Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 May 25 - क्या सब कुछ छोड़ कर परमात्मा को समर्पण कर देना चाहिए? भूत प्रेत होने का असल कारण क्या है?
Transcript
- 0:04क्या सब कुछ छोड़कर परमात्मा को समर्पण कर देना चाहिए आप?
- 0:18के पूछने के ढंग से ऐसा मालूम पड़ता है।
- 0:23समर्पण कर देना चाहिए जैसे के समर्पण आपके हाथ में पकड़ी हुई
- 0:31कोई चीज़ हो जो कि आप जैसे फूल को अर्पित करते हैं।
- 0:37भोग को अर्पित करते हैं। ईश्वर को ऐसे ही समर्पण भी कुछ
- 0:43ऐसा है जो कि आप कर सकते हो। यहीं आपसे चूक हो जाती है, करने
- 0:54जैसी घटना, समर्पण, प्रेम, वैराग्य।
- 0:57नहीं है, समर्पण हुआ करता है, किया नहीं जा सकता, प्रेम किया
- 1:09नहीं जा सकता, हो जाया करता है, वैराग्य किया नहीं जा सकता हो
- 1:16जाया करता है। ये महत घटनाएं हैं जो ईश्वर की
- 1:23कृपा के बिना घटित नहीं हुआ करती। आपके हाथ में नहीं है समर्पण करना
- 1:32ईश्वर किसी दिन इतना धयालु हुआ आपके ऊपर।
- 1:38तो समर्पण हो जाएगा। ईश्वर की कृपा के बिना समर्पण,
- 1:45प्रेम, वैराग्य गठित नहीं हुआ करता।
- 1:49हाँ, उससे पहले उनकी भूमिकाएं अवश्य बना करती।
- 1:57समर्पण करने जैसी कोई घटना नहीं है।
- 2:01प्रेम करने जैसी कोई घटना नहीं है।
- 2:04वैराग्य करने जैसी कोई घटना नहीं है।
- 2:07ये घटनाएं हुआ करती है प्रयास रहित।
- 2:14आपके बिना प्रयास प्रेम हो जाया करता है, आपके बिना प्रयास के
- 2:20वैराग्य हो जाया करता है, समर्पण हो जाया करता है।
- 2:26मेरे पास बहुत से पैसे लोग आते हैं।
- 2:33जो कहते हैं कि मेरा उससे प्रेम है, मैं उसे छोड़ नहीं पाता।
- 2:43अप्रत्यक्ष रूप से तुम मुझे ये कहना चाहते हो कि मैं ईश्वर को
- 2:48हराना चाहता हूँ। ईश्वरय घटना को तुम ना बदल सकते
- 2:54हो ना हरा सकते हो। तुम्हारे सामाजिक बनाए हुए बंधनों
- 3:04के कारण तुम्हें प्रेम छोड़ना पड़ता है।
- 3:08प्रेम छूट नहीं पाता, इस बात को ध्यान से समझ लेना तुम अगर चाहो
- 3:17के कल तक मैं उससे प्रेम करता था, लेकिन आज प्रेम करना छोड़ दिया है
- 3:25और तुम मूर्ख हो। या तो प्रेम घटा ही नहीं।
- 3:31आपने मान लिया कि प्रेम घट गया या प्रेम छोड़ा ही नहीं गया?
- 3:39आपने मान लिया कि प्रेम करना छोड़ दिया, प्रेम ना तुम्हारे करने से
- 3:46हुआ करता है। ना तुम्हारे छोड़ने से छूटा करता
- 3:50है। प्रेम ऐसी घटना है जो कि स्वतः ही
- 3:59प्रस्फोटित हुआ करती है। ईश्वर के कृपा के बिना प्रेम वृग।
- 4:05समर्पण जैसी वृहद घटनाएं घटित नहीं हुआ करते।
- 4:10इसीलिए जपजी साहब ने बाबा नानक ने सब कुछ बोल दिया, लेकिन सबसे।
- 4:25अंत में एक शब्द बोल दिया क्या एक कोंकार सत्यनाम करता पुरख और अंत
- 4:35में गुरु प्रसाद प्रसाद रूप में मिलता है।
- 4:42प्रसाद का अर्थ क्या होता है? कभी विचार किया?
- 4:48प्रसाद का अर्थ होता है जो तुम्हारी मेहनत का फल नहीं होता
- 4:54वो होता है प्रसाद जो तुम्हें मुफ्त में मिल जाया करता है वो
- 4:59होता है। प्रसाद प्रसाद का अर्थ है तुमने
- 5:03किया तो कुछ नहीं। लेकिन तुम तुम्हें मिल गया
- 5:09अक्षमात मिल गया बस प्रेम प्रसाद है समर्पण प्रसाद है, वैराग्य
- 5:19प्रसाद है निश्चित ही। उससे पहले तुमने जो भी कुछ किया
- 5:28होगा, तुम हमेशा ही उन चीजों को पृष्ठभूमि में रखोगे कि हमने ऐसा
- 5:36किया तो हमको ये मिला आप जोड़ लोगे।
- 5:47और प्रसाद की कोई भी कीमत आपसे वसूल नहीं की जाती।
- 5:53प्रसाद बरसा करता है, पात्र को पात्र को कभी नहीं देखा करता,
- 6:01परमात्मा की कृपा अनवरत। बरसती है, पात्र को पात्र को नहीं
- 6:08देखते। कभी सूरज की करण दुष्ट और सज्जन
- 6:19इन पुरुषों पे अलग ढंग से वर्षा करती है।
- 6:22कभी बारिश दुष्ट। और सज्जन इनको देख कर वर्षा करती
- 6:28है हवा दोस्तों सज्जन को देख के चलती है वृहत घटनाएं ईश्वर पर
- 6:36दर्द घटनाएं कुछ भी नहीं देखती, सिर्फ अपनी मर्जी से ही चलती है।
- 6:48तो क्या किया जाए? समर्पण घटित होता है, समर्पण किया
- 6:56नहीं जाता। जैसे ही तुम कर कर के हार जाओगे,
- 7:02कर कर के थक जाओगे। पुरुष थकावट से परिश्रमहीनता से
- 7:11जो आएगा वो समर्पण बड़ी अजीब सी व्याख्या के आपको लगेंगी क्योंकि
- 7:20आपके धर्मों ने आपको सिखाया है ऐसा है।
- 7:26सीधे से समर्पण करते हो बस बात खत्म सीधे से समर्पण हो नहीं सकता
- 7:36करोगे कैसे आप तो ऐसा कहते हो? कि बस आराम कर लो, परिश्रम के
- 7:46बिना सच्चा आराम ना हो पाएगा। परिश्रम होगा तो आराम होगा।
- 7:55मुर्दा अगर आराम की कामना करे तो त्वरित।
- 8:01क्यों? क्योंकि मुर्दा परिश्रम ही नहीं
- 8:04करता, मुर्दा ऑलरेडी परिश्रम से रहित है।
- 8:12ऑलरेडी ही विश्राम कर रहा है, सदा विश्राम अवस्था में कबर के भीतर
- 8:20पड़ा हुआ। विश्राम में ही है इसलिए विश्राम
- 8:26की चाहत ना कर पाएगा क्योंकि परिश्रम ही ना कर पाएगा।
- 8:37सोए हुए थे चैन से ओढ़े हुए कफन। सोए हुए थे।
- 8:43चैन से उड़े हुए कफन यहाँ भी सताने आ गए।
- 8:50किसने पता बता दिया मुर्दा कभी परिश्रम करने की चेष्टा ही नहीं
- 8:58करता इसलिए विश्राम भी नहीं कर पाएगा।
- 9:01क्योंकि विश्रामित अवस्था में पहले से ही संलग्न है थक थक के
- 9:09हार जाओगे, कर कर के थक जाओगे तो घटित होगा वो प्रयास रहित अवस्था।
- 9:21समर्पण सरेंडर पहले तो थकना होगा पहले करके देखना होगा तुम्हें कि
- 9:36क्या कर कर के। कर पाओगे जब तुम्हारे पूरे
- 9:46प्राणों ने इस चीज़ का अनुभव कर लिया, बहुत गहरे तलो पे के मेरे
