Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Apr 26 - क्या गांजा पीने से भगवान मिलते है? गांजा, निद्रा और कोमा में चेतना के विभिन्न स्तर का वर्णन
Transcript
- 0:08विकास, बाथनी बंगलो से बाबा जी प्रणब मैंने एक बार गांजे का सेवन
- 0:26किया था। और कुछ देर के बाद मुझे अनुभव हुआ
- 0:33कि जैसे मेरा मन और बुद्धि किसी ने निकाल लिया है, कोई विचार
- 0:40नहीं, कोई भाव नहीं और बहुत ही शांति लग रही थी।
- 0:48ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने भीतर चला गया हूँ।
- 0:56मेरे दोस्त मेरे पास बैठे आपस में बातें कर रहे थे।
- 1:01मुझे वह बातें सुन रही थी लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी।
- 1:09बाबा जी क्या यह अनुभव सही है या नशे का भरम?
- 1:26अनुभव भी सही है। नशे का भ्रम भी सही है।
- 1:37गांजे का सेवन भगवान शिव की प्रतिमा के साथ जोड़ा गया है।
- 1:49इसकी उपयुक्त मात्रा तुम्हारे मन को सुला देती है।
- 2:02मन तो तुम्हारे रात को भी सो जाता है जब तुम में होते हो।
- 2:10लेकिन फर्क ये होता है। कि तुम्हारी सारी अंतरियां अपनी
- 2:19कार्यक्षमता खोजें, तुम्हें पता नहीं चलता कौन आया कौन चला गया।
- 2:32गहरी निद्रा में तुम रोज़ जाती और मैं अक्सर कहता हूँ कि गहरी
- 2:43निद्रा और ध्यान तुम दोनों। परिस्थितियों में एक ही जगह
- 2:53पहुंचते हो, ध्यान में भी तुम वहीं चले जाते हो, लेकिन जगह जगह
- 3:01निद्रा में भी तुम वहीं पहुँच जाते हो, लेकिन सोए सोए एक तीसरी
- 3:08वर्षा है कि तुम वहीं पहुँच जाते हो।
- 3:11लेकिन मूर्छित, मूर्छित मोर्चे में और सोने में फर्क है।
- 3:19एक चौथी अवस्था है वही तुम्हें बता दो, चौथी अवस्था न तुम सोए
- 3:30होते हो? ना तुम जगह होते हो लेकिन होते हो
- 3:35तुम उस तत्व के पास वह कोमा बहुत से लोग सोचते होंगे शायद कोमा में
- 3:44गया व्यक्ति बहुत दुख भोगता होगा नहीं, नहीं तुम्हारी गलती।
- 3:52कुंमा में गया हुआ व्यक्ति सुखों में होता है।
- 3:57तुम उसके फेज इम्प्रेशन देखो, ज़रा भी दर्द की कोई तुम्हें आहट
- 4:04नहीं मिलेंगे। अवश्य अच्छी तरह से समझ लो।
- 4:14जब तुमने गांजा का सेवन किया तो तुम उस तत्व के पास पहुँच गए,
- 4:22पहुंचे कैसे? मन और बुद्धि को?
- 4:29बेहोश करके ठीक निद्रा में भी तुम उसी तत्व में पहुंचे पहुंचे।
- 4:42कैसे मन और हो ठीक हो? सोलाकर मनप्रीत सो जाते हैं, तुम
- 4:54निद्रा में सो जाते हैं, गांजे में नशे में होते हैं, मोर्चा में
- 5:02होते हैं और कोमा में। न तुम मोर्चा में होते हो, न तुम
- 5:13निद्रा में होते हो होते हो उसी के पास, लेकिन तुम बेहोश नहीं
- 5:22होते, तुम बेहोश होते हो? इसलिए कोमा में पड़ा व्यक्ति
- 5:32तीसियों साल तक कोमा में पड़ा रह सकता है।
- 5:36उसके कार्य तंत्र यंत्र काम करता है, लेकिन वह दुख की परिस्थिति
- 5:47में नहीं है। यह प्रश्न आया था किसी?
- 5:52क्या कोमा में पड़ा व्यक्ति दुख भोगता है?
- 5:55नहीं बिल्कुल नहीं। दुख भोगता जैसे तुम निद्रा में
- 5:59होते हो, वैसे तुम कोमा में होते हो, कोमा लंबी निद्रा है और
- 6:08निद्रा छोटा कोमा है। ध्यान में क्या होता है?
- 6:20ध्यान में तुम उसी तत्व के पास सोते हो लेकिन ना तो बेहोश होते
- 6:27हो, ना मुर्छा में होते हो, ना सोये हुए होते हो।
- 6:39बिल्कुल ऐसे जैसे तुम्हें सुनाई पड़ रहा था इतने होश में भी होते
- 6:43हो बैठे हुए उस तत्व के पास होते हो, लेकिन अड़चन कहाँ है?
