Latest / Baba ji Vijay Vats / 7 May 25 - जिस तल पर तुम खड़े हो वहां दुःख, दर्द, चिंता के अलावा कुछ नहीं! सुनिए दुख पाप का नाश का अर्थ क्या है?
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- 0:01बाबा जी प्रणब बाबा जी आप कहते हैं कि मनुष्य नर्क में है, दुखों
- 0:16में डूबा हुआ है। और स्वर्ग तक जाने के लिए एक सहज
- 0:26रास्ता है और रास्ता क्या है और उसका साइंटिफिक व्याख्या क्या है?
- 0:39कृपा करके जीस तरह आप तर्क के माध्यम से समझाते हैं, सभी बातों
- 0:47को इस बात को भी तर्क के माध्यम से समझाने का कष्ट करें इस वक्त।
- 0:57तुम जहाँ भी हो वहाँ नरक है इस वक्त तुम खोपड़ी के तल पे रहो
- 1:07बुद्धि के तल पे जो भी रहेगा वह कंपता रहेगा।
- 1:13हज़ारों हज़ारों फिकर उसे होंगे, चिंताएं हो उनसे।
- 1:18हजारों हजारों प्रकार से वह अपना बचाव करेगा, अनेक तरह के उपचार
- 1:27खोजेगा, चालाकी करेगा, होशियारी करेगा और जाना है तुमने वहाँ।
- 1:38जहाँ स्वर्ग है और स्वर्ग में शीतल ठंडी सुगन्धदायक हवाएं बहती
- 1:49है, वहाँ जाना है तुम्हे तुम्हारी चाहत है भीतर्क।
- 1:59दुनिया का प्रत्येक प्रण दुख में रहना नहीं चाहता।
- 2:06दुनिया का प्रत्येक प्रण सुख में रहना चाहता है, परम सुख में रहना
- 2:11चाहता है। तुम भी उनमें से ही तुम्हारा वजूद
- 2:20कोई अलग नहीं, तुम्हारे भी भीतर की यही कामना है कि मैं कैसे उस
- 2:28पर्म स्वर्ग तक पहुंचाऊं, उस खुशी के तल को छू लूँ?
- 2:33वहीं बैठा रहूँ चौबीसों घंटे दिन भर रात दुख का लेख मात्र भी मुझे
- 2:44छू है ना तुमने पूछा है तर्क से जब वक्त हाँ।
- 2:53जीस स्थल पर तुम अभी बैठे हो उस स्थल पर तर्क से मैं समझा सकता
- 2:59हूँ तुम्हें क्योंकि तुम तर्क की भाषा ही समझते हो।
- 3:02खोपड़ी में बैठे बैठे तुम्हारी खोपड़ी तर्क की भाषा को सुनती है।
- 3:13तर्क से बोलेंगे, तुम्हारी बुद्धि सहजता से समझ जाएगी।
- 3:22तर्क से थोड़ा गहरा होता है। वाव वाव अगर कोई व्यक्ति तर्क से
- 3:31नहीं समझ सकता। तो कई बार व्यक्ति भावना से समझता
- 3:36है, भावना बुद्धि से गहरी है, भावना विचार से गहरी है तुमने
- 3:42देखा कोई व्यक्ति लाख कहता रह, मैं दुखी, मैं दुखी।
- 3:52फलाकष्ट है फला तकलीफ है उसका इफेक्ट तुम पर इतना ज्यादा नहीं
- 3:57पड़ता और अगर कोई व्यक्ति बोलता बोलता रोगी पड़े ज़ोर ज़ोर से रो
- 4:06पड़े। उसका सारा अस्तित्व भरोना ही बन
- 4:12जाए। पंवार मारकर चिल्लाए तो आप ज्यादा
- 4:20प्रभावित हो गए? क्योंकि रोने में भावना होती है,
- 4:25शब्द नहीं। और जो कहेगा मैं दुखी हूँ, उसमें
- 4:32शब्द होते हैं शब्द कोई बहुत गहरा लेके नहीं जाते शब्द कोई बहुत
- 4:37गहरा आपको पहुंचाते नहीं शब्दों की मार कोई बहुत गहरी आप तक
- 4:42पहुंचते। शब्द तो ऊपर की तय है।
- 4:55तुमने पूछा कि इस परम नरक से जहाँ दुख ही दुख है, तो ऐसा समझो कि
- 5:08तुम एक। महागठर के किनारे पे पड़े जहाँ
- 5:14दुनिया भर की गंदगी आती है, दुनिया भर के मल मूत्र वहाँ से
- 5:22गुजरते हैं, वहाँ इकट्ठे होते हैं और गंदगी ही गंदगी।
- 5:31महादुर्गन्ध है चारों तरफ फैलते हुए और तुम ऐसी अवस्था में वहाँ
- 5:39पर थोड़ी देर के लिए भी खड़े नहीं रह सकते तुम्हारी ऐसी दशाएं।
- 5:47वह दुर्गंध, वह बदबू इतनी ज्यादा है कि तुम्हारी नाशिकाएं वहाँ
- 5:55ठहरने को तुम्हें आज्ञा नहीं देता तो मैं कहती हैं कहीं और चलो यहाँ
- 6:02कुछ ठीक महसूस नहीं हो रहा बस यही खोपड़ी।
- 6:09खोपड़ी वो तल है जहाँ दुर्गंध ही दुर्गंध है, दुखें दर्द है,
- 6:21चिन्ताएँ हैं, क्लेश हैं, चिन्ताएँ हैं।
- 6:26रोग है और ये सभी सड़ांध से भरा पड़ा है।
- 6:33ये दुर्गंध से युक्त है और चाहे दर्द है, चाहे दुख है, चाहे शोक
- 6:39है, चाहे अधैय है, तुम चिंताग्रस्त हो।
- 6:44या तुम चिंतन ग्रस्त हो? दोनों एक ही बात है।
- 6:53लोग मुझे कह देते हैं बाबा हम तो चिंतन करते हैं, चिंता तो नहीं
- 7:00करते। चिंतन भी किसी हद तक सड़ाध ही है।
- 7:15तुम्हारी तथाकथित जाप तप को भी दुर्गन्ध बखेरते है।
- 7:24शब्दों से भरे पड़े है। जहाँ कोलाहल नहीं जहाँ शोर शराबा
- 7:33नहीं बेअवाज़ है वो मौन है वो थोड़ी सी भी।
- 7:44खटताहट नहीं वहाँ कोई शोर शराबा नहीं है, परम शांति का सागर है
- 7:57जहाँ तुम जाना चाहते हो। और तुम चिंता से क्रस्त हो चिंता
- 8:07तो नर्क है चिंता तो तुम्हें ज़रा ती है चिंता चिता देओर मध्या
- 8:16चिंता एव गरियासी संस्कृत का श्लोक है।
- 8:22चिंता चिता देवरमध्य चिंता एवगर्यसि चिता दहती नरजीवह चिंता
- 8:31दहती जीवता चिंता और चिता दोनों समान चिता।
- 8:43मुर्दे को जलाती है चिता दहती निर्जीव चिंता दहती जीवता और
- 8:52चिंता जिंदा को जलाती है, बस तुम जल रहे हो जिंदा हो, लेकिन जल रहे
- 9:00हो। तो उससे जिंदा होने का लाभ अभी
- 9:04क्या है? तुम मनुष्य हो, लेकिन चिंतित हो
- 9:12और फिर तुम्हारे गुरु तुम्हें कह देते हैं तुम चिंता छोड़ो।
- 9:15चिंतन को वो भी दुर्गंध है। एक स्थान से उठाकर तुम्हें दूसरी
- 9:25दुर्गन्ध तक लेकर मैं तुम्हें एक तीसरा मुकाम बताता हूँ जहाँ न
- 9:33चिंता है, न चिता है। न चिंतन है ये तो दोनों एक ही
- 9:44थैली के चट्टे बटे हैं। तुम राम राम करो, तुम ये देखो कि
- 9:52मैंने 10,000 जाप करना है या देखो।
