Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Oct 25 - सूक्ष्म शरीर vs कारण शरीर! देही का निर्माण कैसे होता है? चेतना बढ़ाने का रहस्य! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:02आपने कहा बाबा आशुतोष महाराज सहस्रार से निकल गए?
- 0:21इसलिए वापस नहीं आ पाएंगे। जब भी शरीर से बाहर जाना होता है
- 0:32वापस आने के लिए तो नाभी चक्कर से जाना होता है।
- 0:45बात कुछ समझ में आई नहीं, बाबा इसको थोड़ा सा गहनता से समझाने का
- 0:55कष्ट करेंगे। बिल्कुल अध्यात्म की बातें शब्दों
- 1:09में आती नहीं। प्रवचन से पहले ही मैं बोल देता
- 1:14हूँ ताकि आप शब्दों को पकड़ न पाएं।
- 1:21शब्दों के भीतर जो छिपा है रहस्य उसे पकड़ पाएं।
- 1:34सवाल अध्यात्म के ऐसे ही होते हैं।
- 1:42सवाल बहुत ठीक पूछा है बेटे अन्यथा मैं पार पर कहता हूँ आगे
- 1:51आगे ज़माना अंधकार, पूर्ण आर कोई जवाब दे पाए ना दे पाए कोई इतनी
- 2:03गहराई तक जाए। जाए ना जाए कौन जाने तो विस्तृत
- 2:14विवेचना करता हूँ आज क्योंकि इस प्रसंग में बड़ी गलतफहमी है।
- 2:31मैं भी कोशिश करूँगा सरल करने की आप भी ध्यान से सुनसान जगह पे
- 2:42शोरगुल से बाहर एकांत में से सुनने का प्रयास करना।
- 2:49तो शायद आपके गहरे उतर सकती है बात तो हम शुरू करते हैं
- 3:10विद्यार्थियों को। आभा सा भी सीखाना पड़ जाता है।
- 3:15कभी कभी दो चीजें होती हैं जब आप कोई विचार करते हो, इच्छा रखते
- 3:32हो, वासनाएँ उठती हैं, क्रोध ही जन्मता है।
- 3:39लोभ जन्मता है, तो वो विचार जाते हैं देही में वासनाएँ जाती हैं
- 3:47देही में काम क्रोध या बेकार जाते हैं देही में यह एकठ होता है देही
- 3:55में ध्यान से समझा बात को। यहीं से समझा आ जाएगी।
- 4:04हम जब वासनों में जाते हैं तो दे ही बढ़ता है और जब हम ध्यान में
- 4:11जाते हैं तो कान्शस्नस बढ़ती है, चेतना बढ़ती है।
- 4:18अब इन दो चीजों को मूल रूप से ले लेना, ये दो दिशाएं मैंने आपको दे
- 4:26दी आसनाओ में जाओगे देख ही बढ़ेगा, ध्यान में जाओगे।
- 4:40कान्शस्नस बढ़ेगी, जागृति बढ़ेगी, अवेयरनेस बढ़ेगी।
- 4:51अगर ये बात समझ में आ गई तो आगे चलो।
- 5:01विचार करते हो, वासनाएँ करते हो, कामनाएँ करते हो, लालसाएँ करते
- 5:06हो, स्मृति में जाते हो या भविष्य की कल्पनाओं में जाते हो, देही का
- 5:12निर्माण होता है देही को समझने के लिए आप।
- 5:20पिछले वीडियो खंगाल सकते हैं। जब आप ध्यान में जाते हो, कुछ
- 5:34नहीं करते हो, बस बैठे रहते हो तो आपका कान्शस्नस पड़ता है।
- 5:50चेतना का तल बढ़ता है। अब आगे चल रहे है जब हमने देही को
- 6:08साथ लेके जाना होता है कोई एस्टल ट्रैवलिंग पर।
- 6:16कोई बाहर जाना है, कोई कैलाश जाना है, कोई ज्ञानगंज जाना है, सिद्ध
- 6:27आश्रम वगैरह वगैरह यहाँ या बाहर किसी प्लैन्ट पे जाना है।
- 6:38तो कैसे जाएंगे हम देही के साथ जाएंगे देही जाएगा हमारे साथ देही
- 6:48ही जाएगा। और कहाँ से जाएगा?
- 6:57नाभी चक्कर से जाएगा, मूलाधार से जाएगा एक एक शब्द को बड़े विस्तार
- 7:06से समझ लेना अगर न समझाये तो मुझे बता देना।
- 7:14मैं यहीं रुक के रिपीट कर लूँगा जब इस शरीर से बाहर जाना है थूल
- 7:25से बाहर जाना है दे ही जब बाहर जाता है ना भी चक्कर से जाता है।
- 7:39और आपने बात की दशम द्वार की सहस्रार की सहस्रार से बाहर जाती
- 7:52है सिर्फ चेतना वह योगी जो संपूर्ण हो गया।
- 7:59जिसने इस देह में रहते रहते हैं अपने सब कर्म भौंक भौंक लिए जो
- 8:11ज्ञान गंगा में नहा लिया, अपने आप को जान लिया, अपने विस्तार को जान
- 8:17लिया। दो बातों में बोली मैंने ध्यान
- 8:20रखना। अपना आपा जान लिया।
- 8:25टु नो दाय शेल्फ अपना विस्तार जान लिया हम अस्तित्व हैं कोने कोने
- 8:39में ईशा वाश्य में तुम सर्वभम यत कंची जगत याम से करते हैं, पहले
- 8:44जानना होता है मैं यह शरीर नहीं हूँ?
