Latest / Baba ji Vijay Vats / 27 Feb 25 - दर्शन क्यों आवश्यक है? मोह/illusion कैसे नष्ट होगा? दीक्षा के भीतरी रहस्य! गीता का ज्ञान!
Transcript
- 0:06अर्जुन का मोह ग्यारहवें अध्याय से पहले समाप्त हो गया।
- 0:17जब मोह समाप्त हो गया तो अर्जुन ने ततक्षण।
- 0:25अपना धनुष क्यों नहीं उठाया यार मैं ध्या का पहला श्लोक हे केशव
- 0:36आपने मुझ पर कृपा करके मेरे लिए जो परम गोपनीय।
- 0:43आध्यात्मिक विषय वचन कहे उससे मेरा मोह नष्ट हो गया, मोह नष्ट
- 0:55हो गया। बिलकुल ठीक है तुम्हारी बात।
- 1:02नो द सेल्फ। उसने खुद को जान लिया।
- 1:12दूसरे अर्थों में अगर कहें कि उसने खुद को मान लिया कि मैं शरीर
- 1:20नहीं हूँ, यहाँ तक जाना नहीं हुआ। मैंने पहले भी बहुत बार कहा दर्शन
- 1:30के बिना जान न कैसा सो जाने हू, जीस दे हू जन आई।
- 1:44दर्शन के बिना जानना नहीं होता वो मानना होता है और अर्जुन ठीक कहते
- 1:50हैं, क्या आपने जो बातों से मुझे बहुत अति गोपनीय अध्यात्मिक
- 1:56जानकारी दी, उससे मेरा मोह नष्ट हो गया?
- 2:06लेकिन जानकारी से मोह नष्ट हुआ। दर्शन से नहीं हुआ इसलिए उसने
- 2:14धनुष बाण गांड़ी जो फेंक दिया था वो उठाया तो किस तलाश में है?
- 2:24दर्शन की तलाश में हे वासुदेव ये जो आप कह रहे हैं हे कमल नाइन ये
- 2:48जो आप अपने आप को कह रहे हैं। सारी धरती पर सिर्फ एक कृष्ण है
- 3:03जो मैं शब्द का इस्तेमाल अस्तित्व के लिए करते हैं।
- 3:10अक्सर मैं शब्द का इस्तेमाल। अहंकार ही व्यक्ति करता है, धरती
- 3:18पर अकेले कृष्ण हैं जो में शब्द का इस्तेमाल एग्ज़िस्टन्स के लिए
- 3:27करते हैं, अस्तित्व के लिए करते हैं।
- 3:32कोई भी संत जब बोलता है। दो तल बोलने के होते हैं एक मैं
- 3:43का तल शरीर एक मैं का तल खुद का होना अस्तित्व।
- 3:53दो तरों पे वह मैं कह सकता है अज्ञानी व्यक्ति शरीर के तल से
- 4:03बोलेंगे, मैं कहेगा ज्ञानी व्यक्ति दोनों तरों से बोल सकता
- 4:10है। क्योंकि वह कभी शरीर था आज शरीर
- 4:15में है, तो वह शरीर को भी मैं कह सकता है उसने अस्तित्व को देख
- 4:25लिया। वह अस्तित्व को मैं कह सकता है।
- 4:31और कृष्ण अस्तित्व के लिए मैं का इस्तेमाल करते हैं।
- 4:37हे कमल नय आप जो कहते हैं मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ,
- 4:45बड़े समझदार हैं अर्जुन जैसा शिष्य।
- 4:50मिलना दुर्लभ नहीं, असंभव है। ऐसी विनम्र भाषा में अर्जुन सवाल
- 5:01पूछ लेता है जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते।
- 5:09और पूरी सर्जरी कर देता है। कृष्ण का कहता है कमल नयन ये जो
- 5:21आप कहते हैं कि मैं ये हूँ मैं वो हूँ, मैं वो हूँ, मैं वो हूँ।
- 5:28इसे मैं देखना चाहता हूँ संदेह मिटाने और अगर अर्जुन आत्मदर्शन
- 5:45करके सिर्फ। शब्दों के द्वारा आत्मदर्शन करके
- 5:50धनुष को उठा लेते वह कच्चा कच्चा था।
- 5:56तीरों में वह जान न होती, वह बल न होता और अर्जुन जीत न पाता।
- 6:08अर्जुन कानों का कच्चा रह जाता, दर्शन ने उसे पक्का बना दिया।
- 6:16हे कमला नैन जो तुम कहते हो मैं ये हूँ मैं वो हूँ मैं उसको देखना
- 6:22चाहता हूँ प्रभु। गुरु की परीक्षा का अंतिम छोर
- 6:37कृष्ण के लिए यह घड़ी निर्णायक भी है, अंतिम भी है और सबूत पेश करने
- 6:48के भी है। यही कलयुग में घटा, नरेंद्र दत्त
- 7:00ने सबसे पूछा परमात्मा है देखा दिखा सकते हो?
