Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Aug 25 - Secrets: क्या गायत्री मंत्र सुनकर व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकता है? 1 साल में घर तीर्थ बन जाएगा!
Transcript
- 0:04विद्यावंती बाबा जी चरस वर्ष कल के प्रवचन में आपने कहा।
- 0:22कि गायत्री मंत्र का जाप सिर्फ दीक्षित लोग ही करें, उन्हें ही
- 0:31लाभ मिलेगा। दूसरे व्यक्तियों को नहीं मिलेगा
- 0:41दूसरा क्वेश्चन? जो दीक्षित नहीं हुए हों, उनके
- 0:49लिए आपने हल क्या पूछा है? तीसरा प्रश्न क्या गायत्री मंत्र
- 0:58को सुनने से व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकते हैं?
- 1:16ठीक कहा, पुत्र। और मंत्रों की तरह गायत्री मंत्र
- 1:24की भी दीक्षा होती है। दीक्षित गुरु से ही गायत्री मंत्र
- 1:35लेना चाहिए। दीक्षित का अर्थ क्या होता है?
- 1:44जिसने गायत्री की रूह छू ली है, जिसने गायत्री का चरम लक्ष्य पा
- 1:56लिया है। गायत्री का चरम लक्ष्य क्या है?
- 2:09मैंने अपने कर्म की थ्योरी में आपको दो प्रकार के कर्म बताए पड़ा
- 2:16रब कर्म जो हम कर चूके तीर कमान से निकल गया वापस नहीं किया जा
- 2:25सकता। उसका फल हमें भोगना ही पड़ेगा।
- 2:31दूसरा होता है क्रिया महान कर्म जो हम अब करेंगे तीसरा होता है
- 2:40दूसरों के द्वारा किया हुआ कर जैसे कोई अचानक से हम पे।
- 2:51कुछ गलत प्रभाव की रेंज डालते हैं।
- 2:56ये चौकी, संग्रहणी, कृत्या वगेरह वगेरह जिन्हें नेगेटिव एनर्जी
- 3:03कहते हैं वो छोड़। कुछ व्यक्ति होते हैं दुष्ट
- 3:10सौभाग्य जो जीना भी नहीं चाहते और जीने देना भी नहीं चाहते ऐसे
- 3:21व्यक्तियों को प्रभाव। से बचने के लिए गायत्री अभाव के
- 3:27शस्त्र है। अब आइये इन तीन बातों के ऊपर हम
- 3:36व्याख्या करें जो कर्म हो चूके है।
- 3:46उनका फल हम भोगेंगे देर अवेर जब पक जाएगा बीज वृक्ष बनेगा फल
- 3:55लगेंगे फल पकेंगे फल गिरेंगे, धरती पे हमे खाने ही पड़ेंगे।
- 4:03हमने बोली थी क्रियावान कर इतने सजग हो जाओ कि तुम आगे से वो गलती
- 4:10न करो। जो व्यक्ति सजग होता है उससे गलत
- 4:21करम होते ही तीसरा। दूसरों के द्वारा फेंके गए
- 4:32नेगेटिव एनर्जीज़ के करम किसने गलत सोच लिया तुम्हारा?
- 4:44देखिए जंक्चर पॉइंट के। साधारणसा में अपनी भाषा में बोल
- 4:48दे जंगचिर प्लांट के ऊपर तो जो व्यक्ति बोलेंगे वह तो हो जाएगा,
- 4:55उसको नहीं रोकेगा गायत्री लेकिन जंगचिर प्लांट में पहुंचने वाला
- 5:00ये काम करेगा और बहुत सी चीजें हैं मांगने को करने को।
- 5:08अपना भाव खत्म करेगा, अपनी जरूरतों को पूरा करेगा, अपने
- 5:14लक्ष्यों को सादेगा वह किसी का एक कल्याण नहीं करेगा और उससे ऊपर।
- 5:24जंक और पॉइंट से ऊपर 2 साल ऊपर तक जो व्यक्ति सोचेगा उसका कोई फैक्ट
- 5:31नहीं पड़ेगा, जिसके घर में गायत्री चलती है या जो गायत्री को
- 5:37सुनता है। अब जहाँ फर्क पड़ेगा थोड़ा सा
- 5:39समझना इस बात को। जो व्यक्ति दीक्षित नहीं है वो घर
- 5:47में पुजारों में दीवारों को सुना सकते हैं क्योंकि इसके भीतर शब्द
- 5:53नहीं रेंज भी है। दीवारें उन रेंज को पी जाएंगी।
- 5:59तुम जब यहाँ आते हो। सभी कहते हैं बाबा यहाँ से जाने
- 6:05का मन नहीं करता। क्या होता है ऐसा तीर्थों पे तुम
- 6:10जाते हो मन उचक जाता है। कब वापस चले घर?
- 6:16वहाँ भी मन नहीं लगता क्यों? यहाँ क्यों मन लगता है?
- 6:23महीनों तक यहाँ सादक बैठे रहते हैं।
- 6:27मन नहीं उछलता क्यों वो किरणें आसानी तरंगें जो किसी बौद्ध पुरुष
- 6:38के अंत स्थल से आती हैं। और दीवारें उनको पी जाती हैं, वो
- 6:46दीवारें बुद्ध पुरुष के जाने के बाद भी यथावत बनी रहेंगी।
- 6:54हजारों हजारों सालों तक इसीलिए। कुंभ को आज भी मनाया जाता है।
- 7:06कोई कालवेला थी जब कोई व्यक्ति के भीतर अमृत उतरा था, हर की पूड़ी
- 7:15नासिक में क्या ग्रास में हरिद्वार में?
- 7:22इन चार स्थानों पे व्यक्ति प्रबुद्ध हो जाते हैं, अलग अलग
- 7:27वक्त में इसलिए अलग अलग वक्त में ये कुंभ के मेले भरे जाते हैं।
- 7:40जहाँ अमृत एक बार घटना घट गई और घटना इतनी वृहद होती है, इतनी
- 7:50विराट होती है कि अमृत जैसे बिखर जाता है, धरती पी लेती है।
- 7:58दीवारें पी लेते हैं, वृक्ष पी लेते हैं, वायुमंडल पी लेता है,
- 8:06अगर किसी नदी के किनारे हो तो नदी के किनारे पी लेते हैं, स्थान पी
- 8:17लेता है। फिर तुम दीक्षित हो या नहीं हो,
- 8:22दीवारों के इससे फर्क नहीं पड़ता। जो व्यक्ति यहाँ पर आता है वह
- 8:28दीक्षित होने से पहले तो दीक्षित नहीं ना होता लेकिन आते ही वो
- 8:34झूमने लग जाता है। कार्य में ये तरंगें।
- 8:40ये आसानी तरंगों को वह पीता है। यद्यपि अभी दीक्षित नहीं हुआ है
- 8:48तो जो लोग दीक्षित नहीं हुए हैं इसको पूजा रम में चला सकते हैं,
- 8:53दीवारों को पैला सकते हैं तुम्हारा घर।
- 8:57तुम्हारा घर शक्ति संपन्न हो जाएगा, नेगेटिविटी को दूर भगा
- 9:03देगा। जो नेगेटिव व्यक्ति आएगा उसके
- 9:07तिरंगों को काट देगा। अनगणित फायदे हैं दीवारों को
- 9:13पिलाने के भी। तुम दिक्षित नहीं हो, बात सारी
- 9:19तुम्हारी है, तुम मालिक हो दीवारों के और तुम ही दुखी हो
- 9:27अभाव से, पीड़ा से, दर्द से, तनाव से, चिंता से, व्याध्यों से।
- 9:35रोगों से, कष्टों से, क्लैशो से कितनी तकलीफें हैं तुम्हें
- 9:46दीवारों को शुद्ध होने से तो जब तुम वहाँ जाओगे और दीवारें फुल
- 9:54चार्ज होंगे। तो तुम वहाँ जाकर आराम से बैठ
- 9:58सकते हो, फिर तुम कोई मजार, कोई तीर, कोई ऐसा स्थान ढूंढने की
- 10:06जरूरत नहीं पड़ेगी जहाँ बैठकर तुम ध्यान मग्न हो सको, तुम्हारा घर
- 10:11ही तीर तो बन जाएगा। साल 2 साल में तुम्हारी साज़
- 10:18दीवारें सतें फर्श सब चार्ज हो जाएं, यह घर जीता जागता तीर्थ हो
- 10:26जाएगा। ये बाबा हम तो दीक्षित नहीं होगा
- 10:39हम क्या करें तुम अभी घर की को दूर करो बात रही दीक्षा की भक्त
- 10:55आने पे आपको दीक्षा भी मिल जाएगी दीक्षा के बाद।
- 11:01तुम संपर्क में आना शुरू हो जाना तुम सुन तुम्हारे सुनने से
- 11:10तुम्हारी व्याधियां, अभाव, कष्ट, क्लेश, रोग, पीड़ा, चिंता, तनाव
- 11:16ये समाप्त होने शुरू हो जाएंगे। लेकिन एक बारगी अगर तुम दीक्षित
- 11:23नहीं हो, तुम इसे चाहो तो घर में चला सकते हो
- 11:40जब दीक्षित नहीं हो दीक्षा के लगातार बैच हम निकाल रहे हैं अभी
- 11:4611 अगस्त को है। अभी तीन वर्ष पुराने जिन लोगों ने
- 11:52अप्लाई किया था, उनको बुलाया जा रहा है।
- 12:00पिछले 2 साल 5 साल पहले जिन्होंने अप्लाई किया था, वह हमने दीक्षित
- 12:06कर दिए हैं। तीन वर्ष पहले के हम उठा रहे हैं।
- 12:13आप भी अप्लाई करते वक्त पे आपको भी दीक्षा मिल जाएगी।
- 12:22इसका एक सरल साधन भी हो सकता है। वह ऑफलाइन दीक्षा से पहले।
- 12:31तुम ऑनलाइन दीक्षा ले लेना ऑनलाइन दीक्षा में ज्यादा वक्त नहीं
- 12:37लगेगा। आपको थोड़ी देर में महीने दो
- 12:42महीने में आपको ऑनलाइन दीक्षा मिल जाएगी, क्योंकि ऑनलाइन के भी लिए
- 12:50भी। हमें आज्ञा तो लेनी ही पड़ती है
- 12:55जो संभालेगा आपकी जिंदगाने को हम रहें ना रहें, वह रहेगा उसका
- 13:06संसार कहीं जाने वाला है नहीं। और वह भी कहीं जाने वाला है नहीं
- 13:12ना वह मिटेगा, ना उसकी सृजना मिटेगी।
- 13:17जब उसने अपने हाथों में कमान ले ली, उसने एक्सेप्ट कर लिया।
- 13:24आपको तो आपको बुला लिया जाएगा। ऑफलाइन दीक्षा दे दी जाएगी।
- 13:31अगर एक्सेप्ट कर लिया तो आपको ऑनलाइन दीक्षा भी मिल सकती है।
- 13:36ऑनलाइन दीक्षा लेने के बाद आप इसको सुन सकते हो, सुन तो वैसे भी
- 13:40सकते हो लेकिन होगा कुछ नहीं, फिर उसका फायदा फिर कोई।
- 13:48इसलिए मैंने बोला कि नाम दीक्षित लोग सुने मत सुनेंगे तो रेंजेस का
- 13:59प्रभाव पड़ेगा जैसे कि संत व्यक्ति के बोलने के पीछे।
- 14:09उससे लिप्त हुई आनंद की किरणें आती हैं।
- 14:14शब्दों के पीछे पीछे जैसे फूलों की सुगंध हवाओं के साथ लिपट के
- 14:23जाती है। हवाएं खुद से सुगंधित नहीं होती,
- 14:31हवाएं फूलों को टच करती हैं तो फूलों की सुगंध, सेंस हवाएं पकड़
- 14:40लेती हैं। फिर वो।
- 14:43संघ संग लिए चलते हैं और आपके नसा पुटों को सुगंधित कर देते हैं,
- 14:50ऐसा ही होता है जब संत बोलता है वाणी में कुछ नहीं है।
- 15:00वाणी तो हम रोज़ बोलते हैं, सभी लोग बोलते हैं, धरती के क्या होता
- 15:04है, कुछ नहीं होता है, लेकिन संत भी जब बोलेंगे अकेला बिना प्रभुद
- 15:12हुए तो कुछ नहीं होगा। उस सट्टा चपे जाकर बोलेंगे।
- 15:21जैसे हमने नहर में डुबकी लगा ली है, क्या हम नहर में डुबकी लगाने
- 15:27के बाद सूखे सूखे बाहर आ जाएंगे? नहीं आएँगे हम भीग कर आएँगे बाहर।
- 15:38बस यही होता है आवाज़ के साथ आवाज़ वही होती है, गुणवत्ता बदल
- 15:46जाती है क्योंकि तुमने उस अमृत के सरोवर में छलांग लगा दी।
- 15:53तो शब्द जो आते हैं संतो के प्रवाह से उस तल से लिप्त हो के
- 16:00आते हैं उस तल की लिप्तता को फूलों की सुगंधि की तरह संग लेके
- 16:07आते हैं फिजाओं से महकती हुई वो हवाएं।
- 16:14तुम एक तृप्त कर जाती हूँ। ये है सारा इसके पीछे का विज्ञान
- 16:21रेहस आपका प्रश्न जो नाम दीक्षित व्यक्ति क्या करें?
- 16:36ऑनलाइन दीक्षा का इंतजार करो जब तक ऑफलाइन आपका नंबर नहीं आता
- 16:42ऑनलाइन जल्दी मिल जाएगी। आपको ऑनलाइन से तुम सुन सकोगे।
- 16:47सुनने के अधिकारी हो जाओगे और वही प्रभाव होगा दीक्षा के संबंध में।
- 16:57ऑफलाइन का एक प्रभाव होता है। क्या ऑफलाइन में तुम अगर दीक्षित
- 17:06हो गए तो फिर तुम प्रबुद्ध होने के योग्य हो गए?