- 8:52शरीर से बड़े साक्ष्य पहला कदम है लेकिन यहाँ अगर यहाँ रुक जाओगे तो
- 8:59बुद्ध हो जाओगे। फिर उसके आगे एक स्टेप हो रहा है
- 9:09टु नो दाये सेल्फ की बात। टु नो दी एक्चुअलिटी रियलिटी
- 9:18वास्तविकता क्या है? वास्तविकता तुम अस्तित्व में फैले
- 9:25हुए कण कण में समाये हुए है। बीन ना वे, ना ही कोठा।
- 9:31कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ तुम नहीं हो, वह एक आपा तुम्हारा
- 9:37दूसरा आपा है, एक आपा तुम्हारा तुम साक्षी हो और एक दूसरा आपा भी
- 9:48होता है वो होता है। तुम सर्वज्ञ हो, तुम सर्वव्यापक
- 9:54हो, तुम सर्वशक्तिमान हो, तुम इस अस्तित्व के कण कण में हो और बड़ा
- 10:02प्यारा दृश्य होता है हो उसकी कल्पना से ही।
- 10:13योगी कृतकृत हो जाता है योग इसे ही कहते हैं जिसने अपने आप को
- 10:18मिला दिया योग का अर्थ प्लस जिसने अपने आप को मिला दिया किस्में।
- 10:27बोंध सामान्य समन्ध में बूंद जब समुद्र में समाती है तो समुद्र से
- 10:35योग करती है। समुद्र में प्लस हो गए, वो समुद्र
- 10:44से निकली थी, समुद्र में समा गई। इसे योग कहते हैं।
- 10:56अपना आपा जान लिया। आपा जानने के बाद भी बुद्ध 30
- 11:05वर्ष तक जीते हैं। महावीर भी जीते हैं।
- 11:14आपा जानने के बाद कर्म भोग तो बहुत नहीं पड़ेंगे, जो भी आपने
- 11:22किए पिछले जन्मों में किए भोगे किए भोगे नए किए भोगे प्राण।
- 11:28माइनस प्लस माइनस प्लस जो बच गए, शेष स्वय को जानने के बाद जो बच
- 11:42गए वो तुम्हें भौंकने पड़ेंगे और वो तुम भौंकते हो।
- 11:47बुद्ध भी भौंकते हैं, कृष्ण भी भौंकते हैं, राम भी भौंकते हैं,
- 11:52महावीर भी भौंकते हैं। कबीर भी भौंकते हैं, नानक कभी
- 11:55भौंकते हैं, वो भौंकने ही पड़ेंगे।
- 12:03लेकिन अगर इसमें शरीर में रहते रहते बुद्ध भौंक लेते हैं।
- 12:12लेकिन थोड़ा सा शेष रह गए, करुणा के कारण भौंक सकते थे, उनके पास
- 12:18रिस्क था लेकिन शेष रह गया वो शेष रह गया।
- 12:25अति करुणा के कारण परम करुणा के कारण क्या होगा?
- 12:33जैसे बाप दादा अपनी संतानों के लिए सोचता है कि हम अपनी पुश्तों
- 12:41को क्या देके जाएंगे? ऐसे ही बुद्ध ने सोचा आने वाला
- 12:48वक्त अंधकार है। तो फिर मैं बना ही रहूँ एक बार
- 12:54घने अंधकार के युग में फिर प्रकट हो जाऊं।
- 12:58यह उनकी करुणा की कहानी ही कहता है और बुध फिर आएगा।
- 13:13आयेंगे तो क्वेश्चन ही फर्श। लेकिन दोनों बातें यकसा होती हुई
- 13:20भी अलग अलग हैं। वो आयेंगे किसी और रूप में।
- 13:25पहचान तो तुम बुद्ध को भी नहीं सकोगे, कृष्ण को भी नहीं, राम को
- 13:29भी नहीं सकोगे अगर वो आएँगे तो लेकिन आएँगे नहीं।
- 13:35राम भी कबीर भी नानक भी कभी नहीं आएँगे।
- 13:41वो भोग गए, सब भोग गए। वह योगी जो सारे करम बोग लेता है,
- 14:00सिर्फ देह में बैठे बैठे उसका देह ही नष्ट हो जाता है।
- 14:05समझे ना बात को? क्योंकि दे ही के भीतर जो कुछ जमा
- 14:13है कूड़ा खिचड़ा वही तो भौगना होता है और अगर तुम विषय वासना
- 14:21में अभी भी पड़े रहे तो दे ही बढ़ता जाएगा।
- 14:26और अगर तुम कान्शस्नस में उतरते चले गए तो चेतना बढ़ती जाएगी।
- 14:36और जब तुमने जान लिया के हू एएम आई, उसके बाद तुम्हारे।
- 14:43भोग शुरू हो जाते हैं। नए कर्म बनने बंद हो जाते हैं।
- 14:48देही रोज़ घटता है, रोज़ घटता है, सूक्ष्म शरीर कहता हूँ देही जो
- 14:54लोग ना समझे हो वो देही को सूक्ष्म शरीर की तरह ले ले।
- 15:01सूक्ष्म शरीर रोज़ घटता है, घटता है, घटता है, 1 दिन शून्य हो जाता
- 15:06है। अब उस अवस्था में जबकि देही न बचा
- 15:17देही शून्य हो गया तो क्या रह गया?
- 15:24चेतना रह गई शुद्ध स्वरूप रह गया यश अतुल शरीर और देही सूक्ष्म
- 15:34शरीर और उसके भीतर एक कारण शरीर जो समुद्र का एक हिस्सा बूंद।
- 15:42उसका जिक्र मैंने इसलिए नहीं किया वह प्रासंगिक था जब प्रसंग आएगा
- 15:47तो मैं बताऊँगा यहाँ आवश्यक हो गया।
- 15:57सूक्ष्म शरीर के पीछे कारण शरीर कारण शरीर है बूंद जो समुद्र से
- 16:05बिछुड़ गई थी। उसने मिलना है समुद्र में अपने
- 16:14उदगम स्थल से मिलना है उसने शुद्ध चेतन।
- 16:25वह संघ संघ यात्रा करती है, दे ही और अब आखरी समय में जब दे ही
- 16:36समाप्त हो गया है उसकी अंतिम कदम उठाना है।
- 16:44उसने अपनी यात्रा कहा। समुद्र में मिलना है बूंदने यह
- 16:50उसका अंतिम काम है। समा जाना समुद्र में है वह चाहे