- 6:53अड़चन यह है कि बीच में तुम्हारे तुम्हारी सारी अचेतन, अवचेतन
- 7:05सामूहिक अचेतन यह बीच में होता है।
- 7:10पारदर्शी ढंग से तुम उस तत्व को निहार नहीं सकते।
- 7:17यह है तुम्हारा भीतर का कचरा जो तुम्हारे मन के अंदर इकट्ठा हुआ
- 7:24पड़ा है चेतन तो उस वक्त होता नहीं।
- 7:37लेकिन तुम उस तत्व के पास होते हो, अब तुम कौन हो जो उस तत्व के
- 7:46पास होते हो? इसी भ्रम को तोड़ने के लिए साधना
- 7:52होती। हजारों जन्मो से हम अलग अलग
- 7:59ज़ोनियों में संस्कारित हो गए हैं, एक इलूशन के।
- 8:11वह इलूशन है कि मैं शरीर हूँ, कभी पशु योनी में थे तो भी कभी पेड़
- 8:23की योनी में थे तो भी। कभी यूनीसेल्युलर, कभी
- 8:29मल्टीसेल्युलर, कभी दो पाया, कभी चार पाया इनके भीतर तुम मौजूद थे
- 8:39चेतना के रूप में। और तुमने एक संस्कार पा लिया कि
- 8:49यह पेड़ में मेरा होना पेड़ की तरह है।
- 8:58अमिबा को लगा कि मेरा होना अमीबा की तरह है।
- 9:03मैं यूनीसेल्यूलर हूँ, मैं मल्टीसेल्यूलर हूँ, मैं दो पाया
- 9:07हूँ, मुर्गे को लगता में दो पाया बकरी को लगता में चार पाया तो
- 9:15तुमने अपने शरीर के साथ एक संधि कर ली, तुम लिप्त हो गए?
- 9:25और तुम उसी को मैं मानने लगी। यही भ्रम है और इसी भ्रम को
- 9:33तोड़ने का नाम साधना है। इसी भ्रम को तोड़ने का फॉर्मूला
- 9:40ध्यान। पंचा का गुरु एक ज्ञान तो तुम जीस
- 9:52स्थिति में गए, पुत्र वह बिल्कुल ठीक है, लेकिन गए तुम किसी का
- 9:59सहारा नहीं। जैसे चलते तुम भी हो और चलता कोई
- 10:04बूढ़ा व्यक्ति दे, लेकिन बूढ़ा लाठी के सहारे चलता है, तुम बिना
- 10:14लाठी के चलते हो, बस इतना सा फर्क है तुम मैं और संत हूँ।
- 10:21तुमने गांजे का सहारा ले लिया। संत किसी का सहारा नहीं लेता, संत
- 10:28सीता उतर जाता है, बिना सहारे के जाना है।
- 10:34वहीं जो स्थिति तुमने जानी के कोई बोल रहा है।
- 10:41तुम उसे सुन रहे हो लेकिन प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है।
- 10:46नॉन ए रिऐक्टिव बिल्कुल ये ध्यान की अवस्था है मूर्च्छित ध्यान की
- 10:54अवस्था है। इसलिए, भगवान शंकर ने तुम्हें एक
- 11:01औषधि के रूप में यह प्रदान किया है गांजा और गांजा निर उत्तेजित
- 11:12करता है शराबी पीकर। तुम उत्तेजना में आ जाते हो
- 11:20स्टिमुलेशन गांजा खाकर तुम उत्तेजना में नहीं आओगे, तुम निर
- 11:31उत्तेजना में चले जाओ। तुम्हारे शरीर के तंतु उत्तेजित
- 11:38नहीं होंगे, टिशूज उत्तेजित नहीं होंगे।
- 11:47असल में तुम्हारे दुख का कारण है कि तुमने अपने आप को अब तक सच सच
- 11:55में सही सही में सटीक जाना है। तुम वास्तव में इन ए रियल हू आर
- 12:03यू वास्तविकता में ऑथेंटिकली हो आंसू प्रमाणिकता में तुम कौन हो
- 12:18यह तुमने जाना है। अभी तुम जो जान रहे हो वह
- 12:24लिप्तताओं के कारण जान रहे हो शरीर के साथ लिप्त हो गए भावना के
- 12:31साथ लिप्त हो गए विचारों के साथ लिप्त हो गए और तुम धोखा कहा गए
- 12:37कि मैं भावनाओं हूँ मैं विचार हूँ।
- 12:41मैं शरीफ हूँ यही दुख का कारण है, तो अनुभव पूछा ठीक था, अनुभव ठीक
- 12:52था अगर तुम क्रिया योग करके। उसी अवस्था में नहीं जा सकते तो
- 13:05गांजे का सहारा ले सकते हो, लेकिन सीमित मात्रा में एक्सेस ऑफ़
- 13:17एवरीथिंग इज़ बेक। अति सर्वत्र वर्जेत अति हर चीज़
- 13:24की बुरी होती है। घी चाहे कितना ही पोषक क्यों न
- 13:29हो, दूध चाहे कितना ही पोषक क्यों न हो, लेकिन अगर ज्यादा मात्रा
- 13:35में ले लिया जाएगा। तो लोस मोशन लगा दे तो गांजे से
- 13:44तुमने प्रथम झलक देख ली। तुम्हें समझा आ गया कि यह रोग
- 13:51मेरे साथ नहीं जाएगा। इसका उपाय है।
- 13:56तो, कीत्रम रूप से, आर्टिफीसियल रूप से तुमने देख लिया गांजे का
