Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Feb 25 - कौन सी चीज तुम्हारी मुक्ति में बाधा बन रही है?तुम एक ही क्षण में मुक्त हो सकते हो! गीता का ज्ञान!
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- 0:22केशव प्रसाद आप अक्सर अपने प्रवचनों में मर जीवड़ा जीवन
- 0:34मुक्त जीते जी मरने। की बात किया करते हैं बाबा ये मर
- 0:45जीवडा है क्या? जीवन मुक्ति का उल्लेख सभी
- 0:51शास्त्रों में आता है। कृपया सरल शब्दों में समझाने का
- 0:58कष्ट करेंगे। केशव प्रसाद बैंगलोर से
- 1:15पिछले दिनों में मैंने इनेरसिया के ऊपर बात की है।
- 1:19इनेरसिया बुद्ध समता की बात करते हैं।
- 1:30बुद्ध कहते हैं मध्य में ठहर जा और कृष्ण कहते हैं कि तू जीवन
- 1:44मुक्त हो जा, सति प्रज्ञ हो जा। सम हो जा समता में ठहर जा आइए
- 2:02इसको समझाने का शुरुआत करता हूँ। आपने पेंडुलम तो देखा होगा
- 2:15पेंडुलम कभी इस छोर पे जाता है, कभी उस छोर पे जाता है फिर इस छोर
- 2:22पे जाता है। लेकिन मध्य में कभी नहीं ठहरता।
- 2:31अगर ये मध्य में ठहर जाए तो बुद्ध की बात बन जाए, मध्य में ठहर जाए।
- 2:43तो बुद्ध जो कहते हैं मध्य में सित्र हो जा कृष्ण जो कहते हैं
- 2:52नागार्जुन जो कहते हैं इनेरश्य, निष्क्रियता, जीवंत निष्क्रियता।
- 3:03एक एक शब्द को बहुत ध्यान से सुनेंगे।
- 3:07ये गहरे प्रवचन है। इनको बड़े आराम से सुनना पड़ता
- 3:14है। कृष्ण कहते हैं स्थिति प्रज्ञोजा।
- 3:26नागार्जुन कहते हैं कि जीवंत नृश्य क्रियाता में उतर जाओ
- 3:34इनरशिया में आइए कृष्ण का पांचवें अध्याय का उन्नीसवाँ श्लोक लेते
- 3:48हैं। जिसका मन समदृष्टि में स्थित हो
- 3:58जाता है वे इसी जीवन में जन्म और मन के चक्कर से मुक्ति पा लेते
- 4:06हैं। संक्षेप की व्याख्या बड़ी सुन्दर
- 4:13वृक्षा जिसका मन समदृष्टि में स्थित हो जाता है।
- 4:25वह जीवन मुक्त हो जाता है समदृष्टि क्या है तुम जब अंत में
- 4:43जाओगे तो अंतिम छोर पर समदृष्टि हो जाती हो।
- 4:52प्रीत न जाको बैर न जाको हर्ष न जाको शोक न जाको न प्रीत न बैर, न
- 5:05शोक, न हर्ष, न जीत न हर। कुछ नहीं रहता जहाँ जाकर जहाँ
- 5:17जाकर सिर्फ मौजूदगी रह जाती है, ओनली एक्सिस्टेंस से मौजूदगी
- 5:25अस्तित्व रह जाता है। ना प्रीत रहती है, ना द्वेष रहता
- 5:33है, ना हर्ष रहता है ना शोक रहता है।
- 5:37इसलिए कृष्ण ने कहा सब द्वैतों से पार हो जा, दुई को छोड़ दे,
- 5:44अद्वैत हो जा। दुई में मत भटकाव दुई भटकाव है।
- 5:57बाबा नानक ने कहा, एक उन्कार एक में ठहर जा अंकार क्या?
- 6:09मुँह से नहीं जपना है ओंकार ओंकार का जप करने वाले अभी समझे नहीं यह
- 6:22शुरुआती दौर में हैं। अभी कायदा पढ़ रहे हैं अन्नार।
- 6:29ये आम अभी समझे नहीं ये ओंकार की धुन हमें क्या बताती है वहाँ चला
- 6:41जा जहाँ इस ओंकार की ध्वनि। से वातावरण गुंजायमान है।
- 6:51जहाँ बरस रहा है वो अमृत जहाँ आनंद की धारा प्रतिक्षण बरसती ही
- 7:04जाती है, वहाँ चला जा। अगर तू सम हो गया ना हर्ष में खुश
- 7:22हुआ नाचा ना शोक में दुखी हुआ, गमगीन हुआ ना हार गया तो विश्वास
- 7:33आया। ना जीत गया तो प्रसन्न हुआ।
- 7:39गरीब हो गया तो निराश नहीं हुआ। अमीर हो गया तो छाती जुड़ी नहीं
- 7:46हुई। इसी को सम कहते हैं।
- 7:59दो दुइयों के बीच में खड़े हो जाना ना इधर ना उधर तुम्हारे मन
- 8:08का पैंडुलम ना इस छोर जाए ना उस छोर जाए किसी अति पे ना जाए।
- 8:19एक शब्द कहा था हमारे रिशों ने एक्सेस ऑफ़ एव्रीथिंग इस बैड अति
- 8:27सर्वत्र वर्जित अति एक्सेस ऑफ़ एव्रीथिंग इस बैड।
- 8:38इसका यही मतलब था शम हो जाओ, अगर तुम चलोगे तो एक तरफ की अति
- 8:47करोगे। फिर वहाँ से तुम दूसरी तरफ खेती
- 8:53करोगे और तुम घूमते ही रहोगे। इसी को संसार चक्र कहते हैं।
- 8:58घूमते ही रहने का नाम संसार है। ठहरने का नाम मोक्ष है।
- 9:12जब ठहर गए तब पा जाओगे। जब तक चलते रहे, तब तक भटकते
- 9:20रहोगे। इसलिए मैं अक्सर एक नारा देता
- 9:24हूँ, मुझे पूछ लेते हैं बाबा आप कहते हैं आराम करो, हराम मिल
- 9:29जाएगा। लोग कहते हैं राम राम जपो तो राम
- 9:33मिल जाएगा, बिलकुल उल्टा गणित है नहीं, उल्टे वो हैं, दौड़ाते हैं,
- 9:43आपको मैं तो ठहराता हूँ। मैं कहता हूँ आराम बड़ी चीज़ है,
- 9:54आराम करो, आराम से राम मिलेगा। जीसको भी मिला, आराम से मिला
- 10:03भागने से नहीं मिला। आराम से राम की ओर जहाँ सब
- 10:22कोशिशों व्यर्थ लगती हैं जहाँ सभी परिश्रम।
- 10:29व्यर्थ लगने लगे। ध्यान से समझे न सौतों को जहाँ
- 10:35सभी भोग व्यर्थ लगने लगे, जहाँ सभी परिश्रम घुस पाने के व्यर्थ
