Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Sep 25 - जीते जी सचखंड तक पहुँचने की यात्रा! जो भी मेरे पास आएगा झोली भरके जायेगा! जपुजी साहिब 36,37.
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- 0:02रमेश कुमार, आरएस जपजी साहब का एक शब्द बाबा न ओह मरै न ठद्य चाँद
- 0:23जिनके राम। बसै मनमर हाँ बिलकुल ये जपजी साहब
- 0:38की सैंतीसवीं थोड़ी है, अगर मैं यहीं से विस्तार करूँगा और थोड़ी
- 0:49सी। भूमिका बांधनी पड़ेगी।
- 0:57बाबा के हिसाब से यह एक यात्रा है।
- 1:02यात्रा क्या है? सच्च खंड तक पहुंचने की यात्रा
- 1:06है। जीते जी मरकर।
- 1:13मरना होता है लेकिन जीते जी मरना होता है मर कर गुरु आएगा, ऊँगली
- 1:20पकड़ेगा, ले जायेगा, ऐसा कुछ नहीं है, ये भ्रम है तो ये हम शुरू
- 1:29करते है। ज्ञान खंड में ज्ञान प्रचंड यहाँ
- 1:33से शुरू करते हैं, बाबा कहते सबसे पहले तुम्हें पता चलेगा ज्ञान खंड
- 1:44में ज्ञान प्रचंड। तिथ्य नाद विनोद कोढ़ आनंद ज्ञान
- 2:01से सुनिएगा। हम पूरी यात्रा को थोड़े से
- 2:05अल्पबाजों में तय कर लेंगे हम चले हैं जीते जी सच कांड के।
- 2:14त्याग दो जयभ्रम के कोई गुरु आएगा इसे जखण्ड में ले जाने के लिए
- 2:18मरने के बाद कोई नहीं आएगा। तो आइए हम जीते जी चलते हैं उन
- 2:26पकड़ियों पे उन राहों पे जो परमात्मा तक जाती है।
- 2:32जीसको बाबा नानक का सच्च खंड कहते हैं, सत्य का वास बाबा इसको कुछ
- 2:41खंडों में विभक्त कर लेते हैं। पहला कंड है ज्ञान खंड।
- 2:52तेरा सोचिएगा जिसका तुम नाम ले रहे हो नाम कोई फिर ले रहे हो
- 3:01क्या तुमने उसे कभी देखा है? तुम्हें मालूम ना हो कि कोई जज
- 3:21होता है तो तुम जज की बुराइ करोगे तुम्हें मालूम ही ना हो कि कोई
- 3:31सुप्रीम कोर्ट होती, आई कोर्ट होती, लोअर कोर्ट होती।
- 3:34डिस्ट्रिक्ट कोर्ट होती तो क्या तुम जज बनने के लिए कोई मेहनत
- 3:39करो, पढ़ाई करो यहाँ तो बड़ी वडंबना है जो तुमको पता नहीं है।
- 3:54कि तुम कहाँ जा रहे हो वहाँ तक जाने का रास्ता तुम्हें गुरु देता
- 4:04है मूर्खों की दुनिया। चलने वाले मूड जाना कहाँ पता नहीं
- 4:22तुम्हारे संग कौन है संग तो मरते वक्त गुरुक आएगा।
- 4:32साथ ही ना कोई मंजिल दिया है ना कोई महफिल चला मुझे।
- 4:50ले के है दिल अकेले कहा साथी ना कोई तुम्हारे संग कोई नहीं चलेगा।
- 5:13ज्ञान खंड में ज्ञान प्रचंड तथ्य नाद विनोद कोण आनंद करोड़ों बाजे
- 5:25गाजे, संगीत की दुनिया स्वर की फिल्कारिया।
- 5:37सुगंधित हवाएँ फिज़ाएं यहाँ से शुरू होता है यह सफर तृथ नाद पहले
- 5:50नाद शुरू होता है। अभी तो तुम्हें नाद ही शुरू।
- 6:04और जैसे ही नाज शुरू होता है तुम हतप्रभ रह जाते हो।
- 6:10ये कहाँ से हो रही है? आवाज़ बड़ी प्यारी, मधुर है मिठास
- 6:15ही। देखिए अध्यात्म के रहस्य के रस्ते
- 6:29को काटने वाले लोग जगह जगह बैठे हैं जो तुम्हें छल लेंगे और कहानी
- 6:36मैं अक्सर सुनाया करता हूँ कि टोकरी में एक मासूम बकरी का बच्चा
- 6:42मासूम। लैला ले के चला और ठगों ने रास्ते
- 6:49में आप उसमें राय कर ली बड़ा प्यारा मासूम लैला है ये सिख छीन
- 7:01ने? तो छिनोग कैसे?
- 7:03मीडिया का इस्तेमाल करके तो चार पांच ही जने थोड़ी थोड़ी दूर पे
- 7:12खड़े हो गए। मोड़ पर दूर का रास्ता था, गांव
- 7:17में जाना था टोकरी के भद्र उसने लैला रखा था।
- 7:30पहले व्यक्ति ने कहा कहाँ जा रहा है?
- 7:36मैं तो बाजार से खरीद के लाया हूँ, ये मासूम ले रहा है अरे ये
- 7:43तो कुत्ते का बच्चा है, उसने कोई ध्यान नहीं दिया।
- 7:47आगे चला दूसरा कड़क। कहाँ चले?
- 7:55अरे गांव चला कैसे आए थे ये छोटा सा लैला खरीदने ये तो कुत्ते का
- 8:05बचा है, थोड़ा शक हो गया। मीडिया ऐसे बर्बाद करता है।
- 8:10तुम्हें यही ढंग है मीडिया का एक ही बात को बहुत से चैनल प्रकाशित
- 8:22करने लग जाए तो आपको लगेगा यह सत्य है जो बोल रहे हैं इतने सारे
- 8:29लोग बोल रहे हैं। और यह है बेचारा अकेला टोकरी के
- 8:33भीतर मेमने को लेके चल रहा है। तीसरी जगह चौथी जगह पांच में जगह
- 8:41गया हो के लगा रही तुझे कुत्ते का बच्चा कहाँ से ले आया?
- 8:47नहीं तो वैसे भी नस्ल भी अच्छी नहीं है।
- 8:49कहाँ से लेके आया ये? ये तो काट लेगा, रैपिज का
- 8:53इन्जेक्शन निकालना होगा। तो उस आदमी को पक्का हो गया कि यह
- 9:02तो कुत्ता खरीद रहा है। खूब खाते गए पैसे तो थोड़ी सी दूर
- 9:08जाकर ठोकरे को। फेंक दिया।
- 9:12उसने भाग दिया। ऐसे ही तुम्हारे गुरु थोड़ी थोड़ी
- 9:20दूर पर डेरी जमा कर बैठे हैं और एक ही बातें कहते हैं।
- 9:28और तुम इतनी बार बातों को सुनकर समझ लेते हो कि ये सत्य बोल रहे
- 9:33हैं। यद्यपि एक ही गुरु हो के हिस्से
- 9:37हैं ज्ञान खंड में ज्ञान प्रचंड
- 9:50द्वितीय नाद विनोद, कोढ़ आनंद अब देखो यहाँ से शुरू करना है।
- 9:57तुम्हारे भीतर अनाथनाथ का गुंजार हो गया।
- 10:01लोग कहेंगे अनाथ तो होता ही है ये तो टाइम कैसे होता है?
- 10:08इनके कोई प्रवाह करना तुम प्रवाह करना आनंद के।
- 10:15कितना सुरीला है। मधुबन में नानी का नाच रहे मधुबन
- 10:25में राधे का नाम। गिरधर की मुरली आबाजे गिरधर की
- 10:40मुरली आबाजे आज कल तो मुरली भी नकली नकली बजानी शुरू हो गयी।
- 10:49मुरली में कोई स्वाद नहीं होता। मुरली में कोई धार नहीं होती, कोई
- 10:54सुरों का संगम नहीं होता, कोई साज नहीं बताया होता।
- 10:56मुरली शब्दों की मुरली है सब जाली हो गया है।
- 11:04लिस्टिक के फूल बन गए हैं ओरिजिनल फूलों की जगह।
- 11:11यहाँ तक कि ज्ञानी भी नकली हो गई हैं।
- 11:13बंदे भी नकली हो गए हैं। सुनने वाली भी नकली हैं तो बाबा
- 11:18कहते हैं कुछ शरूर आएगा तो यात्रा शुरू होगी।
- 11:27ठंडी हवाएं तुम्हें लगेंगी तन स्पर्श करेंगी, मज़ा आएगा तो तुम
- 11:34देखोगे कहाँ से आ रही हो ये तो हिमालय से टकरा के आ रही हैं तो
- 11:40चलो हिमालय की तरफ चलो। एक उदगम सतल से, जहाँ वह परवर्ती
- 11:50कार बैठा है, वहाँ से टकराकर ठंडी हवाएं आती हैं और उसमें नहा जाती
- 11:59हैं। तुम शीतला हो जाते हो तो यहाँ से
- 12:06शुरू करना। अगर तुम्हें आनंद नाँद शुरू हो
- 12:10गया है तो तुम भाग्यशाली प्रभु ने कृपा की, प्रभु ने आवाज दी, प्रभु
- 12:19ने पुकार और दीनबंधु ने कहा आ जाओ मेरे गले से लग जाओ।
- 12:26आगोश में बैठ जाओ, मेरे आँचल में छुप जाओ ज्ञान खंड में ज्ञान
- 12:37प्रचंड तीर्थ नाद विनोद कोण आनंद। वह नाद का इतना करोड़ों आनन्दों
- 12:46के बराबर आनंद होता है। जैसे साजे बाजे शहनाइयां गूंज
- 12:53पड़ी हैं, एक दम यक साप लाखों लाखों करोड़ों करोड़ों नाथ विनोद
- 13:05कूड आनंद। इतना आनंद शुरू होगा थोड़े से
- 13:09धीरे उतरने शुरू करो भीतर तो बाबत में एक लक्षण बताते हैं।
- 13:24जैसे ही आनंद आनंद शुरू हो जाए। तुम्हारे मित्रों को बंसरी सी
- 13:30बजनी शुरू हो जाएगी और राधा की पांव की झंकार, मीरा की झांजरें
- 13:41और निधि मन में राधा नची ऐसा लगेगा कि चारों ओर सुगंधित हवाएं।
- 13:52लगेगा जैसे वो कन्हैया अपने लम्हों पे होंठों पे बंसरी रखकर
- 14:03मदर ध्वनि निकाल रहा है। गिरधर की मुरलियाँ आज मधुबन में
- 14:22राधी का नाचेर। ज्ञान खंड में ज्ञान प्रचंड तिथ्य
- 14:32नाद विनोद कोर आनंद यहाँ से शुरू करना देखिए आनंद आएगा तुम क्यों
- 14:40रसीले पदार्थों की तरफ भागते हो। क्यों तुम अंतरंग क्षणों की तरफ
- 14:44भागते हो? क्यों तुम संभोग की तरफ भागते हो?
