Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Jan 25 - अहंकार का अंत कैसे करें? आध्यात्मिक रूप से धैर्य कैसे बढ़ाएं? नए साल की शुरुआत आध्यात्म से।
Transcript
- 0:16सरवर फल नहीं खत है सरवर पिन पान। कह रहीम पर काज हित संपत्ति सच्चे
- 0:41ही सुजान। सरवर फल नहीं खात है सरवर यही न
- 1:03पान कह रही हूँ पर काज हित। संपत्ति सचे ही सुजान हम बनियास
- 1:27से शुरू करें, तभी इसका असली मर्म समझायेगा।
- 1:43अपने लिए जियो, दूसरों के लिए मत जियो, चौंक गए अपने लिए जियो,
- 2:02दूसरों के लिए मत जियो। बांटने की जल्दी न।
- 2:10करो चौंको मत। यहीं से शुरू करना होगा।
- 2:29प्रकृति से एक सबक सीख लेना सरवर फल नहीं खाता है यहाँ से शुरू हो
- 2:39जाओ, सरवर पिए हैं ना पान सरवर कभी पानी नहीं पीता और वृक्ष?
- 2:50कभी फल नहीं खाता और इसके गहरे अर्थों में चलें तो बड़े राज़
- 3:00खोलेंगे। बड़ी कीमती कड़ियाँ तुम्हारे
- 3:08सामने आएंगी। मैं कहता हूँ अपने लिए जियो,
- 3:20दूसरों के लिए जीने की जल्दबाजी न करो, बांटने की जल्दबाजी न करो।
- 3:36और प्रकृति हमें यही सबक सिखाती है।
- 3:41चाँद, तारे, सूर्य, चंद्रमा ग्रहण नक्षत्र तुम्हारा फिकर न।
- 3:51अपने लिए जीते हैं, अपने निर्धारित मार्ग पर चलते हैं
- 3:55तुम्हारे कहने से ज़रा भी तो नहीं भटकते मार्ग परवर्तन करते एक
- 4:04मनुष्य ही ऐसा मूर्ख प्राणी है। जिसने अपने ताले की चाबी दूसरों
- 4:13के हाथों में पकड़ा रखा और दूसरे जब चाहे तो चाबी लगा देते हैं
- 4:24तुमने अपना बटन। दूसरों के हाथों में दे रखा है।
- 4:29रिमोट उनके पास है, जब चाहें तुम्हें ऑन कर दें, जब चाहें
- 4:34तुम्हें ऑफ कर दें। रहीम बड़ा सुंदर शब्द बोलते हैं।
- 4:46इसमें जीने का तरीका निहित है। प्रकृति तुम्हें यही सखाती है
- 4:56बांटने की जल्दी न करो जब मौसम आएगा बांटने का।
- 5:08तब बंट जाएगा खुद ही बंट जाएगा बांटने की तो तुम प्रवाह ही मत
- 5:15करना, तुम भरने की प्रवाह करना खुद भर जाओ।
- 5:27इन शब्दों को हृदय पटल पर लिख लेना जीने का अनिवार्य ढंग है।
- 5:39रहीम कहते हैं, तरोवर फल नहीं खाते हैं।
- 5:50और तुम इसकी व्याख्या कर लेते हो कि दूसरों के लिए जियो तवर दूसरों
- 6:02के लिए छाया बनता है। दूसरों को फल महिया आता है।
- 6:11पेट की आग बजाता है। तुम्हारी भूख मटाता है गर्म राहों
- 6:20में चलते हुए तुम्हें छाया देता है तुम दो केढ़ी विश्राम कर लेते
- 6:26हो। वृक्ष के जीवन से तरोवर के जीवन
- 6:37से तुम्हें सबक लेना चाहिए। यह क्या तरोवर छाया दे सका
- 6:52क्योंकि वह पहले बीज था। बीज ने अपने आपको तोड़ने की सहमति
- 7:05दी। वह टूटा फूटा अनुकृत हुआ अगर वह
- 7:12टूटने का साहस न करता। तो वृक्ष न बनता आज दरबर तुम्हें
- 7:25फल देने के योग्य हो गया छाया देने के योग्य हो गया तुम आज
- 7:33देखते हो बस यही तुम्हारी गलती है।
- 7:40बहुत से मेरे शिष्य कह देते हैं बाबा हम आपका अनुकरण करते हैं,
- 7:49मैं उनसे कह दूँ, मेरे मार्ग का अनुकरण करना है।
- 7:55मंजिल का अनुकरण मत कर लेना। अक्सर लोग यही करते हैं जब मैं
- 8:07कहता हूँ अष्टमककर कहते हैं तुम ही प्रभास में हो।
- 8:16यह मंजिल है और तुम इसका अनुकरण कर लेते हो और अगर तुमने मंजिल का
- 8:24अनुकरण किया, फिर तुम समझदार नहीं।
- 8:33अनुकरण करना मार्ग का मंजिल तो मिल ही जाएगी, मंजिल स्वतः ही आ
- 8:42जाएगी। मार्ग से ही होगा तो वृक्ष वृक्ष
- 8:52तो गन सका अगर बीज फट सका। उसने अपनी आहुति मिटा दे अपनी
- 9:00हस्ती को अगर कुछ मर्दबाचा है के दाना खाक में मिलकर गुलेगलचार
- 9:08होता है। बांटने की जल्दबाजी न करना कच्चे
- 9:21कच्चे बांटोगे तो वह बिल्कुल उसी तरह होगा जैसे तुमने बीज को आग
- 9:28में डाल दिया। वह सड़ जाएगा जो बीज वृक्ष बनकर।
- 9:36तरोवर की तरह तुम्हें छाया और मीठे फल खिला सकता था।
- 9:42अगर आग में गिरा दिया जल्दबाजी में तो वह जल जाएगा, फिर तुम उसकी
- 9:49घनी छाया का लुत्फ न उठा पाओगे। फिर तुम उसके फलों का स्वाद न ले
- 9:58सकोगे। पेट न भर सकोगे।
- 10:02जल्दबाजी मत करना। ये रास्ता है धीरे धीरे चलना,
- 10:13प्यार से चलना। सरोवर, फल नहीं खाते हैं, सरोवर
- 10:27पिए, हैं न पान सरोवर अगर तुम्हें आज तुम्हारी प्यास मिटाने के योग
- 10:34हो गया तो याद रखो कभी उसमें एक बूंद भी नहीं थी।
- 10:40पहले वो खुद भरा आज इस योग्य होगा कि तुम्हारी प्यास बुझा सके।
- 10:53जब उसमें एक बूँद पानी नहीं था, तभी वह तुम्हें निमंत्रण दृढ़ता
- 11:01के आ जाओ, प्यास बुझा लो। जब तर्वर बीज था तभी आवाजें मारना
- 11:15शुरू कर देता, निमंत्रण देना शुरू कर देता आजाओ मीठे फल खोल घनी
- 11:22छाया में बैठ जाओ तो तुम्हारे साथ एक धोखा था।
- 11:29और वह खुद के साथ भी धोखा कर लेता।
- 11:33मुझे लोग कह देते हैं बाबा तुम संत पुरुषों की निंदा करते हो।
- 11:41मैंने कहा अगर एक व्यक्ति की निंदा करने से करोड़ों अरबों
- 11:47व्यक्तियों की जिंदगी खुशहाल हो जाए तो उस व्यक्ति की निंदा करना
- 11:53उचित है। क्यों?
- 11:58मुझे किसी पागल कुत्ते ने नहीं काटा?
- 12:03मुझे रैबीज के टीके की आवश्यकता नहीं है।
- 12:08एक व्यक्ति की निंदा करने से आने वाली पीढ़ियाँ बच जाएं।
- 12:16बुढ़ताओं से तो निंदा करना आवश्यक हो जाता है, इसलिए?
