Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Jan 25 - कसूर दुर्योधन और शकुनि का, पर सबसे ज्यादा सज़ा भीष्म पितामह को क्यों मिली? Karma Philosophy.
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- 0:14प्रिय व्रत पारदर्शी बाबा, एक प्रश्न उलझन की तरह दिमाग में
- 0:28बहुत वक्त से है। उसका हल नहीं मिल रहा।
- 0:37महाभारत का प्रसंग है यह जब हम गौर से देखेंगे।
- 0:50तो किशोर दुर्योधन का किशोर मामा शकुनी का क्योंकि दुर्योधन ने
- 1:03राज़ करना था। मामा शकुनी दुर्योधन का मामला था।
- 1:14लाक्साग्रे की योजना बनाई तो दोनों ने बनाई पाशा खेला गया
- 1:24इंद्रप्रस्थ हार गए। वो भी शकुन की ही चल थे।
- 1:36अगर सारे महाभारत को बड़े गौर से देखा जाए तो कसूर निकलता है।
- 1:46दुर्योधन और शकुनिका जहाँ तक स्वाल धृतराष्ट्र का है, वह तो
- 1:56वैसे भी अंधा था और मोह में भी अंधा था।
- 2:12तो आप कृपया इस समस्या का मुझे सुना देने दीजिए कसूर दुर्योधन का
- 2:22ओह शकुनि का सजा उन्हें मिलनी चाहिए थी सबसे ज्यादा।
- 2:27लेकिन सबसे ज्यादा सजा मिली विस्मपताना को, जिसका कोई कसूर
- 2:36नहीं था। परम त्याग भी था हस्तिनापुर का
- 2:40राज़, जिसने त्याग दिया था। देश के लिए जो कुर्बान था, देश
- 2:50प्रेमी था, हस्तिनापुर की रक्षा की, कसम खाई थी, आजीवन ब्रह्मचर्य
- 3:01का व्रत लिया था। देखने में भीष्म पिता माँ की कोई
- 3:09पाप जैसी कृत्य सामने नहीं आती। इतना बड़ा परिणाम जो उसे भुगतना
- 3:18पड़ा क्या बाबा ये उसके पिछली जन्मो का फल था, कर्म था।
- 3:27या की इसी जन्म का बस ये बात ले जाती है।
- 3:36इस बात के ऊपर आखिर सारा फोकस हो जाता है कर्म सिद्धांत का।
- 3:44कि भीष्म पितामह को इतनी खतरनाक सजा क्यों दी गई?
- 3:48रोम रोम उसका बिन दिया गया। भगवान कृष्ण की मौजूदगी में
- 3:57शरशइया भी उसको लेटा दिया गया। इतना दर्द, पीड़ा से कराहता हुआ
- 4:08जीवन उसके जीवन में कहीं देखें तो इतना पापथान है।
- 4:16पिता के लिए त्याग किया राजसिंह का।
- 4:23हस्तिनापुर की रक्षा का वचन लिया। आजीवन आजीवन ब्रह्मचारी रहा।
- 4:34निजी स्वार्थ जैसी कोई चीज़ लगती नहीं, फिर महाभारत में भी।
- 4:46कुछ नहीं ऐसा जो चार चली हो, जो कुछ इतना बड़ा षड्यंत्र रचा हो,
- 4:54बेईमानी की हो। सीधा साधा, सरल व्यक्ति और इतनी
- 4:59बड़ी सजा। क्या आप इस कर्म सिद्धांत को
- 5:05व्याख्यायित करने का कष्ट और कृपा करेंगे?
- 5:20प्रश्न ठीक है। तुम्हें परमात्मा अन्यायकारी
- 5:27मालूम पड़ता है यहाँ आके तो तुम्हारी बुद्धि ठीक सोचती है
- 5:39लेकिन ध्यान रखना बुद्धि गणित की प्रभाषा जानती है।
- 5:46और जीवन गणित नहीं जीवन गणित से कुछ पार है और ये बातें जीवन से
- 5:58संबंधित हैं। विषम पदामा का बाहर बाहर देखने
- 6:08में त्याग ही त्याग मालूम पड़ता है, लेकिन जब उसको सजा देखते हैं
- 6:18तो वो कांप जाती है। क्या राष्ट्रप्रेमियों का त्याग
- 6:24करने वालों का? आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने
- 6:33वाले का ऐसा अंत होना चाहिए था। उसको प्राण को त्यागना के लिए भी
- 6:44मकर संक्रांति का इंतजार करना पड़ा।
- 6:54देखने में ठीक लगता है। मैंने तुम्हें कहा ज़िन्दगी हिसाब
- 7:01नहीं है, ज़िन्दगी गणित से पार है और बुद्धि गणित की तरह सोचती है।
- 7:12गणित बड़ा सरल है, ज़िन्दगी बड़ी जटिल है, गणित बड़ा सरल है, दो और
- 7:21दो चार ही होते हैं, लेकिन ज़िन्दगी बड़ी जटिल है, ज़िन्दगी
- 7:29बिल्कुल ऐसी जटिल है। जैसे उपनिषद का यह वाक्य पूर्णमदः
- 7:35पूर्णमदः पूर्णमद पूर्णमदक्ष्य थे पूर्ण से पूर्णमाताएं पूर्ण में
- 7:42वापस शिष्य थे। पूर्ण में से पूर्ण को निकाल दिया
- 7:45जाए तो पूर्ण ही शेष बचता है। यह ज़िन्दगी की परिभाषा है।
- 7:52तुम समझ नहीं सके उपनिश्चित करिशी तुम्हें कहता है कि ज़िन्दगी गणित
- 8:01की तरह सरलें गणित बड़ा सरल है, गणित कहेगा सो में से सो निकाल
- 8:10लूँ। शेष बचा शून्य कुछ नहीं बचा लेकिन
- 8:17ज़िन्दगी उपनिषद का ऋषि कहता है तुम्हें समझाने की चेष्टा करता
- 8:23है। पाषा बहुत अक्षुद्र है, सीमित है।
- 8:29भाषा नहीं समझा पाती, इसीलिए इन चीजों का सहारा लेना पड़ता है।
- 8:37अब ये ज़िन्दगी का भाषा है जो उपनिषद के ऋषि रहते हैं।
- 8:43पूर्ण मतः पूर्ण मैडम। पूर्ण अर्थ पूर्ण मतिष्य थे
- 8:48पूर्णश्य पूर्ण महादाय पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लिया जाये।
- 8:53पूर्ण मेवा शिष्य थे पूर्ण ही शेष अवस्था है।
- 8:59यह कोई गणित की परभाषा नहीं है। ज़िन्दगी की पर वर्षा है, जिंदगी
- 9:05बड़ी जटिल है, प्रथम बर्गा ऋषित तुम्हें समझाना चाहता है कि गणित
- 9:16को त्याग दो शब्दों को त्याग दो, बुद्धि को त्याग दो।
- 9:22बाहर की आँखों से देखने पर ये समझ आएगा कि इतनी बेदर्दी से कोई भी
- 9:32नहीं मरा जितनी दर्दनाक मृत्यु भीषम पिता माँ की हुई।
- 9:4358 दिन 58 डेज़ शर शैय्या पे पड़े रहे और उनका रोमा रोमा वाणों से
- 9:55विद्युत था। कितनी पीड़ा रही होगी?
- 10:02दिन भर रात सर्द रातें ये दर्द सहा कैसे होगा उसमें और पास कोई
- 10:16भी नहीं। सभी राजकुमार अपने अपने घरों में
- 10:22जाके सो जाते हैं। उसका अपना कोई भी नहीं होता, ना
- 10:30पांडव, ना कोरव और ऊपर से इतनी बड़ी सजा।
- 10:41उसके बावजूद विश्व प्रदामा कहती कि अभी नहीं मरूंगा जबकि उसे
- 10:50स्वमृत्यु का स्वेच्छिक मृत्यु का वरदान था।
- 10:55वो चाहती तो उसी वक्त प्रणों को त्याग सकते थे।
- 10:59अब यहाँ बड़ी मजेदार बात है, एक बहुत से लोगों ने बहुत से ढंगों
- 11:06से इसे विबेश किया है, लेकिन मेरी दृष्टि में वह चूक गया है।
- 11:20ये उसका त्याग गिना जाता है। भीष्म पिता माँ का स्वेच्छिक
- 11:26मृत्यु का वरदान रखने वाले भीष्म जब बाणों की सैया पे पड़े थे।
- 11:37घोर पीड़ा और दर्द से कराह रहे थे, तब उन्होंने वो शरीर त्याग
- 11:44क्यों उन्हें दिया? जब उनके पास वरदान था?
