Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 Sep 25 - जपुजी साहिब की 12वीं पउड़ी का गूढ़ रहस्य, परमात्मा के तल से व्याख्या!
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- 0:03अकाल सिंह परलोक सिंह, न्यू यॉर्क बाबा जी हम दो भाई हैं अकाल सिंह
- 0:16परलोक सिंह। आपकी सभी वीडियो सुनते हैं जपजी
- 0:28साहब की 121314 और 15 इन वीडियो के बारे में आप।
- 0:38बोले नहीं कुछ कृपा करके इन कोड़ियों के बारे में समझाने का
- 0:47कष्ट करें। रह गई होगी।
- 0:58कोई याद करा दिया करो। बाबा ने पहले बोला सुनिए सुनिए
- 1:17दुख पाप का अनुष अब बाबा आए हैं मन्ने यहाँ से शुरू होती है।
- 1:30बार में पूरी मन्ने की गति कहीं ना जाए, जे को कह पीछे पाश्ता।
- 1:46आइए हम शब्द मने का अर्थ ठीक से समझे मने शब्द के दो अर्थ बताऊँगा
- 2:03तुम्हे। और दोनों अर्थों का मतलब यक सा
- 2:08होगा। एक ही होगा दोनों का मतलब मरने की
- 2:15गति कहीं न ज है। ध्यान से सुनो बड़ी सुंदर पोल।
- 2:26मन कार्थ है, जो उसकी रजा को मान लेता है और उसकी रजा में चलना
- 2:46शुरू हो जाता है। उसको बाबा ने शबद दिया।
- 2:55मने की गति कहीं न जाए, जो उसकी रजा में चलना शुरू कर देता है
- 3:04उसकी रजा को मान कर। मन में बार बार बोल रहा हूँ।
- 3:11ये उसकी राजा को मानकर अपने जीवन की नैया को चलाना शुरू कर देता
- 3:16है। जाने के वो ही चलाता है।
- 3:26गति कहीं न जाए उसके बाद कहीं नहीं जा सकते क्योंकि फिर वह नहीं
- 3:35करता। विराट करता है, दूसरा मिलने का
- 3:44शब्द है। मन के पार हो जा, मन के पार हो
- 3:55जाना मन में पूरा भी नहीं मिला दूँ, जो मन के पार हो गया।
- 4:07वहीं उसकी रजा में चल सकेगा। जो मन में ही उलझा रहा, दोनों में
- 4:15ही उलझा रहा। मन तुम्हारा भड़काव देता है।
- 4:22मन से पार जब हो जाते हो तो मन की बाउंड्री से बाहर हो जाते हो।
- 4:31जब तक तुम मन से पार नहीं हुए, मन के कोलाहल के बीच में ही खोए रहे
- 4:40और मन? बड़े तर्क पेश करता है।
- 4:48मन बड़े उदाहरण देता है। मन अपने आप को सही ठहराने का पूरा
- 4:56यत्न करता है। शास्त्रों से ऋषियों से।
- 5:02उपनिषदों से, वेद से, प्राणों से, बाइबल से, करण से, गीता से, कुरान
- 5:10से उदाहरण उठा के ले के आएगा और मन तुम्हें समझाने की चेष्टा
- 5:17करेगा। यद्यपि मन।
- 5:20स्वयं को ही समझा रहा है। मन के दो अर्थ हुए मन में जो मन
- 5:30के पार हो गया, समय के पार हो गया टाइम लेस्स में आ गया माइंड लेस्स
- 5:36में आ गया, नो माइंड में हो गया। तो उसको मन का कोलाहल, मन का
- 5:46झंझोर उसे तंग नहीं करता। फिर वह आजाद है, वह फैसला लेने को
- 5:54सोचता। मन की वृधि के भीतर जब्त रहोगे तब
- 6:02तक तुम स्वतंत्र नहीं हाथों पांवों की बेड़ियों में बंधा हुआ
- 6:11व्यक्ति परतंत्र नहीं होता। अगर हाथों पांव की बेड़ियां बंधी
- 6:20भी हों और व्यक्ति मन से पार चला जाए, सही रूप में तो वही स्वतंत्र
- 6:26होता। है स्वतंत्रता है।
- 6:34मन की प्राधीनता से पार चले जाना अभी तो मनुष्य मन के अधीन है और
