Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Jul 25 - क्या गहरी नींद (सुषुप्ति) में परमात्मा का अनुभव होता है? मैंने गायत्री मंत्र क्यों बोला?
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- 0:12बाबा जी प्रणब चैनल कंट्रोलर रोहित का प्रश्न है, आप अक्सर
- 0:33अपने प्रवचनों में एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं।
- 0:43परमात्मा तुमसे जुदा नहीं है। सिर्फ तुम उसे भूले हो।
- 1:01प्रश्न पूछा रोहित ने हम उसे भूल कैसे गए?
- 1:10तो उसको याद करने के लिए हमें साधना में जाना पड़ता है।
- 1:18न कुछ करने में जाना पड़ता है इसको थोड़ा सा रहस्यत्मक रूप से।
- 1:31इस बुद्धि को सुलझाने का प्रयास कर रहे है।
- 1:36रोहित इसलिए प्यारा है और भी प्यारा हो
- 1:53जाता है जब तुम ऐसा पूछते हो। कि रहस्यत्मक ढंग से समझाने का
- 2:01प्रयास करें। पहली बात ये शब्दों को गौर से
- 2:16सुनियेगा जब भी कभी रहस्य की बात को आप सुनना चाहते।
- 2:28बाबा नानक कहते हैं शिष्य गंजा कौन होता है?
- 2:41शिष्य शिष्य होता है। जो बिना किसी तरह के बिना किसी
- 3:01सेंसर सीख के गुरू की रात को। पूर्ण हृदय से स्वीकार करता है
- 3:18यही शीशी की निशान। पूछा भूल कैसे गए इसे ऐसा समझा
- 3:44तुम एक सम्राट। दिन भर के काम काज करके तुम सो गए
- 3:56हो रहस्यत्मक बातें हैं बारीकी से सुनने की चेष्टा करना यानी अपनी
- 4:12समझ को छोड़ देना। कोई सेंसर से बाकी न रहे।
- 4:19दिमाग में सीधी आवाज तुम्हारे हृदय में उतर जाए।
- 4:25सभी तलों को चीरती हुई जो गांठें बन के तुम्हें तंग कर रहे हैं।
- 4:38रात को सो गए हो गह नेद्रा में सोए हो, परम शक्ति में सोए हो?
- 4:45गुड़ नेद्रा में सोए हो हो तुम सम्राट?
- 4:55परम सुशक्ति की अवस्था में क्या तुम्हें पता होता है कि मैं
- 4:59सम्राट हूँ नहीं पता होता है, बस तुम ऐसी ही किसी अवस्था में आ गए
- 5:17हो। यह तुम्हें अपने होने का पतन इसे
- 5:29ही मैं भूल जाना कहता हूँ। इसे ही गुरचिप रिमेम्बर यूरसेल्फ़
- 5:39कहते हैं। सेल्फ रिमेम्बरिंग अपने आपको याद
- 5:43करो अब जहाँ पर थोड़ा सा हम बारीकी से संदिग्ध क्षेध कर ले
- 5:56भूलने का अर्थ खो देना नहीं होता। तुम सम्राट हो, रात को सो गए हो,
- 6:07नींद के गहरे आगोश ने तुम्हें डुबो लिया है, तुम्हें कोई खबर
- 6:14नहीं आस पास की दुनिया की। सभी वातावरण सेवा बेखबर है।
- 6:29तुम सोए पड़े हो तुम हो सम्राट। उस घड़ी में क्या तुमने अपना
- 6:39सम्राट अस्त वह खो दिया है यह बताओ सोच के प्रकृति की नींद ने।
- 6:56तुम्हें तुम्हारा सम्राट तत्व भुला दिया है, येट यू हैव लॉस्ट
- 7:02यूर एम्पायर तुमने तुम्हारा साम्राज्य खो दिया है?
- 7:14या कि तुमने तुम्हारा साम्राज्य बोला दिया है, तुम कहोगे खैर,
- 7:29नहीं बुला दिया है क्योंकि सुबह जागेंगे।
- 7:37और सुबह जागेंगे, तो राजा पायेगा, मैं तो सुन रहा था वह भूल न कैसे
- 7:48क्षण थोड़ी देर के लिए। जैसी ही तुम्हारी निद्रा टूटेगी
- 8:04तुम बाहोष हो जाओगे तब क्षण तुम पाओगे, खोया नहीं।
- 8:16भूला है। फिर इसे हम शाश्वत खेल समझे या
- 8:29प्रकृति का खेल समझे, प्रकृति का खेल समझे।
- 8:39क्योंकि तुम स्वयं हो, प्रकृति की व्यवस्था के कारण हर दिन का काम
- 8:47धंधा करते करते, तुम्हारे सनायु तंत्र ढीले पड़ जाते हैं,
- 8:52तुम्हारे टिशूज टूट जाते हैं। तो प्रकृति तुम्हे निद्रा में दखल
- 8:58देती है। एक प्रकृति के कर्म के कारण तुम
- 9:04उन लक्षणों में होल जाते हो के हम सम्राट हैं।
- 9:19जब जब भी तुमने अपना सुमार्कत्व खोय नहीं फोरगेट किया है, लूज़
- 9:32नहीं। बस यही फर्क
- 9:48क्यों भूले क्योंकि प्रकृति न तुम्हें?
- 9:54अपने आरोप में ले लिया और प्रतिस्थिति पढ़ी करणप्रिया है
- 10:05अगर तुम्हे न सुलाएगी। तो तुम अगले दिन के कामकाज करने
- 10:10के लिए तैयार ना हो और फिर वैज्ञानिक कहते हैं कोई व्यक्ति 9
- 10:20दिन तक न सोयो ये पागल हो गया। इससे भी ज्यादा दिन न सोए तो वह
- 10:34मर भी सकता है, क्योंकि नींद में तुम्हारे सारे शरीर की तोपसिस सके
- 10:47प्राकृतिक रूप से प्रकृति। टॉक्सिसिटी को बाहर निकाल देते
- 10:53हैं, जो विषैली जवानु होते हैं, तत्व होते हैं, फॉरेन मटेरियल्स
- 10:58होते हैं, विजातीय द्रव्य होते हैं, जो बाहर से आए होते हैं,
- 11:05शरीर के किसी काम के नहीं होते। जैसे धूल धमास तुम्हारे शरीर में
- 11:12जम गई, वह शरीर की कोई काम नहीं। धूल धमास जम गई, वह किसी काम की
- 11:18नहीं तो तुम क्या करोगे? कपड़ों को धो लोगे, शरीर को नहा
- 11:26लो। धूल धना से उतर जाएगा प्रकृति
- 11:36बड़ी करुणामयी जैन ही है, माता है और तुम्हें अभी पता नहीं है,
- 11:48बच्चे को प्रकृति 22 से घर के सुला।
- 11:52एक 2 घंटे के लिए भूख लगी है। उसने दूध पीना है, बच्चा बड़ा
- 12:02होता है, नींद करती है, आज तुम बड़े हो गए हो, कल को बूढ़े भी हो
- 12:10गए। मैं क्यों कहता हूँ पर्याप्त
- 12:21मात्रा में 100 टॉक्सिसिक इस जो विष तुम नहीं करता प्रकृति को
- 12:33मौका दो इस विष को बाहर? सारी रात प्रकृति तुम्हारे
- 12:47विषाणुओं को बाहर निकलती है। यही वो वक्त है।
- 12:53जब प्रकृति तुम्हारे विषाणुओं को बाहर निकालती है सारी तुम्हें
- 12:59नॉनटॉक्सिक कर देते हो। सारा धूल धवन, सारा कूड़ा, खोवा
- 13:08जो व्यर्थ है तुम्हारे शरीर के किसी काम का।
- 13:15प्रकृति अपनी मेहनत करके तुम्हारे भीतर जादू फेर देती है, साफ सफाई
- 13:20करते है और वह सारा दूध, वह सारा विषयलय तत्व सारे वीषाणु।
- 13:40यूरीन के माध्यम से पेशाब मार्ग से सुबह निकल जाते हैं।
- 13:47इसलिए तुमने सुना होगा डॉक्टर से अगर पेशाब की जांच करनी है तो हम
- 13:53कल लावारिसरी के भीतर तो सुबह सुबह का पेशाब देते हैं।
- 14:00कब? क्योंकि सारी रात्रि की विषाणु
- 14:07विजाती है। भृग फौरन मैटेरियल्स सब उसमें आ
- 14:11गए और तुम इतने समझदार हो की तुम उसको गट्टा भी लेते हो?
- 14:23फिर तुम कहते हो कि मोरारजी देसाई 100 साल जीते।
- 14:28मैं तुम्हें कहता हूँ, अगर मराठ की देसाई अपना मूत्र खुद न पीते
- 14:34होते तो 125 साल जीते। ये तुमने कभी सोचा?