- 11:49अब यहाँ एक बात समझ लेना बड़ी दुर्लभ है।
- 11:58कर्मों का फल ईश्वर नहीं देता समझ लेना बात को तुम जानकर हैरान
- 12:08होगे, जब भीतर जाओगे और कर्मों की फिलॉसफी को अपनी नग्न आँखों से
- 12:14देखोगे। प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों का फल
- 12:19वह खुद देता है। यह बड़ी अद्भुत बात है।
- 12:28तुम्हारा मन कहेगा फिर तो हम बेईमानी कर जाएंगे हम जब।
- 12:34अपने ही कर्मों के फल को निर्धारण करेंगे तो अपना ही पक्ष रख लेंगे।
- 12:43अपराधी जब न्यायालय में पेश होता है तो अपना ही पक्ष रखा करता है।
- 12:49हाँ, न्यायालय की बात वो है। जिनके सामने वो बोलता है वो खुद
- 13:00झूठे हैं, गद्दी पर बैठ गए हैं। बेला शक लेकिन भीतर से वो सच्चे
- 13:11नहीं है, वो खुद झूठे हैं। और एक मजेदार बात तुम्हें खत्म
- 13:19सच्चे व्यक्ति के सामने झूठ बोलना बड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि
- 13:24उसके भीतर से निकलते हुए रोए रोए से आसानी तरंगें तुम आसानी से झूठ
- 13:30नहीं बोल पाओगे। और जब तुम अपने अंदर जाओगे, अपने
- 13:37भीतर जाओगे वहाँ इतने ईमानदार हो जाते हो तुम जब तुम अपने ही
- 13:48कर्मों का लेखाजोखा करोगे। दूसरा कोई आके तुम्हारे लेखा जोखा
- 13:54करने वाला है नहीं, क्योंकि अपने कर्मों का सटीक ओब्सर्वर तुम्हारे
- 14:07सिवा और कुछ नहीं हो सकता। कोई नहीं हो सकता।
- 14:13तुम ही हो जो हर वक्त अपने कर्मों के साक्षी हों, ये दो आँखें हर
- 14:19वक्त तुम्हारे कर्मों पे गड़ी रहती हैं।
- 14:24तुम क्या करते हो? क्या सोचते हो?
- 14:31दिमाग में क्या चलता है? कर्म में क्या चलता है?
- 14:38तुम अच्छी तरह से देखते हो और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों को
- 14:43खुद देखता है। इससे दूसरे।
- 14:50शब्दों में तुम कह सकते हो कि परमात्मा देखता है ये तो बाद में
- 14:56पता चलेगा कि जो देखता था वह परमात्मा ही था, लेकिन अभी से तुम
- 15:03मत कहो क्योंकि जानते नहीं। अभि से तो ये कहो कि तुम्हारे
- 15:11कर्मों का फल तुम स्वम देते हो और तुम इतने ईमानदार हो, भीतर से
- 15:17जिसका कोई हिसाब नहीं है क्योंकि भीतर जाकर तुम इतने आनंद में मगन
- 15:26हो जाते हो। के जे पाप ये गलतियाँ ये
- 15:31त्रुटियाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हो, संसार में वहाँ जाके बड़ी
- 15:36छोटी मालूम पड़ती है और तुम अपने पापों को स्वीकृत करने में हिचक
- 15:45नहीं करते। मेरे पास रोज़ कन्फेशन आ जाते हैं
- 15:57दिमाग हल्का करने के लिए। मैंने कहा था, कोई तुम्हारा शुभ
- 16:04चिंतक होना चाहिए, मित्र होना चाहिए, जिसके सामने तुम बात कह
- 16:09सको। जीसको तुम पाप समित्य हो, उसके
- 16:14सामने प्रकट कर दो तो तुम हलके आ जाओगे।
- 16:18गांधीजी ने कहा था कन्फेशन ऑफ एरर्स।
- 16:22इस लाइक ए ब्रूम दट स्वीप्स हॅव ए डर्ट एंड मेक्स उस ए फिक्स क्लीनर
- 16:27थान बिफोर। अपने गुनाहों को मान लेना इसाइयत
- 16:35का यही सन्देश है, बेस में यही है इसाइयत के वो कन्फेशन करते हैं।
- 16:47अपने पापों को मार लेना, अपने भोलों को मार लेना, कन्फेशन ऑर
- 16:53फेरर्स इज़ लाइक आवर होम उस झाड़ू की तरह है, दैट स्वीप्स में डर्ट
- 16:59जो तुम्हारी सभी धूल डवस को इकट्ठा कर देता है।
- 17:04एंड मेक्स ए सर्फेस क्लीनर थान बिफोर?
- 17:07और वर्ष को पहले से भी ज्यादा साफ सुथरा उलजला बना देता है तो
- 17:17कन्फेशन के लिए व्हाट्सएप रोज़ भर जाता है।
- 17:22मैंने इस उम्र में ये किया, मैंने इस उम्र में ये किया, मैंने इस
- 17:26उम्र में ये किया और मैं सांझ सारे डिलीट कर देता हूँ।
- 17:40पढ़ता हूँ कि नहीं पढ़ता हूँ ये मैं नहीं बताऊँगा क्योंकि तुम्हें
- 17:44साइकोलॉजिकल इफेक्ट हो जाएगा। बस तुम समझो कि मैंने सुन लिया
- 17:49तुमने कह दिया तुम भार मुक्त हो जाओ।
- 17:56यही परंपरा ईसाईयद में थी। तुमने गुनाह किया वो तुम्हारे ऊपर
- 18:00बोझ है, मैंने किया और यही बोझ है कि मैंने किया।
- 18:05सनातन ने इसे सीधा सीधा कह दिया भगवान कृष्ण ने ईसाईयत ने इसे हाथ
- 18:12घुमाकर कान पकड़ लिया। मैंने किया यह बोझ है।
- 18:21तो कृष्ण कहते हैं कि तू कुछ नहीं करता करता, मैं हूँ इसलिए मुझ पे
- 18:28छोड़ देगा कर्म नेवाधिकारस्ते माफलेशु का दाचना।
- 18:38कर्मण्य वाद का रस्ते? माँ फली शुक्लाजन सर्बधर्माण
- 18:43प्रतिज्ञा माँ मेका शरणम भच्च मेरी शरण में आजा तू करता नहीं
- 18:51रहेगा फिर जो करेगा। मैं करूँगा कर्तब, मैं हो जाऊंगा।
- 19:01दोनों का मतलब एक ही था ईसाईयत का भी और कृष्ण का भी।
- 19:09तीसरा बाबा नानक का भी। वो कहते हैं, कर्ता कर्तापुरक वो
- 19:18विराट है एकंकार सतनाम कर्तापुरक वह विराट है वह करता है और अगर
- 19:30तुम कहते हो कि मैं करता हूँ। तो यही तुम्हारे ऊपर बोझ है और
- 19:36बोझ काहे का एक ही बोझ है तुम्हारे ऊपर तुम जब कहते हो कि
- 19:44मैं करता तो तुम अपना वजूद नियत कर लेते हो।
- 19:50ओके मैं हूँ तभी तो करोगे ना? मैं हूँ और मैं हूँ बहुत बड़ा बोझ
- 19:57है इस मैं हूँ को मिटाने के लिए सभी संत प्रतिबद्ध हैं।
- 20:06अपने अपने तरीके से नानक अपने तरीके से कहते हैं, कृष्ण अपने
- 20:12तरीके से। क्राइस्ट अपने तरीके से
- 20:25जब ये कहता कि मैं करता तब ये गर्भ जून में पड़ता।
- 20:35फिर आवागमन का चक्कर शुरू हो जाता है।
- 20:41तो शुरू कहाँ से हुआ? मैं मैं करता हम प्रसंग पर वापस आ
- 20:51जाएं। विषम पतामा उसी वक्त शरीर छोड़
- 21:00सकते थे, लेकिन। वरदान होने के बावजूद भी श्री
- 21:08छोड़ा नहीं, दुखों से मुक्त होवे नहीं कारण जाको मैं दारु न तो कदे
- 21:15ही ताकि मत पहले हर लें उसके बेचारे की क्या औकात है?
- 21:24उसने मकर संक्रांति का नाम ले दिया।
- 21:26इतने दिन उसने कष्ट भोगना था। पहले दिन कैसे छूट देता?