- 14:00सेवन करके और कीत्रम रूप से तुमने देख लिया कैसे नॉन रिऐक्टिव हुआ
- 14:10जा सकता है? बुद्ध इसी स्थिति में होते हैं,
- 14:17लेकिन जागते जागते हैं। बहू उनके ऊपर कोई थूक जाता है, वो
- 14:23प्रतिक्रिया नहीं करते। तुम भी उसी तल पर पहुँच गए बुध के
- 14:29तल पर लेकिन मूर्षित अवस्था में। बुद्ध जागृत पहुंचे।
- 14:36तुम मुर्शीत पहुंचे अगर किसी दिन तुम जागृत वास्था में बिल्कुल उसी
- 14:41स्थान पर पहुँच गए जहाँ कोई बात कर रहा है, लेकिन तुम्हारे भीतर
- 14:48किसी प्रकार का कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रहा है।
- 14:54तो तुम समझो ध्यान में चले गए। उसका दूसरा लक्षण भी है।
- 15:02दूसरा लक्षण है कि तुम उस अवस्था में हल्के हल्के आनंद से शुरुआत
- 15:08होगा आनंद बढ़ता ही जाएगा। क्योंकि ये मन ही आनंद के लिए
- 15:17बाधक है। ये बुद्धि ही आनंद के लिए बाधक
- 15:22है। बुद्धि की जरूरत है विवेक को पैदा
- 15:27करना। इसलिए बुद्धि नामक यंत्र हमें दे
- 15:32दिया गया। बुद्धि का प्रयोग करके विवेक का
- 15:37माखन निकालो, बुद्धि को रण को, विवेक का माखन निकालो, उस माखन को
- 15:45तुम ताओगे गर्म करोगे तो घी निकल जाएगा।
- 15:54तो विवेक पैदा करना है बुद्धि से वह विवेक क्या है?
- 16:01विवेक है मन ठहर जाए, मन प्रतिक्रिया न दे।
- 16:14तुम उस स्थान पर पहुँच जाओ जहाँ मन नहीं होता और बुद्धि भी नहीं
- 16:19होती। ऐसा गांजे से अनुभव तुमने कर लिया
- 16:27गांजा खाकर। न तुममें बुद्धि थी लेकिन वो
- 16:32मूर्छित थी। ऐसी ही अवस्था में अगर तुम जागृत
- 16:45जागृत चले जाओ। तो उसी को ध्यान कहते हैं।
- 16:52गांजे से तुम उस अवस्था में जाओगे तो धीरे धीरे आनंद बढ़ेगा, लेकिन
- 17:01उसकी एक सीमा बाहरी पदार्थों में। की सहायता लेकर तुम चल तो सकते
- 17:11हो, जैसे बूढ़ा लाठी का सहारा लेके चल तो सकता है लेकिन मैराथन
- 17:18की दौड़ नहीं लड़ सकता। बूढ़ा अपने घर से दुकान तक चला
- 17:26जाएगा। दुकान से घर तक आ जाएगा लाठी का
- 17:28सहारा लेकिन मैराथन का कॉम्पिटिशन नहीं लड़ सकेगा क्योंकि उसमें तो
- 17:36बिना सहारे के भागना होता है, निरंतर भागना होता है।
- 17:44तो तुमने पूछा है पुत्र, क्या ये अनुभव सही है या बिल्कुल सटीक सही
- 17:49है? 100% सही है जहाँ जाकर तुम नॉन
- 17:54रेक्ड हो जाओ। जहाँ जाकर मान और बुद्धि का नामो
- 17:59निशान भी न रहे और वहाँ दुख भी नहीं होता वहाँ तुम्हें हल्का सा
- 18:09सुरूर आएगा, बस इस सुरुर के लिए ही तुम।
- 18:16दीवाने हो जाते हैं। संत की वाणी में लेबर से बढ़कर यह
- 18:26सरोर किया करता है। इसलिए संत व्यक्ति को सुनते सुनते
- 18:32तुम अगाते हैं, क्योंकि इन शब्दों में खोखे शब्द नहीं हैं।
- 18:41वह रसीला पदार्थ भी है जिसे आनंद कहते हैं उसमें ये फोके शब्द
- 18:47लिपटते बढ़ के आए हैं। जैसे ही तुम संत को सुनोगे और
- 18:54जितना सुनोगे। वह अक्षर तो तुम्हारे शरीर से
- 18:59तुम्हारे दिमाग के ऊपर से निकल जाएंगे और तुम्हें फायदा होगा
- 19:06क्या कि वो जो शब्द जीस आनंद से लिपट के आए थे, गच मच हो के आए थे
- 19:15वो तुम्हारे भीतर उतर जाएंगे। और भीतर किसी स्पेस में अपना
- 19:22स्थान बनाने लगेंगे। अगर तुम लगातार किसी संत को सुनते
- 19:27ही रहो तो 1 दिन सिर्फ सुनने से ही तुम प्रबुद्ध हो जाओगे।
- 19:36बाबा नानक ने कहा है सुने दुख बाप का नाश सुने मात्र से ही तुम
- 19:44प्रबुद्ध हो सकते हो, यही महावीर ने कहा सच्चे श्रावक बन जाओ, तुम
- 19:55सिर्फ सुनो। संत को सुनो, संत की आवाज में एक
- 20:04वीणा की झंकार भी होगी जो तुम तुम्हें उस सुंदर इलाके की तरफ
- 20:13अग्रसर करेगी। जो तुम्हारा गंतव्य स्थान है जहाँ
- 20:18तुमने आखिर में पहुंचा उसकी मदहोश के आरंभ से आई हुई यह शब्दों की