- 14:43और फिर यहाँ तो मैंने ऐसे लोग देख के जो रात को ही शराब पी थी, बहुत
- 14:54कुछ ऐसा खा लेते हैं। जो शरीर की प्रकृति के वर्ग है और
- 15:03रात्रि में जब साफ सफाई होती है क्लीनर फेरा जाता है।
- 15:07प्रकृति के द्वारा तो वह सब तुम्हारा पेशाब में निकल जाता है
- 15:12और सुबह उठकर मैंने देखे वो लोग अपने पेशाब के लिए।
- 15:23आदमी के पास बुद्धि है, विवेक भी है, फिर बुद्धि और विवेक होते हुए
- 15:35आदमी इतना मूड क्यों हो गया? दूसरों के कहने के कारण दूसरों के
- 15:46पीछे लगने के कारण सम्राट रात को भूल जाता है कि मैं
- 16:03सम्राट हूँ दरिद्र। कंगाल भी रात को भूल जाता है कि
- 16:12मैं दृद्र हूँ मैं बंगाल और यह शोभ भी है क्योंकि वास्तव में
- 16:21प्रकृति तुम्हें बताना चाहती है के रियली व्हाट यू अरे?
- 16:30वास्तव में तुम जो हो न तो सम्राट और न ही तुम धरित रहो प्रकृति
- 16:43तुम्हें दोनों से पार ले जाती है यह थोड़ा समझना।
- 16:51मैं पलटी मरूँगा प्रकृति तुम्हें उस तल पे ले जाती है जो तल
- 17:08बिल्कुल सही है, जिसमें थोड़ा सा आनंद भी है।
- 17:15खुमार भी है, शांति भी है, गलाहल हेमिता भी है यहाँ तुम्हारे गलत
- 17:26बोध का तुम्हें पता नहीं लगता ये गलत बोध है कि तुम सम्राट हो।
- 17:35ये गलत बोध है कि तुम कंगाल प्रकृति रोज़ तुम्हें ये मौका
- 17:43देती है कि तुम इस नींद से कोई सबक ले।
- 17:53घनी नींद की अवस्था में तुम आनंदित होते और हमारे शास्त्र ने
- 18:05हम और प्रकृति से ज्यादा समय वो कहते हैं 3 घंटे सो 4 घंटे सो।
- 18:22तुम्हारी ज़िन्दगी उस फुटबॉल की तरह है जो दो धड़ों के 1111
- 18:30खिलाड़ियों के बीच में जिधर के कमार के फुटबॉल उतर चली जाती है,
- 18:36तुम्हारा अपना खुद का वजूद है। और ऐसी देनहीन अवस्था में प्रकृति
- 18:45तुम्हें रोज़ उस तत्व को लेकर जाती है जहाँ वास्तव में तुम कौन
- 18:52हो वहाँ चले जाते हो ये ठीक से तुम्हें पता नहीं लगता कि तुम हो।
- 19:01यहाँ रुकिए, थोड़ा मैं यहाँ से फिर पलटूँगा प्रकृति तुम्हें उस
- 19:09स्थल पे ले जाती है जहाँ तुम्हें पता नहीं चलता कि तुम कौन अच्छा
- 19:15किया प्रकृति ने बुलाकर। जो गलत था।
- 19:21यह गलत है कि तुम मराठा यह गलत है कि तुम दृद्र हो, इसलिए प्रकृति
- 19:34तुम्हें उस स्तर पर ले जाकर। एक अनुभव देना चाहती है कि तुम
- 19:41करीब करीब ऐसे हो शब्द प्रयोग किया।
- 19:46मैंने करीब करीब ऐसे एक्यूरेट बिल्कुल सटीक ऐसे नहीं करीब करीब
- 19:55ऐसे हो, शांत हो। कलह रहीम हो, कोई विचार नहीं
- 19:59उगता, कोई बात नहीं उठती, कोई भाग दौड़ नहीं सुसुक्ति की बात को
- 20:07करता हूँ सोपन की बातों से आगे आएंगी।
- 20:16प्रकृति तुम्हें रोज़ कहती है ऐसे हो जाओ तुम यहाँ तुम्हें मैं लेकर
- 20:25आई इस घड़ी में न शोक है, न रोग है, न धैर्य है, न ईर्ष्या है, न
- 20:35प्रेम है। कुछ भी तो नहीं यहाँ विरोधी
- 20:41तत्वों के रूप में न खुशी है, न दुख है, न सुख है, न रोग है, न
- 20:48निरोग है। पहली बात।
- 20:56आज के प्रवचन की कि तुमने ऐसा होना है जैसे रात को प्रकृति
- 21:01तुम्हें बना देती हो। ये तुम्हारा लक्ष्य है दुनिया में
- 21:10कुछ भी करो। लेकिन जब तक प्रकृति तुम्हें इस
- 21:15स्थल को लेके जाती है उस स्थल पर न पहुँच जाओ, जागते जाओ प्रकृति
- 21:24कहती है मैं सोते सोते जहाँ तुम्हें ले गई मूर्च्छित अवस्था
- 21:30में तुम्हें जहाँ ले गई। बस तुमने इतना करना की आमूर सीत
- 21:37अवस्था में तुमने वहीं पहुंचे ड्रामा ये है तुम्हारा ध्येय ये
- 21:45है तुम्हारा डारगट ये है तुम्हारा गोल ऑफ लाइफ।
- 21:53ज़रा देखा थोड़ा सा व्याख्या ही कर दूँ क्षणों को लीजिए परमू
- 22:05सृष्टि के क्षणों में तुम ना तो रोगी रहती हूँ।
- 22:13ना अंदर रोगी रहते, ना कर्जदार होते हो, ना कर्ज देने वाले होते
- 22:18हो, ना धनाढ्य होते हो, ना दरिद्र होते हो।
- 22:29तुम्हें पता नहीं होता कि तुम भूखे हो या तुम।
- 22:38तुम्हे पता नहीं होता कि तुम तानाशाह या तुम प्यारे सारे दो लग
- 22:47जाते प्रकृति तुम्हे यह सपाती है। ऐसी अवस्था में आ जाओ, उसका फल
- 22:58क्या मिलेगा जो तुम अभी देख रहे हो तुम निर्भार हो जाओ, उन क्षणों
- 23:09में तुम्हारे दिमाग पर कोई भार होता है।
- 23:14कोई चिंता, कोई चिंतन, कोई जप चढ़ता, कोई राधे राधे, कोई योग,
- 23:28आसन, कोई प्राणायाम, कोई खेचरी मदुरा उस अवस्था में तुम करते
- 23:35क्या हो? इस अवस्थ में तुम सिर्फ होते हो
- 23:48बिना किए पर प्रकृति तुम्हें यही पाठ और रोज़ सिखाती।
- 24:01सिर्फ होना है बिना कुछ किये और अगर तुम ऐसी स्थिति में पहुंचने
- 24:09में काम जामोगे तो तुमने अपना लक्ष्य हासिल कर दिया होना है।
- 24:19बिना किये कुछ किये होना है क्या होना है जहाँ प्रकृति तुम्हें रात
- 24:28के क्षणों में सुसुक्ति के उन घने तालों में ले जाती है रोज़।
- 24:40वह तुम चीज़ को पता नहीं करते कि मैं लूट गया, मैं लूट गयी, मेरा
- 24:48छीन गया, मेरा कोई छीन के ले गया वहाँ वेद नहीं होता कि यह मेरा
- 24:55है, यह तेरा है। वहाँ पता नहीं होता कि ये मेरा
- 25:00पुत्र है, ये मेरी माता है, ये मेरा पिता है, भाई है, बन्धु है,
- 25:05शत्रु है, दोस्त है क्या नहीं सभी सूचनाओं के?
- 25:17पा ये सभी सूची नहीं तुम सम्राट हो, तुम कंदाल हो, ये तुम्हारे
- 25:30भाई, बहन, माता पिता पुत्रपौत्र आती हैं, ये तुम्हारे दोस्त हैं,
- 25:34तुम्हारे शत्रु हैं। तुम गद्दी नशीं हो या गद्दी खो गए
- 25:40हो तुम्हारा बैंक में बैलेंस कितना है या तुम्हारे पर कोई
- 25:48अभियोग चल रहा है या तुम निर अभियोग अवस्था में परम आनंद में?
- 25:59क्या हो तुम तुम्हें पता नहीं चलता यह वो क्षण है जिसे व्याख्या
- 26:08ही नहीं किया जा सकता। बिल्कुल ऐसा ही।
- 26:14जैसे परमात्मा व्याख्या नहीं किया जा सकता जब तुम उस छोटे से तल पर
- 26:26जहाँ रोज़ जाती हो, क्या तुम मुनकेर हो सकते हो कि वो तल नहीं?
