Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 Sep 25 - जपुजी साहिब पौड़ी 14 - मन से पार जाने का सबसे गूढ़तम प्रवचन! Japji Sahib - 14
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- 0:18मने मार्ग ठक न पाए। मने पतृश्य प्रगट जाए।
- 0:31अरे थोड़ी सी कहानी से। आज की कथा को प्रारम्भ करते हैं।
- 0:43सन् 2000 की बात मैं अपने घर की संरचना में प्रलिन था।
- 1:03दीवारें निकल गईं थीं और आज जैसे लैंटर पड़ना था।
- 1:11छत का 20 शर्प 60 यानी 1200 स्क्वायर फुट का।
- 1:21हल्की हल्की बूंदाबांदी मौसम कुछ रंगतिन्यारी है।
- 1:30जे। तो मुझे मिस्त्री कहने लगे।
- 1:35और तो सब इंतजाम हो गया। तीन।
- 1:41मजदूर और चढ़ें, मैंने कहा कोई बात नहीं आपके पास 17 हैं आपको 20
- 1:57से। हमारे यहाँ पर चौंक है।
- 2:05बाबा गंगाराम स्टेडियम के पास है वहाँ पर शुभ है, मजदूर और कारीगर
- 2:11है इकट्ठे हो जाते हैं। जीसको मजदूर चाहिए, कारीगर चाहिए।
- 2:16कोई बात करनी है वहाँ चले जाओ। मैं भी वहाँ चला गया।
- 2:26मैंने कहा अभी हमें तीन मजदूर चाहिए सबसे पूछा मैं तो वहाँ लगा
- 2:33हूँ। मैं तो वहाँ लगा हूँ।
- 2:35दो मजदूर तुम मिल गए एक मजदूर अभी और चाहिए?
- 2:41तो? मैंने वहाँ खड़े हुए एक मिस्त्री
- 2:46से कहा। कि एक में दूर और दे दो हमें घर
- 2:53का रास्ता सभी जानते थे दो मजदूर तो मैंने भेज दिए थे कभी वहाँ चले
- 2:59जाओ। वहाँ आकलैंड पर चले गए, एक में
- 3:08दूर नहीं मिल रहा, मैंने सभी कोशिश की अभी एक।
- 3:15चाय के दुकान के किनारे एक व्यक्ति नीचे बैठा है।
- 3:19उखड़ू। मुझे पूछने लगा आप क्या टूट रहे
- 3:29हो? मैंने कहा भाई मुझे एक मजदूर जैसे
- 3:37छत पढ़नी। है।
- 3:39एक मजदूर की कमी। बोलिए देखिए बाबूजी मैं वृद्ध हूँ
- 3:48था भी वृद्ध हूँ। बस हड्डियों।
- 3:50ही नजर आ रही थी। काम धाम तो मेरे से।
- 3:54ऐसा ही होता है। लेकिन ऐसा है।
- 4:00के और एक कृपया करते हैं तो मैं। 12 नहीं कर दूंगा मेरे।
- 4:06को पीछे वगैरह थोड़े कम दे देना। मैंने कहा कोई बात नहीं।
- 4:11तुम चलो, मैं उसको स्कूटर के पीछे बैठा।
- 4:20और घर में लिया है। काम शुरू हो गया।
- 4:23लैंटर का काम शुरू हो गया। बूँजा बांदी थम गई।
- 4:32अचानक मैं क्या देखता हूँ? चारों तरफ।
- 4:37मैं चक्कर लगा रहा हूँ। बच्चे छोटे थे।
- 4:44वा। मुश्किल 167 साल।
- 4:45का एक 5 साल का। उन्हें तो कोई कमैंड करने आती
- 4:55नहीं तो सारा काम मैं नहीं संभालना।
- 5:03घूमता घूमता मैं इधर आ। गया।
- 5:05दूसरे प्लॉट में साथ वाले प्लॉट में खाली वहाँ मैं क्या देखता हूँ
- 5:20वहीं मजदूर। ध्यान से सुनना।
- 5:26वो ही मजदूर खड़ा है ना तो जीत नीचे झुकता।
- 5:33है ना कोई इंट उठाता। है।
- 5:37ना ऊपर फेंकता। है।
- 5:39लेकिन ऊपर एक मिस्त्री मजदूर खड़ा है नीचे से जो लोग।
- 5:45ईंट फेंक रहे हैं, वो ईंटों को संभाल रहा है, हाथों को वो ईंटे
- 5:55फेंक रहे हैं नीचे से वो संभाल रहा है।
- 6:01तो मैंने देखा वह वृद्ध। व्यक्ति है जो कहता सर जी, मैं
- 6:05व्रत हूँ। मेरे से काम धाम तो ऐसा ही होता
- 6:08है। लेकिन ऐसा है कि वो।
- 6:12रुपया करते हैं, क्या मैं बाहर कर दूंगा?
- 6:16थोड़ा पिसा टका कम दे देना। मेरे को मैंने कहा चलो कुछ भी है।
- 6:24ईमानदार है, समझदार भी है। पुराना है अनुभवी है अनुभवी
- 6:29व्यक्ति की रेस में। बड़ी से बड़ी सीमियां अनुभव।
- 6:35होती है। मैंने देखा वह वृद्ध व्यक्ति खड़ा
- 6:47है लंब वत खड़ा है ना तू झुकता है नीचे ना ईंट उठाता।
- 6:52है ना ऊपर फेंकता है लेकिन ईंट ऐसे लगता है जैसे वो।
- 6:57उठाता है और ऊपर फेंकता है। और ऊपर वाला व्यक्ति उस ऐंट को।
- 7:03पकड़ लेता है। यह दृश्य देखते ही मैं ठहर गया।
- 7:15मुझे मेरी उस घटना की आदत है। 70 की वो घटना ट्रेन।
- 7:29मुझसे कोई पूछ लेता है कि धन्य भागी।
- 7:31कौन जो परमात्मा को मानता है, जो परमात्मा की पूजा, प्रतीक्षा?
- 7:40करता है। दान पुण्य करता है धन्य।
- 7:44भागी कौन? मैं सिर्फ एक जवाब देता हूँ,
- 7:49धन्यवाद कि वो है जिसने उस परमात्मा के होने की इशारा पा
- 7:59लिया वह है। बस इतनी छोटी सी बात।
- 8:06वह है। अगर तुमने प्रत्यक्ष अपनी नग्न।
- 8:13आँखों से उसका होना देख लिया तो आपके सभी संदेह खत्म हो जाएंगे।
- 8:19और यही कृष्ण कहते हैं। शंख, आत्मा, मनुष्य, शंख छोड़।
- 8:25दे शंख छोड़ दे लेकिन। अर्जुन भी।
- 8:29बड़े स्वयंकार है अर्जुन कहते हैं, भगवान शमशय।
- 8:32छोड़ू कैसे जब तनक उस पार? की चीज़ दिख न जाए।
- 8:43संशय, छोड़े की बुद्धि लेकिन। हृदय में तो थोड़ी।
- 8:48सी। सिंशात्मक प्रवृत्ति बनी ही
- 8:52रहेंगी। और सच पूछो तो हृदय से शंकित रहता
- 8:58ही है तुम? खोपरी से श्रद्धा।
- 9:02वान हो सकते हो। खोपरी से श्रद्धा।
- 9:05वान भी हो सकते हैं। लेकिन खोपड़ी का श्रद्धा और
- 9:10श्रद्धा से कोई मतलब नहीं है। यह मसला है तुम्हारी अंतरंगता का।
- 9:18तुम्हारे उस अंतःस्तर का वेद्र तुमने वोतल छुआ या नहीं?