- 7:11कोई भी इन कसौटियों पर खरा नहीं उतरा।
- 7:13पहले दो सवालों के जवाब थे ईश्वर है, देखा है, दिखा सकते हो नहीं
- 7:25अकेले रामकृष्णा ने कहा हाँ। है देखा है देखना चाहता हूँ, हाँ
- 7:34देखना चाहता हूँ तो देखो सर पर हाथ रखती रहा और पहली दफा
- 7:42नरेंद्रनाथ हार गया। चीखा, चिल्लाता जब वो 70 पर गया
- 7:49क्योंकि नियम तो नियम है एक मरेगा झूठा दूसरा जन्मेगा सच्चा झूठे को
- 8:01मरना होगा उसी से तुम डरते हो। जन्म जन्मांतरों से तुम इस झूठ को
- 8:09माने हुए हो, साथ धोए हुए हो और यही बोझ है तुम्हारे ऊपर वहाँ
- 8:22जाकर चिल्लाता। जब मौत सामने खड़ी थी, मरना तो
- 8:26पड़ेगा। मैं तुम्हारी दुविधा को बखूबी
- 8:35समझता हूँ डरा तो मैं भी कम न था सूखे पत्थे की तरह कंपन होता है
- 8:45वहाँ जब मिथ्या टूटता है सत्य सामने आता है।
- 8:52तो कंपन होता है सभी डरते हैं। नरेन्द्रनाथ हुई कम्पे और
- 9:07चिल्लाएं स्वामी जी मेरे माँ बाप भी हैं।
- 9:16राम कृष्णन समझ गए ठीक फिर बाहर जाओ तुमने ही कहा देखना चाहता हूँ
- 9:25फिर बाहर जाओ। अर्जुन कहते हैं, आपने ये जो कहा
- 9:33स्वयं प्रशंसा में अपना मुँह मियाँ मिठू बनना हमारी कहावत है
- 9:43ये तो तुमने बड़ा कहा भगवान, लेकिन मैं उस सब को देखना चाहता
- 9:49हूँ। अंतिम परीक्षा अंतिम घड़ी हे
- 9:56वासुदेव कमलन ने मुझे वो अपना विराट वो स्वरूप दिखाने की कृपा
- 10:04करें। कृष्ण बोले।
- 10:10हे पार्थ तैयार हो जाओ अर्जुन बड़े प्यारे हैं।
- 10:18अर्जुन कहते हैं, योगेश्वर अगर आप समझते हैं उचित मेरे द्वारा वह
- 10:26रूप देखा जा सकता है। आई ऍम एबल टु सी दट।
- 10:37अगर मेरे द्वारा उस रूप का अवरोकन हो सकता है तो कृपा कर दीजिये।
- 10:45मुझे अपना वो स्वरूप दिखाइए। क्योंकि हे कमलेनयन अब तक आपकी
- 10:55उत्पत्ति करने वाला भी मैं हूँ विनाश करने वाला भी मैं हूँ मैंने
- 11:02ये सब आपके मुख से सुना है खुद देखा।
- 11:08बड़े समझदार हैं अर्जुन तो अर्जुन कहते हैं, अगर कृष्ण अर्जुन की
- 11:19परीक्षा ले रहा है तो अर्जुन भी कमतर नहीं है।
- 11:26अर्जुन कहे कि अब तक आप कहते हो मैंने उत्पत्ति के और मैंने विनाश
- 11:32किया मैं ही हूँ तो आपके ही मुख से सुना है तो कृपा करके अपना वो
- 11:42मन मोहक रूप मुझे दिखा दीजिए। कृष्ण कहते हैं ठीक लेकिन मेरा वो
- 11:53रूप तुम इन चर्म जक्सों से नहार न पाओगे?
