Latest / Baba ji Vijay Vats / 30 Jul 25 - मेरा परीक्षा लेने का ढंग कुछ "अलग"! मुझे कुछ गिने-चुने ही दीपक चाहिए! “सुनिए दुख पाप का नाश”
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- 0:03निरग्रंथ होना अध्यात्म और तुम्हें निरग्रंथता का सही अर्थ
- 0:12मालूम है और मैं वक्त वक्त में तुम्हारी परीक्षा देता हूँ।
- 0:21क्योंकि बाबा ने कहा ज्यादा भीड़ भाड़ इकट्ठी मत करना, कमीन मत
- 0:26बनाना तो थोड़े से विद्यार्थी चाहिए।
- 0:30मुझे वो विद्यार्थी चाहिए जो इस पाठशाला में उतीर्ण हो गए।
- 0:42मुक्त हो सके, लिबरेशन का आनंद पा सके, जो हीरे को पा सके और उसे
- 0:51गांठ में गठया सके, जो मानसरोवर के ऊपर।
- 0:58को दरकियां लगा सके और ताल तलइयों में भटकते न फेरे मुझे ऐसे
- 1:11जिग्गसू चाहिए मैंने फिर पार्टी थोड़ी बन रही है।
- 1:18मुझे बाहू बल की आवश्यकता नहीं आदम बल पैदा करना चाहता हूँ, तो
- 1:25मैं मैं इसलिए बाहर के आडम्बरों को तुमसे छीन लेना चाहता हूँ।
- 1:35मेरी सारी प्रणाली इसी पर आधारित यदा कदा तुमने कहानी सुनी होगी।
- 1:45मैं परीक्षा लेने के लिए ऐसे काम कर दिया।
- 1:47फिर यह मेरी परीक्षा का ढंग है जैसे जैन फकीर।
- 1:56प्रताड़ित करते उन्हें पता है कि शरीर के साथ मोहित किसी को अपने
- 2:05विचारों के साथ ज्यादा लगाव होता है, बस थोड़ा सा उन्हें भांप मिल
- 2:10जाए। और तुम्हारे विचारों को तोड़ेंगे,
- 2:14तुम्हारे विचारों से बिल्कुल विपरीत बात करेंगे तुम्हारे शरीर
- 2:20का होना तो जब टूटेगा तब टूटेगा, वो तो बड़ी मुश्किल बात है।
- 2:26संत भी जानता है। कि ये आखिरी वक्त जब छलांग लगानी
- 2:33पड़ेगी कि मैं शरीर नहीं हूँ, रोवा रोवा थर्रा जाएगा सूखे पत्ते
- 2:40की तरह तुम कांपोगे मृत्यु साक्षात तांडव बनके तुम्हारे
- 2:45सामने नाचेगा ऐसा तांडव नृत्य होगा।
- 2:51कि तुम्हारा रोमा रोमा खप जाएगा मृत्यु के सामने देखकर और तुम
- 2:59घबरा जाओगे, सर्दी होगी लेकिन तो पसीनों से भर जाओगे ये भय का
- 3:07आक्राण तुम्हारे रोये रोये को ग्रस्त लेगा।
- 3:13गुरु इसको अच्छी तरह से जानता है कैसे हम मुक्त होगे तुम जब छोटी
- 3:20छोटी बातों से तुम मुक्त न हो सके छोटी छोटी चिपकाहटों को तुम छोड़
- 3:27न सके। ऐसी ही परीक्षा में लेता हूँ।
- 3:33जैन फकीरों की तरह उनका अपना तौर तरीका था।
- 3:39मेरा अपना तौर तरीका। ये कहानी तुमने सुनी होगी एक राजा
- 3:46के। खजाने से थोड़े से हीरे विलुप्त
- 3:52हो गए थे। किसी ने चोरी कर ली और बहुत से
- 3:58लोगों के पास जा रही थी उसकी अब शक कोई करे तो किसपे करे।
- 4:07चाबी सभी के पास थी, जीसको जिसकी जरूरत होती ले जाता, क्योंकि राजा
- 4:14मगाता किसी को पुरस्कार देना है, किसी को सम्मानित करना है तो राजा
- 4:21हुक्म दे देता जाओ, खजाने से इतने हीरे ले आओ।
- 4:27जाओ मोतियों की माला ले आओ, हीरो की माला ले आओ, माणिक की माला ले
- 4:32आओ, लाल ले आओ, सोने की शर्त में ले जाओ वो चाबी वहाँ पड़ी रहती है
- 4:40बाहर और फिर जो सामने खड़ा है उसे हुक्म दे देते हैं।
- 4:46एक बार की ऐसा हुआ कि राजा के उस खजाने से कुछ कीमती हीरे द्वारा
- 4:54चोरी हो गए। अब दोष लगाए तो किसपे लगाए नाम ले
- 5:04तो किसका ले? पता तो है नहीं तो उसने अपने
- 5:12विश्वास पात्र मंत्री को बुलाया, सारी कहानियों बताईं।
- 5:19बात हीरे जो हतो की नहीं। इतना तो हम रोज़ पुरस्कार में भी
- 5:24बांट देते हैं। बात ये है कि ऐसा व्यक्ति कृत गण
- 5:33कौन कौन व्यक्ति है? जिसकी वासनाएँ पूरी नहीं होती, जो
- 5:47लोभी हो गया है, जो चोरी करता है, चोरी करना बड़े से बड़ा आता है।
- 5:59इसलिए संतों ने कहा, पतंजलि ने कहा।
- 6:03अचौर्य महावीर ने कहा, अचौर्य सत्य क्यों?
