Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Dec 24 - साक्षी भाव कैसे विकसित करें? जीवन बदलने वाली विधि! मन, चेतना साक्षी भाव का गहरा रिश्ता!
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- 0:12वही गीता का अध्याय दूसरे अध्याय का।
- 0:52तन आई है फिर वो ही शाम वो ही गन वही तन आई है।
- 1:12दिल को समझाने तेरी याद चली आई है फिर वो ही।
- 1:26शान दिल को समझाने तेरी याद चली आई है।
- 1:34श्री कृष्ण तुम मृत्यु से डरते हो तुम कटनी से डरते हो, तुम जलने से
- 1:51डरते हो। तुम सूखने से डरते हो और के सिंह
- 2:03कहते हैं कि तुम जो हो नैनम छिंदन्ती।
- 2:13कोई शस्त्र उसे काटता नैनम दहती पांव का आप उसे जलाती न न चैनम
- 2:26क्रेदन त्याप। मारो ता जल उसे गीला नहीं करता
- 2:37वायु उसे सुखाती ना। एक बात को ध्यान से सुन लेना।
- 2:55जो व्यक्ति अध्यात्म की गहरी तलों को छू चुका होगा वह मनोज्ञान का
- 3:07निष्कृणिता होगा। तुम्हें बड़ी उल्टी लग सकती है,
- 3:11बात तुम्हें लग सकती है उल्टी कि मनोविज्ञान अलग है और करीब करीब
- 3:21विपरीत है। लेकिन जो अध्यात्म के गहरे स्तरों
- 3:27पे जाता है उससे बड़ा मनोवैज्ञानिक कोई नहीं हो सकता।
- 3:40बाहर खोपड़ी खोपड़ी के तल पे बैठे बैठे सोचते रहते हैं।
- 3:44जैसे कबीर कहते हैं मैं बपुरा बूढ़न डरा गया किनारे बैठो
- 3:51सेटमेंट फ्राइड भी डरते हैं अपने से मानव जाति मरने से डरती है।
- 4:04और मानव जाति की व्यथा को कृष्ण बखूबी समझते हैं।
- 4:12कटने से डरती, जलने से डरती, सूखने से डरती मानव जाति कृष्ण
- 4:19कहते हैं, तुम न जल सकते हो न कट। ना तुम गीले हो सकते हो, भिगोए जा
- 4:25सकते हो, ना सुखाए जा सकते हो। कृष्ण से बड़ा मनोवैज्ञानिक और
- 4:35कोई क्योंकि सेगमेंट फ्रॉड सिर्फ समुद्र के किनारे किनारे पे बैठे
- 4:43हुए कहीं डूब ना जाऊं दूर। लहरों को ही देखते रह जाते हैं और
- 4:49लहरों से कभी समुद्र की अटल गहराइयों का पता नहीं चलता।
- 4:56लहरें बाहर बाहर हैं और लहरें बड़ी नौटी हैं।
- 5:02शरारती हैं, उछल कूद करती रहती हैं।
- 5:07उस बेचारे को क्या पता? केस वृहद उछलकूद के भीतर गहरा
- 5:15शांत सागर समाया हुआ है। लेकिन सेगमेंट शायद कभी गहरे
- 5:23उतरते हैं। मरने से डरते हैं।
- 5:27यही मानव प्रजाति की दुविधा है। बस किनारे बैठ के जो खोजा गया उसे
- 5:37ही सत्य मान लेते हैं। अंतिम जबकि वो सत्य होता नहीं है।
- 5:45इस संसार में बड़ी विरोधी चीजें हैं।
- 5:47एक ही जगह पे समुद्र की तरह कुछ। शंकर।
- 6:01वृषक पुथल पुथल, कोलाहल, शोर शराबा सब तरह के ऊपर और सेगमेंट
- 6:12फ्राइड बाहर से ही अंदाजा लगाना चाहते हैं लेकिन वो नहीं जानते।
- 6:18जिसकी अटल गहराइयों में परम शांति है, कोई शोर नहीं, कोलाहल हीनता
- 6:27है, परम तृप्ति है, परम शांति है, ठहराव।
- 6:36कोई चूक चाट का वह सवाल ही नहीं पैदा होता और मैंने कहा कि कोई भी
- 6:44अध्यात्मिक व्यक्ति है, वह मनोवैज्ञानिक होता ही है।
- 6:53क्यों? क्योंकि वह मनोविज्ञान मनुष्य से
- 6:59मन को पार करके ही आता है अपने तक अपने तक आने के लिए मन के रास्ते।
- 7:13चलने पड़ते हैं, खंगालने पड़ते हैं।
- 7:19मन ही के रास्ते तुम चलोगे और फिर अमन की स्थिति में आ जाओगे, जहाँ
- 7:24मन होता नहीं एम् मन मन से शुरू होगा और एम् मन में समा जाओगे।
- 7:31इसलिए मन की उष््रांकलता से घबराना मत, यह शुरुआत है और यह
- 7:38जरूरी है घबरा के भाग मत जान। क्योंकि इसी वृहद कोलाहल के भीतर
- 7:51तुम परम शांति पाओगे, इसलिए सथैरे भाव से बैठे रहना शांतिपूर्ण इसके
- 8:02किनारे धीरे धीरे इसमें उतरने का प्रयास करना।
- 8:09उतरते जाना और गहरे और गहरे घबराना मत।
- 8:15मृत्यु का भय सताएगा, बहुत से भय सताएंगे।
- 8:25कभी कोई मछली ना निकल जाये, बड़ी बड़ी मछलियां हैं, बहली मछली हैं,
- 8:33कभी कोई जहरीली वस्तु डस ना जाये, मन बड़े उत्पाद खड़े करेगा, मन
- 8:43बड़ी शंकाएं खड़ी करेगा। मन का काम है शंकाएं उत्पन्न
- 8:50करना, क्योंकि मन शंकाओं का संग्रह इरादे बांधता हूँ, सोचता
- 8:58हूँ, छोड़ देता हूँ, इरादे बांधता हूँ, सोचता हूँ, छोड़ देता हूँ।
- 9:07कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं ऐसा न हो जाए।
- 9:16मन में ऐसे ख्यालात उठेंगे और तुम हिल जाओगे।
- 9:26मन के हिलने से तुम बहिल जाते हो क्यों?
