Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 Nov 25 - Moksha Dwar Special Satsang | Baba Ji Vijay Vats Satsang #babajivijayvats
Transcript
- 0:06बाबा जी, प्रणाम सपने में कैसे जागृत हूँ?
- 0:21हाउ टू अवेर इन ड्रीम्स गीता यादव भोपाल।
- 0:42करने की बातें अध्यात्म में नहीं होतीं।
- 0:49लक्स बा लक्स सुनते जानो ये बड़े अमूल्य शब्द हैं।
- 1:00करने की भाषा अध्यात्म की नहीं होती।
- 1:08अध्यात्म की भाषा हम मजबूरी में बोलते हैं।
- 1:17करने की भाषा संसार की भाषा है। स्वप्न में कैसे जागृत हूँ, कैसे
- 1:26जगा जाए? स्वप्न में बहुत सी तकनीकें बहुत
- 1:31से ग्रंथ में तुम्हें मिल जाएंगी लेकिन ना कारगार है।
- 1:40रिज़ल्ट कुछ नहीं आएगा जैसे तुम सोए होते हो और सोने के उस दर से
- 1:55सुशुक्ति की परमवस्था से। जब तुम जागृति चेतना की तरफ आते
- 2:02हो तो मैंने यह सारा सफर बताया हुआ है।
- 2:07जैसे ही एक तल को तुम क्रॉस करते हो, वहाँ से स्वप्नों का संसार
- 2:15शुरू होता है। सोपन में जागृत कैसे हो?
- 2:26सच में जागृत होने के बाद सोपन में जागृति स्वयमेव हो जाती है।
- 2:38पहले तुम सच में जागृत हो जाओ। अभी तुम जागृत हो नहीं अभी तुम
- 2:46जीवन में ही सोए हुए हो, स्वप्नों में जागने की बात करते हो।
- 2:55हौ टु इस पॉसिबल। पहले जीवन में जागना सीख लो देखिए
- 3:08ये हमारी भाषा है, क्या करें ये अध्यात्म की भाषा अभी तक आज तक न
- 3:15तो बनी न बन पाएगी भाषाएं संसार में।
- 3:23कन्वर्सेशन करने के लिए बनी है। अध्यात्म की भाषा आज तक बनी ही
- 3:30नहीं, ना ही कभी बन पाएगी। स्वप्नों में जागृत कैसे हो, पहले
- 3:41जीवन में जागृत हो जाओ। ज़िन्दगी में जो जागृत हो गया वह
- 3:48उस स्थल पर चला जायेगा जो सदा जागृत रहता है।
- 3:54देन भर रात जागते, सोते, उठते, बैठते सब क्रिया कलाप करते वह
- 4:01जागृत रहता है। उसमें अधिष्ठित हो जाओ।
- 4:09जैसे ही तुम उसमें अधिष्ठित हो गए।
- 4:13तुमने जान लिया के तुम साक्षी हो तो फिर स्वप्नों में।
- 4:24जागने का कबाड़ा नहीं करना होगा। फिर तुम जाग गए न तुम्हारे कोई
- 4:30कल्पना उठेगी न तुम्हारे कोई स्वप्न आएँगे।
- 4:38सन्तों को स्वप्न नहीं आता। अगर अभी भी आपको स्वप्न आता है तो
- 4:46समझो आप उस गहरे तल पर जागृत नहीं हुए, आप सारे रात सोये रहते हो?
- 4:59सारी रात कोई तत्व जागकर आपको देखता रहता है।
- 5:03निरंतर और उसे पल पल का ज्ञात है कि आज ये ठीक से सो नहीं पाया, आज
- 5:16उधेड़बुन बनी रही। आज चिंता लगी रही और आज आज बड़ा
- 5:27सुन्दर नींद आया, पता ही नहीं चला ऐसी घुड़तम निद्रा में सोया।
- 5:39यह जिसे वो देखता है वो यह तुम हो जो साक्षी देखता है कि यह बड़े
- 5:52आनंद में सो रहा है और सारी रात। कोई उथल पुथल मन में नहीं थे।
- 6:01सारी रात ज़रा भी कोई सोच विचार नहीं था, कोई उधेड़बुन नहीं चली।
- 6:10सारी रात मज़े ही मज़े में गुजर गई।
- 6:15वो देखने वाले तुम हो। साक्ष्य उस सारी स्थिति को देखने
- 6:25वाले रात्रि को ये ज्यादा समझा आ जाता है इसलिए रात्रि जागरण का।
- 6:36सूत्र दिया गया लेकिन उस सूत्र को आज विकृत कर लिया गया।
- 6:46बोले शाह कहते हैं रातिं स्वप्ना आवे, उन जड़े अल्लाह वाले हू।
- 6:57रात तीन सपने आवे, उन गिड़े अल्लावाड़े हो जो अल्लाह के भीतर
- 7:09प्रतिष्ठित हो गए। उनको रात को सपना नहीं आता।
- 7:15दिन में कल्पना नहीं आती तुम्हारा मन अब मैं बोल रहा हूँ सुनते
- 7:30सुनते न जाने तुम कहाँ कहाँ के चक्कर सारे संसार के परिक्रमा पर
- 7:35आओगे? यह जागरण है।
- 7:43यह तुम सुन रहे हो मुझे नहीं। क्या यह सम्यक श्रवण है, जिसकी
- 7:50बात महावीर करते हैं? नहीं तुमने कहाँ सुना?
- 7:56मुझे सुन भी रहे हो और कभी कभी किसी और ही संसार की बातों में
- 8:03उलझ जाती हो, फिर होश आता है, फिर मुझे सुनना शुरू कर देते हो,
- 8:10तुम्हे मालूम नहीं तुम कितनी बार कर बदलते हो मुझे सुनते सुनते।
- 8:20जैसे घड़ी स्वयं में अधिष्टित होना इतना परिपक्व हो जाए कि
- 8:34स्वयं में अधिष्टित हो तो स्वयं में अधिष्टित ही बने रहो।
- 8:44साक्षी तुम हो बहुत से मेरे पास वीपक्षणा करने वाले वीपक्षणा
- 8:53सिखाने वाले प्यार बाबा बुद्ध की बातों को काटते हैं।
- 8:59मैंने कहा नहीं उतनी कभी ऐसा कहानी।
- 9:08और दुख की बात यह है कि बुद्ध का कोई जीवंत रिकॉर्ड बोलने का है।
- 9:16बुद्ध ने जो कुछ कहा वह बुद्ध ने स्वयं नहीं लिखा।
- 9:24उनके शिष्यों ने आगे लिखा। और शिष्य तो फिर हर चीज़ को विकृत
- 9:30कर देते शिष्य तो जब मेरी जीवनी लिखेंगे इसीलिए मैं अपनी जीवनी,
- 9:37अपनी जीते जी लिखवा शिष्य जब लिखेंगे, वो लिखेंगे।
- 9:46गंगा माता ने जब विजय वत्स को जन्म दिया तो नहीं जाने कहाँ से
- 9:54नर्मदा आई और उनके पांव छूकर चली गई।
- 9:58शिष्य तो ऐसा बड़ा करने वाले हैं, इसलिए मैं अपनी जीवन गाथा।
- 10:07अपने जीते जी लिखवा के जाना चाहता हूँ लिखवादी हिंदी में आपने पढ़
- 10:12ली होगी, अंग्रेजी में अभी आज कल में आ जाएगी।
- 10:15आपके पास शिष्य तो कबाड़ा करता है बुद्ध क्या बोले?
- 10:27शिष्यों ने उसी वक्त ढंग से सोना नहीं जैसे अभी आप मुझे सुनते
- 10:34सुनते सारे संसार की परिक्रमा कर देते हो।
- 10:39क्यों? क्योंकि अज्ञानी हो और इसमें दुख
- 10:44मानने की बात नहीं है कि तुम मैं ज्ञानी हो।
- 10:47इसमें सजग होने की बात है कि तुम अज्ञानी हो, कैसे ज्ञान की ओर
- 10:54चलें? तुम सो माँ जौ दुर्गम है, अगर कोई
- 11:00तुम्हें जागृत करता है, अव्यवहार करता है।
- 11:06कि तुम अंधकार में हो, तुम प्रकाश की ओर चलो तो तुम्हें गुस्सा नहीं
- 11:15मानना चाहिए। बहुत से लोग गुस्सा मान जाते हैं।
- 11:21लोग कमेंट करते हैं, फिर मैं उन्हें ब्लॉक कर देता हूँ।
- 11:24इसीलिए कि तुम पहले से पहुंचे हुए हो तो हमारे साथ मैंने बहस थोड़ा
- 11:29कर दी। अगर तुम वाकई ही मस्ती में हो,
- 11:33तुम मुझे सुन काहे रहो, मुझे सुनने की कोई आवश्यकता ही नहीं
- 11:38है। फिर मज़े से अपनी कोठरी में बैठो।
- 11:47वजह से आनंद लो, उस अमृत का रसपिओ तो मैं कह देता हूँ देखो बुद्ध ने
- 11:59साक्षी होने की तरकीब कभी नहीं बताई।
- 12:03बुद्ध जो जान गए के साक्षी तो मैं हूँ, वह साक्षी बनने की परिकल्पना
- 12:13आपको क्यों बताएगा? वी प्रश्नों को सिखाने वाले
- 12:23साक्षी भाव में उलझ गए। यह तो एक सर्कस हो गई जैसे हम
- 12:30रामलीला में राम बन जाते हैं, राम हो तो नहीं जाते, आप साक्षी बन
- 12:36जाते हो, साक्षी होते तो नहीं। विपश्यना करने वालों सावधान जैसे
- 12:47रामलीलाम मैं राम बन जाया करता था, राम होता नहीं था, ऐसे ही
- 12:57तुम। भी पक्षीणा में साक्षी बन जाते
- 13:01हो, लेकिन तुम्हें ये नहीं मानो के साक्षी वास्तव में तुम हो।
- 13:09यही गुंडी तुम्हें उलझाई चली जाती है और अगर किसी ने नीचे भ्रम ना
- 13:17तोड़ा होता। तो तुम उलझे ही रहते, आज मैंने
- 13:22तुम्हारा ये धर्म तोड़ा, उस स्थल पर गया हुआ व्यक्ति ही तुम्हारे
- 13:29भ्रमों को तोड़ सकने में समर्थ है अन्यथा तो उन बातों को।
- 13:37सिर्फ व्याख्यायित करने वाले औजार्य बैठे हैं।
- 13:43वो अपने अपने ढंगो से व्याख्यायित करते रहेंगे और तुम उनको मज़े से
- 13:47सुनते रहोगे, उनका अनुकरण करते रहोगे, लेकिन यह सत्य नहीं है, यह
- 13:54आपको उस गहरे आनंद के। क्षणों में नहीं ले जाएगा उन तलों
- 14:00पे नहीं ले जाएगा पूछा है सोपन में कैसे जागें?
