Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Apr 25 -शिव सूत्र! स्वयं में स्थिति ही शक्ति है!अस्तित्व का आनंद भोगना समाधि है।आत्मज्ञान तक कैसे..
Transcript
- 0:02कल की पर्वचन से आगे स्वयं में स्थिति ही शिफ्ट की है।
- 0:16शिव कहते हैं भविष्य में से शुरू होगी फाउंडेशन।
- 0:21तुम्हें हर तरफ ठहराने हो अभी तो तुम अमावस्या की रात को आसमान की
- 0:31तरफ देखते हो, वही घने तारे युगने नहीं जा सकते।
- 0:45ओके, सारा ब्राह्मण चमकता तमकता लेकिन तुम्हें कोई हैरानी नहीं
- 0:51होती। हैरानी खो गई न्यूस की जब से वह
- 0:56बुद्धि। इसलिए सूत्र को ठीक से समझे
- 1:07बुद्धि को कुंठित नहीं करना जैसे आज हो रहा था।
- 1:14भारत क्रम में बुद्धि को कुंठित किया जा रहा है।
- 1:20सभी ने अपनी मान्यता बना ली है। सत्यो को छुपा दिया।
- 1:37वांटेड से शुरू होगा और दूसरा आएगा स्वयं में ही शक्ति है।
- 1:56आस्था के सैलाबों में जाओ, बस शानदार सूत्र हैं, स्वयं में
- 2:12स्थिति ही शक्ति है। आस्था की सैलाबों में जब
- 2:27आस्था की सैलाबों में जाना सीखो बड़ी शानदार बात।
- 2:39इसको ज़रा आजमा के चक्कर में अगर तुम सचमुच में प्यासे हो अगर तुम
- 2:48झूठे झूठे प्यासे हो तो फिर तो तुम करोगे ही सच में ही अगर प्यास
- 2:55लग गई। कोई इस सूत्र को आजमा के देख
- 3:00आस्था के सैलाबों में जाना सीख क्या है आस्था की सलाह?
- 3:09हमारे सनातन ने बहुत सी आस्थाओं के सैलाब बनाए।
- 3:15जैसे महाकुंभ आस्था का घोर शैलाब होता है, वहाँ जाओ, लेकिन ऐसी
- 3:30मुर्ताएं मत करना बाघेश्वर धाम जैसे वहाँ जो मर गया।
- 3:39वह मोक्ष हो जाएगा। इन पागलपणों को त्यागती आस्था के
- 3:46सैलाबों में याना सीखो यही कारण था सनातन ने इतने सारे त्यौहार
- 3:53बना दिए। हिंदू धर्म में बहुत उधार है।
- 4:00बाकी धर्मों में बहुत कम त्यौहार दिख जाए तो तिसाई धर्म या तो कृष
- 4:16शंकर। ईसा मत श्री यह गुड फ्राइड वगैरह
- 4:23इनके ऊपर त्यौहार में लगता है, लेकिन हमें तो इतनी इजाजत करती
- 4:32है। हर दूसरे दिन त्यौहार कभी कोई कभी
- 4:38कोई। क्या था कारण?
- 4:41उसके कुछ रहस्य क्या था? बुनियाद का कुछ तुमने कभी देखा जब
- 4:53तुम भीड़ के साथ होते हो तो तुम्हारा अपना।
- 4:58अस्तित्व हो जाता है। जब तुम भीड़ के संग चलते हो तो
- 5:10भीड़ की मेंटालिटी तुम्हारी मेंटालिटी बन जाती है वहाँ आस्था
- 5:16का प्रवाह। जैसा है।
- 5:19अगर श्रद्धा युद्ध है तो तुम भी श्रद्धा युद्ध हो जाओ।
- 5:25अगर क्रोध युक्त है तो तुम मारखुद करने लगोगे, जैसी होगी भावना पेड़
- 5:34की। वैसे ही तुम्हारी मनो स्थिति बदल
- 5:38जाएगी। तुम्हारी औकात भी क्या है?
- 5:41इतनी भीड़ क्या है? और कुम्भ मेले में करोड़ों
- 5:45व्यक्ति और तुम्हारा छोटा सा दिमाग कुल शायद हो जायेगा उन
- 5:53रंगों में और जहाँ। अपना अस्तित्व तुम भूल जाओ वही तो
- 5:59समाधि है, ईगो लेस्नेस जहाँ तुम अपना अस्तित्व खो देते हो, जो
- 6:09तुम्हारा बयार हुआ है तुम्हारा असली अस्तित्व तो कभी?
- 6:14टस से मर से भी नहीं होता, वो तो आड़ी के है और कम पे है लेकिन जो
- 6:22नकली नकली तुमने बनाया वो खो जाता है।
- 6:28पिछली कंबो बनाई। कहीं भी ऐसा नहीं है।
- 6:38इफलाम में ऐसी चेष्टा की गई, ऐसा होता है इस्लाम में हच वहाँ भी
- 6:52अपार विरोधी। कि क्यों बनाए गए थे, जब बहुत से
- 7:03तरंगे इकट्ठी हों, कोलैबरेशन कर ले, समूह बनाने कोलेक्टिवनेस में
- 7:12आ जाएं तो तुम्हारी इंडिविजुअल्टी समाप्त हो जाती है।
- 7:18तुम गए और यही सबसे बड़ी उपलब्धि है और सच पूछो तो यही उपलब्धि है
- 7:24भीड़ में जाकर तुम खो जाओगे। ये फिर आस्था की हो।
- 7:42अगर तुमने सही मार्ग पे चलना आनंद की उस दिशा में तुम बड़े चले हो
- 7:47तो इस बात को याद रखो। प्रत्येक धर्मों के अपने अपने
- 8:00जश्न के दृक जहाँ से हमारे प्रेम वाइब्रेशन छोड़ते हैं और जहाँ
- 8:10करोड़ों व्यक्ति। एक दम से डड़केंगे दिल लुटे और
- 8:16उनके मस्तिष्क के नूरोंस झेंकेंगे श्रद्धाधिकरण तो अपार समूह में।
- 8:31तुम चाहें नास्तिक ही तुम तुम देखना तुम अपने आप को बदलता पाओगे
- 8:39बाद में सोचोगे मुझे क्या हो गया आज मैं क्यों इनके साथ भाग लूँगा
- 8:45लेकिन तुम्हारा। भीड़ में जाकर हमारी
- 8:52इंडिविजुअल्टी खो जाती है, व्यक्ति हो जाता है, व्यक्तित्व
- 8:58हो जाता है, विराट हो जाता है भीड़।
- 9:05इसलिए कितने कंपनी और एक कंपनी? हमने तो चार चार कुंभ नाशिक है,
- 9:13उज्जैन है, हरिद्वार है, प्रयागराज और चार चार जगह भी
- 9:20नहीं। हमने फिर अर्धभुमियाँ बनाई हर 6
- 9:25साल के बाद। इसके पीछे कारण बहुत महत्वपूर्ण
- 9:32कारण व्यक्ति की अंतरिम लालसा उस सतत्त्व के पास पहुंचने की है
- 9:41जहाँ जाकर आनंद ही आनंद दर्शक तुम झूम झूम जाती हो।
- 9:49भीतर से कोई नाच उठता है, भीतर से कोई गाय न उठता है, इसलिए बाबा
- 9:55गाते मेरा नाच देवी यह भीतर से उठा हुआ संगीत।
- 10:08वीणा के तार इतने कसे लिए गए कि उन कसे हुए तारों पर उस अज्ञात के
- 10:16हाथ फिरे और सुर निकले और सरगम बनी।
- 10:26बस तुम कैसे चाहते हो तुम्हारी वीणा की तार ऐसे?
