Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Sep 25 - ध्यान के लिए सबसे शक्तिशाली स्थान! क्यों खास है पीपल, नीम और वट वृक्ष के नीचे ध्यान?
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- 0:08साईं बाबा भिक्षा मांग के। ले के आए हैं।
- 0:18द्वारकापुरी में। और अभी खाना शुरू।
- 0:29ही किया है। देखते हैं कि सामने।
- 0:38एक ब्याही। कुत्ती सुई कुत्ती से कह हमारी
- 0:44हरयाणवी भाषा में उसे। ब्याह ही कुत्ते कर सकते हैं।
- 0:52सुई कुत्ते को। भूख बहुत लगती है, सात आठ बच्चे
- 0:55हो जाते हैं, सभी दूध पीते हैं। अति की भूख लगती।
- 1:02है। ललचाई दृष्टि से देखने।
- 1:17लगी। साईं बाबा ने देखा।
- 1:29आँखों की तरफ बौखिक तुम मुर्गों को बकरों को इतनी निर्दयता से काट
- 1:44लेते हो तुमने कभी उनकी मासूम आँखों में झुंकन काश।
- 1:53तुम एक बारों की मासूमों को में जंग लेते हो।
- 1:59इतनी बच्चों से भी ज्यादा मासूम? और जैसे प्रार्थना कर।
- 2:05रहे हैं। कि हमें मत काटो हमें।
- 2:09भी? जीना अच्छा लगता है।
- 2:19इसलिए मैं इन बकरीद करने वालों को माँ।
- 2:26संरक्षण करने वालों को यला कहते हैं।
- 2:33त्यौहार मना रहे हैं। लेकिन ये सब त्यौहार।
- 2:38तुम्हारे बनाये हुए है इंसानियत। की देन।
- 2:44और इंसानियत जितनी। घर कह गई है।
- 2:48पूछो ही मत। जब देखा भूखी।
- 3:03है सुई कुत्ते आंधी रो के चलते। झपट के खा गई।
- 3:18फिर देखा अभी रचाई। आँखें वैसी ही थीं उसने।
- 3:27याद दिया वो। कह ले।
- 3:32जितनी भिक्षा मान के ले के आए थे। ये भूख?
- 3:41की कुर्ती से भी खा गए। और शेर कुछ।
- 3:46भी न। बचाओ तो साईं।
- 3:52बाबा कहने। लगे।
- 3:58रुको देवी, रुको, मैं अभी लेके आता हूँ।
- 4:05अभी फिर से मांगने। जाता हूँ, लेकिन।
- 4:16कुत्ती वहाँ से चली गई। साईं बाबा।
- 4:30एक बार ही मांगते थे उस दिन फाका हो गया, आज फाका हो गया।
- 4:44अब लेकिन गए भिक्षा मांगने के लिए कुछ लोगों के प्रश्न आए।
- 5:00यह भी एक प्रश्न। था बाबा नाम मत बताना।
- 5:03प्रश्न मत बताना ठीक जो आज्ञा कुछ प्रश्न।
- 5:15लेकिन शुक्रगुजार। हूँ उन लोगों को कि ना तो इस बार
- 5:19गली में पड़े ना इस बार इतनी क्रूरता हुई।
- 5:31बाबा ओशो को गाली? समझते हैं फिर तो।
- 5:38कृष्ण भी एक गाली। है।
- 5:42फिर तो राम भी एक गाली? है।
- 5:49समझी, मैं जानता हूँ तुम तुम आओगे।
- 5:57कमिंग। इवेंट्स कास्ट दैट सैड।
- 5:59उस बिफोर मैं पहले से चालू देता हूँ, तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या
- 6:04होगी। फिर बोल।
- 6:10हम ध्यान से सुन। किसी संत पुरुष ने महापुरुष ने एक
- 6:18बात। कही थी।
- 6:18जब भी। कोई तार नहार आ।
- 6:22जाता है। तो समझो।
- 6:27लाखों। करोड़ों लोगों की जिंदगी महा नरक
- 6:32में चली गई। कतल गारथ हो जाएगी।
- 6:38तुम आपस में भाई भाई। लड़ो के मरो के।
- 6:42कटोगे क्यों? क्योंकि एक मानेगा।
- 6:51कि ये ठीक। एक मानेगा?
- 6:52कि ये गलत। आपने बाबा किसी को भी नहीं छोड़ा
- 7:02ना शंकराचार्य को? छोड़ा ना बुध को छोड़ा मैं।
- 7:09खुद को भी नहीं। छोड़ता।
- 7:13आई डोंट एक्सपेक्ट मी। टू।
- 7:31तुम जहाँ जहाँ भी चिपक जाओगे वहाँ वहाँ मैं ऐसा ही करने।
- 7:38वाला हूँ। तुम।
- 7:50आज कृष्ण में बंध। गए।
- 7:55और तुम? भूल गए कि कृष्ण दूसरा है।
- 8:00पात्र की मूर्ति हो। या जीवित?
- 8:04कृष्ण हो तुम्हारे? लिए आजीवित नहीं है वो गड।
- 8:14और तुम उनकी पूजा कर रहे हो। शोर्ट सुप्रजा कुछ भोग लगा रहे
- 8:20हो? पत्रम पुष्पम परम तोयम ये माँ
- 8:24वृक्ष्य। अर्पण कर रहे हो?
- 8:36और मन बड़ा चालाक। है।
- 8:41मन मूर्तियों के आगे। झुक सकता है।
- 8:44मानो मूर्तियों के आगे। कन्फेशन कर सकता है।
- 8:48क्योंकि वो जानता है कि मूर्तियां सुनती हैं।
- 8:56इसलिए मू का बदर मूर्तियों के आगे जाकर।
- 8:59तुम अपने गुनाह। कबूल करते हो?