- 10:44हो जाएं, हाथ कुछ न आए। भोगों को भोगने के बाद 29 वर्ष की
- 10:55आयु में गौतम बुध होने के लिए घर से निकल पड़ते हैं।
- 11:05महावीर? वर्धमान महावीर होने के लिए घर से
- 11:11निकल पड़ते हैं। अब ये दोनों राजा हैं और हमारा
- 11:19इतिहास। आपको जानकर हैरानी हो के।
- 11:30राजा फकीर हो गए इससे भरा पड़ा है।
- 11:36यह क्या बताता है? यह सांकेतिक भाषा किस तरफ इंगित
- 11:43कर दिया? गरीब नहीं पहुँच सकता।
- 11:52ध्यान से सबकी न बात का गरीब नहीं पहुँच सकता।
- 12:01फकीर पहुँच जाता है हैरान मत होना।
- 12:08गरीब और फकीर में फर्क है। गरीब के पास धन का अभाव है, लेकिन
- 12:15चाहता है कि मैं धनी हो जाऊं। फकीर के पास धन का अभाव है, लेकिन
- 12:25वह चाहता नहीं कि मैं अमीर हो जाऊं।
- 12:30फकीर चाहता है कि ये तो बड़ी मौज हो गई, मैंने कल भी एक शब्द कहा
- 12:38था कम्बली, सड़ी फकीर दी हस्या ताड़ी मार।
- 12:47चंगा ये भी रह गया मोटे हाथों पर फकीर की कंबली थी, वो जल गई और
- 12:58ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। कहता चलो ये भी अच्छा हुआ।
- 13:04ये भी कान्धों पर बाहर था उतर गया कबीर भी कहते हैं गिर गई माला भलो
- 13:19भयो, हरी भी सरो सर से टली भला। तुम कहते हो राम राम करो, कबीर
- 13:27कहते हैं अच्छा हुआ, हरी बिसर गया।
- 13:34ये एक बला थी सर के ऊपर तुम जिसे जाप कहते हो, करते ही रहो।
- 13:42और तेज़ी से दौड़ो, ये दौड़ना तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा।
- 13:47भटक आएगा रोज़ प्रेरित करते हो, रोज़ गुनाह करते हो उसकी किचाई
- 13:57रोज़ कहते हो और ज़ोर से दौड़ो दौड़ना।
- 14:02कभी किसी को पहुंचा नहीं पाया। ठहरना जो भी ठहर गया और वही सूत्र
- 14:09में कहा गया है जो सम हो गया जो समता को उपलब्ध हो गया वो पहुँच
- 14:15गया। जो दौड़ा उसने खो दिया।
- 14:27तुम्हारे गुरु तुम्हें दौड़ते हैं, उनके पास जाना, उनका उपयोग
- 14:35कर लेना, खूब दौड़ना, जितना वो कहे, उससे भी तेज दौड़ें और आखिर
- 14:44में अनुभव पाओगे। औंधे मुँह गिरोगे थक जाओगे, हार
- 14:52जाओगे एनर्जी लेस्नेस में आराम तो नहीं मिलेगा, आराम मिल जाएगा राम
- 15:04को पाना है। आराम के जरिए तो पाया जाता है
- 15:12लेकिन आराम को भोग कर पाया जाता है।
- 15:20आराम मतलब ठहरना राम मतलब आनंद। ठहरने से आनंद मिलता है।
- 15:30दौड़ने से दुख मिलता है। यह दौड़ते हुए लोग हैं, जो
- 15:37ईर्षालु हैं, जो एक दूसरे को गाली देते हैं।
- 15:44लड़ाई झगड़े करते हैं। ये दौड़ते हुए लोग हैं।
- 15:50राजनीति में तुम सब धावक पाओगे। जो तेज दौड़ा वो पहले पहुँच गया
- 16:00जो कछुए के चाल चला। बड़ी देर से पहुंचेगा, जो शम हो
- 16:11गया, शम का अर्थ ठहर गया, जो ठहर गया वो पा गया।
- 16:21जो दौड़ा उसने खो दिया तो मैं सदा कहता हूँ आराम से राम की ओर मेरा
- 16:34सूत्र काम हाथ तोड़ के काम करो। और आराम करो, इतने गहरे से आराम
- 16:50करो कि तुम्हें आराम मिल जाए, अब समझो कि मैं कहता क्यों हूँ कहता
- 16:59क्या हूँ आराम तो तुम भी करते हो। लेकिन जीसको तुम आराम कहते हो और
- 17:08मेरी दृष्टि में वो आराम नहीं है। तुम आराम करते हो, बाहरी बाहरी
- 17:15तल्पे शरीर आराम कर लेता है टिशूज रिपेर हो जाते हैं।
- 17:24लेकिन मन दौड़ता रहता है। तुम बाहरी बाहरी तल पर आराम करते
- 17:31हो, शरीर को ठहरा लेते हो, तुम इसी को आराम कहते हो।
- 17:40और बा मुश्किल कभी कभी है। बहुत से लोग मेरे पास आ जाते हैं
- 17:44बाबा नींद नहीं आती, नींद से मन का आराम मिलता है अगर तुम कोई दवा
- 17:54वा वा खा के आराम दे देते हो मन को।
- 17:58तो वह बहुत गहरे से आराम नहीं होता, वह नैचुरली आराम नहीं होता,
- 18:08आराम होता है जो बच्चा करता है। रात को सोते हुए बच्चे को देखना
- 18:13कब है? वह पूर्ण विश्राम में है।
- 18:21इसलिए कबीर ने कहा अनहद, मैं विश्राम वह जहाँ अन्नदनाद हो रहा
- 18:29है विश्राम तो वहाँ मिलता है तुम बाहर के विश्राम को विश्राम
- 18:36समेटते हो। बाहर से सो जाते हो, तुम्हारा
- 18:41शरीर आराम कर लेता है तुम्हारे टूटे हुए तंतुर बेर हो जाते हैं,
- 18:46तुम्हारे मस्तिष्क के तंतुर बेर हो जाते हैं, लेकिन बेहतरी आराम
- 18:51तुमने कभी जाना ही नहीं किया तो बहुत दूर।
- 18:57ये जो कृष्ण कहते हैं अर्जुन को ये अर्जुन स्थिति प्रज्ञ हो जाओ
- 19:04ये कहते हैं अपनी प्रज्ञा में आराम कर ले और तुम जन्मो जन्मो से
- 19:10आराम नहीं किया, तुम दौड़ ही रह जाओ कहो से दौड़ने चले थे।
- 19:18ये दौड़ बहुत पुरानी है। कहाँ से चले थे दौड़ और दौड़ते
- 19:26दौड़ते दौड़ते आज तक दौड़ रहे? क्या कहते हैं कृष्ण?