- 14:47वहाँ आनंद आता रह सकता है रस दूर का एकदृश्य तुम्हें रखा जाता है
- 14:58कि कहीं इससे भी बड़ा आनंद है। अंतरण कक्षणों में संसर्ग के वक्त
- 15:08तुम जो देखते हो वो आनंद का दर्शन होता है।
- 15:12दूर पड़े हुए आनंद का दर्शन वहाँ जाना है।
- 15:16हमने वहाँ तक का सफर तय करना है। सरमखंड की वाणी रूप पहले ज्ञान
- 15:30होगा कि वह है आप 35 साल से बैठें, 50 साल से बैठें।
- 15:38मेरी बात सुन लेना फाउंडेशन ही नहीं फाउंडेशन क्या होती है कि वह
- 15:42है। तुमने जान लिया तुमने देख लिया,
- 15:47तुमने अनुभव कर लिया कि वह है तुम 1000 साल भी बैठे रहो तो कुछ ना
- 15:59मिलेगा। मंजिल चाहे 1000 हो लेकिन उन 1000
- 16:08मंजिलें की कोई फाउंडेशन ना हो, कोई नींव ना हो उतनी ही गहरी।
- 16:13तो तुम याद रखना कोई भी हवा का झोंका, कोई भी 8000 किलोमीटर का
- 16:20तूफान उन्हें धराशायी कर देगा या वो स्वयं के भार से ही गिर जाएगी
- 16:27मंजिल। श्रम खंड की वाणी पहले तो तुम्हें
- 16:37देखिए, मैं बहुत ही ज़ोर से कर रहा हूँ।
- 16:47अगर तुम्हें विश्वास नहीं हुआ, कभी दीक्षा लेने के बाद नहीं कह
- 16:51देना कि बाबा अंगूठा लगाने से अपने भीतर पहुँच जाऊंगा, ये बात
- 16:55कुछ उतरती नहीं, फिर मत आना मेरे पास और फिर आने का कोई फायदा भी
- 17:05तो नहीं है। यह श्रद्धा बीच में बनी रही।
- 17:14श्रद्धा की ना आवश्यक है सफर करोगी?
- 17:20कैसे इस समुद्र की लहरों? के ऊपर बिना मजबूत नाव के लहरें
- 17:33तुम्हें डुबोतेगी मजबूत नाव चाहिए ताकि समुद्र में उठी हुई लहरें
- 17:42तूफान। उस नाभ का कुछ न बगाड़ सके और नाभ
- 17:46क्या है? श्रद्धा विश्वास तोपनों या भयाम
- 17:51भी न कुछ श्रद्धा तुम्हारी है नहीं खोपड़ी लिए फिरते वो पता
- 18:02नहीं कहाँ कहाँ के क्या क्या कीचड़ भरा हुआ है दिमाग में।
- 18:08ये तो शुक्र है कि तुमने तुम्हारे अचेतन की बात निकल आई तो मैंने
- 18:14ठहरा दिया कि बस करो यहीं बस करो, पहले फाउंडेशन खो दो, फाउंडेशन भी
- 18:27इतनी गहरी खो दो बड़ा दूर। बहुत दूर जाना है क्यों?
- 18:42वैसे तो परमात्मा तुम्हारे बिल्कुल पास लेकिन तुमने दूर
- 18:46क्यों जाना है? क्योंकि तुम बहुत दूर निकल गए हो,
- 18:51घर से इतनी दूर निकल गए हो, घर तो तुम्हारा है।
- 18:56लेकिन तुम दूर निकल गए हो, बहकते बहकते तुम वहाँ पहुँच गए हो जहाँ
- 19:05से आना करीब करीब नामुमकिन है लेकिन ध्यान रखना नामुमकिन कुछ
- 19:10नहीं होता। अगर गुरु ठीक मिल जाए तो?
- 19:15अगर गुरु जाँचसारा मिल जाए तो फिर कहीं नहीं पहुंचेगा।
- 19:18फिर तो हम पहले से ही भरमाए हुए हैं।
- 19:28मैं ज़ोर दे रहा हूँ नींव खोदने पर अभी 52 का भी।
- 19:40बहुत दूर जाना और बहुत ऊंची जाना। दशम द्वार जाना सचखंठ जाना तो
- 19:48उसके लिए नीम बहुत गहरी खोदनी होगी।
- 19:50और नीम क्या है श्रद्धा? और ध्यान रखना अगर तुम्हे श्रद्धा
- 20:00हो ही नहीं अभी तो श्रद्धा का एक ही मार्ग हो सकता है।
- 20:09या तो तुम्हारे जीवन में कुछ ऐसा घट जाए जो तुम में श्रद्धा पैदा
- 20:13कर जाए या भड़ों की आँखों में स्वरूप लगे।
- 20:20गुरु का आचरण तुम्हें ऐसा लगे कि संसार के पार कुछ दिख जाए जब तुम
- 20:32गुरु की आँखों में झांक हो तो तुम्हें संसार से पार की वो
- 20:37दुनिया नजर आए। ये दो ही रास्ते यहाँ से नीम खुद
- 20:48जाएंगे और फिर जब नीम खुद गई तो तुम प्रयास करना।
- 20:57ज्ञान खंड में ज्ञान प्रचंड तथ्य नाद, विनोद, कोर आनंद, आनंद, नाद
- 21:02जो शुरू होगा उसमें बड़ा प्रेम होगा, बड़ा आनंद होगा उसके दागे
- 21:08को पकड़ लेना और उसके संग संग चलो जनके नाद शुरू हो गया है।
- 21:18देखो कितना प्यारा नाच है जिंगुर की आवाज कभी कभी बदल जाती है, कभी
- 21:30कभी एक पल के लिए शंक उनका। कभी बंसरी की मधुर धुन कभी कभी
- 21:41बदल जाती है, लेकिन जंगुर की आवाज़ यह अहंकार का ही दूर से
- 21:47सुना हुआ भ्रम है। सारे विषयों को यही आवाज कहीं चले
- 22:00जाओ, ब्लैक होल चले जाओ सूरज में चले जाओ।
- 22:05अभी वैज्ञानिक ने सूरज के भीतर जो ध्वनि हो रही है।
- 22:11उसकी आवाज को रिकॉर्ड किया है। जस्ट लाइक ओंकार ओंकार जैसी देखिए
- 22:30मैं आगे चलूँ। इससे पहले यहाँ ज़ोर देना ज्यादा
- 22:34जरूरी है। क्योंकि अगर ये नहीं हुआ तो उठ
- 22:39जाओ तुम्हें पहनती हुए कि 35,000 हुए कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 22:44तुम जैसे बैठे थे वैसे ही हो जैसे कोई व्यक्ति रात को सोया सुबह उठ
- 22:48जाए, वह सोया है ही नहीं। बस उसका शरीर दुई सिद्धि की, उसने
- 22:56सिर्फ रीढ़ की हड्डी उसने सिद्धि की और कुछ नहीं किया।
- 23:01नींद तो नहीं आई उस मुकाम पे तो नहीं पहुंचा जहाँ सुसुक्ति तो मैं
- 23:07उन खेतों खलिहनों में ले जाती हैं आनंद के बागबगीचों में ले जाती
- 23:12है। जहाँ दो सितारों का।
- 23:21हजूर, तुमको सितारों में ले चलो। दिल झुम।
- 23:38जाए। ऐसी।
- 23:41बहारों में मैं चलूँ। सबसे पहले श्रद्धा, श्रद्धा,
- 24:00श्रद्धा फिर आना मेरे पास अगर तुम्हे श्रद्धा हो या नेता मत आना
- 24:11इसलिए मैं थोड़े से लोग चुप। और तुम ढूंढ़ते हो वो ठिकाना जहाँ
- 24:20करोड़ों, अरबों, अरबों लोग बैठे हैं यानी पागलों की जमात श्रद्धा
- 24:33कभी कभी। किसी एकांत लम्हे में, फुर्सत के
- 24:39लम्हे में वो प्रेम उतरा करता है आपके भीतर समूह में कभी नहीं उतरा
- 24:46करते बात सुन लेना। तुम जब तक समूह में बैठे रहोगे,
- 24:53एक दूसरे की रेंजें तुम्हें प्रभावित करती रहेंगी और तुम
- 24:58डिस्टर्ब रहोगे। प्रत्येक की किरणें भीतर से अलग
- 25:04आती हैं और तुम्हें वो किरणें ढहाई नहीं पड़ती।
- 25:08वो तुम्हें छिड़ेंगे। तुम कभी देखना गाड़ी में जा रहे
- 25:14कहीं जा रहे तो तुम्हें तकलीफ होती है।
- 25:19तुम्हें पता भी नहीं होता कि साथ में बैठा हुआ व्यक्ति कुछ ऐसे
- 25:23तरंगें छोड़ रहा है जो तुम्हें माफी की नहीं, वो पेन्सिलिन के
- 25:26इन्जेक्शन की माफी करें। तुम्हें रिएक्शन करते हैं तुम्हें