- 9:55कि मैंने ₹10,000 शाम तक कमाने कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 10:00दोनों हिसाब किताब के दायरे में आते 10,000 चाप करने से तुम बहुत
- 10:12ज्यादा आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं हो जाते।
- 10:19बुद्धि का हिसाब बराबर चल रहा है। माला के गुटके बराबर गिर रहे हैं।
- 10:26वो ही हिसाब किताब लग रहा है जो व्यापार में लगता है नोटों को
- 10:31गिनते हुए वो ही यहाँ लगता है माला के।
- 10:38मन के गिनने के लिए कोई फर्क नहीं है।
- 10:41उसका तुम उसी स्थान पर बैठे हो जहाँ रुपए गिन रहे थे, उसी स्थान
- 10:49पर बैठकर तुम माला के मन के गिनते हो।
- 10:52स्थान तो नहीं बदला? तो मैंने कहा, तुम एक जगह पे खड़े
- 11:00हो, जहाँ सारे शहर का के सारे शहरों का गंधा होता है और दुर्गंध
- 11:07से सारा वातावरण भरा पड़ा है और फिर तुम कहते हो बहुत दुर्गंध है,
- 11:13यहाँ तो रहा भी नहीं जाता, ऐसी ही तुम्हारी दिशा है।
- 11:19और फिर तुम देखते हो थोड़ी दूर थोड़ी दूर कोई तुम्हारे ही जैसा
- 11:26इंसान नाच रहा है गीत गा रहा है तुम्हारे ही जैसा कोई इंसान।
- 11:37पग में घुंगरू बांध के नाश्ता है कोई तबीर, कोई नानक गीत गा रहा
- 11:46है, उसका कोई हिसाब होता है? गीत गाते हुए कभी हिसाब लगते गीत
- 11:59गाते हुए कभी माला फिरती तुमने देखा जब तुम गाते हो तो मदहोश हो
- 12:06जाते। जब तुम गाते हो तो हिसाब किताब
- 12:10छूट जाता है तो कहाँ माला पकड़ते हो?
- 12:15गीत लगाते हुए माला हाथ से छूट जाती है पहले, लेकिन तुम्हें किसी
- 12:22अभागे क्षण में तुम्हारे ही पथ प्रदर्शकों ने पथ भ्रष्ट कर दिया।
- 12:34और तुम इसे समझ नहीं पा रहे हो उषा है तर्क सिद्ध है क्या होता
- 12:44है यह है दुर्गन्ध तो न मटेगी। अगर तुम यहीं खड़े रहे, अब ज्ञान
- 12:55से सुन लेना बात को अगर तुम यहीं खड़े रहे तो यहाँ तो दुर्गंध है,
- 13:04यहाँ चिता भी है यहाँ चिंता भी है।
- 13:09और तुम यहाँ जलोगे चिंता से जलो के चिंता से जलो, तुम जलोगे कष्ट
- 13:16होगा क्लेश दर्द होगा, दुख जीस जगह तुम खड़े हो वहाँ दुर्गंध है।
- 13:33और ये तुम्हारे पथ प्रदर्शक तुम्हें उसी जगह पे रखती हूँ।
- 13:40कहते हैं यहीं बने रहो और थोड़ा सा काम बदल चिंता को छोड़ दो
- 13:50चिंतन करो येलो माला। राम राम कर इनको ये नहीं पता,
- 14:07इसलिए तो मैं उनको उल्लू के पट्ठे कहता हूँ।
- 14:12ये बड़े उल्लू नहीं है छोटे उल्लू है बड़े उल्लू।
- 14:17तो थोड़े से समझदार हो जाते हैं छोटे उल्लू उल्लू के पत्ते होते
- 14:23हैं राधे राधे क्या हो जाएगा राधे कितने लोग यहाँ मेरे पास रोते
- 14:33हैं, रोते हैं, आँखों में आंसू होते हैं।
- 14:38बाबा 35 वर्ष हो गए जाप करते को फरियाद करते को और दास करते को
- 14:46कुछ नहीं बदला। मैंने कोई कोई रस का स्वाद, कोई
- 14:52आनंद की झलक। कोई उस महारथ की उत्पत्ति कभी उस
- 14:59रस का आनंद चक कर तुम नाचे हो तुमने गीत गुण गुनाया है नहीं,
- 15:04ऐसा तो नहीं होता वो ठीक ही। जो साधन पथ उन्हें दिया गया है वह
- 15:16उन्हें वहीं रख छोड़ेगा जहाँ वो खड़े और तुम बुद्धि गतक मैं जो
- 15:23तुम्हें कहता हूँ, मैं तुम्हें ये कहता हूँ कि तुम्हें मैं तट
- 15:27बदलूँगा। तुम्हें मैं उस तल से पार ले
- 15:33चलूँगा, मैं तुम्हें मन से पार ले चलूँगा।
- 15:38मन में दुर्गन्ध है मन ऐसा कूड़ा कबाड़ा संग्रह है गटरों का, जहाँ
- 15:47सारे मुल्क भर की गंदगी आती है। तो वहाँ सुगंधि कैसे आये?
- 15:57वहाँ दुर्गंध ही दुर्गंधि आएगी और तुम्हारे पथ प्रदर्शक तुम्हें
- 16:02कहते हैं यहीं खड़े रहो, आज चरणोपद लो।
- 16:11चरित्र निर्माण कर लो और तुम चरित्र निर्माण करने में लग जाते
- 16:18हो सत्य बोलने के पीछे पुण्य करने के पीछे।
- 16:29और बहुत से यंत्र दे रखे हैं। तंत्र दे रखे हैं इन लोगों ने।
- 16:33ये करो वो करो, ये करो वो करो, तुम उनके पीछे लग जाते हो, लेकिन
- 16:41चुप जाते रहो। जब देखते हो पीछे मुड़कर तो इतनी
- 16:48ज़िन्दगी में कभी उस आनंद का एक बूंद भी नहीं चखा।
- 16:54स्वाद कैसा है उसका मुड़ मुड़ के देखते हो कि कभी कोई ऐसा मरहला
- 17:03मुकाम आया। जब मैंने इस आनंद की एक बूंद कभी
- 17:07चखी, चारों तरफ अँधेरा नजर आता है।
- 17:15सुख की कोई किरण तुम्हें अतीत में नजर नहीं आती जहाँ तुमने वो सुख
- 17:19की किरण कभी पी। कहाँ से आए हो और कहाँ ठहर गए हो
- 17:32हर कदम पे उन्हें मुड़ के देखा, उनकी महफिल से हम उठतवाये।
- 17:41तुम गंदगी के ढेर के करीब रखा और तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि
- 17:49गंदगी का ढेर है, यहाँ दुर्गंध के सिवा कुछ न मिलेगा लाक इसके ऊपर
- 17:55इतर चढ़ के जाओ। लेकिन इतर भी वाष्प बनकर उड़
- 18:01जाएगा। थोड़ी देर में सच्चाई फिर बाहर आ
- 18:04जाएगी। थोड़ी देर में इतर तो उड़ जाएगा
- 18:08आसमान में, लेकिन गंदगी रह जाएगी जमीन पे और जमीन पर पड़ी हुई
- 18:15गंदगी, दुर्गंध को फिर बिखेरेगी। और तुम्हारी नाच का पुतों को फिर
- 18:22छिड़ेगी तुम दुखी हो जाओगे बस यही तुम्हारा दर्द है, यही तुम्हारा
- 18:32दुख है, यही तुम्हारा प्रश्न है, मैंने तुम्हें कहा।
- 18:39कि तुम ऐसी जगह पे खड़े हो ऐसे मुकाम पे खड़े हो जहाँ सारे मुल्क
- 18:45भर का गंध आता है उस गटरों के महासागर के पास खड़े हो तुम फिर
- 18:53तुम कहते हो के दुर्गंध आ रही है बाबा क्या करें?