- 12:24जो व्यक्ति बोल सकता है और जानता है वो बोलता नहीं तो वो पाती है।
- 12:40आज यही हो गया है पहले समर्थ हो जाओ, पहले तुम खुद को बलवान बनाओ।
- 12:55अंग अंग को पुष्ट करो, सुगंध अपने भीतर फैलाओ दृढ़ हो जाओ तभी किसी
- 13:03गिरे हुए को उठा पांव के अगर खुद ही तुम दीन हीन दुर्बल, निर्बल
- 13:11मरे मरे से। रहे और तुमने व्यायाम ना किया और
- 13:21तुमने अपने शरीर की तरफ ध्यान ना दिया।
- 13:26तुमने मस्कुलर बॉडी ना बनाई। तुमने अपने भीतर जान एकत्र न की
- 13:34तो कैसे कैसे गिरे हुए को उठा पाओगे?
- 13:40तुम सिर्फ गिरे होकर देखते रह सकते हो, उसकी सहायता न कर पाओगे,
- 13:49तुम असमर्थ हो जाओगे। इस शब्द के भीतर बड़े गहरे हीरे
- 13:59जौहरात छिपे पड़े बांटने की जल्दबाजी मत करना।
- 14:19क्योंकि बांटने की जल्दबाजी करना एक मूर्खता भरा कम है जब गागर भर
- 14:29जाया करती है, ऊपर तनक भर जाया करती है।
- 14:37और उसमें एक मूंद और समाने की जगह बाकी नहीं बचा करती तो गागर
- 14:47बांटने की चेष्टा किया करता है, बट जाया करता है क्यों गागर के
- 14:54भीतर समाने के लिए सान नहीं? जिसने बांटने की जगदी की उसने
- 15:06समझो बीज को आग में झोंक दिया। बीज ही खत्म कर दिया बीज की सब
- 15:14पोटेंशिअलिटीज़। संभावनाओं को उसने खत्म कर दिया।
- 15:23धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए, माली सींचे सो घड़ा ऋतु आए
- 15:32फल होए। धैर्य मत खोना अगर धैर्य खो दिया,
- 15:47इस धैर्य के कारण ही तुमने सब पाना है यही तुम्हारी फाउंडेशन।
- 15:57गहर ही तुम्हें उस नज़ारे तक पहुंचाएगा जब थपेड़ों को फल
- 16:07लगेंगे जब जब बागों में फूल खिलेंगे, खुशबू फैलाएंगे।
- 16:16हरियाली हो गई। चारों तरफ़ ठंडी सुगंधित हवाएं
- 16:21चलेंगी और आने जाने वाले व्यक्तियों को सुखद एहसास की
- 16:28प्रतीति देंगे। तुमने ठीक पूछा बच्चे, इसका गहरा
- 16:42अर्थ क्या है? महापुरुषों के वचनों को हम अपनी
- 16:51मर्ज़ी से ही मोड़ तोड़ लेते हैं। यह महापुरुषों का अपमान हो न हो।
- 17:01तुम्हारी ज़िन्दगी से एकलवाड़ जरूर हो जाता है क्योंकि तुम उसका
- 17:05सही मतलब समझ नहीं पात है। और महापुरुषों का भी अपमान हो
- 17:13जाता है क्योंकि जीस कारण से महान पुरुषों ने बोला था वो कारण तो
- 17:22पूरा न हुआ। सर्व वर्पिय हीनपाण।
- 17:44दूसरों के हित के लिए सुजान जो अच्छे व्यक्ति हैं वो प्रिग्रह
- 17:52करते हैं। कह रही म पर काज हित संपत्ति सची
- 18:04ही सुजान संपत्ति का संचय करते हैं पर हित कर लिया है तुम कच्चे
- 18:16कच्चे फलों को मत तोड़ लेना। बीजों को बांटने की शिक्षा मत
- 18:26देना। जिसने बीजों को बांटने की शिक्षा
- 18:34दी वह जल्दबाजी करके। बीजों को शिक्षा दो कि तुम फलो,
- 18:42फूलो बड़े हो जाओ, तरोवर बन जाओ। पहले तो जे बांटना सिखाने से पहले
- 18:53जोड़ना सीखाना होगा अगर तुमने ज़िन्दगी में।
- 19:00सुखद स्थितियों को छूना है, बट तो जायेगा ही पर वो तुम्हें कभी
- 19:14पुकारना भी नहीं जब राहगीर? रेतेली धरती के ऊपर चमकते हुए
- 19:25सूरज के भीतर भरी दुपहरी में पसीने पसीने होके थक जाते हैं तवर
- 19:33कहाँ पुकारा करते हैं बस तुम तवर की छाया का लुत्फ उठा लेते हो?
- 19:43और भूखे होते हो, उसके फल खा लेते हो।
- 19:52आज नया साल है, पहला दिन है और पहले ही दिन।
- 20:01तुम्हें मैं पहला ही पाठ्य जीवन का सीखा दूँ, अन्यथा तुम कुछ भी न
- 20:08सीख पाओगे। मरेमरे से शक्तिहीन।
- 20:20आनंद विहीन सुखविहीन बांटने की चेष्टा में संलग्न हो जाओगे।
- 20:30तुम्हारे परले तो कुछ नहीं है, जिसके परले ही कुछ नहीं है।
- 20:37ये बांटे का क्या खाक? लेकिन बांटने की कल्पना का मज़ा
- 20:48ले सकते हो? तुम ऐसा कर रहे हैं लोग आज बांटने
- 20:56की कल्पनाओं का मज़ा ले रहे हैं सिर्फ बांटने की क्षमता हो न हो।
- 21:08तो रहीम कहते हैं, सबसे पहले इस बात को ध्यान में रखो मिटा दे
- 21:20अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबाचा है सबसे पहले बीज को।
- 21:26खुद को मिटाना होता है, दाव पे लगाना होता है और इतना साहस पैदा
- 21:33करना होगा। बीज अगर इतना साहस पैदा नहीं कर
- 21:38सकता तो फिर तड़वर भी नहीं बन सकता।
- 21:46छाया देने का मन है, भूखे को भोजन देने का मन है और लम्बी दूर तलक
- 21:55और लम्बी देर तलक तुम तवर की तरह भूख मिटाना चाहते हो और छाया देना
- 22:04चाहते हो? तो सबसे पहला काम बीज की तरह
- 22:11मिठना के दाना खाक में मिलकर गोलकुलजार होता है।
- 22:20अगर मिठने का साहसन न कर पाया तो याद रखना।
- 22:26तुम्हारी ये आकांक्षा भी पूरी ना हो सकेगी कि तर्वर की तरह तुम
- 22:34किसी की छाया बन सको कि तर्वर की तरह तुम किसी को मीठे फल खिला के।
- 22:44उसकी शुभता को शांत कर सको। ये एक गणित है, सीधा सीधा गणित
- 22:53है, मिट्टी ने से भय मत खानों। बने रहने का लोभ मत करना जैसे तुम
- 23:07हो बीज अगर बीज बने रहने का लोभ करें यहाँ लोभ त्याज्य है, बीज
- 23:21अगर चाहे कि मैं बस बीज ही बना रहूँ।
- 23:24डरे मरने से डरे, भय प्रकट करे, साहस न कर सके खुद को गलाने का तो
- 23:36फिर बीज कभी तड़प नहीं बन सके और दूसरों को कभी छाया।
- 23:46और मीठे फल नसीब न हो सकेंगे। सबसे पहले तुम स्वार्थी बनो, तुम
- 24:03प्रार्थी बनने की जल्दी मत करना, पर अर्थ तो हो जाएगा जैसे गागर
- 24:10बरती है। ओवरफ्लो होती है ना?