- 9:53किए कुछ नहीं होता तब समर्पण घटित हो जाएगा।
- 9:59लेकिन समर्पण घटित होगा तब जब आप कर कर के थक जाओगे हमारे धर्म
- 10:12ग्रंथों में सभी को। सीखा दिया जाता है कि समर्पण कर
- 10:21दो, समर्पण होने दो। ये शब्द कोई भी नहीं कहता।
- 10:31हमारे संत हमारे ऋषियों ने दिन भर रात आपको समझाए चले जाते हैं।
- 10:38छोड़ो परिश्रम, समर्पण कर दो और देखिए आप बड़ी उलझन में पड़ोगे
- 10:50समर्पण तो हो नहीं पाएगा। परिश्रम करना भी छोड़ दोगे, दोहरी
- 11:00स्थिति में आ जाओगे। आप समर्पण हो नहीं पायेगा,
- 11:09परिश्रम करना छोड़ दोगे। हाँ बोलिए जी।
- 11:16ये तुम्हारे साधु संत तुम्हे झूठा समर्पण करना सीखा रहे हैं, झूठा
- 11:24समर्पण करना सीखा देंगे और वो भी समर्पण।
- 11:29क्या समर्पण हुआ के थोड़ा सा पांव में दर्द हुआ और तुम्हारी शिकायत
- 11:34बाहर निकली। मुझसे बहुत से लोग कह देते हैं कि
- 11:42हम तो ईश्वर के ऊपर हैं, छोड़ रखा है।
- 11:44सब कुछ बड़े तेजस्वी ढंग से बोलते हैं।
- 11:53उनकी वाणी सुनने योग्य होती है कि हम यो तो द पावे।
- 11:59स्वीपलिका और जब थोड़ी से उनके ऊपर आपत्ति आती है, जो झट से सगाई
- 12:07शुरू हो जाती है, तो मैं कहता हूँ कि समर्पण देवता आपका कहाँ के
- 12:15आपका समर्पण? ये शिकायत कहाँ पड़ी थी जो उभर के
- 12:22बाहर आ गए? गहरे तनों के भीतर ये शिकायत भी
- 12:29पड़ी थी समर्पणों पर से थोप लिया था।
- 12:36जैसे मैं अक्सर कहा करता हूँ कि गोबर के ऊपर सेंट तुम्हारा समर्पण
- 12:41बिलकुल ऐसा है तुम्हारा प्रेम भी बिलकुल ऐसा है तुम्हारा वैराग्य
- 12:49भी बिलकुल ऐसा है। वैराग्य हो नहीं पाता।
- 12:58प्रेम हो नहीं पाता, समर्पण हो नहीं पाता और तुम सोच लेते हो कि
- 13:03समर्पण हो गया क्योंकि तुमने कर दिया प्रेम हो गया क्योंकि तुमने
- 13:11प्रेम कर लिया उसे। बैराग्य हो गया बैराग्य आ गया
- 13:19क्योंकि मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता नहीं, इन्हीं गलत धारणाओं में तुम
- 13:30पैदा हुए हो और इन्हीं गलत धारणाओं को लेकर।
- 13:36तुम विदा हो जाओगे, संसार से ना समर्पण घटित होगा, ना वैराग्य
- 13:41घटित होगा, ना प्रेम घटित होगा, फिर कबीर जैसे लोग पागल हैं क्या
- 13:50जो प्रेम की इतनी कीमत बताते हैं? प्रेम ना बाड़ी उपजे प्रेम ना
- 13:55हार्ट बेका है राजा पर जा जहरूचा शीश दे ले जाए।
- 14:00कितनी बड़ी कीमत तुम्हारे लिए प्रेमी के लिए कोई बड़ी कीमत नहीं
- 14:09है। प्रेमी तो कहता है कि अगर शहीद
- 14:19होना प्रेम है तो मैं उस शहीदी को पाना चाहता हूँ।
- 14:27शीष देना प्रेम है तो मैं वो शीष देना चाहता हूँ।
- 14:36मैं मिटना चाहता हूँ, प्रेम गली अति सांकरीता में दो न समाए।
- 14:43अगर मेरे अहंकार के मिटने से प्रेम पैदा हो जाएगा तो मैं उसे
- 14:48मिटा देना चाहता हूँ। क्यों?
- 14:50क्योंकि वो अहंकार से त्रसित होता है, सताया हुआ होता है अहंकार से,
- 14:59इसलिए वो प्रेम को पाने की चाहत में अपना सिर बलिदान कर देगा।
- 15:05यही तो हुआ करता है लैला मजनू के और क्या हुआ करता है वो काली की
- 15:09रोटी लड़की? इसके प्रतीक ईश्वर ने प्रेम
- 15:14प्रदान किया उमड़ा भीतर से कृपा हुई, उसका प्रसाद बरसा और सुंदर
- 15:23वंजनों को काली लैला से प्रेम हो गया।
- 15:28काली कलूटी बेडबी। लेकिन प्रेम हो गया तो हो गया ये
- 15:33कोई करनी जैसी चीज़ थोड़ी है। हम बहुत सी जोड़ियों को देख के कह
- 15:41देते हैं अरे, डूबो तो कहाँ डूबो अगर प्रेम सच्चा है तो जहाँ तुम
- 15:50डूब गए? बस वो ही किनारा जहाँ डूब गए वो
- 15:58ही किनारा किनारे पे तो तुम जब लग जाओ तो समित हो के बच गए, लेकिन
- 16:04यहाँ तो किनारा डूबने का नाम है, जब डूबे तब किनारा उल्टी बात है
- 16:11अध्यात्म में। असल में जो भी बातें आपको बताई
- 16:15जाती हैं वो आपको लगेंगी उलटे लेकिन सही तो वो ही हुआ करती।
- 16:23द्रौपदी ने पूछा, कृष्ण सर के प्रभु?
- 16:34मैंने पुकारा आपने इतनी देर क्यों कर दी?
- 16:41आते आते इतनी देर क्यों लगा दी? भगवान क्या मेरे से गलती हुई?
- 16:54क्यों देर लगाई? कृष्ण कहते नहीं द्रौपदी, मैंने
- 17:03देर नहीं लगाई, मैं कभी देर लगाया भी नहीं करता।
- 17:15देरी तुम्हारे पुकारने में हुई। मेरे आने में तो बिल्कुल भी देर
- 17:19ना हो। अक्सर मुझे लोग कहते हैं केश्वर
- 17:28के घर देर है अंधेर नहीं। गलत कहता है।
- 17:38एक शब्द है अंग्रेजी में जस्टिस डेलेट जस्टिस डे नाइट देर से मिला
- 17:46होना अन्याय हुआ करता है। इसलिए आपके कोर्टों कचहरी से जो
- 17:51न्याय मिला करता है वो अन्याय से ज्यादा नहीं हुआ करता।
- 17:55अन्याय ही हुआ करता है 15 साल ठोकरे खाके टक्करें मारकर
- 18:03न्यायालय को अगर न्याय मिला वो भी न्याय नहीं होता, फैसला होता है।
- 18:09तो क्या खाक मिला? लेकिन ईश्वर के घर ना तो देर होती
- 18:16है, ना अन्याय होता है। ईश्वर के घर तत्व के क्षण न्याय
- 18:22मिला करता है। वो ईश्वर विगाहे का जो आपको
- 18:35परिणाम दे रही थी, दे नहीं इधर तुम पंखे का बटन दबाते हो।
- 18:47उधर पंखा चलना शुरू नहीं हो जाता। जैसे ही कारण को आपने दबाया कारण
- 18:54होना शुरू कारण को दबाया कार्य होना शुरू हो गया।
- 18:59एक क्षण की भी देरी ना की इधर से बटन उधर से पंखा शुरू।
- 19:06ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं ये गलत है अंधेर तो है ही नहीं, देर
- 19:13भी नहीं तब तो किशन उसका फल मिलता है।
- 19:21आपने कभी कैलकुलेटर के ऊपर देखा? आप हिंसाओं को जोड़तें हैं?