- 19:01और बाबा तुम्हें कह देते हैं चलो मेरे संग चला एक ऐसा मुकाम भी है
- 19:08जहाँ दुर्गंध नहीं बाबा ऐसा भी होता है हाँ होता है।
- 19:17क्या तुमने देखा, बिल्कुल देखा तुमको विश्वास नहीं होता जन्मो
- 19:29जन्मो से जब से जन्मे हो, तब से आज तक।
- 19:36सुगंधी का एक क्षण भी तुमने बताया नहीं।
- 19:41सोते हो तो दुर्गंध में जगते हो तो दुर्गंध में काम धाम करते हो
- 19:49तो दुर्गंध में। व्यापार करते हो, कारोबार करते
- 19:54हो, नौकरी करते हो तो दुर्गंध में और यही तो यही जप पाठणी करते हो
- 20:02तो भी दुर्गंध में हमने देखी है जन्नत की हकीकत लेकिन।
- 20:11हमने देखी है जन्नत की हकीकत, लेकिन दिल के बहलाने को मालूम ये
- 20:16ख्याल अच्छा है, बस सिर्फ ख्याल थोप दिए जाते हैं तो हमारे दिमाग
- 20:22में कि ये जॉब कर लो। पांच नाम का चार नाम का 1000।
- 20:29बड़ी सुगंधिया आएगी, लेकिन सुगंधिया तो नहीं आती लेकिन अब 20
- 20:35साल खराब हो गए। बाबा क्या करें?
- 20:38जब तक होश आता है तब तक वक्त बीत गया होता है और तक कुछ नहीं हो
- 20:47सकता। वो 30 वर्ष वक्त नहीं आएँगे।
- 20:50तुम्हारा मन ये कहेगा पसंद ये भी छोड़ दें, शायद एकाध साल में मिल
- 20:57जाए। नए तक जाने का मन नहीं होता।
- 21:01उथला नहीं होता और तुम डर जाते हो।
- 21:11मन के तल्प पे बुद्धि के तल्प पे तो विचार ही विचार हैं जो कभी
- 21:15शांति में कभी अच्छे विचार हैं, कभी बुरे विचार हैं तुम चौबीसों
- 21:20घंटे घिरे ही रहते हो, लेकिन ये विचार बड़े तकलीफ से।
- 21:25तुम इससे पीछा छुड़ाना चाहते हो, लेकिन विचार हैं कि तुम्हें
- 21:29छोड़ते हैं और तुम सारे दिनभर रात इन विचारों से लिपटे लिपटे ही
- 21:38खत्म हो जाते हैं। तुम्हे कोई मार्ग नजर नहीं आता और
- 21:47कोई मार्गदर्शक होता ना करें तो क्या कर तुमने पूछा कि कोई
- 21:56साइंटिफिक वे से समझाओ? बोले शाह ने कहा सर अब दा की
- 22:02पांव। ओद्रव पुटिना से मैं आपसे क्या
- 22:10कहता हूँ संत आपसे क्या कहता हूँ? संत कहते हैं डू नॉट सी दी
- 22:16सर्कमस्टैंसेस। सर्कमस्टेंस को कभी न बदलो स्थान
- 22:30को बदलो जहाँ दुर्गंध है वहाँ से हट जाओ, तुम्हे ही करना पड़ेगा ये
- 22:40प्रयास। तुम उस स्थल पर बैठे हो, बुद्धि
- 22:45और मन के जहाँ सड़ाध ही सड़ाध है, दिन भर रात तुम जल रहे हो और तुम
- 22:54ही यहाँ से हिलोगे स्थान बदलोगे? और तुम उस स्थान पर चले जाओगे
- 23:02जहाँ दुर्गंध नहीं है। इतनी सी बात है रबदा की कोना
- 23:10पुटना ये तुम्हारे पथ प्रदर्शक क्या कर रहे हैं?
- 23:19और तुम्हारा तल नहीं बदलते, वो कहते यहीं बैठे हो, तुम सूचनाओं
- 23:27के तल पर बैठे हो और वो तुम्हें सूचनाओं के सूचनाएं और उपलब्ध
- 23:33करवा देंगे, थोड़ी सी बढ़िया करवा देंगे।
- 23:41अभी तक सांसारिक सूचना दे रहे थे, अब अध्यात्म को सूचनाएं देना शुरू
- 23:45कर देंगे। तो तुम कहोगे हाँ दिशा बदल गया,
- 23:52बदल गया सब कुछ। अब तो मैं आध्यात्मिक हो गया, अब
- 23:57मुझे सुख मिलेगा नहीं मिलेगा। जब तक आप अपना स्थान नहीं बदलते,
- 24:06जब तक आप गटर वाले स्थान को छोड़कर जो बाबा कहते हैं, जहाँ से
- 24:13थोड़ी ही दूर ज्यादा दूर नहीं है मुकाम।
- 24:21फूलों के महान बगीचे कल्पवृक्ष लगे हुए हैं, वहाँ स्वर्ग ही
- 24:29स्वर्ग है। चारों तरफ खोल खिले हुए शीतल
- 24:34हवाएं चल रही हैं। आनंद के झरोखे हैं मस्ती के सरोवर
- 24:42बस थोड़ी ही दूर यहाँ से क्यों गंदगी में ठहरें क्या है यह?