- 9:23छुआ। वहीं लौट आएं।
- 9:34ना वो वृद्ध झुकता है, ना नीचे ईंट उठाता ना ऊपर फेंकता लेकिन
- 9:40ईंट नीचे से। उठती?
- 9:42ऊपर जाती और ऊपर वाला मजदूर या मिस्री उसे पकड़ लेता।
- 9:53काफी देर खड़ा मैं देखता रहा। ये है नजारा लेकिन मेरे लिए कोई
- 9:59न्याय नहीं था बाकी लोग। भी वहाँ से जा रहे।
- 10:05थे। सभी थे।
- 10:11कोई मिक्सचर। बना रहा था, कोई सीमेंट डाल रहा
- 10:14था। कोई रेत डाल रहा, कोई बजरी डाल
- 10:16रहा। कोई मशीन को घुमा रहा, लेकिन मैं
- 10:27उसे खड़ा। हुआ देख।
- 10:28रहा हूँ और ये सारा काम? ईंट नीचे से उठती है।
- 10:33ऐसा लगता है कि जेवृद्ध ने ईंट उठाई।
- 10:37ऊपर फेंकी और ऊपर। बैठे हुए मजदूरिया में सिर पकड़
- 10:41लीं। लैंटर में टोकी भी जरूरत होती है।
- 10:47मसाले की भी जरूरत होती है, सरिया पहले ही डाल देते हैं।
- 10:53अंतिम पड़ाव था और सिर्फ। मिक्सर ही पढ़ना।
- 10:57था ये सारा कुछ देखते है? काफी देर मैं देखता रहा हूँ।
- 11:11फिर किसी ने मुझे आवाज दी कि मैं उधर चला गया।
- 11:14ये जो लोग मार्कर्स जैसे पढ़े लिखे लोग।
- 11:22आचार्यों जैसे या सर जैसे ये बेईमान नहीं है अज्ञानी अज्ञानी
- 11:32का मतलब बेईमानी। नहीं होता।
- 11:33पाती नहीं। अज्ञानी का मतलब उन्होंने सिर्फ
- 11:38देखा और मुझसे। कई बार लोग पूछ।
- 11:44लेते हैं बाबा सबसे बड़ा पुण्य क्या है?
- 11:52सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पुण्य फल है परमात्मा का यकीन।
- 11:58नवन आँखों से उसका होना देख लेना। इससे बड़ा पुण्य?
- 12:01कोई है सारी दुनिया सुसंकित है भ्रमों में।
- 12:07डूबी हुई है। वेदर हेस ऑर नॉट वह है कि नहीं
- 12:16है। इस बात पर सारी दुनिया की
- 12:19अंदरूनी। बहस चल रही है, किसी ने देखा है
- 12:26और जिसने देखा वो बहस करेगा ना से गुजर जाएगा।
- 12:38या फिर शांति से अपने घर में बैठ जाएगा ना तू?
- 12:44तू ना मैं मैं? ना इंटरफेरेंस करेगा ना किसी
- 12:53प्रकार की डिस्कशन। जैसे ही तुम जान लेते हो।
- 13:00परमात्मा है कैसे ही तुम्हारी सारी शंकाएं, चिंताएं, कष्ट, रोग,
- 13:11क्रैश। दुख दरिद्र सब खत्म हो जाते हैं।
- 13:19हाँ कहते दरिद्रता। भी खत्म हो जाती।
- 13:23है, दरिद्रता तो सबसे पहले खत्म होती है।
- 13:29जब तुमने देख लिया कि मैं सहिंसा हूँ, मैं शहनशाही आलम हूँ।
- 13:38और धीरे धीरे कहाँ रह गए सिर्फ अध्ययन होने से व्यक्ति।
- 13:48अमेरी। शायद तुम्हें पता नहीं।
- 13:52है कि धन तुम कमाते किसलिए हो, सुख के लिए आनंद के लिए और उस धन
- 14:02से आनंद मिलता है। और तुम्हें ये भी नहीं पता सीधे
- 14:08सीधे। अगर तुम्हें आनंद मिल जाए।
- 14:10तो तुम्हें धन की। हुई आवश्यकता कभी पड़ती पदवी
- 14:15कमाते हो अगर। तुम्हें सीधी सीधी पदवी मिल जाए
- 14:22तो तुम पदवी की देखभाल में कभी ना कभी कतलो।
- 14:32कभी किस मासूम व्यक्ति का मर्डर करके उसकी लाशों को तुम सीढ़ियों
- 14:39ना बनाओ अगर तुम्हें सीधा सीधा। आनंद मिल जाए।
- 14:46लेकिन तुम चाहते हो। तुम्हारा मन।
- 14:48कहता है कि ये पदवी पालन तो सारे दुख।
- 14:51मिट जाएंगे। पदवी मिल जाती है कितनों के दुख।
- 14:56मिटें तुम क्या समझते हो? पॉलिटिशियंस के दुख?
- 15:05जो सबसे बड़े से बड़े। ओहदे के ऊपर पहुँच गया, उसके दुख
- 15:08मिट जाते हैं नहीं। दुख सिर्फ एक ही व्यक्ति।
- 15:13का मिटता है और वह होता है संत दुख मिटता है संत का।
- 15:26जो पक्का पक्का जानता है। कोई भ्रम बाकी नहीं, कोई शंका की
- 15:34एक रत्ती भर भी गुंजाइश में उसने। देखा है भगवान?
- 15:45अगर उसे पूछोगे कि तुमने भगवान देखा।
- 15:48वो कहेगा हाँ, बिलकुल पक्का पक्का देख ये बात।
- 15:54युद्ध के तुम शब्दों में उसे उलझाने की चेष्टा करोगे, लेकिन
- 15:58बोल। वह तो बोला नहीं जा सकता, वह तो
- 16:03देखा नहीं जा। सकता बिल्कुल ठीक है।
- 16:07लेकिन जीस तरह भी वो देखा जा सकता है वैसे मैंने देखा।
- 16:17वह ज़रा भी बदले नहीं झाँकेगा। वह शास्त्र प्रमाण।
- 16:22नहीं देगा ये देखो ये। शास्त्र का प्रमाण लो।
- 16:25कृष्ण कह गए कबीर कह। गए वो कहेगा।
- 16:29मैंने देखा कृष्ण कबीर को। छोड़ो कृष्ण कबीर बेमानी है यहाँ
- 16:38यहाँ तो। मेरी।
- 16:40आँखों में ही निहार है और संत बड़ा जादू होता है, क्योंकि उसके
- 16:55भीतर लोभ जो अहंकार करता है, बैनी होता है।
- 17:09अहंकार ही प्रसिद्धि पाना चाहता है।
- 17:13अहंकार धन कमाना चाहता है। जो जो सीढ़ियों अहंकार को दिखाई
- 17:20पड़ती है उस आनंद को प्राप्त करने में।
- 17:28वह उन उन सीढ़ियों को पाने की चेष्टा करता है लेकिन उन सीढ़ियों
- 17:32से वो मिलता है और संत भीतर से मारा होता है।
- 17:46चेतना जागृत होती है। अहंकार।
- 17:49मटा होता है। एक तल पर वो मट।
- 17:51जाता है। तो दूसरे दल पे वो हो जाता।
- 17:54है। संत के भीतर सहन शक्ति बहुत होती
- 18:02है। इम्युनिटी है सहन शक्ति।
- 18:11वो मेरे सब्र का इंतिहान लेते हैं।
- 18:16वो मेरे सब्र का इम्तिहान लेते हैं बिचारे मालूम नहीं उनको
- 18:25मर्दों के पास सब्र ही तो होता है जिसका अहंकार मर गया।
- 18:38उसमें सबर ही सबर होता है। वो मेरे सबर का इम्तिहान लेते हैं
- 18:51बिचारे मालूम में के मूर्तों। में तो सबर ही सब्र।
- 18:58होता है जो मर गया उसमें सबर विराट रूप में होता है।
- 19:10जितना विराट उसका अस्तित्व उतना। विराट उसका सबर।
- 19:21मुझे किसी शिक्षा निकाली निकाल। दी थी माँ की मैंने कहा बेटी मेरी
- 19:26माँ तो है नहीं। अब ऐसी भी प्रतिक्रिया दी जा सकती
- 19:30है। जरूरी नहीं है कि।
- 19:33राजनीतिक गोटियां बिठाने के लिए ही रोना धोना किया जाए।
- 19:41उसने माँ की गाली निकाली, मैंने कहा पुत्री मेरी माँ तो है नहीं।
- 19:48उसने बहन की गाली निकाली, मैंने कहा।
- 19:54बेटे दो। बहनें थीं।
- 19:56दोनों मर गई। अब तू ये जो गाली निकाल रही है ना
- 20:02ना तो माँ है मेरे ना मेरे बहन है।
- 20:05अब दोनों चली गई इस गाली को तू अपने।
- 20:08पास ही रख ले। यही बुद्ध कहते हैं, तुम्हें समझ
- 20:14नहीं। आता?