- 12:01फिर सुन रहे। कृष्ण कहते हैं, हे पार्थ मेरा वो
- 12:12रूप तुम इन चरम शिक्षकों से निहारना को अर्जुन के मन में फिर?
- 12:22अविश्वास आ जाता है। कहीं बहानेबाजी तो नहीं कर रहे
- 12:26कृष्ण हे भारत वंशोधभव अर्जुन 12 हैं आदित्यों को।
- 12:41आठ पशुओं को, 11 रुद्रों को, दो अश्विनी कुमारों को और 49 मर्द
- 12:48गणों को देख दखाते। कुछ भी नहीं।
- 12:57अभी सिर्फ बातचीत है। और अर्जुन बड़ा पक्का है।
- 13:06अर्जुन कहता है, प्रभु आपने जो कहा अब तक वह शांत श्रीजेरणा यथा
- 13:12विहाय नवानी घृणा। तथा श्री रानी विहाय जी न
- 13:20नन्हयानी संयाती नवानी देही जैसे पुराने वस्त्रों को उतार कर हम नए
- 13:29वस्त्र ग्रहण कर लेते हैं, वैसे ही आत्मा।
- 13:34प्राणी शरीरों को त्याग कर नए शरीर ग्रहण कर लेती है और बहुत
- 13:39कुछ कहा पत्रम पुष्पम फरम स्वयं पत्र चढ़ा दो पुष्प चढ़ा दो फल
- 13:47चढ़ा दो फूल चढ़ा दो श्रद्धापूर्वक जो भक्त मुझे।
- 13:54जो भी अर्पित कर लेते हैं भक्ति भाव से मैं स्वीकार कर लेता हूँ
- 14:06और भी बहुत कुछ कहा जो देवताओं को सुम्रते हैं देवताओं के पास भूतों
- 14:12को सिमरते भूतों के पास, पितरों को सिमरते पितरों के पास।
- 14:18जो जिसका स्मरण करता है, उसके पास पहुँच ही जाता है और मैं उसी में
- 14:24उसी की श्रद्धा को बढ़ा देता हूँ। अर्जुन कहते हैं, अपनी बातें तो
- 14:30बहुत हैं। 10 अध्याय भी चूके।
- 14:39दूसरे अध्याय से शुरू किया था। कृष्ण ने बोला ग्यारहवां अध्याय आ
- 14:46गया सब सुन यार चुनने अब अर्जुन के पूछने की बारी थे।
- 14:55प्रभु, मैंने सब सुना, मेरा यह महोतों नष्ट हुआ शाब्दिक महोतों
- 15:09नष्ट हुआ। लेकिन देखा मैंने कुछ नहीं।
- 15:16अब तक ऐसे शानदार मो मोक्ष हैं अर्जुन सारी मानवता को मुक्त करने
- 15:27में समर्थ शिष्य अगर कोई आयतक हुआ तो अर्जुन।
- 15:35उन्होंने सवालों के बाल की खाल उधेड़ दी।
- 15:49कृष्ण कहते हैं ये 49 मृदगण है, 111 है रुद्र दो अश्विनी कुमार आठ
- 15:58वर्षों सब देख। लेकिन अभी दिखाया कुछ ने और फिर
- 16:10कृष्ण बोलते हैं यार सुन और भी जो तू देखना चाहता है देख।
- 16:23तुमने पूछा कि अर्जुन में जब मोह नष्ट हो गया दशमय अध्याय में और
- 16:31ग्यारहवीं अध्यायी के शुरुआत में, अर्जुन कहता है, मेरा मोह भंग
- 16:35हुआ, लेकिन शाब्दिक। अब दर्शन भी करवा दो तुम कहते हो
- 16:46मैं ये हूँ मैं वो हूँ बिलकुल मूल चोट की है लेकिन नहीं अर्जुन।
- 16:58जो दर्शन तू करना चाहता है, मेरे विराट का है।
- 17:04अब प्रैक्टिकल के ऊपर कृष्ण आ जाता है क्योंकि देखना चाहता है
- 17:11अर्जुन तो कहते हैं कि इन चरम चक्षुओं से।
- 17:17इन चमड़ी की आँखों से तुम न देखूंगा योग्यता है तुम्हें दिव्य
- 17:24सक्षु को लेने की, इसलिए हे अर्जुन मैं मेरा स्वरूप दिखाने के
- 17:31लिए तुम्हें दिव्य सक्षु पहले प्रदान करता हूँ।
- 17:37जैसे हम कह दें कि इतनी दूर तक तुम नग्न आँखों से तो न देख सकोगे
- 17:46लेकिन ये लो हर्बल टेलीस्कोप वहाँ तक भी नहीं।