- 20:26रचना तुम्हें भी मदहोश कर देती। अनुभव बिलकुल ठीक है और प्रथम अगर
- 20:48तुम्हें कुछ नहीं होता किसी चीज़ से तो तुम इसका सेवन कर सकते हो।
- 20:56निश्चित रूप से यह कारक है। इसलिए भगवान शंकर ने इसे अपने साथ
- 21:01रखा। भांग गांजा तुम्हें बताने के लिए
- 21:09वो खुद तो समाधिष्ट हैं, वो तो एनलाइटन पर्सन।
- 21:17उन्हें जरूरत नहीं है इसकी, लेकिन ये सिर्फ तुम्हें समझाने के लिए
- 21:22है कि अगर तुम्हें प्रथम दर्शन करने हैं अपने गंतव्य सथल के के
- 21:31आखिर में हम कहाँ पहुँचेंगे तो हम।
- 21:35आप इस चीज़ का सेवन कर लेना तुम्हें लक्षण मिलने शुरू हो
- 21:41जाएंगे। तुम्हें तुम्हारी मंजिल के दूर से
- 21:44दर्शन होने शुरू हो जाएंगे। मंजिल देख लोगे दूर से ही सही।
- 21:53लेकिन दर्शन कर लोगे और दर्शन बिलकुल सही है।
- 21:57इसमें कोई आर्टिफीसियलिटी नहीं है।
- 22:01यह क्रित्रम नहीं है, कृत्रम ढंग से दर्शन हुआ है, यह ठीक है,
- 22:07लेकिन दर्शन सही हुआ है। नॉन रिऐक्टिवनेस एक लक्षण है।
- 22:12वह आ गया। मन का ठहरना एक लक्षण है।
- 22:17वो भी आ गया। बुद्धि का लक्षण है, कोई सरोकार
- 22:24नहीं, कोई जवाब नहीं देती, वो भी ठहर गई।
- 22:30ये भी लक्षण से ही। तुम मौन हो गई।
- 22:33ये भी लक्षण सही है और तुम्हें हल्का हल्का सुर भी आया होगा।
- 22:37अली खान वो लक्षण भी तुम्हारा सही है जब बुद्धि ठहर जाती है या मन
- 22:47ठहर जाता है स्वभाविक रूप से। सुरूर आया ही करता है, ये नहीं हो
- 22:57सकता तुम्हारा मन ठहर जाए। रात्रि को विश्राम में तुम्हारा
- 23:01मन और भूति ठहर जाती है तो तुम सुबह कितने फ्रेश होके उठते हो?
- 23:08सारी रात वो सुरूर के पास बैठे रहे।
- 23:12तो सुरूर की रंगत तुम पे चढ़ गई और सुबह तुम उठे लाली मेरे लाल की
- 23:21जीत देखूं तित लाल लाली खोजने में गई मैं भी हो गई लाल तो उसी रंगत
- 23:29को साथ लेके तुम। सुबह उठ जाती हूँ, आँखें खुल जाती
- 23:39हैं। यह बिल्कुल सही है।
- 23:43इसको आप शुरुआती तौर पर प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन ध्यान रखना किसी
- 23:50के जोके मत रह जाना। क्योंकि जीस स्थल पर जाना है,
- 23:55तुम्हें उस हद तक जाने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता नहीं होती
- 24:03बिना सहारे की ही जाऊंगा, निरा विलम्ब रूप से जाओ।
- 24:10और आखिर में जीस छटिया का सहारा लेकर तुम चले उस छटिया को भी
- 24:17छोड़ना पड़ता है निरावलंब होना पड़ता है सारे सहारे छोड़ देने
- 24:23पड़ते हैं त्रौपदी की तरह। जब तक सहारे थे परमात्मा के पास
- 24:32नहीं पहुंचा। जब सारे सहारे टूट गए, पांच पति
- 24:38थे, द्रोणाचार्य थे, भीष्म पितामह थे, ताशरी थे धृतराष्ट्र।
- 24:48लेकिन कोई काम न पड़ा तो आखिर में परमात्मा की याद आयी और जब्त में
- 24:56परमात्मा की याद आएगी तो तुम याद तुम नहीं करोगे, वह परमात्मा
- 25:04तुम्हे याद करेगा। तुम्हें लगेगा ऐसा कि तुमने याद
- 25:10किया करेगा तुम्हें परमात्मा याद और कब याद करेगा।
- 25:16जब तुम निरव अवलंब हो जाओगे, अभी तो तुम्हारी अवलंबन बहुत है।
- 25:23तुम राधे राधे करते हो, राम राम करते हो।
- 25:27तुम पांच नाम जपते हो, तुम 1000 नाम जपते हो, ये सारे अविलंबन ही
- 25:31तो हैं, इन अविलंबनों को छूटना होगा आपको शुरू शुरू में लठिया के
- 25:43तरह तुम इस्तेमाल कर सकते हो। लेकिन यह लठियां आखिर में भँकनी
- 25:48पड़ेगी। कबीर भी कहते हैं, माला जब रहा था
- 25:55तस भी हाथ से निकल गई भलो भयो, हरी भी सरो सर से टली भला मैं याद
- 26:02कर रहा था उसको। और हाथ से तस्वीर टूट गई।
- 26:10मैंने याद करना बंद कर दिया और मैंने पाया कि वह तो मेरे भीतर
- 26:17मौजूद है। मैं किसे याद कर रहा हूँ?