- 9:04क्योंकि। तुम भीतर से जानते।
- 9:05हो कि इनके कान बिहारी। हैं इनके मुँह बाहरी।
- 9:12हैं, इन्हें ना सुनाई। पड़ता है ना दिखाई।
- 9:15पड़ता है। जोप ने किये हुए।
- 9:19पापों गुनाहों। को बखान कर।
- 9:23देते हैं इजाजत? में कन्फेशन की परंपरा।
- 9:29लेकिन कन्फेशन करते हुए। पादरी और गुनाहगार के भीतर एक
- 9:38पर्दा लगा दिया जाता है। पता ना चले।
- 9:43कौन मूल बात को समझने की चिष्टा? जैसे ही।
- 9:56तुमने? दूसरे को आइकॉन बनाया।
- 10:00और। ईश्वर की इस सृष्टि।
- 10:02में विराज्यतम प्रज्ञा है। ईश्वर खुद महाविराज्यतम प्रज्ञा
- 10:09है। इसलिए तुम इतनी।
- 10:12महाविराज्यतम प्रज्ञा होगी भी परमात्मा को इंकार कर देते नहीं
- 10:17हो सकता। यही कारण है मूल में।
- 10:26क्योंकि अगर ईश्वर महा विरार प्रज्ञा है।
- 10:30तो फिर तुम्हारा। क्या होगा तुम्हारा अहंकार दुग्ध
- 10:35और? अहंकार कभी।
- 10:37अपने आपको नीचा स्वीकार। नहीं करता जब मैं गुरु के।
- 10:43बारे में बोलता हूँ। तो जनाब आपको आपत्ति कहाँ होती
- 10:54है? आपका गुरु बड़ा है।
- 11:02उसने इतने शस्त्र बोले इसलिए नहीं आपका गुरु।
- 11:13बड़ा है, मैं पहले भी बोल चूका हूँ।
- 11:17आप। घोषणा करना चाहते हो?
- 11:19कि मैं बड़ा हूँ, मेरा अहंकार बड़ा है और।
- 11:25तुम्हारा अहंकार बड़ा है इस सब बात।
- 11:29को मनाने के लिए। हिटलर करोड़ों?
- 11:34लोगों का कतल कर देता है। मसूल नहीं चंगेज खान?
- 11:37के मैं बड़ा राजनीतिक। लोग।
- 11:40इसीलिए इतना अत्याचार करते हैं। की तुम मुझे मान।
- 11:44लो की मैं बड़ा। यही तो हो रहे है ना के सपने की।
- 11:50मेरी ही ओला। न रागणी का नाम जब्बी मेरा नाम न।
- 11:56जब्बी तिरस्कार? की बात है मेरे।
- 11:59लिए फिर पुत्र पुत्र। नहीं रह जाता।
- 12:04प्रभुता से। कराया गया हाथी के।
- 12:07पांव तले कुसोवाने की कोशिश की। बहुत तशरदें दी गईं जलते हुए खंभे
- 12:17के साथ चिपकाने की। चेष्टा की गई।
- 12:20होलिका के साथ आग में। बढ़ाया गया ये सब अहंकार की
- 12:27चेष्टा है अपने आपको बड़ा। ओशो एक गाली?
- 12:38है। मैंने कहा।
- 12:41रिकॉर्ड सबदार है की रिकॉर्ड अब इसका मरम।
- 12:49जानिए कल को। तो मैं भी चला।
- 12:51जाऊंगा। कुछ मुट्ठी भर लोग मेरे भी फॉलोवर
- 12:57होंगे। तुम आपस में लड़ोगे?
- 13:04गुथम गुथा होगा। रक्तपात होगा धरती लाल।
- 13:06हो जाए। तो ठीक कहा जिसने भी कहा।
- 13:11कि जब कोई महान पुरुष होता है। कमहान।
- 13:16किसी भी दृष्टि से। हो मार्कस।
- 13:18की दृष्टि से हो। चारबात की दृष्टि से हो।
- 13:26सत्य कभी नहीं बदलता। विचार तो।
- 13:28बदलते ही रहते हैं। तो तुम आपस।
- 13:34में ठकराव होगा। मैं न रहूँगा, तो।
- 13:42मेरे मानने वाले टकराएंगे उनसे। जो मुझे नहीं मानते।
- 13:51जो मैं बता के गया था। वो किसी को याद।
- 13:55नहीं रहेगा किसी के। बारे में गलत बोलता हूँ, शंकर
- 14:07हैं, उषा हैं, कृष्ण मूर्ति हैं, कितने भी बड़े रोग हैं, प्रेमानंद
- 14:19हैं। जीतने भी आज।
- 14:24यूट्यूब पर भरे पड़े तो क्षमा।
- 14:36चाहता हूँ जिनके नाम। मैंने नहीं लिए।
- 14:42आपके लिए। वो भी बड़े हो।
- 14:44सकते हैं, लेकिन एक बात को मुख्य। बात को ध्यान में।
- 14:52रखना जीसको भी तुम सुनते हो। सोने लेना जीसको।
- 15:00भी तुम पढ़ते हो पढ़ लेना। लेकिन उसके साथ चिपकना नहीं।
- 15:07बहुत देर से मैं बोलता हूँ यही तो मूल रोग है, तुम चेतना हो।
- 15:20शरीर के साथ चिपक जाते हो तो शरीर हो।
- 15:23जाता है। वाणी।
- 15:26के साथ चिपक जाते। हो तो वाणी हो जाती।
- 15:28हो गायकी के साथ चिपक जाते। हो तो गाय हो जाते हो अच्छे आचरण।
- 15:37करते हो तो उनके। साथ चिपक जाते हो।
- 15:42लेकिन ये चिपकना तुम्हारी मुक्ति में बातें।
- 15:47बनता है। ये चिपकना तुम्हें आजाद।
- 15:54नहीं होने देता ये चिपकना तुम्हारे गले की।
- 15:57फांस बन जाती है। हाँ तो कहूं की।
- 16:01जंजीरियां बीड़ी बन जाती। है।
- 16:12मन तो पहले से ही बेहरमुखी। है।
- 16:19फिर शंकर इस कृष्ण इसरम एसो। इन महान विभूतियों ने तुम्हें और
- 16:29बहर्मुखी बना दिया। और अगर कोई पाप है धरती पे।
- 16:39जो तुम्हारे बंधन का? कार्क है, वो है।
- 16:43बहर्मुखी। होना।
- 16:47फिर बहरहमुखी तुम्हें कृष्ण बनाये।
- 16:52के बुद्धा बनाये। के लाउसे बनाये।
- 16:55के जर। सुस्त।
- 16:56बनाये के चौंगत से। बनाये या मार्कस बनाये।
- 17:02अचार? वाक बनाये इससे क्या फर्क पड़ता
- 17:05है? बैहर।
- 17:07मुखी तुम्हें। वैश्य बनाये या।
- 17:11सुंदर रानी बनाये। क्या फर्क पड़ता है?