- 25:31अचर होती है तुम हिरते झुलते हो पता नहीं ये क्यों आज इतनी बेचैनी
- 25:35सी क्यों है? लेकिन तुम पाओगे जैसे ही तुम वहाँ
- 25:44से उठ गए या वो वहाँ से उठ गया तो तुम शांत हो जाओ।
- 25:52आगे चले फिर सुन लो फिर सुन लो फिर सुनो परमात्मा तक जाना चाहते
- 26:06हो। और सबसे पहले तुम्हें यकीन होना
- 26:15चाहिए तो वो है फिर अगर तुम्हें प्रेम भी हो जाए, वो भी तुम्हें
- 26:25दूर का रास्ता दिखा देगा। प्रेम भी तुम्हें दूर का।
- 26:32दूर से बैठा हुआ प्रेमात्मा दिख जाता है प्रेम इसलिए प्रेम को
- 26:38प्रभु का दरवाजा पढ़ा गया है, लेकिन यकीन होना चाहिए कि कुछ है
- 26:44इस संसार से परे कुछ है, इस मन से पार कुछ है।
- 26:52समथिंग इस बियॉन्ड माइंड? तो अगर तुम्हें यकीन ना हो तो फिर
- 27:01मत चलना संसार में दुनियादारी चलना दो।
- 27:05पी से ज्यादा कमा लोगे पर बच्चों के काम आय।
- 27:11दो नामक पे पांव मत रखना देखिए मेरी बात ध्यान से सुन मत आना,
- 27:20किसी और के पास चले जाना और मेरे पास तो मत आना क्योंकि मैं ये बात
- 27:25नहीं कमाना चाहता। फिर तुम्हें यकीन ही नहीं है और
- 27:35तुम यहाँ मेरे पास शिक्षा लेने आवे और फिर वर्षों बाद मुझे कहते
- 27:42हो कि बाबा ये अंगूठा लगाने से हम भीतर चले जाएंगे।
- 27:47यह बात कुछ गले से उतरती नहीं। मैंने कहो, यह तो जिंदगी में
- 27:57भयानक वृद्धि हो गई। कई बार ऐसा होता है मैं नहीं
- 28:10भुलाता बाबा भी आवाज नहीं देते। हमारे यहाँ पर कारिंदे जो होते
- 28:17हैं वो बुला लेते हैं कि ठीक है तुम भी आ जाओ।
- 28:21ऐसे ही लोग होते हैं जिन्होंने नींव नहीं होती होती।
- 28:28अपनी जिंदगी की श्रद्धा की विश्वास की कोई पता नहीं परमात्मा
- 28:33है कि नहीं है। और परमात्मा की राहों पर गुजरना
- 28:39शुरू कर देते हैं। नहीं कुछ नहीं होगा और आगे जो
- 28:45बताने वाला है वह तुम्हें शब्द दे देता है, अक्षर दे देता है नाम जो
- 28:50हो। और हवाला देता है हाँ।
- 28:58मुझको जी ऐसे है ऐसे ध्रुव, पहला। जब को हर जय से नाम जब तुम कहते
- 29:22हो ठीक है बात तो ठीक है, अर्थ यहाँ भी नहीं समझाया तुम्हे।
- 29:30ध्रुव, प्रहलाद, जप्यो, हरि जैसे प्रहलाद ने खम्भे को हाथ नहीं
- 29:34लगाया और भगवान जानते थे कैसे विश्वास दिलाना होगा कि मैं हूँ।
- 29:44कई बार पूरा शब्द न सुनने से भ्रांतियां उत्पन्न हो जाती हैं।
- 29:49आंधी आंधी बात तुम सुन लेते हो नाम झपोबस आगे भी सुन लो भाई ऐसे
- 29:58ऐसे ध्रुव प्रहलाद झपो हर जैसे। जपता हुआ खंबा और हिरण्यकश्यप
- 30:08कहने लगे इसके साथ चिमट जाओ फिर मालूम की तरह नारायण ठीक नहीं तो
- 30:18छोड़ दे नारायण को मेरा नाम जब तो मेरा बेटा है हिरण्यकश्यप,
- 30:24हिरण्यकश्यप। सारी दुनिया झप रही, तू भी झप ले?
- 30:34मेरा बेटा है मेरा बच्चा अगर भगवान नहीं जानता कि श्रद्धा के
- 30:42बिना तो नहीं। इससे जलती हुई आग को चपट पाएगा।
- 30:47श्रद्धा पैदा करने की आवश्यक है। भगवान भी जानते हैं तो उन्होंने
- 30:54जलते हुए खम्बे के ऊपर एक टीढ़ी चल रही है।
- 31:01प्रहलाद की निगाह पड़ी। अरे ये जब खेड़ी चल रही है, छोटी
- 31:08सी जान नन्ही सी तो मैं तो अच्छा चौबर हूँ।
- 31:1612 वर्ष के थे। सरदार हो गई विश्वास जप डाल लिया
- 31:32उसने, पर कुछ नहीं जा को राख है सुनैया।
- 31:41मार सके ना कोई बाद में, ना बात को कर सके जो जग भरी होए और
- 31:48हिरण्य के शप में मुँह बाय देखता रहा।
- 31:51फटी आँखें रह गई प्रहलाद का कुछ नहीं बिगड़ा अगर तो ऐसे जप हो गए।
- 32:01तो बिल्कुल ठीक। अगर तुम सिर्फ गुरु के कहने से जप
- 32:08रहे हो तो गुरु का खंडी हो सकता है और अक्सर गुरु का खंडी है आज।
- 32:26घोरव तुम्हें रास्ता बताता है राम राम करो पांच नाम देखो राधे राधे
- 32:32करो कृष्णा कृष्णा करो, मैं तुमसे कहता हूँ, मत करो।
- 32:43अगर विश्वास है तो टेंटें भी कर लेना, अपना ही नाम जपते रहना उसी
- 32:48समय कहीं जाने की जरूरत भी कहाँ होती?
- 32:53तुम ही तो हो अगर विश्वास नहीं है तो किसी के पास भी जाओगे मत आना
- 33:04मेरे पास मैं कितनी बार? बिरहा की आग फूट पड़ी है।
- 33:22मीरा की तरह नेत्र झड़ते हैं, झरनों की तरह उसके ब्रह में दिल
- 33:31तड़पता है और भीतर से उदगार निकलते हैं।
- 33:46इस बिरहा की तड़पंच निगम मार डाला है।
- 33:53जो मैं ऐसा जान थी। डंडोरा पीठ के नकरियों।
- 34:33को। बिरहक की आग में ऐसे जलों के
- 34:39तुम्हारे भीतर अंत से ये बात उठे कि प्रीत न करियो कोय, जो मैं ऐसा
- 34:46जानती प्रीत करें तो मैंने सोचा परम आनंद मिलेगा मिलेगा।
- 34:56या आँखों से झड़ते हुए गृह के आंसू आनंद ही तो हैं तुम गौर से
- 35:03पहचानना सीखो ही न, कितना सुकून मिलता है रोका यह आनंद का रोना
- 35:11है। मैंने पिछले प्रवचन में भी कहा
- 35:12था। ज्ञानखंड में ज्ञान प्रचंड तथ्य
- 35:21नाद विनोद कोड़ा आनंद अनंतनाथ तुम्हें यज्ञा है शर्मखंड की वाणी
- 35:30रूप। तिथ्यकारित कड़िये बहुत अनूप वहाँ
- 35:45बहुत सुंदर संरचना होती है, आँखें ठहर जाती हैं उसकी संघ रचना को
- 35:52देख। श्रम श्रमकंठ पहले ज्ञान होगा
- 36:01तुम्हें कि वो है ज्ञान ये है उसका होना तुम्हें प्रकट रूप से
- 36:06दिखे कि वो है। भीतर किसी प्रकार की संशय और जब
- 36:21तक संशय रहा तब तक अर्जुन ने गांडिव धनुष नहीं उठाया।
- 36:29जब देख लिया वो छोर। कि मैं शरीर नहीं हूँ तो विषम
- 36:37पिता भी शरीर नहीं है। गुरु द्रोण भी शरीर नहीं है और
- 36:42सारे योद्धा झुकेंगे ये भी नहीं है।
- 36:46तो फिर विश्वास हो गया, श्रद्धा उत्पन्न हुई, फिर भीतर से उदगार
- 36:52आया। समृद्ध लग्धा नष्ट मोहा।
- 37:04तुम्हे कोई नई चीज़ नहीं दिखती, वो ही तुम्हारा स्ववरूप जो तुम
- 37:08भूल गए थे वो ही याद आता है। स्मृति लब्धा याद आया स्मृति आई
- 37:17समर नायक से समर कहते हैं, तुम्हारी पोलोवृत्ति को तुम्हारी
- 37:23रेपुटेशन को स्मृति नहीं कहता। स्मृति लब्धा नष्टो मोहा।
- 37:32और जैसे ही तुम याद करोगे तुम कौन हो, तुम्हें पता चल जायेगा तो मोह
- 37:36नष्ट हो जायेगा। मोह नष्ट क्या है?
