Latest / Baba ji Vijay Vats / 23 May 25 - मन कब और कैसे ठहरेगा? मन के सही प्रारूप का कथन! समाधि से पहले और बाद का मन! Must Watch
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- 0:01निरहुप्पण दत्त बाबा जी प्राण मन के सही प्रारूप का कथन करने का
- 0:14कष्टकरण क्योंकि बहुत से संतो ने। मन के प्रारूपों का वर्णन अलग अलग
- 0:26से किया है, प्रश्न बहुत बढ़िया है, मेरा कहती
- 0:45है। मेरो मन बड़ो हरम जो बदमातो हाथी
- 0:58और गुरुवाणी में शब्द आता है, मान तो ज्योत स्वरूप है अपना मूल
- 1:05पहचान। ये दो व्याख्यान मन की उलट उलट
- 1:14लगेंगे उलट है नहीं। संतों ने मन की व्याख्या उलट की।
- 1:31यह उलट समझ ली गई। आओ देखते हैं यो मेरो मन बड़ो हरा
- 1:44में यो मदमाती हाथी। सद्गुरु हस्त परयो सिर ऊपर आँखों
- 2:00से दे समझती सद्गुरु का हाथ सर के ऊपर पड़ा।
- 2:13तो इस मन को समझ आई मन के दो रूप हैं एक रूप होता है संबोधि से
- 2:29पहले का समाधि से पहले का और दूसरा रूप होता है समाधि के बाद
- 2:35का। बस यही आपका बुनियादी हरम है, यही
- 2:43आपका बुनियादी झगड़ा है, मन के रूप दो होता है।
- 2:49मीरा ने कहा, ये मन मेरा बड़ो हराम है।
- 2:57और वाणी में शब्दाता मन तू ज्योत स्वरूप है अपनों मूल बच्चा
- 3:10तुम्हें देखने में लगेगा या दो शब्द?
- 3:14बिल्कुल विरोधी हैं। दोनों शब्द एक ही तल पर जाकर कह
- 3:24गए। मीरा ने कहा है जब वह अपने
- 3:41अंतःस्थल को छू गई, नृत्य उपजा, रोम रोम संगंधित हुआ, कली कली
- 3:52मुस्कुराई। झूम उठी पांव थिरकने लगे, उसके
- 4:04बाद कहती है मीरा उस तल से बाहर आके कहती है मीरा।
- 4:16क्योंकि जब व्यक्ति वहाँ जाएगा फिर तो बोल न सकेगा, वह पर मौन
- 4:26में हो जाएगा। जैसे तुम रात को नींद में बोलते
- 4:35नहीं, परम उसकी की अवस्था में गहन मौन और गहन चुप्पी होती है वहाँ
- 4:46से थोड़ा सा ऊपर उठोगे। और संधि क्षेत्र से थोड़ा सा नीचे
- 4:56रह जाओगे। वहाँ से बोलना शुरू हो गया।
- 5:02जंक्चर पॉइंट यानी संधि क्षेत्र से थोड़ा सा आगे निकलोगे मंच उप
- 5:07होना शुरू हो जायेगा। मन को एक थोड़ा थोड़ा स्वर
- 5:16उतरेगा, हल्की हल्की मस्ती तुम्हें गहरने लगेंगी।
- 5:29और तुम उस हाथी की तरह मस्त हो जाओगे जिसने पता नहीं कितनी शराब
- 5:35पी ली है। जो बदमाती हाथ थी, उस स्तल पर तो
- 5:45बोला नहीं जा सकता। उस सतल पर जो गया खो गया, इस बात
- 5:53को आप पक्के से लिख लेना जो कोई बोलेंगे वह मन के ऊपर के उस सतल
- 6:03से बोलेंगे जहाँ जाकर चुप्पी आती है।
- 6:08मेरा मन बड़ो हरामी है। वहाँ जाकर नहीं बोला वहाँ से
- 6:14थोड़ा सा ऊपर आप से संबोधित होते हुए जब पूछते हैं लोग इसे क्या
- 6:20है? तुम्हें ज़रा भी लाज नहीं है तुम
- 6:25स्त्री हो, राजघराने की रानी हो, राजघराने की पत्नी हो, विधवा हो
- 6:43तुम्हें ऐसे नंगे पांव सड़कों के ऊपर।
- 6:46नाचते हुए शर्म नहीं आती, लज्जा नहीं आती।
- 6:52मीरा के पति का नाम था भोजराज और भोजराज, तो मैं बता दूँ कि मेवाड़
- 7:03के राजा। राणा सांगा के सबसे बड़े बुद्धा
- 7:09थे भोजराज, उससे शादी हुई मेरी आंखें अलवेरी सी चाल बह की बह की
- 7:20बातें बह जैसे। कुछ माधक द्रव्य सेवन कर लिया हो,
- 7:30तुम्हें ऐसा ही लगेगा उस रस के अभाव में तुम माधक अद्रव्यों का
- 7:39सेवन करते हो। फिर भी बात कहाँ बनती है?