- 26:25मेरा याद करना गलत था, मैं उसको याद कर रहा था जो कि मैं स्वयं ही
- 26:31था भलो भयो हरि भी सरो सर से टली भरा जीस दिन तुम पांच नाम को छोड़
- 26:42दो। ये पांच नाम घर जाएं ये राधे राधे
- 26:47राम राम जो भी तुम सहारे लिए बैठे हो नेरा बलम पहुँच जाओ सारे सहारे
- 26:53टूट जाएं उस दिन तुम पाओगे, तुम उसके भीतर छलांग ले गए।
- 27:05और फिर तुमने जो पिया उसी को मैं रहस्य कहता हूँ, उसी को मैं अमृत
- 27:12कहता हूँ, उसी को मैं रस कहता हूँ, उसी को मैं अमृत कहता हूँ।
- 27:20उसी को मैं आनंद कहता हूँ। उपनिषद उसे रस कहते हैं, रसो वैसा
- 27:29वह रस है और बड़ा मीठा है। नानक उसे खुमार कहते हैं।
- 27:39कबीर उसे सूरत ही कहते हैं। नाम कोई भी हो, अनुभव वही है, वही
- 27:48मस्ती का और फिर जब उसका नशा उतर जाएगा।
- 28:06तो तुम छटपटाओगे तुम्हें उसकी याद आएगी, जैसे प्रेमी प्रेमिका को
- 28:16याद आती है। तुम पूछोगे परमात्मा से, तुम कहाँ
- 28:27खोगे एक बार याद आए तो ही पूछ पाओगे ना?
- 28:36यहाँ तो लोगों को कभी याद आया ही नहीं, सही रूप में।
- 28:41पहली झलक जब मिलती है, वह जातो प्रेम की अवस्था में मिलती है।
- 28:47जब तुम्हें किसी से प्रेम हो जाता है तो प्रथम बार वह उतरता है।
- 28:55तुम्हारा सारा अहंकार मटिया मिट हो जाता है।
- 29:00फिर तुम्हें तुम इतने अशक्त हो जाते हो कि तुम उसे भूलना भी
- 29:04चाहते हो तो वो भूल नहीं पाता। तुम्हारे सारे सहारे गिर गए,
- 29:13तुमने पहली बार अपने आपको निरावलम पर पाया।
- 29:17ये क्या हुआ कि मैं अब उसके बिना रह नहीं सकता रह नहीं सकती या
- 29:31तुम्हारी याद जिसे याद कर रहे हो माला हाथ से घर जाए तस भी छूट गई
- 29:38कबीर की। और परिणाम में उन्हें महा सुख
- 29:43मिला। उस महा सुख पानी की अवस्था में वह
- 29:49एक शब्द बोलते हैं कि अरे मुझे पता ही नहीं था कि नाम जप करने
- 29:55में दुख मिलता है। नाम जप छोड़ने में सुख मिलता है।
- 30:03मैं तो न छोड़ पाया लेकिन हाथ से तसवी छूट गए।
- 30:07भरो भयो परमात्मा का कर्तज्ञ हूँ मैं बहुत अच्छा हुआ जो उसने मेरे
- 30:14हाथ की तसवी करा दी। भलो भयो हर बिसरो में बिसर गया
- 30:21उसको पल भर के लिए ही सही, काश तुम बिसर जाओ, क्योंकि याद
- 30:31तुम्हारा अहंकार करता है, तुम नहीं करते सच में तो याद वही किया
- 30:37करता है। वो ही सच्ची याद होती है।
- 30:42तुम जो करते हो वो याद नहीं, वो व्यापार है भलो भयो हरि भी सरो
- 30:54अपने आप से जो तस्वीर घर जाए तुम्हारे घराए से नहीं है तुम अगर
- 30:58घरा दोगे तस्वीर को वह नहीं गरेगे।
- 31:03तस्वीर खुद से गरजा सर से टली बला, देखिये शब्द कितना प्यारा
- 31:10प्रज्ञा जैसे ये पांच नाम भी उनके सर पर एक बला थे।
- 31:20भला भला थी उसके सर के ऊपर प्रथम बार दर्शन हुआ उसका और प्रथम बार
- 31:30बोलते हैं कबीर किया तो बड़ा अच्छा किया भगवान आपने।
- 31:38जो मैं जप रहा था वो तुने छीन लिया और मैंने पाया राम रत्न अयो
- 31:52जी मैंने। राम रत्न धन पायो जी मैंने राम
- 32:07रत्न धन पा प्रथम भारत में सच्चा राम रत्न मिलता है।
- 32:19लेकिन तुम अपने आप को बीज़ी रखते हो।
