Latest / Baba ji Vijay Vats / 20 Feb 25 - कुछ संत पुरुष बिना ज्ञान बांटे ही धरती से क्यों चले जाते हैं? क्या संत भी दुख भोगते हैं?
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- 0:21मैं कुंभ स्नान करने नहीं गया, लोग मुझे पागल भी समझने लगे हैं।
- 0:37बाबा मुझे बहुत से लोग अंधभक्त लगते हैं?
- 0:46मैं कुछ कह भी देता हूँ, बहस बाजी भी हो जाती है।
- 1:01लोग मुझे पूछते हैं कि क्यों नहीं गए?
- 1:05मैं तर्क देता हूँ। लेकिन वह तर्कों को काट देते हैं।
- 1:15मेरा मजाक उड़ाते हैं। मैं पिछले रविवार आपके पास आया
- 1:24था, मैं नहीं जाना था कुंभ से सनान पे।
- 1:33लेकिन आपके प्यार से नहा लिया को नहीं गया।
- 1:46मुझे क्या करना चाहिए? हंसा पायो मानसरोवर ताल तलैया
- 2:04क्यों ढो रहे है? मन मस्त हुआ फिर क्या बोले है?
- 2:19तेरा साहब है तुझे माही बाहर नैना क्यों खोले?
- 2:32मन मस्त हुआ तब क्यों बोलें? कुछ तो लोग कहें कहें, लोगों का
- 2:50काम है कहना छोड़ो, बेकार की बातें कहीं बीत न जाए नैना।
- 3:02कहीं बीत न जाए रहना खुद बदलो पुत्र किसी को बदलने की चेष्टा न
- 3:15करना, क्योंकि खुद बदलने से पहले। किसी की किसी को बदलने की चिष्ठा
- 3:26पाप है रोज़ बोलता हूँ तुम रोज़ सुनते हो, खुद बदलो खुद बदले बिना
- 3:39दूसरे को बदलने की चिष्ठा। तानाशाही है और बाप रे।
- 3:49हंस पायो मानसरोवर। ताल तलैया।
- 4:05क्यों? ढोले।
- 4:10मन मस्त हुआ। फिर क्या?
- 4:15बोलू मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोले तेरा सा हब है
- 4:31तुझे मैं बाहर नैना। क्यों?
- 4:42खोले। मन मस्त हुआ फिर?
- 4:49क्या बोले मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले?
- 5:03कितने संत आए चले गए और भी आएँगे चले जाएंगे।
- 5:16दुनिया को बहने की चेष्टा मत करो। हंसा पायो मानसरोवर कोशिश यही
- 5:26करनी है किसी तरह तुम पहुँच जाओ, उस मानसरोवर की शीतल जल का आनंद
- 5:40ले लो जल क्रीड़ा करो। मस्त हो जाओ और तुम्हें एक बात
- 5:49बताऊँ जब तुम मस्त हो गए तो लोग कहेंगे बोलो तुम्हारे होंठों से
- 5:59बोला नहीं जाएगा। तुम्हारे होंठो में एनर्जी नहीं
- 6:08होगी कि तुम बोलो, क्योंकि सारी शक्ति बेहतर है।
- 6:11चेतना सारी बेहतर है। आनंद ले रही है।
- 6:15उस मानसरोवर में अठखेलियां कर रही हैं।
- 6:22ज़रा सोचो अगर तुमने वो मुकाम पा लिया जो आनंद से भरा पड़ा है।
- 6:39तो क्या तुम लोगों को बदलोगे? हाँ, बदल भी सकते हो और चुपचाप
- 6:49खिसके भी सकते हो। बहुत से शांत होकर यहाँ से चुपचाप
- 6:54चले गए। बुध का बेटा राहुल जैसे ही जानता
- 7:04है, छलांग लगा देता है, चला जाता है, दूसरों को बदलने की चेष्टा ही
- 7:15नहीं होती, बैठे हैं पिताश्री बदलने के।
- 7:26कबीर राय गुरु तेग बहादुर राय जीतने भी संत आए।
- 7:31उनकी वाणी समरास है, यज्ञ सा है सभ्य स्याने एकमात्र मूर्ख अपने
- 7:40ओपन। ये तो मूर्ख है, इन मूर्खों से न
- 7:52झगड़ा करो, ना ही इनके पीछे लगो, यही मेरा सिद्धांत है जब मैं रोज़
- 8:00बोलता हूँ नॉन क्लीनिंगनेस। विचार आए या विकार आए?
- 8:11तुमने मात्र उसे देखना है, चिपकना नहीं है और ये सारी बहसें
- 8:21डिस्कशन। दुनिया को बदलने की ये चाहत खुद
- 8:29के बदलने से पहले दुनिया को बदलने की चाहत व्यर्थ है।
- 8:41ना तुम्हारी आवाज में उच्छन का हट होगी, ना वो गिरधर की मुरलियां
- 8:54बजेगी, ना राधा का नृत्य होगा ना निधिवन खेलेगा।
- 9:10उस रस के बिना सब बेकार है। सभी ने कहा मन में क्यों जाते हो
- 9:24तेरा साहब है तू जो माँ ही। बाहर नैना क्यूँ खोला मन मस्त?
- 9:34हुआ तब क्या बोले क्यूँ बोले क्यूँ बोला?