- 7:50भीतर के रस का सेवन करके तुम्हारी बुद्धि मस्तानी चाल से चलती है और
- 8:00बाहर के मादक द्रव्यों का सेवन करके तुम्हारी बुद्धि मूर्छित हो
- 8:04जाती है सो जाती है, बोल नहीं सकती।
- 8:10बुद्धि को जैसे ही लकवा मार के सिसोदिया राजवंश से थे, महज 3130
- 8:29वैन की उम्र में इनकी। रणक्षेत्र में लड़ते हुए शहीदी हो
- 8:36गई और मीरा ने खुद भेजा अपने पति देव को तलवार देकर तिलक किया जाओ।
- 8:52कन्हैया जो करेंगे, शोभा करेंगे और चल दिए भोजराज बड़ी फिराक दिल
- 9:03थे बड़ी प्यारी कहानी है मेरा फेरे ले रही थी।
- 9:13पंडित जी ने मंत्र पढ़ने शुरू किया है ओम पुंडरी का अक्षम ये
- 9:23बोला हिसाब है मीरा कहती। मैं फेरे नहीं लूँगी, क्यों मेरा
- 9:38गजब की सुंदरी थी? देखिए।
- 9:48सुंदरता के ऊपर अगर मन भीतर की उस सुंदरता की भीतर डौकी लगा ली तो
- 9:59वह लावण्य हो जाता है। मेरे इन बातों को बुद्धि से मत
- 10:05सुन चूक जाओगे। मेरा कहती मैंने पहले से पति मान
- 10:17लिया है घर घर को पार। मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न को।
- 10:42मेरो तो गिरधर गोपा हाल दूसरो न खोए जा के सिर।
- 10:59पे। मोरू मुक्त है।
- 11:04जा। के सिर पे।
- 11:07मोरू मुक्त है, मेरो आती। रो तो गिरिधर गोपाल।
- 11:26दूसरे से मैं शादी नहीं कर सकता, न मांग में सिंधु ना ही फिराए।
- 11:38माता पिता ने तय करती थी अजीब से हालात पैदा हुए तो भोजराज कहने
- 11:49लगे कोई बात नहीं चलेगा। राहुल से रिश्तेदारों ने कही की
- 11:59ये तो बदनामी हो जाएगी। लड़की को शिभा पर ही लगती है, तो
- 12:05भोजराज बोले कोई बात नहीं मैं भी तो बामरा ही हूँ।
- 12:11वह भी अजीब किस्म के व्यक्तित्व है।
- 12:14उनमें भी भक्ति रस था और 1516 में यह शादी संपन्न हुई और 1521 में
- 12:27भोजराज की मृत्यु हो गई। युद्ध रहते हैं।
- 12:32राणा संघ के सबसे बड़े पुत्र थे। विवाद के राजा उत्तराधिकारी से
- 12:39राणा संघ के वहीं से कहा मैंने कहा राजा भोज कहा गंगू थेली।
- 12:54मन के दो प्रारूप होते हैं अब समझना, सूक्ष्म बुद्धि से समझने
- 13:00की चेष्टा करना यानी चेष्टाहीन हो जाओ जब मैं कहता हूँ चेष्टा करना।
- 13:08तो मन को रिलैक्स कर देना यही चेष्टा है।
- 13:16रिलैक्स युअर बैंड रिलैक्स युअर मैएंड रिलैक्स युअर थॉट्स खुल जाओ
- 13:25ब्रॉड हो जाओ। तो मेरा एक एक शब्द के भीतर
- 13:32उतरेगा सर वास्तव में तो मीरा का नाम लेते ही मेरे भीतर एक अजीब सी
- 13:46खुमारी छाने लगती है। सुदी बुदी को खोना शुरू कर देता
- 14:00हूँ बारात बिना फेरे, बिना मांग में सिंधूर भरे राजस्थान के प्रथम
- 14:10शादी राजघराने के सम्पन्न में। माँ ने भी कहा यह तो बच्ची बावरी
- 14:24है, अब क्या होगा? लेकिन हे कृष्ण कन्हैया, अब तू ही
- 14:31लाज रखियो। बोली लाज तिहारी हाथ और कन्हैया
- 14:48ने लाज रख लिया, वहीं से चली यह कहा कहा राजा भोज कहाँ गंगु तेल
- 14:55ली बड़ा ब्रॉड माइंडेड व्यक्ति रहा होगा।
- 15:02पांच वर्ष का विवाहित जीवन और 21 में मृत्यु हो गई।
- 15:0916 में विवाह में बेदवा हो गई मेरे को कोई।
- 15:19पता ही नहीं जैसे एक साधारण औपचारिकताएं हैं वो निभाली उसने
- 15:35मन के दो प्रारूप हैं एक समाधि से पहले एक समाधि के बाद।
- 15:41अब आइए हम इसकी सुक्षमता में चलें ज़रा ध्यान से देखना किसी भी
- 15:51व्यक्ति को जो धार्मिक प्रवचन कर रहा हो।
- 16:01अगर उसको सुनकर तुम्हारा तर्क टूटता है तो समझना यह व्यक्ति उस
- 16:12गहरे तत्व तक पहुंचाने और जीसको सुनकर।
- 16:19तुम्हारा हृदय के बीज खिलता है, तुम्हारे भीतर एक उल्लास अज्ञात
- 16:26उल्लास हर्ष उल्लास का जन्म होता है तो समझना कि यह व्यक्ति उस सतल
- 16:34को छू लिए है, बस यही पहचान है। दो रूप एक वहले का रूप तलवार की
- 16:48धार की तरह काटेगा। जिधर जाएगा दो धारु तलवार, लेकिन
- 16:54उसमें रस न होगा। टर्क की धार बड़ी तेज और ऐसी तेज
- 17:03के बड़ों बड़ों को माटी सुंघा दी गई टर्क की तीखी तलवार।
- 17:13लेकिन कभी भी तर्क की तीखी तलवार से सम्मोहित मत होना तर्क कितना
- 17:26भी तीखा हो जाए मात्र काटता है। और जो व्यक्ति बोलता है और
- 17:42तुम्हें तार्किक रूप से समझ आता है तो तुम समझना किस व्यक्ति ने
- 17:46वो बोला जो मेरी बुद्धि ने समझा। लेकिन अगर कोई व्यक्ति बोलता है,
- 17:57कुछ चीजें समझ में नहीं आती और कुछ चीजें समझ में आती है।
- 18:05कुछ शब्द सिर से बाहर उतर जाते हैं और जीसको सुनने के बाद
- 18:16तुम्हें एक हर्ष की सरल लहरी आच्छादित कर देती है।
- 18:22चारों तरफ से तुम झूमने लगते हो तुम्हारा जीरा।
- 18:27ऐसे हो जाता है जैसे अभी अभी पी हो तुम ने शराब मन भर के पिया हो
- 18:36उसका सुरूर। अभी तो चढ़ना शुरू हुआ है जीस
- 18:44व्यक्ति को सुनकर ऐसी। दशा हो जाए तो समझ लेना कि यह
- 18:51व्यक्ति प्रभुद्ध है प्रबुद्ध उस तल पर नहीं जिसे मैं कहता हूँ
- 18:59बुद्धि क्षेत्र के भीतर। सन्धि क्षेत्र के भीतर उससे आगे
- 19:11निकला हुआ तर्क और उससे आगे निकला हुआ तर्क का तीर जब उस रस में
- 19:23भीगकर आते हैं शब्द। भीनी भीनी सुगंध लिए भीनी भीनी
- 19:30मुस्कान लिए तो तुम्हारे हृदय का रोम रोम झरने लगता है एक अज्ञात
- 19:41रस्म। जिसका स्वाद कभी चखा नहीं था और