- 17:06तो। नाभि से निकल सकता है चाहे तो
- 17:13नाशिका से निकल सकता है, चाहे तो कानों से निकल सकता है।
- 17:17नव द्वार में से कहीं से भी निकल सकता है और दशम द्वार से वे ही
- 17:23निकल सकता है क्योंकि उसे वापस नहीं आना।
- 17:29और अगर कोई व्यक्ति मूर्खता करेगा आशुतोष शश देह समाप्त नहीं हुआ और
- 17:43निकल गया दसम द्वार से तब गड़बड़ हो जाएगी ये मुड़ताएं कभी कभी
- 17:48होती हैं। ऐसी ही मुरता आशुतोष ने की और कोई
- 17:58भी व्यक्ति जो साधना करते करते ऐसी मुरता करेगा।
- 18:07देखिये। मेरे पास बहुत सी शंकाएं आ रही
- 18:11हैं कि अगर ध्यान करते करते, हम सहसरार में से निकल गए तो क्या
- 18:17होगा? नहीं निकल सकोगे तुम बड़ा मुश्किल
- 18:20है वो निकाल लो। क्योंकि वह द्वार ही नहीं है।
- 18:30यह तो ऐसा है जैसे छोटे से द्वार से हाथी निकलने की कोशिश करे।
- 18:38क्या होगा वह दरवाजा टूट जाएगा। दशम द्वार है निकलने के लिए कारण
- 18:48शरीर के निकलने के लिए द्वार है, सूक्ष्म शरीर के निकलने का द्वार
- 18:58नहीं है, इसको बहुत बारीकी से समझना ठीक किया तुमने बेटी प्रश्न
- 19:04पूछ के। अगर देही को कारण शरीर के साथ ले
- 19:15के जाना है तो तुम्हें ना भी के अंदर से ही न करना होगा और अगर
- 19:25कहीं गलती से गलती से देखिये प्रयास करना पड़ता है।
- 19:29ऐसे ही नहीं है कि तुम ध्यान करते करते अपने से निकल जाओगे।
- 19:33ऐसा इतना आसान मसला नहीं है, ये ये स्वभाव नहीं होता, ये गलती से
- 19:39भी नहीं होता। इसलिए जो लोग ध्यान में जा रहे
- 19:44हैं वो निश्चिंत रहें। मैं जिम्मेवार हूँ इस चीज़ का।
- 19:50वो अपने से नहीं निकल सकेंगे, उन्हें बड़ा प्रयास करना पड़ेगा।
- 19:55तुम्हारा क्या ख्याल है? छोटे से दरवाज़े से तुम्हारे
- 19:58दरवाज़े से हाथी गुजर सकता है नहीं बड़ा प्रयास करना पड़ेगा।
- 20:09जिन लोगों ने ऐसी शंकाएं ज़ाहिर की हैं, डर, भय ज़ाहिर किए हैं,
- 20:15कहीं ऐसा तो नहीं होगा? हम शरीर से बाहर निकल जाते हैं तो
- 20:22देखिए शरीर से बाहर निकाला जा सकता है, ध्यान में निकाला जा
- 20:27सकता है। लेकिन जब भी तुम शरीर से बाहर
- 20:32निकलोगे वो निकलेगा, दे ही कारण शरीर नहीं जाएगा।
- 20:38यह बात समझना शब्दों में सारी चीज़ को।
- 20:45अभी व्यक्त करने की पहले ही मैं क्षमा याचना कर चुका हूँ।
- 20:50कोई व्यक्ति प्रश्न न करे, यह इतना साधारण मसला नहीं है के आगे
- 20:59तुम्हारे प्रश्नों के मैं जवाब देता हूँ, बस यहीं तक बोल सकता
- 21:02हूँ अपनी पूर्ण? अनटलेक्चुअलिटी का इस्तेमाल करके
- 21:07मैं जो बोल रहा हूँ वो अंतिम है, उससे आगे मैं बोल नहीं सकता।
- 21:14शब्द भी बेकार है और मेरा प्रयास भी बेकार है।
- 21:25तुम ध्यान करते करते जब बाहर हो जाते हो तो एक बात समझ लेना कारण
- 21:32शरीर नहीं जाता है, दे ही बाहर जाता है या नहीं।
- 21:36सूक्ष्म बाहर जाता है, थूल यहाँ पड़ा रह जाता है और थूल के भीतर
- 21:41कारण शरीर भी पड़ा रह जाता है। कारण शरीर एक ऐसा फ्यूज है जो
- 21:55तुम्हारे घर को सप्लाई करता है। देखिये थर्मल प्लांट में बिजली
- 22:01बनी वहाँ से तुम्हारे पावर स्टेशन में आई यहाँ।
- 22:07जीतने भी तुम्हारे वोल्टेज के होते हैं, 11,000 होते हैं, जो भी
- 22:12होते हैं वहाँ से तुम्हारे घृत का ही लाइट और तुम्हारे घर तक भी आने
- 22:18में लाइट उसको भी फूसे का सहारा लेना पड़ता है वहाँ भी तुम फूसे
- 22:22लगाते हो, वो है कारण शरीर। उस फ्यूज से वह थर्मल प्लांट की
- 22:34विद्युत पावर तुम्हारे घर को रोशन कर देती हैं।
- 22:38अगर वह फ्यूज नहीं होगा तो भी तुम्हारा घर रोशन नहीं हो सके।
- 22:46अब इस सारी व्यवस्था को ठीक से समझ लेना अगर समझना आए तो उसको
- 22:51बार बार सुन लेना, रिपीट करके सुन लेना अहम बिन्दुओं को मैं बार बार
- 22:58बोलता हूँ। एटोमिक पावर प्लांट या कोई भी
- 23:08पावर प्लांट वहाँ से सप्लाई आती है।
- 23:16सारे संसार को वो आती है तुम्हारे ग्राम या शहर के।
- 23:27विद्युत स्टेशन तक पावरहाउस की शिकायत देते हैं, पावरहाउस से
- 23:33तारे बिछाके तुम्हारे घर से बाहर के जो खम्भे हैं वहाँ तक आ जाते
- 23:40हैं। वहाँ से तुम्हारे घर तक आ जाती
- 23:45है, लेकिन फिर भी तुम्हारा घर जगमग नहीं होता, एक कमी रह जाती
- 23:51है, फिर भी क्या कमी रह जाती है? वह है फूसे सारे कनेक्शन ओके हैं,
- 24:00लेकिन जब तुम फूसे लगाओगे। तो वह बिजली तुम्हारे घर को रोशन