- 24:53लेकिन अड्डा रूडी का कुत्ता दिखा है।
- 24:59हड्डारूड़ी का कुत्ता तुमने देखा नहीं होगा और जिन्होंने देखा है
- 25:03वो जानते है जो पशुओं के मरे हुए पशुओं के शरीर फेंक देते हैं उसको
- 25:12हड्डारूड़ी कहते हैं। फिर वो धूप में गल गल कर वाष्प
- 25:17बनकर हड्डियों रह जाती है और हड्डियों का एक पहाड़ बन जाता है
- 25:24तो कुत्ता दूर से देखता है। वाह क्या बात है जहा तो खाना ही
- 25:31खाना है। और वो जाके वहाँ से एक हड्डी उठा
- 25:38लेता है मुँह में और उस हड्डी को चबाने लग जाता है थोड़ी देर तक
- 25:46कुछ आता नहीं, लेकिन जब ज़ोर से चबाता है तो उसके मसूड़े।
- 25:52फट जाती है, जख्म हो जाता है और उन मसूड़ों में से खुद का ही खून
- 25:58निकलता है और खून नमकीन होता है। जब वो खून निकलता है तो कुत्ता
- 26:09कहता है वाह। बड़ा मज़ा आया।
- 26:15यह तो इतना सम्मान है कि जीवन का यहाँ सात पुश्ते भी बैठ जाए, तो
- 26:20भी खत्म नहीं होगा। उसे पता नहीं होता कि ये जो खून आ
- 26:27रहा है, ये जो स्वाद आ रहा है। ये तुम्हारे ही भीतर का खून है,
- 26:36जो इस हड्डी ने जख्म बना दिया है, उस जख्म से रिस रहा है तो
- 26:42तुम्हारे अपने ही शरीर का खून भीतर और तुम्हें उसी का आनंद आता
- 26:49है, तुम उसी को कहते हो। खुशी थोड़ा ज्यादा ना हो जाये,
- 26:55तुम कहोगे बहुत खुशी, लेकिन याद रखना हड्डियों को खाने से ज्यादा
- 27:06खून आए या कम? खून आए होता तुम्हारे शरीर का है।
- 27:12तुम अपना ही गँवाते हो भ्रम ये पालते हो कि अपना नहीं है, ये
- 27:18दूसरों का है, यह तो भोजन है और तुमने कभी हंडा रोड़ी के ऊपर
- 27:24कुत्तों को देखा भी नहीं मरे मरे से हड्डियों।
- 27:29क्योंकि मांस तो वो खाते है, खाना तो खाते है तो उनका भीतर का ऑर्गन
- 27:39उनके ही हड्डियों को मांस को बचाना शुरू कर देता है और वो
- 27:44कमजोर हो जाते है। हड्डियों का एक ढांचा रह जाता है।
- 27:48तुम देखना कभी? तुम्हारी दशा वैसे ही तुम
- 27:58हड्डियों के झुंड में से स्वाद चाहते हो खून का?
- 28:08फिर वो स्वाद तुम्हारे भीतर से ही आएगा, तुम्हे सच्चा स्वाद नहीं
- 28:13मिलेगा, फिर कोई संत कह देता है थोड़ी ही दूर जहाँ बड़े बगीचे हैं
- 28:21अली शान बड़ी सुगंध है दूर से ही तुम थोड़ा चलो मेरे संग।
- 28:27मैं तुम्हें वहीं छोड़ देता हूँ। पहले तुम्हें यकीन नहीं होता कि
- 28:33ऐसे कैसे पास होगा तो उसकी खुशबू हमें भी आनी चाहिए, लेकिन नहीं,
- 28:40तुम्हारा मन मानता नहीं, तुम्हारा मन कहता है कि ये भी छोड़ दूं।
- 28:463035 साल का और आगे पते नहीं कितनी रह गई है तो गंवा दूँ ना
- 28:56खुदा ही मिला ना बसा ले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।
- 29:03इधर से भी 35 वर्ष खराब हो जाए और आगे से कुछ मिले तो तुम्हारा मन
- 29:10नहीं करता, जाने का तो ज्यादा पक्के हो जाते हैं।
- 29:15मैं अक्सर कह सकता हूँ अगर आप ज्यादा देर किसी धर्म के बीच।
- 29:22अगर आप ज्यादा देर किसी पाखंड के भीतर किसी मान्यता भीतर रह गए तो
- 29:29वो आपके लिए शक्ति हो जाती है। यही साइकोलॉजिस्ट भी कहते हैं अगर
- 29:37किसी चीज़ को बार बार दोहराया जाए।
- 29:41तो दुहराने से वो चीज़ असल नजर आने लगती है।
- 29:45असर होती नहीं, राम राम करने से राम तक पहुंचते नहीं।
- 29:53तुम्हारा रोवा रोवा और राम पुकारना भीतर से और आनंद आए इसकी
- 29:59यह एक पहचान है। लक्षण नहीं होते तुम्हारे राम राम
- 30:04भला कर लो बड़ी मालाएँ भला तुम हाथ में उठाए फिरो लोगों को दिखाए
- 30:09फिरो लेकिन भीतर हमारे हृदय में तृपती नहीं होती और अगर तृपती
- 30:16नहीं है तो फिर राम राम। राम राम क्या खाक देता है?
- 30:24राधे राधे क्या खाक देता है? जब तृप्ति ना मिली खुशी ना मिली
- 30:31संतो को ना मिला आनंद खुमार ना मिला जब।
- 30:41तुम्हारा मन जुमाना तुम्हारे मन ने ये डिमैंड ना की की ये तो बड़ा
- 30:54क्या रहा है अब तक तो मैं जिसे समझ रहा था वह तो मेरी मान्यता ही
- 31:00थी। वह तो सच में आनंद नहीं था, वह तो
- 31:09वास्तव में दुख का ही एक कण था। मेरी मान्यता थी कि ये सुख है।
- 31:15मेरी मान्यता थी कि ये आनंद है यद्यपि आनंद नहीं है।
- 31:20पता कब चलेगा जब तुम सच्चे आनंद को पी लोगे?