- 19:35कृष्ण कहते हैं कि जैसे तू दौड़ता है और जैसे तू आराम करता है वैसे
- 19:42तू जीवन मुक्त नहीं हो पाएगा। तू ठहर और अन्नहद में विश्राम कर।
- 19:52और विश्राम इतना करगहरे में जाके कि तू अपनी प्रज्ञा में स्थित हो
- 19:58जा, अंतः से विश्राम करना ही सच्चा विश्राम है, तू बाहर बाहर
- 20:07से विश्राम करता है, जैसे तुम बाहर बाहर से पंचस्नानी कर।
- 20:15वह स्नानपूर्ण नहीं है कहाँ तुम बहती हुई धारा में घंटों सुबह से
- 20:29शाम। आकंठ डूबे रहो बार बार बोता लगाते
- 20:35रहो गंगा में और मल मल के नहाते रहो कहाँ तो वो नहाना कहाँ पंच
- 20:42शनानी करना पंच शनानी कोई शनानी नहीं होता।
- 20:48वह तो उस वक्त की बात है। जब पानी की कमी थी तो संतो ने
- 20:57पानी को बचाने के लिए पंचशनानी छोड़ दी।
- 21:02चलो ऐसा कर लो, रोम खुल जाएंगे। रोम क्षेत्रों को ही तो खोलना
- 21:07होता है, लेकिन आज। पानी प्रचुर मात्रा में है और
- 21:13जहाँ प्रचुर मात्रा में है, वहाँ तुम भी शिनान नहीं करते।
- 21:17वहाँ भी तुम पांच शिनान नहीं करते हो क्योंकि तुम प्रत्येक चीज़ की
- 21:22गहराई में नहीं जाते कि ये व्यवस्थाएँ बनी क्यों थीं?
- 21:28तुम जब शिनान करो। तो ऐसे स्नान करो जैसे तीर्थ में
- 21:34गंगा के बीच में खड़े हो के तुम पूरे के पूरे आकंठ नहीं, सारे
- 21:40शरीर को डुबो लेते हो और जैसे तुम डुबकी लगाते हो, ये डुबकी नहीं
- 21:45होते हैं, ये तो पंचशनानी ही है। डुबकी लगाओ तो मल मल के नहाओ
- 21:53घंटों नहाओ ये दो चार डुबकियों से बात नहीं बनेगी सुबह से शाम सारा
- 22:02दिन रात बीत जाए सदा दिवाली सात की और आठवीं पैर आनंद।
- 22:10तुम उस आनंद की गंगा में स्नान कर रहे हो जितना स्नान करोगे उतना
- 22:18पीने का मन करेगा। ज्यादा ये वो शराब है जिसकी एक
- 22:24बूँद अगर घटक के लिए। तो प्यास बढ़ेगी।
- 22:29पानी को पीने से प्यास बुझती है। मैं को पीने से प्यास बचेगी,
- 22:36बढ़ेगी फिर कहोगे और मांगोगे और ते दो।
- 22:45और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुपके मैंने पी ही
- 22:58क्या है होश अभी तक है बाकी। और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी
- 23:13कैसे रहूं। चुपके।
- 23:15मैंने पी ही क्या है, होश भी तक है बाकी।
- 23:23और ज़रा सी दे दे साखी, और ज़रा। सी पानी पीने से प्यास बुझती है।
- 23:35मैं पीने से प्यास बढ़ती है इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ।
- 23:42बेखौफ़ कहता हूँ कि तुमने सुख तो बहुत जाना आनंद की तुमने एक बहुत
- 23:49कभी पी वह ऐसी मैं है लगती नहीं छूटती नहीं है का फिर मुँह को लगी
- 24:01हुई। एक बार जैसे तुम प्रेम के शराब पी
- 24:10लेते हो जीसको कभी जीमन में प्रेम हुआ हो, वो मेरी बातों को बखूबी
- 24:17जानेगे। भीतर से जायेंगे।
- 24:21मैं क्या बोल रहा हूँ जीसको जीवन में कभी प्रेम हुआ हो, साधारण
- 24:29प्रेम आदमी को स्त्री से स्त्री को आदमी से वासना नहीं, प्रेम
- 24:35वासना तो तुम सभी को होती है। जीसको जीवन में कभी प्रेम उतरा हो
- 24:43तुम देखोगे, वो प्रेम पीने का मन करता है सदा एक बार प्रेम की
- 24:51प्यास लग गयी। बढ़ते ही जाते हैं, बढ़ती ही जाती
- 24:56है। वो खत्म नहीं होती, वो इंफीनाइट
- 25:00हो जाती है, असीम हो जाती है, बुझती है वो प्रेम की लगी आग
- 25:12बुझती है परमात्मा को पीकड़ इन शब्दों को आप।
- 25:18अपनी झोली में गांठ बांध लेना प्रेम की आग बुझती है परमात्मा को
- 25:25पीकर तुम्हारी भूखें तो खाना खाने से शांत हो जाती हैं, प्रेम की
- 25:34भूख शांत होती है। परमात्मा को खाने से परमात्मा को
- 25:39ही खाना पड़ेगा। पूरा का पूरा तो तुम्हारी भूख
- 25:44मटेगी तो तुम्हारी प्यास बुझेगी अनीता नहीं बुझेगी तुम तड़पते ही
- 25:51फिरोगे कैसे मजनूं रातों रातों रोता है।
- 25:58काली कलूटी लैला के वास्ते कैसे राँझा क्या कुछ नहीं करता है हीर
- 26:06के वास्ते प्रेमी प्रेमिका के लिए और प्रेमिका प्रेमी के लिए सोहनी
- 26:13महिवाल। सोहनी कच्चे घड़े के ऊपर तूफानी
- 26:18रात में बैठ जाती है तो मुझसे मूर्खता कम होता है, प्रेम में
- 26:27बुद्धि नहीं होती, प्रेम बुद्धि को हटा देता है, प्रेम कहते पर हो
- 26:33जाता है। तो मुझे मेरा काम करने दे।
- 26:40तूफान तूफान कभी दीयों को देखता है कि उसकी लोह मेरे चलने से
- 26:49हिलती है या नहीं। वो तो निर्वाद चलता है और तेज गति
- 26:56से चलता है। जीसको प्रेम हुआ वह परमात्मा को
- 27:05पिए बिना शांत नहीं होता और इसी को भक्ति कहते हैं तुमने भक्ति के
- 27:10रूप बड़े अलग दे दिए। लोग मुझे पूछ लेते हैं बाबा भक्ति
- 27:15क्या है? मैंने कहा पहले प्रेम का स्वाद
- 27:19जानो तो प्रेम का स्वाद जानोगे तो भूख लगेंगी प्यास लगे क्या?
- 27:28और वो भूख प्यास बुझेगी परमात्मा को पीने से तुम शरीर के भूख को
- 27:35मिटा ले जाओ, खाना खाने से मिटा लेते हो, पानी पीने से मिटा लेते
- 27:41हो, काम वासना से शांत कर लेते हो, इंद्रियों की भूख है ये।
- 27:47इंद्रियों के भूख तो तुम शांत करना जानते हो दक्ष और सारे दिन
- 27:53तुम जो क्रियाकलाप करते हो, सब इंद्रियों की भूख को शांत करने के
- 28:00लिए करते हो। भीतर की भूख का तुम्हें कोई पता
- 28:02ही नहीं। इसलिए तुम्हारे सारे स्नान बाहर
- 28:07के स्नान हैं। भीतरी स्नान तुमने कभी जाना ही
- 28:11नहीं भीतर का वो रस तुमने कभी पिया ही नहीं, वो रस है, प्रेम का
- 28:18रस मेरा पी लेती है इस रस को। और बिरहा में भटकती है, तड़पती है
- 28:31जैसे मछली लोग कहते हैं इसको क्या रोग लग गया है?