- 17:15तुम तो बैर मुखी हुए ना इसको सर। डर बेहरमुखी होना ही पाप अगर तुम
- 17:29मुझे पाप की परिभाषा पूछोगे तो मैं।
- 17:35कहूँगा कि बेहरमुखी। होना ही पाप।
- 17:41रात्रि को तुम कोई। पाप नहीं करते।
- 17:46शुक्र है उस दृष्टि। बनाने वाले का।
- 17:51कि उसने रात बना दी रात ना होती। और तुम इतने घंटे के।
- 17:59लिए भी बेहरमुखी होते। और वो तुम्हें रो उठ के समझाती
- 18:04है, प्रकृति। जीवन जीने का ढंग।
- 18:14कर्मण्य पातिकार के कर्म। को।
- 18:16जीवन यापन के लिए। कर्ज फर्ज के लिए।
- 18:24लेकिन इस तरह भी हो जाओ। जैसे मैं तुम्हें रात।
- 18:27को निजरा में ले। के जाते हैं।
- 18:31रोज़ ये समझती है कितने वर्ष के हो गए तुम उतने वर्ष ही सो?
- 18:39समय तुम्हारे फिर भी नहीं आता। प्रकृति तुम्हारी मार्गदर्शक तो।
- 18:45है बशर्ते। के तुम उनसे कुछ।
- 18:48सीखो प्रकृति भागती है। गाड़ी में बैठे हुए।
- 18:58यात्री से सेवा कभी। तुमने वृक्ष भागते हुए।
- 19:02देखा? घास फूस।
- 19:05पेड़ पौधे भागते हुए देखा। ये जमीन।
- 19:09भागते हुए देखा वह? जो गाड़ी के भीतर तुम।
- 19:18इन वृक्षों को वाकते हुए देखते हो चाँद तारों को वाकते हुए देखते हो
- 19:23समस्या आसमान को। वाकते हुए देखते हो, वह एक
- 19:27इल्यूशन है, भ्रम और प्रकृति तुम्हें यही सखाती है पेड़ अपने
- 19:35होने में। खुश।
- 19:40कभी तुमसे शिकायत करता है कोई डाक ये।
- 19:46घास छोटी छोटी घास, प्यारी प्यारी।
- 19:54तुमसे कभी शिकायत। करते हो तुम्हें इन्हें?
- 19:56कुचल जाते हो गैस। के ऊपर चलना आँखों।
- 19:59के लिए लाभकारी है। और तुम घास।
- 20:05को कुचल देते हो कभी घास ने। ऐतराज किया कभी तुम्हारी शिकायत
- 20:11लगाई मेरे पास तो घास। कभी नहीं है।
- 20:16न ही कभी वृक्ष आए न ही कभी हवाएं।
- 20:18आईं न ही फिजाएं। आईं।
- 20:21न ही कभी सुगंध आईं। मेरे पास।
- 20:26प्रकृति ने कभी कोई उलाहना दिया ही नहीं।
- 20:36अगर कोई बाप। है।
- 20:38तो तुम्हारा बहर्मुखी होना फिर बहर्मुखी।
- 20:44तुम्हें कोई भी करे। शास्त्र करें, गंगा करें तीर्थ
- 20:48करें मक्का कर आज कर। गंगा सागर कर।
- 20:55फिर कोई मूर्ख करे या ओशम करे या कृष्ण?
- 20:59करे या राम करे? उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 21:05उलझ दे तो। तुम हर जगह हो।
- 21:10बेहर। मुखी तो तुम हर जगह होते हो।
- 21:13सामने कौन इससे? क्या फर्क पड़ता है कृष्ण ने कहा
- 21:24था लोहे की? जंजीरें ही तुम्हें नहीं बांधते,
- 21:28सोने के आभूषण भी तुम्हें बाँध लेते हैं।
- 21:33बात तुम्हारे बंधन की है। बंधे किस्से हो।
- 21:40ये मायने नहीं रखता वो सोने के जेवरात।
- 21:45हैं। लोहे की जंजीरें हैं।
- 21:50वो तुम सोने की जेल में बंद हो। नहीं, तुम लोहे की जेल में बंद।
- 21:56हो? पंछी को तुम दोती को।
- 22:01तुम। सोने के पिंजरे में।
- 22:03बंद कर दो। कोई बहुत महंगा नहीं।
- 22:06बनता सोने का पिंजरा। ये सेठ लोग?
- 22:10बनवा सकते है, लेकिन लोहे के पिंजरे में बंद कर।
- 22:13दो बात तो। बंदिश यह बंदिश यह बंदिश तुम्हें
- 22:23आजाद होने की। फिर यह बंदिशें सिर्फ।
- 22:28हाथकड़ियाँ और पांव की बेड़ियां नहीं।
- 22:32तो हमारे लिए शास्त्र भी बंधन हो गए।
- 22:34हमारे लिए पवित्र गंगा। भी बंधन हो गई।
- 22:37माँ यमुना भी। बंधन हो गई हाज।
- 22:40और का बंधन का। तीर्थ भी बंधन आज भी बंधन दुष्ट।
- 22:50भी बंधन और कृष्ण। भी बंधन।
- 22:54राम भी बंधन और रावण भी बंधन लेकिन बात तो बहर्मुखी।
- 23:02होने की जो तुम्हे बहर्मुखी कर। दे वह तुम्हारे।
- 23:09लिए तो पायजन स्वरूप। है जहर?
- 23:14क्योंकि उसने तुम्हें तुम्हारे तक नहीं पहुंचने।
- 23:17दिया वह तुम्हें बाहर ही अटकाई करता।
- 23:23है। इसलिए मैं ओशो।
- 23:27एक गाड़ी समझता। हूँ।
- 23:32चला गया, चला गया कृष्ण। भी गए।
- 23:40जो आयेंगे सब चले जाएंगे, कोई नहीं रहा।
- 23:47कोई नहीं रहेगा। तो तुमने पूछा बुद्र?
