Latest / Baba ji Vijay Vats / 28/4/26 - मन तू जोत स्वरूप है अपना मूल पहचान: भीतर उतरने के लिए ठहराव का क्या महत्व है?
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- 0:16बाबा जी पूनम प्रेरणा जुनेजा कनाडा से।
- 0:34मन तू ज्योत शरूप है अपना मूल पछान मन हरि जो तेरे नाल है
- 0:46गुरमती रंगमान। इसका रहस्यत्मक गुणतम विवेक न
- 1:01करने का कष्ट करें। बाबा आपने कभी बारिश का गंधला
- 1:13पानी देखा है? उस बारिश के गंदले पानी को एक कंच
- 1:21के ग्लास में इकट्ठा कर लो और उसको किसी ऊंचे स्थान पर रखो भूल
- 1:32जाओ। इसे फिर सुन बारिश के पानी को
- 1:47गंदले पानी को जो प्रणाली से गिरता है ऊपर उसको किसी कांच के
- 1:53ग्लास में उभर लो। उस कांच के ग्लास में भरकर उसे
- 2:01किसी ऊंचे स्थान पर आओ और उसे भूल जाओ 2 दिन 4 दिन।
- 2:22यह पानी नंदला होता है बारिश का, ऊपर से तो शुद्ध पानी आता है
- 2:33आसमान से सदा। डिस्टिल्ड वाटर बरसता है यहाँ की
- 2:43गंधली जमीन उसमें मिक्स हो जाती है और पानी को गमराह कर देती है।
- 2:52उस पानी का रंग मट मैला हो जाता है
- 3:06उस मटमैले पानी को कांच के बड़े गिलास में।
- 3:12भरकर एकांत सन में रख देना, छेड़छाड़ मत करना, अपने दैनिक
- 3:22दिनचर्या के कामों में व्यस्त हो जाना और दो चार दिनों के बाद जब
- 3:29तुम्हें याद आए। तो तुम उस पानी को घोर से
- 3:35निहारना, तुम्हें पानी मिलेगा। दो रंग का ऊपर शुद्ध जल प्योर
- 3:52वाटर, नीचे बैठी हुई माटी। और कंच के ग्लास में तुम भलीभाँति
- 4:02जान सकते हो कि माटी नीचे बैठ के शुद्ध जल अपराध यह शुद्ध जल ज्योत
- 4:21स्वरूप परमात्मा है। जैसे पानी दूध को हम रखत बिलोते
- 4:35हैं, माचते हैं तो माखन ऊपर आ जाता है।
- 4:44वैसे ही पानी को जब हम गंदले पानी को शीतल करके रह तो शुद्ध जल ऊपर
- 4:53आ जाता है। माटी नीचे बैठ जाती है, ऐसा ही
- 4:58दूध में होता है। छाछ नीचे बैठ जाती है, माखन ऊपर आ
- 5:04जाता है। ज़रा सोचो अगर तुमने इस पानी को।
- 5:28एक स्थान पर एकांत में बिना छेड़छाड़ किए न रखा होता तो क्या
- 5:37यह पानी की दशा ऐसी हो जाती जो आज है?
- 5:41अब है, नहीं होती क्यों? क्योंकि वह पानी के भीतर माटी का
- 5:53गंधलापन घोला ही रहता है, तो यह माटी नीचे बैठी ही क्यों?
- 6:04पानी के ठहराव से बढ़ी पानी को हमने रख दिया, स्थान पे ठहरा दिया
- 6:12उसे और उसकी फिकर छोड़ दी पानी का गंधलापन माटी।
- 6:24नीचे बैठ गई और पानी का ओरिजिनल जो ऊपर से बरसा था बादलों से
- 6:34डिस्टिल्ड वाटर वह ऊपर रह जाएगा। पारदर्शिता से तुम देख पाओगे।
- 6:49बस गुरुवाणी के इस शब्द का यही मूल अर्थ है।
- 7:01तुम शब्दों को त्रोटिकल रूप से कंठस्थ कर लेते हो।
- 7:09उनके ऊपर प्रयोग नहीं करते, जबकि संतों ने ये शब्द प्रयोग करके
- 7:15बोले तुम बिना प्रयोग के बोलते थे।
- 7:33पानी का गंधलापन मिलता है गंदले पानी को ठहराने से मन तो ज्योत
- 7:43सहो है अपना मूलकपछान। अपना सही डिस्टिल्ड वाटर वह देख
- 8:02तो निर्मल है निर्दोष है पारदर्शी।
- 8:12लेकिन तुम गंधला हो गया यह मन जब ऐसे ठहर जाएगा तो
- 8:33तुम्हारा ज्योत स्वरूप हो कर आ जाएगा।
- 8:42मर नीचे बैठ जाएगा। मैंने कहा उस गंदले पानी को किसी
- 8:52एकांत ऊंचे स्थान पर रख तू छेड़ छाड़ मत करो।
- 8:57और अगर तुमने मेरे हुक्म को ठीक ना माना होता और हर आधे घंटे के
- 9:05बाद उससे छेड़छाड़ होती, पानी में गजोल मारा होता तो क्या यह पानी?
- 9:13इस पारदर्शिता की अवस्था में आ पाता नहीं आ पाता क्यों?
- 9:25क्योंकि उसका मूल स्वरूप मिक्स ही होता रहता गंदगी के साथ।
- 9:32तो फिर यह मिक्सिशन खत्म कैसे हुआ?
- 9:38ठहराव से गंधला पानी तुमने ठहरा दिया एक स्थान पर और निश्चिंत हो
- 9:45गए तो पानी का गंधलापन। नीचे बैठ गया और जो ऊपर से बरसाता
- 9:55शुद्ध जल मेघ से डिस्टिल्ड वाटर आपको पता है मेघ से वर्षा पानी
- 10:04जितना डिस्टिल्ड होता है, इतना कोई पानी नहीं होता।
- 10:08सबसे ज़्यादा शुद्ध तम। स्वरूप में वो ही पानी होता है जो
- 10:14मेघों से बरसता है। तुम उसमें निश्चिंत हो के मेघों
- 10:20की बारिश के तरह स्नान कर सकते हैं।
- 10:30बादलों से घिरा हुआ पानी तुम्हें चर्म रोगों से निष्णा चला सकता
- 10:37है। बहुत से लोग पुरातन बरसते हुए
- 10:48मेघों में नहाया करते। कारणुकूल मात्र इतना था कि उस
- 10:55डिस्टिल्ड वाटर के नहाने से उसकी शीतलता से हमारी पित्त अलाइ जो
- 11:02गर्मी से उत्पन्न हुई रोग है वो मिट जाते थे।
- 11:09तन बदन की गर्माईश जो आग लगी रहती थी और बारिश के पानी से नहाने से
- 11:17तुम शीतल हो जाते थे, मन तो ज्योत शृूप है अपना मोरू बछ।
- 11:31अगर इस पानी को हर पांच 4 मिनट के बाद गजोड़ दिया जाता।
- 11:43तो क्या यह पानी इस अवस्था में पारदर्शिता की अवस्था में आ पाता?
- 11:48ट्रांसपेरेंट हो पाता अब जब पानी ट्रांसपेरेंसी को छू गया।
- 12:00तो तुम इस पानी के बीच में से नीचे बैठी हुई मड्य को देख सकते
- 12:06हो, कीचड़ को देख सकते हो, मैल को देख सकते हो, माटी को देख सकते हो
- 12:14क्या हुआ? शुद्ध शुद्ध जल ऊपर आ गया।
- 12:22और तुम्हारा मन ऐसे ही नॉर्मल है मन तू ज्योत स्वरूप अपना मूल
- 12:29पछाड़ अपनी ट्रांसपेरेंसी को जान ले।
- 12:36हौ विल यू नो योर ट्रांसपेरेंसी ओएफ माइन।
- 12:41अपने मन की ट्रांसपेरेंसी को पारदर्शिता को तुम कैसे देख
- 12:47पाओगे? ठहराव से तुम जान पाओगे कि मेरा
- 13:06स्वभाव निर्मल है। इसमें कोई मड, कीचड़, मैल या माटी
- 13:15नहीं। लेकिन तुम क्या करते हो?