- 24:08करेगी, फिर सब कुछ चलेगा, पंखा भी चलेगा, एसी भी चलेगा, हीटर भी
- 24:14चलेगा, बल्ब भी जगेगा। टूब भी चलेगी, पानी की मोटर भी
- 24:19चलेगी। लेकिन अगर तुम ने फूसे नहीं लगाया
- 24:25तो कुछ नहीं चलेगा। यह फूसे कारण शरीर है क्योंकि
- 24:34इसका जिक्र कहीं आता नहीं, इसलिए पहले मैंने तुम्हें उलझाना ठीक
- 24:40नहीं समझा। वक्त आने पर इसका छोटा सा रोल है
- 24:45तो मैं बता दूंगा। आज वो वक्त आ गया, आज वो प्रश्न आ
- 24:51गया तो तुम्हारे खम्भे से तुम्हारे घर तक।
- 24:59कनेक्शन आ गया और तुम्हारे घर के भीतर जो कनेक्शन जाएगा वह लेके
- 25:04जाएगा। कारण शरीर तो क्या होता है जब तुम
- 25:13संबोधि से युक्त होते हो? ये तुम्हारा दे ही गल गया तुमने
- 25:18सभी भोग भोग लिए जब तुमने सारे भोग भोग लिए तो तुम्हारा दे ही
- 25:26शून्य हो गया। जे रो कुछ और भोगना बंधना रहा।
- 25:31सभी बही खाते बराबर कर दिए गए को लेना देना बाकी नहीं।
- 25:39अब क्या है? अब तुम्हारी मर्जी है, अगर शरीर
- 25:45चलता है तो चलने दो। अगर तुम चाहते हो तो चलने दो,
- 25:52नहीं चाहते तो निकल जाओ। और फिर तुम्हारे लिए तुम स्वतंत्र
- 25:57हो, इसे ही स्वतंत्रता कहते हो, यहाँ भी परतंत्र नहीं है व्यक्ति
- 26:05तुम चाहो किसी भी द्वार से न कर सकते हो, लेकिन उसी अवस्था में।
- 26:16यह सहसरार काम करता है, सहसरार से निकलना होता है तो योगी सहसरार से
- 26:23निकलता है क्योंकि सही सही बिंदु सही सही निकासी सतल कारण शरीर का।
- 26:34शब्द समझ लेना अब मैं दे ही नहीं बोल रहा हूँ कारण शरीर का उस बूंद
- 26:43का समुद्र में मिलने का सही सही। निकासी द्वार है हमारा सहसाहार
- 26:54लेकिन एक बात को ध्यान में रखना उस कारण शरीर के साथ दे ही नहीं
- 26:59जाएगा तो जो अपने दे ही को समाप्त कर चुका है, वह निकलेगा।
- 27:09दशम द्वार जैसे हर चीज़ की निकासी के परमात्मा ने द्वार बना रखे
- 27:17हैं। पसीने का द्वार, चमड़ी, मलमूत्र
- 27:22का द्वार अलग है। बाकी द्वारों के अपने अपने काम
- 27:29हैं। ऐसे ही इसका द्वार का एक बार
- 27:36इस्तेमाल होता है। सहसरार द्वार का एक बार इस्तेमाल
- 27:41होता है कब अंतिम समय में? जब बुद्ध पुरुष सब भोग लेता है और
- 27:49उसका देय ही समाप्त हो जाता है। एक बात तुम से कहूँ इस द्वार से
- 27:55बुध भी नहीं निकलते हैं। निकल सकते हैं निकलते नहीं हैं।
- 28:02बुध भी जब जाते हैं, नाभी केंद्र से जाते हैं।
- 28:11कोई भी व्यक्ति जो कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ा रहा है, ध्यान में जा रहा
- 28:17है। इस द्वार से एक बार ही निकला जाता
- 28:21है, दूसरी बार नहीं निकाला जाता और अंत वेला में बुध यहाँ से निकल
- 28:27सकते हैं लेकिन बुध निकले नहीं। महावीर यहाँ से निकल गए।
- 28:36बुध नहीं निकले। सभी चीजों के निकासी द्वार
- 28:43निर्धारित हैं। अगर निकासी द्वार गलत निकासी से
- 28:49निकलोगे आप तो कोई न कोई गड़बड़ी होगी।
- 28:56देखिये पसीने को निकलने की जगह है, हमारे रोम छिद्र मूत्र के
- 29:02निकलने की जगह है, वीरे के निकलने की जगह है?
- 29:07हमारी गुप्तेंद्र मर के निकलने की जगह है, आँखों को देखने की जगह है
- 29:18आँखें कानों से नहीं सूझ सकती, सूझने की जगह है।
- 29:25आँखें सुन नहीं सकती, कान देख नहीं सकते।
- 29:31सभी के द्वार अपने अपने हैं, सुचारु रूप से काम कर रहे हैं।
- 29:37गड़बड़ी कब पैदा होती है जब तुम किसी द्वार को।
- 29:41गलत ढंग से इस्तेमाल करते हो, ना भी तोहार है, दे ही के साथ शरीर
- 29:49का निकल जाना। तुम एस्टेट ट्रैवलिंग करना चाहते
- 29:51हो करो मौत से करो, तुम चाहे तो हिल स्टेशन जा सकते हो।
- 30:03गाड़ी में बैठ सकते हो, कार में बैठ सकते हो, बस में बैठ सकते हो
- 30:13क्या तुम्हारी ऑप्शन है? लेकिन वो सही ढंग है हिल स्टेशन
- 30:19पे जाने के? लेकिन कार के द्वारा तुम दूसरे
- 30:23ग्रह पे नहीं जा सकते हो, वहाँ जाने के लिए तो देय ही को साथ
- 30:28लेके जाना पड़ेगा और फिर यहाँ मैं साफ कर दूँ बात कल फिर उलझ सकती
- 30:35है आय तो प्रसंग आया है। जब तुम एस्टल ट्रैवलिंग पे जाते
- 30:43हो तो दे ही जाता है। सूक्ष्म शरीर साथ चेतना तो सब जगह
- 30:49फैली हुई है, लेकिन कारण शरीर नहीं जाता।
- 30:55कारण शरीर यही रहता है। क्योंकि कारण शरीर जिससे निकल गया
- 31:02वो दिन तुम्हारे भीतर कुछ नहीं कारण शरीर के निकलने का कौन सा
- 31:09स्थान है, जैसे पसीने के निकलने का द्वार है कारण शरीर के निकलने