- 19:47तुम्हें पता नहीं चलता ये क्या हो रहा है।
- 19:51अगर ऐसी दशा हो जाए तो समझना तुम किसी संत को सुन रहे हो और ये
- 20:00घंटों तक रह सकती है। लेकिन तार्किक व्यक्ति को अगर
- 20:06सुनोगे तो थोड़ी देर में ये रस खो जाएगा, रस होगा नहीं, जिसे तुमने
- 20:14रस की तरह समझ लिया रस नहीं था, रस तो तुम्हें जब ओत प्रोत करेगा।
- 20:22तो बहुत देर तक उसका नशा छाया रहेगा।
- 20:29यह पहचान है तार्किक व्यक्तित्व इस धरती पर बहुत वे मार्कर्स
- 20:35जैसे। और उन्होंने तर्क दिए बिलकुल बचत
- 20:42खाना। परमात्मा को मैं क्यों मानु मानना
- 20:48तो होता ही नहीं। परमात्मा को भाई परमात्मा के भीतर
- 20:54डुबकी लगाना होता है, परमात्मा के भीतर विलीन होना होता है।
- 20:58परमात्मा के भीतर परवानी की तरह खो जाना होता है, जो क्षमा में
- 21:03अपने आप को बस में बहुत कर देता है।
- 21:08मानना थोड़ी होता है, मानने से कुछ नहीं होता।
- 21:15उसके भीतर तो डूब जाना होता है। उसके स्वाद में तो तुम ऐसा डूबोगे
- 21:23कि तुम्हारी खुद ही मर जाएगी मन के दो परारू एक जब तक मैं रहता है
- 21:32जब मैं था तब हरी नहीं। उस तर्क में उस मन में आनंद का
- 21:42स्वाद नहीं होगा, यह मन की एक अवस्था है।
- 21:51जो मीरा ने उस तल से ऊपर आकर जंक्चर पॉइंट के पास आकर बोली
- 21:56मेरा मन बड़ो हारा में जो मदमाती हाथ थी, मन निर्मल हो जाता है
- 22:12काबीरा मन निर्मल? समाधि से पहले का मन निर्मल नहीं
- 22:22होता है, उसमें बड़ी विषवास नहीं होती है, बड़ी दौड़ होती है, बड़ी
- 22:28ख्वाहिशें होती है, वह दौड़ता है, वह भागता है।
- 22:37यह समाधि से पहले का मन है और जो ही व्यक्ति को समाधि उपलब्ध हुई
- 22:49सब समाधान हो गए वह मन की दशा निरमग।
- 22:57उसमें मल नहीं होता है, बड़ा शुद्ध होता है और इतना शुद्ध होता
- 23:02है। कबीर कहते हैं कबीरा मन निर्मल
- 23:06भयो, जो गंगा को नीर पक्ष पक्ष हरिपिरा कहत कबीर कबीर।
- 23:18उस स्तर पर जाकर जब मन निर्मल हो जाता है, कोई मल नहीं रहता, कोई
- 23:25वासना, कुछ पाना, कुछ खोने का डर, कुछ नहीं रहता कहाँ जाना?
- 23:34क्या करना, क्या बनना, क्या होना कुछ नहीं रहता वह मन समाधि के बाद
- 23:42का मन है। समाधि से पहले का मन जब समाधान
- 23:48नहीं होता समाधि का मतलब समाधान। जब समाधान नहीं होता तब तक प्रश्न
- 23:55और मल ये दोनों बने रहते हैं? समाधि से पहले का मन निश्चय
- 24:02प्रश्न नहीं होता, प्रश्न नहीं, प्रश्न उनके भीतर हैं।
- 24:07ये मन तुम्हें बड़ा वधकाएगा उससे पहले के मन की व्याख्या करती हैं।
- 24:13मीरा ये मन बड़ोहर अमी मेरो ये मन बड़ोहरा मी जो मदमाती हाथी जैसे
- 24:24हाथी ने बहुत सी शराब पी के बेहोशी के आलम में खोया।
- 24:30चला जा रहा है। मस्त हाथी को पता नहीं होता, वह
- 24:37पता नहीं किसको कुचल देगा। मेरा कहती है ऐसे मेरा मन है।
- 24:54जब समाधान नहीं हुआ था जब यह तल को नहीं छूआ था, तो मन मेरा ऐसा
- 25:01था बैराग्य नहीं जन्मा था भटक रहा था।
- 25:10और जिसके लिए भटक रहा था वो जब मिल गया तो समाधान हो गया।
- 25:16तुम भी ध्यान रखना तुम किसी के लिए भटक रहे हो।
- 25:22तुम्हारा मन किसी के लिए भटक रहा है और जब तक वो नहीं मिलता।
- 25:30तब तक मन को चैन नहीं आता, मन को करार नहीं आता और वह चलता ही रहता
- 25:36है। बेकरार दिल तू गाये जा बेकरार
- 25:46दिल। तू गाये जा मस्ती से भरे ये
- 25:56सराहने जिसे सुन के दुनिया झूम उठे।
- 26:08और जो मुठे दिल। दी।
- 26:13वा ने बेकरार दिल। तुम गाये जा बेकरारी मौजूद रहती
- 26:24हैं। सभी गम तुम्हें सताते हैं, सभी
- 26:31आगें तुम्हें तपाती हैं सभी आगों में तुम झुलसे झुलसे रहते हो।
- 26:41तुम बिल्कुल ऐसे रहते हो जैसे परिधि के ऊपर आग लगी और तुम उस आग
- 26:47के भीतर ही बैठे हो, अभी तक मीरा परिधि के ऊपर है के ऊपर है।
- 26:58और मीरा कहती जैसे मैं परिधि से नीचे केंद्र में उतरी तो मन ठहर
- 27:04गया। कबीर कहते हैं, मन ऐसा ठहरा कि
- 27:08जीसको मैं ढूंढ रहा था, वो पाछे पाछे हरी फिरें, कह तो कबीर कबीर।
- 27:15वह मुझ में समाहित हो जाने को बेताब है जिसमें समाहित होने को
- 27:22बेताब कभी मैं था वो आज मुझ में समाहित होने को बेताब है।
- 27:29बड़ा फर्क पड़ गया ब्रोधी स्वर हो गए।
- 27:35इतना फर्क है दो तल हैं एक समाधि के पहले का मन और समाधि के बाद का
- 27:41मन समाधि के बाद का मन सभी गुत्थियों से पार हो जाता है।
- 27:48उसकी सभी गांठें खुल गईं। निर्बंध हो गया वो निर्द्वंध हो
- 27:59गया, वो निर्बंध हो गया वो तुम अभी गांठो से भरे पड़े हो ये
- 28:09गांठें ही तुम्हारा चैन छीन लेती हैं।
- 28:12ये गांठी ही तुम्हारी रात की नींद छीन लेती हैं।
- 28:16तुम्हें चैन नहीं आता तुम्हें करार नहीं आता और तुम कुछ भी किए
- 28:21जाते हो तुम उस फुटबॉल की भांति जो खेलने वाले खिलाड़ी खेल खेल
- 28:30रहे हैं। और कोई केक मार देता है, तुम उधर
- 28:34हो जाते हो और दूसरे पक्ष का व्यक्ति केक मार देता है।
- 28:38तुम इधर हो जाते हो बस तुम्हारी हालत ऐसी ही पटवारी जैसी दोपाटन
- 28:45के बीच में साबत बचो न कोई है। तुम्हारी हालत बिल्कुल ऐसी है
- 28:51तुम्हारा अपना वजूद नहीं, फुटबॉल का कभी अपना वजूद होता है क्या?