- 6:47मन में सभी कुछ है, वास नहीं है काम, क्रोध, लोक मो अहंकार भ।
- 6:56मद मक्सर ये मन का ही एक अंग है, फिर विषय है अलग अलग सब्जेक्ट्स
- 7:07हैं। यह भी मन का ही रूप है।
- 7:18वा सुनाइए विचार हैं तुम में न जाने तुम्हारी खोपड़ी में कितने
- 7:25कितने विचार भरे पड़े और तुम इन सब विचारों के गुलाब।
- 7:35गुलाम ऐसे कि तुम कहते हो ये विचार मेरे और उन विचारों पर कोई
- 7:42आदात कर दे और तुम फ़ौरन प्रतिक्रिया करते हो और ही अच्छी
- 7:49क्योंकि तुमने माना ये विचार मेरे।
- 7:53और जो मेरा हो जाता है वो मैं ही हो जाता है तो आज तुम मन से चिपके
- 8:01हो गए हो और यही तुम्हारी दुर्भाग्य है और यही तुम्हारी
- 8:08स्वतंत्रता को छीने हुए हैं तुम बराती।
- 8:13आज इंद्रियों की वासनाएँ तुम्हें गुलाम बनाती हैं।
- 8:17नचाती हैं आज इच्छाओं कि तुम गुलाम दान इकट्ठा करो, ज्यादा
- 8:31बड़ी सी जमात इकट्ठी करो। जा के बड़ी जमात से मन को हुसला
- 8:36हो जाता है कि इतने व्यक्ति जो मुझे मेरे फॉलो करे हैं वह कोई
- 8:45मूर्ख है, थोड़ी है, मूर्ख है, बिल्कुल मूर्ख है, तुम भी मूर्ख
- 8:53हो। अन्य साहित्य नहीं जमाता।
- 8:57न इकट्ठी करते, तुम अकेले ही काफी थे।
- 9:03टु बी अलोन असफिशिएंट तुम। अकेले ही पर्याप्त हो।
- 9:13इतनी जमात इकट्ठे करने की आवश्यकता नहीं होती और श्री संत
- 9:20एकांत में रहता है और अकेले में रहता है।
- 9:24वो अगर भीड़ में भी खड़ा हो जाए तो भी अकेले ही पाओ।
- 9:32बाहर कोलाहल है भीतर शांति की रेखा की जा रही है।
- 9:41जो मन के पार हो गया वह प्रभु की आज्ञा में चलना सीख हो गया।
- 9:58मन के पार पर जाओ, प्रभु की आज्ञा में चलना सीख जाओगे शास्त्रों को
- 10:08पढ़कर गुरुओं को सुनकर संत पुरुषों को सुनकर।
- 10:18पथ प्रदर्शकों से मार्ग लेके तुम उनसे सिमट जाओगा इसलिए मैं कहता
- 10:28हूँ, शास्त्रों से तुम चिपटे हो, गुरुओं से तुम चिपटे हो।
- 10:35गुरुओं की शिक्षाओं से तुम चिपटे हो गए, यह चिपकाट हित में मुक्त
- 10:42नहीं होने देते। अगर दीवाल से कोई पोस्टर लगा हो
- 10:49बड़ी अच्छी सी फेविकोल्स है तो वह दीवाल उस।
- 10:55पोस्टर के लिए बंधन हो जाती है ऐसे ही तुम चिपके हो और शांत आते
- 11:04हैं तुम्हारी चिपकाहटों को दूर करने के लिए, लेकिन तुम उल्टा
- 11:08उनके गल में हाथ ढल लेते हो, तुम कहते हो?
- 11:14यह तो मैं हूँ, मन की गति कहीं न जा, जो मन से पार हो गया वह मन की
- 11:26आज्ञा से भी पार हो गया। फिर मन उसे आदेश नहीं दे सकता,
- 11:34फिर वह मन को आदेश देगा जैसी उसकी जरूरत।
- 11:38होगी। अभी तो मन तुम्हें नचा रहा मन
- 11:42इन्द्रियों का मालिक है और तुम मन के मालिक।
- 11:46हो तुम मन के गुलाम। इसलिए मन तो मैं नहीं चाह रहा हूँ
- 11:56मन जैसा कहता है वैसा तुम कर रहे हो गुलाम चाहते हो तुम मुकते।
- 12:07हो तुम गुलाम और तुम धरातल पर जीस धरातल पर खड़े हो उसे ठीक से देख
- 12:15नहीं पाते कि हम गुलामी के धरातल पे हैं या आजादी के धरातल?