- 9:46कारण है बोलने का बोले तो सिर्फ करुणा के कारण बोले और पहुंचने के
- 9:57बाद लाखों में से कोई एक व्यक्ति बोलने का इच्छुक होता है।
- 10:11भीतर आज्ञा ही नहीं देता के बोले इतनी मस्ती का खुमार तुम्हें कहाँ
- 10:17निकलने देता है, बाहर कोई अंध भक्त है तो रहे।
- 10:29यह उसकी स्वतंत्रता है और प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है।
- 10:37वह चाहे तो कुंभ शनान कर सकता है, वह चाहे तो कुंभ शनान नहीं कर
- 10:42सकता, वह चाहे तो कुंभ शनान की भगदड़ में मोक्ष प्राप्त कर सकता
- 10:49है। और कोई न चाहे तो घर बैठे ही
- 10:58मोक्ष प्राप्त हो जाता है। सच तो यह है गंगा स्नान से कभी
- 11:06किसी को मुक्ति मिली नहीं कोई एक आध व्यक्ति होता है।
- 11:15लेकिन वो एक्सेप्शनल केस है, वह नियम नहीं है।
- 11:21एक्सेप्शन सदा नियमों से हटकर होते हैं, कोई एकाध व्यक्ति पहुँच
- 11:26गया, इससे नियम नहीं बनता है। घर बैठे तो हजारों पहुंचे, लाखों
- 11:35पहुंचे। कुंभ शिनान से कितने पहुंचे 12
- 11:40वर्षों में तो आता है एक बार और 12 वर्ष तप करके महावीर कैवल्य को
- 11:51प्राप्त हो जाते हैं। और ध्यान रखना गंगा स्नान नहीं
- 11:55करते, वो पर्वतों पे जाते हैं, बुद्ध मैदानी इलाकों पे जाते हैं।
- 12:09शायद ही किसी ने गंगा स्नान किया हो जो पहुंचे।
- 12:14और शायद ही कोई पहुंचा हो जिसने गंगा स्नान किया मेरे इन शब्दों
- 12:21को गहरे से ले लेना। रैदास के पास कुछ ब्राह्मण गए
- 12:34हैं। मित्र गए बाबा चले स्नान करना है
- 12:44गंगा रैदास तुम्हें सिखाते हैं, काम ही पूजा है वर के जो वर्ष।
- 12:59रहदास अपना काम कर रहे हैं, जूतियां गाठ रहे हैं, जबड़ा छील
- 13:04रहे हैं हरदास कहते तुम चले हाँ, हम चले तो ये लो ये मेरी भेट।
- 13:16माँ गंगा को दे देना उनका कोई झगड़ा भी नहीं है।
- 13:27नॉन क्लिंगिकनेस का मतलब यही है न पीछे लगो न ही लड़ो।
- 13:38डू नॉट क्वारल डू नॉट क्लिंग झगड़ा भी नहीं और चिपकाहट भी नहीं
- 13:48दूर बैठे रहो वही व्यक्ति साक्षी रह पाता है, ना चिपटे, ना झगड़े।
- 13:59तुम शत्रु शांत हो, अकेले आनंद में मगन हो तो दूसरों को बदलने की
- 14:07चाहत खत्म हो जाएगी। बस यही कहते हैं हीरा पायो गांठ
- 14:15गढ़ आयो। बार बार फिर।
- 14:20क्यों खोला? मन मस्त हुआ तब क्यों खोला?
- 14:36प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है।
- 14:43अगर कोई जाएगा कुंभ स्नान तो उसे उसका।
- 14:47परिणाम भोगना पड़ेगा। अगर उसे मोक्ष मिलेगा तो मिल
- 14:53जाएगा। और अगर उसे मृत्यु मिलेंगे तो मिल
- 14:57जाएगी तो मत जाओ, क्योंकि सभी संत कहते हैं गंगा तो खुद ही मैली हो
- 15:13जाती है, तुम्हारे पापों को गंगा नहीं धो पाती है।
- 15:18तुम्हारे मैल ही नींद हो पाती है, सही पूछो तुम मन के मैल धोने तो
- 15:25बहुत दूर गंगा की पहुँच तुम्हारे शरीर तक भी पूरी नहीं होती।
- 15:41कोई जाता है उसे जाने दो। किसी के मन में तीव्र आवेग है,
- 15:51श्रद्धा है, वह जाए। बहुत से लोग हैं जो परमात्मों का
- 15:58नहीं मंथ हैं, मार्क्स हैं, चारवाक हैं।
- 16:04निश्चय और आंधी दुनिया नास्तिक है और सच पूछो तो पूरी दुनिया
- 16:10नास्तिक है जिसने अभी तक देखा नहीं परमात्मा वो अगर कहे कि
- 16:18परमात्मा है तो गलत है, झूठ बोलता है।
- 16:22कुछ झूठे आस्तिक होते हैं, कुछ सच्चे आस्तिक होते हैं और उन कुछ
- 16:29सच्चे आस्तिकों में कोई एक आध होता है, बाकी झूठे होते हैं।
- 16:37ऐसे ही नास्तिक होते हैं। कुछ सच्चे नास्तिक होते हैं।
- 16:45और झूठे नास्तिक तो होते ही नहीं, जिसने खोजा ही नहीं उसको पता कैसे
- 16:56चलेगा वह नहीं। नास्तिक कभी भी सच्चा नहीं हो
- 17:10सकता। नास्तिक झूठा ही होगा अगर सच्चा
- 17:18हो सकता है कोई एक आध तो वह आस्तिक हो सकता है, जिसने देख
- 17:23लिया क्योंकि वो है। बस संत यही समझाना चाहते हैं
- 17:29तुम्हें संतो ने देख लिया ठहर गए और उनके रहन सहन, खान पान आना
- 17:42जाना वेश भूषा। लक्षणों को देखो कृष्ण कहते हैं,
- 17:52तुम्हें समझ आएगा इसे कुछ मिला है जो हमें नहीं मिला इसे कुछ मिला,
- 18:02फिर उससे पूछो तुम्हें क्या मिला? वह कोई संकोच नहीं करेगा, वो
- 18:05बताएगा मुझे यह मिला हीरो पायो गांठ गठे आयो बार बार उसे क्यों
- 18:22खोल ले? दिखाने का मतलब कई बार खेसियानी
- 18:45बिल्ली खंबानोचे खेसियानी बिल्ली खंबानोचे।
- 18:58सोने के भंडार इकट्ठे कर लिए सोने के आभूषण, सोने के वस्त्र बना दिए
- 19:06मिला। कुछ ने वही रूखे का रुख है, बल्कि
- 19:12ज्यादा रूखे हो गए हैं। क्योंकि गरीब में कहीं न कहीं एक
- 19:17लालसा होती है। एक चाहत होती है वो जब पटता है
- 19:24सोने पे और धन कमाने की फिराक में उसकी आँखों में एक अजीब कशिश होती
- 19:30है। ओह, कशिश काहे की होती है तुमने
- 19:33कभी सोचा कशिश होती है कि वह मानता है कि पैसे में सोने में
- 19:44आनंद है। यह चमक भी खत्म हो जाती है जब वह