- 20:15गालियां तुम देते हो लेकिन मैं रखूँगा ही नहीं।
- 20:19जब तो गालियां किसके पास रहती हैं, तुम्हारे ही पास रहती हैं
- 20:26लेकिन रोना धोना होता है। मात्र एक छलावा मगरमच्छ के।
- 20:30यहाँ कहीं पे निशाना। कहीं पे निगाहें।
- 20:38इतनी सर्कस करने की आवश्यकता नहीं होती।
- 20:41तुम कितने ही हाथ पैर मार लो तुम हज़ारों स्याण पे कर लो।
- 20:52लाखों से यान। पे कर लो, बाबा कहते हैं और
- 20:56बिल्कुल भी सेयानपना करो। अगर वो परवर्धगार की निगाहें।
- 21:05सीधी हैं तो फिर तुम्हें कोई सर्कस करने के ड्रामेबाजी करने की
- 21:12जरूरत नहीं है। रामलीला करने की जरूरत नहीं है।
- 21:18गर्मी आवे कपड़ा नजरी। मोख दवार।
- 21:22उसकी कृपा से ही तुम्हें मानव। शरीर मिलता है और उसकी।
- 21:26नजर होने से ही मुक्ति का। द्वार खुल जाता है।
- 21:34लिबरेट हो जाते हो, तुम्हें पता चल जाता है क्या क्या धो परखा।
- 21:39था मैंने इस संसार के प्यार में पढ़कर।
- 21:49इस हीरे ने अपनी चमक के ऊपर। ना जाने कौन?
- 21:53कौन से कीचड़ मर गए थे और अब ऐसा है कि यह हीरा।
- 22:03तो दिखाई नहीं पड़ता है। हीरे के ऊपर हमने जो मान्यताएँ
- 22:10छिपेट। ली हैं।
- 22:12शिकरों की बस वही दिखते हैं। क्या से क्या हो गया बेवफा?
- 22:37तेरे प्यार में मांगा था क्या मिला?
- 22:57बेवफा तेरे प्यार में। क्या से क्या हो गया चाह था क्या
- 23:15मिला? बेवफा तेरे प्यार में यह संसार
- 23:22बेवफा है। तुम चाहते हो कुछ और और तुम्हारी
- 23:29भान्ति यह कहती अगर गद्दी मर गई तो?
- 23:31सब मिल जायेगा। तुम्हारी भ्रांति ये कहती है अगर
- 23:37धन के अम्बार। लग गए तो सब मिल जाएगा।
- 23:39एक जहाज खरीद लूँ, बस सब मिल जाएगा लेकिन काश।
- 23:47काश सभी मिल पाता सभी मिलता है। लेकिन।
- 23:54तब मिलता है जब तुम सब खो देते हो।
- 23:59ये गणित बड़ा उल्टा। है।
- 24:03ये बुद्धि की पकड़ में आता नहीं। बुद्धि सीधा सीधा गणित जानती है
- 24:07दो। और दो चार।
- 24:10बुद्धि वो गणित नहीं जानती। जो संत जनते संत कहता है पूर्णश्य
- 24:25पूर्णमाताएं पूर्ण विवाह विशिष्ट। पूर्णमय से पूर्ण निकाल लिया है
- 24:33तो पूर्ण ही शेष बचता है। ये संत की बुद्धि कहते हैं
- 24:40तुम्हारी बुद्धि कहती। है।
- 24:41100 में से 100 निकाले तो बचेगा शो न।
- 24:46तुम्हारी बुद्धि काम नहीं करती। इसीलिए तो पहुँच ही नहीं पाती।
- 24:53संत की बुद्धि कहती है 100 में से 100।
- 24:55निकाल ले। पूर्णस्य पूर्णमादाएं
- 24:57पूर्णमेबावशी। सर्वे इसलिए संत कहते हैं।
- 25:04कि बुद्धि से वो मिलता। नहीं, इसको छोड़ दो जितनी जल्दी
- 25:08हो सके हिसाब किताब लगाने वाली इस बुद्धि को।
- 25:11छोड़ दो, छोड़ दो। इसके लगाओ।
- 25:18ऐसे तो कहाँ बुद्धि को धर के आओगे सरे नुरोंज को उठा के पटक के आओगे
- 25:22क्या छोड़ दो का मतलब क्लिंगनगनेस हटा लो बुद्धि से मैं बुद्धि हूँ
- 25:31मैं भेजा। हूँ ये।
- 25:32क्लिंगनगनेस को हटा लो। तब भी छूट गई मैं।
- 25:38शरीर हूँ इस क्लीनगनेस को जब काहट को हटा लो तो शरीर।
- 25:43छूटा? मैं विचार हूँ मैं भावनाओं हूँ।
- 25:48मैं प्राइम। मिनिस्टर हूँ, मैं चीफ मिनिस्टर
- 25:51हूँ, मैं एमएलए हूँ, मैं एमपी हूँ, मैं हूँ।
- 25:54ये तुम्हारे थोपे हुए मापदंड हटा दो।
- 25:59यही तो चिपकाहटें थीं और चिपकाहटें मात्र एक छलावा थीं।
- 26:06सत्य में नहीं थी, तुम गद्दी नहीं थे।
- 26:15वो गद्दी पर बैठे बैठे। तुम्हारी आँखों में बड़ा सुरूर।
- 26:20था, नशा था, शानो शोकत थी। लेकिन तुम्हें पता नहीं था ये
- 26:30सुरूर गद्दी मेरा पर, जैसे ये मौत उसे छीन लेती है या जनता उसे छीन
- 26:39लेती है तुम्हारी आँखें तब खुलती हैं क्यों?