- 17:51तो ये लो जेम्स वेव टेलीस्कोप इससे देख पाओगे तुम।
- 17:56भ्रमण के पार बस बिलकुल ऐसा ही शब्द बोलते हैं।
- 18:02कृष्ण के नगन आँखों से न देख सकोगे इसलिए हे अर्जुन तेरे दर्शन
- 18:14की अभिलाषा जगी। यह बड़ा प्यारा शब्द बोला मो
- 18:19मोक्षों को समझ लेना चाहता है कि अगर अर्जुन मोमक्षु हैं और कृष्ण
- 18:31को पता चल जाता है कि मो मक्षु हैं, मुक्त होना चाहते हैं,
- 18:37दर्शनार्थ आए हैं। तो फिर कोई दुविधा नहीं होती।
- 18:42हम देखेंगे क्या पता तो तब चलता है जब शिष्यगण यहाँ आके मस्तकन
- 18:49आते हैं। बात परमात्मा की पूछते हैं लेकिन
- 18:53धीरे धीरे कहते हैं ये तो थोड़े ही मांगा था।
- 18:57हम तो अच्छे गाय का बन जाए, ये मांगा था।
- 19:10हम तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनी बन जाएंगे।
- 19:13ये मांगा था अपूर्व सौंदर्य और लाबन ने छा जाए ये मांगा था।
- 19:24उच्च पदासीन हो जाएं यह मांगा था यह थोड़ा ही मांगा था।
- 19:31पता तब चलता है यहाँ बड़ा कसते हैं, 10 अध्यायी तक कसते हैं ऐसे
- 19:40ही गुरु आपको चर्मचक्षों से भी नहीं ले के आता।
- 19:45ऐसा ही मैं कहता हूँ मैं कहता हूँ तुम दीक्षा ले जाओ, एक बीज बो
- 19:52दूँ, तुम्हारे भीतर जिन आसानी रंगों की तुमने कभी खुशबू नहीं
- 20:01देखी थी। मैं तुम्हारे भीतर छोड़ दूँ, एक
- 20:05बीज बोलूं, धीरे धीरे पाँपता रहेगा।
- 20:091 दिन तुम उस सीमा पर आ जाओगे जहाँ तुम्हें दिव्य जक्षु की
- 20:15आवश्यकता पड़ेगी तो फिर तुम्हें दिव्य जक्षु दे दूंगा, मैं कहीं
- 20:21नहीं जाता मैं यहीं। जाएगा, शरीर जाएगा, लेकिन बहुत
- 20:31दीक्षा देने वाला कभी कहीं नहीं जाता।
- 20:34वो यहीं रहेगा पहर संभाल लेगा तुम्हें।
- 20:42एक अर्थ वे मैं ही संभाल लूँगा तुम्हें ऐसा समझ लूँ तो अगर कृष्ण
- 20:52खेंचते हैं प्रश्नों को रबड़ की तरह तो अर्जुन भी कम नहीं है।
- 21:01अर्जुन भी प्रश्न से प्रश्न दागे चले जाता है।
- 21:07अब बात आ गई सिर्फ दर्शन अब अंतिम छोर आ गया, अब जो कहा तुमने हे
- 21:20कमलेन? मैं ये हूँ, मैं वो हूँ मरुदगण
- 21:25हूँ अश्विनी कुमार हूँ ये सब देखना चाहता हूँ मैं आपके मुख से
- 21:34बड़े प्यारे लगते हैं, अब दिखा तो।
- 21:40कृष्ण कहते हैं, ये शब्द खाऊंगा और भी बोध खाऊंगा जो तुम देखना
- 21:47चाहते हो और अभी तक देखे नहीं, लेकिन इन चर्म जक्ष्यों से नहीं,
- 21:57मैं तुम्हें दिव्य जक्षु देता हूँ।
- 22:00यहाँ तक आते आते इतनी शक्ति फेंक दी गई थी के अर्जुन देव जिक्षु को
- 22:12ग्रहण करने में समर्थ हो गया था। 10 अध्याय तक लगातार बारिश करते
- 22:22रहना वह व्यक्ति दिव्यचक योग्य हो जाता है।
- 22:32इसलिए मैं तुम्हें रोज़ कहता हूँ संत जनों को सुनते रहना, सुनते
- 22:38सुनते सुनते, सुनते उनकी। अल्फा थेटा रेस आपको पेनिट्रेट
- 22:46करेंगे, मौमुक्षा को जगाएंगे और 1 दिन तुम योग्य हो जाओगे, अभी नहीं
- 22:53अभी तो तुम चारवाक और मार्क्स से ही रहोगे?