- 23:54इसका यह। कारण?
- 24:00तुमने बड़े। गर्व लहे जैसे पूछा।
- 24:02के तुम्हें एक सयानी होगे न, मैं भी तुम्हारे लिए अबंदन हूँ।
- 24:10बहुत बार बोल चुका हूँ कि मुझसे मार्गदर्शन।
- 24:15ले लेना इसलिए तो मैं ठहरने। नहीं देता नक्ष घर?
- 24:20जाना। मैं तुम्हारे लिए बंधन।
- 24:22बन सकता हूँ। तुम्हें मेरी आवाज खें सकती है।
- 24:30तुम्हें समबोधित कर सकती। है मेरी बोलने की शैली मेरे।
- 24:37अल्फाज़। मेरे भीतर का सुरूर।
- 24:41मेरे। आनंद से लतपथ हुई।
- 24:45और भव। दशा तुम्हें बांध सकती।
- 24:47है। और बड़ा खतरा है।
- 24:58मैं सभी को कहता हूँ। जो भी तुम्हें।
- 25:02बांध ले तुम्हारे लिए तो। वह ज़हरी हो क्या?
- 25:08उसने तो तुम्हें। मृत्यु देवी उसने तुम्हें।
- 25:11जंजीरों से बांध लिया उसने तुम्हें स्वतंत्रता ना।
- 25:15दी। उसने तुम्हें आजादी।
- 25:17ना दी उसने। तुम्हें बांध लिया?
- 25:20और तुम मुक्त होना चाहते हो सार रूप में मैं तुम्हें यह।
- 25:28कहूँ ब्रश रूप। में मैं तुम्हें यह कहूँ।
- 25:35जो भी तुम्हें बांध। ले जो भी तुम्हें बहर्मुखी कर दे
- 25:42वो तुम्हारे। दुश्मन।
- 25:46कोई भी ऑब्जेक्ट तुम्हें। बांध ले।
- 25:53और तुम्हें? अंतर्मुखी न होने।
- 25:55दे और तुम्हारा दुश्मन कुदरत तो। तुम्हें अंतर्मुखी होने में
- 26:03सहायता। करती बुद्ध पीपल।
- 26:08के पेड़ के नीचे। बैठ?
- 26:11पीपल के बेड में से कुछ ऐसी। तरंगें आती हैं, जो।
- 26:16तुम्हारे रोम रोम में घुस जाती हैं।
- 26:18और तुम्हें अपने अंत। में ले जाने में।
- 26:22सहायक होती। हैं।
- 26:26इसलिए अगर तुम्हारे आसपास। पीपल का पेड़।
- 26:32और जब तुम। अंतर्मुखी हो ना जो।
- 26:37तो पीपल के पेड़ तले। छैया में बैठते है।
- 26:43उससे कम भी है। तुलसी का पत्ता तुलसी का पौधा।
- 26:47पास रख लेना। वट वृक्ष के नीचे बैठते हैं।
- 26:52नीम के नीचे। बैठते हैं।
- 26:55ये त्रिवेणी थी पीपल। नीम और बड़ बट।
- 27:03इन तीनों की। भीतर से कुछ ऐसे रेंज से ऐसे
- 27:06निकलते हैं। जो तुम्हें तुम्हारे भीतर जाने
- 27:10में। सहायक होते हैं।
- 27:14शास्त्रों। में इसका बड़ा गुणा।
- 27:16अनुवाद है। लेकिन क्यों है ये?
- 27:19किसी ने बताया नहीं। मैं तुम्हें आज बता देता हूँ कि
- 27:22इनके। भीतर से ऐसी तरकी निकलती हैं जो
- 27:26तुम्हें। अपने भीतर।
- 27:28जाने में सहायता करते हैं। देखिये पढ़ाई मत करना।
- 27:31इनके नीचे बैठ के तुम्हें नींद आने।
- 27:35लग जाएगी तुम अपने। भीतर जाना शुरू।
- 27:37हो जाओगे अगर संसार। चाहिए तो पीपल व्हाट?
- 27:44ओर नी। इनसे परेशान क्योंकि।
- 27:50ये तुम्हें धकेलेंगे अपने। पिता, फिर तुम?
- 27:55बबूल के पास बैठ जाओ। अगर बाहर पढ़ाई।
- 28:05करनी हो तो तुम घास के पास बैठ जाना घास।
- 28:11तुम्हें बहर्मुखी होने में सहायता करेगी या ग्रीन।
- 28:14ग्रास कनक तुम्हें बहर्मुखी। होने में सहायता करेगी।
- 28:29बहरह। भूखी होने में सत्याग्रह?
- 28:31की बड़ी। प्यारी कहानी है आदम और ई दोनों
- 28:45को परमात्मा ने बनाया। एक बाग।
- 28:51में छोड़ दिया उसमें। गेंहू बीजा हुआ था।
- 28:59कहानी पुरानी है। तुमने पढ़ी होगी।
- 29:02लेकिन तुमने गुणी कब दी होगी? तो आदम और ईव।
- 29:14दोनों बरसों तक। कहानी है वहीं घूमते रहे कण कहोती
- 29:26कोई काट के ले जाता। हूँ।
- 29:29फिर। कनक भी दी जाती है।
- 29:31वो उसी के। आसपास बड़ा विशाल।
- 29:33क्षेत्र था। कहते हैं कि अल्लाह।
- 29:39ने फरमान किया। कि तुम इस कणक।
- 29:44को खा मत लेना। इस फल को।
- 29:48खा मत लेना। ऐसा मौसम आया कि फल पक गया।
- 29:55उन बलियों में। फल लग गया गेंहू।
- 30:00और। आदम ईव ने मशविरा।
- 30:02करके। वो फल खा लिया, क्या फल खा लिया?