- 13:30मन तो मैला है और तुम बैठे बैठे उसको शेक करते रहते हो और बड़ी
- 13:41तेजी से शेक करते हो। ज्योत निरंजन एकों का रण, उनका
- 13:49सोहम सतनाम यह तुम अपने मन की मनलिंगता को बढ़ा रहे हो ऐसे मन
- 14:03ठहरे। का?
- 14:09इसलिए पुत्री तुमने 30 वर्ष कहे किसी ने तीन वर्ष कहे 3,00,000
- 14:17साल तक भी तुम ऐसा करते रहोगे? मन ठहरेगा नहीं क्योंकि फॉर्मूला
- 14:24गलत यू अरे ऑन दी रॉंग वे। रंगपक्ष गंदले पानी को बार बार
- 14:39बार बार किसी भी नाम से। तुम हास्य गचोलो तुम किसी यंत्र
- 14:46से गचोलो पानी फिर गंधरा हो जाएगा जितना ठहरा था फिर उससे ज्यादा
- 14:56गंधरा हो जाएगा यही तुम्हारे गुरबों ने तुम्हें सिखाया।
- 15:05शेक एंड शेक वल जितना ज्यादा हो सके उतना शेक करो।
- 15:17यह गंदगी कभी नीचे बैठने वाली है ही नहीं।
- 15:21ज़रा सोचो लाखों सालों में यह है जिंदगी अगर तुम ऐसा ही करते रहे,
- 15:28तो क्या यह है गंदगी नीचे बैठ के बस यही मैं रोज़ कहा करता हूँ अलग
- 15:38अलग ढंगों से। डायमेंशन से शब्दों का प्रयोग
- 15:44करके शास्त्रों का प्रयोग करके लेकिन काश किसी दिन तुम्हारी समझ
- 15:54में आ जाए, मैं बोलता ही चला जाऊंगा।
- 16:11गुरुवाणी कहती है कि जीस जोत को तू ढूंढ रहा है जोत निरंजन एकों
- 16:23का रणवंकार सत्यनम सोहब। वह ज्योत पानी को गज़ल मारने से
- 16:40नहीं फैला, पानी को ठहरा देने से। और तुम तो सुबह उठते हो तो सिर
- 16:58हिलाने लग जाते हो, जो पूछ ही देने वाले हो तुम कैसे पा सकोगे
- 17:11तुम परमात्मा को? माना हरि जी तेरे नाल है अरे मान
- 17:25हरि जी तो तेरे साथ है। लेकिन तुम मार्ग गलत पकड़ लिए
- 17:38श्रद्धा कितनी है? अकेली श्रद्धा काम ना करे तुलसी
- 17:46ने शब्द बोला अधूरा। श्रद्धा विश्वास रुपणों या ब्याम
- 17:54बिनाना पचनते इसलिए दो तुलसी भटके भटके मरकर मन हरि जी तेरे नाल हैं
- 18:08गुरुमती मन रंगमान। उसके रंग को अगर मानना चाहता है
- 18:17उसके रंग को अगर माननी चाहती है पुत्री प्रेरणा लाली मेरे लाल ये
- 18:26तो देखूं तो तलाल। लाली खोजन में गई मैं भी हो गई
- 18:34लाल गुरूजी कहते हैं हे मन वह ज्योत
- 18:54तो तेरे साथ है, मान हरिजीत तेरे नाल हैं?
- 19:04तो बाहर कहाँ ढूंढता है? गुरुमती रंगमान।
- 19:19गुरु के बताए हुए मार्ग पे चल ढोंगियों के बताए हुए मार्ग पे मत
- 19:25उछल जो गद्दियाँ बदल लेते हैं, बाबा को हजूर बना देते हैं, हजूर
- 19:35को फिर बाबा और बाबा। फिर हजूर बना देते हैं, ये
- 19:41तुम्हें कहीं नहीं पहुंचा पाएंगे, क्योंकि खुद ही नहीं ये खुद अपने
- 19:49मन को ऋढ़ कर रहे हैं, गजौर मार रहे हैं तो मन की वो जोता स्वरूप।
- 19:59ता ट्रांसपेरेंस से खो जाएगा, मन मठ मैला हो जाएगा और तुम उसमें से
- 20:08आर पार झक न सको। गुरु जी कहते हैं मन को ठहरा दे।
- 20:29मन को ठहराने से मड़ नीचे बैठ जाएगा।
- 20:36शुद्ध मन का ज्योत स्वरूप ऊपर आ जाएगा।
- 20:43और उस शुद्ध ट्रांसपेरेंट वाटर में तुम ठीक से देख सकोगे कि
- 20:50तुम्हारे में क्या वासना है क्या विषय है, क्या इच्छाएं हैं, क्या
- 21:00कामनाएं हैं। क्या स्मृतियां छिपी पड़ी हैं?
- 21:06क्या तुमने भविष्य के सपने संजोए हैं?
- 21:09सब दिखेगा सब साफ साफ दिखेगा। अभी तो तुम्हें पता ही नहीं चलता।
- 21:22अभी तो तुम्हारे भीतर काम उठता है, तुम काम के पीछे हो लेते हो,
- 21:28क्रोध उठता है, तुम क्रोध के साथ एकाकार।
- 21:32हो जाते हो। लोग मोह अहंकार कुछ भी उठे बेकार,
- 21:40तुम उसके संग ही हो लेते हो घर से तो हम।
- 21:47चले थे खुशी की। तलाश में खुशी की तलाश में घमराह
- 22:08में खड़े थे वो ही। सर्च हो लिए खुद दिल से दिल की
- 22:21बात से कहीं और रो लिए। यूँ हस रतों के दा।
- 22:37अगर मन के पीछे गए तो ऐसे ही रोते रहो यह गंदगी मड, जो नीचे बैठ गई।
- 22:56यही है विकार, यही है विषय यही है रोग तुम्हारे गंधले पंत और फिर
- 23:09तुम एक एक करते। तुम शुद्ध पानी को निकाल लो और एक
- 23:16वक्त ऐसा आएगा जब मातृगंदगी ही उस ग्लास में बचेगी तो उस गंदगी को
- 23:26फेंक दो। निरभोज हो जाओ, निर्विकार हो जाओ,
- 23:35शांत हो जाओ, तुम निर्भर हो और जब तुम निर्भर हो जाओ भगवान राम ने
- 23:49कहा है। निर्मल मान जान सोई मोहे बाबा
- 23:58मोहे कपट छल छिद्र न बाबा ये गुरु गुरू गदियों के ऊपर बैठे हुए कपट
- 24:05करते हैं छल करते हैं तुम्हारे साथ तुम ठगते।
- 24:13छिद्र करते हैं। हेरा फेरियां करते हैं, मरने के
- 24:16बाद सच्च खंड पहुंचाने की बात कहते हैं।
- 24:22मन के बहराने को वाले मुझे ख्याल अच्छा है, हमने देखी है जन्नत की
- 24:29हकीकत, लिखन। पंडित तो नहीं?
