Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Mar 25 - क्या साक्षी का भी कोई साक्षी है? कारण शरीर के आगे क्या है? Most Awaited Question! Must Watch.
Transcript
- 0:13राम स्नेही बाबा सादर चरण स्पर्श ये जो आदेश आते हैं वह कौन हैं?
- 0:31जो हमें सही मार्ग दिखाता है राम से नहीं, यह पुत्र जंक्चर पॉइंट
- 0:47के जैसे नीचे उतरोगे तुम। यह आदेश आने शुरू हो जाएगा।
- 0:58तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें क्या नहीं करना चाहिए?
- 1:08साधारण जीवन में भी तुम्हें कभीकभी झलक मिल जाती है।
- 1:14तुम इस पर गौर नहीं फरमाते हैं। कभी कभी तुम कुछ ऐसा कर रहे होते
- 1:22हो भीतर से आवाज आती है कि मत करो, लेकिन फिर भी तुम कर देते हो
- 1:33परिणाम। अच्छा नहीं होता।
- 1:38अगर भीतर से आवाज आ जाए कि कर दो तो परिणाम अच्छा होता है।
- 1:48इसलिए मैंने तुम्हें एक बात कही थी अगर अच्छा करने का मन हो।
- 1:56भीतर से आवाज आ जाए तुरंत कर देना क्योंकि कभी तुम उस जंक्चर
- 2:03प्वाइंट के नीचे होगे, कभी नहीं भी होगे, तुम हर वक्त तल बदलते
- 2:11रहते हो। और कभी बुरा करने का मन हो तो
- 2:18पोस्टपोन कर देना ठहर जाओ, कर लेंगे, कोई बात नहीं दो फार्म
- 2:27बोले मैंने आपको बताई। जीवन में सुखी रहने का साधारण
- 2:36जीवन में भी तुमने देखा होगा तुम कोई काम करने चले हो, तुम्हारे
- 2:46लिए वह शुभ नहीं है। लेकिन वो तुम कर देते हो बावजूद
- 2:52इसके कि तुम्हारे भीतर से आवाज आई, फिर उसका परिणाम ठीक नहीं
- 2:58होता तो मैंने तुम्हे बड़े विस्तार से अपनी पुरानी वीडियो
- 3:05उसमें बताया कि जंग से और पॉइंट से।
- 3:09नीचे उतरोगे तो यह है पांच आएगा जो मांगू ठाकुर अपने से सोई सोई
- 3:18जगह और एक बात मैंने और भी बताई अगर।
- 3:35अच्छा करने का मन हो तो तुरंत कर देना एस्टोलॉजी में महूरत
- 3:45चिंतामनी में शब्द आता है उसमें मुहूर्त बताएगा।
- 3:54ये ज्वालामुखी योग है, ये फला योग है, ये सर्वार्थ सिद्धि योग है,
- 4:02ये सिद्धि योग है लेकिन आखिर में एक शब्द आता है।
- 4:13अगर तुम्हारे मन में उत्सा हो, ध्यान से समझना इस बात को अगर
- 4:22तुम्हारे मन में तीव्र उत्सा हो तो फिर मुहूर्त चिंता बने की इस
- 4:28किताब को बंद कर देना है मानो उत्सा।
- 4:34तीव्र रहो तो फिर उसे कर ही देना और अगर ऐसा हो कि नहीं करना तो
- 4:43चाहे तुम्हारी मुहूर्त कुछ भी बोलते रहे, सर्वार्थ सिद्धि है।
- 4:51कोई वस्तु खरीदनी है, उसमें कुछ मुहूर्त होती हैं, दो गुना हो
- 5:00जाते हैं, तीन गुना हो जाते हैं। अगर भीतर से आता है कि नहीं होगा
- 5:05तो मत करना। शास्त्र रज्ञों को प्रति, क्योंकि
- 5:17आपको शायद पता होगा कि यह ज्योतिषी विज्ञान भी बीरगंज
- 5:26महाराज का पैदा किया है। और भृगु जी तत्व ज्ञानी थे।
- 5:32इतना तो जानते ही थे कि हमारे भीतर एक ऐसा प्वाइंट है जहाँ से
- 5:41आधिश आते हैं। ये सभी मुहूर्त जो निकाले गए हैं।
