Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Jan 25 - राधा स्वामी का क्या मतलब है? सिद्ध पुरष कैसे जड़ को चेतन में बदल सकता है?
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- 0:20आज शुरू करें शून्य बाद नागार्जुन का उससे पहले छोटे छोटे दो
- 0:37प्रश्न, पहला प्रश्न। राधा स्वामी का अर्थ क्या है?
- 0:53राधा स्वामी का अर्थ है राधा का मतलब क्षेत्र में स्वामी का मतलब।
- 1:02मालिक चेतना के मालिक हो जाओ राधा सोनू हो जाओ का मतलब अभी तुम हो
- 1:15नहीं अभी तुम जिसके मालिक हो। वह चेतन नहीं है, वह जड़ है।
- 1:24अभी तुम शरीर के मालूम हो, शरीर जड़ है राधा स्वामी बहुत पुराना
- 1:34शब्द है। ये तो दूसरी बार अब पुनर्जागृत
- 1:39हुआ है। प्राचीनता शब्दों में राधा स्वामी
- 1:45शब्द आता है। इसका अर्थ चेतना के मालिक हो जाओ,
- 2:02अभी तुम जड़ता के मालिक हो। अभी तुम शरीर के मालिक हो, अभी
- 2:10तुम शरीर ही हो, विचार हो, भावनाओं हो, अभी तुम जड़ हो और
- 2:19राधा स्वामी का मित्र चेतन के मालिक हो जाओ जड़ से चेतन की ओर।
- 2:26यात्रा है और ध्यान रखना शव तो उठा लिया गया बहुत पुराना है
- 2:37तरीका नहीं उठाया गया पांच नाम से व्यक्ति।
- 2:43जड़ता से चेतनता तक पहुंचता नहीं है।
- 2:46करके देख लो हाथ कंगन को अर्शी क्या प्रत्यक्ष को प्रमाण की
- 2:53जरूरत नहीं होती इसलिए मैं सता ही कहता हूँ कि जो राधे राधे कहते
- 3:00हैं राम राम कहते हैं तुम करके देख लो भाई।
- 3:06मैं जो बोलता हूँ उसे सुनो ही मत, उसके ऊपर विश्वास मत करो, तुम
- 3:13राधे राधे करके ही देख लो, क्या तुम जड़ता से चेतनता में आ जाओगे?
- 3:22यही तमाशा देख लो जड़ता ही चेतन होने का मतलब है राधा स्वामी, अभी
- 3:35तुम अपने आप को शरीर मानते हो। जो कि जड़ है अभी तुम जड़ के
- 3:42मालिक हो, मालिक होना है, चेतनता का चेतनता का तुम्हें कोई पता ही
- 3:48नहीं चेतनता तुम्हारे लिए सिर्फ शब्दमात्र है अनुभव नहीं है उस
- 3:57अनुभव में उतर जाऊं। जहाँ चेतना निवास करती है और यह
- 4:04किसी भी नाम से संभव नहीं हो सकेगा नाम के बिना विधियों हैं
- 4:11नाम कोई विधि नहीं है तुम कोशिश करते देख लो।
- 4:17पहले आजमा के देख लो ना मिले तो फिर दूसरी तरकीबों पे आ जाना।
- 4:29ये है राधा स्वामी का मतलब आगे चले दूसरा प्रश्न है।
- 4:38स्वामी चैतन्य तीर्थ ओशो कहते हैं कि मैं राम को भगवान मानता ही
- 4:49अवतार मानता ही न मानो। कौन कहता है तुम मानो अपने आप ही
- 5:00बोले चले जाते हो राम को तुम अवतार नहीं मानते लेकिन ओशो के
- 5:07मानने से क्या होता है? सत्य के मानने से होता है।
- 5:15ओशो के मानने से कुछ नहीं होता ओशो अगर झूठ को मारने लगे तो फिर
- 5:21गलत है। देखिए इससे पहले मैं शून्य वाट पे
- 5:32बात करूँ। ये बातें करना आवश्यक भी है।
- 5:39चैतन्य तीर्थ तुम थोड़ा सा इसको अच्छी तरह से समझ लो।
- 5:56राम हमारे वितरक तल हैं, जहाँ गुंजार होता है, अंकार का और सभी
- 6:08प्रकार के राग राग का बाज्जे नाद अनेक अशंका के ते भावणारे।
- 6:16कित्ते राग परिशियों केण कित्ते गावण हार्य वहाँ जो पहुँच गया अब
- 6:28इन शब्दों को ध्यान से सुन नहीं कटाक्ष करते फिरोगे प्रश्न पूछते
- 6:33फिरोगे? जो व्यक्ति वहाँ पहुँच गया वह जड़
- 6:41को चेतन करने में सामर्थ्य हासिल कर लेता है।
- 6:46इस शब्द को फिर सुन लेना यह नियम नहीं है, यह सत्य है।
- 6:53जीस व्यक्ति ने वो तल छू लिया। उस तल पर जाकर व्यक्ति के भीतर
- 7:03कैपेसिटी आ जाती है, पोटेंशिअलिटी आ जाती है, वह जड़ को हाथ लगाए
- 7:11जड़ को छू दे। चेतन हो जाता है और जो व्यक्ति उस
- 7:21स्थल पे पहुँच गया वह व्यक्ति ओमनी पोटेंट हो गया।
- 7:34सर्व शक्तिमान हो गया, सर्वज्ञ हो गया, सर्व व्यापक हो गया, वह
- 7:39परमात्मा हो गया, ईश्वर हो गया, भगवान हो गया, गौ हो गया, अल्लाह
- 7:44हो गया, बैगुरु हो गया, लेकिन बुद्ध को तुम उस जगह पहुंचते हुए
- 7:54नहीं पहुँचोगे। ओशो को तुम उस जगह पहुंचते हुए
- 8:00नहीं पाओगे, व्याख्यान कर सकेंगे। उसका कारण है ओशो सिरस्तर है, बाल
- 8:12की खाल निकाल सकते हैं शब्दों की। सत्य के एक एक शब्द को ध्यान से
- 8:19सुनते रहना ये एक एक शब्द आपको रूपांतरित कर सकता है ओशो फिलॉसफी
- 8:30की अमी है मष्ट। और ओशो फिलॉस्पी की पीएचडी है।
- 8:35डॉ। तो ध्यान रखना फिलॉस्पी का एमए ही
- 8:42मान नहीं होता। फिलॉस्पी का पीएचडी का मान होगा।
- 8:48वे ऐसे जादूगर हैं शब्दों के। सत्य के नहीं शब्दों से तुम्हें
- 9:00कोई यहाँ खड़े खड़े स्वर्ग दिखा देंगे।
- 9:04ये जादूगरी का कमाल है उनके शब्दों का, लेकिन सत्य के मामले
- 9:11में टाइम टाइम फिश। बुद्ध के तन तक ही पहुँच पाते हैं
- 9:20ओशो ही इज़ एनलाइटन पर्सन ऑफ कोर्स मैंने बहुत बार कहा है
- 9:29लेकिन सिर्फ एनलाइटन हो जाना दट। इस नॉट सुफ्फिसिएंट।
- 9:37टू बी ओम्निपोटेंट ओम्निपरेटेंट एंड ओम्निशिएंट यह है सनातन का
- 9:44अंतिम पड़ाव बुद्ध को यहाँ से कदेड़ दिया गया।
- 9:52ऐसा नहीं था। बुद्ध खुद ही भाग्य बुद्ध यहाँ पर
- 9:57आए, उन्होंने अपनी स्टेट देखी और यहाँ के ऋषियों की स्टेट देखी।
- 10:06आज से 2500 साल पहले की बात। तब यहाँ का जरा जरा चैतन्य था तब
- 10:16यहाँ झूठ बोलने वाले लोग नहीं थे। सत्य का बोल बाजा था सब जगह तब
- 10:27झूठे लोग। प्रचार नहीं करते थे, प्रसारण
- 10:32नहीं करते थे। और देखिये सत्य सत्य पहला पहली
- 10:39सीढ़ी का प्रथम पाद है जिसने सत्य को नहीं जाना।
- 10:49सत्य पे नहीं चढ़ा पहले पड़ाव पे वो अंतिम पे पहुँच जाएगा ऐसी
- 10:54कामना मत करना तो वो शो शब्दों के खिलाड़ी हैं।
- 11:00कारण मैंने बता दिया कबीर अनपढ़ हैं लेकिन जाते हैं।
- 11:09वो सोना मरे, अजपा मरे, अनहदपी मर जाए इतनी दूर तक जाते है यह क्या
- 11:18है? उन्होंने कोई पीएचडी नहीं है, ना
- 11:23फिलॉसफी के एमए है, ना फिलॉसफी की डॉक्टर्स है।