- 30:10गेहूं कनक कनक कनकते 100 गुनाह मादकता अधिकार वो खाये बहुराय।
- 30:18है वो पाये बहुराय ये दो चीजें हैं।
- 30:23जो मादकता को भड़ाती हैं खजूर। खजूर और कनक।
- 30:35तो अल्लाह ने कहा। ये फल मत।
- 30:37खा लेना आदम और। ईब काफी देर बजते रहे।
- 30:45लेकिन 1 दिन दोनों ने मशविरा। किया और खा लिया।
- 30:50खालिया और कण के खाते ही। दोनों में काम बेग।
- 30:53उत्खन होगा वासन उठी। अरे भाई, मैं कोई।
- 31:15कथावाचक थोड़ी हूँ वैष्णव। उठी अल्लाह ने देख।
- 31:22लिया अल्लाह वहाँ आया। उसने कहा, मैंने इसमें कहा था आदम
- 31:29इब। इस फल को मत खा ले।
- 31:35एक इस फल को मत खा लेना एक स्वर्ग का फल।
- 31:38होता है खजूर। उसको मत खा ले।
- 31:41ये बड़े कान वर्चक। होते हैं कान वर्चक कान बाहर
- 31:46मुख्य। तो तुमने अब ये फल खा लिया?
- 31:53इसीलिए मैं तुम्हें दंड। देता हूँ।
- 31:56और दंड ये देता। हूँ।
- 31:58कि जाओ, तुम भूलोक पे जाओ और अल्लाह ने ने भूलोक पे पटक दिया।
- 32:06वहीं। से सर्ज न हो।
- 32:08कहानी है, दम है कहानी। कनक इतनी काम उतेजक?
- 32:17है। खजूर इतना काम उतेजक।
- 32:20है कि काम उतेजक। पदार्थ।
- 32:24तुम्हें वहरमुखी कर ही। देंगे इसलिए हमारे रिष्यों।
- 32:30ने। छठ विचारों में।
- 32:33सबसे प्रथम। कामकरूख कामक्रोथ लोभ मोभ अंकार
- 32:41मत्स्य। तुम्हें वहरमुखी कष्ट और जो।
- 32:54तुम्हें। अंतर्मुखी करते है, वो पुण्य है
- 33:01तो क्या? अंतर्मुखी करता है।
- 33:08इन बहस से करने वालों के साथ बहस मत करना।
- 33:15मैं अपनी जिंदगी के अनुभव के शंक बोल रहा हूँ अगर तुम ब्रह्मचर्य
- 33:19को। साथना चाहते हो जो?
- 33:21स्वत ही सधी जाए, कुछ न करना पड़े, कोई प्रयास नहीं, कोई
- 33:28एफर्ट। तो गाय का दूध पीना शुरू कर दो।
- 33:42तुम्हें और कोई प्रयास? करने की आवश्यकता नहीं।
- 33:46तुम काम से मुक्त हो और ध्यान रखना इतना भी मत पी जाओ।
- 33:53कि शेर शेर एक। बार में पी जाओ।
- 33:56बस थोड़ी सी लिमिट। जैसे मेरी लिमिट।
- 33:58300 ग्राम। की मैंने और 13।
- 34:01वर्ष से मैं इतना। ही ले रहा हूँ।
- 34:05900 ग्राम बस। और जीवन चल रहा।
- 34:09है लोगों ने मुझे। कहा डॉक्टर्स।
- 34:11ने मुझे। कहा डेफिसिएंसी हो जाएगी।
- 34:14कहीं को डेफिसिएंसी। कई जन्मो प्राणी बातों को।
- 34:21मैं याद। कर सकता हूँ ये डेफिसिएंसी?
- 34:25मेमॅरि लॉस हो जायेगा। कोई मेमॅरि लॉस में।
- 34:2813 वर्षों से सो कोई नहीं। अब आगे इफेक्ट कितनी?
- 34:33बार तो खून बदल गया कितनी बार? कैटी सू से बदल गए तो बहिष्कार कर
- 34:43दिया। अल्लाह ने तुमने कहानी।
- 34:46तो सुनी होगी लेकिन। तुमने कहानी का मर्म नहीं?
- 34:53मैं तुम्हें यह नहीं कहता। कि कणक मत खाओ।
- 34:57पंजाब में। बाढ़ आई हुई है।
- 35:01बहुत घर। तबाह हो गए आवेशी मर गए हैं।
- 35:08या बह गए। बहुत।
- 35:11सी जानी लापता। भयंकर द्रा हित्रा।
- 35:17और इतना भयंकर तमहार। मैंने अपने जीवन में कभी नहीं
- 35:27देखा। पंजाब कोई इतनी उम्र भी नहीं है
- 35:31मेरी। 7075 साल कोई ज्यादा नहीं।
- 35:39लेकिन मैंने अपने जीवन। में ऐसी भयानक?
- 35:43पर नहीं देखी। ये सब कुछ लील जाए और श्रोताओं
- 35:51से। और श्रोताओं से कहूंगा।
- 35:55के अनेदानी। पुरुषों।
- 35:57से। अनुरोध करें भिक्षा?
- 36:03मांगें पंजाब के लिए। और चीफ मिनिस्टर रिलीफ।
- 36:08फंड जो। हमारे माननीय मुख्यमंत्री हैं।
- 36:12शुरू किया है। भगवंत मान?