- 28:43दिखता तो कोई है नहीं, महारणी है। सब है इसके पास, लेकिन फिर क्यों
- 28:50तड़पती है तुम्हारी बुद्धि में कभी ये बातें कभी समझ नहीं आई
- 28:56क्यूँ बुद्ध निकल गए भरे राज़ दरबार को, हीरे द्वारतों को
- 29:03तख्तों, ताज को छोड़ के? पुत्र पत्नी को छोड़ के क्यों
- 29:09निकल गए? वो तो तुम्हें समझ नहीं आएगा।
- 29:13तुम्हें समझ नहीं आएगा कि महारानी मीरा जो सब है वो किसके भी राह
- 29:23में रो रही है। किसके भ्रह में तड़प रही है?
- 29:31कायल की गति घायल जाने घायल की गति घायल जान।
- 29:46या जिन घायल हो, हेरी में तो प्रेम दीवानी।
- 30:04मेरोदर्द न जाने को तेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरोदर्द न।
- 30:24जाने को। घायल की गति घायल जाने या जिन
- 30:32घायल हुए तुम भक्ति को पूछते हो खोपड़ी से और भक्ति वो।
- 30:41जहाँ खोपड़ी को परे रख देना होता है, खोपड़ी को परे रखना अनिवार्य
- 30:48शर्त है, फिर भक्ति की शुरूआत होती है प्रथम चरण तुम समझना
- 30:56चाहते हो खोपड़ी से। इसलिए संत कहते हैं क्षमा करो, यह
- 31:04खोपड़ी से समझने की चीज़ नहीं। खोपड़ी को उतार के यहाँ आ जाओ तो
- 31:12भक्ति समझ में ना जाए जो शीष तली पे धर न सके।
- 31:20वह प्रेम गली में आए। क्यों तुम प्रथम अनिवार्य
- 31:28क्वालिफिकेशन ही नहीं पूरी कर पाते और ढूंढ़ते हो चरम परम अखंड?
- 31:40विशाल विराट अनवार्य शर्त पूरी नहीं करते।
- 31:46अनिवार्य शर्त क्या है? बुद्धि को हटा देना बुद्धि
- 31:52गणितज्ञ है गणितज्ञ कभी नहीं पहुँच सकता।
- 32:00अगर अल्बर्ट आइंस्टीन कहे कि मैं परमात्मा को पहुंचाऊं तो मुश्किल
- 32:05नहीं इम्पॉसिबल है और संभव मैथमेटिशियन अगर कहे कि मैं पहुँच
- 32:13ही जाऊं, परमात्मा नहीं पहुंचेगा। क्योंकि परमात्मा तो ऐसा कि
- 32:21बुद्धि को कमा दे, बुद्धि से पार हो जाए परमात्मा तो ऐसा जैसा
- 32:27उपनिषद कहता है कि 100 में से 100 को निकाल लो और 100 ही बाकी बच
- 32:31जाए, लेकिन तुम्हारा मैथमैटिशन का ये कर रहा हूँ।
- 32:36इट फ्रॉम 100 में से 100 निकाल दो पूर्णश्य अपूर्ण मदाएँ पूर्ण
- 32:43मेवा। बशीर क्षते तो शून्य बजता है
- 32:48लेकिन ऋषि कहेगा नहीं 100 ही बच जायेगा भाग्यती।
- 32:54अंततः तुम्हें इनर्शिया में ले जाती है इनर्शिया में तुम जीवंत
- 33:00तो होते हो, लेकिन परम ठहराव होता है, उसे ही जीवन मुक्त कहते हैं।
- 33:10तुम जीते हो मृदा नहीं होते। परम ठहराव तो मुर्दे में भी होता
- 33:15है और परम ठहराव इनरशिया में भक्त में भी होता है।
- 33:21दोनों में फिर फर्क क्या है? भक्त जीवंत होता है और मुर्दा मृत
- 33:29होता है ये फर्क है। जो जीते जी आनंद से भर जाए शरीर,
- 33:38उसका मृत और आत्मा, उसकी जागृत शरीर मृत आत्मा जागृत मैंने
- 33:49तुम्हें कहा कि तुम विश्राम नहीं कर पाते।
- 33:52तुम विश्राम करते हो, सिर्फ शरीर का विश्राम करते हो या ज्यादा से
- 33:57ज्यादा मन का विश्राम कर लेते हो, वो भी थोड़ा सा लेकिन असली
- 34:05विश्राम तुम का नहीं सके अगर विश्राम की कला तुमने सीख ली
- 34:10होती। तो इन भटकाने वाले भगवाने वाले
- 34:17दौड़ लगवाने वाले गुरुओं के पास कभी न जाते तो में इतनी बुद्धि
- 34:22अभिषेक नहीं हूँ कि तुम समझ जाओ के भागने से परमात्मा नहीं मिलता।
- 34:28मैंने कितनी बार कहा? संतो ने कितनी बार बोला के दौड़ने
- 34:35से नहीं मिलता वो ठहरने से मिलता है इनर्शिया परम ठहराव का नाम है,
- 34:44लेकिन मुर्दा नहीं। जीवंत परम ठहराव, ये बातें थोड़ी
- 34:51सी उलट लगेंगी, लेकिन मैं कहता हूँ ये गणित से परे हैं इसलिए उलट
- 34:58लगेंगी। गणित तज्ञ को उलट लगेंगी।
- 35:01100 में से 100 निकाल दो तो 100 कैसे बच सकते हैं?
- 35:06वह सारी उम्र मगज खपाई करता रहेगा और आखिर में उस किताब को फेंक
- 35:13देगा। ये गलत है।
- 35:15इट्स रॉन्ग, ही इज़ ऑन मिस्टिक। वह गलती में है नहीं, ये गणितज्ञ
- 35:23गलती में है। वो आयाम कुछ दूसरा है।
- 35:30परमात्मा का आयाम दूसरा है परमात्मा का आयाम तुम्हारी सोल्डर
- 35:36डी को भंग करके हो जाता है संसार का आयाम तुम्हें सॉलिड टीमें।
- 35:47कन्जेस्ट कर लेता है इसलिए तुमने मूर्तियां बनाई है मूर्ति
- 35:52कन्जेस्टेड है, पक्का है वहीं बैठी रहेंगी, ज़रा भी इधर उधर
- 35:57नहीं करेगी तुम लाख उसको ये लोग फिरते हैं चुन्नियों में।
- 36:05बच्चे से को लपेट लेते हैं लड्डू को पाल को उतना तो कुछ बोलता है
- 36:14बेचारा उसको प्यार करो या चांटा मारो कुछ भी नहीं बोलेंगे एक
- 36:21लड्डू गोपाल की भक्त नहीं मेरे पास आ गया।
- 36:24कहती बाबा मैं रोज़ नहलाती हूँ मगर ठीक एयर कंडीशन में सुझाती
- 36:29हूँ ठीक इसका बिछोना भी बना रखा है ठीक इसका झूलना भी है ठीक है
- 36:39इसको जल भी देती हूँ खाना भी देती हूँ बिलकुल ठीक है।
- 36:45मैं इतनी सेवा करती हूँ लड्डू को, पाल के मैंने कहा वो तो ठीक है
- 36:50लेकिन एक बात बताओ देवी क्या बाबा ये मल मूत्र कहाँ से त्याग करता
- 36:58है? अरे बाबा ऐसी बातें मत करो क्यों?