- 11:29लेकिन पहुंचते कहाँ हैं? ये मसला जानने का है।
- 11:35ये मसला कागजों की क्वालिफिकेशन डिग्री लेने का नहीं है।
- 11:42कबीर तो कैसे है? कागज कर लो मुझको और नहीं।
- 11:47लेकिन यही शब्द ओशो बोलेंगे तो उनके अनुभव का कमाल नहीं है।
- 11:54ध्यान रखना। यह उनकी क्वालिफिकेशन का कमाल है।
- 12:01वो एमए हैं फिलोस्फी की और पीएचडी हैं फिलोस्फी।
- 12:06शब्दों का कमर भी जादू कर सकता है।
- 12:10तुम हिप्नोटाइज़ हो जाते हो, तुम कहते हो वाह बस ऐसा तो न हुआ है न
- 12:17होगा। अरे भाई इससे बहुत ज्यादा दूर तक
- 12:21निकले हुए लोग पहले से हो चूके हैं।
- 12:27मैं उस काल खंड की बात करता हूँ या बुद्ध भारत में आए प्रचार हेतु
- 12:33सारनाथ में पहला प्रवचन दिया जब यहाँ के ऋषियों को देखा तो किसी
- 12:45ने उन्हें भगाया। कुछ दो चार मूर्ख होंगे जो
- 12:49उन्होंने कह दिया होगा। लेकिन वो भाग गए।
- 12:54भाग इसलिए गए उन्हें अपना तल देख के आ अपना तल व्यक्ति स्वयं जानता
- 13:00है, झूठ बोलता है, ये बात अलग है। प्रबुद्ध ने देखा कि मैं अपने आप
- 13:11को जान चुका हूँ, उससे आगे नहीं निकला और इतना ही काफी है।
- 13:17आज के जमाने में दुनिया दुखी है। फैसला किया कि आगे न जाऊं।
- 13:25शरीर इजाजत नहीं देता था। मूर्ख लोगे के कारण 49 दिन का
- 13:31उपवास सब के शरीर कृष्ण तनु हो चुका था कृष्ण बरण काला पड़ गया
- 13:38था शरीर वह गोरा चिट्टा राजकुमार काला पड़ गया था।
- 13:46फैसला किया कि दुनिया दुखी है और अपने आप को जानने से बड़े से बड़ा
- 13:52भ्रम टूट जाएगा और सारे दुखड़े, संताप, कष्ट, क्लेश, दर्द, तनाव
- 14:00सब मुक्त हो जाएंगे। इतना काफी है।
- 14:04प्रचार के लिए लेकिन प्रचार से आगे भी कुछ है।
- 14:12बुद्ध ने वह छोड़ दिया यहाँ तक सफीशियंट है।
- 14:24इससे आगे रास्ता है, बुद्धमूर्ख नहीं है, बुध जानते हैं और महावीर
- 14:30चलते हैं, इसलिए महावीर को 12 वर्ष लगते हैं।
- 14:38जीस स्थल पर बुध छह वर्षों में पहुंचा है।
- 14:42महावीर भी छह वर्षों में पहुँच गए थे, लेकिन महावीर ने यात्रा शुरू
- 14:48रखी और छह वर्ष और फिर आगे का पड़ाव।
- 15:00अपने आप को जानने से आगे भी कुछ पड़ाव है और भी राहतें हैं बसल की
- 15:07राहत के सिवा ये ठीक बुद्ध का देश है और बुद्ध जहाँ तक पहुँच गए।
- 15:16वहाँ तक इक्का दुक्का विक्की पहुंचे बाहर और सच कहूं तो बुद्ध
- 15:24से आगे पहुँच गए लव से ने कमाल कर दिया हिंदुस्तान की धरती का ज़रा
- 15:36ज़रा। उन्हें कुछ शक्ति नहीं देता था,
- 15:45लहर नहीं देता था, उसके बावजूद वाक्य ही लौजे को प्रणाम करने को
- 15:55दिल करता है। ऐसी अवस्था में जहाँ की धरा
- 16:01मरुभूमि है उपजाऊ नहीं है, वहाँ से पैदा हुआ है, ईश्वर जो करता है
- 16:09अच्छा करता है, भले के लिए करता है यह आखिरी पड़ाव है बुधनी कह
- 16:14सकते हैं। बुद्ध ये बात नहीं कह सकते।
- 16:21बुध कहेंगे अब तो दीपो भव तुम करते हो ईश्वर नहीं करता है,
- 16:26ईश्वर तो है ही नहीं, कहना पड़ेगा तुम्हें सुखी करने के लिए और
- 16:32ध्यान रखना मैंने ही शब्द। सुख प्रयोग किया तुम्हें सुखी
- 16:36करने के लिए अभी तो तुम सुखी भी नहीं हो अभी तो तुम दुखी हो आनंद
- 16:44की आकाक्षा व्यर्थ है, बेकार है मत करो, आनंद की आकाक्षा भी मत
- 16:51करो, पहले सुख की आकाक्षा करो। अभी तो तुम दुखी हो यही प्रयास
- 16:59रहा बुद्ध का। बुद्ध ने देखा संताप से मरा हुआ
- 17:05ये संसार मृत्यु के व्यय से कब रहा है?
- 17:09और वह जो मरता है वह इल्लुसन है। तो यहाँ तक काफी होगा प्रचार करने
- 17:17के लिए वो तो उठ गए, अंतिम छोर तक जाना उचित नहीं समझा और जो शुभ भी
- 17:27किया शुभ किया। ठीक ऐसा।
- 17:33धर्म छोड़ जाऊं जो व्यक्ति को दुख से सुख तक पहुंचाती सुख से आनंद
- 17:42का रास्ता आगे है, वह तो फिर कृष्ण तक पहुंचने का है।
- 17:51लेकिन यहाँ तक भी काफी है तुम्हें बुद्ध प्रथम सीढ़ी मिलेंगे।
- 17:59पहले बुद्ध होना होगा, बुद्ध के बाद सिद्ध होना होगा।
- 18:06अभी तो तुम बुद्ध भी नहीं हो। बातें करते हो, सिद्ध की बातें
- 18:13करते हो सनातन की और बुद्ध भाग गए यहाँ से खुद को पता था मेरी
- 18:18दारलों को लगी और बुद्ध जानते थे कि इससे आगे पड़ाव है और मैं
- 18:25अधूरा छोड़ के आया हूँ। इसलिए यहाँ से निकल गए कहानियों
- 18:34हैं कि उसको मारने पड़ गए ऐसा कुछ नहीं है यहाँ संतत्व का बोल बाला
- 18:41हो एक एक जर्रा अध्यात्म से। भरा पड़ा होगा वहाँ हिंसा नहीं
- 18:51होगी, अहिंसा ही है, किसी ने नहीं भगाया, खुद भाग्य बुद्ध को दिख
- 18:58गया। मेरी दाल नहीं गलेगी, मैं सुख की
- 19:01बात करता हूँ। ये सुख से आगे का पड़ाव आनंद की
- 19:06बात करते हैं। मेरे पांव यहाँ लगेंगे, लेकिन
- 19:11मेरा धर्म फैल जाएगा। किसी वक्त में यह दुनिया दुखी भी
- 19:15होगी तो मेरा धर्म छा जाएगा। इसलिए मैं कहता हूँ आज अगर भारत
- 19:22भूमि। बोध से कुछ सीख ले तो बड़ा शुभ
- 19:29होगा, क्योंकि ये यात्रा दुख से सुख और सुख से आनंद तक की यात्रा
- 19:34है। तुमने पहला पड़ाव अभी छुआ नहीं
- 19:38है। तुम महज बात करते हो आनंद की शिवा
- 19:44हम और वो भी ऐसेऐसे उपायों से जिससे सुख भी नहीं मिलता आनंद की
- 19:56बात छोड़ो, राधे राधे करते रहो। राम राम करते रहो, इससे सुखी भी
- 20:03नहीं हो गया। आनंद तो बहुत दूर की बात है, वो
- 20:06तो ऐसा रस है जीसको पीकर व्यक्ति निहाल हो जाता है।
- 20:22हम लोग चले चल एक ऐसा पड़ाव है हमारे भीतर जहाँ पहुँच कर व्यक्ति
- 20:32मुर्दे को छू दे जीवंत हो जाता है।
- 20:42राम उस तल तक पहुँच जाता है इस धरती का ज़रा ज़रा राम राम कहता
- 20:51है तो किसी कारण से कहता है तुमने जाना नहीं बात रखा है।
- 21:01सिर्फ़ ओशो के मानने या ना मानने से कुछ नहीं होता।
- 21:06बात सत्य को मानने या ना मानने की है और इससे भी आगे वात सत्य को
- 21:13जानने की है। सत्य क्या है?