- 26:45यह तो मेरा था नहीं। यह तो मैंने मान।
- 26:48रखा था कि मेरा ऐसी ये मान्यताएँ ही तुम्हारी।
- 26:55मोड़ताएँ यही तुम्हे गुलाम रखते, ईंट नीचे से उठती, ऊपर जाती, ऊपर
- 27:08मजदूर पकड़ लेता। मैं ये सब कुछ देखता रहा और जब
- 27:18लैंडर। कंप्लीट हो गया तो मैंने सभी
- 27:22मज़दूरों को। उनकी जो दिहाड़ी होती होती।
- 27:27है। और उस मजदूर को जिहाड़ी भी दी।
- 27:34अलग से थोड़ा सा। पुरस्कार भी दिया और चुपके से
- 27:42उसके पांव भी छुए और थोड़ा मुस्कराया।
- 27:52जैसे कह रहा हो कि आखिर तुमने मुझे जान।
- 27:56लिया मैं दूर के बख्मे। ने जानी।
- 28:08किस देश में नारायण में? जाए।
- 28:14तुम सोचोगे अगर परमात्मा कहीं। होगा तो सोने का मुकुट पहन रखा
- 28:22हो। मोरू मुकुट लगा लिया होगा वैजयंती
- 28:27माला उसके गले में। तो मैं क्या?
- 28:32करता वह एक अमर दूध सिर्फ हड्डी मात्र मयदूर।
- 28:40के भीतर भी हो सकता है। उसी का ही तो सारा पसारा है?
- 28:50लेकिन काश तुम इस राज़ को समझ सकते काश कोई दिन।
- 28:57ऐसा शुभ आए पल्टू शुभ दिन शुभ घड़ी याद।
- 29:02पड़े जब नाम। लगन, मुहूर्त, झूठ सब।
- 29:07और बिगाड़ें का तुम्हारी बुद्धि तो लगन मुहूर्त निकलवा के काम को
- 29:12बिगाड़ देती है तो पल्टू कहते हैं वो ही शुभ दिन और वो ही शुभ घड़ी
- 29:18है जब उसकी। याद आ जाए।
- 29:25जैसे ही उसकी याद आई वैसे ही सारे धर्म टूट गए।
- 29:31तुमने जो मान रखा था। खंड विखंड हो जाएंगे।
- 29:35वही चीजें जो कोई दूसरा व्यक्ति तोड़ता तुम्हारी मान्यताओं को तो
- 29:40तुम गुस्सा हो जाते, आँखें लाल कर देते, लेकिन वही चीज़।
- 29:46तुम्हारा एक दर्शन सभी पाखंडों। को खंडित कर देता।
- 29:52है। जीस दिन तुम्हारा भ्रम टूट जाए और
- 29:59जीस दिन तुम्हें सत्य का दर्शन हो जाए।
- 30:02पलटू कहते है वो ही दिन वो ही शुभ गढ़।
- 30:08कमारे भ्रम टूट जाएं शुभधन शुभ अड़ी वही होती है।
- 30:19चलो, सुहाना। भरम तो टूटा जाना के भूषण क्या है
- 30:34चलो सुहाना भरम तो टूटा जाना। के हुस्न।
- 30:44क्या है कहते हैं जीसको प्यार? दुनिया।
- 30:56क्या चीज़ क्या बला है? दिल है क्या न स बेवफा हाँ।
- 31:23तेरे प्यार में क्या से क्या हो गया?
- 31:37बेवफा यही होता है जब तुम्हारी सारी उम्मीदों से पाली गई संपदा
- 31:52तुम्हारी गद्दियाँ तुम्हारे मान सम्मान।
- 31:56तुम्हारी शोहरत। तुम्हारे ये झुंड तुम्हारे ये
- 32:03फॉलोवर्स। तुम्हें दिखाई।
- 32:11पड़ता है बोझ के अलावा। और कुछ नहीं कहती है जीसको प्यार
- 32:21दुनिया क्या चीज़ क्या बोला? दिल ने क्या ना?
- 32:27सहा बेवफा तेरे प्यार। में तुम ऐसा इसके।
- 32:34प्यार में। डूबते हो कि इसी के हो के रह जाते
- 32:39हो, बस यही भर में है। तुम इसी के ही हो गए हो ठगणी ने
- 32:46तुम्हें ठग दिया। कहते हैं गुरख माया।
- 32:54तो ठगणी भाई ठगत फिरत सब देश जा। ठगने ठगनी ठगी।
- 33:04त ठग को आदेश। गोरख कहते हैं कि मैं उस।
- 33:10ठग को। आदेश करता हूँ जिसने इस ठगनी को
- 33:14ठग। लिया और वह व्यक्ति एक जगह के ऊपर
- 33:19शांत बैठा नजर आएगा। मन में कोई उत्पाद नहीं है मन में
- 33:24कुछ। पाने के लाल संग कोई भाग दौड़
- 33:29कहीं जाना नहीं, कहीं आना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ खोने का बैन
- 33:35कुछ भी तो नहीं है। शांति ही शांति है, आनंद ही आनंद
- 33:41है। मिठास ही मिठास है, रसीयस है मने
- 33:50मार्क ठक न पाए। जो मन से पार हो।
- 33:55गया। उसको संसार की कोई भी।
- 34:02अड़चन अपने आप तक पहुंचने में बाधा नहीं बन सकती।
- 34:09मन ने जो मन से पार हो गया मार्ग जग पात्र।
- 34:17भी मन ने। मार्ग ठाक न पाए जो मन से पार हो।
- 34:24गया उसको अपने आप तक। मैं।
- 34:28क्या हूँ ये जानने तक किसी प्रकार की कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती
- 34:33रास्ते। में मन ने।
- 34:39पथ शिवों पर घट जाए इज्जत से ईमान से जो व्यक्ति अपने मन से पार चला
- 34:49गया वह इज्जत। बा इज्जत अपने घर को वापस।
- 34:55लौट जाता है। जाते तो तुम भी हो लेकिन बड़े
- 35:08बेयाबरू होकर तेरे। कुचे से हम निकले।
- 35:21निकलना सुनते आए थे अदमका वहिष्ठ से, लेकिन बड़े भयावह होकर तेरे
- 35:29कुचे से हम निकले। पार्थो तुम भी होते।
- 35:36हो? लेकिन ब्यावरू हो के निकलते हो
- 35:41उसके? कुचे से बाबा कहते हैं जो मन।
- 35:46के पार हो गया। बस इतनी सी बात है मन से उलझना
- 35:54नहीं है। और मन के पीछे नहीं चलना है।
- 35:58मन से बैर नहीं करना है और मन? से शास्त्र अर्थ नहीं करना है।
- 36:04ये दो चीजों को हल्की सी बातें हैं।
- 36:07दोनों जिसने त्याग दिया उसको ज्यादा शास्त्र वगैरह पढ़ने की
- 36:13जरूरत नहीं है। दो अक्षरी काफी है।
- 36:17ना तो अपने मन के साथ बहस करो, वो जो बोलता है बोलता रहे, उसकी
- 36:23मर्जी है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व है भाई ये
- 36:30औजार है तुम्हारा जैसे पंखा चलता ट्यूब चलती।
- 36:36एसी एसी चलता पंप चलता मोटर चलता ऐसे ही तुम्हारा औजार यह बात ठीक
- 36:46यह तुम्हारी शक्ति के बने चल और तुम इनके साथ बहस करके।
- 36:56जब बहस नहीं करते तो इसके पीछे लग जाते हो।
- 36:58मन कहता है भोग लो, तुम कहते हो ठीक है भोग।
- 37:00लेते हैं इन दोनों। कारणों से तुम मन को।
- 37:09शक्ति देते हो? ये दोनों कारण ही तुम्हें संसार
- 37:14में। फंसा देते हैं लड़ोगे?