- 31:25कबीर ने भी कहा है जो गूंका गुड़ खाय के कहे कौन मुख स्वाद गुड़ को
- 31:34खाने के बाद ही उसकी मिठास समझाती।
- 31:41गुड़ गुड़ के गुण सुनने से उसकी मिठास नायक खाना पड़ेगा और जब तुम
- 31:51खा लोगे तो फिर तुम्हारा भीतर तृप्ति की ओर बढ़ेगा।
- 31:57फिर तुम्हारे भीतर और डमांड उठेगी।
- 32:01फिर तुम्हारा मन कहेगा थोड़ा और भला तो उसे कहते है दीवाना पन
- 32:12छूटती नहीं है तो फिर मुँह को लगी हुई है फिर तुम उसे।
- 32:17राम राम से तो 1 दिन थक जाओ मेरी बात को ध्यान से नोट कर लेना, याद
- 32:24रख लेना कभी काम आये कि जब तुम थक जाओगे राधे राधे से राम राम से तो
- 32:29मेरी बातें। और फिर जब तुमने एक बूंद पीली कभी
- 32:43जाने अनजाने में एक बूंद तुमने पीली कभी कभी कभी प्रेमी पी लेते
- 32:48हैं सुबूंद को पता नहीं होता, लेकिन संयोग विषाक्त एक बूंद
- 32:55उनके। गले से नीचे गटक जाती है, फिर वो
- 32:59दीवाने हो जाते हैं। मजनू की तरह खीर की तरह इदो नी
- 33:09मेनू अखोरा जा। सी दो नी मैंनू आँखों राँझा हिरण
- 33:16कह कोई राँझण राँझण कर दी मैं आप पे राँझण हुई मुझको की हिरण कहें,
- 33:31मुझे कहो राँझा। मैंने राँझा रांझा करते करते बस
- 33:38मैं रांझा ही हो गई हूँ फिर तुम उसी का स्वरूप हो जाते हो और जब
- 33:45तुम गटकते हो, पहली बार गहरे से नचा तो तुम्हारे भीतर प्यास और
- 33:50जगती है। पहली बार तो तुम्हारे भीतर प्यास
- 33:54और जगे ये प्यास का एक फार्मूला संसार की हो या परमात्मा हो एक
- 34:05बार बढ़ती है धन जोगना शुरू कर दिया प्यास बड़े।
- 34:13और अगर आनंद की वह मूंद पीली तो प्यास बड़ी वो इतनी दीवाना कर दी
- 34:19की तुम्हें तुम्हारा रोम रोम पुकारएगा वो ज़रा सी दे दे सा की।
- 34:31और ज़रा सी और और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुप
- 34:45के मैंने। पि ही क्या है हो श भी तक है बाकी
- 34:56कैसे रहूँ चुपके मैंने पि ही क्या है हो श भी तक है बाकी।
- 35:06और ज़रा सी दह दे साखी और ज़रा सी और और पीने का मन करना प्यास,
- 35:16संसार की हो तो प्यास और जगी दन और जोड़ लो बस प्यास की यही खूबी।
- 35:29तुमने देखा जिसे प्यास होती है धन की, वह धन जोड़ना शुरू कर देता
- 35:35है, जोड़े ही चला जाता है, ये पता नहीं होता।
- 35:40जरूरतें उसकी कमी खत्म हो गई। जरूरतों के कारण आगाज किया था।
- 35:48जरूरतें तो पूरी हो गई, लेकिन संस्कार पड़ गया जोड़ने का वह
- 35:55संस्कार अब तो हमारा पीछा नहीं छोड़ता।
- 35:58वह संस्कार के तहत थोड़ा और हो जाए तो फर्क क्या पड़ता है?
- 36:05प्यास की यही खूबी है। संसार की लग जाए तो संसार और
- 36:13परमात्मा की लग जाए तो परमात्मा इसलिए प्यास देख कर बजाना।
- 36:20देख लेना की प्यास किस चीज़ के कहीं पदार्थों की व्यास तो नहीं?
- 36:27कहीं ऐसी प्यास तो नहीं जो मैं मेहनत करके कमाई करूँगा और
- 36:33पदार्थों को जोड़ लूँगा और आखिर में मैं धर्म से गरज आऊंगा,
- 36:37पदार्थ यहीं पड़े रह जाए। एक बड़ा लाला मेरे पास आ गया।
- 36:44बहुत वर्ष पहले की बात है, मैंने कहा इतना काहे जोड़ रहे हो?
- 36:52तुमने कहा था बस जरूरतों के लिए जोड़ूंगा अब तो जरूरतें कब की
- 36:57पूरी हो गयी? मुद्दतें बीत गईं, जरूरतें पूरी
- 37:00हो गईं। अब तो छोड़ दो बाबा अव्वल आ गया
- 37:07है, जोड़ने का बोर जोड़ लेने काहे जोड़तें हो, जब छोड़ के चले जाओगे
- 37:13तो बच्चों के काम आ जाएगा। अच्छा?
- 37:19तो फिर बच्चे भी यही काम करेंगे। हाँ हाँ तो उनके बच्चों के काम आ
- 37:24जाएंगे। मैंने कहा फिर बच्चों के ही काम आ
- 37:27जाएगा तो बोगी का काम फिर कोई भोगने वाला भी चाहिए की तुम
- 37:35इकट्ठा ही करते रहोगे। सभी।
- 37:40और कौन जाने आगे खाने वाला वंश ही चलेगा, नहीं चलेगा तो यह सिर तो
- 37:51तमथमाया कांपा। शेर के तो भीतर से मैंने जब कहा
- 37:59कौन जाने वंश ही चलेगा की नहीं चलेगा, कहाँ जाके खत्म हो जायेगा
- 38:05ओह बाबा बाबा शुभ शुभ बोलो शुभ शुभ बोलो मैंने कहा शुभ शुभ बोल
- 38:11रहा हूँ तुम अगर पगला गए हो तो मैं क्या कहूँ?
- 38:17तुमने अपने उद्धार की बात कभी सोंची उनके लिए सोच रहे हो जो पता
- 38:24नहीं आएँगे। पता नहीं तुम्हारा कमाया हुआ वो
- 38:30खत्म कर देंगे। संस्कृति में कहा है भूत कपूत तो
- 38:37क्यों धन संचय अगर भूत पुत्र कपुत्र है और आज कपूत है तो
- 38:43क्यों? धन संचय तो धन को इकट्ठा क्यों
- 38:46करते है? दबा देगा तुम्हारा कायम।
- 38:50और पूत सपूत तो क्यूँ? धन संचय और पूत अगर सपूत है तो
- 38:55फिर क संचय करते फिर वह खुद ही जोड़ लेगा जैसे तुम जोड़ रहे हो
- 39:00अगर तुम सपूत हो तो जोड़ रहे हो अगर तुम कबूत हो तो बाप दादों का
- 39:05कमाया हुआ तुम लूटा रहे। कुत सपूत तो क्यों?
- 39:11धन संचय कुत कपूत तो क्यों धन संचय धन तो किसी भी तरह से संचय
- 39:17नहीं करना पड़ता। इतना सा जोड़ो जिससे तुम्हारी
- 39:22जरूरतें पूरी हो वासनायें कभी कृष्णा भरी नहीं वासनायें तो।
- 39:28सदा अतिरिक्त रहते वासनई कभी किसी की पूरी नहीं सिकंदरों तक हमें भी
- 39:38छोड़ के ही जाना पड़ेगा अतिरिक्त वासन के साथ तुम भी कुछ कर जाओगे
- 39:43संसार से 1 दिन। करता है, वक्त को गँवा रहे लेकिन
- 39:59मानव को पागलपन का एक रोग लग गया है।
- 40:08बस एक भेल चाल है। कुछ मिले ना मिले।
- 40:15उस कुत्ते की तरह जो हांडी चबा रहा है और खून उसके खुद के
- 40:21मसूड़ों से आ रहा है तुम्हें बड़ा स्वाद आता है जब तुम नए नए वस्त्र
- 40:26दिन में छः बार बदलते हो, शरीर को कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 40:32कभी शरीर ने तुम्हे शाबाशी दी? तुम शरीर को छे बार नए वस्त्र
- 40:41पहना देते हो, कभी शरीर ने तुम्हे शाबाशी दी?