- 31:16का। एक ही द्वार सहस्रार यह द्वार बना
- 31:20ही कारण शरीर के लिए है देही के लिए नहीं है, देही के लिए नाभी
- 31:29केंद्र है वहाँ से जाओ आओ कारण शरीर के लिए।
- 31:36एक ही स्थान है निकासी द्वार है, वो है सहसरार और कारण श्रेय से
- 31:45निकला भी नहीं करता कारण से बिल्कुल अंत में निकला करता है।
- 32:00अभी तुम पूरे भौंक भोंके नहीं अभी तुम्हारा देही बरकरार है तुम देही
- 32:11को साथ लेके अगर बाहर निकलते हो। कारण शरीर को साथ लेकर देही के
- 32:21संग उस द्वार से निकलते हो जो सिर्फ कारण शरीर के लिए है।
- 32:29प्रथम मैंने कहा कि वह एक बार वहाँ से निकला हुआ कारण शरीर।
- 32:38वह निकासी द्वार है कारण शरीर के लिए और कारण शरीर बिल्कुल अंत में
- 32:44निकलता है कब जब उस बूंद ने समुद्र में समाना होता है जहाँ
- 32:51कबीर कहते हैं बूंद सामान्य समुद्र में।
- 32:59यह द्वार सिर्फ कारण से लिया है, लेकिन कोई व्यक्ति है जो विशुद्धि
- 33:13चक्कर से ऊपर चला गया है। वह निकल सकता है यहाँ से देखिए एक
- 33:251 है जो विशुद्धि से नीचे है वो तो यहाँ से निकल ही नहीं सकता
- 33:29उसकी तो बात छोड़ दो जो विशुद्धि पे आ गई हैं।
- 33:36वो यहाँ से निकल सकते हैं लेकिन निकलना मूर्खता होगा फिर अगर वो
- 33:44यहाँ से निकलेंगे तो ये सोच के निकलें कि वापिस नहीं आएँगे
- 33:49क्योंकि इस ब्रह्मरंद्र से। निकला हुआ फिर वापस नहीं आता कारण
- 34:03सर इसे तुम जीव भी कह देते हो जीवकार्थ जो जिंदा है जीवकार्थ जो
- 34:14चेतन है। यह उसका निकासी द्वारा है।
- 34:21सहसरार तो क्या हुआ? आशुतोष के साथ क्या हुआ इस।
- 34:35चक्कर से बाहर हो गए थे। वह विशुद्धि चक्र से बाहर और
- 34:43मैंने पहले भी प्रवचन के अंदर साफ किया।
- 34:46विशुद्धि चक्र में जैसे ही आप प्रवेश कर गए बस आप योग्य हो गए।
- 34:53किसके मुक्ति क्या? फिर देर अवेयर तुम पहुँच जाओगे और
- 35:03देर अवेयर का ये मतलब नहीं कि प्रकृति के हिसाब से लाखों जन्म
- 35:06नहीं लगे। नहीं नहीं, लाखों नहीं लगेंगे,
- 35:11फिर तुम जल्दी ही पहुँच जाओगे। बस एक या दो अगर तुम भी शुद्धि
- 35:18किसी ना किसी तरह इसलिए मैं रोज़ तुम्हें कहता हूँ किसी ना किसी
- 35:23तरह से तुम भी शुद्धि पे पहुँच जाओ और जब मैं यहाँ दीक्षा देता
- 35:28हूँ अब मैं थोड़ा साफ करता हूँ। तो तुम किसी भी तल पे हो, किसी भी
- 35:38तल पे हो, किसी भी चक्कर पे हो चाहे मूलाधार पे हो, चाहे अनाज पे
- 35:43हो, स्वाति स्थान पे हो मैं तुम्हें अनाह पे ले आता हूँ।
- 35:53बस मेरी दीक्षा का यही मतलब इसलिए मैं तुम्हें कन्फर्मली कह सकता
- 35:58हूँ कि यू विल बी लेवेट क्योंकि मैं बखूबी इन नियमों को जानता
- 36:05हूँ, जो प्रवेश कर गया शुद्ध चक्र में।
- 36:10वह सर्टेन हो गया, वह पहुँच जाएगा।
- 36:15एक गुरु का यह काम बड़ा अनोखा और अद्भुत होता है जो व्यक्ति अभी इस
- 36:23योग्य नहीं हुए होते कि उन पर शक्तिपात करके।
- 36:28उन्हें अपना आपा दिखा दिया जाए तो फिर एक ही रास्ता है कि उन्हें
- 36:34इतने सेफ कर दो कि अब शुद्धि पे ले जाओ तो कम से कम उनकी लिबरेशन
- 36:42का मार्ग पक्का हो जाएगा। यह एक नियम में है विशुद्धि के
- 36:57भीतर जो प्रवेश कर गया। लेकिन इस नियम को इतना हल्के में
- 37:02मत ले लेना कि मार काट शुरू कर दो, झूठ बोलना शुरू कर दो।
- 37:10राजनीति में प्रवेश कर जाऊं, ऐसा कुछ मत करना।
- 37:13मैं अपने शिष्यों को समझा देता हूँ कि ऊंट पटांग शुरू मत कर
- 37:19देना, बस तीन काम शुरू रखना, सुबह उठ के क्रिया योग करना, ध्यान में
- 37:29बैठना। नथ्थिंग टु डू ये दूसरा और तीसरा
- 37:36आपको लगातार प्रेरणा मिलती रहे इंस्पिरेशन मिलती रहे वीडियो को
- 37:41सुनते रहना इन तीनों कामों को मत छोड़ना।
- 37:49कमी बत्ती हो सकते हैं नहीं तुम्हारा शरीर इजाजत देता क्रय
- 37:56योग मत करो बाहर सर्कमस्टैंस भी बड़े ठंडे हैं मुझे पूछ लेते हैं
- 38:03यहाँ बाबा -20 है क्या करें मैं कहता हूँ घर में हीटर लगा लो।
- 38:11थोड़े से कमरे को रूम टेम्परेचर पे ले आओ, वहाँ पे कर लो और अगर
- 38:16नहीं कर सकते हो तो कोई बात नहीं ये दिन गुजार लो किसी से निकसित
- 38:21रहे क्रिया योग छोड़ दो एक बार। कोई शरीर की तकलीफ होती है, तो
- 38:27छोड़ दो क्रिया एक चीज़ को छोड़ सकते हो तुम अगर ध्यान में नहीं
- 38:35बैठा जा सकता किसी कारणवश तो ध्यान को छोड़ दो एक बार अगर कोई