- 24:17बस। ऐसे ही ओवरफ्लो हो जाएगा।
- 24:25उसकी जल्दबाजी की तो चूके हैं। इसलिए कबीर कहते हैं कि शान्ति
- 24:37बनाये रखना, धीरज बनाये रखना। माली सीचे सो घड़ा ऋतू आए, फल होए
- 24:51फूल तो तभी खेलेंगे जब मौसम आएगा। जब वक्त आएगा फल तो तभी लगेंगे
- 25:02धीरे धीरे रे मनन जीवन को अर्थ। और जीवन को सही दिशा देने वाला यह
- 25:14शब्द अपने अंतश में बैठा लेना, व्यर्थ के कचरों के बजाए व्यर्थ
- 25:26के कचरों को हृदय में बसाने के बजाए।
- 25:30जो जो शुभ है तुम्हारे जीवन के लिए, वो अपने न्यूरोस में बारलेना
- 25:38ज्यादा अच्छा है मैं कहता हूँ अच्छा वही है तुम व्यर्थ के
- 25:46बकवासों को। अपने निर्वांश में मत भरो, वो
- 25:51चाहे गीता हो, चाहे कोई भी धर्म ग्रंथ हो, बाइबल हो, कुरान हो,
- 25:59ग्रंथ हो, कुछ भी हो, ये व्यर्थ की बकवासी हैं इनको निर्वांश में
- 26:07फीड करने की बजाय। सही सही बातें जो तुम्हारे जीवन
- 26:12में लोगों के काम आ सकती है तुम अगर गीता के शलोक रख लेते हो अभी
- 26:22छः 6 साल के बच्चे गीता के शलोक को रोते हुए हैं।
- 26:30बड़े बूढ़ हैं तक इसका अर्थ नहीं जानते जगती इसका अर्थ आपको समझा
- 26:36रहे हैं? आचार्य का संघ हो गीता के रंगों
- 26:41में क्या मस्ती है क्या मौज है? बड़े बूढ़े तक उस तल पर जा नहीं
- 26:53पाए। जीस तल से बोले समझाने की
- 26:58जल्दबाजी हो गई बस ये वो ही काम हो गया।
- 27:01कबीर से उलट चले। कबीर कहते हैं, जल्दबाजी मत करना,
- 27:09धैर्य रखना। धैर्य रखोगे तो बंटने के लिए
- 27:17एकत्रित हो जाएगा। अगर फूलों ने धैर्य न रखा होगा
- 27:24होता। कलि बनकर सुकड़े न होते सुगन्धों
- 27:31को इकट्ठा न किया होता पृग्रहण न किया होता तो आज फूल बनकर तुम्हें
- 27:40सुगंधी बांट नहीं सकते थे। धीरज रखा।
- 27:49जब फूल कली होती है तो परम स्वार्थी होती है, अपना मुखड़ा
- 27:54बंद कर लेती है, आप देखना कली को कैसे ऊपर से मुँह बंद होता है,
- 28:00उसका बस यही कली की निशानी है? प्रथम चरण यही है जीवन में पहले
- 28:09परिक्र होकर कह रही म पर काज हित संपत्ति सच ही सुजान संचय न करोगे
- 28:24तो बांटोगे क्या? अगर संचय ना करोगे, बांटोगे क्या?
- 28:33फिर तो कागची फूल दिखाओगे? ये लो ये हमने ये बना दिया, हमने
- 28:46ये बना दिया हमने जो बना दिया। फिर तो कागजी फूल हमने एम्स बना
- 28:53दिया है, उसमें किसी मरीज का इलाज नहीं होगा क्योंकि है ही नहीं।
- 28:57एम्स हमने विश्वविद्यालय बना दिया है, वहाँ आपको कोई शिक्षा नहीं
- 29:04मिलेंगे, क्योंकि है ही नहीं। झूठे सपने दिखाना स्वयं के साथ भी
- 29:14गात करना होता है। तुम्हें भी कभी न कभी तो शर्म
- 29:20आएगी कभी न कभी प्रत्येक की आत्मा जागती है और दिखाती है।
- 29:28कि तुमने ये किया तो क्या किया? तुम पर अगर किसी ने विश्वास किया
- 29:40तो तुमने उसका प्रतिफलन क्या दिया?
- 29:44गुरु को भी ऐसा ही करना चाहिए। गुरु को बांटना चाहिए।
- 29:50बांटने का दिखावा नहीं करना चाहिए अगर कच्चे कच्चे तुम कागज़ के फूल
- 30:01हो, धरती की छाती फाड़ के निकला हुआ फूल नहीं।
- 30:07तो फिर तुम बांटने का दिखावा मत करना।
- 30:09दिखावा बड़े से बड़ा पाप है। धरती के ऊपर उससे बड़ा कोई पाप
- 30:16नहीं है क्योंकि दिखावा एक छलावा है, होती नहीं है।
- 30:20वो चीज़ जिसे तुम प्रकट करने में लग जाते हो।
- 30:28और। उस दखावे करने वाले।
- 30:31को लोगों में। प्रसारित करने वाला महापापी है।
- 30:47फिर तुमने? एक झूठ को बल दिया, एक पापी को बल
- 30:53दिया। यही तो कृष्ण कहते हैं अर्जुन
- 31:00गिना रहा है अपने संबंध, अपने उपकार ये मेरे गुरु हैं।
- 31:07मेरे भीष्म पिता में हैं, ये मेरे भाई हैं, ठीक है आज लोह के वश
- 31:16इनकी बुद्धि विकृत हो गई लेकिन हैं तो आखिर मेरे भाई मैं इन्हें
- 31:21मार दूंगा तो पुनः जीवंत करने की क्षमता मेरे में नहीं है।
- 31:28इसलिए प्रभु मैं भाग जाना चाहता हूँ युद्ध से मैं नहीं लड़ूंगा।
- 31:41मुझे ये सब अच्छा नहीं लगता। लेकिन कृष्ण कहते हैं देखो अगर हम
- 31:53राह पे बिछे हुए खार कांटे न चुग पाए, न चुग पाए।
- 32:02तो फिर हम आने जाने वाले राहगीरों का भला नहीं कर सकेंगे।
- 32:07तुम अगर समर्थ हो तो इन खार इन कांटों को चुगलु एक तरफ़ हटा दो
- 32:19ताकि ये कांटे। आते जाते हुए राहगीरों के पांव
- 32:22में जोब न सकें। रहीम कहते हैं कि संचय करना कोई
- 32:36बुरा नहीं है लेकिन संचय है। पहले संचय होना चाहिए, फिर संचय
- 32:47करना चाहिए। तुम्हें योग्य तो बना बांटने के
- 32:54बिना योग्य बने बांटने के तुम बांटने लग जाओ, वह तो छलावा है।
- 33:05दिखावा मात्र छलावा होता है क्योंकि तुम्हारे पास जो बाँट रहे
- 33:10हो वो है नहीं। आज सारी दुनिया में मुझे पता है
- 33:21बेरोजगारी से तंग है, महंगाई से तरसता है।
- 33:28और कुछ उसके अपने विषय वासनाएँ लोभ अंकाक्षाय आकाश में उड़ने की
- 33:37आकांक्षा बड़ी कार हो और वो भी एक दो नहीं ढेरों से।
- 33:50धर्म प्रचार इकाई जिसने आपका जीवन बदलना था वो कहती हैं कि जब
- 33:59अप्रैल का नया मॉडल आता है, मैं नहीं रह सकती उसके बिना तो क्या
- 34:04खाक जिंदगी को बदलो के लोगों के? प्रचारिका को या प्रचार को खुद
- 34:16दुख सहके भी जैसे तवर घनी धूप में खड़ा रहता है खुद पथिकों को छाया
- 34:25देने के लिए। यह बड़ा आसान मसला नहीं है जितना
- 34:31तुम समझते हो। ये दिखावा ये होता है, कमाया नहीं
- 34:41है, रिटर्न तो किया है जैसे 6 साल के बच्चे ने रट लिखी था।
- 34:48गीता रटरी जीवन का सार न रटा जीवन का सार न जाना वह का खाक बांटेगा
- 34:57बड़ा होकर तुम्हें शब्द बोलेंगे बहुत बढ़िया उसका फ्लो।
- 35:04इन संस्कृत बहुत बढ़िया होगा। और तुम सिर्फ शब्दों से ही मोहित
- 35:10हो जाते हो, बस शब्द बोलने वाला निक्षनाथ हो, तुम तो धोखा खाये
- 35:21बैठे ही हो। तुमने तो जैसे कसम खा ली है कि हम
- 35:26बदलेंगे नहीं, धोखा खा लेंगे, तुम्हें भीतर की बात बताऊँ, ये
- 35:34अहंकार की तरकीब है। अहंकार बदलना नहीं चाहता।
- 35:42अहंकार बदलने से डरता है। बीज अपनी स्थिति को बदलने से डरता
- 35:47है। क्यों मठना पड़ेगा?
