Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Mar 26 - "मैं शरीर हूँ" – इस सबसे बड़े भ्रम को कैसे तोड़ें? आज के गुरु 'खाली' क्यों नहीं हैं?
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- 0:12जितेंद्र प्रसाद आपने शब्द कहा बाबा की राजनीति में कोई ओहदा
- 0:30धारण नहीं करना चाहिए। उसका आंतरिक कारण बताने की कृपा
- 0:39करेंगे। क्या है रहस्य?
- 0:48क्योंकि आप बिना कारण के तो बोलते नहीं।
- 0:53अगर बोला है तो अवश्य ही इसमें कोई न कोई रहस्य होगा।
- 1:11मनुष्य के चित्र पर। पहले ही बहुत सी माने गए।
- 1:19इसलिए चित इतना भारी रहता है। हर वक्त चित हल्का नहीं होता।
- 1:32अगर तुम खुद को देखने लग जाओ तो पाओगे विशाल बोझा मान्यताओं का
- 1:40आपके सिर के ऊपर है। और यह इतना बड़ा बोझा है जितना
- 1:50आपके शरीर का भार नहीं है। इतनी बड़ी पोटली आपने अपने सर के
- 1:58ऊपर उठा रखी है, जिसे आप सहन नहीं कर सकते।
- 2:06इसे सहन न करने के कारण ही तुम दुखी हो इसलिए मुझसे पूछ लेते हो
- 2:14कि बाबा मैं दुखी हूँ क्यों? और बहुत से लोग तो कह देते हैं
- 2:19बाबा सब कुछ है लेकिन फिर भी दुखी।
- 2:26दुखी हो अपनी मान्यताओं के बोझ के कारण इतनी पांडाल तुमने सिर के
- 2:34ऊपर चित्र के ऊपर बोझ की तरह डाल ली है।
- 2:39कि उसका बोझ तुम झेल नहीं सकते है।
- 2:45फिर उस बोझ के तले दबे दबे, कुचले कुचले तुम रोते हो, चिल्लाते हो
- 2:54संत शरण में जाते हो? राजेश संत को अगर गड़बड़ घोटाला
- 3:00मिल जाए फिर तो और भी बुरा हो जाता है।
- 3:11आपकी हालत मैं अच्छी तरह से समझता हूँ क्योंकि इन्हीं हालातों में
- 3:20से मैं निकला हूँ। इन्हीं संकटों में से रूबरू हुआ।
- 3:35ये सब मान्यताएँ तुमने थोप रखी और मैं रोज़ बोलता हूँ ये मन मैं हूँ
- 3:43विचार। मैं हूँ मेरे विचार, मेरे विचार
- 3:49किसने चुरा लिए, ये भावना है, मैं शरीर मैं हूँ या खौल मैं हूँ और
- 3:59बाहर के कमाए हुए पदार्थ भी मैं हूँ यह मैं का इतना बड़ा बोझ।
- 4:06तुम्हे जीने नहीं देता, पर या तो तुम सारी उम्र इस बोझ रूपी गट्ठर
- 4:18को। सिर के ऊपर उठाये उठाये चित के
- 4:22ऊपर बोझ। उठाये उठाये, दुखी होते रहोगे,
- 4:26चिल्लाते रहोगे, सीखते रहोगे लेकिन सुनने वाला भी आगे उतना ही
- 4:33दुखी है जैसे एक पानी से भरा हुआ तालाब।
- 4:41अपने भार को हल्का करने के लिए दूसरे तालाब को पानी ट्रांसफर
- 4:47करना चाहता है और पता है कि वह भी भरा हुआ है, तो फिर तालाब अपने
- 4:54गंदे पानी को। कहाँ कह ये तुम्हारा बहुत बड़ा
- 5:06दुख है तुम्हारे पास दूसरा खाली तालाब है और तुम्हें जरूरत है
- 5:16खाली तालाब। खाली तालाब वो होता है जिसके भीतर
- 5:22न कोई वास न बचे, न विचार बचा, न जीने की तमन्ना बचा, वह शून्य हो
- 5:32गया और वह गड्ढे की तरह और गड्ढा भी इतना विशाल।
- 5:37कि उसमें संसार का सारा सागर का सारा पानी अगस्त की तरह वो पी
- 5:43जाएगा और ज़रा भी पता नहीं लगने देगा।
- 5:49इसलिए अगस्त से जैसे गुरु इस धरती पर बामुषकर पैदा होता है।
- 6:00तुम पहले से भरे हुए हो, तुम्हें जरूरत है इस झलकते हुए तालाब में
- 6:11से थोड़ा पानी निकासी कर दे इसलिए तुम भरे भरे रहते हो।
- 6:19तुम्हें कोई संघीय साथ ही मिलता है।
- 6:23इस हेल्त तुम शादी करते हो और तुम्हें इसका कारण कोई नहीं पता
- 6:27होता। मैं तुम्हें आज कारण बता देता
- 6:32हूँ। तुम हल्का होना चाहते हो, कोई
- 6:36मेरे इस दुख में शरीक हो जाए। कोई ऐसी खाली गड्ढा मिल जाए
- 6:43जिसमें मैं अपना दुख और तकलीफ फेंक सकूँ लेकिन वह भी आगे से भरा
- 6:49हुआ है। यह तकरार यूं तो नहीं हो जाती,
- 6:56कुछ तो मजबूरियां नहीं होते। यही कोई बेवफा नहीं होता है।
- 7:05बस मजबूरियां यही है फिर थोड़ी देर जब तुम लिपट लिपट जाते थे एक
- 7:13दूसरे के बिना रह नहीं सकते। फिर तुम उसकी शक्ल देखना भी पसंद
- 7:18नहीं करते, उसके में बैठना भी अच्छा नहीं समझते क्यों?