- 6:12क्योंकि अगर तुम सत्य से शुरू ना करोगे तो आगे।
- 6:18कोई रास्ता तुम्हें नहीं मिलेगा सब रास्ते बंद हैं सत्य के बिना,
- 6:27उसने कहा, यह तो बहुत गलत हो जाएगा मांग के ले जाएगा जीसको जो
- 6:34चाहिए चाबी सब के पास पड़ी है। और काउंटिंग करने वाला व्यक्ति
- 6:42अपने रजिस्टर पहले से लेता है। ये फलों को दी गए, ये फलों को दी
- 6:47गए, ये फलों को दी गए, कोई हिसाब सारा मिल गया लेकिन इतने रत्न
- 6:52गायब क्या पता लगे? मंत्री सुमितार्थ महामंत्री कहत
- 7:02कोई बात नहीं राजन तुम शांत रहो, मैं चोर को ढूंढ दूंगा।
- 7:09सारा स्टाफ बुला दिया गया। राजा के पास सेट ऑफ कौन सा कम
- 7:13होता है? सैकड़ों लोग थे, एक कतार में खड़े
- 7:17कर लिए गए। राजा भी देख रहा है चोर को
- 7:24पकड़ेगा कैसे वह महामंत्री बोलता है।
- 7:33खजाने से कुछ हीरे जो हारा इतना इतना माल चुरा लिया गया, किसी ने
- 7:42चोरी कर लिया और इतने दिन की पुष्पड़ताल के बाद हमने चोर को
- 7:49ढूंढ निकाला। कौन कितना स्टॉक लेके गया था और
- 7:54किस लिए लेके गया था और कौन सी चीजें गुम हैं और उसने खजाने से
- 8:06कब मांगी, किस्से मांगी, किस अध्यन मांगी?
- 8:11ये सब रिकॉर्ड है चुप करके सत्य का प्रमाण देते हुए वह व्यक्ति
- 8:21बाहर आकर अपना अपराध स्वीकार कर ले तो उसको बक्श दिया जाएगा।
- 8:30अन्यथा मृत्युदंड मिलेगा। राजा भी देख रहा है ये है कौन सा
- 8:38ढंग हुआ, चोरी को पकड़ने का कोई नहीं बाहर आया किसने आंख नहीं
- 8:46परखई किसी ने जुबान नहीं परखाई। कोई लब ना हिला किस ने कहा मैंने
- 8:56चोर किया मेरी ये मजबूरी थी ये मुझे लोभ लालच आ गया था।
- 9:07फिर महामंत्री बोला, चोर की पहचान मैंने कर ली है, मैंने तुम्हें
- 9:13पहले बता दिया बस ये दूसरा वचन है अपने आप चोर बाहर आ जाए अगर नहीं
- 9:25आया। तो मैं खुद उसे बकर के बाहर ले
- 9:30आऊंगा। एक मौका और है तुम्हें, लेकिन कोई
- 9:36बाहर नहीं आया। अब सारी कहानी तो बना रखी थी।
- 9:41महामंत्री ने कैसे कैसे क्या क्या करना है?
- 9:45चोर निकल जाएगा। उसने तीसरी बार कहा, लेकिन अब मैं
- 9:52पहचान बताता हूँ तुम दो बार कहने से नहीं निकले, लेकिन अब मैं
- 9:59तुम्हें पहचान बताता हूँ। तुम्हारा सर कलम कर दिया, चाय का
- 10:07अब भी वक्त है कि तुम बाहर आ जाओ और तुम्हें इतना बता दो कि जिसने
- 10:19चुराया उसकी दाढ़ी में चनखा है। बड़ी हद हो गई।
- 10:28यह तो व्यक्ति जानता है। जिसने चुराया था उसने धीरे से
- 10:35दाढ़ी में हाथ मरा। पैनी निगाहें थी।
- 10:42सब के ऊपर सभी के और मंत्री ने उसे इशारा किया इब्राजा चोर पकड़ा
- 10:53किया चोर की दाढ़ी में तेन का यहीं से कहावत बन।
- 11:00यह वो ही था जो सामान ले के जाते, राजा के हुक्म के अनुसार और
- 11:06रजिस्टर पे नोट किया करता था। उसी व्यक्ति ने बेईमानी के चैन
- 11:15चौकीदार चोर नहीं थे। चौकीदार मालिक था, समझ गए चौकीदार
- 11:27चोर नहीं था चौकीदार मालिक था पहचान बाद में आयी।
- 11:35कई चीजें बहुत ठहर के पहचान में आती है।
- 11:42मेरा अपना मैं तुम्हें निर्ग्रंथ करना चाहता हूँ कैसे आवाज में कोई
- 11:54आवाज नहीं मैं चाहता हूँ। तुम्हारी ये बदसूर देख कर
- 12:03तुम्हारे ओरे देखकर काले पड़े हैं तुम्हारे ओरे तुम्हें शांत होना
- 12:09चाहिए, तुम्हें गंभीर होना चाहिए। तुम्हें प्रश्नों की आग में हर
- 12:15वक्त जलते नहीं रहना चाहिए। ऐसा कब तक चलेगा?
- 12:22जन्मो। जन्मो से, तुम ऐसे ही चलाते आए
- 12:25हो, तुम दिनों को जी नहीं रहे, तुम दिनों को धक्के मर रहे हो, ये
- 12:34भीका जी न हुआ। ज़िन्दगी को जियो ज़िन्दगी छोटी
- 12:42है बड़ी लेकिन ज़िन्दगी जीने के लिए मज़े से जीने के लिए ज़िन्दगी
- 12:50दिनों को धक्का देने का नाम बिल्कुल नहीं।
- 12:56और तुम दिनों को धक्के ही दिए जा रहे हो कितने जन्म बीत गए तुम जीत
- 13:05तो पाए निराश होश कभी अतीत के गहराइयों में उतर जनम।
- 13:15पिछली बार तुम कब मुस्कराए थे? पिछली बार तुम कब ठहाका लगा के
- 13:24हँसे थे? याद करो, तुम्हे याद आएगा।
- 13:36एक वेला, एक वेला, एक मृतक भीत गई, हम कह कहे लगा के हसन ठहाके
- 13:47लगा के हसन किसने छीन लिया तुम्हारा ये सुख?