- 37:39मैं शरीर नहीं हूँ, मैं विचार नहीं हूँ, यह है मोह का नष्ट होना
- 37:44है तो कृष्ण का अच्छा। माम नुशम्र युद्ध है च मेरे को
- 37:52याद कर युद्ध में उद्ध तथ्य काढ़ तिकड़ी है वो दोनों को ताकियाँ
- 38:03करना कथियाँ ना जाए और तुम कहो के व्याख्यान करो शब्दों में समझाओ।
- 38:14बाबा कहते हैं ये मुश्किल है, संभव है शब्दों में नहीं समझाया
- 38:18जा सकता ताकि ये गल्ला कतिया ना जाए।
- 38:21जो को कहें पाछे पचता है कह तो देते हैं हम लेकिन जैसे ही हम
- 38:29अपना प्रोचन समाप्त करते हैं, माथे पे हाथ मार लेते हैं।
- 38:34जो कहने चला था वो आन कह रह गया हमारा चेहरा इतना सा रह जाता है
- 38:48बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना, हम ही सो गए दास्तां कहते कहते।
- 38:58बड़े शोक से चले थे, समझाएंगे आज लेकिन काश हम समझा पाते थक जाते
- 39:10हैं हम सो गए दास्तां कहते कहते ताकियाँ गल्ला कतिया ना जाए।
- 39:16जे को कहे 5656 तार नहीं कहा जा सकता, वह क्या?
- 39:23उस विराट संरचना को तुम कैसे कह पाओगे?
- 39:26एक दर्रा न हवा का बना सकते हो, न पानी का, न धरती का बना सकते हो।
- 39:35फिर बातें ही बगाड़ में योग्य रहेंगे ताकि अगर आप कथियाँ ना जाए
- 39:40ये तो कहें 5675 श्रद्धा चाहिए, पंख खलक जाते हैं, पंख या मेरे
- 39:52सेवक सेवा करते हैं। आपकी सेवा करते हैं सारी मनेजमेंट
- 39:59उनकी मैं तो सिर्फ अपने कमरे में बैठो, मैं तो बाहर भी नहीं
- 40:03निकलता, कमरे से बाहर नहीं निकलता पहले उधर के कमरे में था अब।
- 40:08इधर के कमरे में। तब के जब सिक्का बंडार उसके बाद
- 40:20तो हमने महफिल बुलाई ही नहीं तो से से कहने लगा आपने बाबा जी मुझे
- 40:27कोई पुरस्कार नहीं दिया तो मेरे हवा में से एक माला निकाली जले।
- 40:35वही बाबा जो ऐसे करते थे, मैंने ऐसा उससे नहीं किया।
- 40:39मैंने तो सीधा हाथ किया ही था और रोहित भी वही कड़क था, बाकी रोहित
- 40:50कहने लगा बाबा जी मिला तो मुझे भी कुछ नहीं।
- 40:55अब हालांकि वो झूठ बोल रहा है। उसे इतना कुछ मिला वो भूल जाता
- 41:03है। उसके भंडारे भर गए।
- 41:12कहता है मुझे भी कोई पुरस्कार तो नहीं दिया आपने और जो दिया ये
- 41:16पुरस्कार ही तो था जीमंत पुरस्कार।
- 41:32रोहित बोला, मुझे भी कुछ नहीं मिला, मैंने कहा ये ले भाई तू मिल
- 41:35ले, मैंने ये क्यों किया ताकि इनको श्रद्धा के पंख लग जाए, मैं
- 41:47तुम्हें श्रद्धा के पंख देना चाहती।
- 41:51तुम जमीन पर ही रेंगते रहोगे बिना पंखों के और श्रद्धा के पंख जो
- 41:58पास खड़े थे लोग उन्होंने भी देखा उनको चाहिए मैंने कोई मारा नहीं
- 42:04देखी। लेकिन श्रद्धा के पंख उनके लग गए,
- 42:08विश्वास हो गया कुछ अपहरण शक्ति है मुझे लोग कह देते हैं श्याम
- 42:14मानव 30 लाकर रखा मैंने कहा बस उसकी सृष्टि के रहस्य का इतना सा
- 42:23ही कीमत होता है क्या? बस तीसरा, फिर उसकी सृष्टि की
- 42:33कीमत तो जारी ही नहीं जा सकती। शाम मानव आए से सिर्फ दा के हिसाब
- 42:38से थकचूर होकर आए। अपनी बेईमानी से अपनी श्रद्धा
- 42:47इसको इसकी चुलें हिलाते कुछ ना मिले वो आनंद न मिले, इसकी तलाश
- 42:55इसका भी भीतर कर रहा है। मार्कस हो या चारवाक हो या श्याम
- 43:01अनभो सबका भीतर तलाश करता है। उस अमृत के बस मिल नहीं पाता।
- 43:07बात रख ये जड़ूस नाथ मिले हैं। नाम दान देने वाले इनके पास कुछ
- 43:13खुद के पास ही नहीं है तो खुद ही तलाश कर।
- 43:18और जीस फूल के पास सुगंध नहीं होती, बांटे का केस श्रद्धा के
- 43:29पंख लग जाएं जीस दिन शाम मानव श्रद्धा से यहाँ आएगा तो खदी नहीं
- 43:37जाएगी और जीस दिन वह परीक्षा लेने के लिए आएगा खाली आ जाएगा क्योंकि
- 43:48मुझे ना तो 30,00,000 चाहिए, ना 30,00,00,000 चाहिए, ना अरब
- 43:53चाहिए। अरे यो दो वक्त का भोजन ही नहीं
- 43:57करता। उसे 30,00,000 क्यों चाहिए?