- 7:26क्योंकि तुम खाली होना चाहते थे और वो आगे से वो भी भरा हुआ है।
- 7:33इसलिए आज डेरों में। अध्यात्म के केंद्र में मनुष्य
- 7:47जाता है, किसी और नियर से पाता है, सब मय से भरप है, खाली कोई है
- 7:55ही में चैन नहीं मिलता। और तुम चैन ही तो लेने गए थे या
- 8:12तो तुम किसी गुरु की तलाश में निकल जाते हो, किसी खाली गड्ढे की
- 8:20तलाश में निकल जाते हो। तुमने देखा दुख के क्षणों में तुम
- 8:27किसी न किसी के पास जाते हो अपनी व्यथा कहने क्योंकि तुम्हारा पानी
- 8:34ओवरफ्लो हो गया सर के ऊपर से गुजर गया और आगे जो सुनने वारा है।
- 8:41अगर वो आपकी बात को सुन ले तो आपको बड़ा अच्छा लगता है।
- 8:47क्या कारण के पीछे कारण है कि वह आपके भरे हुए तालाब के पानी को
- 9:01थोड़ा सा हल्का कर देता है? तुम्हे राहत में सूख सोती है।
- 9:12इसलिए गुरु और शिष्य। की परंपरा बनाई गई थी।
- 9:18गुरु खाली समुद्र है, बहुत विशाल गड्ढा है।
- 9:26जितना चाहे गंगा, यमुना, सरस्वती सभी नदियां उसमें अपना पानी उड़ेल
- 9:32दे, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी शिष्य उस गुरु के बीच में
- 9:41जाकर मिल जाते हैं। और हल्के हो जाते हैं।
- 9:48अपना बोझा चित का निर्मल हो जाता है।
- 9:58इसलिए भगवान राम ने कहा मुझे वो अच्छा लगता है जो निर्मल चित होता
- 10:07है। है।
- 10:10यानी भार रहित चित्त। मुझे अच्छा लगता है।
- 10:20तुम्हें भी गुरु की तलाश है, क्योंकि कूड़ा कचरा भरा हुआ है।
- 10:30और तुम ऐसे समुद्र की तलाश में हो जो एक दम से खाली है, लेकिन काश
- 10:40आज के गुरु तो पहले से भरे पड़े हैं, ज्ञान से भरे हुए हैं।
- 10:51आयास की कोचिंग से भरे हुए हैं। दुनिया भर का सब सामान कूड़ा करकट
- 10:56स्टोर की तरह इनमें भरा पड़ा है। इसने में पहले कहा कि अजामिल की
- 11:03कथा जीस दिन आध्यात्मिक वार्ता इन सर लोगों ने करनी शुरू कर दी।
- 11:09उस दिन समझ लेना के आज़ाद में क्या क्या बड़ा कर के उसका ये
- 11:14कारण था? पहले से ही इतनी सूचनाएं रखने
- 11:21वाले न्यूरॉन्स 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं।
- 11:25हमारे। 86 अरब न्यूरॉन्स में कितना कूड़ा
- 11:35भरा होगा? हिसाब लगा पहले से ही भरे पड़े
- 11:42हैं। और तुम तलाश हो, किसी ऐसे व्यक्ति
- 11:49की जो खाली गड्ढा हो, जिसमें तुम्हारे समुद्र का पानी समझा है।
- 12:00सूरज को धरती तरसे। धरती को चंद्रमा, धरती को
- 12:14चंद्रमा, सूरज को धरती तरसे। धरती को चन्द्रमा, धरती को
- 12:29चन्द्रमा, पानी में सी पूजा से प्यासी हर आत्मा।
- 12:42जैसी हर आत्मा उम्मीदवारें आनी में शिप जैसे प्यासी हर आत्मा
- 13:05बोंद छिपे किस बादल में बोंद छिपे किस बादल में कोई जाने न?
- 13:17ओह रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में सागर मिले कौन से
- 13:30जल में कोई जाने न ओहरे ताल। मेले नदी के जल में।
- 13:47हर व्यक्ति क्षेत्र के ऊपर अरपों अरपों मंटन भारतीय में घूम रहा
- 13:56है। फिर वह दुखी न हो, ये कैसी संभव
- 14:04है? निश्चित रूप से तुम दुखी हो और सच
- 14:09में दुखी हो, तुम ऐसे ही नहीं रो रहे हो।
- 14:15और तुम्हें एक ऐसा गुरु चाहिए जो शून्य हो, जो एक समुद्र से भी
- 14:25बड़ा गड्ढा हो, जो तुम्हारे सारे दुखों को समाहित कर ले, जो तुमको
- 14:32ही अपने आक्रोश में ले। जो तुमको ही तुम्हारे मैं को ही
- 14:43निगल जाए, लेकिन काश तुम्हे ऐसा गुर मिल सकता है उसका कारण।
- 14:56तुम गुरु को ढूंढ़ते हो अपनी कहीं सुनी पड़ी मान्यताओं के ढंग से,
- 15:04जबकि गुरु ऐसे नहीं मिलता, तुम कहोगे गुरु के सिर के ऊपर तो मोर
- 15:11मुकड़ चाहिए। मैंने तुलसीदास को मूर्ख इसलिए
- 15:16थोड़ा किया, मैं जानता हूँ बोलने से पहले मैंने, क्या कहना है तुम
- 15:28अपनी मान्यताओं के हिसाब से पूर्व के गुरुओं को देखकर।
- 15:35बिल्कुल उसी नाईन नक्ष आकृति परिधान का गुरु चाहिए।
- 15:40तुम्हें फिर वह तो नहीं मिलेगा, फिर क्या होगा?