- 13:53किसने छीन ली तुम्हारी हँसी? कुछ मशीन मान्यताओं ने छीनी प्याज
- 14:01नहीं खाना चाहिए, लहसुन नहीं खाना चाहिए और संत।
- 14:10प्याज भी खाते हैं, लहसुन भी खाते हैं, शराब भी पीते हैं, मांस भी
- 14:18खाते हैं तो मैं जान के बड़ी। पर हम खुशी तक पहुंचने के जो
- 14:29रास्ते तुमने इजाद किए ध्यान से समझना कहीं वो मूड़ता के ऊपर जाकर
- 14:38तो नहीं है से कहीं वो मूड़ता तक तो तुम्हें लेकर नहीं जाते ऐसा ही
- 14:45है। तुम चलते हो?
- 14:51अध्यात्म के रास्ते पर खुशी गई, लेकिन आखिर में तुम नतीजा ये पाते
- 15:01हो कि हमारे संग तो दुखड़े बहुत हो लिए।
- 15:09घर से तो हम चले थे, खुशी की तलाश हो गए गमराह में खड़े थे वो ही
- 15:19साथ हो लिया खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिया यूँ हसरतों के
- 15:28दाग। मोहब्बत में दौड़ रही है हँसना
- 15:37तुम्हारा स्वभाव, खुशी और उन्मुक्त ठहाके लगा के नाचना
- 15:51तुम्हारा स्वय। तुम्हारा अपनत्व है तुम्हारा अपना
- 15:54हो ना तुम कहाँ फंस गए किन लाचारियों में तुम उलझे फिरते हो
- 16:07यह नकाब किसने तुम्हें उड़ा दिए? ये लबा दे तुम्हारे ऊपर किसने थप
- 16:17दिया है? तुम बहुत बेहोशी में जी रहे हो और
- 16:30बड़ी बात तो ये है कि तुम बेहोश हो और तुम्हें पता नहीं तुम बेहोश
- 16:34हो। अगर पता भी चल जाए कि मैं होश में
- 16:40नहीं हूँ, बस इतना सा पता लगना कि मैं होश में नहीं हूँ।
- 16:51तो बेहोशी को काटने का पहला कदम है।
- 16:57यारों मुझको माफ़ करना, मैं नशे में हूँ।
- 17:10यार मुझको माफ़ करना, मैं नशे में हूँ।
- 17:25जीसको ये पता लग गया कि मैं नशे में हूँ।
- 17:31उसका अगला कदम उस नशे में नहीं बीतेगा।
- 17:37उसका अगला कदम बहोशी में बीतेगा। बेहोशी भी नशा तो बेशुद्धि में भी
- 17:47होता है। खुमार नशे से लथपथ होता है।
- 17:56गुजरात को योगी ध्यान में मस्त रहता है।
- 18:02सुबह तुम्हें ऐसा लगेगा जैसे इसने न जाने समुद्र भर के शराब पी ली
- 18:08है। लेकिन ये नशा कुछ अलबेला है,
- 18:15तुम्हारा नशा तुम्हें मोर्चा देता है और वो जो योगी नशा पीता है,
- 18:24उसे जागृति देता है। अमूरछा।
- 18:30बस सब तुम्हारे नशे में और योगी जो पीता है सारी रात लोग कृष्ण
- 18:36कहते हैं जब तुम्हारा संसार सोता है तो मेरा योगी जागता है वो रात
- 18:46को जागे ही जागे, वह समुद्र पी जाता है।
- 18:50रोज़ और सुबह जब उठता है चारों तरफ से मदहोशी में आनंद में उस
- 19:03सुगंध में झूम रहा होता है। मुझे बहुत से लोग कह देते हैं
- 19:08बाबा अच्छा विजय क्यों करते हो? सर्व दीक्षा ब्रह्म मुहूर्त में
- 19:15शुरू करते हैं। दूसरे लोग तो मैं का पुत्र यह
- 19:21निजी सवाल है, मेरा मेरे जीवन का सवाल है।
- 19:27किसी ने पूछो तुम कोशिश करो कैसे तुम भी वैसे हो जाओ कैसे तुम्हारी
- 19:34भी रात वैसे गुजरे जैसे किसी योगी की गुजरती तुम्हारी रातें।
- 19:44सैन शैया पे पड़े हुए वह सनाव में लिप्त लिप्त गुजर जाती थी, लेकिन
- 19:52योगी की राते अपने मदहोशी के समुद्र में अठखेलियां लगाते हुए
- 20:00गुजरती। जब मैं सभ्यवस्था हूँ, वह मस्करी
- 20:074:00 बजे तक उसका हल्का हल्का सुर फिर भी रह जाता है और तुम पाओगे
- 20:17जब तुम मेरे पर सत्या। ये बिलकुल ऐसा जैसे बुद्ध
- 20:25मूर्तिवत बैठें जैसे महावीर मूर्तिवत बैठें और आनंद इतना घना
- 20:33जैसे कृष्ण बांसुरी बजा रहा हो। जैसे मीरा ने अपने पग में घुंघरू
- 20:39बांध लिया, ये दोनों चीजों का कॉम्बिनेशन क्या हुआ?
- 20:50कुछ ऐसा पी लिया, सारी रात तुम सोये?
- 20:57योगी जागह और उसे जागने में ऐसी शराब पी गया, साँझ तलक नहीं उतरी
- 21:09शाम हो गई कई बार मेरे बच्चे कैसे थे?