- 9:29क्योंकि तुम मन से एकाकार हो जाते हो, बस सारे अध्यात्म का मूल पाठ
- 9:37ही है मन के हिलने से तुमने हिलना है मन के साथ तुमने एकात्मताएं
- 9:44बनानी है। मन से दूर खड़े रहना है और मन से
- 9:52दूर ही तुम हो, ये तुम्हारी गलती है के मन से दूरी होते हुए भी तुम
- 10:00मन के साथ चिपक जाते हो एकाकृत हो जाते हो।
- 10:06एक हो जाते हो तो मन के साथ ही तुम अपनी यात्रा शुरू कर देते हो।
- 10:13फिर मन चलता है चलो काम को भोग लें, तुम काम को भोग लेते हो,
- 10:19यहाँ मेरे पास आके शिकायत करते हो बाबा।
- 10:23हमें काम वर्षाओं से मुक्त कर दो। अब इन मूर्खों को ये नहीं पता कि
- 10:32तुम्हारा मन है तुम इंटीगल होते हो मन के साथ।
- 10:42बाबा के समय क्या रोल है भाई? ये काम तो तुम्हें करना होगा।
- 10:52ब्रह्मचर्य तुमने साधना है, तुम्हारी शक्ति को ओज में
- 10:59परिवर्तित तुमने करना है। या तो फिर पश्चिम की तरह मान लो
- 11:10कि वीर ओजमी करो कन्वर्टर होता ही नहीं।
- 11:15बात खत्म कर दो मारकस की तरह परमात्मा है ही नहीं, एकदम से
- 11:22शांत हो जाओगे। बड़ा बोझा है परमात्मा और तुम
- 11:32भारी से भारी रोज़ होते चले जाते हो कारण कारण ये जो परमात्मा के
- 11:39बारे में तुम्हें बताया जाता है वो सब सूचनाएं और सूचनाएं दिमाग
- 11:44को भारी करते हैं। ज्ञान।
- 11:51आदमी को भार विहीन करता है तुम रोज़ भार युक्त होते रोज़ गने गने
- 11:57वार से युक्त होते चले जाते हो। कारण इसका यही है कि तुम्हारे
- 12:03बताने वाले। गलत बताते हैं, जिसमें भार होता
- 12:09है। इस बात को आप हृदय पर अंकित कर
- 12:15लेना कि ज्ञान तुम्हें भार मुक्त करता है और सूचनाएं तुम्हें भार
- 12:22युक्त करती हैं। और तुम सूचनाओं को ही इकट्ठा करना
- 12:26ज्ञान समझ लेते हो, यही तुम्हारी बेवकूफ़ है।
- 12:34सूचनाओं को इकट्ठा करना अगर इस मार्ग पर चल पड़े हो तो सूचनाओं
- 12:40को इकट्ठा करना बंद कर दो। यही नहीं।
- 12:44जो सूचनाएं तुमने इकट्ठी कर दी और बाहर फेंक दो, इसे ही मैं थ्रोसिस
- 12:51और रेचन कहता हूँ, जो सूचनाएं तुम्हारे भीतर हृदय में अचेतन मन
- 12:59में तुमने संग्रहित कर ली हैं। उन्हें क्रिया योग करके चेतन में
- 13:05लेके आओ और चेतन से वो अपने आप निकल जाएंगे।
- 13:10चेतन में से निकलने का रास्ता है जो व्यक्ति आध्यात्मिक होता है।
- 13:22सबसे पहली बात समझलो वो कोई किताब पढ़ के सको जैसे नहीं होता।
- 13:30साइकोलॉजिस्ट बहुत बड़ा होता है लेकिन मनोविज्ञान की कोई किताब
- 13:37नहीं। उसने पढ़ी होती तो क्या पढ़ा होता
- 13:41है अपने आप को पढ़ा होता है। वह अपने पास जाता है, मन की उन
- 13:48तहों को उन मार्गों को तय कर उन मार्गों पर चल कर एक एक कदम
- 13:58खंगालता है। और ध्यान रखना कृष्ण से बड़ा
- 14:08मनोवैज्ञानिक कोई हो नहीं सकता। क्यों कृष्ण ने अपनी खोपड़ी?
- 14:14से स्वेतक की यात्रा खुद पैदल चलकर की है।
- 14:21चप्पा चप्पा जानता है एक कण भी मोहताज नहीं जो उसकी दृष्टि से
- 14:30परे हो। सब जानते हैं कृष्ण।
- 14:36तुमने थोड़ी सी बात की, कृष्ण समझ जाएंगे तुम कहाँ से बोले हो, क्या
- 14:40बोले हो, क्या बोलना चाहते हो? इसलिए कृष्ण जानते हैं के सारा
- 14:52संसार। मस्त से बहकता है, कटने से बहकता
- 14:59है, जलने से भयक होता है, तूफानों के आवेग से बहकता है, बालों की
- 15:12आमद से त्रस्त होता है। डरता है।
- 15:23कृष्ण कहते हैं कि डरने की कोई आवश्यकता ज़रा भी तो नहीं है।
- 15:31सत्य से डरना होता है, कल्पना से तो डरना नहीं होता।
- 15:38लेकिन तुम्हारा स्वभाव कल्पना से डरना है तुम्हारे संस्कार कल्पना
- 15:46से डराने के लिए बनाए गए हैं। हम बचपन से ही तुम्हें सीखा देते
- 15:50हैं माऊ। आ गया।
- 15:52हाऊ आ गया? हाबू आ गया।
- 15:56शुरू से ही बच्चों को डराने शुरू कर देते है।
- 16:06कृष्ण मन के सारे तलों को खंगाल के अपने तक पहुंचे और कोई भी
- 16:14अध्यात्म की यात्रा बिना मन को तय किए हल नहीं कर सकता।
- 16:22यहाँ सीधे सीधे छलांग लगाने का कोई रास्ता ही नहीं है।
- 16:27यहाँ आराम से पग पग चलना होता है, कोई बहुत घना रास्ता भी नहीं है,
- 16:34आराम से चलो। समुद्र कितना भी गहरा हो खंगाल
- 16:44लिया जाता है और तुम 1 दिन तलहटी के ऊपर जाकर विराजमान हो जाते हो।
- 16:51रास्ते में क्या आया तुम भरी भांति जान लेते हो?
- 16:58कृष्ण कहते हैं, नैनम? दंत शस्त्रण तुम ऐसे हो के कटते
- 17:07नहीं किसी भी शस्त्र की धार से नैनं दा से भाव का तुम ऐसे हो।
- 17:19आग तुम्हें जलाती नहीं, मैं चैनम क्लिकन त्यापो न सृष्टि मारुता
- 17:27कोई बाढ़ तुम्हें बहा के नहीं ले जाती और कोई तूफान तुम्हें उड़ा
- 17:33के ले के नहीं जाता। इन्हीं बातों से तुम घबराते हो,
- 17:43कहीं मर न जाऊ, कहीं बिखर न जाऊं, कहीं छिद न जाऊं, कहीं टुकड़े
- 17:54टुकड़े न हो जाऊं। वो तुम्हारी व्यथा को कृष्ण बड़ी
- 18:01अच्छी तरह से समझता है कृष्ण तुम्हारी व्यथा का इलाज सत्य से
- 18:09बताते है तुमने कल्पना की है और कल्पना का तोड़ दर्शन होता है।
- 18:20तुम्हें अगर कोई वहम हो गया है तो वो जब टूटेगा जब तुम सही सत्य का
- 18:27दर्शन कर लोगे। शंकराचार्य को उदाहरण देते थे।
- 18:35के छत के ऊपर एक रस्सी पड़ी है तेज हवा के झोंके उसे हिला रहे
- 18:42हैं, तुम दूर से देखो, हो अंधेरी रात है, हवा के झोंकों के कारण।
- 18:54वह रस्सी हिलते हैं और तुम डर जाते हो के सांप है।
- 19:03सर्प का भ्रम पैदा हो जाता है और जू के भीतर रस्सी के भीतर, लेकिन
- 19:11यह सर्प कल्पना होती है, भ्रम होता है।
- 19:16बिल्कुल, ऐसा ही तुमने भ्रम पाला है।
- 19:19शरीर में आज तक तुम्हें जीतने भी शरीर प्रकृति ने प्रदान किए और
- 19:28पेड़ पौधों का था। छोटे जीव जंतुओं का था, बड़े पशु
- 19:37पक्षियों का था, उड़ने वालों का था, जल में रहने वालों का था,
- 19:44धरती पर रेंगने वालों का था। तुम्हें सदा ही भरम रहा है कि ये
- 19:52शरीर में कोयल भी समझती है कि ये कोयल मैं हूँ और कौआ भी समझता है
- 20:06कि कौआ मैं हूँ। मोर भी समझता है, तोता भी समझता
- 20:12है कबूतर भी समझता है, पेड़ भी समझता है कि मैं पेड़ हूँ, मतलब
- 20:21शरीर में हूँ, आज तक यही संस्कार तुमने पाला है?
- 20:34चेतना के कम सतर्क में ऐसे ही संस्कार पाले जाते हैं।
- 20:40तब चेतना का सतर्क था। बड़ी आसानी से ये संस्कार तुम में
- 20:52समा गया। मैं शरीर हूँ, सांप को कोई मारने
- 20:56जाता है, वह उसको मारने की चेष्टा करता है, उसको डराता है, फन उठा
- 21:02लेता है, फुंकार करता है, क्यों? उसका संस्कार है कि मैं सर्प का
- 21:12शरीर हूँ, मैं सर्प हूँ चेतना का भी कोई आभास नहीं हुआ।
- 21:23मानव जामे को इतना सृष्ट क्यों कहा गया क्योंकि मानव?