- 15:48कोई नकली गुरु वैसा ही वेश बन लेगा और मुकुट लगा लेगा।
- 15:54कोई कृपालु जी महाराज और रानियों के साथ रास रचाएगा ध्यान रखें।
- 16:06कृष्ण का रास उसका प्रेम है, कृष्ण का रास उसकी चेतना से आता
- 16:13है। और कृपालु जी महाराज का रास उसकी
- 16:15वासनाओं से आता है। देर इस ह्यूज डिफरेंस बिटवीन दी
- 16:22टू बड़ा विशाल अंतर है। दोनों में से एक का रास प्रेम से
- 16:29आये एक का रास वासना से आये। लेकिन क्या करो तुम्हारी
- 16:41मान्यताएँ तुम्हें छोड़ती नहीं या ऐसा समझलो कि तुम मान्यताओं को
- 16:46छोड़ना नहीं चाहते। जब गुरु तुम्हारी मान्यताओं को
- 16:52तोड़ता है तो तुम्हें लगता है कि मैं मरा इसने मेरा नुकसान कर
- 16:57दिया। बिलकुल ठीक लगता है जो दाँत दुःख
- 17:03रहा है डेंटिस्ट, अगर उसको निकाल दे तो तुम्हे लगता है कि इसने
- 17:07मेरा दाँत निकाल दिया, तुम उसको दंड भी दे सकते हो।
- 17:15अगर मूर्ख हो तो? अगर समझदार हो तो तुम कहोगे अच्छा
- 17:20हुआ व्याधि से छुटकारा हुआ, दर्द कर रहा था रात को चैन की नींद तो
- 17:25सुन गए जब गुरु तुम्हारे ऊपर तुम्हारे व्यर्थ के लादे हुए।
- 17:35गंदगी के ढेर को हटाया जाता है, उसे तुम गालियाँ निकालते हो, उसे
- 17:41तुम सूरी के ऊपर टांग देते हो, जहर पीला देते हो की तरह की तरह
- 17:47हाथ पांव काट देते हो, मीरा की तरह प्याला पीला देते हो जहर का?
- 17:57ऊपर से तुम इच्छा रखते हो कि हम सुखी हो जाए, काम करते हो, दुखी
- 18:07होने, इच्छाएं रखते हो, सुखी होने की।
- 18:15हाउ इट कैन टु पास यू वर्क? यह कैसे संभव हो सकता है?
- 18:23जैसा कर्म करी का, वैसे फलती का भगवान।
- 18:35एवरी एक्शन, देर इज़ निकल एंड अपोज़िट एक्शन तुम्हे पता ही नहीं
- 18:46होता। बूंद छिपी किस बा, जल में बूंद
- 18:54छिपी किस बा जल में? नदी के जल में नदी मिले सागर में
- 19:12सागर मिले कौन से जल में? कोई जाने न होरे।
- 19:21बूँद छिपी किस बादल में कोई जाने क्यों तुम्हारे पास पैमाना नहीं
- 19:28यद्यपि बताने वाले तुम्हें बता के गए, लेकिन तुम हो कि तुम्हारे।
- 19:36सिर के ऊपर जूं भी नहीं सरकती। तुम इस बोझ को उठाने के एडिक्टेड
- 19:45हो गया। भले कोई सिगरेट का दुगुना अंदर
- 19:49बाहर भरता है, इससे उसको कुछ मिलता है।
- 19:55हमारे फेफड़े, हमारे लंग्स और सीज़न को अधिग्रहण करने के लिए
- 20:00बनाये परमात्मा। लेकिन हम अगर के शर्ट, जहर, धुआं
- 20:08फेफड़ों को पिलाएगा तो वह एडिक्टेड हो जाएगा।
- 20:13इसलिए बार बार तरफ़ उठेगा और तुम जानते भी नहीं होगे कि यह धुंआ
- 20:19तुम्हें मारेगा। यह कैंसर आईटिस करेगा, अनेकों
- 20:29प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न करेगा।
- 20:38तुम्हारी मूर्खता क्या है? तुम्हारी मूर्खता है कि तुम्हें
- 20:44पता नहीं गुरु कौन है? इसलिए माखनशाह लोवाना दो दो
- 20:52ऐशर्थियां सभी को टेक देते हैं, लेकिन आखिरी में गुरु नहीं जाता
- 20:56है। सा धोरे गुरु ला धोरे गुरु देख
- 21:07बहादुर कहते है सुखे सो तो देने दो अरे देख मेरा कंधा तेरे जहाज
- 21:17का बोझा उठाये उठाये। यह फौलादी शरीर जख्मी हो गया।
- 21:23देख कैसे घाव रिसरा है माखन शालुबाना चरम में गड़बड़ा लर जार
- 21:35रोने लगा। क्षमा कीजिए, मैं अनजान हूँ और
- 21:49तुम्हारे दुष्टों की भीड़ ने मुझे उलझा लिया था।
- 21:53ये सब दुष्ट हैं। पखंडी जो किसकी नमक टोपी पहनें?