- 17:15ऑनलाइन दीक्षा के बाद अगर तुम मुझे सुनोगे तो मेरे शब्दों के
- 17:19पीछे की धार जो रंग की आई उस तल की महकों से।
- 17:30और तुम्हें सुगंध मान करेंगी मात्र लेकिन तुम प्रबुद्ध नहीं हो
- 17:40पाओगे। प्रबुद्ध होने के बाद विधिवत
- 17:47दीक्षा लेनी जरूरी है। इसलिए एक शब्द दीक्षा आया।
- 17:55गुरु दीक्षा गुरु जब दीक्षा देता था, आपको मंत्र देता था, उसे गुरु
- 18:05मंत्र कहते थे, दीक्षा का मतलब हुआ।
- 18:12के इस संमंत्र में गुरु ने कुछ प्रवाहित कर दिया है।
- 18:18काम करेगी वो शक्ति शब्द काम नहीं करेगा, काम करेगी वो शक्ति जो
- 18:27मंत्र के भीतर भरी गई। कैसे देखो आप आपके पास शिप होती
- 18:34है? खाली हो तो उसमें कुछ भी नहीं
- 18:36बचेगा, लेकिन उसमें अगर भर दिया जाए सब कुछ तो जो कुछ डाला उसमें
- 18:44अपने शक्ति के रूप में शब्द के रूप में।
- 18:51और सारा कुछ बोला जायेगा ये डेटा नहीं होते आपके इतने जीबी, इतने
- 18:55जीबी, ये कहीं स्टोर कर लिए जाते हैं।
- 19:02ऐसे ही तुम्हारे भीतर आनंद का डेटा है और वो कोई जीबी वगैरह
- 19:09नहीं है। वह अनंत है, उसका कोई मेज़रमेंट
- 19:15नहीं है, उसका कोई मापतौल नहीं है।
- 19:23वह विराट वह कहीं चुकता नहीं। तुम्हारा रोज़ का डाटा चूक जाता
- 19:32है? तुम्हारे भीतर का आनंद का डाटा
- 19:38कभी नहीं चूकता, इसलिए वह कभी नहीं चूकता, जिससे तुम परमात्मा
- 19:44कहते हो। कितना ही निकाले जाओ।
- 19:49वह चुकता नहीं किसी के संदर्भ में ईशा वर्ष का यह शब्द हाँ फर्क हो
- 20:06सकता है हो सकता है किसी और का हो।
- 20:11पूर्णमदाह पूर्णमिदं पूर्णमद पूर्णमदध्यक्षय पूर्णस्य पूर्ण
- 20:17महादाय पूर्ण में वापस शिष्य थे। उस पूर्ण में से पूर्ण भी निकाल
- 20:23लिया डाटा की बात पर ध्यान रखना। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल
- 20:30लिया जाए तो पूर्ण ही शेष बजता है।
- 20:33उसको तुम कभी रीता नहीं कर सकते हो और मज़े की बात अगर उसमें से
- 20:39एक गागर निकाल ली तो गटेगा नहीं एक गागर यही विशेषता है, यही
- 20:45विलक्षणता है उसकी? वह घटता नहीं, उसमें एक गागर और
- 20:51गिरा दोगे तो वह बढ़ता नहीं। यह परमात्मा के लिए शब्द थे वे ना
- 21:01चुराया जाता, ना घटाया जाता ना बढ़ाया जाता।
- 21:07उस पूर्ण में से अगर पूरा भी निकाल लो पूर्णस्य पूर्णमाग आए तो
- 21:11पूर्णमेवा विशिष्यते पूर्ण ही बचता है।
- 21:14ये बातें समझ में आएँगे नहीं इसलिए संत कहता है समझ को पहले
- 21:19बाहर रख दे ये गणित वगैरह जो करेगा।
- 21:25वो पहुंचने की उम्मीद तो न करें, हिसाब किताब लगाने वाले लोग उस
- 21:33आनंद के गहरे तल को छूने की कामना न करें, सब मिल जाएगा, पदार्थ मिल
- 21:40जाएगा, गद्दियाँ मिल जाएंगी, मान सम्मान मिल जाएगा।
- 21:43लेकिन आनंद के वो छाया तृप्ति न मिलेंगे, अमृत न मिलेंगे और अगर
- 21:50देखा जाए तो आनंद के सिवा तुम्हारा कुछ खजाना होता भी है,
- 21:58तुम स्वभाव से आनंद हो। आनंद के पार तुम जो भी कमाते हो
- 22:09वह आज नहीं कल चुभता हो जाता है। आज नहीं कल टूट जाता है, आज नहीं
- 22:18कल विनाश को प्राप्त होता है। एक ही है जो ना घटता ना बढ़ता ना
- 22:28कम होता ना विनृष्ट होता कौन तुम आनंद और वहाँ कैसे जाया जाता वहाँ
- 22:40व्रव ढोके जा जाता। जिसका जैसा स्वभाव अब इस बात को
- 22:49हाँ सर्कल में चले उसको जिसका जैसा स्वभाव अगर उसके पास जाना तो
- 22:57वैसा ही लक्षण ले के जाना पड़ेगा। उस विराट के पास संकीर्ण हो के
- 23:03जाने की चेष्टा मत करना। हिसाब किताब लगाने वाली बुद्धि
- 23:11अगर साथ लेकर गए इसलिए कहते हैं हम के बुद्धि को छोड़ जाओ क्योंकि
- 23:17ये लगाती है हिसाब किताब। हिसाब किताब लगाने वाली बुद्धि
- 23:23संकीर्ण होती है और संकीर्णता से उसे विराट तक नहीं पहुंचा जा
- 23:29सकता। तुम संकीर्णता को छोड़ोगे धीरे
- 23:35धीरे विराट धीरे धीरे विराट। और विराट और विराट तो तुम उसकी
- 23:43हदों में प्रवेश कर सकते हो। विरा तत्व से विरा तत्व से विराट
- 23:51तत्व को पाया जा सकता है संकीर्णता से।
- 23:56वराटता की आशा न रखें। शायद आपके दो सवालों के जवाब
- 24:07होंगे। हर मंत्र की दीक्षा होती है।
- 24:14गायत्री की भी दीक्षा होती है और दीक्षा देने का अधिकारी हूँ।
- 24:21जिसने अपने अंतर स्थल का ओह अंतरिम तल छू लिया हो, वह दीक्षा
- 24:29देने का अधिकार है। अनिसा दीक्षा दीक्षा न होकर होके
- 24:38कोरे शब्द रह जाएंगे। और कोहरे शब्द हो तुम माथा पाची
- 24:45सारे दिन करती हो कोहरे शब्दों से तुम नहीं लेना क्या है, वही तो
- 24:50तुम्हारी सरदर्दी का कारण है। तुम सारे दिन राधे राधे करते रहते
- 24:54हो। तुम्हारे सिर में दर्द होने लग
- 24:57जाता है, तुम एनर्जीलेसनेस फील करते हो, फिर तुम्हें सोना पड़ता
- 25:03है, आराम करना पड़ता है। उस तत्व के पास जाना पड़ता है जो
- 25:08तुम्हें शक्ति फिर से भर देता है। गायत्री मंत्र की दीक्षा होती है
- 25:27बिना दीक्षा के आप शब्दों की तरह सुन सकते हो, बस कोई लाभ नहीं
- 25:33होगा दीक्षा के बाद तुम योग्य हो के तुम्हारा कोई द्वार खुलेगा।
- 25:43दीक्षा एक ऐसा गुरु एक कुंजी लगा देता है।
- 25:54हमारे लॉकर्स बंद पड़े हैं, मृत्यु जन्मो जन्मो से बंद पड़े
- 25:58हैं। उसको कभी किसी ने खोला नहीं जल
- 26:03रहा है। गुरु चाबी लगा के उसके खोलने के
- 26:07योग कर देता है, फिर तुम उसमें कुछ रख सकते हो, जो कीमती है
- 26:17उसमें तुम रख सकते हो। दीक्षा वो कुंजी है जिससे गुरु
- 26:24तुम्हारी जर जर हुए उन खजानों को खोलता है जिनमें ये गोपनीय चीजें
- 26:33रखी जाती हैं जिसे हम रस कहते हैं।
- 26:38आनंद कार। अभी तक तो तुमने आनंद का रस का एक
- 26:42बूंद भी नहीं किया। मैं बहुत बार कहा हूँ, वे विनाशक
- 26:47होंगे जब तक तुम्हारे खजानों के ये बंद हुए द्वार दरवाजे खुलेंगे
- 26:55नहीं और खोलेगा खून। जो खोलना जानता है, जिसके बादशाह
- 27:00भी है, तुम खुद से ना खोल पाओगे, गुरु खोल देगा और फिर तुम अपना
- 27:09आनंद उसमें समाहित कर सकते हो, जोड़ सकते हो उससे पहले।
- 27:19दीक्षा के बिना गायत्री मंत्र तुम्हें काम नहीं करेगा।
- 27:25दूसरा प्रश्न दीवारों, दीवारों को सुना सकते हो, तुम्हारा गर्व
- 27:29पवित्र हो जाएगा दीवारों पूजा रूम में।
- 27:35हर वक्त चतर खुश को दीवारों के भी काण होते हैं।
- 27:42एक कहावत तो तुमने सुनी ही होगी। उनके भीतर भी इलेक्ट्रॉन, प्रोटन
- 27:48न्यूट्रॉन होते हैं। उनके भीतर भी जीवन तत्व है।
- 27:53जीवन तत्व के बिना वो चलते कैसे? दीवारों का प्रतीक झर्रा भी जीवंत
- 28:02है उसमें भी वो विननामे ना ही कोटा।
- 28:07जेता कित्ता तेता नाम। जितना पसारा उसमें वो खुद भी बैठा
- 28:14है। प्रत्येक दर्रे में वह खुद भी
- 28:18बैठा है। ईशावास में दम सर्वम, यति, किंच
- 28:22जगत एवं जगत वह कण कण में मौजूद है तो वह मौजूद है।
- 28:31बे नप्पा के चले सुनें वेलकम तो वह सुनता भी है, दीवारों में भी
- 28:37वो है मुझसे पूछा किसी ने दीवारों के कान कैसे होते हैं, कैसे होते
- 28:43हैं? क्योंकि दीवारों में वो बैठा है,
- 28:49कण कण में, वह है सर्वम यति किंच जगत नाम जगत जगत के कण कण में
- 28:59बुद्धिमान है तो तुम्हारी दीवार में भी है।
- 29:04तुम्हारी दीवार के कण कण में वह मौजूद है और वह ऐसा कि उसके कान
- 29:11उसके पांव हो न हो, वह चलता है कान हो न हो, वह सुनता है क्यों?
- 29:21क्योंकि चेतना है। ये इलेक्ट्रॉन प्रोटोन इतनी तेजी
- 29:25से घूम रहे हैं, बिना चेतना के घूम सकते हैं क्या न्यूट्रॉन का
- 29:32लॉ कहता है कि जब तक किसी के ऊपर फोर्स न अप्लाई किया जाए वह गति
- 29:37को नहीं पकड़ता? तो कौन सी गति है जो इसके ऊपर
- 29:41चलती है, जो इलेक्ट्रॉन को चलाती है?
- 29:42इतनी तेजी से घुमाती है परमात्मा की वह शक्ति जो कण कण में
- 29:52विद्यमान है, वह इलेक्ट्रॉन को चलने की एनर्जी देती है।
- 29:56इतना तेजी से घूम रहे हैं जब तुम देखोगे।
- 30:00तो थर्रा हो गए। ये ठहरी हुई दीवार गटती थी जैसे
- 30:07जड़ इसके भीतर इतनी तेज गति हो रही है और प्रत्येक कण में इतनी
- 30:14तेज गति हो रही है। हाँ ऐसा ही है।
- 30:18तुम अगर अंधे हो तो क्या किया जाये?
- 30:24आँखें नहीं हैं तो क्या किया जाये?
- 30:27यही तो कहा कृष्ण ने चरम चक्षुओं से नहीं देखेगा वरविक दीप चक्षुओं
- 30:36से देखेगा। तो बरप्रीत ने कहा प्रभु देव
- 30:40जकक्षों के लिए मैं क्या करूँ? वो ही जो प्रत्येक व्यक्ति देव
- 30:49जकक्षों को प्राप्त करने के लिए करता है, जो कबीर कहते हैं।
- 31:36सी सुतलीधर सी सुतलीधर। घर मेरे यहाँ ये तो प्रेम मिल की
- 32:02चाल शीशतलीधर। शीश तलीधर घर मेरे घर मेरे यहाँ
- 32:23घर मेरे यहाँ। जी तुम प्रेम मिलन की छ दिव्य
- 32:37चक्षुओं से प्रेम तक पहुंचा जा सकता है।
- 32:40चर्म चक्षुओं से उस प्रेम तक नहीं पहुंचा जा सकता।
- 32:44अगर मार्क्सस कहते हैं कि नहीं दिखता है, वो है नहीं।
- 32:48ठीक कहते हैं, चर्म शक्षुओं से देखेगा भी नहीं।
- 32:54दिव्य शक्षुओं से दिखेगा जैसे जेम्स वेव टेलीस्कोप स्पेस
- 33:01टेलीस्कोप से। तुम दूरगामी तारों को देख सकते
- 33:05हो, वैसे ही चर्मचेक्षुओं से नहीं देखेगा।
- 33:10चर्मचेक्षुओं से तो संसार कर कुछ दूरी तक ही देख पाता है, उसके बाद
- 33:19काम करता है जेम्स वेव। टेलीस्को स्पेस टेलीस्को फिर
- 33:25दूरगामी आकाश गंगाओं को देख सकता है वो उन्हीं चर्म चक्षुओं के
- 33:30द्वारा दीप चक्षुओं से। ज्ञान सक्षुओं से दिखता है।
- 33:40वह प्रेम का सागर और जो प्रेम है वह प्रेम से ही पाया जाता है।
- 34:02उसके लिए सीस को तलीपे रखना होता है।
- 34:07यही कहा बरबरी सीस को तलीपे रखना होगा, शेयर देना होगा ये
- 34:14सिम्बोलिक रिप्रेजेंटेशन से सिंबल से अप्रीविएशन से।
- 34:20हमने इनको यही मोड़ता है, बंदे की यही मोड़ता है।
- 34:29कृष्ण ने क्या कहा? तुमने क्या मोड़ताएं करनी?