- 21:30जामे में इतनी चेतना होती है कि वह अपने शरीर को अपने से अलग देख
- 21:37सके और किसी योनी में यह काबिलियत नहीं होती।
- 21:49मानव की चेतना जीस उचाई तक होती है वह अपने आपको शरीर से अलग
- 21:55देखने में समर्थ होती है। न देखें बात अलग है।
- 22:02मुझे लोग पूछते हैं बाबा चेतना के शत्र को बढ़ाएं कैसे?
- 22:07बड़ा सुन्दर सवाल है, मैंने जवाब बहुत बार दिया, जो कुछ करके तुमने
- 22:20यह भ्रम पाला, संस्कार पाला कि मैं शरीर हूँ उससे बिल्कुल उलट
- 22:26करके। तुम चैतनों को बढ़ा सकते हो, अब
- 22:33तक तो तुम्हारे भीतर कैपेसिटी ना थी, लेकिन मानव जाम में तुम्हें
- 22:38कैपेसिटी आ गई। चेतन के सत्र को कैसे बढ़ाए बड़ा
- 22:44अहम सवाल है। फिर जवाब दे देता हूँ तुमने चेतना
- 22:53के सत्र को घटाई रखा शरीर के साथ चिपक है।
- 23:07ब्य इन टैंगलिंग विथ माइंड चिपक के विचारों से, भावनाओं से शरीर
- 23:19से और चिपकते चिपकते। तुम समझने ही लग गए कि ये भावना
- 23:25ही मैं हूँ। विचार मैं हूँ और शरीर में ऐसे
- 23:31तुमने बनाया यह संस्कार और टूटेगा बिल्कुल इससे अवगत जानो कि मैं
- 23:42विचार नहीं हूँ बड़ा आसान है। जानो की मैं भावना नहीं हूँ, जानो
- 23:50की मैं शरीर नहीं हूँ बड़ा आसान है और हैरानी की बात तो ये है
- 23:58इतना आसान होते हुए भी मानव जानता भी नहीं है।
- 24:08दो कारण है। एक तो लेज़ीनेस एक फियर डरता है
- 24:14और दूसरा सुस्ती सुस्ती का है कि तुम साक्षी।
- 24:23नहीं बनना चाहता तुम जैसे हो वैसे पड़े रहना चाहते हो, दुखी हो तो
- 24:30दुखी सुख हो तो सुख यह लेजिनेस तुम्हें ले डूबती है सच्ची नहीं
- 24:40होना चाहते तुम। और लिप्तता से तुमने संस्कार
- 24:48बनाया कि मैं शरीर हूँ मान हूँ विचार लिप्तता से विचार बना शासित
- 25:01से विचार टूटेगा। लिप्तता से गहन हुआ संस्कार
- 25:10शाक्षित से संस्कार टूटेगा अब देखिये कितने जन्मों की गहरी
- 25:19अंधकार की योनियां तुमने तैंकी? और जमा पड़ा है भीतर पर्वत की तरह
- 25:26विशाल ये संस्कार कि मैं शरीर हूँ, तुम सपने में भी नहीं सोच
- 25:33सकते कि मैं शरीर नहीं, इस शरीर को कोई मारने आ जाता है, तो तुम
- 25:41थर थर कांपने लग जाते हो। ये छोड़ो शरीर को तुम्हारी
- 25:46विचारों और भावनाओं को भी अगर कोई काट दे तो भी तुम न जाने क्याक्या
- 25:56सोचते रहते हो यहाँ आए हो ज़िन्दगी को स्वर्ग बनाने के लिए
- 26:05और बना लेते हो लड़का। मानव योनी में होते हुए भी अगर
- 26:10तुम अपनी ज़िन्दगी को नर्क बनाए रखोगे तो तुम जितना भाग्य ही कोई
- 26:14नहीं, तुम राग, द्वेष, नफरत इन्हीं में उलझे रहते हो।
- 26:27प्रश्नों, भावनाओं, विचारों में खोए रहते हो।
- 26:31तुम कभी जाग के नहीं देखते। एक सीधा सा फार्मूला तुम्हें बता
- 26:36दो, जो तुम्हें दिखता है वो तुम नहीं हो फिर सुन लो।
- 26:44जो तुम्हें दिखता है वो तुमसे अलग है, अब देखो तुम्हें क्या क्या
- 26:51दिखता है विचार तुम्हें दिखते हैं तुम कह सकते हो मुझे ऐसा विचार
- 26:58आया कि मैं उसको पिट दूँ, मुझे ऐसा विचार आया।
- 27:03कि मैं उसको मार दूं। विचार तुम्हें दिखा, मेरे मन में
- 27:14ऐसी भावना उठी कि मैं इसके मुँह पर थूक दूं।
- 27:20भावनाओं को तुम देख सकते हो। मेरे भीतर ऐसी भावना आई, ये इतना
- 27:25प्यारा है इसको गले। से लगा लूँ, चूम लूँ।
- 27:30इस भावना को तुम देख सकते हो जीसको तुम देख सकते हो वो तुम
- 27:37नहीं हो सीधा सा फॉर्मूला ये मंत्र है।
- 27:44जीसको तुम देख सकते हो वो तुम नहीं हो, अगर ये पंखा तुम्हें
- 27:52दिखता है, तो पंखा तुम नहीं हो, निश्चित तुम नहीं हो।
- 28:01जो कुछ भी तुम देख सकते हो, वो तुम नहीं सीधा सीधा सा तर्क और
- 28:09तर्कों में तुम बड़े प्रभावित होते हो और इस बुनियादी तर्क में
- 28:15तुम प्रभावित का तुम तुम चूक चूक जाते हो।
- 28:20तुमने कभी सोचा ही नहीं गहराई से कि जो दिखता है वो सामने कुर्सी
- 28:25पड़ी है मुझे दिखती है तो साफ है बिलकुल अंधे को न दिखे तो वो कह
- 28:31सकता है कि मुझे तो दिखती नहीं, अब तो मरे तो माखी है, तुम्हें
- 28:37कुर्सी दिखती है। और साफ है कि कुर्सी तुम नहीं हो।
- 28:43कौन पागल कहेगा कि ये कुर्सी मैं हूँ, लेकिन तुम पागल हो, जो कहते
- 28:47हो ये शरीर मैं हूँ तुम पागल हो जो कहते हो ये विचार में हूँ तुम
- 28:53पागल हो जो कहते हो ये भावना ही मैं हूँ मेरी भावनाओं को।
- 28:57तिरस्कृत कर दिया मेरी भावनाओं का खंडन कर दिया, मेरे शरीर पे आघात
- 29:07किया मेरे शरीर पे थूक दिया, मुझे चुब्बत लगाई।
- 29:16बुद्ध जान गए हैं कि वो शरीर नहीं और तुमने अभी जानना है कि तुम
- 29:23शरीर नहीं हो अभी तक तुमने माना मात्र है इतने इतने जन्मों के घोर
- 29:31अंधकार में तुम जिए हो अंधकार। यानी सत्य का ज्ञान न होना अंधकार
- 29:39होता है। तुम्हें सत्य का ज्ञान नहीं था,
- 29:43तुम शरीर की भावनाओं को अपनी समझते रहे, मैं समझते रहे।
- 29:55कॉन्शसनेस लेवल को कैसे बढ़ाएं? दृष्ट बनते है देखो देखते रहो,