- 26:36एक छोटे से तल के बारे में तुम ये नहीं बोल सकते की सिसूक नहीं होती
- 26:46कह सकते हो कोई धरती का प्राणी कह सकता है की सिसूक्ति नहीं होती।
- 26:53अब देखिए आपकी मूर्खता। मार्कर्स जैसे लोगों की मूर्ख था
- 27:04होते जैसे लोगों की मूर्ख, तुम ये नहीं कह सकते के सुशुकती नहीं है
- 27:15जहाँ जाके तुम आनंद। यह सारे भेद मर जाते हैं, शत्रु
- 27:23नहीं रहता, मित्र नहीं रहता, पिता नहीं रहता, पुत्र नहीं रहता,
- 27:30निर्धन नहीं रहते, राजा नहीं रहते, कंगाल नहीं रहते, सम्राट
- 27:34नहीं रहते। रोगी नहीं रहते सुस्त नहीं रहते
- 27:40तुम वहाँ पहुँच जाते पर तुम नहीं कह सकते कि वह नहीं है इतना सा
- 27:55ज्ञान रखने वाला व्यक्ति। परमात्मा तक को कह देता है कि वह
- 28:04नहीं है रोज़ जाती सुशुक्ति के गहरे थलों पे जा आनंद उठाती, मस्त
- 28:17होती रिलैक्स। डी टैक्सी फाइल बड़े मज़े की बात
- 28:27है तुम्हारी अपने ही शरीर के भीतर और मस्तिष्क के भीतर गटने वाली
- 28:33घटनाओं को तुम ये नहीं कह सकते को है।
- 28:39लेकिन तुम मज़े से कह रहे हो तो कोई परमात्मा नहीं, इसलिए को मैं
- 28:48यहाँ मोरू। कृष्ण नहीं कहते हो परमात्मा
- 29:04कृष्ण कहते हैं परमात्मा नहीं है, ये तो सवाल है मैं मैं परमात्मा
- 29:09हूँ, किसी ऋषि न्याय तक का बुद्ध कोई अकेले।
- 29:15नए अध्यात्मिक व्यक्ति जनमत करते एक अकेले और किसी दूसरे के भीतर
- 29:25वो यंत्र नहीं लगे। सभी के भीतर वो यंत्र है।
- 29:35बुद्ध ने बोलने का सहस किया कि परमात्मा नहीं, क्या उसका पागलपन
- 29:42नहीं है? बिलकुल बुद्ध जीस स्थल को जान गए
- 29:56और तुम तत्व को जान गए। पर ये भी जान गए कि मैं भ्रम में
- 30:02था जीसको मैंने मैं की तरह मानूं, वास्तव में वो मैं नहीं था, ये
- 30:12शरीर के उपकरण एप्रेटस मैं नहीं था अब पता चला।
- 30:23ये मेरी भावना चाहे प्रेम चाहे ईर्ष्या ये भावना उससे दूर थी,
- 30:33मैं नहीं आज बुद्ध ने जान लिया। तो आज बुद्ध निमंद बुद्ध कैसे कह
- 30:46सकते हैं? बिना खोजे की परमात्मा नहीं है।
- 30:57वो ही गलती वो मारकर उसने की। क्षमनीय है क्यों?
- 31:09क्योंकि वो अध्यात्मिक वृत्ति है ही नहीं, लेकिन वो तो एक
- 31:14अध्यात्मिक है। बुध को ये शंखना चाहिए।
- 31:20कि मेरा एक एक शब्द सदियों सदियों, पीढ़ियों, पीढ़ियों तक
- 31:25लोग सुनें, सुनेंगे और अनुकरण करें।
- 31:30बुध का एक एक लफ्ज़ बड़ी जागरूकता से आना चाहिए।
- 31:39तो क्या बोलते हैं? यहाँ मोर्चा दिखाई बिलकुल दिखाई।
- 31:48पक्का पक्का कह सकते हैं परमात्मा नहीं है तो फिर कृष्ण गलत हो जाए।
- 32:00यज्ञ वल्क गल्प हो जाएंगे। अगर बुद्ध को पक्का पक्का मार
- 32:07लिया जाए, शिष्य तो अग्र ही होता है।
- 32:15शिष्य पीछे लघू शिष्य बेड़ों की जमात है।
- 32:20एक बाड़े में बंद कर दी गई। मैं मैं मैं मैं पकार रही शिष्य
- 32:26वो किस्मत गुरु की बातों को ही दोहराना और गुरु की बातों को ही
- 32:32मानकर। उन तलो तक बुंझना शिष्य का दी
- 32:40माना भूत ने वो जान लिया जिसके जानने से दुख मिट जाता है।
- 32:56किसके जानने से रोग मिट जाता है? अभाव मिट जाते है धीरजता मर जाती
- 33:05है सब मिट जाता है जीसको तुम। क्लेश कहते हो, रोग कहते हो कष्ट।
- 33:21लेकिन क्या यह पर्याप्त है? क्या बुद्ध दुनिया को इस तल्प से
- 33:31आगे? यज्ञ बल की या कृष्ण के तल के
- 33:34मकान के ऊपर नहीं ले गए। क्या वास्तव में परमात्मा नहीं
- 33:41होता? बस यहीं बुद्ध मार्ग एक थोड़ा सा
- 33:48शब्द। संत को इतनी उच्च श्रेणी में
- 33:52पहुंचाया व्यक्ति लेकिन एक पागल व्यक्ति है वो कतल कर देता है।
- 34:03अदालत किसी ने क्षमा कर देती है इस अब नॉर्मल जब की उसने कतल किया
- 34:10है। भारतीय जंतर संहिता के प्रावधान
- 34:23के मुताबिक आईपीसी के धारा 8484 के तहत कोई व्यक्ति मानसिक पागलपन
- 34:35है। यह विकसितता की स्थिति में कोई
- 34:41क्राइम कर देता है, उसको क्षमा कर दिया जाता है।
- 34:47क्या कैसे तुम गाड़ी चला रहे हो और पक्का है कि तुम्हारा स्टेट इन
- 34:55फेर हो? स्टेटिंग का कोई शत्रु फँसा था वो
- 35:01ढीला हो गया, टूट गया, बाहर बिखर गया और फ्री हो गया तुम्हारा
- 35:07स्टेटिंग तो निश्चित रूप से तुम गाडी तो चला नहीं पाओगे जिधर
- 35:13जाओगे मोरू। क्या होगा दुर्घटना हो जाएगी।
- 35:25हमारे शरीर का संचालक मन का संचालक दिमाग है।
- 35:35दिमाग अव्यवस्थित हो जाए। पागल होते हैं दंड नहीं मिलेगा
- 35:42मुझे क्या क्योंकि पागल को दंड क्यों नहीं मिलता है ठीक ठाक और
- 35:51थोड़ा सा सही व्यक्ति? और वही अपराध करते, उसको सजा मिले
- 36:02और मैं तुम्हें कहता हूँ, अगर सर्वोच्च पत्नी के ऊपर बैठे हो
- 36:07व्यक्ति को कतल करते हैं तो उसके लिए क्षमा नाम की चीज़ कुछ नहीं
- 36:15होना चाहिए। वो किस के हाथ में पावर है और
- 36:22तुमने पावर दी है? इसका मतलब उसका दिमाग ठीक है,
- 36:31उसका माइंड सेट है। पागल होता तो तुम कैसे जिताते?
- 36:41जीतने ऊंचे पौधे का होगा। जज अगर करते हैं तो जज को तो
- 36:46आईपीसी की धाराओं का सब पता है। निश्चित रूप से उसको कठोरतम दंड
- 36:55मिलेगा। क्योंकि आम देखती तो और किसी के
- 37:01धाराओं को जानता भी नहीं, वह तो वेल नोन है पढ़ा लिखा है, उसने
- 37:07करण क्यों किया जान के बूझते कि इसकी सजा क्या है?
- 37:15स्टेज में फेर हो गया। दुर्घटना होगी ही होगी।
- 37:31बुध एक समझदार व्यक्ति उस स्तर पर वासन।
- 37:38उस स्तर पर पागल व्यक्ति पहुँच सकता है।
- 37:44अगर पागल व्यक्ति जहाँ क्षमा हो जाता है, एक तल पर उसको बेनिफिट
- 37:50भी है तो एक तल पर जाकर नुकसान भी है तो वह सोन को रीत करना ही नहीं
- 37:55कर सकता। को कि रीकवर नइज़ करने वाला विवेक
- 37:59नहीं है। अब देखिये तू 18 साल से अगर 1 दिन
- 38:08भी कम है। वह जो अपराध करेगा 18 साल से 1
- 38:14दिन ऊपर है। वह जो अपराध करेगा दोनों के लिए
- 38:20सिर्फ 2 दिन के बाद है। अलग होगा क्योंकि वह नाबालिग समझा
- 38:25जाए और दूसरा बालिग समझा जाएगा। क्या 2 दिन में?
