Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Nov 24 - Golden Words - ध्यान की सारी वीडियोस का सार! ध्यान की शक्तिशाली आवस्था - तुरिया आवस्था।
Transcript
- 0:03अनुज मिश्रा कल इनका फ़ोन आया बाबा आप कहते हैं भोगो भोग में
- 0:18दुख है। स्टॉक कर भी यही कहते हैं।
- 0:28हमने सब कुछ होगा, सब होगा। और भोगने के बाद कोई वास न बाकी न
- 0:41बचे सब देख लिया जिसे आप कहते हो के काम नेस में आ जाओ ठहरों वो भी
- 0:55हो गया। लेकिन मन से वे तड़पता है।
- 1:01अब क्या रह गया भक्य अनुज मिश्रा आस्ट्रिया से सुंदर सवाल है।
- 1:25जिसने भोग दिया है, जिसके भीतर ठहराव आगे को ही ऐसा प्रश्न पूछ
- 1:35सकता है। भोग भी भोगों से दुख भी मिला।
- 1:45भोगों से काम ने भी आई शोर शराब और रुका प्रयोग करता हूँ।
- 1:55घर दो, गुबार सब निकल गया, ठहराव भी आ गया।
- 2:03रुक गया मन लेकिन जो आप कहते हैं वो नहीं आया, अब क्या कमी रह गई
- 2:11बाबा? अति सूक्ष्म से सूक्ष्म का सवाल
- 2:15है, कोई वरला ही इस प्रश्न को पूछ सकता है इनडाइरेक्टली तुम प्रश्न
- 2:25पूछ रहे हो व्हाट? इस दी डिफरेंस बिटवीन कामनेस एंड
- 2:29पीस? कोलाहलहीनता और शांति पीस में
- 2:45क्या फर्क है? आप घर में बैठे हो, बच्चे शोर कर
- 2:53रहे हैं, खेल रहे हैं, उत्पात मचा रहे हैं।
- 2:57यही उम्र है उत्पात मचाने की। वे बजाय शोर शराबा करते हैं,
- 3:02तिलकरियां मारते हैं, नाचेंगे कूदेंगे, भागेंगे, दौड़ेंगे, उनकी
- 3:10उम्र है आपने, वो सब कर लिया। कभी आपने भी किया था उस उत्पाद से
- 3:25आप घबरा जाते हो, ध्यान रखिए इसे कहते हैं, कोलाहल कोलाहल शोर है।
- 3:40यह शोर आपको अच्छा नहीं लगता। आपका अंत कहीं ना कहीं कहता है कि
- 3:49इस शोर से दूर हो रहा है और तो तुम्हें कोई उपाय आता नहीं।
- 3:57तुम उस स्थान से हट जाते हो, ऊपर के कमरे में बैठ जाते हो, वह शोर
- 4:03नहीं है इसे कहते हैं, कॉरमनेस शोर का न होना कोलाहल हीनता।
- 4:15इसे कहते हैं कामनेस कहते हैं अंजू मिश्रा पूछ रहे हैं बाबा
- 4:25इससे आगे और क्या है? इससे आगे एक बड़ा वो है।
- 4:34कुलाहल हीनता से आगे है शांत अभियान से समझना कुलाहल हीनता,
- 4:46नॉइज़, लेस लेस ये नेगेटिव है नकारात्मक।
- 4:54शोर नहीं है बस विधायक जैसा कुछ नहीं है।
- 5:00इसमें ऋणात्मक है, नेगेटिविटी है, शोर नहीं है।
- 5:12लेकिन लुत्फ भी नहीं है, शोर भी नहीं है, लुत्फ भी नहीं है में से
- 5:19एक कदम और आगे जाने को कहता हूँ आपसे कोलहल से दूर आ गए।
- 5:28नीचे बच्चे थे, शोर मचाते थे, भाग दौड़ करते थे, नाचते कूदते थे,
- 5:33होहल्ला करते थे, तुम उठकर ऊपर आ गया, यह शोर नहीं है।
- 5:45इस शोर होने न होने का नाम है नॉइज़लेसनेस यानी कमनेस शोर
- 5:52हीनता। लेकिन मैं तुम्हें कहता हूँ कि
- 5:57शोर हीनता में ठहर मचाना इससे आगे और क्या है?
- 6:03और भी है। और भी गम है जमाने में मोहब्बत के
- 6:15सिवा राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा।
- 6:28कोलाहल हीनता तुम्हारा ध्येय नहीं, सुख समझेगा, ठहराव आएगा,
- 6:40अच्छा लगेगा तुम यहाँ रुके हुए रह सकते हो।
- 6:48अब रात को तुम निद्रा में जाते हो, निद्रा में कुलाहल हीनता नहीं
- 6:53होती, क्षमा करना कुलाहल हीनता होती है, चुप्पी होती है, साइलेंस
- 7:01होती है। लेकिन पीस नहीं होती।
- 7:11पीस का फायदे मिश्रा की कामनेस। कोलाहल का अभाव है कोलाहल नहीं है
- 7:25बस निद्रा में और जिसकी बात मैं करता हूँ वह मिलती जुलती है
- 7:33कोलाहलहीनता के साथ पीस शांति वहाँ भी कोई धूम धड़का नहीं है।
- 7:41कोई शोर नहीं, लेकिन बड़ा आनंद है, बड़े झरने बहते हैं, सुख
- 8:00ग्रह। बड़े फूल खिलते हैं।
- 8:04सुगंधियों से बराबर कोलाहल हीनता मिलेंगे तुम्हें निद्रा में और
- 8:17तुम्हें प्रकृति रोज़ ले जाती है कोलाहल हीनता में तुम रोज़ जाते
- 8:23हो नॉइज़लेसनेस में तुम रोज़ जाते हो?
