23हम इन मान्यताओं को तोड़ते हैं और यह पुण्य कर में मान्यताओं को
- 1:25:30बनाना। प्रतीकों को सत्य रूप में आपके मन
- 1:25:37में स्थापित कर देने से बड़ा कोई बात नहीं एक यादगार के रूप में
- 1:25:43बनाया हम तस्वीर बनाते हैं, अपने माँ बाप को लटका देते हैं और आज
- 1:25:49तो तस्वीरों में भी आपत्ति हो गई। इसे वंतर्व में मत रखना।
- 1:25:52इसे दीवार पे दक्षिण मुखी करके मत रखना ये कहाँ से से किया ये
- 1:26:04तुम्हारे दिमाग में भूसा भरता है, तुम्हारा जीना बेहाल हो जाएगा।
- 1:26:12मुहाल हो जायेगा। इन प्रतीकों को समाप्त कर देना
- 1:26:18इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ 1 दिन आएगा अगर ऐसा ही चलता रहा हिंदू
- 1:26:23धर्म नहीं सुधरा तो तुम आए तो कंगार कल तुम्हारा विनाश हो
- 1:26:29जाएगा। कौन उठेगा इस्लाम उठेगा इस्लाम
- 1:26:35क्यों उठेगा उसने जड़ पकड़ ली। क्यों उठेगी रियायत?
- 1:26:41आज ही ज्यादा है हिंदू धर्म की संख्या कुछ है तुमसे तो बहुत गलत
- 1:26:48हो गया क्योंकि। वो जानते थे, मान्यताएँ गलत हैं।
- 1:26:53इनकी मान्यताएँ 50,00,00,000 बुद्ध अलग हो गए तुमसे जो जो
- 1:27:01तुम्हारे पागलपन को निहार गए, बाबा साहब अंबेडकर जैसे समझदार
- 1:27:07लोग उन्होंने हिंदू धर्म का त्याग कर दिया।
- 1:27:11ना कैसे कैसे ये गंगा माता और कैसे हमारे पाप धोयगी अरे भाई
- 1:27:18बुद्धि है और परमात्मा ने किसी कारण से दी है।
- 1:27:24संसार में इसका उपयोग करो। तुम इसका उपयोग करते हो अध्यात्म
- 1:27:30में? अध्यात्म तक ये पहुँच नहीं पाती
- 1:27:34इसलिए ऐसे ऐसे ऐसी मूडताएं पैदा होती हैं।
- 1:27:42तुम सुनना और मेरे तरीके से सुनना तुम्हें हँसी आएगी।
- 1:27:49मैंने लक्ष्मण से कहा लक्ष्मण कहती हाँ बाबा मैंने कहा तुम्हारे
- 1:27:54साथ तो बड़ा बुरा किया उन्होंने पंडितों ने कहती हाँ बाबा थोड़ी
- 1:28:01सी आँखों में आंसू भर आये, मैंने कहा तुम्हें तो देखिए सरस्वती को
- 1:28:08आंसर दे दिया। तुम्हें तकौआ भी नहीं दिया
- 1:28:14तुम्हें तो उल्लू है कहती हाँ बाबा अब उल्लू रात को जागता है
- 1:28:22तुम रात को सोती हो, कैसे पटती होगी आपस में?
- 1:28:26कैसे जिंदगी यापन करनी? वो तो रात को जागता है।
- 1:28:32तुम दिन में जागती हो और दिन में कहीं काम जाना पड़ जाए तो उल्लू
- 1:28:36तो सो रहा है तो तुम्हारा व्हीकल तो स्टार्ट ही नहीं होता, उल्लू
- 1:28:42तो जागना भी चाहे तो इतनी तेज धूप को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
- 1:28:46उसको दिखाई पड़ता भी नहीं। कुल्लू की आँखों की संरचना ही ऐसी
- 1:28:51है तो लक्ष्मी तुम्हारे साथ तो बड़ा पाप किया इन्होंने कहती हाँ
- 1:28:57बाबा, लेकिन मैं क्या करूँ? बनाया भी तो अंत भक्त नहीं है।
- 1:29:05मैंने कोई विष्णु से शिकायत कर लो, कहती वो है ही नहीं शिकायत
- 1:29:14अभी हमारे शानदार आज तक के सबसे शानदार मैंने जब देखे।
- 1:29:22अपनी 73 साल की आयु में मैंने जो देखा सबसे सर्वोच्च मैं रखता हूँ
- 1:29:32बीआर ग भाई जिन्होंने इतनी हिम्मत की कि विष्णु से ही मांग।
- 1:29:43अब ये बात तू तो बोल रही सर क्योंकि संविधानिक पद पर हैं
- 1:29:48लेकिन हम तो तुम्हारी मान्यताओं और मान्यताओं को तोड़ने के लिए
- 1:29:52बाधित नहीं हैं कि हम ये अक्षर बोलें, ये ना बोलें।
- 1:29:57ये संविधान के रूप नहीं। ये तुम्हारी भावनाओं को तोड़ेंगी,
- 1:30:01लेकिन तुमने भावनाओं बनाई ही क्यों?