- 19:50व्यक्ति अमीर हो जाता है इसलिए बुध सोने के तत्वतास को लात मार
- 19:57के चले जाते हैं, लेकिन कुछ तो लात मार के चले जाते हैं उस सत्य
- 20:05की खोज में। जो धन अभूषणों से नहीं मिला और
- 20:14कुछ व्यक्ति तुमको चिढ़ाने लग जाते हैं, तुम्हारी ही जेब में
- 20:17काटी होती हैं। लोगों ने मुझे खुद को धोखा दे रहे
- 20:23हैं। ये तुम्हें अंगूठा दिखाते हैं कि
- 20:27ये देखो मैंने तो सोने के बशाके पहने हैं और तुम बड़े लालच में आ
- 20:35जाते हो। तुम्हारा मन ये चाहता है कि हम
- 20:39इनका गला घोंट दें। नहीं नहीं इनका गला मत घोंटना।
- 20:48ये अपने पाप कर्मों को भुगत रहे हैं।
- 20:51इनको भोग लें। दो परमात्मा की कर्म व्यवस्था के
- 20:57भीतर व्यवधान नहीं डालना चाहिए, उसके विधान के भीतर व्यवधान नहीं
- 21:02डालना चाहिए। इस व्यक्ति की वो कसी सिमट गई है
- 21:10और लश्क जो आँखों में थी कुछ पानी की कुछ पाने की बात तो हो गई, कुछ
- 21:16नहीं मिला जैसे तुम्हें अंतरंग कक्षणों के बाद तुम घर पड़ते हो
- 21:22बस सो जाती हूँ। मिला।
- 21:28कुछ नहीं मिला तो संत कहते हैं फिर तुम इधर आ जाओ, एक अखंड आनंद
- 21:38की धारा लगातार तुम्हारी मित्र बह रही है, चलो मैं तुम्हें वहाँ ली
- 21:44चलो। आओ सितारों पे ले चलो।
- 22:10दिल जो मज़ा ऐसी बहारों में ले चलूँ आओ हजो।
- 22:32संत कहते हैं आओ तुम्हें ले चलो सितारों पे जो तुम्हारी खोज है,
- 22:39संत बखूबी जानता है और संत तुम्हें गलत दिशाओं में भटकते हुए
- 22:46भी देखता है। ये भी देखता है कि ये तुम वहाँ
- 22:51पाल न सकोगे क्योंकि संत लफ्जी के वो नहीं बोलता।
- 22:58सिर्फ संत ने ये गलियां छान ली होती हैं।
- 23:03संत कहता है जिन गलियों में तुम अब।
- 23:08जश्न की रेखाएँ ढूंढ रहे हो? मैं कब से खंगाल चुका हूँ नहीं
- 23:14मिला अगर तुम मेरे अनुभव से लाभ उठाना चाहते हो तो उठा लो।
- 23:25मिलेगा नहीं, तुम्हें नहीं मिलेगा क्योंकि यहाँ है नहीं।
- 23:31संत अपना अनुभव बताता है तुम्हें रोकता नहीं संत कैसा मिलेगा?
- 23:37नहीं इन तेलों में तेल नहीं, यह बालू है रेगिस्तान का बालू।
- 23:45इसमें तेल नहीं निकलेगा। मैंने ये कहा कि छान के देख लिया
- 23:55नहीं मिला, तुम्हें भी नहीं मिलेगा, क्योंकि होता ही नहीं है
- 24:02और फिर भी अगर कोई छाने। फिर भी कोई कुंभ जाए, स्नान करे
- 24:10तो जाए, उसे प्यार से विदा करना है।
- 24:25जाओ भगवान तुम्हारा भला घर है। ठीक से लौट आए तो गले मिलेंगे।
- 24:36ईद मनी अगर मोक्ष को प्राप्त हो गए तो फिर वे ठीक है।
- 24:52या तो संत पागल हैं या ये भीड़ पागल है दोनों में से एक पागल है
- 24:59विलाशक न दोनों पागल हैं, न दोनों सयाने हैं।
- 25:09सबैसिया ने एक मत मो रखा अपना अपना भीड़ कहती है मिलेगा तो उसे
- 25:19कहो कि खोजो संत कहता है भीतर मिलेगा।
- 25:27तो उसके शरण में बैठ जाओ। यही कहते हैं कृष्ण भगवान
- 25:34अमानित्वम दंभित्वम हिंसा शान्ति राजवं आचार्य उपासनम स्वचम्
- 25:40स्थिरम आचार्य के समित बैठ जाओ। वह तीर्थ है।
- 25:51तुम तीर्थ स्नान करने कितनी दूर निकल जाते हो, तुम्हें हर चीज़
- 26:00बाहर नजर आती है, ये तुम्हारा संस्कार बन गया है।
- 26:08पदार्थों ने तुम्हे थोड़ा आराम दिया, तुमने उसे आनंद समझा,
- 26:16स्वादिष्ट पदार्थों ने तुम्हारे टेस्ट वर्ड्स को स्वाद दिया,
- 26:21तुमने उसे आनंद समझा। तुम्हारी गुप्त इंद्रियों ने
- 26:26तुम्हें थोड़ी सी देर का आनंद दिया, सुख दिया, तुमने उसे आनंद
- 26:30समझा। धीरे धीरे सभी बातें बाहर से तुम
- 26:37कलेक्ट करते हो और तुम अभ्यस्त हो जाते हो, इसे ही संस्कार कहते
- 26:44हैं। तुम्हारी भी तरह के तह जम जाती
- 26:49है। अगर स्वाद बाहर से मिला सुख बाहर
- 26:58से मिला आराम बाहर से मिला तो आनंद भी बाहर से मिल जाएगा बस यही
- 27:04चीज़ तुम्हें खराब कर देती है। यही चीज़ तुम्हें आनंद तक पहुंचने
- 27:09नहीं देती। सब बाहर से मिलेगा तक तो ताज से
- 27:14मिलेगा लोग पांव में झुकेंगे तो मिलेगा।
- 27:24लोग पूजा करेंगे तो मिलेगा धन में मिलेगा, पदार्थों में मिलेगा,
- 27:32सुखसाधनों में मिलेगा ज्यादा से मित्र बना लूँ, रिश्तेदारों को
- 27:37इकट्ठा कर लूँ, भीड़ इकट्ठा कर लूँ, बड़ी पार्टी बना लोगे।
- 27:46लेकिन पार्टियों में सुख का होता है, पार्टियों में सुख का दिखावा
- 27:52होता है तुमने देखा? पलटू राम कह रहे थे कॉल अपनी
- 28:07पत्नी से यह जो अटैची रखी है, इसमें क्या है?
- 28:13कहते साड़ी और यह जो ट्रंक में रखा है, इसमें क्या है?
- 28:24कहती साड़ी फिर जब एक स्थान पर साड़ियां रखी जा सकती हैं तो दो
- 28:32ट्रंकों को को खराब कर दिया। कुछ सामान बाहर खराब हो रहा है तो
- 28:39पल्टू राम के घरवाले बोले जी। साड़ी साड़ी में फर्क होता है
- 28:45क्या फर्क होता है ये ट्रंक वाली साड़ी घर में डालने के लिए और ये
- 28:54अटैची वाली साड़ी फंक्शन्स में डालने के लिए?