- 21:32उसके पाप ही इतने थे। तुम जो कहते हो वो निष्पाप था
- 21:38क्योंकि उसने त्याग किया। हस्तिनापुर की गद्दी छोड़ी है
- 21:42उसने। ब्रह्मचर्य का पालन किया, बच्चों
- 21:48को जन्म नहीं दिया, जो वारिस बन जाती हस्त्रनापुर का शादी तक भी
- 21:53नहीं की और शादी करके भागा भी नहीं।
- 21:57तुम असा मत करो। कुछ नहीं किया।
- 22:06बेचारे ने बड़ा साफ सुथरा कैरेक्टर है इसका पिता के लिए,
- 22:16राष्ट्र के लिए उसने जीवन को कर्पान कर दिया और निभाया भी है।
- 22:23आखिर तक हसनपुर की रक्षा करता रहा जो जरूरत थी राजकुमारों को वो छीन
- 22:33के मांग के खरीद के जैसे भी हुआ वो लाया विचित्र वीर।
- 22:44और चित्रांगत तो विचित्र वीर्य उसकी शादी के लिए राजकुमारियों का
- 22:59अपहरण करके लग गया है। ये हस्तिनापुर की रक्षा थी।
- 23:07अपना वीरत्त्व दिखा के अपने डोलों का प्रभाव दिखा के किसी की
- 23:18बच्चियों को छीन के ले आना दुराचार होता है कि सुताचार लेकिन
- 23:27क्या करें? तुम तुम भक्त हो, भक्त हो भाई
- 23:43किसी की बच्चियों को जो स्वयंवर के लिए अपना उपयुक्त वर्ग तराश
- 23:50रही है। हाथ में बरमाला है या विलन की तरह
- 23:57जाते हैं और सबके मुक्के टुकड़ा देते हैं और वहाँ से राजा तो भाग
- 24:03खड़े होते हैं और उन तीनों को लेकर चल।
- 24:09चलो हमारे हस्तना पर की रानियों बनु कोई व्यक्ति का इच्छा भी तो
- 24:16व्यक्ति की होती है तो अम्बा ने विद्रोह कर दिया नहीं, ऐसा नहीं
- 24:27चलेगा। उसने बेनती कि महाराज मैं किसी
- 24:34अन्य पुरुष से प्रेम करते हूँ तो मुझे गलत ले के आया हूँ, इन दोनों
- 24:39को रख लो, ये किसी से प्रेम नहीं करते।
- 24:43इनको तो वैसे भी वर्ष चाहिए था। हस्तिनापुर का इतने बड़े
- 24:48साम्राज्य का राजा मिल गया और क्या चाहिए?
- 24:52लेकिन मैं तो पहले से ही किसी पुरुष के प्रेम में हूँ।
- 25:04कोमल हृदय भी हैं तो स्नेह। फौरन सिपह सालारों को बुलाया और
- 25:15कहा कि अम्बा को सकुशल काशी पहुंचाया जाए क्योंकि किसी और पर
- 25:28पुरुष के प्रेम में है। और मैं गलती से छीन लाया हूँ
- 25:35लेकिन छीन ले आए यही गलती हो गई। जब अम्बा वहाँ गई तो उस पुरुष ने
- 25:43उसके साथ शादी करने से इंकार कर दिया।
- 25:48अम्बा। चेदी के राजा शाल्व से प्यार करते
- 25:54थे और स्वयंवर में शाल्व भी आया हुआ था।
- 26:00अम्बा ने शाल्व के गले में माला डालनी थी।
- 26:05वे उसके पति स्वीकार कर चूके थे। तो भीष्म ने कहा कि ठीक है
- 26:17तुम्हें वापस छोड़ दिया जाता है, ये मुझसे गलती हो गई, लेकिन गलती
- 26:21नहीं हो गयी। कई बार देखने में छोटी गलती लगती
- 26:25है, हम भूल सुधार लिख देते हैं लेकिन भूल सुधार नहीं होता है।
- 26:29इतना बड़ा पाप होता है। तुम्हें पता भी नहीं होता उसका
- 26:34प्रयास किया ही नहीं जा सकता और इसी छोटी सी घटना का मूल्य
- 26:44भविष्यम को शरशैया पे लेट के देना पड़ा।
- 26:56जब अम्बा घर आयी तो शाल्ब ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया।
- 27:03उसने बड़ी मेहनत खुशामत की कि देखिये मेरी कोई गलती नहीं मुझे
- 27:08यहाँ से भैषम ले गए थे अपने बहु बलके ज़ोर पे लेकिन वो तुरंत वहाँ
- 27:14से वापस आ गए। मैं तुम इससे प्रेम करती हूँ।
- 27:16तुम इससे शादी करूँगी तो मैं अपना पति मान चुकी हूँ।
- 27:21किसी अन्य से मैं भी शादी नहीं करूँगी।
- 27:24आजीवन कवारी रह लूँगी लेकिन शार्व ने।
- 27:32मिन्नत खुशाम करने के बावजूद इंकार कर दिया करें।
- 27:37मैं तुमसे शादी नहीं करूँगा क्योंकि वह पुरुष ने तुम्हें
- 27:41स्पर्श किया है। अपने अपने समाज की मान्यताएँ होती
- 27:48हैं। और अपने अपने समाज की मान्यताओं
- 27:54को प्रत्येक व्यक्ति अधिमान देता है।
- 28:02प्रत्येक वेला इस धरा पे आई, ऐसी भी वेलाएं आईं जब पर पुरुष का
- 28:09सपरष मात्र से। शार्प ने अम्बा को पत्नी मानने से
- 28:15इंकार कर दिया। सिर्फ स्पर्श, हाथ का स्पर्श उन
- 28:20तीनों को हाथ से रस में बैठाया था।
- 28:31और कोई वक्त ऐसा भी है जब रथी सर इक्स्वांकु वंश के रथी सर अपनी
- 28:43बार्या को अंगरा ऋषि के पास नियोग करने के लिए ले जाते हैं।
- 28:48केस के गर्भ ठहराते हैं। कुकी रथी सर मैं शुक्रूण मोकी कमी
- 28:57थी। निग के अलावा और कोई रास्ता नहीं
- 29:02था, बच्चे उससे चढ़े थे। उसमें स्पर्म काउंटिंग ठीक नहीं
- 29:08थी तो अंकरा ऋषि के पास चले गए। मैंने तुम्हें पहले भी कहा है ये
- 29:17आवारा सांड पाले हुए थे। अपने अपने समाज की रीती रिवाजों
- 29:28के अनुसार समाज उत्पन्न कर लेता है।
- 29:33सभी चीजों की व्यवस्था को अम्बा आजीवन कवारी रही।
- 29:46और शादी नहीं की, सुन्दर थी, सुशील थी, समझदार थी, काशी नरेश
- 29:55की पुत्री थी लेकिन उसने कस्म खाई कि शादी करूँगी साल से करूँगी
- 30:03नहीं करूँगी। यह भूल नहीं यह पाप हो गया, मैंने
- 30:12एक शब्द पहले बोला था, प्रत्येक व्यक्ति जो भी कुछ करता है मुझे
- 30:18कह देते हैं लोग यह फलाण व्यक्ति ऐसा कर रहा है।
- 30:24बड़ा पाप है, तो मैंने कहा तुम क्यों चिंतित हो?
- 30:34तुम क्यों चिंतित हो? क्योंकि अगर कोई जहर पी रहा है तो
- 30:43मरेगा कौन? और ये छल, कपट, शतरंज की विशाल
- 30:52राजनीति की ईर्ष्या, द्वेष फैलाना, आग लगाना।
- 30:59अगर कोई ऐसा कर रहा है, संत व्यक्ति उसमें गुस्तानी एन्टेंगल
- 31:07नहीं होता जो तू जान गया है कि प्रकृति की व्यवस्था परमात्मा की
- 31:13व्यवस्था इतनी शानदार और महीन सूक्षम है।
- 31:19कि उसे सोचने की कोई आवश्यकता है जिसने बनाया संसार जिसने बनाई
- 31:28व्यवस्था वह खुद सुलट भी रहेगा। तुम चिंता मत करो।
- 31:36औरों के घर के झगड़े, न हक न छेड़ तू तुझको पराई, क्या पड़ी अपनी न
- 31:43बैठ तू लेकिन क्या करें? यहाँ देशभक्त बहुत है जो भीतर की
- 31:53उन व्यवस्था को नियमों को जानता नहीं।
- 31:56वो ऐसे झगड़े झगड़े किया करता है। अंततः इस बात में कोई तंत नहीं
- 32:04है। जो भीतर चला गया वो नियमों को जब
- 32:07देखेगा, देखेगा तो शांत हो जायेगा।
- 32:11इतनी सुन्दर व्यवस्था उसने बनाई और इतने महीन।
- 32:16और सूक्ष्म और इतनी एक्यूरेट कि जब तुम नए नए खोजते हो तो तुम
- 32:28चकित होते हो लेकिन जिसने बनाया। परमात्मा के बारे में व्याख्या
- 32:40करने वाले कहानियों सुनाने वाले लोग कभी कभी मेरे संपर्क में आ
- 32:48जाते हैं। परमात्मा के बारे में बताने लग
- 32:54जाते हैं, लेकिन मैं कोई जवाब नहीं देता, मैं सिर्फ इतना कहता
- 33:00हूँ देखो मेरे आगे बकवास मत करो। तो खूब भी तो हो जाते हैं क्रोधित
- 33:08मैं बकवास कर रहा हूँ, भगवान का नाम ले रहा हूँ तो ये नाम मत लो
- 33:12ना मेरे सामने तो फिर मैं तुम परमात्मा के बारे में बात उस दिन
- 33:21करना। बात उस दिन करना लायक भी उस दिन
- 33:27होगे। जीस दिन तुम पानी के एक बूंद या
- 33:33रेत का एक कण पैदा करने के योग्य हो जाओगे।
- 33:37उस दिन भगवान का नाम लेना उससे पहले और इस योग्य तुम कभी नहीं
- 33:44हो। ओके यू कैन इन्वेंट एवरीथिंग बट
- 33:48नॉट क्रिएट, इवन ए सिंगल पार्टिकल।
- 33:55शायद तुम्हें सब पता चल जाए शायद कहता हूँ लगेगा तो नहीं, लेकिन
- 34:03तुम कभी भी। कुछ पैदा करने के योग्य कभी भी
- 34:08नहीं होंगे। क्रिएट नहीं कर सकोगे कुछ भी तो
- 34:12मैं कहा करता हूँ जीस दिन तुम क्रिएट करने के योग्य हो जाओ एक
- 34:18रेत का छोटा सा कण भी पानी की एक छोटी सी बूंद भी।
- 34:24जब पानी के दो तत्वों में से एटम में से हाइड्रोजन ऑक्सीजन का एक
- 34:29छोटा सा एटम बनाने के योग हो जाओ, बनाने के योग हो जाओ।
- 34:34उस दिन परमात्मा का नाम लेना, मेरे सामने आके उससे पहले
- 34:38परमात्मा की बात मत करना, यह झूठ है, बकवास है।
- 34:45तुम्हें पता ही नहीं वह क्या है उसके बारे में इतना तो कहा जा
- 34:51सकता है जितना कहा है। रिशू ने बस और वहाँ जाके चुप भी
- 34:57हो गए। रिशू ने यही बातें कही हैं।
- 35:00वो सत्य है, वो चित्त है, वो आनंद है।
- 35:04खत्म सत्य चित आनंद परमात्मा के बारे में इतना ही कहा जा सकता है
- 35:22इससे ज्यादा कहने वाला। उसको मैं तो मूर्ख कहता हूँ, कम
- 35:29से कम बस उसका लक्षण बताया जा सकता है कि जब तुम परमात्मा में
- 35:37प्रविष्ट हो जाओगे, मिल जाओगे। या परमात्मा के करीब हो के आनंद
- 35:44घना हो जायेगा जिससे तुम सुख कहते हो, इतना हो जायेगा कि तुम्हारी
- 35:53आँखें तंदरा जैसी हो जाएँगी, तुम्हारी वाणी लड़खड़ाने लग
- 36:00जायेगी। एक पांव तो उधर रखोगे पड़ेगा।
- 36:03उधर शराबियों की तरह यह उस मद मस्ती का लक्षण है।
- 36:14लेकिन परमात्मा क्या है इसके बारे में बात मत करना।
- 36:19परमात्मा के बारे में बात करोगे, वह क्या है?