- 21:58जो पीली काली दाढ़ी करते हैं कोई नहीं पहुंचा है।
- 22:04सिर्फ एक पार्टी है सिर्फ एक गुंडों का समूह, शैतानु का समूह
- 22:13इनकी अपनी अपनी वर्दियां। कोई काला नका, कोई पीता परिधान,
- 22:22कोई गेरुआ परिधान लेकिन हैं सब गुंडे शैतान फिर कोई कल को मोरू
- 22:32मुकुट लगा के कृपालु जी महाराज कहेगा, आओ रहा आश्चर्य।
- 22:36मैं तुम्हारा कन्हैया, तुम मेरी गोपी आओ प्रेमिका।
- 22:48आ लग जा गले खिलरोगा आ। लग जा गले दिलरुबा।
- 23:05और तुम इस सर्कस को ही असली समझो, तुम समझो की हाँ यही भगवान, वह
- 23:14तुम्हारा शोषण करेगा। मैंने कृपालुही महाराज से पूछा
- 23:26अरे दोस्त तुने यह क्या किया? अब उसको कही गर्व नहीं मिलता
- 23:37बोलता बाबा देखो मैंने पूछ के किया।
- 23:41मैंने क्या क्या खाद पूछा? पहले तो समझा दिया उसे कि मैं ऐसे
- 23:46कहूँगा तुम हाँ कह देना यह क्या खाद पूछा यह तो गुमराह किया जैसे
- 23:56ढेरों वाले करते हैं, पांच ना बोलना परमात्मा तक पहुँच जाओगे।
- 24:01जैसे ये पीली दाढ़ी करने वाला प्रेमानंद गुमराह कर आए।
- 24:05ये दुष्ट हैं सभी इनको आध्यात्मिकता का हुई ज्ञान
- 24:11इन्होंने उस अमृत रोपी आनंद को पिया नहीं और फिर ये क्या कहेंगे?
- 24:16आपको बहलाने के लिए कहेंगे, देखो हमने प्रतिक्रिया की।
- 24:21संत तो हम हैं, वह तो प्रतिक्रिया कर रहा है।
- 24:29गंदगी की निंदा नहीं होनी चाहिए। क्या झूठ का खुलासा नहीं होना
- 24:37चाहिए क्या? निंदा की।
- 24:39हमने परिभाषा गलत बना ली इसलिए आज भारत में सभी निंदित कार्य कर रहे
- 24:46हैं। विश्व में सभी निंदित कार्य कर
- 24:48रहे हैं। तुमने निंदा की परिभाषा बना दी,
- 24:55जो किसी के विपरीत बोलता है। वो चाहे ठीक बोलता है तो भी
- 25:00निंदा, वो चाहे गलत बोलता है तो भी निंदा।
- 25:03तो क्या जबान कुठ वाले? तुम्हे पता ही नहीं परमात्मा की
- 25:15खोज कैसे की जाती है? उसका लक्षण क्या होता है?
- 25:19उसमें तुम्हारा कसूर भी नहीं। लाख कृष्ण बता के गए अम्मनितुम
- 25:32दंभितुम, हिंसा शांतिराजम, आचार्य उपासनाम, शवचुम सेरम आत्मा विनम
- 25:39रहा। अब लक्षण बता तो गए लेकिन
- 25:47मुश्किलात कहाँ आती है? मुश्किलों की संस्कृत में बोलते
- 25:51है आज की सरल भाषा दैनिक को उपयोग में लाने वाली भाषा संस्कृत है
- 25:57नहीं। इसलिए बड़े बड़े शंकराचार्य
- 26:01संस्कृत बोलके तुम्हारे दिमाग को एबनोटाई कर लेते हैं।
- 26:09कोई अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति मिल जाये तुम कहते हो बहुत अच्छा
- 26:12है, यह तो पहुंचा हुआ होगा, कहाँ पहुंचा हुआ होगा भाई?
- 26:20नरक तक पहुंचा है इसका धोबड़ा देखो इसके भीतर से उठती हुई
- 26:27कड़ाहट देखो यह भी तड़प रहा है उस परमात्मा सिर्फ।
- 26:37कंगाल ही नहीं राजा सम्राट भी तड़पते हैं उस रस की एक बूंद के
- 26:43लिए तुम भ्रांति में मत रहना कौन नहीं तरसता फकीर नहीं तरसता।
- 26:55फकीर नहीं तरसता, क्योंकि फकीर तो उस समुद्र में छलांग लगा देता है।
- 27:05फकीर उस आनंद के रस को पी लेता है जिसका समुद्र भरा पड़ा है।
- 27:10हमारे ही भीतर। जो सुख पाय,
- 27:47अमीरी में वो सुख ना ही अमीरी में, मंडो लागो मेरो।
- 28:01फकीरी में, फकीरी में मन ढोला, जो मेरे रो।
- 28:11तुम अपना नाम फकीर चंद रख सकते हो, फकीर होना बड़ी मुश्किल बात
- 28:19है फकीर होना तो अपने इस। गट्ठर को फेंक देना जिसके कारण
- 28:30तुम दुखी हो वो जैसे परीक्षण हो। जयचंद्र प्रसाद तुमने पूछा पुत्र
- 28:44कि आपने कहा राजनीति में प्रवेश मत कर देना?