- 24:33मैं तो यही कहा था, अगर हम ही दान करोगे तो मरने के बाद स्वर्ग में
- 24:45इन्द्रासन मिलेगा। इस्लाम ने भी यही कहा, एक बात को
- 24:54ध्यान से समझ लेना पुत्र मरने के बाद जो कुछ मिलेगा।
- 25:07इसका लोग तुम्हें दिखाने वाले लोग बाखंडी हैं।
- 25:11इसको सर्कल में दे लो जो मिलता है जीते जी मिलता है मरने के बाद ना
- 25:19श्राद्ध की रोटी तुम खा पाओगे। चाहे कितने ही सुंदर सुंदर पकवान
- 25:24पकवान पंडित खायेगा मोटी पेट वाला खायेगा गोखड़ बढ़ जाएगी न मरने के
- 25:35बाद स्वर्ग होता है न मरने के बाद नरग होता है।
- 25:39ना मरने के बाद 72 हो रहे होते हैं ना मरने के बाद शराब के चश्मे
- 25:45बहते हैं। चश्मे तो यही बहते हैं तुम पीने
- 25:51वाले भानो। यहीं यहीं जीते जी मिलेगा जो कुछ
- 26:01मिलेगा। जो लोग तुम्हें मरने के बाद छलावा
- 26:08करते हैं वो हम आएँगे और तुम्हारी ऊँगली पकड़ेंगे और सच खंड में ले
- 26:16जाएंगे। ये ब्रांत लोग हैं, स्वयं
- 26:22इन्होंने कुछ पाया है और तुम्हें क्या खाक देंगे जब खुद ही नहीं
- 26:30पाया? निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह
- 27:10करे। मन रे तो काहे न धीर धरे उतना ही।
- 27:33उपकार समाज को जितना संघ निभाते जनममरण का।
- 27:55खेल है सपना ये सपना बिसरा भी कोई न संगमर।
- 28:13न रे तू खाये न धीर। ये ठग हैं।
- 28:28ये व्यापारी हैं और व्यापारी भी शुद्ध व्यापारी नहीं बाबा नानक
- 28:34जैसे व्यापारी हैं। जो 1313 तोलते तोलते तेरा पे ही
- 28:40ठहर जा ये व्यापारी हैं, ठग हैं, सलैया हैं, चलते हैं तुमको ज़रा
- 28:50सोचो। गुरवाणी का यह प्रयोग इस मत युक्त
- 29:05वाणी में से अपना अस्तित्व निकाल लेना है।
- 29:13कैसे निकाल पाओगे? इस मैले पानी को ठहरा कर रख दो
- 29:25किसी को ऊंचे कोने में ठहर जाओ, विश्राम करो सारी रात विश्राम
- 29:32करो, सुबह उठ के पाओगे कीचड़ नीचे बैठ गया।
- 29:38पारदर्शी वाणी पर आगया वो ही तुम्हारा स्वभाव है निरमर मान जन
- 29:45सोय मोहि पावा, मोहे कपट छिद्र न भावा परमात्मा को कपट।
- 29:55छल छिद्र नहीं अच्छा लगता, लेकिन तुम तुम तो छल लिए जाते हो, लेकिन
- 30:05ध्यान रखना ये भ्रांति में है कि तुमको छल ले जाएंगे।
- 30:16इनकी बनाई गई ₹126,00,00,000 की बंगले धराशायी हो जाएंगे।
- 30:27एक माटी का कण संग नहीं जाएगा जड़म से घर जाएंगे 1 दिन तुम देख
- 30:31लेना हम तो न रहे के रहे पतंग। लेकिन इनका दून हाल देखना और जैसे
- 30:42तड़प तड़प के लिए जान देंगे। उनका हार कोई उनके संग रहने वाला
- 30:51सेवक ही देख सकता है। मानवता का अच्छा अच्छा लहू पी गए
- 31:03यह रोक लहू पीने की कोई मनाही नहीं और लहू के रंग जैसी शराब
- 31:13पीने की मनाही। खुद लोगों का लहू भी जाते हैं, वह
- 31:23भी लाल रंग का और तुम लाल परी ना पियो उसे रोकते हैं।
- 31:38नाच ना जानी हाँ घंटे फिर तुम जाके शिकायत करते हो फिर ये महफिल
- 31:47सजाते हैं क्वेश्चन एंड डांसर है और तुम पूछते हो बाबा मन ठहर तन।
- 31:55यह पापी है नहीं, मन पापी नहीं, तुम्हारी तरकीब है, मन को रटका
- 32:05नहीं जाता, मन को ठहराया जाता है। ठहरने से कीचड़ नीचे बैठ जाता।
- 32:22किसी ने तुम्हें भागना सिखाया, वड़ों में भाग जाओ, कंधराव में
- 32:28भाग जाओ, हिमालय में निकल जाओ नहीं, मैं तुम्हें नहीं कहता, मैं
- 32:33तुम्हें कहता हूँ जहाँ हो वहीं बैठ जाओ।
- 32:37मैं खुद बैठा हूँ, मैं तुम्हें नहीं कहता अच्छे अच्छे भगवान खो
- 32:46कोई आवश्यकता नहीं। इस शरीर को चलाने के लिए थोड़ा सा
- 32:54आहार काफी होता है। और तुम तो सुबह से शाम तक भरले
- 33:04पकौड़े चाव, मंचूगा पिज़्ज़ा बर्गर न जाने क्या कुछ और फिर
- 33:13मांसमाटी मरा हुआ मुर्गा तुम खा लेते हो?
- 33:19भाई पेट है के शमशान घाट मुड़ते तो शमशान घाट में दफन हुआ करते।
- 33:28तुम अपने पेट में सफर कर लेते हो। ये लोग रोकेंगे तुम्हें लाल रंग
- 33:44का खून तुम्हारा चूस जाएंगे जोंक की तरह जोंक भूरा भूरा चूसती है
- 33:50ये अच्छा अच्छा चूस जाए। इसलिए जिन्होंने लघु चुसवाना है
- 33:59भूरा भूरा झोंकों से और अच्छा अच्छा गुरुओं के पास जाके डेरों
- 34:04में चुसवा देना, लेकिन उसी रंग की शराब तुम्हें पीने से रोकेगा।
- 34:12तुम मत पियो क्यों? क्योंकि सच कंठ में नहीं ले जा
- 34:16पाऊंगा। फिर भाई तुम ताकतवर कैसे हुए?
- 34:21तुम तो बड़े कमजोर निकले तो एक छोटी सी शराब तुम्हें सच कंठ में
- 34:30जाने से रोक गयी। मैं कहता हूँ, पीओ थोड़ा शार्थ को
- 34:39देखो तो ये होती कैसी है? और फिर तुम उस बड़े?
- 34:51मदहोश करने वाले अमृत के पास पहुंचोगे खोजोगे कि क्या इससे
- 34:58बड़ी शराब पी होती है? सच्चा गुरु कहेगा हाँ तुमने पीनी
- 35:04है, तुम कहोगे हम बिलकुल पानी पीनी है, ये तो बड़ी अच्छी है।
- 35:12ये तो मन को ठहरा देती है, सच्चा गुरु तुम्हारे मन को ठहराएगा
- 35:24जिसने अभी पी ही नहीं है, उस समर्थ की श्राप और मन ठहरा ही
- 35:28नहीं है। वो तुम्हें ऐसी ही बातों में
- 35:31विचार है। मन तू ज्योत स्वरूप है अपना मूल
- 35:38पक्ष तो मूल पहचान लिया पारदर्शी पानी ट्रांसपेरेंट वाटर शुद्ध जल
- 35:48तुम हो यह ज्योत स्वरूप। जो नीचे बैठ गया मढ़, वह तुम्हारा
- 35:55विकार अब मैंने बिल्कुल अलगाव कर दिया।
- 36:01पहले तुम्हारे ज्योत स्वरूप मन में यह विकारों का मल।
- 36:09गुथ हुआ था, गोला हुआ था आराम से ठहर जाने नथिंग टू डू कुछ नहीं
- 36:20करने जलमट नीचे बैठ जाएगा। और शुद्ध जल पर आ जाएगा
- 36:29ट्रांसपेरेंट वो ही तुम्हारा मन परमात्मा का स्वरूप है और तुम
- 36:41किसे ठहरने की बजाय दौड़ते वनों में दौड़ते।
- 36:48कंधराओं में दौड़ते हो, हिमालय की गोफाओं में दौड़ते हो।
- 37:05मेरे बन को जन जाए काहे रे? बन खोजन जाए सरबगया भी सदा हल।
- 37:40सदा हलीफा, तोहे संग समहम तोहे संग समह काहे रे?