- 19:28कुछ? डिजिट्स आप लगा देते हैं और जैसे
- 19:32ही आप इस इक्वल टु बराबर का बटन प्रेस करते हैं, तत्क क्षण उसका
- 19:40उत्तर आ जाता है। उसने देर लगाई नहीं।
- 19:45जैसे ही आपका पूछना बंद, उसका जवाब सामने।
- 19:49ये लीजिए जवाब हाँ, ये बात अलग है।
- 19:54उस प्रोसेसर के अंदर थोड़ी सी देर अवश्य हो जाती है।
- 20:01बीज बोया तत क्षण फलीभूत नहीं होगा।
- 20:04उसमें बहुत सी प्रोसेसेस। एंटायरली होंगी एंटायरली घटित
- 20:12होंगी प्रोसेसेस भीतर भीतर चलेगा सारा ये प्रोसेसर और 1 दिन
- 20:20फूटेगा, खौल बीज का निकलेगा अंकुर और वो अंकुर बड़ा हो के।
- 20:27पेड़ और फिर पेड़ से फल लेकिन ऐसा मत समझ लेना कि फल देरी से आया
- 20:34नहीं, नहीं नहीं, फल देरी से नहीं आया।
- 20:38फल थ्रू प्रॉपर प्रोसेसर आया। आफ्टर फुल प्रोसेसिंग।
- 20:45लेकिन वो फल के आने की घटना थी जो कि शुरू तभी से होगी जब से बीज
- 20:52बोया गया। लेकिन ये प्रोसेसिंग में जो देरी
- 20:58हुई उसको आप देरी नहीं कह सकते। ये तो एक।
- 21:05प्रोसेसिंग का वे है फल तक आने का।
- 21:10लेकिन शुरू तो तभी से हो गया जब से बीज होया तभी से उसका फल
- 21:18प्रस्फुटित होना शुरू हो गया और अंतिम प्रस्फुटित हुआ।
- 21:24जब फल गिर गया, पूछा द्रौपदी ने का प्रभु देरी क्यों हो गई?
- 21:38आने में कृष्ण बोले नहीं, कृष्णा नहीं द्रौपदी।
- 21:46नहीं पांच चाली, मैं देरी नहीं की, देरी तुमने पुकारने में की।
- 21:55मेरे आने में तो क्षणिक देरी भी नहीं हुई।
- 21:59मैं तो एक क्षण भी न रुका। जैसे ही तुमने पुकारा, मैं आ गया।
- 22:08जैसे ही तुमने कहा वैसे ही मैं पहुंचा, लेकिन द्रपदी समझ नहीं
- 22:23सके कैसे प्रभु? कृष्ण बोले सबसे पहले तुम्हे मान
- 22:37था अपने पतियों के ऊपर, तुमने देखा युधिष्ठिर की तरफ लेकिन
- 22:43क्योंकि युधिष्ठिर गुलाम थे युधिष्ठिर ने।
- 22:47तुम्हें देख कर गर्दन नीचे कर ली, भीम की तरफ देखा उसने भी गर्दन
- 22:51नीचे कर ली अर्जुन ने सहदेव ने, नकुल ने सभी की तरफ तुमने इस
- 23:01भावना से देखा कि शायद ये बचा लेंगे मुझे।
- 23:06इस अपेक्षा से तुमने उनकी तरफ देखा कि शायद तुम्हें बचा लेंगे,
- 23:10लेकिन उन्होंने क्योंकि खुद को हार दिया था इसलिए तुम्हें बचाने
- 23:15में असमर्थ थे। उन्होंने तुम्हें देखकर अपनी
- 23:19गर्दनें झुका लीं। इसका अर्थ था कि वे तुम्हें बचा
- 23:23ना सकेंगे। फिर तुम्हें भरोसा था बेशम के टमा
- 23:35में कि ये तो संत है निष्पक्ष, निस्वार्थ?
- 23:44हस्तिनापुर की सेवा में संलग्न वचनबद्ध महारथी महाबलवान सबसे
- 23:51बड़ा उसकी तरफ तुमने बहुत ही उत्कंठा से देखा, ये तो मुझे बजा
- 24:01ही लेंगे। लेकिन अफसोस उसने भी बहुत दैनीय
- 24:10अवस्था में अपनी गर्दन जुगाली फिर देखा।
- 24:17द्रोणाचार्य ओह महाबलिशाली जो सभी का गुरु था।
- 24:23जिसने सभी को शस्त्र विद्या में प्रवीण किया था, शस्त्र और शस्त्र
- 24:28दोनों विद्याओं में प्रवीण किया था उसकी तरफ देखा तुमने बहुत ही
- 24:34उत्कंठित निगाहों से, बहुत ही भरोसे की निगाहों से।
- 24:40लेकिन उन्होंने भी गर्द नीचे कर लिया।
- 24:44फिर तुमने देखा था तिशरी की तरफ धृतराष्ट्र की तरफ के लिए तो पिता
- 24:49है, अंधा है, लेकिन पिता है, तुमने आवाज लगाई कि देखिए आपकी
- 25:05कुल वधू। सारे बाजार नग्न हो रही है लेकिन
- 25:14उसने भी आँखें तो बंद ही थी लेकिन गर्दन झुका ली।
- 25:25उसके ऊपर भरोसा तो उसमें टूटता गया सारी बैठी हुई सभा की तरफ
- 25:35तुमने देखा भरोसे की दृष्टि से वेदुर की तरफ देखा लाचार सभी
- 25:42लाचार। पाचु पति लाचार, भीष्मपिता लाचार,
- 25:51तरोणाचार, लाचार, धृतराष्ट्र, लाचार।
- 26:03लाचार सभी की तरफ तुम्हारी भरोसे की निगाहें टूट गई।
- 26:17कृष्णा तो तुमने मुझे बुलाया, तुमने मुझे पुकारा।
- 26:30और जब तुम थक गई, कृष्णा। तुम टूट गई, तुम हार गई तुम्हारे
- 26:39सारे साहस तुम्हारे सारे हौसले छीन हो गए, तो तुमने अंत में मुझे
- 26:45पुकारा तुम कहाँ छिपे भगवान करो मत देरी तुम कहाँ छिपे भगवान।
- 26:57करो मत देरी दुखहारो द्वारका नाथ शरण में तेरे दुखहारो द्वारका नाथ
- 27:10शरण में तेरे तुम कहाँ छिपे भगवान?
- 27:15लाज गई मेरी तुम कहाँ छिपे हो भगवान लाज गई मेरी दुख हरो द्वार
- 27:25का नाथ शरण मैं तेरे द्रौपदी तब समर्पण हुआ।
- 27:34उससे पहले समर्पण कहा था तो दी मुझे बताओ तो उससे पहले समर्पण
- 27:40नहीं था मुझपे, उससे पहले तुम्हें बल दिखता था अपने पत्तियों का,
- 27:47भीष्म पदाना का, द्रोणाचार्य का, धृतराष्ट्र का विद्रुर का बल
- 27:51दिखता था। तुमने मुझे पुकारा ही कहा, और
- 27:55जैसे ही तुमने कहा कि तुम कहाँ छिप गए कहाँ छिपना होता है मैं तो
- 28:00तुम्हारे पास ही हूँ कृष्णा तुम कहाँ छिपे भगवान करो मत देरी लाज
- 28:11गई मेरी? तो कहर का अनाथ, शरण में तेरी और
- 28:22जैसे ही तुमने समर्पण किया। तत क्षण में आगया ध्रुव जी और
- 28:37मैंने तुम्हारी तत क्षण रक्षा की, तुम्हारा चीर बढ़ाया, थक गया
- 28:45दुशासन खेंच खेंच के उसाने को। लेकिन वो थक के गिर पड़ा।
- 28:54दुश्मन गिर गया हार के क्यों? क्योंकि समर्पण हो गया था उससे
- 29:01पहले तो तुम्हें औरों के बल पे भरोसा था द्रोप दे तुम्हें मेरे
- 29:08बल पे भरोसा कब था? जैसे ही तुमने मेरे बल पे भरोसा
- 29:14किया, मैं दतक क्षण उपस्थित हुआ। शब्द वैसे नहीं आया करते, बहुत
- 29:25प्रगाढ़। लाचारी की अवस्था में आया करते
- 29:30हैं जो उदुध पावे है सोई पलिका तुम ऐसे ही बोल दिया करते हो
- 29:36तुम्हें ऐसे ही समझा दिया करते हैं जे संत लोग बहुत दीनदृद
- 29:43अवस्था से आए हुए शब्द हैं जो उदु पावे।
- 29:48इतना आसान है क्या कहना बहुत मुश्किल होता है।
- 29:55बिल्कुल अंत में जब तुम हृदय विदीरण करण किए बैठे होते हो तब
- 30:05मेरी याद आती है। तब मुझे पुकारा तुमने द्रोपते और
- 30:10मैं इतना क्षण आ गया मैंने तनिक भी तेरी ना की मैंने तुम्हारी
- 30:21रक्षा की द्रोपदी लेकिन मैंने देरी नहीं की तुमने पुकारना।
- 30:30और मैं आ गया मैंने तुम्हे दृश्य जनों से बचाया लेकिन याद रख
- 30:41द्रोपदी मैंने धेर नहीं करी, तुमने पुकारने में देरी करी,
- 30:49मैंने आने में देरी नहीं। ओके मैं तो मैं तो की क्षण आ गया
- 30:54द्रौपदी तुम्हें पुकार और मैं आ गया पुकार होनी चाहिए, समर्पण
- 31:01होना चाहिए, समर्पण किया नहीं जाना चाहिए और समर्पण तुम्हारा
- 31:06किया समर्पण होगा भी नहीं। झूठा होगा, उस पर अभी बल बाकी
- 31:13होगा। तुम्हारे भीतर लड़ने का साहस
- 31:15होगा। अभी अभी बचाव के साधन होंगे।
- 31:18तुम्हारे पास अभी तुम बिलकुल निर्बल नहीं हुए होंगे।
- 31:24जब निर्बल हो जाओगे, परिपूर्ण असहाय अवस्था में आ जाओगे तब मुझे
- 31:28पुकारोगे और तभी समर्पण घटित होगा, वो होगा सम्पूर्ण समर्पण
- 31:35तुम्हारे अंतरतम की। अंतरिम अवस्था से आया हुआ समर्पण
- 31:43वो पुकार जो तुमने असहाय अवस्था में की होगी और मैं ततक्षण आ
- 31:50जाऊंगा द्रोपदी मैं कक्षण की तेरी भी न लगा पाऊंगा तुमने पूछा।
- 32:00कि क्या सभी को छोड़ चढ़ के समर्पण कर देना चाहिए।
- 32:06बड़ी हैरानी की बात है कि इन मूड होने तुम्हें सिखाई है ये बात
- 32:15समर्पण किया जा सकता है। समर्पण हो जाएगा और जीस दिन
- 32:21समर्पण हो जाएगा। तुम्हारा रोवा रोवा बोलेंगे कि
- 32:25हाँ समर्पण हो गया अभी तो तुमने छोटे समर्पण का रखे हैं तालियां
- 32:30बजाये छोड़ते हो, बड़े बड़े घड़ियाल बजा लिया करते हो, शंख
- 32:34पुष्प वर्षा कर दिया करते हो, माथा टेक दिया करते हो, समर्पण हो
- 32:38जाया करता है। द्रौपदी ने कहा माथा टेका कहाँ
- 32:44फूल बरसाए कहाँ शंकुर घड़ियाल बजाए कहाँ घंटियां कड़कईं
- 32:49उन्होंने सिर्फ पुकारें पुकार के कहाँ हो भगवान?