- 30:09देखते रहो जैसे संस्कार बने तुम्हारे चिपटने के, वैसे ही
- 30:15संस्कार बनेंगे तुम्हारे। अलगाव के और चिपटने के जैसे धीरे
- 30:21धीरे तुम्हारे बढ़ते गए स्मेरु पर्वत तुमने खड़े कर दिए, वैसे ही
- 30:26अलगाव के भी ये तोड़ते जाएंगे। उस स्मेरु पर्वत को बड़ा रास्ता
- 30:32है। धीरे धीरे कोशिश करलो और जब तुम
- 30:42उस मुकाम पे आ गए जीस मुकाम पर तुमने ठीक तरह से समझ लिया कि
- 30:50सिर्फ मैं नहीं हूँ, तर्क तो मैंने दे दिया लेकिन तर्क से मसले
- 30:54हल होते हैं। और इस तर्क का कोई खंडन भी नहीं
- 31:00कर सकता। जो तुम्हें दिखता है, वह तुम नहीं
- 31:09हो। आईने में तुम अपना चेहरा देखते
- 31:12हो, याद रखो, आईने में दिखा हुआ चेहरा तुम नहीं हो।
- 31:18आइने में दिखता हुआ चेहरा तुम्हारी रिफ्लेक्शन है, तुम नहीं
- 31:23तुम तो वो हो जिसकी रिफ्लेक्शन आइने में रिफ्रेक्ट हो रही है।
- 31:32रिफ्लेक्शन तुम नहीं हो। आईना सिर्फ माध्यम बनता है
- 31:39तुम्हारे चेहरे को रिफ्लेक्ट करने का।
- 31:45लेकिन आईने के भीतर तुम्हारी छपी हुई तस्वीर तुम नहीं हो, तुम उसे
- 31:53देख सकते हो। तुम अपनी ही तस्वीर को देख सकते
- 31:56हो। इसलिए तुम वो नहीं जो तुम्हें
- 32:00दिखता है, वो तुम नहीं ये पेड़ पौधे ये आसमान, ये तार्य ग्रह
- 32:06नक्षत्र ये घूमता हुआ सारा अस्तित्व, ये सूरज, ये चाँद ये जो
- 32:16भी कुछ। वॉटेवर यू कैन सी जो भी कुछ तुम
- 32:21देख सकते हो वो तुम नहीं हो, इसी तरह तुम और करीब आओ और करीब आओ और
- 32:34करीब आओ। तो तुम अपने विचारों को देख सकते
- 32:38हो सा है कि विचार तुम नहीं तुम अपनी भावनाओं को भी देख सकते हो,
- 32:46देखो उसके प्रति मुझे बड़ी दया आ रही है दया तुम देख सकते हो, तुम
- 32:51नहीं सहानुभूति हो रही है मुझे। तुम देख सकते हो सहानुभूति को
- 32:58इसलिए तुम सहानुभूति भी नहीं तुम्हें क्रोध आता है क्रोध तुम
- 33:03नहीं तुम्हें काम आता है काम तुम नहीं हो बस तुम छिप पड़ जाते हो
- 33:13जब काम के साथ। तो काम रोज़ पहुँच जाते हो कोई
- 33:18क्या करे चिपटते तुम हो रोते मेरे पास हो आके बाबा क्या करण तुम ही
- 33:28कुछ करो ना मैं क्या करूँ? कोई ऐसा कुछ तो होता नहीं कि
- 33:35तुम्हें गोल के फिरा दो समझाना ही होता है।
- 33:39100 बार समझाया 1000 वीडियो में हजारों बार समझाया।
- 33:442000 में कितने बार तुम्हें समझाया कि तुम चेपकते हो यही
- 33:50तुम्हारा दोष? चिपकना बंद कर दो, दोष समाप्त हो
- 33:57जाएगा तुम विकार हो क्योंकि विचारों से चिपट जाते हो विकार
- 34:04हीन होना है, तो विचारों से चिपटना बंद कर दो मेरे पास आके
- 34:11रोने का कुछ। मुझे अपनी समस्याएं बताने से
- 34:21सिर्फ यही हाल होगा कि मैं कहूंगा भाई इसको देखो ये तुम हो नहीं जब
- 34:29तुम हो नहीं तो भोगने की आवश्यकता क्यों आन पड़े?
- 34:36प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि मैं अपनी शक्ति को ओज में परिवर्तित
- 34:43करके उस पर आनंद का रस पी लूँ। कौन नहीं चाहता, लेकिन कर्म तो
- 34:50तुम तुम्हारी चाहत से बिलकुल भी प्रेरित करते हो।
- 34:58तुम्हारी चाहत है उस ओझ को परिवर्तित करके उस आनंद का लुत्फ
- 35:03उठाने का और खंडित कर रहे हो तुम अपनी शक्ति को।
- 35:15तो भला जब शक्ति ही नहीं होगी तो ओज में परिवर्तित कैसे होगी और ओज
- 35:21में परिवर्तित कैसे होगी? और उसके बाद तुम उसका लुत्फ कैसे
- 35:25उठा पाओगे? 1000 जन्मो तक, तुम यह कुछ करते
- 35:33रहना। बिना शक्ति के तुम अपने भीतर भी
- 35:39नहीं जा सकती। ध्यान रखना मुर्दा अपने भीतर नहीं
- 35:42जा सकता। डेड बॉडी कैनट एक्जामिन हिमसेल्फ।
- 35:53वह अपने आपको निहार नहीं सकता, मुर्दा ना बेहतर देख सकता है, ना
- 35:59बाहर देख सकता है। मुर्दा असमर्थ हो गया है, असहाय
- 36:03हो गया है, लेकिन तुम अभी मुर्दा नहीं हो, मुर्दे जैसे काम कर रहे
- 36:08हो। पुष्ट हो कि कान्शस्नस लेवल कैसे
- 36:18बढ़ूँ अब तक तो प्रकृति में तुम्हें कान्शस्नस सिलेबल बढ़ाती
- 36:25सही गई, इसलिए बाबा कहते हैं, कर्मियावय कपड़ा नजर।
- 36:36उसने कर्म किया, उसने कृपा की उसकी रहमत हुई और तुम्हें ये मानस
- 36:45का जामा मिल गया। ये उसकी रहमत थी।
- 36:54ये इसके नियमों का प्रबंधन था कि सहज, सहज, सहज यह कॉन्शसनेस लेवल
- 37:01बढ़ता जाएगा और कृपा से तुम्हें। मानस का जामा मिल गया नगरी मोख
- 37:16दवास अब उसकी नजर होगी तो तुम्हारी ये बेड़िया टूट जाएंगी।
- 37:24एक ही बेड़ी है, देखो कोई हजारों बेड़िया तो है नहीं?
- 37:29मुख्य पीढ़ी एक ही है, बाकी सब श्रृंखलाएं हैं जैसे एक पेड़ की
- 37:34शाखाएं होती हैं, हजारों शाखाएं होती हैं, ऐसे ही तुमने एक
- 37:41बुनियादी भ्रम के। बल के ऊपर हजारों मिस
- 37:49अंडरस्टैंडिंग्स खड़ी कर दे ये शाखाएं अगर तुमने जड़ से काट दिया
- 37:55पेड़ को तो शाखाएं अपने आप सूख जाएंगी पुनियादी भ्रम अगर मत जाय
- 38:12तो पेड़ की कोई भी शाखा, पत्ता, फूल, फल सब मुरझा जायेगा।
- 38:22क्या है बुनियादी भ्रम, जो आज तक तुम पालते रहेगा?