- 36:23इसके अलावा उसके लक्षण क्या हैं? ये तो ठीक है लेकिन वह क्या है?
- 36:31तो तुम लोगों का मूड बना रहे हो, उसके बारे में कुछ नहीं बताया जा
- 36:35सकता। पर व्यक्ति कितना भी खोज कर रहा,
- 36:44मेरी इन बातों को रिकॉर्ड में रहेंगी भी रखना भी।
- 36:50व्यक्ति कभी भी इतना सामर्थ्यवान नहीं होगा।
- 36:54कि रेत का एक पार्टिकल बना सके, एक कण बना सके, पानी की एक बूंद
- 36:58बना सके, इन बेंट सब कुछ कर लेगा, खोज लेगा सब कुछ कर्मों की ये
- 37:12अनूठी परंपरा। कोई दंडाधिकारी यहाँ है ही नहीं।
- 37:22ये ज्योतिषी जी महाराज धुंड मुंडा कई बार आ जाते हैं।
- 37:27न्याय के देवता आगे न्याय करेंगे। शनि तुम बड़ा हस्ता।
- 37:41ऐसी मूड बातें कहीं और जाके किया करो मेरे सामने तुम्हारी ये वकवास
- 37:48चलने वाली है जो जानता है वह मानता नहीं।
- 37:58वह मानता है तो जानने से मानता है तुम सिर्फ मानते हो शनि की साढ़े
- 38:05साथी आ गई यह कुंभ के तीन ग्रह आ गए।
- 38:12यह कुंभ का प्रथम स्नान आ गया। सब बकवास तुम्हें कुछ पता नहीं।
- 38:20और भरे पड़े हैं शस्त्र। तभी मैं कहता हूँ इनको आग लगा दो,
- 38:32जितनी शक्ति तुम यहाँ खपाते हो। अगर वही शक्ति राष्ट्र के उत्थान
- 38:41में पाई जाए या अपने भीतर जाने में खर्च की जाए तो पॉज़िटिव
- 38:51प्रणाम निकलेंगे। ये सारे तुम्हारे काम नेगटिविटी
- 38:56फैलाने के हैं क्योंकि आगे के आगे शाखाएँ बढ़ती जाएंगी, शाखाओं से
- 39:03शाखाएँ निकलती जाएंगी। झूठ की और बुनयाद जब झूठ है तो
- 39:10आगे होगा भी झूठ। फूल पत्तियाँ लगेंगी वो भी झूठ फल
- 39:15फूल लगेंगे वो भी झूठ मर तो उसी दिन जाते देखिये वरदान लेकिन उसकी
- 39:33ही आत्मा ने फैसला किया भीतर जा के अपने कर्मों को देखकर तुम्हें
- 39:39नहीं पता होता। जब व्यक्ति शरीर छोड़ता है तो
- 39:44भीतर अपने सारे गुणा भाग्य कर लेता है, खुद ही अपने कर्मों का
- 39:52लेखा जोखा व्यक्ति करता है। इसे तुम मान ना पोके बेईमान लोग
- 39:57इसे कभी नहीं मान पाते। सिर्फ वो ही मान पाते हैं जो जान
- 40:01जाते हैं, कोई एकाध व्यक्ति जानता है और वो ही मानता है और वो ही
- 40:12आचरण भी वैसा ही करता है। महावीर आचरण नहीं करते।
- 40:19महावीर के भीतर से ये चीज़ प्रकट हुई कि तुम ही हो तुम्हारे कर्मों
- 40:27के फलों को देने वाले अगर कृष्ण कहते हैं तो कृष्ण शब्दों का
- 40:34थोड़ा सा पुट कर देते हैं, जो तुम्हारी ही समझ में आ जाएं।
- 40:38कर मान्य वाधिकार से माँ फलेशु का लोचन फल को मेरे ऊपर छोड़ते हैं
- 40:51क्योंकि वो जानते हैं। अच्छी तरह से प्रत्येक व्यक्ति के
- 40:55वितरिक साक्षी विद्यमान हैं जो सोता नहीं।
- 41:00जिसका दिया कभी भुजता नहीं रौशनी कम ज्यादा होती रहे।
- 41:05प्रत्येक अवस्था में वो साक्षी रहता है।
- 41:09ये शरीर सो जाए, घनी निद्रा में चला जाए, सुशोक्ति में चला जाए या
- 41:17क्रोध की अवस्था में हो, काम की अवस्था में हो, तुम किसी चिंता
- 41:22में डूबे हुए हो, भय की अवस्था में हो, तुम किसी भी अवस्था में
- 41:28हो, एक साक्षी बराबर अडोल बना रहता है, तुम्हें देखता रहता है।
- 41:36और अगर देखता रहता है, तो ही तुम्हें पता चलता है कि तुम कब
- 41:39रहे हो ध्यान से समझना, मेरी बात को गहराई तक जाना और फिर देखना
- 41:47अगर कोई देखने वाला है तो तुम्हें पता चलता है कि कोई काम रहा है।
- 41:56कोई डर रहा है? किसी के भीतर आवेग उठा काम का,
- 42:01क्रोध का, लोभ, मौका, अहंकार का अगर देखने वाला कोई ना होता तो
- 42:10फिर ये रिकॉर्ड भी नहीं होता। कोई है साक्षी कोई है सीसीटीवी
- 42:17जिसके भीतर रिकॉर्ड होता है। अगर तुम साक्षी ना होते तो
- 42:24तुम्हारे कामों को रिकॉर्ड करने वाला कोई भी नहीं होता।
- 42:27फिर ये कहानियों रह जाती हैं। स्वामी प्रेमानंद जी।
- 42:31यहाँ चित्रगुप्त बैठे हैं अरे भाई, एक आदमी को ऊपर दो बंदे बैठा
- 42:37दोगे वो बेचारे की जिंदगी पहले ही नर्क बन गई फिर वो लिखेंगे हिसाब
- 42:44कोई पेंसिल में शाही मुक जाए, कोई उसका मामला खत्म हो जाए, क्या
- 42:51करेगा वो? फिर वो आगे जाकर हिसाब देंगे।
- 42:56कितना दुष्कर प्रक्रिया बनानी पड़ती है।
- 43:01कर्म फिर आगे धर्मराज करेगा, धर्मराज उसका फल देगा।
- 43:09तो मैं कह देता हूँ तुम्हारे दिमाग में फर्क है चुडवो तुम्हारे
- 43:13दिमाग में फर्क है जो व्यवस्था को समझता नहीं अपनी आँखों से जिसने
- 43:22देखा नहीं वो ऐसी ही उल जलूल बातें किया करता है जो जानता है
- 43:31बस। वह तो ये जानता है कि मैं साक्षी
- 43:34हूँ और मेरे द्वारा किए गए प्रत्येक कदम को भीतर मेरा
- 43:40रिकॉर्डर साक्षी बराबर रिकॉर्ड कर रहे हैं।
- 43:47यह सोता है तो इसका सोना भी रिकॉर्ड।
- 43:51यह जागता है तो इसका जागना भी रिकॉर्ड यह स्वप्न देखता है तो
- 43:56इसका स्वप्न देखना भी रिकॉर्ड यह संसार में जागते जागते कोई कर्म
- 44:03करता है तो वह भी रिकॉर्ड यह पुण्य करता है।
- 44:07वह भी रिकॉर्ड या पाप करता है, वह भी रिकॉर्ड।
- 44:11हर चीज़ रिकॉर्ड होती है इसलिए एक शब्द दिल का है देना होगा दिल दिल
- 44:22का लेखा देखने वालों ने देखकर कहा।
- 44:36तुम सिर्फ दो ही को देख लेते हो भीतर जलती हुई आग को नहीं देखते
- 44:50हैं। और उस उठते हुए धुएं से अंदाज लगा
- 44:55लेते हो कि यहाँ आग होगी, लेकिन अंदाजे कभी सत्य नहीं हुआ करते।
- 45:02अंदाजे गलत भी हो जाते हैं। देखने वालों ने देखा।
- 45:12है धुआँ देखने वालों ने देखा है धुमा किसने देखा दिल मेरा?