- 21:18पहले जानू तो मान तो खुद ही लिए जाओगे, जिसने ताजमहल देख लिया वह
- 21:26ताजमहल को इंकार भी कैसे करेगा? सूरज को देखने वाला व्यक्ति सूरज
- 21:32को इंकार कैसे करेगा? चाँद तारों को ग्रह नक्षत्रों को
- 21:37देखने वाला व्यक्ति इंकार कैसे करेगा?
- 21:40नहीं कर सकेगा मानना तो पड़ ही जाएगा राम स्थल पर पहुँच गए यह
- 21:57सनातन की धरा। चूमने योग्य है।
- 22:03इस धरा में आज भी उन संतों की छोड़ी हुई तरंगें महक आई।
- 22:18हमारे यहाँ एक रिवाज है। ईसाई और इस्लाम ने तो नकल करके
- 22:24बनाया सनातन से, लेकिन सनातन में सिद्ध पुरुषों को दफन किया जाता
- 22:31है, बुद्धों को नहीं सिद्धों को यहाँ बुद्ध और सिद्धि में कर रहा
- 22:39हूँ मैं वर्क। सिद्धबुद्ध से आगे की अवस्था है,
- 22:44जिसने उस मुकाम को छू लिया। परमात्मा वर्ष गया और वह कण कण
- 22:51में फैल गया। वह सिद्ध हो गया।
- 22:59उसने तमाम अस्तित्व के तिरंगों को भी लिया।
- 23:03और वो तरंगें युगों युगों तक चलती रहेंगी, इसलिए उसको दफन कर दिया
- 23:09जाता या जलाने योग्य नहीं है। इसका रोमा रोमा अनंत अनंत अमृत की
- 23:17बूँदों से भर गया और अनंतकाल तक। यह रास्ते पर सारता रहेगा।
- 23:26इसको जलाने से हानि हो जाएगी। इसको दफन कर दो।
- 23:34इसलिए जो सिद्ध नहीं थे उनको भी दफन किया गया, लेकिन उनको समाधि
- 23:43नहीं कहा गया। समाधि शब्द बड़ा अद्भुत है।
- 23:50समाधि जिनके सब समाधान हो गए लेकिन दफ़न तो ईसाई भी करते हैं,
- 23:58दफ़न तो इस्लाम भी करता है। समाधि शब्द के पैडल कोई शब्द नहीं
- 24:04दिया गया उन्हें। उनको मजार कहते हैं, बस एक रिवाज
- 24:15दफन करने का। और ऐसा व्यक्ति जिसने अस्तित्व को
- 24:29पी लिया जुगों जुगों तक प्रेरणा स्रोत बनके यहाँ न जाने कितने इस
- 24:37धरा को क्यों स्वर्णिम कहा जाता है।
- 24:40सनातन की यह धरा स्वर्णिम क्यों कहलाती है?
- 24:44यहाँ दफन है बहुत सी सिद्ध और लगातार उनकी तरंगें बाहर आ रही
- 24:51हैं। इसलिए यहाँ आते ही बदल जाती हैं
- 24:59हवाएं। बाहर के लोग जब यहाँ आते हैं तो
- 25:07कुछ अजीब सा मालूम पड़ता है। भारत में भारत से बाहर चले गए
- 25:11मेरे भाई बहन जब यहाँ वापस आते हैं तो कहते हैं लोग जाने का मन
- 25:16नहीं करता, लेकिन क्या करें डालरों की चमक?
- 25:22लोभ हमें ले जाता है, वरन जो शांत यह है, वहाँ उसका लेश मात्र भी
- 25:34नहीं है। कोरी औपचारिकता है।
- 25:40ओनली फॉर्मलटी? बाहर डॉलर की चमक है और कुछ नहीं
- 25:47वो खेच लेती हैं। हमें मैंने पहले भी कहा है अगर
- 25:55किसी सिद्ध की समाधि मिल जाए, वहाँ बैठ जाना।
- 26:00जो काम 10 साल में हुआ वह 2 साल में हो जायेगा।
- 26:05बहुत शीघ्रता से तुम्हारे भीतर की लहरें तुम्हारा रूपांतरण कर
- 26:10देंगे। वह वातावरण अजीब है।
- 26:15मस्ती नुमा। तुम्हारे कारण नहीं उसके कारण जो
- 26:23दफन है उसने किसी वक्त अस्तित्व को पी लिया था, अस्तित्व बरसा था
- 26:29और उसका रोम रोम पी गया था, उसे वह बिखरेगा, जीते जी भी बिखरेगा।
- 26:41और मृत्यु के बाद भी बिखरेगा और बिखरता ही रहेगा।
- 26:46अनेक वर्षों तक विखरता रहेगा। वह तुम्हें अपने भीतर जाने की
- 26:54शक्ति दे सकता है। प्रेरणा दे सकता है, रास्ता बता
- 26:59सकता है, मार्गदर्शन कर सकता है। ऐसी समाधियों के आसपास शुद्ध
- 27:06रूहें जो व्यक्ति की हेल्प करती हैं, मंडराती रहती हैं, उन्हें
- 27:11अच्छी लगती हैं ऐसी तरंगें। बुध भागे ने यहाँ से किसी के कहने
- 27:25से खुद की अनुप उपलब्धि के कारण भागे लेकिन जो बुद्ध ने पाया वो
- 27:33भी कोई कम नहीं था। आज उसकी जरूरत है।
- 27:39बेला आ गया जब बुद्ध की जरूरत है बेला आ गया जब तुम्हें सुख चाहिए
- 27:49घोर दुख में तुम डूबे हो गए हो, पैसा है, सुविधा है, सब कुछ है,
- 27:55व्हीकल है, जहाज है, हेलिकॉप्टर है।
- 27:58बड़े मकान हैं, बड़ी कार्य हैं, सुख सुविधा के सभी समान हैं, जो
- 28:04चाहो तुम खा पी सकते हो, लेकिन आग लगी है प्यासे हो।
- 28:16पानी नहीं है जो इस आग को शांत कर सके।
- 28:23आग जलाती है तुम्हें तो तुम चाहे महलों में बैठो बाग बगीचों में
- 28:29टहलो वो आग तुम्हें जलाती ही रहेंगी दिन भर रात।
- 28:37तो आज बुद्ध की जरूरत है, बुद्ध पानी बनकर बरसेंगे और आग को बजा
- 28:46देंगे। शीतल करके राम उस स्थल पर पहुँच
- 28:53गए थे। अन्यथा कहने वाले पागल नहीं थे।
- 29:04एक जो शास्त्रों में लिखा काफी कुछ बिगाड़ दिया गया बूढ़ों के
- 29:09द्वारा क्योंकि तथ्यों को और सत्यो को वो जानते नहीं थे
- 29:13पहचानते नहीं थे। इसलिए किसी शब्द की टांग में रोक
- 29:18दी, किसी के सेर में रोक दिया, कुछ का कुछ बना दिया इन्होंने तो
- 29:27फिर कोई सिद्ध आएगा तो बताएगा कि यहाँ गलती हो गई।
- 29:35लिपि को जानने वाला ही बता सकता है कि कहाँ मात्रा की कमी कहाँ
- 29:42कोमा रह गया, कहाँ पूर्ण विराम रह गया, कहाँ अर्ध विराम रह गया, वह
- 29:51बता सकेगा पंक्चुएशन वही कर सकेगा।
- 29:56लेकिन जानकर कोई है नहीं फिर करोगे क्या?
- 30:00जैसा है वैसा मानते जाओगे। ऐसा ही हो रहा है।
- 30:06अब आज उसने कह दिया कि मैं राम को अवतार नहीं मानता, मत मानो परिवार
- 30:12ने कह दिया कि भगवान से शब्द। सवाल पूछते हैं परिवार पूछो भाई
- 30:20भगवान से सॉल्व क्या पूछोगे? भगवान जवाब देने का बंदित नहीं
- 30:32है, सृजना बनाती है, तुम्हें अच्छा लगता है?
- 30:38तुम इसको पीओ नहीं अच्छा लगता तो पीछे का भी एक दरवाजा है समझ लेना
- 30:46वहाँ से निकल जाओ नहीं अच्छा लगता तो और क्या करें?
- 30:55तो प्यार जैसे लोग भगवान से जवाब मांगते हैं और भगवान कभी जवाब
- 31:01नहीं देता क्यों है पर मौन है वो वहाँ एक्शन रिएक्शन होता नहीं
- 31:10वहाँ पर मौन की स्थिति है। तुम्हारी लहरों से वो लहराता है,
- 31:18तुम लाख सवाल पूछते रहो, वह न बोलेंगे क्योंकि वह पर मौन है,
- 31:23हाँ तुम उसके पास जा सकते हो तुम पर मौन हो के उसके पास जा सकते हो
- 31:30तो तुम्हें सब समझा जाएगा। फिर सवाल न खड़े होंगे, फिर
- 31:35समाधान हो जाएगा सब सवालों का सब दुखों का, सब व्याधियों का,
- 31:40कष्टों का, कलशों का समाधान हो जाएगा।
- 31:47मूर्खता के तिल पे बैठे बैठे तुम 10 सवाल करो चाहे 10,000 करो।
- 31:53क्या फर्क पड़ता है तो प्यारिया जैसे मूर्ख सवाल पूछते रहेंगे
- 31:59मार्कस जैसे मूर्ख इंकार करते रहेंगे और इनके इंकार करने से कुछ
- 32:06नहीं होता और ओशो नए ही तरह के मूर्ख?