- 29:04तुम फंक्शन्स में नए सुंदर, सुंदर सूट पहनते हो लोगों को जलाने के
- 29:10लिए बना ये भावना अच्छी है। दूसरों को जलाने की अगर मंशा खोगे
- 29:23उसके एवज में क्या मिलेगा? एवेरी अक्शॅन देर इस एन इक्वल एंड
- 29:29ऑपज़िट रिएक्शन अगर दूसरों को जलाने की भावना से अलग से सूट
- 29:35पहनोगे? तो उसकी एवज में परमात्मा का
- 29:41विधान तुम्हें जलन नहीं देगा। ईर्ष्या, द्वेष, नफरत ऐसे ही पैदा
- 29:46होती है, जरूरी है दिन में छः बार सूट बदलना क्या दिखाना चाहते हो?
- 29:58मैं सुखी हूँ यह दिखाना चाहते हो? मैं कबीर गलत कहते हैं तो मैं
- 30:07कबीर कहते हैं जिसे नमस्ते हुए। उस दिन परिधान बदलने की आवश्यकता
- 30:13नहीं रह जाएगी। फिर जैसा है टूटा फूटा चलेगा।
- 30:22किसको होश रहती है के कौन सी घर में और कौन सी बाहर में फंक्शन
- 30:33पर? होश जाने के बाद किसको होश रहती
- 30:38है और वो मुकाम ऐसा जहाँ होश गुम हो जाता है जहाँ तुम होशों हवास
- 30:54सुध खो देते हो। बेसुध ही आके तुम्हें घेर लेती
- 31:02है, सुध बिसर जाती है और ध्यान रखना जब तुम खुद की सुध बिसराओगे।
- 31:14तब उसकी सुधा आ जाएगी। यह अनिवार्य है।
- 31:19सुध एक की रहेंगी या तो खुद की सुध ले लो देख लो कपड़े प्रेस किए
- 31:26हैं, देख लो बाल ठीक से सवार हैं। ये बालों में मोतिया का गुच्छा
- 31:35ठीक लगा, ये कुमकुम ठीक लगी। खुद के तिल से खुद ही प्रभावित हो
- 31:43जाती हैं कुछ स्तरीय इसे सेल्फी हिप्नोटिज्म कहते हैं।
- 31:52आत्मविमुग्धता और यह पागलपन है एक तरह का दे शुड बी ट्रीटेड मेंटली।
- 32:03इनका मानसिक उपचार होना चाहिए। पहले डाका मारा दूसरों की जेब पर।
- 32:15अब सोने की पुशाकें पहन के दिखा रहे हो, चिढ़ा रहे हो लेकिन संत
- 32:21तुम्हारी सब फोगी कार्रवाईयों को जानता है क्योंकि संत तुम तो आज
- 32:26हो अमीर संत राजा भी रह चूके हैं। संत अपने अलग अलग जीवनों में अलग
- 32:36अलग स्वाद चख लिए होता है। जिन मुकामों से तुम आज गुजर रहे
- 32:42हो वो मुकाम उसने पहले बहुत पहले तय कर लिए थे।
- 32:47वह अर्क निकाल चुका है। कहाँ क्या है कहाँ दुख मिलेगा?
- 32:55इसलिए वे धड़कों के अष्टावकर कहते हैं के भोग कर ले क्यों भोग से
- 33:02दुख है कितना बेधड़क निडरता से बोलते हैं।
- 33:11भोगों में चला जा भोगों से मिलेगा।
- 33:15दुख और दुख तुम चाहते नहीं दुखों से होगा वैराग्य, वैराग्य से आई
- 33:24की मोह मुक्षा कैसे इन दुखों से मुक्त हो जाऊं?
- 33:29और जब बहुमुक्षा आ जाएगी यानी मुक्ति की चाहत तो मुक्ति का
- 33:34तरीका भी हो जाएगा। खोज लोगे मुक्ति का तरीका?
- 33:38पहली चाहत को उत्पन्न करो नेसेसिटी इस दी मदर ऑफ इन्वेंशन
- 33:51जरूरतों की जननी है आविष्कार जरूरत पैदा करो पहले अभी तो
- 33:58तुम्हें जरूरत ही नहीं पता तुम चाहती क्या हो अभी तो तुम उस
- 34:04फुटबॉल की तरह हैं। जिधर से जिसने के को मार दिया,
- 34:08उधर चले गए। अपना कोई वजूद नहीं है, तुम्हारा
- 34:21संत तुम्हारी असलियत को खोल देता है।
- 34:32पहले कदर होती थी नए कपड़ों की बड़े लोगों ने घुटने गिसवाने शुरू
- 34:43कर दिए। किसी गरीब को देखा होगा।
- 34:49कुछ अलमस्त फकीर ऐसे होते हैं, अब ध्यान से सुनना ये बात तुम्हारे
- 34:55सुनने जैसी है, जिनको इस बात की सुध नहीं होती कि घुटने घिस चूके
- 35:03हैं। कपड़ों की फिक्र कौन करता है ऐसा
- 35:09मत करो। कपड़े घिस गए हैं क फट गए हैं
- 35:19नहीं तो कृष्ण कहते हैं, बाशांत सिंह जीरनानियता बिहाय नवानी,
- 35:24घृणाति नरो प्राणी तथा श्री रानी बिहाय।
- 35:28जीणा अनन्यानी सयाती नवानी देखी। शारीरिक वस्त्र की भाँति है और
- 35:35आत्म उस जीण शीण वस्त्रों को छोड़कर जैसे नए वस्त्र ग्रहण कर
- 35:40लेती है, वैसे ही होता है जनमवर्मरण।
- 35:52कुछ व्यक्ति लाजवाब होता है, उनके परिधानों का तरीका एक वशीर बन
- 36:00जाता है। कोई गरीब व्यक्ति के घुटने फट गए
- 36:06होंगे घिस गए होंगे। और अमीर व्यक्ति को अच्छा लगा।
- 36:17यहीं भी गलती खा गए। अच्छा लगा उसका लावण्य उसके चेहरे
- 36:22का नूर उसके चेहरे से टपकती हुई आनंद की वो छलकाहट।
- 36:31उसे हतप्रभ रह गया। वह छलकाहट वह नूर तो नहीं कमा
- 36:39सकता था, उसने अपने पैंट भर लिए गुड न्यूज़।
- 36:49इसे आइकॉन कहता हूँ। मैं तुम किसी की नकल करते हो,
- 36:56इमिटेट करते हो तुम में खुद जैसा कुछ नहीं है।
- 37:01यू अरे नॉट इंडिपेंडेन्ट तुम पा बैठे हो कठपुतली हो?
- 37:11किसी लाबनी युक्त फकीर के घोड़े घिस गए मांगता वो है नहीं क्योंकि
- 37:21मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोले?