- 34:41तुमने सिर काट लिया, उसका बरबरी का सिर काट के इसलिए मैं ऐसे सिर
- 34:50कटिया कहता था श्याम बाबा को। मैं सरकटिया ठीक भी है।
- 34:59शीश कटाना कठिन से कठिनतम होता है इस संसार की दुर्लभतम कार्यों में
- 35:12से शीश कटाना। सबसे अग्रिम आता है उच्च स्थान पर
- 35:17आता है तो मैं श्याम भाभी को कहता शीर कटिया कहाँ जा रहे हो, कहता
- 35:24हम श्याम बाबा को जा रहे हैं शीर कटिया के पास जा रहे हो, नाराज हो
- 35:30जा। अब देखिए शब्दों की ही तो बात है,
- 35:37अभी मैं नाराज होंगे जब की हकीकत ही है वहाँ क्या सिर है अकेला
- 35:45जहाँ तुम जाते हो वहाँ बरबरीक का पूरा शरीर है।
- 35:53नहीं अकेला से तुम उसी को देखने जाते हो तुमने मजाक बना लिया,
- 36:08शास्त्रों को मजाक बना लिया कुंभों को मजाक बना लिया, तीर्थों
- 36:13को मजाक बना लिया। दामों का मजाक बना लिया।
- 36:16जब के ये इंगित थे जब के ये प्रतीक एब्रीवेश शिवबद चिन्ह
- 36:29तुमने एक चिन्हों को मूर्त रूप दे दिया।
- 36:35यही गलती हुई है। हिंदू धर्म से शक्ति को शेर के
- 36:41ऊपर बैठा दिया और नवरात्रों में दही के अंदर आलू काट के खाओ।
- 36:55और जीस शेर की सवारी कर रही है माँ श्रीराम वाली नहीं मांस के
- 37:00बिना कुछ खाता नहीं डाल के देख लो दूध बिलाओ उसको नहीं पिएगा शेर
- 37:08खायेगा मांस खायेगा। माँ सिखाने वाले जानवर के ऊपर
- 37:17बैठी हुई दुर्गा तुमने बिठा दी पर कभी शेर भूखा भी होगा भाई तुम्हें
- 37:28माता से कहता होगा माता मुझे मेरा भोजन दो।
- 37:35तो क्या करती होगी? माता शेर तो घास नहीं खाता शेर तो
- 37:42जीरी भी नहीं खाता, चावल, गेंहू भी नहीं खाता मूंगी की दाल भी
- 37:46नहीं खाता। शेर का खाता है मास खाता हूँ।
- 37:53कैसे कैसे अडम भर तुमने व्यर्थ के अनर्थ के जिनका कोई अर्थ नहीं गढ़
- 38:01लिए और तुम उनको पूजा ही चले जाते हो, बस यही मुड़ता है जिसके बारे
- 38:10में मैं बोलता हूँ। शक्ति को आकार दे देना, वहीं तुम
- 38:16गलती खा गए, परमात्मा परम शक्ति है चेतना चेतना का कोई आकार जैसे
- 38:23ही तुमने आकार दिया तुमने मूल तत्व को खोया, ज़रा देखिये।
- 38:32आनंद का आकार होता है जब तुम प्रसन्न होते हो कोई आकार होता है
- 38:35उसको अगर तुम्हें कहा जाए संत कहें तो मैं बड़े आनंद में और तुम
- 38:45कहो उस आनंद को दिखाओ हमें कहाँ है वो नहीं दिखा सकेगा।
- 38:53तुम्हें अगर कहा जाए तुम कहती हो पेट कर दे हम कहें के दर्द को
- 38:56निकाल के दिखाऊं कहाँ अनुभवों का आकार नहीं हुआ करता और वह परम
- 39:05अनुभव है आनंद का। अनुभवों का हाँ इसको दिखलाओ इनको
- 39:12सर्कल में दिलवाओ अनुभवों का आकार नहीं हुआ करता और वह परम आनंद का
- 39:19अनुभव है जिसे तुम ब्रह्मात्मा कहते हो आकार तुम अपनी मर्जी से
- 39:24दे देते हो, सोंड लगा दो पूस लगा दो तुम्हारी मर्जी।
- 39:29दांत आधा तोड़ दो, आधा रख दो तुम्हारी मर्जी चाहे तीन लगा दो
- 39:34दांत, कोई फर्क पड़ता है शक्ति को और तुम ऐसे भाग लो की शक्ति की
- 39:39पूजा कर दो जैसे तुम बिजली की पूजा करनी शुरू कर दो।
- 39:45हमारी माता जब नई नई बिजली आई थी। तो माँ कहती बेटा ऐसा कर संध्या
- 39:51हो गई। उससे पहले तो दीपक ही जलाते थे
- 39:56लेकिन बिजली आ गई तो दीपक ही जलाना बंद हो गया।
- 39:59यही तुम्हारी तरकाल संध्या होती थी जो आज बकवास करते हैं मल का मल
- 40:04का भविष्य कहने वाले। प्रकाल संध्या और कुछ नहीं होती
- 40:08है। ये उस जमाने की बातें हैं जब
- 40:10बिजली नहीं होती थी। ये मूर्ख कहते हैं कि वो बचेंगे
- 40:17जो प्रकाल संध्या करेंगे। सुबह अरुणोदय नहीं हुआ अभी।
- 40:24अभी रोशनाई बिखरी नहीं है, अभी तमास है आज सुबह की संध्या हो गई
- 40:33तुम्हें दीपक जलाना होगा। फिर सायं की संध्या हो गई।
- 40:42जब वो डल गया, सूरज बूढ़ा हो गया। आज का सफर उसने तय कर लिया तो
- 40:50अंधकार अच्छा जाएगा। तो हमारी माता कहती है पुत्र नई
- 40:57नई बिजली आई थी। जाओ बिजली जगा दो, हम बिजली जगा
- 41:06देते बटन कोन कर देते और पुत्र नमस्कार कर देना भल्लभ को नमस्कार
- 41:16कर देते। जैसे दीप को हम नमस्कार करते हैं,
- 41:19अच्छा वही आदत बनी हुई है वारे शान आदतों जानती हैं, नहीं हमें
- 41:27कटलो पोरियाँ पोरियाँ जी पहले हम प्रकाश संध्या करते थे, सुबह बोर
- 41:35हुई ही नहीं है संध्या। रोशनाई की जरूरत है सांझ सांझ
- 41:43सूर्य ढल गया है, अब सारी रात दीया जलेगा, जब तुम जागोगे इन दो
- 41:53संध्याएं प्राकृतिक। सही संध्या तीसरी संध्या है जो
- 42:01मैंने आपको पहले भी बताया है 11:36 से 12:24 तक।
- 42:12ये दो घड़ी की संध्या होती है। ये बीच की संध्या सही संध्या है
- 42:17और देखिए एक बात समझिए, संध्या का मतलब है जो दो कालों का मिलन आधा
- 42:27दिन गुजर गया। रात आने को आधा वक्त बच गया।
- 42:35वह है मिलन का पॉइंट। तुम सांझ को मिलन का पॉइंट कहते
- 42:41हो, सुबह को मिलन का पॉइंट कहते हो नहीं, यह तो अंतिम पॉइंट है,
- 42:46वो अंधकार का अंतिम पॉइंट है। यह रुशनाई का अंतिम पॉइंट है।
- 42:50यश। संध्या वो है जो दिन और रात दोनों
- 42:57के मध्य में ही है। उत्तराकार उस संध्या में एक ही
- 43:00संध्या होती है वो होती है दो पहरिक अब सूरज भी विष्णु है।
- 43:11तुम्हें तुम्हारा दीपक कितनी रौशनी दिखायेगा।
- 43:17सूरज परम रौशनी करता है तमाम संसार को रौशनी उसकी संध्या
- 43:23नेचुरल है तुम्हारी संध्या आर्टिफीसियल है मैं कल सुन रहा
- 43:28हूँ उस पागल को। क्या नाम है उसका क्या नाम है?
- 43:33संजीव मलिक बचेंगे वो वो डराता ही रहता है आदमी दो, तीन क्लिप्स
- 43:41दिखाए उसके मुझे बचेंगे वो। जो त्रिकाल संध्या करेंगे भविष्य
- 43:53मलिका में लिखा है, इसलिए इन इन मूर्खों को देख कर ही कबीर ने
- 44:02लिखा था ऐसे बहुत से मूर्ख पहले भी हुए हैं।
- 44:08तुम कहते कागज की लिखी भविष्य मलका को पाडकर सुना रहे हैं?
- 44:18खुद के भीतर जाकर उस स्थल पर भविष्य को देखने की क्षमता इनमें
- 44:22है नहीं, यह भविष्य की बात बताएंगे।
- 44:26भविष्य मलका पुराण को पढ़कर। और डराने के अतिरिक्त इस व्यक्ति
- 44:31का काम ही नहीं 234 क्लिप्स भेजे उसने मर जाएगा, खप जाएगा, विनाश
- 44:38हो जाएगा, तूफान हो जाएगा, ऐसे भाव वेष रखने वाला व्यक्ति
- 44:43तुम्हें जीवन कैसे देगा सोचो। जो सारे दिन तमन्ना ही ये करता
- 44:52रहता है, वो मट जाएगा, वो खत्म हो जाएगा, तमस हो जाएगा, उजड़ जाएगा,
- 44:59बाढ़ आ जाएगी, तूफान आ जाएगा, अंधकार हो जाएगा।
- 45:037 दिन सूर्य से नहीं निकलेगा, रात ही रात होगी।
- 45:11इन मूर्ख के पट्ठों ने तुमको इतना डराया इनके पास दो ही काम थे या
- 45:20तो लोग या भय भय इस चीज़ का 7 दिन सूर्य नहीं निकलेगा।
- 45:27नहीं निकलेगा भाई 1 दिन हम ऐसे सो जाएंगे कि सूरज कभी भी नहीं
- 45:34निकलेगा हमारे लिए तुम क्या डराते हो फिर तुम्हें जगाएंगे भी 1 दिन
- 45:49सब सो जाएंगे। कौन उठेगा?
- 45:54तुम्हे लाख जगाओ, तुम नहीं जागोगे तुम 7 दिन की बात करते हो सदा के
- 46:00लिए सो जाओ चिर निद्रा। ऐसे ही तो कहते हैं इन लोगों के
- 46:08भीतर। भूसा भरा हुआ है भय का, खुद भयभीत
- 46:15लोग हैं, डरे हुए हैं इनके चेहरे देखना डरपोक गीदड़ की तरह इनके
- 46:21चेहरे में लगा डरा हुआ गीदड़ जो मंडी से भाग जाता है इनका चेहरा
- 46:27देखो तुम गौर से देखो कोई शांति नहीं मिलेंगे इनके चेहरे।
- 46:31कोई आनंद का झूमता हुआ भाव नहीं मिलेगा।
- 46:33इनके ये मुर्दा से लोग देखेंगे। तुम्हें जो भविष्य मलका को पढ़ के
- 46:41बताता है, मैं बताएगा नहीं तो क्या खाक बताएगा?
- 46:48जो अपने भीतर के आनंद में जाके तरो ताजा होके उस चीज़ को नहीं
- 46:52देख पाया जो होने वाली तस्वीर होती है।
- 46:57होने वाली चीजें होती हैं, भविष्य दर्शन होता है लेकिन किताबों से
- 47:01नहीं पढ़ा जाता। और तुम भविष्य मलका का उदाहरण
- 47:07क्यों देते हो? सबूत देते हो कि तुम खुद से नहीं
- 47:10देख सकते। भविष्य मलका को देखकर ही बताओगे,
- 47:15तुम तो इसकी चाल ढाल देखो मैंने बड़ी गौर से देखा।
- 47:20डरा हुआ इंसान बहस से भरा हुआ कप रहा।
- 47:26लूट जाओगे मर जाओगे इस मूर्ख को ये नहीं पता कि कोई नहीं लूटेगा
- 47:33यहाँ कोई नहीं मरेगा यहाँ नैनम सिदं तीशास्त्रण नैनम दाहती पाब
- 47:39का न चेनम क्ले धनता कोना सुर से। हमारा असली तत्व इन रियल व्हाट
- 47:52हूँ? अरे वास्तव में हम क्या हैं?
- 47:59वह तो कभी निद्रा को प्राप्त नहीं होता, वह तो सदा जागता ही रहता।
- 48:13उसके भीतर कभी अंधकार नहीं होता उसका दिया कभी नहीं बुझता एक दिया
- 48:20मेरे प्राण जलते हैं क्या दिवस है क्या रहन दिन हो या रात हो एक
- 48:27दिया तुम्हारे भीतर जागता रहता है वो कौन है वो तुम?
- 48:35तो इन लोगों ने डराया और डराने का कारण यही था कि तुम अज्ञानी थे,
- 48:42तुम्हें पता नहीं था हू आर यू तुम हो तत्व हो जो मटाई से नहीं
- 48:47मिटोगे। जिसका सोच कभी भुझेगा तुम सदा
- 49:00जिंदा रहोगे। तुम्हें कोई शस्त्र काटने से आज
- 49:06कोई परमाणु बम करा दो, तुम शरीर को बचा सकते हो।
- 49:13लेकिन तुम तुम तो बचे ही रह जाओगे, शरीर मिटने के बाद फिर
- 49:19शरीर को बचाने का तुम उपाय कर सकते हो, रेडिएशन न फैल जाए।
- 49:28ये न हो जाए वो न हो जाए। अच्छा भी है।
- 49:30अगर बचा लोगे तो लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि अगर शरीर रेडिएशन से
- 49:37मर गया या मर गया, मौत आएगी। 1 दिन कौन बचा है यहाँ तो इसका
- 49:44मतलब ये नहीं कि तुम मर जाओगे। नहीं एक तत्व ऐसा जो न कटता, न
- 49:52मरता, न जलता, न गलता, न सूखता न उडता ओह तत्व तुम हो मरता कहती है
- 50:03जेब प्रणों को। हम प्रणाम करते थे, पता तो था
- 50:07नहीं, ये तो एनर्जी है और अकेली एनर्जी भी क्या करें?
- 50:16बेहद दरें धरे में विद्यमान है, लेकिन प्रगटीकरण होता है शरीर के
- 50:20द्वारा। तो विद्युत किसका पंखा न हो, इसी
- 50:31न हो, हीटर न हो, रेफ्रिजरेटर न हो, यह भौतिक तंत्र भी तू चाहिए,
- 50:40जिससे उसका आभास हो सके। तो शरीर की आवश्यकता उसके आभास के
- 50:48लिए और शरीर की जरूरत तुम्हे वो ही पड़ती है की तुम उसका आभास कर
- 50:55लो। पंखे के बिना जैसे विद्युत का
- 51:01आभास नहीं होता। रेफ्रीजिरेटर के बिना जैसे
- 51:05विद्युत का, इसी के बिना पंखे के बिना बल्ब और लाइट ट्यूब्स के
- 51:14बिना जैसे तुम्हें बिजली का आभास नहीं होता, वैसे ही पंचभौतिक शरीर
- 51:21के बिना। तुम्हें चेतना का वा सुनी तो इन
- 51:31मूर्ख पंडितों के। वहीं राजनीति आज भी चल रही है और
- 51:39प्रभावी है। दर्द खा लो।
- 51:45नरक में सड़ोगे लोभ दे दो, स्वर्ग में आनंद उठाओगे, भेद दिखा दो घर
- 52:00में, भेज देंगे तुम्हारे? पीडीआईटी वगैरह अगर ना माने तो
- 52:09लोग दिखा दो फिर ऐसा करो तुम्हारा 17,000 करोड़ रुपए माफ़ ये गंगा
- 52:14सामने डुबकी लगा लो, पवित्र हो जाओ, वस्त्र बदलो।
- 52:24हमारा पटका, डालो ये पटका मार डालो अच्छा हो गया सब कुछ, यही आज
- 52:33भी है, वही है चाल बेढंगी जो पहले थी वो अब भी है।
- 52:43पहले भी यही दो डंग थे। खरीद लो या डरा दो आज भी यही
- 52:51संजीव मलक जैसे लोग कर रहे हैं और डरा दो तुम देखो इसके प्रवचन पढ़ो
- 52:56अवश्य पढ़ना। तुम देखोगी यह व्यक्ति, वह ही
- 53:02भैतला रहा है, अरे को यह हो जाएगा अरे 13 को यह हो जाएगा, हो जाएगा
- 53:09अभी सारे संसार में होता है कहा नहीं होता है कब नहीं होता कोई
- 53:14दिन ऐसा हुआ? कभी जाता होता कभी कम होता संसार
- 53:25में सबसे ज्यादा महीने जब व्यक्ति सुसाइड करता है मार्च।
- 53:33अप्रैल मई जून जुलाई इन महीनों में सबसे ज्यादा लोग सुसाइड करते
- 53:44हैं। वर्ल्ड लेवल के ऊपर जब खाकर ही आ
- 53:50गया तो पता चला कि इन महीनों में लोग सबसे ज्यादा।
- 53:57आत्महत्या करते हैं। कारण बड़े लंबे चौड़े हैं।
- 54:02इसका सम्बन्ध भी नहीं है। फिर कभी बताऊँगा पूछ लेना तो मैं
- 54:06बता दूँ क्यों करते हैं सुसाइड इन महीनों में मार्च अप्रैल जो जल्द।
- 54:15इन चार महीनों में चौमासी में क्यों करते हैं?