- 40:45ये बड़ा अच्छा किया। बेटा मुझे खूब सजाया धजाया नहीं,
- 40:50नहीं शरीर तुम्हे शाबाशी। शरीर तो एकदम धड़कन से घर जाता
- 40:55है। शरीर का अपना जीने का ढंग है,
- 41:01शरीर के अपने विधान है, अपने नियम, कायदे, कानून वो तुम्हारे
- 41:06नियम कायदे कानूनों से नहीं जाता, पर मैंने कहा।
- 41:13थोड़ी ही दूर आलीशान बगीचों का एक समूह है खुशबु से भर पड़ा है और
- 41:24खुशबू ही ऐसी कि तुम्हें मदभूषी के आलम में ले जाए तुम्हें ऐसा
- 41:30मगन करता है। ऐसा मगन करता है कि तुम पता न
- 41:40रखें कौन कहाँ? अब समय तुम्हारा व्यतीत नहीं
- 41:53होता, फिर समय का पता नहीं चलता। कब व्यतीत हो गया बस ये दो ही
- 42:01श्रेणियों हैं समय एक समय जो तुम्हें पता ही नहीं चलता।
- 42:09कब वितीत हो गया? परम सुख की घड़ियों में भक्त
- 42:13कविता नहीं चलता और परम दुख की घड़ियों में भक्त के बीतने कप्ता
- 42:20नहीं चलता। कब बीते घड़ियाँ इक फलु जै।
- 42:31एक युग भी ता एक पल जय से एक युग भी ता।
- 42:48युग भी ते मुझे निंद न आज पूछो न कैसे मैंने रे।
- 43:09पूछो ना ऐसे मैंने ऐसा भी वक्त कभी आता है।
- 43:26एक पल एक युग के बराबर बीटता है और दुख की घड़ियां होती है परम
- 43:30दुख की घड़ियों में एक पल एक युग के समान बीतता है, और परम सुख की
- 43:38घड़ियों में एक युग एक पल के समान बीत जाता है।
- 43:46एक कथा व चित किशोरी मेरे पास बैठ गई।
- 43:53प्राणों के गहरे अर्थ सीख रहे थे। एक जगह पे शब्द आया कि ब्रह्मा
- 44:03का। 1 दिन एक कल्प के समान होता है।
- 44:08बाबा, इसका मतलब क्या है? मैंने कहा तुम क्या समझाते हो?
- 44:14अपने श्रोताओं को बस वक्त बीतता जाता है।
- 44:22वर्ष दर वर्ष। और फिर उसके बाद जैसे कल्प बीत
- 44:27जाता है, तो ब्रह्मा का 1 दिन पूरा होता है।
- 44:31ब्रह्मा का 1 दिन पूरा होता है ब्रह्मा का नहीं।
- 44:34ब्रह्मा तो तुम्हारे बनाई हुई। ब्रह्मा तुम्हारे शैतान मन की
- 44:44उपाधि उपज है। सत्य में ब्रह्मा, विष्णु, महेश
- 44:49ये तुम्हारे शैतान मन की उपज है। वस्तुतै इनका मतलब कुछ और है।
- 44:59प्रसंग ले जाऊंगा कहीं और तो बड़ा लंबा हो जाएगा।
- 45:04इस प्रसंग से चूकना नहीं चाहता मैंने कब्र में वो एक कल्प में
- 45:17उसका 1 दिन बीत है ऐसे ही हाँ बिलकुल।
- 45:25मैंने कहा तू इसका अर्थ क्या है? तुम्हारे हिसाब से मैं सुन लिया।
- 45:30अब इसका सही अर्थ सुन ले। इसका सही अर्थ ये है कि ब्रह्म
- 45:36परम सुखी है, परम आनंद में है। परम इतने आनंद में हैं कि वक्त का
- 45:45पता ही नहीं चलता। एक कल्प बीत जाता है, उस दिन भी
- 45:52उन्हें ज्यादा लिख दिया। लिखने वाले कुछ तो लिखेंगे ही।
- 45:58एक कल्प बीत जाता है तो ब्रह्म का 1 दिन होता है।
- 46:02नहीं ज्यादा लिखता एक कल्प बीत जाता है तो एक क्षण भी नहीं
- 46:08बीतता। भ्रम तो ऐसा वहाँ समय ठहर जाता
- 46:12है, गड़ियां रुक जाती हैं। हवाएं ठहर जाती हैं, आसमान ठहर
- 46:19जाता है। वो ब्रह्म जहाँ वक्त चले ही ना,
- 46:27एक पल भी कहना गलत होगा। भय ब्रह्म और जो इतना सुखी है
- 46:33जहाँ समय ठहर जाता है। तुम भी पाओगे जब तुम उस बगीचे में
- 46:39जाओगे जिसकी बात मैं कर रहा हूँ जो प्रश्न तुमने पूछा वहाँ वक्त
- 46:44ठहर जाएगा, वहाँ वक्त ठहर जाएगा। ब्रह्म का 1 दिन तुम्हारे एक कल्प
- 46:59के बराबर होता है। यानी दुखी व्यक्तियों का एक कल्प
- 47:05बीत जाता है और ब्रह्म का 1 दिन बीतता है।
- 47:11लेकिन फिर भी कुछ गलती खाकर। लिखने वालों ने लिखा तो ठीक लेकिन
- 47:17अंदाजा सा तुम्हें समझा जाए बस लेकिन सच बात तो ये है कि ब्रह्म
- 47:24का 1 दिन भी नहीं बीतता। एक पल भी नहीं बीतता वो इतना सुखी
- 47:28है बस उसके सुख का। वर्णन किया गया है।
- 47:33इस संकल्प के बीच इतना सुखी है वो इतना आनंद में है वो कि पूरा कल्प
- 47:41भी जाता है और भ्रम का एक पल भी नहीं बेचता, यही कहता है।
- 47:50एक पल जैसे एक जुग गीता जुग गीते मुझे नींद ना आई पूछो ना कैसे
- 47:58मैंने रहन बताई उसी बगीचों का मैंने जिक्र किया थोड़ी ही दूर
- 48:13पर। यहाँ तो सड़ाध है तुम्हारी खोपड़ी
- 48:18में बहुत सड़ाध है थोड़ा सा हटोगे यहाँ से तो हृदय में जाओगे वहाँ
- 48:26सड़ाध थोड़ी सी कम हो जाएगी, ओके नफरत होगी, दुख होगा।
- 48:36लेकिन सड़ाध होगी, लेकिन थोड़ा सा परे हट जाओगे।
- 48:40बुद्धि से नीचे उतरे तो मन का द्वार आ जाता है।
- 48:45मन के द्वार पर भावनाएँ आएंगी, वह शोभ भी होगी।
- 48:49वहाँ थोड़ी थोड़ी खुश होगी। उस बगीचे से चल के तुम्हारे पास
- 48:53तुम्हे आएगी। और थोड़ी सी दुर्गन्ध भी आये थे
- 48:58वो तुम बीच में खड़े हो गए उस बगीचे के और इस गटर, कुछ दुर्गन्ध
- 49:07यहाँ से आएगी व्यमनस्य आएगा नफरत आये।
- 49:15इरशाएगी तो ईशाएगा और कुछ खुशबू इधर से आएगी प्यार आएगा करुणा एक
- 49:24प्रार्थना जन्मेगी अरदास आएगी तो मिश्र से वातावरण में तुम खड़े हो
- 49:32जाते हो। बिल्कुल गटर के ऊपर खड़े हो तुम
- 49:36सारी मानवता गटर के ऊपर खड़ी हो और इतने जन्मो जन्मो तक गटर के
- 49:44ऊपर खड़ने से ठहरने से उसके नाकों को अभ्यास हो गया है।
- 49:53जिसे हम कह देते हैं कि यह तो संस्कार बन गया है नाकों के भीतर