- 28:49मैप अपनाने का कोई हर्ष नहीं है। जब तंत्र बिगड़ जाता है तो आप
- 28:55सुझाव दे सकते हो कि ऐसा कर लो, ठीक हो जाएगा।
- 29:00लेकिन राजगुद्दियों पर मल कर बैठ जाना फैविक और लगा के यह मूड़ता
- 29:05की निशानी है। इसका मतलब तुम्हें कहीं और मिला
- 29:08नहीं। मैं शराब नहीं पीता, मैं शराब
- 29:17नहीं पीता। छोटीछोटी बच्चियों का खून पीता
- 29:23है। मैं गौ मांस नहीं खाता, छोटीछोटी
- 29:34नाबालिक बच्चों का ले के पुलिस खाता हूँ।
- 29:43मुझे अच्छा लगता है छोटी छोटी बच्चियों की चित्रकार सुनना
- 29:50कराहती हुई छुट छोटी बच्चियों की चित्रकार सुनना मुझे अच्छा लगता
- 29:54है इसलिए मैं शराब नहीं पीता। क्योंकि जो मज़ा छोटी बच्चियों के
- 30:03खून में है तो हमारी शराब तो कड़वी होती है।
- 30:10छोटी छोटी बच्चियों के खून बड़े शानदार नमकीन होते हैं।
- 30:16ये परमात्मा ने बनाए ही हमारे लिए हैं राजनीतिज्ञों के लिए।
- 30:22बड़े बड़े अमीर लोगों के लिए हैं, बड़े बड़े इंडस्ट्रियलिस्टर्स के
- 30:27लिए हैं, इसलिए मैं शराब नहीं पीता।
- 30:36ये मास भी नहीं खाता। मैं बकरीद क्यों?
- 30:39बकरे को हलाल नहीं करते। मैं गौ मास भी नहीं खाता, मैं
- 30:47हिंदू हूँ, सुनाती नहीं हूँ और पक्का सुनाती हूँ, लेकिन छोटी
- 30:53बच्चों का अंग काट के उनको मुर्गे की तरह उबाल कर।
- 31:00तड़का लगा के मैं भुखाता हूँ, मुझे दर्द से कराहती हुई चीखें
- 31:09अच्छी लगती हैं। तेरी दुनिया आ से।
- 31:22हो के मजूर चला में बहुत दूर बहुत दूर।
- 31:38बहुत दूर चला तेरी दुनिया। से एक कच्ची झोंपड़े के अंदर बैठा
- 31:52हुआ संत भी जो सुख पायो राम बचा। वो सुख नाहीं अमीरी में, मनुरो ला
- 32:05दो, मेरे राम फकीरी में इस बोझे को गला दो, प्रेम रसमें गला दो,
- 32:15नाम रसमें मत गलाना। क्योंकि नाम को उन्होंने बदनाम कर
- 32:21दिया। प्रिय मरस्य में गला दे ना
- 32:32तुम्हारी खाक भी ना बचे उस परवानी की तरह जो शर्मा में जलकर निस्त
- 32:39नाभुद हो जाता है। इन्हें जश्न मनाने दो, लेकिन एक
- 32:54बात तुम्हें कहती हूँ आखिर में आएँगे मेरी ही शर्म समुद्र जानता
- 33:07है। ये नदियां, ये दाल, ये सब मेरे
- 33:18में आखिर में मुझ में आके मिल जाएंगे कहाँ जाएंगे?
- 33:25और कोई रास्ता ही नहीं समुद्र से भली भांति जाता है इसलिए समुद्र
- 33:30कहीं नहीं जाता। कौन जानता है जब व्यक्ति पैसा
- 33:37होगा मेरे पास आ जाए तो मुझे चल के जाने की क्या आवश्यकता है किसी
- 33:41के पास? पुत्र राजनीति में ये होता है
- 33:58दुखी तुम पहले से हो यह दुःख क्या कम है जन्मो जन्मो से एक बहुत
- 34:07बड़ी चिपकाहट तुम्हारी संग संग चल रही है साय की त।
- 34:13वो चिपकाहट है कि तुम शरीफ और यही चिपकाहट तुम्हारा असली चित का
- 34:21बोझा है अगर तुम दुखी हो भारी भारी लगता है जीया।
- 34:30तो उसका कारण तो मैं बधाई देता हूँ।
- 34:32उसका कारण है कि तुम जन्मो जन्मो से माननीय हो, कि मैं शरीर तुम
- 34:38साँप की में थे, तो माने थे कि मैं शरीर हूँ, मैं साँप हूँ, तुम
- 34:43वृक्ष थे तो मैं वृक्ष हूँ, तुम अमीबा थे तो मैं अमीबा हूँ, तुम
- 34:48गाये थे तो मैं गाये हूँ। मैं छुपाया हूँ, मैं दुपाया हूँ,
- 34:52मैं ऊनी सेल्युलर हूँ, मैं मल्टी सेल्युलर हूँ लेकिन मैं हूँ सर एक
- 35:00ये जन्मो जन्मो से तुम्हारे चित्र के ऊपर बोझ ऐसा चढ़ा कि आज वो
- 35:07हिमालय पर्वत से भी ऊँचा हो गया। भला इतने बार को तुम सहन कर
- 35:11पाओगे, तुम्हारे दुःख का असली करने के है भला इसको नाम से कैसे
- 35:19मटाओगे? इसको सत्य का गाणें चाहिए, इसको
- 35:26सत्य का हथौड़ा चाहिए। इसको वो आरा चाहिए जो चीरते
- 35:32पत्थरों को लेकिन तुम चीखते हो, तुम चिल्लाते हो तुम्हारा अहंकार
- 35:46जब टूट जाए तो तुम बड़े चीखते हो, बड़े चिल्लाते हो।
- 35:53कोर्ट से में पहुँच जाते हो। इसने मेरा अपमान कर दिया।
- 35:56इसने मेरी भावनाओं को त्रस्त कर दिया है।
- 36:01कहाँ तक गर्क गया है इंसान? मैं शरीर हूँ, मैं भावना हूँ।
- 36:12इसने मेरी भावनाओं को आहत किया। इसे ₹500,00,00,000 माप जा मैंने
- 36:19पूछा उससे मुझे ये बता इस शरीर के अंदर कितना माल?