- 37:18तो भी तुम्हारी शक्ति वहाँ जाएगी, देखो ना बाली की धारण।
- 37:21देखी तुम कहते हैं एक पात्र हुआ रामायण में उसका नाम था बाली
- 37:32भगवान राम ने। उसको पीठ के पीछे से धोखे से।
- 37:35मारा वह मन था। ना?
- 37:42मुस्का रख दिया बाली बाली के साथ जो लड़ेगा, सम्मुख हो के लड़ेगा,
- 37:50उसकी आंधी शक्ति उसमें चली जाएगी, तुम मन से लड़ते हो।
- 37:58तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारी। जो शक्ति है मन के पास वो
- 38:03तुम्हारी ही दी हुई है अपनी ही शक्ति से तुम लड़ते हो जो आंधी
- 38:11शक्ति तुम्हारी बाली के पास चली गई बाली तो उसी शक्ति से तुम सिहर
- 38:16लेगा। उसकी शक्ति जो रह गई वो व्यर्थ
- 38:20में उसके पास है ही तुम उसको क्या जीत पाओगे?
- 38:25मन को तुम जीत नहीं पाते मन। को जीतने का एक ही।
- 38:31ढांग है नरलुप्त हो जाओ, मन से पार हो जाओ।
- 38:38उसी को बाबा। कहते हैं मन मैंने।
- 38:41पिछली वीडियो में मनने की। बड़ी लंबी जोड़ी उदाहरण दी थी।
- 38:48जब तुम मन के साथ द्रोह नहीं करते तो तुम्हारी।
- 38:52शक्ति मन को जाती। और उसी शक्ति?
- 38:56से मान्य लड़ना था। तुम्हारे साथी ना बैर करना, ना मन
- 39:06के पीछे लगना। अगर।
- 39:11दोनों चीजों को तुम त्याग दो। एक शब्द कहा रहिम में रहिमन ओछे
- 39:27नरन सुन बैर भली न प्रीत गौर से सुनने का ये शब्द को ये मन की बात
- 39:35है। रहिमन ओछे नरन सुन वैर भली न
- 39:40प्रीत। काट्य चाट्य स्वान के दोहुँ भात व
- 39:45पड़ी जब उच्छ नर है। उसे न तो वैर करो और न उससे प्रीत
- 39:53करो, जैसे कुत्ता। काटते चाटते स्वां के अगर उससे
- 40:00प्रेम करोगे तो चाटते। का?
- 40:03लाल। उसके पास हो तो मेरेबिज भी हो
- 40:07सकता है। काटते का तो मेरेबिज।
- 40:10हो सकते है। काटते चाटते।
- 40:12स्वां के तो वो वहाँ से? रहीम बड़ा सुंदर शब्द कहते हैं
- 40:20इसका अर्थ। करने वालों ने अनर्थ।
- 40:23कर दिया। यह बात कही गई थी।
- 40:26मन के। ओछा नर्ण इस संसार।
- 40:31में एक ही है। और वो है तुम्हारा मन, सभी का मन
- 40:37अच्छा होता है। रहिमन ओछे नरणते बैर बलो न प्री,
- 40:47जो दुष्ट व्यक्ति। है।
- 40:52जीसको तुमने उधारे पैसे दे दिए? कल को मांगे तो कहेगा नहीं वो
- 40:58मैंने लेने हैं तुमसे। तुमने ऐसे नरणा ओछो जबकि एक दूसरा
- 41:08उपाय। भी है।
- 41:10अगर तुम्हारे पास नहीं है तो उसका पैर।
- 41:12कभी है नहीं। मेरे पास जरूर ही थाने के जहरी
- 41:20करना है लेकिन ओछे रण की यही पहचान।
- 41:24है ये तुम्हारे मन की बात कही है। रहिमन ओछे नरते, बैर भली, ना
- 41:34प्रीत ना तो मन के साथ छिप को प्यार न करो, ना ही।
- 41:41उसको दुत्कारो उससे द्रोह मत। करो काटे चाटे स्वाण की मन को
- 41:49कुत्ता कहा उसने। ऐसे ही नरन।
- 41:52कुत्ते के समान अगर कुत्ता काटेगा तो अगर चाटेगा तो।
- 42:05भाई उसकी लार से। ये बात कही मन मने मार्ग ढकन पा
- 42:20मने पत से प्रगट जा। इज्जत से ही जाता।
- 42:25है उस दरबार में। बेइज्जत नहीं होता आदम की।
- 42:30तरह। मने मगना चल पंथ।
- 42:42अगर इस एक। शब्द को समझ लो।
- 42:46तो किसी अन्य शास्त्र। को पढ़ने की जरूरत नहीं है मैं।
- 42:50रोज़ कहता हूँ। सभी।
- 42:53शास्त्रों से ऊपर। मैं जब जी साहब को।
- 42:56रख सकता हूँ? क्यों एक छोटा छोटा।
- 43:00शब्द पूरा वेद है एक एक शब्द पूरा वेद है।
- 43:08ऐसा उपहार दे गए। बाबा, हम जाते जाते हैं।
- 43:15लेकिन इसकी बात मानेगा कौन? और फिर जो इसकी बात मानेगा नहीं,
- 43:23वह सुखी होगा। कैसे तुम कहते हो दुनिया सारी
- 43:27दुखी है और दुखी है रोज़ देखता हूँ।
- 43:31ये लोग कह सकते हैं बाबा। आप धड़ल्ले से छती के ऊपर हाथ मार
- 43:35के कहते हो मैं तो सुख हूँ। मैंने कहा, भाई।
- 43:38हूँ कोई झूठ। थोड़ी बोल रहा हूँ।
- 43:42मैं सुख का हूँ भाई और उसका कारण रोज़।
- 43:45समझाता हूँ मैं। इस कष्ट क्ले शिक्षा, तनाव,
- 43:54व्याधी, रोग। शोक?
- 43:57इस सब का कारण है मैं इसको त्याग दूँ, यही तुम त्यागना नहीं चाहते।
- 44:05इसको तो इसके साथ। तुम चिप बदलना चाहते।
- 44:12और रहीम इसको कहते। है ओच्छ अगर एक शब्द को आप आप।
- 44:20ठीक से समझलोगे तो किसी अन्य शास्त्र को पढ़ने की जरूरत नहीं।
- 44:24फिर यहीं रोक देना। जपजी को भी यहीं रोक?