- 8:27बेहोशी के क्षण में उलाहल हीनता ही होती है, लेकिन एक ऐसा भी क्षण
- 8:37है जहाँ बेहोशी नहीं जहाँ होश होता है।
- 8:43होश के उस क्षण में कोलाहल हीनता आ जाये।
- 8:48ध्यान से समझना इन शब्दों को होश के उस क्षण में कोलाहल हीनता आ
- 8:57जाये तो उसे कहते है शांति पीस देर इस ए लॉट ऑफ डिफरेंस बिटवीन।
- 9:03कामनेस एंड पीस कामनेस है चुप्पी शोर का ना होना और नकारात्मक है
- 9:14कोई चीज़ नहीं है क्या नहीं है शोर नहीं है, लेकिन पीस।
- 9:25पीस किसी चीज़ का अभाव नहीं, पीस विधायक है पॉज़िटिव है, किसी चीज़
- 9:33का होना है वो चीज़ क्या है वो ही आनंद की फुलकारियां बोही सुगन्धों
- 9:44का आवास वो ही झरणों की मंद मंद मुस्कान धीमे धीमे चलती हुई फिजा
- 9:58की हवाएं। कल्पना का वो एहसास जिसमें तुम
- 10:15कभी नहीं डूबे थे, सो ध्यान रखना। तुम आज तक कभी पीस को उपलब्ध नहीं
- 10:23हो रहा हो। पीस को कभी कोई बिरला, बुद्ध,
- 10:30कबीर, नानक उपलब्ध होता है। उलहदहीनता को तो तुम सभी रात्रि
- 10:39में जाकर निद्रा में। कोलाहल हीनता के शत्र को छू लेते
- 10:45हो, लेकिन इससे तुम गलती में मत रहना कि हमने पीस को लिया, मैं
- 10:58कहता हूँ पीस तुम्हारा ध्येय है। इट्स युअर ऐम।
- 11:06तुम्हारी मंजल है वहाँ जाना है, पीस विधायक है, शांति विधायक है
- 11:18और कोलहल हिंता। नेगेटिव है।
- 11:28प्रकृति तुम्हें ज्यादा से ज्यादा कुलाहलहीनता के भीतर ले जा सकती
- 11:33है। इसके भीतर जाना प्रकृति के बस से
- 11:36बाहर है। पिस में उतरना तो तुम?
- 11:46तुम अपने ही से कर सकोगे जो तुम करोगे उससे पीस में उतर जाओगे।
- 12:06क्या करना होता है? जिससे तुम पीस में उतर जाओ।
- 12:11देखिये सोने के लिए तो कुछ करने की जरूरत नहीं, कोलाहल हीनता के
- 12:16लिए कुछ करने की जरूरत नहीं। आँखें बंद करो, मौन हो जाओ, शरीर
- 12:21को रिलैक्स कर दो, बुद्धि को रिलैक्स कर दो, सोचना बंद कर दो।
- 12:25ऑटोमैटिक्ली तुम कोलाहलहीनता में चले जाओगे जिससे निद्रा कहते हो
- 12:31तुम, वो तो बचपन से ले के आज तक तुम सदा उसका लुत्फ लेते आए हो,
- 12:40लेकिन एक लुत्फ जो आपने लिया नहीं कभी आज तक वो लुत्फ।
- 12:50शांति का है शब्दकोश में डिक्शनरी में दोनों शब्दों का मतलब एक ही
- 13:00मिलेगा ठीक भी है। क्योंकि शब्दकोश को लिखने वाला
- 13:05डिक्शनरी के शब्दों को लिखने वाला व्यक्ति उस तल पर पहुंचा नहीं,
- 13:10जीस तल पर पीस है जीस तल पर शांति है उसकी समझ में आएगा ही नहीं।
- 13:21व्हाटस दी डिफरेंसेस बिटवीन दी टू कामनेस और पीस में फर्क क्या है,
- 13:27वह नहीं समझ पाएगा तो कौन समझेगा? सिर्फ एक व्यक्ति समझेगा, कोई
- 13:38बुद्ध समझेगा। कोई महावीर समझेगा, कोई कबीर और
- 13:43नानक समझेगा और इस पीस के लिए वो सब कुछ छोड़ने को तैयार हो
- 13:48जाएंगे। कोलहल हींता को कुछ भी छोड़ने की
- 13:54जरूरत नहीं कोलहल हींता को तो तुम?
- 13:57सहज ही रोज़ पा लेते हो। प्रकृति ही तुम्हें ले जाती है
- 14:01नॉइज़लेसनेस में उसके लिए तुम्हें कुछ भी तो नहीं करना होता और तुम
- 14:14रोज़ जाते हो। यहाँ शोर नहीं होता है जहाँ घनी
- 14:23भूत ठहराव होता है तो आइए इसे समझने के लिए हम इसको तीन भागों
- 14:34में विभक्त कर रहे हैं। सबसे पहला है कोलाहल संसार कोलाहल
- 14:43है और अभी तुम्हारी शक्ति इस कोलाहल में व्यस्त है।
- 14:50ये पहला भाग होगा। संसार कोलाहल है अभी तुमने अपनी
- 14:59शक्ति की इन्वेस्टमेंट संसार में लगा रखी है और ये कोलाहल तुम्हें
- 15:07दुख देता है, कोलाहल सदा ही दुख देता है।
- 15:15दूसरा स्टेप है जो बुद्धि के थर में होता है।
- 15:23जब मन कुछ नहीं सोचता, निर्विचार अवस्था में होता है।
- 15:30मन के आगे कोई विषय नहीं होता। सब्जेक्ट कुछ नहीं होता, सोचने के
- 15:34लिए तुम विषय ही ना होते हो सब्जेक्ट लस्नेस की अवस्था में