- 37:29क्या जरूरत है बोलने की? जब रोमा रोमा आनंद से ग्रसित है
- 37:34मस्ती में झूम रहा है। कपड़ों की फिकर कौन करता है?
- 37:44फिर उस मूर्ख आमिर ने अपने घुटने फाट लिए नई भेंट के।
- 37:52और उसमें छह पी लगा दी फटे हुए कपड़े के और मूर्खता देखो,
- 38:02बिल्कुल नए कपड़े से सेलेगी पैंट ₹600 की और घुटनों से फटी हुई
- 38:09पैंट ₹1000 की है। यह इस व्यक्ति ने नकल की थी उस
- 38:17फकीर की जीस फकीर के चेहरे से लाबने मुझे लगता था।
- 38:28जिसके चेहरे से टपकता था नूर तुम प्रभावित हुए, हतप्रभ हुए उसके
- 38:37नूर से और तुमने अपना लिया उसका वस्त्र।
- 38:50कैसे तुम सन्तना बन पाओगे, संत बना जाता है भीतर का द्वन्द खोकर
- 39:04द्वंदा तीर्थ अवस्था में पहुँचकर अद्वैतवाद में पहुँचकर।
- 39:12है और वेदांत तुम्हें यही सीखाता है।
- 39:17उस अद्वैत में प्रतिष्ठित हो जाओ। क्यों तुम्हारी प्रज्ञा है?
- 39:34तुम अपनी खोपड़ी की प्रज्ञा में उलझे रहते हो क्योंकि इस
- 39:37सुप्रज्ञा के अलावा तुम्हें अपने भीतर की प्रज्ञा का कुछ पता ही
- 39:42नहीं है। वह आनंद से सराह हो रहा है वह
- 39:46प्रज्ञा और तुम्हारी खोपड़ी की प्रज्ञा।
- 39:53में कोई आनंद वनन्द नहीं है। तर्क की धार है तलवार की पैनी वह
- 39:59जहाँ जाती है, काटती है और काटने पीटने में कोई आनंद नहीं होता।
- 40:05काटने पीटने में तो रुलाई धुलाई होती है, चीख चीतकार होता है।
- 40:21भीतर की उस प्रज्ञा में बड़ा गहरा आनंद छिपा है।
- 40:26ये वो गुलशन है जिसकी सुगंध कभी जाती नहीं, कभी घटती नहीं।
- 40:34इसे ही कृष्ण कहते हैं। यह कटता नहीं, यह गलत नहीं।
- 40:41तुम्हारा शरीर जल जाएगा, यह नहीं जलेगा इसको हवा तूफान बहा के नहीं
- 40:52ले जाती कोई वाड। इसको अपने स्थान से हिला नहीं
- 41:03सकते हैं। यह अटल है, ये अचल है, उसी की बात
- 41:10करते हैं। सारी गीता में बात तो एक ही कही।
- 41:18समझने वाला होना चाहिए। दूसरी कोई बात कही ही नहीं कृष्ण
- 41:24ने जिसकी आँखें वो ही जान पाएगा। इस बात को ड्वंदतीत व्यक्ति ड्वंद
- 41:35की बात कभी नहीं करेगा। अद्वैत में स्थित हुआ व्यक्ति
- 41:44द्वैत की बात कभी नहीं करेगा। आनंद में गया तो बेसुधि में खो
- 41:52गया बेसुधि के गुण गायेगा इसे ही भजन कहते हैं।
- 41:58तुमने भजन की डेफिनिशन बिगाड़ लिया है।
- 42:12वह उस अवस्था में गाया गया गीत उसकी शलागाह में शब्द सलागाई में।
- 42:23उसकी स्तुति में भीतर से निकली हुई वो पुकार, वो आनंद की लहर जब
- 42:30तुम मस्त हुए फिर बोलना तो होता है लेकिन भजन में बोलना होता है।
- 42:42बजरा दे गोविंदा गोपाला तेरा प्यारा नाम है बजरा दे गोविंदा।
- 43:00गोपाला तेरा प्यारा नाम है गोपाला, तेरा प्यारा नाम है
- 43:13नंदलाला, तेरा प्यारा नाम है। वज्राधे गोविंदा गा गा उस रथ से
- 43:26निबड़ते बड़के गा जो भीतर से आती है।
- 43:29लहरें गोपाला, तेरा प्यारा नाम है।
- 43:40सभी नाम उसके हैं झगड़ा मत किया करो, एक ही की व्याख्या है, एक ही
- 43:53की शलागा है एक ही का गुणगान है नाम कोई भी हो तुम झगड़ा मत किया
- 44:04करो। प्यार से ईद मनाया करो और प्यार
- 44:15से दिए जलाया करो, प्यार से रंग खेला करो और प्यार से अपने अहंकार
- 44:24की बलि दिया करो बकरों के न। बकरों की बलि देने से मासूम
- 44:31जानवरों की बलि देने से तुम्हारा अहंकार बढ़ता है और तुम ज्यादा
- 44:35दुखी हो जाते हो। फिर तुम पूछते हो बाबा ये मानवता
- 44:38दुखी क्यों है मूर्खता के कारण? मानवता दुखी है।
- 44:47अपनी मूर्खता के कारण इस निर्दोष इनोसेंट प्राणी ने क्या बिगाड़ा
- 44:51तुम्हारा? तुम क्यों इसको काट देते हो और
- 44:56क्यों तड़पा तड़पा के मारते हो? क्यों कलमा पड़ते हो और फिर।
- 45:04इसका जीवन छीन लेते हो? इसने क्या बिगड़ा इस तो बेचारे ने
- 45:09कुछ कहा भी नहीं था तुम्हारा क्या लेता था जहाँ घूम फिर रहा था
- 45:19तुम्हारा क्या छीनता था। तुमने क्यों इसको बेकसूर को मार
- 45:26डाला? धर्म के नाम पर अल्लाह को प्यारी
- 45:32है कुर्बानी ये शब्द तो ठीक है लेकिन कुर्बानी बकरों की नहीं,
- 45:38मेमनों की नहीं, निर्दोषों की नहीं तुम्हारी।
- 45:44तुम्हारी कुर्बानी मांगता है वो तुम अपनी कुर्बानी से बचने के लिए
- 45:51हिंदू यज्ञ में नारियल भेंट कर देता है, जला देता है, अपने हंकार
- 45:56को बचा लेता है मुसलमान। मैमने की बलि दे देता है मार देता
- 46:06है खुद के अहंकार को बचा लेता है तुमने तरकीब में खोज ली हैं
- 46:14प्रत्येक धर्म न खुद के स्वाद के लिए।
- 46:22तुमने देवताओं का नाम प्रयोग करना शुरू कर दिया इच्छा तुम्हारी है,
- 46:28तुम्हारी जीव स्वाद मांगती है और तुम उन इच्छाएं की पूर्ति कर रही
- 46:38है दूसरों को बलि का बकरा बना देते हो।
- 46:47फिर तुम कहते हो, मानवता दुखी क्यों है?