- 54:18ये अलग से चमक है हम प्रसंग पे आ जाये गायत्री मंत्र के भीतर शब्द
- 54:31नहीं हैं अकेले यह कोई वो पर्व मंत्र नहीं।
- 54:38जो आनंद से विहीन हो ये आनंद से तृप्त गुरु मंत्र है।
- 54:49मैंने देखा कुछ लोग कमेंट कर रहे थे जो दीक्षित नहीं, मैंने बाबा
- 54:55से पूछा ये कमेंट करें। दीक्षित नहीं ये दीक्षित नहीं है।
- 55:02जब इनकी जिम्मेदारी ही तो नहीं है, हमारी एंड लाइटनिंग करनी ही
- 55:10तो तुम हमारा चैनल देख क्यों रहे हो?
- 55:14देखिये बड़ी हैरानी की बात। तुम कहते हो सब्सक्राइब
- 55:18सब्सक्राइब सब्सक्राइब मैं कहता हूँ नहीं नहीं नहीं कोई
- 55:21सब्सक्राइब नहीं भाई दूसरे कहते हैं आ जाओ आ जाओ आ जाओ, नाम दान
- 55:29ले लूँ, बस यही फर्क होता है। तुम्हें ये फर्क पहचानना होगा।
- 55:41लोभी कोम और लोभी कोम। तुम्हारी दोमक लगा देने से या
- 55:50कलंक लगाने से हम कलंकित थोड़ी होते हैं।
- 55:55विशुद्ध आत्मा वही कलंकित नहीं होती।
- 56:02हमने तुम्हें भुलाया नहीं कि तुम आओ इस चैनल पे तुम कमेंट देने लग
- 56:08गए इसलिए मैं सबसे पहले इस डिस्क्लेमर को बोलता हूँ कि मैं
- 56:20जो बोलूं उसको कोई कोर्ट में चैलेंज मत करना।
- 56:25क्योंकि डिस्क्लेमर मेरा पहला कि तुमने सुना तो मैं उल्टा तुम पे
- 56:29ठोक दूंगा। मैंने तुम्हें कहा था मुझे सुनो
- 56:34आज तक मैंने कभी किसे कहा है मुझे सुनो अगर मेरी आवाज सुन कर।
- 56:43तुम्हारी आत्मा तृक तो हो जाती है तो तुम्हें सुनना ही पड़ेगा जो है
- 56:52तुम ठहर जाओ। बहुत से व्यक्तियों के कमेंट आते
- 56:56हैं। बाबा यूट्यूब ने रेकमेंड किया?
- 57:00ऐप का वीडियो मेस्क्रिप्ट कर दिया।
- 57:04यूट्यूब ने रिकमेंड किया, हमने एस्केप कर दिया करते रहे, लेकिन 1
- 57:08दिन कहा कि देखें तो ये यूट्यूब क्यों जान खा रहा है।
- 57:14हमने देखा और आपकी आवाज। हमारी बुद्धि के सब शस्त्र गिर गए
- 57:27और आपकी आवाज हमारे हृदय को चीरती हुई बेइज्जती हुई, हमारे अंतर को
- 57:31छू गई हम सदा के लिए आपके आवाज के दीवाने हो गए।
- 57:41यह आवाज़ के दीवाने नहीं है। वो तो यह परमात्मा के उस तत्व के
- 57:47जहाँ से विबो के आया वो हमारा अल्फाज़ उसके दीवाने हो तुम और
- 57:54यही संत की निशानी होती है। जो ड्राय जो धमकाएं 7 दिन सात रात
- 58:06सूर्य नहीं निकलेगा तो क्या हो जायेगा?
- 58:09भाई अरे 1 दिन तो तुम्हारे लिए सदा के लिए सूर्य व्यस्त हो
- 58:14जायेगा। इनसे ही इनका व्यवहार चलता है।
- 58:20दे अरे ट्रेडर्स दे अरे बिजनेसमैन गले में माला पहन के दिखाने के
- 58:33लिए। ये भी तो एक श्रृंगार ही तो है
- 58:43अलग अलग से तुम मेकअप करते हो भाई शायद तुम बोलते हो कि लोग डर जाते
- 58:50हैं जब के गुरु का काम होता है कि तुम्हें भयमुक्त करना।
- 58:58उस अंतरिम तप पे जब तुम कपने लगोगे थर थर सूखे पत्ते की तरह तो
- 59:03गुरु कहेगा नहीं नहीं तुम डरो मत, डरो मत क्योंकि कभी मैं भी यही था
- 59:12और मैं भी ऐसे ही कंपा था सूखे पत्ते की तरह मैं जो हूँ।
- 59:18तुम फिकर मत करो, देखो मैं भी खपा था मरा नहीं, आज तुम्हारे सामने
- 59:22खड़ा हूँ, जम्प करो जम्प डरो मत होगा कुछ नहीं मैं जिम्मेदार।
- 59:38गुरु उसे साहस देता है। साहस तो शिष्य में होना ही चाहिए।
- 59:45मैं कुछ और बात बोलता हूँ, तुम कुछ और समझ जाते हो, मैं कहता हूँ
- 59:49साहस होने चाहिए जुवारी जैसा और वो जुवारी।
- 59:53जो अपना सारा कुछ एक बार की दांव पे लगाते और लोग जुआ घेरना शुरू
- 59:58कर देते। कल ये स्त्री का कमेंट मेरे घर
- 1:00:05वाले को आपने बिगाड़ दिया। मैंने कहा, पुतरी बताओ कैसे उगाते
- 1:00:13हैं तो मेरे गुरु कहते हैं कि जब तक तुमने इस शराब का टेस्ट नहीं
- 1:00:18देखा है तो परम शराब का टेस्ट कैसे देखोगे?
- 1:00:22मैंने कहा ठीक कहते हैं, मैंने कहा, लेकिन मैंने ये थोड़ी कहा कि
- 1:00:27इसी शराब का टेस्ट देखते रहे। पूछो तो मैंने यही कहा कि इसी इसी
- 1:00:40शराब का टेस्ट देखते रहना। मैंने कहा बैंक का टेस्ट देखो
- 1:00:46तुम। लेकिन मैंने ये तो नहीं कहा कि
- 1:00:49भंग का ही कैसे देखते हैं सीढ़ी की तरह उपयोग कर लेना लेकिन सीढ़ी
- 1:00:55को छोड़ भी तो देना और भी राहतें हैं बस हल्की राहत के सिवा।
- 1:01:03और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के सिवा अगले पड़ाव को भी देख
- 1:01:08लेना कौड़ियाँ और भी हैं 38 कौड़ियाँ हैं जपजी साहब की 38
- 1:01:14कौड़ियाँ हैं तो क्या पहली कौड़ी पे खड़े रहो?
- 1:01:25कहा, मैंने बिलकुल कहा जर्ज़ है मेरी वीडियो में दर्ज है।
- 1:01:34बिलकुल कहा इस शराब का तुम टेस्ट ना देखें ये डेरे वाले तुम्हें
- 1:01:40कहते हैं शराब नहीं पीना, मैं कहता हूँ बिलकुल पीना भाई।
- 1:01:45फिर तुम छुप छुप के पीओगे मन की ये आदत है जहाँ पर्दा नहीं उसे
- 1:01:52अच्छी नहीं लगती पर्दा उगा उगाड़ के देखना चाहता है और पर्दा
- 1:01:58उगाड़ने की आदत। कितनी खोजे कर गई ये पर्दा
- 1:02:05उगाड़ने की तुम्हारी सायकॉलजी मनुष्य की पर्दा उगाड़ो देखो के
- 1:02:10भीतर क्या है? कितनी खोजे कर गई ये विद्युत का
- 1:02:14अविष्कार, ये एटम को तोड़ा। ये मालिकपुर को तोड़ा ये सारा कुछ
- 1:02:23तोड़ा उगाड़ के देखा तभी तो पता चलेगा भीतर क्या है उगाड़ने की
- 1:02:39आदत मैं कहता हूँ सा सा होना चाहिए।
- 1:02:45धृतराष्ट्र को क्षमक युधिष्ठिर को मैं परम साहसी कहता हूँ, हालांकि
- 1:02:51लोग उसे जुएबाज़ कहते हैं। हार के द्रौपदी को भी हार
- 1:02:57तुम्हारे देखने का तरीका गलत है। साहस हो तो युधिष्ठिर जैसा।
- 1:03:05वो काबिले तारीफ भी नहीं काबिले पूछ नहीं उसने सारे को उसे दांव
- 1:03:13पे लगा दिया इंद्रप्रस्थ भी लगा दिया सारे भाई भी लगा दिए खुद भी
- 1:03:18दांव पे लगा दिया द्रोपदी को भी दांव पे लगा दिया छत ऐसा ही साहस
- 1:03:23समझता है। लेकिन अगर कोई अपनी द्रौपदी को घर
- 1:03:26में जाकर दांत पे लगा दे, फिर मैं कब मेरी बातों से चिपक मत जाना,
- 1:03:34मेरी बातों का अर्क निकाल लेना, सेंस से निकाल लेना।
- 1:03:37मैंने बोला क्या क्यों बोला? उसके भीतर रस क्या है?
- 1:03:42घरवाली को थोड़ी काम पे लगा द्रौपदी मलकिए थोड़ी थी युधिष्ठिर
- 1:03:53की उसको तो जीत के भी नहीं ले के आए थे।
- 1:03:56अर्जुन जीत के ले के आए थे तो माँ ने कह दिया कि बाँट लो जो कुछ भी
- 1:04:01ले के आए हो। सदा सी आदत रही थी, माओं की आज भी
- 1:04:04आदत है कि पुत्र कुछ लेके आए तो आपस में मिल बांट खा लो सहजे सहजे
- 1:04:13बैठी थी कुंती ने कह दिया पुत्र बीम ने कहा देखो माँ हम क्या लेके
- 1:04:20आए? द्रौपदी को लेके आए थे वर्ण करके
- 1:04:26और जीत के लेके आना अपने आप में खुशी की बात जीत के लेके आए थे और
- 1:04:35भीम ने कहा माँ देख हम क्या लेके आए?
- 1:04:40कुंती अपने काम में बस्ती कहीं खोई होगी?
- 1:04:45विधवा व्रत थी अपने पति की किसी याद में खो गई होगी।
- 1:04:56यादें न जाए। बीते दिनों की याद न जा बीते
- 1:05:19दिनों की। जा के न आए जोगन दिल क्यों भुला
- 1:05:32है उन्हें दिल क्यों भुला? याद न जा, बीते दिनों के पूरा दिन
- 1:05:56जो पखेरू होते। पिंजरे में मैं रख लेता दिन जो
- 1:06:10पखेरु होते पिंजरे में मैं रुक लेता।
- 1:06:20पालता उनको जतन से पालता उनको जतन से खाने को मोती देता सीने से रे
- 1:06:37तरगा। याद न जाए बीते दिनों की जाकी न
- 1:06:55आए। जो अरे तुम क्यों रो रही हो?
- 1:07:01तो कुंती ऐसी ही किसी परिवार में बैठी हो?
- 1:07:07कुंती भातरी दो ही धर्मपत्नियां थीं।
- 1:07:18पांडुक तो किसी पुराने ख्यालात में डूबी बैठी अपना काम धाम कर
- 1:07:28रही है कि फटे प्राणी वस्त्र शेल रही है।
- 1:07:31महारानी लेकिन वनवास काट रही है। तो भीम कहता है माँ देख हम क्या
- 1:07:40लेके आए शोक है माँ को दिखलाएगी हम क्या लेके आए माँ खुश हो तो
- 1:07:52मैं कहती पुत्र बाट। सभी बढ़ बराबर बढ़ अब द्रौपदी को
- 1:08:00कैसे बांटा जाए? लेकिन जननी और जन्मभूमि तो स्वर्ग
- 1:08:06से भी महान है ना के पांव तले जन्नत होती है।
- 1:08:20तथास्तु बता लेकिन देख तो रहे क्या?
- 1:08:23लेकिन तन्द्रया टूटी कंति की देखा तो द्रौपदी हरे राह ये मैंने क्या
- 1:08:37कह दिया? लेकिन पुत्र अनासूरती भाव में
- 1:08:43ईश्वर की तरफ से जो बोला गया वो पूरा मैं जिम्मेदार।
- 1:08:49ये होती है ब्राह्मण की आवाज। जो बाबा नानक कहते हैं जीस एम्
- 1:08:59लिखे तैसे सरहना जब फरमाए जैसे फरमान कर दिया उसने वैसे वैसे मैं
- 1:09:07लिख रहा हूँ इस बुद्धि की उपज वक्त समझना इसे ये उसकी देन है।
- 1:09:14सत्यकांठ से उतरा गगन मंडल से उतरा, ऊपर से उतरा उस विराट के
- 1:09:21पास से ये मेरी खोज नहीं है ये मेरी खोपड़ी की।
- 1:09:30ये खोज है उसकी ये उसकी स्पुरना है जब वो फुरम आए, जैसा जैसा
- 1:09:34स्पुरम हुआ उसकी स्पुरना हुई। मैंने मान दी एक शक जो दीक्षित
- 1:09:49है। खुशबी सुनें दीवारों को भी सुना
- 1:09:57दें दीवारें पी लेती हैं, दीवारों में जीवन है, दीवारों में प्रभु
- 1:10:02बैठे हैं, कर्णकन में जो विद्यमान है, दीवारों में भी होगा, फर्श पर
- 1:10:07भी होगा। छत में ही होगा, पेड़ पौधों में
- 1:10:10भी होगा। कौन सी ऐसी जगह है जहाँ वो नहीं
- 1:10:19है, चाहे शराब पीने दे, मस्जिद में बैठ?