- 44:01कभी सोचा क्या करना मैंने 30 नमक तक मैं खाता नहीं फ्रूट तक मैं
- 44:13खाता नहीं जूस तक मैं खाता नहीं सुबह से शाम तक देखो मैं क्या
- 44:17खाता हूँ। तीन बार की थोड़ी थोड़ी चाय मुझे
- 44:2130,00,000 क्या करना भाई 30,00,000 में तुम खरीदना चाहते
- 44:27हो जी असम्भव इम्पैशी पर हाँ जब जब भी कोई।
- 44:37बिरहा का मारा मेरे शब्दों को सुनना बिरहा का मारा मेरे पास
- 44:46आएगा झोली भर के जायेगा वो फिर चाहे पुत्र लेने आया चाहे पुत्री
- 44:57संतान लेने आया। चाहे धन लेने आया चाहे गद्दी लेने
- 45:03आया खाली नहीं जाएगा। बस एक ही बस एक ही है
- 45:14क्वालिफिकेशन, योग्यता और वो योग्यता है।
- 45:19बिरहा की आग तुम्हें जला देना है और तुम्हारा अंतसीय पुकारने लगे
- 45:26कि प्यासा हों, गर्मी सताती है? डिहाइड्रेशन हो गया है।
- 45:31राजस्थान की इस भूमि में जलते चलते सारे शरीर का पानी निचुड़
- 45:36गया है। और गला सूखने लग गया है।
- 45:38प्राण कपने लग गए है, अब तो जिया गया गया क्या पानी होता है ऐसे
- 45:47प्राण तुम्हारे व्याकुल हो जाएं और तुम्हारे प्राण ये कहने लगे
- 45:52पानी होता भी है कि नहीं? तब तो मेरे पास आना है मेरा घर
- 46:08खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए।
- 46:19कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे ये संसार तुम्हारा हृदय जब तोड़ दे
- 46:29तड़पा हुआ जब कोई छोड़ दे। तब तुम मेरे पास आना प्रय मेरा घर
- 46:45खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे। लिए सामानों के लिए।
- 46:54हम सब के लिए जो ठुकराए जाएंगे संसार के द्वारा और संसार
- 46:59ठुकराता, क्योंकि संसार के झांसा है अगर इसी हिसाब से कहा हो
- 47:09शंकराचार्य के संसार के झांसा है। तो ठीक कहा के माया, माया इस
- 47:16हिसाब से के इसमें आनंद नहीं है, जड़ में आनंद नहीं है।
- 47:23ब्रह्म सत्यम ब्रह्म में आनंद है, जगत मिथ्या जगत मिथ्या है, जगत
- 47:27में आनंद नहीं है। अगर इस हिसाब से शंकराचार्य बोले
- 47:31हों। तो ठीक बोले, लेकिन सुख गए शंकर
- 47:35है, मैं उसको तरमीन कर देता हूँ, संसार सुख नहीं दे पाता, तुम्हें
- 47:42आनंद नहीं दे पाता ये तुमने रे ऑगनाइस कर दिया इसलिए जगत मिथ्या
- 47:50हो गया। अगर आनंद चाहिए तो ब्रह्म सत्यम
- 47:55है और जब तक तुम संसार में आनंद को ढूंढ़ते रहोगे, मिथय संसार
- 48:04आनंद नहीं दे सकता। तृथ्य कढ़ीय सुरत मत मन बुद्ध
- 48:17वहाँ बुद्धि गढ़ी जाती है, मन गढ़ा जाता है, चित्त गढ़ा जाता
- 48:20है, सुरती गढ़ी जाती है, तृथ्य कढ़ीय सुरत मत मति गढ़ी जाती है
- 48:29मन बुद्ध। सब संरचना वहाँ होती है, शरीर की
- 48:33संरचना भी वही होती है। सभी गढ़त कढ़ी है, सब गढ़ती वहीं
- 48:40गढ़ी जाती है प्रशिक्षण कार्य वहाँ होता है, वह कढ़ी है।
- 48:49सुरा सिद्दा की शुद्ध वहाँ देवताओं की सिधों की सुधि घड़ी
- 48:57जाती है ये मत समझेना। कि वहाँ देवताओं की भी इसकी ही
- 49:09शुद्धि गढ़ी जाती है। वह राक्षसों की भी शुद्धि गढ़ी
- 49:14जाती है। सारा कंस्ट्रक्शन कम होता है तो
- 49:22बाबा ने शुरू किया। ज्ञान खंड में ज्ञान परीक्षण था।
- 49:30पहले विश्वास होना चाहिए था कि वो है नाथ विनोद को उड़ा आनंद अनंत
- 49:37ना जब पैदा हो गया उसका आनंद देखना कितना प्यार आनंद।
- 49:43गिरधर की मुरलिया बाजे मधुवन में राधिका ना चेरे।
- 50:06तिथ्य कढ़ी है सुरा सिद्धार्थी सुध देवताओं की भी सिद्धों की भी
- 50:15राक्षसों की भी दैत्यों की भी सबकी सुध वहाँ गढ़ी जाती है और
- 50:20कहाँ गढ़ी जाती है? वहीं गढ़ी जाती है।
- 50:25एक कंस्ट्रक्शन वर्कशॉप कर्मखंड की वाणी जो अब आइए पहले ज्ञानखंड
- 50:38था। ज्ञान खंड के बाद श्रम खंड आ गया।
- 50:46तुम्हें पता चलेगा कि वो है फिर तुम श्रम करोगे, यह श्रम नहीं है,
- 50:52सब ध्यान रखना, यह शर्म नहीं है। ओशो नहीं इसे शर्म के रूप में
- 51:02क्या पंजाबी वो जानते हैं? यहाँ श्रम है, पता चल गया वो है,
- 51:11तो तुम जैसा भी वहाँ जाने के लिए श्रम चाहिए, वो श्रम करते हो,
- 51:20मेहनत करते हो। और वहाँ जाने के लिए क्या श्रम
- 51:24चाहिए? समर्पण और समर्पण करना बहुत बड़ा
- 51:28श्रम है। समर्पण से बड़ा श्रम नहीं होता।
- 51:35तुम कहोगे इसे समर्पण का क्या? लट ही तो जाना है पाम ही तो पकड़
- 51:40लेने। नहीं भाई पूरे के पूरे प्राण
- 51:46दंडवत हो जाएं, तुम्हारा शरीर ही ना हो, तुम्हारा अस्तित्व ही
- 51:50समर्पित हो जाए। उसे कहते हैं समर्पण कर्म खंड की
- 51:58वन। जो वह बड़ी ज़ोर वाली है बड़ी
- 52:02स्ट्रोंगेस्ट है स्ट्रोंगेस्ट मैंने कहा स्ट्रोंगर नहीं
- 52:07स्ट्रांग नहीं स्ट्रोंगेस्ट करमखंड की वाणी जो और तीर्था होर
- 52:16है ना कोई होर अब देखिए। मेरी एनलाइट पेमेंट हुई है, सुन
- 52:24स्टेचू बन गया, एक स्थान पे खड़ा हूँ, हेले लग गया, मटेरियल वर्ड
- 52:30खत्म होने लगा, ट्रांसपेरेंसी आने लगी, बढ़ता गया, बढ़ता गया, बढ़ता
- 52:36गया, विशाल हो गया। अनंत हो क्या विराट हो क्या कौन?
- 52:46वहीं जो अस्तित्व और शरीर जड़ है, जड़ हो गया और चेतन फैल गया।
- 52:59इसलिए समाधि में व्यक्ति। जड़वत हो जाता है क्योंकि चेतन
- 53:03फैल जाता है मुर्दे में और समाधि व्यक्ति में एक हिसाब से कोई फर्क
- 53:11नहीं होता है। मुर्दे में चेतना शरीर से संबंध
- 53:20तोड़ लेती है और समाधि में चेतना। शरीर से संबंध नहीं तोड़ती विराट
- 53:27हो जाती है शरीर अपनी जगह पड़ा रहता है नहीं रे जीवन ही होता है,
- 53:32जीवन उसमें होता है, मुर्दे में जीवन नहीं होता कर्मखंड की वाणी
- 53:39जो तृथ होर न कोई होर तो मैं अकेले।
- 53:45अकेले होते हो इसलिए तुम वहाँ जाकर कहते हो अहम ब्रह्मस्ली मैं
- 53:52ही हूँ, मेरे सिवा कुछ नहीं बस मैं ही हूँ।
- 54:02तृथय होर न कोई हो, कर्मखंड की वाणी जो तृथय जोध, महाबलसूर दिन
- 54:11में राम रेया भरसूर और कौन होता है सहसीपुर से, जिन्होंने अपना
- 54:19आपा छोड़ दिया? जोध महाबलसूर।
- 54:23काइर व्यक्ति तो अपने आप को नहीं छोड़ेंगे काइर व्यक्ति तो चरन
- 54:28जुम्मक बनजा जिसे जो तो महाबल सुर जिनमें राम रेया परफूर।
- 54:40मैंने तुम कहा इन शर्ट कंप्लीटली योरसेल्फ इंटू राम कितनी बार बोला
- 54:47एक शब्द वह ऐसे लोगों की कतार होती है जिनकी बूंद असमुद्र में
- 54:56मिल गई, एकाकार हो गई। इंटरमिंगल्ड हो गई, समाहित हो गई
- 55:02बस वो ही हो गई बोथ समान ही समद जा, समद ही होए तथ्य ज्योत
- 55:16महाब्रसूर। जिनमें राम, रिया, प्रफुर तो राम
- 55:22के भीतर ही समाज के इन्सर्ट हो गए।
- 55:25वहाँ वो लोग हैं वो आत्माएं जो परमात्मा में भीले होंगे, वो
- 55:31बूंदें हैं जो समित्र के साथ एक आकार हो गई।
- 55:37और बाबा कहते हैं वहाँ पर योद्धा होते हैं।
- 55:41सूर्य वीर होते हैं, सबसे बड़ा लक्षण है साहस सबसे बड़ा लक्षण है
- 55:49साहस अपने आपको मिटा देना सबसे बड़ा साहस होता है।
- 55:55तुम सब छोड़ सकते हो। धन छोड़ सकते हो, पद भी छोड़ सकते
- 56:00हो, सब छोड़ सकते हो ले अपना अपना हंकार नहीं छोड़ सकते तो बाबा
- 56:05कहते हैं जिसने अपना अहंकार छोड़ दिया वहीं सही मायने में वीर है
- 56:12इसलिए महावीर भगवान महावीर को। नाम महावीर नहीं था महावीर तो
- 56:16खिताब, वह तो एक अलंकार मिला। उन्हें उपाधि मिली।
- 56:22उन्हें नाम तो उनका वर्धमान था। तथ्य ज्योत महापल सोर बाबा कहते
- 56:31हैं, सुरमा सच्चा सुरमा तो वही। जिसने अपना अहंकार खो दिया तीथ्य
- 56:40जोध महाप्रसूर जिनमें रामर्यप्पर पुर और जब बोंध समुद्र में समा गई
- 56:47तो फिर पानी पानी की कोई कमी रहेंगी क्या?
- 56:51दिन मैं रामय्या प्रफुर राम में ही समाहित हो गया।
- 56:56इन्सर्ट कंप्लीट्ली योरसेल्फ इन नाम इन राम इन राधा इन कृष्णा
- 57:05किसी में ही इन्सर्ट हो जाओ लेकिन कंप्लीट्ली इन्सर्ट हो जाओ।
- 57:11यह कभी बताया तुम्हें तिथ्य जो द महा बलसूर इसको मैं बार बार क्यों
- 57:20बोल रहा हूँ यह क्वारिफिकेशन है योग्यता है।
- 57:28कायर व्यक्ति नहीं पहुँच सकता। वहाँ कायर व्यक्ति अपने आपको छोड़
- 57:31भी नहीं सकता। कायर व्यक्ति तो सदा डरता ही
- 57:34रहेगा। ड्रपोक व्यक्ति आशा भी मत करना कि
- 57:43कभी पहुँच जाएगा। इस साहस को मैं एक गुण समझता हूँ।
- 57:51साहसी व्यक्ति पहुँच सकता है, ज्वारी व्यक्ति पहुँच सकता है।
- 57:57बनिया नहीं पहुँच सकता बनिया जातिका नहीं बनिया हर 10 वृत्ति?