- 38:28बनादिभ्रम मैं शरीर यह बुनियादीभ्रम और मेहनत में यह बात
- 38:42समझाई, इस बात को आप एक फार्मूला की तरह ले लो मंत्र की तरह ले लो।
- 38:50जो चीख तुम्हें दिखती है, वो तुम नहीं और तुम रोज़ अनुभव करते हो
- 38:54कि विचार तुम्हें दिखते हैं। विचार दिखते क्या हैं तुम्हारा
- 38:59जीना हराम कर देते हैं। इतने दिखते हैं विचार तो शोर गोली
- 39:04बहुत मचाते हैं। विचार तो खेल कूद ही बहुत करते
- 39:10हैं, तुम्हारे भीतर खेलते ही रहते हैं, गुल्ली डंडा खूब शोर मचाते
- 39:18हैं और तुम इनसे तंग हुए हुए संतों की शरण में जाते हैं मन
- 39:24बड़ा। तंग करता है बाबा क्या करें मन
- 39:32तंग करता है क्योंकि अभी तुम तुमने तुम्हारा आपा जन्माया नहीं
- 39:42थोड़ी सी उदाहरण से समझना। जैसे क्लास में बच्चे पढ़ रहे
- 39:48हैं। बच्चे आके बैठ गए, टीचर अभी आया
- 39:53ही नहीं तो बच्चे क्या करेंगे, शरारत करेंगे, उछलकूद करेंगे,
- 39:58कापियों को पाडकर गेंद बनाएंगे, हवाई जहाज बनाएंगे, एक दूसरे के
- 40:02ऊपर फेंकेंगे यही तो कुछ करते रहे।
- 40:06सबका अनुभव है। जब मास्टर नहीं होता तो तुम चोर
- 40:12करते हो फिर कॉपियों को फाड़ लेते हो।
- 40:18कागजों के तुम बॉल बनाते हो, हवाई जहाज बनाके उड़ाते हो?
- 40:24और एक दूसरे के ऊपर फेंक जाते हो। ये शरारतें करते हो, करते क्यों
- 40:30हो? क्योंकि अभी टीचर नहीं आया
- 40:34तुम्हारे ऊपर निगाह बान अभी आया नहीं है बस साक्षी नहीं आया अभी
- 40:41इसीलिए तुम्हारा मन शरारतें करता है।
- 40:46चेथन वो टीचर आ गया। सारे बच्चे आराम से सावधान हो के
- 40:52बैठते हैं, कोई शोर गुल नहीं मचाएगा, कोई एक दूसरे के ऊपर बॉल
- 41:01नहीं फेंकेगा। न जहाज उडाएगा शाक्षित के अभाव
- 41:10में तुम्हारा मन चलंत होता है, अगर साक्षी को तुम जन्मालो।
- 41:23तो मन धीरे धीरे धीरे धीरे ऐसे जैसे जब टीचर आ जाता है तो मन
- 41:31बच्चे शांत हो जाते हैं। ऐसा ही मन भी शांत हो जाएगा।
- 41:35जैसे ही तुम्हारा साक्षी रूपी शिक्ष का जाएगा बस शिक्षक के आने
- 41:41की देर है। विट्नेस के आने की देर है
- 41:44निगाहबान होना चाहिए कोई अभी तक निगाहबान तुम्हारा है नहीं कोई
- 41:50इसलिए तुम्हारा मन तुम भटकते हो और तुम्हारा मन भी तुम्हें भटका
- 41:55लेता है तुम्हें एक बात और बता। जैसे पत्थर से आज तुम मानस का
- 42:10जामा अख्तियार कर चूके हो, कृपा तो परमात्मा की ही है।
- 42:22कर्मी अभय कपड़ा नदरी मोकद्वारा ये मानस का जामा उसकी कृपा से
- 42:31मिला, उसने विधान बनाया तुम्हारी कान्शस्नस अपने आप बरती हुई तुमने
- 42:38कोई प्रयास नहीं दिया। तुम साक्षी बने नहीं, कभी पत्थर
- 42:44थे तो भी साक्षी नहीं बने। पेड़ थे तो भी नहीं बने, अमीबा थे
- 42:50यूनीसेल्यूलर ओर्गेनिस्म मल्टी सेल्यूलर।
- 42:55दुपया चौपाया पशु पक्षी उड़ने वाले जलचर, थलचर, नपचर जो भी कुछ
- 43:02थे, लेकिन साक्षी बनने का कोई प्रयास नहीं था।
- 43:05फिर भी तुम्हारी कान्शस्नस बढ़ी चेतना बढ़ती ही गई कारण परमात्मा
- 43:13के विधान के कारण। इसे ही परमात्मा की कर्म कहते
- 43:19हैं। परमात्मा की कृपा अगर तुम अब भी
- 43:23नहीं करोगे साक्षित्व का अभ्यास। मूर्ख तुम फिर भी हो जाओगे ध्यान
- 43:36करना इस बात से चकित मत होना अगर तुम ध्यान नहीं करोगे, कुछ भी
- 43:45नहीं करोगे चार नाम नहीं जपोगे 1000 नाम नहीं जपोगे नहीं राधे
- 43:50राधे राम राम शाम शाम करोगे? तो पहुँच तुम फिर भी जाओगे बाबा
- 43:57कहते हैं नजरी मोख दवास उसकी नजर तो हमेशा तुम्हें पत्थर से यहाँ
- 44:05तक ले आई और यहाँ से तुम्हें परमात्मा भी बना देंगे।
- 44:11तुम अगर कुछ भी न करो तो लेकिन बाकी जन्मो में तो तुम घोर अंधकार
- 44:21में थे, तुम साक्षी बन न सकते थे। मानस के जन्म में तुम्हारे पास
- 44:29ऑप्शन है। तुम साक्षी बन सकते हो मानस के
- 44:36जन्म तुम्हें बुद्धि मिल गई है, विवेक मिल गया है, ये एक्स्ट्रा
- 44:41ऑर्गन मिल गया है। तुम्हें एक्स्ट्रा इंस्ट्रूमेंट
- 44:45मिल गया है, जो किसी और जोने में नहीं था।
- 44:50तो अब तक की यात्रा परमात्मा ने तुम्हें तय करा दी इस कॉन्शस ने
- 44:55स्लेबल पे पहुंचा दिया, अब अगर प्रकृति पे छोड़ दोगे, ये नई बात
- 45:03अलग है कि तुम्हें पहुँच तो तुम फिर भी जाओगे।
- 45:13लेकिन चूक जाओगे इतने जन्मो के बाद पहुंचोगे तुम्हे नहीं पता
- 45:20लाखों लाखों जन्मो के बाद तुम यहाँ आ जाओ और क्या तुम चाहते हो
- 45:25की लाखों जन्मो के बाद फिर? तुम मुक्त हो जाओ बड़ा लंबा समय
- 45:30होगा, तो इसमें इस जन्म में एक ऑप्शन है।
- 45:36इस जन्म में विवेक है। इस विवेक के सहारे तुम एक ही जन्म
- 45:43में हो। उतना सफर तय कर सकते हो जितना
- 45:49धीरे धीरे पक्ष से प्रकृति तुम्हें सफर तय कराएगी।
- 45:56तुम साक्षी बनकर अपने आप में गहरे उत्तर के वो सफर।
- 46:06उस हिसाब से मिनटों सेकंडों में तय कर सकता हूँ।
- 46:12प्रकृति तुम्हें लाखों जन्म में पहुंचा देगी, पहुँच तो जायेगा
- 46:15प्रत्येक व्यक्ति यह संसार ये ब्राह्मण जड़ से परमात्मा तक की
- 46:23यात्रा है। जीरो से संपूर्ण अगर छोड़ना चाहे
- 46:42तो कुछ ना करो पहुँच तो तुम फिर भी जाओगे ये बात तुम्हें नहीं
- 46:49लगेंगी लेकिन ये सत्य है। बहुत से लोग कुछ भी नहीं करते,
- 46:58कुछ भी नहीं करते, अंत तक लेकिन पहुँच जाते हैं।
- 47:03क्यों प्रकृति पहुंचा देती हैं? प्रकृति का दायित्व है प्रकृति
- 47:08अपना काम बखूबी निभाती है, लेकिन। बहुत धीमे धीमे चाल से जैसे रेंग
- 47:18अगर जाना हो ब्रह्मण्ड के उस पार कितनी देर लगेंगी और बिजली की
- 47:28रफ़्तार से भी अगर चलोगे तो कितनी देर लगेंगी?