- 32:22पांच नाम जपने में राधा राधा जपने में राम राम जपने में और वह
- 32:28परमात्मा तुम्हारे द्वार पे दस्तक देता है लेकिन पाता है कि यह
- 32:34बीज़ी है। इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ, तुम्हें
- 32:43प्रेमानंद के शिष्यों को कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि वह व्यस्त होते
- 32:48हैं। व्यापारियों को कभी नहीं मिलेगा,
- 32:55क्योंकि वह दुकानदारी में व्यस्त होते हैं।
- 33:00व्यापार करने वाले व्यापारियों को नहीं मिलेगा।
- 33:05व्यसियों को नहीं मिलेगा क्योंकि वह व्यापार में तलीन होते हैं,
- 33:11मर्द हो के और। जीस घड़ी तुम नॉन बिज़नेस में हो
- 33:20गया खाली फुर्सत के लम्हों में आओगे उस घड़ी को आठ टपकेगा
- 33:29तुम्हारे भीतर उसकी स्मृति उसकी जात आठ टपके के इंतजार में थी।
- 33:36लेकिन तुम खाली ही नहीं हो रहे थे यू वर ऑल्वेज़ बीज़ी वह आता था
- 33:44तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता था और पाता था कि तुम गायब हो तुम
- 33:52बीज़ी हो। बीज़ी कहाँ हो इससे उसको कुछ नहीं
- 34:00लेना देना बस तुम बीज़ी हो तो फिर वो वापस चला जाता है।
- 34:07वह आता है, रोज़ आता है और जब पाता है कि तुम नॉन बीज़ी हो।
- 34:14तुम फुर्सत के लम्हों में हो और तुरंत तुम्हारे भीतर उतर जाता है
- 34:27तो समझना जब तुमने गांजे का सेवन किया।
- 34:33तुम नॉन बिज़नेस में तो नहीं आए लेकिन तुमने वो यंत्र ही बेहोश कर
- 34:40दिया जिससे तुम बीज़ी होते हो। तुम बुद्धि से बीज़ी होते हो, तुम
- 34:44मन से बीज़ी होते हो, यह भी एक तरीका है तुमने वो यंत्र ही बीज़ी
- 34:50कर दिया। मदहोश कर दिया, यंत्र ही तुमने
- 34:55मूर्छित कर दिया। नाउ यू आर नॉन विजनेस फिर वो उतर
- 35:04गया, उसकी झलक उतर गई। यह अनुभव तुम्हारा बिल्कुल ठीक
- 35:09है। ऐसा ही अनुभव बिना किसी सहारे के
- 35:13मिल जाए। सहारों से शुरू कर देना कोई बात
- 35:18नहीं छोटे बच्चे को ऊँगली पकड़ कर ही चलाना होता है ऊँगली उसका
- 35:24सहारा होता है अपने आप कोई बच्चा सीख नहीं पाता।
- 35:30तो तुम भी इसका सेवन कर लोगे तो कोई अपराध नहीं है।
- 35:39अपने गंतव्य सतर्कता पहुंचने के लिए इसका इस्तेमाल कर लो।
- 35:47जब भी तुम फुर्सत के लम्हों में आओ।
- 35:54मिल जद भी मिली, इफर जा तू वेल तू तेरे मुख दी किताब ले बैठा
- 36:28मेनू तेरा। शबाब ले बैठा आता है।
- 36:42तुम्हें काबिलियत है। जैसे ही किसी ने मानव जामा डाला
- 36:50वह योग्य हो गया। बड़े भाग मान स्तनपवा वह पहुंचने
- 37:00के योग्य हो गया। अब तुम नहीं पहुंचना हो तो बीज़ी
- 37:06हो जाओ, पहुंचना है तो नॉन बीज़ी में चले जाओ।
- 37:11सीधा सा फॉर्मूला है। अगर तुम सीधे सीधे नहीं जा सकते
- 37:21तो कोई सहारा ले लो। बच्चे हो तो किसी की अंगुली पकड़
- 37:29लो। वृद्ध हो तो लटकिया पकड़ लो,
- 37:35लेकिन चलो उस रास्ते पे चलो चरि वैती चरि वैती तो तुम्हारे लक्षण
- 37:50जो तुमने लिखे। ये बिल्कुल ठीक है।
- 37:56ऐसे लिखा हुआ अगर तुम पत्र बहस करो तो ज्यादा आसान हो जाता है।
- 38:10मैं एक एक लफ्ज़ व लफ्ज़ तुम्हें जवाब दे सकता हूँ।