- 36:26वैज्ञानिक के हिसाब से ₹5 छे आने का माल है?
- 36:31थोड़ी महंगाई हो गई। ₹6 पांच आने का समझ लो।
- 36:37इससे ज्यादा माल नहीं और उसको फूंकने के लिए हजारों रुपए लग
- 36:43जाता है। ₹6 पहुंचाने के माल को फूंकने के
- 36:48लिए हजारों पर लग जाता है अंतिम संस्कार में।
- 36:56समस्या तो भारी है तुम्हारी समझ में आती होगी समस्या तुम इस आभार
- 37:06को दिनभर रात साथ साथ संग संग लिए भरते हो और इस जन्म में नहीं।
- 37:13सोते हुए भी तुम्हारे पास होता है ये भार इस गठ्ठर को तुम सदा ही
- 37:18अपने सर पे रखते हो और अगले जन्म में भी साथ ले जाते हो।
- 37:23ये भार बना ही रहेगा फिर इसको तोड़ा कैसे जाए इसको पटका कैसे
- 37:29जाए प्रेम रस के द्वारा? प्रेम रस तुम्हारे गुरुओं के
- 37:42द्वारा दिए गए सब मार्कों को छोड़ दो, क्योंकि परमात्मा तक पहुंचने
- 37:46का कोई मार्क। नहीं था।
- 37:56परमात्मा तक पहुंचने का परमात्मा मंजिल है और वहाँ तक पहुंचने का
- 38:02कोई मार्ग इसलिए नहीं है कि सब जगह वो है ईसा अवस्थ में दम सर्पम
- 38:09जत् अगर सब। सब वही है तो कहाँ जाओगे?
- 38:20परमात्मा तक पहुंचने के लिए यात्रा क्यों करोगे?
- 38:25जब वह उम्नी पर रंग तो जाओगे कहाँ हाँ?
- 38:33कौन है तेरा? मुसाफिर जाएगा कहाँ दम ले ले दो
- 38:42घड़ी ये छिया पायेगा कहाँ वहाँ कौन है तेरा वहाँ?
- 38:52कोई भी नहीं। तू अगर ठहर जाए तो यहीं तू है,
- 38:58क्योंकि ही इज़ प्रेसेंट एव्रीवन ही इज़ ओमनी प्रेसेंट किसी यात्रा
- 39:06की जरूरत नहीं तुम्हें परमात्मा के पास पहुंचने की क्योंकि
- 39:09परमात्मा इज़ ओमनी प्रेसिडेंट। जहाँ भी जाइएगा।
- 39:28कहाँ जाइएगा, हमें पाइएगा, अजय रूठकर अब।
- 39:47कहाँ जाइएगा मानवता? से प्रेम करने की बजाय तुमने
- 39:56मानवता को काट के उसका लहू पीना शुरू कर दिया है।
- 39:59छोटे छोटे बच्चों को मत पियो खून को प्रेम रस को पियो।
- 40:09मत लडाओ छोटे छोटे बच्चों को अपनी शाखाओं में भर्ती कर लो।
- 40:12मत जहर उंडोलो इनके दिमागों में माँ बापों को समझना चाहिए हम
- 40:19बच्चे को किस राह के ऊपर भेज रहे हैं।
- 40:26जब गुलामी थी तो तुम में से कोई बाहर नहीं आ रहा है और अब हम आजाद
- 40:33हैं और इन्हीं लोगों ने हमें गुलाम बना रखा है।
- 40:36अब तुम इन्हीं के शिविरों में भर्ती कराते हो।
- 40:39अपने को थोड़ा सोचिएगा, प्रहर के सोचिएगा।
- 40:47कोई जल्दबाजी नहीं, अपने बच्चों को वापस बुला लो।
- 40:53ये नफरतबाजों के शैतानों के गिरोह हैं, इनको पोषण मत दो, इनको ताकत
- 41:02मत दो। ये ऐसा ही ज़हर फैलाएंगे तुम देख
- 41:05रहे हो बस एक व्यक्ति रिश्वत दे के बच जाता है उसके पास पैसा होता
- 41:16है। एक व्यक्ति रिश्वत दे के बच नहीं
- 41:19सकता क्योंकि उसके पास रिश्वत देने के लिए पैसा नहीं होता।
- 41:24इ तो सही, पर कहें तुम्हारे न्याय और अन्य प्रेम का।
- 41:31रसगयो। प्रेम का रसगयो।
- 41:43प्रेम वो विधि है। प्रेम वो तकनीक है जो तुम्हारे
- 41:47अहंकार को जड़ मूल से समाप्त कर देती और फिर तुम हँसोगे नाचोगे
- 41:57कौन के नओगे फिर तुम्हें कहीं आने जाने की जरूरत नहीं।
- 42:03फिर कोई बसना न बचेगी, कोई विचार न बचेगा, ठहरा बचेगा, आनंद बचेगा,
- 42:08रस बचेगा तुम्हारा जेहरा झूमेगा। चारों और सुगंध होगी अमृत के।
- 42:22अनजाने होंठों पर यह पहचान गीत हैं, पहचान गीत हैं अनजाने होंठों
- 42:39पर यह। हे चानेगीत हैं।
- 42:46हे चानेगीत हैं। कल तक जो थे बेगाने, जन्म के मीत
- 42:57हैं। जन्मो के मित हैं, उम्मीदवारे कल
- 43:08तक जो थे बेगाने, जन्मो के मित हैं।
- 43:16क्या होगा कौन से पल में कोई जाने ना कोहरे ताल मिले नदी के जल में
- 43:30जली नदी मिले सागर में। सागर मिले कौन से जल में कोई जाने
- 43:41ना और ताल मिले नदी के जल। में अनजाने होठों पर ये पहचान गई
- 43:55थी। अनजाने होंठों पर ये पहचानें गीत
- 44:07हैं पहचाने गीत हैं। वह जिसके पास जाओगे।
- 44:15वो अभी तुम्हें अनजान जैसा लगता है, लेकिन याद रखना, वो तुम्हें
- 44:19खेचता है क्यों? क्योंकि तुम उसके अंश हो बौद्ध
- 44:25समुद्र का अंश हुआ करता है, वो तुम्हें खेचता है, इसलिए तुम गाहे
- 44:33बगाहे सोचते हो ये। कौन है?