- 33:01आ जाओ बस पुकार विदीर्ण हृदय से की हुई पुकार।
- 33:15मुझे उपस्थित होने के लिए विवश कर देगी।
- 33:17द्रौपदी और तुम्हें उसी विधि अवस्था में जैसे ही मुझे पुकारना
- 33:24में ततक क्षण पहुँच गया, मैंने क्षण भी तेरी नाक ये होता है
- 33:33समर्पण। उससे पहले अगर तुमने समर्पण किया
- 33:37और वो नहीं आया तो समझ लेना के समर्पण में कमी उसके आने में कोई
- 33:42कमी नहीं, फिर तुम वो लाना देते रहोगे लेकिन वो लाना भी गलत होगा।
- 33:49शिकायत भी गलत होगी। समर्पण नहीं किया।
- 33:57तुम्हारी शिकायतें सभी ऐसी ही हुआ करती हैं जो बल रख कर बोला करती
- 34:03हैं। तुम्हारी पुकार रिज़र्व फोर्स
- 34:06होते हैं, हमारे वो अभी बचे हुए होते हैं।
- 34:11उनके रहते तुम पुकारना हो नहीं हुआ समर्पण, समर्पण ये समर्पण है
- 34:17कि नहीं समर्पण उस अवस्था का नाम है जहाँ तुम पत्ता पत्ता हार जाते
- 34:24हो और गिर जाया करते हो समर्पण हुआ करता है।
- 34:31समर्पण किया नहीं जाता और आपने पूछा कि क्या समर्पण कर देना
- 34:37चाहिए? हद हो गयी समर्पण तुम कर सकते हो
- 34:43तुम्हारे हाथ में नहीं है समर्पण। जीस घड़ी तुम बिल्कुल वितरण हृदय
- 34:50से ग्रसित चुभे हुए कांटों से तुम्हारा हृदय विछिन्न हो जाएगा
- 34:55वितरण हो जाएगा छेद जाएगा तुम्हारा रोवा रोवा तो भीतर से
- 34:59पुकार उठेगी के लाज गई मेरी दुख हरो द्वारका अनाथ शरण में देरी।
- 35:10ये क्षण समर्पण है, ये है समर्पण जो द्रौपदी ने किया किया नहीं
- 35:17हुआ, उससे पहले तो किया। पांडवों को अपने पत्थियों को
- 35:25समर्पण किया, कोई प्रतिउत्तर नहीं आया, भीषण पिता माँ को किया, कोई
- 35:31प्रतिउत्तर नहीं आया, द्रोणाचार्य भी मौके रह गए, धृतराष्ट्र भी मुख
- 35:37बैठे रहे, विद्रुर भी मुख रह गए, क्या करें सभी बेबस, लाचार?
- 35:43तुम भी लाचार वो भी लाचार कोई जवाब ना आया द्रोपदी जैसे ही
- 35:52तुमने मुझे पुकारा कि कहाँ छिप गए हो कहीं नहीं छिपा द्रोपदी
- 35:59तुम्हारी पास ही तो बैठ। जैसे ही तुमने पुकारा उसी क्षण
- 36:07में हाजिर हो तुम पुकारो, विदीर्ण हृदय से पुकारो, असहाय हो के
- 36:18पुकारो। निरावलंब होके पुकारो।
- 36:27बेसहारा होके पुकारो, बेसहारा हो जाओ इसीलिए मैं कहता हूँ और
- 36:33अविलंबन रहित हो जाओ अभी तो तुम्हारे बहुत से सहारे शेष हैं।
- 36:42और तुम पुकारना हो मत पुकारो, ऐसी पुकार पुकार होती ही नहीं।
- 36:49व्यर्थ में समय बेकार मत करो ये पुकार पुकार ही नहीं है।
- 36:56ये वक्त को व्यर्थ करने का एक तरीका है महज जो तुम्हारी।
- 37:01संत तुम्हे सीखा रहे हैं या तो पुकारो ही मत पुकारो तो ऐसे
- 37:09पुकारो जैसे द्रोपदी ने पुकारा था सभी प्रकार के अवलंबनों को चेक कर
- 37:15लिया उसने और पाया कि मैं निराश हूँ हो गई हूँ।
- 37:20और जब उसने देखा कि मैं निराश्रित हूँ, तब उसने अपने को पुकारा कहे
- 37:27भगवान तुम कहाँ हो, आजा मैं तो यही खड़ा था द्रौपदी मैं बात जो
- 37:36रहा था कि कब तुम्हारे सहारे घर जाए?
