Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Mar 26 - लोभ, अपूर्णता और पूर्णता की खोज!! विराट (Infinite) होने की आंतरिक तमन्ना
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- 0:10लीला प्रसाद बाबा जी आपने विचारों के ऊपर लोभ को विकार क्यों कहा?
- 0:27यह बहुत कम होता है, अपूर्ण व्यक्ति लोग करता है।
- 0:46अपूर्ण व्यक्ति, लोभ। करता।
- 0:48है। अपूर्ण व्यक्ति लोभ करता है।
- 0:57तीन बार बोला मैंने लेकिन लोभ को तुम गलत तरीके से पूरा करते हो।
- 1:08धन जुटाते हो, साधन जुटाते हो, सुख के लोभ कभी पूरा नहीं होता,
- 1:24लोभ को पूरा किया ही नहीं जा सकता।
- 1:30लोभ को समाप्त किया जा सकता है। ध्यान से समझना मैं थोड़े से धीरे
- 1:37धीरे बोल रहा हूँ। आपको समझ में ऐसा है आपका अंतः
- 1:48किसी न किसी तल पर अधूरा है। और अंतःस की कामना हर पल हर घड़ी
- 2:01पूर्ण होने की, लेकिन अभी जीस हाल में तुम हो।
- 2:11अपूर्ण जीस हाल में तुम जाना चाहते हो वह पूर्णता है यह
- 2:20अपूर्णता का लक्ष्य तुम में लोह पैदा करता है तुम चकित ना होना
- 2:29पुत्र। लोभ का मतलब है बड़ जन तुम अभी
- 2:42क्षुद्र हो छोटे हो, तुम बड़े होना चाहते हो और इतने बड़े होना
- 2:53चाहते हो? कि विराट हो जाओ।
- 2:58ये हमारे अंतष की तमन्ना है और अंतष की तमन्ना पूरी करने के लिए
- 3:09लोग दिनों जा लुटा देते हैं। लोग कहते हैं हम।
- 3:13पूरा कैसे हो जाए पूर्णता की दौड़?
- 3:23सभी दौड़ें पूर्णता की दौड़ें फिर आप चाहे गद्दी कमाते हो, धन कमाते
- 3:33हो। वे भव्य कमाते हो, प्रतिष्ठा
- 3:39कमाते हो, सूचनाएं कमाते हो, ये बड़े बड़े गुरु बन बैठते हो।
- 3:54आपकी आंतरिक कामना है विराट होने वह विराट होने की कामना तुम्हारे
- 4:07भीतर लोगों को पैदा करती है, बड़ा अद्भुत सूत्र है।
- 4:15कामना बराट होने की पैदा होता है लोग अध्यात्म के शब्द इसलिए उलटे
- 4:24पुलटे पूर्णस्यपूर्ण माताएं पूर्णमेभाव शिष्य थे।
- 4:32पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लो पूर्ण ही से स्वास्थ्य तो तुमने
- 4:41कहा, पुत्र के लोह के ऊपर मैंने ज्यादा नहीं बोला, चलो आज बोल
- 4:48देता हूँ। लोभ पैदा क्यों होता है?
- 4:54लोभ की जननी क्या है? तुमपूर्ण होना चाहते हो?
- 5:01विराट होना चाहते हो, असीम होना चाहते हो, लिमिटलेसनेस में आना
- 5:07चाहते हूँ। और अभी तुम लिमिटेड हो, अभी तुम
- 5:12अपूर्ण हो, अभी तुम सीमित हो छोटे हो, पूरन नहीं हुए यह कामना।
- 5:26या यह आभास तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने का एक प्रयास है, लेकिन
- 5:39चौक नामक यह प्रयास तुम्हारा कामयाब होता ना?
- 5:46क्योंकि रास्ते में गुरु रम बैठे हैं गुरु रम कहती तुम राधे राधे
- 5:53चपलो पूर्ण हो जाओगे गुरु रम कहती कि तुम पांच नाम जपलो पूर्ण हो
- 6:02जाओगे, राम राम करलो पूर्ण हो जाओगे।
- 6:08भला राम राम के जपने से पूर्ण होने का क्या संबंध है?
- 6:16कोई सुध नहीं अब बेसिक कार्य समझिये।
- 6:24तुम्हारे लोग का बेसिक काज है, तुम अपूर्ण हो, तुम पूर्ण होना
- 6:31चाहते हो अब इसको आप अंडरलाइन कर लो, तुम्हारी पूर्ण होने की कामना
- 6:40विराट होने की कामना इतना फैल जाऊं।
- 6:45इतना फैल जाऊं कि मेरा कोई और छोर न कुछ सब तरफ मैं ही मैनेजर हूँ
- 6:58इसलिए तो तुम राजनीति के बन जाते हो इसलिए तो तुम झंडिया उठाते हो।
- 7:07यह गाड़ी भी मैंने बनाई। श्रेय लेना चाहते हूँ यह जो हमारा
- 7:17यान थ्री पहुंचा चंद्रयान। चंद्रमा पे इसका भी श्रेय लेना
- 7:26चाहते हो? तुम गलत नहीं हो, तुम्हारी इच्छा
- 7:33बिलकुल सही है, रास्ता गलत है। रास्ता तुमने चुन लिया बाहर बाहर
- 7:43के दिखावे का जबकि रास्ता था भीतर भीतर के होने का तुमने चुना बाहर
- 7:54बाहर के दिखावे का दिखाओगे किसको? जिनको तुम दिखाओगे वो खुद ही
- 8:02अपूर्ण है और जिनको तुम अपनी पूर्णता दिखाने के चक्कर में पड़े
- 8:09हो एक ना 1 दिन वो विदा हो जाएंगे तुमसे पहले या तुमसे बाद में।
- 8:21पन्ना की तमन्ना है के हीरा मुझे मिल जाए, चाहे मेरी जान जाए।
- 8:35चाहे मेरा दिल जाए, पन्ना की तमन्ना है कि हीरा मुझे मिल जाए,
- 8:52चाहे मेरी जान जाए। चाहे मेरा दिल जाए।
- 9:01हमारी तमन्ना यही है कुछ भी दांव पे लग जाए हेरा मुझे मिल जाए जान
- 9:11जाए जाए। दिल जाए जाए लेकिन हीरा मुझे मिल
- 9:18जाए बिल्कुल अहसास सही है तुम्हारे भीतर से आता है।
- 9:28मिला शक। मार्ग के घर चुन लेते हो पुत्र
- 9:39मार्ग चुन लेते हो देखावे का और विराट हुआ जाता है अपने अंत समय
- 9:49उतर के। तुम मार्ग चूमते हो बाहर दिखावे
- 9:56काम के, मैं महान हूँ, मैं बड़ा महान हूँ, मेरे पांव पूजो मैं
- 10:06परमात्मा। और अगर कहीं तुम्हें मौका मिल जाए
- 10:12तो तुम ये कहते हो कि मैं परमात्मा से भी बड़ा हूँ।
- 10:16अहंकार की उदघोषणा परमात्मा को भी छोटा दिखा देती हूँ।