- 45:31जलता हुआ कल चमन था आज इक सेहरा हुआ देखते ही देखते।
- 45:49ये क्या हुआ? कल चमन था तो भी हम अपने भीतर गए
- 46:00और ये जो शब्द कहे गए जहाँ डूबते हैं जा को मैं दारूण दुख दे हूँ
- 46:07ताकि मत पहले। मती हरी जाती है।
- 46:13खुद के शरीर को कष्ट देना था। 58 दिन तक कैसे छोड़ देते हैं?
- 46:18देखिए सब है तुम तो कहोगे बुद्धि से काम नहीं लिया नहीं बुद्धि वह
- 46:25काम करती नहीं। काम का खाक लगाव है, बुद्धि वहाँ
- 46:30जाकर थक जाती है, हथियार डाल देती है।
- 46:34उससे बहुत पहले जब उसका क्षेत्र शुरू होता है, उससे बहुत पहले
- 46:40बुद्धि हथियार छोड़ देती है। भीष्म ने इतने प्राप्त किए थे।
- 46:48ग्रीष्म के सिवा कोई नहीं जानता था।
- 46:52इसलिए सबसे ज्यादा सजा ग्रीष्म को मिले।
- 46:57तुम्हारी नग्न आँखें कई बार सत्य को निहार नहीं पाती।
- 47:01कई बार नहीं अक्सर निहार नहीं पाती।
- 47:07क्योंकि सत्य थोड़ा सा अदृश्य रहता है।
- 47:12भीष्म ने क्या किया यह तुम्हें मालूम नहीं तुम्हें तो दिखने का
- 47:16कि राष्ट्र के लिए बलिदान किया, बच्चों को जन्म नहीं दिया, उसका
- 47:22खुद का कोई लोभ नहीं था। सिंहासन को त्याग दिया बल्कि
- 47:30सिंहासन की रखवाली की, बाहर के दुश्मनों से बचाव किया, सब
- 47:37योजनाएं बनाईं, बुद्धिमान था, बलशाली था।
- 47:44और इसी बुद्धि और बल के सहारे उसने प्राप्त कर दी हैं।
- 47:49इस में तुम्हें बुद्धि दी है, बल दी है।
- 47:53इसका मतलब यह नहीं कि तुम दूसरों के ऊपर तानाशाही थोपो दूसरों की
- 48:00बहन बेटियों को। अपहेत करके ले जाओ, ये गुंडा
- 48:06गर्दी नहीं है, तुम ऐसे व्यक्ति को वीर कह सकते हो, मैं तो गुंडा
- 48:14कहता हूँ तुम्हारी ये अपनी अपनी। व्याख्याएं लेकिन मेरी व्याख्याता
- 48:26जी है जो किसी को उसकी इच्छा के विपरीत जीने देता है या बाध्य
- 48:37करता है, वह डिक्टेटर है और डिक्टेटर गुंडा होता है।
- 48:49महावीर ने भगवान महावीर ने एक बड़ा सुन्दर शब्द कहा है, मानवता
- 48:55को जीवन का सुंदर से सुंदर सबक सिखाने वाला महावीर वर्धमान इन
- 49:06शब्दों को अपने हृदय पर लिख लेना। बड़े कीमती शब्द हैं, बहुत बार
- 49:11सुने होंगे, भीतर उतरे न होंगे, वह शब्द हैं जियो और जी ने दो।
- 49:28तुम अपनी शक्तियां को दूसरों के जीने में बाधा बनने के लिए प्रयोग
- 49:32न करो। साधक बनने के लिए प्रयोग करो तो
- 49:42शुभ कोई गिरा पड़ा उसको अपनी शक्ति से उठा दो।
- 49:48और तुम अपनी शक्ति से किसी की बहन बेटियों को अर्पित भी कर सकते हो।
- 49:52बेशभता मैंने यही किया बाहर से देखने में बड़ा त्यागी लगता है।
- 50:00ये व्यक्ति लेकिन परिणाम बता देता है।
- 50:07किसने किया क्या? था।
- 50:17इस विराट सृष्टि का मालिक कोई अंडू खंडूनाथ नहीं है ये समझ लेना
- 50:28मैं तुम्हें एक बात कही कि जीस दिन एक ज़रा बनाने के योग्य कोई
- 50:32हो जाए। उस दिन भगवान का नाम ले उस दिन वो
- 50:37योग्य होता है। उस दिन उसमें थोड़ी सी प्रतिभा
- 50:42आती है कि भगवान का नाम ले उससे पहले तो अगर कोई कहे के भगवान
- 50:48नहीं है तो वो ठीक कहता है। वो योग्य भी नहीं है भगवान का नाम
- 50:53लेने का यहाँ आचार्यगण ढिंढोरा बोल रहा है, एनलाइटनमेंट होती
- 51:01नहीं और एनलाइटन व्यक्तियों के वज़न खाते हैं।
- 51:07एलाइटन्ड सिद्ध पुरुषों के संत पुरुषों के व्याख्याएं बदलती हैं,
- 51:11भाषाएं बदलती हैं, परिभाषाएं बदलती हैं क्योंकि कॉम्पिटिटर
- 51:17दिमाग है और दिमाग से हर चीज़ को सर्व करना चाहते हैं।
- 51:22और मेहनत में पहले ही कहा कि जीवन गणित नहीं है।
- 51:27जो बुद्धि से हल किया जा सके। इसलिए संत कहता है अगर जीवन को
- 51:32देखना है, जीवन को जानना है, जीवन को छूना है तो बुद्धि को एक तरफ
- 51:38रखना हो। जैसे हम मंदिर में जाने से पहले
- 51:42जूतियों को जोड़ी के बाहर निकाल कर आते हैं।
- 51:47ऐसे ही उस अपने भीतर के मंदिर में प्रवेश करने से पहले बुद्धिरों की
- 51:52जूतियों को बाहर निकाल दो। एक तरफ रख लो, यह बाधा बनेगी।
- 52:02फिर क्या हम बुद्धिहीन हो के जाए? नहीं बुद्धि शून्य हो के जाओ।
- 52:09बुद्धि से लगाव तोड़ दो। जब भीतर जाना हो हम मंदिर में
- 52:17प्रवेश करते हैं, जूतियों को डोरी के बाहर निकाल के आते हैं।
- 52:26जब संसार में वापस जाते हैं, क्या झूतियों को वहीं छोड़ जाते हैं?