- 1:30:03इतनी ओछी कसूर तुम्हारा के हमारा अरे कोई गधे को घोड़ा कहे और हम
- 1:30:13कहें कि नहीं भाई गधा है और तुम्हारी तो मान्यता टूट जाएंगी।
- 1:30:18और तुम तो कोर्ट कचहरी जाओगे और हम जाके उसे खड़ा कर देंगे।
- 1:30:21देखो ये गधा है के कुढ़ा है बताओ तुम्हारा मुँह इतना से रह गया मैं
- 1:30:28कहता हूँ तुमने मान्यता बनाई है क्या बनाई गलत तो टूटेगी भाई
- 1:30:35लक्ष्मी कहने लगी वो है ही नहीं। तो तुम पैर किसके दबाती हो?
- 1:30:40मैं किसी के पैर को तो नहीं दबाती, पर सच पूछो बाबा तुम्हें
- 1:30:45पता नहीं है। मैंने कहा मेरे को तो पता है हँसी
- 1:30:49मजाक करने की मेरी आदत है, तुम भी तो नहीं हो हाँ ठीक ठीक पकड़ा।
- 1:31:01सही पकड़ा है? लोग कहते हैं दंड क्यों नहीं
- 1:31:08देते, भाई होगा तो दंड देगा। बहुत पहले मैंने बोला।
- 1:31:16श्याम बाबा के पास यहाँ बलवंत बाबा सिर का भाई हुआ करता था।
- 1:31:23पता नहीं उसके खुद के बाबा सिर थी के बाबा सिर हटाता था वो ये तो
- 1:31:27मेरे को नहीं पता नहीं, लेकिन नाम था बलवंत बाबा।
- 1:31:30सिर उसका भाई ड्राइवरी करता था। श्याम बाबा का भगत खाटू श्याम जा
- 1:31:38के आया था। मैं तो भर की कहानी अच्छी तरह से
- 1:31:42भीतर से तो सत्य बोलने से कोई गुरेख नहीं है तो उसके बाप रे
- 1:31:51डैगिंग बाबा रात को आके। तेरा गले में रोड़ेंगे मैंने कहा
- 1:31:56उस उल्लू के पट्ठे को आने दो। बहुत भक्तों की लंबी कतार लगी है।
- 1:32:03बाप नहीं टूट जाएंगे, टूट जाएंगे किशोर तुम्हारा?