- 1:10:30सही शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर या वो जगह बता जहाँ खुदा का घर
- 1:10:37ना हो तो तुम्हारी दीवारें पी जाएं, पवित्र हो जाए, जैसा
- 1:10:44पीएंगे। वैसे रिफ्लेक्ट करेंगे और तुम जब
- 1:10:50घर में आओगे शाम को थके हुए माँ दे चोर हुए किसी बॉस ने कुछ कह
- 1:10:55दिया किसी मालिक ने कुछ कह दिया दिमाग खराब हुआ पड़ा है।
- 1:11:02घर के अंदर प्रवेश करती है ये दीवारें जो चार्ज हैं ये तुम्हारे
- 1:11:09साथ कूड़ा कचरा साफ कर देंगे। तुम निर्भार बजाओ, कहीं निर्भोश
- 1:11:17हो जाओगे? उन के लिए हैं जो मेरे शिष्य हैं।
- 1:11:39यह उनके लिए हैं जो मेरा शिष्य अभी बना नहीं, लेकिन हरदा से मेरा
- 1:11:45शिष्य हो गया है। एकलव्य है गुरु ने अभी अपनाया
- 1:11:52नहीं। लेकिन तुम्हारे हृदय ने उसे
- 1:11:56स्वीकार कर लिया तो तुम्हारा गुरु हो गया और अगर हृदय ने स्वीकार कर
- 1:12:01लिया तो द्रोण के पास योग अध्यापक को मिल गई।
- 1:12:05यह एक अद्भुत सूत्र है अगर तुम किसी को हृदय से प्रेम करते हो।
- 1:12:13तो प्रेम ऐसी चीज़ है कि तुम्हें उसके हृदय से मिला देते हैं,
- 1:12:19प्रेम उसके गुण को खींचकर तुम्हें प्रवाहित कर देगी।
- 1:12:24यही तो कीमियां हैं प्रेमी और प्रेमिका के भीतर की एक अज्ञात
- 1:12:30सूत्र जो दिखता नहीं। इतना कच्चा धागा है और इतना वृष्ट
- 1:12:36है के फौलाद की जंजीरें फीकी पड़ जाती हैं वहाँ ये अज्ञात बंधन
- 1:12:51प्रेम के। फौलादी जंजीरों से ज्यादा बलशाली
- 1:13:00होते हैं। प्रेम की ऐसी जंजीर है, प्रेम ही
- 1:13:09प्रेमिका के बिना नहीं रह पाती क्यों?
- 1:13:14उनका बंधन दिखता तो है लेकिन शक्तिशाली ऐसा कि तुम्हारा फौलाद
- 1:13:26भी कमजोर पड़ जाए। तुम थोड़ा ना सकोगे।
- 1:13:29लाख कोशिश कर ले वो जो दाना। इसलिए मैं कहता हूँ अगर शादी करनी
- 1:13:41तो प्रेम होना आवश्यक है ये तुम्हारी औपचारकताएं जो मोटे पेट
- 1:13:48वाले गोकुण वाले। संस्कृत बोल देते है और संस्कृत
- 1:13:53का शब्द भी गलत होता है। वो एक हमारे हनुमान मंदिर में लगे
- 1:13:58हुए थे। गायत्री मंत्री बोल रहे थे तथ
- 1:14:01सवित्र वयणयम कहती तितर वितर वयणम तितर वितर हो गया।
- 1:14:10जैसे ही बेनेनी गर्मी आई सब तितर वितर हो गए।
- 1:14:18ये पंडित जी ने मंत्र कर दिया क्या करे?
- 1:14:24बस जो दीक्षित नहीं है उनके लिए तितर वितर है।
- 1:14:27ध्यान से सुन लीजिए। दीक्षित हो के उसके बाद काम
- 1:14:32करेगा, उससे पहले एडसेंस वगैरह। हमें समझाने की जिष्ठा ना करो, हम
- 1:14:42पहले से ही समझदार हैं। तुम्हें सुनने के लिए किसे नहीं
- 1:14:52तुम जाओ किसी और गुरु के पास जाओ, यह विधि नहीं बैठेगी।
- 1:14:59ये पैकड़ों की महफिल है, कैसे जमेगी रात गुजरेगी?
- 1:15:08कैसे मिलेगा शिनजोग कैश? जंगल में अकेला है, मुझे जाने दो
- 1:15:17कैश जंगल में अकेला है, मुझे जाने दो कैश मजनू को कहते है।
- 1:15:25लैला के शब्द हैं कैश जंगल में अकेला है मुझे जाने दो खूब
- 1:15:31गुजरेगी, मिल बैठेंगे दीवाने दो खूब गुजरेगी, मिल बैठेंगे दीवाने
- 1:15:40दो। यह कोई जकई की बात नहीं है।
- 1:15:53मैंने बार बार फरियाद की, बाबा के सामने क्यों?
- 1:15:57क्योंकि मेरे पास दीक्षा देने वाले व्यक्ति हैं, आज नहीं कल बता
- 1:16:01देते बाबा असली तकलीफ तो ये अभाव है, बीमार हैं।
- 1:16:09संतार्प है, क्लेश है, दरिद्र्घा असम्मान है करसदा हूँ खुद का मकान
- 1:16:19नहीं, ये नहीं, वो नहीं अपना गनाना शुरू कर देते तो तुम्हें
- 1:16:24समझ गया। परमात्मा की कश सीने खींच के नहीं
- 1:16:32ले के आई इन्हें खींच के ले के आया अभाव तो मैं जल्दी ही समझ
- 1:16:39गया। मुझको देर नहीं लगी कि इनका अभाव
- 1:16:43दूर करना पड़ेगा। अगर इन्हें आलोकित पथ पर चलाने की
- 1:16:52तुम चाह रखते हो, ये इतने मजबूर हैं कि ये चाहते हुए भी शराब पे
- 1:16:59चल ना पाए। मैंने बाबा से।
- 1:17:06इतनी बार फरियाद की सजल न्यायनों से, करुणा हृदय से अतृप्त हृदय से
- 1:17:17मैं डीप मर्म को समझ गया। ये चलते क्यों नहीं?
- 1:17:22मैं जानता हूँ इनके घर में क्लेश शांति नहीं है, मैं जानता हूँ
- 1:17:28इनके घर में अभाव है प्रचुर मात्र नहीं जीवन यापन करने के लिए परचुर
- 1:17:39नहीं होता मैं समझता हूँ रोग। हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी
- 1:17:53पिरोती है और तुम्हारी कमर्स मैंने प्रयास की कर्णधरता से।
- 1:18:04मैं जानता हूँ बाबा एक ही उपाय है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन
- 1:18:15में दीदा वर पैदा हजारों साल नर के सपने बेनौरी फिर होती है।
- 1:18:23तो मैंने दरख्वास्त की सजल हृदय से, कर्म हृदय से सजल नैनों से
- 1:18:32बाबा इनका दुख भी मैं जानता हूँ ये चलते क्यों नहीं और इनका उपाय
- 1:18:38भी मैं जानता हूँ गाय को। सब जानता हूँ, लेकिन एक बाधा तो
- 1:18:45बाबा कहने लगे क्या पता है आपकी आज्ञा है आप आज्ञा दो मैं प्रसारण
- 1:18:58एवं मशहूर। कल्याण मक्तूबा ठीक है, ऐसा ही
- 1:19:03करता हूँ। बाबा ने रिकॉर्ड करवाया वैज्ञानिक
- 1:19:13ये न समझ लें कि ये आवाज गोमुखी की आवाज मेरी यहाँ।
- 1:19:20कमरे के भीतर बैठे आवाज़ से कैसे मिल गई?
- 1:19:23ये जरूर किसी पंखे की आवाज़ ये जरूर किसी चीज़ की आवाज़ होगी।
- 1:19:28नहीं नहीं पंखा बंद ये गो मुख की आवाज़ ये कल कल खस्ती आवाज।
- 1:19:43ये गंगा की उन तरंगों की लहरों की आवाज जो मंत्र के साथ युक्त होकर
- 1:19:50आ गई है तो बाबा ने आज्ञा दे दी। ठीक प्रसारित कर दो मैं समझकर और
- 1:20:00यही वेला है। यही वेला है बाबा मेरे होते मेरे
- 1:20:08रहते ये जहाँ तक पहुँच गए उस स्थल को ना घटा पाएंगे चाहते हुए।
- 1:20:19उस तक मैं इनको पहुंचा जाऊं जहाँ आगे तो बस एक छोटी सी जैसे लाउज
- 1:20:27से गो पत झड़ में एक पत्ता ऊपर से गिरता है और इतने से ही ज्ञान हो
- 1:20:33जाता है। बस इतना सा ही बाकी रह जाए बाकी
- 1:20:37सारा रास्ता मैं कवर करा जाऊं इनका।
- 1:20:41मेरे हृदय की तमन्ना थी तो बाबा कहते ठीक है, आपने मुझे उठाया
- 1:20:48जगाया, मैं मस्ती में सोर पी रहा था, भर भर प्यारे सुराईयां खाली
- 1:20:55कर दी, समुद्र खाली कर दिया। अब तुम मेरी एक विनती सुन लो,
- 1:21:02आपके बिना आज्ञा के मैं इसे प्रसारित नहीं कर सकता।
- 1:21:10आज्ञा मिली। बाबा ने इसे रिकॉर्ड करवाया,
- 1:21:15मैंने इसे भेजा। और आपके कल्याण के लिए ही ये सब
- 1:21:20किया और आपके कल्याण के लिए ये अल्फाज़ बोले गए कि डाउंलोड मत कर
- 1:21:25लेना भाई अगर डॉक्टर आपको कोई दवाई देता है और कहता है परेज है
- 1:21:31भाई देखो, चाउ मनचुगा मत खा लेना। गरिष्ठ चीजों का सेम मत कर लेना
- 1:21:41या कोई गलती है क्या? अरे भाई डायग्नोज़ उसने किया
- 1:21:47ट्रीटमेंट वह दे रहा है तो वह क्या आपको रखना होगा?
- 1:21:57एत। यह भी तो वह बताएगा लेकिन जिन
- 1:22:06लोगों ने हो शरारती लोग जिन लोगों ने अपने विचार रखने शुरू किए।
- 1:22:15उनका इस चैनल में था ही कुछ ये कोई पशुओं का बड़ा थोड़ी है ये
- 1:22:22तुम सब्सक्राइब कर दिया और मुझे सुनने लगे और अपने विचार बिखेरने
- 1:22:26लगे। अरे नहीं भाई नहीं, अगर इतना
- 1:22:30ध्यान रखते हो, अपना चैनल खोलो, यूट्यूब सब के लिए खोला पड़ा।
- 1:22:39हम आपके कमेंट सुनने के आदि नहीं, जरूरत भी तो नहीं है।
- 1:22:49आप अपने कमेंट अपने पास अच्छा लगता है।
- 1:22:55सुन मैं रोकता हूँ। 1000 बार कहा कृपा करके कमिट
- 1:23:03नहीं, अच्छा लगता ठीक या तो चले जाओ या मन मसोस लो, कुछ बोला है
- 1:23:10तो किसी कारण से बोला है। और देखो तुम्हारी ये डाउंलोड
- 1:23:19वगैरह की अगर तुम मेरी कोई भी वीडियो सुनते हो।
- 1:23:22इसे ऐड सेंस वगैरह ना समझी लेना कोई भी वीडियो अगर तुम सीधे चुनो,
- 1:23:30सीधे चुनोगे कि हमने ये सुनना सीधा सीधा चैनल से सुनना।
- 1:23:40अगर तुम्हें इसका चाहिए रिसाल्ट नहीं चाहिए तो डाउंलोड कर लो।
- 1:23:47दोनों ही व्यवस्थाएँ दोनों ही ऑप्शन आपके पास है।
- 1:23:51मैं रोकता नहीं, लेकिन बस एक बात कह दूंगा से से से अपना लखो है तो
- 1:23:56एक करना चल लेना तुम 1000 पे कर लो तुम लाख पे कर लो मैं तुम्हारी
- 1:24:01भलाई के लिए बोला कुछ लिया तो नहीं।
- 1:24:04कोई शिवर की फीस कोई एंट्री फीस नहीं लिया।
- 1:24:10तो फिर सुनने का भी कुछ नहीं मानता और जिसने वो पा लिया जिसे
- 1:24:18पाने के बाद कुछ और पाने की तमन्ना से से रह नहीं जाती, तुमसे
- 1:24:23क्या मांगेगा? मैं परमसम्रात हूँ शहंशाह का
- 1:24:28शहंशाह। तुमसे अपेक्षा भी तो कुछ नहीं
- 1:24:32रखता, मैं कोई अपेक्षा नहीं है मुझे तुम सुनो अपेक्षा इतनी ही है
- 1:24:44कि तुम आनंदित कैसे हो जाओ? ये तमन्ना भी है।
- 1:24:50ये संसार हँसता नाचता, गाता झूमता कैसे फेरे, चीखता चिल्लाता न
- 1:24:57फेरे, दर्द से कोहराता न फेरे, हँसता नृत्य करता खेलता हँसीबो
- 1:25:05खेलिबो दरिबो दयान। ये तमन्ना और उस तमन्ना के अंडर
- 1:25:14ही तुम्हें सारी चीजें बोलते हैं। तो?
- 1:25:18डायग्नोसिस किया परवेंशन भी बताऊँगा क्योंकि परवेंशन इस बेटर
- 1:25:25थान को इलाज बताया। तो परहेज भी तो बताऊँगा मत करना
- 1:25:30डाउनलोड अगर तुम कहते हो हम तो डाउंलोड करेंगे तो सुन कौन रोकता
- 1:25:36है? यूट्यूब पर पड़ी है सारी वीडियो
- 1:25:42लेकिन बात तो ये है। जीस कारण से तुम सुनते हो क्या वो
- 1:25:46रिसाल्ट आया यही तो मैंने जाना इतनी लंबी लंबी 2500 वीडियो टालने
- 1:25:56की बात हुई। तुम अभी ये कह रहे हो बाबा अपने
- 1:26:00भीतर कैसे जाए? तो हैरानगी की बात नहीं है क्या?
- 1:26:08तो करण खोजने पड़ेंगे ना तो उन कारणों में से ये कारण भी निकला
- 1:26:15कि तुम मुझे सुनते सुनते सारे संसार की सैर कराते हो।
- 1:26:19हाँ तो ये कर या तुम उन्हें अलग से?
- 1:26:25अलग से उसे सुरक्षित रख लेते हो रख लो फिर वो अल्फाज़ हैं।
- 1:26:29कोरे काम न करेंगे तुम्हारा दे न मिलेगा तुम्हारा मन तब देना
- 1:26:38मिलेगा इससे अच्छा तो न सुनो। और अगर सिर्फ तुमने मेरे शब्द ही
- 1:26:43सुनने हैं तो डाउंलोड कर लो मुसीबत क्या है इतराज कौन करता
- 1:26:48है, कोई रोकेगा नहीं तुम्हें? मेरे ख्याल में मैंने सभी
- 1:26:58प्रश्नों के जवाब दे दिए। आखिरी प्रश्न रह गया क्या गायत्री
- 1:27:03मंत्र को सुनकर व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकता है?
- 1:27:06लीजिए इसका जवाब दीजिए मारवाड़ी टाइप वृत्ति रखने वाला व्यक्ति या
- 1:27:13मारवाड़ी मेरे इस चैनल पे आने की गुस्सा क्यों न करें?