- 21:17बहुत देर से बैठे हैं दीक्षा लेने वाले वह मुश्किल दो चार महीनों के
- 21:23बाद एक सेशन बुलाया जाता है क्योंकि मैं ज्यादा।
- 21:34मैंने राजनीतिक पार्टी थोड़ी ही बना ली।
- 21:38मुझे वो प्रबुद्ध दीपक चाहिए जिनमें जलें की क्षमता है जिनके
- 21:45दीपक तेल के ईंधन से भरे पड़े हैं और जिनके भीतर बातें सजा दी गई
- 21:52लेकिन आग नहीं लगी। फिर वो दीपक रोशनाई न फैला
- 21:57सकेंगे। बावजूद इसके के दीपक हैं, इसके
- 22:03ईंधन है और इसके के बाती भी है, लेकिन रोशनाई नहीं है पर जलवृत्त
- 22:11नहीं है। बुझे हुए दीपक है, अभी जगाया
- 22:16नहीं। इनको ईंधन से भरे पड़े कपास की
- 22:24बाती लगी, लेकिन किसी ने जलाया नहीं, कोई दिया इनके पास आएगा
- 22:31जलता हुआ। इनकी बातें से लगेगा और ये भी जल
- 22:36जाएंगे। बस ऐसा ही मैं चाहता हूँ तुम यदा
- 22:41कदा में ऐसे सुहाग करते हो। प्रत्येक प्रकार के जिन जिन
- 22:47संभावनाओं से तुम ग्रंथित हो सकते हो।
- 22:56तुम किसी धार्मिक ग्रंथ से भी चिपटे हुए हो सकते हो, तुम किसी
- 23:01धार्मिक मान्यता से भी चिपटे हुए हो सकते हो।
- 23:05तुम किसी पारिवारिक या सामाजिक मान्यता से भी चिपटे हुए हो सकते
- 23:10हो। और कुछ ऐसी भी ग्रंथियाँ हैं जो
- 23:14तुमने स्वयं ही पैदा कर दी हैं। अपनी बुद्धि के कारण अपनी सोच के
- 23:21कारण तुम्हें पता नहीं यह 1 दिन ग्रंथि खिस्ती खिस्ती खिस्ती
- 23:29खिस्ती गोल गांठ बन जाएगी। फिर ये तुमसे खोल न पाएगी, फिर
- 23:37गुरु का सहारा चाहिए और गुरु को ढूंढोगे फिर से, इसलिए मैं ज्यादा
- 23:46पता जानता हूँ अभी। जानता हुआ भी यह व्यक्ति प्रभुद्ध
- 23:57है। कुछ ऐसा गलत मैं लत बोल देता हूँ
- 24:04कि इनसे चिपके हुए लोग भड़क उठें। और वो मेरे पास आ गए क्योंकि
- 24:15गुरुदेव अभी रहे नहीं तो मेरे पास आ गए जलते हुए दीपक की रोशनाई की
- 24:24झलक देखने के लिए। शास्त्र तो है उनके पास लेकिन
- 24:32शास्त्र जीस रोशनाई में पढ़ा जाता है।
- 24:36वो दीप की रोशनाई नहीं है। दीप की रोशनाई में ही शास्त्र
- 24:40पढ़े जाते है। बस इसलिए कह गए थे।
- 24:46और शो के मेरे जाने के बाद किसी जीवंत गुरु को ठोंक लेना शास्त्र
- 24:53में दे चला हूँ लेकिन शास्त्र जिसकी रोशनाई में बांचे जाएंगे,
- 25:01वह रोशनाई चली जाएगी। किसी रोशन दीपक की खोज कर लेना
- 25:08जहाँ जाकर तुम मेरा ये शास्त्र वाचस्प हो यही था मतलब और क्या
- 25:17तुम समझे कौन गुरु है? जो शक्ति को अलग प्रकार से बोला
- 25:27है अब यहाँ समझना थोड़ी बात का मार्ग अलग हैं, सभी के कोई पूर्व
- 25:37चला, कोई पश्चिम चला, कोई दक्षिण चला, कोई उत्तर चला।
- 25:42और सफियर के ऊपर हजारों मार गए हैं जो केंद्र तक पहुंचाते हैं
- 25:49लेकिन केंद्र पे जाके सबकी अनुभुतियाँ समान हो जाती हैं तो
- 25:55कबीर कहते हैं सबय सयाना, एक अमर जो सयाना हो गया।
- 26:02वह केंद्र पे पहुँच गया इसलिए केंद्र पे तो एक ही चीज़ अनुभव
- 26:11में आती जो केंद्र में पहुँच गया उसके अनुभव में सदा जो जो रोग
- 26:18केंद्र में पहुंचे उसके अनुभव में एक ही चीज़ आए।
- 26:22क्या है शान? आनंद की बलकाकक और खुशी व आनंद की
- 26:34खुमारी? केंद्र पर यही कुछ मिलेगा।
- 26:42तो कबीर ने कहा जो सयाना हो गया। किसी भी मार्ग से चला मार्ग तो
- 26:49अनेक है, अनेक पंथ हैं और प्रत्येक अपरंथ।
- 26:59पहुंचाता है। केंद्र के पास प्रत्येक पंथ का
- 27:05अंतिम लक्ष्य है केंद्र लेकिन केंद्र पे जाके तुम पाओगे, सयानों
- 27:13के मत दो नहीं होते कोई सयाना नहीं कहेगा।
- 27:19कि परमात्मा दो हैं। सभी स्याने कहेंगे परमात्मा एक है
- 27:27एक ओंकार, क्योंकि केंद्र एक है केंद्र दो होते हैं कभी केंद्र एक
- 27:34होता है। सिफियर दो नहीं होते सिफियर अनेक
- 27:38होते हैं परिधि के ऊपर अनेक रस्ते लेकिन केंद्र के ऊपर मंजिल एक है,
- 27:48अनेक रास्तों से होते हुए भी। एक केंद्र पे पहुँच ही जाता है
- 27:54साधक मोमूक्ष तुम अनेकों ग्रंथियों से बारांतियों से भरे
- 28:00पड़े हो और गुरु तुम्हें हर हाथ में निर्व्रांत करना चाहता है।
- 28:11और सभी के पास अपनी अपनी तकनीक है।
- 28:16मेरी तकनीक अपनी है, मैं तुम्हारी चिपकाहटों पे सीधा पार करता हूँ
- 28:28और तुम तिल में लावसते हो बस जैसे ही तुम तिल में लाए।
- 28:35मैंने तुम्हें ब्लॉक मारा ब्लॉक मारने का सीधा सा अर्थ है तो मुझे
- 28:42तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। बहुत से लोग गुस्सा में जाते हैं।
- 28:49मैंने का भाई बरा बुरा है सारा से।
- 28:54किसी अन्य के पास चले जाओ। मेरे पास न टेकक है आज छोटी सी
- 29:02बात को कटने से तुम और तेजत होकर तो मैं भलीभाँति जानता हूँ।
- 29:11कि जब वो महान शीतल जैसी सुमेरू पर्वत जैसी बाधा को हटाना पड़ेगा
- 29:24तो कैसे हटा पाओगे तुम? आज एक अभ्रांति को काटते वक्त तुम
- 29:31झल्ला गए आज एक अभ्रांति को काटते वक्त तुम थर्रा गए और तुमने इतना
- 29:38बड़ा रिएक्शन किया कल को आखिरी भ्रांति तोड़ने को बोले और गुरु
- 29:44का विश कर। गुरु का मतलब भी क्या है?