- 36:19उस फंड में जमा। करा पता वगैरह।
- 36:22पूछने तुम्हें सारी साइट्स। से मिल जाएगा।
- 36:27तुम्हारा दिया हुआ दान सही जगह पे लगेगा।
- 36:32और। भयंकर तबाही है।
- 36:48बहुत घर बर्बाद हो। गए बहुत जीव अपनी जिंदगानियों।
- 36:54से हाथ मवेशी। उम्र का।
- 36:58पशुधन समाप्त हो गया। बड़े पैमाने पर हानि ही है और
- 37:07मेरी आपसे यही रास्ता है जरूरत। के वक्त ही दान प्रभावी हुआ करता
- 37:17है। जैसे मैंने साईं।
- 37:20बाबा की कहानी सुनी। सुई कुत्ती को जरूरत।
- 37:24थी भूखे। आज पंजाब को जरूरत है।
- 37:31इसीलिए यहाँ तक भी मेरी आवाज़ पहुंचती।
- 37:34है। और सभी।
- 37:40वक्ताओं का सभी। चैनल चलाने वालों का।
- 37:46मैं प्रार्थना करूँगा अपनी तरफ से।
- 37:50कि। अपने अपने श्रोताओं से कहें।
- 37:53कि यथाशक्ति थोड़ा थोड़ा। आप भी योगदान दें।
- 37:58यह। यज है यज की।
- 38:00आहुति में। एक चुटकी भर आप भी डाल दो।
- 38:06इतने से पंजाब का क्षतिपूर्ति तो नहीं होगी लेकिन बस इतना है जख्म
- 38:13के ऊपर मरम लग जायेगा। कनक और खजूर।
- 38:29स्वर्ग में फल। होता है खजूर बड़ा।
- 38:31मीठा होता है। ये दोनों कामो तेज़, अति कामो
- 38:37तेज़। इसलिए जो तुम्हे चीज़।
- 38:45बहरमुखी करे। अगर।
- 38:49किसी ने शब्द। कहा कि जब।
- 38:52कोई पीर पैगंबर ऋषि। मुनि तीर्थंकर या।
- 39:00कोई महान आत्मा। अवतरित होती है।
- 39:04तो समझो लाखों करोड़ों लोगों की बलि।
- 39:07निश्चित हो गई। आपने बहुत से।
- 39:11अर्थ निकाले होंगे, लेकिन सही अर्थ में तुम्हें बताता।
- 39:14हूँ। उसकी।
- 39:17आवाज़ कृष्ण की मुरली। के तहत में खींचो।
- 39:24तुम उसके दीवाने हो जाओगे और दीवाने तुम उसके।
- 39:27साथ चिपक जाओगे आज तक भी। कृष्ण की पूजा।
- 39:31हो गई पूजा का? मतलब बहर्मुखी होता है।
- 39:40किसी बहाने से तुम बहर्मुखी। होना भी चाहते हो।
- 39:44तुम्हारा अहंकार भीतर जाना भी नहीं चाहता।
- 39:47क्योंकि वो जानता है। भीतर गया तो मैं।
- 39:51मरा। संकट मुझ पर।
- 39:55आएगा। इसलिए भीतर।
- 39:57जाना वो भी नहीं चाहते। तो तुम उसके साथ।
- 40:01हो लेते हो? और तुम बहर मुखी हो जाते।
- 40:07हो भीतर नहीं चाहते। तो जिसने भी कहा उसको पता।
- 40:16हो या ना हो, लेकिन इसका गहरा। आरती है।
- 40:19कि जब कोई पीर। पैगंपा तीर्थंकर अवतार पैदा होता
- 40:27है। आज अल्लाह और राम।
- 40:32के नाम पे झगड़े हो रहे है। कतल उगा रहे हो?
- 40:40बस यही। कहना चाहता था वो?
- 40:41व्यक्ति अगर नहीं कहना चाहता तो मैं तुम्हें बताता।
- 40:46हूँ। संत पुरुषों की आवाज।
- 40:49में एक मैच होता है। जादू जादूई आवाज़ वहाँ।
- 40:55से टकरा के आती। है जहाँ जादू खुद।
- 40:58बैठा है बहु इमेजिनेशन। नहीं है।
- 41:04वो जादू है। और जादू से टकरा की जो आवाज।
- 41:09आती वह तुम्हें। ली ले लेती है।
- 41:16और तुम उसके संग संग चलते हो ये तुम्हारे लिए।
- 41:25बाप सागर से पार। करने के लिए नाव बन सकते।
- 41:28थे। लेकिन तुमने नाव नहीं बनने दिया।
- 41:35तुम तो। इसके साथ ही चिपक गए।
- 41:39और चिप के गए तो ओले? ज गए और ओले।
- 41:41ज गए तो। रोक गए, रोक गए सड़ जाते हो जब
- 41:46कुछ रुक जाता। जीवनगति का नाम।
- 41:51है। इसलिए मैं इन सब को।
- 42:00जो जो महान पुरुष। हमारी संस्कृति में हुए।
- 42:06तुम्हें चाहिए था कि। उनसे सब खरीद लेते।
- 42:09उनके राहों को पकड़ लेते सभी राहें ठीक हैं।
- 42:18और फिर ढेरों की सेवा न करते अपने।
- 42:22भीतर। उतरते, यही असली सेवा है।
- 42:25तुम अपनी तो सेवा कर लो। दूसरों की सेवा।
- 42:31करने से पहले। तुम खुद की।
- 42:33सेवा तो करो। इसलिए मैंने एक शब्द कहा।
- 42:37कि। प्रार्थी।
- 42:38बनने से पहले तुम। स्वार्थी?
- 42:40तो बन। उस फूल की तरह जो खुशबू बांटने।
- 42:44से पहले। कली की तरह मुखबंध।
- 42:47रखता है वह। स्वार्थी होता है फूल।
- 42:50पर होना चाहिए अगर फूल। स्वार्थ ही न होगा।
- 42:56तो परार्थी भी नहीं होगा। कलि बनकर मुखबन्ध करेगा।
- 43:01और खुशबू को जोड़ेगा और फिर। जब खुशबू भर जाएगी कलि के।
- 43:07रूप में तो अपनी। पंखड़ियों को फैला दे।
- 43:13लोग हित के लिए। जो भी यहाँ से।
- 43:15गुजरे कोई भी हो, वह इसका आनंद। लुत्फ उठाये।
- 43:28इसी ढंग से मैं बोलता हूँ, मेरा सिर्फ मतलब ये है।
- 43:37मैं किसी को भी बुरा। कहूँ, आगे से इशारे बहुत बार।
- 43:46लेकिन जो ज्यादा। छा गया।
- 43:49कृष्ण की तरह कबीर? की तरह नान।
- 43:52की तरह। पशु की तरह।
- 43:56सारी दुनिया ने उसे धक्का। दी।
- 44:02तो कुछ तो। था उस बंदे में लेकिन वो तो गया।
- 44:13अब तुम महज जैसे पत्थरों के साथ टक्कर।
- 44:16मारो वैसे। उसके शब्दों के साथ टक्कर मारोगे
- 44:20और तुम इन शब्दों को अर्जुन। और फिर अगर मैं।
- 44:28भूल जाऊं मेरे जाने के बाद? जीवंत गुरु को तलाश।
- 44:34लेना मूर्तियों में मत। जड़।
- 44:36पत्थरों में मत उलझन। तो फिर भी तुम जड़ पत्थरों में
- 44:41उलझे? रहो या जड़ महान।
- 44:45पुरुषों में उलझे। रहो या जड़ महान।
- 44:47पुरुषों की कृतियों में उलझे रहो। वो जो बोल के गया था और शब्दावली।
- 44:54में उलझे रहो। तो फिर तुम्हें मुर्ख ही तो कहा
- 44:59जाएगा। तुम मुर्ख आना दो।
- 45:04क्योंकि वह जिसे तुमने छूना। है हिज़ कान्शस्नस वह।
- 45:10जीवन है। मत ढूंढो उन्हें।
- 45:15जड़ में जड़। तो खुद यात्रा।
- 45:20पर है। कॉन्शसनेस की यात्रा पर है।
- 45:24और तुम जड़ में ही। कॉन्शसनेस को ढूंढने लगे।
- 45:28नहीं। वो तो खुद ही यात्रा पर है पड़ा।
- 45:33उसमें ढूँढोगे तो वक़्त। जाया करोगे?