- 23:00कहते चाहे कुछ भी रहो तो सिर्फ एक बीज बोना है मेरा अंगूठा रखना,
- 23:12तुम कहीं फिरते रहो, बस ये तीन चीजों को मत छोड़ो, जितना हो सके
- 23:20क्रिया कर लो। ऑक्सीजनेटेड बॉडी प्रवचन सुन लो,
- 23:30तार न टूटेगी लगातार तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेंगी।
- 23:37तुमने किधर जाना है बुरा मत करना? हो सके तो अच्छा करना, बुरा मत
- 23:50करना और ध्यान न कुछ करना, बस उसमें बैठ जाना जैसे रात्रि को।
- 24:05नींद में 6 घंटे 8 घंटे 5 घंटे गए।
- 24:13उसी तरह बिलकुल शीतल हो के बैठ जाना जो कुछ होता है होने देना,
- 24:21डरना मत। अब कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन
- 24:29बिल्कुल सही चल रहे हैं अर्जुन लेकिन अर्जुन के मन में अभी शंका
- 24:36है लेकिन कृष्ण बिल्कुल सही ही चल रहे हैं।
- 24:41कृष्ण जानते हैं कृष्ण तल पर आकर ये।
- 24:46क्या प्रश्न पूछेगा? और पूछ लिया वो ग्यारवें अध्याय
- 24:55शुरुआत में है प्रभु। मेरा भ्रमण तो टूट ही गया, जो
- 25:08आबरण ओढ़े थे। मैंने जो भी ठीक गलत माना था
- 25:14मैंने लेकिन प्रभु देखा, खुशी बड़े ईमानदार हैं, अर्जुन और
- 25:20बेईमान व्यक्ति यहाँ पहुँच भी नहीं सकता ध्यान रखना।
- 25:26ईमानदार ही पहुँच सकता है, सत्य ही पहुँच सकता है।
- 25:32झूठ बोलने वाला यहाँ नहीं पहुँच सकता।
- 25:34मुझे लोग कह देते हैं हमारे इतने उच्च पदासीन झूठ बोलते हैं।
- 25:40मैंने कहा, आप क्या कह लेते हैं? गीता को मानते हो जैसा कर्म करेगा
- 25:51वैसा फल देगा, भगवान बोलने दो, फल भी तो वो ही भुगतेगा।
- 26:00तुम क्यों जलते हो? तुम मौज करो, तुम्हारे लिए तो
- 26:06राजा कोई भी हो जाए, तुम्हें तो करना खाना पड़ेगा।
- 26:12तुम इससे मुक्त नहीं हो सकोगे तो फिर कोई भी राज़ करे तुम्हें क्या
- 26:18फर्क पड़ता है? अच्छा करेगा अच्छा भोंकेगा बुरा
- 26:25करेगा बुरा भोंकेगा तुम क्यूँ ना जाए बीच में अड़ंगा अड़ाते हो तो
- 26:38अर्जुन कहते हैं हे कृष्ण तुम्हारी सब बातें सुनी तो मैं।
- 26:44और उसे सुनने से जो मेरा मानना था वो सारा टूट गया।
- 26:50जो सिर्फ माना था मैंने जाना नहीं था।
- 26:55अर्जुन कहते हैं, ठीक ये शब्दों का खेल तो बहुत हो गया।
- 27:03बात रहेंगी दर्शन की। हंसापाया मानसरोवर हंसापाया,
- 27:19मानसरोवर। ताल तलैया क्यों डोले हम सपाया
- 27:35मानसरोवर? ताल तलैया क्यों डोलें हंसा पाया,
- 27:52मानसरोवर ताल तलैया। क्यों?