- 1:32:16हमने जो सत्य बताया तो बुरा मान गए।
- 1:32:23हमारा काम ही धंधा ही है। तुम्हारी गलत मान्यता को तोड़
- 1:32:29देना और उसके बाद। भव्य भवन का निर्वाण करना कोई बता
- 1:32:41है विष्णु का उस हरामी को मैं बहुत देर से ढूंढ रहा हूँ कुबेर
- 1:32:48जी रोज़ मुझे तम कर बाबा क्या श्री है नहीं तुमने जिम्मेदारी और
- 1:32:54दी थी। मैंने कहा पता नहीं वो कहाँ है,
- 1:32:58मैं तो खुद ढूंढ रहा हूँ। लोग कहते हैं वो है तो मैंने कहा
- 1:33:03उसका पता होता होगा खर्च चुप हो जाते हैं, मान्यताएँ हैं
- 1:33:09तुम्हारी। तुम्हें पता ही नहीं, वो है भी कि
- 1:33:13नहीं और है तो कहाँ तुम्हारे हृदय के भीतर बैठा है दिल के आईने में
- 1:33:24थी। तस्वीरें यार जब ज़रा गर्दन झुकाई
- 1:33:28देख। तो सर बता तू तुम्हे तो मज़ा आयी
- 1:33:37और बोलो बाबा कहते है मज़ा तो अब आ रहा है।
- 1:33:50जब मूड मान्यताएँ नहीं थीं, गुप्त वंश से पहले और गुप्त वश के दौरान
- 1:34:01तो हम समृद्ध भी थे और बुद्धिमान भी थे और हमारी खोपड़ी में।
- 1:34:11विजातीय द्रव्य नहीं भरे थे। ये विजातीय द्रव्य हैं।
- 1:34:14तुम्हारी सभी सूचनाएं ये जो सर लोग पढ़ाते हैं, जो आचार्य लोग
- 1:34:18पढ़ाते हैं, सभी विजातीय द्रव्य हैं और ध्यान रखना जो मैं बोलता
- 1:34:22हूँ, ये भी विजातीय। अगर तुम्हारे पांव में काँटा गढ़
- 1:34:29गया तो दूसरा काँटा दे देता हूँ फोरसेप उस फोरसेप से उस काँटे को
- 1:34:34खेंच लो, बस इतना सा काम है, फिर दोनों कांटों को फेंक दो।
- 1:34:42कहीं ऐसा ना हो कि उसका धन्यवाद करने के लिए फोरसेप को कांटे की
- 1:34:47जगह गढ़ा दो कि तुम्हारा बड़ा उपकार है तो फिर तुम धंस जाओ, आप
- 1:34:51उसमें यही तुम कर रहे हो मान्यताओं को तोड़ने वाला हूँ
- 1:34:59मेरा शव। हृदय में संजोग के मत रख लेना
- 1:35:08क्योंकि अखरा नाम क्या नगीत गुण का अखरा से सलागा होती अखरों से
- 1:35:19उसका ज्ञान बखान होता है। मैं क्या करूँ मजबूर हूँ?
- 1:35:25अक्षरों में अगर कहना पड़े तो चुप हो जाओ तो अक्षरों में ही कहना
- 1:35:30पड़ेगा चुप हो जाओ, कराना चुप है, लेकिन मौन की कोई भाषा नहीं है।
- 1:35:37बोल के बताना होगा की चुप हो जाओ, यही अंतर द्वंद है।
- 1:35:42इस अंतर्दंद को तुम समझने की चेष्टा करो, कोई समझाने आया है
- 1:35:50तुम ज्यादा जानते हो तो फिर मुझे सुनो मत कब से कर रहे हो, ब्लॉक
- 1:35:57कर देता हूँ वगैरह देता हूँ। लेकिन फिर फिर वही।
- 1:36:02फिर फिर बोली फिर फिर आ जाते हैं पापा बोलते अच्छे लगते हो तो तुम
- 1:36:07सब कुछ जानते हो तो मुझे सुनते क्यों हो?
- 1:36:09जो जानता है वह कभी सुनता नहीं है।
- 1:36:14इसको टिक मार्क जो सब जान गया सर्बग् हो गया, वह कभी नहीं
- 1:36:19सुनेगा। उसको सुनने की जरूरत खत्म हो गई।
- 1:36:26तो मान्यताएँ बहुत थीम जश्नकाल में कंगाली साथ लेके आ गई
- 1:36:35धर्द्रता साथ आती। और भगवान कृष्ण कहते हैं कि जहाँ
- 1:36:40मान्यता नहीं है वहाँ समृद्धि है, वहाँ शांति है, जहाँ मान्यताएँ
- 1:36:45हैं, वहाँ शोर तुम्हारी मान्यताएँ शब्दों की मान्यताएँ शोर मचाती
- 1:36:49हैं तुम्हें चैन से रहने नहीं देते सुहानी चांदनी।
- 1:36:58रातें हमें सोने नहीं देती, सुहाने चांदनी रातें।
- 1:37:16हमें सोने नहीं देतीं, तुम्हारे प्यार की बातें हमें सोने नहीं
- 1:37:34देतीं। सुहाने चावे नी रहा से हम सोने
- 1:37:46नहीं दे। तुम सभी नक्शा हो गए मान्यताओं का
- 1:37:57इतना जाल है। तुम्हारे न्यूरोज भगवान ने बनाए
- 1:38:03थे संसार में कुछ खोजने के लिए, पर महात्मा ने जिसने बनाया वो
- 1:38:12जानता कि मैं तो न खोजा जा सकूंगा।
- 1:38:17इसलिए परमात्मा को अपने न्यूरोन से खोजने की सिस्टम मत करना, उसकी
- 1:38:22एक्सप्लनेशन भी मत करना, उसकी डेफिनिशन भी मत करना, चुप हो जाना
- 1:38:28चुप ही उसकी डेफिनिशन बोलना है, चांदी ख़ामोशी है, सोना चुप हो
- 1:38:34जा, घर ईश्वर है। हो ना?