- 29:01जिसने विके को मार दी, उस तरफ हो लिया, वो इधर था या वो उधर था कोई
- 29:07फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारा कोई निश्चित गोल तुम्हें
- 29:10नज़र नहीं आता तुम चाहते क्या हो आखिर ये तुम्हें खुद भी पता नहीं
- 29:21तुम चले जा रहे हो बस चले जा रहे हो और तुम्हें पता नहीं है।
- 29:29न तुम्हारी संघ कोई है, न तुम्हारा मार्गदर्शक कोई है यही
- 29:34कहती है मेरा सदगुरु, हस्त धरो सिर जब सदगुरु ने सिर के ऊपर हाथ
- 29:48रखो। तो खुल गया वो तीसरा नेत्र चरम
- 29:55चक्षुओं से पार जो एक अज्ञान चक्षु होता है वो खुल गया और यह
- 30:05मद मारती हाथी। यह शांत हो के बैठ गया।
- 30:14दो स्वरूप होते हैं मन के समाधि से पहले का मन भटकता है क्यों
- 30:21भटकता है इस कारण से भटकता है। वह चाहता है आनंद उसने सुख से देख
- 30:28लिया संसार का। कुछ नहीं है।
- 30:32जनकों को भी आखिर में अष्टावकरों के पांव के खाक बनना पड़ता है।
- 30:46जनकों को भी। आखिर में टेढ़े मेढ़े आष्ट जगह से
- 30:50अष्टावक्र टेढ़े मेढ़े अष्टावक्र की चरण पकड़नी पड़ती है।
- 31:06ये तुमसे हल न होगा। गुरु के वर्ध हस्त के बिना ये तुम
- 31:16स्वयं से हल ना हो। तुम कोशिश करते हो मेरे पास रोज़
- 31:22कमेंट हो जाती है बाबा मैंने बड़ा प्रयास किया था।
- 31:2610 वर्ष बीत गए, कुछ नहीं मिला। तो मार्ग किसने दिया मार्ग तो
- 31:32किसने नहीं दिया? मार्ग तो पहले कोई आता जाता गुरु
- 31:37बता गया फिर चैनल्स पर देखने लगा, लेकिन मिला कुछ नहीं नहीं जीसको
- 31:50खोते ही नहीं पता। किस धरती के नीचे पानी कितना गहरा
- 31:57है? और जिसने धरती के नीचे खोदकर वहाँ
- 32:03का पानी पिया नहीं, जिसकी प्यास बुझी नहीं, वह तुम्हें क्या खा के
- 32:08बताएगा? बस उसका तर्क बिलकुल ऐसा होगा
- 32:12जैसे अचारों के तर्क होते तुम्हारे बुद्धि के प्रश्नों को
- 32:19काट देगा और तुम्हें लगेगा हाँ मिल गया पायो।
- 32:24जी मैंने पायो जी। मैंने।
- 32:29राम रत्न धन। पालिया, मैंने पालिया लेकिन कहाँ
- 32:38पाया? मन तो फिर प्रश्न खड़े कर देता है
- 32:44और आनंद को पानी का एक लक्षण है कि मन मोन हो जाए।
- 32:48मन बोला ही ना। मन डोले ही न मन हेले झूले, न मन
- 32:56ठहर जाए, मन की गति अवरुद्ध हो जाए, मन शून्य हो जाए, मन खाक हो
- 33:02जाए, मन विलीन हो जाए। मन उससे लयपथ हो जाए, एक हारमनी
- 33:10में आ जाए, परमात्मा के साथ बहे अब ये बड़ा मुश्किल पड़ेगा।
- 33:23किस आचार्य ने तुम्हारे तर्क को काटा?
- 33:27और तुमने कहा बड़ा गुणवान है, लेकिन उसके आवास में कहीं कोई
- 33:34क्षणकार नहीं मिलते, उसके शब्दों से कहीं कोई शहद टपकता हुआ दिखता
- 33:42नहीं उसकी वाणी में कोई। फेजुल नहीं दिखती जो उस सबार की
- 33:52कथा कहती हो जो प्रेम की बात बताती हो तुम्हें उसके शब्दों में
- 34:00तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। सबै तर्क।
- 34:04उस तर्क से तुम्हारा तर्क टूट जाएगा।
- 34:08तुम कहो कि भड़क किया नहीं है, लेकिन कुछ भी किया नहीं है, लेकिन
- 34:15इसके शब्द बिल्कुल वैसे ही होंगे जैसे तुम्हारे तोते के होते है।
- 34:21तुम तोते को रटाते थे। इन्होंने उपनिषद पढ़ लिया,
- 34:29इन्होंने गीता पढ़ ली, इन्होंने शास्त्र पर लिया, बोलने लगे
- 34:39प्यासे प्यासे से खोद रहे। खुद की प्यास बुझी नहीं, खुद के
- 34:46पास से जल का स्रोत नहीं आया और तुम्हीं कहते हैं आओ लाइव सेशन
- 34:51में जुड़ जाओ। खुद का सेशन अब भी अधूरा है।
- 35:03अभी खुद की क्लासेज बुरी नहीं हुई।
- 35:10अभी रास्ता बहुत बाकी है। मन चलता है, मन चलता है ऐसा ही मन
- 35:20इनका जैसे तुम्हारा मन चलता है, वैसे ही इनका मन चलता है।
- 35:29और एक और बड़े मज़े की बात है। इनके शब्दों से तुम इतने प्रभावित
- 35:34हो जाओगे। तुम कहोगे इससे विद्वान व्यक्ति
- 35:38गुणवान व्यक्ति देखा ही नहीं। ये शब्दों के धनी हैं।
- 35:42वोकबुलरी बड़ी शांति है। लेकिन इनका मन इन्हें ले जाता है
- 35:53तो ये बिलकुल उस गृहस्थी व्यक्ति की तरह है जिनका मन तुम्हें नचाता
- 36:01है। संत का मन संत को नहीं निचाता संत
- 36:11अपने मन को निचाता है और संत अपने मन के द्वारा अपनी इंद्रियों को
- 36:15निचाता है, इसलिए वह इंद्र हो जाता है।
- 36:21यह तोते हैं जैसे तुम्हारे घर के पिंजरे में कैद हुआ तोता तुम कहते
- 36:28हो तोता बोलो राम तोता कहेगा राम राम।
- 36:35लेकिन ये राम उसके भीतर के प्राणों से नहीं आया।
- 36:39उसके रोम रोम ने राम का उच्चारण नहीं किया।
- 36:42उसे तो पता भी नहीं राम कौन है? बोलता तो तोता भी है, इसलिए इनको
- 36:49उपनिश्चितदों का तोता कहता हूँ मैं यह गीता के भी तोते हैं या
- 36:55अष्टावक्र? गीता के भी तोते हैं।
- 36:57श्रोताओं की भाषा सुननी हो तो इन सारे लोगों के पास आचारों के पास
- 37:03चले जाना शहीदों के बूँदें भी नहीं हो।
- 37:06शहीदों के झरने की बौछार अगर देखनी हो कैसी शीतलता होती है
- 37:12उसमें तो संत पुरुष को सुन लेना जीसको सुनने के बाद।
- 37:17आपका जेरा ठहर जाएगा। मन उपद्रव न करेगा मेरो मन ब्रो
- 37:24हरामय जु मदमाती हाथी एक तो भटकता हुआ मन उसे पता नहीं।
- 37:36तुम कहाँ जाओ गए साथी ना कोई मंचन दिया है ना कोई महफिल चला मुझे
- 37:48लेते ऐसे तू जाने का। कहाँ ले जा रहा है?