- 5:47ये उस आदेश से निकाले गए हैं। भीतर से अगर कुछ आ जाए वह
- 6:07परमात्मा का बताया होता है और परमात्मा वो तत्व है।
- 6:16इसे न कोई जान सका है, आज तक न ही कोई जान सकेगा।
- 6:23कब है बस? नास्तिक कुछ भी कहते रहे जो सच
- 6:35में आस्तिक होगा, वह तो नीती, नीती ही कहेगा, जो सच में ज्ञान
- 6:43का भंडार है वेद वह तो अंत में सब कुछ बतला के भी कहेगा नीती, नैतिक
- 6:53और ठीक भी है। अगर तुम देखो तुम तो एक ज़रा भी
- 7:00नहीं बना सकते। एक इलेक्ट्रॉन भी नहीं बना सकते,
- 7:07बाकी तो छोड़ो। और बात करते हो, तुम हिमालय की
- 7:15बात करते हो, तुम ब्रह्मांडो की अस्तित्व की छोड़ दो, ये बातें
- 7:22आराम से नहीं, ये आज्ञाएं भीतर से आती हैं।
- 7:28मैं पहले भी तुम्हें बता चुका हूँ एकता का है जहाँ से ईश्वर के
- 7:36फरमान आने शुरू हो गए। सभी संतो में गाहे बुगा है।
- 7:45इस फरमान की बात की। जपजी में बाबा नानक ने कहा जस ए
- 7:54लिखे तिस शरण न जेब फुरमाई तेब तेब प जैसे उसका फरमान आया, मैंने
- 8:02वैसे वैसे लिख दिया, मैंने नहीं लिखा।
- 8:12सभी संत कहते हैं वह आदेश देता है उसके आदेश से सृष्टि सकती है।
- 8:26तुम अपनी इच्छा रख कर उसके आदेश में व्यवधान डालते हो।
- 8:30यद्यपि एकदम कामयाब नहीं होता, कामयाब भी होते हो तो बड़े मज़े
- 8:41की बात है। उसकी इच्छा के कारण ही कामयाब
- 8:47होते हो। लेकिन तुम अभी ये बात समझ नहीं
- 8:52पाओगे जब तक इलूशन भर्म बना हुआ है, मैं हूँ तब तक यही अंधेरगर्दी
- 9:06चलती रहेंगी। तब तक तुम तुम्हारी बुद्धि अस्त
- 9:12व्यस्त रहेंगी, कुछ समझ नहीं आएगा, सुजहीन होगे।
- 9:18तुम सूज तो भीतर है, उस स्थल से आती जहाँ वो तत्व विराजमान है।
- 9:28इसे कृष्ण कहते हैं स्थिति प्रज्ञा हो जाओ उसे।
- 9:32प्रज्ञा कहते हैं भगवान सभी धर्मों के आगाज़ करतो ने इस बात
- 9:45को बताया है आपको। आप नहीं समझ पाए बात अलग है।
- 9:52फरमान भीतर से आता है। इस्लाम कहता है अल्लाह ने का हो
- 10:01जा और प्रकृति होगा। यह क्या था?
- 10:06फरमांत सनात्मक कहता है एको अहम्भूषण यह फरमांत संकल्प कर लो।
- 10:22भीतर से उस तत्वों ने संकल्प किया।
- 10:26पर जब वो चाहेगा समय चलेगा, उसकी लीला फरमान आते हैं भीतर से और एक
- 10:39ही है फरमान करने वाला। तुम तो नाजायज बिच में अड़ के
- 10:44अपने आप को दुःखी भर कर लेते हो और कुछ नहीं।
- 10:50इसलिए संत कहते हैं, दुखी तुम अपने कारण हो, ईश्वर के कारण जो
- 11:02कहते हैं करके दिखायेंगे वो कुछ नहीं कर पाते हैं।
- 11:09उनका अंत देखना कैसा कुछ भी न कर पाएंगे।
- 11:24ज़िन्दगी इतनी सरल नहीं है जितनी तुम व्याख्यात कर देते हो।
- 11:32बड़ी जटिल है ज़िन्दगी। तुम्हारे लिए तो बड़ी आसान है एक
- 11:40जगह तक तुम नहीं बनाते, मैंने 1000 बार बोला, पानी के बूंद हवा
- 11:45का एक कण तुम नहीं बना सकते खोज नहीं सकते कैसे बना?