- 14:15पहले जागृति में जागना सीख लो पहले जागृति में जाना सीख लो और
- 14:27जो भी कोई जागा पहले जागृति में जागा।
- 14:33बुध सोय सोय थोड़ा पहुंचे। महावीर सोय सोय थोड़ा पहुंचे।
- 14:39कोई भी सोए सोए आय तक पहुँच नहीं सका, पहुंचा तो जागने के बाद अपने
- 14:49उस अधिष्ठाता साक्षी का दर्शन कर। उस साक्षी में अवस्थित हो गए।
- 15:03उस साक्षी की प्रज्ञा में स्थित होकर ये बहुत लोग मेरे पास आ जाते
- 15:12हैं। बाबा आप बुध को काटते हो नहीं
- 15:17कहाँ काटता हूँ भाई? मैं जब बुद्ध हो जाता हूँ तो
- 15:23बुद्ध की बात आपको बताता हूँ सटीक कि बुद्ध ने क्या कहा पक्का जानता
- 15:31हूँ मुझे कोई इसमें गलतफहमी नहीं, कोई मुझे शंका नहीं।
- 15:37जब मैं बुद्ध के तप पे जाता हूँ तो मैं जानता हूँ कि साक्षी हो
- 15:41गया और बुध से आगे जब यात्रा करता कृष्ण होता तो मैं जानता कृष्ण
- 15:48क्या कहते हैं इसलिए मैं बोलता हूँ।
- 15:53ऑथेंटिक प्रामाणिक। अनुभव से युक्त कल्पना से युक्त
- 15:59नहीं, शास्त्र के नहीं लिखी लिखाई नहीं सुनी सुनाई नहीं देखा देखी
- 16:08लिखा लिखी की है। नहीं देखा देखी बात।
- 16:17स्वप्न में कैसे जागें? बहुत से मूर्ख लगे हुए हैं स्वप्न
- 16:20में जागने के अधिष्ठान करने के लिए, लेकिन सब बेकार हो जाएंगे।
- 16:30मैंने पहला शब्द कहा। करने कराने की बातें अध्यात्म में
- 16:35बेकार संसार के लिए साकार संसार के लिए परिश्रम की बातें सुन,
- 16:47अध्यात्म के लिए विश्राम की बातें सुन।
- 16:51सारे श्रम तो दो सारे श्रम को छोड़ दो, लेकिन ये मुश्किल बहुत
- 17:00है। तुम कहोगे जीवन के निर्वाहण के
- 17:09लिए। काम धाम तो करना ही होगा।
- 17:13बिलकुल करो भाई चौबीसों घंटे तो अब भी नहीं काम करते छोड़ दे सारी
- 17:22दुनिया किसी के लिए। यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए छोड़
- 17:39दे सारी दुनिया किसी के लिए यह मुनासिब।
- 17:49नहीं प्यार से भी जरूरी कई काम है।
- 18:02वो प्यार जो आपके अंत में साक्षी बनकर बैठा।
- 18:07वो प्रेम का भरा हुआ समुद्र है, प्यार से भी जरूरी कई काम है
- 18:20प्यार सब कुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए।
- 18:27छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए अपने भीतर जाना उस प्रेम तक जाना
- 18:44जो आनंद का समुद्र है। उससे भी जरूरी काम है क्या?
- 18:53जीव का उपार्जन करना बिलकुल ठीक है, लेकिन चौबीसों घंटे तुम कहाँ
- 19:00करते हो? जीव का उपार्जन, उसके बाद थोड़ा
- 19:05सा वक्त। अध्यात्म के लिए भी दे दो वो ही
- 19:14है असली तुम्हारा देह, लेकिन याद रखो प्यार से भी जरूरी कई काम
- 19:28हैं। तो फिर संसार से जरूरी भी कई काम
- 19:35संसार से जरूरी भी एक काम है, जो अति महत्वपूर्ण है।
- 19:42जिसके न सजने के कारण तुम तड़पते ही रहोगे, वो क्या है?
- 19:47संसार से जरूरी प्यार है, संसार से जरूरी प्रेम है, संसार से
- 19:54जरूरी आनंद है, ये दोनों जप योग हो जाते हैं, इसे ही योग कहते हैं
- 20:04संसार। और प्यार ये दोनों इकट्ठे हो जाते
- 20:09हैं तो फिर वो महत घटना घटती है। बुध कितना ही अपवास क्यों न कर
- 20:16रहा है आखिर भिक्षापत्र उठा के जाना ही पड़ता है।
- 20:23पेट में आग लगती है। भूख को शांत करने के लिए दूसरों
- 20:30के दरवाजे पे दस्तक देनी ही होती है।
- 20:37बहुत से शिविर लगाने वाले लोग। मेरे पास आ जाते हैं, आप जानते हो
- 20:464:00 बजे से पहले मैं मिलता नहीं हूँ, बहुत से लोग पूछ लेते हैं
- 20:54बाबा 4:00 बजे से पहले क्यों नहीं मिलता है?
- 21:00क्योंकि अगर 4:00 बजे से पहले आप मेरे माथे लग गए तो बाली बाली बात
- 21:07होती है मेरी आंधी शक्ति आप में चली जाएगी और मैंने उठते ही
- 21:14वीडियो बनानी होती है। चाय पी के।
- 21:19वीडियो बनाने से पहले मेरे पास कोई न आए, तुम कहोगे घरवाले चाय
- 21:33देने तो आते हैं, आते हैं, वो तो रोज़ के खेर लड़ जाए, उन्होंने तो
- 21:37पी लिया, वो बिना कुछ दिए पहुँच जाएंगे।
- 21:43अब उनका सौभाग्य समझो या प्रकृति की यह एक लाजवाब तोहफा समझो।
- 21:57क्यों उन्होंने इस घर में जन्म लिया?
- 22:01अब यहाँ लोग रुकते हैं। जाते हुए कहते हैं बाबा एक बार
- 22:06प्रणाम मैंने करना है, प्रणाम रात को कर लो, तुम विदा होते हुए 2
- 22:15घंटे बैठो, एक घंटा बैठो, बातचीत करो, समस्या को सर्वे करो लेकिन
- 22:19सो गए। सुबह के हो जाता है सारी रात मैं
- 22:28उस साक्षी के करीब उस कार की डग्गी को भरता हूँ जो सुबह कार
- 22:35मुझे चलानी होती है आपकी भाषा में बोल रहा हूँ।
- 22:42इसलिए कृष्ण ने कहा जब तुम्हारा संसार का यात्री रात को सोता है
- 22:52तो मेरा योगी रात को जागता है, वह कौन है जो जागता है?