- 10:31सुदृढ़ ढंग से कष्ट दिए जाते हैं कि तुम्हें उनके साथ बहना ही
- 10:35पड़ता है। कैसे तो तुम घर में बैठे बैठे
- 10:43स्वयं से नहीं बदल पाओगे दो ही? जस सम्पूर्ण गुरु को तराश जो की
- 10:56मुश्किल है, गुरु लोभी हो सकता है।
- 11:06लालची हो सकता है, काम ही क्रोधी हो सकता है।
- 11:10प्रथम त्याक्रम सब कुछ लुटा के होश में आए दिन में अगर चिराग।
- 11:30नजर आये तो क्या हुआ सब कुछ लुटा होश में।
- 11:47आए तो क्या हुआ? दिन में अगर चिराग जलाये तो क्या
- 12:04हुआ? सब कुछ लुटा के होश में आये तो
- 12:14क्या हुआ सर होश में आये थे नानी योग भी तो क्या?
- 12:28तुम खो गए अब अगले जन्म की बात जोहना आस्था के सैलाबों में वह
- 12:46जाना। आस्था की सेला अकेले सनातन में
- 12:55नहीं है, लेकिन सनातन में बहुत है, वहाँ जाना ही काफी है।
- 13:07उस सैलाजों में तुम पकड़ लिए जाओगे किसी अज्ञात शक्ति के
- 13:13द्वारा किसी अज्ञात धारणा के द्वारा और उस घड़ी के लिए तुम बदल
- 13:20जाओगे और तुम देखो। उन जाने वालों को कुछ भी समझा दो
- 13:25आप श्रद्धा के आगे तुम्हारी बुद्धि फीकी पड़ जाती है तुम लाख
- 13:33कहो देखो मर गए, क्या करोगी जागृति?
- 13:41लास्ट में तब से ही मिलेंगे गिनती नहीं पता कितने मर गए, लेकिन वो
- 13:47नहीं मानेंगे क्यों? आस्था पर सैलाब इतना भारी है और
- 13:52इतना रसीला है कि तुम छोड़ नहीं पाते इस रस को।
- 13:59पिछले जन्म में गाँधी जीके पास एक शिकायत आई।
- 14:02एक शिकायत आई कि अपने आँखों से बाबा कहने वाला एक पाखंडी कामी
- 14:14150 स्त्रियों को सुन्दर मिस्त्रियों को ले के भाग आया।
- 14:20उस वक्त तो सारा हिंदुस्तान हिसाब पाकिस्तान न बना था और लाहौर
- 14:30कराची रावल 20 सब ले हिंदुस्तान के।
- 14:40गाँधी जी को एक शिकायत आई। यह व्यक्ति बड़ा तंग करता है, काम
- 14:44ही है, घोर काम ही है और नाम रखा है अपनी शिष्याओं का।
- 14:53ब्रह्माकुमारी। इसका कोई सिला नहीं।
- 15:05यह अश्लीलता और असभ्यता फैलाता है।
- 15:07समाचार समाज में यह भी के सब्र? आप तो ब्रह्मचर्य का उपदेश थे,
- 15:22इसने सब खंड विखंड कर दिया, अब क्या सोचा बड़ी मुश्किल पेश है
- 15:37गाँधी जी ने कुछ देर सोचा। बोले तुम्हारी बात तो ठीक है
- 15:48लेकिन अगर हम इन मामूली व्याग हाथों में पड़ जाएंगे तो हमारा
- 15:55मूल और देश भी शुभ जाए। अभी हमें इन्हें छेड़ना नहीं
- 16:04चाहिए। बाबा मोज़ उड़ाते रह मुझे लोग कह
- 16:12देते कि शिव बाबा ने जौहरी से अपनी सारी संपदा लुटा दी इन
- 16:20दादियों तो मैं कहता हूँ। कामी व्यक्ति सब लुटा देता है,
- 16:31तुम उसको महिमा मंडी के किसी शब्द से करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
- 16:38है। फिर कामी चाहे ब्रह्मचर्य का
- 16:40प्रदेश ही हो ना देओ। क्या फर्क पड़ता है?
- 16:49बस ये श्वेत वस्त्र पहनाने का मतलब ये था अपनी शिक्षाओं को कि 1
- 16:53दिन मैं तुम्हें विधवा करके सौंप जाऊंगा।
- 16:59असामट करो भाई। सत्य को उदघाटन कर रहा हूँ और मैं
- 17:12देख रहा हूँ आज ऐसा। ही है।
- 17:20जैन धर्म की नकल पर है। इन्होंने भी स्वेता क्यों?
- 17:27पहनी। श्वेत सूट पति के रहते हुए
- 17:33विधवाएं हो गईं। तलाक ले लिए गए, ये क्या है?
- 17:41तूफान है, लेकिन अस्थापन है, तूफान है, भावनाओं कितनी और चीजों
- 17:51का तूफान है? आस्था का तूफान कुछ अलग होता है,
- 17:56है तो आपको सुधीबुधी में रहने देता हूँ।
- 17:59इकट्ठा वहाँ भी है इकट्ठे यहाँ भी है, इकट्ठे डेरों में भी है,
- 18:08लेकिन हिन्दुओं ने कहा बिना गुरु के बनाओ, क्योंकि एक ऐसा माध्यम
- 18:14भी होना चाहिए जहाँ बिना गुरु के तुम पहुँच सको।
- 18:24कौन गुरु तलाक की तोहमत उठायेगा। जय मत उठायेगा तू ऐसा तूफान,
- 18:35क्योंकि वेश को जानते थे वो? अगर आंसुओं के सुंद्र में तुम ढल
- 18:39जाओगी, तो इनका आवेग तुम्हें आमूलचूल परिवर्तित कर जायेगा और
- 18:45तुम्हें तुम्हारे। स्वभाव में भटक जाएगा।
- 18:52देखिए शिवशूत्र का दूसरा शब्द भी है स्वयं में स्थिति ही शक्ति है,
- 19:02तुम उस शक्ति तक महाशक्ति तक पहुँच जाओगे।
- 19:05जो तुम वास्तव में हो हो तो तुम, लेकिन तुम जानते हैं सिखों के
- 19:19अपने सलाह होते हैं, वहाँ भी जानो जहाँ जहाँ तुम्हें मौका मिले वहाँ
- 19:26भी जानो। ईसाईयों के अपने सैलाब होते हैं,
- 19:32वहाँ भी जाना इस्लाम के अपने सैलाब होते हैं, वहाँ भी जाना,
- 19:40लेकिन तुम तो कहो के छि छि छि। लेकिन नानक बड़े वेदार्थ है, मैं
- 19:54इनकी आस्थाओं के सैलाब में कूद जाती हूँ और राजा कहता है कि
- 20:02तुम्हें नमाज़ पढ़नी पड़ेगी, नानक कहता है, बिल्कुल पढ़ूँगा लेकिन
- 20:07एक शर्त है कि तुम्हें भी पढ़नी होगी।
- 20:14राजा कहते मैं तो पढ़ने ही चला हूँ अरे बच्चे तो मैं चला हूँ
- 20:21क्या चकमा चला हूँ नमाज़ ही तो करने चला हूँ, चलो अगर तुमने
- 20:27नमाज़ की तो मैं भी करूँगी। नानक भी गए, नानक खड़े हुए, सभी
- 20:44बैठ गए बज्रास में। कुछ बहुत बजाएं चूके, पर इतना
- 20:54झुके के धरती है माँ तक माथा लग गया छूमलो में खुश जुकाम।
- 21:06आँखों जिसपे आए तेरा नाम कण कण में तो ही है धरती को माथा टेपल
- 21:20दो ने भी ऐसा किया सनातन ऐसा किया माँ धरती।
- 21:25माँ गंगा माँ यमुना तो कह देते है तुम्हारी कितनी माई है बहुत माई
- 21:31है, मेरे माई ही मानी है न खड़े रहे।
- 21:52सभी जोके नमाज़ अदा की अदा कर कर उठ कर हुए है।
- 22:03देख बाबा आप झूठ भी बोल लेते हैं। नहीं तो आपने कहा तो मैं नवाज़
- 22:14करूँगा, बिल्कुल कहा, लेकिन मैंने एक और भी कहा अगर तुम नवाज़ करोगे
- 22:20तो मैं भी करूँगा। हाँ तो मैंने तो नमाज़ की बाबा के
- 22:26चेत तो सर कस्से। एक को नमाज़ थोड़ी भितर से कहाँ
- 22:31झुके तुम बाहर से तुम्हारा शरीर बैंड होगा तुम्हारे मस्तक ने माथी
- 22:41माटी चूमी तुम कहाँ? झुके हो?