- 29:52गुरु को एक गीत सुनाने के लिए होता है वो तो कभी कभी मनो बहल
- 29:58जाए। तुम्हारा इतना गुड एकदम विषय है
- 30:04कि तुम्हें जैसी फ़िल्म नहीं चलती।
- 30:08फ़िल्म के भीतर कोई गाना ना हो वो मज़ा नहीं आएगा।
- 30:12हर स्वाद जाइए फ़िल्म में कहानी ही कहानी चलती जा हर रस देना
- 30:22पड़ता है प्रोडूसर को डायरेक्टर को।
- 30:26विलेन भी बनाना पड़ता। अच्छा आदमी भी बनाना पड़ता, एक्टर
- 30:34भी बनाना पड़ता, हीरोइन भी बनानी पड़ती, कोई सोतन भी बनानी पड़ती,
- 30:40कोई ईर्षालु भी बनाना पड़ता सारी कहानी चलाता है परदे।
- 30:46और बीच बीच में तुम्हारे मनोरंजन के लिए थोड़े गीत भी मॉडल देता है
- 30:53क्योंकि वो जानता है मान स मन थोड़ा सा बीच बीच में मनोरंजन भी
- 31:00चाहेगा। छोटी सी जिंदगी है एक फ़िल्म की
- 31:04तरह दो 3 घंटे की। उसके बाद गेट दरवाजे खोल दिए
- 31:10जाएंगे। तुम जाओ अपने अपने घर में और इसी
- 31:16वक्त के भीतर सारे रस तुम्हें दिखा नहीं कैसे संभव हो पाएगा?
- 31:22इसको मैनेज करता है गुरु? गुरु तुम्हें नरकंथ करना चाहता
- 31:29है, निर्भ्रांत करना चाहता है इसलिए तुम्हारे सारे भ्रांतियों
- 31:35के ऊपर चोट मरेगा और उसे चोट मारने के कारण महत्त्व एक ही है,
- 31:43मच्छ। कैसे मैं उस जब विराट इल्यूजन को
- 31:53हटाऊंगा वह जो सदा सदा से पाथर से शुरू हुआ पेड़पौधों में आया?
- 32:02यूनी सेल्यूलर ऑर्गनिज्म में आया मल्टी सेल्यूलर में आया दपाई
- 32:08चौपाई पशुओं में आया और फिर आखिर में मानव में आया।
- 32:14मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ ये तुम्हारी आखिरी बाधा है।
- 32:21एक मात्र वादा है तुम्हारी का मैं शरीफ यही तुम्हारे दुख का कारण
- 32:27है। मैं विचार हूँ यही तुम्हारे दुख
- 32:30का कारण गुरु तुम्हारी गुरुओं पर प्रहार करेगा।
- 32:38गुरु तुम्हारे शस्त्रों पे प्रहार करे अब फूंक दो इनको आग लगा दो
- 32:42इनको जहाँ तुम भड़क गए पशु से चोर की तरह महामंत्री कहेगा आओ बाहर
- 32:55चलो यहाँ तुम्हारा क्या काम? मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम
- 33:01है किसी और के पास जाओ भाई यहाँ नहीं दाल कलेगी हमने तुम्हारा
- 33:09लक्ष्य तक तुम्हें लेके जाना नहीं।
- 33:13रास्ते में तो महज एक प्रणाली अब बनाई जा रही है।
- 33:20देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है सर फरोशी की तमन्ना अब
- 33:26हमारे दिल में है तोड़ना तो आखिर तुम्हारा वो गोरुर है जो तुम
- 33:34जन्मो जन्म से लिए बैठे हो। गुरु और अहंकार घमंड क्या मैं
- 33:42विचार हूँ मैं शरीर हूँ, उसके ढंग प्रत्येक गुरु के अपने आपको कोई
- 33:51कैसे कह देता है? कोई कैसे कह सकता है?