- 10:27लेकिन यह अहंकार की उदघोषणा है एगोइस्टिक प्रश्न इसकी घोषणा करते
- 10:34हैं, परमात्मा भी मेरी ही बनाई हुई कलाकृति है, इसलिए तुमने
- 10:42परमात्मा की कलाकृतियाँ बनाई। सब तस्वीरें अहंकार की बनाई हुई
- 10:51ओह दुर्गा हो भूकाली हो, छिन्न नमस्ता हो और बगला मुखी हो, वह
- 10:59अम्बा हो, पार्वती हो। सब कलाकृतियाँ तुम्हारे अहंकार की
- 11:07बनाई हुई कलाकृतियाँ तुम्हारा अहंकार कहता है, मैं परमात्मा से
- 11:15भी बड़ा हूँ, मैं परमात्मा को भी बनाने वाला हूँ।
- 11:25इसलिए तुम भगवान राम को छोटा दिखाते हो।
- 11:28बाल स्वरूप में अपने आप को दिखाते हो महामानव स्वरूप में अहंकार की
- 11:38घोषणा है या कहलों की इच्छा है। बिल्कुल सही है तुम्हारा एहसास और
- 11:55चाहे हिटलर हो, मसोलिनी हो, स्टालिन हो, चंगेज हो या कोई भी
- 12:07तानाशाह हो। भीतर से आई हुई इस आवाज को पहचान
- 12:14नहीं पाता और वहाँ तक पहुंचने का रास्ता नहीं खोज पाता।
- 12:27तुम कहते हो मैं महान हूँ, गुरु कहता मैं महान का गुरु हूँ, यहीं
- 12:36पेंच फंस जाता है, अहंकार कहता है मैं परमात्मा का सृजन करता हूँ।
- 12:44देखो यह तस्वीर मैंने बनाई यह परमात्मा की है एक शहर ने एक शेर
- 12:55लिखा था, भूत परस्तों का निराला भगवान देखा है, भूत परस्तों का
- 13:05निराला भगवान देखा है? खुद तराशा है और नाम भगवान रखा
- 13:12है। मैं बड़ा आसा करता था, जब यहाँ
- 13:17मूर्खों की टोलियाँ गुजरा करती थी।
- 13:23मंदिर वहीं बनाएंगे। हम उन्हीं को लेकर आएँगे जो राम
- 13:29को लेकर आए। कैसी कैसी मुड़ताओं में उलझ गए
- 13:36हैं तुम तो राक्षस क्यों ले आए? तुम कहाँ राम को लेके आए?
- 13:48तुम तो दुष्ट को ले आए, जो सब कुछ बक्श गया, राजा का अंतःस होता है
- 14:00सबको बराबर बांटी सूर्य की तरह। किसी को कम न दे, किसी को ज्यादा
- 14:06न दे, लेकिन तुम चूक गए हो, तुम गलती खा गए, तुमने सबसे इकट्ठा
- 14:17किया एक को दे दिया। वो चाहे अंबानी हो, चाहे अडानी
- 14:21हो, चाहे बिल गेट्स हो। यह राजा की दिनचर्या नहीं होती,
- 14:35यह राजा का कर्म नहीं होता। राजा का कर्म होता है सूर्य की
- 14:44तरह बराबर। गरीब पे भी उतना है, अमीर पे भी
- 14:50उतना है। फिर जो सूर्य का ताप लेना चाहे दे
- 14:55ले जो नहीं लेना चाहे वो घर बैठ जाए।
- 15:05मुझे तो प्रेम मिलनो की जा। प्रेम मिलन की चा शिस तलीधर घर
- 15:33मेरे आं? शिस तलीधर।
- 15:41घर मेरे आओं, मुझे तो प्रेम मिलन। की इच्छा सूरज निकलता है, लेकिन
- 15:58तो मैं नहीं कहता। तुमने सूरज का जितना लाभ उठाना है
- 16:04उठा दो, वह कभी इंकार नहीं करेगा पूछा है, बीच में मैं कई प्रश्न
- 16:18लूँगा, पुत्र, मैं उस आनंद को पाना चाहता हूँ।
- 16:27तो कौन सा धर्म अपना हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, योगी,
- 16:34पारसी पुत्र तुम महज इंसान हो जाऊं?
- 16:49न हिंदू पा सकेगा, न मुसलमान पा सकेगा, न सिख पा सकेगा, न ईसाई पा
- 16:58सकेगा, न येहूदी पा सकेगा, न पारसी पा सकेगा।
- 17:05क्योंकि ये सब तुम्हारी मान्यता है और एक बात को हाँ, इसे साइकिल
- 17:11में ले लो। मान्यताएँ तुम्हें कहीं नहीं
- 17:16पहुँच जाती। मान्यताएँ तुम्हें परमात्मा के
- 17:21पास रस के पास नहीं ले के जा सकती।
- 17:25मान्यताएँ तुम्हें वहीं रहती हैं जहाँ होती हैं मानकर तुम वहीं
- 17:33टिके रहते हो जहाँ पहले से थे ना हिंदू बन के मिलेगा ना मुसलमान ना
- 17:43युदी। न इस्लाम, न पारसी, न ईसाई, न सीख
- 17:58अगर तुम जे तुम प्रेम मिलन के चाह।
- 18:06शीश तलीधर घर में रह आओ ये शीश क्या है दूसरा शीश तुम्हारी
- 18:13मान्यता है तुमने देखा है नहीं। किसी के कहने से, कोई शास्त्र
- 18:22पढ़ने से, किसी गुरु के सुनने से तुमने मान लिया कि हाँ ऐसा होता
- 18:29है परमात्मा ये मान्यताएँ हैं। तो अगर कबीर कहते हैं कि अगर तुम
- 18:41वास्तव में उस रस का प्याला पीना चाहता है तो इन मान्यताओं को हलक
- 18:52कर दो अपनी। इस सिर को धड़ से अलग कर दो, इन
- 19:02मान्यताओं को बाहर फेंक दो, शीश को जुदा कर दो अथेली पे रख लो,
- 19:12बिना सिर के हो जाओ। और जैसे ही तुम बिना सिर के हो गए
- 19:20तुम पाओगे, वह तो पहले से ही मौजूद है।
- 19:31मान्यताएँ तुम्हें पहुंचने नहीं देती।
- 19:35क्योंकि मान्यताएँ वह पलकें हैं जो तुम्हारी आँखों के ऊपर बिछी
- 19:40रहती हैं। बस पलकें उठने के देर होती हैं,
- 19:50आँखें भीतर होती हैं। फिर तुम्हें सब नजर आता है बात
- 19:57पलकों की है पलकें झुकी हुई हैं पलकें बनते हैं तो तुम अंधे ये
- 20:08मान्यताएँ तुम्हारी पलकें हैं। इन पलकों को अड़चन मत भरने दो।
- 20:19ये देखने में दुविधा पैदा करती है।
- 20:23इन मान्यताओं को हटा दो समझाने के ढंग है।
- 20:32शी स तली पे सच में काट के रख लोगे तो कुछ नहीं होगा।