- 58:09वृत्ति बनिया है, अगर कंजूसी जोड़ना अपने आप को छोड़ना नहीं,
- 58:14कुछ अपरिग्रह इसलिए दोनों ने बोला, महावीर ने भी बोला, बुद्ध
- 58:19ने भी बोला, पतंजलि ने भी बोला जो इकट्ठा नहीं करता और जो छोड़ देता
- 58:25है। है यही तो मनासिक नहीं सारी
- 58:34दुनिया को जैसे ही छोड़ दिया तुमने अगर तुमने अपने आप ही छोड़
- 58:37दिया इस अहंकार को छोड़ना परम वीरता है।
- 58:44और अहंकार को छोड़ दिया। महावीर ने अहंकार को छोड़ दिया।
- 58:48जोध महाबल सूर्य ये सारे सुरमाओं ने छोड़ दिया इनमें राम रेया
- 58:54प्रफुर इनमें आनंद की घनी मात्रा होती है, भरे होते लबालब ये आनंद
- 58:59से। छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
- 59:13ये मुनासिब नहीं आदमियों के लिए। प्यार।
- 59:22से भी जरूरी कई काम है। प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए
- 59:37छोड़ दे। सारी दुनिया किसी के लिए ये
- 59:46मुनासिब नहीं आदमी के लिए कायरों के लिए हम ना सुने।
- 59:57अपने अहंकार को छोड़ते। इंकार जो पाता है उसकी खुशी से भी
- 1:00:07ज्यादा जरूरी है और भी चीजें हैं प्यार से भी जरूरी कई काम हैं।
- 1:00:13प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए। पदार्थ शरीर की जरूरत है, लेकिन
- 1:00:22एकात्मा की प्यास है, वह प्यार में नहीं है, वह तुम्हारी
- 1:00:33सांसारिक प्रेम में पदार्थों में नहीं।
- 1:00:36इनसे पार जाकर मिलता है वो आनंद, प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए
- 1:00:45खुशी मिलती है जब पदार्थों को भोकते हो, डंडप के पिल्लों पे
- 1:00:51सोते हो तो खुशी मिलती है। लेकिन नींद नहीं आती।
- 1:01:00दिन भर की भागदौड़, ठगी ठोरी, बेईमानी, कपट ता कुटिलता तुम किसी
- 1:01:08ना किसी तरह धनोपार्जन कर लेते हो, पदार्थ इकट्ठे कर लेते हो।
- 1:01:13जरूरत से ज्यादा इकट्ठा कर लेते हो, लेकिन वो 3600 प्रकार के भोजन
- 1:01:19आपके आसपास पड़े परमात्मा ने भोग छीन लिए क्या करो कथ सीतो सीता,
- 1:01:29मैं माँ। उसकी महिमा में वो राम है या सीता
- 1:01:36है? किसी के वितरित में इन्सर्ट हो
- 1:01:41गए। नाम कोई भी है वो राधा है या
- 1:01:45कृष्ण है, राम है या सीता है? तथ्य सीतो सीता।
- 1:01:51मैं मामा किसी के महिमा में ही समा जाओ, इन्सर्ट हो जाओ?
- 1:01:56दे कैन कंप्लीटली ता के रूप ना बढ़ने जा है फिर जो रूप तुम
- 1:02:06देखोगे जो नजारा तुम देखोगे वो कहा नहीं जा सकता।
- 1:02:14नॉट एक्सप्लेन्ड इन वर्क्स ऐसा मज़ा है तुम छोटी छोटी अनुभवों को
- 1:02:26व्याख्यान नहीं कर सकते शब्दों में।
- 1:02:29दर्द है डॉक्टर तुम्हें कहे कि ठीक है, होगा दिखाओ निकाल के दर्द
- 1:02:35कहाँ खुशी है निकाल के दिखाओ खुशी कहाँ छोटी छोटी बातों को तुम
- 1:02:44दिखाने में। असफल हो जाते हो और परमात्मा को
- 1:02:51कह देते हो, देखता नहीं वो होता ना वह कमल बात है, तुम दर्द दिखा
- 1:02:58नहीं सकते, परमात्मा को दिखाने की बात करते हो, दिखाओ परमात्मा कहाँ
- 1:03:03है? तुम दिखाओ दर्द कहाँ है?
- 1:03:08तुम खुश हो दिखाओ खुशी है कौन निकाल के दिखाओ ना खुशी वह जो
- 1:03:23नजारा तुम देखोगे वो तुम्हें ऐसा आनंद देगा।
- 1:03:36क्यों गूंगा गुड़ खाई के कहे, कौन मुख स्वार्थ है?
- 1:03:41नहीं, जीवा नहीं होगी, स्वार्थ तो तुम्हें आएगा।
- 1:03:45जीवा तो है लेकिन बोलने के लिए जीवा असमर्थ होगी।
- 1:03:50शब्द नहीं है। उसके पास अब का ब्लरी नहीं है।
- 1:03:55एक्सप्रेस से नहीं कर सकता। वो तिथ्य सीतो सीता महिमा माँ ता
- 1:04:04के रूप न कथन जवानी की उम्र थी मैं बुल भर कर खींच रहा था।
- 1:04:13बलवरकर का एक कोना साइड हत्थी मैंने खूंटी पर टांग दी और पांव
- 1:04:19लगा लिया। मैंने दीवार के साथ खींचना शुरू
- 1:04:22कर दिया। पूरे ज़ोर से देखे कहाँ तक बढ़ता
- 1:04:26है। होश नहीं था जोश तो जब मैं जवान
- 1:04:39हुआ, माँ ने मुझे बुलाया और कहा बेटा अब तुम जवान हो गया।
- 1:04:50जवानी में जोश ज्यादा होता है, होश कमी लेकिन तुम होश को बनाए
- 1:04:59रखना होश खो गया पता नहीं था। ये सब बुलबर्कर पर तुम ज़ोर लगा
- 1:05:09रहे हो उसकी खूंटी उखड़ जाएगी। ऊपर से इतना ज़ोर था आधा ज़ोर था
- 1:05:18और वही हुआ है बुलबर्कर ऊपर से उतर गया और मेरे यहाँ लगा।
- 1:05:26एक कपल के लिए बजे संसार अंधेरा नजर आया।
- 1:05:34अब दूसरी बार जब मेरी आँखों की निगाह गई तब मुझे एक आंख से
- 1:05:38अँधेरा नजर आया तो मुझे समझ आया कि नास्तिक लोग किस अंधेरे में जी
- 1:05:45रहे हैं? आँखें इनके पास नहीं दोष देते
- 1:05:51हैं। अंधेरे को अंधेरा रौश देते हैं।
- 1:05:55रौशनी को रौशनी नहीं है, बेचारे जानते हैं।
- 1:06:05आँखें नहीं हैं तुम्हारे पास, वो मेरे सब्र का इम्तिहान लेते हैं।
- 1:06:14मालूम नहीं वेचारों को वो मेरे सब्र का इम्तिहान लेते हैं।
- 1:06:20मालूम नहीं वेचारों को। मर्दों में सब्र ही तो होता है,
- 1:06:29उसके अलावा कुछ होता है मर्दों में प्रथम बार मुझे समझाया यह तो
- 1:06:41दो सपना मड़ते हो दूसरे ज्ञानियों से।
- 1:06:45दिखाओ अगर है तो और ज्ञानी चुप हो जाता है जो सच्चा ज्ञानी शास्त्र
- 1:06:50नहीं करता कितना ही शंकराचार्य कह ले, आओ शास्त्र करें मेरे पास
- 1:06:57ज्ञानी लोग आए, मैं पांव पकड़ लेता हूँ, मैं उनकी मंशा को समझता
- 1:07:01हूँ, कोई मुझसे हैरानी आई है। मैं पांव पकड़ लेता हूँ, हाथ जल
- 1:07:06लेता हूँ भाई मैं तो हार गया, बस तुम्हारी तमन्ना पूरी हुई, जलपान
- 1:07:12करो, खाना वगैरह खाओ, मन को शांत रखो और विदा हो जाओ तुम्हारी
- 1:07:20तमन्ना पूरी हुई, मैं हार गया, तुम जीत गए।
- 1:07:25आँखों वाला कभी आँखों वालों को ये भी दिखता है कि सामने वाला अंधा
- 1:07:30है आँखों वालों को ये भी दिखता है हरी पंजाबी में कहावत है उठे आप
- 1:07:44तो न जावे फिट्टे मो। गोट्या वे?
- 1:07:53आँखें तो मारी नहीं हैं, परमात्मा होता नहीं, यही कृष्ण ने कहा
- 1:08:02बर्फी से देखो तुम्हें अपना सर देना होगा।
- 1:08:11दिव्य चक्षु के बिना वो देखा नहीं जाएगा जो तुम देखना चाहते हो, तो
- 1:08:18बरबरी ने कहा जो आज शाम बाबा है फिर प्रभु मुझे क्या करना होगा?