- 15:40होते हो तुम कुछ सोचते नहीं हो खाली रह जाते हो तो जिन्हें मैं
- 15:46अक्सर आम कहता हूँ फुर्सत के लम्हे।
- 15:51दूसरी व्यवस्था है पहली घटती है संसार के भीतर कोलाहल दूसरी घटती
- 15:58है कोलाहल हीनता वो तुम्हारी खोपड़ी में घटती है, तुम्हारी
- 16:03बुद्धि शांत हो जाती है, तुम्हारी बुद्धि शोर नहीं मचाती।
- 16:08तुम्हारा मन ऊहा पोहा नहीं खड़ा करता, तुम थोड़ी देर के लिए ठहर
- 16:15जाते हो, वो निद्रा में भी होता है वो जागते जागते भी किसी क्षण
- 16:22में हो सकता है। कभी कभी अचानक तुम पाओगे के जागते
- 16:27जागते मन के पास कोई विषय ना बचा। मन चुप हो गया, मन ने सोचना बंद
- 16:38कर दिया, भागना बंद कर दिया, विषय हीनता आ गई।
- 16:46उस अवस्था को कहते हैं, कामनेस पहली संसार के तल पे आई कोलाहल
- 16:55दूसरी कोलाहल हीनता बुद्धि के स्तर पर आई।
- 17:03और कुलाहल हीनता में तुम रोज़ जाते हो, नींद के तल पे भी तुम
- 17:08रोज़ जाते हो, वह तो तुम्हें प्रकृति स्वतः ही ले जाती है रोज़
- 17:16ये दो तलों का तुम्हें आभास है। संसार का और बुद्धि का कुलाहल का
- 17:23और कुलाहल हिन्दता का, लेकिन एक तीसरा कल है, इस बुद्धि के तल से
- 17:31नीचे जाओगे, संसार से हट जाओगे। और बुद्धि से भी हट जाओगे।
- 17:44जीस शिक्षण का मेरा मन कुछ सोचता नहीं, निर्विषय होता है,
- 17:49निर्विचार होता है, सहजता में होता है, ठहरा हुआ होता है, कुछ
- 17:55सोचता नहीं। उत्पात नहीं मचाता, उसे कुछ नहीं
- 17:59चाहिए। उस वक्त यह क्षणिक होती है तो तुम
- 18:05ठहरे होते हो। उस वक्त इसका नाम है ठहर जाना।
- 18:18कोलाहलहीनता साइलेंस नोइसेलस्नेस बुद्धि के तल पे आती है
- 18:31नोइसेलस्नेस और एक तीसरा तल है। जहाँ हम नहीं जाना मैंने कहा, वह
- 18:40हमारा ध्येय है, लक्ष्य है वहाँ अगर तुम पहुँच जाओ तो तुम्हें
- 18:49किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होगी, संसार में रहोगे।
- 18:561000 तरह की आवश्यकताओं आएंगी शरीर, भोजन मांगेगा ध्यान से
- 19:04समझना बढ़िया, गहरे शब्द है आँखें सुंदर दृश्य मांगेंगे कान।
- 19:15सुन्दर संगीत मांगेंगे। मन कह रहा चलो हिल स्टेशन चले चलो
- 19:24वहाँ चले जैसा नजारा उसने अपने मन के भीतर कल्पित किया होगा।
- 19:36वहाँ चले मन कुछ देखना चाहता है मन को भ्रम है कि उसको देखने से
- 19:47शांति मिल जाएगी। तलाश काहे?
- 19:52कि वास्तविक तलाश है शांतिक? जिससे शांति मिल गई, उसकी सारी
- 20:04जरूरतें मिट जाती हैं। मैंने कहा बड़ा खतरनाक शब्द है।
- 20:12हिलाएगा तुम्हें तुम्हारे प्राणों को कुपायेगा जरूरतें बड़ी जाती
- 20:18हैं जहाँ शांति आ जाती है कामनेस। बुद्धि के तल पे कामनेस होती है
- 20:32निद्रा के तल पे भी कामनेस होती है निद्रा के तल पे पीस नहीं होती
- 20:41नींद में तुम फ्रेश तो बहुत होती हो बड़े तरो ताजा उठते हो सुबह
- 20:48सुबह। आँख खुलती है संसार बड़ा सुहागन
- 20:53रखता है। क्या हुआ कामनेस के भीतर से अभी
- 21:01अभी आए ताजा ताजा आई हो सारी रात। तुम उस कमनेस का आनंद लेते रहे,
- 21:12अब यहाँ थोड़ा सा साधक ठहर जाए। मैं कुछ बात कहूंगा, उसे ध्यान से
- 21:20सुनें। क्रिया योग करने के बाद।
- 21:28जब कचरा पचड़ा निकल जाए और मैं कहता हूँ कुछ भी ना करो ध्यान में
- 21:36तुम बैठ जाओ जब बिना क्रियोग के क्रिया योग किए भी बैठ जाओ।
- 21:43तुम किसी कारण से ला चाह रहे हो, प्रायोग नहीं कर सकते या नहीं
- 21:47करना चाहते तो तुम बैठ जाओ, कुछ न करो।
- 21:52कुछ न। करो की स्थिति में पहले आएगी
- 21:54कामन्यास मन भटकना बंद कर देगा। खूब भटकेगा, खूब भटकेगा।
- 22:03उसके बाद अगर तुम उसकी तरफ ध्यान न किए तो वह भटकना छोड़ देगा जैसे
- 22:11गंधला पानी अगर तुम कांच के ग्लास में भर के रख दो एक तरफ।
- 22:20और सो जाओ और सुबह उठोगे तो क्या पाओगे?