- 35:50बीज को फूटना पड़ेगा। तभी भीतर से अंकुर उपजेगा अहंकार
- 35:57की तरकीब है। ट्रांसफॉर्मेशन से बचने के लिए कि
- 36:04धोखा खा जाओ, कोई बात नहीं, गलत मतलब रिटर्न कर लो, जैसे भी
- 36:12बचेंगे, सड़े गले बचेंगे तो। लेकिन कृष्ण कहते नहीं ये भी क्या
- 36:25जीवन है गले, सड़े जीवन के साथ जीना भी क्या जीना है नाचते गाते,
- 36:37खुशबू बिखेरते। खुशबू से खुद शराब और होते आनंद
- 36:43का नजारा लेते बांटने की चेष्टा नहीं करनी बट तो जाता ही है, फूल
- 36:49ने कभी बांटने की चेष्टा की। तरबोर ने कभी छाया बांटने की
- 36:55चेष्टा की। फल बांटने की चेष्टा की।
- 37:01वह तो आते जाते राहगीर तोड़ लें या पशु पंछी खा जाएं।
- 37:06तवर तो सबके लिए खुला है, वो तो पशु पंछी भी बैठ के खा लेते हैं।
- 37:14जब भूखे होते हैं कहीं से कुछ नहीं मिलता हो तो तरवर्त आगरण
- 37:19उनके फल सदैव सभी के लिए समान रूप से विद्यमान हैं।
- 37:29रहीम कहते हैं बांटने की जल्दी ही मत करना।
- 37:36कबीर का शब्द फिर दोहरा तुम धीरे धीरे रे मना इस शब्द को अगर तुम
- 37:45भूल गए तो ज़िन्दगी का आनंद समझो तुमने भुला दिया।
- 37:55क्योंकि धैर्य ही तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य तक पहुँचाए और
- 38:02तुम्हारा लक्ष्य क्या है? तुम भूखे हो, तुम्हारा लक्ष्य है
- 38:06तृप्त होना, पेट भरना नहीं, तृप्त होना मेरे शब्दों को थोड़ा सा
- 38:12गहरे से समझना करो। पेट भरना तुम्हारा लक्षण है।
- 38:18तुम भूखे हो और सिर्फ तुम्हारा पेट ही भूखा नहीं।
- 38:35तू हैं मेरा प्रेमदेवता। इन चर नन की दासी हूँ, मैं मन की
- 39:05प्यास भुझाने। आई मन की प्यास भुझाने आई अंतर्घट
- 39:28तक। प्यार सी हूँ मैं तू है मेरा
- 39:41प्रेम देवता तू है मेरा। प्रेम देवता इन चरनन की दासी में
- 39:58मन की प्यास भुझाने आई। मन की प्यास भुझन आई अंतर्घट तक
- 40:17प्यासी हूँ तो है मेरा। प्रेम देवता, तुम तुम्हारा सिर्फ।
- 40:34पेट भूखा नहीं, तुम अंतरात्मा तक भूखे हो।
- 40:45तुम्हारा मन भी भूखा है, तन भी भूखा है, भूख बढ़ी गहरी है, इसलिए
- 40:56मैं कहता हूँ सिर्फ पेट के भर लेने से भूख शांत नहीं होती।
- 41:04तमारिक सुधा गहरी तृप्ति से कम गुज़ारा नहीं होगा और तृप्ति पर
- 41:14गुज़ारा हो जाएगा। इससे कम पे गुज़ारा नहीं होगा।
- 41:21और तृप्ति से ज्यादा भी गुज़ारा नहीं चाहिए।
- 41:26गो धन गज धन बा ज धन और रत्न धन खान जब आव संतोष धन शव धन धुर
- 41:38शमन। जब तुम्हें सारे धन धूल के बराबर
- 41:54लगने लग जाएं। अब इन शब्दों को ध्यान से सुनना
- 42:02जब तक तुम्हें लगता है। के पदार्थों से भूख मिट।
- 42:09जाएगी तो? इस इच्छा को दबाना मत इच्छाओं का
- 42:16दमन कभी मत करना, ये एक अनोखा पाद है।
- 42:26तुम्हारे भीतर इच्छा उठती है, वह तुम्हारे तुम्हारी ऑथेंटिसिटी का
- 42:33पता देती है प्रामाणिकता का तुम हो कहाँ तुम्हारा अन्तरस कहता है
- 42:40कि पदार्थों से भूख मिट जाये। बिलाशक पदार्थ इकट्ठा करो।
- 42:49तुम्हारा अंत से कहता है, गद्दियों से भूख मिल जाएगी।
- 42:54बिलाशक गद्दियाँ इकट्ठी करो, हीरे ज्वारतों से मान सन् मान से,
- 43:02काबिलियत से। सूचनाओं को एकत्रित करने से सभी
- 43:09संसार की सूचनाओं को न्यूरोन में भरने से तुम्हें तृप्ति मिल
- 43:15जाएगी। बिला शक इकट्ठा।
- 43:16करो दबाव मत। लेकिन एक वक़्त ऐसा है कहा जब तुम
- 43:33धन भी घुमारोगे गद्दियाँ भी घुमारोगे हीरे जवाहरत भी घुमारोगे
- 43:40मान सम्मान भी घुमरोगे जनता जयजाकार कर के।
- 43:51सब सुख साधन तुमको मालूम है सब जिसमें भी सुख नजर आया मन को वो
- 44:02तुमने देख लिया करते हैं और फिर भी अगर तुम पाओ।
- 44:09मन की प्यास बजाने आई। अंतर्घट तक प्यास सी हों।
- 44:26तू है मेरा प्रेम देवता। तुम्हे लगे कभी प्यास बुझी नहीं
- 44:37प्यास, जौ की क्यों भरकर आया? तो समझ लेना कि तुम्हें प्रेम की
- 44:45प्यास है और प्रेम न तो खेत में उपजता है, प्रेम न बाड़ी उपजा है,
- 44:57न किसी दुकान पे मोल बिकता है, प्रेम न हार्ट बिका है।
- 45:04और तुम्हारी आत्मा अंतरघट तक प्यासी हूँ मैं कैसे प्यास होजेगी
- 45:13तू है मेरा प्रेम देवदार प्रेम ही बजा पाएगा इस व्यास को नफरत?
- 45:21करके देख लो मुझे लोग कहते हैं ये नफरत में धकेल रहे हैं लोग, मैंने
- 45:27कहा स्वाद सख लो, क्रोध का स्वाद सीखो, घृणा का स्वाद सीखो ईर्ष
- 45:35नफरत सभी का स्वास्थ्य हो क्या हर्जा है, शायद इस में मिल जाए?