- 45:36मिलेगा। इसलिए मैं कह देता हूँ।
- 45:42शंकर को कहूँ बुद्ध। को कहूँ उषा को?
- 45:47कहूँ? कृष्ण मूर्ति को कहूँ, किसी को भी
- 45:51कहूँ। मेरा एक मंतव्य आप अच्छी।
- 45:55तरह से हृदय में सुना लेना मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूँ।
- 46:02कि फिर वो पत्थर। तुम्हें बहर्मुखी करे जब कृष्ण के
- 46:07वचन तुम्हें। बहर्मुखी करे अगर गीता भी तुम्हें
- 46:10बांधने लग जाए। अगर।
- 46:12अष्टावकर गीता भी तुम्हें बांधने लग जाए तो वो भी तुम्हारे लिए
- 46:17लोहे की जंजीरें होंगे। चले सत्य मुक्ति के पथ।
- 46:26और। जगाये तुम बंधन के।
- 46:28पथ। फिर मनुष्य में जो विवेक होना
- 46:34चाहिए उसका इस्तेमाल तुमने। किया।
- 46:45आगे से भी मैं। ऐसे ही दोहराता हूँ गलतियाँ।
- 46:53इन बातों का ध्यान। ये गलतियाँ तुम्हें मार्ग पे लाने
- 47:01के। लिए।
- 47:02हम अच्छी तरह जानते। हैं क्या हम जानें।
- 47:06हमें कोई शंकर लेकिन इतना भी जानते।
- 47:13हैं। मैं ना मरू।
- 47:15मरे सुन सारा यह ताम झाम। यह पदार्थ, यह मलकियत।
- 47:21हमने तो खैर। दवा नहीं दिया दावा।
- 47:26किया नहीं और दावा करेंगे। लेकिन 1 दिन यह।
- 47:34है स्ट्रक्चर ढांचा जीस छोटी सी जाए स्कैटर।
- 47:43इसका कण कण कण। कण में समा जाए।
- 47:49पृथ्वी में वायु। में आकाश में।
- 47:52पानी पानी में सभी। कुछ।
- 47:58अपने अपने तत्वों में। समाहित हो जाएगा और कोई।
- 48:01ऊपर से थोड़ी गिरेगा। यही जीस पर तुम चलते हो।
- 48:07तुम्हें पता नहीं यह। उसी सिकंदर की राख।
- 48:10हो जीस। सिकंदर के सपने देख के धरती बड़ी
- 48:15छोटी। है जीतने के लिए और उसी सिकंदर
- 48:19की। राख हो।
- 48:20जीस पर तुम लतड़ते। हुए चले जा।
- 48:24रहे हो? मेरा आज का मोटो।
- 48:36मैं किसी को। भी गाली निकाल लूँ, उसका मतलब समझ
- 48:41लेना। उसका मतलब है कि यह व्यक्ति
- 48:45तुम्हें। बैरमुखी कर रहा है।
- 48:52और वह। मिलेगा तुम्हे?
- 48:54बहरमुखी होके नहीं मिलेगा? बहरमुखी।
- 48:56होके तो संसार मिलेगा। देखिये वो।
- 48:58कर्तव्य कर्म करते रहो। उसे भागो मत जाओ।
- 49:06क्योंकि कहाँ? भागोगे भाग के जाओगे।
- 49:08कहाँ? तो कर्तव्य कर्म करते।
- 49:12रहो लेकिन फुर्सत। के लम्हे भी निकाल लो।
- 49:16कोई इतना कर्तव्य कर्म? भी नहीं होता कि तुम्हें वक्त न
- 49:20मिले। तुम तुम मचल।
- 49:25भाग के जाओगे कहाँ? अब फिर समझलो।
- 49:29क्योंकि भूल जाते हो तुम बार बार बोलता हूँ।
- 49:39लेकिन तुम भूल जाते। हो अब आज बोला।
- 49:46शाम तक भूल जाओगे। लेकिन इसे हृदय में।
- 49:52उतार ले प्रत्येक चीज़ जो तुम्हे। प्यारी लगती है जिसकी तरफ।
- 50:04तुम खींचते हो? याद?
- 50:09रखना वो तुम्हारे बंधन। का कारण।
- 50:15तो मैं कहता हूँ इनको काटो उस अप्रियतम की तरफ।
- 50:21आंख मोड़ो। जिससे प्यारा और कुछ।
- 50:24भी है। जिससे प्यारा और कुछ।
- 50:29भी है। सबसे ज्यादा।
- 50:32प्यारा वो ही है। उसी में जमाने की चेष्टा करो,
- 50:41इसलिए मैं बहुत बार। कहा, आगल का?
- 50:43दुःश्रस्त रखूँ? और शास्त्रों में मेरी किताबें भी
- 50:48आती है। एकाध।
- 50:50किताब जो मैंने प्रकाशित यही कुछ तो है मेरे पल्ले और।
- 50:54क्या? और तुम्हारी जिसके साथ तुम चिपक।
- 50:59गए हो, रोज़ बात करते हो, सबको बहा दो।
- 51:05गंदे नाले में न। सही छरो गंगा।
- 51:09में बहादुर क्या कहना चाहते हो? मैं यही कहना चाहता हूँ कि जो
- 51:18चीज़ तुम्हें। बहर्मुखी करें।
- 51:20ये विकार क्यों कहा हो? सट विकार क्यों कहा?