- 11:55बस एटम खोज लोगे दो हाइड्रोजन एक ऑक्सीजन मिली इतना सुफ्फिसिएंट
- 12:01नहीं है उस जंक्चर पॉइंट से थोड़ा नीचे उतरोगे तो उस विराट के।
- 12:19संदेशे आने शुरू हो जाएंगे, वह बनेगा तुम्हारे पथ प्रदर्शक यह
- 12:33परम पिता परमात्मा वही गुरु सतनाम अल्लाह गॉड।
- 12:42कुछ भी कह लो शब्द तुम्हारे अस्तित्व उसका है दूसरा प्रश्न
- 12:56बाबा जी प्रणाम। ध्यान की अवस्था में मन की
- 13:04भावनाओं ख्याल कामनाएं जीसको आपने सूक्ष्म शरीर या देही से डिफाइन
- 13:16किया? इनमें आते जाते सभी तरह के विचार
- 13:26को एक साक्षी लगातार देखता जा रहा है।
- 13:31यह अनुभव में आता है, बाबा। इस साक्षी या दृष्टा को आपने कारण
- 13:40शरीर बताया जिसकी असल में मुक्ति होनी है?
- 13:50ठीक समझाया, बिलकुल ठीक समझाया आपको।
- 13:55आगे अब इसके साथ उलझन ये है एक और तत्व महसूस होता है।
- 14:17जो मैंने आपको ऊपर बताया कि होता कुछ समय के लिए है जो इस कारण
- 14:26शरीर को भी निहार रहा है, जो इस कारण शरीर का भी साक्षी है।
- 14:37यानी जो इस साक्षी का भी साक्षी है, प्रश्न बड़ा गहरा है, मैं इसे
- 14:44बोल देता जरूर बोल देता हूँ, लेकिन इंतजार कर रहा था।
- 14:56किसी साधक का प्रश्न आया है और आज एक प्रश्न आ गया एक साक्षी कारण
- 15:08खरीद जो आपकी भावनाओं को विचारों को।
- 15:19सभी प्रकार की आहटों को लगातार दिखता है वह चेतना का एक सूक्ष्म
- 15:28अंश जिसे मैंने कार्य से कहा। लेकिन इससे अलग बस क्षणिक कुछ देर
- 15:43के लिए एक झलक मिलती है जैसे इस कारण शरीर को।
- 15:51भी कोई देख रहा हो और पलक झपकते ही वह ओझल भी हो जाता है।
- 15:57वह कौन जो साक्षी का भी साक्षी है और बाबा जीस दिन।
- 16:09यह एक पल की घटना घट जाती है। उस से मैं आनंद विभोर हो जाता
- 16:16हूँ। पता नहीं ये कौन है, ये क्या है
- 16:21बाबा मैं इस प्रश्न के इंतज़ार में था।
- 16:29यही प्रश्न रह गया था। मैं इतना गहराई से बोला उसके बाद
- 16:39ही ये नहीं बोला इसलिए नहीं बोला। कि जो इस गहराई को छू लेगा वो ही
- 16:49ये प्रश्न करेगा और आज ये प्रश्न आगया वैसे तो बहुत से लोग हैं।
- 17:03जो इन सब से पार चले गए अस्तित्व में ठहर गए, स्थिति भग्र हो गए,
- 17:14लेकिन साधकों में ये प्रश्न आना चाहिए था आज आ गया।
- 17:23या कौन आप अपनी स्मृति में जाएंगे तो पाएंगे कि मैंने आपसे कहा कि
- 17:35जब यात्रा शुरू होती है तो पत्थर जड़ से एक छोटी सी चेतना।