- 37:01जब खाता है तो मल नहीं त्यागेगा जब पीता है तो मूत्र नहीं
- 37:06त्यागेगा बताओ कहाँ से तागा उसकी आपने क्या व्यवस्था की, कोई
- 37:12टॉयलेट वगैरह। वो तो ये करता ही नहीं बाबा फिर
- 37:16मैं खाता भी नहीं। तुम भ्रांति में हो।
- 37:21तुम भ्रांति में हो कहीं चूक है तुम्हारे बताने वालों में तुम
- 37:29मूर्ख मत बनो। ऐसे मेटल के बाल गोपाल मृत होते
- 37:37हैं। ये तुम्हें जीवन मुक्ति की तरफ
- 37:40नहीं ले जाएंगे। ये तुम्हें जड़ बना देंगे, पूर्ण
- 37:43मृत बना देंगे, ये तुम्हें कब्रों में दफन करने योग्य बना देंगे।
- 37:49ये जीवन तो आप पैदा नहीं करेंगे भगवान कृष्ण का ये सूत्र?
- 37:57जो समता को उपलब्ध हो गया। इस हैब तर्जित सरगोत ये शाम साम्य
- 38:11स्थित मनम। निर्दोषम ही समम्ब्रह्म तस्माद
- 38:20ब्रह्मनी तीर्थ ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
- 38:26वह व्यक्ति ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
- 38:30वह व्यक्ति। जो समता में स्थित हो जाता है।
- 38:37समता का मतलब क्या है? ना इधर ना उधर बीच में ठहर जाना
- 38:46ठहर जाने का मतलब सम। एक सूत्र है बड़ा गहरा सूत्र है,
- 38:58इनर्शिया की बात हुई इसमें आ गई। बुद्ध की समता की बात हुई, इसमें
- 39:03आ गई और समता की बात कृष्ण के भी इसमें आ गई और परम ठहराव की बात
- 39:11जो बाबा करते हैं। वो भी आ गए।
- 39:13इस में। इसमें सारे विज्ञान भैरव तंत्र के
- 39:19सूत्र भी आ गए। क्योंकि कोई सूत्र 112 के 112
- 39:24सूत्र आखिर में दौड़ने पे खत्म नहीं होते।
- 39:30तेरी बात को फिर ठीक से समझ लेना। विज्ञान भैरव तंत्र का कोई भी
- 39:35सूत्र 112 में से 112 दौड़ पे खत्म नहीं होते।
- 39:42ठहराव पे खत्म होते शुरू कहीं से हूँ खत्म होते हैं ठहराव पे।
- 39:52और खत्म होते हैं ठहराव पे तभी ये मंत्र हैं तभी ये तंत्र हैं।
- 40:01अगर वो दौड़ पर ही समाप्त हो जाए तो फिर वो तंत्र नहीं है, वो
- 40:08तुम्हें विश्राम में ले जाएगा, सच्चे विश्राम में ले जाएगा।
- 40:13सच्चा विश्राम बाहर से नहीं अकेला बाहर से नहीं तुम रात को सो जाते
- 40:20हो, शरीर सो जाता है, मन भी सो जाता है, लेकिन तुम वहाँ नहीं
- 40:28पहुँचे। जो उस सोते हुए को जाग कर देखता
- 40:35है, वह है इनर्शिया वह दोनों एक साथ है, वह ठहरा भी हुआ है, कहीं
- 40:46जाता भी हूँ और जीवंत भी है। जिसका मन समदृष्टि में स्थित हो
- 40:59जाता है वे इसी जीवन में जन्म और मन के चक्कर से मुक्ति पा लेते
- 41:05हैं। मुक्ति तुम सभी चाहते हो बंधन कोई
- 41:11भी नहीं चाहता। सभी स्वतंत्रता चाहते हैं।
- 41:17बेड़िया कोई भी नहीं चाहता और कृष्ण उसका सूत्र बताते हैं जो
- 41:26समता को उपलब्ध हो गया वह जीवन मुक्त हो गया।
- 41:35वह इनेरसिया में पहुँच गया इनेरसिया क्या है जो दिन भर रात
- 41:42जगता है एक हमारे वितरित्व है। जो कभी सोता नहीं है, तुम सो जाती
- 41:55हो, तुम थक जाती हो वह कभी थकता नहीं है, तुम्हें आराम की जरूरत
- 42:03पड़ती है, उसे आराम की जरूरत नहीं पड़ती है, वह सदा ही जगता रहता
- 42:10है। बह कौन बह साक्षी साक्षी कभी सोता
- 42:18नहीं हूँ और अगर साक्षी हो जाए साक्षी सो जाए तो सब सो जाए।
- 42:30फिर कुछ नहीं बचा। ये दुनिया जागती है, दुनिया चलती
- 42:38है, चाँद तारे घूमते हैं, ग्रह क्षेत्र अपनी राह बदलते हैं बकरी
- 42:43मार्गी उदयास्त होते हैं अंश बदलते हैं यह सारी सृष्टि।
- 42:50बखूबी नियंत्रित रूप से घूमती है। किसके कारण इसका एक बैस है शक्ष
- 43:03शक्ष जिसे मैंने कल गुरुवाणी के जब की साहब का कहना वह करता भी
- 43:15है, साक्षी भी है, देखता भी है अगर वह साक्षी।
- 43:28अपना साक्षित्व छोड़ दे तो चाँद तारे घूमना बंद हो जाएंगे, पृथ्वी
- 43:37मंगल से टकरा जाएंगे, मंगल नेपचून से टकरा जाएगा, ग्रह एक दूसरे से
- 43:43टकरा जाएंगे और विनाश हो जाएगा। एक तत्व के कारण ये सारी
- 43:50सृष्टिकड़ी है, अवलंबित है वो तत्व है।
- 43:55साक्ष्य जब तक साक्षी है तब तक जीवन है।
- 44:06जब साक्षी मिट गया तो जीवन भी चला जाएगा।
- 44:12भाग दौड़ भी साक्षी के कारण है और ठहरा भी साक्षी के कारण है।
- 44:18ये बातें उलटी हैं, लेकिन तुम क्योंकि खोपड़ी से सुनते हो इसलिए
- 44:23तुम्हे समझ नहीं आएगा। समझ में तो कुछ नहीं आता।
- 44:27मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा अध्यात्म का सार दो शब्दों में,
- 44:37अध्यात्म का सार यह कि हमने जो बोला, झूठ बोला, सत्य कभी बोला
- 44:43नहीं जाता। उस झूठ से तुम्हें सत्य की तरफ
- 44:49इशारा किया जैसे मैं कहता हूँ वो रहे चंद्रमा ये झूठ है क्योंकि
- 44:57चंद्रमा मून इस नॉट ऑन दी। टॉप ऑफ दी स्विंगर यहाँ पर नहीं
- 45:02है। ये झूठ है।
- 45:04जो मैं कहता हूँ कि वो रहा चंद्रमा तो चंद्रमा इसकी टॉक पे
- 45:10नहीं है ये झूठ बोलता हूँ मैं तो कहाँ है चंद्रमा सत्य भी बोलता
- 45:19हूँ, लेकिन इशारा मेरा सत्य है। इशारा यह है कि अगर तुम इसकी
- 45:25स्ट्रीट लाइन में ऊपर देख लोगे तो चंद्रमा दिख भी जाएगा।
- 45:30बोला जो वह झूठ जो देखा जाता है वह है सत्य।
- 45:41इसलिए बाबा कहते हैं उतर गए। हो मेरे मन का संसार।
- 45:58इसे कृष्ण कहते हैं, चंचल आत्मा बनुश्यति।
- 46:03बाबा कहते हैं वो सन से उतर गया, खत्म हो गया।
- 46:08उतर गए हो मेरे मन का शंशा। जब तेरा दर शेन पायो।
- 46:30देखने से संशय मित्र का मानने से नहीं, ये जो कहते हैं लोग मानो।
- 46:40मानने से संशय मिट जाएगा। नहीं मानना एक फायदा कर सकता है
- 46:50मानना तो मैं उस दिशा में चलने को बाध्य कर सकता है बस।
- 46:58मानने का है कि ये लाभ है मानने से मिलता नहीं है मिलता तो है मान
- 47:06कर तुम चलो मंजिल की तरफ़ चलो पहुँच जाओगे।
- 47:14उतर गए हो? उतर गए हो?