- 33:57और फिर तुम शब्दों से चिपक जाती हो, फिर तुम शब्दों की तपसील
- 34:03मांगते हो, जबकि गुरु तुम्हारी व्रांतियों के शब्दों की तफसील
- 34:08देने के लिए नहीं गुरु तुम्हारी व्रांतियों को तोड़ने के लिए।
- 34:14गुरु तुम्हारे ग्रंथियों को खोलने के लिए है तुम्हें निरग्रंथ करने
- 34:19के लिए है तुम्हारी ग्रंथियों का जवाब देने के लिए गुरु नहीं है,
- 34:25समथिंग मेरे पास कम है शादी मैंने कहा इसका मतलब तुमने मेरे शब्दों
- 34:33को सुना। तुमने मेरे प्रवचनों को सुना
- 34:37तुमने मुझे नहीं सुना अरे बाबा तुमको सुनना और तुम्हारे प्रवचनों
- 34:45को सुनना। ये दो बातें हैं, बिल्कुल दो
- 34:50बातें हैं तुम्हें अभी तक पता नहीं।
- 34:55मुझे सुन और मेरे शब्दों को सुन ये दो बातें हैं तुमने क्या सुना?
- 35:02बस मैं इसी से निर्णय करता हूँ कि कितनी देर लगेंगी, कितनी देर
- 35:10लगेंगी निरग्रंथ होने के? और ग्रंथियाँ तुमने बहुत पाली
- 35:17छोटी छोटी ग्रंथियाँ तुम्हारे जान का जिंजाल बन गई जी का जिंजाल बनी
- 35:24बैठी है प्याज ये लहसन खाऊ के नखाओ, मिर्ची मसाले खाऊ के नखाओ।
- 35:32मांसाहारी करूँ कि न करूँ? अरे भाई, ये आध्यात्मिक विषय
- 35:39थोड़ी है, ये तुम्हारे दिमाग में किसने घुसेड़ दिया?
- 35:50यह चरित्र निर्माण है। प्याज लहसुन न खाना माँ समठी न
- 35:59खाना शराब न पीना यह चरित्र का उत्थान है, जिसका अध्यात्म से कोई
- 36:08भी तो समझ नहीं है। तुम मेरी बातों को जानकर हैरान हो
- 36:14रहे हो? नहीं हैरान मत हो, शराब पीते हो
- 36:19तो शरीर शराब पीता है, मांस खाते हो तो शरीर मांस खाता है, सोते हो
- 36:29तो शरीर सोता है। एक दिया सदा जलता रहता है चाहे
- 36:38दिवस हो चाहे रैन हो, तुम तो वो जागती हुई लोग हो जो कभी बुझती
- 36:48नहीं। बिना ईंधन के चलते हो तुम तुम वो
- 36:54जागृति हो तुम वो लो हो अकाम्प लो जो कंपटी नहीं, जिसका ईंधन कभी
- 37:03खत्म नहीं होता, न सुमय बाती है, न सुमय तेल है, लेकिन फिर भी चल
- 37:13रहा है। एक दिया मेरे प्राण जलत है बिन
- 37:19बाती बिन तेल वह सदा जलता ही रहता है, उसको किसी ईंधन की आवश्यकता
- 37:27नहीं, किसी बाती को बदलने की आवश्यकता नहीं।
- 37:33वह सदा चलता रहता है, बिना बाती के और बिना तेल के जब मैं कहता
- 37:42हूँ तुमने मुझे सुना या तुमने मेरे ही शब्दों को सुना।
- 37:48इस शब्द को आप थोड़ा सा शांति से सुन बार बार सुन तो समझाएगा मैं
- 37:54क्या बोल रहा हूँ लीजिए इस फर्क को समझियेगा यद्यपि आज तक तुम्हें
- 38:02शायद यह फर्क मैंने बताया नहीं। चुपचाप चलता रहा।
- 38:075 साल बीत गए आज तो मैं फर्क समझाता हूँ, तुमने मेरे इन शब्दों
- 38:16को सुना या तुमने मुझे सुना कैसे पता चलेगा?
- 38:28कैसे समझ पाएंगे हम अगर तुमने मेरे शब्दों को सुना, जिसे महावीर
- 38:38कहते हैं, यह सम्यक श्रवण नहीं है अगर तुमने मेरे शब्दों को सुना।
- 38:46अगर रिएक्शन आ गया तो समझ लेना तुमने मेरे शब्दों को सुना।
- 38:53ध्यान से समझना बड़ी गहरी बात है और अंतिम बात है प्रवचन की अंतिम
- 38:59बात। अगर रिएक्शन आ गया तो तुमने मेरे
- 39:04शब्दों को सुन। कैसे माहवीर कहते हैं तुमने सम्यक
- 39:12श्रवण नहीं किया, सिर्फ तुमने मेरे शब्दों को सुना और अगर तुमने
- 39:23मुझे सुना। तो मतहोश ही आएगी, रिएक्शन नहीं
- 39:29आएगा, मेरे शब्दों को सुना तो रिएक्शन आएगा वो फिर चाहे तुम
- 39:36मुझे बताओ या अपने मन में ही रख लो।
- 39:40इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर तुमने मेरे शब्दों को सुना तो
- 39:48रिएक्शन आएगा अगर तुम्हारे भीतर ग्रंथियाँ हैं तो ग्रंथियाँ
- 39:56टूटेंगी पर जब कोई चीज़ टूटती है झटका तो लगता है।
- 40:02आवाज़ भी आती है, टूटने की भी तो आवाज़ हुआ करती है।
- 40:09अगर तुमने मेरे शब्दों को सुना तो कुछ टूटेगा, भीतर भ्रांतियां
- 40:15टूटेगी मैं व्रांत करना चाहता हूँ मैं ग्रंथियाँ टूटे।
- 40:22निःग्रंथ करना चाहता हूँ मैं जब वो टूटेंगे तो उससे अगला मरहला
- 40:29देखने ही होगा। क्या तुम हड़वड़ा जाओगे?