- 20:39लोग अपनी जीवभा को काली माता की चढ़ा देते हैं, वह मूर्ख हैं।
- 20:44लोग न तो काली माता है। नहीं, तुम सिर हो, दोनों ही
- 20:56मोड़ताएं काली माता भी तुम्हारी इमेजिनेशन है और तुम सिर हो यह भी
- 21:04तुम्हारी इलूशन है। इसलिए संत कहते हैं दोनों ही माने
- 21:13हैं तुम जब घोर सी आँखें खोल के देखोगे, इन पलकों को हटा के
- 21:22देखोगे तो पाओगे आँखें सदासी हैं। और तुम सदा से हो नहीं हो जहाँ थे
- 21:33कहीं गए नहीं कहीं जाते नहीं कहीं जा सकते नहीं आध सच जुगाद सच हेवी
- 21:41सच नानक हुसैन सच। हर व्यक्ति को, हर मनुष्य को हर
- 21:59पर ये अहसास होता है कि मैं अभी पूर्ण नहीं हूँ अपूर्ण हूँ।
- 22:16और यही अपूर्णता का एहसास तुम्हें पूर्ण होने की तरफ खींचता है
- 22:26चुम्बक की तरह फिर तुम पहुँच क्यों नहीं पाते।
- 22:36मनुष्य शरीर को इसलिए इतना भाग्यशाली माना गया कर्मी आवय
- 22:43कपड़ा नदरे मोख द्वार बड़े भाग मानस तन बाबा है।
- 22:55बहुत भागी शादी हो तुम जो मनुष्य का शरीर बाकी है, दो जन्मों में
- 23:03परमात्मा मिल सकता है और ज्यादा। एकाग्र वृत्ति से तुम एक ही जन्म
- 23:13में पा सकते हो, एक जन्म संस्कारों को तोड़ने में लग जाए
- 23:24और अगले जन्म में तुम संस्कार विहीन पैदा हो जाओ।
- 23:29तो अगले जनम में निश्चित रूप से तुम्हें मिल जाएगा अगर तुमने
- 23:35पिछले जनम में कोशिश की संस्कार विहीनता की तो तुम्हें इस जन्म
- 23:42में मिल जाएगा यह संस्कार क्या है?
- 23:49मान्यताएँ तुम्हारे संस्कार है, तुमने मान लिया कि मैं शरीर हूँ,
- 24:01तुमने मान लिया कि परमात्मा नहीं है तुमने मान लिया कि परमात्मा
- 24:08है। तुमने मान लिया कि ये भावनाओं, ये
- 24:13विचार, ये कर्म मैं करता हूँ। इन सभी को प्रबुद्ध व्यक्तियों ने
- 24:27संस्कार कहा। ये संस्कार तुम जन्मो जन्मो तक
- 24:36जोड़तें आए हो और इनकी एक बहुत मोटी तह जम गई है।
- 24:46अब तुम्हारे भीतर तुम्हारा असली स्वरूप नजर नहीं आता, मात्र
- 24:51तुम्हारे संस्कारों की परछाइयां नजर आती है, जो तुम हो नहीं,
- 24:59इसलिए हर व्यक्ति तुम्हें नकली नकली सा मिलेगा।
- 25:03हर व्यक्ति तुम्हें झूठ बोलता नजर आता है क्योंकि सत्य छिप गया है
- 25:09इस मैल के तहत संस्कार तुम्हारे मैल हैं, मान्यताएँ तुम्हारा मैल
- 25:19है। तुमने इस स्मेल को हटाना है कैसे
- 25:27हटाओगे कुछ तो लोग तुम्हें बता देंगे।
- 25:34इसलिए बड़ा सुंदर शब्द कहा कबीर ने।
- 25:38निंदक नी रे राखी है आँगन कुटी छवार जो तुम्हारी निंदा करता है
- 25:46वह तुम्हारे दुर्गुणों को पहचान लेता है, तो निंदक को।
- 26:00उसको जवाब नहीं देना रिएक्शन मत करना कबीर कहते नींद को अपनी
- 26:07झोपड़ी में पास ही बैठा लेना बिन साबुन बिन बारी के शक में।
- 26:18ना किसी सावन की, ना किसी पानी की तुम्हारा सारा मैल धुल जाएगा मैल
- 26:25या मान्यता तुम मान्यताओं का समूह हो तुम संस्कारों का समूह हो
- 26:34कितने वर्षों में तुमने कितने संस्कार?
- 26:38अपने ऊपर लीपलिए कैसे तुमने अपना सिली चेहरा छिपा लिया, कैसे तुमने
- 26:49मेकअप कर लिया? मेकअप की 150 तहे जमा ली।
- 26:57पता नहीं लगेगा तुम्हारा असली स्वरुप क्या है, यह तो मेकअप की
- 27:04परतें है जो दिखाई पड़ते है और अक्सर तो मेकअप के ऊपर ही पैदा हो
- 27:15जाते है। जबकि मेकअप तुम्हारा असली स्वरूप
- 27:25नहीं होता। आज हर व्यक्ति झूठा है इसलिए
- 27:32राजनीतिज्ञ हो गया है। हर व्यक्ति दुखी है, राजनीति के
- 27:40व्यक्ति सदा दुखी हो जाता है, संत सदा सुखी हो जाता है।
- 27:47संत कौन है जिसने अपनी सारी मिथ्या?
- 27:52भ्रांतियो को उखाड़ फेंका जड़ मून से अगर तुम्हें कभी सही गुरु की
- 28:03शरण स्थली मिल जाए तो चूकना मत क्योंकि सही गुरु का मिलन।
- 28:13एक दुर्लभतम घटना है और अभी कहीं खुश किस्मती से तुम्हें असली गुरु
- 28:23मिल जाए, सच्चा जिसने अपना स्वस्वरूप देखा।
- 28:32तो उसकी बातों को गौर से सुनना। महावीर कहते हैं, श्रावक बनो।
- 28:45महावीर कहते हैं, सच्चे शराबक बन मेरे पास बहुत से लोग आ जाते हैं,
- 28:54मैं कहता हूँ अरे भाई तू तो बहुत ज्यादा जानता है, तू अपना चैनल
- 28:57खोल ले। महंगाई के इस जमाने में तेरा पेट
- 29:03भी भरेगा, बच्चों का पेट भी भरेगा।
- 29:10तेरे हिसाब से तू पूछ तो गया ही है, अन्यथा कमेंट क्यों करता?
- 29:18तो फिर तू अपना चैनल खोलें। चैनल खोलें में कोई पैसे नहीं
- 29:22लगते। अगर नहीं खोलना आता तो मैं कोई ना
- 29:26कोई बंदा तो ये तेरा चैनल खोलने के लिए दे देता हूँ।
- 29:34भ्रांतियों से चिपटे हुए लोग मान लेते हैं कि मैं तो पहुँच गया।
- 29:43और यह सबसे खतरनाक वृत्ति है, सबसे खतरनाक वृत्ति है यह मान
- 29:55लेना कि मैं पहुँच गया। इसलिए मैं सदा से कहता हूँ सभी
- 30:04पहुँच जाएंगे, गुरु नहीं पहुँच सकेंगे क्यों?