- 47:38उतर गए हो मेरे मन का संसा मन का संसा।
- 47:55जब तेरो दर सन पायो ठाकुर तुम सर नाई आयो।
- 48:13ठाकुर? तुम सरनाईया तुम सरना।
- 48:50तुम सरीना ही आयो। उतर गयो मेरे मन का संसार जब तेरा
- 49:01दर्शन पायो मानने से नहीं मिलेगा मान ना सहायक हो सकता है चलने
- 49:09में। चलने से मिलेगा, देखने से मिलेगा।
- 49:14चलकर भी अगर तुम देखने से चूक गए तो अभी न मिलेगा मान न होगा चलना
- 49:22होगा देखना होगा जब तेरा दर्शन पाया हो।
- 49:30दर्शन से संशय खत्म होते हैं। अर्जुन ने नहीं माना जब तक दर्शन
- 49:37नहीं किया अर्जुन विराट देख लिए फिर कपने लगे सारा शरीर कप रहा
- 49:47है। मैं काल भी हूँ मैं काल बनकर
- 49:54भक्षण करता हूँ, मैंने इन सबको खा लिया है मेरे द्वारा मारे गए इन
- 50:05लोगों को। भीष्म जैसे जयप्रथ ध्रुधन द्रौण
- 50:14मारे हुए इन लोगों को तो उठ और मार दे यह मेरे द्वारा मार दिए गए
- 50:21हैं। तू तो सिर्फ श्रेय ही लेना है और
- 50:29तू शंका मत कर तू जीतेगा क्योंकि मैंने ये मार दिए हैं, तू सिर्फ
- 50:40श्रेय ले ले इसलिए हे अर्जुन उठ। जो गाली धनुष फेंक दिया उसको उठा
- 50:49ले, उसकी प्रतिज्ञा को कस लें, बाण चढ़ा दे और उनकी छातियों में
- 50:57भेद ले ये मैंने मार रखा है। यार ऑलरेडी टैक्ड बाई मी तू तो
- 51:09सिर्फ तुने तो श्रेय लेना है सेरा बदना तेरा तो नाम हो जाएगा करता
- 51:20तो वो ही है। तुम्हें तो सिर्फ शय देता है तुम
- 51:31शय ले लो। मेरा हाथ की।
- 51:41कृपा से सब काम हो रहा है मेरा आप की।
- 51:58कृपा से सब काम हो रहा है, करते हो तुम कन्हैया करते हो तुम।
- 52:18कन्हैया हाँ, मेरा नाम ओह रहा है मेरा, आपकी कृपा से।
- 52:36सब काम हो रहा उठ। खड़ा हो परतेजा कस और वाणों को
- 52:47इनकी क्षति के आभार करते हैं। वाणों की शैय्या पेन में सुला दे।
- 52:56तो शरीर है सिर्फ अर्जुन मानता है अर्जुन ऐसा पात्र है जो देखे बिना
- 53:10नहीं मानेगा और तुम भी ऐसे ही हो मेरे शब्दों पे गौर करने।
- 53:17तुम भी ऐसे ही बनो, मानने में सुख है?
- 53:21उथला उथला जानने में आनंद है, गहरा गहरा, सिर्फ मानने पर रुक मत
- 53:30जाना शुरुआत अच्छी है। अंजाम तक पहुँच जाना है।
- 53:37आगाज़ वे सिर्फ सुख लेके खुशी मत हो जाना कभी कुंभ के मेले में जाओ
- 53:45और खुश हो जाओ अच्छी तरह से तीर्थ में स्नान कर लेना वो कुंभ का
- 53:53तीर्थ न। अपने भीतर के तीर्थ में डुबकियां
- 53:58लगा के मल मल के नहाना और शुद्ध हो जाना निर्मल हो जाना निर्मल मन
- 54:08जन सोई मोहि पावा, मोहि का पट्टे छले छिद्रण न पावा।
- 54:14कपट छल छिद्र करने वालों का असर मैं उनका विनाश कर ही देता हूँ।
- 54:23संशयात्मा भी निश्चित है तो अर्जुन बड़ा खिलाड़ी है।
- 54:32अर्जुन कहता है। जब तक ना देखूं अपनी नैनी तब तक
- 54:38ना मानूं कुरकी कन्नी तो कृष्ण माप लेते हैं, यह पक्का खिलाड़ी
- 54:48है, इसे अंतःस्थल तक ले जाना होगा।
- 54:53फिर वो विराट प्रकट करते हैं, अपना सही स्वरूप दिखाते हैं, उस
- 54:59विराट फ़ैला को एक क्षण भर के लिए वो देखता है जब कृष्ण कहते हैं यह
- 55:09काल भी मैं हूँ। देख इनको मेरे मुख में जाते हुए
- 55:14मैं कैसे भक्षण कर रहा हूँ वो उसने देखा भीष्म द्रवण कहते कहते
- 55:22हैं बलि योद्धा सब भगवान के मुख में चले जा रहे हैं।
- 55:30मैं काल रूप से भक्षण कर रहा हूँ उनका तू देख और मैं ब्रह्म रूप से
- 55:37इनको जन्म भी दे रहा हूँ तू देख अनंत अनंत मुख देख अर्जुन।
- 55:48अनंत अनंत मुखों से अनंत अनंत प्रकटीकरण हो रहे थे।
- 55:56सबसे विकराल दृश्य था मृत्यु का मृत्यु का घोर तांडव।
- 56:01उसने अपने आँखों से देखा सभी समा गए काल का ग्रास बन गए।
- 56:07वो भीष्म हो, वो दुर्लधन, वो द्रोण हो, वो दोह शासन हो।
- 56:15सभी खप गए। और अर्जुन कंपा कप तो पहले ही रहा
- 56:24था। तेजी से कंपा बहुत कंपा अर्जु ने
- 56:29कहा, भगवान मुझसे यह दृश्य देखा नहीं जाता, मैं संशय मुक्त हुआ।
- 56:41अब ये अपना विराट रूप समिट है। मुझे डर लग रहा है।
- 56:46महलू से सिर्फ मैं भयभीत था, अब तो मैं डर की मूर्ति ही बन गया
- 56:51हूँ, सब मुझ से नहीं देखा जाता, भगवान इस विराट को हटाओ स्मोत्र
- 57:02लब्धों। स्मृति मिल गई।
- 57:08मुझे नष्टो मो। मेरा मोह नष्ट हुआ, अब और मत
- 57:16कमाओ, विराट को समेटो मैं समझ गया, समझ गया जो आप कहोगे मैं
- 57:22करूँगा। मैं तुम्हारी शरण में हूँ।
- 57:29इस विराट कंपन को देखकर कृष्ण ने अपना स्वरूप समेटा।
- 57:37वह विराट दृश्य आपके भीतर है। तुम भी ऐसे ही कफोगे जहाँ मैं सदा
- 57:45ही कहता हूँ कि तुम्हें गुरु की आवश्यकता पड़ेगी, वहाँ ये विराट
- 57:51ही तुम्हारे सामने आएगा। तुम जब अपना स्वरूप देखोगे, उससे
- 57:58बिल्कुल आगे विराट भी देखोगे। उसका स्वरूप भी देखोगे?