- 38:34हमारे कानून हमारे ढंग से ही बनेंगे।
- 38:38इसके अलावा हम कुछ बना नहीं सकते। कुछ तो निर्धारित करना ही होगा
- 38:43ना? लोग आज फैसला हो जाए।
- 38:57मार्क एस कहते परमात्मा ने उसको छोड़ा क्योंकि उसकी लाइन नहीं, वह
- 39:02तो समाज में सुधारक है। नीचे से कहते हैं परमात्मा मर गया
- 39:12व्हाट इस दट? ऐसी बातें नास्तिकता वास्तिकता की
- 39:21बातें बुरा मत मानिए अगर बुरा मानोगे ही तो मेरा।
- 39:39पागल लोकप्रिय करते जिनके दिमाग में सब तो इस विचारधारा से इस
- 39:48शक्ति से मैं बुद्ध को मूर्ख हो के।
- 39:56अरे वो क्या जागते बोल के पागल है क्या गुमराह कर दिए हैं?
- 40:09संत है और संत? हमेशा मानवता का भला क्या है?
- 40:22फिर अगर बुद्ध ठीक है तो कृष्ण गलत हो जाएंगे क्योंकि कृष्ण के
- 40:33परमात्मा में। विरोधी धुर हैं।
- 40:38दोनों ऐसा नहीं है। तलों का फर्क है बड़ा भार एक कहता
- 40:44परमात्मा नहीं, एक कहता परमात्मा छोड़ो, मैं ही परमात्मा हूँ।
- 40:52तो बड़े मज़े की बात है। सनातन धर्म में तो जो ऋषि पहुँच
- 40:56गया उसका उदभौष्य ही ये है अहम ब्रह्मास्त्र और कभी कभी अचानक भी
- 41:07छलांग लग जाती है। जो नैत का शिष्य मनसूद छलांग लगा
- 41:16गया अचानक अब उसे पता से क्या पता सर कि मैं परम विस्तार अखंड हूँ,
- 41:26मेरी कोई सेवा नहीं है एक दम से फैल गया।
- 41:32फैल गया तो परम जितना फैलोगे उतना आनंदित हो जाओगे।
- 41:37इस पाठ को नोट कर हाँ हाँ इसको सरल जीतने संकीर्ण हो जाओगे और
- 41:48जीतने संकीर्ण परम संकीर्ण हो जाओगे।
- 41:55तो तुम लोगों से मांग कर लेकर कहोगे नहीं, मैंने तो लेना है
- 42:04इसका देना कुछ नहीं है ये परम संकीरता के निशान।
- 42:09और परम संकीर्ण व्यक्ति 1 दिन का हो जाता जितना फैलोगे और फैलते
- 42:22फैलते फैलते 1 दिन बुद्ध के चलते आ जाओगे।
- 42:28करुणा जनक हो जाओगे, दयालु हो जाओगे भगवान।
- 42:35लेकिन शांत हो जाओगे, मस्त हो जाओगे, आनंदित हो जाओगे, थोड़े
- 42:42थोड़े उस दल के ऊपर गया हुआ व्यक्ति अगर ऐसे।
- 42:51सेंसिटिव उदघोषित ना करता है, वह शमणीय नहीं है।
- 43:01अक्षम्य अपराध की अवस्था में थोड़े से शब्दों की रित बूटी।
- 43:11सब कुछ बदल जाता है। बुद्ध जैविक तो कह सकते थे
- 43:20ईमानदार थे। बुद्ध की ईमानदारी पर पुरुष कही
- 43:24था, मैंने देखा। मैं शरीर नहीं हूँ, मैन्द्रिया
- 43:31नहीं, मैं भावनाओं नहीं, इमोशन्स नहीं, ये मैंने देखा, उससे आगे
- 43:38मैंने कुछ नहीं देखा, लेकिन शायद बुद्ध के किसी पल पर चोट लगी होगी
- 43:46इन बातों को। क्योंकि अभी थोड़ा अंहकार वकील है
- 43:54और अंहकार है तो करना भी है। कृष्ण में करना भी होता है, हो
- 44:03जाता है क्यों? अहिंकार के फलस्वरूप की ही तो
- 44:09करना होगी। अब तुम्हें शायद समझना है कृष्ण
- 44:19करुणावान नहीं है बुद्ध कर्णवान। और करुणा एक वासना निर्दायिता भी
- 44:35एक वासना है, करुणा भी एक वासना है, जीस सभी का।
- 44:44विपरीत हो, वह वासन सुख है तो दुख है, शोक है तो हर्ष लाभ है तो
- 44:56हानि है, जिसका विपरीत वह वासन। इसलिए आनंद का कुछ विपरीत।
- 45:05शांति का विपरीत है, अशांत आनंद का कुछ विपरीत और जीस, शांति के
- 45:12तिलाश में तुम करते हो वह मिलेंगे तुम्हें कोलाहल हीनता में नहीं
- 45:20मिलेंगे। वोहो मिलेंगे तुम्हें आनंद की
- 45:23छाया की तरह मत ढूंढो, शांति को सीधे सीधे आनंद को ढूंढो आनंद में
- 45:35उतरो, शांति आनंद की छाया की तरह। अनंत के संग संग आज ही जाया करती
- 45:42है, उसे आना ही पड़ता है। हैरानी की बात है भारतवर्ष जैसी
- 45:52पवित्र भूमि के ऊपर कृष्ण जैसा व्यक्ति होते हुए।
- 46:00हमने शंकर जी से व्यक्ति को कैसे तरीके करना सीखे, कैसे मान्यता
- 46:06देती, कैसे महत्त्व की? जो झंडा उठाया जाता है?
- 46:12पहलवान की तरह कहता इस झंडे को पकड़ लो, शास्त्रार्थ कर लो।
- 46:17अगर जीत गए। तो तुम जीत जाओगे, मैं हार
- 46:20जाऊंगा, अभी इतना ही कच्चा है तो नहीं, मैं शास्त्रार्थ करने योग्य
- 46:26ही नहीं हूँ। कृष्ण ऐसी कोई शर्त नहीं लगाते।
- 46:33क्यों कृष्ण बखूबी जानते हो? अनल हक मैं ही थर्मा हूँ और फिर
- 46:43जो बखूबी जानता है वह शत्रत नहीं करेगा, कोई झंडी नहीं उठायेगा,
- 46:52क्योंकि इसने सम्मान थोड़े ही पाना है।
- 46:56झंडी जो पकड़ेगा उसे शास्त्रार्थ करेगा, सारी मंडी इकट्ठी करेगा,
- 47:02उनके बीच में शास्त्रार्थ होगा, फिर वो जीतेगा, फिर लोग वाह वाह
- 47:08करेंगे क्या? वाह वाह लेना अगर शंकर चाहते हैं।
- 47:12तो मैं समझता हूँ के फिटे में कह देना चाहिए शंकर तेरे फिटे में एक
- 47:20कला ही तो जानता है, तेरी कोई भी व्यक्ति जान सकता है जो जमसे और
- 47:26बैठकर पहुँच जाए कोई बहुत बड़ी कृपा है।
- 47:31करामात है, सुन को खो देना शुद्रता के रूप में करामात है,
- 47:41सुन का हो जाना वराट की तरह और अगर अभी शस्त्रत करते होगे।
- 47:55तो सिर्फ तुम तुम्हारी कमजोरियों को दर्शा रहे हो।
- 48:01ऐसे ऐसे लोगों को हमने पूछा शंकराचार्यों को हम पूछ रहे।
- 48:13क्योंकि कौन करेगा किसके साथ शस्त्रार्थ जिसने देख लिया दूसरा
- 48:27आई ने अगर पगला गए हो तुम? शास्त्रार्थ करोगे एक दूसरे के
- 48:37साथ और बातें करोगी उसकी यहाँ जाकर दूसरा खत्म हो जाता है।
- 48:43अध्यात्मान दूसरा रहता ही नहीं बात करोगे उसकी शास्त्रार्थ करोगे
- 48:51उस विषय में। यह कुछ तुम्हें पागलपन नहीं लगता
- 48:59था। मुझे तो लगता है आई कैन से विथ
- 49:05गारंट के शंकर से। एक छोटी सी ट्रिप जानता है इससे
- 49:17ट्रिप वो सारा संसार भ्रमित कर दिया।
- 49:30ज़रा सोचना कभी एकांत में बैठ के अपने कमरे में एकांतों की सूचना
- 49:40बात करते हुए उस तल की जहाँ भेद मत जाती और शास्त्रार्थ फिर करोगे
- 49:48किस के साथ जब दूसरा बचा है? मूल मंत्र की व्याख्या कर रहा था।
- 49:54मैंने कहा निर्भय निरप्पू यह उसके लक्षण हैं परम पिता परम।
- 50:10वह वह नहीं खाता। क्यों दूसरा मिट गए?