- 30:10क्योंकि गुरु के भीतर तुमने बार बार यंत स्पर्श करके पांव छूम के
- 30:15पांव धो के उसका पानी पी के। बार बार उसे अहसास कराया कि तुम
- 30:21तो पहुँच गए हो और गुरु अपने भीतर।
- 30:26यह मान्यता बहुत गहरी ले जाता है कि मैं तो पहुँच गया, फिर गुरु की
- 30:37इस। बैराट हिमालय जितनी मान्यता को
- 30:43कौन तोड़ेगा वह झुकेगा कभी है नहीं वक्त जाया होगा।
- 30:55और ध्यान रखना, अगर एक जन्म में तुमने संस्कार इतने ज्यादा ऊंचे
- 31:01कर लिए प्रगाढ़ कर लिए तो वे जल्दी जल्दी टूटते नहीं।
- 31:09अगर तुम गुरु बन गए हो और तुमने पाया है नहीं।
- 31:19तो ना तो आनंद की झलक तुम्हें मिले ना आनंद का स्वाद तुम्हें
- 31:26पता ना आनंद का रस तुम्हें पता अगर आनंद का स्वाद पता होता।
- 31:35तो ये नाम दान देने वाले नाम दान क्यों देते?
- 31:39बना नाम में रस होता है। क्या अगर नाम में रस होता?
- 31:50तो सभी लोग वही नाम रख लेते हैं, फिर नाम अलग अलग क्यों हैं?
- 31:57फिर राम रहीम अल्ला वे गुरु सतनाम गौड़ ये क्यों अलग अलग हैं?
- 32:05नाम में रस होता नहीं। और तुम नाम को दान देते हो यानी
- 32:14कूड़ा करकट इकट्ठा किया। तुमने अपने ही गुरु से न उनको पता
- 32:20था, न तुमको पता है और न आगे तुम जीसको।
- 32:27गदियों पर बैठाओगे उनको पता है तुम जीस नानक के पीछे चढ़ रहे हो।
- 32:36उसके दो बेटे थे श्रीचंद्र और लक्ष्मी जी।
- 32:43लेकिन उन्होंने उन्हें गद्दी नहीं दे।
- 32:48लक्ष्मीचंद कहने लगे मैं योग्य हूँ पिता जी श्री और अक्सर बात
- 32:57अपनी गद्दी को पुत्र को दिया करता है।
- 33:03तो बाबा नानक ने कहा यह कोई राजनीतिक गद्दी नहीं है।
- 33:09पुत्र इट कैनट बी ट्रांसफर। यह ट्रांसफर नहीं हो सकती।
- 33:19अनुभव कभी ट्रांसफर नहीं किए जा सकते गद्दियाँ ट्रांसफर हो सकती
- 33:24हैं आनंद एक अनुभव है आनंद गुरु से शीशे में ट्रांसफर नहीं हो
- 33:35सकता। आनंद पैदा किया जा सकता है।
- 33:42भीतर से तुम्हें राह बता सकता है गुरु लेकिन आज मुसीबत तो यही है।
- 33:58तुम्हें रस नहीं पिलाया जाता, तुम्हें नाम दिया जाता है, दान भी
- 34:06दिया जाता है, तो नाम का और नाम में रस होता नहीं, फिर तुम अगर
- 34:14नीरस होकर संसार में भटकते फिरो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं
- 34:25क्योंकि तुम्हारे गुरु ने तुम्हें दिया ही नाम है और उस नाम में
- 34:32मिठास नहीं होता, मिठास होता है उस रथ में।
- 34:39जो सहज अपने भीतर जाकर, समादृष्ट होकर उस रस के प्याले को पीता है,
- 34:49फिर उसका स्वाद पता चलता है, नाम में कोई स्वाद नहीं होता है।
- 34:57बताओ खट्टा होता है, मीठा नाम कड़वा होता है, तीक्षण होता है,
- 35:06नमकीन होता है, कैसा होता है? नाम नहीं नाम कुछ भी नहीं होता।
- 35:16नाम दान करने वालों से सावधान यह तुम्हें भटका देंगे।
- 35:27इन्होंने मुझे भी भटकाया था। मैं ऐसे ही नहीं बोल रहा नाम की
- 35:39चरखड़ियां दिन रात मैंने गंवाई, लेकिन पाया कि थकावट के सिवा और
- 35:45कुछ नहीं एनर्जीलेसनेस। लेकिन तुम्हारी मान्यताएँ इतनी
- 35:54गहरी हैं, तुम कहते हो आह, हमने तो बैंक में अरबों नाम जमा कर
- 36:00लिए। सचखंड में जा के मन कर सचखंड होता
- 36:04है यह पाखंडियों की। और पुत्र जो तुमने लोभ के बारे
- 36:13में पूछा उन लोभियों की शरारत है, लोभ ही अपना हित साँधने के लिए
- 36:22तुम्हारा धन धन्य इकट्ठा करने के लिए तुम्हें नाम दान देते हैं।
- 36:32जिससे कभी कुछ मिला नहीं। किसी को कभी कुछ मिलता नहीं मिलता
- 36:40है। रस का पान करने से और रस का पान
- 36:45वह होता है जहाँ रस होता है। मैंने पहले भी कहा था वस्तुएं
- 36:52वहीं मिला करती हैं जहाँ हुआ करती हैं रस नाम में नहीं रस तुम्हारे
- 37:02अंतःस्थ में है उस अंतःस्थल के। अंदरूनी तल पर रस है।
- 37:13जब तक तुम उस तल पर नहीं जाते जहाँ रस बरसता है, झरना बनके तब
- 37:21तक उस रस का पान नहीं कर पाओगे। ये झूठे झूठे रस है।
- 37:28जैसे तुमने अपलिस्टिक के गुलाब के फूल बना ली और नकली नकली सुगंधें
- 37:36भी बना ली। इस अपलिस्टिक के फूल के ऊपर तुमने
- 37:40सुगंध इतर छिड़क दिया तो तुम क्या समझते हो?