- 23:00ओहो मेरा। स्वयं का अस्तित्व है जो जागता है
- 23:09और अकेला मैं नहीं जागता मेरे संग संग सारा अस्तित्व जागता है ये
- 23:19शरीर सो जाता है। पहले भी ये शरीर मुझे दिखाई पड़ता
- 23:26था लेकिन तब मैं सोया सोया था। आपको भी शरीर दिखाई पड़ता है,
- 23:33शरीर रेस्ट फुल अवस्था में आ जाता है।
- 23:38टिश्यूज़ रात को रिपेर हो जाता। और आप फ्रेश हो के जब बाहर आने
- 23:43लगते हैं अपने स्वभाव से तो रास्ते में ये घटना घटती है सोपन
- 23:50की और आप होते हो मूर्छित। आपने अभी स्वयं का दर्शन नहीं
- 23:56किया होता। उस मूर्छित अवस्था में तुम्हें
- 24:01सपने आते हैं। सपने आने का मतलब तुम्हें अपना
- 24:08ज्ञान नहीं हुआ? सीधा सीधा अर्थ सर अगर तुम्हें
- 24:14सपने आते। बुले शाह कहते हैं, राति सपना वे
- 24:19न जेड़े अल्लाह वाले हो दिन की कल्पना समाप्त क्योंकि जिसे रात
- 24:30को सपना आएगा उसे दिन में कल्पना भी आएगी।
- 24:37जिसकी दिन की कल्पना खत्म हो गई उसको रात को सपना भी नहीं आएगा।
- 24:43ये दोनों पैरेलल चलेंगे और एक अनुभव के कारण चलेंगे।
- 24:51वो अनुभव है कि आपने अपने आप को जान लिया वो एमआइ मैं कौन हूँ और
- 25:04जिसने भी कभी अपने आप को जान। वह थोड़ा सा आगे जाएगा तो
- 25:17परमात्मा हो जाएगा। कृष्ण हो जाएगा अपने आप को जानने
- 25:24तक प्रत्येक व्यक्ति बुद्ध हो जाता है और अपने आप से बात।
- 25:32आगे चलकर अस्तित्व को जानना अस्तित्व में समझ आना उर्कर्षण हो
- 25:39जाएगा व्यक्ति तो बहुत से शिविर लगाने वाले व्यक्ति बहस करने की
- 25:49मुद्रा। में मेरे पास आ जाते हैं जिसके
- 25:55रात की स्वप्न मिटें उसके दिन की कल्पना भी मिटें तुम्हारी
- 26:03कल्पनाएं दो कौड़ी की कल्पनाएं? टका भर भी उनकी वैल्यू नहीं है।
- 26:17क्या कल्पनाएं हैं तुम्हारी? अच्छा से पति मिल जाए, अच्छी से
- 26:26पत्नी मिल जाए, खूब पैसा हो। बड़ी बड़ी कारें हो, लक्ज़री
- 26:40सेवेन, स्टार होटल जैसी सुविधाएं हो ऐसा महल हो सब सुविधाएं हो।
- 26:51और लोग आगे स्लम करें, प्रतिष्ठा घनी हो, मान गण हो ये तुम्हारी
- 27:01कल्पनाएं हैं और ये कल्पनाएं टके भर से ज़्यादा नहीं।
- 27:12अगर तुम अभी इन चीजों में उलझे हुए हो कि लोग मुझे प्रणाम करे,
- 27:19लोग मेरे अंगरक्षक बनकर मेरे संग संग चले, लोग मुझे बचाए।
- 27:33बुद्ध कभी अंगरक्षक साथ नहीं रखते, ना नानक रखते हैं, ना कबीर
- 27:38रखते हैं, ना कृष्ण रखते हैं। कृष्ण अकेले ही जाते हैं, महावीर
- 27:45भी नहीं रखते, वो तो भिक्षुक बन कर जाते हैं, क्योंकि उन्होंने
- 27:51जान दिया। मेरा दुश्मन अगर किसी को मारेगा,
- 27:58मुझे नहीं मारेगा, मैं ना मरूँ, मरे संसारा होगे, मिला जलावन हरा।
- 28:12उसको मने सगल पावन की शुद्ध उसको सब दिखाई पड़ता है।
- 28:23मैंने आपको बताया के एक बड़ी तथाकथित।
- 28:30प्रसिद्ध तथा कतिथि होगा। प्रसिद्धि तथा कतिथि होती है।
- 28:37स्वयं की प्रसिद्धि तो प्रतिष्ठा के बाद मिलती है।
- 28:41स्वयं में प्रतिष्ठित होने के बाद परमात्मा तुम्हें प्रसिद्धि देता
- 28:46है। परमात्मा के दरबार में आप
- 28:57सम्मानित होते हो पंचेय पांवि दरगाह मान जो स्वयं में
- 29:05प्रतिष्ठित हो गया वो दरगाह में मान पाता है यानी परमात्माओं से
- 29:10मान देता है। और इस संसार में तुम्हारा है क्या
- 29:14ढाबे के अतिरिक्त तुम्हारा है क्या तुमने कुछ बनाया तुम्हारे
- 29:21बाप ने, तुम्हारे दादा ने उसके उसके बाप दादा किसी ने कभी कोई एक
- 29:27कण धरती का बनाया। पानी का बनाया वायु का, आकाश का
- 29:37अग्नि का कुछ बनाया नहीं बनाया तो फिर इसीलिए सिर्फ तुम्हारा दावा
- 29:45ही है, ना सिर्फ स्टेम्प लगाते हो, तुम कि ये मेरा।
- 29:51और वह स्टेम्प झूठी होती है, मृत्यु दूध का दूध और पानी का
- 29:57पानी कर देते हैं। तुम डणम से घर पड़ते हो फिर
- 30:02तुम्हारा क्या रह जाता है, ये देखना वो तुम्हारा है।
- 30:08मृत्यु के बाद भी। जो सच में तुम्हारा मना रहे वो
- 30:13तुम्हारा मृत्यु के संग जो तुम्हारी संग न चले वो तुम्हारा
- 30:23है नहीं मात्र खोखला दवा था। आज मृत्यु ने उस भ्रम को तोड़
- 30:28दिया। मृत्यु बड़े वड़ों के भ्रमों को
- 30:32मिटा देती है यहाँ बड़ी सर्कस करते हैं लोग उन सब सर्कसियों को
- 30:41मृत्यु आइना दिखा देते हैं ये देखो ये तुम्हारा आइना, ये
- 30:46तुम्हारी शक्लो सूरत। सीधा सीधा मेजरमेंट सीधी सीधी
- 30:56परीक्षा जो मृत्यु में तुम्हारे संग चले वो तुम्हारा सच्चा साथी।
- 31:09जो मृत्यु में तुम्हारा संघ छोड़ जाए, वो तुम्हारा साथी कैसे हुआ?
- 31:18प्रोस्पर्टी मेक्स फ्रेंड्स एडवर्सिटी ट्राइज़ देम एडवर्सिटी
- 31:25आई। आपातकाल आया, मृत्यु आ गई, संघ
- 31:30कौन चला? बस जो चला वो तुम्हारा शिक्षा साथ
- 31:33है। प्रस्पति मेक्स फंड तुम सम्पन्न
- 31:38थे तो तुम्हारे बहुत से मित्र बन गए।
- 31:43शरीर भी तुम्हारा मित्र बन गया, धन भी तुम्हारा मित्र बन गया, पद
- 31:46भी भी तुम्हारा मित्र बन गई, प्रतिष्ठा, मान, प्रतिष्ठा, नाम,
- 31:51धाम सब लोगों का समूह जनता भी जयजागर वो तुम्हारी संगीत साथी हो
- 31:57गई लेकिन। जब बुरे दिन आएँगे, अच्छे दिन चले
- 32:06जाएंगे तो परीक्षा होगी। इन संगीत साथियों की कितने संगीत
- 32:13साथी थे? कितने संग जाएंगे?
- 32:20एक जाएगा तुम्हारे संग अभी तक तो तुमने सुना होगा कोई साथ नहीं
- 32:26जाएगा नहीं एक साथी तुम्हारे संग जाएगा वो साथी है जो तुमने इस जनम
- 32:36में। कौन से संन्यास की तरक्की के
- 32:41उत्थान के तुम्हारी चेतना का स्तर तुमने कितना ऊंचा उठाया?
- 32:50तुम पशुता के तल पर थे, पाश में बंदे।
- 32:54लेकिन अभी भी तुम अगर पशुता की तल पर हो, बोझ ही ढोना चाहते हो,
- 33:02गधों की तरह भागना ही चाहते हो? घोड़ों की तरह?
- 33:16उन लम्हों में जाना चाहते हो जो तुम्हारे अंतसकेलम हैं अंतसंभव के
- 33:32लम है तो फिर तुम गधे ही हो। बोझा ढोते हो।
- 33:42अगर शरीर के कपड़े ही बदलते रहे, साड़ियां ही बदलती रहे, लोगों को
- 33:52सोने की पुषां की, बहन चढ़ाते रहे तो याद रखना।
- 33:58तुम लोगों को नहीं चिड़ा रहे हो, तुम खुद को चिड़ा रहे हो।
- 34:04संत कहते हैं तुमने तरक्की तो की नहीं, काश तुमने कौन से स्नेक्स
- 34:10की तरक्की की होती तो यह आज दिखावा बाजी न होती।
- 34:18जब तक दिखावा है तब तक तुमने रश पिया नहीं, जो रश पी लेता है।
- 34:27वह तो चुपके से अपने कोने में बैठा प्याले को लबों से लगा के।
- 34:33उस रस को गटक जाता है। सुरत कलारी भाई मत बारी।
- 34:55सूरत। कलारी भय मतभारी मधुबा पी गई।
- 35:09बिन बोले। सूरत कलारी भाई मैं तुम्हारे मदवा
- 35:21पी गई, बिन बोले कौन दिखाबा बाजी करेगा, किसको दिखायेगा?
- 35:29वह इतना मधुर रस है कि तुम एकांत में बैठ जाओगे, प्याले को लबों से
- 35:42लगाओगे और जल्दी से गटक जाओगे। इसलिए कबीर ने कहा।
- 35:51जो हीरा पा लेता है। हीरो पायो गांठ गठियायो हीरो
- 36:05पायो। गांठ गठियों बार बार बा को क्यों
- 36:16खोले? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल?