- 37:59बन को जन। को खोजने में जाओगे तो तुम अपने
- 38:11मन को गजोल मारो, यहाँ नहीं मिलेगा।
- 38:16वहाँ मिलेगा जब के वह है, तो तुम्हारे भीतर है।
- 38:23पुष्पमर्ध जो बास वसच है पुष्पमर्ध जो बास वसच है।
- 38:37मुकर माहि, जस छाये तैसे हरि मैं हरि पैसे हिया मैं हरि बस्त।
- 38:55घट ई खोजो हो ई काहे रे रे वन को जंजाल।
- 39:11पुष्प मध्य जो बास बसता है। लोग मुझे कहते हैं परमात्मा
- 39:20दिखाओ, मैं कहता हूँ तुमने सुगंध कभी सुगंध का आनंद जाना।
- 39:34हाँ बाबा जान कभी सुगंध को देखा नहीं बाबा वो तो देखी तो नहीं जा
- 39:41सकती मैं इनका जब सुगंध नहीं देखी जा सकती, सुगंध एक इन्द्रिय से
- 39:51सूँघी जा सकती है हमारी नस का। आवाज़ कानों के श्रवण यंत्रों से
- 39:59सुनी जाती है, दृश्य आँखों के इस यंत्र से सुना देखा जाता है,
- 40:10स्पर्श चमड़ी से अनुभव होता है। और तुम मुझे कहते हो, परमात्मा को
- 40:19दिखाओ सुकंध दिखती नहीं आवाज़ कानों के बिना दिखाई नहीं पड़ती।
- 40:31आँखों से नहीं और दृश्य कानों से दिखाई नहीं पड़ते, जो सपर्श होता
- 40:44है तुम्हारी चमड़ी को वह जीवा से नहीं प्रकट होता यह प्रत्येक
- 40:52अनुभव को। जानने के अपने अपने ओजार हैं ऑल
- 40:58आर इंस्ट्रूमेंट्स, परमात्मा को जानने के लिए भी एक इंस्ट्रूमेंट
- 41:09है। वो है छठी इंदरिया छठी इंदरिया
- 41:17यानी तीसरा नेत्र। जब तुम यहाँ पर दीक्षा लेने के
- 41:28लिए आती। तुम्हारी शक्ति किसी भी केंद्र पर
- 41:35है मूलाधार पर ज्यादा होती है, क्योंकि सभी कामग्रस्त हैं
- 41:43तुम्हें तुम्हारी उस शक्ति को जीस केंद्र पर मौजूद होती है।
- 41:49उसको उठा के इस केंद्र के करीब ले आता हूँ।
- 41:55विष्णु दिन चक्कर पर बस विष्णु चक्र तक ही गुरु ले आ सकता है।
- 42:07विष्णुति चक्र पर जैसे ही गुरु ले आया वहाँ सावधान तुमने गुरु की
- 42:15आज्ञा का पालन करना है, क्रियाएं करो ने कुछ करने में बैठ जाओ।
- 42:28नथ्थिंग टु डू आराम से और दुनिया है यहाँ पर काम करने के लिए हम तो
- 42:38आए हैं महज आराम करने के लिए। आराम से बैठ जाओ, शरीर का रूमा,
- 42:49रूमा ही लक्स छोड़ दो। जैसे आस पास सब समाप्त हो गया।
- 43:01कुछ नहीं बचा। ऐसे हो जाओ कुछ नहीं करने में बैठ
- 43:10जाओ, धीरे धीरे तुम्हारे इलेक्ट्स होते जाओगे और इस रीलेक्शन के
- 43:17कारण। तुम अपने ही भीतर उतरने शुरू हो
- 43:22जाओगे, अपने भीतर उतरने की चेष्टा मत करना, अपने आपको रिलैक्स छोड़
- 43:31देना, तुम भीतर उतरना शुरू हो जाओगे।
- 43:35शब्द थोड़े गहरे पर सुन लो। फिर भी समझना है तो रिपीट करके
- 43:40सुन लेना, अपने भीतर जाने की चेष्टा मत करना, क्योंकि इन
- 43:49चेष्ठों ने तो हीद ने तो तुमने मारा है, इन चेष्ठों के कारण ही
- 43:56तो तुम पहुँच नहीं सके। तुमने गंदले पानी में चेष्ठा करके
- 44:02हाथ घुमाया, वह और गंधरा मैं तुम्हें आराम करना सिखाता हूँ।
- 44:14लोग तुम्हें नाम जपना सिखाते हैं। राम करना सिखाते हैं मैं तुम्हें
- 44:20आराम करना। सीखाता हूँ, अपने भीतर उतरने का
- 44:29भी प्रयास मत करना। यह भी प्रयास है।
- 44:38फिर नाम तो चाहे परमात्मा का तुमने रख लिया और नाम चाहे भद्दी
- 44:44चीजों का भी तुमने रख लिया। महज है तो वो वर्णमाला ही अल्फा
- 44:49बेकनी है। और सभी अल्फाबेट तुम्हारे गंधले
- 44:57पानी में जंजोल का काम करते हैं, ठहराव नहीं आता इसलिए मौन हो
- 45:06जाना, मौन हो जाना, कहर जाना। अपने आप को रिलैक्स छोड़ देना
- 45:18टोटली रिलैक्स हो जाना नक् से शिखा तक अपने आप को छोड़ देना,
- 45:24उसके सुबूत कर देना, वह अन्नोन पावर।
- 45:29अज्ञात शक्ति जीसको तुमने अभी देखा नहीं और जिसका जाप करना
- 45:34तुम्हारे गुरु तुम्हें सीखा रहे हैं स्मरण करो, कैसे कर पाओगे?
- 45:44स्मरण हमेशा उस चीज़ का होता है जीसको तुमने पहले देखा हो।
- 45:51मैं तुम्हें कहूँ सेब तो फौरन तुम्हारे मन में आकृति बन जाएगी
- 45:58सेब की मैं तुम्हें कहूँ पानी तो तुम्हारी आकृति बन जाएगी पन।
- 46:09शब्दों से जुड़ाव है वस्तुओं को लेकिन शब्दों से परमात्मा का
- 46:18जुड़ाव है क्योंकि ये वस्तुएं तुमने देखी हैं?
- 46:24परमात्मा तुमने देखा? इसलिए परमात्मा को शब्दों से
- 46:32जुड़ाव होता ही नहीं। परमात्मा शब्दातीत है।
- 46:38अखरा नारों वखर चिड़ा ही इज़ ए ब्यूट वर्ब्स।
- 46:44तुम शब्दों में उसे बांधने की चेष्टा न करना मंदिरों में बांध
- 46:48लिया, गुरुद्वारों में बांध लिया। मस्जिदों में, गिरजाघरों में,
- 46:52चर्चों में तुमने बांध लिया, परमात्मा को कैद कर दिया और वह
- 46:59कभी कैद किया नहीं जा सकता। आदमी का अजीब पागलपन है, खुद
- 47:16मुक्त होने के लिए परमात्मा को कैद कर लेता है।
- 47:27अजब तरीके हैं तुम्हारे। खुद चाहते हो आजाद और परमात्मा को
- 47:38मस्ज़िदों में, मंदिरों में, गुरुद्वारों में, चर्चों में
- 47:42गिरजाघरों में कैद कर दिया। और तुम जानते नहीं कि वह कैद किया
- 47:48ही नहीं जा सकता। वह इतना उन्मुक्त है कि तुम्हारी
- 47:55किसी कैद में वो आता नहीं। क्या सुगंध को तुम कैद कर पाओगे?
- 48:07क्या ध्वनि को तुम क्या करवाओ नहीं स्टोर कर सकते हो क्या?