- 52:33नहीं ना? जब संसार में जाते हैं तो उन
- 52:36झूतियों को फिर पहन लेते हैं। ओके, संसार में कंकड़ हैं, पत्थर
- 52:40हैं, शिक्षा है। टूटा फूटा पांव में चुभ जाएगा
- 52:45यहाँ जरूरत है बुद्धि की यहाँ जूतियां चाहिए लेकिन मंदिर में
- 52:52जूतियां नहीं चढ़ीं। मुश्किल तब खड़ी होती है और तुम
- 52:58कहते हो हाथ तो कुछ लगाने। बिलकुल नहीं लगेगा क्योंकि अगर
- 53:05तुम जूतियां डाले डाले, मंदिर में प्रवेश करोगे तो गंदगी खिलारोगे
- 53:13बिखरे हो गए और बुद्धि शब्दूषित कर देती है जहाँ जाती है बुद्धि
- 53:21सरल नहीं है। ज़िन्दगी अति शल है जहाँ तुमने
- 53:27जाना है इस दृष्टि से जहाँ तुमने जाना है और बड़ा शल है बुद्धि
- 53:36बड़ी कॉम्प्लिकेटेड है। बाहर के हिसाब से गणित बड़ा शरल
- 53:43है। बुद्धि के लिए जीवन बड़ा जटिल है,
- 53:49जीवन के लिए बुद्धि जटिल है। ये दोनों वॉइस वर्षा है।
- 54:00हस्तिनापुर की रक्षा का वचन लेने वाले भीषण यह भूल जाते हैं कि अगर
- 54:07कोरव हस्तिनापुर के अंग है तो पांडव भी हस्तिनापुर के अंग है।
- 54:16यहाँ पाप हो जाता है लक्शागिरी में।
- 54:23उनको जलाने का षड्यंत्र होता है कुंती समित लेकिन भीष्म कुछ नहीं
- 54:28बोलते। बिदुर को पता होता है बिदुर सबसे
- 54:32पहली खबर भीष्म को देते हैं, इसलिए बिदुर पर हम सुखी रहे आखिर।
- 54:40क्योंकि वह दासी पुत्र थे और उन्होंने सत्य का सहारा लिया।
- 54:46उन्होंने ऐसा कर्म ही नहीं किया लफड़े में पड़ने का कि हम त्याग
- 54:52करेंगे, हम राष्ट्र का निर्माण करेंगे, हम राष्ट्र की रक्षा
- 54:55करेंगे। राष्ट्र की रक्षा तो भाई।
- 54:59ये सैनिक करते हैं। ये हैं जो शहीद दुश्मनों को हमारे
- 55:07क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने देते।
- 55:11तुम तो सिर्फ नाम कमाने वाले हो। तो विषम पिता मैंने ये नहीं सोचा
- 55:25कि कौरव भी इंद्रप्रस्थ हैं और पांडव भी इंद्रप्रस्थ हैं और
- 55:30दोनों की रक्षा का सामूहिक दायित्व मेरे पर है।
- 55:34मैंने वचन लिया है। तो क्या बात है कौरवों के लिए काम
- 55:38क्यों किया? युद्ध की वेला जब आई तो कृष्ण इसी
- 55:45ताक में थे। के भीष्म फैसला लेंगे क्या?
- 55:49क्योंकि भीष्म प्रतिज्ञा वत हैं कि मैं हस्तिनापुर की रक्षा
- 55:55करूँगा। तो हस्तिनापुर की रक्षा का मतलब
- 55:59कोरब और पांडव दोनों हैं। बस यही देखना चाहते थे कृष्ण
- 56:07क्योंकि सब डिपेंड था। भीष्मिता माप है ना?
- 56:11गुरु द्रोण इतने बड़े थे। न ही कोई और योद्धा इतना बलि था
- 56:20इसलिए सबसे ज्यादा युद्ध लड़ा भीष्म ने।
- 56:25वह महारथी गिराने में बड़ा वक्त और शक्ति खराब करनी पड़े।
- 56:32अगर वो एक आदमी हथियार गिरा देता कि नहीं देखो, मैं वचनबद्ध हूँ
- 56:38दोनों के लिए जीस वक्त मैंने रक्षा का अपहरण लिया।
- 56:44उस वक्त कौरव भी थे, मंडप भी थे। तमाम हस्तिनापुर की रक्षा का
- 56:52मैंने वचन दिया था, अब कौरवों के पक्ष में अकेला क्यों खड़ा हो
- 57:00गया? यही देखना चाहते थे कृष्ण जब
- 57:07कृष्ण को बंदी बनाने की घोषणा उस अदने से ध्रुव धन ने की।
- 57:14कि बंदी बना लो इस ग्वाले को अहंकार सदा ही ऐसा करता है,
- 57:19अहंकार सदा ही अपनी औकात कभी नहीं देखता अंकार सदा कहता है कि मैं
- 57:29हूँ जहाँ। वहीं है सब समृद्धि जहाँ मैं नहीं
- 57:34होगा, मुर्गा जहाँ नहीं होगा वह सूरज नहीं निकलेगा क्योंकि मुर्गा
- 57:40भांग नहीं देगा। सूरज निकला कैसे मुर्गे की भांग
- 57:45से निकलता है सूरज उसे पता नहीं के मुर्गे।
- 57:51कि भांग से सूरज नहीं निकलता, सूरज को मुर्गी की भांग से कुछ
- 57:55लेना देना नहीं। सूरज बहरा है, सूरज को सुनाई ही
- 58:01नहीं पड़ता। वह तो अपने वक्त पे उगता है और
- 58:05भक्त पे सूख जाता है, लेकिन मुर्गा जब भ्रम पाल लेता है।
- 58:12मेरे बाँध देने से उगता है सूरज ऐसा ही अहंकारी व्यक्ति होता है,
- 58:19मैं हूँ तो मुमकिन है अहंकारी व्यक्ति परम अहंकारी व्यक्ति का
- 58:25लक्षण है और ऐसे ही व्यक्ति। बख्त के गर्त में बख्त ही छुपा
- 58:35देता है, गिरा देता है कहाँ है नैपोलियन बोना पार्ट जो कहता था
- 58:42इम्पॉसिबल पार्ट इस नॉट फाउंड इन माय डिक्शनरी असंभव शब्द मेरे
- 58:47शब्दकोश में है। कहाँ है वो?
- 58:56अब देखिए क्या हुआ, कैसे फल मिला? भीष्म को जब भीषण अपने भीतर उतरे
- 59:03भीष्म तो सबके सामने प्रकट हो जाता है।
- 59:09क्योंकि जीस स्थल पर जाकर हिसाब होता है वो तल निष्पक्ष है जहाँ
- 59:21लेखा जोखा होता है कर्मों का वहाँ वातावरण निष्पक्षता का होता है।
- 59:29न्यायालय में आपने देखा कितनी निष्पक्षता होती है, कितनी शांति
- 59:34कुतुब हर ज़रा भी नहीं होता, शोर गुर नहीं होता वह क्योंकि फैसला
- 59:40लेने वाला सन्नाटे में बैठा होगा वहाँ कोई शोर शराबा नहीं होना
- 59:46चाहिए। बस ऐसा ही तुम्हारे भीतर है जहाँ
- 59:50जाकर तुम तुम अपने ही जीवन के हिसाब किताब का आकलन करते हो,
- 1:00:01वहाँ परम सन्नाटा है, वहीं से उदगम होता है।
- 1:00:08ये तुम्हारा अनाथ अर्थ वहीं जाकर तुम्हें हिसाब किताब करना होता
- 1:00:13है। कितनी शांति है वहाँ?
- 1:00:18तुम कैसे झूठ बोलोगे? होगा जब परलोक में तेरा हिसाब लोक
- 1:00:36बदल जाता है। जब बाहर लोक है वह अंतर का लोक
- 1:00:42है, वहाँ हिसाब होता है जहाँ परम सन्नाटा है।
- 1:00:48होगा। जब परलोक में तेरा हिसाब कैसे
- 1:01:01मुकरोगे बता दो है जना। जब वही जब वही तेरी निकाली जाएगी
- 1:01:25जब तेरी। डोली निकाली जाएगी।
- 1:01:33बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी। बस यही है गाथा।
- 1:01:47बिछा दो शतरंज की चाल कर लो इकट्ठा दुनिया भर का कूड़ा।
- 1:02:01होगा। जब परलोक मैं तेरा हिसाब कैसे
- 1:02:07मुकरोगे बता दूँ ए जनाब जब तेरी जब बही तेरी निकाली जाएगी उस बही
- 1:02:15को कैसे मुकर सकोगे जनाब तुम साक्षी हो।
- 1:02:20तुम साक्षी हो अपने कर्मों के तुम कैसे मुकरोगे और वहाँ जाकर जहाँ
- 1:02:29मुकरा जा नहीं सकता, वहाँ वातावरण ही ऐसा है, वहाँ जाकर व्यक्ति झूठ
- 1:02:36नहीं बोल सकता। वहाँ जाते हैं भीष्म देखते हैं,
- 1:02:42मैंने क्या कुछ किया प्रतिज्ञा की थी हस्तिनापुर की रक्षा के लिए
- 1:02:48हस्तिनापुर के प्रत्येक जीव जंतु के लिए और इतने कतलोकार का
- 1:02:54जिम्मेवार सिर्फ मैं और सिर्फ मैं हूँ।
- 1:03:01अगर पहले दिन भीष्म कह देते कि मैं नहीं लड़ूंगा किसी की तरफ से
- 1:03:09न कोर बना पांडव मेरे लिए तो पहले पांडव राजा था, अब धराश राजा है।
- 1:03:17मैंने दोनों की रक्षा का वचन दिया।
- 1:03:20मैं पक्षपात नहीं करूँगा, मैं नहीं लड़ूंगा और वैसे भी भी ओवरध
- 1:03:26हूँ, सबसे बुजुर्ग हूँ सब का रखवाला हूँ।
- 1:03:33उम्र का भी तकाजा है। औहदे का भी तकाजा है और प्रतिवाद
- 1:03:38भी हूँ मैं अपने वचनों में इसलिए न कौरव की तरफ से न पांडव की तरफ
- 1:03:45से मैं नहीं लड़ूंगा कि तुम्हारा क्या ख्याल है?