- 22:48यह तो सर्कस है। यह तो रोज़ योग के शिक्षक सिखाते
- 22:58हैं इन सर्कसों को लेकिन ये योग? थोड़ी ये सर्कस है योग कार तो
- 23:06परमात्मा से मिलन तुम प्लस हो जाओ उसमें।
- 23:11तुम उसमें जमा हो जाओ बौद्ध समुद्र में योग हो जाए बौद्ध
- 23:15सामान्य समुद्र में वह योग है। यह तो सर कैसे है राजनेता और मैं
- 23:30क्या कर रहा? की नमाज़ ही तो थी, ऐसे ही तो
- 23:34नमाज़ अदा होती है। नानक बोले तो पिशावर में गोले कौन
- 23:40खरीद रहा था? बड़ी शर्म है बस हाँ, कल होडा मर
- 23:50गया था। घोड़े के बिना यहाँ तक भी आना
- 23:55पैदल चढ़ के आना घोड़ा खरीदने का ब्योत बना रहा था और पेशावर में
- 24:05घोड़े का हिस्सा था। बिलकुल उसने हाथ जोड़ें की क्षमा
- 24:09मांगी। क्षम कर दो गट गट के अंतश की चलनी
- 24:16भले भरे की वीर परेशान तुम गुरु से छिपाने से हो, तुम कोशिश करोगे
- 24:26बहुत कोशिश करने के बाद भी। तुम छुपा न पाओगे।
- 24:30गुरु बोले जल बोले वह जानता है तुम्हारे मन में जो बेईमानी चल
- 24:38रही है, गुरु अच्छी तरह से जानता है।
- 24:48बहुत से लोग मुझे आ जाते हैं। दर्शन कभी घर में प्रवेश नहीं किए
- 24:59होते, इससे पहले मुझे सोच न मिले, मैं कह देता हूँ उनसे कैसे वापस
- 25:04चले। पापा बस दर्शन करने हैं।
- 25:12मैंने कहा उनसे कहो वापस सर वो ऐसी आसानी तरंगों से भरे हैं और
- 25:18उनका मंतव्य भी ठीक नहीं है। उनसे कहो।
- 25:26और सारा कूड़ा यहाँ फेंक जाएंगे और खुद भी तो रूपांतरित नहीं हो
- 25:30पाएंगे। हाँ, अगर कूड़ा यहाँ फेंक जाती तो
- 25:33कोई अरजा नहीं था। मैं तो साफ कर लेता उसे लेकिन खुद
- 25:39बदल जाएगी। ये तो हो जाता है।
- 25:44ये नहीं होता तो बड़ा दुख होता है।
- 25:48मेरी धर्मपत्नी मुझे कहती है ये मुझे अच्छा नहीं लगता, मैंने कहा
- 25:53मुझे अच्छा। लगता है।
- 26:04मेरे किसी कारण से प्रभाव से किसी उपाय से उनका उद्धार हो जाए।
- 26:10मैं हाजिर हूँ लेकिन मेरे उसी उपाय से यहाँ तो दूषित हो जाए और
- 26:17उनका उद्धार न हो तो फिर क्या ठीक रहेगा बताओ?
- 26:30आस्थाओं के सैलाब में चले जाओ और सब जगह आस्थाओं के सलाह होते हैं,
- 26:38तुम सिर्फ सनातन को ही। मत चिप कजन सारे विश्व आस्थाओं के
- 26:49सैलाब से युक्त लोग हैं, सभी धर्मों में हैं।
- 26:53यह मानव और सभी धर्मों में सैलाब आते हैं।
- 26:59उसी का धर्म हो, बड़े शानदार सैलाब होते हैं ज़रा जापिते उन
- 27:06सैलाबों में जाते हुए तुम खुद पत्र जाओ इस्लाम में भी है, लेकिन
- 27:20तुमने तो मान ही लिया है। कि मुसलमान गलत?
- 27:23होता है कोई बात? नहीं तुम नमाज़ नुपुरम तुम इन
- 27:30सैलाबों में जरूर जाओ, हाजी जरूर जाओ वहाँ आस्थों के तूफान वो
- 27:37तुम्हें भीतर से उखाड़ दी। और ये उखाड़ना ही कर्तव्य होना
- 27:44चाहिए। मनुष्य बस मैं तब तक सांस न
- 27:48लूँगा, ये संकल्प भरा हो जब तक मेरा आपा ना खत्म हो जाए, स्वयं
- 27:55ना गुम हो जाए, आई थिंक की फिकर से नहीं आ जाए।
- 27:59मैं द्विज हो जाऊं, मेरा दूसरा जन्म हो जाएगा, ये जन्म चला
- 28:02जाएगा, सुर्रोहित हो जाएगा, तुम द्विज हो जाओ और जहाँ भी दूसरा
- 28:12जन्म हो गया वहाँ आसनों की सैलाकों में जन्मेगा दूसरा जन्म।
- 28:19और फिर हिंदू, मुसलमान, ईसाई या सिख ये नहीं होते सैलाबों के
- 28:27आस्त्रों के सैलाबों के कोई धर्म नहीं होते, बस सैलाब हुआ करते
- 28:32हैं, ऊर्जा और चेतना के प्रवाह। वो कोई भी हो, सभी धर्मों में
- 28:41सैलाब आती हैं और उन उन सैलाबों का लाभ उठा लेना जो व्यक्ति से ही
- 28:47मैं घर में पड़ना चाहता है। जो दुखी ही रहना चाहता है फिर
- 28:52उसकी बोझ है परमात्मा। इतना हिंसक नहीं कि तुम्हारी
- 28:58गर्दन पकड़े और कहे कि उतरो अपने भीतर ऐसा नहीं करेगा।
- 29:07इस कदर में दयालु है डिक्टेटेड शिप डकाता नहीं सब कुछ होने के
- 29:12बावजूद एक घड़ी के लिए। वो प्राण वायु को छीन ले अपने
- 29:17एटमोस्फीयर में से तो तुम्हारा रिज़ल्ट क्या बचेगा?
- 29:21ज़रा सोच लेना अब मैं रोज़ बहुत है।
- 29:33जब उसे सुनते हैं कम से कम इतना यकीन हो कर लें।
- 29:41इतना यकीन हो कर लें कि जो व्यक्ति दो 2 घंटे वो तो हमारी
- 29:48भाषा में वर्किंग करता है। कोई कारण नहीं, कोई पगार नहीं
- 29:57मिलती जो मिलता है वह मिलता है दान दान, उस परमात्मा का दिया हुआ
- 30:08दान अपने ही किसी दूसरे हास्य। और उन्हीं हाथों से ये सच्ची
- 30:15संस्थाओं चला करते हैं। अस्थों के सैलाबों में चले जाना
- 30:30अगर तुमने ये देख लिया कि सिर्फ हम घूम जाएंगे।
- 30:34हाजिर नहीं जाएंगे और तुमसे बड़ा मूर्ख कोई क्योंकि तुम्हारा सैलाब
- 30:43है कि तुम तुम विश्व के पांचवें हिस्से के येस छठी और बार की भी
- 30:53विश्व है। और बाकी में भी आस्थाओं के सलाखें
- 30:57सभी जीवन से कौन जाने किस घड़ी किसके भीतर से वो आस्था का सैलाब
- 31:04उमड़ आई। प्रश्न उन मौकों की तलाश में रहना
- 31:11वहाँ बिलकुल। अब जैसा व्यक्ति वहाँ जाकर ऐसी
- 31:20पूर्णदवगामी रंगों से तो हो जाता है कि जैसे वो खुद परमात्मा हो
- 31:25गया है, तुमने पूरे पहचानने की कला नहीं सीखी?