- 37:41कब तुम बेसहारा हो जाओ? कब तुम अवलंबन रहित हो जाओ, लेकिन
- 37:50तुम तो स्वावलंबी भरने की चेष्टा कर रहे थे।
- 37:57जब कोई तुम्हारा सहारा न बना तुम बिलकुल असहाय अवस्था में आकर चीख
- 38:03के मुझे पुकारने लगी तो मैं कहीं दूर नहीं था।
- 38:07डोपती में आ गया समर्पण हो तो ऐसा।
- 38:17समृपण हुआ करता है पत्ता पत्ता हार जाते हो परिश्रम करके तो
- 38:22विश्राम हुआ करता है। तुमने देखा कि परिश्रम करने की भी
- 38:27एक हद होती है जब तुम इतना परिश्रम करते रहते हो, परिश्रम
- 38:32करते रहते हो और थक जाते हो। तब तुम्हें विश्राम करना नहीं
- 38:36पड़ता, तुम गिर ही पड़ते हो, सूखे पत्ते की तरह मैं उसे विश्राम
- 38:42कहता हूँ, विश्राम करो मत, विश्राम होने की अवस्था में आ
- 38:45जाओ। यद्यपि शब्द थोड़े से गहरे हैं,
- 38:51लेकिन शांति से सुनोगे तो आपके भीतर उतर जाएंगे।
- 39:01इतना परिश्रम करो देखो तुम्हारी ताकत क्या है, मैं नहीं कहता कि
- 39:07पहले से ही तुम समर्पण कर दो, वो होगा भी नहीं।
- 39:11नकली समर्पण होगा और तुम अपने मन में माने जाओगे कि मैंने तो बहुत
- 39:15समर्पण कर दिया। ईश्वर कहीं पता नहीं कहाँ छिप के
- 39:18बैठा। ऐसे ही तो नास्तिक पैदा होते हैं
- 39:24जो परिश्रम ही नहीं करते और समर्पण कर दिया करते नहीं थक जाओ।
- 39:39अपने बलबूते के ऊपर प्रयास करके थक जाओ, देखो तो तुम करवातें हो,
- 39:47ये सभी तुम्हारी मोटिवेशन से पीछे द्रौपदी से उलटे द्रौपदी का
- 39:57समर्पण। और तुम्हारे ये मोटिवेशनल
- 40:00प्रेरणात्मक स्पीचेस बिलकुल उलटे जैसे एक आदमी शीर शासन के बल खड़ा
- 40:09हो मत सुनना इनको अगर तुम्हें कोई मोटिवेशनल स्पीचेस द्वारा।
- 40:16तुम्हें समझाने की चेष्टा करते हो तो बहिष्कार कर देना उनको अगर तुम
- 40:20ईश्वर की राह पे सच्चे आनंद की तलाश में चले हो तो मोटिवेशन के
- 40:25पीछे से सावधान। ये सिर्फ एक गल घुस के बोतल दे
- 40:38रहे हैं। लुफ्त में पहुँच भी जाओगे तो क्या
- 40:42होगा? थोड़ा सा और ज्यादा भटकल हो गए।
- 40:48बस भटकने की वक्त बढ़ाए जाते हैं ये भटकने का वक्त।
- 40:55लंबा किये जाते हैं ये तुम्हारी जितनी भी प्रेरणात्मक सभी तुम्हें
- 41:06भटकाने की राह को लंबा किये देती है।
- 41:15और जीता कौन द्रौपदी जयते। मोटिवेशन नहीं था वो सिर्फ समर्पण
- 41:26था, झुक गई उसके चरणों में जो तू दुपा है जैसे नानक कहते, आपने तो
- 41:36सिर्फ शब्द सुन लिए और उसके पीछे चल गई कि जैसे बस आज से समर्पण हो
- 41:40गया। जो कुछ करेगा तू ही करेगा नहीं
- 41:43नहीं नहीं गलत हो तुम तुम समझोगे कि मैंने ईश्वर पे छोड़ दिया,
- 41:49लेकिन ईश्वर पे छोड़ नहीं दिया तुमने अभी बहुत सी अवलंबन बाकी
- 41:55है, जब पूरे कश लोगे। भाग भाग के भाग भाग के भाग भाग के
- 42:02तुम्हारी सभी सहारे टूट जाएंगे। बिखर जाएंगे तब समर्पण हो जाएगा
- 42:15समर्पण होने की फिक्र मत करना। तुम धकने की फिक्र करो और
- 42:22तुम्हारे सभी समर्पण किए हुए झूठे होते हैं।
- 42:26कृष्ण बोलते हैं, लेकिन शब्दों में क्या करें?
- 42:32शब्दों की एक सीमा है, कृष्ण कहते हैं।
- 42:35सर्वधर्माण प्रत्यक्ष माह में कम शरणम पर अहम तम सर्वपाप्य भवमुख
- 42:42से श्यामी महाशूचक कहते हैं, लेकिन शब्दों की लिमिट के भीतर
- 42:48यही तो कुछ कह पाएंगे और इससे ज्यादा कुछ कहा भी नहीं जा सकता।
- 42:52शब्दों से इशारे मात्र हो जाया करते हैं।
- 42:55लेकिन अवस्थाएं नहीं आया करती। शब्दों से अवस्थाएं नहीं आया करती
- 43:03शब्दों से इशारे मात्र हुआ करते हैं अवस्थाएं तो तुम्हें पैदा
- 43:07करनी होंगी, भीतर से गिर के सूखे पत्ते की तरह हरे पत्ते की तरह
- 43:13नहीं तुम गिर ही ना पाओगे। तुम खेले खिले पत्तों की तरह
- 43:18समर्पण कर देते हो, मुरझाए हुए पत्ते की तरह गिर के समर्पण होता
- 43:23नहीं है, इन बातों को ठीक से समझ लेना समर्पण इतना आसान नहीं होता
- 43:28जितना तुम समझते हो समर्पण कर दे मुझसे क्या पूछते हो?
- 43:34इस दिन समर्पण हो जाएगा उस दिन पता चल जाएगा तुम पहले तो थको
- 43:40अपने सहारों को गिरने दो, अपने सहारों को तुम प्रयोग करो सहारों
- 43:46को क्या बचा पाएंगे? नहीं बचा पाए।
- 43:57इसलिए जैसे जैसे व्यक्ति बूढ़ा हुआ जाता है उस समर्पण की ओर
- 44:01अग्रसर होता जाता है। क्यों जवानी तुम्हें समर्पण करने
- 44:06में बाधा डालती है? बुढ़ापा तुम्हें समर्पण करने में
- 44:11राह प्रशस्त करता है। टपेंगे हाथ तुम संभाल न पाओगे,
- 44:18ब्लड प्रेशर होगा, हार्ट वेटिंग बढ़ेगी, तुम रोक न पाओगे, गड्ढा न
- 44:22पाओगे थर्राओगे पर तू सामने खड़े होगे।
- 44:32तो तुम्हें पता चलेगा कि जो मैंने कमाया सहारे के लिए वो सहारा दे
- 44:41ना पाए जिनको तुमने पाला पोसा अपना खून देकर हमने ही अपने खून
- 44:49से बक्सा गोलों को रंग। हमने ही अपने खून से बक्सा, गुरों
- 44:55को रंग हम ही शरीर के जश्न से बाहर आ न हो सके आखिर में तुम
- 45:00पाओगे हम ही शरीर के जश्न से बाहर आ न हो सके।
- 45:03हम ही बाहर के जश्न में शरीर न हो सके और हमने ही इन फूलों को अपने
- 45:08खून का रंग दे के सींचा था। हमने ही अपने खून से बक्सा गोलों
- 45:13को रंग हम ही शरीर के जश्न से बाहर न हो सके, हम ही बाहरों का
- 45:17जश्न न मना सकें इकट्ठे किए जाओ तिजोरियो क्या होने को है भर दो
- 45:24बैंक बैंकरों में पड़ा हुआ बैंकरों का है तुम्हारा।
- 45:34उलाद को जन्म दिया, बाला पोसा पढ़ाया लिखवाना बड़े खुश हुए बेटा
- 45:40आईएएस बेटा मजिस्ट्रेट लग गया, जज लग गया, सुप्रीम कोर्ट का पीएम बन
- 45:47गया, सीएम बन गया लेकिन क्या किया?
- 45:54बहुत महत्त्व अपेक्षाएं थी तुम्हें, हमने ही अपने खून से
- 46:03बक्सा गुल लेकिन क्या होगा? जब मरोगे, वो ही अग्नि देंगे
- 46:16जिनको तुमने अग्नि से बचाया, जिनके शरीर पे अग्नि के कारण फाले
- 46:22ना होने दिए वो ही तुम्हें आपके भीतर डाल देंगे, पटक देंगे हमारे
- 46:27हिंदू में एक बहुत। सुंदर प्रथा है, प्रथा नहीं।
- 46:33इसके पीछे कारण था पौराणिक कारण था जब मुर्दे को जलाया जाता है तो
- 46:45उसके खून को। उसके बच्चे को उसके अंश को कपाल
- 46:52क्रिया होती है, उसकी खोपड़ी के ऊपर चोट करनी होती है, एक बाँस के
- 46:59द्वारा उसका सिर फोड़ना होता है, उसको कपाल क्रिया कहते हैं।
- 47:07कपाल क्रिया का अर्थ क्या है तुम्हें अपने ही जिनको तुमने पाला
- 47:13था, तुम देखते हो तुम शरीर से बाहर होते हो, उस वक्त बिल्कुल
- 47:16अपने शरीर से बाहर होते हो तुम अपने ही शरीर को अभी मोह टूटा
- 47:20नहीं होता तुम्हारा और तुमको तुम्हारे ही बच्चे।
- 47:26आदमी डाल देते है तुम्हारे ये प्रिय तुम्हे आदमी डाल देते है
- 47:30तुम्हे बहुत दुख होगा की इनके लिए मैंने ज़िन्दगी खराब की फिर
- 47:37तुम्हे डंडे से तुम्हारा सिर फोड़ा जाता है की तुम्हारी?