- 28:01ढोले जब हंस ने मानसरोवर पा लिया तो तार तलैया क्यों ढोले तालाबों
- 28:13के चक्कर क्यों लगाए, यही लक्षण बताते हैं कृष्णा।
- 28:24जब तुम जान गए, मैं सर्व व्यापक हूँ तो संकीर्ण बुद्धि समाप्त हो
- 28:34जाती है और कृष्ण कहते हैं, मैं विराट हूँ।
- 28:41और अर्जुन अभी संकीर्ण होते हैं। अर्जुन कहते हैं, हे प्रभु आपकी
- 28:49बातें तो समझाइए। सारे थोपे हुए आवरण अनावरण हुए।
- 28:59टूट गए, लेकिन सत्य तो अभी भी नहीं दिखा।
- 29:06बिल्कुल जायज क्वेश्चन तब कृष्ण कहते हैं, कृष्ण जानते हैं 10
- 29:13अध्याय तक आते आते यह बीज। टूट गया पानी मिला खाद मिली
- 29:24कोंपेलें उगी सूर्य की रौशनी पड़ी बढ़ना शुरू हुआ अपना मुख, बाहर
- 29:35निकाला धरती का। बस अब ये योग्य हुआ।
- 29:39वृक्ष बनने का बीज बो दिया अब वृक्ष बन जाएगा, फल भी लगेंगे,
- 29:48फूल भी रखेंगे। कृष्ण कहते हैं कि मैं तुझे चर्म
- 30:02चक्षु के बजाय वो चक्षु देता हूँ जिससे मेरा तू स्वरूप देख सके।
- 30:11बिल्कुल एक्यूरेट जा रहे हैं। स्पष्ट दिशा में ऐसा ही तुम्हें
- 30:16भी करना होगा। और उन्हें भी मिले तो तुम भी जब
- 30:24उतरोगे तो दर्शन के तल पर जाकर ही समझाएगी।
- 30:33दर्शन के तल से पहले तो सिर्फ मान्यता होगी।
- 30:37झूठी मानी हुई थॉपी हुई और उनसे भर्मनाश नहीं होता।
- 30:44तुम्हारे आचरण में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लक्षणों में कोई फर्क
- 30:50नहीं होगा, लक्षण वहीं रहेंगे। कृष्ण कहते हैं मैं तुझे देव जकशु
- 30:59देता हूँ, तू तैयार हो जा। अर्जुन ने कहा जी देव जकशु
- 31:08दीजिये। और कृष्ण ने अर्जुन को देव
- 31:12विशक्षु देने शुरू कर दिया है। अर्जुन पक्का खिलाड़ी है।
- 31:21यहाँ हार जीत की बात नहीं है। यहाँ मरने मारने की बात है।
- 31:29यह बात तो प्रणब बुरा आयी है। शब्दों से कृष्ण लुभाना पाएंगे तो
- 31:40अवश्य ही कुछ ऐसा दिखाना पड़ेगा जो हम जैसा चमत्कार कह देते हैं।
- 31:48कुछ कुछ मतकार तुम्हारे जीवन में किसी संत के आने से कोई चमत्कार
- 31:53घटित हुआ है तुम जैसे ही ये ख्याल करोगे तुम्हें समझाना शुरू होयेगा
- 32:04जैसे फूल के करीब जाने से सुगंध आती।
- 32:09और गंदे नाले के करीब जाने से दुर्गन्ध आती है।
- 32:15तुम्हारी इंद्रियाँ उसे अनुभूत करेंगे।
- 32:20दिव्यक्षु दे देते हैं और सब दिखाते हैं।
- 32:25आगे प्रसंग चलता है। चलता है।
- 32:30प्रश्न का चलता है कृष्ण बहुत ते चले जाते हैं अर्जुन पूछते चले
- 32:35जाते हैं ये क्या है? ये क्या है?