- 22:29माटी नीचे बैठ गई, शुद्ध स्वच्छ निर्मल जल ऊपर आ गया, माटी नीचे
- 22:38बैठ गई। बस वही होता है, नींद में हमारे
- 22:41साथ तुम ठहर जाते हो नींद में जैसे पानी का ग्लास हमने गंदला
- 22:49पानी हमने ठहरा दिया, एक जगह पे वैसे ही तुम होते हो।
- 22:57और वह गंतला पानी धीरे धीरे क्योंकि उसके साथ कोई छेड़छाड़
- 23:01नहीं होती, वह धीरे धीरे माटी नीचे बैठनी शुरू हो जाएगी माटी
- 23:07अलग है, पानी से माटी अलग है बिल्कुल इसी तरह कोलाहल तुमसे अलग
- 23:16है। कोलाहल तुम्हारे मन का हिस्सा
- 23:21नहीं है, तुम कहते हो, मेरा मन बड़ा शोर मचाता है, तुम गलती में
- 23:28मन अलग चीज़ है, शोर अलग चीज़ है, ये बिलकुल ऐसे है जैसे गंधलापन।
- 23:38और गंधला पानी तुम गिलास में काँच के गिलास में रख देते हो एक तरफ
- 23:47और आराम से बैठ जाते हो सो जाते हो।
- 23:52मैं सोने के साथ कंपैरिजन कर रहा हूँ, उसका सो गए, इधर पानी का
- 23:59गिलास रखा, उधर गंदले पानी का इधर तुम अपने भीतर उतरते जाओगे, उधर
- 24:07वो माटी भीतर उतरती जाएगी। सुबह उठोगे तो क्या पाओगे?
- 24:15उस गलास में शीतल जल ऊपर है। ट्रांसपेरेंट और माटी नीचे बैठ गई
- 24:26और निद्रा में भी यही होता है। मन ठहर गया, कोलाहल अलग हो गया,
- 24:36मन अलग हो गया, मन मरता नहीं है, ध्यान रखना मन और कोलाहल इन दोनों
- 24:46चीजों को अगर जोड़ दिया जाए तो उत्पात शब्द।
- 24:52मैं कहना ज्यादा ठीक समझूंगा, बह का हुआ, मन शोर करता हुआ मन
- 25:00कोलाहल युक्त मन मन तो रहता है, मन मरता नहीं।
- 25:10गंदले पानी की तरह अभी तो है। अभी तुम्हारा मन शीतल जल और माटी
- 25:21इसका मेल है। दोनों का यह माटी को हल करती है।
- 25:27मन शीतल जल की तरह है। इसको छित्र कर दो, ठहर जाओ तुम
- 25:32ठहर जाओ, आराम से तो क्या होगा, माटी अलग हो जाएगी और जल अलग हो
- 25:42जाएगा। रात को तुम ठहर जाते हो।
- 25:46यह प्रोसेसर सोती रहती है। तुम बड़े फ्रेश हो जाते हो,
- 25:52कोलाहल ठहर जाता है, शुद्ध जल भी ठहर जाता है।
- 25:57पहले दोनों भाग रहे थे और सुबह जब तुम उठते हो, तरो ताजा उठते हो,
- 26:06ट्रांसपेरेंट जल अलग होता है। माटी अलग होती है, गहरी है बातें
- 26:12ना समझाई तो बार बार रिवाइंड करके, फिर सुन लेना बड़ी सरलता से
- 26:19बोल रहा हूँ, मन नहीं ठहरेगा। ठहरेगा उत्पाद ठहरेगा, शोर शराबा
- 26:36ठहरेगा। कोलाहल वह जो माटी शोर मचा रही
- 26:42थी, वह बैठ जाएगी। अलग हो जाएगी शीतल जल।
- 26:47अलग हो जाएगा मन तो सभी समृतियों का, जो तुमने सीखा सूचनाओं का जब
- 27:03तुमने कुछ देखा समृतियों का? जो तुमने कुछ कल्पना के सपने
- 27:09संजोए उन सपनों का कुछ भोगने की इच्छाओं का समूह यह है मन।
- 27:25मन के भीतर सभी चीजें है। मन में शीतल जल भी है और मन में
- 27:32यह कूड़ा कबाड़ा भी है। स्मृति भी है, कल्पना भी है,
- 27:38तुम्हारी वासनाएं भी है। तुम्हारी यादगारियां भी हैं,
- 27:42पिछले जन्मों तक की यादगारियां हैं और तुम शीतल जल की तरह भी हो
- 27:52तुममें मिल गया है ये सारा कचड़ा, ये सारा कचड़ा खत्म हो जाएगा
- 27:58कैसे? जब तुम उस जल की तरह ठहर जाओगे तो
- 28:05पहला प्रमाण तो ये कि तुम रात को भी ठहर जाते हो और रात को जब ठहर
- 28:12जाते हो, मन अलग हो जाता है, शोर अलग हो जाता है, सुबह जब उठते हो।
- 28:21तो तुम अपने आप को बड़ा फ्रेश महसूस करते हो, क्योंकि कचरा अलग
- 28:28हो गया। जैसे जैसे संसार का प्रतिघात तो
- 28:33तुम्हारे भीतर दस्तक देता है वह बैठी हुई माटी।
- 28:39फिर फिर जल के भीतर मिलनी शुरू हो जाती है और फिर वही सब कुछ हो
- 28:46जाता है। मन मैला हो जाता है, मन भागता है,
- 28:54मन दौड़ता है। मन कुछ पाने की चेष्टा करता है,
- 28:58मन कुछ याद करने की चेष्टा करता है।
- 29:02चेष्टाओ से युक्त मन गंदला हो जाता है और चेष्टाहीन मन परमात्मा
- 29:09हो जाता है। मन तू ज्योत स्वरूप है अपना मूल
- 29:13पछा। ये शब्द कहाँ है, संपूर्ण है, मन
- 29:22में दुख नहीं देखता है इस मन से ही सब देखा जाता है, मन तो एक शीश
- 29:33की तरह है। जिसमें तुम अपनी छवि निहार सकते
- 29:38हो। एक दर्पण की तरह है तोरा मन दर्पण
- 29:43कहलाए। अगर इस पर धूल दवाई जमी है तो
- 29:49तुम्हे कुछ नहीं देखेगा। और अगर ये साग उजला धूल विहीन कोई
- 29:59कण नहीं इसके ऊपर तो फिर तुम्हें अपना चेहरा साफ साफ देखेगा।
- 30:06बात बड़ी गहरी है लेकिन आराम से समझोगे तो समझ जाओगे।
- 30:16मन रोज़ अलग होता है। कोलाहल से निद्रा में, निद्रा में
- 30:23तुम अलग हो जाते हो, तुम मन तुम्हारा मन अलग हो जाता है, शोर
- 30:29अलग हो जाता है। सब ठहर जाता है मौन में और सुबह
- 30:37के उठते हो बड़ा शांत होता है बड़ा फैट्स दिमाग होता है फिर फिर
- 30:44वो ही क्रियाकलाप रोज़ रोज़ तुम वो ही करते जाते हो जन्मते हो।
- 30:51ये सब कुछ कूड़े कबाड़े करते हो, मर जाते हो साथ ले जाते हो कुछ
- 30:58यादें कुछ कल्पनाएं, कुछ वासनाएं, कुछ भोगने की जो कुछ भोगने कुछ
- 31:06शेष रह गई। कुछ याद कर लिया, कुछ याद करना
- 31:12बाकी रहे क्या ये सब साथ ले के जाते हो?