- 47:45समझा जाए तुम्हें अगले जन्म में कि मैंने जिन के लिए ये किया, आज
- 47:49क्या कर रहे हैं? तुम्हारे साथ क्या दुर्गति कर रहे
- 47:52हैं मुझे एक व्यक्ति कहने लगा कि अपने तो अपने ही होते हैं, अगर
- 47:56मारते हैं तो छांव में गिराते हैं।
- 47:59मैंने कहा जिसने मार ही दिया वो छांव में गिराए या धूप में गिराए
- 48:03आखिर में तो? चीता में ही गिरा देगा।
- 48:07फिर अपना क्या हुआ अपना तो वो जो मारे ही ना तुम कहते हो कि अपने
- 48:15तो अपने ही होते हैं, अगर मार भी देंगे तो छाया में गिराएंगे, धूप
- 48:23में नहीं गिराएंगे। अरे भाई अपने क्या हुए इन्होंने
- 48:27मार ही दिया अपने तो वो होंगे जो मारेंगे ही नहीं, जो हमें बचाएंगे
- 48:35और फिर मरा हुआ व्यक्ति तो छाया में हूँ के धूप में हूँ आखिर में
- 48:39तुम अग्नि में डाल देते हो। वो ही जिनको तुमने गर्म हवा ना लग
- 48:49जाए, गर्म झोंका ना लग जाए, उसे बचाया वो तुम्हें आग में पटक
- 48:54देंगे और इतना ही नहीं। कपाल क्रियाकार्थी यही था कि वो
- 48:58बांस तुम्हारी खोपड़ी में मारेंगे और तोड़ देंगे उसको और तुम खड़े
- 49:03खड़े देखोगे, तुम्हारा मोह भंग हो जाएगा।
- 49:06अरे इनके लिए ये क्या दुर्गति कर रहे है मेरी अभी तक तुम्हारा उस
- 49:12समृद्ध देह के साथ। वो बना होगा।
- 49:19हमारी हिंदू संस्कृति में बड़ी सुंदर पौराणिक व्यवस्थाएँ दे रखी
- 49:23हैं मुसलमानों में, इस्लाम धर्म में।
- 49:35और इसाई धर्म में मुर्दो को गढ़ाया जाता है।
- 49:39धरती के भीतर इसीलिए मुस्लिम धर्म के और इसाई धर्म के लोग बहुत
- 49:47तेरें जब आप फॉर्थ डायमेंशन में झाकोगे यहाँ के।
- 49:53भटकती हुई रूह फिर रही तो आप ज्यादातर ईसाइयों को और इस्लाम
- 49:57धर्म के मुसलमानों को भावोगे। खैर, आपने तो अभी फोर्थ डाइमेंशन
- 50:06में प्रवेश नहीं किया है, जहाँ भूत, प्रेत आदि का निवास है।
- 50:12लेकिन जो जाग गया है वो जानता है कि हिंदू बहुत कम मिलेंगे।
- 50:20क्यों? क्योंकि जिसके साथ मुँह है वो अभी
- 50:26जिंदा है अभी पड़ा है अवशेष पड़ा है हमारे हिंदुओं में बड़ी समझ
- 50:31थी। बड़ी गहरी समझ थी।
- 50:33पहले तो उन्होंने चिंता के भीतर डाला उसका मोह भंग हुआ बच्चों के
- 50:37साथ फिर उसकी खोपड़ी तोड़ दी। मोह हुआ खत्म बच्चों के साथ फिर
- 50:44फिर जो बची खुशी हड्डियों थी ना वो भी जाके पटक दी।
- 50:47गंगा में चल खत्म। फिर 12 दिनों के बाद विदा कर
- 50:57दिया। भूल गए चलो खत्म लेकिन मुसलमानों
- 51:03ने वो मुँह का कारण ही बचा के रख दिया।
- 51:08अब आत्मा उसके आसपास घूमती रहेंगी कि मेरा शरीर, मेरा शरीर, मेरा
- 51:13शरीर नया जन्म ले ही नहीं पाएगा। तुमने उसका कारण अभी रख लिया
- 51:20संभाल के इसलिए हजारों सालों से। अपनी कब्रों के आस पास ऐसे लोग
- 51:30विराजमान भटकर वो प्रेत मात्र भूत प्रेत बनके अपने शरीर के अर्द
- 51:43गिर्द उनको भ्रम टूटा ही नहीं। इसलिए इस्लाम और ईसाईयत पुनर्जन्म
- 51:54में क्योंकि विश्वास नहीं करती इसलिए वो जल्दी जल्दी जन्म ले भी
- 51:59नहीं सकती। मुस्लिम धर्म के लोग जीतने भूत और
- 52:07प्रेत फोर्ट एंड एवेंसन में आपको मिलेंगे।
- 52:10इतने हिंदू नहीं मिलेंगे, सिख नहीं मिलेंगे।
- 52:14बड़ी समझदार कौम थी, बड़ी समझदार संस्कृति थी क्योंकि प्राचीनता
- 52:20में है। इसीलिए इन्होंने तत्व निकाल लिया
- 52:23था इस बात को कि मुर्दे को जितनी जल्दी हो सके जला दो बहुत कोशिश
- 52:31करके बिल्कुल जब तुम बचा ना सको उसको अच्छी तरह से डॉक्टर डिक्लेर
- 52:36कर दे कि इस डेड शी इस डेड। तो मैक्सिमम अगर आप रखना भी चाहो
- 52:46तो 72 घंटे तक आत्मा बसा सकती है। अगर वो स्वादिष्ट हो तो।
- 52:52लेकिन अगर आम व्यक्ति है जिसने कभी समाधि अवस्था का स्वाद ही
- 52:57नहीं चखा। उसको 4 घंटे के भीतर भीतर अग्नि
- 53:04ताकि उसका इस शरीर से इसको वो अपना होना मानता है, उसे मोह भंग
- 53:11हो जाए। अग्नि यात्रा पे चलने के लिए वो
- 53:13तैयार हो जाए, अगली यात्रा पे रवानगी की तैयारी कर ले।
- 53:18और आपके ऐसे ऐसे ऐसे कार्य देख के उसको आपसे गलानी होगी।
- 53:26आपके साथ मुँह टूटेगा कि ये मेरा बेटा, ये मेरी बेटी, ये मेरी धर्म
- 53:33पर। सबसे ज्यादा मुहूर्त है अपने शरीर
- 53:38के साथ और उसका मुद्दा ही खत्म कर देते हैं अग्नि में जला देते हैं
- 53:43उसकी हड्डियों उठाई पटक दी जाके, ये सब व्यवस्थाएँ थी, पौराणिक
- 53:50व्यवस्थाएँ थी आज गायब हो चुकी है।
- 53:51आज पता नहीं है किसी को जलाया क्यों जाता है, दफनाया क्यों जाता
- 53:55है? दफनाया इसलिए जाता है क्योंकि वो
- 53:57लोग मानते ही नहीं, अगला जन्म है बस सिर्फ मानते नहीं जानते हैं,
- 54:02ऐसा नहीं है जानता, कोई भी नहीं। अगर जानता होता तो दफन होते नहीं,
- 54:10सिर्फ ऐसे व्यक्ति को दफन किया जाना चाहिए।
- 54:15जो एनलाइटनमेंट को प्राप्त हो गया है क्यों?