- 31:33अगर तुम पूरा पहचान ना जानते तो तुम जान जाते बिलकुल अच्छी तरह से
- 31:39कि ये कुंभों के अंदर आए हुए सैलाब सभी के और एक कुछ थे लेकिन
- 31:49यहाँ पे बिलकुल व्हाइट टिश्यू। तो तुम न तुम उस्तक हो जाते यह
- 31:59शक्ति तुम में आई नहीं, ये कला है ये कला तुम्हें सिखाई नहीं गई।
- 32:10तुम कब अपने स्वयं में से हो जाओगे जब तुम सैलाबों के भीतर
- 32:16आस्थाओं के सैलाबों के भीतर तुम्हारा अपना अस्तित्व उड़
- 32:21जाएगा, जो तुमने कुर्द बनाया, नकली नकली असली असली तो बचा ही
- 32:27रहता है, उसको तो कोई। तोड़ नहीं सकता नई नम छीदन ती
- 32:32शस्त्राँण नई नम उदास दीपाव काना। नई चैनम के लिए धन क्या तुम्हारा
- 32:44नकली नकली उड़ जाएगी और तुम ऐसे इसको उड़ा ना पाओगे।
- 32:51लाश प्रयास कर लो। सनावते ने बड़ी अद्भुत व्यवस्था
- 32:57की जो तुम्हें आज पाबिलपन लगता है लेकिन ये पाबिलपन है नहीं।
- 33:08दोनों सच्चे गुरु हुए आते हैं। उनकी छटा निराली होती है।
- 33:14तुम्हारी पहचान में नहीं, लेकिन होते हैं कुछ।
- 33:22मैंने पहले भी कहा था कि इस कुंभ में चार ऐसे दयालु पुरषाहित जो
- 33:30बांटने को आए थे। लेकिन कोई न मिला वापस चले जाए।
- 33:39क्या करे आस्थाओं के तूफान में जब तुम्हारा बनाया हुआ कृत्रिम
- 33:47आइडेंटिफिकेशन जिसे अहंकार ईगो कहते हैं।
- 33:51वो उड़ जाए, हवा में काफूर हो जाए तो तुम्हारा तीसरा स्वयं की शक्ति
- 34:02है। तुम शक्ति में हो जाते हो, तुम उस
- 34:09तल पर फेंक दिए जाते हो अचानक। इस आस्था की सैलाब के तूफान में
- 34:19तुम पटक दिए जाते हो, तुम्हें पता भी नहीं चलता कि कर्तव्य वे मूड
- 34:27हुए हुए देखते रह जाते हो और तुम बदल जाती हो।
- 34:31बहुत से व्यक्ति बदल के आते हैं, लेकिन अक्सर खाली हाथ वापस लौट
- 34:38आते हैं। अगली बार कोशिश करनी।
- 34:49आस्थाओं के सैलाब में बहना सीखो जाना सीखो और सैलाब चाहे किसी भी
- 34:55धर्म का हो, भेद नहीं होना चाहिए। तुम्हारे उन सैलाबों को तुम उनका
- 35:02लाभ उठाओ। सभी के भीतर से वो तरंगी उठती है
- 35:07किसी खास मौके पर? और वो होते हैं पर्व और पर्व सभी
- 35:12धर्म है, इसलिए मैं तुमसे एक बात कहता हूँ, तुम्हारी तथा के तो
- 35:24विद्वानों को जचेगी पूछ रही है। क्या है ना?
- 35:33सिर्फ फतह जगत पर हम बकरीद पर क्यों चले?
- 35:41जी बिल्कुल चले जी अरे यहाँ सदना भी तर जाता है भाई तुम्हारे तर्क
- 35:50को कुछ करो। बुद्धि से यह सत्य तुलेगा नहीं
- 35:57आचार्य तुम इन शब्दों को मैं पहले ही ये तुम्हारी संस्कृति और
- 36:07तुम्हारी दिमागी सड़ाम के विपरीत पड़ेगा।
- 36:12वह तो इसके मैं भी बोलेंगे, लेकिन किसी खास लम्हों पे बोलेंगे।
- 36:18लेकिन जो शार्थिक है उसके बारे में भी बोलना जरूरी हो जाता है।
- 36:24बकरीद भर भी चले जाओ, वहाँ झटके होते हैं मासूमों के।
- 36:29लेकिन इधर से से लाभ उठता है। हजरत के कुछ कारण कोई भी हो
- 36:44तुम्हें लाभ उठाना है। आस्थाओं के सैलाबों का वो सैलाब
- 36:53कहाँ से किस पर्व में मनाए गए, इसका फिक्र नहीं करना हमारे यहाँ
- 36:59हमारे शहर में गुजर वहाँ है हिंदू सिख का भाई चेहरा बड़ा शांत है।
- 37:07हमारे यहाँ फंक्शन गुरुद्वारा में होते हैं।
- 37:13सिक्ख कमेन्टी का फंक्शन डेरों में होते हैं।
- 37:19बाबा गंगाराम वगैरह वगैरह एक दूसरे के।
- 37:26पर्वो में बड़े उत्साह से भाग लेते थे।
- 37:31ऐसा ही होना चाहिए, किसी का कुछ नहीं।
- 37:35सामाजिक भेदभाव की बात में बात तो आध्यात्मिक है।
- 37:44उस आस्थाओं के तूफान को पी लेते हैं धर्म जो तुमने बन गए यह दीवार
- 37:53तो तुमने इकट्ठी हुई यह रचना तुम्हारी ईश्वर की रचना, वह आस्था
- 38:01उसके सैलाब को पिए। किसी भी धर्म में मिल जाए, धर्मों
- 38:06की फिक्र मत करना, लेवलिंग की फिक्र मत करना, आस्था की फिक्र का
- 38:14उन आस्थाओं के तूफान में अगर तुम चले गए तो तुम्हारा भी वजूद नहीं
- 38:20रहेगा। तुम भी उड़ जाओगे फिर तुम्हें लाख
- 38:26समझाए, कोई नहीं समझ पाओगे तुम क्योंकि तुम किसी आस्था के तूफान
- 38:32में बह गए, लेकिन ऐसा होता है अब। दुर्भाग्य के बात से आज ये जाता
- 38:50है व्यक्ति लोभ को लिए लिए आस्था को लिए नहीं जाते और लोभ को लिए
- 38:57लिए जाता है। कि बस महत्त्वमुक्त हो गया, एक
- 39:02डुबकी लगाई। हर हर गंगे कहूंगा और पार हो
- 39:06जाऊंगा। नहीं है सनी यह लोभ है और इसी लोभ
- 39:12के कारण मौनी अमावस्या पर प्रथम मैं मुक्त हो जाऊं जल्दी से
- 39:18स्वर्ग के द्वार। सुमनु तो पहले छलांग लगा दी, पहले
- 39:23कौन छलांग लगाएगा? किसी ऊहापुहु के अंदर वो बेचारे
- 39:29शहीद हो गए। अच्छा हुआ मोक्ष आप भी ले लेते
- 39:47मोक्ष क्या दूसरों को मोक्ष देख के आखिर में जाओगे?
- 39:58कुछ ज्यादा ही दयालु प्रवृत्ति के लगते हो, लोगों को हाथ की सफाई
- 40:06दिखलाकर ऐसे हिप्नोटाइज़ करके मूर्ख बना लेना।
- 40:21यह दुष्टों का काम होता है। तुमने न जानी कितनी हदें ऐंटी
- 40:27तुम्हें पता था अस्थों की हत्या करते हो तुम?