- 31:16जो किया उसके कर्म साथ ले गए। जो भोग लिया उसका दंश साथ ले गए
- 31:24या उसका सुख साथ ले गए। ये सब साथ लेके जाते हो तुम गंधला
- 31:37मन जब तुम सो जाते हो, छट जाता है, बार बार बोलता हूँ चीज़
- 31:45तुम्हें अच्छी तरह से समझाया जाए। मन अलग माटु अलग है यह कामनेस तुम
- 31:58शांत हो रात को कोई तूफान नहीं होता सुसुक्ति की अवस्था में जब
- 32:05तुम गहरी निद्रा में होते हो, बड़े मगन होते हो लेकिन संत
- 32:10तुम्हें। एक और अवस्था बताते हैं तुमने
- 32:16जागृत अवस्था देखी तुमने स्वप्ना अवस्था देखी?
- 32:22जब तुम्हें स्वप्न आता है, तुम श्रुति को भी देखते हो, तुम्हें
- 32:28पता नहीं चलता। यह सुसुक्ति कब आती है?
- 32:32लेकिन सुसुक्ति के बाद मन की एक और दशा होती है।
- 32:37मैं आज उसकी बात कर रहा हूँ, वह अवस्था होती है दुरयवस्था।
- 32:44सुरयावस्था तुरिया शब्द मैंने पहली बार प्रयोग किया, क्योंकि अब
- 32:48तक तुम योग्य ही नहीं थे। अब तक मेरा पाठ्यक्रम चल रहा था
- 32:53कि मैं तुम्हें तुरिया तक ले आऊ संसार से जागृत अवस्था।
- 33:04जागृत से सुप्त अवस्था और सपन अवस्था ये तीनों का जिक्र मैंने
- 33:13सदा किया। चौथे का जिक्र क्यों किया?
- 33:16लेकिन शब्द और उपयोग किया शब्द प्रयोग किया आनंद।
- 33:23शांति चौथी एक अवस्था है मन की, वो है तुर्यावस्था तुर्यावस्था
- 33:32में तुम्हें शांति मिलती है जहाँ सब ठहर जाता है।
- 33:42छक हो जाता है रह जाता है सिर्फ एक तत्व जो गहरी शांति पर मौन पर
- 33:57आनंद से युक्त है। जो सत्य भी है और जो चेतन भी है
- 34:07और जो आनंद भी है ये तीनों होण है उसके इसलिए हम सत्य चित आनंद हम
- 34:16रोज़ यह माता बोलते हैं बोल सत्यदानंद भगवान।
- 34:23सत्य चित आनंद सत्यदानंद और तुरया अवस्था में मन शांति को प्राप्त
- 34:37करता है। मैं चला था कोलहल से फिर आया
- 34:44कोलहल हिंसा के बीच में फिर कोलहल हिंसा से आगे चला।
- 34:49अब मैं पहुंचा तो अवस्था में बात कर रहा था।
- 34:56शांति के। ठहराव से चला था कामने से चला था
- 35:03शोर शराबी से हट जाओ, शोर शराबी से हट के तुम शांति की तरफ़ जाओ
- 35:13अब थोड़ा सा यहाँ विषय को वहीं विराम देखा।
- 35:19थोड़ा सा इसको और एक्सप्लेन कर देता हूँ।
- 35:25तुम्हें पता है कि जाप पाथ सुमरण। ये कोलहल है शोर तुम्हारी जीवा
- 35:45ऊपर नीचे हुई दो चीजें टकराई। आहट नाद हुआ तो कोलाहल पैदा हुआ
- 36:02और तुम इस कोलाहल से इच्छा रखते हो, शांति की तरफ जाने असंभव है।
- 36:13कोलाहल हीनता से तुम शांति की तरफ जा सकते हो।
- 36:17जैसे हमने पहले एक बिंदु पर सफर रोका, लेकिन जब तुम्हारे गुरु
- 36:25तुम्हे समझाते हैं कि कोलाहल से शांति की तरफ तुम जाओगे।
- 36:30तो तुम्हें भटकाते कोलाहल से कभी भी शांति की तरफ नहीं जाया जा
- 36:39सकता, सिर्फ और सिर्फ कोलाहल हीनता से शांति की ओर जाया जाता
- 36:48है। अच्छा सुन लो, कोलाहल तुम्हें
- 36:55मूर्छा में ले जाता है, कोलाहल से तुम्हारी शक्ति नष्ट होती है,
- 37:02क्योंकि कोलाहल करने में तुम शक्ति को व्यय करते हो।
- 37:07तुम कुछ नहीं बोला अपना नाम बोला अपना नाम बोला तुमने विजय, विजय,
- 37:14विजय, विजय, विजय क्या होगा तक जाओगे?