- 32:13राम को मैं अवतार नहीं मानता हूँ ना तो मानो भाई एक व्यक्ति के
- 32:17मानने से क्या हो जायेगा सारी सारी सनातन की व्यवस्था राम राम
- 32:24कर रही है। तुम ना मानोगे?
- 32:27एक व्यक्ति के ना मानने से क्या होगा?
- 32:32भीतर के तत्व को जान लेना अलग बात होती है।
- 32:35अब इन बात को ठीक तरह से समझें भीतर के तत्व को जान लेना अलग बात
- 32:39है। इन शब्दों को ध्यान से समझना ओशो
- 32:42मुझे रोज़ मिलते हैं। अपनी कमियां, अपनी खामियां कैसे
- 32:49क्या हुआ सब कहानी मुझे मालूम है। मुझे कुछ बताने की जरूरत नहीं, बस
- 32:54मैं उसे सिर्फ सार्वजनिक नहीं करता कि उसकी इज्जत बच ही रहा है।
- 33:04इतना ही काफी है। भीतर के उस तत्व को जान लेना अलग
- 33:11बात है, वो चाहे स्वयं को जानना है, चाहे परमात्मा होना है, ज्ञान
- 33:20लेना अलग बात है। अब इन शब्दों को मैं फिर कहूँगा
- 33:23बार बार। रिपीट करके सुनना और उस जाने हुए
- 33:32शब्दों को शब्द रूप दे देना जाने हुए सत्यो को शब्द रूप दे देना
- 33:37अलग बात है। राम किशन परमहंस ने वो उत्तर छोड़
- 33:47लिया, लेकिन उस जाने हुए सत्य को कहने के लिए शब्द नहीं हैं।
- 34:01ये महारत नहीं है। रामकृष्णा में बड़ा ऊंचा खर्च छू
- 34:04लिया है। सत्य को शब्दों में ढाल नहीं
- 34:13सकते, यह प्रतिभा नहीं है रामकृष्णा में तो क्या करते हैं?
- 34:24ढूंढ़ते हैं किसी वक्ता को। अगर मुझे कोई वक्त मिल जाए तो
- 34:33उंडेल दूँ सब कुछ उसके भीतर और वह मेरी जो मैंने दर्शन किया मेरे को
- 34:42वह संसार में फैला दे। अब इच्छा तो बड़ी शुभ है।
- 34:48जो जाना वह सत्य है और तुम अगर भटके भटके फिरते हो, संसार में
- 34:54तड़पते तड़पते हैं, आग में जलते जलते हैं तो तुम्हारी मूर्खता के
- 35:03कारण हो तुम हो कारण हो। तो संत पुरुष सदा ही चाहते हैं कि
- 35:12ये आग कैसे बुझाये क्योंकि ये आग असल नहीं है।
- 35:17ये नकल है लेकिन उस देखे हुए अनुभव को।
- 35:24शब्द में डालना इन्हें अतण इसलिए खोज लेते हैं।
- 35:35नरेंद्र को विवेकानंद बड़े दक्ष हैं, बोलने के कमाल हैं, जब जाते
- 35:42हैं अमेरिका में प्रथम भाषण करते हैं।
- 35:47शिकागो। 1893 की बात है।
- 35:51शायद ये प्रथम शब्द कहते हैं ब्रदर्स एंड सिस्टर्स तो उठते हुए
- 36:08लोग बैठ जाते हैं आवाज़ में इतनी खुशी?
- 36:14और बोलते चले जाते हैं। नरेंद्र नाथ विवेकानंद और शून्य
- 36:20वाले सुनते चले जाते हैं, छा जाते हैं।
- 36:23शिकागो में अमेरिका में एक संत आया है।
- 36:27इंडिया से इंडिया तब गुलाम था। वह दक्ष है।
- 36:35बोलने में अब फर्क को ठीक तरह से समझ लेना लेकिन अनुभव नहीं जो
- 36:44अनुभव रामकृष्णा का चाहते थे। दशकों दिशाओं में फैले वो अनुभव
- 36:50जब देने लगे उसे। तो चिल्ला के बाहर आ गया।
- 36:54स्वामी जी मेरे माँ बाप भी हैं और सभी इच्छाओं पर अठारहघात हो गया।
- 37:08रामकृष्णा का रामकृष्णा का एक अच्छा।
- 37:13फिर तुम बाहर अन जाओ लेकिन जो जहाँ तक मैंने तुम्हें पहुंचाया
- 37:20दृढ़भूमि करते रहना और विवेकानंद दृढ़भूमि करते भी रहे, लेकिन
- 37:27दृढ़भूमि करते करते मूर्ख तो मूर्ख ही होते हैं।
- 37:33जब उस तल पर पहुंचे जहाँ पर व्यक्ति सर्वसमर्थ हो जाता है।
- 37:38कुछ भी कर सकता है तो चाहे दया का काम ही क्यों न था, वो एक पंडित
- 37:44जी सुबह 3:00 बजे से लेकर रात्रि 11:00 बजे तक टल्ली ही खड़काते
- 37:48रहते हैं। जबकि टल्ली धड़काने से कभी किसी
- 37:51को कुछ मिला नहीं। वह पंडित जी का चेहरा सामने आया।
- 38:02अब तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ, दया की भावना उपजी।
- 38:07आते जाते देखते थे, दया आती थी। बेचारा भगवान को भोग ही लगाता
- 38:12रहता है। इसको इतना ही पता नहीं कि पत्थर
- 38:19की मूर्ति मेटल की मूर्ति कुछ खाती नहीं।
- 38:31एक स्त्री मेरे पड़ोस में लड्डू गोपाल को बांधे फिरते थे।
- 38:40पुत्र प्राप्त करें। यानी कहिए क्या?
- 38:44कहती, लड्डू गोपाल लड्डू गोपाल जी जी ये क्यों बांधे फिरो क्यों बोझ
- 38:53लटका? एक बार पुत्र प्राप्ति के लिए यह
- 38:59पुत्र देने में समर्थ है। मैंने कहा इसके पास सारा सामान
- 39:03है। जब पुत्र दे दे यार और फिर भोग
- 39:09लगाती उसे तुम हसा मत करो, इतने सरल बोल देता हूँ फिर भी हस्ते
- 39:18हो? इसको भोग लगाती हो, खाना खिलाती
- 39:28हो, बड़े प्यार से सुला देती हो। एयर कंडीशनर में खुद चाहे नॉन एयर
- 39:35कंडीशनर में सोना पड़ा, लड्डू गोपाल को एयर कंडीशनर में झूला
- 39:39जला के मैंने कहा वो तो ठीक खाना खिला देती हो, पेट भर के हाँ।
- 39:46तो मैंने कहा फिर मल त्याग कैसे करता है?
- 39:49उसका तो चेहरा उठ गया। जो खाता है, मल भी तो त्याग देगा
- 39:53ना? मूत्र वगैरह चुप हो गई।
- 39:59उसने लड्डू गोपाल को खोला फेंक दिया, समझदार थी।
- 40:06जो खाता है तो मल क्यों के? आगा ना जब पानी पिएगा तो मुत्र भी
- 40:12करेगा समझदार थी उसने फेंक दिया दो चार गालियां पे निकाल ली
- 40:19हरामजादे और लोके। ऐसी ऐसी पागल सुनी है आज हो चली
- 40:29है तभी मैं कहता हूँ आज बुद्ध की बड़ी आवश्यकता है।
- 40:36बुद्ध कम से कम इन पाखंडों का नाश करके तुम्हें सुख में तो ले
- 40:40आएँगे। और सुख का जीवन दुख के जीवन से
- 40:44कहीं बेहतर होता है। बुद्ध की फिलोस्पी आज इतना घिर
- 40:50गया है हिंदुस्तान क्या आज बुद्ध की फिलोस्पी काम करेगा?