- 36:26मन मस्त हुआ फिर क्यों वो वो आ रहे हैं साँसों झरा।
- 36:35आज हिस्सा चालू दिल के धड़कने से भी इबादत में खलल पड़ती है।
- 36:47राधे राधे भी तुम्हें बड़ा दुख देगा अब तो तुम्हें बड़ा सुख देता
- 36:53है राम राम भी तुम्हें बड़ा दुख देगा अल्लाह शिव सब तुम्हें दुख
- 37:00देंगे जुबा हिली नहीं। कि दुःख आये ऐसा मौन पर मौन चाहिए
- 37:09कि जुबा ना हिलाए यहाँ जो मूल लोग तुम्हें सीखा रहे हैं जुबा हिलाते
- 37:18रहो सारे दिन भोंकते रहो। वो तुम्हें ठीक मार्ग नहीं दिखा
- 37:26रहा है। तुमने उस स्थल पर जाना जहाँ बोलने
- 37:31में बड़ी मुश्कलात पैदा हो और दूसरा कारण।
- 37:394:00 बजे तक मैं बोलने की हालत में नहीं आता है।
- 37:43बस भीतर से जो रस फूटता है इसलिए आपको बंट देना चाहता हूँ, उससे
- 37:50बढ़िया रस और किसी वक्त में नहीं आएगा।
- 37:54रात भर का बिया हुआ। ताजा ताजा।
- 37:58यह मधुर प्याला प्रेम का तो मैं पीला जाना चाहता हूँ इसलिए सुबह
- 38:04सुबह सबसे पहले आपके लिए वीडियो हीरो पायो गांठ कठियायो बार बार
- 38:15बाकी क्यों खोलें? जो दिखावे बाजी करता है समझो उसको
- 38:25उसके होने का लुत्फ नहीं है। अगर हीरा होने का लुत्फ नहीं
- 38:31तुम्हें मिला तो हीरे को दिखाने का लुत्फ ज्यादा मिलेगा।
- 38:38यही तो बताता है कि हीरा जो तुमने पाया वो हीरा था ना वो नकली हीरा
- 38:47था। वो तुम्हारे लॉकर की शोभा बना हुआ
- 38:54हीरा था। नौ लक्खे हार होंगे लेकिन वो हार
- 39:00तुम्हारे काम के नहीं। एक हीरा और भी है जीस तरफ कबीर
- 39:06इशारा करता है वो हीरा वो नहीं। जो तुम्हारे लॉकर में तुम रख लेते
- 39:12हो ये वो हीरा है जो मधुर रस का प्यारा हो फिर उसे दिखाते थोड़ी
- 39:21भरते हो तुम तो यहाँ जान मखाने में बैठ के जो भर लेते उसे भी
- 39:28दिखाते कहाँ हो? कोई देख ना ले ये कोशिश करते हो
- 39:33और गटेकने की जल्दी करते हो देखा ना तुम गटेकने की जल्दी करते हो
- 39:38कोई देखने दे अगर कोई दिखा तो फिरेगा जाम तो फिर कहीं कोई चूक
- 39:46है? इसको भी एक मापदंड की तरह ले
- 39:54लेना। एस ए मेज़रमेंट जो जितना ज्यादा
- 40:02दिखावा करता है, समझो उतना भीतर से सोता।
- 40:08थोथा चना बाजे घना, जो बार बार सूट बदल के आता है अब और फिर और
- 40:18फिर और फिर और वह मूर्ख है पहले खुद।
- 40:25और फिर जिनको दिखाता है अगर वे प्रभावित हो जाते हैं, तो वे उससे
- 40:33बड़े मूर्ख दिखावे बाजी अपने आप में अपूर्णता को दिखाने का आभास
- 40:43है कि तुम पूर्ण होवे। तुम कहीं थौथे हो थौथा चंद बाजे
- 40:55घन इसलिए मैंने कहा देखा वे वाजी। पहले तो आप करने से शुरू करोगे?
- 41:13कपड़ा फटा है, फटा है उसे सुई धागे से सीम लो यह है कपड़ा तुम
- 41:22नहीं शरीर विकृत है। उसका इलाज करा लो, लेकिन शरीर तुम
- 41:32और नहीं लोगों को समझाने की चेष्टा करते हो?
- 41:39अल्फा से समझाया जा नहीं सकता बहुत तत्व।
- 41:48इसलिए संत कह देते हैं देखो बोला तो बहुत लेकिन ये मत समझना कि बोल
- 41:56दिया गया जिसे बोलना चाहता था वह बोला अभी भी नहीं गया।
- 42:06अभी भी वो छुई वुई की तरह छुपा हुआ है?
- 42:13अभी वो प्रकट नहीं हो सका और शब्दों में वो प्रकट हो भी नहीं
- 42:20सकता प्रकट होगा तुम्हारे देखने से।
- 42:26तुम जब आँखें खोल के निहारोगे उसे तल पर जाकर देखोगे, तो फिर पाओगे
- 42:35के सत्य किसने कहा? और झूठ किसने कहा वहाँ जाकर तराजू
- 42:43तुलते हैं। चिंघ के आईं या बड़े आईं वाच धर्म
- 42:52हदो करनी आपो अपनी केनरा के दो। वहीं जाकर पता चलता है क्या सच
- 43:03क्या झूठ? शंकिया, बुरियाइयां, वाच्य धर्म
- 43:08महदुर और धरमराज की ज्हरी में बाबा कहते हैं जाकर सच और।
- 43:14असच का अन का न्याय होता है, ठीक क्या है?
- 43:24वो गलत क्या है? अगर तुम दिखावा कर रहे हो तो याद
- 43:35रखना विवाह शादी में तुम जाते हो अपनी पोशाकों को दिखाते।
- 43:46अंतरंग क्षणों में जाते तो दिखाते हो किसी को क्यों उसमें थोड़ा सा
- 43:53आनंद दिखता है दूर से सही दूर से सही लेकिन वह मधुर कलश दिखता है
- 44:04उन क्षणों में। सिर्फ एक वही क्षण है इसलिए काम
- 44:08के क्षणों को इतना महत्त्व दिया गया।
- 44:12काम के क्षणों को वात साइन हला के ब्रह्मचारी था, उसने भी महत्त्व
- 44:18दिया और काम सूत्र बोल दिया। क्यों?
- 44:23क्योंकि काम के क्षणों में दूर से ही सहि, लेकिन उसका दर्शन होता है
- 44:32इसलिए तो हमारी लालसा होती है कि हम काम के उन क्षणों में बार बार
- 44:37जाएं और मधुर लम्हे बार बार चखें। देखें।
- 44:44और संत तुम्हें कहते हैं पागल मत बनो और तुमको सितारों पहले चलो।
- 45:05दिल झूंजा ऐसी बहारों में ले चलो। आओ हजूर, तुम कहाँ फंसे हुए हो,
- 45:26दूर से देखते हो परमात्मा के उस कलश को और सम्मोहित हो जाते हो और
- 45:36बार बार। उसको देखने के लिए लाला ही तो
- 45:41होते हो। संत कहते हैं, दिखता तो वो है
- 45:49विलाशक काम के अंतरंग क्षणों में जब तुम पीक पॉइंट पे होते हो।
- 45:57तो दिखता तो वह है, लेकिन कितनी देर के लिए है एक पल के लिए और एक
- 46:04पल के लिए देखना भी तुम्हारे जीवन मृत्यु का सवाल हो जाता है।
- 46:09तुम जीवन तक को दांव पे लगा देते हो बलात्कार में क्या होता है?
- 46:23अभी लोग कहते हैं बलात्कार के अभी योगी को टांग दिया जाए, तुम चाहे
- 46:28टांग दो रुकेंगे नहीं क्यों? क्योंकि उन क्षणों में उसे
- 46:40परमात्मा दिखा। दूर से ही सही, लेकिन तेरा दीदार
- 46:48हो गया और उसके दीदार के लिए व्यक्ति टंगना सस्ता समित है उन
- 46:59क्षण। इसलिए बार बार उन क्षणों में जाने
- 47:04की उसकी कामना होती है। लालायित होता है वह इसलिए कल तक
- 47:13जिन्होंने जो गृहस्थी में हुए नहीं जिन्होंने शादी नहीं की भवा
- 47:17नहीं किया, संभोग नहीं किया। वो तुम्हें इरेक्शन का फॉर्मूला
- 47:22समझा रहे हैं, अब पहचान लेना कौन संत है वो और तुम तो तुम तो
- 47:33ढूंढ़ते ही हो, इरेक्शन बना ही रहे और तुम बार बार उन क्षणों में
- 47:39जाते रहो। नहीं संत कहता है कहाँ उलझे हो पल
- 47:51दो पल की अब तुमने देख लिया के परमात्मा दिखा तुम्हें आओ तो मैं
- 47:56यही पल श्रद्धा के लिए दिखा देता हूँ।
- 48:03दिल छू जाए ऐसी बहारों में ले चलो।
- 48:15हजूर, तुमको संत यही कहता है, दूर की झलक पाकर तुम्हें इतना कुछ
- 48:30दांव पर लगाने के लिए तैयार हो गए।
- 48:36संत अच्छी तरह जानता है क्योंकि संत इन रानों से गुजरा हुआ है इन
- 48:41गलियों की धूल उसने फांकी इन गलियों में वो खेला जहाँ अब आप
- 48:48खेल रहे हो इसकी मिट्टी को। अपने शरीर से चिपकाया खेला, खूब
- 48:58खेला। वो ये भी जानता है कि फिर नहादों
- 49:05के स्नान करके वस्त्र नए पहन के ऐसा भी कुछ होता है।
- 49:14सदा के लिए तुम उस आनंद को चखते रहो, दिवाली तुम्हारी 1 दिन आती
- 49:23है और कहाँ आती है पटाका फोड़कर तुम 20 फोटो का आनंद लेते हो?