- 44:36ये कौन है जो मुझे खींच रहा है? सब कुछ होते हुए भी ये क्या है
- 44:42जिसकी कमी मुझे खल रही है? छोटी छोटी बच्चियों के रेत रेप
- 44:47करके खून पी के भी मेरी आत्मादृपति नहीं हुई।
- 44:51मैं दौड़ता ही भर रहा हूँ। क्या है ऐसा जो बम हो गया है अब
- 44:55ये मिला नहीं सब कुछ तो है, लेकिन नहीं सब कुछ नहीं है पुत्र सभी
- 45:05कुछ नहीं है सभी कुछ तब होगा जब तुम इन अनजाने गीतों पर।
- 45:12पहचानी गीत गाओगे। कल तक जो थे वेगाने जन्मो के मीत
- 45:21हैं, जन्मो के मीत हैं तुम्हें सदा।
- 45:28ही लगता है कि कुछ खोए हुए हों। सब कुछ छुपाकर भी मैं किसी चीज़
- 45:33से वंचित हूँ। वो क्या है?
- 45:35वो तुम्हारा अपना अंतस का प्रेम सतल है, वह अंदर अंदर का समुद्र
- 45:40है तुम्हारा जो चुम्बक की तरह तुम्हें हर पल काँचता है इसलिए
- 45:48प्रेम से बड़ा चुम्बक कोई है। वह प्रेम का सागर है।
- 45:58अनजाने होंठों पर यह पहचाने गीत। के गीत तो पहचानी है यह आवाज
- 46:08अनंतनाथ की तो कुछ। पहचानी पहचानी लगती।
- 46:14करतक जो थे वे गाने जनमो के मित्र हैं।
- 46:26अमित वारे कल तक जो थे वेगाने जन्मो के मिथ।
- 46:36हैं ये तुम वहाँ जाकर पाओगे के मैं ही बिछड़ गया था।
- 46:43बड़े शोक से सुन रहा था, ज़माना हमी खो गए।
- 46:50दास्तां कहते कहते। वहाँ जाकर तुम्हें पता चलेगा कि
- 46:56वह कहीं नहीं गया। दादू दूजा को नहीं, दूजे मन की
- 47:02ठो। दादू दूजा को नहीं दूजी मन की
- 47:07दौड़ दौड़ मिटी सन सह गया वस्तु ठोर की ठोर वह वहीं मिलेगा जहाँ
- 47:14पर छोड़ कर गए थे उसे और वह लगातार फेंचेगा तुम्हें यही
- 47:21तुम्हारा दर्द है। तुम कुछ भी कर लो लेकिन पुत्र
- 47:27शांति नहीं मिलेंगे और शांति ही तुम्हारा अंतिम ध्येय और लक्ष्य
- 47:36जब तक बहे नहीं मिलेंगे तुम तड़पोगे चाहे बच्चियों का खून फो।
- 47:42चाहे बच्चियों से रेप करो, चाहे कुछ करो, चाहे सारे धरती का धन
- 47:47औरत इकट्ठा करो, तुम्हें चैन नहीं मिलेगा क्योंकि चैन बरामद में है।
- 47:57चैन तो उसके पास से जाना पड़ता है।
- 48:00प्यास बजाने के लिए कुएं के पास से जाना।
- 48:02पड़ता है अनजाने होंठों? पर ये है है।
- 48:09चानेगी तो है वह। तो सदा से ही पहचाना था, आज भूल
- 48:14गया। इसलिए संत कहते हैं रिमेम्बर
- 48:18यूरसेल्फ़, यू आर यू। कल तक जो थे वेगाने जन्मों के में
- 48:27से हैं वो कभी। खोया नहीं जब तुम अमीबा थे जब तुम
- 48:32पत्थर थे जब तुम पेड़ से पौधे थे यूनीसेल्युलर थे मल्टीसेल्युलर
- 48:37थे, तो वह तो था। और वह तुम्हारे आंतरिक कोनों में
- 48:43विद्यमान था। श्रद्धा वह तो जन्मो जन्मो से
- 48:52तुम्हारा मील है, बस तुम ही छोड़कर आ गए, उसे मेला देखने दे,
- 49:00संसार का और वडक्क है। आज तुम्हें याद नहीं कि मेरा असली
- 49:05मुकाम क्या है? इसी असली मुकाम की चाहत में तुम
- 49:10दर दर की ठोकरें खाते हो, तुम एपिस्टीन कांड करो, तुम हीरोइन
- 49:20पांडा को मारो, तुम तुलसी प्रजापति को मारो।
- 49:23तुम सोहराबुद्दीन को मारो, तुम जस्टिस लोहा को मारो, तुम 750
- 49:29किसानों को मार दो, तुम सारी दुनिया को मार दो, लेकिन एक बात
- 49:33ध्यान रखना न चैन मिला मसूरीनी को न स्टालिन को।
- 49:40ना ही ये लड़कों ना ही तुम्हे मिलेगा।
- 49:47कल तक जो थे वेगाने जन्मो के मीत हैं।
- 49:56जन्मो के मीत हैं, उस जगह पे पहुँच जाओ।
- 50:00जहाँ जाकर तुम वापस न सको पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न।
- 50:07अमित वारे कल तक जो थे वे गाने जन्मो के मित हैं।
- 50:20क्या होगा? कौन से पुल में क्या होगा?