- 40:58तुम बात करते हो आनंद की। शिबो हम शिबो हम सत्य चित आनंद
- 41:05जयकारा लगाते हो बोल सच्चिदानंद भगवान की जय बात करते हो, आनंद की
- 41:13हो तुम दुखी अभी तो सुखी भी नहीं तो बुध कहते हैं पहले सुखी हो
- 41:19जाओ। यह पड़ाव है दुख से सुख और सुख से
- 41:24आनंद आनंद अगला पड़ाव है। लोक चले चलो राम उस तल पर पहुँच
- 41:37गए हैं। जड़ को हाथ लगा दे चेतन हो जाता
- 41:42है ऐसे कबाड़े में भी किया करता था लोग मेरे पास आ जाते यो रोमट
- 41:54लगा रहता बाबा ये पानी बनाता हूँ। बाप रे घड़ी चार्ज कर दो आज
- 42:03इंतेहान है कर देता हूँ मैं इंटरव्यू पे जाना है कोई चीज़ दे
- 42:10दो, हाथ लगा के दे देता है ये लो ले जाओ, सेलेक्ट हो जाती है।
- 42:21सब हो जाता काम ठीक हो जाता एक मेरे शिष्य को मैंने घड़ी दे दी
- 42:26ये ले ये बांध के चले जा ना तो फैल नहीं होगा पास हो जाएगा सारे
- 42:33पेपर कराया हिसाब का पेपर रह गया वो घड़ी कोई मांग के ले गया।
- 42:40उस पेपर में फैल हो गया जो मांग के ले गया था उसका काम बन गया।
- 42:49ऐसे कबाड़े मैंने भी किए हुए हैं, ये सिर्फ चमत्कार है।
- 43:00ईश्वर की शक्ति का प्रयोग है, शक्ति उसी की है हम को वाह वाह ही
- 43:10मिलती है सिर्फ और कुछ नहीं करने वाले हम नहीं हैं, उसके नियम के
- 43:16अनुसार कर देते हैं। और बहुत जाता है, ठीक हो जाता है।
- 43:24राम उस स्थल पर पहुँच गए जहाँ जड़ को छू देंगे, चेतन हो जाएगा, अब
- 43:32कसूर तो है नहीं कोई अहिल्या का। अहिल्या सुंदर ही इतनी है कि जहाँ
- 43:40से गुजर जाए वह घंटों तक उसकी खुशबू नहीं जाती और इंद्र मोहित
- 43:48हो गया। इंद्र तो आपको पता ही है मोहित ही
- 43:50रहते हैं रंभा उसके पास। जो समुद्र में से निकली मेनका,
- 44:00उसके पास उर्वशी उसके पास लेकिन वो उर्वशी से वीरमवासी भी ज्यादा
- 44:05सुंदर है और ये भटके हुए लोग बाहर की सुंदरता को देखते हैं।
- 44:14बस इंद्र ऐसे ही होते हैं। बाहर की सुंदरता से मोहित होने
- 44:22वाले भीतर की सुंदरता का स्वाद नहीं चखा, जिन्होंने स्वर्ग का
- 44:28सुख देखा, लेकिन स्वर्ग के सुख से आगे आनंद तक नहीं गए।
- 44:33कल्प वृक्ष है, जो मांगेंगे, मिल जाएगा, लेकिन वस्तुओं से आनंद
- 44:37नहीं मिलता। कल्प वृक्ष से वस्तुएं मिलती हैं।
- 44:44वस्तुओं से आनंद नहीं मिलता इसलिए भटके रहते हैं।
- 44:48सदा तो इंद्र मोहित हो गए। फिराक में रहने लगे।
- 44:54षड्यंत्रबाजी जैसे ये राजनीति पे करते हैं, इनको तोड़ लें तो ऐसा
- 44:59हो जाएगा, इनको तोड़ लें तो ऐसा हो जाएगा, अपनी पार्टी का बहुमत
- 45:04मिल जाएगा। सारे जन ये सीढ़ी खोपड़ी ऐसे ही
- 45:06करते रहते हैं और आज कर लेते हैं, लेकिन मूर्खों को ये नहीं पता।
- 45:12कि राज़ करने से सोक कहाँ होता है?
- 45:17राज़ करने से सिर्फ बोझ होता है। जीस दिन इनको पता चल गया उस दिन
- 45:24राज़ गद्दी को ये त्याग देंगे। महात्मा गाँधी मूर्ख नहीं थे,
- 45:29चाहते प्राइम मिनिस्टर बन सकते थे।
- 45:32लेकिन उन्हें पता था दे मार्ग पर बोझ के अलावा और कुछ नहीं।
- 45:40आजादी चाहिए तो वो मिल गई। मेरा काम पूरा हुआ।
- 45:44कांग्रेस को भंग कर दो। राज़ करने की ज़रा भी इच्छा नहीं
- 45:50थी। और अगर इच्छा होती तो रोक भी कौन
- 45:52सकता था? फिर तो जिन्ना भी नहीं रोक सकते
- 45:56थे क्योंकि जिन्ना का कोई योगदान नहीं था, किसी का कोई योगदान नहीं
- 46:02था। हीरो थे तो गाँधी लेकिन गाँधी
- 46:05बैठे नहीं, क्योंकि बखूब भी जानते हैं।
- 46:08राज़ करना एक। लफड़ा है, पचड़ा है, छोटी छोटी
- 46:19औकात के लोग तुम्हें गाली निकालेंगे, ये कोई अच्छी बात है।
- 46:28ये प्राइम मिनिस्टर को निकालियाँ पड़ती हैं।
- 46:30कोई बेशर्म व्यक्ति ही गद्दी पे बैठा रह सकता है।
- 46:37सुबह से शाम तक रात तक गालियाँ ही गालियाँ और इतनी बुद्दीबद्दी
- 46:41गालियाँ राज़ करना बड़ा दुष्कर है।
- 46:45मूर्ख व्यक्ति राज़ कर सकता है। समझदार व्यक्ति राज़ नहीं करेगा
- 46:50उसे पता है। वह त्याग देगा।
- 46:54राज़ को दिमाग पर भोज के अलावा और कुछ भी नहीं और जो राज़ को मांगता
- 47:04है वो बड़े से बड़ा मूर्ख है। उसका भ्रम अभी टूटा नहीं के राज़
- 47:10करने से सुख मिल जाएगा। हुक्म चलाने से सुख मिल जाएगा।
- 47:14ये उसके भीतर है। अभी गलती इल्ल्यूशन है, लेकिन
- 47:19बाबा का एक वचन फिर बोलना सुख आनंद हुक्म करने में नहीं।
- 47:31आनंद हुक्म मानने में है, इसलिए बाबा कहते हैं अगर आनंदित होना है
- 47:38तो उस पर वर धिक्कार का हुक्म मानना शुरू करता हूँ हुक्म में
- 47:44अंदर सब को बाहर हुक्म ना कोए। ना ना कहुक्म जय वजह तह मैं कहे न
- 47:53कोई वैसे तो बाबा कहते हुक्म के अंदर सब चल रहा है।
- 48:07व्यक्ति बड़े से बड़ा इल्यूशन में है जो कहता है कि मैं करता हूँ
- 48:12करता तो वह नहीं है, उसके वश में इतनी सृष्टि में करना नहीं है, वह
- 48:17कुछ नहीं कर सकता, लेकिन तुम चाहते हो कि हुक्म करूँ, हुक्म
- 48:23करने में सुख मिल जाएगा। बस ये सिर्फ तुम्हारी भावना है,
- 48:30सोच है मिलता नहीं है पूछ लेना जब रिटायर हो जाएं मेरा सोखी जगह के
- 48:39नहीं मिला। मैंने कुल जारेलाल नता से पूछ
- 48:42लिया मैं उनसे मिलने जाया करता था।
- 48:46मैंने कहा तुम थोड़े दिन के लिए प्राइम मिनिस्टर बनी चलो मैं तो
- 48:49नहीं बना कोई सुख मिला बड़े साफ निक दिल इंसान थे वह कहते नहीं
- 48:58बाबू कहाँ सुख राज़ में राज़ में सुख नहीं है?