- 40:34क्या तुम रिएक्शन करोगे? रिएक्शन करोगे तो यह सब में
- 40:39कश्रवड़ ना हो। महावीर कहते हैं तुम शम्य के
- 40:46श्रवण करो, तुम श्रावक बन जाओ तो श्रावक कौन जो मेरे शब्दों को
- 40:54नहीं सुनता, जो मुझे सुनता है तुमसे मैं सदा कहता हूँ।
- 41:01अगर तुम मुझे सुनते ही रहो तो फिर तुम्हें और कुछ करने की जरूरत
- 41:07नहीं है। सुनिए दुख पाप का नाश बड़ा गहरा
- 41:16वाक्य है ही और उससे भी ज्यादा गहरा।
- 41:20इसके भीतर छुपा हुआ वो रस सुनिए। दुख पाप का शब्दों के भीतर छुपा
- 41:32हुआ वो रस। जब मैं बोलता हूँ तो शब्दों के
- 41:37साथ लिपड़ तपड़ के मैं भी आता हूँ।
- 41:42अब इस फर्क को समझ लेना गहरा है। मुझे अंत में बताना जरूरी था
- 41:51अन्यथा गड़बड़ रह जाती। फिर तुम्हें समझ नहीं आती, इसलिए
- 41:56मैं तुम्हें कहता हूँ। आचार्यों के प्रवचनों में मस्ती
- 42:02नहीं होती। आचार्यों के प्रवचनों में रस नहीं
- 42:06होती, क्योंकि उसके शब्द बाहर से आते हैं।
- 42:12और रस है भीतर रसातल में रस आतल जब तुम्हारी वाणी उस उदगम स्रोत
- 42:21से टकरा के आती है तो रस पूर्ण होकर आती है, रस से लपड़ते पड़ के
- 42:29आती है। और रस से लिपड़ी तिपड़ी वाणी जब
- 42:36तुम्हारे कर्ण में पड़ती है, अब देखना होता है ये श्रावक है, ये
- 42:42श्रावक नहीं है। इसने सुना मुझे या नहीं सुना
- 42:48मुझे। उसकी पहचान क्या होगी?
- 42:51बाबा उसकी पहचान होगी। जैसे दवा रिएक्शन कर जाती
- 42:58टेन्सिलिन रिएक्शन कर जाती, ऐसे ही मेरे शब्द में लड़ जाए,
- 43:05तुम्हारी कोई भ्रांति टूटी। तुम्हारा मनुष्य बर्दाश्त नहीं
- 43:10करेगा, तुम फ़ौरन रिएक्शन करोगे? नहीं नहीं ऐसा नहीं ये तो यहाँ तो
- 43:17वैसा लिखा है तुम मुझे वीडियो भेजोगे, ये देखो ये प्रमाण लो ये
- 43:25वो करो भाई। ऐसा ही होता तो मैं शास्त्रार्थ
- 43:30ही कर लेता। फिर जो शास्त्रार्थ करने के लिए
- 43:36सैकड़ों मीलों से मेरे पास आते हैं, बगल में पोती दवाई मैं उनके
- 43:41पांव छू लेता। अरे नहीं भाई तुम जीत गए, मैं हार
- 43:46गया। इसीलिए तो आये थे न तुम क्या मुझे
- 43:51हरा सको? मैं हार गया बस जलपान करो, खाना
- 43:56वाना खाओ और चले जाओ जहाँ से आए मैं तो तुम्हे जानता भी नहीं तुम
- 44:05कौन सुनता है मुझे? मैं उससे जानता हूँ या नहीं जानता
- 44:10हूँ, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बात तो ये है मैं इतना जानता हूँ
- 44:16कि तुमने सुना क्या आया कि तुमने मेरे शब्द सुने आया कि तुमने मेरा
- 44:24प्रवचन सुना? आया कि तुमने मुझे सुन बाबा
- 44:31किस्से सुनने की बात कहते हैं बाबा जीस सुनने की बात कहते हैं,
- 44:36उसका राज़ आज कोरे दे रहा हूँ। सुनिए दुख बाप का नाश अगर तुमने
- 44:44सच में ही मुझे सुन लिया। बार बार दोहराऊंगा इस बार क्योंकि
- 44:52अंत में बोला हूँ, बहुत देरी से बोला हूँ, जब बोलना चाहिए था तभी
- 45:00बोला हूँ और अब वक्त आ गया क्योंकि अब बहुत वक्त बीत गया।
- 45:08अब तो बोल देना चाहिए कि आखिर मैंने क्यों निकाल दिया लोग?