- 45:43और जब तुम बखूबी पाओ मर्ज बढ़ता ही गया, जूं जूं दबा के ये तो रोग
- 45:51बढ़ता ही चलता है और तुम्हें कुछ न मिले पदार्थों में।
- 45:59तुम्हें कुछ न मिले पद्बियों में सारी दुनिया तुम्हारे सामने न तुम
- 46:05मस्तक हो जाए तुम चक्रव्रती सम्राट हो जाओ, फिर भी आत्मा की
- 46:14प्यास न बुझे तो तुम समझ लेना। कि यह प्यास, प्रेम की प्यास और
- 46:28यही मीरा कहती है। तेरी मैं तो प्रेम दीवानी।
- 46:43मेरे दर्द न जाने को मैं तो। दीवानी मेरो दर्द न जाने को।
- 47:19पर मीरा को पता लग गया। ठीक है ये भूख, ये प्यास, ये तो
- 47:26प्रेम की है और लोग नहीं समझते। लोग यही समझेंगे कि मान की भूख ही
- 47:38है मेरा। पदार्थों की भूखी है मीरा भोगों
- 47:45की भूखी है मीरा, लेकिन मेरा के पास सब कुछ है बुद्ध के पास सब
- 47:54कुछ है छोड़कर चले जाते हैं। उन्हें पता चल गया, हेरी मैं तो
- 48:03प्रेम दबाने मुझे प्रेम चाहिए। पदार्थों से भूख नहीं मिली।
- 48:14गद्दी से भूख नहीं मिली उसके पास है।
- 48:17नौकर चाकर हैं, दास दासियाँ सेवक सब हैं, पदार्थ हैं, हीरे
- 48:24ज्वारार्थ हैं, राजा राज़ पुत्र हैं और राज़ राजा इतना सुख नहीं
- 48:32ले पाता जितना राज़ पुत्र ले पाता है क्योंकि।
- 48:37कोई बोझ नहीं होता। व्यवस्था को संभालने का राजपुत्र
- 48:42जितनी कोई ऐश नहीं कर सकता। राजपुत्र बिल्कुल खाली होता है ऐश
- 48:49लेने के लिए और राजा के दिमाग पर तो 1000 बोझ होते हैं।
- 48:58और जब जान लिया कि ये प्यास नहीं बुझते, ये भूख नहीं मिटती तो आंधी
- 49:05रात को भाग जाते हैं। वो घर से पुत्र छोड़ दिया।
- 49:12पत्नी छोड़ दी, मलकियत छोड़ दी। मीरा भी राजघराने में ब्याह थी।
- 49:20भोजराज के साथ बुधवासी भोजराज की मृत्यु हो गई थी, लेकिन बचपन से
- 49:29ही प्रेम जमाने थी। कृष्ण की मूर्ति पास रखकर सोया
- 49:33करती थी इतनी जीवानगी मीरा के भीतर लेकिन तुम समझते हो कि मीरा
- 49:48को साधारण प्यास है। साधारण प्याज तो पदार्थों से बूझ
- 49:53जाती है। पेट कितना खायेगा?
- 49:58आखिर भरेगा तुम? रोज़ भूख भूखे होते हो, रोज़ पेट
- 50:02भर लेते हो, लेकिन भूख कहाँ उठती है?
- 50:08वह जो अंदरूनी भूख है? वह यथावत बरकरार रखे।
- 50:23जब पदार्थों से सब कुछ इकट्ठा करके भीख हमारा मन भटकता रहे ठहरे
- 50:32न संतोष नाय। सिथर न हो भागता फिरता रहे तो समझ
- 50:44लेना कि यह भोग कोई साधारण भोग नहीं है, असाधारण भोग है, यह
- 50:52प्रेम के भोग है। और प्रेम के भूख प्रेम से ही मत
- 51:00देखे, प्रेम क्या है? प्रेम न बाड़ी उपजाये प्रेम न हाथ
- 51:16भगाया। इस प्रेम की अगर जरूरत है राजा
- 51:23वर्जा सभी के लिए समान है यह नियम कायदा कानून क्या शीष दे ले जाया
- 51:35प्रेम तुम्हारे अहंकार की बलि मांगता है।
- 51:40अगर दे सकारा में समर्थ हो तो अहंकार को बलि दे दो नारियल की
- 51:46बलि न दो बकरों की बलि न दो नीरे हैं निर्दोष पशुओं को क्यों मारत
- 51:54हो? उनका क्या कसूर है?
- 51:584 दिन जन्म गानि जी लेने का, उन्हें उनका हक है।
- 52:07अगर तुम ताकतवर हो इसका ये मतलब नहीं है, तुम निरही प्राणियों की
- 52:13जान ले लो। राजा अगर ताकतवर है, इसका मतलब ये
- 52:19नहीं है। निर्दोष जनता को मारना शुरू करते
- 52:21हैं और जिसने ऐसा किया उसका अंतिम हर्ष भी वैसा ही हुआ।
- 52:30कहाँ बच पाते हैं हिटलर? मसोलनी स्टालिन?
- 52:35नहीं बच पाते प्रेम के भोग प्रेम की प्यास, प्रेम से ही मटेगी और
- 52:48प्रेम कैसे मिलेगा अहंकार की बलि देने से, पशुओं की बलि देने से?
- 52:56दूसरों की बलि देने से प्रेम नहीं मिलता, स्वयं की बलि देनी होती है
- 53:06और अहिंकार के लिए सबसे कठिनतम मसला है।
- 53:14खुद की बलि दे देना अहंकार खुद बलि नहीं होना चाहता, सब चीजों की
- 53:22बली दे देगा। पदार्थों को बाबर में फेंक देगा।
- 53:29जीवजंतुओं की बली दे देगा। कोई ज़माना था जब अश्वमेध जग तो
- 53:34हम थे, घोड़ों की बलि दी जाती थी, नर बलि दी जाती थी, कोई वक्त था
- 53:46तुम मुझसे कहते हो बाबा तुम क्यों बोलते हो?
- 53:49इनके विरुद्ध अगर न बोला होता तो आज नरबलि शुरू रहती।
- 53:57कुछ हिम्मत वर लोगों ने आवाज उठाई।
- 54:01यद्यपि वो लोग भी उतने ही ताकतवर थे।
- 54:04जीतने आज ताकतवर हैं। लेकिन उन्होंने आवाज उठाई सती
- 54:15प्रथ औरत विधवा हो गई, उसका घर वाला मर गया, मीरा ने साफ इंकार
- 54:23कर दिया। मेरा करती मैं नहीं चलूँगा
- 54:28क्योंकि मेरा पति अभी जिंदा है जा के सिर्फ मोरू, कुछ मेरा पति सोई,
- 54:37किसी का पति कभी मरा। है।
- 54:41तुमने कभी सोचा? तुम्हारा पति कौन है?