- 40:36मर गए क्यों मर गए? व्यवस्था सीख रही थी।
- 40:44यहीं गड़बड़ हो जाती है, फिर लोग डरते हैं, लोग कहते हैं फिर
- 40:50तुम्हें प्रचार करना पड़ता है आज फलां जगह पे।
- 40:56विशाल जागरण हो रहा है यह एक समूह को इकट्ठा करने की कवायद।
- 41:01थी और वो समूह। बिखेरेगी आस्था की तरंगी लेकिन आज
- 41:11कहाँ भी करती हो आई तो बस उसने बुलाया था, मैं चला जाऊं।
- 41:16उसने जागरण कराया था, हम भी चले गए, अगर उन्होंने नहीं बुलाया तो
- 41:21हम भी नहीं लाते। ये लेखो देय है, ये आस्था नहीं,
- 41:28आस्था हो तो कोई बुलाये या ना बुलाये, तुम चले जाओगे।
- 41:36आस्थाओं के तूफान कहाँ कहाँ उमड़ पाते हैं, देखना जाकर देखना उनमें
- 41:44बैठ जाना तुम्हें साफ पता लगेगा यू आर गोइंग टू ट्रांसफॉर्म।
- 41:51तुममें कुछ बदलाहट हो रही है लेकिन वो बनाए हुए लाखों, लाखों,
- 41:58हजारों हजारों साल पुराने व्यवस्थाएँ टूटती ही नजर आती हैं।
- 42:07उन चार रिश्तों से मैंने संबंध किया है।
- 42:11मैंने कहा वापस क्यों चले गए? कहते लोभ ही लोभ तो ज़रा भी नहीं
- 42:18लोभ था, दंडाधिकारी थे शिव कोई नहीं था, आस्था के नाम पर कुछ और
- 42:29ही हो रहा था। मैं समझ गया।
- 42:34तो वापस चले आए, हमारा कोई काम नहीं इकट्ठे जहाँ होगा और अगर
- 42:45वहाँ तुम्हारी लोभ होगी और लोभ होगी मुझे पता है।
- 42:49क्योंकि मुझे पता है मेरे पास कितने जिज्ञासु मुमुक्षु आते हैं।
- 42:54अक्सर से ही आते हैं पापा मेरी बेटी को ठीक करते हैं मोह खुद से
- 43:00दूर नहीं हो रहा मोह से छुटकारा तुम खुद नहीं पा रहे।
- 43:08बाबा तुम्हारी बेटी को ठीक कर दे, ये तुम्हारी इच्छा है बस ऐसे ही
- 43:23अपनी अपनी पोटलियाँ लेके जाते हो और कुम्भ में चले जाते हो।
- 43:30अब स्नात जितना पुराना था, उतना ही दूषित हो गया।
- 43:35आज कौन बचाएगा? और जो बचाता है और प्रताड़ित किया
- 43:39जाता है तो मैं कह रहा था। इन श्वेत वस्त्रधारी विधवाओं
- 43:53विधवाएं हैं जो कुछ होता है मैं चित्र से जानता हूँ खैर पदार्थ न
- 44:00करूँ तो ज्यादा अच्छा है तो कहते बाबा ने सब कुछ लुटा दिया।
- 44:06जौहरी सा करोड़ों का मात अरबों। मैंने कहा भाई कामी व्यक्ति कुछ
- 44:12भी उठा सकता है कामी व्यक्ति अपना जीवन लुटा सकता है, लौटा दिया
- 44:21कितनी बार भविष्यवाणी की प्रलय हो जाएगी?
- 44:2669 में हो जाएगी। सब बदल डाल जीस समय बदलने की
- 44:33क्षमता नहीं है वह बदलने चला युवकों को बदल दिया 5000 साल के
- 44:41चार गुट कर दी कर दो भाई बिल्कुल तुम्हारे कहने से सूरज नहीं उगता।
- 44:51मुर्गा बांग देखता है। लगता है कि सूरज जो उसकी बांग से
- 44:56उगता है, लेकिन वो भ्रांति में है तो हम भी भ्रांति में सतयोग नहीं
- 45:02आया। बाबा खुद करयुग के रास में गश्त
- 45:16लिए गए। तुम पूजा करते रहो क्या फर्क
- 45:22पड़ता है सत्य गुणा बाबा? फिर कुछ भी करो, किसी को बनाओ,
- 45:31किसी से सम्मानित हो, किसी को सम्मानित करो, ज़रा भी तो फर्क
- 45:36नहीं पड़ता, तुम्हारे संसारिक लेन देन है तुम्हारी बंटी हुई?
- 45:42सर्टिफिकेट्स की धारणाएं सत्य। में तो परितोष मिलता है।
- 45:46परमात्मा से तुम्हारे यह। कागज की डिग्रियां।
- 45:51यह सम्मान पत्र तुम्हारे हैं और जो सच्चा साधक है उससे परमात्मा
- 45:58का परि जोश है। परमात्मा का ईनाम चाहिए।
- 46:03तुम्हारा नाम आइए देवांशु जी, हम अगले।
- 46:11प्रश्न का भी चल। रहे हैं सूत्र पर।
- 46:15अब तक तो भूमिकाएं थीं। 20 में भूमिका बनेगा।
- 46:22फाउंडेशन की तरह और स्वयं निश्चित हो जाओगे, इन आश्रमों के सैलाबों
- 46:28में आकर एक झरोखा आएगा। बड़ा तूफानी झरोखा और तुम अपने
- 46:34भीतर एस्टाबलिश कर दिए जाओगे। तीसरा विवेक आत्मज्ञान का साधन
- 46:43है। विवेक क्या है?
- 46:49बुद्धि? द्वारा दिया गया।
- 46:51सही और गलत अंदाज में उसे पता होना चाहिए।
- 46:59मनुष्य को पशुओं से अलग। पशुपात से बना बंधन में है
- 47:04पाश्विक व्रतते हैं। ज़रा मुझे उसे पता नहीं, तुम्हारी
- 47:11शिष्टाचार को। पशु नहीं मानता और।
- 47:17पाश्विक वृद्धि के लोक। अब इस शब्द को।
- 47:23ठीक से सुन लेना। ये तुम्हारे समाज में डूबती।
- 47:28है पाश्विक वृत्ति के लोक। मनुष्य के स्वभाव को।
- 47:38यह शिष्ट आचार्य को नहीं समझती। अभी मैं कल ही पढ़ रहा था कृषि।
- 47:46शहर में। एक एंगेजमेंट हुई घरवालों ने?
- 48:08लड़की के लिए लड़का सीखा। लड़की सपने से जोड़ने लगी पर आजकल
- 48:23जैसा रिवाज है, पहले ही फ़ोन दे दिए।
- 48:28जाते हैं। हमारे पंडित जी।
- 48:36थोड़ा सा कभी मजाक कर लिया करते थे, पिताजी।
- 48:44तो हमारे पास एक मित्र। आया जिसे हम जाट कहते हैं।
- 48:49जाट घरेलू व्यवहार जैसा उनका संबंध।
- 48:56हाँ जा लड़की की शादी की रखी है पक्की तो लड़के।
- 49:04को हम मोटरसाइकिल दे। के आएँगे रॉयल, फिर ठीक।
- 49:08है लेकिन शादी तो अभी। लंबी शादियाँ फिर सोती थीं।
- 49:15अभी छह महीने पढ़े अभी मोटरसाइकिल दाज देने का कारण।
- 49:25विवाह के समय पे दाज। दिया जाता है।
- 49:27ये पहले क्यों दिया है? मजाक की बात है तो मांसों।
- 49:32पे। ये तो पंडित जी तुम्हें?
- 49:39पता नहीं हम ज्यादा समझदार होते हैं, खुली अभाव में रहते हैं।
- 49:45शुद्ध मोटा खाना खाते हैं। हमारा दिमाग थोड़ा सूक्ष्म हम
- 49:50विवेकशील भट्टी हैं। तुम्हें देखने में कुछ और लगते
- 49:55हैं। लेकिन तुमसे कहीं ज्यादा विवेक।
- 49:58हम में हमें पता होता है बढ़िया ठंडी मार रहा है, लेकिन हम कुछ
- 50:02बोलते नहीं हैं। हमारी एक फ़िल्म आई थी।
- 50:07मेहर मित्रा जी हमारे घर के बिल्कुल बेक साइड पर।
- 50:12उनके परिवार यानू का घर है। तो एक फ़िल्म में रोल?