- 37:18इस समय शक्ति समाप्त होगी। बोलने में शक्ति समाप्त होती है।
- 37:25तो अपना नाम जपो के दूसरे का नाम जपो विजय विजय न करो, राम राम कर
- 37:30राते राते करो। यह कुलाहर दो चीजों के टकराव से
- 37:37पैदा होता है। यह शोर है।
- 37:45शोर से तुम शांति की तरफ कभी नहीं जा सकते ए शोर की तरफ गुलालहीनता
- 37:52से तुम शांति की तरफ जा सकते हो बस एक ही मार्ग है।
- 38:02तुम्हारे गुरु तुरंत समझाते हैं कि तुम शोर मचाओ, जागरण करो, बाग
- 38:09दो ऊंचे ऊंचे बोलो शोर शराब भी करो और तुम भगवान तक पहुँच जाओगे,
- 38:16परम शांति तक पहुँच जाओगे, नहीं पहुंचोगे तुम सबके घर जाओगे।
- 38:24एक वक्त ऐसा आएगा कि शक्ति को खर्च करते करते विजय, विजय, विजय,
- 38:29विजय करते करते तुम शक्तिहीन हो जाओगे और लड़ाम से घर जाओगे
- 38:33क्योंकि शक्ति समाप्त हो जाएगी। शक्ति कभी न कभी समाप्त हो जाती
- 38:38है। और तुम गिफ्ट लोगे तुम मूर्छित हो
- 38:43जाओगे जो तुम कहते हो कि हमें शांति मिलती है, वह शांति नहीं
- 38:54होते। वह कुलहल हीनता भी नहीं होती, वह
- 39:00तो और भी निक्कृष्ट दल होता है, किसका मूर्छा कुलाहल हीनता भी
- 39:10नहीं और शांति भी नहीं, वह तो मूर्छा में होते हो, मूर्छित होते
- 39:16हो? निद्रा में तुम मूर्छित नहीं होते
- 39:20हो। निद्रा में तुम कुलाहल गीनता में
- 39:22होते हो और एक और तन है जहाँ तुम ना निद्रा में होते हो ना तुम
- 39:33मोर्चा में होते हो। ना तुम कोलाहल में होते हो, ना
- 39:38तुम कोलाहल हीनता में होते हो। तुम शांति में होते हो और तुम
- 39:43जागृति में होते हो, ये दो चीजों को बराबर समझ लेना जो मैंने बोला
- 39:51जीस तल्क की मैं बात कर रहा हूँ। नींद में जागरण नहीं होता।
- 39:57नींद में शोर नहीं होता ठीक लेकिन शांति नहीं होती।
- 40:03जीस स्थल की मैं बात कर रहा हूँ दुरियावस्था की वहाँ शांति होती
- 40:10है और शांति के साथ साथ जागृति होती है।
- 40:18शब्द बड़े गहरे हैं क्योंकि बातें अनुभव की हैं और तुम्हें तभी पता
- 40:24चलेगा जब तुम स्वयं उस अनुभव में गहरे उतर जाओगे।
- 40:30तुम उस तुर अवस्था में जाकर। उस शांति का एहसास कर सकते हो और
- 40:40उस शांति में तुम पाओगे की तुम जगे हो, तुम सोये नहीं और दो
- 40:47शर्ते हैं जहाँ तुम मुर्षित नहीं होते।
- 40:52और जहाँ तुम परम शांत होते हो और शांति के साथ आनंद तो होता ही है
- 41:01आनंद की प्रतीक्षा है, शांति, शांति और आनंद दो चीजें नहीं।
- 41:11शांति और आनंद एक ही सूझ है जहाँ कामनिश है वहाँ आनंद नहीं है और
- 41:19फिर उलझी मत जाना जहाँ कुल्हा घीनता है शोर नहीं है वहाँ आनंद
- 41:29नहीं है। लेकिन जहाँ आनंद है, वहाँ शांति
- 41:37है और वहाँ जागृति है जहाँ कामन है, वहाँ जागृति हो ये जरूरी
- 41:48नहीं। अगर का मनस के भीतर जागृति आ जाए
- 41:55तो वह बन जाती है तुर्यावस्था तुम जागे होगे और तुम शांत भी बड़े
- 42:04होगे। तुम आनंदित से भी बड़े होगे, तुम
- 42:12जागे भी होगे रात को तुम जागे तो होते हो क्योंकि वो जो तुम हो वह
- 42:21तो कभी सोता नहीं रात को तुम जागे तो होते हो।
- 42:28इसलिए कृष्ण ने कहा जब तुम्हारे संसारी सोते हैं तो मेरा योगी
- 42:33जागता है। वह उस तल की बात कही।
- 42:37जीस तल पे तुम कभी सोते नहीं तो कृष्ण कहते हैं कि मेरा योगी
- 42:43जागता है रात को, तुम जागते तो हो तुम?