- 17:45कि किरण बुंद कहलो आज तो पार्टी कर और वेब इनको यक्सा से कह दिया
- 17:59गया है, आप भी जानती है। वह एक करण कह लो, एक कणक है लो
- 18:11पत्थर से शुरू होता है और यात्रा मुक्ति की उसकी है।
- 18:21देही इकट्ठा होता जाता है, मानव शरीर मिल जाता है, देही रोज़ बड़ा
- 18:31हो रहा है, फिर देही गलना शुरू होता है।
- 18:371 दिन देही गल जाता है। और वह जिसे मैं चेतना की एक बूँद
- 18:43कहता हूँ, है तो वह चेतना वह लगातार साक्षी है आपकी वह ही
- 18:49लगातार साक्षी है आपकी लेकिन और एक मजेदार बात उस साक्षी का भी
- 18:57साक्षी है। जिसकी आज बात हुई साक्षी कारण
- 19:06शरीर और साक्षी का भी साक्षी महा कारण शरीर कारण का भी कारण।
- 19:24महाकार बस उसके आगे कुछ नहीं हम जब आखिर में जहाँ तक तो मैंने बता
- 19:43दिया। कारण शरीर दे ही जब गल जाता है तो
- 19:52बूंद समानि संबंध में। तो यह समुद्र क्या है?
- 20:00यह है महाकारण शरीर। कारण शरीर मुक्त हुआ देखी से सारी
- 20:15यात्रा की देखी ने संग संग चला कारण शरीर अल्फाज़।
- 20:27बड़े सरल करके बोले हैं गहरे हैं, वैसे ही अलफ़ाज़ चुने हैं।
- 20:33मैंने देही गल गया बिखर गया। जैसे ही ये बिखर जाती है,
- 20:42पंचभौतिक तत्वों पंचभौतिक तत्वों में मिल जाती है।
- 20:46पता नहीं कोई कहाँ गया कोई कहाँ गया ऐसे ही देही भी बिखर जाता है
- 20:59सब वासनाएँ इच्छाएं, कामनाएं, स्मृतियाँ सब बिखर जाती हैं।
- 21:10मुक्त कौन हुआ? कारण शरीर मुक्त हुआ कारण शरीर
- 21:16समा जाता है। जीसको मैंने आपने कहा आप उतार
- 21:19लेना कारण शरीर जिसमें समाता है। बूंद जिसमें समाती है वह कौन
- 21:35समुन्दर वह भी साक्षी का साक्षी है।
- 21:44बात गहरी थी, अति गहरी थी और सबसे गहरी थी।
- 21:48अब इसके आगे कुछ नहीं। तो बूंद सामान्य संबंध में, लेकिन
- 21:54किसी ने पूछा नहीं यह समुद्र क्या है यह जो अस्तित्व जिसकी बात मैं
- 22:00करता हूँ जो सब जगह है कण कण में है।
- 22:17वह महा कारण कारणों का कारण समुद्र आनंद तो कारण शरीर में भी
- 22:31बहुत है। और बहुत से लोग इस कारण शरीर को
- 22:39छू लेते हैं, कई प्रक्रियाओं के दौरान तुम कारण शरीर को छू लेते
- 22:49हो कई बार और तुम्हें बड़ा मज़ा आता है बड़ा आनंद आता है, लेकिन
- 22:55वहाँ कारण शरीर सदा ही अछूता रह जाता है।
- 23:01तो आप बड़े आनंदित होते हो, लेकिन उससे भी बड़ा आनंद जो आनंद का