- 50:18करते हैं वो वो ही आढ़त और आढ़तियों वाली बात वो।
- 50:24जाता है सेठ के पास। सेठ कहता है।
- 50:32प्रतिपाल सिंह जी। हाँ जी, मैं एक बिंदी लादवा कि
- 50:38तुम्हारे हिसाब के आगे में एक बिंदी लगा दू और ला दो जी जी।
- 50:44क्या बात है लगा दो? एक बिंदी लगा दी जहाँ 1000 थे।
- 50:49पुराना ज़माना था ₹10,000 10,000 तो बहुत होते हैं।
- 50:56फिर छह महीने भी तो फिर गए। व्रत बाद सिंह जी हाँ जी तो।
- 51:01उसे कहो तो मैं एक। बिंदी और लगाता हूँ लगा।
- 51:05दो जी क्या फर्क? पड़ता है।
- 51:11हमारे दिल बहुत बड़े होते। हैं।
- 51:16घुसने की बिन दीवार लगाती। हो तो बड़े खुश हुआ या तो लाख हो
- 51:20गए और वह बिचारा आता? कोई जरूरत तरीके से चीज़ की रहे
- 51:27की जरूरत स्प्रे की जरूरत कोई बीज की जरूरत कोई और घर बार की जरूरत
- 51:32देखिए। आठ के आठ के जिम में सब चलता था
- 51:37यानी आठ का अपना परिवार तो होता ही होता था।
- 51:41सेठ का उसके परिवार। की जिम्मेदारी भी उसकी।
- 51:45उसके कोई जन्म जाए तो पृथ्वी। पाल के नहीं जन्मा।
- 51:50उसके जन्मा बनिए के उसके कोई मर जाए तो पृथ्वी का कोई नहीं मरा,
- 51:55वो बनिए का मरा वह सबसे पहले पहुंचेगा, कंधा देगा, सब करेगा
- 52:02तो। उसकी कई फैमिलीएं होती हैं।
- 52:04जीतने अड़ते होते हैं। ऐसा कुछ पहले चलता था, आज नहीं
- 52:08पता क्या है? फिर गया छः महीने बाद थोड़ी सी
- 52:17बेईमानी ज्यादा बढ़ गई। वो कहता है अब इतना करता हूँ, ये
- 52:21उतार नहीं सके सारे जितनी जमीनों की पुश्तेनी।
- 52:25सारी बस में अपने नाम करवा ये लोग ही तुम्हें जीने नहीं देता।
- 52:36ये लोग ही तुम्हारा दुश्मन। है।
- 52:41इकट्ठा कर सके कहाँ? ले जाओगे।
- 52:51ब्रजपाल सिंह जी एक बिंदी और ला दो।
- 52:57तो ला दो जी हमारे। दिल बहुत मड्ढे होते हैं।
- 53:01जी। अच्छा लगा।
- 53:0710,00,000 हो गए इनके 10,00,000 में तो सारे ही इसकी हड़प लूँगा
- 53:11मैं। जमीन जायदाद गर्व बचेगा।
- 53:15से प्रेरणा के लिए और न भी बचे तो मैं छोड़ दूंगी, कोई बात नहीं
- 53:20रहो। तो चैन से।
- 53:23अन्यथा मुझे मार्क होगा ऐसा भी होता है अगर।
- 53:28किसी का गर्द ने इतना दबा दिया जाए कि मरने के कगार पे आ जाए तो
- 53:33वो सन्नाटा तुम्हारे थप्पड़ भी ठोक सकता है।
- 53:36तुम्हारा गला भी दबोच सकता है। बिल्कुल ऐट दी एंड पॉइंट व्यक्ति
- 53:41में असीम शक्ति आ जाती है। इसलिए पहले मत डरना।
- 53:47आखिरी क्षणों लम्हों में डरना बाजी आखिरी लम्हों में पल्टा करते
- 53:52हैं। मैं राजनीतिज्ञों से बात करा।
- 53:57इतना मत दबाओ, गुलबर्ग की पॉलिसी पर मत चलो।
- 54:01कितना दबाव? वो भी कहता है कि बस।
- 54:06खाने को पांच किलो। अनाज।
- 54:11वो भी तुम्हारे दर पे। बैठे रहे और कोई बांटने वाला आए
- 54:16वो धन्यवाद करे। शुक्र है।
- 54:18हमें जीवन तो मिला बस सांस लेने का नाम है जिंदगी।
- 54:24इतना अगर कर दोगे तो। तुम सारी उम्र राज़ कर पाओगे।
- 54:28उस मूर्खबुद्धि को ये पता नहीं लगा।
- 54:34कि तुम सब सारे धरती। के चक्रवर्ती सिमरात हो जाओगे।
- 54:38ये आनंद का रस कहाँ से लेके आओ जोड़तें ही रह जाओ।
- 54:45रस कहाँ से लेके आओगे? ये उस मूर्ख को पता नहीं लगा गुरू
- 54:49किसने बना दिया? ऐसे ऐसे लोग भी गुरु?
- 54:56कहलाए मुझे बड़ा। जब मैं जीवन ही पढ़ रहा था।
- 55:02बड़ा दुख भी हुआ। और आश्चर्य भी हुआ।
- 55:05ऐसे लोग भी बूजे गए अगर। ऐसे लोग बूजे गए।
- 55:12तो यहाँ गधों की पूजा हो कोई बड़ी बात नहीं है।
- 55:15उल्लुओं की पूजा हो तो। बीत गया कुछ समय।
- 55:27पता लगा सेठ जी ने पैसा लिया हृतपाल सिंह जी।
- 55:38थोड़ा थोड़ा खाता ज्यादा हो। गया है।
- 55:42थोड़ी जमा वमा करवा देंगे। कुछ दो एक एकड़ सड़े नाम करवा
- 55:49देंगे। वो कहता जी कोई बात नहीं करवा
- 55:52देंगे। दो 4 दिन बीते वो।
- 55:56फिर आया फिर मैंने तुम्हारी इतनी बातें मानी, तुमने कहा जीरो लगा
- 56:02दो, मैंने कहा लगा दो जीरो लगा दूँ लगा दो और लगा दूँ लगा दो।
- 56:10अब आप भी मुझे। मैं भी कुछ अपने खाते।
- 56:17में कर्ज हूँ। तुमने तीन बार मेरे खाते।
- 56:22को छेड़ा मैं। एक बार छेड़ दू?
- 56:27बिजली का क्या करेगा? एक बिंदी घटा दूंगा।
- 56:3310,00,000 का? चलो लाख रह जाएगा, लेकिन अपन तो
- 56:401000 ही था ना एक? एक बार छेड़ना हाँ एक।
- 56:44बार छेड़ूँगा। 10,00,000 से।
- 56:50लाख रह जाएगा अपूर्ण तो फिर भी फायदा है अचार ₹1 तो ले ही लूँगा
- 56:5725। 1000 का कोई?
- 56:58बात नहीं पुराण में जाओ, कोई नहीं अच्छा सिर।
- 57:04से थोड़ा सा मुँह। एक तरफ।
- 57:09उसने मुँह एक तरफ़ पर। लिया।
- 57:10क्या बिगाड़ लिखा कुछ नहीं कर रहा।
- 57:15पृथबाल सिंह जी ने। सबसे पहले जो लिखा था क्या लिखा
- 57:19था? एक एक ओंकार कहता, बस इस एक ओंकार
- 57:24को उठा देता हूँ, मैं बाकी कह रहे जा सभी शून्य रह गए।
- 57:31खैर, अंत ये देखो ये। देना है।
- 57:38मैंने सुना है वो व्यक्ति आयुक्त को।
- 57:40मम्मी? प्रीतपाल सिंह जैसा दिमाग।
- 57:44से मिला नहीं और उसे पता नहीं। जो खुले वातावरण में बनता है वो
- 57:49ज्यादा शहना होता है। खुला।
- 57:52खाना मोटा खाना। मोटा पहनना सब तमन्नाएं मिट गई।
- 57:57सुबह से शाम तक मेहनत की खून को पसीने में डाल दिया।
- 58:03ऐसी होती है किसान की कमाई? और।
- 58:07तुम वरुहों के ऊपर बैठाकर उनको तड़पाते और तुम ये सोचते हो कि
- 58:13इनके परिणाम बड़े शो पर निकलेंगे। तुम गलत नहीं हो।
- 58:16मार्च। कोई गरीब को सता के शुभ परिणाम
- 58:28भूगा हो। ऐसा मैं सृष्टि का मल्क नहीं देख
- 58:32पाता। मेरे संविधान के अंदर ऐसा।
- 58:37कुछ नहीं होता तुम गलती मत खा जाना तुम्हारी बुद्धि निशैली है।
- 58:48तुम लाख बिंदियां लगा रहे? हो वह एक ओंकार मिटा देगा अच्छा
- 58:54मैं करता हूँ। बस इतने ही देने हैं मैं छः।
- 58:59बिंदियां रहती हूँ। अब इतने लेले आस्त्रों का तो फ़ोन
- 59:17विश्व में से भूमिका बनती। है यहाँ।
- 59:20से शुरू होगी तुम्हारी वो। कवायद?