- 38:02यह मन अंधा है कब तर्क जब तर्क उसका अज्ञान खुद का और जब अज्ञान
- 38:12मच गया अज्ञान हो गया। तो फिर वाणी के शब्द को ले लेना
- 38:18मन तू ज्योत शुरू ये पहचान आ गई मन के अपना मूल पछान तुम्हें अपनी
- 38:28जड़ों में उतरना होगा तुम आखिर हो।
- 38:33और जैसे ही तुम्हें अपना मूल पहचान में आ गया, तुम्हें अपना
- 38:38आगाज समझ में आ गया। तुम्हें अपना स्रोत समझ में आ
- 38:43गया। बस जैसे ही यह मन दूसरा मन हो
- 38:50जाएगा। एक मन है मदमाती हाथी उसे पता
- 38:56नहीं मैं कहाँ जा रहा हूँ, किसको कुचल दूंगा, यह भी पता नहीं और
- 39:02किसको ढोए हुए चले जा रहा ये भी उसे पता नहीं और एक मन है जिसके
- 39:09शीश के ऊपर सद्गुरु का हाथ। रखा जाता है तो वह बनशाली हाथी की
- 39:18तरह हो जाता है। निर्द्वंदा वह बोध से युक्त होता
- 39:27है। उसे पता है उसे कहाँ जाना है।
- 39:35ये मन की दो हस्ताएँ हैं। तुम इससे उलट डिस्क्रैब कर लेते
- 39:40हो। तुम इनके डेफिनिशन्स उलट निकाल
- 39:44लेते हो वरन संतो ने तो सही कहा। दोनों ने यही बात कही।
- 39:50मीरा ने भी यही बात कही। उस अवस्था में तो मन हरामी ही था।
- 39:59मेरा मन बड़ो हरामी कब तलक जब तलक सदगुरु का हाथ मेरे शीश में
- 40:08निपटा? जब सदगुरु का हाथ मेरे शीश पे पड़
- 40:13गया तो फिर से अपनी राह दिख गई अपनी मंजल दिख गई।
- 40:23फिर मीरा के भीतर से अहोभाव उमड़ेगा।
- 40:31उस द्यादू की कृतज्ञता प्रकट होगी।
- 40:34भीतर से उस रहमो करीम की इनायत बख्शेगी तुम्हारे ऊपर बरसती हुई
- 40:48उस जर्नो की रसधार में तुम झूमोगे।
- 40:52मेरा की तरह ऐसा लगेगा जैसे तुम्हारे पांव में घुंघरू बांधे,
- 41:01वो ऐसी मस्तानी चाल होगी, तुम्हारी कोई नृत्यांगना इसका
- 41:06मुकाबला नहीं कर सकेगी। मधुवनु में राधिका नाचे रे मधुवनु
- 41:28राधिका नाचे रे। गिरधर की मुरलीया बा।
- 41:40जेरे। गिरधर की मुरलीया बा जेरे मधुवन
- 41:51में राधिका। ना चे।
- 41:58जैसे मधुवन में राधिका नाचती है, निधि वन में उसके पांवों की झंकार
- 42:08तुम्हारे हृदयों में उल्लास पैदा कर देती है।
- 42:13यह तब की तस्वीर है जब मीरा उस संधि क्षेत्र को पार कर लेती है
- 42:21और उसे हल्का हल्का शुरू रहना शुरू हो जाता है और वो स्वर अपनी
- 42:25तरफ खींचता है और तुम खींचे ही चले जाते हो।
- 42:28तुम्हें पता नहीं हम कहाँ जाते हैं, यह मन के दूसरे दिशा है।
- 42:36मन वहि है पहले मलयुक्त फिर मल मुक्त और मलयुक्त मन तो हजारों
- 42:46प्रकार की आकांक्षाओं से भरा होता है, वासना से भरा होता है,
- 42:50व्याधियों से भरा होता है। जरूरतों से भरा होता है, अभाव से
- 42:55ग्रस्त होता है, दुखी होता है, आगों से पीड़ित होता है, जलता है,
- 43:01सटता है और उसे मार्ग का पता नहीं होता है, कोई साथी नहीं।
- 43:14साथ ही ना कोई मंजिल दिया है ना कोई महफिल चला मुझे।
- 43:29ले के है दिल अकेले कहा साथी न कोई।
- 43:45मंजिल। दिया है ना कोई महफिल चला मुझे
- 43:56लेके ए दिल अकेले कहाँ यही। मन है जो तुम्हें।
- 44:08मल युक्तता से मलहीनता में ले जाएगा, निर्मल हो जाएगा तुम्हारा
- 44:15मन, मन वही रहेगा जैसे माटी से मिला हुआ पान आपने देखा होगा।
- 44:27जब किसी कांच के गलास में किसी माटी से युक्त पानी को तुम रख
- 44:34देते हो ठहराव की अवस्था में और सो जाते हो आराम से सुबह उठते हो,
- 44:42तो आप देखते हो वह मल वह कीचड़। वह माटी जो इसमें मिलकर इसको
- 44:54ट्रांसपेरेंसी इसकी छीन रही थी, डाउन ट्रांसपेरेंट हो गया था।