- 23:10भंडार है समुद्र है, खजाना है, वह महा कारण है कारणों का कारण है।
- 23:26सब बिखर जाते हैं। सतूल बिखरा पंच भौतिक में सूक्ष्म
- 23:36बिखरा सब अपने अपने स्थान पर वासनाएँ तृष्णाएँ कल्पनाएँ।
- 23:46योजनाएं समृतियाँ सब बिखर गए तहस नहस उसके बाद कारण वह क्योंकि जड़
- 23:56नहीं है, वह चेतन है तो कारण का ठिकाना एक ही है कारण शरीर का।
- 24:05शरीर कहता हूँ तुम्हारी समझ के लिए कुछ शब्द मैंने भाषाओं को
- 24:13भाषाओं में आसान समझने के लिए कर दिया है।
- 24:17क्या आपको आसान हो जाए? वह जो बोला नहीं जा सकता है उसको
- 24:28बोलना सहज हो जाए और बहुत से लोग मेरे इन इशारों को पकड़ भी पाए
- 24:35हैं। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है।
- 24:43कारण शरीर चेतना की वो बूँद जो आनंद है, वह लगातार साक्षी और
- 24:55साक्षी कभी साक्षी है, वह सब जगह है।
- 25:04बुद्धि से पकड़ में नहीं आएगा, बुद्धि उलझ जाएगी इसलिए बुद्धि को
- 25:10छोड़ दो, तुम्हारी बुद्धि बड़े प्रश्न उठाएगी।
- 25:20अगर सब जगह वो है तो फिर ये बूंद कहाँ से आएगी?
- 25:24ये प्रश्न है। ठीक है, लेकिन मैं ही कर देता हूँ
- 25:28तो सुन ये लेकिन समझ में नहीं आएगा।
- 25:34ईश्वर का कुछ भी आपके समझ में नहीं आता।
- 25:41यहाँ तक के बुद्धि के भीतर जो तत्व हैं न्यूरॉन हैं।
- 25:45वो कहाँ से आएगी आपको पता नहीं आपको कुछ भी पता नहीं और अगर मैं
- 25:52कह दूँ कि सृष्टि का मानव सृष्टि का मानव मूड है और मूड रहेगा तो
- 26:01इसमें कोई अति शोक नहीं है। ये कभी नहीं जान पाएगा तो ठीक कहा
- 26:08अल्बर्ट इस नॉट ओनली अननोन बट ऑल्सो अननोन एबल यहाँ यात्रा
- 26:17समाप्त हो जाती है। अगर कारण शरीर चेतना की वह बूंद
- 26:32थोड़े से भी विकार से युक्त है। देखिये विकार सिर्फ में बुरी चीज़
- 26:43को नहीं कहता। करुणा भी एक विकार है ये आपको
- 26:53जानकर बड़ा आश्चर्य होगा। दया की भावना भी एक विकार है।
- 27:06बुद्ध जैसे लोग बड़े लोग हैं, जो इन विकारों के कारण किसी में
- 27:15करुणा है किसी में दया है। किसी में बांटने की भावना है,
- 27:24किसी में सहानुभूति की लहर है। हैं तो शुभ लेकिन भार हैं उस कारण
- 27:36शरीर पे उस चेतना पे भार हैं। ऐसे ऐसा समझो कि जैसे तुम सिर के
- 27:46ऊपर गंदगी का ढेर लिए चले आओ एक बर्तन में गंदगी का ढेर लिए सिर
- 27:55पे चले जाओ तो उसमें भार होता है न?