- 38:18जब तुम संक्षिप्त में कोई चीज़ लिखोगे तो मैं उतना सा जवाब
- 38:22दूंगा, अपनी पूरी जो तुमने अनुभव किया वो लिखोगे तो मैं पूरे अनुभव
- 38:31का जवाब पूरा ही दूंगा। कि मैंने इस रस्ते के सारी गलियां
- 38:37कूचे छान मारे और ऐसे व्यक्ति को मास्टर ऑफ मास्टर्स कहा जाता है।
- 38:47कोई ऐसा कोना नहीं, कोई ऐसी गली नहीं।
- 38:56जो मुझसे चूक गई हो हर गली की रंगत मैं नहीं चखी है हर फासला
- 39:06मैंने तय किया है तुम ऐसे प्रश्न पूछो जो काम किये हैं ये बड़े
- 39:13सुन्दर प्रश्न हैं। व्रत की जगाई करने का कोई फायदा
- 39:20नहीं होता। परमात्मा को किसने बनाया फिर उसको
- 39:26किसने बनाया? ये व्रत के प्रश्न है।
- 39:29मुर्गी पहले आई अंडा, पहले आई ये खोपड़ी की जलजलाहट।
- 39:34खोपड़ी में खारिज होती है। श्रीदेव प्रश्न कुछ जो तुम्हें
- 39:41आत्महत्या की बढ़ोतरी में सहायता करें, चेतना तुम्हारी प्रगाढ़ हो?
- 39:48ऊंचाइयों को छुए। और जैसेजैसे चेत न तुम्हारी
- 39:52ऊंचाइयों को छूएगी याद रखना, तुम्हारा आनंद भी उतना ही गना
- 39:56होगा, तो प्रश्न ऐसे ही पूछने जायज है, ऐसे ही क्वेश्चन पूछना
- 40:05करो। सार रूप में बता दूँ कि तुम्हारे
- 40:15उस रस जिसकी मैं बात करता हूँ अरे हैश को पीने में मन और बुद्धि ही
- 40:25बाधा है। अगर तुम किसी भी प्रकार से मन और
- 40:31बुद्धि को हटा दो, किसी संत के पास बैठ जाओ, पाओगे फल तो फल के
- 40:42लिए तुम्हारा मन ठहर गया और तुमने उसकी घूँट भर ली जिससे हम।
- 40:49रस का आनंद कहते हैं, तुम्हें पता चल गया कि स्वाद में कैसा होता
- 40:57है, वह तुम्हें गांजे से मिल गया। मुझे कोई हर्ज़ा नहीं, तुम शुरू
- 41:07करो। वो आनंद तुम्हारे भीतर प्रवेश कर
- 41:14जायेगा जब तुम नॉन बिज़नेस में हो अगर तुम अभी व्यस्त हो।
- 41:30अभी क्लास ले रहे हो, अभी पढ़ा रहे हो या भी पढ़ रहे हो या भी
- 41:37लोगों को उपदेश दे रहे हो, राज़ करना भी एक व्यस्तता होती है।
- 41:49और जो ये राजनीतिक तानाशाह बन जाते हैं, डिक्टेटर बन जाते हैं
- 42:01तो बहुत बीज़ी रहते हैं। तो इन्हें पल पल का ख्याल रखना
- 42:07होता है। तुम ज्यादा अमीर हो गए, तुम
- 42:09ज्यादा बीज़ी हो गए, तुमने 100 फैक्टरी लगा दी, 100 फैक्टरी का
- 42:17फिकर आ गया तुम्हें, लेकिन तुम एक फैक्टरी का एक ज़रा भी नहीं
- 42:20जाओगे। लेकिन ज़िन्दगी भर तुमने 100
- 42:24फैक्टरों का भार गधे की तरह अपने दिमाग पर ढोया, लेकिन तुम एक
- 42:31घर्रा भी नहीं जाओगे, यह व्यर्थ का बोझ ढोया, तुम तुम्हें मैं
- 42:37समझदार नहीं कहता। तुम कहते हो हमने कमाया, लेकिन
- 42:46कमाई तो तुम्हारे साथ ही जानी चाहिए, ये तो तुम्हारे साथ नहीं
- 42:51गई। ये तो यहीं पड़ी रह गई।
- 42:56व्यक्ति एक ही चीज़ को कमा सकता है, मांस के चोदे में आकर और वो
- 43:01है। चेतना की वृद्धि, चेतना का
- 43:13मेजरमेंट तुम्हारा। अपर लिमिट तक अपपेस्ट लिमिट तक
- 43:19पहुँच जाये 100% क्षेत्र में हो जाओ तुम बस यही कमाई है जो
- 43:25तुम्हारे संग जाती है और यह किसी को देखती नहीं तुम्हारे मेहर
- 43:32चौबारे। तुम्हारे महेल चोबारे
- 43:54जाएंगे सारे अकड़ किस बात की प्यार?