- 44:28देना मन में मगना चले पंथ। अगर।
- 44:35तुम मन से पार होना सीख गए। अगर ये कला तुम में सफर हो गई मन
- 44:42में मगना। चले पंथ।
- 44:47तो फिर भूल जाना। कि तुम्हें किसी और शास्त्र की
- 44:49जरूरत तो पड़ेगी ही नहीं। जैसे ही तुम मन से पार हुए वैसे
- 44:53ही। बरसने लगा अम्बार से बोरस।
- 44:56सच खंड से वह मृत। बरस मन में मन से पार हुए मगना
- 45:04चले पंच। बस यही रास्ता है मन से पार हो
- 45:11जाओ। अगर तुम मन से पार होने की कला
- 45:16सीख गए तो फिर किसी और पन्थों में।
- 45:21किसी डेरों में, किसी आश्रम में, किसी।
- 45:24गुरुओं में ठगों के पास जाने की। तुम्हें जरूरत नहीं पड़ेगी ना
- 45:32पांच नाम जपने पड़ेंगे ना राधे राधे करना पड़ेगा।
- 45:41ना कोई अज्ञशास्त्र कहानियों, ना भागवत प्राण की कथाएं, कुछ भी
- 45:47नहीं करना पड़ेगा तुम परम पवित्र को।
- 45:51मने मग्न चल है पंथ बाबा का एक शब्द नोट कर लेना।
- 45:59इस एक शब्द को अगर तुम्हारे हृदय में।
- 46:01उतर जाने दिया तुमने। तो फिर तुम पाओगे कि इससे आगे तुम
- 46:07जपजी को भी पढ़ने की जरूरत। नहीं है।
- 46:12एक एक वचन बाबा का? वेद है वेद जो मन से पार हो गया
- 46:24यह विधि। है तुम्हारे विज्ञान भैराव तंत्र
- 46:31में 112। विधियों।
- 46:34जहाँ तक पहुंचाती हैं वो ही विधि है ये उनका।
- 46:39सार। तत्व है ये कोई भी।
- 46:44विधि 112 विज्ञान भैरवतंत्र की विधियों हैं।
- 46:48वो तुम्हें क्या करती है? मन से पार से गुजरती है और कुछ
- 46:52नहीं करती। अगर कोई विधि में मन से पार न
- 46:56लेके जाए। तो समझना वह काम करेंगे।
- 47:01तो ज्यादा व्याख्याओं में मत पड़ो बाबा इसके ऊपर भी बोल दो बाबा
- 47:06इसके ऊपर भी बोल दो क्यों बोल दूँ भाई जब तुम्हें रस फैला रहा हूँ?
- 47:14और वह रस ही है रसोवैसा तो फिर? तुमने नागार्जुन के शून्य से लेना
- 47:23क्या है? तुमने बाकी पंथों से लेना क्या है
- 47:28क्योंकि? बाकी पंथ अगर देखा जाए।
- 47:31सभी वहीं पहुंचाएंगे। केंद्र की तरफ।
- 47:35अंत में जाकर सभी विरोधी पंथ तुम देखोगे एक ही जगह पे जाकर चाय
- 47:41पीते हैं। अगर सच में बोलूं तो।
- 47:46एक ही जगह में जाकर एक ही मैखाने में।
- 47:50जाम ढलते हैं, वहाँ सबकी सुराही इकट्ठी है।
- 48:04हिंदू? मुस्लिम, सिख, ईसाई एक दूसरे के
- 48:09जामों को बरतें। और हिंदू जाम को भरता है।
- 48:20मुसलमान पीता है, मुसलमान जाम को भरता है, ईसाई पिता और ईसाई भरता
- 48:26शेख पीता। वह मैं खाना इतना काबिले तारीफ कि
- 48:36उसका बयान नहीं हो सकता। और फिर तुम पीते।
- 48:44ही चले जाओ। पीते ही चले जाओ।
- 48:47जैसे जैसे पीते जाओगे। तुम्हारी प्यास घूसती जाए।
- 48:53और ज़रा सी दे देसा की और ज़रा सी और।
- 49:01और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और।
- 49:08कैसे रहूं चुपके मैंने पी ही। क्या है?
- 49:15होश भी तक है बाकी। और।
- 49:23ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे।
- 49:28रहूं चुप के मैंने। पी ही क्या है थोड़ी?
- 49:32सी तभी है मैं अभी अभी तो आए हो। होश भी तक है, बाकी देखो बातें।
- 49:46कर रहा हूँ इतनी होश है बा होश जितनी पीता ही गया, होश में आता
- 49:55ही गया ये वो शरबत है। जिसका होश निराला है।
- 50:06जहाँ बेहोशी नहीं आती, यह तुम्हारे इन ठेकों की शराब नहीं
- 50:12है, यह उस परमात्मा के दरबार की शराब है।
- 50:16ज़रा। चक्के तो देखो एक बार।
- 50:21संत। कहता है इसे चख लो मगजकपाई मत करो
- 50:25तर्क वितर्क मत करो यहाँ जाओ बस थोड़ा सा घूँट भर लो, एक बार इसी
- 50:32के होके रह जाओ फिर तुम सब छोड़ दोगे नहीं सब छूट जाएगा।
- 50:39हेरों को देखकर कंकड़ पत्थरों से भरी हुई मुठ्ठियां कुल जाया करती
- 50:43हैं। अपने आप खोलनी नहीं पड़ा करके।
- 50:48मने मगना चल ले पंथ। फिर किसी और पंथ पे यानी किसी और।
- 50:55राह पे। चलने की जरूरत कहाँ रह जाती है?
- 51:00अगर तुम मन से पार हो गई, ये मन ही है एक रुकावट, इसी को लांघलो
- 51:08यही रास्ते। की है।
- 51:13यही पत्थर है। जो तुम्हारे झरने को फूटने से रोक
- 51:17देता है। ये झरने के ऊपर रखा हुआ विशाल का
- 51:20ये पत्थर है, इसी को उठा लो और झरना तत क्षण फूट पड़ेगा।
- 51:33बाबा कहते हैं मन है मगना चल रहे पंथ।
- 51:38तो किसी अन्य धर्मों में अन्य पंथों में भटकने की भौंकने की
- 51:42जरूरत नहीं है। बाबा सीधा सीधा बोलते हैं।
- 51:45मन है मगना चल रहे। पंथ।
- 51:51अगर तुम मन से पार होगे छोटी सी तरकीब एक तरकीब ने सारा महफिल लूट
- 51:58लिया, सब खजाना खाली तुम्हारे वस्त्रों।
- 52:04का? एक अलफ़ाज़ ले गया प्राणों को।
- 52:14ये जादू। सैया ले गई जिया तोरी पेहली नजर।
- 52:28सैंया ले गयी जिया तोरी पे ली नजर।
- 52:36कै। सजा तू किया तुने मोपे हो जा, तू
- 52:43घर सैंया ले गयी जिया। थोड़ी पहेली ही नजर।
- 52:52मरने मगने चल रहे पंच अगर मन से पार हो।
- 52:59गए तो किसी और रास्ते पर भौंकने की जरूरत नहीं है।
- 53:04डेरों में बैठो बांस। पे चढ़ते जाओ।
- 53:07जापते जाओ ये मूर्खों के कारनामे हैं सर्कस।
- 53:10करते हैं न खुद? पहुंचे हैं न तुम्हें, पहुंचने
- 53:14देंगे ये बड़ा भारी पाप? मारे हैं तुम इनके पाप।
- 53:21की गिरफ्त से बाहर जाओ। बाबा क्या कहते है तेरे को बाबा?
- 53:32कहते है मन में मगना। चल रहे है।
- 53:35बस मन से बाहर हो जाओ जी ये सूत्र है छोटा सा।
- 53:38सूत्र है। और किसी सूत्र की आवश्यकता है?