- 48:24खाब इस खाब से तू प्यार न कर प्यार हो जाए तो।
- 48:43इस प्यार का इजहार न कर मैं तो। एक।
- 48:54खाव इस प्यार इस ख्वाब से। तू प्यार न कर ये हवाएं कभी
- 49:11चुपचाप चली जाएंगी? लौटकर फिर कभी गुलशन में नहीं
- 49:26आएंगी अपने हाथों में। हवाओं को गिरफ्तार न कर मैं तो एक
- 49:52ख्वाब से। तुम प्यार ना कर यार हो जाए तो इस
- 50:06प्यार का इजहार ना कर। अपने हाथों से इन हवाओं को
- 50:17गिरफ्तार ना पड़ा। कभी ख्वाब तुम बांध सकते हो?
- 50:32आज तक धरती पर कभी किसी व्यक्ति ने ख्वाब बांधा है, देखा बांदा है
- 50:44नहीं देखा है। यहाँ तुम शीशों पॉइंट में पड़
- 50:53जाओगे, तुम कहोगे हाँ देखा है तो फिर हवाई जहाज के अंदर बैठे क्रैश
- 51:00हो जाता है। हजारों सैकड़ों लोग मर जाते हैं,
- 51:08खाब टूट जाता है। उस जहाज का पुर्जा, उसका पेट्रोल,
- 51:19उसमें बैठे पैसेंजर्स उसको उड़ाने वाले पायलट सह पायलट।
- 51:31उनका एक ज़रा भी तुम्हें मिलता है ख्वाब के टूटने के बाद नहीं जब
- 51:39उसकी अस्तियां तक तुम्हें नहीं मिलती तो वह ख्वाब तुमने देखा तुम
- 51:47कहोगे हाँ देखा। देखा तो उसके 80 विंजर कहाँ है?
- 51:55क्या तुम उसे कैद कर सकते हो? नहीं कैद कर सकते क्या तुम हवाओं
- 52:05को बंद कर सकते हो, गैर रफ्त में नहीं कर सकते।
- 52:10सुगंध को कर सकते हो, नहीं कर सकते हो, फिर तुम परमात्मा को
- 52:15देखने की जिद काहे की हो? क्या तुम्हें पक्का है कि मिल
- 52:24जाएगा वनों में जाने से पहाड़ों में जाने से बर्फीले स्थानों में
- 52:32जाने से मिल जाए? नहीं, ये ख्वाब है सिर्फ और कोई
- 52:44भी व्यक्ति ख्वाब के नहीं होने का ऑथेंटिसिटी से नहीं कह सकता कि
- 52:53ख्वाब नहीं होता। सबने ख्वाब देखे, ओके, किसी को
- 53:03माया कहते क्या ख्वाब होता है? तुम कहोगे होता है मैंने देखा तो
- 53:12देखा तो दिखाओ कहाँ है? तुमने देखा, तुम कहोगे हाँ देखा
- 53:22तो फिर उसका कोई कचरा, कोई मलबा, कोई जहाज, कोई पैसेंजर, कोई उसके
- 53:27भीतर भरा हुआ पेट्रोल, कोई पायलट अरे कुछ उसकी बाल दिखा दो।
- 53:38सिरका बाल दिखा दो तुम कहोगे नहीं बस ऐसा ही संत होता है अपने हाथों
- 53:54में। हवाओं को।
- 53:58गिरफ्तार न कर में तो इक खाब। अभी तो ख्वाब सच नहीं होंगे तुम
- 54:16प्रत्येक चीज़ को। एग्ज़िस्टेंस को देखने के लिए
- 54:22माध्यम होता है कोई जैसे छत्र पे जाने के लिए सीढ़ियों सपर्ष का
- 54:32अनुभव करने के लिए त्वचा दृश्य को देखने के लिए आंख।
- 54:39शब्द को सुनने के लिए कान सुगंध को दुर्गंध को देखने के लिए मानने
- 54:47के लिए नाशिका पुटें स्वाद को जखने के लिए जीवा तो परमात्मा को
- 54:54देखने के लिए क्या होता है? दिख जाएगा।
- 54:59हाँ दिख जाएगा, लेकिन दिख जाएगा। शब्दों में बोल सकते हैं हम वह
- 55:06देखने की चीज़ नहीं, वह तो रस है रसो वैसा उपनिषद में उसकी
- 55:15व्याख्या बढ़ी शानदार की। वह रस रूम में और रस पिया जाता
- 55:22है, रस पिया जाता है। कैसे पियोगे उस गंदले पानी को और
- 55:35रख दो। मढ़ नीचे बैठ जाएगी शुद्ध स्वच्छ
- 55:42जब ऊपर आ जाएगा उसको तुम पीकर अपने प्यार से बजा सकता हो उसके
- 55:52पीने का। कौन सा यंत्र है?
- 55:57कौन सी सीढ़ी है? तीसरा नेत्र तीसरे नृत्य से उसे
- 56:06पिया जा सकता है। तीसरे नेत्र से समाधि में आनंद
- 56:14बरसता है। तो जब मैं तुम्हें दीक्षा देता
- 56:18हूँ, 19 9% लोग मूलाधार पे होते हैं, कामवासना के उप क्षेत्र में
- 56:31विराजमान होते हैं। सिगमेंट फ्राइड ने कहा है मनुष्य
- 56:38सुबह से शाम तक और रात तक जो काम करता है वह काम वासना के
- 56:44अर्धगिर्द करता है। इन दी सर्फेयर ऑफ सेक्स।
- 56:54कामवासना के अर्धकृध व्यक्ति घूमता है।
- 57:01अक्सर मैं पता हूँ कि कुच्छे के लोगों को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति
- 57:07कामवासना पर स्थित है। मुराधार पर स्थित है।
- 57:11मैं उनको खींचकर ऊपर जाता हूँ। और एक बार उस स्थिति में ले आता
- 57:17हूँ। जीसको विशुद्धि चक्कर कहते हैं
- 57:22मूलाधार चक्कर के ऊपर से विशुद्धि चक्कर के बाद।
- 57:33अगर तुमने मर्यादा सा दे रखी मौन रहे फेफड़े भर के सोंस ली प्राण
- 57:45वायु का संचरण कर लिया। और ने कुछ करने में बैठ जाए, अपनी
- 57:54शक्ति को संग्रहीत किया, सुपच्य भोजन खाया और इधर उधर भटके नहीं,
- 58:05आराम से बैठ गए तो धीरे धीरे। उस रीलक्षीषण में तुम
- 58:13परमरीलक्षीषण तक पहुँच जाओगे मौन से परमोन तक बोले में भी बड़ी
- 58:21शक्ति वह होती है इसरीसंत को बोलता देखकर।
- 58:29तुम्हें कमेंट करना तो बड़ा आसान होता है और मैं उन्हें कह देता
- 58:35हूँ भाई तुम तो पहले से ही जानते हो, तुम्हें मेरे चैनल पर आने की
- 58:42आवश्यकता क्या थी? यह कमेंट गलत है तुम्हारा, अन्यथा
- 58:53तुम मुझे सुनने ना आती सुनने आए हो तो यह इस बात का प्रमाण है कि
- 59:02अभी तुम ठहराव में आए नहीं। तुम्हें कमेंट करने के लिए बुलाया
- 59:10किसने? लेकिन यह भी एक वासना है।
- 59:21दूसरों की निंदा करना आलोचना नहीं हो।
- 59:27आलोचना होता है सत्य को जानकर। झूठ का खंडन करना आलोचना होता है।
- 59:37शक्ति को बिना जाने कुछ भी कह दिया वह निंदा होती।
- 59:50शक से टूट के गुंचे भी कहीं खिलते हैं रात और दिन भी जमाने।
- 1:00:09में। कहीं मिलते हैं, भूल जा जाने दे
- 1:00:19भूल जा जाने दे। मैं तो आया से करूँगा।
- 1:00:28मैं तो प्राइम मिनिस्टर बनूँगा मैं तो सीएम बनूँगा मैं तो एम एलए
- 1:00:33बनूँगा मैं तो डॉक्टर इंजीनियर बनूँगा यह सब तुम्हारी वासनाओं के
- 1:00:39कारण वरना जो तुम हो यू अरे सुफ्फिसिएंट?