- 58:02यहीं से जाता है वो रास्ता जो विराट तक पहुंचता है पहले तुम्हें
- 58:08तुम्हारा अपनत्व दिखाएगा। स्वत्व दिखाएगा तुम कौन फिर
- 58:15तुम्हें विराटत्व दिखाएगा मैं कौन?
- 58:20ये दोनों चीजें यक्सांग हो जाती हैं।
- 58:23बस एक पड़ाव का फर्क है। एक पड़ाव पहले तुम अपना आपा देखते
- 58:30हो, नो दाय सेल्फ हूँ एमआइ और बस अगले पड़ाव पे तुम्हें पता चलता
- 58:38है ये सब क्या है? वह क्या है?
- 58:44बस दो ही पड़ा तो भगवान कृष्ण ने अपना विराट समेटा।
- 58:56पल भर के विरासत बने पल भर के दर्शन ने इसलिए मैं कहता हूँ
- 59:02दर्शन से पहले। ना तो कोई तृप्त हुआ, ना ही तुम
- 59:09नकली तृप्ति को पैदा करना राम राम करके राधे राधे करके तुम सूख
- 59:15जाओगे तुम्हारी मंझर जो ईश्वर ने इतनी विराट सृष्टि का निर्वाण
- 59:19किया तुम्हारे लिए व्यर्थ हो जायेगा तुम फिर अगले जन्म की।
- 59:26इंतजार में लाइनों में लगोगे जब तक पूरा अपनी आँखों से उसे देख तब
- 59:35तक तपती मिलती भी नहीं और तुम नकली संतोष कर भी मत लेना।
- 59:42यह अंतिम पड़ाव कि मैं बात करता हूँ तुमसे वहाँ जाकर तुम्हें
- 59:47समत्व उपलब्ध हो जाता है, जो इस गीता के पाँचवें अध्याय के
- 59:55उन्नीसवें श्लोक में बताया गया है।
- 1:00:01यही अनर्शिया है, यह जागता रहता है।
- 1:00:06यह जीवंत है और यह निष्क्रिय है। यह कर्तव्य कुछ नहीं जैसे कैटलाइट
- 1:00:14एजेंट उसके बिना भी काम नहीं होता।
- 1:00:19और उसके होने से काम हो जाता है लेकिन वो पार्टिसिपेट नहीं करता।
- 1:00:25लेकिन ये चीजें तुम्हें समझ नहीं आएंगी या जिन्होंने केमिस्ट्री
- 1:00:30पढ़ी वो सब समझ जाएंगे। क्या होता है?
- 1:00:38यह है जिसकी मैंने बात की है, तुम नहीं समझोगे कैटलिटिक एजेंट व्हाट
- 1:00:47इस कैटलिटिक एजेंट ऐसा ही तुम ये नहीं समझोगे एक साथ ये कैसा हो
- 1:00:54सकता है? कि कैटेलिटिक एजेंट के बिना भी
- 1:00:59केमिकल रिएक्शन नहीं होता और उसका कोई योगदान भी नहीं होता।
- 1:01:06तुम्हारी बुद्धि कहेगी इट इस इम्पॉसिबल इसीलिए मैं कहता हूँ
- 1:01:10ये। शंका पैदा करने वाली शंशाह पैदा
- 1:01:14करने वाली बुद्धि को बाहर हटा के रख दो, हर हर कदम पे ये शक
- 1:01:21उठायेगी और तुम्हें रोक लग गया इसलिए तुम रुके पड़े हो इसका
- 1:01:29मुख्य कारण है तुम्हारी बुद्धि। बुद्धि को एक तरफ़ रख दो, पहला
- 1:01:36काम दूसरा विश्राम पूर्ण करना सीखो, शरीर का विश्राम तुम रोज़
- 1:01:42करते हो, मन का विश्राम तुम रोज़ करते हो, नींद में चले जाते हो,
- 1:01:47लेकिन मन का पूर्ण विश्राम तुम नहीं करते।
- 1:01:54मन छुप जाता है, मन विलीन नहीं होता, नींद में अपप्रकट हो जाता
- 1:02:00है लेकिन विलीन नहीं होता। मन को विलीन कर दो किस में विराट
- 1:02:06में मन तू जोत स्वरूप है अपना मूर्ख पछा?
- 1:02:11अपने मूल के भीतर तू विलीन हो जा, तू अपप्रकट ना हो, तू छुप ना
- 1:02:20सिर्फ नींद में मन छुप जाता है किसी एक कोने में पड़ा रहता है।
- 1:02:29लेकिन योग में आख़िरी पड़ाव में मन अपने विराट तत्व में विलीन हो
- 1:02:37जाता है और मन विराट हो जाता है। मन मरता नहीं है, मन विराट हो
- 1:02:45जाता है मन तू ज्योत स्वरूप बैठ। वह भी ज्योतिष है।
- 1:02:52वह एक छोटा सा किनका जो देही के साथ ही चलता है?