- 1:27:19क्यों? एक व्यक्ति मर के ऊपर चला गया।
- 1:27:25धर्मराज ने कहा, अभी देखो बात ये पुण भी हैं, पाप भी हैं, बताओ
- 1:27:34पहले पुण्य भोगना चाहते हो या पाप भोगना चाहते हो?
- 1:27:39किधर भेजूं तुम्हें? स्वर्क भेजूं?
- 1:27:42नर्क भेजूं तो मारवाड़ी बोलने लग गया देखो जी बात ये है ये तो दो
- 1:27:49पीसे का फायदा हो जा उठे भेज दो ये व्रती रहकर अगर मेरी सेन पे आ
- 1:27:57गए तो मैं ताना। कब से बोल रहा हूँ चिल्ला रहा हूँ
- 1:28:06तुम बहरे तो नहीं हो अगर मारवाड़ी वृत्ति लेके आओगे तो दो पीसे का
- 1:28:15पैदा हो जाए पर दो पीसे का पैदा हो तो व्यापार में होगा भाई।
- 1:28:21मेरे को सुनने से तो तुम वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ तुम्हारी
- 1:28:24जरूरतें खत्म हो जाती हैं बहुत से लोग कहते हैं बाबा मेरा दुखड़ा हर
- 1:28:31लो, मैंने कहा तुम्हारा दुखड़ा तो मैं नहीं हर सकता फिर क्या कर
- 1:28:36सकते हो तुम तुम्हारा क्या एचआर डालना है?
- 1:28:39तुम्हारा दुखड़ा मैं नहीं हर सकता, लेकिन तुम्हारी सारे दुखड़े
- 1:28:44में यज्ञ सा हर सकता हूँ अच्छा तो बाबा बताओ, फिर मैंने कहा यही तो
- 1:28:50है दुखड़े का जो मूल कारण तुम्हारा अज्ञान है मैं शरीर में
- 1:28:56मन। इसको खत्म कर दो।
- 1:28:57सारे दुखड़े हर गए सूक्ष्म सा मंत्र है तुम्हें ये समझ नहीं
- 1:29:02आता। इसके लिए 2500 लंबी लंबी वीडियो
- 1:29:05बोलनी पड़ी और आखिर में रस तो यही है।
- 1:29:10तुम्हारे सारे दुखड़े मैं हर सकता हूँ एक दुखड़ा नहीं हर सकता।
- 1:29:16तुम कह तो मेरा कैंसर राइटर्स ठीक कर दो एक दुखड़ा है और फिर इसको
- 1:29:22मिटाऊंगा तो दूसरा निकल आएगा और फिर दुखड़े पर दुखड़ा निकल आएगा।
- 1:29:27एक एक करके नहीं, सारे दुखड़े ही इकट्ठे इकट्ठे ठीक करवा दो।
- 1:29:34सब जोड़ दूंगा हार्ड पैर जो टूटे हुए सब जोड़ दूंगा कट्टे कट्टे
- 1:29:39बिलकुल बंदा पूरा बना दूंगा, तुम्हे सो ही खान हो तुम आनंद की
- 1:29:50खान हो, तुम कहा उलझे हो। कहाँ खो गए तुम, ना जाने किस जहा।
- 1:30:15तुम ना जाने परमात्मा के बारे में भक्त कहता है।
- 1:30:22किस जहाँ मैं खो गए हाँ गरीब दुनिया में।
- 1:30:34तनह हो गए तुम ना जाने किस जहाँ में खो हम।
- 1:30:51भरी दुनिया में तनहा हो गए। क्या गायत्री मंत्र को सुन के
- 1:31:07प्रबुद्ध हो सकते हो? वैसे तो शब्दों को सुन के
- 1:31:13प्रबुद्ध कोई नहीं हो सकता। मैंने बोला, लेकिन अगर तुम ऐसा
- 1:31:20सुनो जिसे सम्यक के श्रवण कहते हैं, महावीर।
- 1:31:26जिसे बाबा कहते हैं सुनिए दुख पाप का नाश, दुख और पाप का नाश कैसे
- 1:31:30होगा जब तुम्हारी भ्रांति मिट जाएगी, तुम्हारा इलूशन मिट जाएगा,
- 1:31:35तुम्हारा मुख्य भ्रम मिट जाएगा कि तुम शरीर हो, तुम मन हो, यह
- 1:31:40तुम्हारा मुख्य भ्रम है, यह कैसे खत्म होता है?
- 1:31:43बस वही उपाय? वो ही मार्ग है तुम्हारे सूख का।
- 1:31:50अगर तुम ऐसा सुन सको तो गायत्री भी तुम्हारे लिए काम करेगा
- 1:31:54क्योंकि गायत्री के पीछे छुपी हुई वो आसानी तरंगें वो अंकार जैसी
- 1:32:00हैं। तुम सुन के देखो थोड़ा।
- 1:32:04लेकिन शब्दों को सुनने की चेष्टा मत करना जानें कि तुम गायत्री को
- 1:32:08सुनने की चेष्टा मत करना, फिर क्या होगा?
- 1:32:12शब्द खोपड़ी में उतर जाएंगे और खोपड़ी से बाहर वातावरण में खो
- 1:32:16जाए और वो रस उन्नत। ओंकार का नाथ, जो सर्व अस्तित्व
- 1:32:27में अनइंस्ट्रक्टेड सॉन्ग की तरह बज रहा है ओंकार के ध्वनि मैं तुम
- 1:32:36पाओगे, वह शीर्ष रह गई शब्दों के पीछे वह शीर्ष रह गई।
- 1:32:43शब्दों की छाया में वह घुलमिल गई थी।
- 1:32:48जैसे शुद्ध पानी में मिट्टी घुलमिल जाती है और तुम उस गिलास
- 1:32:53को एक तरफ़ रख देते हो तो सुबह पाते हो मिट्टी नीचे बैठ के शुद्ध
- 1:32:57जलोप बना के। सुनने की कला सम्यक श्रवण की कला
- 1:33:04तो बाबा का यह वाक्य तुम समझ सकते हो।
- 1:33:06सुनिए दुख, पाप का नाश, दुख और पाप का नाश कैसे होगा?
- 1:33:11सुनने की कला होनी चाहिए सुनने की कला क्या है?
- 1:33:15शब्दों को मत पकड़ो, सुनो सिर्फ सुनो जो कानों में ध्वनि पड़े।
- 1:33:20तुम पाओगे ध्वनि खेची जाएगी भीतर शब्द जाएंगे क्षेत्र में क्षेत्र
- 1:33:25से उड़ जाएंगे बाहर वातावरण में और तुम्हें ध्वनि बदल देगी।
- 1:33:32उदगम स्रोत जहाँ से ओंकार का नाद प्रकट हो रहा है, उसी में मिल
- 1:33:37जाएगी ये ओंकार की नाद। और।
- 1:33:44तुम पर्वत हो जाओगे, ये है बेहतर कार्य से सीक्रेट, तुम ऐसा सुनो
- 1:33:53अगर ऐसा सुनोगे? तो गायत्री मंत्र के पीछे जो
- 1:34:00उंकार की ध्वनि चिपटी हुई है, वह उंकार है।
- 1:34:09यह है उंकार की ध्वनि तुम्हारे मूल उदगम स्रोत से उठती हुई अनाहत
- 1:34:15नाद के बिल्कुल। जैसा ही है उस ध्वनि में या ध्वनि
- 1:34:24मिट जाएगी और तुम इस ध्वनि के संग उस उद्यम में प्रवेश कर जाओगे
- 1:34:33जहाँ वह महा आनंद का खजाना सरोथ। वह उपवन जहाँ सुगंध की लहरें उठ
- 1:34:42रही हैं वहाँ तुम पहुँच जाओगे, वहाँ आनंद ही आनंद है, आनंद ही
- 1:34:53मुक्ति है आनंद ही। निर्वाण आनंद कोई शब्द नहीं है
- 1:34:59ऐसा कि तुम सूचनाओं को इकट्ठा करोगे और अपने तंत्र का
- 1:35:06तंत्रिकाओं को भर लोगे। निरौंज को भर लोगे और तुम आनंदित
- 1:35:14हो जाओगे, ऐसा कुछ नहीं। इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ, सूचनाओं
- 1:35:19को इकट्ठा मत करना सूचनाओं को इकट्ठा करने से तुम कहीं नहीं
- 1:35:25पहुंचने वाले खोपड़ी में ही रह जाओगे, कुएं के डड्डू की तरह।
- 1:35:32समुद्र में उतरना चाहते हो? अतः ज्ञान का भंडार जहाँ से उठ
- 1:35:38रही है ये आनंद की तरंग अगर वहाँ तक जाना चाहते हो तो तुम्हें
- 1:35:43तलाहटी में उतरना पड़ेगा। कुंआ के गहरे कोई जात नहीं होते।
- 1:35:50समुद्र की गहराई असीम होती है। तुम उसको सुनना, ऐसी सुनना कि
- 1:35:58जैसे तुम सोए पड़े सुनते हो बस सिर्फ़ सुन्न शून्य के क्षण में
- 1:36:09सिर्फ़ सुन्न। तुम्हारा मन कहीं सैर ना करे उसको
- 1:36:17रोको भी मत करे तो करे बात तुम्हारे कानों से उतरती हुई ये
- 1:36:24ओंकार की ध्वनि तुम्हारे अंतस्तर को छू लेगी।
- 1:36:31एंड यू विल गेट एनलाइटनमेंट तुम प्रबुद्ध हो जाओ।
- 1:36:37अगर ऐसे सुनोगे सुनने की कला है उसको श्रावक कहा मांगी और बाबा ने
- 1:36:45उसका परिणाम बताया। शून्य से क्या होता है?
- 1:36:49शम्य के श्रवण से दुख का नाश होता है दुख का नाश दुख का ओरिजिन
- 1:36:55पॉइंट क्या है पाप तुम्हारे पापों से जो दुख उत्पन्न होता है उसका
- 1:37:02नाश कर देता है। यह सुनिए दुख पाप का नाश।
- 1:37:08अगर ऐसा सुनोगे के सुनने में तुम ज़रा भी ज़ोर न लगाओ, सुनाई खुद
- 1:37:15पड़ेगा जैसे अनंत नाद खुद सुनाई नहीं पड़ता है।
- 1:37:19ऐसे ही नाद गूंजता रहे। ऐसे ही गायत्री बाहर गूंजती रहे।
- 1:37:26इसके तरंग तुम्हारे कान पीते रहें, ओजारों को पीने दो, तुम बीच
- 1:37:31में मत आओ, उपकरणों को अपना काम करने दो, तुम बीच में मत आओ।
- 1:37:40यह ध्वनि तुम्हारे कानों के भीतर से जाती हुई तुम्हारे अंत स्थल
- 1:37:45में जाएगी। और उस उदगम स्रोत से उठती हुई
- 1:37:48ओरिजिनल ओमकार की ध्वनि के बीच में मिक्स हो जाएगी और तुम पाओगे
- 1:37:541 दिन तुम अनंत सागर बन गए आनंद का हम सपा।
- 1:38:11हाँ, बोलिए हाँ लीजिए, मैं अपना वजन शुरू करो, उससे पहले सूक्ष्म
- 1:38:22से प्रश्न। मैंने बोला पंचा पांवें दरगाह मान
- 1:38:35इसका गहरा रहस्य आत्मकार्थ क्या है?
- 1:38:37जपजी साहब का शब्द है ये पंचा पांवें दरगाह मान।
- 1:38:51पंच कौन है पंच वो जिसने अपने जीवन की नैया की पतवार उस विराट
- 1:39:03के हाथों में सौंप? दूसरे अर्थों में जिसने अपने आप
- 1:39:10को परमात्मा को दान कर दिया, तुम यहाँ धनदान करते हो, संसार
- 1:39:22धर्मशाला बनाते हो, कोई आश्रम बना देते हो।
- 1:39:29कोई मंदिर बना देते हो, कोई गुरुद्वारा मस्जिद बना देते हो,
- 1:39:36तुम दान करते हो, संसार गरीबों को भोजन करवा दिया तो तुम्हें क्या
- 1:39:43मिलता है? संसार तुम्हें मान देता है।
- 1:39:48दानी पुरुष वस्तुओं को दान करने से संसार में मान लेता है।
- 1:39:59तुमने वस्तुओं का दान किया, धन का दान किया।
- 1:40:01इसलिए धन को दान करने का निर्देश दिया गया था।
- 1:40:05जो इस मार्ग पे चलना चाहता है उसे ध्यान से शुरू करना होगा।
- 1:40:10छोड़ना है हाथों की मैल है तुम्हें इन्हें कमाया तुम्हें
- 1:40:17इन्हें दान कर दिया। धन जो दान कर दिया समझना वो दान
- 1:40:27करने के बाद तुम्हारा नहीं रहता बस तुम यहीं चूक जाते हो, तुम धन
- 1:40:36को दान करते हो उसके बाद पश्चात अब करते हो कि मैंने क्यों किया,
- 1:40:41वो अभी भी तुम्हारा है। मन की किसी स्थिति में बैठा अभी
- 1:40:47भी तुम उसके मालिक हो, लेकिन बाबा कहते कि दान ऐसा होना चाहिए कि
- 1:40:55तुम दान करके भूल जाओ और जगह जगह लिखा है सभी शास्त्रों में
- 1:41:01वर्णित। कि तुम्हारा दाएं हाथ दान करे,
- 1:41:05तुम्हारे बाएं हाथ को पता न चले, नेकी का दरिया में डाल शुभ
- 1:41:13कर्मकार कुएं में डाल दे। इसका सबका अर्थ यही था।
- 1:41:19भूल जाओ। अगर भीतर रह गया उसकी छाया मात्र
- 1:41:25तिनका मात्र तो फिर तुम उससे चिपटे ही रह गए और उद्देश्य पूर्ण
- 1:41:32न हुआ। दान का दान का उद्देश्य क्या था
- 1:41:36कि दान से तुम्हारी पकड़ कम हो जाए?