- 37:47यह असली सुगंध है, नहीं, यह तुम्हारी कृत्य मैन मेड है असली
- 37:56नहीं है, यह मैन मेड है तुमने ही फैक्टरीस में गुलाब के फूल बनाए।
- 38:08तुमने ही फैक्टरीस में ये स्प्रे बनाया, छिड़ क्रिया इसके ऊपर और
- 38:15फिर तुमने कहा क्या बड़ा सुंदर है।
- 38:27लोभी गुरु, लोभी, गुरु लालची, चीरला, सीला तो किसी और नीयत से
- 38:37आता है कि मुझे रस का मान होगा लेकिन गुरु लोभी है आगे वह अटका
- 38:44रहता है तुम्हें। घर से तो हम चले थे खुशी की तलाश
- 38:58में। खुशी की तलाश में घमराह में खड़े
- 39:15थे। गुरु राह में खड़े थे वो।
- 39:19हिस्सा थे। हो लिए खुद दिल से दिल की बात कही
- 39:33और रो लिए। यूं धो लिए खुद दिल से दिल की बात
- 39:55कही और। रो लिए खुद दिल से।
- 40:02दिल की बात कही और रोटी खुशी तो मिली नहीं, बस दिल से दिल की बात
- 40:09कही, मान लिया की मैं सुखी हो गया।
- 40:14अब एक नया धर्म मुकजा है। एक बदमाश व्यक्ति कराची से कुछ
- 40:20लड़कियों को लेकर दौड़ाता हूँ। पिछले जन्म में उसकी शिकायत मेरे
- 40:27पास आई थी और वह आज भी इतना बड़ा वृक्ष बन गया है और मैं जानता हूँ
- 40:35कि यह है वृक्ष। जावे है क्योंकि इसको लगाने वाला
- 40:44व्यक्ति जाली था, बदमाश था, बेईमान था, लड़कियों से छेड़छाड़
- 40:51करता था। डेढ़ 200 लड़कियों का पुंज।
- 40:57जेल भी काट चूका था। एक विध्यासी उसने शादी भी कर ली
- 41:01थी और उसको जेल भी हुई थी। जेल काट के उसने धर्म बना लिया,
- 41:09यहाँ आ गया। ओर जाकर राजस्थान की माउंट आबू
- 41:16में बैठ गया। उस धर्म का नाम है ब्रह्माकुमारी,
- 41:30बस ये यही कहते हैं। मान लो सुबह उठ के।
- 41:34कि मेरे से खुशनसीब व्यक्ति कोई धरती पे है नहीं, लेकिन मैंने ऐसा
- 41:41कोई खुश नसीब नहीं पाया। इस संस्था में जो छाती ठोक के कहे
- 41:51के मैं सूखी हूँ। जब ऐसे लोग धर्मों को शुरू करने
- 42:03वाले बन जाएं, जिनके बीच ही खराब है तो सोचिएगा यह वट वृक्ष इतना
- 42:15विशाल? जहरीला होगा कि नहीं होगा?
- 42:20बिलकुल होगा एक बदमाश व्यक्ति ने एक पाखंडी ने एक सजा काटने वाले
- 42:31व्यक्ति ने। एक विधवा स्त्री को धोखा देने
- 42:36वाले व्यक्ति ने सुंदर बच्चियों को जैसे एपिस्टीन कांड में अब हुआ
- 42:46बहकाकर फूस लाकर। इकट्ठा किया और वहाँ से भाग गया।
- 42:53कराची और हिंदुस्तान तब एक ही था, पाकिस्तान बना नहीं था, जद्दोजहद
- 43:02शुरू थी तो मेरे पास ये मसला आया कि एक शरारती बदमाश व्यक्ति।
- 43:13बापू आप कुछ करिए, मैंने कहा देखो यह कोई प्राइऑरटी नहीं, इसको जीते
- 43:22रहे तो बाद में निपटेंगे। सबसे पहले उन करोड़ों भारतवासियों
- 43:28का सवाल है। जिनके हाथों में भेड़िया और रफाओं
- 43:31में भेड़िया कोशिश करनी है व कट जाएं, इनसे बाद में निपटा लेंगे।
- 43:42लेकिन निपटा नहीं गया मुझे। मार दिया गया और अब अब निपटने का
- 44:00मौका है तो मैं निपटा रहा हूँ। ये बदगुमानी में रहने वाले लोग
- 44:08हैं अगर सोचियेगा। अगर कोई गधा 1000 जन्म तक भी
- 44:18सोचता रहे कि मैं अरबी घोड़ा बन गया, मैं अरबी घोड़ा बन गया, मैं
- 44:25अरबी घोड़ा बन गया तो क्या बन गया?
- 44:30यह तर्क नहीं, यह सत्य है। तर्क तो तुम्हारी बातें हैं
- 44:34क्योंकि झूठी हैं। मुझे बताइए तो सुबह उठ के सबसे
- 44:43पहला पहला यह सोचते हैं कि हम दुनिया का सबसे खुश नसीब व्यक्ति
- 44:49हूँ। उनमें से कितने व्यक्ति हैं?
- 44:52जो खुश नसीब हो गए वो धक्के खाते हुए मैंने देखे हैं।
- 44:59मेरे पास भी कुछ बड़े औधों वाली ब्रह्मकुमारियाँ आती हैं।
- 45:08कभी फ़ोन पे पूछ लेती हूँ बाबा, इसका उत्तर क्या है?
- 45:15कुछ जैन धर्म में है, कुछ इसमें है, कुछ उसमें है, सभी धर्मों के
- 45:19लोग गाहे बगाहे क्योंकि मेरा फ़ोन नंबर आम लिखा होता है नीचे।
- 45:28तो बाबा बताना मत तो मैंने कहा नहीं बताऊँगा, बस नाम नहीं लूँगा
- 45:33किसा जरूर बता दूंगा सीधा पूछना आगे से जब कभी जाओ मैं जाने से
- 45:46नहीं रोकता कर सका। मैं परमात्मा हूँ, परमात्मा कभी
- 45:54किसी को रोका नहीं करता, मुझसे लोग पूछ लेते हैं ये कतल, ये
- 45:59गाहरत, ये हत्या, ये बलात्कार क्या तुम्हारी इच्छा सी होती है
- 46:04मैं कि नहीं? कहते फिर तो मैंने रोकते क्यों
- 46:10नहीं? मैंने कहा इसलिए कि ये स्वतंत्र
- 46:14है तो फिर रोकते क्यों नहीं? इसलिए नहीं रोकता।
- 46:22तुम्हें रोकना चाहिए। मैंने कहा मैं तुम्हारे बाप का
- 46:25बोला हूँ, क्यों? तुम दंड क्यों नहीं देते?
- 46:30मैं देता हूँ, दंड क्यों नहीं देता, आएँगे तो मेरे पास भी काम
- 46:38की बातें पूछा करो, व्यर्थ की बातें मत पूछा करो।
- 46:42रोकता नहीं और मैंने बहुत बार कहा, जीस वक्त मैंने अपनी
- 46:48साक्षित्व खो दिए। उसी वक्त पृथ्वी, सूर्य, सूर्य,
- 46:54मंगल, मंगल, बृहस्पति सारे आपस में टकरा जाएंगे।
- 46:59एक भ्रमंड दूसरे में दूसरा तीसरे में सभी भ्रमंड आपस में भिड़
- 47:05जाएंगे और जीसको तुम कहते हो कयामत कयामत की रात होगी।
- 47:17जैसे ही मैंने एक। एक पल के लिए अपना शाक्षित्व खोया
- 47:29ऑब्जर्वर न रहा? मैं एक पल के लिए तो दंड कैसे
- 47:35दूंगा? उस पल में जब मैं ऑब्जर्वर नहीं
- 47:38था? तो मैं न्यायाधीश भी नहीं होगा उस
- 47:43पल का उस पल में तुमने जो किया मुझे पता नहीं होगा क्योंकि मैं
- 47:51तो किसी को बलात्कार रोकने में गया था तो उस पल में मैं साक्षी
- 47:58ना रहा। उस पल में ओब्सर्वर ना रहा और जीस
- 48:04पल में ओब्सर्वर ना रहा टकरा जाएंगे।
- 48:07सभी आपस में तारे और धूल दूषित होकर खुदा करे कि कयामत हो और तू
- 48:16आए। हम इंतजार करेंगे क्या मतलब मुझे
- 48:27पूछ लेते हैं बाबा तुम भगवान हो तो फिर तुम रोकते क्यों नहीं?