- 47:34तुम्हारा साक्षित्व का पैदा करना बिजली की रफ्तार के रॉकेट के ऊपर
- 47:39बैठ जाने के समान है। घबराओ मत पहुँच ही जाएगा प्रत्येक
- 47:45व्यक्ति जिसने शुरू कराया है सफर। वो अंजाम तक भी ले जाएगा।
- 47:55इसमें तुम्हें चिंता लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन बात तो
- 47:59ये है कि तुम्हारा भ्रम तब तक तुम दुखी रहोगे, क्योंकि तुम्हारा
- 48:05भ्रम ये है कि मैं शरीर हूँ और शरीर मैं हूँ।
- 48:11यह मान्यता भ्रम तुम्हें दुख देता है और अगर भीतर तड़प उठ गई है कि
- 48:20मैं इस दुख से मुक्त होना चाहता हूँ तो फिर तुम्हें कुछ न कुछ
- 48:27करना पड़ेगा। तो हमें करना पड़ेगा।
- 48:29प्रकृति के ऊपर अगर कॉन्शस स्नैश लेवल को छोड़ दोगे, पहुँच तो फिर
- 48:37भी जाओगे, लेकिन लाखों जन्म अगर एक ही जन्म में पहुंचना चाहते हो।
- 48:46देन यू विल हैव टू डू समथिंग तुम्हें विटनेस तुम्हें, साक्षी
- 48:59तुम्हें ऑब्जर्वर देखना होगा, तुम हो तो हो तो तुम साक्षी?
- 49:08हो तो तुम ओब्सर्वर ही तभी तो देख पाते हो।
- 49:11इन विचारों में तुम ओब्सर्वर हो तभी तो देख पाते हो।
- 49:18इससे चलते हुए शरीर को इन भावनाओं को शुरू से ही हो, तुम्हें बनना
- 49:23नहीं है। ओब्सर्वर साक्षी तुमने बनना नहीं
- 49:28है, सिर्फ साक्षी में अधिष्ठित होना है।
- 49:32कृष्ण कहते हैं, स्थिति प्रक हो जा।
- 49:35अर्जुन साक्षी में अधिष्ठित हो जा।
- 49:39साक्षी है तो साक्षी को पैदा नहीं करना।
- 49:45जो साक्षी को पैदा करने की मुशक्कत में लग जाते हैं, वह भी
- 49:49नहीं पहुँच पाते। उन्होंने गलत रास्ता चुन लिया।
- 49:53साक्षी को पैदा करने की कोशिश मत करना साक्षी तुम हो यू अरे ऑलरेडी
- 50:00ऑब्सर्वर बस उस। ओब्सर्वर तक पहुंचना है कैसे
- 50:09पहुंचोगे छोड़ दो अपने आपको रास्ता सबसे सरल है।
- 50:20अलगअलग ऋषियों ने अलगअलग शब्दों से समझाने की चेष्टा की।
- 50:26मिटा दें अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे की दाना खाक में
- 50:33मिलकर गुलजार होता है, अपने आप को छोड़ दो।
- 50:41दाना मिट जाए, अपना वजूद खो दे, फल लग जाएगा, बड़े से बड़ा प्रयास
- 50:53है ये। अपने आप को छोड़ देना बड़े से
- 51:00बड़ा साहस है यद्यपि तुम मरते नहीं, लेकिन साहस है इस संकट की
- 51:08वेला में जब तुम चिपटे बैठे हो लाखों लाखों जन्मों से तुमने अपने
- 51:13आप को। शरीर माना है।
- 51:16इस शरीर को उसके हवाले कर देना बहुत मुश्किल है।
- 51:21भजन गाना बड़ा आसान है। भजन तो वो भी गा लेती हैं जो
- 51:2710,00,000 में 20,00,000 में भागवत सप्ताह की कथा कहती हैं।
- 51:35और फिर कुछ दिन बाद लाखों रुपए के बैग के साथ पकड़ी जाती हूँ वजन तो
- 51:43बहुत बिग हालत है मेरा हाथ। की।
- 51:51कृपा से सब काम हो रहा है। मेरा आप की कृपा से सब काम हो रहा
- 52:17करते हो तुम कन्हैया करते हो तुम कन्हैया।
- 52:27मेरा नाम हो रहा है, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है।
- 52:50पतवार के बिना ही मेरी नाव उछल रही है पतवार के बिना भी मेरी नाव
- 53:08उछल। रही है।
- 53:13हैरान है, ज़माना हैरान है, ज़माना मंजिल भी मिल।
- 53:27रही है। हैरान है ज़माना मंजिल भी मिल रही
- 53:41करता नहीं है कुछ भी। करता नहीं मैं कुछ।
- 53:49भी? मेरा काम हो रहा है।
- 53:58करता नहीं मैं कुछ भी। मेरा काम हो रहा है मेरा आप की
- 54:11कृपा से सब काम हो रहा है। कहना बड़ा आसान है।
- 54:23छोड़ना बड़ा मुश्किल है। किसी के हाथ में अपने जीवन की
- 54:29पतवार को सौंप देना बड़ा मुश्किल है।
- 54:36फिर वो चमड़े का बैग पकड़ाए तो पकड़ लो, बोरी का बैग पकड़ाए तो
- 54:42भी पकड़ लो। जरूरी नहीं है कि ट्रेड मार्क का
- 54:47ही प्याग लेना है। ये दिखावेबाजी बंद हो जाती है।
- 54:53वहाँ मुखौटे उतर जाते हैं, मुखौटे उतारने पड़ते हैं।
- 55:01महावीर नग्न हो गए। एक दृष्टि में वो आपको बदला के गए
- 55:10हैं के बाहर भीतर से नग्न हो जाओ। परमात्मा तुम्हारा बनावटी चेहरा
- 55:18देखना नहीं चाहता। ये लाबा दे जो तुमने टांग रखे हैं
- 55:23ये मेकअप जो तुमने सजा रखे हैं इससे तुम लोगों को प्रलोभन तो दे
- 55:28सकोगे लेकिन दिए हुए प्रलोभन अंततः नहीं बना पाएंगे।
- 55:38कितना ही इकट्ठा करो। साथ कुछ जाता ना आँखें, मायूसी
- 55:51हाथ लगती है कितने सिकंदर आए? कितने चले गए हैं?
- 56:03संघ कुछ ले के नहीं गए। अगर यह बात समझ में आ जाए कि इस
- 56:13गलत मान्यता के कारण मैं दुख में हूँ, दर्द में हूँ, चिंताग्रस्त
- 56:18हूँ। विकार से त्रस्त हूँ तो तुम
- 56:24ततक्षण सुखी होना शुरू हो जाओगे। बस इस एक के कारण तुम दुखी हो और
- 56:34इस एक को ही साधना होता है। एक साध है सब है एक को साध लो
- 56:43किसको साक्षी साक्षी से तुम्हें पता चलेगा कि मैं जिसे आपका समझता
- 56:52था वह दूसरा है, मुझे दिखता है। और जो दिखता है और मैं हूँ मैं और
- 57:03दूसरे के लिए क्यों झगड़ा मोड़ लेना हो?