- 32:38थर्राने लग जाते हैं, ये देख मेरा काल रूप और एक तज पर।
- 32:48कृष्ण कहते हैं, अर्जुन मैं इन्हें मार चुका हूँ, तू सिर्फ
- 32:55होठ और मारने का श्रेय ले ले, तू ये सेहरा सजा ले अपने सर के ऊपर
- 33:05मैं इन्हें मार चुका हूँ। यहाँ से ये कहावत उठती है ऑल दी
- 33:13इवेंट्स आर फ्री डिटरमाइन्ड जिसने इस तल से देखा वो ये बात कहेगा।
- 33:22लियो टॉल स्टाइल इस तल से बोलेंगे।
- 33:26आज द इवेंट्स आर प्रीडिटरमाइन्ड कमिंग इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज
- 33:32बिफोर प्रसंग चलता है। चलता है।
- 33:48धीरे धीरे मोह तो नष्ट हो गया, दिखलाते रहते हैं अपना विराट
- 33:52विराट देखता रहता है, बड़ा कंपन भी होता है देखिए जैसे जैसे
- 33:58मान्यताएँ टूटे कंपन आना स्वाभाविक है।
- 34:08जैसे जैसे तुम्हारी मान्यता जो तुमने देखी ही नहीं थी, मान ने थी
- 34:14वो टूटेगी तुम कम हो गया अब मैं बोलता हूँ तो बहुत से लोग मुझे
- 34:23कहते हैं बाबा हमें तो बड़ा डर लगता है तो मैं सुनते सुनते।
- 34:29नहीं कभी ऐसा होता है मान्यताएँ टूटेंगी तो तुम कम क्योंकि तुम
- 34:35मान्यताओं को अपना होना समझे बैठे हो।
- 34:40ये इलूशन तुम्हारा जीवन बन गए हैं।
- 34:45तो इल्ल्यूज़न टूटेंगे तो तुम्हारा जीवन भी टूटा लगेगा,
- 34:50टूटेगा नहीं तो तुम ठहरे रहना अगर उस परम सुशोभित तत्व के पास जाना
- 35:01चाहते हो। अर्जुन डटे रहते हैं, कम्पते हैं,
- 35:09सब देखते हैं। आखिर में अठार में अध्याय 73 में
- 35:20श्लोक। पूर्ण रूप से मोह नष्ट हो जाता
- 35:25है, संतुष्ट हो जाते हैं, तृप्ति आ जाती है तब अर्जुन कहते हैं,
- 35:31तृप्त हुए नष्ट मोहा समृ तरलव्धा तत्व प्रसाद आपकी कृपा से।
- 35:45ना मयाजवाद आपकी कृपा से हे अच्युत हे ना कंपनी वाले कृष्ण
- 35:56मेरा मुँह नष्ट हो गया। अट्ठारहवीं अध्याय के तिहत्तरवें
- 36:01श्लोक कहाँ से चली? गीता तुम भी जब तक मोह नष्ट न हो
- 36:09जाए तब तक मुझे पता है। तुम्हें मानना भी नहीं चाहिए और
- 36:24सच में तुम मानोगे भी नहीं, बार बार खोपड़ी में मान लोगे और
- 36:28खोपड़ी का क्या है? खोपड़ी तो यहीं धरी रह जाएगी अगर
- 36:33लिबरेट होगे तुम वह लिबरेशन। तुम्हारे देही शरीर को भूँक देंगे
- 36:44देही को भूँकना है, देही से तादाद में हट जाए, देही जल जाए, बीज नाश
- 36:53हो जाए और बूंद। समुद्र में समा जाए ये तुम्हारा
- 37:01लक्ष्य तब तक चलते ही रहना है जब तक सच में मोह नष्ट ना हो जाए और
- 37:08याद ना आ जाए। नष्ट मोह समृद्धि लपधा तो प्रसाद
- 37:13आज मया जोत। हे चुत तेरी कृपा से मेरा मोह
- 37:20नष्ट हुआ तो पूछा है कि मोह तो नष्ट हो गया, दसवें में नष्ट हो
- 37:37गया लेकिन धनुषी क्यों नहीं उठाया?