- 1:02:57सदा उसे ही मन कहता है यह संत उसे ही मन कहता है जो देही के साथ।
- 1:03:08एक चेतना का छोटा सा टुकड़ा मैं निकालता जो ब्रह्मरंत्र में से
- 1:03:14आखिरी वक्त निकलता है। मुक्त होने की स्थिति में जब वह
- 1:03:22बूंद समुद्र में खोती है, वह मन का ही रूप होता है।
- 1:03:30उसको पहचान पहला दूसरा मैंने कहा तुम विश्राम करना सीखो, तुम्हारा
- 1:03:43मन अर्ध विश्राम करता है यानी वो छिप जाता है।
- 1:03:47विलीन नहीं होता तो मन को विलीन कर दो।
- 1:03:50इसलिए दूसरा मैंने उपाय बताया जो भी काम करो देखो राम राम करो राधे
- 1:03:57राधे भी करो, कोई बात नहीं, लेकिन इतनी तल्लीनता से करो।
- 1:04:07कि कर्ता समाप्त हो जाए। तुम कर्ता बने रहते हो इसलिए तो
- 1:04:13हिसाब लगाते हो। चार माला हो गई, छह माला हो गई,
- 1:04:17बैंक बना देते हो, बैंक में जमा कर देते हो, पूंजी जमा हो गई, कोई
- 1:04:21पूंजी पूंजी जमा नहीं होती। ये बैंक में जमा कराने वालों वक्त
- 1:04:28न खराब करो, शक्ति न खराब करो, उसी शक्ति को अपने भीतर के तीर्थ
- 1:04:33को खोजने में लगा दो, मिल जाएगा, वह सच्चा है।
- 1:04:37इस व्रत सृष्टि में ये लुटेरे और झूठे लोग बहुत बैठे हैं।
- 1:04:43भटकाने वाले। कई बार इन्हें खुद ही पता नहीं
- 1:04:49होता कि हम भटका रहे हैं और कई बार ये जानबूझकर भटकाते हैं।
- 1:04:54अब इनकी तो ये ही जानें लेकिन मैं आपको शक्ति की बात बताता हूँ कि
- 1:05:02राम राम भी करो। लेकिन राम रम जाए, ऐसा करो राधे
- 1:05:10राधे भी करो लेकिन राधे चैतन्य में हो जाए ऐसा करो।
- 1:05:17अगर ऐसा नहीं करोगे तो फिर तुम भटक जाओगे फिर तुम्हें नहीं
- 1:05:23मिलेगा। कोई भी कर्म करो, पूरे तलीन हो
- 1:05:29जाओ, मन को तलीन कर दो, उसमें मन को विलीन कर दो, उसमें यानी मन न
- 1:05:35बचे मन खो जाए फिर चाहे तुम राम राम करो, फिर चाहे तुम राधे राधे
- 1:05:41करो फिर चाहे तुम टरर टरर करो। पहुँच जाओगे पक्का नाम उसका कोई
- 1:05:48है ही नहीं। जब राजा नहीं थी, तब भी जब राम
- 1:05:53नहीं थे, तब भी और कोई तो वेला थी, जब राजा नहीं थी और जब राम
- 1:05:58नहीं थे तब भी मानवलीन होता था। मन को विलीन करना है, मन को
- 1:06:12विश्राम देना है, परम विश्राम देना है, उसी विश्राम को मैं
- 1:06:17सच्चा विश्राम कहता हूँ, आराम से राम की ओर।
- 1:06:29मेरा आराम मन को विलीन करने का नाम है मेरा आराम मन्ना बचे मन
- 1:06:40पूर्णतः विलीन हो जाए। जैसे परवाना क्षमा में राख हो
- 1:06:47जाता है, उसकी राख तो बच जाती है। मन की राख भी न बचे, मन विलीन हो
- 1:06:54जाए, खाख हो जाए, कोई भी काम करो। कर्म विशेष में तुम्हें मैं रोकता
- 1:07:07नहीं हूँ, कोई बाधा नहीं लगाता, कोई भी काम करो, पूर्णता से करो
- 1:07:16मुक्त हो जाओगे। इसी सूत्र से साधना कसाई मुक्त हो
- 1:07:21रहा है। तुम्हें राज़ की बात बताता हूँ
- 1:07:29विलीनता के सूत्र से सदना कसाई भी पार हो गई और तुम दान करके भी पार
- 1:07:35नहीं हो सकते। तुम्हारा मन मरने के बजाय और
- 1:07:39प्रगाढ़ हो जाता है। सदना कसाई कतल करके भी पहुँच ही
- 1:07:46जाता है तो सती सावित्री बनकर भी मुक्त नहीं हो सकती और अनिका
- 1:07:53गणिका वेश्या होती हुई भी मुक्त हो जाती है।
- 1:07:56कारण क्या है, पीछे का रहस्य क्या है?
- 1:08:00रहस्य है विलीन गनिका अनिका और सदना जो करते हैं उसमें अपने मन
- 1:08:10को पूरा झोंक देते हैं। अगर तुम किसी भी काम में राम राम
- 1:08:16करो। लेकिन पूरे विलीन होने का मन को
- 1:08:21और जीस घड़ी विलीन होने का तुम्हें फॉर्मूला आ गया।
- 1:08:26वल्ल आ गया सली का आ गया उस घड़ी तुम पाओगे मुक्ति दूर नहीं है।
- 1:08:34यह एक अड़चन थी थोड़ी सी जो आँख में कनक पड़ गया था।
- 1:08:38कणक बहुत छोटा होता है, आँखों का बहुत दूर तक फैला होता है और इस
- 1:08:44छोटे से कणक तुम्हारी आँखों ने आँख को देखने से वंचित कर दिया।
- 1:08:53इस छोटे से कणके को हटा दो। तुम बचे रह जाते हो, बचना बंद करो
- 1:09:01पूर्ण विलन कर दो, कैसे करोगे? सरल शब्दों में समझा दूँ तुम्हें
- 1:09:07कोई भी काम करो कोई भी काम करो अच्छे बुरे की में कोई संज्ञा
- 1:09:12नहीं देता है इसमें, लेकिन करो पूरे विलनता से।
- 1:09:18तुम तुरंत मुक्त हो जाओगे, यह फॉर्मूला है।
- 1:09:24करते न बचे तुम नाचो नृत्य बचे नृत्य ना बचे नाचने वाला खत्म हो
- 1:09:36जाए। नृत्य बचे, नाच बचे लिखने वाला
- 1:09:46समाप्त, लेख बचे महँगा कवि समाप्त कविता बचे।
- 1:09:57हँसा मत कर सर कभी कभी देखो थोड़ी ये मसला थोड़ा गंभीर होता है।
- 1:10:03अब थोड़ा सा आपको हंसाना जरूरी हो जाता है।
- 1:10:10कविता बचे, लेख बचे। नृत्य बचे नृतक खो जाए, कवि खो
- 1:10:18जाए लेखक खो जाए अगर तुम ऐसा कर्म कर सकोगे इसको ही कर्मों की
- 1:10:27कुशलता कहा भगवान कृष्ण ने कर्मशु कौशल।
- 1:10:35योगः कर्मेश्वर कुशल कर्मों में कुशलता का नाम ही योग है।
- 1:10:43इसका सरल अर्थ तुम्हें बतला रहा हूँ जो करो पूरी तलिंगता से करो।
- 1:10:52कर्म बचे करता ना बचे फिर बता रहा हूँ बार बार कर्म बचे करता ना बचे
- 1:11:05कभी खो जाए कविता बचे लेखक खो जाए लेख बचे।
- 1:11:11गीतकार खो जाए, गीत बचे। सुध विसरा गयो मोरी रे।
- 1:11:33शुद्ध विसरा गयो मोरू। वो काला इक भा सुरीवाला सुध विसरा
- 1:12:05गयो। मोरी रे सुध विसरा गयो मोरी।
- 1:12:24माखन चोरु नन्द किशोर जो माखन चोरु नन्द किशोर जो।
- 1:12:46कर गयो मन की कर गयो मन।
- 1:13:22सुध बिसरा गयो मोरी रे सुध बिसरा गयो मोरी।
- 1:13:42ओह काला इक भां सूरीवाला छुप गयो, फिर एक तान सुना के।
- 1:14:01कहाँ गयो एक वाहन चलाकर कहाँ गयो एक वाहन चलाकर।
- 1:14:37मथुरा ढूंढ को ई नगरिया न छोड़ी रे।
- 1:14:56कोई नगरिया न छोड़ी रे, सुध विसरा।
- 1:15:35धन्यवाद।