- 54:49तुम्हारा पति कभी नहीं मरता नैनम शिद्दति शास्त्रण है नैनम दहती
- 54:55पावु का किसी का पति कभी मरा है। इस लोथड़े को मृत होने पर तुम
- 55:04दूसरे जनता व्यक्ति को अग्नि में स्वाहा कर देने पर तुले।
- 55:09हो अगर कुछ। व्यक्तियों ने आवाज न उठाई होती
- 55:19तो आज सती प्रथा वैसे ही रहती। आवाज़ उठाने का भी हौसला होना
- 55:26चाहिए। साहस के बिना ये काम भी नहीं
- 55:30होता। बहुत से तथाकथित सुर में भेड़िए
- 55:38कायर जिन्होंने सिंघ के लबाते पहन रखे हैं।
- 55:43वो तुम्हारे विरुद्ध खड़े हो जाएंगे।
- 55:48मुझे रोज़ फ़ोन आ जाते हैं। बाबा तेरे को मार दे, तू मत कहा
- 55:52कर राधे राधे कहने से मिल जाता है मैंने कहा तुम्हें मिल जाता है
- 55:56तुम करते रहो मैं तुम्हें कहाँ रोक दो।
- 56:00मैं तुम्हें देखने नहीं आता, मैं तो घर से बाहर नहीं, तुम करते
- 56:06रहो, मुझे मारने से आवाज बंद हो जाएगी।
- 56:13क्या नहीं मालूम क्या? बिल्कुल, मुझे लगता है शोर से
- 56:26नहीं मिलता वह मोहन ये बिल्कुल विरोधी बात है तलाश है तुम्हें
- 56:33शांति की फैला रहे हो तुम कोलाहल बना कैसे मेरे को शब्द कोलाहल है।
- 56:44नाम जब कुलाहल है और तुमने पाना है पर मोन को मोन को भी नहीं पर
- 56:53मोन को जहाँ पिन ड्रॉप साइलेंस जहाँ पिन ड्रॉप भी नहीं।
- 57:02पत्ते के टूटने की आवाज भी नहीं है।
- 57:09इतना इतना चुप है वो वहाँ जाकर तुम्हारी वासनाएं शांत हो जाती
- 57:16हैं। मतलब कोलाहल मच जाता है।
- 57:19यह वासना ही कोलाहल। वहाँ जाकर तुम्हारा मन मिट जाता
- 57:23है। मतलब कोलार बिखेरने वाला समाप्त
- 57:27हो जाता है। मन ही तो कोलार मचाता है, वह पर
- 57:36मौन की व्यवस्था है। और।
- 57:48जिन लोगों को राधे राधे करने से मिलता है वो मज़े से करे लेकिन
- 58:01मैं ये कहता हूँ कि मिलेगा नहीं, मैं भी तो अपनी बात कहने में
- 58:07स्वतंत्र हूँ ना? जिसने सती प्रथा बंद किया है।
- 58:16तुम ज़रा सोचो जितनी जागती जनता, अभी उसकी हजारों तमन्नाएँ शीर्ष
- 58:23हैं। और उसका पति मर गया है, आग की
- 58:35आहुतियों में उसे भी चलाता हूँ। क्यों तो कुछ प्रबुद्ध व्यक्तियों
- 58:45ने सोचा ये अन्याय है जैसे आज बकरों के साथ निनाय हो रहा है।
- 58:51तुम अपने स्वाद के लिए बलिदान देते हो, परमात्मा के नाम पर
- 58:59अल्लाह के नाम पर तुम बलि देते हो और बाद में क्या करते हो, खुद खा
- 59:04जाते हो उसे। सिर्फ नाम प्रयोग करते हो अल्लाह
- 59:11का परमात्मा के नाम के ऊपर तुम्हारी भी बलिया चलती हैं तुम
- 59:18कोई कम नहीं हो सदा से ऐसे अशिष्ट व्यवहार चलते रहे, क्रूर व्यवहार
- 59:26चलते रहे। मैंने कहा एक बार अशुभ में तो था
- 59:31ही तुम जीते हो तो बेचारे अशुभ का क्या कसूर क्यों मार रहे हो?
- 59:39घोड़े को तुम्हें खुशी है तो आप इसमें मिल बैठो, गले मिलो, ईद
- 59:46मनाओ। तुम बकरों को क्यों मार रहे हो?
- 59:50अंडर दोष प्राणियों को उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?
- 59:59उनके पास भी अधिकार है, ये ठीक है, तुम्हारे संविधान ने अधिकार
- 1:00:03नहीं दिया। हमारा संविधान उस अधिकारों को खा
- 1:00:07गया। वो बेचारे बोल भी नहीं सकते हैं।
- 1:00:13मूक प्राणी हैं, बेजुबान हैं, लेकिन गिड़गिड़ाते तो बहुत हैं।
- 1:00:23तुम उनकी आवाज़ नहीं सुन पाते हो, बात अलग है, गिड़गिड़ाते बहुत हैं
- 1:00:28तुम्हारे सामने कि छोड़ दो मुझे माफ़ कर दो, मैंने क्या अपराध
- 1:00:33किया तुम्हारी बकरीद आई है तो तुम आपस में गल बकड़ी मिलो गले मिलो
- 1:00:41ईद मनाओ। लेकिन।
- 1:00:45तुम ऐसे ही हो जो। कहानी।
- 1:00:48सुनी तुमने बेड़िया की और मेमने की।
- 1:00:55मेमने को देख कर लबा लबा से मेमने बेचारा चिकना, चिकना।
- 1:01:03पानी भी ना यार नीयत। खराब होगी, बढ़िया की कहते।
- 1:01:09तुमने मुझे गाली ना गाली? मैं मैं कहने लगा मैंने तो गाली।
- 1:01:16नहीं निकाली नहीं, नहीं। और तुम मेरे पानी को खराब।
- 1:01:23कर रहे हो? पानी पानी तुम्हारी तरफ से मेरी
- 1:01:29तरफ आ रहा है, तुम झूठा करते हो, वो मैं पी रहा हूँ।
- 1:01:36उसने कहा अब मंशा तो। कुछ और थी।
- 1:01:40ऐसे ही डिक्टेटर की मंशा होती है इसलिए रोज़ कानून बदल देते हैं।
- 1:01:53पिछले साल तुमने मुझे गाली। निकाली थी और मैं।
- 1:01:58कहने लगा कि पिछले। साल तो मैं मेरा जन्म ही नहीं हुआ
- 1:02:01था, मैं तो हूँ ही सारा दो महीने का।
- 1:02:06तो भेड़िए ने सोचा कि देखो खाना तो है।
- 1:02:09ही बस ये तुम सीधा। कहो ना कि खाना ही।
- 1:02:13है। मन मंशा सीधी ज़ाहिर होनी।
- 1:02:17चाहिए कि खाना है हमें? लबा।
- 1:02:22लबा सा चिकना, चिकना सा। हमेशा अच्छा लगता है।
- 1:02:30कहता तुमने नहीं निकाली तो? तुम्हारे बाप ने निकाली ओके?
- 1:02:34अब वो कैसे मेरा बाप भी नहीं है। मैं कहने लगा कि मुझे मेरे।
- 1:02:44मुझे तो पता नहीं है मेरा बाप कब तुम्हें गाली निकाल के नहीं,
- 1:02:49नहीं। बिल्कुल तुम्हारे बाप ने निकाली।
- 1:02:52और उसे खा गया बस कारण चाहिए। तुम्हें।
- 1:02:58हलाल करने का कारण चाहिए। और तुम तरसा तरसा के मारते हो?
- 1:03:06कल में परख के दरिंदगी के भी। कोई हद होती है?
- 1:03:19मारना तो ना झटके से अच्छा ना हलाल।
- 1:03:21से अच्छा ये मार ही गया हमारे यहाँ।
- 1:03:26कहावत है कि अपने अपने। ही होते हैं अपने अगर।
- 1:03:31मारेंगे तो? छाया में कराएंगे।
- 1:03:361 दिन मैं बैठा। ये बात हुई, मैंने कहा।
- 1:03:38सुनो, जब तुम मर। ही गए तो छाया में।
- 1:03:43डालो के धूप में डालो आखिर तो आग में ही डाल देते हो मरने के बाद।
- 1:03:50तो अपना कौन अपना वो जो। मारे ही न हो, जो जिंदा रखने की
- 1:03:55कोशिश करें। और अगर मरता भी हो आदमी, तो उसे
- 1:03:58बचाएगा वो। अपना मरेगा बेगाना, बचाएगा अपना
- 1:04:10और तुम्हारी कहावतें अक्सर मूड। व्यक्तियों ने बनाई।
- 1:04:19तरवर फल नहीं खाते हैं। सर्वर पिया ही नप्पा फूल के
- 1:04:27थपेड़ों से प्रकृति। से।
- 1:04:31जीने का फॉर्मूला सीख लो यह मंत्र है।
- 1:04:38बीज को मिटना होता। है।
- 1:04:39वृहद बनता है और मिटे बिना बीज वृहद नहीं हो सकता।
- 1:04:49सबसे पहले। अगर प्रेम चाहिए प्रेम की?