- 1:38:41तो अगर बोलोगे तो क्यों जाओगे? बोलने से वो आ रही हैं साँसों
- 1:38:52ज़रा आहिस्ता चलो। वो आ रहे हैं साँसों ज़रा आहिस्ता
- 1:38:59चलो दिल की धड़कनों से भी इबादत में खलल पड़ती है तो गुप्त वंश
- 1:39:09में परम्पराएं मान्यताएँ नहीं थीं।
- 1:39:11जो दिखता था वो था बस। इसलिए गंगा को माँ बांध दिया गया।
- 1:39:18जो जो देता था उसे देवता मान लिया गया।
- 1:39:21सूरज को देवता, गंगा को माता ये सभी तुम्हारी माताएं हैं,
- 1:39:31तुम्हारा पोषण करती। हवाएं तुम्हें देती हैं जीवन यह
- 1:39:39तुम्हें फूटन देता है, क्लोरोफिल का निर्माण होता है भाई चेहरे भरे
- 1:39:44होते हैं तुम आज काट रहे हो, जैसा खाइये अन्न वैसा हुई अमन जैसा पी
- 1:39:55वे पण। वैसी बोलें बंद तुम शाम को कड़वा
- 1:40:01पानी पीते हो शराब तो बोल चाल बदल जाती है जैसा खाये अनदुषित अन्न
- 1:40:10कार्य डाले जा रहे हैं। इसमें कीटनाशक।
- 1:40:17अरे सर, होवे मन तो इनसे मन हो गया तुम्हारा मान्यताएँ नहीं थीं,
- 1:40:24तब समझो बात कीजिए एक बात तुम्हारा सारा जीवन का कष्ट हर
- 1:40:30सकती है कोई मान्यता नहीं थी। बस देखो सत्य को देखो, सत्य देखने
- 1:40:35के लिए है उसको बताया नहीं जा सकता ड्यूटी रिश्तों से नॉट टू
- 1:40:50टच। सुन्दर तम सबसे सुन्दर तम होगी
- 1:40:57ब्यूटी एस्पिस्ट्री नॉट टु टच उसका व्याख्यान नहीं होता वह
- 1:41:06देखने के लिए उसको देखो ने आरोप। और उसके लावण्या को निहारो और 1
- 1:41:14दिन पाओगे व्यक्त में अपनी ओर खींच लेगा और तुम उसमें समाहित हो
- 1:41:19जाओगे। परवाना ऐसे ही तो समाहित होता है
- 1:41:22क्षमा का नूर देख कर क्षमा की वो जगमगाती नूर की लावण्याभरी।
- 1:41:33ज्वेदा डर नहीं के मर जाऊंगा बस खुशी है कि इस लावण में इस ज्वार
- 1:41:43में खो जाऊंगा और तुम्हें नहीं पता कि परवाहों को क्या मिलता है
- 1:41:51बस परवाह नहीं जानता है। या मैं जानता हूँ जो परवाने में
- 1:41:57भी हूँ गुप्त वंश से आगे मंदिरों का निर्माण होगा।
- 1:42:08यानी कल्पनाओं को मूर्त रूप दे दिया गया।
- 1:42:14और फिर कल्पनाओं को मूर्त रूप देने का यह सिलसिला चल पड़ा और
- 1:42:22फिर तुम भटकते ही गए, फिर मानवता भटकती ही गई, भटकती ही गई, भटकती
- 1:42:30ही गई। और आज तुम जीतने दीन हीन दरिद्र
- 1:42:34कंगार हो ऐसे कभी तो ना तुम कह सकते हो हम बड़े अमीर हैं होगे
- 1:42:42कहाँ अमीर हो अभी तक तुम्हारी खोज शुरू है।
- 1:42:49तुम्हें पता नहीं अमीरी आती कहाँ से अमीरी आती हैं, इच्छाविहीन
- 1:42:56होने से इच्छाएं बहुत हैं, तोर हो रही हैं इच्छाएं कम हैं शहनशाह।
- 1:43:09अच्छा जी बिलकुल नहीं तो खुदाई इस मुकाम पे आ जाओ, सभी मान्यताओं को
- 1:43:17छोड़ दो। मान्यताएँ बिलकुल न रखो, कोई
- 1:43:20मान्यता नहीं। तुम जानते भी नहीं तुमने, सिर्फ
- 1:43:24मान आज तक के परमात्मा है। मैं कहता हूँ इन मान्यताओं को
- 1:43:28आड़े बताने को कौन जाने वो न हो फिर तुम क्या करो?