- 1:00:47मोर दैन सफीशियंट कुछ बनने की चेष्टा वासनाओं का ही एक रूप होता
- 1:00:58है। इसलिए मैं तुमसे कहूंगा कुछ बनने
- 1:01:06की चेष्टा। संसार के पालन करने में करना,
- 1:01:12लेकिन मुख्यतः तुम चेष्टा करना होने की जो तुम वास्तव में हो पर
- 1:01:21वो ठहर कर अपने होने में तुम जा पाओगे।
- 1:01:29पुष्प मत्य जो बास बसत है, मुकर माहि।
- 1:01:38जस? छाई जैसे फूलों के भीतर।
- 1:01:45खुशबू होती है और जैसे आईना देखते हो तुम उसमें तुम अपनी तस्वीर
- 1:01:51देखते हो क्या उस तस्वीर को पकड़ पाते हो उस तस्वीर को शीशे के
- 1:02:01भीतर से निकालकर तुम बाहर ले आओगे?
- 1:02:05नहीं, यह संभव है। तैसे ही हरी बसें निरंतर तैसे ही।
- 1:02:22हरि बसे निरंतर गट ही खो जोहाई गट ही खो जोहाई।
- 1:02:42काहे रे बन को जन जा हो? ऐसे ही तुम बाहर मत जाके खो जो।
- 1:02:55तुमने श्रद्धा से चेष्टा की जन्मो जन्मो बीत गए, हजारों डाकुओं
- 1:03:00जन्मो और बीत जाएंगे, लेकिन अगर तुमने शीशे में से अपनी परछाई को
- 1:03:06बाहर निकालने की चेष्टा बंद न की तो निश्चित है कि तुम अपनी परछाई
- 1:03:13को बाहर न निकाल पाओगे। क्योंकि तुम हो तुम्हें परछाई को
- 1:03:20बाहर निकालने की जरूरत क्या है जरूरत क्या है जब तुम हो, इसलिए
- 1:03:30मैं कहता हूँ शांति को अलग से उत्पन्न करने की जरूरत क्या है?
- 1:03:36जब तुम ही शांति हो, आनंद को जरूरत क्या है अरग से पैदा करने
- 1:03:42की जब तुम ही आनंद का बोरा सो, लेकिन बस तुम अभी अनभिज्ञ हो तुम
- 1:03:53अनजान हो। तुम अज्ञानी तुमने जाना नहीं के,
- 1:04:00मैं ही वो रस का समद्र हूँ जहाँ से सारे आनंद के झरने बहते।
- 1:04:12इसलिए बाबा कहते हैं कि शीशे में से अपनी परछाई को बाहर निकालने की
- 1:04:20चेष्टा मत करना, फूल में से सुगंध को कैद करने की चेष्टा मत करना।
- 1:04:29गर्मी की ऋतू में ठंडी ठंडी शीतल हवाओं को पकड़ने की चेष्टा मत
- 1:04:36करना, लेकिन तुमने तो परमात्मा तक को कैद कर लिया।
- 1:04:42मुझे रोज़ परमात्मा कहते हैं। कि मुझे कैद करने की चेष्टा करता
- 1:04:48है मानव किताबों में मैं जानता हूँ परमात्मा को कैद करने की
- 1:05:04मस्ज़िदों में। मंदिरों में, गुरुद्वारों में,
- 1:05:08गिरजाघरों में, चर्चों में सब बेकार है, कुकी परमात्मा कैद होता
- 1:05:17नहीं। जब सुगंध कैद नहीं होती, जब हवाएं
- 1:05:22कैद नहीं होती, फिरराएँ कैद नहीं होती।
- 1:05:27तो वह परम सर्जन हरा कैसे कैद कर पाओगे?
- 1:05:30तुम जो अखंड है, जो असीम है, जो विराट है, जो विशाल है, जिसका कोई
- 1:05:37और छोर नहीं, जिसका कोई मेज़रमेंट नहीं, तुम कैसे उसे कैद कर पाओगे?
- 1:05:45यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे तुम दर्पण में देखते हो, अपनी तस्वीर
- 1:05:53और उसको दर्पण से बाहर निकालने की चेष्टा में संलग्न हो।
- 1:05:57बस तुम्हारे नाम जाप के समण पांच नाम।
- 1:06:01राधे राधे सभी इस परछाई को शीशे से बाहर निकालने का प्रयास मात्र
- 1:06:07है। कभी सफर नहीं होगे, तुम आखिर में
- 1:06:11टूट जाओगे, आखिर में मर जाओगे और गुरु तुम्हे सारी उम्र दिलासा
- 1:06:17दिलाता रहेगा। तुम जब मर जाओगे ना?
- 1:06:22तो मैं आऊंगा तुम्हारी अंगली पकड़ूंगा सच खंड में ले जाऊंगा,
- 1:06:35तुम इनका नार्को करवाओ। तुम पाओगे ये झूठ बूठ करोड़ों
- 1:06:46लोगों का भ्रम एक बार में टूट जाएगा।
- 1:06:48स्क्रीनिंग के ऊपर लगा दो, ओपन में नार्को करवाओ।
- 1:06:54तुम इनसे पूछो की तुमने देखा सच गंड जब होता ही नहीं देखेंगे क्या
- 1:07:00खाक रस होता है और रस के लक्षण होते हैं और जब संत होता है उसकी
- 1:07:10आवाज में वही तो रस बहता है। कृष्ण की मुरली में वही तो धुन
- 1:07:16होती है। रसीदी बाबा जब गाते हैं।
- 1:07:31बन खो जंजा। यह रस भरी आवाज़ कहाँ से आती है?
- 1:07:41यह उसी रस से समुद्र से टकरा के आती है इस रस की आवाज़ को पी
- 1:07:49देना। बस इतना सा कर लेना काफी और
- 1:07:56परमात्मा जब तुम्हारे में आनंद का संचार कर दे तो उस आनंद के संचार
- 1:08:04को। तो मात्र सुन क्योंकि वह उस रस के
- 1:08:08सागर से टकरा के आती हुई आवाज़ कुछ मत करना नथ्थिंग टु डू
- 1:08:19तुम्हारे कानों में वह आवाज़ रसीली पड़ेगी जद भी वह गूंज रही
- 1:08:25है तुम्हारी सहसराट। और तुम्हारे भीतर इकट्ठी होती
- 1:08:33रहेंगी, बूंद बूंद करके 1 दिन घड़ा बढ़ जाएगा।
- 1:08:38तभी बाबा नानक ने शब्द कहा सुनिए दुःख पाप का नाश।
- 1:08:45सुन ने मात्र से ही घड़ा भर जाता है आनंद का तुम रस से भर जाते हो,
- 1:08:52रस छलकने लगता है और फिर तुम बांटने लग जाते हो।
- 1:08:58इनके पास रस तो अभी आया है, यह निंदा नहीं आलोचना है।
- 1:09:06और मैं तुम्हें सत्य प्रमाणित कर सकता हूँ।
- 1:09:11मेरा भी नर्क को करवाओ, इनका भी नर्क को करवाओ वो चाहे बाबा हों,
- 1:09:19चाहे बाबा के बाबा हों, चाहे बाबा के हजूर हों।
- 1:09:23इन्होंने देखा है सत्यकंड जहाँ ये आपको लेके जाएंगे क्या इन्होंने
- 1:09:29दिल्ली देखी है जहाँ ये तुम्हें लेके जाएंगे दिल्ली तो देखी होगी।
- 1:09:41सच कंड देखा नहीं, क्योंकि सच कंड होता ही और जो सच कंड बाबा बता
- 1:09:49रहे हैं वो कहते हैं कि तुम्हारे पिता हैं ये कहाँ ले के जाएंगे
- 1:09:58तुम मरने के बाद? इस जड़ शरीर में जब चेतना बाहर
- 1:10:04निकल जाएगी, ये तुम्हें कहाँ दे के जाएंगे व्हेर इस दी माइलस्टोन
- 1:10:12जहाँ जाकर ये तुम्हें ठहराएंगे नहीं, कुछ नहीं है।
- 1:10:16प्राण निकल गए। यह थोता पंचभौतिक तत्व का शरीर बच
- 1:10:21गया सब झूठ है, कफर है, तूफान है, ऐसे ही ये उपजाऊ धरतियों को एक
- 1:10:37उपाय करते हैं। गरीब भूख से मर रहा है।
- 1:10:45ये जमीनों के ऊपर काबिज हुए जाते हैं।
- 1:10:49महज झूठ के नाम पर सच खंड एक झूठ है बाहर के लिए सच खंड भीतर तो
- 1:10:57है। इसलिए मैं कहता हूँ तोड़ दो
- 1:11:02मंदिरों को मस्ज़िदों को, गुरुद्वारों को, चर्चों को,
- 1:11:05गिरजाघरों को हृदय के भीतर उतर जाओ।
- 1:11:17दिल के आईने में थी तस्वीरें यहाँ दिल के आईने में थी तस्वीरें यहाँ
- 1:11:27जब ज़रा कर्तन झोंकाई देखते हैं तहसी।
- 1:11:36हरी बसे निरंतर तैसे ही गुरु बसे निरंतर गत ही खोजा हई।
- 1:11:54कार बन को जनजागर। अब आखिरी शब्द रस रूप, सारा फल
- 1:12:07हमने निचोड़ लिया। उसका रस एक शब्द में समझो।
- 1:12:12और इसको आप सर्किल में ले लो के। नानक गुरु जन नानक बिन आका छीन।
- 1:12:31जननानक बिन आपा छीने मिटे न भर म की खाई मिटे न भर म की खाई।
- 1:12:50काहे रे बन को जन हाय काहे रे बन को जन बा बाहर भीतर ध्यान से सुन?