- 38:43तकलीफ हो गई है। वीडियो नहीं सुन सकते तो एक बार
- 38:47छोड़ दो उनको ये पाबंदी नहीं है लेकिन ये आवश्यकता है इन तीनों को
- 38:57करते रहना। प्रेरणा मिलती रहेंगी वीडियो से।
- 39:06क्रिया योग से तुम्हारे भीतर साफ सफाई होती रहेंगी।
- 39:10ऑक्सीजनेशन होता रहेगा और ध्यान से तुम कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ाते
- 39:19जाओगे रोज़ गहरे गहरे, गहरे, गहरे रोज़।
- 39:28ये तीनों चीजों को लगातार करते रहना अगर मैंने तुम्हें स्थापित
- 39:33कर दिया विशुद्धि चक्र पे तो ये मत सोच लेना के विशुद्धि चक्र पे।
- 39:42हम अगर बुरे कर्म भी करेंगे तो विश्व युद्ध पे टिके रहेंगे।
- 39:46नहीं नहीं इतनी कृपा नहीं तुम पे की है अभी ध्यान रखना कि तुम कुछ
- 39:51भी अच्छा बुरा करते रहो, तुम नीचे भी आ सकते हो।
- 39:58इसलिए इस स्टेज को बरकरार रखे रहना आवश्यक है।
- 40:03दीक्षा लेने के बाद मैंने कहा तुम 7 दिन तक बैठो, अगर तुम्हारा
- 40:09माहौल इजाज़त देता है तो अवश्य बैठना चाहिए।
- 40:147 दिन तक तुम ध्यान में बैठो, थोड़ा सा और गहरा हो जाएगा।
- 40:24तुम्हारा कॉन्शसनेस लेवल थोड़ा सा और ऊंचा उठ जायेगा।
- 40:29तुम्हें आनंद की वो खुशबू आने लगेंगी और वह आना जरूरी है।
- 40:37खुशबू अगर तुम्हारे नासा पुटों को छू ले तो बार बार तुम्हारा मन
- 40:43करेगा वहीं जाने को बस इसे ही संस्कार कहते हैं तो ये मत सोचना
- 40:52कि तुम यहाँ से दीक्षा ले के गए हो तो जो चाहे करते रहो।
- 40:58जो चाहे मन उत्पाद करता रहे नहीं। फिर तुम विश्वुधि चक्र से नीचे भी
- 41:05आ जाओगे, अनाहत पे भी आ जाओगे। अगर तुम इसको सिधर रखना चाहते हो
- 41:13तो यहाँ से जाओ 7 दिन बैठो, नहीं भी बैठ सकते।
- 41:18तो कम से कम ऐसा मत करो कि समाज में उत्पाद करना शुरू कर दो।
- 41:25स्वतंत्र तुम हो स्वच्छंद नहीं हो मन में जो आये वो करो, ऐसा नहीं
- 41:32चलेगा। अकॉन्शियसनेस लेवल पे सब फीड होता
- 41:36है। ध्यान रखना तुम जो करोगे वह तक्षण
- 41:42भीड़ हो जायेगा तक्षण यहाँ कोई चन्द्रगुप्त वगैरह नहीं बैठे हैं,
- 41:49चन्द्रगुप्त वगैरह को तो रिश्वत दी जा सकती है सब बिकाऊ उम्र होते
- 41:55हैं ये। ये चंद्रगुप्त हुआ, यमराज हुआ,
- 41:59यमदूत हुए, सब बिकाऊ होते हैं, आशा मत करो, कोई गुप्त नहीं बैठा
- 42:08है, ये तुम्हारे स्वामियों की खोज है ठग्गी मारने के लिए।
- 42:20लेकिन इनको अब तक मूर्खों को ये भी नहीं पता लगा कि जो ठगी मार कर
- 42:26कमाओगे साथ में ही लेके जाओगे, वे क्या समझाएंगे?
- 42:41वो ही पुराने गिसे फटेर काले रंग के अचंभी के अरे बस भी करो कुछ
- 42:52खुद का देखा भी बोल दो वो ही गरुड़ प्राण।
- 42:58लगा दूँ अगस्त को जब तुम दीक्षा लेते हो, तो गुरु तुम्हें उस
- 43:13केंद्र पर स्थापित कर देता है जहाँ से बड़ा आसान हो जाता है
- 43:18आसान मैं किस लिए कहता हूँ। तो मेरी बेटी को आप अवश्य सुने
- 43:23जिसने नहीं सुनी है। बट इस अनाहतनाथ साउंड ऑफ साइरस
- 43:31अस्तित्व की आवाज क्या है ये अवश्य सुनो आप बाकी कोई सुनो ना
- 43:37सुनो कोई बात नहीं। क्यों किसने पार्ट पास देना है
- 43:42तुम्हे? अनाथनाथ 1 दिन शुरू हो ही जाएगा
- 43:47और बड़े काम आएगा तुम्हारा वडका वडका समान अनाथ के ऊपर ध्यान
- 43:55जमालो किसी बिंदु की आवश्यकता नहीं।
- 43:58किसी स्वास्थ्य पर स्वास्थ्य पर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं है।
- 44:02वो तुम्हारा बनाया हुआ है। यह अनंतनाथ स्वयं से आया हुआ
- 44:07परमात्मा के द्वार के उद्गम स्थल से प्रकट हुआ हुआ अपने आप ध्यान
- 44:13इधर खींच जाएगा, इतना रसीला और सुरीला होता है।
- 44:18तो यह एक बुम है परमात्मा का नाद शुरू हो जाए फिर सहारा मिल गया
- 44:29तुम्हें समझो मार्ग मिल गया तुम्हें क्योंकि ये दूर जाता है
- 44:34उदगम सतर पे। वहीं से आया है इसके संग संग होलो
- 44:40बड़ा आसान वार मैंने तुम्हें बताया वाजे नाद अनेक आशंका केते
- 44:45पावन हारे केते राग परिसों कैयण केते गबन हारे।
- 44:59और अगर जेहने नहीं हुआ है, अब कोई बात नहीं, धैर्य रखें।
- 45:05अगर हो गया तो बहुत बढ़िया है, नहीं हुआ तो और भी रस्ते हैं और
- 45:12भी राहते हैं। वसल की राहत के सिवा और भी गम है
- 45:16जमाने में मोहब्बत का। अकेला यही नहीं है रास्ता राहतें
- 45:26और भी हैं अकेला यही रास्ता नहीं है कि चुक गया रास्ता नहीं नहीं
- 45:34उसके विराट रस्ते हैं। अनेकों द्वारों से तुम जान सकते