- 37:42धनुषी से नहीं उठाया? के शब्द का मोह नष्ट हुआ था,
- 37:46दर्शन नहीं हुए थे और दर्शन के बिना मोह नष्ट हुआ नष्ट होता
- 37:54नहीं। शब्दों को शब्दों से काटना होता
- 37:59है। तर्कों को तर्कों से काटना होता
- 38:01है, लेकिन तुमने तो तर्क का तीर्थ होना है जो तर्कों से पार जाता
- 38:07है। जहाँ वो विराजमान है जिसके बारे
- 38:14में कृष्ण कहते हैं कि तीर नहीं कटता, जल नहीं।
- 38:18गलता वायु नहीं, सुकाती आग नहीं जलाती, वहाँ पहुंचना है और वो
- 38:26तर्कों से परे है। तर्क बुद्धि के दिन तर्क बितर्क
- 38:34बुद्धि के दिन। लेकिन तर्कों से पार तुम खुद हो
- 38:42तुम खुद हो और अर्जुन खुद को शब्दों से जान लिए दर्शन से नहीं
- 38:56जाने। दर्शन से अब जानें जब शब्द दिखाया
- 39:00उसको, मैं जे भी हूँ मैं जे भी हूँ ये भी मैं ये भी मैं दर्शन से
- 39:10नष्ट होता है मोह इलूशन सच में? अन्यथा शब्दों से मोह को नष्ट हुआ
- 39:20जानू, तब वो नष्ट हुआ नहीं, वो तुम्हारी कल्पना है।
- 39:34ठाकुर, तुम शरनाई। आय ठाकुर तुम शरनाई।
- 39:59उतर गए हो, मेरे मन का संसा उतर गए हो।
- 40:17मन का संसार जब तेरा दर्शन पाया ठाकुर तुम सरना।
- 40:37आया छा कोर तुम शरनाई उतर गया मेरे।
- 40:54मन का संसार उतर गयो मेरे मन का संसार जब तेरा दर्शन पायो।
- 41:14जब तेरा दर्शन पाए बस यहाँ आके बात खत्म हो जाती है दर्शन के
- 41:21बिना सनसनी निमृता नष्ट मोह समृता लघता प्रसाद आज तेरे दर्शन के
- 41:30बिना मोह नष्ट नहीं होता था। अब दर्शन हुआ तो मौका नष्ट हो
- 41:38गया। सत्य देखा क्या है?
- 41:41सत्य को देखे बिना झूठ खत्म हुआ मान मत लेना।
- 41:48जे भी किसी को भी एक मान्यता मत बना लेना।
- 41:52सत्य को देखना, नग्न आँखों से देखना और तुम खिल जाओगे फूल की
- 41:59तरह इसे ही 1000 दल कमल का खेलना कहते हैं हजारों पक्कड़ियाँ खुल
- 42:04जाएंगी तुम्हारी कल यह अपना मुख खोल लेगी सुगंधें बिखरनी शुरू हो
- 42:10जाएंगी। नाद चलने शुरू हो जाएंगे।
- 42:14जिथे वाजे नाद अनेक अनुशंखा हजारों अशंख नाद बजते हैं, वहाँ
- 42:27पहुँच ही जाओ। दर्शन होगा देखोगे नाद सुनोगे
- 42:33जहाँ से उदगम सतल होता है, तो भ्रम मिटेगा, उसके बिना भ्रम
- 42:38मिटेगा शास्त्र को पढ़ने से, गुरु को सुनने से।
- 42:48कल्पनाओं से कल्पनाएं टूटेंगी, तर्कों से तर्कों का वरान होगा।
- 42:54जैसे एक तीर से दूसरा तीर कट जाता है लेकिन एक तीर से दूसरा तीर कट
- 43:02जाता है, युद्ध नहीं जीता जाता। युद्ध जीता जाता है जब वह दुश्मन
- 43:11ढेर हो जाता है, दुश्मन कौन तुम्हारा संशय और संशय नष्ट हो
- 43:19दर्शन से उतर गए हो मेरा मन का संशय?
- 43:26जब तेरा दर्शन पाया हो ठाकुर तुम शरनाइया हो तेरी शरना श्रीकृष्ण।
- 43:39गोविन्द हरे मुरारी। हे।
- 43:49नाथ नारायण, वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 43:59गोवन, हरे मोरार। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 44:15श्री? कृष्ण गोविंद परे मुरारी हे नाथ?
- 44:25नारायण वासुदेव पितुमात स्वामी सखा हमार पितुमात स्वामी।
- 44:43सखा हमारे हेनाथ नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद।
- 45:01हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 45:12श्री कृष्ण। गोविंद हरे ब्लारी हे नाथ?
- 45:20नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी ए नाथ नारायण
- 45:34वासुदेव। धन्यवाद।