- 1:04:56पराकाष्ठा चाहिए। तुम संसार के ऊपर राज़ करना
- 1:05:02चाहते। हो तुम चाहते हो मैं चक्रवर्ती
- 1:05:05सम्राट हो जाऊं, लेकिन तुम्हें पता नहीं तुम्हारी अज्ञानता है,
- 1:05:10तुम चक्रवर्ती सम्राट पहले से ही हो।
- 1:05:14ज़रा। उस तल पर जब जाओगे।
- 1:05:18पर सारे विश्व के। कण कण में जब फैल।
- 1:05:20जाओगे तो? तुम्हें पता चलेगा।
- 1:05:26कि ओमनी। प्रेसेंट तो मैं पहले से।
- 1:05:28ही हूँ। और जो ओमनी।
- 1:05:31प्रेसेंट है उसकी सारी। शक्ति भी तो उसी की है तो ओमनी
- 1:05:35पोटेंट भी तुम्हें हो और जब सारी। शक्ति तुम्हारी है तो ज्ञान।
- 1:05:41की शक्ति भी तो तुम्हारी है तो ओमनी।
- 1:05:45शिएंट भी तुम्हें हो सारा। ज्ञान भी तुम्हारा है।
- 1:05:50लेकिन पता। कब चलेगा?
- 1:05:52जिन खोजा तन पानी में गहरे पानी बैठ मिटना पड़ेगा।
- 1:06:00मिटना तुम चाहते नहीं। और ऐसा कोई?
- 1:06:04फॉर्मूला नहीं, कोई तरकीब नहीं। जो तुम्हारे अहंकार की इच्छा
- 1:06:08पूर्ति कर दे। अंकार चाहता है कि मैं भी बचा रहा
- 1:06:11हूँ सड़ाध युक्त कैंसर का फौड़ा चाहता है, मैं भी बचा रहा हूँ और
- 1:06:18शरीर भी सवस्थ रहे, ऐसा कभी नहीं होगा शरीर मरेगा या तुम मरोगे?
- 1:06:27दोनों में से एक। बचेगा।
- 1:06:30अगर तुमने जनता। रहना है तो शरीर को।
- 1:06:32मरने के लिए छोड़ दो, अन्यथा अपनी आहुति।
- 1:06:35देने के लिए। तैयार रह जाओ कैंसराइटिस का फोड़ा
- 1:06:40जब तक अपनी आहुति देने को तैयार नहीं होता, तब तक शरीर निरोग नहीं
- 1:06:45हो सकता। तुम रोगी हो गए।
- 1:06:51और तुम? उल्टी तरकीब चाहते हो तुम?
- 1:06:53चाहते हो? कि कैंसर भी बना रहे।
- 1:07:00शरीर भी बना रहे यह असंभव है। दोनों चीजें।
- 1:07:09जो प्रेम गली अति सांकरी। तब मैं दो न समा।
- 1:07:16जब हरि था, तब मैं नहीं। अब हरि।
- 1:07:20है मैं ना? प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न
- 1:07:26समा। दो नहीं समाते उसमें तुम्हारी
- 1:07:31इच्छा तुम्हारी। अहंकार की यही इच्छा?
- 1:07:33रहती है। मैं भी बचे जाऊ और प्रेम भी आ जाए
- 1:07:38नहीं, प्रेम नहीं आएगा, प्रेम आएगा।
- 1:07:43प्रेम तुम्हारी। भली मांगता है।
- 1:07:47ये तुम। प्रेम मिलाने की चा।
- 1:08:05प्रेम। मिलन।
- 1:08:08की चार शीर्षतलीधर? घर।
- 1:08:21मेरे आ। जे तो प्रेम मिलन की चार शीश
- 1:08:35स्तरीथ हर घर में रहूं। तुम उसका घर भी ढूंढ़ते हो और
- 1:08:41देखो आखिर में जाना ही पड़ेगा। मैं तुम्हें कहता।
- 1:08:46हूँ देर अवेर तुम्हें अहंकार। की बलि देनी ही होगी।
- 1:08:53इस इलूशन को मिटाना ही होगा। आज फोड़े को ऑपरेट करा लूँ।
- 1:09:06थोड़ी देर ठहर के साल बर्बाद करा। लेना।
- 1:09:10इसका उपाय एक ही है और। प्रेम की तरंग चाहते हो?
- 1:09:23तो प्रेम बलिदान मांगता है तुम्हारे अहंकार।
- 1:09:25का तुम्हारे एलूजन का यह बलिदान? देने के लिए राजी हो।
- 1:09:32जाओ। अगर तुम राजी नहीं होते, तो फिर
- 1:09:35दुखी बनो, दुखी रहो। क्योंकि इसे चस चस करते हुए फोड़े
- 1:09:46के साथ कभी कोई चैन से। सोया नहीं सोया यह रात भर दिन
- 1:09:54चसकता ही रहता है। यह दर्द करता है।
- 1:09:58यह दुख देता है। तुम्हारी ज़िन्दगी इसे नर्क बना
- 1:10:01दी है। अहंकार ऐसा ही फोड़ा है सर वर फल
- 1:10:08नहीं। खाता है।
- 1:10:10सर वर पिए, है ना पान बांटने? की जल्दी मत करो।
- 1:10:17पहले। भरो अपनी गागर।
- 1:10:19को बस तो जाएगा प्रकृति। से यही नियम सीख लो।
- 1:10:31फूल। का नियम सीख लो थपेड़ों।
- 1:10:33का नियम सीख लो। सरोवर का नियम सीख लो पहले।
- 1:10:42खुद को भरना होता है। सरोवर पानी से भरता है, बीज
- 1:10:47अमिटता है, तरोवर हो जाता है, विशाल वट वृक्ष बनता है।
- 1:10:55गागर भर जाती है। तुम न समझो के।
- 1:10:58बिखरने के लिए भरती है। नहीं भर जाती है।
- 1:11:02एक बूंद समाने के लिए स्थान नहीं बजता इसलिए वो बूंद बिखर जाया
- 1:11:06करती है। बांटने की कोई जल्दी नहीं है गागर
- 1:11:10को। बांट ही।
- 1:11:12जाएगा। तुम उसका तो फिक्र।
- 1:11:14ना करो अगर होगा ही। नहीं तो बांटोगे का?
- 1:11:18खाक। झूठे बांटने वाले मत बनो।
- 1:11:23क्योंकि तुम्हारे पास वो है ना? परमात्मा के आनंद को बांटने।
- 1:11:31वाले? नफरत बांट रहे हैं।
- 1:11:37घृणा की आग, द्वेष, बेईमानी की आग झूठ की आग में तुम्हें धकेल रहे
- 1:11:45हैं। और तुम आशा रखते हो के।
- 1:11:52आग तुम्हे ठंडक दे दे। नहीं देंगे, आग जलाएंगे और।
- 1:11:58जलोगे तो। चीखोगे चलाओगे और अगर?
- 1:12:04शांति चाहिए। तृप्ति चाहिए, शीतलता चाहिए तो
- 1:12:11नफरत की आग। से बाहर आना होगा।
- 1:12:14नफरत आग है। वैज्ञानिक कहते हैं कि नफरत के
- 1:12:18क्षण में क्रोध के क्षण में तुम्हारे भीतर कुछ ऐसे।
- 1:12:22हार्मोन। पैदा होते हैं जो तुम्हारे।
- 1:12:26खून को विषाक्त कर देते हैं और दंड किसे मिला दंड उसे?