- 50:03उसको आदत पड़ गई किसी अच्छे कराने की लड़की।
- 50:15किसी ऐसे लड़के के साथ ब्याह की जो चमड़े का काम करती थी, चमड़ा
- 50:20रंग के सुगाते हैं। वह बड़ी दुर्गंध आती थी और यहाँ
- 50:30से लड़की आई थी ब्याह। बाप के घर में ऐसी कोई दुर्गंध
- 50:34नहीं थी क्योंकि वो अपना कारोबार करती थी।
- 50:39जब वो ब्याही आई तो कहने लगी अपने घर वाले से सास ससुर से यहाँ बड़ी
- 50:46दुर्गंध आती है और कहीं और चले मकान कहीं और बदल।
- 50:53ससुर से आना था, बोला बेटी तू ठहर थोड़ी थी, कुछ देर की है ये कोई
- 51:06बात नहीं हम बदल लेंगे मकान बदल। कुछ दिन बीते नाक को आदत पड़ गई।
- 51:16संस्कार, नाक उसी माहौल में रहने के आदि हो गए।
- 51:27थोड़ी देर में बहू बोलती है। सासु जी देखो मैं क्या आई
- 51:34तुम्हारे घर की बदबू ही खत्म हो गयी।
- 51:40ऐसा ही वर्मा में आता है। उसके नाक को आदत पड़ गई।
- 51:46तुम्हारी भी नाक को आदत पड़ेगी दुर्गंध दुर्गंध जैसी महसूस नहीं
- 51:50होती। ये तो महसूस होती है किसी संत को
- 51:53कि तुम कहाँ खड़े हो हटो यहाँ से दुखों और दर्द के भीतर तुम हटो
- 52:05यहाँ से। लेकिन तुम क्योंकि आदत पड़ गई तुम
- 52:11कह तो कहाँ दुख है कहाँ दर्द है बीच में से थोड़ा थोड़ा हवा का
- 52:17झोंका और अब तो आदत पड़ गई है तुम अभी तो अभी तो तुम्हे दुर्गंध नजर
- 52:25भी नहीं आती। बस वो ही तुम्हारा हाल हो गया है,
- 52:32खोपड़ी से नीचे आओगे, थोड़ी सी दुर्गन्ध कम हो जाएगी और जीस
- 52:38बगीचे की बात मैं कर रहा हूँ बिलकुल भीतर उतर जाओगे अपने तल
- 52:43में। वहाँ कोई दुर्गंध नहीं है, वहाँ
- 52:51ऐसी सुगंधियां हैं, वहाँ ऐसे ऐसे नाद बज रहे हैं।
- 52:59ऐसी ऐसी धुन उभर रही है ओंकार की ओर।
- 53:04बड़ी प्यारी प्यारी धुन ये तुम्हारे को मोह लेती हैं, मैं
- 53:10तुम्हें बड़ा आनंदमयी बना देती हूँ तुम वहाँ चले जाओगे धीरे धीरे
- 53:16लेकिन इस गटर से उतर के हृदय के स्थान पर आना होगा।
- 53:23और हृदय के स्थान से नीचे उतर के अस्तित्व के तल पे जाना होगा।
- 53:29अस्तित्व के तल पर जब तुम जाओगे, वहीं बाबा नानक कहते हैं बाजी नाद
- 53:36अनेक अशंका चित्त वाबण भारे। खेते राग परी सो केहरिण खेते गावन
- 53:46भारी ऐसा लगता है यहाँ बहुत गाने वाले बैठे हैं।
- 53:53इतने शानदार मृदंग बंसरी वादी यंत्र पड़े।
- 54:03वीणा के तार छलकते हैं, यहाँ बेंजो है, गिटार है, इलेक्ट्रिक
- 54:10गिटार है, तबला है, ढोलक है, मंत्री सुन्दर सुन्दर वाद्य यंत्र
- 54:17है। कित्तेनाथ अनेक असंका।
- 54:24ज़रा सोचो जहाँ असंख्य वाद्य यंत्र बज रहे, वहाँ की दशा क्या
- 54:30होती वहाँ से हट जाने का मन करेगा नहीं करेगा?
- 54:38जहाँ ओमकार की मीठी मीठी ध्वनि गुजर रही है, इतनी गूंज रही है कि
- 54:44तुम उसको सुनकर मस्त हो जाते हो। सारा भीष्म इस ध्वनि से भरपूर है,
- 54:51इसी को नाम कहते हैं और हम पागलों ने।
- 54:55इसको राधे राधे बना दिया। इसको राम राम बना दिया।
- 55:00बात इस धुंध की थी, जिन्होंने सही से ही पकड़ ली।
- 55:03ये धुन् को ओंकार का जाप करना शुरू कर दिया।
- 55:08बाबा कहते हैं उस तन पे चले जाओ जहाँ ओंकार की धुनी वजह रही।
- 55:14और कहाँ पहुँच जाओगे तुम? नाभ के पास वो सतल है नाभ के पास
- 55:21वो स्थल है जिसे कुंटल नहीं कहते इसलिए शायद तुमने एक शब्द पंजाबी
- 55:28का सुना हो। हमारी जो नाभी है उसको पंजाबी में
- 55:33क्या कहते हैं? तुन्नी ध्वनि हमारी नाभी को
- 55:44पंजाबी के अंदर ध्वनि कहते है ध्वनि और जो।
- 55:55नाथ लोक लगाते थे मंडप उसको क्या कहते थे दूणी ये बड़े प्यारे शब्द
- 56:04हैं। हम इन अर्थों को पकड़ नहीं पाए
- 56:12यहाँ से वो ऐसी मिठास। ही उर्जा उठेगी जो सारे चक्रों
- 56:21में से गुजरती हुई तुम्हारे ब्रह्मरंद्र में सहस्राल में
- 56:27प्रवेश कर जाएगी। और तो महा आनंद के रस से ओतप्रोत
- 56:31हो जाता है। परसों ही मेरे पास एक प्रश्न आया,
- 56:37बाबा तुम कहते हो कि छोटे बच्चों को क्रिया योग करवा दो।
- 56:41अगर कहीं गलती से कुंडली नहीं जा रही तो कोई विनाश नहीं हो जायेगा।
- 56:45न ही विनाश हो, इस फिक्र को निकाल दो।
- 56:51ये मूर्खों की बातें हैं जो कहते हैं कुंडलिनी जग गई तो नुकसान हो
- 56:55जाएगा कोई नुकसान अमृत भला नुकसान करता है अमृत का काम है तुम्हें
- 57:01जीवन देना बेहतर प्यार से उठेगी और तोड़ेगी नहीं किसी चक्कर को।
- 57:10ये तो शब्दों की बात है तुम वह तो चक्करों में से रास्ता है।
- 57:15तुम्हारी उन सभी चक्करों को लांघती हुई सहस्रार में जाके
- 57:21भरम्रंत्र में जाके प्रवेश हो जाएगी।
- 57:25पहली बात जगह तो। कुंडली जगे दो तुम कहते हो बाबा
- 57:32क्रिया युग बच्चों को करा दो करा दो, उनकी जिंदगी सार्थक हो जाएगी,
- 57:39उनकी जिंदगी आनंद से नहा जाएगी और प्रतिभाशाली हो जाएंगे।
- 57:47को लड़ने के लिए योग्य हो जाएंगे और तुम डराते हो अगर कुंडली नहीं
- 57:57जग गई तो फिर क्या होता? तुम्हारे मूर्ख होने के बाद
- 58:03कुंडली कभी जगती है? तुम्हारे भीतर रश कभी जगता है तो
- 58:11तुम्हें नुकसान पहुंचाता है। तुम्हारे भीतर खुशी का तूफान उठता
- 58:15है, तुम्हें क्यों नुकसान होता है?