- 45:38हो, अनेकों रास्ते हैं, जीतने व्यक्ति हैं, उतने ही रास्ते हैं
- 45:47तो चिंता मत करना, किसी और रास्ते से हो लेना केंद्र तक ही तो जाना
- 45:53है। और सफीर से बड़े रास्ते जाते हैं
- 45:57केंद्र की तरफ़ तो मैंने कहा हर चीज़ का निकासी द्वार है।
- 46:10कारण शरीर का भी निकासी द्वार है। कारण शरीर का निकासी द्वार है।
- 46:20सहस्रया सचखंड के ब्रम्हरंत ऋषि से कह देते हैं, बस कारण शरीर का
- 46:30सही सही निकासी द्वार है, वह अगर कोई दे ही निकलेगा।
- 46:39कारण शरीर को साथ ले के तो वह निकल सकता है, कोई व्यवधान नहीं
- 46:45है, बशर्ते के वो विशुद्ध चक्र के ऊपर पहुँच गया हो।
- 46:52इसलिए जो व्यक्ति यहाँ से दीक्षा ले के जाते हैं, वह प्रयास न
- 46:56करें। वह विश्व युद्धि पे आ गए हैं,
- 47:01लेकिन मूर्ख न बने देही को साथ लेके यह सटीक मार्ग नहीं है
- 47:09निकलने का कारण शरीर के निकलने का देही के संग।
- 47:15सहसरार सटीक मार्ग नहीं है। हर चीज़ के सटीक मार्ग होते हैं
- 47:21देही के निकलने का सटीक मार्ग नाभिचक्र है, लेकिन वहाँ से कारण
- 47:27शरीर नहीं जाता। अब इसको आप बहुत विस्तार से मैं
- 47:32आपको डिफ्रेन्शिएट करके समझा रहा हूँ।
- 47:37इसलिए कभी भी जब तुम एस्ट्रल ट्रैवलिंग पे जाओगे, बाहर जाओगे,
- 47:41घूमोगे फिरोगे और गृह तारे इन क्षेत्रों को देखोगे ये जो ऋषियों
- 47:47ने इतनी इन्वेंशन्स की जो आज वैज्ञानिक खोज रहे हैं ये कैसे
- 47:52की? ये दे ही को साथ ले जाके की लेकिन
- 47:56कारण शरीर साथ नहीं गया। कारण शरीर तो एक बार ही जाता है
- 48:04और कारण शरीर जाता है जब एक बार जाता है।
- 48:12तो सहस्रार से जाता है और फिर जब कारण शरीर के साथ दे ही निकल गया
- 48:20तो अंतिम वेला में कोई भी द्वार प्रयोग कर सकता है ये समझ ले बात
- 48:28लेकिन वो वापस आने के दे नहीं आता है।
- 48:33बैन नहीं है। कोई कारण शरीर को किसी द्वार से
- 48:38निकल जाने का बैन नहीं है। कोई बस बैन एक ही है कि वापस नहीं
- 48:43आ पाएगा। अब इसको बड़ी सूक्ष्म चीज़ है।
- 48:50गौर से समझे लेना कारण शरीर का अक्चवल निकासी मार्ग है।
- 48:56सशस्त्र लेकिन अगर तुम दे ही के साथ सूक्ष्म शरीर तुम्हारा
- 49:02विद्यमान है। अभी तुमने पूरे भोग नहीं भोगे
- 49:05हैं, तुमने स्वयं को भी जान लिया है, चाहे।
- 49:12और तुम कारण शरीर को साथ लेकर देही समेट यहाँ से निकल गए हो तो
- 49:19वापस नहीं आओगे, ये पक्का है शंकराचार्य इस शिव को अच्छी तरह
- 49:27जानते हैं। और शंकराचार्य छः महीने के लिए
- 49:31शरीर से बाहर रहते हैं। निकलते कहाँ से हैं उन्हें पता है
- 49:36वापस आना। वे मस्त और मस्त से हैं तो नाभि
- 49:43से जाते हैं और नाभि से ही वापस आ जाते हैं।
- 49:50लेकिन एक बात फिर मैं बता दूँ शंकराचार्य जब जाते हैं, दे ही
- 49:55जाता है, सिर्फ कारण नहीं जाता जब कारण यहाँ से गया एक बार तो फिर
- 50:03वापस नहीं आता भाई। कारण जब भी जाएगा देही के बिना
- 50:08जाएगा तो समुद्र में ही समा जाएगा।
- 50:13वह बूंद है चेतनक जो देही के संग संग रहती है।
- 50:26समझ में न आए तो मेरा कसूर न समझना, शब्दों का कसूर समझना,
- 50:34इशारों से समझ जाना, अगर कोई समझे तो वह कण कण में विद्यमान है।
- 50:46लेकिन देही के साथ उसकी एक बूंद रहती है ये समझना मुश्किल हो
- 50:52जाएगा। थोड़ा इस जहन में बहुत सी चीजें
- 50:56हैं जो तुम्हारी समझ में आएंगी नहीं।
- 50:59इसलिए संत भली भांति जानता है और पहले ये हाथ जोड़ लेता है कि देखो
- 51:03बोल तो ना पाऊंगा। तुम्हारे में प्यास है तो बोलने
- 51:11की चेष्टा कर दूंगा। समझ आए तो भला न आए तो भी भला मैं
- 51:20सब चीजों को खोल रहा हूँ हम आपके सामने।
- 51:25तुम देही को कारण से साथ लेके निकल सकते हो।
- 51:31अगर तुम शुद्धि पे पहुँच गए तो तो यह निकासी द्वार हो सकता है,
- 51:37लेकिन ध्यान रखना वापस नहीं हो सकोगे।
- 51:40जैसे ही गति हुई आशुतोष की मैंने 2 साल पहले भी।
- 51:45ही विल नॉट रिटर्न इट ऑर? और उसके बाद तो कहते हैं कि शादी
- 51:52का भी बेचारी बलि हो गई, मैं जानू कितने लोग बलि चढ़ेंगे इन मूड ताऊ
- 51:59के? वो जानें उनका प्रतिष्ठान जानें
- 52:10हम बातों को समझा सकते हैं क्योंकि समझा सकते हैं जीसको पता
- 52:17नहीं वह तो समझा भी न पाएगा। मानना न मानना सबकी स्वतंत्र
- 52:25चेतना यह जरूरी नहीं है। तुम चाहो तो मान सकते हो, तुम
- 52:32चाहो तो नहीं मान सकते हो 2 साल हो गए कहाँ माने तुम?