- 1:03:50गुरु द्रोण के बल के ऊपर और अश्वथम के बल के ऊपर दुर्योधन यह
- 1:03:57दुरंत कर सकता था कि शंखनाद कर दे, नहीं शंखनाद किया भीष्म पिता
- 1:04:05मैंने किया, उसने सब काम भीष्म से करवाए।
- 1:04:12फंस गया बेचारा भीषण, इसलिए तुम्हें शिक्षा देखो तुम्हारा
- 1:04:21राजा अगर तुमसे गलत काम करवाता है, देना तुम्हें पड़ेगा।
- 1:04:32राजा के रुतबे का डर मत मानना डर मानना अपने कामों के लेखे जोखे का
- 1:04:40हिसाब तुम्हें देना पड़ेगा। राजा खिसके जाएगा राजा के पास सब
- 1:04:53कुछ है। लेकिन कैसे मुकरोगे वहाँ पर ए
- 1:05:02जनाब जब वही तेरी निकाली जाएगी, तुम नहीं मुकर सकते वहाँ जाकर
- 1:05:10बिल्कुल नहीं मुकर सकते। प्रतिज्ञा ली थी।
- 1:05:15अपने बाप के लिए इसको ज्यादा तूल या रबड़ की तरह खींचने की
- 1:05:24आवश्यकता नहीं थी। बस यहीं गलती खा गए।
- 1:05:29भीषण। तुमने पूछा सबसे बड़ी सजा भीष्म
- 1:05:32को क्यों? कारण ही भीष्म है भीष्म को निकाल
- 1:05:36दो इस सारी महाभारत में से भीष्म को निकाल दो युद्ध नहीं होगा फिर
- 1:05:44कृष्ण भी नहीं आएँगे भीष्म को। भीष्म को न्यूट्रालाइज़ करने के
- 1:05:53लिए कृष्ण को आना पड़ा क्योंकि महारथी है, आत्म ज्ञानी है, कुछ
- 1:06:06थोड़े से लोग आत्मज्ञानी थे। महाभारत में वेदव्यवस्था, जो संजय
- 1:06:16को दिव्यदृष्टि तक है विश्व और पिता के कृपा जा रहे थे।
- 1:06:23कुछ थोड़े से लोग थे जो प्रबुद्ध थे।
- 1:06:28वो जानते थे बिदुर बिदुर से इसीलिए तो कृष्ण की पटी विदुर के
- 1:06:38साथ कृष्ण ने दुर्योधन के मेवे त्याग दिए, बिदुर के घर का साग खा
- 1:06:44लिया। उसके साथ तरंगे जगती थी।
- 1:06:51ध्रुव धन के पास तो बैठने से आसानी और लासानी तरंगे आपस में
- 1:06:55बढ़ते थे। वो तो एक सभागार में बैठ भी नहीं
- 1:06:58सकते थे। अहंकार सदा ही चेष्टा करता है।
- 1:07:07कि जीस सभागार में कृष्ण बैठे, वहाँ मैं भी बैठूं और दुर्योधन
- 1:07:12सभी जगह मौजूद रहा। मुँह के खा के आना पड़ा।
- 1:07:16शिशु पाल के वक्त भी वो था लेकिन जब कृष्ण ने उसकी गर्दन काट दी पर
- 1:07:25दुर्योधन के पास तो। रथ तैयार होते हैं।
- 1:07:29भागने के लिए दुर्योधन 1 मिनट नहीं रुकते क्योंकि कायर और कायर
- 1:07:36की परभाषा मेरी सुन लो जो मृत्यु से डरता वो कायर है जो अपने साथ
- 1:07:44फौज लेके चलता। साथ साथ दीवारों के साथ बेकार जो
- 1:07:51अपने सुरक्षा कवच के घेरे में चलता वो कार तो अकेले चला करते
- 1:07:59हैं। शेरों की तरह शेरों ने कभी
- 1:08:02सुरक्षा बंदोबस्त किया। मर भी जाएगा तो क्या है?
- 1:08:08मरना तो 1 दिन है। वैसे भी जनाब तुम कहीं छिप जाना
- 1:08:22मृत्यु ऐसी शानदार श है। वह तुम्हें सात प्रकोटों के भीतर
- 1:08:28से भी ढूंढ लेगी। अभी मैंने सुना वैज्ञानिक ने एक
- 1:08:32कपड़ा तैयार किया कि उसके भीतर पड़ी हुई चीज़ दिखाई नहीं देती,
- 1:08:37लेकिन मृत्यु को दिख जाएगी तुम लाख उड़े फिर हो वह देख लेगी तुम
- 1:08:44कहाँ से? जय ईश्वर की सृष्टि का विधान बड़ा
- 1:08:48गजब का है। बेश्म को क्यों मिला दंडा?
- 1:08:58क्योंकि तुम्हारी सारी व्याख्याएं गलत हैं, तुम दूसरों को
- 1:09:04न्यायाधीशों की तरह। दंडाधिकारी समझते हो जबकि दूसरे
- 1:09:08दंडाधिकारी नहीं हैं। तुम ही हो दंडाधिकारी स्वयं के
- 1:09:13कर्मों का कैसे मुकरोगे जनाब, दूसरा तो फैसला सुना सकता है
- 1:09:21न्याय नहीं कर सकता इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ।
- 1:09:24तुम्हारे न्यायालयों में फैसले होते हैं, न्याय नहीं होता
- 1:09:30क्योंकि जिसके बलबूते पर न्यायाधीश फैसला लेता है वो होते
- 1:09:35हैं। गवाह या सबूत और गवाह खरीदे भी जा
- 1:09:39सकते हैं। मुकराये भी जा सकते हैं।
- 1:09:42गोहा मारे भी जा सकते हैं। गोहा का वजूद भी खत्म किया जा
- 1:09:47सकता है। गोहा डराए भी जा सकते हैं।
- 1:09:50गोहा गलत है लेकिन तुम्हारे पास और कोई तरीका भी नहीं है, लेकिन
- 1:09:56परमात्मा के पास तो बड़ा शानदार तरीका है।
- 1:10:01और उसका तरीका कभी फेल नहीं होगा। उसका तरीका सदा कामयाब दंडाधिकारी
- 1:10:12तुम ही तुम्हारे ही कर्मों के यह समझ लेना बात को।
- 1:10:18होगा जब पर रोक में तेरा हिसाब कौन करेगा तू ही करेगा कैसे
- 1:10:24मुकरोगे बता दो एस जनाब जब वही तेरी निकाली जाएगी तुम ही खोलोगे
- 1:10:32तुम्हारे ही कंप्यूटर को खोलोगे तुमने ही देखे हैं सभी कर्म।
- 1:10:38तुम मुकर नहीं सकते हैं। तुम साक्षी हो, साक्षी कैसे मुकर
- 1:10:41सकता है? वह खरीदा नहीं जाता, वह बिकता
- 1:10:47नहीं, वह लोभ नहीं खाता। इसलिए तो बाबा ने कहा, निरपो
- 1:10:52निर्वैर अकाल मूरत। अजूनी सैपम गुर प्रसाद भाई न
- 1:11:00डराया जा सकता है यह माटी का पुतला डराया जा सकता है यह माटी
- 1:11:06का पुतला लोभ दिखाई जा सकता है, खरीदा जा सकता है खरीद लो पहले
- 1:11:12दिन दर्द दिखा दो। इतना घपला किया है अभी तुमने और
- 1:11:17चक्की पीसिंग पीसिंग अगले दिन बहुत तुम्हारे पास आ जाओ, ऐसा
- 1:11:25सीधी सी बिसात है राजनीतिज्ञ लेकिन एक बात तुम्हें बताता हूँ।
- 1:11:33लाख तरले, मार कर तुम राज़ कर लो, बात राज़ की कहाँ है?