- 1:08:24दिव्य चक्षु चाहिए तो तुम्हें सिर काट के देना होगा।
- 1:08:28होयाभाजन मिलदा सजन वे मोया भाजन मिलदा सजन वे उस मालिक।
- 1:08:51मरना पड़ेगा भाई, अहंकार को मारना पड़ेगा शीश देने का कुल यही मतलब
- 1:08:57है शीश काट के थैली पे नहीं रखना है ये तो बात है कहने की तुम्हें
- 1:09:05समझाने की। अहंकार को काट के रख दो और झट से
- 1:09:11उसने अहंकार काट दिया। तुम आज शीश काट के उसकी फोटो वहाँ
- 1:09:16पर लगाए बैठ पता तुम्हें कुछ है नहीं कतारें लंबी हैं किलो किलो
- 1:09:22किलोमीटर क्या दिखता है तुम्हें वहाँ से?
- 1:09:27कुछ नहीं मिलेगा ना तुम्हें, श्याम बाबा कुछ देगा ना तुम्हें,
- 1:09:32हनुमान कुछ देगा मिलेगा तुम्हें तुम्हारे भीतर जाकर मिलेगा कोई
- 1:09:39देवी देवता, कोई पीर पेगम्बर कोई तुम्हें कुछ नहीं दे सकता कोई
- 1:09:45अवतार। कोई तीर्थंकर तुम्हें कुछ नहीं दे
- 1:09:49सकता मिलेगा तुम ही अपने ही वेतर से तुम अपने वेतर उतरोगे अपने ही
- 1:09:59वेतर पाओगे उसे बैठा हुआ कब से बैठा है, वो तो इंतजार कर रहा है।
- 1:10:05तुम ही बाहर मोंक रहे हो। कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूंढे बन
- 1:10:10माँ ऐसे घाट में पीम है मूर्ख, जानें ना तुम्हारे ही घाट में
- 1:10:17बैठा ढूंढने की दिशा तुमने गलत तुम वनों में भटके तुम हिमालो में
- 1:10:24भटके। अपने भीतर नहीं गए, सर्च नहीं
- 1:10:27किया उसे और दोष देते हो फिर तुम के वो है नहीं, ठीक है नहीं, हम
- 1:10:36भी कह देंगे दर्द होता नहीं, खुशी होती नहीं, फिर मानोगे?
- 1:10:44नहीं मान डॉक्टर कहते कि भाई दर्द तो होता नहीं, एनर्जी से क्यों
- 1:10:49तुम तुम तड़प तड़प के मरते हो डॉक्टर समयता है कि भाई दर्द होता
- 1:10:57है। वो शब्द आ गया ना वो मरे, न ठग
- 1:11:11गए, कहाँ से चले थे तुम विश्वास हो गया कि वो है विश्वास हो गया
- 1:11:18श्रद्धा हो गया वहाँ से तुम्हें श्रम किया श्रम क्या किया अपने आप
- 1:11:23को? कुर्बान करना शुरू कर दिया।
- 1:11:25अपने आप को समर्पित करना शुरू कर दिया।
- 1:11:28झूठे समर्पण नहीं आज जो बी के सी के करते हैं जयंत धर्म में करते
- 1:11:32हैं समर्पण यह नहीं है समर्पण वो जो अहंकार को नष्ट करते हैं मैं
- 1:11:38शरीर हूँ, मैं भावना हूँ मैं मन हूँ मैं विचार।
- 1:11:43किसको समर्पण करना है? गुरु तुम्हारा मन मांगता है, मन
- 1:11:53तन नहीं मांगता, गुफाओं में मन लेने के बहाने शोषण करता है,
- 1:12:03तुम्हारे इतनों से खिलवाड़ करता है।
- 1:12:05सावधान इन दुष्टों से। गुरु को चाहिए तुम्हारा मन मन
- 1:12:13याने अहंकार अहंकार यानी मैं शरीर हूँ मैं विचार हूँ मैं भावना ही
- 1:12:18हूँ ये चाहिए तुम अपने मन को समर्पित करो।
- 1:12:28और गुरु तुम्हारा असानिधि नहीं हुआ आपका तुम्हें इसानिधि की
- 1:12:32आवश्यकता पड़े थोड़ी देर बैठ लिया था उन ठंडी हवाओं के छांव के तले
- 1:12:40विश्राम कर लिया था। मिलेगा तो तुम्हें अपने भीतर
- 1:12:46लेकिन इतना आसान भी नहीं है यहाँ से देख जाओ सर्द हो जाएगी।
- 1:12:57एक व्यक्ति कैसे 13 वर्षों से बिना खाये पिए बैठा एक कमरे में
- 1:13:01बैठा उसका कोई शौक नहीं, कोई हॉबी नहीं।
- 1:13:05कोई जरूरत नहीं उसकी बस इतना सा कैलोरीज लेता कि तुम्हें बता दें
- 1:13:12कि हाँ मैंने देखा है मैं जिंदा हूँ तो सिर्फ इसलिए एम ऑथेंटिक
- 1:13:19पर्सन और मैं स्टेम पर लगा सकता हूँ कि वो है।
- 1:13:27और कोई स्टाम्प नहीं लगा सकता। बाबा आए तुम बोलो, मैंने कहा और
- 1:13:32होगा कोई ढूंढ लो बाबा मैं तो मज़े से रस ही रहा हूँ।
- 1:13:3735 वर्ष हो गए, बाबा कहते हैं और नहीं है कोई मैं उसी वक्त समझ गया
- 1:13:43सब अखड़े बैठे हैं। सब शेखी बघार रहे हैं।
- 1:13:54जानते कुछ नहीं उस उसके पास नहीं घरे जिसकी बात करते हैं ना वो
- 1:14:01मरे, न ठगे जा जिनके राम बसे मन माँ।
- 1:14:10तुम तो मरते हो क्योंकि तुम शरीर हो, मरोगे ही, तुम तो मरते हो
- 1:14:16क्योंकि तुम विचार हो, विचार आज कुछ है, कल और है, इसलिए तुम मरते
- 1:14:23हो। लेकिन बाबा कहते हैं ना वो मरे,
- 1:14:26ना ठगे जाएं, वो ठगे भी नहीं जा सकते क्योंकि जो ठगना था वो उनका
- 1:14:39रहा ही नहीं, जो ठगा जा सकता है। धन, वैभव, कुर्सी, मान सम्मान।
- 1:14:49वो उनका है ही नहीं। उन्होंने जान लिया कैसे झगोगे ऐसे
- 1:14:54व्यक्ति को जिसने जान लिया ये मेरे नहीं और मैं ही नहीं उसको
- 1:15:01कैसे झगोगे और जिसने जान लिया मैं वो नहीं जो मर जाता हूँ, मैं वो
- 1:15:08हूँ। नैनम चिदंती शस्त्राणी नैनम दाहती
- 1:15:11पावका ने चैनम के लिए जनता को न सो सती मारुका न हनते हनुमान शरीर
- 1:15:20में नहीं मरता, मरेह संसारा, मोहे मिला जिला बनारा।
- 1:15:27तुम वहाँ पहुँच जाते हो, यहाँ मौत नहीं आती, यहाँ चिंता नहीं जाती,
- 1:15:32यहाँ तनाव नहीं जाता जहाँ रात की नींद को हराम करने वाली चिंताएं
- 1:15:38नहीं पहुंचती, चिन्ताएं नहीं पहुंचती, तुम्हारा राम राम
- 1:15:43तुम्हारी राधे राधे वहाँ नहीं पहुंचती ये शोर हैं?