- 52:38तो फिर वहाँ सिर्फ एक ही बात समझती है।
- 52:43यहाँ संस्थान को चलाने वालों में कोई लोभ होगा और वह तो गया जाने
- 52:51वाला यहाँ कोई लोभ अवश्य है जो संस्थान को चला रहे हैं।
- 52:57अन्यथा एक तरफ़ा कर देते लोग अपने गुरुओं को कौन सा नहीं ठिकाने
- 53:01लगाते, वो दफन करने योग दफन कर देते हैं, जलाने योग जला देते हैं
- 53:06अपने अपने हिसाब से, लेकिन गुरुओं को उसका अंतरिम छोर तो दे देते
- 53:13हैं ना, लेकिन यह गुरु के साथ अन्याय है।
- 53:16शिष्यों का अत्याचार है, अब वो चला गया, वो नहीं कुछ कह सकता,
- 53:22लेकिन ये झूठ जाट बातें हैं। जो लोग कहते हैं कि हमें स्वप्न
- 53:25में आके कह गए, वो कह गए ये कह गए प्रकट हो जाऊंगा वो हो जाऊंगा,
- 53:30कुछ नहीं होगा भाई मेरी खुद उससे बात हुई है।
- 53:36नहीं तो बेचारा बेचारा हो गया। अब छोड़ो इन बातों को हम मूल
- 53:43मु्द्दे पर आ जाएं। कैसे भक्तों की भावनाओं भड़कती
- 53:48हैं मैं क्या करूँ मजबूर मैं भी हूँ सत्य बोलने के लिए।
- 53:56और भावना तुम्हारी बढ़के न भड़के, इससे कोई लेना देना नहीं है।
- 53:59मेरा मेरा लेना देना है। मैं परवाह करता हूँ सत्य की मैं
- 54:03तुम्हारी फिक्र नहीं करता हूँ, मैं फिक्र करता हूँ सत्य की मैं
- 54:10तुम्हारी फिक्र करता कि नहीं करता।
- 54:15और जीस दिन मैंने तुम्हारी फिक्र करनी शुरू कर दी जो दुनिया की
- 54:19फिक्र करना शुरू कर देता है, वह शक्ति की फिक्र से चूक जाता है।
- 54:23मेरे इन शब्दों को गोल्ड इन शब्दों में लिख लेना, जो दुनिया
- 54:29की फिक्र करना शुरू कर देता है, वह शक्ति की फिक्र करना बंद कर
- 54:33देता है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ, कुछ तो
- 54:38लोग कहेंगे आशा मत करो, लोगों का काम है कहना छोड़ो, बेकार की
- 54:48बातें कहीं बीत न जाए। रैना आओ।
- 54:54हम तो रात को सुनहरी कर दे तो इन्होंने तो अपनी रात सुनहरी कर
- 55:00ली। अब बारी है तुम्हारी चूक न जाओ इन
- 55:15मूड़ताओं को इतना फैलाया गया जो जानते नहीं थे।
- 55:19उन्होंने भी कुछ न कुछ कहा, बड़ी गलत बात है जब तुम जानते नहीं यू
- 55:29शुड बी क्विट तुम्हें चुप हो जाना चाहिए मानवता की इसमें भलाई है
- 55:37तुम्हारा बोलना। अगर मानवता के लिए अभिशाप बन जाए,
- 55:41भटकाव का कारण बन जाए तो तुम पापी हो।
- 55:46मैंने बहुत बार कहा है और लोग बोले ही चले जाते हैं।
- 55:54किसी के मन में राज्यसभा की टिकट पाने की इच्छा है?
- 55:58उन्हें लगता है राज्यसभा की टिकट में वह आनंद मिल जाएगा, भाई नहीं
- 56:03मिलेगा जो तुम्हें टिकट देगा, ना पीएम ना सीएम, किसी को नहीं
- 56:08मिलेगा। मिलेगा किसे मिलेगा उससे?
- 56:14मयभू गए सावरिया। बोल गए सांवरिया आमन कह गए आज हो
- 56:49न आए आमन? कह गए आजगुणा आए ली नहीं मोरी
- 57:07खबरिया। मोहे भूल गए, सांवरिया भूल गए
- 57:25सांवरिया। इस भजन के बीच में थोड़ा सा
- 57:37सूक्ष्म रोहन के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए मैं बता दूँ।
- 57:42अगर कहीं ऐसी गलती हट जाए तो ज्ञानगंज में तीन रोए बैठे हैं।
- 57:53एक तो स्वामी उदंडानंद जी महाराज, तृप्तानंद जी गिरि और तीसरी
- 58:03सुनंदा कात्या स्त्री ये तीन रोहें बैठी हैं।
- 58:10ध्यान रखना शरीर के बाहर निकलने के बाद कोई पुरुष या स्त्री नहीं
- 58:17रहता, बस वो सिर्फ विद्युत के तरंगे मात्र रह जाता है।
- 58:25यह तीन लोग बैठे हैं उनसे। दिशानिर्देश ले सकते हैं और वो
- 58:32आने वाले करीब 1,00,000 वर्ष तक के लिए वहीं बैठेंगे।
- 58:37कोई उलझे व्यक्ति कोई गलती कर बैठे तो उनसे परामर्श ले सकते
- 58:44हैं। वो इस वक्त के द्रुव हैं।
- 58:49हमारी आध्यात्मिक फील्ड में। जो मैं ऐसा जान।
- 59:39प्रेत न करियों को। मोह भूल गए सागरिया भूल गए
- 1:00:12सागरिया। आमन कह गए आज हो न आए ये आमन कह
- 1:00:28गए आज हो न आए। मोरे खबरिया मोहे भूल गए सागरिया।
- 1:00:55भूल गए सावरिया नैन कहें रो। रोके सजना देख चूके हम चार का
- 1:01:21सपना नैन कहें। हैं रो रो के सजना, देख चूके हम
- 1:01:38यार का सक नो प्रीत है झूठे। प्रीतम झूठा, प्रीतह झूठी, प्रीतम
- 1:01:59झूठा। जूठी हसारी नगरिया मोहे भूल गए
- 1:02:16सांवरिया। भूल गए, सांवरिया दिल को दिए
- 1:02:33क्यों दुख विरहा के। दिल को दिए क्यों दुख विरहा के
- 1:02:51तोड़ दिया क्यों? महल बना के तोड़ दिया क्यों महल
- 1:03:08बना के आस दिला के? ओह बेधर दे आस दिला के ओह बेधर दे
- 1:03:31फिर लिखा। ये नजरिया फिर लिखा है।
- 1:03:43नजरिया महे भूल गए। सावरिया भूल गए सांपरिया आवन कह
- 1:04:06गए आज हो न आये। आमन कह गए, आज होना आये, लीना ही
- 1:04:22मेरी खबर या मोह भूल गए। सांवरिया भूल गए सांवरिया।