- 1:13:10ए। कई जानो बाहर भीतर ए कई जानो यह
- 1:13:20गुरु ज्ञान न बताई कह जन नानक। बिन आपाचीन जन नानक बिन आपाचीन
- 1:13:41मिडनाभर में दिखाई। मीट न भर म की काई काय रे?
- 1:13:55बन को जनजा तत्व रूप में। समझावा।
- 1:14:07यही कृष्ण ने किया, अर्जुन से कांप रहा है वो कुरुक्षेत्र के
- 1:14:12मैदान में मैं गुरु को कैसे मार दूं उसी शस्त्र विद्या से जो
- 1:14:20शस्त्र विद्या मेरे गुरु द्रोण ने मुझे सिखाई थी।
- 1:14:26मैं कैसे अपनी ही उस पिता माँ को मार दूं जीस पिता माँ में ने
- 1:14:32बुर्की बुर्की देकर मुझको पाला बड़ा किया कैसे चला दूँ तीर मैं?
- 1:14:42तो कृष्ण कहते हैं ठीक है पार्थ तो कृष्ण उसकी अपरशक्ति बात करते
- 1:14:50हैं, देख तू कौन? और यह देख के द्रोण कौन हैं और यह
- 1:14:59भी देख। कि भीष्वं पिता में हो शक्तिपात
- 1:15:06के कारण वह देखता है अर्जुन के मैं शरीर नहीं, जन नानक बिन अप्पा
- 1:15:17चीन। मिटे ना भर में की काई, उसने आपस
- 1:15:26छीन लिया अपना अपना स्वरूप देख लिया नो दाय सेल्फ हू आर यू
- 1:15:34रिमेम्बर यूर सेल्फ। अपने आप को उसने याद रख लिया कि
- 1:15:39मैं कौन भ्रम मट गया जान नानक बिन आपका चिन्ह मिटा न भ्रम की काई
- 1:15:53कृष्ण कहते हैं, अगर ये भ्रम बना रहा, अभी तो भ्रम बना हुआ।
- 1:15:58अनीता मुझे सुनने न आते, मुझे न सुनोगे, किसी को भी सुनोगे, लेकिन
- 1:16:05सुनोगे? लोग मुझे पूछ लेते हैं बाबा एक
- 1:16:09मास्टर जी बोलते हैं, क्या हम उनको सुन लिया करें हाँ?
- 1:16:15अगर तुम ठीक से सुन पाए तो तुम पत्थरों को भी सुन सकते हो।
- 1:16:21पत्थरों में भी तो परमात्मा है। पत्थर में देखने वालों ने पत्थरों
- 1:16:31में भी पाया। धन्ना भगत ने पत्थर में ही पाए तो
- 1:16:38निगाह बड़ी पारदर्शी होनी चाहिए। बात तो तुम्हारी निगाह की बात तो
- 1:16:47ये है कि तुमने अपनी सारी शक्ति को इन्सर्ट नहीं किया।
- 1:16:54और जब तक तुम इन्सट नहीं करोगे, अपनी सारी शक्ति को, तब तक
- 1:17:01तुम्हें कहीं भी भटक लो नहीं मिलेगा।
- 1:17:06मंत्र जाओ गुरुद्वारा जाओ, किसी शांति स्थल पर जाओ।
- 1:17:12बड़ों में निकल जाओ, हिमालय की कन्दराओं गुफाओं में छिप जाओ
- 1:17:19लेकिन ओम शांति कहने वालों शांति तो भीतर है, वह न बोलने से मिलती
- 1:17:28है न दोहराने से मिलती है। न सुबह सुबह इस अपखंड से मिलती है
- 1:17:35कि मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति भाग्यशाली हुआ जाता है
- 1:17:42भाग्यशाली माना नहीं जाता तुम भाग्यशाली मान रहे हो अपने आपको
- 1:17:49तुम गलत हो। यू आर इन इमेजिनेशन स्वप्न की तरह
- 1:17:55तुम कल्पना में घिर रहे हो तुमने दर्शन नहीं किया और यहाँ देखिए
- 1:18:03बाबा कहते हैं जन नानक बिन आपा चिन्ह।
- 1:18:09देख कर ही मिटती है मिटैन भ्रम की इकाई यह है भ्रम की इकाई
- 1:18:16शंश्यात्मा विनिष्य तीज इसे कृष्ण कहते हैं, जो संशय करेगा उसका
- 1:18:21विनाश हो जाएगा। इसे भ्रम कहते हैं।
- 1:18:24बाबा और इस भ्रम की इकाई। को अगर मिटाना है तो अपने आप को
- 1:18:31जाने बगैर यह धर्म की इकाई नहीं मिटेगी।
- 1:18:38राम राम करते रहो, कहीं जाते रहो कुछ करते रहो।
- 1:18:48लेकिन उस भीतर के रस को ना पा सकोगे।
- 1:18:53वह तो वही मिलेगा जहाँ है और वह तुम्हारे भीतर है।
- 1:19:02फिर जब तुमने अपना आपा छीन लिया, अपना आपा देख लिया।
- 1:19:09फिर तुम्हें क्या होगा? फिर तुम्हारा फैलाव शुरू हो
- 1:19:12जायेगा। बाहर भी एक ही जानो।
- 1:19:24ऐसा हो जायेगा, तुम फैलते चले जाओगे, पहनते चले जाओगे।
- 1:19:30फेंकते चले जाओगे और तुम्हारा कोई और छोर मेजरमेंट आदि मध्य अंक कुछ
- 1:19:42भी नहीं रहेगा। बाहर वेतर एकई जानो बाहर।
- 1:19:56भी वही यथा पिंडे तथा भ्रमण। मेटेना भी भ्रम की काई?