- 44:03अकड़ किस बात की प्यारे ये सिर फिर भी झुकाना है।
- 44:16तुम्हें पता है, शमशान में मैं साधना किया करता था।
- 44:20तीन बरस तक जलती हुई चेतावनी के पास बढ़ जाता था।
- 44:25सबसे पहले ये सिर गिरा रहता था, मैंने कर लिया भाई।
- 44:31इसी के ऊपर इसको गुरूर था। इसका गुरूर सबसे पहले झूठा अकड़
- 44:43किस बात की प्यार है ये सर फिर भी झुकाना है नहीं झुकोगे?
- 44:55आग लगा दी जाएगी। सबसे पहले ये सर ही करता है सजन
- 45:02रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास से जाना है।
- 45:13ना हाथी है, है। सजन रे छूट मत।
- 45:31तुम्हारा अनुभव बिल्कुल सही है। शो प्रतीक्षक इसको बनाए रखो,
- 45:40लेकिन याद रखो मेरी बात को। ये लठिया तुम्हारी एडिक्शन न बन
- 45:46जाए लठिया को भी छोड़ देना है 1 दिन तुमने बिलकुल बेसहारा हो
- 46:02जाना। बेसहारा होने की अवस्था में तुमने
- 46:10सारे सहारे छोड़कर घरा देंगे क्योंकि साथ नहीं जाते महल चवारे।
- 46:22यहीं रह जाएंगे सर पकड़ किस बात की पीढ़ ये सर फिर भी चुकाना है
- 46:35जो मरने के बाद करोगे। अभी से कर लो जीते जी कर लो किसी
- 46:42को मर जीवडा कहते हैं कभी जो मरकर प्रकृति कर देगी, अगर सयाने हो
- 46:51तुम तो जीते जी तुम खुद से ही कर लो।
- 46:56अक्कड़ को दांत पर लगाना है घरा दो इसको यह तुम्हारा भ्रम है कि
- 47:02तुम हो नहीं, नहीं तुमने कुछ बनाया नहीं कभी सोचना, आराम से
- 47:11बारीकी से सोचना तुमने क्या बनाया तुमने सिर्फ कमाया?
- 47:16बनाया तो उस मालिक ने परमात्मा ने सृजन हरे हैं पर वो हमने देखा है
- 47:27और जब मैं ऐसा बोलता हूँ तो मगुरु हो जाता हूँ।
- 47:33जब मैं कहता हूँ कि हाँ, मैंने देखा है तो स्मृति में खो जाता
- 47:42हूँ जब मैंने वो प्रथम बार उसे निहारा।
- 47:51और प्रथम बार निहारते निहारते मैं वही हो गया था मेरा कोई और छोर न
- 47:57बचा था मैं अनंत हो गया था, मैं विराट हो गया था।
- 48:11वह ना खुशी थी, ना गम था, ना कष्ट था, ना कृष था, वह ना जीवन था, ना
- 48:23मरण था, ना यश था, ना यश था। वहाँ सब धुंध मिट गए, भेद मिट गए।
- 48:32भेद रहित अवस्था में प्रथम बार जब मैं गया तो मुझे याद आता है जब भी
- 48:38मैं तुमसे कहता हूँ कि हाँ, मैंने देखा है उसे तो मेरा।
- 48:49अभिभूत हो जाता है। उस दृश्य को याद कर ये याद है
- 48:58क्योंकि मैंने उसे पिया है। याद हमेशा उसकी होती है सही बाकी
- 49:09तुम्हारी यादें तो नकली नकली आर्टिफीसियल हम जो याद करते हैं
- 49:16कबीर जो याद करते हैं नानक जो याद करते हैं उसको करते हैं तो
- 49:22उन्होंने कभी पीया? और अभी पीते हैं, रोज़ पीते हैं,
- 49:27दिन में सैकड़ों बार हजारों बार उसके पास जाते हैं बड़ा जब भी तुम
- 49:36प्रश्न पूछते हो, हम उसका उत्तर देने से कभी।
- 49:43ये परादर्शी दा तत्व है पर हम प्रार्थना करते हैं परमपिता से।
- 49:51काश तुम भी उन ऊँचाइयों को चेतना कि उन ऊँचाइयों को चुनो।
- 49:59किसी दिन परमात्मा तुम पर भी मेहरबान हो जाएं।
- 50:04कर्मी, आवय कपड़ा, नजरें, मोक द्वार और तुम्हारी भी ये सब
- 50:10बेड़िया इलूशन की भ्रम की टूट जाए और तुम भी मुक्त हो जाओ।
- 50:19जैसा मैं हूँ ऐसा तुम भी हो जाओ, धन्यवाद।