- 1:12:32मिला जिसने नफरत की। इसलिए बुद्ध का कुछ नहीं बिगड़ता।
- 1:12:38बुद्धों का कुछ नहीं बिगड़ता बिगड़ता है, जो बुद्धों से नफरत
- 1:12:42करता है। और एक और भी।
- 1:12:48बात ध्यान मेरा क्यों संत? बोलेंगे नहीं।
- 1:12:54तो और कौन बोलेंगे कायर तो बोलेंगे?
- 1:12:58नहीं बताओ। कायर तो कहेगा अगर मैं बोलेंगे तो
- 1:13:02मुझे मार देंगे। यह 1000 संत में ही होता।
- 1:13:08है क्योंकि संत मर गया पहले और। जो मरा नहीं उसे मरने से डर।
- 1:13:18लगेगा। पर फिर तुम जैसे गीता?
- 1:13:24सीखते हो। अपनिश्चित सीखते हो।
- 1:13:30मृत्यु से डरने वाले ऐसे। लोग तुम्हें गीता से खा पाएंगे।
- 1:13:39कृष्ण तो कहते हैं। जहाँ मृत्यु है, वहाँ मैं हूँ ही
- 1:13:45नहीं मेरे होते मृत्यु कहाँ आएगी न?
- 1:13:51कोई शास्त्र में काटेगा न। कोई आदतों में ज़रा।
- 1:13:56मैं तो ऐसा हूँ मैं तो था हूँ और रहूँगा।
- 1:14:02और तुम्हें अपने ना होने का गम सताने।
- 1:14:04लगता है और तुम गीता की व्याख्या करने चले हो।
- 1:14:10कब होश? आएगी तुम्हें?
- 1:14:16आएगी। जैसे।
- 1:14:19ऐसे ही बुद्धा बना के। करोड़ों लोगों को चले जाओगे।
- 1:14:30कोई तो बोलेंगे। किसी को तो साहस बटोरना।
- 1:14:38ही होगा ये गलत। मान्यताएँ ही तभी टूटेंगी।
- 1:14:44मान्यता। कोई भी गलत हो उसे।
- 1:14:47साहसी व्यक्ति ही तोड़ पाता है। सबसे पहले कहने का साहस जुड़ा न
- 1:14:51होगा। मृत्यु का भय जिसे सताता।
- 1:14:57है, वह कहने का साहस नहीं कर पाएगा।
- 1:15:07दूसरों का कार्य संवारने। के लिए सज्जन पुरुष परिग्रह करता।
- 1:15:16मैं तुम्हें नहीं कहता कि तुम पर ग्रह न।
- 1:15:19करो। बिल्कुल करो, प्रग्र है किया तो।
- 1:15:26बीच टूटा और वृक्ष बना। ये प्रग्र है मिटने के बाद बढ़ना
- 1:15:34होता। है विराट।
- 1:15:35हुआ तुम भी मिटोगे तो विराट हो जाओगे।
- 1:15:39सबक सीखना तो ये सीखो। जो मिटा वो विराट हुआ और तुम
- 1:15:52मिटने से डरते हो। प्रकृति तुम्हें सिखाती है।
- 1:16:01कि यहाँ। शुद्र मिटता है बीज?
- 1:16:04वहाँ विराट प्रकट होता है वृक्ष फिर ही लोगों के।
- 1:16:09काम आता है घनी। छाया और मीठे फल देने के लिए और
- 1:16:14अगर बीज डरेगा मरने से। तो वाट वृक्ष नहीं बन पाएगा,
- 1:16:20मिट्टी फल नहीं दे पाएगा। तुम्हे सर वर फल नहीं।
- 1:16:24खाता है। सर वर पिया न पान।
- 1:16:32कह रही हूँ पर काज? हित।
- 1:16:38दूसरों के काज के संवारने। के हेतु।
- 1:16:45संचित कर ही सुजान। संचय करते हैं अच्छे आग में।
- 1:16:54तो संचय का करना कोई बुरी बात नहीं।
- 1:16:56है लेकिन। एक प्रोसेसर के अधीन संचय।
- 1:17:01करो और सिर्फ संचय ही ना करो तुम्हारा।
- 1:17:07संचय किसी को जीवन प्रदान। करे किसी को खुशी प्रदान करे,
- 1:17:11किसी को छाया प्रदान करे। मीठे फल प्रदान करें कोई।
- 1:17:17संतोष का सुख ले सके। चैन ले सके।
- 1:17:23तुम्हारा त्याग किसी काम आना। चाहिए और त्याग करने की इतनी
- 1:17:28ज़्यादा बाज़ी मत करना। त्याग को फलीभूत।
- 1:17:31होने देना त्याग। खुद से फलीभूत हो जाएगा।
- 1:17:35तुम्हें करने की आवश्यकता नहीं है।
- 1:17:39जब वेला आ जाएगी तब। फल भी आ जाएगा फल।
- 1:17:45भी आ जाएगा। माली सिंचन सो घड़ा ऋतू।
- 1:17:52आए फल होए वो आ जाएगा उसकी फिक्र मत।
- 1:17:55करना रहीम का ये दोहा बड़ा। प्यार है इसको वेग।
- 1:18:05से ही उठाना था। और वैसे ही मैंने आपको समझा दिया
- 1:18:15ढंग से शुरू करो और विराट हो जाओ मिटने की कला सीखो प्रकृति से।
- 1:18:26संचय की कला सीखो। बांटने के लिए और अगर बिना।
- 1:18:34संशय के आवंट हो गए। तो फिर?
- 1:18:38ये जो आज। कर रहे हैं नकली तथा कथित वैसे ही
- 1:18:45हो। के रह जाओगे।
- 1:18:47तुम तृप्त ना हो पाओगे तुम्हारी खुद की आत्मा चित्रकार करती
- 1:18:52रहेंगी तुम पानी। मांगती रहेंगी तुम्हारी आत्मा?
- 1:18:57तुम्हारा गला प्यासा। होगा।
- 1:18:59रोवा। रोवा पानी पानी की पुकार करेगा और
- 1:19:03तुम लोगों को उपदेश कर रहे हो। हौ टु बिकम ट्रिलिनेयर?
- 1:19:10बिलिनेयर। पहले ये तो देख लो बिलिनेयर।
- 1:19:16ट्रिलिनेयर होने में सुख मिलता है वह जो सच्चा सुख है।
- 1:19:24वह मिलता है किसी ट्रेलिनेयर। से जाके पूछ लो।
- 1:19:29किसी गद्दी नहीं से जाके। पूछ लो गद्दी में सुख है भोग
- 1:19:35विलासी। व्यक्ति से पूछ लो उसमें।
- 1:19:37सुख है वह तो छुटकारा पाने की चेष्टा में संलग्न।
- 1:19:44उनके। लिए तो यह एक संस्कार।
- 1:19:46बन गया है, छूटती नहीं है। काफिर मुँह पर लगी हुई है।
- 1:19:50अब उनका तो यह संस्कार बन गया है। अब वो छोड़ना चाहते हैं इतनी भारी
- 1:19:57कीमत। चुकाना नहीं।
- 1:19:59चाहते इतने थोड़े से सुख कर लिया। और संत तुम्हें?
- 1:20:04एक अखंड धारा में ले। जाना चाहता है आनंद की अखंड तारा
- 1:20:08में। तुम स्वतंत्र हो।
- 1:20:15गुलामी चुनो, आजादी चुनो, दुःख चुनो।
- 1:20:19या परम सुख चुनो। तुम स्वतंत्र हो।
- 1:20:24धन्यवाद श्री कृष्ण गोविंद। हरे मुरारी।
- 1:20:39हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण।
- 1:20:47गोविंद। हरे मुरारी।
- 1:20:55हिनाथ नारायण वासुदेव पितमातु स्वामी सखा हमारे पितमातु स्वामी।
- 1:21:14सखा हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:21:34हेनाथ नारायण वासुदेव। धन्यवाद।