- 49:32विस्फोट में कहीं आनंद होता है। दिवाली में पटाखे अगर ना छूटे तो
- 49:40आनंद ही नहीं आया। दिवाली का वो आनंद तीब्र आवाज का
- 49:48था। विस्फोट अगर ना हो छुर लिया ना
- 49:54चलें। पटाखे ना बजे तो दिवाली आई ही
- 49:58नहीं लेकिन संत कह था कि श्रद्धा दिवाली साथ थे।
- 50:07आओ तो मैं उस स्थल पर ले चलो। जहाँ दिवाली एक पल के नहीं थी,
- 50:16जहाँ दिवाली एक दो पल के नहीं थी, जहाँ दिवाली श्रद्धा के लिए थी और
- 50:22वो तल है। अगर तुम अभी भी पटाखे फोड़ रहे
- 50:28हो। दिवाली की आने की राह बाट जो रहे
- 50:34हो तो एक बात साफ कि तुम्हें अभी तक कोई आनंदित व्यक्ति मिला नहीं,
- 50:45कोई रसखान तुम्हें मिला नहीं। अगर तुम्हें कोई रसखान मिल गया
- 50:55होता, वह तुम्हें कहता कि छोड़ो इसको माना पल भर का आनंद है,
- 51:10लेकिन। पल भर के लिए मेहमान यहाँ पल भर
- 51:26के लिए। मेहमानों में यहाँ नहीं मंजिल है
- 51:40कहाँ है पल भर के लिए है मेहमान यहाँ।
- 51:51इशारे समझे मैं कहाँ बोल रहा हूँ मालूम नहीं मंजिल है कहाँ पल भर
- 52:02के लिए संत कहते हैं जिसे पल भर के लिए तुमने देखा।
- 52:12आओ उसी मंजिल के ऊपर ले के जाके तुम्हें उसी समुद्र के भीतर
- 52:18अटकेलियां करवा देता हूँ, उसी मानसरोवर में तुम्हें डुबकियां
- 52:25लगवा देता हूँ, चलो मेरे संग कहाँ उलझे हो?
- 52:34कितने भाग्यहीन हो तुम तुम्हारी भाग्यहीनता पर हमें रोना आता है ए
- 52:50मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया। तुमने मान से देख पाकर क्या
- 53:04कमाया? सिर्फ दहावे बाज असर नहीं मिला तो
- 53:13दिखावे बाजी शुरू होती है। इसको सर्कल में ले लो।
- 53:21असर नहीं मिला तो दिखावेबाजी शुरू होती असली फूल जब धरती में नहीं
- 53:30धरा की को को बांटकर जब असली फूल नहीं निकला, सुगंध नहीं बिखरी तो
- 53:35तुम प्लास्टिक का फूल तैयार कर लेते हो।
- 53:39फैक्टरी में। इतर छिड़क लेते हो, बिल्कुल सेम
- 53:43सर्कमस्टैंसेस पैदा कर लेते हो लेकिन वो असली नहीं होता।
- 53:53वह नकली होता है और नकली तो तुम कितना ही बनाते चले जाओ फैक्टरीस
- 53:59में तो। असल में तो तुम एक बार के लिए
- 54:02जिसे देखते हो वह फैक्टरीज़ में लाखों लाखों की तादाद में बन जाता
- 54:09है, पलभर के लिए है मेहमान यहाँ मालूम नहीं मंजिल है कहाँ?
- 54:24तो संत अगर कभी मिल जाए तो ध्यान रखना।
- 54:32पहली बात वह लो भी नहीं होता जिसे सर्वस्व मिल गया।
- 54:44वह फिर कामना काहे की करेगा? अगर अभी कामना बची तो समझना कि वह
- 54:53सर्वेस हुआ ना? अगर किसी ने अपनी एंट्री फीस रख
- 55:01ली शिव वर्गी। तो समझना अभी लोभ बाकी है और
- 55:08जिसका लोभ बाकी है, वह अधूरा है, वह कुछ और पाना चाहता है।
- 55:20ये तो हमारे बड़े बड़े औधम पर बैठे हुए अमेरिकन प्रेसिडेंट हो
- 55:24जाते हैं। लोह बना रहता है।
- 55:27इसका मतलब अमेरिकन प्रेसिडेंट की कुर्सी पर जाकर भी तुम तृप्त नहीं
- 55:33होवे, यह इस बात की खबर देता है। तुम कभी कुछ और बनना चाहते हो?
- 55:41अभी कुछ और बनना चाहते हो? वो क्या बनना चाहते हैं उसका
- 55:45तुम्हें भी पता नहीं है। इसलिए मैं ट्रंप जैसे लोगों को
- 55:49महा मूड कहता हूँ। ऊंची गद्दी पर बैठे हुए
- 55:54राष्ट्रपति प्रधानमंत्री इन्हें मूर्ख कहता हूँ।
- 55:58क्यों? क्योंकि अभी वो नहीं मिला जो
- 56:03तृप्त करते है और जो तृप्त हुआ। हंसा पायो।
- 56:16मानसरोवर हंसा पायो मानसरोवर ताल दलिया क्यों डोल?
- 56:36ताल तलैया क्यों डोल? मन मस्त हुआ हुआ फिर क्यों बोला
- 56:48मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला? अगर अभी आकांक्षा और है तो समझो
- 56:59तृप्ति नहीं हुई। सीधा सीधा मेज़रमेंट कोई बल फेर
- 57:07नहीं है इसमें अगर तुम अभी। सबसे समृद्ध देश के राष्ट्रपति
- 57:19होकर भी अभी कुछ और पाना चाहते हो।
- 57:23वह मूर्ख जानता नहीं कि फिर मैंने अभी पूर्ण नहीं पाया।
- 57:28मैंने जो पाया वह अपूर्ण था। काश इन तथाकथित ऊंची पदवीयों पर
- 57:42बैठे हुए लोग उस रस के प्याले को पी लेते, वो तृप्त हो जाती और
- 57:49जीसको तृप्ति मिली। वह ताल तलैया में क्यों डोलेगा ये
- 57:58तुम्हारी मान प्रतिष्ठा, ये तुम्हारी सूचनाएं डिग्रीज़ बड़ी
- 58:08बड़ी पथबियाँ। बंगले कोठी कारें तुम्हारी जहाज
- 58:13तुम कितने बड़ी बड़ी फैक्टरीज़ के मालिक और कितनी फैक्टरीज़ के
- 58:17मालिक ये सभी तब उत्पन्न होता है जब तुम्हें भीतर से कुछ कमी खलती
- 58:24है के में कमी है अभी कुछ और मज़े की बात कमी तो भीतर।
- 58:29पूरी करते हो तुम बाहर से कमी और तुम पूरी करते हो बाहर से फिर और
- 58:43धन जोड़ लूँ तो कमी पूरी हो जाएगी।
- 58:46इसीलिए मैं तुम्हें मूर्ख कह रहा हूँ।
- 58:50बड़ी गल्तियों पे बैठने वाली है, इतने ऊंचे पहुँच गए तुम ललचाई
- 58:56दृष्टि से देखते हो। कितने लोग लगे हैं?
- 59:00प्राइम मिनिस्ट्री की रेस में किसकी टांग थे चलु अभी लेकिन कर
- 59:07नहीं पाते। साहस भी तो चाहिए?
- 59:13संत में साहस होता है, मज़े की बात है कि क्या करें?
- 59:20संत तृप्त होता है, अतृप्त व्यक्ति ही तुम्हारी टांग
- 59:26खींचेगा। अष्टावक्र क्यूँ टांग खींचेगा जनक
- 59:31की जनक खुद ही अष्टावक्र के चरणों में आके घर जाएंगे जनकों ने सदा
- 59:42ही अष्टावक्र के चारने चुमे क्यों?
- 59:46वह भीतर से तृप्त हुआ, मस्त हो गया, मन मस्त हुआ फिर क्यों वो हो
- 59:57ले मन मस्त हुआ फिर क्यों वो हो ले?