- 49:05हुक्म करने में सुख नहीं है, हुक्म मानने में सुख है और बाबा
- 49:11तुम्हें बिल्कुल नब्ज पकड़ा देते हैं।
- 49:14सुख की बाबा कहते हैं ये नब्ज है सुख हुक्मय अंदर सबको बाहर हुक्म
- 49:21ना कोई। वैसे तो हुक्म में ही चल रहा है
- 49:24सब कुछ, लेकिन तुम इस हुक्म को मान लो, बस तुम मानती नहीं हो
- 49:32नानक हुक्म में जे बुज है तो मान लो और जान लो के हुक्म में चल रहा
- 49:38है सब कुछ। तो मैं कहे न कोई फिर तुम मैं ना
- 49:42कहोगे मैं करता हूँ और तुम सुखी हो जाओगे।
- 49:49बड़े से बड़ा फॉर्मूलेशन जब जी सा होगा वैसे तो जब जी का एक एक शब्द
- 49:54वहाँ कल्याणकारी है यह एक अजूबा घटित हुआ धरती पे।
- 50:01जप जी अब मैं कहूंगा सिख कौम का यह दुर्भाग्य है जप जीके होते हुए
- 50:08और और धर्मों की खाक छान रहे। जब जी में एक एक शब्द स्वर्णिम
- 50:16है, हरे मोतियों से जड़ित है। जब जी वो नाव है जिसपे तुम बैठ
- 50:27जाओगे तो बाबा सागर को पार कर जाओगे लेकिन फिर भी तुम भोंकना
- 50:35चाहते हो, आदमी की इच्छा होती है? मुँह मारना इधर उधर वो मारते हो
- 50:40तुम पता है राम स्थल पर चले गए जहाँ जड़ को हाथ लगा दे चेतन हो
- 50:57जाता है सब शुद्ध व्यक्ति अगर जड़ को हाथ लगा दे चेतन हो जाएगा।
- 51:12ये आज तुम्हें वो फार्मूला मैंने बताया जो तुम्हें कहीं से नहीं
- 51:16मिलेगा। सिर्फ तुम्हें इनकी लहरें
- 51:21मिलेंगी, सिर्फ तुम्हें इनकी झलकें मिलेंगी शब्दों के रूप में।
- 51:29जैसे कहानी मिल गए। गौतम की पत्नी अहिल्या अंतरंग
- 51:37क्षणों में पाई जाती है। इंद्र के साथ और गौतम ये नहीं
- 51:44जानते कि कसूर किसका है? गौतम श्रात् अहिला तू जड़ मत पड़ी
- 51:53रही इसलिए जा तू पत्थर की सिरा हो जा, तू जड़ हो जा।
- 52:02गुस्सा व्यक्ति को मूड बना देता है।
- 52:08स्त्री पर अधिकार कोई नहीं है गौतम कहा अहिल्या स्वतंत्र है,
- 52:13चेतन है लेकिन फिर भी मूर्खता, गुस्से की मूर्खता इतना बड़ा
- 52:21श्राप दे दिया तो पत्थर के शिला बन जा।
- 52:27बात क्या थी कुछ भी नहीं आज के लोगों से पूछ लो वो कहेंगे गौतम
- 52:34मुर्ख थे। कभी इतनी सी बात के ऊपर शराब दिया
- 52:38करते हैं तो मसूमत ये कोई शराब देने योग्य बात है।
- 52:47और जड़ बन गई, लेकिन पता लगा कि राम नाइक है और राम ने आना था बाद
- 53:01में। कृष्ण ने आना था।
- 53:05पहले सतयुग के बाद 16 कला अवतार पहले आता 14 कला अवतार बाद में
- 53:13अंत बाद में घटती जाती हैं कलाएं पहले शर्म कला सम्पूर्ण सतयुग।
- 53:23फिर 16 कला सम्पूर्ण द्वार पर नंबर के हिसाब से देंगे तो दुआ का
- 53:34मतलब दो ही होता है 271 फिर त्रे त्रेता, त्रेता तीन।
- 53:47तो सत्यानंद ने देखा सोचा कि अभी भगवान राम तो बहुत दूर आएँगे।
- 53:55पहले कृष्ण आएँगे का? पुत्र था सत्यानंद जो जनक का
- 53:59दरबारी था मैं व्यथित रहता कि मेरी माता पत्थर बनी हुई है शिला।
- 54:10तो बात की भगवान शंकर ने कहा कि देखो तुम्हारे हमारी माता के
- 54:17त्रेता युग में राम आएँगे, वो छू देंगे उनके छूने से।
- 54:26सभी ठीक हो जाएगा। चेतन हो जाएगी जड़ तुम्हारी माता
- 54:32जीवंत हो जाएगी परम सुंदरी अहिल्या कोई कमी न थी गौतम ने
- 54:39स्थापित कर दिया अक्षर जय प्रेमी। ऐसे ही इर्षालु होते हैं।
- 54:48अगर वो श्राप न देता सिर्फ निकाल देता तो अहिल्या को तो इंद्र तक
- 54:54चाहते हैं। अहिल्या के लिए पुरुषों की कमी न
- 54:58थी, लेकिन प्रेमी अक्सर इर्षालु हो जाते हैं।
- 55:06बस कुछ भी हो जाए तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल हो गया।
- 55:21ये मुश्किल हो गया। प्रेमी इसे बर्दाश्त नहीं कर
- 55:24सकता। ये प्रेम का खाक हो गया।
- 55:28प्रेम परम स्वतंत्रता देता है। जहाँ चाहो जाओ तुम परम स्वतंत्र
- 55:34हो, मैं बाधा बनने वाला हूँ। बाधा तो दुष्ट बनते हैं, प्रेमी
- 55:40थोड़े बनते हैं। तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात
- 55:47नहीं है। तुम किसी गैर को चाहोगे तो
- 55:50मुश्किल होगी। यह प्रेम नहीं है और इसलिए यह जो
- 55:58उपद्रव होते हैं इसलिए होते हैं। किसी ने काट दिया, किसी ने 35
- 56:03टुकड़े कर दिए। किसने ये कर दिया वो कर दिया सब
- 56:06देखते हैं हम? ये आज हो रहा है।
- 56:11ये इच्छा के कारण हो रहा है जबकि प्रेम में इच्छा करता नहीं है,
- 56:25प्रेम में कोई शर्त नहीं होती, किसी और को चाहोगी तो भी ठीक है।
- 56:34किसी और को चाहोगे तो बस ठीक है चलेगा तुम पर स्वतंत्र हो, हम
- 56:41वस्तु में चाहते हैं अच्छे लगते हैं।
- 56:47क्या खूब लगते हो, बड़ी सुन्दर लगती हो बस इतना अच्छा लगता है
- 57:02हृदय को और सुकून मिलता है। यह क्या कम है?
- 57:07किसी को देखने से सुकून मिले। यह क्या कम है?
- 57:13लेकिन नहीं यहाँ तक नहीं। जो अच्छा लगता है उसको गिरफ्त में
- 57:17ले लेना है, उसको बांध लेना है। यह मुश्किल होती है, प्रेम प्रेम
- 57:22नहीं रह जाता, प्रेम बंधन बनकर खो जाता है।
- 57:26प्रेममह बन जाता है प्रेम की हत्या है, शादी प्रेम की हत्या है
- 57:33बंधन इसलिए मैं सदा ही कहता हूँ प्रेम से कोई शर्त नहीं है।
- 57:45ये आजकल चलता है तीन बच्चे पैदा करो, मैंने कहा बिलकुल तीन करो,
- 57:51अगर करने हैं तो वो भी ना करो क्यों पकड़ते हो?
- 57:55अपने सिर को जननी जनें तो भक्त जनें।
- 58:06समर्पित या दाता या सुर या शूरवीर हो या दाता हो, जननी जने तो भक्त
- 58:15जने या दाता या सुर नहीं तो जननी बांझ रहे।
- 58:20काहे गोविनूर? सारा नूर खत्म हो जाता है।
- 58:26बच्चे को जन्मदिन से तो फिर नूर नहीं हो गया, बस दाता सुर भक्त
- 58:39इनको जन्मे। यही कल्याणकारी होते हैं, सृष्टि
- 58:43के लिए वहीं चले। वहीं चलो राम के भीतरी शक्ति से
- 58:55मैं कहता हूँ उस स्तर पे जो व्यक्ति चला जाता है।
- 59:00वह जड़ को छूदे तो जीवन हो जाता है, चेतन हो जाता है।
- 59:08तुम्हारे संसार में एक कहावत है कि इसके भाग्य इतने अच्छे हैं कि
- 59:13यह मिट्टी को छूदे तो सोना हो जाता है, लेकिन यह कोई भाग्यशाली
- 59:19बात नहीं है। पदार्थ पदार्थ ही रहता है ना यह
- 59:24तो स्वरूप ही बदल जाता है। पूर्ण रूपांतरण हो जाता है।
- 59:30जड़ चेतन में तब्दील हो जाता है। राम स्थल पे पहुँच गए थे।
- 59:41और युग में पहले पता था रामायण का आने वाली घटनाएं अपनी परछाइयों को
- 59:53पहले से ही घराना शुरू कर देती हैं।
- 59:56कमिंग इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज बिफोर?
- 1:00:01देखिए युगों पहले पता चल के अराम आये और उनमें ये शक्ति होगी जब वो
- 1:00:11जाएंगे। जनकपुरी फिर तुम कह देते हो यह
- 1:00:16सभी कुछ। पूर्व निर्धारित है सब शास्त्रों
- 1:00:24की कहानियों इसलिए लिख दी जाती हैं पहले लिख दी जाती है रामायण
- 1:00:31पहले बता दिया जाता है हसर क्या होगा महाभारत का?