- 1:43:34कबीर कहते हैं कबीर ने देखा होगा, मैं कहता हूँ मैंने देखा होगा,
- 1:43:41लेकिन मेरे खाने से तुम्हारा पेट तो नहीं भरता?
- 1:43:45मुझे प्यास लगी, मैं पानी पी लूँगा, मेरी प्यास बुझेगी,
- 1:43:48तुम्हारी तो नहीं बुझेगी, बस यही तुम्हें समझाना चाहता हूँ, मेरे
- 1:43:54शब्दों से चिपकने की आदत है तुम्हारी मेरे शब्दों से भी चिपक
- 1:43:59मत जाना मैं वो फोरसेप हूँ जो तुम्हारा कांटा निकालने आया हूँ।
- 1:44:05इस कांटे का फोरसेप का उपयोग कर लेना अपने कांटे को जो दुख देता
- 1:44:10है तुम्हें दर्द देता है, रात को चस चस करता है इससे वो काम कर
- 1:44:17लेना, काँटा निकाल के बाहर फेंक देना और साथ में फोरसेप को भी
- 1:44:20फेंक देना, मेरे शब्द भी मत रख लेना।
- 1:44:25शब्द ज्यादा दर्द करेंगे, ध्यान रखना शब्द बोलता हूँ मैं उसका
- 1:44:33कारण है क्या करूँ बोलने के लिए भी शब्द?
- 1:44:40और चुप कराने के लिए भी शब्दों का प्रयोग होता है।
- 1:44:44चुप हो जा अगर ईश्वर है होना ये भी तो शब्दों में कहा गया तो
- 1:44:52मान्यताएँ जब शुरू हो गई तो मंदिर मस्जिद बने और जब मंदिर मस्जिद बन
- 1:44:59गए। तो तुमने अगर मूर्तियां नहीं बनाई
- 1:45:02तो खुदा का घर तो बनाया, वो भी तो मूर्ति है, क्या?
- 1:45:09गिरजाघर मूर्ति नहीं है, मंत्र ही मूर्ति है क्या?
- 1:45:18जो मूर्ति को तुम भगवान का घर कहते हो उसको तुम खुदा का घर कहते
- 1:45:23हो है तो वो भी आकार में, वो तो मूर्ति है, उसका भी तो स्ट्रक्चर
- 1:45:31है, उसकी भी तो लंबाई चुड़ाई ऊँचाई है उसका भी तो डायमेंशन है।
- 1:45:38और जो चीज़ नॉन डाइमेंशन है, वह परमात्मा है।
- 1:45:43खुशी का कोई डाइमेंशन नहीं होता, कोई ठिकाना नहीं होता।
- 1:45:47तुम कितनी खुश हो, बता सकोगे तोला भर पांव भर मन भर टन भर बता सकोगे
- 1:45:55नहीं बता सकोगे कोई डाइमेंशन नहीं है।
- 1:46:01वो खुशी है, वो आनंद है, रस का कोई वार नहीं होता, रस का कोई
- 1:46:07पैमा नहीं। नो मेजरमेंट, वो तो पीना होता है
- 1:46:16देखो। दूर से देखो, जिन माध्यमों से वो
- 1:46:20दिख सकता है, देखो और देखो और देखते ही ना चले जाओ, फिर उसमें
- 1:46:28समाहित होने का प्रयास करो, धीरे धीरे धीरे धीरे तुम समाहित हो जाओ
- 1:46:35और 1 दिन। आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा
- 1:46:40नहीं यहाँ पहुंचने से पहले की बात है और जब व्यक्ति पहुँच जाता है
- 1:46:47तो कहता है अनल हक मैं ही लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं।
- 1:47:01अगर विक्रमादित्य का काल 335 से शुरू होगा, 375 तक जाता है ईसा
- 1:47:10पूर्व नहीं, ईसा के बाद तो फिर ये ईसा से 57 वर्ष बड़ा कैसे होगा?