- 50:17दूसरा मिट गए तो बहता है मेरे वह, वह वह नहीं करता क्यों?
- 50:27क्योंकि दूसरा है ही नहीं जिसके साथ उधार पे।
- 50:34यही तो राबिया ने कहा कुरान के अंदर लिखा था शैतान से।
- 50:42राबिया ने कुरान में तरमीन कर दी और इस्लाम कहता कि कुरान में
- 50:48तरमीन करना कासीराना हरकत और राबिया ने काफी राना हरकत कर दी
- 51:00एक शाम। एक सूखी शांत उसकी कोठरी में ठहरा
- 51:10कुआन का वो पन्ना ऊपर ही पड़ा था। उसकी वो लाइन काट दी गयी थी।
- 51:21उसकी तो आँखें लाल हो गई। चेहरा थपने लगा हरा दिया तुम्हें
- 51:26से हिम्मत कैसे की कुरान में तरमम करने की तरमीन छोड़ो कुरान के
- 51:32शब्दों को काटने की तुमने खराबिया ने कहा।
- 51:41तुमने क्यों बांटा? राग ने बड़े सरल अंदाज में उत्तर
- 51:48दिया, प्रभु दूसरा मत गया गणना किस से?
- 52:06सास्त्रत किस तरह गए? जब दूसरा भी है ये बस इसका अर्थ
- 52:11हिसाब है की तुम उस दल को छूओ तुम उस दल को छूओ।
- 52:23कृष्ण बिल्कुल सटीक फरमाते हैं शब्दों पे यकीन ना करना कर्मों पे
- 52:30भी यकीन ना करना ये पुण्य आत्मा है, दान करता है पुण्य करता है
- 52:35इतने लोग इसके अलावा इतने लोगों को ये ज्ञान बांटता है तो फिर
- 52:41विश्वास किसपे करना। लक्षणों पे विश्वास करना, वो कहो
- 52:47के जो लक्षण अप्रकट हो, उसके भीतर से उनके ऊपर विश्वास करना, हम आज
- 52:53कृष्ण कहते हैं लक्षण क्या उसका व्यर्थ खो गया?
- 53:04अगर डेथ बाकी है तो वो कुछ भी बोलता रहता तो उन बातों को नकार
- 53:11देना। ये बातें झूठी हैं।
- 53:16क्योंकि उसके जीवन का लक्षण कुछ और बोलता है।
- 53:19उसकी जीवन की जीवा कुछ और बोलती है।
- 53:23अब थोड़ा सा विस्तार में चले आइए, थोड़ा सा और गहराई में उतरते हैं।
- 53:30तो रोहित ने पूछा कि हम भूलें कैसे?
- 53:38हमने किसी लाकर को बंद कर दिया। चाबी यहीं कहीं रख दी और भूल गए
- 53:49की चाबी को, लेकिन अब ज़रा सोच के बताओ।
- 53:56क्या हो चाबी गुम हो गई खो गई जाके तुम रख के भूल गए तो तुम
- 54:07सोचने के बाद कहोगे कि नहीं, हम भूल गए कहीं चाबी तो है कहीं न
- 54:12कहीं। दादू दूजा कोण?
- 54:28दूजी मन की गौ तुम्हारा मन ढूंढता है चाबी कहूं, कहूं कहूं सारा घर
- 54:36छान मारते हो? जल्दबाजी में ज्यादा छान मारते
- 54:39हो? तुमने देखा होगा जल्दबाजी में
- 54:44तुम्हारा ऊंटभूम हो गया ना तो तुम अपने गलास को भी तौल देते हो कि
- 54:51कहीं ऊंट इस गलास में न छूते हो। जल्दबाजी एक।
- 55:01ऊँट गुल हो गया है, अरे भाई गलास में थोड़ी छू लेकिन तुम उन
- 55:11दक्षिणों में गलास में ऐसी जगहों पर ढूँढना शुरू कर देते हो।
- 55:16और जब तुम समझ में आओगे होश में आओगे तुम हँसोगे देखो मैं भी
- 55:21कितना मैंने टेबल के नीचे खोज बेड के नीचे खोजा यही ना मैं कहीं बैठ
- 55:28गया हूँ अरे भाई उसका जो ऊपर होता है ना ऊपर वो इतना ऊंचा होता है
- 55:34जितना तुम्हारा बैड उछा। कैसे बने से बैठ के नीचे आ जाए
- 55:40वहाँ पर लासु जहाँ हो सकता है चाबी रख के भूल गई तुमने कहीं
- 55:52गवाह नहीं दी है। और तुम कभी गवां भी नहीं सकते।
- 55:57यही कहते हैं दादू दादू तू? जब तुम्हें पता चल जाता है दूसरा
- 56:08कोई नहीं सिर्फ एक ही है। दो जी मन ही तो मन मन दौड़ता है
- 56:16तो तुम्हें लगता है दूसरा दौड़ता हुआ मन तुम्हें यथार्थ दिखा नहीं
- 56:22सकता? जैसे गाड़ी के अंदर बैठे तुम दौड़
- 56:25रहे होते गाड़ी के संग तो तुम्हें और ही और कुछ नजर आता है।
- 56:31स्टेशन भाग रहे हैं स्टेशन कभी भागते हैं वृक्ष भाग रहे हैं चाँद
- 56:39तारे भाग रहे हैं, दूर दराज वेडिंग में भाग रहे हैं, कभी भागी
- 56:44है ये दूजे मन की दौड़ता हुआ मन? तो मैं ठीक ठीक से सम्य का दर्शन
- 56:57नहीं करवा सकता। सम्य के दर्शन कौन कराया था ठहरा
- 57:05हुआ। इसलिए सभी संत कहते हैं ठहर जाओ,
- 57:11ठहर जाओ, दौड़ों मत, दौड़ता हुआ मन तुम्हें साम्य का दर्शन नहीं
- 57:17दिखला सके। वो उस गाड़ी की तरह है जो दौड़
- 57:23रही है गाड़ी और तुम दौड़ रहे मन के ऊपर सवार तो तुम अंट क्षति
- 57:29देखोगे यथार्थ नहीं दिखेगा तुम्हें चाबी कहीं रखती है, लेकिन
- 57:38एक बात पति याद रखना। प्रसन्न से दूर मत चले जाना क्या
- 57:45भी तुम भूले हो गँवाए नहीं हो भूले हो कहाँ रखती वहाँ मिल जाएगी
- 57:57तो दादू कहते हैं। तू जी मन की दौड़ दौड़ गई सनसनी
- 58:05जब गाड़ी ठहर गई तो संडे न कोई न तो वृक्ष वार्ता, न प्लेटफार्म
- 58:13भरता, न सिटेशन भारती न आदमी भारते न जानता रे भारती सब ठहर
- 58:18जाए। और सब ठहरा हुआ है तो क्या हुआ
- 58:24था? भ्रम हुआ था, क्या हुआ था?
- 58:35तुम भूल गए थे कि नहीं दौड़ रहे हैं?