- 1:11:46बात तृप्ति की है वह जो एक झोपड़े में बैठा हुआ वकील एक पल में
- 1:11:54तृप्ति का आनंद ले लेता है? जनाब तुम हज़ारों साल राज़ करके
- 1:11:58नहीं ले सकते। उतना आनंद एक पल के भीतर टूटे हुए
- 1:12:08झोपड़े के भीतर बैठा हुआ वो अलमस्त फकीर एक पल में जितना आनंद
- 1:12:14और लुत्फ उठा लेता है। तुम हजारों सालों के राज़ के बाद
- 1:12:20उसका तुलनता ही सकल मिली, जो सुख लव सत्संग तुम्हें उसके एक क्षण
- 1:12:30का लखनाश भी नहीं मिलेगा। कितना ही राज़ करो कर लो।
- 1:12:36कौन रोकता है संत तुम्हें सिर्फ राह बता सकता है संत तुम्हारी
- 1:12:49बांह पकड़ के खींचेगा संत इतना? हिंसक नहीं है।
- 1:13:00संत इतना अहिंसक है कि तुम्हें मार्ग बताएगा।
- 1:13:03देखो आगे क्यों है, डूबना है, डूब जाओ नहीं, डूबना रुक जाओ।
- 1:13:14मर्जी तुम्हारी, लेकिन आगे कुआं जीस सीद मैं तुम जा रहे हो अंधे
- 1:13:20हो, मुझे पता है हाथ में लठिया है, लेकिन मैं आँखों से देखता हूँ
- 1:13:29सामने कुआं है। जीस स्ट्रेट लाइन में तुम चल रहे
- 1:13:33हो और तुम गिरोगे कुंए में गिरोगे डूबना है डूब जाओ रुकना है रुक
- 1:13:42जाओ मर्जी तुम्हारी बताना मेरा काम मार्गदर्शन करना संतो का काम।
- 1:13:57और ये मार्गदर्शन ही तुम्हारे लिए वरदान बन जाएगा क्योंकि अगर मार्ग
- 1:14:04से ही पकड़ लिया तुमने तो चल तो तुम लोगे ही चल न कोई मुश्किल
- 1:14:10नहीं। गलत रास्तों पर भी दुनिया चलती
- 1:14:15है। सही रास्तों पर भी दुनिया चलती
- 1:14:17है। अगर तुम्हें मार्गदर्शन से ही मिल
- 1:14:22जाए तो तुम्हारी बहुत मशक्कत और शक्ति बची जाएगी।
- 1:14:27और तुम वो आनंद जो लाखों सालों बाद प्राकृतिक रूप से पथ वो अभी
- 1:14:33अभी। अभी इसी घड़ी पर हो गया बहुत
- 1:14:40मुश्किल है ये जनाब इतना तुम समझती हो कि इतनी बिसात क्यों?
- 1:14:50इतनी माथा खपाई क्यों बेवजह? कुछ नहीं निकलेगा, लेकिन संत
- 1:15:01तुम्हें करने से रोता नहीं। संत कहता है तुम जो कर रहे हो
- 1:15:09करो, तुम्हें आनंद आता होगा। लेकिन अब आनंद आता है करने में
- 1:15:21आनंद आता है कर्म होगा जब पर रोक मैं तेरा हिसाब और तुम खुद ही
- 1:15:29करोगे हिसाब विषम खुद ही हिसाब करता है।
- 1:15:35और भीष्म के पाप इतने ज्यादा थे कि वरदान होते हुए भी पहले दिन वो
- 1:15:41शरीर छोड़ सकता था लेकिन उसने छोड़ा नहीं।
- 1:15:44क्यों जा को मैं दारूण दुख दे ही ताकि मत पहले घर हो उसकी मत ही
- 1:15:51हरली। नहीं हम तो मकर संक्रांति के बाद
- 1:15:57ज़रा सूर्य उत्तरायण में आ जाए, वो काल की वेला जानबूझकर लेट कर
- 1:16:08दी गई। प्रकृति तुम्हारा विवेकहरण कर
- 1:16:13लेती है। अगर तुम्हें दुःख देना होता है
- 1:16:16बाद में तुम सोचते हो क्या है कोई उत्तरायण के अंदर और लोगों ने तो
- 1:16:23पकड़ लिया ऐसे उत्तरायण के अंदर सूर्य आ जाए तो क्या बदल जाता है
- 1:16:29तुमने कुछ बदला देखा? अभी कल ही उत्तरायण में आया
- 1:16:33सूर्य। 8:55 में कुछ बदला कुछ नहीं बदला
- 1:16:42हर बार आता है, चारों स्थानों पे आता है, लेकिन कुछ बदलता तुमने
- 1:16:51कभी देखा। कुछ नहीं बदलता।
- 1:16:56सिर्फ लोभ ही लोगों की मोज़ लग जाती है, वो भी मौज कहने को होती
- 1:17:03है किसी के साथ ठगी मरना, किसी का धन लूट लेना, किसी को मूर्ख बना
- 1:17:09लेना, वो उसको मौज कहते हो के तुम?
- 1:17:15तुम्हारी परिभाषाएं गलत हैं इसलिए तुम दुखी हो।
- 1:17:22संत लेषमात्र वक्त के लिए भी दुखी नहीं होता।
- 1:17:30तुम उसे दर्द दे सकते हो, ध्यान रखना तुम उसको दर्द दे सकते हो,
- 1:17:36दुख नहीं दे सकते हो। दुखी तो वो कभी होगा ही ना
- 1:17:43क्योंकि वह उस स्थान पर बैठ गया है जहाँ दुख की आँख मंझती नहीं
- 1:17:49जहाँ सुख ही सुख है। आनंद का परम बगीचा सुगंधमान मस्ती
- 1:17:58के खुमारी मदमस्ती खुमार सदा चढ़ा रहता है, आनंद सदा छाया रहता है।
- 1:18:09और तुम उस समुद्र के भीतर अठकेलिया करते हो, लेकिन बात तुम
- 1:18:15पर आत्मा की करते हो और मैंने तुम्हें आज एक शब्द कहा, जीस दिन
- 1:18:20तुम इस जहान का, सृष्टि का एक जर्रा।
- 1:18:24रेत का जिसे तुम घटिया से घटिया समझते हो हम कहते हैं सब मिट्टी
- 1:18:28हो गया मिट्टी का जिसे दूर का एक कण बनाने के योग हो जाओ या पानी
- 1:18:35के एक बूंद का एक आइटम बनाने के योग हो जाओ उस दिन भगवान का नाम
- 1:18:39लेना, उससे पहले लेना। ऐसे ही लोग कह देते हैं कि नहीं
- 1:18:51है परमात्मा मार्कर्स जैसे वह अपनी जगह ठीक है।
- 1:18:57सामाजिक वितरण प्रणाली को ठीक करने की कवायद है।
- 1:19:02वो समझते हैं कि इससे सब ठीक हो जाएगा।
- 1:19:04ठीक वगैरह कुछ नहीं होता। जीसको बना के गए थे मार्क, आज वो
- 1:19:09क्या है? बात तो शांति की होती है।
- 1:19:14आज बम्ब के गोले फट रहे हैं, तुम्हें शांति मिलती है।
- 1:19:24जीसको बना के गए थे, किसके लिए बना के गए थे?
- 1:19:31बस ये भूल जाते हो तुम संत इस चीज़ को पहचानना है।
- 1:19:35जानता है तुम जो भी कर्म करो, उसमें लक्ष्य को तृप्ति का।
- 1:19:42तो तुम कभी डुबोगे नहीं लक्ष्य रखोगे सग्रहण का तो तुम डुबोगे ही
- 1:19:50डुबोगे लक्ष्य रखोगे राज़ करने का तो डूबे हुए ही हो लक्ष्य रखोगे
- 1:19:58तृप्ति का फिर तुम्हें समझा जाए कि तृप्ति को तुम।
- 1:20:03मापदंड बना लेना, तृप्ति के तराजू पे कसना, हर कर्म को जो तृप्ति
- 1:20:10देता हो, वो पुण्य जो तृप्ति न देता हो, आग लगा देता हो भीतर वो
- 1:20:16पाप, ये मेरी परिभाषा याद कर लेना जो कर्म।
- 1:20:22तुम्हें तृप्ति देता है, वह जो तुम्हारा रोवा रोवा तृप्त कर जाता
- 1:20:27है, जो तुम्हारा रोवा रोवा आग लगा देता है, वो पाप इसको एक मपदंड की
- 1:20:35तरह ले लेना, एक तराजू की तरह ले लेना, एक मेज़रमेंट की तरह ले
- 1:20:39लेना। फिर तुम कर्म करना, मौज से करना
- 1:20:45कभी खता नहीं होगा जब परलोक में तेरा ऐसा।
- 1:21:00कैसे? मुकरों के बता दो ए जना जब बहि
- 1:21:12तेरी निकाली। जाएगी जब तेरी डोली निकाली जाएगी
- 1:21:28बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी। जब तेरी श्रीकृष्ण गोविंद हरे
- 1:21:49मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री
- 1:21:58कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:22:12श्री कृष्ण, गोविंद कृष्णा, कृष्णा कृष्णा।
- 1:22:30हरे, हरे, हरे कृष्ण गोविंद हरे। हिनाथ नारा यन वासुदेव श्री कृष्ण
- 1:23:02गोविन्द हरे मोरा। ारी हिनाथ नारा जन वसुदेव कृष्णा।
- 1:23:29हरे हरे श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी नाथ नारायण।
- 1:23:49वासु त वा वितुमात स्वामी सखा हमारे वितुमात स्वामी।
- 1:24:09सखा हमारे, हमारे हमारे हमारे। हेतु मात स्वामी सका।
- 1:24:35हमारे हे नाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोबिंद हरे हरे मुरारी
- 1:24:57मुरारी हिनाथ नारायण वासुदेव। विथ मात स्वामी स्वामी स्वामी
- 1:25:21स्वामी। स्वामी किंतु मात स्वामी सखा
- 1:25:33हमारे अनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:25:44हरे हरे मुरारी ए नाथ नारायण वासुदेव धन्यवाद।