- 53:43मग न? चल रहा है पंथ फिर।
- 53:45कोई और मार्ग के ऊपर चलने की जरूरत नहीं है।
- 53:49किसी पंथ के ऊपर अवशकता खत्म हो गई एंड नाउ यू नीड नॉट टू।
- 53:55वरी, तुम्हारी सब चिंताएँ जरूरतें समाप्त हुई, भय भ्रम का नाय हुआ।
- 54:09सब व्याधियाँ आदि व्याधि सब समाप्त।
- 54:13हुए मने मगनाचल्लै पंथ मने धर्म सेति संबंध।
- 54:24क्या प्यारा शब्द है बाबा कहते है के मन में मन?
- 54:29के पार होने से धर्म से सच्चा सच्चा संबंध स्थापित।
- 54:32हो जाता है। अगर तुम मन से पार हो गए, फिर
- 54:38तुम्हें हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई का झंडा नहीं उठाना पड़ेगा।
- 54:42धर्म से सीधे सीधे जुड़ाव हो गया। तुम्हारा धर्म से जुड़ गए सच्चे।
- 54:49धर्म से हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी ये नकली नकली।
- 54:56धर्म है असली नहीं असली धर्म बाबा कहते हैं वो है।
- 55:01जो मन के पार होकर उससे संबंध जुड़ जाता है असली धर्म से
- 55:06तुम्हारा। जैसे ही तुम मन।
- 55:10के पकड़ के भीतर हो तो धर्म। के साथ तुम्हारा संबंध।
- 55:15जुड़ ही नहीं। सकता।
- 55:20यह नामुमकिन है के तुम मन। से भी संबंध बनाकर रखो और धर्म से
- 55:26भी संबंध बना लो। बाबा कहते हैं, ये तो।
- 55:29असंभव है। तो फिर धर्म से संबंध कैसे?
- 55:36धर्म ही आनंद है। धर्म में वो प्याला है।
- 55:41वो मैं खाना है जहाँ। सभी इकट्ठे बैठ के।
- 55:45जाम डालते हैं। सांझ जली।
- 55:56ख्याला गया दिशा। उनका?
- 56:09ख्याला गया। वो ही ज़िन्दगी का सवाल आ गया,
- 56:28ईशा। मन में धर्म से तुम धर्म से संबंध
- 56:41स्थापित करना चाहते हो, कोई झंडा झंडा मत उठाओ।
- 56:47बस एक ही तरीका है बाबा कहते। है मन से पार हो जाओ मन में, मन
- 56:52में मन में। मन में तरम से ती संबन्ध अगर धर्म
- 56:59के साथ संबंध। जुटाना चाहते हैं।
- 57:01अभी तो अधर्म के साथ संबंध है। नाम जप लो वो कर।
- 57:05लो ये कर लो वो कर। लो।
- 57:07पांच नाम जप लो 10 नाम जप लो 1000 नाम जप लो।
- 57:10ये धर्म नहीं है ये। अधर्म है भाई, काश बाबा जी की
- 57:19जपजी को आपने ठीक से गुणा होता गुण कर हृदय में उतारा होता।
- 57:25तो आज तुम दुखी न हो। आज तुम भागे भागे न फिरते दौड़े न
- 57:32फिरते संसार की किसी प्रकार की वासनाएँ तुम्हें अपने चंगुल में न
- 57:39लपेटती तुम संसार के थपेड़ों से आहत न होते तुम लूट पिट।
- 57:46न जाते। आज इस संसार ने तुम्हें लूट।
- 57:50पिट लिया है, क्यों? क्योंकि?
- 57:54तुम मन की गर्भस्थ। में हो और बाबा कहते हैं मन की
- 57:58गर्भ से बाहर हो जाओ, मन में मन के पार हो जाओ मन की।
- 58:04से पार हो जाओ। मने धर्म से तीसा, न बंध धार्मिक
- 58:10तो सभी होना चाहते हैं। धर्म से संबंधित तो सभी जोड़ना
- 58:14चाहते हैं। वह धर्म के मैं का प्याजा, रस का
- 58:17पहला तो सभी पीना चाहते हैं, लेकिन खोपड़ी को तुम।
- 58:19छोड़ते नहीं यही मुसीबत है। छोड़ दो अगर धर्म से संबंध जोड़ना
- 58:38चाहती तो संबंध एक ही चीज़ से जुड़ेगा।
- 58:42या तो मन से जोड़ लो। या धर्म से +2।
- 58:47तो बाबा कहते हैं, देखो। अगर तुम धर्म से संबंध जोड़ना
- 58:52चाहते हैं तो मन से संबंध। जोड़ना पड़ेगा दोनों।
- 58:56से संबंध यज्ञ से नहीं। जुड़ सकता या।
- 59:00धर्म से जुड़ेगा या मन से जुड़ेगा?
- 59:04अभी तुम मन से संबंध जुड़े हो तो धर्म से संबंध जोड़तें नहीं
- 59:09धार्मिक तुम नकली नकली। हो?
- 59:12मंत्र चले जाओ गुरुद्वारा चले जाओ मस्चि चले जाओ मसीब चले जाओ,
- 59:20चर्चे चले जाओ नकली नकली धार्मिक हो अभी।
- 59:24असली धार्मिक नहीं असली धार्मिक तो अपने भीतर के।
- 59:28तीर्थ में जाना होता है। अपने भीतर के मंदिर, मस्जिद,
- 59:33गुरुद्वारा में जाना। होता है तो बाबा कहते हैं, अभी तो
- 59:37तुम हो अधार्मिक बाबा कहते हैं, अभी।
- 59:41तो तुम हो, अधार्मिक। लेकिन खुद को माने हुए।
- 59:45हो धार्मिक यही। क्लेश तुम्हे दिन भर।
- 59:50रात सताए जाता है हजारों हजारों रास्ते तुमने गलत खोज लिए अभी कल
- 1:00:02ही मैं सुन रहा था। एक व्यक्ति है वो विनाश की बातें
- 1:00:06करता रहता। है उसको उसको कंस्ट्रक्शन की
- 1:00:09बातें अच्छी नहीं लगती। डिस्ट्रक्शन की बातें करता है,
- 1:00:13गांव के गांव उजड़ जाएंगे। कहता है उल्का पिंड बरस नहीं
- 1:00:18लगेंगे, आग बरसेगी, हमारे लिए गढ़ जाएगा।
- 1:00:23और पानी ही पानी हो जाएगा। ये धरती विलीन हो जाएगी।
- 1:00:27इस मूर्ख को परल ही परल दिखती है और परल ही परल सूझती है और इसको
- 1:00:36ये नहीं पता की परल तुम्हारे भीतर है भाई।
- 1:00:43जब देखो जब देखो यह मरो खप्पो की बात करें देख लो जाके और वैसे ही
- 1:00:53इसका चेहरा है मुँह के ऊपर। 12 बजकर 3.75 मिनट में।
- 1:01:02मरा मरा सा जी रहा है, ये हो जाएगा वो हो जाएगा वही भय और लोभ
- 1:01:09ये दोनों चीजों नहीं तो लूटा तुम। कहाँ तक नाम गिनवाए, सभी ने हम को
- 1:01:27लूटा है, सभी ने हम को लूटा है। गांव के गांव डूब जाएंगे उल का
- 1:01:39पिंड वर्षेंगी सूरज आग फेंकेगा ठीक है भाई फेंकेगा फिर कौन
- 1:01:46बचेगा? कहता वो बचेंगे जो त्रिकालु।
- 1:01:52संध्या करेंगे तो मेरे पास एक शिक्षा है बाबा।
- 1:01:58फिर क्या विचार है ये? कहता त्रकाल संध्या जो करेंगे वो
- 1:02:03बचेंगे और त्रकाल संध्या पूछनी है मेरे पास आ जाओ, मैंने कहा देख
- 1:02:08बेटे बस। जाना है तो चले जाओ।
- 1:02:13मैं किसी को बुलाता भी नहीं हूँ और जाते को रोकता भी नहीं।
- 1:02:17लेकिन एक बात सुन ले सिर्फ त्रिकाल संध्या करने वाले
- 1:02:21डूबेंगे, बाकी सभी बचे जाएंगे, अब तू जाना है, तू चलाएगा।
- 1:02:27मेरे से क्या पता? अकेला यही मरेगा बाकी सब बचे
- 1:02:33जाएंगे उल्का पिंडों से। अकेला त्रिकाल संध्या करने वाला
- 1:02:40ही डूबेगा। त्रिकाल संध्या जो नहीं करता, वह
- 1:02:46तो मज़े से सोएगा। राति पोकण राति जागण इस दर्गादे
- 1:03:03कुत्ते राति पोकण राति। जागण इस दर्गादे कुत्ते बोले।
- 1:03:11शाह जी न रब थे, चादर तान के सुते दी में।
- 1:03:16कमली? क्या लेना है तुमने इन?