- 1:00:09स्वप्न में कैसे जागें? पहले जागृति में जागना होगा।
- 1:00:21जबो सुबह उठो लंबे लंबे स्वांस लो मथुर वेला है ऑक्सीजेनेटेड माहौल
- 1:00:27है। ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन खींच लो
- 1:00:31ताकि सारे दिन तुम्हारी ऑक्सीजन की पूर्ति बेहतर ढंग से होती रहे।
- 1:00:38खूब लंबे, लंबे सांस खेचो याद रखो, दिन 12 घंटे का तो होता है।
- 1:00:47या 10 घंटे का? तो अगर आधा घंटा श्वास खींचने पे
- 1:00:52लगा तू क्या जो सारे दिन भर रात आपको काम करेगा सुबह सुबह
- 1:01:01ऑक्सीजनेटेड हो जाओ क्योंकि बिना प्राण और जा के।
- 1:01:07बिना फ्यूल के ये तुम्हारी गाड़ी चल नहीं सकेगी तो इसे मत चूक
- 1:01:14जाना। जैसे तुम खाना नहीं बोलते वैसे ही
- 1:01:19फ्यूल डलवाना मत भूलना। लंबे लंबे सांस खेचना और छोड़
- 1:01:23देना इसे क्रिया योग कहता हूँ, मैं इसकी प्रोसेसर तुम मेरी
- 1:01:32किताबों में देख सकते हो, रोहित की वीडियो तुम्हें मिल जाएंगे।
- 1:01:40मैंने भी वीडियो में बोला है लंबे लंबे श्वास कह दो, खूब लंबे लंबे
- 1:01:48श्वास कह दो, सांस को छोड़ दो, सारे का सारा श्वास छोड़ दो, पूरे
- 1:01:55का पूरा श्वास लो, सारे का सारा श्वास छोड़ दो।
- 1:01:59अगर तुम्हें आनंद आता है कई व्यक्तियों को आनंद आता है।
- 1:02:03कुंभ भगवान स्वास्थ्य भर लिया, थोड़ी देर रुक गए, वो स्वास्थ्य
- 1:02:13सारे खून में फैल जाएगा। ऑक्सीजन सारे खून में अच्छी तरह
- 1:02:17से फैल जाएगा। लेकिन देखिए परमात्मा ने ऐसी विधि
- 1:02:21बनाई है। स्वास्थ्य भरते ही सारे कुल में
- 1:02:24ततः क्षण फैल जाता है क्योंकि वो फेफड़ों में स्टोर हो जाता है
- 1:02:32लेकिन फिर भी अगर रोकने में तुम्हें आनंद आता है तो उसे रोक
- 1:02:36लो थोड़ी देर के लिए। 2 मिनट में एक श्वास लेना तो
- 1:02:42मुड़ता है, यह काम मत करना। इससे न तो उम्र बढ़ेगी, न कहीं
- 1:02:50कोई आपकी कुंडलनी वगैरह जागृत होगी, यह मूड बनाने के डगों से
- 1:02:56नहीं। इन्होंने खुद जाना नहीं, सिर्फ
- 1:02:59इन्होंने ओशो को सुना खुद नहीं पहुंचे कहीं पे ओशो को सुनते
- 1:03:08सुनते आपको भ्रम हो सकता है कि आप पहुँच गए प्रबुद्ध व्यक्ति को
- 1:03:15सुनते सुनते। बुद्ध को सुनते सुनते आपको भ्रम
- 1:03:18हो सकता है कि हम पहुँच गए, लेकिन ये मत भूलना कि भ्रम तो भ्रम ही
- 1:03:25होता है, स्वयं पहुँचना होता है, वहाँ आप मरे बिना कहावत है कि
- 1:03:34स्वर्ग नहीं मिलता। और आप मरे बिना मरो हे जौ की मरो
- 1:03:41मरो मरण है मीठा ऐसी मरने मरो जैसे मरने मर गोर्ख देता आप मरे
- 1:03:50बिना गोर्ख नहीं मिलता? तो गीता तुम्हें खुद मरना होगा,
- 1:04:02अपने भीतर जाने के लिए खुद मरना होगा।
- 1:04:09शब्दों को मत पकड़ लेना। शब्दों के पीछे छुपा हो, भाव को
- 1:04:14भी मत पकड़ लेना, भाव के पीछे छुपे हुए रहस्य को पकड़ लेना।
- 1:04:23तुम अपने भीतर जाओ बैठे जागते, जागते जाओ, सोते हुए तो सभी चले
- 1:04:33जाते हैं। शशक्ति में लेकिन तुम जागते जागते
- 1:04:37जाओ क्रिया योग करो फिर आराम से बैठ जाओ।
- 1:04:41नथिंग टु डू कुछ न करो, कुछ न करने का प्रयास भी न करो इन
- 1:04:52शब्दों को ठीक। बहुत से लोग कुछ न करने का प्रयास
- 1:04:57भी करते रहते हैं। जैसे बुद्ध की विप्सणा को साक्षी
- 1:05:06बनने का प्रयास करना वैसी ही मूर्खता है ध्यान में।
- 1:05:12कुछ नहीं करने का प्रयास करना सब थोड़े गहरे हैं।
- 1:05:16बार बार सुनना तो समझ में आ जाएगा, कुछ नहीं करने में बैठ
- 1:05:24जाओ। रिलैक्स युअर बॉडी एंड माइ
- 1:05:30कंप्लीट्ली। तुम्हारे मन और शरीर को पूर्णतः
- 1:05:36विश्राम में छोड़ दो, छोड़ दो छोड़ दो यही करवातें हैं तुमसे
- 1:05:47योग निद्रा में ले जाने वाले लोग। तो हमारे एक एक तंतु को छुड़वा
- 1:05:53लेते हैं, तुमसे छोड़ दो ये भी छोड़ दो ये भी छोड़ दो इट मीन्स
- 1:05:57क्लिंगिंगनेस छोड़ दो, चिपका छोड़ दो तुम्हें मूल मंत्र मैंने बता
- 1:06:01दिया सारे शरीर की क्लिंगिंगनेस यही तो दुख का कारण है तुम पकड़े
- 1:06:08बैठे हो? विचार भी में हूँ भावना भी मैं
- 1:06:13हूँ शरीर में मैं हूँ शरीर के अंग परतंग में हूँ यही तुम्हें दुख
- 1:06:18देती है और इसी का तुम मुआवजा मांगते हो कोर्ट के चेहरे में
- 1:06:23जाके ₹500,00,00,000। टका कीमत नहीं है इसकी 1% तुम
- 1:06:33सेल्फ हिप्रोटाइज़ हो, आत्मसमोहित व्यक्ति हो, जो 500,00,00,000 का
- 1:06:39माप जा हो, उतना ही ज्यादा अहंकारी व्यक्ति जितना ज्यादा माप
- 1:06:43जा मांगी। का?
- 1:06:45जो जान गया कि इसकी कोई कीमत नहीं, ये लबादा है और बड़ा पुराना
- 1:06:50हो गया। अब ये करीब 73 साल पुराना लबादा
- 1:06:55है। इसकी कोई कीमत रह गई बला गिस पिट
- 1:07:02गया जगह जगह से। पुराना शरीर ज़रा जीर्ण हो जाता
- 1:07:08है। इसीलिए कृष्णन कहते हैं कि मृत्यु
- 1:07:11जिसे तुम कहते हो वो सर्पस कपड़ों का बदलना है।
- 1:07:15वंश जीरनानी अथापिहाय नवानि घृणाति, नरों प्राणी।
- 1:07:22तथा श्री रानी विहाय जीर्ण अनन्य आनी सयाती नवानी देई प्राणी
- 1:07:31वस्त्र उतार दो, नए वस्त्र डाल दो।
- 1:07:33इससे ही तुम जीवन और मौत का खेल कहते हो तो अपने भीतर उतर जाओ।
- 1:07:42जागते जागते फिक्र न करो बहुत खुश आएगा जो तुमने दबाया ज़िन्दगी भर
- 1:07:47नहीं ज़िंदगियों भर पिछले जीवन की छात्राओं में भी तुमने जो दबाया
- 1:07:55वो सबसे ज्यादा तुमने दबाया मृत्यु के भय को।
- 1:08:01तो तुम्हें भय बहुत कम आएगा, क्योंकि जो दबाया वह निष्कासित भी
- 1:08:08होगा, वो ही आएगा जो तुमने दबाया उसकी लेयर से पे लेयर से लेयर से
- 1:08:15लेयर दंबती गई। आज ही हिमालय पर्वत जैसा पहाड़ बन
- 1:08:18गया भय का। इसलिए मैं कहता हूँ अज्ञानी
- 1:08:23व्यक्ति कायर भी होता है। ज्ञानी व्यक्ति ही साहसी होता है
- 1:08:31जैसे जैसे तुम अपने स्वरूप के पास पहुंचोगे तो तुम्हारी कायरता
- 1:08:37लुप्त होती जाएगी। तुम साहसी बनते चले जाओगे और उस
- 1:08:42अंतिम पड़ाव पर तुम कृष्ण जैसे दुस्साहसी हो जाओगे।
- 1:08:521 दिन आएगा बेटी के तुम अपने मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाओगे।
- 1:09:03जिससे कृष्ण ने कहा स्तिथिप्रज्ञ हो जा तुम स्तिथिप्रज्ञ हो जा, बस
- 1:09:11तुमने मंजिल पा दी स्तिथिप्रज्ञ जो हो गया उसने जान लिया कि यह
- 1:09:20लबादा है। यह ढांचा यह लवादा है।
- 1:09:28यह मेरा घर है। यह मेरे वस्त्र हैं, जिनको मैं
- 1:09:33ओढ़ के बैठा हूँ या इसके भीतर में बैठा हूँ, यह तुम्हें साफ साफ
- 1:09:39दिखेगा। यह कोई कल्पना नहीं है, पुत्री।
- 1:09:44यह सत्य का दर्शन है। नहीं तुम्हें साफ साफ दिखेगा और
- 1:09:50तुम्हारे सारे भ्रम टूट जाएंगे। यहाँ आकर व्यक्ति नी भ्रम की
- 1:09:58आवश्यकता में स्थिति में आता है। भ्रम के बिना अवस्था भ्रमहीनता
- 1:10:11स्पष्ट अपनी आँखों से देख लेना यह लबादा मैं तो नहीं।
- 1:10:24बस तुम जागृत हो गए, फिर तुम एक बार जागते जागते जागृत हुए उस तल
- 1:10:36पर पहुँच जाना जागरण कहलाता है। तुम तो रात रात भर चिल्लाते हो?