- 1:41:41धन से तुम्हारी पकड़ कम हो जाए तो दान से शुरू करो, धन के दान से
- 1:41:47शुरू करो। यह आसान है तो दान करो दायं हाथ
- 1:41:57दान करें, बाएं को पता न चले। इसका मतलब यही था कि भूल जाओ, जो
- 1:42:07चला गया उसे भूल जाओ उसे याद ना करो नेकी करो, अच्छा काम करो।
- 1:42:18किसी की सहायता करो, मार्ग निर्देश करो, लेकिन उस पर जप्फा
- 1:42:23पार्क न बैठ जाओ कि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तुम मेरे से शुरू यह
- 1:42:28जप्फा दान होना चाहिए 1000 हाथों से दान करो 100 हाथों से।
- 1:42:37इकट्ठा करो और भूल जाओ, धन को दान करोगे, तुम धन के मालिक नहीं रह
- 1:42:49जाओगे और समझना बारीक बात गहरे गहरे उतरा हूँ, तुम भी साथ ही
- 1:42:54उतरते जाना। धन को दान किया धन तुम्हारा ना
- 1:42:59रहा पकड़ खत्म हो गई वो धन तुम्हारा था ही नहीं तुमने दान कर
- 1:43:05दिया आज भी नहीं कल था दान कर दिया आज नहीं रहा तुम्हारी पकड़
- 1:43:12गई। तो बाबा कहते हैं पंचा पांवई
- 1:43:20दरगाह मान तुम्हें यहाँ का संसार दान करने से मान लेता है,
- 1:43:27धर्मशाला लिख देते हो या बाना मर लें, दान की या दाना मर लें दान
- 1:43:33की तुम लिख देते हो। पट्टिकाएं लिखा देते हैं, दान में
- 1:43:39पट्टिकाएं नहीं होती हैं। दान में फिर वो ही बनी रही।
- 1:43:44मैंने देखे पंखे पांच पांच पीढ़ियों के नाम थे।
- 1:43:49पंखे के ऊपर दान किसने किया? पांच पीढ़ियों के नाम थे दान तो न
- 1:43:55हुआ। दान तो पंखे के साथ लिपटा चल रहा
- 1:43:59है। जब भी कोई आएगा देखेगा की फलां
- 1:44:02व्यक्ति ने ये पंखा दान किया दान ऐसा हो जाए कि तुम्हारी आत्मा का
- 1:44:11एक जर्रा कभी दान ना करे और तुमसे कोई पूछे।
- 1:44:15तो तुम्हें वास्तव में याद करना पड़े हैं।
- 1:44:18मुझे याद नहीं यह वस्तुस्थिति हो। तुम्हारे हृदय की ऐसा दान करो तो
- 1:44:28बाबा कहते हैं। संसार में धन को दान करने से
- 1:44:32तुम्हें मान मिलता है सम्मान मिलता है।
- 1:44:38कैसा हो अगर तुम खुद को ही परमात्मा को दान करते हो?
- 1:44:45उपनिषद में कहानी आती कठोपनिषद में वजेश्वरमा ने अपने पुत्र
- 1:44:51नचिकेता को यमराज को दान कर दिया। यद्यपि आज नहीं कल सब यमराज के
- 1:44:58भेंट चढ़ जाएंगे, लेकिन उस कहानी का सार है।
- 1:45:07मरने से पहले जीते जी दान कर दो फिर तुम्हें मरने का अफसोस नहीं
- 1:45:12होता। मरने से पहले जीते जी वजेश्वर ने
- 1:45:20कठोर निषद की कहानी है। अपने पुत्र नची केतबा को यमराज को
- 1:45:25दान करती। दान करके भूल जाओ पंचा पा भाई
- 1:45:35तड़का माँ पापा कहते हैं, अपने आप को परमात्मा को दान कर दो,
- 1:45:40हालांकि वैसे तो तुम्हारा कुछ है तो है नहीं।
- 1:45:46लेकिन क्योंकि तुने मान लिया है की मेरा सब मानता, ये मानता ही तो
- 1:45:52आड़े आ रही है तुम्हारे तुम इसे सच समझ रहे हो की तुम्हारा है,
- 1:45:59लेकिन मौत इस सच को। रूबरू कर देती है।
- 1:46:03तुम धड़ाम से घर जाते हो, तुम्हारा शरीर तक भी नहीं रहता।
- 1:46:08फिर जो गोची में तुमने पैसे डाले थे, वो कोई और ही निकालेगा।
- 1:46:16तुम्हारा कहाँ रहा तो यही बाबा कहते हैं कि जीते जी।
- 1:46:22तुम दान कर दो, किसको दान करो, अपने आप को दान करो, शय को दान
- 1:46:29करो और जो शय को दान करता बाबा उसे नाम देते पंच पंचा पाभई दरगाह
- 1:46:37माँ। तो यहाँ दान करने से तुम्हें
- 1:46:40संसार सम्मान देता है, परमात्मा को तुम दान करोगे तो परमात्मा
- 1:46:47तुम्हें अपने क्षेत्र में सम्मान देगा।
- 1:46:51पंचा, पवई दरगाह मान उसकी दरगाह में तुम्हें परमात्मा सम्मानित
- 1:46:57करेगा। सम्मानित कैसे करेगा?
- 1:47:01कोई पारी तो से देगा, कोई डिग्री देगा, कोई कागज़ का सर्टिफिकेट
- 1:47:07देगा नहीं, उसके पास बड़ा शानदार तोफा है।
- 1:47:14उसके पास है ऐसा शानदार तोफा। कि तुम किसी सांसारिक पदार्थ में
- 1:47:19से वो निकाल नहीं सकते, भोगो, संसार के प्रत्येक पदार्थ को भोगो
- 1:47:26और बार बार भोगो और पाओगे। सब निकल गया लेकिन एक वो न मिला।
- 1:47:38जो परमात्मा में पारितोषिक के रूप में मान स्वरूप देखा वह क्या देता
- 1:47:47है? पारितोषिक में वह क्या देता है?
- 1:47:51कोई डिग्री नहीं देता कि तुम पीएचडी हुए।
- 1:47:58कि तुमने फैला सब्जेक्ट की मास्टरी डिग्री कर ली के बैचलर कर
- 1:48:03ली। यह नहीं कहता परमात्मा की दरगाह
- 1:48:07का एक बड़ा सुंदर उपहार है और उससे बड़ा उपहार।
- 1:48:12सृष्टि में नहीं है बरात सृष्टि भरी पड़ी है पदार्थों से,
- 1:48:21परमात्मा के पास तो एक परितोषक देने के लिए उससे बड़ा परितोषक है
- 1:48:26भी नहीं। बड़े से बड़ा परितोषिक तुम्हें
- 1:48:31देती है, इनाम देती है तुम्हें गिफ्ट देती है ईश्वर पंचाबावे
- 1:48:42दर्गा माँ मेहमान क्या है? आईएएस को थोड़ा सा।
- 1:48:47मैं खुल जाऊं तो मैंने पूछा वैसे भी प्रश्न सूक्ष्म का है।
- 1:48:54ये सूक्ष्म के लोग अत्यंत प्रभावी प्रश्न पूछा करते हैं।
- 1:49:02पहली बात तो अपने आप को दान कर दो।
- 1:49:04तो आप देखो तुमने सवाल पूछा तुम्हारा शरीर कहाँ है, जिसे तुम
- 1:49:07अपना समझते थे? आज नहीं आज सिर्फ तुम्हारे पास दे
- 1:49:14ही है वो शरीर जो तुम्हारे फूल शरीर में रहता था वो दे ही।
- 1:49:24आज तुम हो और तुम्हारा दही है, मैं उसकी सिर्फ कॉपी इमिटेशन उसकी
- 1:49:32रिफ्लेक्शन जो तुम्हारा भौतिक शरीर था उसकी रिफ्लेक्शन तुम्हारे
- 1:49:37पास है नाम क्या तुम्हारा चतुर सिंह चतुर सिंह जी पूछते हैं?
- 1:49:42के पंचा पामी दरगाहमान दरगाह परमात्मा का वो स्थान उसे दरगाह
- 1:49:58कहते हैं जहाँ तुम्हें बहुत बड़ा इनाम गिफ्ट के रूप में मिलता है
- 1:50:04जो वहाँ पहुँच के उसे मिलता है। वो गिफ्ट है क्या गिफ्ट है उसका
- 1:50:20मान संसार तुम्हे मान देगी भला बंदा है दानी है।
- 1:50:26बड़ा अच्छा है, लेकिन वह दान देगा तुम्हें किस्से तुम मस्त हो जाओगे
- 1:50:37आनंद आनंद का। दान का कोई मुकाबला नहीं, उसका
- 1:50:51मुकाबला कोई नहीं कर सकता। संसार की सब खुशबू फीकी पड़ जाती
- 1:50:58है, दुर्गंध नजर आती है। आनंद की सुगंध के बराबर तुम्हारे
- 1:51:06संसार की सुगंधें मातृ दुर्गंध के इलावा और कुछ भी तो नहीं परमात्मा
- 1:51:17की सुगंध पर सुगंध है। परमात्मा की सुगंध आनंद की सुगंध
- 1:51:26जहाँ आ जाती है वहाँ सब निहाल हो जाता है।
- 1:51:35वही असली तीरथ है जिसे बाबा कहते हैं तीरथ नमः जयति सब बाबा है।
- 1:51:46अगर वो चाहेगा वो क्यों चाहेगा अगर तुमने अपने आप को उसे दान कर
- 1:51:51दिया? गहरा अर्थ समझी ना तुमने
- 1:51:55रहस्यत्मक अर्थ पूछा पुत्र तुम अवर में छोटे दिखाई पड़ते हो?
- 1:52:12रहस्य क्यों कर चुका है? संसार में पारितोषिक रूप में सुख
- 1:52:21देता है। स्वाद स्वाद से युक्त हुए जीवा
- 1:52:29पदार्थ खाती है। कहती बड़े स्वादिष्ट।
- 1:52:35किसी चीज़ कोमल का तुम स्पर्श करते हो तुम कहते हो बड़ा सुंदर
- 1:52:39अनुभव है, ठंडी हवाएं लहरा के चलती हैं तुम कहते हो बड़ी शीतलता
- 1:52:47है वाणी की वो मीठी मीठी सुगंध। कोयल गाती है तुम्हें, मंत्र
- 1:52:57मुग्ध कर जाती है, यह संसार के सुख जो तुम्हारी इंद्रियाँ देती
- 1:53:05हैं, तुम्हें कोयल गाती तुम्हारे कान आनंद देते हैं।
- 1:53:12सुंदर दृश्यों को देखकर तुम्हारी आँखें तुम्हें आनंद देती फूलों के
- 1:53:19सुगंध चक्के तुम्हारे, नासा पुट तुम्हें आनंद देते, सुंदर स्वादों
- 1:53:25से युक्त पदार्थ तुम खाते तुम्हारी जीवा तिस्ट वड।
- 1:53:31तुम्हें स्वाद का आनंद देते है, लेकिन परमात्मा भी तुम्हें
- 1:53:39पदार्थों जैसा आनंद नहीं देता। वो आनंद नहीं है, पदार्थ सुख देते
- 1:53:45है। पदार्थ सुख देते हैं और परमात्मा
- 1:53:49तुम्हें महा सुख नहीं देता। परमात्मा तुम्हें आनंद देता है और
- 1:53:54दोनों में क्वालिटेटिव फर्क है। गुणात्मक फर्क है, तुम ऐसा मत
- 1:54:02समझना। के सुखों की इम्तहा हो जाएगी तो
- 1:54:06वह आनंद होता है नहीं। आनंद में पहले भी बहुत बार बोला
- 1:54:11और सुख में क्वांटिटेटिव फर्क नहीं है।
- 1:54:15डिफरेंसेस दट। क्वालिटेटिव गुणात्मक फर्क है,
- 1:54:21संख्यात्मक फर्क नहीं। तो परमात्मा तुम्हें वो देता जो
- 1:54:29संसार की किसी चीज़ से तुम्हें नहीं मिलता और वो क्या है?
- 1:54:33आनंद वह मान के रूप में तुम्हें आनंद देता है।
- 1:54:43पंचा पांवै दरगाह मान पंचकोण जो अपने आप को परमात्मा को दान कर
- 1:54:52दे। जैसे वज्रपा ने अपने पुत्र को
- 1:54:56सबसे प्रिय पुत्र होता है अपने पुत्र को।
- 1:55:06दान कर दिया। यमराज को संसार के भीतर तुम दान
- 1:55:16करते हो, तुम्हें इज्जत, शोहरत, सम्मान मिलता है ज़रा सोच।
- 1:55:27उस परम विराट को अगर दान हो गया वो भी खुद का तो क्या मिलेगा?
- 1:55:36वह विराट उसके हाथ विराट वह दाता विराट तू दाता दातार?
- 1:55:45तेरा दत्ता कामना, वह ऐसा शानदार तोहफा देता है तुम्हें पंचा,
- 1:55:56पांव, दरगाह पंच वह जो अपने आप को ही दान कर देता है, वस्तुओं को भी
- 1:56:02क्या दान करता है तो वह मन करते हो, यज्ञ करते हो?
- 1:56:07लकड़ियों का दान कर देते हो घृत का दान कर देते हो अग्नि जला लेते
- 1:56:11हो नारियल रख देते हो सब बकवास है तुम्हारी सर्कस से खुद को बचा
- 1:56:17लेते हो सदा इसलिए भौंकते फिर रहे हो संसार में जन्मो जन्मो से।
- 1:56:24तुम्हारे यज्ञों ने तुम्हें मार डाटा यह है फुंके दान मत करना इन
- 1:56:36सर्कसों, ये पखेडे हैं जंजाल हैं ये तुम्हें।
- 1:56:43मुकत तो न होने देंगे, तुम्हारे जी का जंजाल बन जाएंगे।
- 1:56:48मैंने इतने अश्वमेध यज्ञ किए। इससे अहंकार और बढ़ेगा और अहंकार
- 1:56:56बढ़ेगा तो दुख भी बढ़ेगा। ये पहले लल चलते हैं।
- 1:57:02अहंकार बढ़ेगा, दुख भी बढ़ेगा, जितनी मात्रा में उतनी मात्रा में
- 1:57:07दुख बढ़ेगा मत करना इनको पाखंडों को तुम परमात्मा की बनाई हुई
- 1:57:18सामग्री को आग में डाल के। जरूरी नहीं कि जो चीज़ वेद में
- 1:57:25लिखी वो शीर सस्ती हो। तुच्छ बहुत सी तुच्छ बातें वेदों
- 1:57:33में लिखीं ये हवन रूपी। यज्ज रूपी नर बलि देना, अश्वमेध
- 1:57:44यज्ञ करना यह हिंसा नहीं तो और क्या है?
- 1:57:53तुम इसको कुर्बान करते हो? इस्लाम में मुस्लिम बकरों को
- 1:57:59कुर्बान करता है। कुर्बानी को परमात्मा तुम्हारी
- 1:58:02माँगता है, अल्लाह को कुर्बानी प्यारी है निश्चित लेकिन किसकी
- 1:58:10बकरे की नहीं, घोड़ों की नहीं तुम्हारी तुम्हारी और तुम्हारे भी
- 1:58:17शरीर की नहीं तुम्हारे अहंकार के। जिससे अहंकार बढ़ता है तो वेदों
- 1:58:27में तो ऐसी बातें नहीं की जिससे तुम्हारा अहंकार बढ़ता है तो मत
- 1:58:33करनी ऐसे फखंडों को सरकसें हैं, गलत लोगों ने देखी है।
- 1:58:40इसलिए ठीक किया अगर बुद्ध ने इन्हें इनकार कर दिया तो वेदों
- 1:58:51में लिखा है हे इंद्र तू बरसना बरसना मेरे खेतों में को बरस ये
- 1:59:01तो यहाँ तक ठीक है। और पड़ोसी के खेतों में बिल्कुल
- 1:59:05मत बस पड़ोसी के खेत दुर्बक्ष से मर जाएं, ये किसी संत की कामना हो
- 1:59:16सकती है। क्या पागल हुए हो?