- 54:18क्योंकि उसके शरीर के कणकण ने उस एनलाइटनमेंट की खुशबू अपने भीतर
- 54:26पिरोली है और मैंने पिछले वीडियो में सब स्टार ये बातें कही।
- 54:38उसके भीतर की हड्डियों में, उसके मांस की त्वचा में, उसके बालों
- 54:43में उसके शरीर के रोम रोम ने वो अमृत पी लिया है अलाइटेनमेंट का
- 54:51इसीलिए उसको दफन किया जाता था क्योंकि उसके रोम रोम से भीतर से।
- 54:57वो रेंज निकलती थी जो की एनलाइटनमेंट की रेंज है।
- 55:01उसके पास जब आप बैठोगे तो बहुत शांत हो जाओगे, क्योंकि आपको कारण
- 55:06भी ना पता लगेगा क्योंकि उसके शरीर के विसर से।
- 55:10वो रेंज निकल रही है और आपको प्रभावित कर रहे हैं।
- 55:13उसके भीतर शांति की वो रेंज सुनाई हुई है।
- 55:19वो आपको शांत कर जाएंगे अगर उसके पास आपने बैठने की चेष्टा की।
- 55:26बड़ी मशालों के ऊपर जाने का कुल मात्र यही कारण था।
- 55:30आप तो जने कने जो प्रेत बने हुए आसपास घूम रहे हैं उनको भी जाके
- 55:35आप माथा टेक रहे हो? आपको पता ही नहीं लेकिन ये
- 55:40व्यवस्था बनाई थी सिर्फ उन पुरुषों के लिए या स्त्रियों के
- 55:44लिए जो कि एनलाइटमेंट को प्राप्त हो चूके हैं।
- 55:49ताकि उनके शरीर के भीतर जो एनलाइटनमेंट के वक्त जो एनर्जी
- 55:53उसने पी ली है, वो विकीर्ण होगी, उसका आप लाभ उठा सको और फिर दूसरी
- 56:01भी बात थी कि शुद्ध आत्माएं उसके आसपास आती रहेंगी।
- 56:04उनको भी वो रेंज बहुत प्रिय है। शुद्ध आत्माएं उसके आस पास मंडरा
- 56:11रही होंगी और आपको एक फ़ॉर्मूला बता देता हूँ।
- 56:16मैं अगर कोई एनलाइटनमेंट व्यक्ति उसको जलाना मत, उसको दफन कर देना,
- 56:26उसके समाधि बना देना। इसीलिए हमारी परंपरा में ये
- 56:29समाधियों का प्रचलन चला था वो समझ गए थे लोग कि इस व्यक्ति के शरीर
- 56:37का मृत शरीर का भी ज्यादा से ज्यादा उपयोग कर लिया जाए।
- 56:42इसीलिए उन्होंने दफन कर दिया और भीतर से वो रेंज जब निकली।
- 56:48वो किसी दीवार का मोहताज नहीं होती है या रेंज दीवारों को चीर
- 56:52के बाहर आ जाती है। सूक्ष्म शरीर भी दीवारों को भीतर
- 57:00से क्रॉस कर दिया करता है तो ये तो अति सूक्ष्म है।
- 57:03जो रेंज उन्होंने पी है लाइटनमेंट के वक्त।
- 57:06बहुत सूक्ष्म है ये तुम्हारी समाधि की ईंटों से बाहर आ जाएंगी
- 57:10बिखरेंगी और जैसे ही आप उसके पास जाके बैठोगे, आपके मन को आनन्द से
- 57:16भरपूर कर देंगे, शांति से भर देंगे ये सुगंध से भर देंगे आप।
- 57:23यह था महत्त्व और उस सुगंध को लेने के लिए शुद्ध आत्माएं और कुछ
- 57:32ऐसी आत्माएं जो आनंद की क्लास में हैं वो आस पास बिखर जाएंगी।
- 57:37हर वक्त और जैसे ही आप उनको। माथा टेकने के लिए जाते हो, शीश
- 57:43नवाने के लिए जाते हो आप कोई ना कोई इच्छा तो रखे होते ही हो
- 57:49प्रगाढ़ता से, जिसके लिए आप दुखित हुआ करते हो दिन भर रात तो वो
- 57:54आपके मन के भीतर ही होंगे और ये आस पास फिरती हुई आत्माएं उसको
- 57:57भांप लेंगे के ये व्यक्ति जिसने माथा टेका है इसके।
- 58:01के भीतर क्या दुविधा है? क्या कष्ट क्लेश है जिसके कारण
- 58:05इसका चित्त दुखी है? वो आत्माएं जो आसपास मंडराती
- 58:11होंगी वो आपकी सहायता करने हेतु आपके साथ चल पड़ेंगी और आपके
- 58:16कार्य को सम्पूर्ण कर देंगे। ये था राज़ इन।
- 58:22मढ़ी, मशानों के ऊपर समाधियों के ऊपर माथा टेकने का सिर न माने का
- 58:28ये था राज़ वो व्यक्ति कुछ न कर पाएगा, वो तो गया दुख हो गया।
- 58:35लेकिन ये जो शुद्ध आत्माएं हैं जिन्होंने अभी शरीर धारण करना है।
- 58:40ये आपकी सहायता करने के लिए उतावली हैं।
- 58:43ये करुणावान है ये जैसे ही आप वहाँ जाके मस्तक निभाओगे, ये आपके
- 58:50दुख को देखेंगे और आपके दुख को दूर करने के उपाय ढूंढने शुरू कर
- 58:54देंगे। आपके साथ चल पड़ेंगे और आपको ये
- 58:57दुख मुक्त करके ही दम लेंगे। ये था कारण आपके दुख क्यों दूर
- 59:02होते हैं? ऐसे व्यक्ति की समाधि पर मस्त
- 59:06कणवाने से वह व्यक्ति कुछ नहीं करता है जो एनलाइटनमेंट को
- 59:10प्राप्त हो गया। वो तो ज्ञात रोहित हो गया इसलिए
- 59:16एनलाइटनमेंट व्यक्ति को? एलाइटन्ड व्यक्ति को कभी आग नहीं
- 59:24देनी चाहिए, उसको दफन करना चाहिए। वहाँ जाके आप समाध्यस्य हो भी
- 59:31सकते हो क्योंकि उसकी रेंज समाधि की अवस्था की उन रेंज को भी है वो
- 59:37आपको भी उस स्तर पे ले जा सकती है।
- 59:39अगर ध्यान करने का सबसे बढ़िया तरीका है तो हमारे पुराने
- 59:44शास्त्रों में तंत्रोप जो विधियों हैं उनमें लिखा है कि शमशान में
- 59:50जा के साधना करना उस शमशान में नहीं इस समादेश्य व्यक्ति की
- 59:57शमशान में। यहाँ ये समाधित व्यक्ति की मृत्यु
- 1:00:02देय पड़ी है वहाँ जाके अगर आप इन सिद्धियों को करोगे या इन मुक्त
- 1:00:11होने के क्रियाएं को करेंगे तो उनकी रेंज उसमें सहायता करेंगी।
- 1:00:16आपको मुक्त होने की दिशा। दिखाएंगे रास्ता, दिखाएंगे भटकी
- 1:00:23हुई रेंज आपको भटकाएंगे और शुद्ध परमात्मा तक पहुंची हुई रेंज आपको
- 1:00:27शुद्ध परमात्मा के दर्शन करवाएंगी, उसमें सहायता करेंगे
- 1:00:31विजेता कुलराज दफन करने का, संत पुरुष को और कुलराज।
- 1:00:37उसकी समाधि पर माथा टेकने का, सिर नवाने का सिर नवाकर, जो शुद्ध में
- 1:00:43उसके आसपास जो लोगों को जो व्यथित आत्माओं को सुखी करने के लिए
- 1:00:48प्रयासरत हैं वो आपके साथ हो लेंगे और आपके दुख को दूर कर
- 1:00:52लेंगे। इसलिए ऐसे व्यक्तियों की समाधि के
- 1:00:56ऊपर जाना मस्त कनवाना एक तो आपको शुद्ध रेंज मिलेंगी, आपका मन शांत
- 1:01:01हो जाएगा। ध्यान के उन रेंज को आप भी ग्रहण
- 1:01:04कर पाओगे और दूसरे जो वहाँ शुद्ध आत्माएं घूम फिर रही हैं वो आपके
- 1:01:09दुखों को। भौतिक दुखों को दूर करने में
- 1:01:15सहायता करेंगी और वो दूर कर ही देंगे।
- 1:01:20दो फायदे थे लेकिन ये आज एक भ्रांतियों को।
- 1:01:31कारण बन गया है। नास्तिकों के मन के अनुसार वो
- 1:01:37कहते हैं कि क्या मड़ियों मसानो पे मथेटिक नहीं नहीं ऐसा नहीं है।
- 1:01:43इसके पीछे कुछ कारण था लेकिन वो व्यक्ति बहुत कम होते हैं।
- 1:01:47ये कारण था। तो उन्होंने उन मड़ियों मसानों पर
- 1:01:52माथा टेकने के साथ साथ उन्होंने जो अच्छा काम था वो भी खत्म कर
- 1:01:58दिया। जो कोई किसी की खबर किसी की समाधि
- 1:02:05के भीतर। कुछ शुद्ध आत्मा दफन है वो लाभ से
- 1:02:09भी आपको वंचित? ये मड़ियों में सानों के ऊपर जाना
- 1:02:15बंद करो बहुत से लोग हैं एक व्यक्ति मैंने देखा वो रोज़ इन
- 1:02:21मड़ियों में सानों पे जाके पेशाब करके आया करता था विरोध स्वरूप।
- 1:02:26ये तो विरोध का कोई तरीका ना हुआ जब आप जानते ही नहीं हैं, किसी
- 1:02:30बात को करो, कोई फर्क नहीं पड़ता। पेशाब कर दोगे तो क्या?