- 1:20:12बार बाहर भीतर एकई ज्ञानो यह गुरु ज्ञान बता।
- 1:20:26काहे रे मन को जन जा फिर तुम? फैलते चले जाओगे, फैलते चले
- 1:20:37जाओगे, फैलते चले जाओगे और इतना फैलते चले जाओगे कि तुम्हें
- 1:20:43तुम्हारा अपना ही और शो पता नहीं चलेगा।
- 1:20:49न वक्त बचेगा, न अहम बचेगा। समय शून्य हो जाओगे, अहंकार शून्य
- 1:20:57हो जाओगे और तुम विराट और विशाल। में सिद्ध हो जाओगे इसे ही स्थिति
- 1:21:06प्रज्ञा कहा खुशी पहला अपने आप को छीनो नो दाई अपने आप को जानन्य के
- 1:21:23बाद तुम्हारे भरम की। कई इल्यूजन कई इल्यूजन को कहते
- 1:21:30हैं। मैल को कहते हैं यह मिट जाएगी और
- 1:21:37जब तुमने अपने आपको जाना हो तो फिर तुम फैलोगे फैलते फैलते तुम
- 1:21:46देखोगे। के मैं भीतर भी हूँ बाहर भी हूँ
- 1:21:51आई ऍम अब्रुव्या एंड ओमनी प्रेसेंट हर जगह में ही में हूँ
- 1:22:02बाहर भीतर एकई जानू। यह गुरुज्ञान बताए ऐसा आखिर में
- 1:22:13तुम देखोगे देखिए। शब्द बताते हैं कि शब्द बोलने
- 1:22:18वाला व्यक्ति उस विराट के तलों को छू गया था।
- 1:22:24शब्द बड़े कीमती भी है। उन शब्दों को पकड़ लोगे तो तुम सा
- 1:22:31मूड कोई मैं शब्दों से मात्र इशारा दे लो जैसे मैं के तुम वो
- 1:22:37रहा चंद्रमा, लेकिन इसको टफ को पकड़ के मत बैठ जाना यह चंद्रमा
- 1:22:42नहीं। इसकी स्ट्रीट लाइन में देखना
- 1:22:45आँखें हैं तुम्हारे पास तुम्हें चंद्रमा दिख जाए ना बाहर भीतर इकई
- 1:23:00जान बस वह एक ही जो मैंने एनलाइटनमेंट के वक्त महसूस किया।
- 1:23:10श्वेत पार्टिकल से भरा यह है सारा अस्तित्व परम शांतिप्रद इतने आनंद
- 1:23:23से भरा हुआ रसा स्वादन से भरा हुआ।
- 1:23:26जिसका व्याख्यान नहीं हो सकता, कोई परिमाण नहीं है।
- 1:23:31उसका कोई मेज़रमेंट नहीं है। उसका इतना आनंद है इतना आनंद है।
- 1:23:44और तुम उसका बहुत शूद्र भाग शूद्र भाग अरबमा खरबमा भी कहूँ, असंख्य
- 1:23:51माँ भी कहूँ तो कहने में नहीं आएगा तुम इन्द्रियों के द्वारा
- 1:23:56बहते हो जो सुख वह असर में तो सुख भी नहीं।
- 1:24:04मात्र उत्तेजना है, तुम्हारी इन्द्रियां उत्तेजित होती हैं और
- 1:24:10फिर उत्तेजना विहीन हो जाती हैं। इसको ही तुमने सुख मान लिया लेकिन
- 1:24:20ये सुख है नहीं। ये सुख है नहीं, पुत्र तीन तल
- 1:24:30हैं, एक तल है कि तुम बहरुमुखी हीरो हो, फिर तुम संसार के पदार्थ
- 1:24:39कमाओगे। फिर तुम श्रे कमाओगे मान सम्मान
- 1:24:45कमाओगे फिर तुम ओहदे कमाओगे धन कमाओगे पदार्थ कमाओगे, गोदाम
- 1:24:54भरोगे बैंक भरोगे जमीन जायदाद खरीदोगे।
- 1:24:59बड़े बड़े समूह बनाओगे, कोठियां बनाओगे, डेरे बनाओगे?
- 1:25:06कुछ भी बना लो, लेकिन यह बाहर से तुम कमाओगे यह बाहर का दल है।
- 1:25:20फिर दूसरा तल है कि तुम बाहर की संलिप्त तांग को तोड़ दो।
- 1:25:30इन लिप्त तांग को तोड़कर क्लिंगिंग नेस को तोड़कर।
- 1:25:35इन क्लीननेस में तुमने अपनी शक्ति निहित कर रखी है, इन्सर्ट कर रखी
- 1:25:42है? तो जब तुम लिप्तताओं को तोड़ दोगे
- 1:25:45तो यह शक्ति आकर तुम्हारी इकट्ठी हो जाएगी सहसरार में।
- 1:25:53एक स्थान पर इकट्ठे हो जाएंगे। ये दूसरा तल है, तीसरा तल है
- 1:26:03रिलैक्स यूरसेल्फ़ कंप्लीट करना। मन को संपूर्ण रूप से रिलैक्स कर
- 1:26:11दो। क्रिया योग करो, बड़ी सहायता
- 1:26:19मिलेंगे। तुम्हें ही प्राण वायु मिलती है।
- 1:26:27तुम्हारे क्रिया योग करने से मुझे प्राण वायु नहीं मिलती ध्यान रख।
- 1:26:34तुम्हारे ही लिए बोल रहा हूँ, पूरे फेफड़े को भर लो।
- 1:26:40इस प्रण वायु के बिना गलत मनेजमेंट के कारण कोरोना में
- 1:26:46लाखों व्यक्ति मर गए। साहब की जिम्मेदारी थी।
- 1:26:54ऑक्सीजन महियाकराना साहेब पश्चिमी बंगाल में बहुत मात्र हित है।
- 1:27:05अब क्या किया जाए ऐसे व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति को?
- 1:27:14सामूहिक पकड़कर गर्दन कॉलर पकड़कर नीचे उतार दो।
- 1:27:18इसको किसी योग्य व्यक्ति को बैठाओ जो तुम्हारी समस्याओं को हल करने
- 1:27:27में सारा वक्त व्यतीत करे। 18 घंटे मत काम करो।
- 1:27:33तुम 8 घंटे को बहुत लेकिन करो तुम तुम्हारी समस्याओं को हल करने में
- 1:27:43अपनी समस्याओं को हल करने में मत करो अपनी इंद्रियों को तृप्त करने
- 1:27:50के लिए अपिस्टीन। के आइसलैंड पे मत जाओ तुम्हारी
- 1:27:59इंद्रियों की भुखमरी को शांत करने के लिए काम करो।
- 1:28:03बैठाएं तो इसलिए लेकिन कोई क्या करे?
- 1:28:15कोई क्या करे जब किसी। का मन बेईमान हो जा कोई क्या करे
- 1:28:31जब किसी का? मन बेईमान हो जा।
- 1:28:39इन्होंने अपनी संस्थाओं को दृढ़ करना यह आचार्य प्रशांत के दूसरे
- 1:28:48स्वरूप में आचार्य प्रशांत तुम्हीं?
- 1:28:53ब्रह्म देखा के अपनी संस्थाओं को मजबूत करता है और यह राजनीतिज्ञ
- 1:29:03तुम्हें दिव्या स्वप्न दिखा के करते वरते कुछ नहीं इन्होंने देखा
- 1:29:08कुछ। अपनी संस्थाओं को दृढ़ करते हैं।
- 1:29:13आरएसएस के पास एक छोटी मरी सी कुटिया भी नहीं हुआ करती थीं।
- 1:29:20आज तुम इनके ऐशो आराम के साधन देखो जो यहीं रह जाएंगे।
- 1:29:32संग तो कुछ जाता है। हो रही बुलबुल गुलों पे क्यों
- 1:29:46निशा? हो रही बुलबुल गोलों पे।
- 1:29:56क्यों निशा है खड़ा माली वो पीछे होशिया उससे ज्यादा होशियारी कौन?
- 1:30:10सेठ शरण पोला खोए तो एक न चले नार हे खड़ा माली वो पीछे होशियाँ।
- 1:30:22मार कर मार कर गोली गिरा। ली जाएगी जब तेरी तेरी तेरी डोली
- 1:30:39निकाली। जाएगी बे मोहूरत के उठा ली।
- 1:30:48जब तेरी। धन्यवाद।