- 58:41दौड़ रही है गाड़ी और इस गाड़ी के ऊपर सवार में तो मुझको जो दिख रहा
- 58:48है वह सम्यक दर्शन नहीं, वह झूठ है जभी तुमने गंवाई है।
- 59:01दौड़ गई संशय मिटा संशय ज्ञान संशय है अज्ञान वस्तु ठोर के ठोर
- 59:10वस्तु तो वहीं है वस्तु कहते हैं भगवान दातु कहते हैं वस्तु भगवान।
- 59:19दादू कहते हैं, वस्तु तो वहीं है जहाँ छोड़ के गए अब चाबी तुम कहीं
- 59:25रख के कानस में रख के या कहीं रख के काले में रख के हजारों लाखों
- 59:31मीलों की सैर करा हो तो हजारों लाखों मीलों की सैर करने के बाद।
- 59:36जब तुम आओगे तो चाबी वहीं मिलेंगे ना या कहीं भाग जाएगी।
- 59:40नहीं भागी तो दादू कहते हैं वस्तु ठोर के ठो दौड़ गई जब मन का ठहराव
- 59:50हो गया, मन की दौड़ खत्म हो गई। तो तुम पाओगे जहाँ छूट गए थे तुम
- 59:55अमेरिका के दर्शन कराये, लेकिन चाबी तो वहीं भूल गए चाबी का कि
- 1:00:06घूम नहीं हुई, घूम नहीं हुई तो 1 दिन मिल भी जाये।
- 1:00:12जो चीज़ गुम हो गई वो शायद धन दी मिले लेकिन जो चीज़ भूल गया के वो
- 1:00:21तो मिल जाएगी पक्का तो दादू कहते हैं, वह तुम्हारी अमानत है, वह
- 1:00:28तुम सहम हो। आदम को खुदा मत कहो आदम खुदा नहीं
- 1:00:46आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा नहीं, लेकिन खुदा के नूर से आदम
- 1:00:52जुदा नहीं। जब तुम भूल जाते हो उसको तो
- 1:00:59तुम्हें ऐसा लगता है मैं खुदा नहीं, मैं खुदा नहीं रहा और तुम
- 1:01:06उस अवस्था में कहते हो, मैं बड़ा दुखी हूँ, दिमाग में अबोज है,
- 1:01:14मेरे पास रोज़ मैसेज आ जाते है। बाबा जी हमारे भी दुखों का नष्ट
- 1:01:29कर दूँ, मैंने कहा बिलकुल कर दूँ, लेकिन मेरी एक शर्त है दुखों का
- 1:01:40नाश। मैं एक बार नहीं करूँ।
- 1:01:43दुखों का नाश मैं सजा के लिए रखूं बोलो मंजूर है तुम कहते हो मंजूर
- 1:01:55है, मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम्हारा तुम रोगी हो, तुम समझे
- 1:02:02बैठे। तुम ये जान लो कि तुम कौन हो,
- 1:02:09तुम्हारे दर्द हो रहा है, ऐनल जैसे लगा देंगे तो थोड़ी देर के
- 1:02:15लिए दर्द भूल जाओगे। तुम दर्द तो होता रहेगा, दर्द
- 1:02:22होगा। लेकिन दर्द होने की सूचना
- 1:02:25तुम्हारे न्यूरॉन से मैं नहीं पहुंचेगी बस इतना सही क्या काम
- 1:02:30करता है इन्स्तिशिया यही तो करता है दर्द होता है वहाँ काँट सांट
- 1:02:35हो रही है, लेकिन दर्द हो रहा है उसकी सूचना।
- 1:02:42हमारे वूल सेंटर को नहीं मिलती हमारी नूरून्स को नहीं मिलती दर्द
- 1:02:48हो रहा होता है। इसी तरह तुम तो हो, लेकिन किसी
- 1:02:57ऐनेस्थीसिया के प्रवाह में आके तुम भूल गए हो कि तुम?
- 1:03:02ओह ऐनेस्थीसिया का प्रभाव क्या? किसने कहा ये माया है या भ्रम है,
- 1:03:08ये संसार है ये तुम्हारा ही अज्ञान, अपने अज्ञान को मिटा दो।
- 1:03:23पूछा रोहित ने क्यों हमें इतना कुछ करना पड़ता है?
- 1:03:25अपने भी न कुछ करने में खो जाओ क्योंकि करना भागना है, बिल्कुल
- 1:03:35उस तरह जैसी गाड़ी भाग रही है। और भागते भागते में तुम्हें जो भी
- 1:03:40दिखेगा वो उपयुक्त नहीं होगा। वो सम्यकदृश्य नहीं होगा, इसलिए
- 1:03:47भागना बंद करो दौड़ दूध बंद करो, ठहर जाओ रोज़ कहते हो ढूँढो भक्त
- 1:03:54ठहर जाओ। ठहरने से मिलेगा।
- 1:04:02चलती गाड़ी में अगर तुमने डूबने का प्रयास किया कि कहीं वृक्ष
- 1:04:08ठहरे तो नहीं तुम नहीं ढूंढ पाओगे क्योंकि गाड़ी चल रही है।
- 1:04:15तो जो ढूंढ रहे थे, वह गाड़ी के ठहर जाने पर स्वतः ही तुम्हे समझा
- 1:04:20जाएगा, कुछ नहीं भागा रहा है कभी स्टेशन भागा करती है क्या?
- 1:04:26लेकिन तुम्हे नजर आई बाग तो ये स्टेशन पर खड़े हुए लोग?
- 1:04:34ये चाँद तारे, इतने बड़े बड़े जग्रहण, नक्षत्र बंडल, ये जमीन,
- 1:04:44धरती आसमान ये सब तुम भागते हुए नजर आएँगे।
- 1:04:50पेड़, पर्वत, पौधे सब भागते हुए नजर आएँगे।
- 1:04:53यानी की भागता तो कुछ भी नहीं। सच तो यही है पर पता कब चले पता
- 1:05:01चलेगा जब गाड़ी रुक जाएगी। दो ही तरीके हैं।
- 1:05:08या तू गाड़ी ठहर जाएगी तो तुम यथार्थ को देख लो।
- 1:05:20गाड़ी अपने गंतव्य पर ठहर गई। स्टेशन आ जाए वहाँ उसका हो।
- 1:05:24गाड़ी ठहर गई तो तुम्हे सस्ते दिख जाएगा।
- 1:05:27नहीं कुछ नहीं भाग रहा था। वही वृक्ष खड़े हैं, देखो दूसरा
- 1:05:37तरीका है लेकिन दूसरा तरीका मुश्किल होता है, वो गहरी प्रज्ञा
- 1:05:47मानता है। दूसरा तरीका।
- 1:05:50पहुंचने के बाद स्वतः ही प्रकट होता है।
- 1:05:53पहले नहीं प्रकट होता है जब कोई स्वतल पड़ जाता जो जग्ग वेल को
- 1:06:03कृष्ण हो जाता उसे कुछ भागता रहे। लेकिन वह उस भाग्य को जानेगा कि
- 1:06:11बागता कुछ भी नहीं है। ठहरता है सब जीतने संकीर्ण होते
- 1:06:19जाओगे ये संकीर्ण कमेंट करने। बस इतनी सी खबर देते हैं और अपनी
- 1:06:30खबर देते हैं। क्या खबर देते हैं की वो दुखी बस
- 1:06:38इतनी सी खबर देते हैं मेडिकल गायत्री की वीडियो डाल।
- 1:06:50मैं बोलता क्यों संत कोई भी होता है।
- 1:07:07नानक कितनी जगह जाते हैं, इन सबके कितनी जगह जाते हैं, महावीर और
- 1:07:18बुद्ध चरित्र संत क्यों बोलते हैं?
- 1:07:23तुम्हारा दुःख आहरण हो जाएगा। उसका सर अब प्रयास होता है।
- 1:07:29ये बात अलग है। आज संतों की ये कामना ना रही कि
- 1:07:38तुम्हारा दुख हो जाए दूर आज संतों की तथाकथित संतों की ये कामना हो
- 1:07:45गई कि उनका दुख दूर हो जाए। स्वयं?
- 1:07:52मैंने कल भी बोला स्वयं का दुख दूर होगा तो दान दो भाई आई ए एस
- 1:08:00की कुर्सी मिल गयी लेकिन ज्यादा संभावना ये डर थी।
- 1:08:05इधर पूजा भी होगी, उधर तो हुक्म मानने वाले थोड़े से घंटी चुनती
- 1:08:10के यहाँ लाखों करो, पूजा भी होगी, प्रतिष्ठा भी होगी और संस्था के
- 1:08:19भीतर दान भी मिलेगा और दान को मिलेगा अपना चेहरा चमकाएं, हम तो
- 1:08:24ऐड भी लगाएंगे। कैसे कमेंट आ जाते हैं कि बाबा
- 1:08:30तुमने ये कहा रूही जी ने इसको डाउनलोड मत कर लेना।
- 1:08:40मैं तुम्हें कहता हूँ तुम डाउनलोड भी मत करो, तुम डाउनलोड करके
- 1:08:45सुनो, बात तो ये है तुम शीशे न रहे अगर तुमने शंका उठा।
- 1:09:01जीस गुरु ने अपने अन्थक प्रयास से तुम्हें गायत्री जैसा अमोघ शस्त्र
- 1:09:09दिया। क्या उसका ये दायित्व नहीं मिलता
- 1:09:15कि अब ये काम भी करे? और फिर अगर ये काम ना करेगा, फसल
- 1:09:23इतनी ऊंची हो जाएगी कि उसमें फल ना निकलेगा तो उस फसल बीजने का
- 1:09:28फायदा क्या होगा? तो फिर मुझे पता चलता है अब तो
- 1:09:35मैं व्यस्त हो गया हूँ कि हाँ भाई सभी भगवान हैं।
- 1:09:40तो मैंने वीडियो डाला, एनलाइटनमेंट का तो सभी भगवान हो
- 1:09:45गए। बाबा यू आर इन एक्सटसी तुम्हें
- 1:09:52भ्रम हो गया है, मन से भ्रांति हो गई है।
- 1:09:56बड़े कमेंट आए, हज़ारों कमेंट आए फ़ोन अरे बाबा तुम पगला गए हो?