- 1:15:52न ओह मरे जब तुम वहाँ पहुँच जाओ, एक बार पहुँच जाओ सिर्फ एक बार
- 1:16:03नाम कमारी नाम का चढ़ी रहे सरदार बसों से ठेके की शराबी एक बार
- 1:16:08फ़िल्म यही तो मज़ा है। इस ठेके की स्राक को शाम।
- 1:16:13ढलते ही हुई शाम अँका तुम्हें ठेका याद आता है हुई शाम अँका।
- 1:16:29ख्याल आ गया वही ज़िन्दगी का सवाल गया वही ज़िन्दगी का।
- 1:16:49सवाल आ गया, होई हाँ, उनका ख्याला गया।
- 1:17:06तुम ठेके की तरफ दौड़ पड़ते हो? और बाबा कहते हैं, यह तो एक बार
- 1:17:10पी ले, जिन्हें नशे जान दे उतर जान पर बाद सुबह उतर जाए, लेकिन
- 1:17:17यह एक बार पी लोगे नाम हमारी नान का चढ़े रहे।
- 1:17:21दिन का फिर पीने की जरूरत नहीं पड़ेगी, फिर कुछ भी पीने की जरूरत
- 1:17:26है। जोड़ने की जरूरत।
- 1:17:27ये जीतने मैंने राधा स्वामी पंत के थे।
- 1:17:32आज हमने वो खरीद लिया, आज हमने वो खरीद लिया, आज हमने वो खरीद लिया
- 1:17:38क्या है यही से किया है सब ढकोसले वाज।
- 1:17:47और कोई धर्म से अछूता नहीं, जैसे एक प्रकोप की लहरी चली हो सम
- 1:17:55संसार कोई धर्म से अछूता नहीं है। कोई रुमाले बेच रहा है।
- 1:18:08कोई पोस्टर बना बैठा, कोई काजी बना बैठा, कोई पुजारी बना बैठा
- 1:18:29फूंक मसला अपन देखोटे। ठीक कहते हैं, वो कहते हैं मुझे
- 1:18:47मस्जिद से डर लगने लगा, मस्जिद खोलो जोड़ा डरिया जा थककर दे डेरे
- 1:18:54बढ़िया जिसे बज दे ना दा जा इश्क दी नमी व नमी बहार।
- 1:19:03उसके तो बाहर निराले और मस्जिद की तिवारी तो मुझे डराती है।
- 1:19:13देखिए खुद मुसलमान। और मच्छी से डर डर लगता है जा ठकर
- 1:19:26दे डी रे वडिया हिंदू के मंत्र में चला गया क्या कुशांत है,
- 1:19:37जिससे वैद्यनाथ हजा? अभी बताये ना पिछले दोहे में आए
- 1:19:47थे नाद विनोद कोढ़ आनंद क्रोड़ों आनंदों के बराबर यह वीणा की जंकार
- 1:19:56है। करोड़ों आनंद यकसंत में मिल जाए
- 1:20:05तो तुम्हारा हाल क्या होगा? यकसंत मिल जाए, उसी की बात करते
- 1:20:13हैं। बलेश जीथे वैदे नाद 1000 जीथे नाद
- 1:20:18बनोद कुंवड़ आनंद। न ओह मरे न ठग जाने शुरू किया
- 1:20:35तुमने वो है भी जिसका नाम लेने चले हो, जिसके पास जाना चाहते हो
- 1:20:43वो है भी ये तसल्ली कर लो। फिर चलना वक्त बर्बाद मत करो,
- 1:20:52बड़ी मुश्किल से ये शरीर मिला है। अगर नहीं विश्वास होता तो चार
- 1:20:59पैसे कमा लो। कोई घर बार बना लो, बच्चों के काम
- 1:21:06है, कोई व्यापार वगैरह करो। ये सभी इंडस्ट्री लिस्ट कर रहे
- 1:21:14हैं, कोई गद्दी वगैरह ले लो अपने बच्चों को कोई मंत्री पद दे दोगे?
- 1:21:28अगर विश्वास नहीं आता तो छोड़ो क्यों भटकना है?
- 1:21:35अगर विश्वास हो गया फिर तो तुम्हें तलाशना ही पड़ेगा, मजबूरी
- 1:21:43हो जाएगी। तुम्हारे गले की फास हो गई।
- 1:21:47मीरा कहती तो है जेब ऐसा जानती प्रीत की दुःख होए नगर डंडोरा
- 1:21:54पीरती प्रेम है ना करियो, उसे पता ही नहीं है हमें करना ही पड़ेगा
- 1:22:00प्रेम ऊपर से उतरा। दुःख हो नगर ढिंढोरा पित।
- 1:22:26तुम्हारी औकात क्या है? तुम नगर में ढिंढोरा पीटो।
- 1:22:34अगर ऊपर से उतरा है सच्चखंड से उतरा है ठै, पगत व सह के लो।
- 1:22:45बहुत से लोगों के भगत वहाँ बसते हैं।
- 1:22:50हमने तो सिर्फ ये धरती देखी है, लेकिन बाबा कहते हैं बहुत से बहुत
- 1:22:55से लोगों के भगत सिर्फ भगत भगत यानी जो उसके प्रेम में दीवान
- 1:23:01हैं। जिन्होंने मिटा दिया अपनी हस्ती
- 1:23:04को उसके प्रेम के भीतर जो जल गए पूरे परवाने की तरह जिन्होंने
- 1:23:13एकाद कर दिया, अपने आपको नेस्तनाबूद कर दिया, उनकी राख भी
- 1:23:19न बची, वो वहाँ बसते हैं। इत्थे पगत विषय के लो करें अनंत
- 1:23:27सच्चा 100 और वह अपने मन में सच्चा आनंद मानते हैं।
- 1:23:36जो खाक हो जाएगा उसे ही सच्चा आनंद मिलेगा जो बचाएगा अपने आप
- 1:23:41को। वह लूट जायेगा जो अपने आप को खाक
- 1:23:46कर देगा, वह मंजिल पा जायेगा पिथ्य प्रगत वशय कर लोग करें आनंद
- 1:23:56सच्चा मन सो। अब आइए शब्द इतनी यात्रा हमने कर
- 1:24:05ली कहाँ से चले थे विश्वास श्रद्धा पैदा हो ऐसे कोरे कोरे मत
- 1:24:12चल पड़ना। 35 वर्ष हो गए, 40351000 भी हो गए
- 1:24:18ना नहीं मिलेगा तुम्हें भाई उस एक अज्ञात शक्ति के ऊपर परम परम
- 1:24:32श्रद्धा। होनी आवश्यक है।
- 1:24:36अनीता फिर इन आचार्यों की तरह इन सर लोगों की तरह जकाई मारते रहना
- 1:24:46या बुद्धि का स्वाद। जिससे बाबा बात कर रहे हैं।
- 1:24:53बुद्धि का स्वागत और रहस्य की बात है।
- 1:24:58बुद्धि वहाँ तक पहुँच नहीं सकती। बुद्धि का कोई पैगाम उस लोक में
- 1:25:05नहीं जाता। उस लोक में सिर्फ भगत जाते हैं,
- 1:25:08अतिथ्य, बस। थै पगत बसै कर लो करिए आनंद सच्चा
- 1:25:20मन लो आपका सच खंड भी आ गया जीते जी हमने तय करना ही सफर मर के
- 1:25:30गुरु आएगा इस बुले के में मत पढ़ना।
- 1:25:33हम तो डूबे हैं सनम, आपको भी ले डूबे, इनका ऐसा काम है सचखंठ
- 1:25:45वगैरह इन्होंने जाना नहीं, वो मरकर नहीं जाना जा सकता वो ऐसा
- 1:25:49बाबा ने बताया ये है ये है पथ। सच खंड तक जाने का जहाँ तक पहुँच
- 1:25:58गए तुम ना ओह मरे न ठगे जहाँ जिनके राम बस म न म सिथ्थे बस भगत
- 1:26:09कर लो कर यह आनंद सच्चा में। अब आगे चलें।
- 1:26:15सच खंड बस है नरंकार आज्ञा पर मैं और मैं जो कृष्ण की बात करता हूँ
- 1:26:25बुद्ध से भी तुमने स्वयं को जान लिया, लेकिन बाहर को मत से जाना।
- 1:26:34बस थोड़ी ही देर की बात है, ये पांच 7 साल और लगेंगे थोड़ी जल्दी
- 1:26:42कर गए। इतनी जल्दी करने की आवश्यकता नहीं
- 1:26:45थी को और इतनी जल्दी करने की आवश्यकता नहीं थी।
- 1:26:51ओशो थोड़ा रुक ही जाते हैं। इतनी भी क्या पड़ी थी इस संसार
- 1:26:57को? 10 साल बाद बोलना शुरू कर देते।
- 1:27:18मैंने 68 की उम्र में बोलना शुरू किया।
- 1:27:21बाबा के ने 68 में फरमान आया, जब फरमाए थे जब हुकम आय पर वो हुकम
- 1:27:34ऐसा कि हुकम मान नहीं पड़ता। के बोलिए ठीक सचखंड वसा एंड अब
- 1:27:46सचखंड बाबा ने खंडों में तब्दील किया।
- 1:27:52ज्ञानखंड से शुरू हो गए पर श्रम किया तुमने?
- 1:27:55धर्म खंड आ गया। बीच में तुमने अपने स्वभाव को
- 1:27:58पहचाना और फिर आगे चलते चलते चलते ये सारा कुछ बीच में जो मैंने
- 1:28:06व्याख्या की है आगे हम आगे सच्च खंड में कोई गुरु वगैरह नहीं
- 1:28:11पहुंचाएगा। जीते जी इसको तय कर लेना, आगे
- 1:28:13भटकते करो। ये चेतावनी आपको तो बाहर कोई गुरु
- 1:28:24हाथ नहीं पकड़ेगा। ये खुद सचखंठ तक नहीं पहुंचे हैं
- 1:28:29क्योंकि सचखंठ तक पहुंचते तो इतना लबादा इकट्ठा ना करते।
- 1:28:33अब पूरी ग्राहक इकट्ठा करने छोड़ देता है।
- 1:28:36ऐसा वक्त नहीं तो रसगुल्ले खाते और जिसने उसका रस भी लिया वो
- 1:28:51रसगुल्ला खायेगा। सच खंडों बस है बस वहाँ चले गए
- 1:29:08हमारी यात्रा पूरी हुई नरींकार के पास पहुँच गए।
- 1:29:18जब तुम कहते थे तुम मिल जाए तो सारा जहान मिल जाए।
- 1:29:22पांचवा मिल गया और अगर वो ना मिला तो फिर सारी दुनिया मिलेंगे तो
- 1:29:31क्या है? ज़िन्दगी सुकून से बढ़ जाएगी और
- 1:29:38ज़िन्दगी में जैसे मीरा की पायलियां नाचती हैं, राधा की
- 1:29:43पायलियां नाचती हैं, झंकार आपको बड़ी आनंद देते हैं।
- 1:29:50आजुबान मेरा अधिका नाचे। मधुबन में राधिका नाच रहे, गिरधर
- 1:30:08की मोरलिया बाजे रे। गिरधर की मुरलियां बाजे मधुवन
- 1:30:22राधिका नाचे। धन्यवाद।