- 51:25ये सट विकार तुम्हें? भैरव ही करता है।
- 51:29काम तुम्हें बाहर लेके जाता है स्त्री पुरुष के सौंदर्य।
- 51:32में क्रोध तुम्हें बाहर लेके जाता है।
- 51:40जो चीज़ छह चीजें तुम्हें। बाहर ले के जाती।
- 51:43थीं, इसीलिए इनको विकार। कहा गया।
- 51:48ये चीजें तुम्हें बेहरमखी बनाती। हैं काम करो तो लोभ मोह अहंकार
- 51:55मदर बदत सर। इनको विकार कहा गया।
- 52:09ये चीजें तुम्हें बेहरमुखी बनाती। है जागो।
- 52:13इनको वहाँ जाओ। जो तुम्हें अंतर्मुखी बनाता है
- 52:19तुम्हें अंतर्मुखी क्या बनाता है। बाहर की चपकाहटों को छोड़ देना और
- 52:29फिर संसार। में एक ही चीज़।
- 52:31है गो से सुनना जो तुम्हें अंतर्मुखी बनाता।
- 52:34है। तो है प्रेम।
- 52:44जीस घड़ी तुम प्रेम के क्षण में होते हो तुम देखना।
- 52:47तुम्हारी आँखें मत लग। जाती।
- 52:51जैसे तुम ध्यान लगाते हो तो आँखें।
- 52:53स्वयं से ही बंद हो जाती। प्रेम के क्षणों में तुम देखना।
- 52:57तुम्हारी आँखें बंद हो। जाती हैं।
- 53:00स्वतः यह प्राकृतिक प्रणाली। है।
- 53:05प्रेम तुम्हें अंतर्मुखी बनाता। है इसके।
- 53:07अलावा, कुछ भी तुम्हें अंतर्मुखी नहीं बनाता।
- 53:11अगर तुम आचार्य के संघ भी बैठते हो तो वह तुम्हें प्रेम में ले
- 53:14जाता है। इसीलिए तुम मंत्रमुखी होते।
- 53:16हो। बाकी शास्त्र है कूड़ा।
- 53:25है और। कूड़ा मैं नहीं इसीलिए कहता हूँ
- 53:29कि तुम्हें तुम्हारे ध्येय। से भड़काते हो ये चीज़?
- 53:35तो अगर धर्म भी तुम्हें तुम्हारे। देह से भटकाते?
- 53:38ओह धर्म नहीं। ओह भटकन।
- 53:42इसलिए कृष्ण? ने कहा, सर्वधर्माण पुर्तज्य माम
- 53:46एकम शरण वृक्ष। इन सब भटकाने वाले धर्मों।
- 53:52को छोड़ दिया। माँ एकं क्षणं वृक्ष तुम भीतर उतर
- 53:59जा। मुझे एक के भीतर उतर।
- 54:02जा समर्पित हो जा। समर्पित करने का मतलब।
- 54:07अंत में उतर जा उस तत्व के पास। उतर जा।
- 54:13जहाँ मैं विराजमान हूँ। सती प्रज्ञा।
- 54:19गौर से देखा जाए तो। गीता?
- 54:22बोली गई युद्ध में, लेकिन ले गई तुम्हें अंत।
- 54:27समय इसको ठीक से बाचना सीखो। यह।
- 54:34अंत से में ले जाने का बड़ा। शानदार पथ।
- 54:38है। लेकिन अगर तुम शब्दों से हो सके।
- 54:45तो फिर? उस चाकू की तरह।
- 54:47उस तलवार की तरह वार करेंगे। तो तुम्हारी 1000 काम आ सकता है
- 54:53तुम्हारी सब्जी काट सकता है तुम्हारा।
- 54:55फल फ्रूट काट सकता। है।
- 54:58और अगर गलत उल्टा। हो जाता तो तुम्हारा अंग भी काट
- 55:01सकता है शरीर। भी काट सकता है यही।
- 55:06शब्दों के साथ अगर तुम चिपक गए। तो नुकसान।
- 55:11उठाओगे और नुकसान तुम? उठा रहे हो सारी?
- 55:13धरती नुकसान। उठा रही है।
- 55:16कोई बाइबिल। के साथ ही चिमटा।
- 55:18कोई कुरान के साथ ही चिमटा। कोई ओल्ड।
- 55:23टेस्टमेंट के साथ। कोई गीता के साथ।
- 55:28प्रत्येक की चपकाहट के अलग। अलग शास्त्र।
- 55:31है और। प्रत्येक की चपकाहट के।
- 55:35अलग अलग आइकॉन बस। ये चपकाहट ही तुम्हें?
- 55:45प्रेरित करती हैं। बहर्मुखी होने की तो थीम।
- 55:50में एक बार समझ लो। मैं उन सभी चीजों।
- 55:55को काटूँगा जो। तुम्हें अंतर्मुखी न करके।
- 56:01बहर्मुखी करें। तो तुम ध्यान से समझना।
- 56:10रिएक्शन मत करना तुम। अपने भीतर उतर जाना।
- 56:19क्योंकि मैं कोई भी बात तुम्हारे अनर्थ।
- 56:21के लिए नहीं करता। मेरा।
- 56:27अंतस की चाहत सदा। यही होती है।
- 56:30जो रस मुझे मिला हो वो तुम भी पी लो।
- 56:40जीस रस में मैं मगन चौबीसोमत। है।
- 56:47ना खुमारी ना। कार चढ़ी रही दिन।
- 56:50रात। उसको तुम भी फिरो, तुम उसमें उतर।
- 56:58जाओ यही मेरी तमन्ना। है।
- 57:06तुम्हारी। भी तमन्ना यही हो।
- 57:08जाए। कि उसके सामने।
- 57:11तुम भी बैठ जाओ। जा के मेरी है तमन्ना।
- 57:25मेरी है तमन्ना तेरे घर के। सामने मेरी जान जाये, मेरी जान
- 57:41जाये हाय। मेरी है तमन्ना।
- 57:49तेरे घर के। सामने मेरी जान जाए।
- 57:59मेरी जान जाए आए। एम् मेरी।
- 58:04हे तुम ना? धन्यवाद।