- 48:33मैंने कहा रोक दूंगा जीस दिन मैंने क्या मत करनी होगी उस दिन
- 48:38रोक। यह भी मेरी इच्छा है ए भी दात
- 48:44तेरी दाता इसलिए मैं रोकता नहीं दो बातें हो जाएंगी।
- 48:54जब मैं रोकूंगा तो एक व्यक्ति एक ही समय में।
- 48:58दो काम नहीं कर सकता, ऑब्सर्वर नहीं रहूंगा तो मुझे पता क्या
- 49:05चलेगा उस पर में तुमने क्या किया और बाकी संसार में किसने क्या
- 49:12किया? सभी चूक जाऊंगा क्योंकि यह सब
- 49:16इंटरमिंगल्ड है। अगर एक ईंट हिलाई तो सारा महल
- 49:25लड़म से आ जाएगा नीचे। प्रभु जी ने ऐसे काये नातू आ गे।
- 49:40प्रभु जी ने ऐसी काये नात बांधी। 1 दिन के पीछे एक रात बांधी।
- 49:561 दिन के पीछे एक रात बांधी, साथ साथ बांधी प्रभु जे प्रभु जे ऐसी।
- 50:12कायनात है ये इंटरमीगल्ड। इसकी सब कड़ियाँ फंसी हुई हैं।
- 50:17एक कढ़ी खोली के गया तो मैंने कहा, जीस दिन मैं ऑब्सर्वर ना रहा
- 50:27उस दिन करता हो गया, तुम भी याद रखना ये फॉर्मूला तुम्हें दे रहा
- 50:34हूँ। जीस घड़ी तुमने ओब्सर्वरशिप खोई
- 50:43उसी घड़ी तुम करता हो गए। फिर वह काम हो, वैक्रोध हो, वह
- 50:50लोभ हो, वह मो हो, अहंकार हो, मद हो, मत्सर हो, वह हो, तुम उनके
- 50:56साथ एक आकार हो जाओगे और बस फिर तुम शरीर हो जाओगे।
- 51:04फिर तुम भावना ही हो जाओगे, फिर तुम विचार हो जाओगे और तुम खो
- 51:08जाओगे जीस घड़ी में तुम वासन के साथ एकाकार हो जाते हो, ज़रा
- 51:17सोचना उस घड़ी में तुम उपजर्वर रह पाते हो।
- 51:25इसे प्रैक्टिकल करके देखो, ऐसे ही अंधे बनकर मान मत लिया करो।
- 51:37इस आकाश में बादल आते हैं जब तक तुम।
- 51:42अपने में स्थिर रहे, बादल आएँगे, ठहरेंगे, गरजने वाले गरजेंगे,
- 51:51बरसने वाले बरसेंगे लेकिन तुम अपने आप में स्थिर रहना तुम ज़रा
- 51:58भी हिलना डुलना नहीं। और जैसे भी तुम हिले डुले तो तुम
- 52:04काम हो के ग्रोध हो के लोभ हो के मोह हो, इसीलिए तो तुम रोज़ फंसते
- 52:09हो, कभी लोग में फंस जाते, कभी काम में फंस जाते, कभी क्रोध में
- 52:14फंस जाते, कभी वह में फंस जाते। रोज़ मरते हो तुम रोज़ जीते हो
- 52:20तुम इसलिए यह भी आप अंडरलाइन कर लो जीस घड़ी तुमने अपना।
- 52:38साक्षित व खोया उस घड़ी तुम्हारे लिए प्रलय आ गई क्योंकि ये सारा
- 52:48इंटरमिंगल्ड है अपने आंख में बने रहना।
- 52:57कृष्ण भगवान ने यही कहा था अर्शनों का सती प्रज्ञ हो जा
- 53:04अर्जुन ओब्सर्वर हो जा अपनी प्रज्ञा में स्थित हो जा स्थित हो
- 53:12जा और ठहर जा और ठहरा ही रह। लोभ की वर्ती बिल्कुल ठीक कौन
- 53:26विराट होना नहीं चाहता सभी चाहते हैं लेकिन बुध की बुध की छाती।
- 53:40वास्तव में बड़ी विशाल थी सब कुछ होते सोते उसने खोल दिया छोड़ दी
- 53:45सब उसने कहा जितना मुझे मिला इतना काफी नहीं महसूस कर रहा हूँ मैं।
- 54:02मुझे लगता है कुछ पाने को और भी है छोड़।
- 54:09दे सारी दुनिया किसी के लिए। छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
- 54:27ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए प्यार से।
- 54:39भी जरूरी कई काम हैं प्यारी सब कुछ।
- 54:48नहीं। ज़िन्दगी के लिए छोड़ दे।
- 54:56सारी दुनिया किसी के। राजा बनना इससे भी जरूरी काम है।
- 55:06एक बुद्ध ने कहा कोई काँटा मेरे भीतर चुभता है।
- 55:14बरसों से चुभता है और मैं आज तक जान न पाया काँटा फूंस इसलिए मुझे
- 55:24यह हीरे ज्वारत मोतीमणियां यह तख्तोतास यह पुत्र स्त्री अछ बे
- 55:38भगोड़ा नहीं था। उसके भीतर की यह तमन्ना उसने पकड़
- 55:47ली कि मैं विराट होना चाहता हूँ। यह जो आज मेरे हिस्से में है, यह
- 55:55शुद्र है, यह अल्प है, यह थोड़ा है और मेरे भीतर की तमन्ना
- 56:04व्याराट होना है और यहाँ तो मैं बहुत वर्षों से देख रहा हूँ।
- 56:11सब हैं। भोगने को 10 दासियां हैं, नौकर
- 56:16चाकर हैं, जो चाहो वो खा लो, पी लो घूम लो फिर लो भोग लो, लेकिन
- 56:26वो तृप्ति कहाँ है? वेरी दी सटिस्फैक्शन तो बुध को
- 56:38सटिस्फैक्शन नहीं मिले तो उसका अंतर कहता है कि प्यार से भी