- 1:00:37और सरे आम कह जाते हैं वेद व्यास दत्त राष्ट्र से तुम मान तो ना
- 1:00:43पाओगे लेकिन मैं अपनी माता को लेने आया सत्यपति को यह भीष्म जंग
- 1:00:51होगा और कोई नहीं बचेगा। तुम बचा सकते थे।
- 1:00:56तुमने बचाया नहीं क्यों? क्योंकि ये होना था वेध व्यास
- 1:01:03जानते हैं वेध व्यास छठी इन्द्रिय का मलक है छठी इन्द्रिय से देखते
- 1:01:11हैं। ये होगा और आ जाते हैं।
- 1:01:16अपनी कुटिया से उठकर माँ को कहते हैं सत्यवती कुचलमा चल चल और साथ
- 1:01:24में जो विधवाएं हैं, सत्यवती की बहुएं वह भी साथ जाती हैं, पहले
- 1:01:33ही निकाल लिया जाता है। ये तुम मरेंगे जी ये नहीं मरेंगे,
- 1:01:38ये बचेंगे तो इनको निकाल लो, यही विधान है ये होने वाली घटनाएं थीं
- 1:01:49ये सभी शास्त्रों में सनातन में मिलेंगे तुम्हें।
- 1:01:55मिलेंगे सभी धर्मों में, लेकिन तुम सहेज के नहीं रख पाए।
- 1:02:00सनातन बड़ा समझदार था वो सहेज के रख लिया रामायण भी सहेज के रख ली।
- 1:02:07वाल्मीकि ने पहले लिखी। महाभारत भी सहेज के रख ली।
- 1:02:16पहले ही लिख दिया था वेधव्यास ने पहले ही कह दिया अपनी माता को
- 1:02:21पहले ही ले गई चलो माँ यहाँ जो होगा तुम देख नहीं पाओगे।
- 1:02:28और सत्यवती जानती है कि मेरा पुत्र ब्रह्मज्ञानी है।
- 1:02:33चुपचाप चले गए साथ में बहू में भी चली गई चित्रांगत क्षमा करना
- 1:02:41विचित्र, वीरे की दो बहुएं। सभी कुछ पूर्व निर्धारित है।
- 1:02:58तुम्हें मानने को कोई जद नहीं करता है।
- 1:03:02तुम मानोगे नहीं हम करके दिखाएं करके दिखाओ कौन रोकता है तुम्हें?
- 1:03:10लेकिन अंत में मुँह के बल गिरो गए।
- 1:03:14ये जो छोटी मोटी तुम प्राइम मिनिस्टर बन गए, चीफ मिनिस्टर बन
- 1:03:18गए, गृह मंत्री बन गए, एक नंबर के अमीर बन गए, ये ठीक ये करके दिखा
- 1:03:27दिया। आई ए एस बन के यूपीएससी पास कर
- 1:03:31लिया। ये कर लिया वो कर लिया डिग्रीज़
- 1:03:32ले लिए ये करके दिखा दिया, नहीं करके दिखाया संत के पास इसकी कोई
- 1:03:43औकात नहीं है संत के पास सुख तक। कोई औकात नहीं रखता, संत कहता है
- 1:03:51सुख से आगे आनंद, संत तुमसे पूछता है तुम ठेक यूपीएससी आई, ए एस
- 1:03:59पीएम सीएम सब कर लिया, भोग लिया, एक नंबर के बन गए, अमीर विश्व में
- 1:04:05झंडे गाड़ दिए, आनंद मिला। नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला।
- 1:04:12बात आनंद की है पा तो कुछ भी रहो और वह पदार्थ हमें मिलता नहीं है,
- 1:04:22वह तो कबीर अपनी झोपड़ियां में बैठे बैठे पा लेते हैं।
- 1:04:26तू न मिला एक तू, न मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है?
- 1:04:47एक तो ना मिला मेरा दिल नाखिला सारी बगिया।
- 1:05:05खिले भी तो क्या है एक तू ना मिला तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी
- 1:05:22तो क्या है? मेरा दिल ना खेला सारी बगिया खेले
- 1:05:29भी तो क्या है? कागज़ की डिग्रियाँ मिल गई सुकून
- 1:05:36ना मिला और बात तो सुकून की है। तुम्हारा अंतःसप्राण सुकून मांगता
- 1:05:46है, शर्म की बात है, तुम सुकून नहीं दे पाते, उसे कागज की
- 1:05:56डिग्रियां उसने क्या करनी है? पदबियाँ उसने क्या करनी हैं सारी
- 1:06:01जनता सारी सृष्टि उसके पांव के हाथ लगाए, गुणगान करे, आरतियाँ
- 1:06:06उतारी उसने क्या करनी जे जुगचारे आरजा और दसूणी होए।
- 1:06:20नमाखंडा विच जाणि हैं लाल चले सब कोय चंगा नाव रखई के जस कीरत जग
- 1:06:29ले जगते से नजर ना वही त बात न पूछ के कीटा अंदर कीट कर दोषी दोष
- 1:06:39तरे। ना न के नर गुण गुण करे ते गुण
- 1:06:43बनतेया गुण दे तेहा कोई न वेखय दे तेश गुण कोई करे गुण बनतेया गुण
- 1:06:57दे तेहा कोई न सुझाई। यह तृष गुण कोई करे उसके ऊपर कोई
- 1:07:02गुण नहीं हो सकता, वह सभी के ऊपर गुण करता है चलो हम फिर वहाँ लौट
- 1:07:09चले दो तरह के व्यक्ति होते हैं एक और की बात है यह सदस्य हैं
- 1:07:18अनुभव कम है। खुद तक पहुंचे हैं।
- 1:07:21बुद्ध के तक आगे की बात सहजता से कर देंगे।
- 1:07:28पढ़ पढ़ा के कबीर को सब को पढ़ लिया इसलिए सब को पढ़ना पड़ा।
- 1:07:341,00,000 किताबें थीं उनके लैब में।
- 1:07:40रात को जानकर हैरान की होगी। वैसे मैं बता चुका हूँ मैंने एक
- 1:07:44किताब भी अध्यात्म करनी पढ़ी थी। एक किताब छोटा सा पन्ना 1,00,000
- 1:07:53किताब या फिरस्पर हैं बोलने की वाणी की क्षमता है।
- 1:07:59बाल की खाल निकालने में दक्ष हैं, लेकिन अनुभव नहीं है।
- 1:08:03अनुभव है अप दीपोभावा तक इसलिए बुद्ध के करीब पड़ेंगे, आगे नहीं
- 1:08:13जा पाएंगे, लेकिन और भी राहते हैं वसल की राहत के सिवा।
- 1:08:21तो त्रेता युग में आना हराम ने विधान ये कहता है और उसकी सृजना
- 1:08:32बहुत बार मैंने कहा व्यक्ति? परमात्मा को इंकार करने वाला
- 1:08:37व्यक्ति परमात्मा की सृजना का एक रेत का कण नहीं बना सकता।
- 1:08:45बनाने की बात छोड़ो, ये बना कैसे ये नहीं बता सकता सिर्फ मालिकुल्स
- 1:08:51और एटम संरचना के इलावा। बना नहीं सकता कैसे बना यह भी
- 1:08:56नहीं बता सकता। कितना निर्बल है मानव और उसकी होत
- 1:09:03को इंकार करता है तुष्तानंदा। भी एक गुप्त विद्या है सब कुछ उलट
- 1:09:19पुलट करने का, वो विद्या को साथ लिया जाए तो उलट पुलट हो जाता है।
- 1:09:29सब खत्म हो जाएगा और सब बन जाएगा। तो उस विद्या को करके सतानंद जो
- 1:09:37जन के पास दरबारी थे, महामंत्री थे, गुरु भी थे, उनके उन्होंने तब
- 1:09:47किया गौर तब किया। और उस महामालिक के पास उस परवर के
- 1:09:54गार के आ गए हैं उस रहम करीम के आँखें अपनी व्यथा सुनाइए देखिए
- 1:10:04वैसे तो मैं इसको भी ज्यादा ठीक नहीं समझता।
- 1:10:08इतनी शक्ति को बर्बाद कर देना। पता है माता मिट्टी की मूर्ति है,
- 1:10:15अब भी मिट्टी है फिर भी मिट्टी हो जाएगी।
- 1:10:181 दिन अहेला खत्म हो जाएगा, लेकिन शर्म आती है।
- 1:10:27उन दिनों में सामाजिक व्यवस्था ऐसी ही थी।
- 1:10:32मातो को उपनर्जागृत करता हूँ, जीवित करता हूँ, पुत्र का ये
- 1:10:38फर्जी है वो तब किया लेकिन पता था अभी द्वापर आएगा कृष्ण आएँगे।