- 58:19तुम उसका मज़ा देते हो। ऐसे ही कुंडलनी शक्ति जब जगी।
- 58:26उसमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी। वो धोनी के पास से उठेगी वो ही है
- 58:31कुंटनलिंग शक्ति का मुकाम वो जागेगी उसके सारे जो ट्रेड मेड है
- 58:40वो खुले? और शक्ति सीढ़ी चक्करों के बीच
- 58:45में से होती हुई एक रास्ता है सुसुमना इडा पिंगला सुसुमना बीच
- 58:52में से सुसुमना जाती है और कुंडलिनी से सुसुमना के बीच में
- 58:57से होती हुई एक रास्ता सीधा जाता है ब्रमबद्र जीसको ससुराल।
- 59:05तुम्हें इतना आनंद से ओतपरोत कर देगी, कहीं नुकसान नहीं होगा।
- 59:09तुम्हें ये बादलों की बातें हैं, इन्होंने कोई अभ्यास नहीं किया
- 59:14होगा। इन्हें कोई कुंडलनी के बारे में
- 59:17जानते नहीं होंगे, सिर्फ सुना होगा बड़ा होगा।
- 59:22शस्त्र पड़े खुद नहीं जाना होगा और कुंडलियन की जागृति भी नहीं
- 59:27हुई होगी क्योंकि जिसकी कुंडलियां नहीं जागृत हो जाती हैं उसके भीतर
- 59:35तो आनंद के झरने, हर घड़ी हर पल फूटते हैं।
- 59:40उसकी सब तमन्नाएं मिट जाती हैं। घूमने की, खाने की फिरने की,
- 59:46भोगने की सब तमन्नाएं समाप्त हो जाती हैं।
- 59:49भाग, दौड़ सब मिट जाती हैं, ना कुछ जोड़ता है, ना कुछ स्वाद का
- 59:55खाता है ना कहीं। तीर्थ स्थलों को मनोरम दृश्यों को
- 1:00:00वो देखता है उसका मन भर गया है। यह जो देखा उसने दृश्य बड़ा
- 1:00:07प्यारा था। इसके आगे का कोई सुंदर, कोई दृश्य
- 1:00:12और होता ही नहीं तो इस। जो मूर्खों ने ये भ्रांतियां
- 1:00:20चलायी हैं की कुंडल नी जगेगी, नुकसान होगा इसको भूल जाओ।
- 1:00:28यह बातें अज्ञानियों की हैं, जिन्हें कुछ पता जगह से ही तो 12
- 1:00:35वर्ष के बच्चों को। क्रिया योग करना शुरू कर दो ध्यान
- 1:00:38में बैठना शुरू कर दो ध्यान यानी कुछ नहीं करना टु डू नथ्थिंग कुछ
- 1:00:46नहीं करना आराम से बैठ जाना है क्रिया योग करवाओ ध्यान में
- 1:00:52बैठवाओ। और जो थोड़े बड़े हैं वो प्रेरणा
- 1:01:00के लिए वीडियो को सुलझाते हैं क्योंकि मन है बड़ा चालाक है।
- 1:01:09मन बार बार तुम्हें नास्तिक बनाने की चेष्टा करें।
- 1:01:15लेकिन अगर तुम वीडियो को सुनते रहे तो तुम्हारी नास्तिकता को
- 1:01:21आस्तिकता में फेर बदल देगी? जब भी कभी तुम पाओ के नास्तिकता
- 1:01:26उतरने लगी तो वीडियो को सुनने लग जाता।
- 1:01:32तुम्हारे भीतर आस्तिकता का संचार होगा।
- 1:01:35नास्तिकता समाप्त हो जाएगी। ये तीन काम करें, इसे शुरू कर
- 1:01:45तुम्हारा जीवन धन्य हो जाएगा। मैं कहाँ से लेके आया दुर्गंध से
- 1:01:51गटर के ऊपर तुम खड़े हो। जीवन चिता और चिंता में जल रही है
- 1:02:00वहाँ से तुम आए हृदय में उतरे थोड़ी करुणा भी है और थोड़ी इच्छा
- 1:02:08भी है थोड़ी नफरत भी है, लेकिन थोड़ा प्यार।
- 1:02:12आधार कुछ इससे इधर से आ रहा है, कुछ उस उधर से आ रहा है फिर तुम
- 1:02:20और चलो थोड़ा और आगे चलो उस शुद्ध स्थान पर पहुंचाओ जहाँ ओंकार का।
- 1:02:31और बाबा कहते हैं कि ये धोनी जिसने भी सुन ली, जिसने भी ये
- 1:02:37धोनी सुन ली, उसने सब बंधन तोड़ दिया।
- 1:02:48उसके सब कष्ट कृष, दुःख धिद्र दूर हो गए सुनिए दुःख पाप का नक्ष
- 1:02:58तुमने कितने भी प्राप्त किया सब समाप्त हो जाएंगे जीस तरह से तुम
- 1:03:05कहते हो वैसे। जीस तरह से तुम्हारे आचार्य कहते
- 1:03:08हैं वैसे तुम्हारे सभी सुनिए दुख पाप का नाश पाप कर्मों से दुख
- 1:03:19होता है और पापों का ही नाश कर देगा यह सुनना।
- 1:03:27क्या सुनना जहाँ जाओगे वहाँ इस ओंकार की ध्वनि गूंजती पक जहाँ
- 1:03:37जाए ये घ हमें। पाइएगा सब जगह पर महात्मा की धुनी
- 1:03:51बज रही है। सुब्रमण्यम कोई स्थान खाली नहीं
- 1:03:56है। यही बाबा ने नाम कहा था, बाबा ने
- 1:04:01यही कहा था। इसी को नाम कहा था तुमने जपना
- 1:04:06शुरू कर दिया। पढ़िए तो जब जी।
- 1:04:16जेता कित्ता तेता नाव ये सारा पसारा जो है इसको नाम कहता हूँ
- 1:04:22मैं बाबा कहते हैं। जेता कित्ता तेता नाम बिन नामे
- 1:04:29नाहीं कोठाओ नाम के बिना कोई जगह सभी जगह नाम कूट कूट के भरा है।
- 1:04:36इसको कहते हैं बाबा नाम फिर उसको जापानी जा सकता है।
- 1:04:39इसका तो आनंद लेना होता है, इसको सुनना होता है।
- 1:04:44और उस शून्य से तुम्हारे सारे पाप और दुःख नष्ट हो जाएंगे।
- 1:04:48सुन ये दुःख पाप करनाश ऐसे तुम इस गटर की जिंदगी से निजात पाओगे और
- 1:05:03फूलों से? खुशबू से लदी हुई इस वाटिका के
- 1:05:08भितर विराजमान को झोंके और तुम्हारा जीवन स्वर्ग से धन्य हो
- 1:05:13जायेगा। धन्यवाद।