- 42:47इस शब्द को पकड़ लेना अच्छी तरह से शब्दों की अपनी तुच्छता है।
- 42:55शब्दों की तुच्छता को ठीक से समझना सीखो।
- 43:01रात को तुम जागते हो, तुम जागते हो।
- 43:06तुम जागते हो ये तुमने जानना है तुम्हे जागना नहीं है तुम जागते
- 43:15हो जागते रहते हो ये जानने के बजाय तुमने जागरण करना शुरू कर
- 43:22दिया। यहाँ तुम मरीज गए जब तुम जागरण
- 43:29करना शुरू कर दोगे तुम जो सदा से जाग रहे हो बिना कुछ किये बिना
- 43:40किसी मेहनत के किये। जो तुम स्वत से सहजता में जाग रहे
- 43:47हो वहाँ पहुंचना है और उसको जानना है कि वो तुम हो बजाय इसके तुमने
- 43:58अर्थ गलत कर दिया। अक्सर शब्दों के अर्थ गलत हो जाते
- 44:01हैं। और अगर कोई गुरु आपको बहका रहा
- 44:05है, जरूरी नहीं कि वह जानबूझ के बहका रहा हो, ये भी है कि वो
- 44:13जानता ही ना हो, वह अज्ञानी भी हो सकता है।
- 44:18उसने जैसा जाना ईमानदारी से तुम्हें बता दिया।
- 44:22लेकिन ये तो हो ही सकता है ना कि उसने उसे जागते हुए तत्व को देखा
- 44:27ना वह उसे जागते हुए तत्व के पास पहुंचा, ना उसने जैसा जाना वैसा
- 44:35तुम्हें बता रहा है। वह ईमानदार है, वह बेईमान तो नहीं
- 44:41है, वह ठग भी नहीं है। लेकिन अज्ञानी जरूर है।
- 44:47मैं जानता नहीं हूँ कि कृष्ण किस जागृति की बात करते हैं।
- 44:52मैं उसी जागृति की तरफ आज अग्रसर हूँ।
- 45:00अभी से ऐसा समझू मुर्दा। कामनेस में है, कोई प्रतिक्रिया
- 45:09नहीं करता और कामनेस के साथ साथ मूर्छा में भी है।
- 45:15तुम जाप करते करते जब एनर्जीलेसनेस की अवस्था में पहुँच
- 45:19जाते हो, जाप करते करते एनर्जी को खो देते हो।
- 45:25तब तुम इस मुर्दे वाली मुर्छ में पहुँच जाते हो और इस मुर्दे वाली
- 45:33मुर्छ में वह व्यक्ति भी पहुँच जाता है जो शराब पीता है, वह भी
- 45:40बिल्कुल उसी तल पर पहुँच जाएगा। जीस स्तर पर जाप वाला व्यक्ति
- 45:45पहुँच जाता है या मुर्दा पहुँच जाता है, मुर्दा भी मूर्छित है
- 45:51एनर्जीलेसनेस है और जाप वाला व्यक्ति भी नजदीक हो चुका वह भी
- 45:58मूर्छित है। और शराब वाला व्यक्ति भी मूर्छित
- 46:04है। उसका दिमाग सुन्न हो गया।
- 46:08मूर्सन हो गया। ये तीनों व्यक्ति एक ही कैटेगरी
- 46:13में है। वो चाहे मुर्दा हो, चाहे जाप करके
- 46:17बिल्कुल थक गया हो और तीसरा जिसने शराब पीली हो।
- 46:22जिसने मोर्चा देने वाला कोई नशा कर दिया।
- 46:26ये तीनों एक कैटेगरी में है। उसके बाद मैंने कहा संसार को राहल
- 46:33है कोलाहल के बाद जब मन ठहरता है तो तुम काम ने समय आते हो।
- 46:41काम ने शकार्थ जहाँ कोलाहल नहीं है जहाँ शांत सब चुप्पी ठहर जाता
- 46:49है मन कुछ ऊहा बहु निकलता भाग दौड़ और इससे आगे की अवस्था मैंने
- 46:58कहा वो है शांत। संसार से आएगा कोलहल हीता कोलहल
- 47:05हीता से आएगा शांत अब मेरे ख्याल में सारा तुम्हें समझ आ गया सूत्र
- 47:17वो शांति में जागृति है। तुम्हारी जाप की मोर्चा में
- 47:28जागृति में बिल्कुल विरोधी पॉइंट्स पे खड़े हैं।
- 47:33दोनों चाहे शराब पीटे मूर्छित हुआ हो।
- 47:40चाहे मुर्दा मुर्छित हुआ हो, चाहे जाप करके एनर्जी लेसनेस की अवस्था
- 47:47में तुम मुर्छित हुए हो और कई बार मिर्गी के दौरे वाले भी जाप वाली
- 47:53अवस्था में आ जाते है। तुम देखो ना कोई होश नहीं होता।
- 47:58उन्हें ज्योति सुभानी पड़ती है, पुरानी देसी उपाय है पुरानी
- 48:06मूर्चेत अवस्था में जब तुम होते हो तो उस वक्त एनर्जी खो चूके
- 48:13होते हो और जागृत अवस्था में नहीं होते।
- 48:18कम से कम ये रात को चिल्लाने वाले माता शिरा वालो को जगराप्ती करने
- 48:24वाले दी। सुबह होते होते मूर्छित हो जाते
- 48:27हैं क्योंकि रात भर को सारी शक्ति गंवा देते हैं तो सुबह मूर्छित हो
- 48:34जाते हैं। जैसा सारा पूरा विज्ञान मूर्छक
- 48:40इससे आगे चले कोलाहल से कोलाहल हेन्ता में और कोलाहल हेन्ता से
- 48:49शांति शांति का तल वो तल है। तुम कोलहल हीनता से नींद में भी
- 49:02जा सकते हो नींद में बड़ी फ्रेशनेस है बड़ी ताजगी है, लेकिन
- 49:07वहाँ एक चीज़ की कमी है क्या वहाँ ठहराव तो है फ्रेशनेस है।
- 49:15तुम उस तत्व के करीब हो जिसे तुम परमात्मा कहते हो, जिसे तुम स्वय
- 49:22कहते हो, बिल्कुल उसके पास बैठे हो नींद में और वह तुम्हें सारी
- 49:27रात चार्ज करता रहता है, शक्ति जीता रहता है और तुम सुबह होते ही
- 49:33बड़े फ्रेश होते हो। क्योंकि रात भर उसने तुम्हें
- 49:36शक्ति दी लेकिन जागृति नहीं आती। तुम्हें तुम फ्रेश होते हो, तरो
- 49:45ताजा होते हो लेकिन जागृत नहीं होते, वो जागृति के पास बैठे होते
- 49:52हो जैसे। सेंट बेचने वाला इतर बेचने वाले
- 49:56के पास तुम चले जाओ तुमने कोई सेंट लगाया भी नहीं खरीदा भी
- 50:01नहीं, लेकिन फिर भी तुम्हारे कपड़े उस गंध से युक्त हो जाएंगे
- 50:09क्योंकि उसके करीब बैठ के आए। तो कबीर ने कहा है कि जैसे गंदी
- 50:22की संगति से तुम्हें बिना खरीदे ही बिना मांगे ही सुगंध मिल जाती
- 50:30है। ऐसे ही संत पुरुष के संघ बैठने से
- 50:35तुम्हें शांति मिलती है। तो रात्रि भर तुम उस संत के पास
- 50:40रहते हो जो तुम्हारा तत्व है, भीतर के तत्व को मैं संत कहता हूँ
- 50:46और रात को तुम संत संगत में होते हो सारी रात और वह संत तुम्हें
- 50:52पिलाया ही जाता है। शादी की एनर्जी।
- 50:56और सुबह तक तुम बिल्कुल फुल हो जाते हो।
- 51:00ताजगी से ताजगी तो होती है लेकिन जागृति नहीं होती।
- 51:12लेकिन मैंने कहा दोनों चीजों का होना तुरियावस्था है कौन सी दोनों
- 51:19एक तो शांति दूसरी जागृति तुम कामनेस को शांति समझ लेते हो,
- 51:27यहीं मार खा जाते हो कामनेस। प्लस अवेयरनेस इज़ इक्वल टु पीस
- 51:37इसको लिख लेना कामनेस प्लस अवेयरनेस इज़ इक्वल टु पीस।
- 51:54कोलाहलहीनता प्लस जागृति बराबर है।
- 52:01शांति शांति में कोलाहल भी नहीं होता और जागृति भी होती है।
- 52:09उसी अवस्था को मैं कहता हूँ। दुरयावस्था देखिये अनुभव की बात
- 52:16को शब्दों में डालना मुश्किल तो बड़ा होता है लेकिन प्रभु का
- 52:23सहारा हो, प्रभु की कृपा हो, उसकी नजर हो।
- 52:31वह करीब हो तो तुम कैसे ना कैसे उसको ढाल ही दोगे?