- 1:47:23शक 78 साल छोटा कैसे हो गया तुम्हारे इतिहास?
- 1:47:30तुम कहते हो हम हम जानते हैं गाँधी कौन थे?
- 1:47:34मैंने कहा तुम जन्मे थे मैं तो वो।
- 1:47:43खुश नसीब इंसान जिसने आजाद भारत में जन्म लिया यानी कि तुम्हारे
- 1:47:52बाप दादा पढ़दाता स्वतंत्रता संग्राम में।
- 1:47:59कोई योगदान नहीं, कोई लघु नहीं। वहाँ पर वह पूछते हैं कि भगत सिंह
- 1:48:04की माफी क्यों नहीं कर पाए? अरे भाई तुम्हारे बाप दादा कहाँ
- 1:48:10गए थे? तुम्हें इतिहास का पता है कुछ?
- 1:48:18पता है तो बताओ हल करो। इस गुंडी को जीस विक्रमी संबध को
- 1:48:23हम 57 साल ईसा से पूर्व बताते हैं और तुम्हारे ही प्रमाण कहते हैं
- 1:48:33कि वो तो शुरू हुआ। 335 से 375 तक राज़ किया
- 1:48:40विक्रमादित्य और शक संपत्ति 78 साल छोटा हिस्सा से तो ज़रा
- 1:48:55तालमेल बचाओ भाई कहाँ गए तुम्हारे इतिहास?
- 1:49:05आज जो हुआ आज 5 मिनट पहले उसकी व्याख्या करने वाले 10 मुँह मिल
- 1:49:11जाएंगे तुम्हें आज अब जो हुआ और तुम बातें करते हो 100 साल पहले।
- 1:49:22यह कृपा है तुम्हारे व्हाट्सएप की तुम्हारी फेस होती है तुम्हारी
- 1:49:26नकली मीडिया की तुम्हें पता बता कुछ नहीं अगर तुम्हें पता है तो
- 1:49:36इस गुण्डी को सॉल्व करो, मैंने तो कर दिया लेकिन मेरी नकली मत करना।
- 1:49:41मेरा कटाक्ष हो सके तो कर देना, लेकिन मैंने तो करण से शुरू कर
- 1:49:46दिया और सातों पीढ़ी गना दी। तुम बताओ ये द्वितीय कैसे
- 1:49:56तुम्हारे ही शास्त्रों में लिखा? और ये 57 साल बड़ा कैसे हिस्सा से
- 1:50:05ज़रा गुंडी को खोलो और तुम्हारी समझ में आ जाये तो मुझे बता देना।
- 1:50:14श्री कृष्ण गोगन हरे। मुरारे हिना थु नारायण यन
- 1:50:35वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद पर मुरारी
- 1:50:51हेनाथ नारायण। वासुदेव वा कृष्ण गोविंद हरे
- 1:51:04मुरारी ए नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:51:15हेनाथ नारायण वासुध पितुवत स्वामी सका हमर पितुवत स्वामी।
- 1:51:35सखा हमारे एनाथ नारायण वासुदेव। श्रीकृष्ण?
- 1:51:45गोविन्द हरे मरारी एनाथ नारायण वासुदेव।
- 1:51:53इतमात स्वामी सखा हमार इतमात स्वामी सखा हमार।
- 1:52:16ने नात नारायण व सूर्या, श्री कृष्ण गोविंद आरे मुरारी हे, नथ,
- 1:52:34नारायण व सु व