- 1:10:04मैंने कहा मैं पगला गया तो मैं भुगत लूँगा तुम्हे क्या दर्द होता
- 1:10:08है? मैं ही पागल हूँ, मैं भुगत लूँगा,
- 1:10:13तुम्हे तो कुछ नहीं करता हूँ। तुम्हें काटता नहीं की तुम्हें
- 1:10:19रेबीज़ के इन्जेक्शन लगाने पर अरे मैं पागल हूँ तो भुगतुंगा में
- 1:10:26रोगी हुआ तुम्हें भुगतुंगा तुमने क्या लेना है तुम्हें ठीक लगता है
- 1:10:31सुनलो नहीं ठीक लगता मत सुनो। ऐसे कमेंट मत किया।
- 1:10:41शिष्य का मतलब यही होता है एक गुरु जो बोलेंगे वो लिख दिया।
- 1:10:46फोटो उसमें से मीन में करने की चेष्टा मत करना, संकीर्णता के।
- 1:10:52कमेंट से मत किया करो, इत्तमारी ही खबर देते हैं और मुझे पता है
- 1:10:57कि तुम दुखी हो और तुम्हारे लूण दुख का राज़ करने के लिए ही मैं
- 1:11:04इतना प्रयास करता हूँ, इस संकीर्णता का सुसाधनों से प्रकट
- 1:11:10हुआ क्यों करते हो? की मैं दुखी हूँ।
- 1:11:14बाबा तो मेडिसिन्स के लिए कहते हो ये बात ये हमे कोई शिकायत नहीं
- 1:11:20है, तुम डाउंलोड करके सुन लो लेकिन फिर तुम ही लोग होगे जो
- 1:11:30बोले के बाबा कुछ हुआ है। और मैं चाहता हूँ कि कुछ तुम
- 1:11:40तुम्हारे रोग कतल तुम्हें शांति मिले तुम आनंदित हो अपने घरवार
- 1:11:50में छोटे से परिवार में। आनंद की बगिया में तुम सभी खुशी
- 1:11:56खुशी खेलो, ये इच्छा है मेरी उस इच्छा के कारण तुम्हें ये दे दिया
- 1:12:07और तुम साइंटिफिक ज्ञान झाड़ते हो?
- 1:12:11एक कुछ कहता नीचे एक लड़की लिखती है नाम भूल गया तो फिर असली जो
- 1:12:18बाबा ने बोला वो पेश करो, मैंने कहा भाई ये तो नहीं हो कुमार आना
- 1:12:27अब वो कहाँ से पेश कर? जब मैं बाप को जड़ से ही काट देता
- 1:12:38हूँ की तुम मेरे चैनल पे आई ही क्यूँ तो तुम्हें लज्जा नहीं आती
- 1:12:43मुझे सुनते आनी चाहिए। मेरे कमेंट की बात तो छोड़ो मैं
- 1:12:52कहता हूँ तुम आये ही क्यों हो, किसने बुलाया नहीं?
- 1:12:58मैंने चावल भेजे, पी ली, मैं निमंत्रण पत्र भेजा भेजा तो बताओ
- 1:13:06फिर तुम्हें सुनकर कोई कमेंट करने का अधिकार कहाँ रह जाता है?
- 1:13:14और फिर जो व्यक्ति दीक्षित नहीं हुआ वो थोड़ा ध्यान से सुन ले।
- 1:13:18उस गायत्री का कोई फायदा नहीं है। ये व्यक्ति दीक्षित नहीं है।
- 1:13:27अभी दीक्षित ही नहीं है। मेरी क्लास में अभी दाखिला पाने
- 1:13:31के योग्य ही तो नहीं हुआ है। उसके ऊपर गायत्री असर करेगी।
- 1:13:37यह भूल जाओ, नहीं करेंगे काम तुम डाउंलोड करके आ गए हो की भेजते
- 1:13:46रहो उसमें मैं कुछ कर भी नहीं सकता।
- 1:13:54तुम भेजते रहो, लेकिन फिर उसी किसान की तरह तुम्हारा असर होगा।
- 1:14:03सुनो वे तो बहुत लेकिन फिर फसल के कण कण लगेंगी, जेब ना लगेंगी।
- 1:14:13तुम्हें पोषण न मिलेगा। इससे अच्छा यह है कि तुम सही ढंग
- 1:14:21से सुन लो, सीधा सीधा तुम चैन से सुनोगे तो यह एक दीक्षा का काम
- 1:14:30करेगा सिर्फ गायत्री को। तुम गायत्री से दीक्षित हो, जो
- 1:14:37कोई रेंज से तुम्हें वैसा ही कुछ देगी जो शीषित में प्रदान होता है
- 1:14:46और जो मेरा शिष्य है, जिसने मुझसे दीक्षा ले।
- 1:14:50मैं डाउंलोड करके सुन बिल्कुल सुन सुन सकता है, लेकिन प्रभाव कम हो
- 1:14:58जाएगा 10 पैसे प्रभाव रह गए और मैं नहीं चाहता कि जब 100% प्रभाव
- 1:15:07आ सकता है। तो तुम्हारी इंद्रसंकी
- 1:15:10डॉक्यूमेंट्स के कारण मैं अपना फार्म भुला बदलता हूँ।
- 1:15:15इट्स नॉट पॉसिबल ऐट ऑल तो कृपा कीजिये मेहरबान कीजिये लोग कहते
- 1:15:23हैं सब्सक्राइब नहीं मैं कहता हूँ अनसस्क्राइब कृपा करो।
- 1:15:32इतना रो लिया दो 2500 लंबी लंबी वीडियो है बोल दी, इस अपेक्षा मैं
- 1:15:41नहीं बोली कि तुम सुनो। इस अपेक्षा में मोदी के आने वाले
- 1:15:46अंधकार का युग उन बच्चों के लिए जब कोई किरण बाकी न बचे भी, सब
- 1:15:54लोग भी। लालची चोर लुटेरे इकट्ठे हो
- 1:16:00जाएंगे तो ये शुद्ध संपदा उनके काम आयेगी।
- 1:16:04बस इसीलिए तुम्हारे लिए नहीं बोलता हूँ, बोलता हूँ उनके लिए
- 1:16:09जिनको मैंने अपना लिया है शिक्षक की तरह बोलता हूँ उनके लिए जो
- 1:16:16रोज़ मुझे करोड़ों की तादाद में उन्हें सुन तू।
- 1:16:22तुम कमेंट करने वाले लोगों के लिए तो मैं बोलता ही नहीं और कितनी
- 1:16:26बार मैंने कहा है, लेकिन तुम फिर नहीं आते।
- 1:16:30भूल जाते हो यही भूलने का हितवाद पुरोहित पूछते हैं, भूल कैसे जाते
- 1:16:39हैं? भूल जाते हो तुम?
- 1:16:43लॉकर की चाबी को लेकर बंद करके भूल जाते हो कहाँ रख दी?
- 1:16:49फिर कैसे मिलेंगे? वो ऐसे मिलेंगे जो मैं रोज़ बताता
- 1:16:56हूँ, कुछ न करने की अवस्था में आ जाओ।
- 1:17:02जस तुम रात को शुशक्ति की अवस्था में जाने के लिए कुछ नहीं करते और
- 1:17:10तुम अपने भीतर उतरना शुरू हो जाते हो और शुशक्ति के उन आनंदित
- 1:17:16क्षणों में उतर जाते हो तलों में उतर जाते हो।
- 1:17:19जहाँ तुझे कोई खोज खबर नहीं रहती, क्या कोई दर्द है?
- 1:17:26तुम किसी रोग से ग्रस्त हो छोटे से बड़े से तुम निर्धन हो तुम
- 1:17:32सम्राट हो, जहाँ भी कमिटी जाता है।
- 1:17:45और बात तो भेद की है सारी अगर आप जात्मिकता को एक शब्द में
- 1:17:52व्याख्या करना तो जहाँ तुम जा कर अभेद्य हो जाओ दूसरा नौ बचे।
- 1:18:06एक रहे शब्द चाहे कुछ दे दो कह दो तू ही तू कह दो, कोई फर्क नहीं
- 1:18:17पड़ता तुम्हारे कुछ कहने से उसके होने में कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 1:18:23वह तो रहेगा है था और रहेगा आध सच जो आध सच है भी सच नानक हुसैन भी
- 1:18:35सच बोले हो गुमा तो तुम सत्य ही है।
- 1:18:46जो सृजना के कण कण में समाया हुआ है वो गंवाया कैसे जा सकता है?
- 1:18:53इतना विराट कैसे गंवाया जा सकता है?