- 45:14आखिर मैंने क्यों ब्लॉक कर दिया? लोग ढूंढ़ते हैं शिष्य बनी लोग
- 45:21ढूंढ़ते हैं जमात बड़ी। लेकिन उन्हें प्रसिद्धि चाहिए,
- 45:29कोई हेतु है, कोई उनका स्वार्थ है, वो प्रसिद्धि चाहते हैं।
- 45:38वो आज नंबर रचेंगे। वो तख्त पोज लगाएंगे, चांदनियां
- 45:43लगाएंगे, दरबार सजाएंगे। ज्यादा लोग आएँगे, उन्हें धन
- 45:50चाहिए, जीतने ज्यादा लोग आएँगे, उतना जलावा चढ़ेगा।
- 45:55उनका निहित स्वार्थ है इन सब आडंबरों के पीछे।
- 46:00लेकिन मेरा नहीं था स्वास्थ्य कोई भी मेरा परार्थ मैं ये चाहता हूँ
- 46:08कि तुम निर्ग्रंथ कैसे हो जाओ तुम निर्व्रांत कैसे हो जाओ, मैं
- 46:14तुम्हारी भ्रांतियों को दोहराना चाहता हूँ।
- 46:18मैं तुम्हारी ग्रंथियों को तोड़ना चाहता हूँ।
- 46:21मैं जानता हूँ कि ये ग्रंथियाँ तुम्हारे दुख का करण है।
- 46:25ये ग्रंथियाँ तुम पर बोझ हैं। ये ग्रंथियाँ गांठें हैं जिन्हें
- 46:30खोलना आवश्यक है, जिन्हें तोड़ना आवश्यक है।
- 46:36इसलिए महावीर कहते हैं। के सच्ची श्रावक बन सबमें के
- 46:42श्रवण की कला को सीखो ये कला क्या है ये तुमने मैंने आज भरता है
- 46:52तुमने मेरे शब्दों को सुना कि तुमने मुझे सुना।
- 47:00अगर सच्चा संत होगा वह जब बोलेंगे उसकी वाणी शब्द नहीं होगी।
- 47:05कोरे आचार्यों की वाणी कोरे शब्द हो सकता है सर।
- 47:12लोगों की वाणी कोरे शब्द हो सकते हैं क्योंकि वो आए हैं सूचनाओं
- 47:17से। बुद्धि की सोचन शैली से, मस्तिष्क
- 47:23के भरे हुए न्यूरोन से, लेकिन मेरी वाणी न्यूरोन से नहीं आई।
- 47:31मेरी वाणी आई है रसातल से उस उदगम स्रोत से।
- 47:36जहाँ से अनहद ना उठता है, रसीला प्रेम से भरा हुआ लबालब रस का
- 47:46समुद्र उदगम स्रोत से उठा हुआ वो आनंदनाथ जहाँ से आता है वहीं से
- 47:54आएगी मेरी वाणी। और वो वाणी वहाँ से निश्चित रूप
- 48:00से टकराती आएगी। तुमने देखा तुमने कभी नहर में
- 48:06तालाब में छलांग लगाई? तुम बाहर आओगे तो तुम्हारे सारे
- 48:11कपड़े गेले हो जाएंगे और कपड़ों ने उस पानी को।
- 48:16पी लेगा। ऐसी ही मेरी वाणी कपड़े जैसे गीले
- 48:21हो जाते हैं। मेरी वाणी उस रस से ओतप्रोत
- 48:26होंगे। कोई भी संत बोलेंगे उसकी पहचान
- 48:31तुम्हें बताती जैसे तालाब में। छलांग लगा दी।
- 48:38जैसे जाती हुई नहर में छलांग लगा दी और उस छलांग लगाने के बाद जब
- 48:47तुम बाहर आए, तुमने जो वस्त्र पहने हुए थे वो पानी से गेले हो
- 48:53जाए। यह वाणी उस अमृत से गीली हो जाती
- 49:00है। यह वाणी जब उस रसातल से आती है
- 49:06उदगम स्रोत से आती है। जहाँ से उठता है वो बीना बीना
- 49:10स्वर। मीठा मीठा स्वर अन्नदन का वहाँ से
- 49:16लिपड़ते बढ़ के आती है निश्चित जैसे तुम्हारे कपड़े पानी को भी
- 49:23साथ ले आते हैं, वैसे ही मेरी वाणी उस रस को भी साथ ले के आएगी,
- 49:29उस अमृत से ओतप्रोत हो के आएगी। और मैं देखूंगा अगर रिएक्शन आ गया
- 49:37तुमने उस रस को छोड़ दिया अगर तुम मेरी वाणी को सुनते रस में डूब गए
- 49:49मीरा की तरह। बिरहा में डूब गए बिरहा के गीत
- 49:58गाने लगे उसका ना होना तुम्हें चड़वाने लगा तुम उलाहने ताने देने
- 50:08लगे। तुम शिकायतें दर्ज कराने लगे तो
- 50:14समझ लेना मेरी वाणी का प्रभाव तुम पे होगा तुमने वो र से भी पी ली
- 50:25बस यही है पहचान। अगर सिर्फ शब्द भी है तो उसकी
- 50:33प्रतिक्रियाएं आए। अगर तुम मेरे प्रवचन को सुन के रस
- 50:40के आनंद से विभोर हो मस्त हो गए, घंटों तक पता न चला।
- 50:46सांझ तक पता न चला, आप मुझे बहुत रोख कहते हैं।
- 50:49बाबा सुबह आपका पर्वचन सुन के जाते हैं, सारा दिन ऐसे ही गुजर
- 50:54जाता है जैसे सावन की तियों में गुज़रना है।
- 51:01तिल को दिए क्यों? दुःख बिरहा के दिल को दिए क्यों
- 51:18दुःख बिरहा। के।
- 51:23तोड़ दिया। क्यों महल बना के तोड़ दिया,
- 51:35क्यों महल बना? के?
- 51:42आस दिला के ओह, वे दर दी आस दिला के ओह, वे दर दी फिर लिखा।
- 52:02ये नजरिया फिर लिखा है नजरिया महे बोल।
- 52:19सावरिया भूल गए सावरिया आवन कह गए, हज हो न आए।
- 52:38आवन कह गए आज होना आ रहे लीना ही मोरी खबरिया लीना ही मो।
- 52:57अरे खबरिया महे भूल गए सांवरिया भूल गए।
- 53:13सावरिया ऐन कह रो रोके सजना, देख चूके हम।
- 53:30प्यार का सपना नैन कहें रो रोके सजना देख चूके हम।
- 53:50यार क सपनों प्रीत हजोठी प्रीतम जोठा प्रीत हजोठी।
- 54:08प्रीतम जोठा झोटिहेसा रे नगरिया झोटिहेसा रे नगरिया।
- 54:27महे भूल गए, सांवरिया भूल गए सांवरिया आवन कह गए।
- 54:45आज हो न आए, आवन कह गए आज हो न आए।
- 54:56लीना ही। मोरी खबर यार मोय भूल गए।
- 55:06सावरिया भूल गए सावरिया। धन्यवाद।