- 57:09तुम तो धन के लिए लड़ने लग जाते हो, तुम तो पदबियों के लिए मार
- 57:14काट कर देते हो? पतलियों के लिए तुम कतलो गारथ कर
- 57:21देते हो, इसके पीछे की एक यह मूड मान्यता है कि मैं शरीर मैं मन
- 57:34हूँ मैं भावना हूँ। तुम्हारी भावनाओं को कोई चोट
- 57:40पहुंचा दे। यद्यपि भावनाएँ तुम हो नहीं,
- 57:44तथापि तुम कोर्ट में जाके हर्जना कर देते हो।
- 57:47500,00,00,000 का मेरी भावनाओं को ठेस पहुंचा दो।
- 57:55और तुम्हारी कीमत क्या है? बाजार में अगर तुम्हारे अंगों को
- 57:59बेचा जाए तो छेर पे आठ आने का माल है।
- 58:05सारा ये सात सूर्य से कलशम ये सारा कुछ मिला के तुम्हारा तो
- 58:12चमड़ा भी काम नहीं आता। पशुओं का तो चमड़ा कम आ जाता है।
- 58:19₹6 अठाने का काम? ये तुम्हारी एक्चुअल कीमत है और
- 58:27मूड है वो लोग जो फैसला देते हैं कि ठीक तुमने भावनाओं को आहत
- 58:32किया। और दो 500,00,00,000 का जुर्माना
- 58:37है, वो भी खुद को शरीर ही समझे बैठे हैं।
- 58:42ये कुर्सी पे बैठने वाले चीफ जुडिशल मजिस्ट्रेट, ये भी तो खुद
- 58:51को। इन्हीं मूड़ताओं से ग्रस्त लिए
- 58:55बैठे हैं कुर्सियों पे और जिनकी मूड़ताएं ध्वस्त हो जाती हैं, वो
- 59:01कहाँ बैठते हैं? जन को उतर के नीचे बैठ जाते हैं
- 59:06और जो जानता है कि मैं शरीर नहीं हूँ।
- 59:10उसको कह देते हैं कि आप वराजो जो भी कुछ दुराचार सदाचार पुण्य
- 59:19प्राप्त करवाती है, ये मान्यता करवाती है और जो भी तुम कष्ट
- 59:26झेलते हो, पीड़ाएँ झेलते हो, दर्द झेलते हो।
- 59:30बदनामी झेलते हो, बेइज्जती झेलते हो वो इसी मान्यता के कारण कि मैं
- 59:34शरीर हूँ, मैं मन हूँ मैं हमेशा भावना हूँ अगर ये एक अहम मुद्दा
- 59:43टूट जाए, टूटेगा क्या सर? सत्य में दिख जाए कि तुम हो कौन
- 59:53तो कृष्ण समझाने की चेष्टा करते हैं कि तुम समझते हो मैं मर
- 59:59जाऊंगा, तुम समझते हो कि मैं कट जाऊंगा, कल जाऊंगा, कल जाऊंगा।
- 1:00:06सूख जाऊंगा, उठ जाऊंगा, तूफानों में बह जाऊंगा बाड़ों में वो जो
- 1:00:13बह जाता है, जो गल जाता है, जल जाता है, जो कट जाता है वो तुम हो
- 1:00:19नहीं इस श्लोक में। तेईसवें श्लोक में दूसरे अध्याय
- 1:00:28के भगवान कृष्ण तुम्हें एक सत्य बताते हैं और ध्यान रखना भगवान
- 1:00:34कृष्ण तुम्हें बहलाने की शिष्ट श्रेणी करता है।
- 1:00:37यह ज्ञान है, इसमें ज़रा भी शुद्धि नहीं।
- 1:00:45औरतया शुद्ध है, पूरे है जो देखा गया जो है वो ही बताते हैं कृष्ण
- 1:00:53और वो ही बताते हैं जो उस लेवल पे कोई भी संत फकीर पहुँच गया सब वही
- 1:01:03जानता है एक। जो कृष्ण जानता है वो कबीर भी
- 1:01:07जानते हैं। नानक भी जानते हैं, मेरा भी जानते
- 1:01:11हैं अगर ये एक मान्यता तुम्हारी टूट जाए।
- 1:01:19मान्यताओं से न टूटे, दर्शन से टूटे।
- 1:01:25तुम देख लो अपनी नगन आँखों से तो ये मान्यताएँ टूट जाएंगे।
- 1:01:34सारे ताश के पत्ते, जो तुमने 100 मंझले महल खड़े किए।
- 1:01:44एक को जानते ही धर्म से सारे ताश के पत्तों की तरह बिखर जाए एक भी
- 1:01:51मंजल न बचेगी सपाट, धरती पे आ जाओगे तुम कृष्ण बुनियादी चीज़ को
- 1:02:02लेते हैं। मैंने कहा कृष्ण से बड़ा
- 1:02:04साइक्लोजिस्ट कोई नहीं। पश्चात में पश्चिम में क्योंकि नए
- 1:02:11है बेचारे एक सेगमेंट फ्राइड का जन्म एक मार्कस का जन्मा जिसने
- 1:02:20कहा परमात्मा नहीं है, धर्म अफीम का नशा है, सिर पे उठा देगा।
- 1:02:27उनको आदत नहीं थी। उन्होंने पहले कभी ये चीज़ सुनी
- 1:02:32ही नहीं थी, लेकिन यह देश यह देश की तो मिट्टी में खुशबू ही इस बात
- 1:02:40की है। यहाँ तो जो।
- 1:02:45दफन हो गए जो दहन हो गए उनकी माटी यहाँ पर आज भी बोल रही है क्या?
- 1:02:55शिव, हम शिव, हम शिव, हम। सच्चिदानंद, मैं हूँ शिवाहन
- 1:03:27शिवाहन शिवाहन शिवाहन, अमर आत्मा, सच्चिदानंद, मैं हूँ।
- 1:03:38शिव, वो, हम शिव, वो हम शिव, वो हम यहाँ।
- 1:03:47की माटी का प्रत्येक कण नजर रहा। बोलता है कि मैं शिव स्वरूप
- 1:03:56उन्हें ऋषियों मुनियों की शरीर की माटी है यह जिन्होंने कभी यह गीत
- 1:04:03गुनगुनाए, जिन्होंने कभी इस सत्य का अवखान किया उन्हीं की माटी है
- 1:04:10कोई ऊपर से नहीं गिरे, ये धरती इसी माटी की बनी है।
- 1:04:17पाश्चात्य की धरती नास्तकों की माटी से बनी है और किसी ने कह
- 1:04:23दिया कि परमात्मा नहीं है, सिर पे उठा लिया बहुत बड़ी खोज की उसने
- 1:04:30क्या बात है अव्वल दर्जे का मूर्ख था मार्कर्स।
- 1:04:36बिना देखे इंकार करना इससे बड़ी मोरूता कोई नहीं बिना खोजे इंकार
- 1:04:42करना इससे बड़ा पागलपन कोई नहीं और बिना देखे स्वीकार करना ये भी
- 1:04:49कम मोरूता नहीं है। तुम मंदिर जाते हो तो मंदिर जाने
- 1:04:53से आस्तिक नहीं हो जाते। तुमने देखा नहीं उसे तुम्हारे लबो
- 1:04:59लिवाश में वो खुशबू नहीं आती तुम्हारे चेहरे पे वो रौनाई नहीं
- 1:05:06आती परमात्मा की खुशबू बाहर बिखर बिखर जाती है।
- 1:05:17परमात्मा की खुशबू भीतर भीतर दब के नहीं रह जाते, बाहर दूर तर्क
- 1:05:26तुम्हें छेड़ती है, लेकिन उनका कसूर कोई ना?
- 1:05:37जिसने देखा नहीं बस मैं ये कहता हूँ कि वो कम से कम सच तो बोलता
- 1:05:42है नहीं है पर अपना सेगमेंट राइट ने ऊपर ऊपर के तल बता दिया।
- 1:05:54उसने अनकॉन्शियस को दो भागों में विभक्त कर दिया।
- 1:05:58सबकॉन्शियस हो रहा अनकॉन्शियस जरूरत न थी इसकी बात क्या जरूरत
- 1:06:04थी? अचेतन मन की खोज ऋषि कर चूके थे,
- 1:06:09कोई तीर नहीं मार दिया। उसी बात को विभक्त कर दिया।
- 1:06:14दो भागों में बांट दिया जो थोड़ा सा कम उथला है, जो उथला उथला है,
- 1:06:22वह सब कॉन्शस, जो गहरा गहरा है, वो अनुकॉन्शस क्या खोज की इसने?