- 1:18:58वह गंवाया जा ही नहीं सकता। वह भूला जा सकता है जैसे रात को
- 1:19:04तुम भूल जाते हो तो मैं सम्राट हूँ या मैं धरेक हूँ और उसको याद
- 1:19:10करने का तरीका है कि जग जाऊं दी अवहार खोद आँखें आँखें हैं।
- 1:19:23आँखों से अंधे हो सकते हो तुम चरम चक्रों से ज्ञान चक्रों से तुम
- 1:19:29अंधेरी वो सभी के बीच होता है, तो जागो सो मत रहो।
- 1:19:38रात को तुम में थे, तुम अभेद्य हो गए।
- 1:19:44सुबह धीरे धीरे जगना शुरू हुआ, तो स्वप्न आया रात तुम जो थे, अभेद्य
- 1:19:52थे और अभेद्य से जैसे तुम सुख अवस्था में आये।
- 1:19:58तो द्वय खा तुम्हे सपना आता है अच्छा बुरा कुछ भी आता है द्वय तो
- 1:20:07होता है तुम राजा हो कंगाल हो गए या तुम कंगाल हो राजा हो गए तुम
- 1:20:15रोगी हो न रोगी हो गए। यह सब सपना है उस स्थल पे पहुँच
- 1:20:21जाओ जहाँ न तो सपना है न तुम्हारे लिए कुछ राज़ बचा है और यह बुद्ध
- 1:20:31के तल से आगे आएगा। बुद्ध के तल पर तुम नास्तिक हो।
- 1:20:38एक राज़ तुम्हारे लिए रह गया कि तुम वास्तव में हो कौन?
- 1:20:42यह तो पता चल गया कि तुम आत्मा हो, लेकिन अभी एक छोर बाकी कि तुम
- 1:20:51परमात्मा हो तब बुध से बिलकुल। बिल्कुल विपरीत शब्द बोलेंगे।
- 1:21:02बुद्ध कहेंगे परमार्थ नहीं है, कृष्ण कहेंगे मैं ही परमार्थ हूँ
- 1:21:08और सभी ऋषि कहेंगे एवं ब्रह्मस्व और जो ऋषि को स्वत में पहुंचेगा,
- 1:21:14चाहे वह मुस्लिम हो, चाहे कोई भी हो।
- 1:21:19मंसूर कहेगा अनल हक मैं खुद खोदा अभी यह मुकाम, बाकी इस मुकाम को
- 1:21:29छू लो उस दिन। तुम धर्वाण महा परिनिर्वाण में
- 1:21:37जाओगे जीस दिन तुम उस मुकाम को छुए, बुद्ध के तल पे आके सिर्फ
- 1:21:42तुम मुक्त हो जाओगे, दुःखों से भ्रमों से मैं नेता हूँ पाखंडों
- 1:21:51से लेकिन? अभी उसके पास नहीं पहुँचेंगे।
- 1:21:57जो राज़ उस राज़ को उगाड़ उसमें खो जाओ और कृष्ण हो जाओ जो चीज़
- 1:22:08जहाँ होती है वहाँ जाकर ही मिलती है तो तुम।
- 1:22:15भोले हो खय नहीं बस वहाँ चले जाओ जहाँ तुम हो तुम बाहर ढूंढ़ते हो
- 1:22:23बाहर तुम हो नहीं तुम हो भी सर कस्तूरी कुंडल बसे है मेरे को
- 1:22:30ढूँढायेगा ना माँ। काहेरे।
- 1:22:52शरम गया की सदा अलेफा शरम गया की सदा अलेफा।
- 1:23:10तो है संग समां काहेरे बन को जनजा।
- 1:23:28जहाँ है वहीं मरेगा वो राज़ जवाब तक राज़ है घूमकट के पट खोल दो,
- 1:23:41उस राज़ को राज़ न रहने दो उस राज़ में तुम समय जाओ।
- 1:23:48समाहित हो जाओ, उस राज़ के अमृत के प्याले को गचक जाओ तुम भी राज़
- 1:23:54हो जाओगे डेट न करो बहुत जन्म बीते मेरे मात हो ये जन्म
- 1:24:02तुम्हारे लेख ये जन्म लगा दो उसके लेख लगा दो।
- 1:24:08कब तक ये सर्कस करो कब तक इस समिट के तन को छिच्छ वार कपड़े, नए
- 1:24:16पहनोगे, वस्त्र वार साड़ियाँ बदलोगे, सोने के वस्त्र पहनोगे,
- 1:24:25छोड़ो इन सर्कसों को? सरकसों को छोड़ो, अभिनय को छोड़ो,
- 1:24:31सत्य में आ जाओ, उस राज़ को राज़ न रहने दो, उस राज़ को उगाड़ दो,
- 1:24:39घूंघट के पद खोल दो, उस राज़ में समाधि हो जाओ और खुद राज़ हो जाओ।
- 1:24:51जहाँ चीज़ तुमने रख दी वहीं से मिलेंगे।
- 1:24:57याद रखना कोई नहीं है भोले मेरे एक मित्र की गाय गुम हो गई।
- 1:25:10और ढूंढ रहा है। मुझे भी खबर लगी, पड़ोस में था,
- 1:25:17मैं उसके पास गया। क्या बात है, मित्र गायब हो गया?
- 1:25:21अच्छा कहाँ ढूंढता? फिर बाथरूम में ढूँढता फिर?
- 1:25:29मैं कहा मूर्ख बाथरूम का इतना सा दरवाजा छोटा सा, उसमें कैसे गाय
- 1:25:35चली जायेगी? और हमारी गाय तो खूब नरोई थी,
- 1:25:42अच्छा कौड़ी में चढ़ गया ऊपर जा अरे मूर्ख पशु ऊपर नहीं चढ़ सकता।
- 1:25:50देखते हैं क्या पता लगता है चमत्कार भी तो होते हैं देख आओ
- 1:25:56भाई तीसरी मंजिल तक चला गया अरे भाई तीसरी मंजिल पे कैसे चढ़ेगी?
- 1:26:03गाय जहाँ हो सकती है वहीं ढूंढ। नहीं यहाँ भी तो हो सकती है इतना
- 1:26:10पागल हो गया राठी गाय इतनी महंगी थी गलासों में डूबने लगा आटे के
- 1:26:20टाइम की मैं टूल लगा खोल खोल के तुम्हारा उसकी बात है।
- 1:26:27दबको में ढूंढने लगा अरे दबके में कैसे चढ़ जाएगी कोई पूरी ही नहीं
- 1:26:32होगी तुम हसो मत ये तुम्हारी हालत तुम्हारा चैन तुम्हारा आनंद,
- 1:26:43तुम्हारा सुख, तुम्हारा संतोष, तुम्हारी तृप्ति।
- 1:26:49छिन गई है। भूल गए हो आप याद रखना भूल गए हो
- 1:26:57आप गुम नहीं हुए और तुम बिल्कुल वैसे ही मेरे मित्र की तरह।
- 1:27:06डबको में ढूंढ रहे हो ऊपर राज़ राज़ में ढूंढ रहे हो राम राम में
- 1:27:15ढूंढ रहे हो विपश्यना सवरों में ढूंढ रहे हो आप मंदिरों में सिर्फ
- 1:27:22गुरुद्वारा हूँ चर्चों में ढूंढ गुम क्या हुआ संतोष प्रेम आनंद
- 1:27:41तृतीय सुख परम स्राक। हो गया है आनंद ढूंढ दे और तुम वो
- 1:27:53रूखो के पास दुनिया बावरे हो गई है।
- 1:28:06ढूंढ रहे है राज़ को और संत कहते है तुम्हारे भीतर मिलेगा तुम ढूंढ
- 1:28:13रहे हो भीतर नहीं बाहर किसी राधा में किसी राम में।
- 1:28:20किसी कृष्ण में, किसी माला में, किसी शोर से उपचार पूजन में तो
- 1:28:26मिनिमय ढूंढ रहे हो नहीं मिलेगा थोड़ा ठहरों ठहर के सोचो सोचोगे
- 1:28:38ठहरोगे तो याद आना जाएगा बस याद ही आना है ओनली टु रिमेम्बर, इसे
- 1:28:45ही समर्जन कहा गया याद करो और तुमने वैगुरु वैगुरु करना शुरू कर
- 1:28:50दिया। अरे भाई वैगुरु को याद थोड़े करना
- 1:28:54है, वो खोया है ही नहीं, वो भूला है।
- 1:29:01ना मैं सपना हूँ, ना कोई राजू, एक दर्द भरी आवाज।
- 1:29:18ना मैं सब ना हूँ, ना कोई राज हूँ एक दर्द भरी आवाज।
- 1:29:32पिया दे नकर आ मेरे पिया दे नकर आ मैं।
- 1:30:10वो कहीं भी जले, कहीं दिल तेरी कौन सी है मन जल?
- 1:30:30कहीं भी चले, कहीं दे तेरी कौन सी है मंजर ज़रा देख ले आकर।
- 1:31:38धन्यवाद।