- 59:23फर्स्ट स्टेप ऑफ लिबरेशन अपने आप में रहना और दूसरा स्वयं में
- 59:32स्थिति ही। शक्ति।
- 59:34और आस्थाओं के सैलाबों में जाना सीखो या कॉमन सिद्धांत है तो?
- 59:41तुम्हें बचाव के लिए दिया। है सर, एक सहायक।
- 59:50और तीसरा है। विवेक आत्मज्ञान का साधन है, साधन
- 59:56है, सिद्धि नहीं है, तुम गंतव्य तक पहुंचते नहीं हो।
- 1:00:01इट्स ओनली दी पाथ मंजिल नहीं है, रस्ता है, ये साधन है और साधन
- 1:00:10शादी में मिल जाए, ये है तुम्हारा लक्ष्य तुम साधनों को साधनों में
- 1:00:16ही उलझाये रखते हो, शादी तक पहुंचने नहीं देते।
- 1:00:22यही तुम्हारा दुर्भाग्य है विवेक। ये बुद्धि बड़ी अद्वोग है बुद्धि
- 1:00:35को इस अद्भुत शक्ति। से युक्त करो।
- 1:00:40और आत्मज्ञान तक पहुंचा विवेक आत्मज्ञान का साधन।
- 1:00:45है साधन का स्टेप विवेक का। यह तीसरी रिपोर्ट लिया है।
- 1:00:54और तुम अपनी आत्म तक पहुंचाओगे। तुम पहचान लोगे।
- 1:01:00शिक्षा आनंद रहेगा। पदार्थों में है जब तुम स्वयं ही
- 1:01:05है इन दोनों ही चीजों का फैसला आज फैसला हो जाएगा।
- 1:01:15तुम में स्वय में ही है ये। रस जब बाहरी पदार्थों के भीतर है
- 1:01:20ये रस बस ये फैसला हो जाना यह विवेक कहलाता है।
- 1:01:27बुद्धि यकसा हो जाए। एक गन्ना रहने पर पहुँच जाए।
- 1:01:33पशु को बुद्धि नहीं दी। मनुष्यों का वृद्धि समझने की
- 1:01:39शक्ति तुम सिंषण में रहो या सिंषण से मुक्त हो जाओ तुम ही हो
- 1:01:44जिम्मेदार इसलिए भगवान कृष्ण का सिंश्य आत्मा अगर वनिष्ठ होना हो
- 1:01:50तो पशुओं की तरह का। अगर जीतना है तो मैं।
- 1:01:57इन्हें मार चुका हूँ फिर तू उसका शरे ही ले ले, अपना धनुष फेंक
- 1:02:02दिया उठा ले और इनका वध कर जाए। तुम ठहरा था वो लड़की के लिए।
- 1:02:10लड़का देखा। लड़का दिखा लड़की की माँ को जच
- 1:02:16गया अरे भाई ऐसा न करो यह सच तह कहानी मैंने अखबार में पढ़ी।
- 1:02:28और मोबाइल देख दिया मोटरसाइकिल देने वाले से।
- 1:02:33पूछा तो मोटरसाइकिल पहले क्यों थी?
- 1:02:37वो बोली। की अगर मरना है ना?
- 1:02:41तो छः महीने में मर जाएगा। क्योंकि तेज चलाएगा।
- 1:02:47बाद में क्यों मेरी बिटिया विधवा हो पहले ही हो जाए बस इस।
- 1:02:53मोटरसाइकिल की। कीमत पर वह मरे तो मरे अगर बच गया
- 1:02:59तो वह बुद्धिमान, फिर वो विवेकी पुरुष अगर?
- 1:03:06मर गए इसलिए हम पहले। मोटरसाइकिल देख के आते हैं।
- 1:03:11मी जा सीख दौड़ा। बच गया।
- 1:03:14तो उस दिन आ जाना। मर गया तो वह।
- 1:03:19भली तेरे दिल नहीं थे तो विभास। ही पहले मोबाइल दे।
- 1:03:27दिया। मोबाइल पर बेटी और वो जो मरता।
- 1:03:34लेकिन बात तो खुश है, शर्म वाली बात है थोड़ा सा थोड़ा सा
- 1:03:43राजस्थानी। उड़ रही ढकना भाई मुझे भी।
- 1:03:46लगता है मुझे भी। राजस्थानी उड़ रही, ढक लेनी चाहिए
- 1:03:52बात ही कोशिश। लेकिन कह देता हूँ कहनी पड़ेगी।
- 1:04:01मैं ना? कहूंगा और कौन कहेगा?
- 1:04:03पर कुछ दिनों बाद चला पता कि लड़की की माँ होने वाले जमाता के
- 1:04:10साथ हुआ तू फिर? मोबाइल समेत पर कुछ।
- 1:04:17कहते हैं जेवरात? सोना भी लेकिन अच्छा।
- 1:04:22अभी तुम्हारी खुद की हवस। ही नहीं खत मिली।
- 1:04:26तुम बच्चों की खवाश को। क्या दूर करोगे?
- 1:04:31बच्चों की ख्वाब को दूर। करने के साधन करने वालों थोड़ा
- 1:04:35भीतर जाती मारो तुम्हारी हवसें पूरी हो गईं अगर।
- 1:04:40जमाताओं के साथ ही तुमने। फर्र बना लिए।
- 1:04:45इस शर्म की बात। आज हम नहीं कह सकते समाज बना लिए।
- 1:04:53अगर ऐसे ही फुर्र होना। है, नया तरीका है समाज को बदला गई
- 1:05:03और ये सत्य घटना है आप खंगाल। सकते हो कहीं ना?
- 1:05:08कहीं आपको मिल जाएगा। मेरे पास कोई प्रेमी ऐसी ट्रेसेडी
- 1:05:18वाली बातें? भिजक करते हैं।
- 1:05:22उन्हें भी अच्छा लगता है। बाबा सुनेंगे तो मज़ा आएगा।
- 1:05:30इस मज़े क्यों मारा है सारा? संसार।
- 1:05:34ये मज़ा ही तो नहीं? आता ये कसी से।
- 1:05:39मेरे पास आते है तो वो कहते मैं कहा तो भाई जहाँ आएगी वहीं आएगी।
- 1:05:51लहसुन के लिए तो सिर्फ। अथेली परखना होता है मुझे तो
- 1:06:00प्रेम मिलन की चा। जय तो।
- 1:06:12प्रेम मिलन की ओर जा शीश तलीधर शीश तलीधर।
- 1:06:27शीश तलीधर शीश तलीधर घर मेरे। आं?
- 1:06:40शीश तलीधर। घर मेरे आं?
- 1:06:45कर मेरे हाँ जय तो प्रेम मेरा फिर लज्जती चाहिए तो सीस।
- 1:07:03को। ऐसे बात फिर लहज़त आएगी फिर
- 1:07:11लहज़त। ही लहज़त आएगी और कुछ भी नहीं
- 1:07:13होगा। दुःख का नाम, अनशन भी नहीं होगा
- 1:07:16दूर तलक। लोधियां श्री आपका।
- 1:07:22आखिरी। अस्तित्व का आनंद भोगना समा दिया
- 1:07:26है। इसी की बात का तुम?