- 50:26कौन से पल में कोई जाने न ओरे ताल मेरे नदी के जल में।
- 50:38नदी मिले, सागर में सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना ओहरे ताल
- 50:49मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में।
- 50:57पहले तुम बहुत कुछ थे, तुम शरीर थे, मन थे, विचार थे, भावनाओं थे,
- 51:04ये सब द्रव्य तुम्हारा था, ऊपर से तुमने आज एक लबादा और ओढ़ लिया।
- 51:11इसीलिए मैं कहता हूँ कि राजनीति में मत जाना।
- 51:15राजनीतिक ओहदा मत स्वीकार करना, क्योंकि पहले भार कम था क्या अब
- 51:24मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ यह और बोझ लाद लिया तुमने, मैं चीफ
- 51:29मिनिस्टर हूँ यह बोझ और लाद लिया तुमने ये मानता हूँ कोई हतो ये
- 51:34मानता है। कोई भी कभी भी गद्दी छुड़ा देगा
- 51:39और अगर कोई भी न छुड़ा सके तो मौत तो छुड़ा ही लेगी।
- 51:47मौत तो 1 दिन आएगी न कर इतना तक? जहाँ एक रोज़ फानी तेरे से आ आला
- 51:59हो गुजरे न कुछ बाकी निशानी वेबेलोनिया में कवर ढूंढ के दिखा
- 52:05दो शिकंते तुम्हे कुछ पता नहीं तुम अंत हो।
- 52:17तुम धृतराष्ट्र की तरह आँखों से नहीं तुम बुद्धि से होते हो तुम
- 52:22बुद्धांत हो। क्या होगा?
- 52:29कौन से पल में कोई जान ना? और ताल मिले नदी के जल में नदी
- 52:42मिले, सागर में सागर मिले कौन से जल में कोई जाने न और ताल मिले
- 52:53नदी के जल में। उस आनंद को उकालो और गांठ में
- 53:04बांध लो, उसका रसू उठाओ, उसका मज़ा जाओ बाहर कोई मज़ा नहीं है
- 53:11ऐफ़ स्टेन मर गया, ट्रंप मर जाए। सब मर जाएंगे लेकिन मज़ा मज़ा तो
- 53:20जहाँ है वहीं पड़ा है मज़ा कभी नहीं मरता, वह वहीं रहेगा।
- 53:28वस्तु ठोर के ठोर? वह कभी कहीं जाता नहीं, वह अटंप
- 53:36है, वह अटल है, वह यात्रा नहीं करता क्योंकि सब जगह है कहाँ
- 53:41यात्रा करेगा। गांठ गठियायो हीरोपयो गांठ
- 54:05गठियायो बार बार। बा।
- 54:13को क्यों खोले बार? बार बा को क्यों?
- 54:23खोले। मन मस्त हुआ वो मन मस्त हुआ।
- 54:33मन मस्त हुआ मन मस्त हुआ मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ
- 54:47फिर क्यों बोल? हम सपायो मानसरोवर हम सपायो ताल,
- 55:12तलैया, ताल, तलैया, ताल तलैया क्यों भौंकता?
- 55:25करता। संसार की इस गंदगी में बोझा उठाए
- 55:31हुए फेंक दो। इसको और भार मुक्त हो जाओ, यही है
- 55:36मुक्ति किसी नाम से मुक्ति नहीं होती।
- 55:41जोहरन न जुबती छूटे संसार इस बोझे को पटर दो।
- 55:48रहो मत चिल्लाओ मत सीधा साओ भाई तुम्हारे सिर के ऊपर जो बोझ है
- 55:54उसे पटक। ताल तलेह।
- 56:03कभी इसी गुरु के पास, कभी उसी गुरु के पास, कभी उस।
- 56:07डेरे में कभी उस आश्रम में ये ताल तलैया हैं।
- 56:12सभी ये बहुरूपिये हैं, तुम्हें ठगने के लिए दाढ़ी पीलीगादी करते
- 56:19हैं, इन गुंडों का गिरोह है इस गिरोह से बचो।
- 56:25ताल तलैया क्यों ढोल मन मस्त हुआ मस्त हुआ मन मस्त हुआ मन मस्त हुआ
- 56:43मन मस्त हुआ? मस्त हुआ फिर जो धन्यवाद।