- 1:06:29इसलिए मैं कहता हूँ कि अव्वल दर्जे के बेवकूफ लोग थे।
- 1:06:36इनकी पूजा वेस्टर्न करे करे, ईष्ट करे।
- 1:06:46पछती नहीं बात गले से उतरती नहीं बात ये ऋषियों मुनियों की धरती
- 1:06:52है, ये मनीषियों की धरती है जो मन से पार हो गए हैं उन मनुष्यों की
- 1:07:00जो मन के ईश हो गए, जो मन के भगवान हो गया है।
- 1:07:06मन से पार चले गए और भगवान के दर्शन कर लिए साक्षी साक्षी को
- 1:07:18पैदा करो जन्मो जन्मो के अभी पता नहीं प्रकृति लाखों जन्म और लेके
- 1:07:29तब तक तुम दुख में रहना चाहते हो। तो चलो कोई बात नहीं ऐसा कुछ
- 1:07:40मूढ़ता से भरा हुआ कॉन्सेप्ट पाश्चात्य तो सहन कर सकता है,
- 1:07:46क्योंकि उसकी रगों में उसकी माटी में वो जज्बा है नहीं।
- 1:07:51लेकिन पूर्व स्वीकार करे कुछ हजम नहीं आती।
- 1:07:55बात गले से नीचे नहीं उतरती बात पूर्व में तो यहाँ की हवाएं
- 1:08:03लगातार गुंजार कर रही हैं मैं शिव स्वरूप।
- 1:08:08मैं कटता नहीं, मैं जलता नहीं, मैं गलता नहीं मैं।
- 1:08:11सोबता नहीं शिवो हम शिवो, हम शिवो हम।
- 1:08:24ये एक्सट्रैक्ट है भगवान कृष्ण की गीता के इस श्लोक।
- 1:08:30नैनाम छिदन तीशास्त्रण नैनाम दोहती बा कहा नै चैनम क्लेदन
- 1:08:42त्यागप। नसोष्यतिमारूता जिसे कोई काट।
- 1:08:53नहीं सकता, गला नहीं सकता, जला नहीं सकता, सुखा नहीं सकता वो
- 1:08:58अजहर आत्मा सचदा नन्द में। जीस दिन तुम ये जान जाओगे उस दिन
- 1:09:11तुम्हें बरसनाएँ तंग नहीं करेंगे इन्द्रियां तुम्हारे इशारों पर
- 1:09:19खेलेंगे, तुम इंद्र बन जाओगे। और इंद्र बन जाओगे इशारे किए थे
- 1:09:25हमारे शास्त्रों ने कि इन्द्र बन जाओगे तो स्वर्ग पे राज़ करोगे,
- 1:09:31स्वर्ग पे राज़ करोगे इन्द्र स्वर्ग का राजा है स्वर्ग जहाँ
- 1:09:37सुख ही सुख है। और कल्पवृक्ष तुम्हारे पास होगा,
- 1:09:42जो मांगोगे मिल जाएगा। ऐसा ही कुछ भीतर है जब तुम जाओगे
- 1:09:48जंक्चर पॉइंट पे जो मांगोगे वही मिलेगा और खुशहाल ही खुशहाल है।
- 1:09:56बगीचे ही बगीचे हैं, सुगंधे ही सुगंधी है।
- 1:10:01अफसराएँ नाच करती हैं, लेकिन इंद्र नहीं डोलते हैं।
- 1:10:06इन तरह दूसरों के लिए भेज देते हैं अफसराओं को, मेनका को, रंभा
- 1:10:10को और वशी को जाओ। तुम विश्वामित्र की तपस्या को भंग
- 1:10:17करो, लेकिन देखो रहती तो उसके पास।
- 1:10:20इंद्र कभी नहीं डोलते जब तुम मिन्द्र हो जाओगे तो तुम डोलोगे
- 1:10:25ना तुम्हारे सामने रम्बा भी होंगी, अप्सराएँ भी होंगी, र वशी
- 1:10:32भी होंगी, मेनका भी होंगी, स्वप्न सुंदरी भी होंगी।
- 1:10:38हजारों हजारों तरह के सब कुछ होंगे, सुन्दर पुरुष भी होंगे।
- 1:10:42अश्विनी कुमार भी होंगे। तुम डोलोगे वो ही सत्य चित आनंद
- 1:10:53रूप जो हिलता नहीं, अडोल है, अचल है।
- 1:10:58अकंप पहल कृष्ण कहते हैं, वो तुम हो वो तुम हो जो घबराता नहीं, जो
- 1:11:11डोलता नहीं, जो डरता नहीं जो कटता नहीं, वो तुम हो।
- 1:11:17और इस तुम को तुम पहचानो यही रमन कहते हैं यही गुरचिया कहते हैं,
- 1:11:26यही कृष्ण उर्ति कहते हैं। सभी सत्पुरुष कबीर, नानक यही तो
- 1:11:33कहते हैं। इसकी खोज करो और देखो खोजोगे तो
- 1:11:40पाओगे नहीं। प्रकृति अपना काम कर रही है।
- 1:11:43मैंने पहले भी कहा मुक्त तो तुम हो ही जाओगे, लेकिन फिर प्रकृति
- 1:11:49अपने ढंग से तुम्हें मुक्त करेगी। जैसे पत्थर से आज तक ले आई।
- 1:11:55वैसे आज से भगवान तक भी ले जाएंगे।
- 1:12:00फिर प्रकृति के ऊपर ठीक है, फिर लाखों जन्म और सहो।
- 1:12:05दुख दर्द बेकार में अब हम सोचते हैं कि इतने जन्म व्यर्थ कब हैं?
- 1:12:12यह दर्द तो किसी और को होता था। और यह जिसे दर्द होता है वह 1 दिन
- 1:12:18जल जाएगा, माटी बन जाएगा, तुम आग में जला दोगे, दफन कर दोगे,
- 1:12:24व्यर्थ में ही दुख होगा ना? इस लिप्तता के कारण दुख होगा ना।
- 1:12:32इस मूढ़ता के कारण इल्यूश़न के कारण भ्रम के कारण के मैं शरीर
- 1:12:36हूँ दर्द हो रहा है, तो मेरे दर्द हो रहा है।
- 1:12:41अगर यही तुम मानना चाहते हो तो चलो चलो फिर लाखों जन्मों का
- 1:12:46इंतजार करो और अगर तुम इन लाखों जन्मों का।
- 1:12:50इंतजार नहीं करना चाहते हो, उस भ्रम को तोड़ देना चाहते हो अभी
- 1:12:55अभी और यहीं तो चलो मेरे साथ मैं तुम्हें वहाँ ले चलूं जहाँ ऐसा
- 1:13:05कुछ नहीं है। यहाँ कोई बनावट नहीं, कोई दखावन
- 1:13:10जहाँ शुद्ध तुम्हारा सत्य सनातन चेतन आनंद सबरूप है चलो मेरे साथ।
- 1:13:21आओ हजूर, तुमको सितारों पे ले चलूँ दिल झुंझा ऐसी बहारों में ले
- 1:13:44चलूँ। आओ हजूर, आओ सितारों पे ले चलो
- 1:13:57दिल झुम जा ऐसी बहारों में। ले चलूँ।
- 1:14:08आओ। हजूर आओ, श्री कृष्ण गोबिंद हरे
- 1:14:22मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री।
- 1:14:33कृष्ण? गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण।
- 1:14:44वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद, हरे मुरारी हे नाथ नारायण, वासु देव,
- 1:15:00पितमात स्वामी। सखा?
- 1:15:06हमारे पितमात स्वामी सखा हमारे हे नाथ?
- 1:15:18नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ?
- 1:15:36नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद, हरे, मुरारी ही नाथ
- 1:15:50नारायण, वासुदेव। धन्यवाद।