- 28:02उसे तुम बुरा कह लेते हो और एक होठल में तुमने हीरे जौहरात भर
- 28:10लिए हैं, बार उसमें भी हैं उसे तुम बेशकीमती कहते हो।
- 28:18बड़े कीमत के हैं वो बाहर गंदगी का भी है बाहर हीरे जवारा तो
- 28:26मोतीमणियों का भी है लेकिन चेतना तो बाहर ही है न तुम्हारे सर पर
- 28:36तो बोझा है न। बस ऐसे ही तुम्हारे कारण शरीर की
- 28:41चेतना यह फंसी हो चाहे पापों में चाहे शुभ भावनाओं में चाहे
- 28:55पुण्यों में। दोनों ही चिपकाहटे हैं और दोनों
- 29:01ही तुम्हें मुक्त नहीं होने देती तो हम जैसे लोग अपनी चेतना को।
- 29:16किसी सहारे के साथ बांध लेते हैं, कोई खूंटी बन जाती है हमारे लिए,
- 29:26जैसे राम किशन के लिए खाना खूंटी बन गया, मेरे लिए भी कोई खूंटी
- 29:32है? बुद्ध के लिए भी खूंटी है करुणा
- 29:41ये मुक्त है, आत्माएं मुक्त हैं लेकिन मुक्ति तो है, संबोधि नहीं
- 29:49हुई। संबोधि का मतलब है उस बोध के साथ
- 29:53संयुक्त हो जाना। वह बोध जिसे मैं सागर कहता हूँ
- 30:02संबोधि उसके साथ संयुक्त हो जाना, उस बोध के साथ उस प्रज्ञा के साथ
- 30:10संयुक्त हो जाना विलीन हो जाना। तो प्रत्येक संत जो तुम्हारी
- 30:22आँखों की तरफ देखता है। सोनी, सोनी सी आँखें, पथराई सी
- 30:38आँखें दुख और दर्द से भरी भरी आँखें वह बंद जाता।
- 30:57जरूरी नहीं कि तुम क्रोध और घृणा की भावना से बांधो।
- 31:03तुम प्रोबकार की भावना से भी बंध सकते हो इसलिए कृष्ण भगवान का एक
- 31:11बड़ा। अमूल्य सूत्राय तुमने सुना होगा
- 31:23बुरे कर्म, पाप, लोहे की भेड़िया और अच्छे कर्म पुण्य सोने की
- 31:35भेड़िया। बांधते दोनों हैं, पाप भी बांधता
- 31:43है, पुण्य भी बांधता है, दोनों बंधन है।
- 31:54संत जानबूझकर बंध जाता है जैसे तुम बच्चे के सामने जानबूझकर
- 32:02पगलानी बातें करना शुरू कर देते हो।
- 32:05तोतलाना शुरू कर देते हो बोलने कि प्रवीण हो मास्टर हो लेकिन बच्चों
- 32:12के सामने तोतली भाषा बोलती है। ये संत वृक्ष ठीक कहते हैं, संत न
- 32:23होते जागते हैं तो जल मरता संसार ये तुम्हारी पथरीली आँखें देखकर
- 32:34द्रवित हो जाते हैं। तो ठीक लिखा तुलसी ने संत हृदय
- 32:39नवनीत समान लेकिन संत में और माखन में फर्क है निज परिताप रवयी
- 32:54नवनीता। नवनीत अपने ताब के कारण बिगड़ता
- 33:00है पर दुख द्रवयी संत सुपनीत नी ज प्रताप द्रवयी नवनीता।
- 33:21पर दुख द्रवयी संत सुपनीत दोनों ही दुख के कारण पिघलते हैं, लेकिन
- 33:37मखन। अपने ताप के कारण पितलता है और
- 33:43संत पर दुःख द्रव्य संत स्वप्नित दूसरे के दुख के कारण पितलता है।
- 33:59इसलिए शांत तुम्हारे लिए रोकता है योजना बनाता है वह अंत में देखता
- 34:09है कि मैं किस चीज़ से बंद सकता हूँ देखिए बड़े मज़े की बात है,
- 34:16हैरानी भी है। उससे पहले वही व्यक्ति अपने
- 34:23बंधनों से मुक्त होने के लिए प्रयास करता था।
- 34:28हैरानी की बात है अब वही व्यक्ति अपने आप को बांधने का प्रयास करता
- 34:32है। कि मैं कैसे बंद जाऊं, थोड़ी देर
- 34:37के लिए कौन सी वृत्ति है जो मुझे बांध लेगी और इस वृत्ति को
- 34:55सांसारिक लोग दोष कहते हैं। क्योंकि सांसारिक लोग इतनी उच्चतम
- 35:04शिखर तक पहुंचे इसलिए सांसारिक लोग जीस बंधन से बंधता है।
- 35:14संत। उसको दोष की तरह देख लेते हैं।
- 35:19वास्तव में कारण यह है पर हित दुर्वा ही संत सुपनिता संत खुद
- 35:29बंधता है और जिससे बनता है बंधन। तुम्हें पता है पाप है।
- 35:36तुम उसे पाप समझते हो? तुम सिर्फ उसके कारण ही संत को
- 35:41पापी कहने लग जाते हो। जीस बंधन के कारण संत ने अपने आप
- 35:49को तुम्हारे कारण बांधा, तुम उसको दोष की तरह देखते हो।
- 35:56क्योंकि तुम अगियानी है, तुम्हें पता नहीं तुम मुक्त कौन होता है?