- 45:02सुबह उठ के देखते हो अलग होता है। माटी भी और पानी पारदर्शिता के
- 45:08रूप में अलग होता है। बस मन ऐसा हो जाता है।
- 45:14समाधि से पहले का मन उस माटी युक्त पानी के संबंध है जिसके
- 45:21भीतर से कुछ दिखता नहीं नॉन ट्रांसपेरेंट।
- 45:26और समाधि के बाद का मन ट्रांसपेरेंट ठहर जाता है।
- 45:30मन कचरा नीचे बैठ जाता है। शुद्ध जल पारदर्शी होकर अलग हो
- 45:37जाता है। यह समाधि के बाद का मन है।
- 45:44इसी की बात कहते हैं भगवान राम निर्मल मान जनसोई मोहि बाबा।
- 45:53निर्मलमानु जनसोई मोई पा। मोहे।
- 46:04कपट छल छिद्रना बा। मुझे कपट अच्छा नहीं लगता, मुझे
- 46:14छल अच्छा नहीं लगता, छिद्र सुराख रख के बोलना, ये अच्छा नहीं लगता।
- 46:21मोहे कपट छल छिद्र न भावा निरमान मान जन सोई मोह ही भावा।
- 46:30भगवान राम कहते हैं मुझे वो ही भा सकता है मन में छल हो और तुम राम
- 46:36मंदिर बनाए बैठे हो तो तुम्हें वह राम।
- 46:42नहीं मिले। तुम्हारी हृदय में वो वास नहीं
- 46:47होता। हनुमान जी को सीता ने बहुत
- 46:54बहुमूल्य हीरो की माला देते। हनुमान जी उसको देखते हैं, अच्छी
- 47:00तरह से कहानी है, एक एक हीरो को दांतों के नीचे तोड़ देते हैं और
- 47:10भीतर देखते हैं फिर दूसरे को तोड़ देते हैं।
- 47:18ऐसे बहुत से तोड़ देते हैं हीरे तो सीता पूछती है पुत्र तुम ये
- 47:23क्या कर रहे हो? हनुमान जी कहते हैं बड़े निर्दोष
- 47:30बाप से विथ इनोसेंट माइंड माँ। इसमें मेरे प्रिय सीताराम तो है
- 47:44ही नहीं तो राम हासते हैं। राम कहते हैं, हनुमान इसमें नहीं
- 47:54मिलेंगे तुम्हें? राम सीता तो तुम्हारी सामने बैठे
- 47:58हैं, सामने बैठो का दर्शन कर लो, इसमें क्या ढूंढ़ते हो?
- 48:08मेरे को ढूंढा है वन माँ कस्तूरी कुंडल वस है।
- 48:15तुम्हारे सामने है अनुमान राम सीता तुम्हारे सामने बैठी है तुम
- 48:21ढूंढ़ते हो इन हीरों की माला में, हाँ ये माता ने मुझे वरदान किया,
- 48:27मैं देख रहा था तोड़ के। इनमें माता सीता हैं, इनमें भगवान
- 48:34राम हैं। मेरे आराध्य लेकिन नहीं दिखे तो
- 48:41राम कहते हैं अगर राम सीता को देखना है तो तुम्हारे सामने ही तो
- 48:45बैठी है, सरल उपलब्ध है तो मत खाक छानों वणों की।
- 48:55काहे रे बन खोजन जाए? काहेरे अमन को जन जा सरबया की सदा
- 49:24अलेफ़ा सरब। व्यापिक सदा अले प तोहे संग सम
- 49:37काहे रे बन को जन जाए? काहे कस्तूरी कुंडल।
- 49:54बस है मृग ढूंढा है बनवा। उसके कुंडल में ही कस्तूरी है,
- 50:01जिसकी खुशबू से वह इतना नाच रहा है और बन मन में ढूंढता है।
- 50:06ऐसे गठ में भी हैं मूर्ख जाने ना? कबीर कहते हैं मूर्ख हैं वो
- 50:11व्यक्ति जो वनों में जाके तलाश करते हैं तुम कथाओं में जाके
- 50:17ढूंढ़ते हो तुम गुरुओं के तर्कों में जाके ढूंढ़ते हो।
- 50:27तुम शब्दों से शब्दों को लड़ाके ढूंढ़ते हो तुम शास्त्रार्थों में
- 50:31ढूंढ़ते हो नहीं मिलेगा मिलेगा कहाँ मिलेगा जहाँ उस प्रेम की
- 50:39शुभाशीष वर्ष रखी हो झरने की तरह वह मिलेगा।
- 50:44प्रेमियों के हृदय में मिलेगा आनंद की गरिमा में मिलेगा तुम
- 50:54झांक कर देखो प्रेम की निशीली आँखों से ज़रा इस सृजना को एक
- 51:02झलक। जी वर के देखो तुम्हें सब कहीं वो
- 51:09ही नज़र आएगा हर जरे में तू ही तो रोबरो है जेधर देखता हूँ उधर दो
- 51:17ही तो है कहाँ ढूंढू तू? कबीर कहते हैं कहीं मत ठूँटो पर
- 51:29गुरु तेग बहादुर कहते हैं काहे रे बन?