- 52:42जीस कुलाहलहीनता में जागृति हो, वह तुर्यावस्ता है।
- 52:52अगर अवेयरनेस नहीं है और खुशी है तो तुम शांत नहीं फिर तुम मूर्छित
- 53:02हो ये दोनों चीजों का संगम। शांति अवेयरनेस जागृति जब तक यह
- 53:16नहीं आता तब तक तुम संत नहीं होते तब तक तुम तुरी अवस्था में नहीं
- 53:22पहुंचते सुबह तक। बांध देते देते तुम्हारा गला थक
- 53:30जाता है तुम शक्ति हीन अवस्था में हो जाते हो, तुम मूर्छित हो जाते
- 53:35हो लीजिए। हम मूल प्रश्न पे लौटे।
- 53:39फिर ये सिफारिश आ रही है कि मीरा का एक भजन?
- 53:45मोह भूल गए सांवरिया संसार के कोलाहल से कोलाहल गीता में सर कुछ
- 53:57नहीं करना तुम भीतर भीतर उतरते जाओगे।
- 54:04और 1 दिन तुम शांति में पहुँच जाओगे वही तल जहाँ निद्रा के तल
- 54:11पे रोज़ जाते हो लेकिन फर्क होता है निद्रा के तल पे तुम मूर्छित
- 54:16होते हो और जागृति के तल पे तुम जागृत होते हो।
- 54:23जागृत जागृत इस अवस्था में पहुँच जाना, पूरी अवस्था में वह समाधि
- 54:30का लगता है, उसमें जागृति भी है। उसमें शांति भी बहुत है।
- 54:39आनंद से युक्त भी है। खुमारी से नहाया भी हुआ है, सब
- 54:45ठहरा हुआ है, कोई शोर नहीं, पिंडर ऑफ साइलेंस हवाएं ठहर जाती हैं,
- 54:56सब शोर छम जाते हैं। वो आ रहे हैं साँसों ज़रा अहिस्ता
- 55:07चलो वो आ रहे हैं साँसों ज़रा अहिस्ता चलो दल के धड़कने से।
- 55:19इबादत में खलल पड़ती है, ये जो दिल धड़कता है इससे भी इबादत में
- 55:27खलल पड़ती है। बस समझाने का तरीका था कि सब शोर
- 55:33खत्म कर दो, जो तुम्हें शोर सिखाये।
- 55:39वहाँ से भाग आओ, तुम अपने भीतर चले जाओगे, शोर से तुम बाहर जाओगे
- 55:48और शोर हीनता से तुम अपने भीतर जाओगे, जहाँ मौन की अवस्था है पर
- 55:55मौन की अवस्था है ज़रा भी। आहट नहीं आहट के बिना जो तल है वह
- 56:09तुम हो, कोई आहट नहीं, लेकिन प्रेम बहुत है।
- 56:15शांति बहुत है, जागृति बहुत है, आनंद बहुत है, खुंवारी बहुत है,
- 56:20सुगंधित हवाएं चल रही हैं, महक चारों तरफ बिखरी पड़ी शोर नहीं।
- 56:30तोड़ दिया क्यों? महल बना के दिल को दिए क्यों?
- 56:50दुःख विरहा के तोड़ दिया क्यों महल बना के?
- 57:08आस दिला के ओह, वे दर दे आस दिला के ओह, वे दर दे।
- 57:29फिर लिखा है नजरिया भूल गए सागरिया।
- 57:47हो गए, सांवरिया कह गए आज हो न आए।
- 58:05आवन कह गए, आजु न आए। ले नहीं मोरे
- 58:38खबरिया। भूलकर सांवरिया।
- 58:52प्रेमी बगावती भी हो जाता है। नैन कहें रो रोके सजना नैन कहें
- 59:15रो। रोके सजना देख चूके हम, प्यार का
- 59:28सपना देख चूके हम। प्यार का सपना प्रीत हजोठ प्रीतम
- 59:48झूठ प्रीत हजोठ। प्रीतम जोठा जोठी हसारीं नगरिया
- 1:00:11जोठी हसारी। नगरिया मोहे बो हो गए, सांवरिया
- 1:00:32हो गए। सांवरिया आवन कह गए अजहु न आय।
- 1:00:50आवन। कह गए।
- 1:00:54आज हो न आये ली नहीं, मेरी खबर यार भूल गए।
- 1:01:12सावरिया भोले सा वरिया धन्यवाद।