- 46:50ए निर्दोष हत्याओं का गुनाहगार कौन?
- 46:54वो भी है जो बकरे की बलि देता है मैंने की और वो भी है जो रोकता
- 47:02नहीं। वो भी कसूरवार है?
- 47:11मुझे कोई व्यक्ति कहने लगा आपने पिछले जन्म में ये नहीं किया, वो
- 47:18नहीं किया। वो नहीं किया।
- 47:23मैंने कहा फिर आप भी साथ हो लेते, आप क्यों उचरण चुम्बक बने रहे
- 47:30आपको किसी ने कहा था चरण चुम्बक बनने को आप साथ हो लेते दो भाई,
- 47:36दो भाई ही होते हैं बराबर कि वह अगर साथ होती।
- 47:41तो फैसला कुछ और भी हो सकता था। तुम क्यों नहीं चले साथ इस बात का
- 47:47जवाब पहले तो मन हो गया तो उसके बाद कोई प्रश्न नहीं पूछा।
- 47:52उसने ऐसे मोड़ों की कमी नहीं है, तुम कहते हो अंत वक्त बहुत हैं,
- 48:04कोई बात नहीं। जो जलेंगे वो इलाज भी करेंगे।
- 48:09जलने का तुम इस आग से परे हट जाओ, तुम नहीं जलने की व्यवस्था कर लो
- 48:19बिलकुल सरेआम कहता हूँ कुछ नहीं है कुंभ में।
- 48:24मोक्ष लेना है तो वहाँ चलियो ना जीस प्रकार का मिलता है।
- 48:29दूसरा तो घर बैठे मिलेगा। सारे संत पुकारना है।
- 48:37काहे रे? बन खोजन।
- 48:48जा है। ये बन है क्यों अपने घर से बाहर
- 48:57जाते हो? सर्वव्यापी सदा अलेपा सर्वव्यापी
- 49:13सदा अलेपा तोहे संग सम। तो है संग सम काहे रे बन खोजन जा।
- 49:41कुंभों में मत खोजो, वनों में मत खोजो, हिमालय की कंधराव में मत
- 49:46खोजो, तेरा साहब है तू जमा है बाहर नैना क्यूँ खोले?
- 50:09हंसपाया मानसरोवर हंसपाया, मानसरोवर।
- 50:26ताल तलैया क्यों डोले, ताल तलैया क्यों?
- 50:38डोले मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोले?
- 50:48मन मस्तुबा नाचो, नाचो गॉ कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, कुछ बोलने
- 51:00की आवश्यकता नहीं, किसी को बदलने की आवश्यकता नहीं।
- 51:05खुद को बदलो मैं सदा से यही कहता हूँ, बिना खुद को जाने जो प्रचार
- 51:16करता है कि तुम आत्मा हो, तुम परमात्मा हो, तुम शरीर नहीं हो।
- 51:25तुम विचार नहीं हो, तुम भावनाओं नहीं हो, वह पाप करता है।
- 51:30मैंने जयपुर की वो घटना सुनाई थी तो व्यक्ति कैसा है?
- 51:34आई ऍम एनलाइटन, तो मैंने खिलौना बंधु को मंगाली ट्विस्टर।
- 51:42झंडी धारी था। जब आया तो मैंने पिस्टल सामने कर
- 51:46दिया। दोनों जगह से गीली हो गई।
- 51:52ऐसा मत करो। कहने की बात कुछ और।
- 52:04भीतर से कुछ और ये श्वेत जुल्फों वाले ले दी हमें आजादी बिना कड़क
- 52:13बिना डाल मका फिर उठाया भी कहाँ था ये बता दो कहीं उठाया उसने
- 52:22बिल्कुल ठीक है। ले कंडिया ठीक है, यह शब्द गाँधी
- 52:33ने नहीं बनाया यह शब्द तुमने बनाया गाँधी तो गए, गाँधी ने कहाँ
- 52:41कहा? मैंने आजादी ले ली।
- 52:44गाँधी ने कहा, सबके सामूहिक प्रयास से हमें आजादी मिल गई, बस
- 52:49काम समाप्त हुआ। अब हमें कांग्रेस को अलविदा कह
- 52:53देना चाहिए और ठीक से गाँधी या खुद बैठते मैं सदा ही ये बात कहता
- 53:02हूँ। या खुद बैठते लेकिन अगर खुद बैठने
- 53:06की लालसा होती तो आज़ादी नहीं दिला सकते थे क्योंकि वो लोभ
- 53:11युक्त आजादी होती है। खुद लोभ नहीं था इसलिए बैरिस्ट्री
- 53:17का सूट उतार दिया, लंगोटी पहन ली। फिर वो मर गया, तुम कुछ भी बोले
- 53:25जाओ कोई फर्क पड़ता है कोई फर्क नहीं पड़ता तू।
- 53:37चला गया। उसे भूल जाओ तुम आज देखो आज उन
- 53:49लोगों ने क्या किया से भूल जाओ। जो आक्रमण्य होते हैं वो इतिहास
- 53:59को खंगाला करते हैं। जो इतिहास बनाने में सक्षम होते
- 54:06हैं वो इतिहास को याद भी नहीं करते।
- 54:09सबक लेते हैं सिर्फ जो। चला गया उसे भूल जा।
- 54:20वो ना सुन सकेगा तेरी सगा जो चला गया उसे भूल जा।
- 54:37उसे भूल। जा उसे भूल जा।
- 54:44लोग गद्दारों की कब्रों के ऊपर जूते मारते हैं, मैं कहता हूँ
- 54:49क्या फायदा? तब जूते मारते जब वो जिंदा था।
- 54:56अब कवर को तो फर्क नहीं पड़ता। हमारे यहाँ कहावत है एक अपना वही
- 55:07होता है जो मारे और छाँव में कराये मैंने कहा नहीं तुम्हारी ये
- 55:13कहावत गलत है मूर्खों की बनाई है अपना वो जो मारे न जलाई।
- 55:19बचाने की चेष्टा करे वो अपना जो मार ही दिए वे धूप में घराए या
- 55:28छाँव में घराए या फिर आखिर तो लकड़ों में गिरा देना होना होता
- 55:32है फिर कहाँ डरते हो तुम? धूप आग तो नहीं है कम से कम फिर
- 55:41मरे हुए प्राणी को तो तुम आग के हवाले कर देते हो।
- 55:46जो मर गया उसको भूल गया। उसने जो किया किया अब वह वापस
- 55:54नहीं आएगा। वह उस रूप में वापस नहीं आएगा।
- 55:58किसी रूप में तो सभी वापस आते हैं।
- 56:01ये हिंदू सनातन मान्यता है। मुसलमान इसे नहीं मानते।
- 56:07ईसाईयत इसे नहीं मानती। ईसाईयत कहती है बस सिर्फ एक।
- 56:14इस्लाम कहता है बस सिर्फ एक जन्म होता है लेकिन सनातन कहते हैं एक
- 56:20अनेक जन्म होते हैं। खैर धारणाएँ हैं।
- 56:26सत्य क्या है ये देखकर जानना चाहिए तुम किसी की बातों पे यकीन
- 56:32न करो। ना एक जन्म होता है ना अनेक जन्म
- 56:36होते हैं। इन सभी पे विश्वास करने वाले
- 56:38मूर्ख हैं वो हैं अंधभक्त, तुम जानो खुद जाओ उन गहरे तिलों पे और
- 56:45देखो के जन्म एक होते हैं के अनेक होते हैं फिर यू अरे ऑथेंटिक तुम
- 56:52प्रामाणिक हो। देखने से पहले मान लेना, मान लेना
- 57:01सहायक तो हो सकता है। मैंने कल भी बोला हर यात्रा मानने
- 57:06से ही शुरू होती है कि मंजर मिल जाएगी।
- 57:10लेकिन नहीं मानोगे? फिर तो अकंबर हुए पड़े ही रहोगे?