- 1:07:35एक्स्ट्रीम का आनंद। उठाते हो अभी तो तुमने आनंद का एक
- 1:07:40ज़रा भी नहीं किया, दुर्भाग्य है। तुम खुद हो, खुद हो और बेखुदी का
- 1:07:53आलम ऐसा के खुदी। में जा नहीं पाते।
- 1:07:58कमाल है ना? अस्तित्व का आनंद भोगना।
- 1:08:04ही समाधि है। सब समाधान हो जाएंगे।
- 1:08:06तुम अस्तित्व में प्रवेश कर जाओ, आनंद इतना घना है।
- 1:08:12कि तुमसे अंगुली भी न परकाएं। बनेंगे।
- 1:08:17तुम खो जाओगे। दुनिया भरी होगी।
- 1:08:24लेकिन तुम तुम हो गई तुम न जाने किसे जहाँ भी खोबई तुम न जाने।
- 1:08:41सोरे जब हम खो गए भरी दुनिया में तनह हो गए तुम न जाने।
- 1:09:01देश से जहाँ में खो बस खो जाओ। अस्तित्व का आनंद।
- 1:09:12भोगना ही समाधी है, सब समधान हो जाएंगे।
- 1:09:16मुझे बहुत से आते हैं बाबा एक प्रश्न कृपया करें कैसे करें?
- 1:09:20मैंने कहता हूँ जब मैं बोलता हूँ उससे आनंद नहीं मिलता क्या
- 1:09:27तुम्हारे प्रश्न का समाधान होने पर ही तो मुझे आनंद मिलेगा, मैं
- 1:09:31चाहता हूँ तुम्हारे सभी प्रश्नों का समाधान मिल जाए।
- 1:09:35तुम चाहते हो कि तुम्हारे एक प्रश्न का समाधान मिले और मैं
- 1:09:38जानता हूँ। तुम्हारे एक प्रश्न के समाधान से
- 1:09:42और लाख प्रश्न उठेंगे, फिर भी तुम बाजित होते हो?
- 1:09:47मेरे प्रश्न का जवाब हमने किया बाबा।
- 1:09:54तो बिटिया। एक प्रश्न का जवाब मत ढूंढो।
- 1:10:00ये देखो। मैं जो बोलता हूँ।
- 1:10:02तुम्हारे भीतर उठकर। जाकर प्रवेश कर के तुम्हें।
- 1:10:07अनंदित कर पाता है या नहीं? क्या तलब वो उठती है सुबह?
- 1:10:14की फिर फिर वही आनंद। फिर फिर वही आनंद।
- 1:10:18क्या घर बैठे नहीं पी सकते? तो एक बार यहाँ आ।
- 1:10:23गया। मुझे पता है आने का दिल तो बहुत
- 1:10:26करीब शुभ। मार्ग।
- 1:10:30बाबा के पास एक घड़ी आंधी घड़ी बैठ जाए लेकिन।
- 1:10:37वो उधार है भटिया। वो मेरा है।
- 1:10:43मेरे भीतर से आया तो मुझसे फॉर्मूलेशन पूछो, मैं रोज़ समझाता
- 1:10:48हूँ और। खुद ही उस आनंद में।
- 1:10:51समाहित हो जाओ तुम हो तो उसका सागर तरस रहे हो हो गूंद को।
- 1:10:57कितने भाग्य जीन और तुम कितने भाग्य।
- 1:11:07अस्तित्व का आनंद भोगना ही। समाधि है पर तुम अस्तित्व का आनंद
- 1:11:11भोग। समग्र हो जाओगे।
- 1:11:19बीज को देख कर तुम नहीं। कह सकते कि यह इतना बड़ा वट वृक्ष
- 1:11:23यह इतना बड़ा रसीले फलों से युक्त आम हो सकता है।
- 1:11:30बहुत छोटा बीज है। फलू से लदा और।
- 1:11:37वृक्ष बड़ा महान है विराट। वहाँ से तुम।
- 1:11:45ये सोच ना सकोगे कि यही बीज वृक्ष हो जाएगा हाँ हाँ बिलकुल तुम
- 1:11:50वृक्ष हो जाओगे रसीले आम लगेंगे। मेरे से तुम सबक नहीं।
- 1:12:01सीख सकते हो जरूर ही मेरे पास भागना है रुक जाओ तुम एक कोने में
- 1:12:16बैठ के नहीं जाते। वाहे इस रस को पियो अस्तित्व।
- 1:12:21में समा जाओ। और उसका रस।
- 1:12:24भोगो जो तुमको? देगा।
- 1:12:28अस्तित्व का आनंद पीना। ही समाधी है बस कोई प्रश्न उठेगा
- 1:12:32ये समाधी का लक्षण। फिर कोई प्रश्न नहीं होता, संत को
- 1:12:36भी प्रश्न नहीं होता। संत प्रश्न करता है नई?
- 1:12:43टेक्नोलॉजीज जो पैदा हो उसको ही नहीं।
- 1:12:46पता व्हाट्सएप चलाना। कैसे वो नहीं पता मीर कैसे चलना
- 1:12:50नहीं यह तो तुमने खोजा है। दीज़ अरे इन मेंशन्स वो तुमसे
- 1:12:57पूछा, लेकिन सत्य में तुम हो क्या?
- 1:13:04बस जो ये जान गया। वो भाग्यशाली हो गया इसलिए
- 1:13:09भाग्यवान भगवान को भाग्यवान से? भाग्यवान से भगा दिया जब भाग्यवान
- 1:13:16हो गया। जब फिट फुल हो गया।
- 1:13:21उसको हमने भगवान उसकी किस्मत उसे खुद तक ले गई।
- 1:13:34और वह खुद को भोगना शुरू। कर दिए।
- 1:13:36अभी तक बदारसों को भोग रहे थे अभी तक।
- 1:13:40बाहर की चीजों को भोग। रहे थे।
- 1:13:42अभी तक इंद्रियों के माध्यम से बाहर की चीजों को भोग रहे थे, फिर
- 1:13:46उसने स्वयं में आकर स्वयं को भोगना शुरू कर दिया।
- 1:13:49यही अस्तित्व का आनंद होता है। बेचारे मत बने रहो।
- 1:13:53वक्त बीता जाता। है।
- 1:13:58फिर ये मौका आए। न आए फिर ये सरगम के तार सदह न
- 1:14:03सदह फिर उस विराट की अंगुलियां फिर न फिरे फिर साज की सरगम सदे
- 1:14:10सदे न सदे कौन जाने। कितना वक्त बिछाई और इतनी देर तक
- 1:14:16तुम उदास रह पाओगे? इतनी देर तक तुम तनहार।
- 1:14:21रह पाओगे? इतनी देर तक तुम व्याधियों।
- 1:14:26से और कष्टों से ग्रस्त रह पाओगे का?
- 1:14:28इतना वक्त तुम गुजारना चाहती हो? तो फिर तुम्हारी नोट है अन्यथा
- 1:14:34मंजर दौड़ नहीं। सच पूछो तो तुम्हे मंजिल है ज़रा
- 1:14:37उतरो, तुम बस इन मान्यताओं को तोड़ दो जो तुमने व्यर्थ की
- 1:14:42बनाती। सत्य तक पहुंचने के लिए।
- 1:14:46सत्य के नाम पर बनाई हुई मान्यताओं को तोड़ना होता है।
- 1:14:50ये तुमने आज बना ली या बन वाली कुछ?
- 1:14:55लोगों ने अपने स्वार्थ सिद्धि? के निहित यह बना दी, लेकिन इसमें
- 1:15:03उनका कुछ स्वास्थ्य है। तुम उनके पीछे में।
- 1:15:11मैं तुम्हें तुम्हारे भीतर। जाने को कहता हूँ।
- 1:15:19और तुम कितने अभागे रहोगे? अगर मैं बीत जाऊंगा और तुम कहीं
- 1:15:24पहुंचे ना पक्ष। राधे राधे शाम मिला दे राधे शाम
- 1:15:44मिला दे गोविंदा। गोपाल हर राध रात शाम मिला दे
- 1:15:57गोविंदा गोपाल हर। मेरी नैया।
- 1:16:06पार लगा दे गोविंदा गोपाल हरे राधे राधे शाम मिला दे गोविंदा
- 1:16:22गोपाल हरे। राधे राधे शाम मिला दे गोविंदा गो
- 1:16:30काल हर। धन्यवाद।