- 1:03:22मुल्खों से उल्लुओं से मन के पार हो जाओ और चादर तान के सो जाओ जो
- 1:03:38त्रिकाल। संध्या करेंगे, वही उड़ेंगे।
- 1:03:42उन्हीं पर उल्का पिंडें बरसेंगी उन्हीं पर सूरज कहढ़ आएगा सिर्फ
- 1:03:47वो ही बच जाएंगे जो त्रिकाल। संध्या नहीं।
- 1:03:50करता है। फिर काल संध्या करने वाले तो
- 1:03:55उल्का पिंड न भी करे। मरे ही पड़े जो समय की सेवाओं में
- 1:04:00बंध गया। तो मर ही तो गया इतना बड़ा बंधन
- 1:04:05है तत्काल? सिन्धा का?
- 1:04:07कि ये बंधन ही तुम्हें मार डालेगा।
- 1:04:14अरे ब्रह्म मुहूर्त हो गया अरे दोपहर का मध्यान्ह।
- 1:04:18का मुहूर्त हो गया। अरे गो धुली का बंधन हो गया, यही
- 1:04:24तो बंधन है तुम्हारे यहाँ। तुमने जाना है टाइम ले सुने सुने
- 1:04:29जहाँ समय शून्य हो जाता है अभाव हो जाता है।
- 1:04:33और तुम समय के भीतर ही फिर समय ही मन है।
- 1:04:38और बाबा कहते। हैं समय के पार हो।
- 1:04:40जाओ मन से पार हो जाओ। तभी उधार हो सकेगा अन्यथा उधार
- 1:04:45नहीं होगा। एक छोटा सा सूत्र तुम्हारी
- 1:04:48ज़िन्दगी को नरक से स्वर्ग। में तब देख कर देगा मन में तरम से
- 1:04:55की स। रस का प्यारा तो सभी।
- 1:05:01पीना चाहते हैं धर्म के साथ संबंध तो सभी।
- 1:05:03स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन मन से पार नहीं हो रहे होना चाहते
- 1:05:08हैं, लेकिन इन उल्लू के पठ्ठों के पीछे पड़ जाते हैं।
- 1:05:15जो कहते हैं उन्होंने लोगों को तरह तरह की गलत भ्रांतियों में
- 1:05:21उलझा रखा है। बिल्कुल मत सुनो इनकी बातें बाबा
- 1:05:31की बातें सुनो। मने धर्म से दी सन।
- 1:05:41अगर बचना चाहते हो उन उल्का पिंडोज जो आय जो ग्लेज़ियर
- 1:05:49पिगलेंगे। जल, थल हो जाएगा, प्रला हो जाएगा
- 1:05:53तो एक काम करो, मन से संबंध तोड़ो और जिसने मन से संबंध।
- 1:05:59तोड़ा वो ही। बचेगा बाकी सब मर जाए।
- 1:06:07बस मेरा ये शब्द। बाबा के ये शब्द।
- 1:06:12हृदय में बसा लेना चपेट। लेना हृदय के साथ मन में धर्म से
- 1:06:17भी सन्न बंध। जो मन से पार हुआ उसी का संबंध
- 1:06:23जुड़ेगा। धर्म के साथ बाकी तो अधर्म की
- 1:06:27लीलाओं में खेलते रहेंगे, पाखंड करते रहेंगे।
- 1:06:30रामलीलाएं कृष्ण लीलाएं करते रहेंगे।
- 1:06:33सर्कस से करते रहेंगे, लेकिन पार? नहीं हो पाएंगे जब पार ही ना हो
- 1:06:40पाया जो दुखी ही रह गया। तो मानस जन्म का अर्थ?
- 1:06:44भी कहाँ होगा मानस जन्म का अर्थ तो तब लगता।
- 1:06:51अगर तुम मन से संबंध तोड़ लेते हैं और धर्म से संबंध जोड़ लेते
- 1:06:57हैं, मन में धर्म से भी सन्न मंत्र?
- 1:07:01मने मार्ग ठक न पा मने पथ शिव। प्रगट?
- 1:07:05ज मने मगना चल पंथ मने धर्म सेति संबंध ऐसा नाम रंजन होय व
- 1:07:16परमात्मा का ऐसा पसारा। जे को मन जाने, मन को वही जान।
- 1:07:28सकता है। जो मन से पार हो दोनों जहानों को
- 1:07:33जान लेता है, वो जान लेता है। के दो नहीं है एक।
- 1:07:43ऐसा नाम निरंजन। होय वह पसारा ऐसा जे।
- 1:07:52को मन जाने मन को। जो मन से बार हुआ वो ही जान
- 1:07:58सकेगा। ना त्रिकाल संध्या करने वाला, ना
- 1:08:03पांच नाम जपने वाला। ना यार नाम जपने वाला।
- 1:08:08ना राम चरित्र मानस। का पाठ।
- 1:08:10खुलवाने वाला ना गीता? का पाठ करने वाला ना?
- 1:08:14अखंड पाठ खुलवाने वाला कोई। नहीं करेगा।
- 1:08:19सिर्फ वो ही करेगा। संबंध धर्म से उसी का।
- 1:08:23जुड़ेगा, जो मन से पार हो मनय धर्म से ती संबंध मन से पार जो
- 1:08:33हुआ उसका संबंध धर्म से जुड़ गया। मन के पार जो नहीं हुआ, मन से
- 1:08:39चिपटा रहा। उसका संबंध धर्म से नहीं जुड़ेगा।
- 1:08:43नहीं जुड़ेगा नहीं। जुड़ेगा आज के परिपूर्ण है।
- 1:08:58अब एक पोड़ी रह गई। 15 मिनट पोड़ी।
- 1:09:32मेरे मन का सन उतर गए वो मेरे मन का संसार जब तेरा दर सन।
- 1:09:52ओह। जब तै तरु सुन।
- 1:09:58आयो हो? ठाकुर तुम सर आई आयो ठाकुर।
- 1:10:10तुम सर जो शरण में। आएगा वो ही पार लगेगा।
- 1:10:19सर्वधर्माण प्रतिज्ञम शरणमृक्ष अहन्तुम सर्व पाव्य भयो मुख्य
- 1:10:26श्याम। धन्यवाद।