- 57:14अजगर की भांति चलना तो पड़ेगा अगर राह नापनी है तो चरे।
- 57:31वैती चरे हुए थे। चलता चला चला दुख भी मिलेंगे, सुख
- 57:41भी मिलेंगे। अगर मंजिल पानी है तो सुखड़े
- 57:54दुखड़े सब जेल में पड़ेंगे। तेरा कोई साथ ना दे तो?
- 58:03तू खुद से पेट। जोड़ ले।
- 58:07अकेला ही चलना पड़ता है और अकेला ही पहुंचना होता है।
- 58:16दूसरे का सहारा? गलत है।
- 58:22दूसरे का सहारा कभी कहीं नहीं मिलता।
- 58:26सिर्फ एक भ्रम है। जन्म भी तुम अकेले लेते मरते भी
- 58:31तुम अकेले पीड़ा भी तुम अकेले ही भोंकते हो।
- 58:36कर्म भी तुम करते हो अगर कुंभ जाओगे तो मुक्त तुम भी होगे और
- 58:43अगर मोक्ष मिलेगा तो मोक्ष तुम्हें भी मिलेगा।
- 58:48तुम ऐसा मत करो। तेरा कोई साथ न दे।
- 58:56तो तू खुद से पीठ। जोड़ ले बिछोना धरती को करके अरे
- 59:07आकाश। ओढ़ ले बिछोना धरती को करके?
- 59:15अरे आकाश ओढ़। ले है कौन सा वो इंसान यहाँ पर
- 59:25जिसने दुख न झेला? बताओ कौन है?
- 59:34राम हैं के कृष्ण हैं, जिसने दुख नहीं जेरा के मोहम्मद हैं या ईसा
- 59:41हैं। यह मंसूर हैं काट दिया गया अंग
- 59:46अंग या बुद्ध हैं, थूक जाते हैं लोग राजा के ऊपर आका।
- 59:53और वो कुछ नहीं बोलता है। नानक को भरा बुरा कहते हैं।
- 1:00:04नानक कहते हैं, बसे रहो बसे रहो अच्छों को कहते हैं उजड़ जाओ।
- 1:00:19तेरा कोई साथ ना? दे तो तू खुद से पीठ जोड़ ले।
- 1:00:26अकेला ही चल किसी की कामना न कर किसी का इंतजार मत कर।
- 1:00:40तुम अकेले ही काफी हो फिराक गोरखपुरी ने बहुत बढ़िया बात देखी
- 1:00:46है, सुना है ज़िन्दगी है 4 दिन की सुना है ज़िन्दगी है 4 दिन की।
- 1:01:00बहुत होते हैं यारों 4 दिन में 4 दिन क्या कम होते हैं?
- 1:01:08चार पल बहुत होते हैं और सच पूछो तो वह घटना एक पल में कट जाती है।
- 1:01:16तुम कह देते हो तुम वही हो न। जिसने ये किया था अरे तब तक तो
- 1:01:22गंगा का पानी न जाने कितनी बार सागर में विलीन हो चुका, वो ही
- 1:01:27कहाँ है रोज़ बदलता है तुम भी और वह भी सारी सृष्टि रोज़ बदल जाती
- 1:01:35है, तुम्हें पता भी नहीं चलता। तुम सोये सोये रहते हो बिछौना,
- 1:01:46धरती को करके अरे आकाश ओढ़ ले पिलोज की डिमॅंड न कर।
- 1:01:56धरती का बिचौना बना ले और बढ़िया चादरों की इच्छा मत कर आसमान का
- 1:02:04ऑर्डर। है कौन सा वो इंसान जहाँ पर जिसने
- 1:02:13दुख न झेला? बताओ कौन 14 वर्ष का वनवास उसे
- 1:02:25मिला ततक क्षण सपने में भी नहीं सोचा था गए थे राज़ तिलक करवाने?