- 1:10:42माँ माँ करते हो? अरे माँ मेरे पास रोज़ आके कहती
- 1:10:48है बाबा इनसे पीछा छोड़ो ना, इनको क्या तकलीफ है, ये क्यों मुझे
- 1:10:57पकाते हैं। और तुम सारी रात यह मूड़ता है,
- 1:11:09इसलिए मैं कहता हूँ आज सनातन जितना विकृत होगा, इतना कभी भी
- 1:11:13नहीं, कोई वेला था जब सनातन विश्व गुरु था।
- 1:11:20आज वेला है जब सनातम विश्व गुरु का लोगों की भाम की ज्योति हो
- 1:11:25गया। वैसे तो सभी धर्म आज कुरूपता की
- 1:11:30कगार पर पहुँच गए, लेकिन बचा सनातन भी नहीं।
- 1:11:39सनातन ने भी ऐसा ऐसा आरोपण कर दिया है तुम देखते हो?
- 1:11:49कुमार चित्रों को बनाता चित्रकार चित्रों को बनाता फैक्टरी में ये
- 1:11:55चित्र बनते। अगर ये फैक्टरी से निकली हुई
- 1:12:00लक्ष्मी की फोटो ही कुछ दे देती तो फैक्टरी वाला इसे तुम्हें
- 1:12:05क्यों बेचता? अगर लक्ष्मी का चित्र बनाने वाला,
- 1:12:14मूर्ति का चित्र बनाने वाला जीस गणेश की तुम पूजा करते हो।
- 1:12:20ये सीजेआई जैसे जिनको हम समझदार लोग कहते हैं इतने मूड निकले, ये
- 1:12:26दिखावा करके फंस गए प्रबुद्ध व्यक्तियों को तो कम से कम समझ आ
- 1:12:31ही गया कि ये महामूर्ख थे। सीजेआई हो।
- 1:12:41यह छोटे पदों पर बैठे हुए जज हों। जब तक खुद को जाना नहीं है, ये
- 1:12:47मूर्ख ही रहेंगे। बड़े वकील हो या छोटे वकील हो, जब
- 1:12:53तक खुद को जाना नहीं है, ये मूर्ख ही रहेंगे।
- 1:12:57तुम चपड़ासी हो जब तुम प्रधानमंत्री हो या तुम
- 1:13:01राष्ट्रपति हो, जब तक खुद को जाना नहीं, तुम मूर्ख ही रहोगे।
- 1:13:09छ मेरी परिभाषा है और प्रत्येक संत की यही परिभाषा होगी।
- 1:13:16जो संत वास्तव में होगा अन्यथा तो उसकी मनगडंत होगी।
- 1:13:21अगर कुम्हार का बनाया हुआ चित्र लक्ष्मी का या दुर्गा का या
- 1:13:26सरस्वती का तुम्हें पढ़ाई दे देता या धन दे देता या शौर्य बल दे
- 1:13:32देता तो फिर वह कुम्हार बेचता क्यों?
- 1:13:38क्यों भेजता हूँ? बताओ चित्रकार क्यों भेजता है?
- 1:13:45चित्र को क्यों भेजती वो फैक्टरी कैलेंडर्स को?
- 1:13:56क्योंकि वो धन देते नहीं, कल्पनाएं हैं मात्र कभी चित्रों
- 1:14:02में भी वास्तविकता होती है, जैसे स्वप्न की कल्पनाओं में
- 1:14:07वास्तविकता नहीं होती। ऐसे ही तुम्हारे चित्रों में
- 1:14:12वास्तविकता नहीं होती ये तुम्हारे बनाए हुए परमात्मा के स्वरूप में
- 1:14:17तुम्हें उलझाने के लिए और सबसे बड़े से बड़े उलझन हैं।
- 1:14:22तुम्हारे ये चित्र और न जानेकन भाग्यहीन लम्हों में इन चित्रों
- 1:14:29का आविष्कार हो। बनाए गए थे।
- 1:14:33ये सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन के कारण जैसे एच टू ओह आज वैज्ञानिक
- 1:14:39ने बना दिया कल विज्ञान मूड होना शुरू हो जाए तो एच टू ओह को वो
- 1:14:43जीभ से चाटना शुरू कर देगा। ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ एच टू ओह।
- 1:14:49चाक से लिखा हुआ है हेच टू जीव से ही चाटना शुरू कर दोगे और
- 1:14:56प्रत्येक साइंटिस्ट ऐसा करने लगे। अगर साइंटिस्ट पागल हो जाए तो
- 1:15:02क्या प्यास हो जाएगी उससे? एक को चाटने से ब्लैकबोर्ड के एक
- 1:15:09को चाटने से प्यास बूझ जाएगी। नहीं बुझेगी ऐसा ही तो हम आज
- 1:15:14सनातन कर रहे हैं सनातन और क्या कर रहा है?
- 1:15:20यही तो सनातन कर रहा है। कोई हिंदू राष्ट्र चाहता है
- 1:15:28इन्हें ये नहीं पता तुम आज हिंदू राष्ट्र चाहते हो तो फिर धर्म तो
- 1:15:35बहुत है कर्को सिख सिख राष्ट्र चाहेंगे फिर क्या करोगे?
- 1:15:40फिर तुम अकाल तख्त को ढाओगे। फिर अकाल तख्त को उडाने वाले
- 1:15:45तुम्हें गोलियों से भून देंगे। सबकी भावनाओं हैं भाई ये जेड़ा
- 1:15:52छेड़ा किसने ये झगड़े का जेड़ा छेड़ा किसने जिसने हिंदू राष्ट्र
- 1:16:00की कल्पना की? ये कल्पनाएँ ही तो तुम्हें दुख
- 1:16:06में धकेल देते हैं। फिर आज तुम हिंदू राष्ट्र के लिए
- 1:16:13पदयात्रा निकालते हो। कल को सिख, खालिस्तान के लिए
- 1:16:19पदयात्रा निकालेंगे। परसों बौद्ध, क्योंकि बुद्ध यहीं
- 1:16:23जन्मे। बौद्ध देश के लिए वो पग यात्रा
- 1:16:32निकालेंगे, परसों जैन भी आ जाएंगे।
- 1:16:34चौथ और कितने धर्म है यहाँ? किस किस को क्या क्या दोगे अखंड
- 1:16:40भारत क्या है खंडित करने का प्रयास?
- 1:16:43तो तुमने शुरू कर लिया और इतनी बुद्धि तुम में नहीं है मूर्खों
- 1:16:50यह तुमने शुरू क्यों किया, तुम्हें पता नहीं।
- 1:16:56केस के दुष्परिणाम कितने आने वाले हैं?
- 1:16:59तुम तो चले जाओगे। इसे समृद्ध राष्ट्र बनाकर 47 में
- 1:17:072000। लेकिन जो आने वाले फल भुगते हैं
- 1:17:12उनका क्या होगा? बंद करो ये बकवास आज हिंदू
- 1:17:23राष्ट्र बनोगे, कल को सिख कहेंगे, हम तो सिख राष्ट्र बनेंगे फिर
- 1:17:29बौद्ध कहेंगे ये हमारा देश देखो उखाड़ के।
- 1:17:33तुम नीचे उखाड़ के देखोगे याद रखो जितनी बुद्ध की मूर्तियां
- 1:17:37मिलेंगी, उतनी तुम्हारी नहीं मिलेंगी तुम ज़रा खोद के देखो
- 1:17:44धरती भरी पड़ी है बुद्ध के बुद्ध की इतनी मूर्तियां बना देगी जिसका
- 1:17:50हिसाब। ऐसे ही सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म
- 1:17:58अपनाया नहीं। बुद्ध धर्म उस वक्त अपने पीठ,
- 1:18:01पैसा और कितनी बुद्ध की मूर्तियां दबी पड़ी हैं?