- 1:02:37वो तो गया लेकिन ध्यान रखना अगर वो स्वादिष्ट व्यक्ति है तो उसके
- 1:02:43पास। उसके आसपास कुछ ऐसी आत्माएं घूमती
- 1:02:48फिरती रही होंगी वो आपका कुछ अनिष्ट भी कर सकती हैं।
- 1:02:52इसीलिए मैं प्रकाशनली आपको कह रहा हूँ कि ऐसा दुष्कर्म कर्म करने की
- 1:02:56चेष्टा मत करना नहीं पूजीना मत भूजो ना ही मस्तक नवाना।
- 1:03:04मत नवाओ अपने घर बैठे रहो आपको क्या कहती हैं ये समतियां कुछ
- 1:03:09नहीं कहती आपका क्या लेती हैं ये समतियां कुछ नहीं लेती हैं आप मत
- 1:03:15मानो बस बात खत्म कौन कहता है आपको अगर कोई कहता है तो कहता रह
- 1:03:22आप मानो मत। आप मानते क्यों हो?
- 1:03:26अगर आपको ये सारा रूढ़िवादिता लगती है तो आप मानना बंद कर दो
- 1:03:31सीधा सा फार्मूला है आप रिएक्शन क्यों करते हो और इतने भद्दे
- 1:03:36रिएक्शन क्यों करते हो? इससे आपको कोई फायदा ही नहीं है।
- 1:03:40आप लोगों को समझाओ। कि ये गर्व हैं प्रथाएँ ये
- 1:03:44कुप्रथाएँ ऐसा मत किया करो तो मैं तो कहता हूँ कि समाधि ही मत दो,
- 1:03:52आप चलाओ लेकिन क्योंकि उनके धर्मों में ऐसा ही विवरण है, वो
- 1:03:56तो ऐसा ही करेंगे। व्यवस्था तो हिंदू धर्म में सनातन
- 1:04:01में ये बनाई थी कि जो व्यक्ति एनलाइटन हो गया है सिर्फ वो ही
- 1:04:05दफन किया जाए। लेकिन क्या करें जब दो धर्म ऐसे
- 1:04:08पैदा हो गए जो कहते हैं कि दफन ही होंगे तो फिर वो तो दफन ही होंगे।
- 1:04:15तो फिर वो आदमी छिप गया जो सचमुच एनलाइटन था।
- 1:04:19जिसके ऊपर से के झुकाने का कुछ मतलब था, लेकिन जने करने की हर
- 1:04:29समाधि के ऊपर माथा टेकते जाओ, ये ठीक नहीं है।
- 1:04:32वहाँ से आपको कुछ मिलने वाला नहीं है, तो आपने पूछा है के समर्पण।
- 1:04:39कर देना चाहिए। समर्पण कर सकते हो तुम नहीं
- 1:04:43तुम्हारा किया समर्पण होगा कि नहीं जैसे तुम्हारा किया प्रेम
- 1:04:47नहीं होता तुम्हारा बनाया हुआ वैराग्य नहीं होता वैराग्य
- 1:04:53तुम्हारा वही होता है जो मैं अक्सर बहुत करता हूँ तुम वैराग्य
- 1:04:57से। मन एक बार आपका दुखित हो जाता है,
- 1:04:59मन ऊब हो जाता है तो आप समितियों के इसमें कुछ नहीं, लेकिन फिर
- 1:05:06आपको वही चीज़ सताने लग जाती है। एक बार भोगों के बाद जो आदमी शराब
- 1:05:14पीता है। सुबह उठ के क्या कहते हैं?
- 1:05:16कानों को हाथ लगाता है आगे से नहीं कस्मे खाते हैं आज से बांधता
- 1:05:21हूँ शाम को फिर जैसे ही सूरज ढला, उठ गया सब जो सोचा था सुबह सुबह
- 1:05:33सिर दुखेगा। तो ये कसम खायेगा क्या अब कभी न
- 1:05:36पीऊंगा शाम को फिर वही बात ते चलो कोई बात नहीं आज तू पी ले ऐसा
- 1:05:43वैराग्य नहीं होना चाहिए, वैराग्य ना चाहिए।
- 1:05:46बुद्ध की तरह तुम्हारा वैराग्य नहीं होना चाहिए कि सुबह सिर दुःख
- 1:05:52रहा है। उल्टी ढक गई डी एस आर का कैप्सूल
- 1:05:57खाना पड़ा तेजाब को मिटाने के लिए बस कल से आज से नहीं पिऊंगा शाम
- 1:06:03को फिर ये बैराग्य थोड़ी हुआ बैराग्य तो वो होता है।
- 1:06:12जो कि स्वतः से उत्पन्न हो जाए और फिर तुम उधर जाते हुए जाना चाहते
- 1:06:19हुए भी जा ना सको वो होता है सच्चा बैरक।
- 1:06:23बुद्ध लौट के तो आए लेकिन सिंहासन पर कब बैठे नहीं।
- 1:06:30जो छोड़ दिया गया वो छोड़ दिया गया तो वैरागडीना तुम पैदा कर
- 1:06:36सकते हो न तुम्हारा पैदा किया हो वैरागडी से काम का होगा प्रेम न
- 1:06:42तुम पैदा कर सकते हो न तुम्हारा पैदा किया हुआ प्रेम किसी काम का
- 1:06:47बढ़ेगा। समर्पण तुम कर सकते हो लेकिन
- 1:06:50समर्पण किया हुआ तुम्हारा समर्पण कोई काम न पड़ेगा, समर्पण हो जाए
- 1:06:55और कैसे होगा? ऐसे होगा जब हार जाओगे, थक जाओगे,
- 1:07:00निरावरंभ हो जाओगे तुम्हें कोई सहायता न दिखेगी, किसी के ऊपर
- 1:07:05भरोसा न रहेगा सब कुछ। टूट जाएगा।
- 1:07:08असहाय अवस्था में आ जाओगे, टूट फूट जाओगे तब वैराग्य फलित होगा
- 1:07:17तब समर्पण फलित होगा तब ईश्वर के प्रति प्रेम जगेगा।
- 1:07:30सो ये जो आपके हाथ में बात नहीं है उनको नकल रूप से पैदा करने की
- 1:07:43चेष्टा न करो। वो तुम्हारे हाथ में है भी नहीं
- 1:07:49और जो बड़ी से बड़ी घटनाएं हैं वो ईश्वर ने अपने हाथ में रखी हुई
- 1:07:53है। जैसे हार्टबीट आपके हाथ में नहीं
- 1:07:57श्वास लेना आपके हाथ में नहीं है। हाँ तुम योग सीखते वक्त स्वास्थ
- 1:08:02को लंबा या छोटा कर सकते हो, ये बात अलग है।
- 1:08:06लेकिन श्वास अब सोये पड़े क्या करोगे सोये पड़े, कैसे करोगे?
- 1:08:10वसर का प्राणायाम करोगे? नहीं हो सकेगा अनुलोम वरोम करोगे
- 1:08:16सोये हुए नहीं हो सकेगा ये जागृत अवस्था में तुम आप अधा भी कर सकते
- 1:08:21हो, लेकिन जैसे ही सोये परमात्मा ने आपको संवार लिया।
- 1:08:26आपका दिल भी वो धड़काएगा आपको साँस भी वो देगा आपका भोजन वो
- 1:08:29बचाएगा आपकी सारी क्रियाएं उसके हाथ में आ गई दिल में आप समझते हो
- 1:08:35ये किराएं मेरे हाथ में है लेकिन आपके हाथ में हैं हूँ कुछ नहीं
- 1:08:41इसलिए समर्पण करने की जष्टम करना। समर्पण होने देना, तुम इंतजार
- 1:08:47करना हम इंतजार करेंगे कयामत तक हम इंतजार करेंगे क्या मतलब खुदा
- 1:08:59करे कि कयामत हो और तू आए? खुदा करें कि कयामत हो और तू आए
- 1:09:07धन्यवाद।