- 51:31ढूंढन जाए। सर्वव्यापी सदा अलेपा तोहे संग
- 51:36समाए तेरे भीतर ही न हो। मृग की कुंडल में कस्तूरी होती है
- 51:47जिसकी खुशबू से वो पागल होकर दौड़ता है बनों में लेकिन उसे वो
- 51:55कस्तूरी मिलती नहीं है। मिलेंगे भी नहीं क्योंकि वह तो
- 52:00उसके भीतर है। वह तब मिलेंगे जब उसकी दौड़
- 52:05समाप्त हो जाएगी, मृग ठहर जाएगा, वनों में भटकना बंद कर देगा, बैठ
- 52:10जाएगा एकांत में और थोड़ा कस्तूरी की तरफ अपने नाशा को ले जाएगा तो
- 52:18पायेगा ये खुशबू तो मेरी कोंडन में से आती थी।
- 52:25ये कस्तूरी तो मेरे ही भीतर बसी है।
- 52:29बिलकुल तुम्हारी ही बात यह है ये बात तुम्हारी है कबीर कहते मूर्ख
- 52:34हैं जाने ना जो नहीं जानता वो मूर्ख ये तुम्हारी अमानत है।
- 52:43सर्व सुलभ है। कोई भी व्यक्ति इसमें जा सकता है,
- 52:46कोई छोटा बड़ा, ना वहाँ जाके ना कोई गुरु रहता है, ना कोई शिष्य
- 52:53रहता है। तुम सभी यज्ञ सा हो जैसे गुरु के
- 52:59भीतर जितनी है। वैसे तुम्हारे भीतर उतनी ही ज़रा
- 53:04भी भेदना वहाँ जाके भेद मठ जाता है।
- 53:09मन के दो रोग होते है एक संभोदि से समाधि से पहले और दूसरा समाधि
- 53:16के बाद समाधि से पहले का मन भटकता है।
- 53:20उसे कुछ की जरूरत है, उसमें कोई कमी है, वासनाई उसे गहरी है,
- 53:27चिंताएं उसे सता रही है। भविष्य की योजनाओं की कल्पनाओं
- 53:34में उधेड़बुन में वो उलझा हुआ। अभी तो लड़की की शादी करनी है,
- 53:42अभी तो बेटा भी ब्याना है अभी काम धंधा भी ठीक नहीं चलता, तुम्हारा
- 53:56प्रभु तुमसे रोट गया है। ऐसा नहीं है।
- 54:02तुमने प्रभु की तरफ से पीठ कर ली है, तुमने आँख फेर ली है और तुम
- 54:12सोच रहे हो कि शायद मेरे भगवान ने मुझसे।
- 54:17आँखें फेर रही नहीं तुमने आँखें फेरी है, वह तो वहीं मौजूद है
- 54:23दादू दूजा को नहीं दूजी मन की दौड़ दौड़ मिटी सन से गया वस्तु
- 54:29छोर की ठोर वह तो वहीं है, वह कभी तुमसे विमुख नहीं होता।
- 54:36वह सदा ही तुम्हारे स्नो पे रहता है।
- 54:40तुम विमुख हो जाते हो तो तुलसी कहते हैं वह नहीं मुख मोड़ता, तुम
- 54:52मुख मोड़ लेते हो? सन्मुख होय जी व मोहे।
- 54:56जब ही जैसे ही जीव मेरे सन्मुख हो जाता है, वि मूखता से सन्मुखता
- 55:03में आता है। जीस तरफ पीठ थी उस तरफ मुख कर
- 55:07लेता है सन्मुख होय जीव मोहि जब ही।
- 55:12जन्म कोटि अगना पाप कोटि अगना संहिता भीम जन्मो जन्मो के पाप
- 55:22खत्म हो जाते हैं, स्वाहा हो जाते हैं, राख हो जाते हैं जलक लेकिन
- 55:28करना क्या पड़ेगा? कुछ भी नहीं रब्दा की पाणा?
- 55:35जीस तरफ पीठ है उस तरफ मुख कर लो, जीस तरफ मुख है उस तरफ पीठ करो
- 55:39इतना ही तो करना तुम तो सुनते हो? हज़ारों के बड़े बड़े भाषा जिन
- 55:47मूर्खों को खुद का ही पता, जिनकी खुद की प्यास नहीं बुझी वो खुद
- 55:51ही। कैसे खुद ही भूखे हैं तुम्हें
- 55:56क्या बताएंगे? अभी तो उन्होंने दान इकट्ठा कर
- 56:01अभी तो उन्होंने संस्थाओं के हाथ मजबूत करने अभी तो बहुत कुछ करना
- 56:06है। तुमने लड़कियों की शादी करनी
- 56:09तुमने बेटों की शादी करनी। तुमने पोतों की शादी करनी पालन
- 56:13पोषण करना, व्यापार को ठीक से चलाना और उन्होंने का निर्माण
- 56:17करना वासना बराबर तो है। वासना और वासना में कोई भेद नहीं
- 56:24होता, कोई वासना अच्छी या बुरी नहीं होती।
- 56:27वासना वासना होती है मात्र क्योंकि वासना दौड़ाती है और जो
- 56:33दौड़ाए वह वासना और जो ठहराए वो निर्वासन तो तुम्हारे आचार्य हों,
- 56:41तुम्हारे कवि हों। महंगे कवि हूँ, ये तुम्हें भटकाते
- 56:46हैं। राम कथा के नाम आराम तो इन्हें
- 56:49खुद भी नहीं मिला। अभी तो कुर्सी चाहिए।
- 56:59अभी तो राज्य सभा की कुर्सी चाहिए।
- 57:07बेचारा जिससे कुर्सी मांग रहा था उसकी खुद की कुर्सी चली गई।
- 57:12हसमत ऐसी नजर लगी, महंगे ऋषि के खुद की कुर्सी गई बेचारे।
- 57:29एक समाधि से पहले कम मल युक्त मन 1000 वासन वासन में धधकता हुआ।
- 57:38ये दिल उसकी गर्माहट में पिघल जाता है।
- 57:46संत कहते हैं। चिंता और चिंता समान है।
- 58:02चिंता चिता देवरमध्य चिंता ऐव घरहियसि चिता दहती निरजीवाह चिंता
- 58:09दहती जीवता। चिंता और चिता में सिर्फ एक ऊपर
- 58:14टिप्पी का फर्क बिंदी का फर्क लेकिन काम दोनों के एक चिंता चिता
- 58:21द्वय मधे चिंता ऐव करी 80 चिता दहती निर जीव है चिता जिसमें
- 58:29बिंदी नहीं थी। वे मुर्दों को जलाती है, चिंता
- 58:35दहती जीवत है और चिंता जीवत को मुर्दा कर देती है, फिर सुनिए ना
- 58:44चिता जीवत को जलाती है, मुर्दे को जलाती है।
- 58:51और चिंता जीवंत को मुर्दा कर देती है।
- 58:57पहले चिंता तुम्हें मुर्दा बनाती है।
- 59:00फिर चिंता तुम्हें जलाती है और तुम राख हो जाती हो।
- 59:04ऐसे राख होने के बजाय अगर प्रभु भक्ति में राख हो जाओ तो ज्यादा
- 59:08ठीक ना हो। तुम्हें तुम्हारी मंजर मिल जाएगी।
- 59:16आज अज्ञान हार जाएगा, आज ज्ञान जीत हो जाएगा, तुम नाचोगे।
- 59:23झूम झूम के नाचो आज। गाओ खुशी के पीतरे झुमझुम के नाचो
- 59:39आज गाओ खुशी केगी। आज किसी की।
- 59:48हार हुई है। कौन हरा अज्ञान हरा और।
- 59:54किसी की जीत रे। जीत किसकी हुई ज्ञान गौ ख़ुशी के?