- 56:44जरूरी है कई काम है प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए।
- 56:55यह कुछ ऐसा था जिसने सब कुछ दांव पे लगाने को बाध्य कर दिया बुद्ध
- 57:00को और यह सच था कोई ख्वाब न था क्योंकि ख्वाबों से कभी आदमी
- 57:08छोड़ा नहीं करता। जब सुर चुभता है हृदय में और सुर
- 57:14चुभता ही चला जाता है तो इते बड़े बिराक सिंघासनों को लात मारी जाती
- 57:28है अन्यथा तो हम। भीख का कटोरा लिए फिरते हैं कि
- 57:33मुझे राजा बना दो, मुझे राजा बना दो, लेकिन तुम्हारी तमन्ना बहुत
- 57:41बराठ होने की है जहाँ तुम कुछ मांगना नहीं चाहते, जहाँ मांगने
- 57:48की तमन्ना समाप्त हो जाती है। जहाँ सिर्फ़ तुम होते हो विराट,
- 57:55विशाल, विशाल तुम होते हो और तुम ही तुम होते हो।
- 58:01जिसे बाबा नानक ने कहा ए कुनका जहाँ न गम है, न बैर है, न बैर
- 58:09है। ना कोई फिकर है ना छिनता है, ना
- 58:14कोई आग है, ना कोई शस्त्र है, ना कोई शास्त्र है।
- 58:27लोभ की तमन्ना भीतर से आती है। और वह तमन्ना है पूर्ण होने की
- 58:35तमन्ना यह सभी के भीतर होती है। जैसे ही व्यक्ति मानव शरीर में वह
- 58:45चेतना आती है, जो पात्र से चली थी, मुझे रोज़ सुनने वाले समझ गए
- 58:52होंगे। वह चेतना जो वात्र से चली थी, वह
- 59:00मानव जाम में आ गई। उसकी तमन्ना फिर भी पूरी न हुई।
- 59:05उसके भीतर फिर भी एक काँटा चुभता ही रहा।
- 59:11बस कैसे मैं पूर्ण हो जाऊं? 100% कान्शस्नस कैसे हो जाऊं कैसी
- 59:20जागृति? परम जागृति टोटली कैसे हो जाऊं।
- 59:28यह प्रश्न सूर्य बनकर चुभने लगाऊं।
- 59:42ठीक है तुम तो प्रश्न तो तुम्हारे भीतर भी उठते हैं, तुम तो भिक्षा
- 59:49पात्र उठाते हो, तुम्हें पता नहीं यह आवाज कहाँ से आती और कहाँ से
- 59:56मिलेगा यह विराट साम्राज्य? बस दिशा ही तो तुम्हें पता नहीं
- 1:00:03होता और दिशा ही तो गुरु ने देनी होती है और दिशा ही देने वाले तो
- 1:00:12सब मर गए। नाम दान देने वाले रह गए।
- 1:00:18दिशा देने वाले सब खामोश चाचा जान के दिन तो किसी तरह गुजर जाता है,
- 1:00:29ये रात क्यों आ जाती है? तुम्हें वहीं जाना होगा जहाँ पर
- 1:00:44चीजें मिला करती हैं वह तुम्हारे अंतर में है, तुम उसको नाम में मत
- 1:00:56ढूँढना ना किसी को मिला ना मिलेगा।
- 1:01:03और अगर किसी को मिला तो मैं जिंदा हूँ मुझे बता दे कब से पुकार रहा
- 1:01:09हूँ मैं जीसको मिला है, वो आ जाओ और जीसको अपने भीतर जाने से मिला
- 1:01:18है, वो मैं बैठा हूँ। वह निर्मोही हो जाता है।
- 1:01:29हाँ, निर्वासन हो जाता है अगर मेरे में वासन होती।
- 1:01:37तो क्या बाहर घूमने फिरने की वासना मेरे मन क्या मैं लूला
- 1:01:42लंगड़ा अगर बाहर के मनोहारी दृश्य देखने की कामना मेरी होती तो क्या
- 1:01:52मनोहारी दृश्य नहीं है? लेकिन क्या खो गया खोया, कुछ नहीं
- 1:02:00मिल गया। कुछ कुछ मिलने से तमन्नाएं खो
- 1:02:06जाया करती हैं और वह मिला करता है क्या आनंद का रस।
- 1:02:14आनंद का रस जैसे मिल गया उसकी तमन्नाएं ओके सब कुछ होते सोते
- 1:02:23मैं फिर क्यों नहीं कुछ खाता? क्या रसगुल्ला, गुलाब जामुन मिलता
- 1:02:27नहीं सारी हलवाई की दुकानों पर मेरा?
- 1:02:34डब्बा जाता है जो बच्चा बनाता है। मेरा बच्चा यही काम करता है।
- 1:02:41मैं हराम की नहीं, खाता हलाल की खाता है, कबीर की तरह खुद का
- 1:02:48चादरिया बना के। और सब की दुकान पर रसगुल्ला भी
- 1:02:55है, गुलाब जामुन भी है, पिन्नी भी है, बर्फी पेड़ा भी है, चमचम भी
- 1:02:59है, लेकिन फिर मेरा मन क्यों नहीं कर सका?
- 1:03:03निकल सही है? कोई जीव के रोग नहीं हुआ, कोई पेट
- 1:03:11का रोग नहीं है। फिर मैं क्यों नहीं जाता बाहर?
- 1:03:17फिर मैं क्यों नहीं भोगता कुछ? क्योंकि विराट कभी कुछ नहीं भोंगा
- 1:03:24करता। विराट 100% हो जाता है और जो 100%
- 1:03:32हो जाता है। वह कुछ और जोड़ने की तमन्ना नहीं
- 1:03:36रखता, वह निरलोभिक हो जाता, तुमने पुत्र पूछा कि लोक पर नहीं बोला?