- 1:18:06इस्तारति के नीचे फिर तुम्हारे। न्यायालय आदेश देंगे कि धरती को
- 1:18:13पढ़ो और धरती को पढ़ोगे तो बुद्ध की उम्र से निकलेगी।
- 1:18:19इन को छोड़ दो। अखंड राष्ट्र की अगर कल्पना करते
- 1:18:24हो तो उसे यथार्थ रूप भी दे दो। ठीक है, मैं कहता हूँ अखंड क्या
- 1:18:31वसुधैव कुटुंबकम यह है अखंड की परिभाषा सारी वसुधा एक राष्ट्र
- 1:18:37हो, वसुधैव कुटुंबकम और राष्ट्र एक परिवार की तरह रहे और परिवार
- 1:18:45की तरह रहे तो फिर नफरत। फैला के परिवार की तरह तुम थोड़े
- 1:18:51ही रह पाओगे नफरत और द्वेष फैला के तुम परिवार की तरह रह ही नहीं
- 1:18:58सकते प्रेम के गीत गुन गुना के। तुम एक परिवार की तरह रह सकते हो,
- 1:19:13उस तर्क पे चले जाना और जब तुम जागृत जागृत, ये संसार तुम्हें
- 1:19:22ऐसा लगने लगे। कि यह शरीर मैं नहीं विचार मैं
- 1:19:33नहीं, फिर तुम क्लेम नहीं करोगे जाते कि मेरी भावनाओं को ठेस
- 1:19:38पहुंचाई। भावनाएँ तुम्हारी नहीं रहेंगे।
- 1:19:42भावनाओं का मालिक भावनाएँ हैं, विचारों का मालिक विचार है।
- 1:19:49शरीर का मल के ये पदार्थ हैं पंचभूत।
- 1:19:54तुम नहीं हो तुम इनसे अलग हो, निर्लिप्त हो, निर्लिप्त हो, तुम
- 1:20:01उसमें समा जाओगे। काहे रे बन खोजन जाए?
- 1:20:18काहेरे बन खोजन जाए सर भया की सदा।
- 1:20:38अले प सरब व्यापी सदा अले प तोहे संग समा काहे रे?
- 1:20:57बन को जन जा सर्वव्यापी सब जगह मौजूद है, वो ओके ध्यान रखना मैं
- 1:21:07किताब में पढ़ के नहीं बोल रहा हूँ, मैं देख के बोल रहा हूँ मेरा
- 1:21:13एक एक अल्फ़ाज़। मेरे अनुभव से आता है, किताबों से
- 1:21:23शास्त्रों से नहीं सुनी सुनाई बात मैं कहता हूँ और अगर कहता हूँ तो
- 1:21:29मैं कहता हूँ कि मैंने सुना है ये कहानी है।
- 1:21:36पक्का नहीं यह हुई की नहीं हो रहा तुम अंडरलिप्त हो, मैं जानता हूँ
- 1:21:44सर्वे व्यापी हो मैं जानता हूँ सर्वे व्यापी सदा अलेपा तो वो है।
- 1:21:54संघ समाये काहेरे बन खोजन जाए, सब जगह विद्यमान है।
- 1:22:10ऐसा नहीं कि बन में मिलेगा, पर्वतों पर मिलेगा।
- 1:22:14तुम्हारे घर में ही मिलेगा यही बाबा ने मुझे कहा, हनुमान जी ने
- 1:22:19मुझे यही कहा तुम्हें घर बैठे मिलेगा जो मिलेगा घर बैठे हैं
- 1:22:26मेरा हरिद्वार नहीं मिला, ऋषिकेश ने मिला यही मिला।
- 1:22:34अपने कस्बे में मिला अपने शहर में मिला।
- 1:22:41फिर जब तुम एक बार जागृत होकर यह देख लोगे के मैं कौन?
- 1:22:51सारे रोग, कष्ट, क्लेश, दुविधाएं, चिन्ताएं, चिन्ताय, ब्रह्म सब
- 1:22:58नष्ट हो जाएंगे ऐट दी मोमेंट ऐट दी सेम स्पॉट सत्य उजागर हुआ।
- 1:23:07प्रकाश का दिया जला अँधेरा भागा। और फिर जब तुम जाग के देखोगे दिन
- 1:23:21में तुम कल्पना भी नहीं करोगे जिसके सोपन मिट गए रात को सोपन
- 1:23:27नहीं आएगा। अभी तो तुम्हें स्वप्न आता है और
- 1:23:33कोई जगा हुआ चिराग भीतर उन स्वप्नों को रिकॉर्ड करता है,
- 1:23:37इसलिए तुम सुबह कहते हो, मुझे ये सपना है हूँ वास् रिकॉर्डिंग ऐट
- 1:23:45दट टाइम। ये तुमने कभी नहीं सोचा।
- 1:23:49उस वक्त कौन रिकॉर्ड कर रहा था यह तुमने सुना है यह तुमने जाना है
- 1:23:59कोई था जो उन शांत लम्हों में। रिकॉर्ड कर रहा था।
- 1:24:06सारी रात तुम बड़े मज़े से सोये, सुबह तुम्हें ये स्वप्न आया लेकिन
- 1:24:12क्लिंगनेस के कारण तुम कहते हो कि मुझे स्वप्न आया बस ये क्लिंगनेस
- 1:24:17को तोड़ना है और जिसका रात का अंधकार मिटा।
- 1:24:26तुमने श्याम को जाना तो स्वप्न खो जाएगा और स्वप्न के साथ दूसरा खो
- 1:24:32जाएगा। कल्पना तुम कल्पना नहीं करो, रात
- 1:24:37का सपना खोया बुधले शाह कहते राती सोपन न आवे होनो।
- 1:24:43चिढ़े हल्ला वाले हो तो दिन की कल्पनाएं भी मट गई।
- 1:24:47कल्पना क्या मैं होम मिनिस्टर बन जाऊं?
- 1:24:54मैं प्राइम मिनिस्टर बन जाऊं, मैं चोरी करूँ, मैं लोगों को तड़पाऊ
- 1:25:01मैं तानाशाह बन जाऊं। मेरा नाम इतिहास में लिखा जाए,
- 1:25:06क्या हो जाएगा भाई इतिहास में लिखा जाएगा तुम्हारा नाम, लेकिन
- 1:25:14हो क्या जाएगा तुम्हें? क्या मिला उससे?
- 1:25:21तुम्हें मिलती हैं, सिर्फ़ कल्पनाएं तुम कल्पनाओं से सोचते
- 1:25:28हो कि मेरा नाम रह जाएगा संत उस मदर प्याले को पीकर अमर हो जाता
- 1:25:36है, वो खुद ही रह जाता है। तुम्हारी कल्पनाएं रह जाती हैं कि
- 1:25:42मेरा नाम रह जाएगा। संत उस मधुर प्याले को पीकर खुद
- 1:25:47ही रह जाता है क्योंकि खुद ही हो जाता है अहम् ब्रह्मस्त्र शिवम
- 1:26:00मैं ही हूँ ईशा वत्स मेदम सर्वबम यत किंचे जगत राम जगत ईश्वर मैं
- 1:26:09ही हूँ और मैं ही जगत के कण कण में रप्त हूँ उसको तो मिल गया
- 1:26:15तुम्हें मिली कल्पनाओं के नाम के ऊपर नाम।
- 1:26:19मेरा नाम रह जाएगा, हे नाम रह जाना तो इतिहास के पन्नों में पता
- 1:26:27नहीं हो के नाम लेकिन तुम्हारा अमर हो जाना तुम्हारा उस समुद्र
- 1:26:35में जाकर आनंदित हो जाना तो सदा के लिए बना रहेगा।
- 1:26:38कृष्ण कब खोए थे? मज़े से अटकेलियां खा रहे हैं कब
- 1:26:44कबीर खोए, कब नानक खोए, कब मीरा खोए?
- 1:26:47आनंद उस समुद्र में आनंद से अटकेलियां कर रहे हैं जिसकी एक एक
- 1:26:54बूंद के लिए तुम तरसे जा रहे हो। सर्व न्योछावर करने के लिए तुम
- 1:27:00तैयार रहते हो, वो उसी समुद्र को हर पल पीते हैं, दिन भर रात ऐसे
- 1:27:16मटेगी। स्वप्नों को दर्शन करने की यह एक
- 1:27:27विधि है। अपने आप का दर्शन कर लेना।
- 1:27:33स्वप्न मिट जाएंगे जैसे ही स्वप्न मिट कल्पना मिट जाएगी फिर तुम
- 1:27:39बनना नहीं चाहोगे कुछ। अब इन शब्दों को सुन लेना आखरी
- 1:27:44अल्फा से, फिर तुम कुछ बनना नहीं चाहोगे क्योंकि तुम होने में
- 1:27:50संतुष्ट हुए कोई कुछ बनना क्यों चाहता है?
- 1:27:58अब इन शब्दों को लिख लेना। जब वो व्यक्ति अपने होने में
- 1:28:04संतुष्ट नहीं होता, जब कोई व्यक्ति अपने होने में संतुष्ट
- 1:28:11नहीं होता तो वह कुछ बनना चाहता है।
- 1:28:15प्राइम मिनिस्टर बन जाऊं, गृह मंत्री बन जाऊं?
- 1:28:21अमेरिका का राष्ट्रपति हो जाऊं, किसी छोटे मोटे टापू का कैलासा का
- 1:28:27प्रेसिडेंट बन जाऊं? इसका अर्थ साफ है कि वह हुआ नहीं।
- 1:28:35जो बनने की चेष्ठ में संलग्न अब ये बड़े महत्वपूर्ण शब्दें आखिरी
- 1:28:41जो बनने की चेष्ठ में संलग्न रहता है।
- 1:28:44दिन भर रात वह सीधी सीधी बात वो हुआ नहीं और जो हुआ नहीं उसमें
- 1:28:52आनंद आया नहीं। जिसमें आनंद आ गया, वो बनेगा
- 1:28:56नहीं, वो होना ही काफी है। होना ही पर्याप्त है, होना ही
- 1:29:07पर्याप्त है। धन्यवाद।