- 36:07मैंने पिछले प्रमोशन में बताए एक प्रमोशन बाकी रह गया था, मैं
- 36:13इंतज़ार में था शायद और 10 दिन ना था।
- 36:19तो मैं न बोलता, लेकिन अंत में तो यह ग्रंथ सम्पूर्ण करना ही था और
- 36:29भी बहुत सी बातें रह गई। जब मैं ऐसी ऐसी बातें करूँ तो
- 36:34रोया धोया मत करो। मैं कहीं जाने वाला नहीं हूँ,
- 36:38मैंने तुम्हें बहुत बार कहा यहीं रहूंगा यहीं हूँ मैं यहीं हूँ,
- 36:50यहीं रहूंगा। शारदा रोने लगी थाली गिरकर ही कहा
- 37:00था रामकृष्णा ने। जीस दिन तुम भोजन की थाली लेके आओ
- 37:04और मैं नाक मोड़ लूँ तो संज लेना बस 3 दिन बाकी है और आज शारदा आ
- 37:11गई और रामकृष्णा ने नाक मोड़ लिया।
- 37:20उसको बात याद आई, कभी लड़ी थी चौके में तुम ब्रह्मचर्चा करते
- 37:27करते अन्य चर्चा करने आ जाते हो। लोग क्या कहेंगे?
- 37:37रामकृष्णा कहने लगे श्रद्धा मैं इसी धागे से बंधा।
- 37:46जीस दिन तुम थाली दे के आओ और मैं नाक फेरु अरुची दिखूं बस मेरे 72
- 37:56घंटे 3 दिन बाकी और आज शारदा आ गई थी।
- 38:12रामकृष्णा ने मुँह फेर लिया, शारदा को बाथ याद आ गई थाली छटके।
- 38:34छाती कूटनीर की रामकृष्णा बोले शारदे फिर वही बात, मैं कहीं नहीं
- 38:50जाऊंगा पगली, मैं यहीं हूँ, यहीं था यहीं रहूंगा।
- 38:59एम ओमनी प्रेसेंट सब जगह हूँ पहले भी यही था, तो क्या फर्क होगा अब
- 39:09में और फिर में अब तुम मुझे देख सकते हो।
- 39:15लेकिन मुझे नहीं देख सकते मेरे पार्थिव शरीर को देख सकते हो,
- 39:20मेरे सूक्ष्म को भी नहीं देख सकते कारण की तो बात ही छोड़ो, मैं
- 39:34तुम्हें देख सकता हूँ मैं तुम्हारे थूल सूक्ष्म कारण।
- 39:41और अस्तित्व महान कारण इन सभी को देख सकता हूँ, लेकिन तुम सिर्फ
- 39:48मेरे पार्थिव शरीर को देख सकते हो।
- 39:51इतना ही फर्क है तुम चर्म चक्षुओं से यही कुछ देख सकते हो।
- 39:56चर्म चक्षुओं की सम्रथा यही है। फिर कोई दिन ऐसा आएगा जब तुम मेरे
- 40:07पार्थिव शरीर को नहीं देख पाओगे, लेकिन मैं तुम्हें देखूंगा बराबर।
- 40:14इसलिए सभी संत कहते हैं तुम घबराना मत था।
- 40:21हम यहीं रहेंगे। बस यही फर्क है, तुम डरते हो
- 40:29हमारे पार्थिव के खो जाने से और हम समझाना चाहते हैं तुम के
- 40:36पार्थिव शरीर तुम नहीं हो। बस इतना सफर्क है थोड़ा सफर्क तुम
- 40:44हमारे पार्थिव के खो जाने से डरते हो हम तुम्हें समझाना चाहते हैं
- 40:51कि तुम पार्थिव शरीर नहीं हो। बात पार्थिव शरीरों की ही है।