- 1:00:05गीत रे सारा संसार उपवन हो जाता है, सारा अस्तित्व नाच लेता है।
- 1:00:16एक नृत्य का चारों तरफ़ आवेग ये हवाएं सुगंध बिखेरती हैं।
- 1:00:24ये झरने कल कल का स्वर थोड़ा तीर करते थे।
- 1:00:30ये हवाएं ठहर के सुनती हैं इन फिजाओं की खुशबू को सारा अस्तित्व
- 1:00:39आनंदमग्न को नृत्य करता है। आज किसी की हार हुई है आज अज्ञान
- 1:00:46हारा आज किसी की जीत रे गाओ, खुशी का जीत झूम झूम के नाचो आज गाओ आज
- 1:00:58मेरा शब्द बोलती है, मेरे मन बड़ो हरामी।
- 1:01:03यह समाधि से पहले जंकचर प्लांट के पहले मन की अवस्था को वर्णित करती
- 1:01:10है और जब वाणी कहती है जो मन है, ज्योति स्वरूप है, मन तू ज्योति
- 1:01:24स्वरूप है। अपना मूल पछा अपनी जड़ तक पहुँच
- 1:01:30जा अभी तो तू बैठा खोपड़िया अभी तो अचारों के प्राचीन सुनकर
- 1:01:37तर्कों से तुम्हारी तर्क टूट जाती और तुम कहते हो ठीक शांति मिली,
- 1:01:43लेकिन शांति कहाँ मिली? ना शांति मिली ना रसाया तुम जैसे
- 1:01:49गए थे वैसे आ गए। बस कुछ तर्कों ने तर्क को तोड़
- 1:01:53दिया। एक तीर ने दूसरे तीर को तोड़
- 1:01:56दिया। तुम कब्रिस्तानों में खेल खेल रहे
- 1:02:02हो? तुमने अभी जीवन का वो स्रोत देखा
- 1:02:07नहीं? जीस स्रोत की बात करती है वाणी
- 1:02:10अपना मूल पचन जब तुम अपने मूल में उतर जाते हो, मूल उदगम स्रोत में
- 1:02:17उतर जाते हो जहाँ से आती है ये ओंकार की ध्वनि।
- 1:02:23तो तुम्हारे सारे दंध मर जाते हैं ना चिंता रहती है ना चिंता जलाती
- 1:02:28है तुम्हें जलाती है तुम्हें कुछ नहीं सब ठहर जाता है वहाँ क्या
- 1:02:35होता है वहाँ मस्ती वहाँ आनंद होता है।
- 1:02:42वहाँ तुम झुकते हो गाते हो, सारा अस्तित्व आनंद मनाता है उस घड़ी
- 1:02:50जब मन के दो प्रारूप मैंने बताए तुम्हें उलट लगेंगे लगते हैं
- 1:02:56क्योंकि तुमने दूसरा तल देखा ना तुमने मन का वो तल देखा।
- 1:03:02जो चिंता में दहक रहा है जो चिंता में जल रहा है तुमने तुम्हारी
- 1:03:07कमियां देखी, तुमने उसका प्रसाद नहीं देखा, उसने दिया क्या यह
- 1:03:13तुमने नहीं देखा तुम धन्यवाद से नहीं भरे और जब तुमने उसका प्रसाद
- 1:03:18देखा जिसे गुरु प्रसाद का एक ओंकार।
- 1:03:22से शुरू हो के सतगुरु की कृपा तुम्हारे सिरके पर आएगी और आखिर
- 1:03:28में गुरु प्रसाद से तुम्हें वो आनंद की झलकें मिलेंगी और तुम
- 1:03:32आनंद में डूबकर मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोल है है?
- 1:03:44कबीर के शब्दों का वाचन करना बड़ा आसान है, वह तो कोई भी कभी कर
- 1:03:53सकता है, लेकिन कबीर के शब्दों के भीतर योरहा से भरा है आनंद का।
- 1:04:00उसको पीना बड़ा तुरत है और जिसने पिया वो कभी ना रहा वो ऋषि हो गया
- 1:04:07यही फर्क है। कवि और ऋषि में एक तल का फर्क है।
- 1:04:12अगर कवि उस समृद्धि को पी ले तो ऋषि हो जाता है और मस्त हो जाता
- 1:04:19है। कबीर के इन शब्दों को कोई भी
- 1:04:23दोहरा सकता है उपलब्ध है सबके लिए, लेकिन सभी ऋषि नहीं हो
- 1:04:29जाएंगे तब तक तो तुम कभी रहोगे? ऋषि कब होगे जब तुम इन शब्दों के
- 1:04:37भीतर? रखे हुए अमृत का प्याला गटक
- 1:04:40जाओगे, फिर बोलती बंद हो जाएगी। मन मस्त हो फिर क्यों बोले मन
- 1:04:58मस्त हुआ। फिर क्यों बोल?
- 1:05:03फिर जरूरत क्या रह जाती है? बोल फिर कोई जरूरत नहीं रह जाती,
- 1:05:13फिर तो और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी।
- 1:05:18कैसे रहूं चुप के मैंने भी ही क्या है हो सभी तक है बाकी और
- 1:05:24ज़रा सी दे दे शाकिब और ज़रा सी। हीरो पायो गांठ गठियायो।
- 1:05:41िरुपायो घाट घटियायो बारवारवाको। क्यों खोला है?
- 1:05:59मन मस्त हुआ हाँ फिर क्यों बोल है मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल?
- 1:06:24हमसफ़यो मानसरोवर हमसफ़यो, मानसरोवर।
- 1:06:40हम। सफ़यो मानसरोवर ताल तलैया क्यों
- 1:06:52डोलें मन मस्त, फिर क्यों? बोलें।
- 1:06:58मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ फिर क्या बोले तेरा सा
- 1:07:12हब है। तूद माई।
- 1:07:19तेरा सा हब है। तुद।
- 1:07:23माँ ऐरो सा हब है तुद माँ। द्वार।
- 1:07:35द्वार फिर क्यों दो ले मन मस्त? हाँ फिर क्यों बोल ले मन मस्त हुआ
- 1:07:50फिर क्यों बोल? मन मस्त हुआ फिर क्यों?
- 1:08:05धन्यवाद?