- 1:03:50आज मैंने लोक पर पूरा व्याख्यान दे दिया।
- 1:03:55भीतर की तमन्ना सबके उठती है। जैसे ही मानस जनम में तुम आओगे
- 1:04:01विराट होने की तमन्ना सिर्फ मानस जनम में उठती है, क्योंकि मैं सभी
- 1:04:06योनियों में रहा हूँ, मैं गधा भी रहा हूँ।
- 1:04:12कुत्ता भी था। अमीबा भी था।
- 1:04:15मैं पेड़ पौधा भी मेरी इच्छा के नीचे कितने महान पुरुष बैठकर
- 1:04:23आत्मभान हो गए और मैंने देखा कि सिर्फ।
- 1:04:33मानस जामे में विराट होने की तमन्ना उपजती है बाकी किसी जन्म
- 1:04:38में नहीं उपजती और मैं अपने अनुभव से पूरा करता हूँ जो बोलते हैं
- 1:04:47मैंने जाना और पाया। इसलिए मानस का जन्म इतना अद्भुत
- 1:04:53है। बड़े भाग मानस तन पावा क्योंकि
- 1:05:01विराट होने की तमन्ना इसी जमी में जगती है तो लोग तो पुत्र उठेगा।
- 1:05:10लेकिन दिशा देने वाले तुम कहाँ से खोजोगे मुझे कोई नजर आता नहीं
- 1:05:16बेटा मुझे चारों तरफ घोर अंधकार नजर आता है।
- 1:05:26उस रात बाबा को भी घोर अंधकार नजर आया जो उन्होंने मुझे कहा कि उठो
- 1:05:33बोलो मैंने कहा बाबा पी लेने दो और ज़रा।
- 1:05:39सी दे दे साखी और ज़रा सी। कैसे रहूं चुपके मैंने पी ही क्या
- 1:05:51है होश अभी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और।
- 1:06:08बाबा ने कहा और बोलने वाला कोई है, नहीं तो मुझे जैसे लखनऊ वोल्ट
- 1:06:21का झटका लगता है। ऐसा लगा।
- 1:06:26हैं, कोई और नहीं है तो ये जो बैठे यूट्यूब पर बाबा कहते हैं सब
- 1:06:33शब्दों के अर्थ निकालने वाले हैं। शब्दों के अर्थ निकालने वाले हैं,
- 1:06:43सभी व्याकनाचार्य हैं सभी। आ जा रहे हैं।
- 1:06:50सभी सर रहे हैं सभी अनुभव कोई नहीं।
- 1:07:00फिर मुझे उठना ही पड़ा और तबका उठा उठा।
- 1:07:11मैं बोलता ही चला गया एक बात समझ लेना पुत्र, लोभ विकार नहीं, लोभ,
- 1:07:26ऊर्जा इस ऊर्जा से तुमने विराट हूँ ना ये तुम्हें जगाने के लिए
- 1:07:34है। लेकिन तुम उलझ जाते हो तुम्हारे
- 1:07:38गुरुओं के कारण तुम्हारे गुरु कहते हैं अरबों जाप कर लो आज
- 1:07:45मैंने देखे हैं राम नाम के भंडार खरबो खरबो खरबो।
- 1:07:53और वह अपने आप को शहंशाह है आलम कहलाते हैं ऐसा भी बुरा ज़माना
- 1:08:00आएगा सन्तु ने सोचा नहीं आ गया लोभ का तिरस्कार मत करना।
- 1:08:13यह तुम्हें जगाने आया, जगाने आया कि तुम शूद्र हो, विराट हो जाओ और
- 1:08:21तुम विराट हो सकते हो। अगर विराट तुम नहीं हो सकते तो
- 1:08:26कभी लोग नहीं कहता था। क्योंकि यह लोग उठता ही विराटता
- 1:08:31से है। विराट तुम्हें पकारता है कि उठो
- 1:08:37तुम मानस के जामि में हो, अब तुम विराट हो जाओ, अब तुम अनंत हो जाओ
- 1:08:43असीम हो जाओ, अब तुम लिमिटलैस हो जाओ।
- 1:08:50बहुत हुआ बहुत शोली है अब, जागने के वेला आगे जाग जाओ यह शराब ना
- 1:08:59पियो का कमेंडमेंट लगाने वाले मूर्ख जानते ही नहीं।
- 1:09:07के यही तो तुम्हारा अंजाम है यहीं तो जाना है तुमने जहाँ शराबों का
- 1:09:16बोतल नहीं सागर ही है। मुक्तों की शाम आज एक जाम बन गई।
- 1:09:28मुद्दतों की शाम आज एक जाम बन गई। एक खुशी की शाम शाम इंतकाम बन गई।
- 1:09:41जो बात हमें तुम में थी। जो गुरु शिष्य में बात थी, जो बात
- 1:09:49हम में तुम में थी वो बात आम हो गई, वो बात हम में तुम में थी।
- 1:10:00वो बात आम हो गई। और ज़रा सीधे देसाखी और ज़रा सी
- 1:10:10कैसे। रहूं, चुपके मैंने पी ही क्या है
- 1:10:14होश। अभी तक है बाकी और ज़रा सीधे
- 1:10:20देसाखी और। ये लोग है पुत्र इस लोभ को जगाना,
- 1:10:30इस लोभ को सही रास्ते पे लगाना, किसी डेरे वालों के चंगुल में मत
- 1:10:38फंस जाना। और मैं तुम्हें ये भी नहीं कहता
- 1:10:42कि किसी ठेके वाले की जंगल में फंक्शन इन दोनों से बचना।
- 1:10:49ठेके वालों से बचना, डेरे वालों से बचना फिर कहाँ जाना?
- 1:10:58यह है शराब का दरिया तुम्हारे भीतर अपने भीतर उतर जाना चुप्पी
- 1:11:08के उस आलम में मौन होकर बिना कोई शब्द कहे शब्द छोर है।
- 1:11:17तो मौन हो जाना अपने भीतर खिसकना और धीरे धीरे धीरे धीरे तुम पाओगे
- 1:11:26ये ठेका नहीं वहाँ समुद्र मिल गया तुम्हें वह शराब का ही समुद्र है
- 1:11:33जो एक बार पीने से फिर कभी उतरता नहीं जो बाबा ने कहा था।
- 1:11:38जिन्हें नशे जहान दे उतर जान पर बात नाम खमारी नान का चढ़े रहे दल
- 1:11:45रात नाम वो तल है जान से गुंजार होता है अहंकार उस तल पर।
- 1:11:57शराब का नशा झरनों की तरह बहता है तो तुमने ना तो इन ठेकों वालों की
- 1:12:07शराब में उलझनाएं? ना ढेरों वालों की उलझन में
- 1:12:20पड़ना। जे शराब का दरिया तुम्हारे भीतर
- 1:12:26बहता है भीतर उतरो बड़ा सहज है, इतनी मशक्कत न करो, छोड़ दो।
- 1:12:35इतनी मशक्कत की कोई अवस्था नहीं, आवश्यकता नहीं, स्वयं के पास जाने
- 1:12:40के लिए कोई यात्रा नहीं करनी मुझे तुम ही हो वो सुरूर ए दरया।
- 1:12:53पता है तुमको राज़ क्या है? मेरे इस सरूर का पता है तुमको
- 1:13:05राज़ क्या है मेरे इस सरूर का। के इस सरूर में ज़रा सा रंग है
- 1:13:15गुरूर। का जो मैंने पी तो क्यों नशा वो
- 1:13:23तुम्हारे सामने मैं असली शराब पी के बैठ गया जो मैंने पी तो क्यों
- 1:13:30नशा? उतर गया हुजूर का?
- 1:13:37जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर? गया हुजूर का और ज़रा सी दे दे
- 1:13:47साखी और ज़रा सी। कैसे रहूं चुप के मैंने?
- 1:13:55पी ही क्या ये लोभ लोभ है? मनुष्य के जाम में आके इसको
- 1:14:05धिक्कारना मत यह ऊर्जा है। इसकी राह बदलना है।
- 1:14:10तुमने डायरेक्शन मोड़ देना है अपनी तरफ, बाहर नहीं ना डेरों की
- 1:14:20तरफ, ना ठेकों की तरफ, बस वहाँ जाओ।
- 1:14:26जहाँ शराब मिलेंगे तुम्हें वहाँ बोतलों में नहीं, वहाँ दरियाओं
- 1:14:33में मिलती है, समुद्रों में मिलती है।
- 1:14:39खाये। काहे रे बन खो जिन जाए?
- 1:15:01काहे रे बनु को जनजा सरबया की सदा अलेपा?
- 1:15:20सर्व बयापी सदा अलेपा तोहे संग समर तोहे।
- 1:15:37संग समर काहे रे, काहे रे बन को जन जाए काहे रे?
- 1:15:56बन को जनजा। धन्यवाद।