- 41:02तुम मेरे ख्यालों में खोकर तुम मेरे ख्यालों में खोकर।
- 41:15बर्बाद न करना जीवन को बर्बाद न करना जीवन को जब कोई सहेली।
- 41:34बात तुम्हे जब कोई सहेली बात तुम्हे समझाये कभी तो मत रोना, हम
- 41:49छोड़ चले हैं महफिल को। याद आए कभी तो मत रोना, इस दिल को
- 42:02तसल्ली दे देना घबराए कभी तो। मत रोना, हम छोड़ चले हैं महफिल
- 42:19को। लेकिन सारदा होती रहे, रामकृष्णा
- 42:27जानते हैं कि मैं कहीं जाने वाला नहीं हूँ।
- 42:34तुम्हारी अपनी मजबूरी है। इसी मजबूरी को समाप्त करना चाहता
- 42:41है संत जीवन। के सफर में तनहाई।
- 42:51जीवन के सफर में है तनहाई मुझको तो न जिंदा छोड़ेगी, मुझको तो न
- 43:05जिंदा छोड़ेगी। मरने की खबर।
- 43:13ए। जाने जिगर मरने की खबर जाने जिगर
- 43:22मिल जाए, कभी तो मत होना। हम छोड़ चले हैं महफिल को इक
- 43:37ख्वाब सा देखा था हमने, इक ख्वाब सा देखा।
- 43:47था हमने जब आँख खुली तो टूट गया जब आँख खुली तो टूट गया ये प्यार
- 44:03तुम्हें सब। न बनकर ये प्यार तुम्हें स्वप्न न
- 44:12बनकर तड़पाये कभी तो मत रोना, हम छोड़ चले हैं महफिल को।
- 44:26याद आए कभी तो मत रोना, इस दिल को तसल्ली दे देना घबराए, कभी तो मत
- 44:43रोना। हम कहीं नहीं जाने वाले हैं।
- 44:50घबराए मत करो, तुम्हारी अज्ञानता तुम्हें विवश कर देती है।
- 45:05लेकिन न तुम कहीं जाओगे, न हम कहीं जाएंगे, यहीं हैं यहीं
- 45:13रहेंगे। घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है,
- 45:20बस फर्क इतना होगा। अब तुम मेरे पार्थिव शरीर को देख
- 45:25सकते हो, मैं तुम्हारे पार्थिव शरीर को देख सकता हूँ, फिर तुम इस
- 45:31पार्थिव को नहीं देख पाओगे। पार्थिव ज्ञा सूक्ष्म क्या कारण
- 45:39क्या? लेकिन मैं तुम्हें बराबर निहार
- 45:46रहा हूँगा यहीं होऊंगा, कहीं दूर नहीं होऊंगा।
- 45:55ऐम एव्रीवर। कण कण में मैं हूँ ऐसा कहूँ के कण
- 46:03कण ही मैं हूँ। श्री कृष्ण गोविंद हरि मुरारी।
- 46:18हे नाथ नारायण वासुदेव पितुमात, स्वामी सखा हमारे।
- 46:36हेतुमात स्वामी सखा हमार हिनाथ नारायण वासुदेव नमस्ते नमस्ते से।
- 46:55नमस्ते ही नमो नमः ऋतुमात स्वामी सखा हमार।
- 47:16हेना नारायण, वासुदेव। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 47:41श्री कृष्ण। गोविंद हरे मुरारी।
- 47:50हेनाथ नारायण वासुदेव नमस्ते से नमस्ते से।
- 48:05नमस्ते से। नमो धन्यवाद।