- 1:02:36आदेश हो गया बन का मन का लेकिन वो होते हैं मर्यादा परशुत एक चिंता
- 1:02:46की लकीर तक उनके माथे पे नहीं खींचे ठीक मारते श्री जो आ गया।
- 1:03:01कृष्ण का जीवन कितने दुखों से भरा, कृष्ण के ऐश्वर्य के साथ
- 1:03:10उनके दुख भी साथ वर्णित किए जाने चाहिए ताकि मानवता ये जाने के दुख
- 1:03:16भी हैं। और दुखों को सहे बिना व्यक्ति
- 1:03:20महान नहीं होता। तुम दूसरा पाठ सूख जाते हो।
- 1:03:25तुम सिर्फ उसके ऐश्वर्य का गुणगान करते हो और वो तुम्हारे भीतर बस
- 1:03:30जाती है। बात कि कैसे उसके ऐश्वर्य जैसे
- 1:03:34ऐश्वर्य हम भी भोक पाएं, तुम भूल जाते हो।
- 1:03:37ज़रा संत जैसे लोग सारी उम्र उसके जान के दुश्मन बने रहे।
- 1:03:48प्रश्न दूसरा भी है, लेकिन वक्त नहीं है, एक घंटा हो गया है।
- 1:03:58कैसे कंस जैसे लोग अपने ही मामा उसका भी वध करने को तत्पर हैं।
- 1:04:07सभी तरफ जासूस हैं इसे ढूंढो और इसे मार दो।
- 1:04:16बताओ कौन है जहाँ जिसने दुख न झेला हो बुआ का बेटा शिशु पार बुआ
- 1:04:31कहती है तो मारेगा इसे? तो कुछ तो इसे रिलैक्सेशन दे तो
- 1:04:41कृष्ण कहतेबुआ इसके 100 गुना माफ़।
- 1:04:45अगर इससे ज्यादा करेगा 100 गुना बहुत होते हैं तो फिर मैं इसका
- 1:04:51बंद कर दूंगा। और शिशु पाल कहने के बावजूद अलर्ट
- 1:04:57करने के बावजूद बोलता ही चला जाता है।
- 1:05:01तू लफंगा तू लुच्चा, तू बदमाश तू औरतों के वस्त्र हण करता तू लोगों
- 1:05:08की स्त्रियों को उठा के ले जाता है, स्वयंवर में से उठा के ले
- 1:05:11जाता है। ज़रा देखो आज तुम्हें ये बात कोई
- 1:05:17कहे तो तुम्हारे मन पे क्या गुजरेगी?
- 1:05:22और 100 गालियां निकाले और एक बार में निकाले युद्धस्तर का
- 1:05:27राज्याभिषेक हो रहा है। और शिशु पाल उसको गालियाँ निकाल
- 1:05:33रहा है, तू चोर लोगों का माखन चुरा के गोभियों के वस्त्र चुरा
- 1:05:41लेता है, तू लफंगा रास का बहाना करता है।
- 1:05:51और छेड़खानियाँ करता है, बेड अटैच करता है, है कोई ऐसा इंसान ईसा को
- 1:06:06तो लटका देते हैं और लटकाने से पहले वो सलीब भी उसे ही उठानी
- 1:06:13पड़ती। जीस पहाड़ी पे वो स्लिप गाढ़ी गई
- 1:06:19उस पहाड़ी तक ईसा को खुद अपने मोडो के ऊपर रख वो स्लिप ढोनी
- 1:06:26पड़ी फिर उसको गाड़ना पड़ा खुद। फिर उस पे चढ़ना पड़ा उसके हाथ
- 1:06:38पांव बीन दिए केलों से तुम महान तो बनना चाहते हो, लेकिन बिना दुख
- 1:06:50झेले महान बनना चाहते हो कि तुम्हारी तमन्ना कभी पूरी नहीं
- 1:06:54हुई? महान बनना है तो लफासियों से महान
- 1:07:01नहीं होते। कुरबानियों से महान होते हैं,
- 1:07:04दुखों को सहन करने से महान होते हैं।
- 1:07:08ऐसे कभी कोई महान हुआ है। कागज के फूलों में खुशबू नहीं
- 1:07:15होती, कागज की लफसियां महान नहीं बनाती हैं पर वो प्रेम का मसीहा
- 1:07:35कहता है गॉड ओह गॉड। फोरतीप देम उन्हें माफ़ कर देना
- 1:07:43बिकॉज़ दे डोंट नो व्हाट दे अरे टोइंग, क्योंकि वो जानते नहीं कि
- 1:07:48वो क्या कर रहे हैं? तुम हंसते हो, तुम तमाशा देखते
- 1:07:55हो। और वो परमात्मा से प्रार्थना करते
- 1:08:03हैं फिर तुम कहते हो ऐसा ही गलत है।
- 1:08:09नहीं जसने कुर्बानी दी उसको आइकॉन बना लेना कहाँ गलती है?
- 1:08:20तुमने भी तो ऐसा किया, राम ने कुर्बानी दी, तुमने राम को आइकॉन
- 1:08:25बना दिया, कृष्ण ने कुर्बानी दी, तुमने कृष्ण को आइकॉन बना दिया,
- 1:08:32गलत क्या है? इसमें ढंग तो वही है।
- 1:08:40कुर्बानी दी हजरत ने कुर्बानी दी। ऐसे ही कोई रातो रातो डेवलप के
- 1:08:48पिल्लोस के ऊपर पड़ा पड़ा। महान नहीं हुआ करता, महान होता है
- 1:08:55दुखों को सहन करके। पीड़ाओ को सहन करके उस आग के भीतर
- 1:09:00से गुजरकर ही सीता अग्नि परीक्षा दे पाती।
- 1:09:13श्री कृष्ण गोविंद हरे मोरहरी। नारायण वासुदेव।
- 1:09:43श्रीकृष्ण, गोविंद, हरे मुरारी। हेनाथ नारायण वासुदेव।
- 1:10:12रजाईया दे ओढ़न। तो दबेन उसके वृहक् के पीड़ा।
- 1:10:28अगर तुम्हारे मन को तड़पा रही है तो रजाइयां अच्छी नहीं लगती।
- 1:10:34तुध बिन रोग रजाइयां देओ धण नाग निवास।
- 1:10:49रहण। जैसे साँपों के साथ रह रहा हूँ
- 1:11:00मित्र। प्यार नू।
- 1:11:05कह देना जाके उसे। हाल मुरी दा दे कण मित्र प्यारे
- 1:11:22नू। मुर्शीत से कह रहे हैं।
- 1:11:27मैं तड़प रहा हूँ मेरे हाल कह देना, जाके तुम रोज़ जाते हो उसके
- 1:11:33पास मेरा बरतांत ही सुना देना कि कैसे बीत रही है मेरी जिंदगानी।
- 1:11:49यारण दी सानु सथर चंगी। तो मिल जाए तो मौत भी मंजूर है।
- 1:12:05यारण दी सानु। सथर।
- 1:12:10चंगी तुम मिल जाए कमौत भी अच्छी पठ खेड़े।
- 1:12:18आ दे रे। लेकिन खेड़ों के महलों में रहना
- 1:12:31आरामदायक बिछोना पे सोना आग की चिता में रहने के समान है।
- 1:12:40मित्र प्यार नू। गोपाला तेरा प्यारा नाम है, बजरा
- 1:13:09दे गोविंदा गोपाला, तेरा प्यारा नाम है गोपाला तेरा।
- 1:13:22प्यारा नाम है नंदलाला, तेरा प्यारा नाम है बजरा दे गोविंदा गो
- 1:13:34पाला तेरा प्यारा नाम है बजरा दे गोविंदा।
- 1:13:41गोपाला तेरा प्यारा नाम है धन्यवाद।