- 1:59:22वेद सर्वोपरि हैं। वेदों को सिर पे उठाए बैठे हुए
- 1:59:25हैं। ये किसी दुष्ट की कामना लगती है
- 1:59:35मेरे पशु खूब दूध दे मेरे पशु खूब दूध दे हमारा परिवार हष्ट पुष्ट
- 1:59:43हो जाए। दूध, घी, दहीं खाकर और पड़ोसी की
- 1:59:48गायों के थानों में दूध सूख जाए। ये वक्तव्य किसी ऋषि के हृदय से
- 1:59:58निकल सकते हैं क्या? दुष्ट हृदय से उत्पन्न न हुई
- 2:00:08भावना है, यह कोई ऋषि नहीं कह सकता, सोच भी नहीं सकता।
- 2:00:14जो तुम्हारी वेदों में लिखा है, इनको मत पढ़ना।
- 2:00:28अल्लाह को कुर्बानी प्यारी तो है लेकिन किसकी प्यारी है तुम्हारी
- 2:00:35सामग्रियों की अवंत सामग्रियों की लकड़ियों की चिंतन की, तुम्हारे
- 2:00:39कपूर की तुम्हारी चिंतन की लकड़ियों की?
- 2:00:45किसकी कुर्बानी प्यारी है तुम्हारी नारियल होगी नहीं अल्लाह
- 2:00:51को प्यारी है, कुर्बान तुम्हारी और तुम्हारी शरीर के नहीं
- 2:00:57तुम्हारे शरीर के नहीं तुम्हारे अहंकार।
- 2:01:04तुम दान भी करते हो और तुम्हारा अहंकार बढ़ जाता है।
- 2:01:10मत करो, ऐसे दान का क्या फायदा जो तुम्हारे अहंकार को भराते हो?
- 2:01:19और शीला लेख में भी लगा देते हो पांच पांच पीढ़ियों का नाम ये
- 2:01:26एडटाइजमेंट है या दान? लेकिन संसारिक रूप में मान देंगे
- 2:01:41पंछापा में दर का माल। बाबा कहते हैं जहाँ संसारिक लोग
- 2:01:46तुम्हारे दान को सम्मानित करेंगे, भले ही चंगे लोग हो, तुम दानी
- 2:01:51पुरुषों हो, तुम पे विश्वास किया जा सकता है, लेकिन उस दरगाह में?
- 2:02:03सिर्फ पंच को ही सम्मान मिलता है। पंच कौन जो ये जान गया मेरा कुछ
- 2:02:12है नहीं, जिसका है उसी को सौंपना। उसने अपने आप को ही परमात्मा की
- 2:02:21भेंट कर दिया। वह पंच।
- 2:02:25पंचावामी दरगाह माँ और उसकी दरगाह, उसकी धर्मशाला उसका वो
- 2:02:36स्थान, उसका गहरा तल। जहाँ से उदगम स्रोत से ओंकार की
- 2:02:44ध्वनि प्रकट हो रही है, वहाँ भी सम्मानित करते हैं आपको जो अपने
- 2:02:51आपको कुर्बान कर देते हैं परमात्मा को और दरगाह।
- 2:03:02में तुम्हारे दान की एवज में तुम्हें वो मिलता है जो कहीं से
- 2:03:07नहीं मिलता, ना पदार्थ दे सकता है।
- 2:03:13ना पदवी, ना सम्मान ना क्वालिफिकेशन।
- 2:03:19न कोई उपाधि, न कोई कार्टिस की डिग्री, न जमीन, न जायदाद, न
- 2:03:25रुतबा वह मिलता है जिससे तुम्हारी आंतरिक रोम रोम की बाँछें खिल
- 2:03:36जाती हैं। तुम नाचने लगते हो, मीरा की तरह
- 2:03:41पग घुंघरू बांधकर तुम गाने लगते हो, बाबा नानक की तरह तुम सुरती
- 2:03:49में, खुमार में डूब जाते हो कबीर की तरह।
- 2:03:57परमात्मा के पास सम्मान देने का यही तरीका है।
- 2:04:04तुम समूचे पर भान हो जाओ क्योंकि वैसे भी तो तुम्हारा कुछ है नहीं,
- 2:04:10वैसे भी तो आज नहीं कल 10205000 साल बाद तुम पाओगे तुम धर्म से घर
- 2:04:16जाओगे तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं। तो क्यों नहीं तुम जो कल होना है,
- 2:04:20आज अपने हाथों से ही कर देते, उसे ही मर जीवडा कहते जीते जी अपने
- 2:04:27आपको उसके हवाले कर देना। अपने जीवन की नैया को उसके हाथों
- 2:04:34में सौंप देना चला। दो खवैया मेरी नैया का खुले पाठ
- 2:04:41कर दो जहाँ चाहे ले चलो, मैं तुम्हारी शर्म उसे ही कहते हैं
- 2:04:55कृष्ण। प्रतिज्तम एकम शरणम वृज सभी
- 2:05:01धर्मों को सर्वधर्माण प्रतिज्ञ माँ एकम शरणम ब्रज मुझे एक की शरण
- 2:05:09में आ जाता है, वह एक है तुम देवी देवताओं की शरण में जाती हो।
- 2:05:14पात्रो की मूर्तियों के शरण में जाते हो तीर्थों की तुम्हारी
- 2:05:18कितनी माताएं हैं कहाँ कहाँ तुम नतमस्तक नहीं हुए तुम इतने
- 2:05:22मल्टीफरकेट हो कि तुमने अपने आपको इतना बहुगणित कर लिया है।
- 2:05:31कि तुम जगह जगह पे कुर्बान हुए जाते हो तुम कितने को तुम
- 2:05:38मल्टीफरकेट हो, तुम एक नहीं पहले एक हो जाओ, ऐसे ही मैं कहता हूँ
- 2:05:46बाहर से सारी इन्वेस्ट की हुई शक्ति को खेंच लो।
- 2:05:50एक हो जाओ पहले तुमसे अच्छे इस राम तुमसे अच्छा इस क्योंकि उसका
- 2:05:57भगवान तो कम से कम एक तुम्हारे तो भगवान ही 23,00,00,000 तो देवी
- 2:06:02देवता हैं तुम्हारे और रोज़ जिंदा ये पैदा होते हैं पता नहीं कहाँ
- 2:06:06से आते? तुम्हारी देवी देवता ही मल्टीफर
- 2:06:13किट प्रत्येक घर में अगर पांच व्यक्ति हैं पांच व्यक्ति अलग अलग
- 2:06:20मत रखते हैं ये काम। सभी धर्मों में है लेकिन बहुत
- 2:06:29कमतर है। इस्लाम ईसाईयत में भी है, लेकिन
- 2:06:35कमती है दो भागों में बंटा ईसाईयत दो भागों में बंटा इस्लाम शियासन।
- 2:06:49यू बाइक फॉर किट यू आर मल्टी फॉर किट तुमने अपने आपको बहुत ज्यादा
- 2:06:56भागों में डिवाइड कर दिया है। कोई हनुमान को मान रहा, कोई
- 2:07:05दुर्गा को मान रहा। कोई विष्णु को, कोई शंकर को, कोई
- 2:07:10ब्रह्मा को तुम ज़रा सोचो, अगर तुम्हारा मन अनंत दिशाओं में
- 2:07:22इन्वेस्ट हो जाएगा। तो तुम अपने भीतर कैसे उतर पाओगे?
- 2:07:26वहाँ जाने के लिए तो बहुत ही शक्ति चाहिए।
- 2:07:30इतनी शक्ति चाहिए के बाहर तुमने जो भखेरी सारी कन्डेन्स करो।
- 2:07:37इसलिए सतयुग में तीन अवतार हुए और तीनों।
- 2:07:44मनुष्य नहीं हुए मत्स्य अवतार हुआ मछली कोरमा अवतार हुआ कछुआ बरहा
- 2:07:53अवतार हुआ सूअर ये अवतार मनुष्य कोई नहीं समझदार लोग थे।
- 2:08:02समझ गए। उसके बाद जैसे जैसे त्रेता दौकर
- 2:08:07आए, तुम्हारे भगवान फर्कट होते चले गए और तुम भी फर्कट होते चले
- 2:08:19गए। बाई ट्राई मल्टीफरकेट हो गए।
- 2:08:29जब तुम्हारे भगवान इतने ज्यादा बहु गणित हैं तो तुम्हारा बहुगणित
- 2:08:38होना स्वभाविक है और जो व्यक्ति अपने आप को।
- 2:08:44जीतने ज्यादा भागों में डिवाइड कर लेता है, उसका इकट्ठा होना उतना
- 2:08:48ही मुश्किल हो जाता है। तुम करीब करीब पागल हो इसलिए
- 2:08:53हिन्दुओं को मैं पागल कर देता हूँ।
- 2:08:59उन्होंने किसी की पूंछ पकड़ रखी। किसी की सोंड पकड़ के कोई क्या
- 2:09:05करे, क्या समझाए। और फिर तुम कहते हो हमारा धर्म
- 2:09:08में खा ठीक है कितने देवी देवता ये भी छोड़ो, कितने वर्ण
- 2:09:21व्यवस्थाएँ तुमने बनाई? ये भी छोड़ो और फिर आगे तुमने जो
- 2:09:25व्यवहार किया। क्या वो छोड़ दे स्त्रियों को?
- 2:09:32सत्तन ढांपने की आज्ञा नहीं थी। क्या ये ठीक किया तुमने तुम
- 2:09:39न्यायकारी हो? तुमने मनुष्य को मनुष्यता का जीवन
- 2:09:44जीने की आज्ञा दी। पशुओं से भी बुरा जीवन जिएबो
- 2:09:51तुमने अपने डिकटे रहना अंदाज से सिर्फ बात किया, पा पा पा पा पूरा
- 2:09:59दुखी विपन्नता की मार तुम झेल रहे।
- 2:10:06और तुम कहते हो हम सबसे उच्च धर्म विषप विजेता है क्या खाक तुम विषप
- 2:10:14गुरु का खाक हो तुम्हारे हृदय में कष्ट और कृष दुख और दुखड़े भरे
- 2:10:19पड़े। तुम बाहर से भी बोझ नहीं कर पाते,
- 2:10:26बाहर से मौज करते हैं, दूसरे धर्म में एकतरफा तो हैं, एकतरफा तो
- 2:10:33हैं, अपने भीतर नहीं उतर पाते। चलो बाहर का मौज मेला तो उठा लेते
- 2:10:40हैं, तुम तो वो भी नहीं उठ पाते। तुम इतने दीनहीन हो, ना खुदा ही
- 2:10:47मिला, ना बसा ले सनम, ना इधर के रह, ना उधर के रह, तुम्हें ना
- 2:10:53बाहर का सुख है, ना भीतर का सुख है इसलिए मैंने।
- 2:11:00शिव से अनुरोध किया। जब तक इन्हें इनके जरूरत की
- 2:11:06मूलभूत चीजें नहीं मिलेंगी, इनके अभाव नहीं खत्म होंगे तब तक ये उस
- 2:11:11रस्ते पे जाएंगे कैसे? तो उन्होंने कहा ठीक गायत्री को
- 2:11:17आप बताता हूँ। मैंने वो प्रकाशित कर दी पंचा
- 2:11:22पांव मैं घर का माँ पंचकुन जो अपने आप को ही दान दे देता है और
- 2:11:32सच में पूछो तो पंच ये जान लेता है दान करने योग्य मेरे पास है,
- 2:11:37कुछ भी तो नहीं है। मैं भी तो खुद अपना नहीं हूँ जो
- 2:11:41है वो 1313 तुझको अर्पण क्या ला के मेरा वो पंच जो इतना भी अहंकार
- 2:11:51नहीं पाता कि मैंने अपने आप को समर्पित कर दिया परमात्मा के ये
- 2:11:55भी तो अहंकार को बढ़ाएगा। जो जानता है कि बेरा है ही नहीं
- 2:12:00कुछ यहाँ मैं ही नहीं वो सच्चा पंच और वही परमात्मा के उस दरगाह
- 2:12:08में मान पाएगा और मान कैसे मिलेगा नॉट इन दी फॉर्म ऑफ डिग्रीज़?
- 2:12:16कोई स्टेटस नहीं बढ़ेगा, तुम्हारी कोई प्रमोशन नहीं होगी, आनंद के
- 2:12:23रूप में तुम्हें मान मिलेगा। उसके घर में एक ही पुरस्कार है
- 2:12:29सर्वोच्च और वो है आनंद। उससे बड़ा उसके पास भी कुछ नहीं।
- 2:12:41आनंद से बड़ा कीमती और आनंद से बड़ा रसीला भगवान के दरबार के पास
- 2:12:49भी कुछ नहीं होता भगवान की दरगाह में ईश्वर की दरगाह में।
- 2:12:55इससे बड़ा आनंद से बड़ा और कुछ भी नहीं और आनंद में तुम मदमस्त हो
- 2:13:01जाते हो, चुप हो जाते हो, बोलने का दिल नहीं करता, तुम मगन हो
- 2:13:06जाते हो, तुम हजारों वर्षों तक एक एक स्नान पर बैठे रह सकते हो।
- 2:13:15इतने मस्त तुम्हारा मन होता है? भटके का क्या?
- 2:13:24हमसपायहों मानसरो? हम सपा आयो मानसरू ताल तलैया।
- 2:13:54क्यों डोला? ताल तलेया क्यों डोला मन मस्त हुआ
- 2:14:07हाँ फिर क्यों बोला मन मस्त हुआ? फिर क्यों बोल मन मस्त हुआ फिर
- 2:14:23क्यों बोल हीरा पायो। गांठ गठियायो बार बार बाको क्यों
- 2:14:46खोल मन मस्त हुआ? फिर क्यों?
- 2:14:53बोल? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला जहाँ
- 2:15:04जाके चुप हो जाता है सब निस्तारण म पर म।
- 2:15:14शान और आनंद का पुलकाव ऐसा आनंद जो तुमने कभी चखा था इस संसार में
- 2:15:30तुम्हारा कोई बगीचा, इतनी सुगंध? इस प्रकार की सुगंध नहीं बिगड़ता,
- 2:15:40जो उसकी आनंद की सुगंध है वो तुम्हें संसार में नहीं मिलेंगे।
- 2:15:45कुछ विलक्षण सुगंध है उसमें जो उसका पुरस्कार है।
- 2:15:56किसको मिलता है पंच को मिलता पंच को जो ये है जानकर के मेरा कुछ है
- 2:16:08नहीं, मैं भी तो मेरा नहीं है। अपने आप को उसके जीवन के अवारे कर
- 2:16:16देता है ये जो इसे समर्पण कहते हैं सच्चा और यह होता है किया
- 2:16:25नहीं जाता। धन्यवाद।