- 1:10:4716 कला सम्पूर्ण फिर आएँगे त्रेता सात एक द्वा दो त्रे तीन कली अनेक
- 1:11:00तो आना था त्रेता ने। तीसरे नंबर पे अपने उस तप के कारण
- 1:11:15ले आए। दूसरे नंबर पे पहले आ जाएं, एक
- 1:11:20युग तो बहुत ज्यादा हो जाएगा और युग पहले आ गया।
- 1:11:26देखिए द्वापरण था। सत के बाद और फिर त्रय आना था
- 1:11:31त्रय लेकिन आ गया त्रय पहले दो ही बाग में यो को पलट दिया और भगवान
- 1:11:41राम आए। जिनके पास यह कैपेसिटी थी, वह
- 1:11:46सतर्क पर गए। जहाँ जड़ को हाथ लगाएं चेतन हो
- 1:11:52जाता है। ये बातें समझदारों की खोपड़ी में
- 1:11:56आएँगे नहीं, वह सुनना छोड़ देंगे। मैं जानता हूँ क्योंकि दिमाग से
- 1:12:04परे हो जाना ये मार्क्स के अनुयायी हैं।
- 1:12:08बिना खोजे कह देते नहीं है परमात्मा सिर्फ वितरण प्रणाली को
- 1:12:14देखकर जबकि वितरण प्रणाली इन्होंने खुद बनाई है।
- 1:12:18परमात्मा ने नहीं बनाई, लेकिन बहाना चाहिए।
- 1:12:26समाज के लिए वो भी ठीक हैं, शुभ हैं।
- 1:12:29अपने जुमाने के राम आए राम को जात लाया गया।
- 1:12:43राम ने अपना पांव लगाया, अंगूठा चच्च किया और अहिल्या पत्थर से
- 1:12:52अहिल्या बन गए। पांव छुए, राम ने आशीर्वाद दिया।
- 1:13:03कल्याण मस्त बाबा अब ये बात विस्तार से शास्त्रों में नहीं
- 1:13:12समझाई, बस विस्तार में कह दिया गया, पांव से छुआ और चेतन हो गई।
- 1:13:21नहीं एक तल होता है जहाँ पर जाकर जो व्यक्ति किसी चीज़ को छू दे वो
- 1:13:30तुम्हारी संसारिक मसले हल कर दे। मेरे पास फ़ोन की भरमार आती है,
- 1:13:37सिर्फ बताने के लिए कि मैं दुखी हूँ।
- 1:13:41क्यों? क्योंकि उनको पुराना विश्वास है,
- 1:13:47पर मैं सुनता नहीं हूँ। उनकी बात कि अपने दुख को बता दो,
- 1:13:50दुख दूर हो जाएंगे। मुझे बाद में मैसेजस भी आ जाते
- 1:13:54हैं। बाबा आपको पता है ठीक हो गया
- 1:13:56बताने भर से ठीक हो गया। अब ये साइंटिफिक प्रोसेसर तो है
- 1:14:03नहीं, मेरी खोपड़ी तो इसको मांगती नहीं थी।
- 1:14:09मैं तो साइंटिफिक मैएंड का व्यक्ति हूँ, ये कैसे हो सकता है?
- 1:14:13लेकिन पता चला कि ये होता है। जब पता चला कि ये होता है तो मैं
- 1:14:21एक जगह बैठ गया, ड्यूटी लगा दी भगवान शंकर ने और सिद्ध होने निभा
- 1:14:31रहा हूँ। प्रश्नों के उत्तर भी देने पड़ते
- 1:14:35हैं। फ़ोन भी उठाना पड़ता है, बातचीत
- 1:14:38भी करनी पड़ती है। लोग तलाश लेते हैं और अपनी व्यथा
- 1:14:45जल्दीजल्दी में कह भी देते हैं। बातों बातों में जी कुछ गहरी
- 1:14:52बातें हैं। तुमको बताती मैं नहीं, इनका भीतर
- 1:14:58का रस ही है। अगर ऐसा व्यक्ति जड़ को छू दे तो
- 1:15:05छत न जाए, लेकिन बात तो छुएगा क्यों?
- 1:15:13करुणा बस छुए गा, अन्यथा वह जानता है अब अगर किसी जड़ को मैंने मृत
- 1:15:21को किसी ने जवाब दिया, बुद्ध में ऐसी क्षमता नहीं थी।
- 1:15:26राम में ऐसी क्षमता थी। कृष्ण में ऐसी क्षमता थी।
- 1:15:33और तो और महावीर में ऐसी क्षमता थी।
- 1:15:36तुम्हें जानकर बड़ी हैरानी हो गई। बुद्ध में ऐसी क्षमता नहीं थी।
- 1:15:41महावीर उसी तल पर खड़े थे। जीस तल पर कृष्ण खड़े हैं विरोधी
- 1:15:45तल पर। बस कृष्ण समर्पण के शिखर हैं और
- 1:15:54महावीर संकल्प के शिखर हैं। इतना ही फर्क है तल समान हैं,
- 1:15:58दोनों के एक रत्ती राई हुए कम नहीं हैं कृष्ण से।
- 1:16:13कबीर के पास काशी नरेश आते हैं। मैंने तीर्थ यात्रा करने जाना है,
- 1:16:20बहुमूल्य हीरा है आपके पास रख जाऊ यहाँ कोई चोर नहीं आता हमारे राज़
- 1:16:30दरबार में। सभी चोर हैं, राजनैतिक चोर ही तो
- 1:16:37होते हैं इसलिए तुम्हारे पास यहाँ रख जाओ राजा के लिए मूल्यवान है।
- 1:16:50कबीर के लिए जो मूल्यवान था, वो उसने पा लिया।
- 1:16:55सब्र साहेब मिले ही, सबूरी में सब्र मिल गया, संतोष मिल गया।
- 1:17:01इससे बड़ा कोई सुख होता भी नहीं, तो कबीर कहने लगे देखो।
- 1:17:10यहाँ झोंपड़ी के अंदर जहाँ भी तुम रख कर जाओगे, वहीं आकर ले लेना
- 1:17:13भाई मुझे नहीं पता है, कहीं भी रख जाओ, लेकिन अपना हीरा आकर वहीं से
- 1:17:20ले लेना। पुत्र दायित्व है मेरा कुछ नहीं
- 1:17:24इतना है कि यहाँ चोर लोग नहीं आते।
- 1:17:28संतों के पास चोर आते भी नहीं तो मसा मत करो तो जाके वापस आया, एक
- 1:17:44प्रयोग था शायद गच्चा खा जाए, परखने का ढंग था।
- 1:17:55बहुत वक्त बीता, करीब एक महीना भर बीत गया, वापस आए, कुटिया में आए,
- 1:18:02प्रणाम किया बग़्जी मैं अपना हीरा ले लूँ हाँ भाई।
- 1:18:10जहाँ रख गए थे वहीं से मिलेगा लेलो काशी नरेश ने हाथ हमारा जहाँ
- 1:18:17रख के गया था वहीं पड़ा था हीरा चोर के घर में रख जाओगे, इधर की
- 1:18:28चीज़ उधर मिलेंगे। संत के घर में रख जाओगे, कोई नहीं
- 1:18:34छेड़ेगा, क्योंकि वहाँ शांति ही आती है।
- 1:18:41कुछ रहा गया हाँ नागार्जुन रह गया नहीं।
- 1:18:45नागार्जुन नहीं तो बोल रहा हूँ। ये नागार्जुन की भूमिका है।
- 1:18:53भूमि बना रहा हूँ प्लो कर रहा हूँ सब तैयारी कर रहा हूँ, पानी छोड़
- 1:19:00रहा हूँ, खाद दे रहा हूँ बस जीस दिन पूर्ण हो गया उस दिन बीज बहुत
- 1:19:06दूंगा। नागार्जुन आखिरी हैं इसलिए इतनी
- 1:19:11देर लग रही है नहीं ये शर्त वर्त नहीं चलेगी, तुम अगर मुझको न चाहो
- 1:19:26तो कोई बात नहीं है, तुम किसी घर को चाहोगी तो मुश्किल होगी।
- 1:19:33क्यों भाई तेरे बाप ने मोर ले रखी है क्या तुम अगर हमको न चाहो तो
- 1:19:40कोई बात नहीं यह है जीवंत है शी इस इंडिपेंडेन्ट तेरे बाप ने मोर
- 1:19:48ले रखी है तुम अगर हमको न चाहोगे। तो मुश्किल हो गई।
- 1:19:57ये शर्तें हैं ये प्यार में नहीं चलते हैं तू से लिपटके जोरो लेते।
- 1:20:13हम तू से लिपटके जो रो रे थे हम आंसू नहीं थे।
- 1:20:29ये मोती से कं तू से लिपटके जो रो लेते हम आंसू नहीं थे।
- 1:20:48ये मोती से कम तेरा दामन नहीं, तेरा दामन नहीं।
- 1:21:07ये आंसू डले भी तो क्या है? एक तो ना मिला सारी दुनिया।
- 1:21:25मिले भी तो क्या है मेरा दिल ना खिला मेरा दिल ना खिला।
- 1:21:44सारी बगिया खिले भी तो क्या है? एक तो ना मिला।