- 12:20पे हैं। मन्ने का अस्त मैंने आपको समझाया।
- 12:26मन के पार हो जाना मन ही समय है समय की सिंघाओं को सीमाओं को लांघ
- 12:33जाना, जो मन से पार हुआ वह मन का गुलाम न रहा क्योंकि तुम उसके
- 12:44हदूद को पार कर गए। उसकी बाउंडरी से फरक होता है।
- 12:49अब मन की आग तुम्हें जलाते हैं, अब मन की चोट तुम्हें चुभन नहीं
- 12:59देती, जैसे ही तुम मन से पार होते हो।
- 13:05मन से दूर हट जाते हो, वैसे ही तुम मन के मालिक हो जाते हो और
- 13:13बाबा उसी की बात कर रहे हैं जो मन का मालिक हो गया।
- 13:20मैंने मनने की परभाषा आपको दे दी जो मन का मालिक हो गया।
- 13:27जो मन का गुलाम न रहा, जो मन पे आधिपत्य रखना सीख गया, जो मन को
- 13:38हुकुम दे सकता है मन के हुकुम में।
- 13:44हुक्मी के हुक्म में चलता है हुक्म में अंदर सबको मन के हुक्म
- 13:50में नहीं चलता, वह मन मुखी नहीं रहता, वह हुक्म मुखी हो जाता है
- 13:57और हुक्म आता है। गुरु गुरु मुखी हो जाता है, मन
- 14:01मुखी नहीं। हुक्म में अंदर सबको बाहर हुक्म
- 14:13ना को ऐसी जिसकी हालत हो गई उसको बाबा ने नाम दिया मन्ने फिर सुन
- 14:27लीजिए एक बार। फिर हम आगे चलेंगे मन ने जो मन की
- 14:37हदुस से बाहर हो गया, जो मन पर हुक्म करने लगा, जो मन का गुलाम न
- 14:44रहा, जो मन का आधिपति हो गया। जिसके वश में मन और इन्द्र ही
- 14:53होगा, जिसके कहने से मन चलेगा और जिसके कहने से मन रुकेगा।
- 15:01तुम्हारा मन तो बेतरतीब दिन भर रात बोलता है।
- 15:07वे लगाम घोड़े की तरह, क्योंकि अभी लगाम तुम्हारे हाथ में घोड़े
- 15:13की आई है, मनुष्य घोड़े की तरह हो गया है तुम्हारा अभी के भागा ही
- 15:22चला जाता है, उसकी लगाम तुम्हारे हाथ में नहीं।
- 15:26इसलिए मन तो मैं नहीं चाहता है इन्द्रियां तो मैं नहीं चाहती है
- 15:30मन, इन्द्रियों का मालिक। है।
- 15:39मन की गति कहीं न जाए, हम आगे चले, मन की गति कहीं न जाए।
- 15:52जो मन से पार हो गया वह काल यही हो गया।
- 15:55को की मन ही का मौत आती है मन को जो मन से पार है तुम्हारा
- 16:04अस्तित्व उसको मौत कभी आती है नैनम चिदंती शास्त्र नैनम दहती
- 16:13पांव का। न चैनम के लिए दिन त्याग हो, न
- 16:18शोषधि, मारो तहा, मैं न मरूँ, मरे संसारा, मोहे मिला जलाबनहरा।
- 16:31संत को वह मिल गया जो कटता नहीं, गलता नहीं, छेदता नहीं सूखता,
- 16:37नहीं, मरता जलता नहीं, मन की उस हदु से पार जो हो गया।
- 16:50उसको बाबा ने कहा मने मने की गति कहीं न च बाबा कहते हैं जो मन से
- 17:06पार हो गया, उसकी गति को तुम शब्दों में न लिख सको।
- 17:15उसकी गति इतनी विराट हो गई, वह इतना विशाल हो गया, वह इतना फैल
- 17:25गया। वह अखंड हो गया।
- 17:29वह असीम हो गया। वह लिमिटेड लेस में चला गया।
- 17:36उसकी गति को हम कह नहीं सकते, मरने की गति कहीं ना जाए।
- 17:45जे को कहे पच्छे पछुता। अगर तुम मन की कोई गति की परिभाषा
- 17:52कर दोगे तो तुम्हें बाद में पछताना पड़ेगा।
- 17:54के बाद में पता चलेगा जब तुम पहुंचोगे उसे द्वार पे उस स्थल पे
- 18:00तो तुम पाओगे कि तुमने जो मरने की परिभाषा की थी वो गलत थी।
- 18:09डेफिनिशन ऑफ़ मन्या वादरों जो कोई कहे पाक्ष्य पच्छताये कागज कलम न
- 18:27लिखनहार मरने का वह कर्ण विचार। पापा कहते हैं जो मन से पार हो
- 18:40गया उसकी बातों को लिखना, मत शुरू कर देना, कागज कलम, न लिखन, हार
- 18:49मनने का वह कर्ण विचार यह व्यर्थ होगा।
- 18:57शिव महिमा स्तोत्र के श्लोक 32 में एक शाब्दाता है।
- 19:06विराट की महिमा कही गई है अखंड की महिमा कहती उसे शिव कहता है।
- 19:17असित घरेसेम स्यात का जलम सिंधुपात्र अगर सारे समुद्रों को
- 19:32काले पहाड़ों। से स्याही बना लिया जाए।
- 19:38असित गरिषम स्यात का जलम सिंधुपात्र काले पहाड़ों को सारे
- 19:48पहाड़ों को सारे समुद्रों में गिराकर।
- 19:53अगर उसकी स्याही बना ली जाए सुरतर्वर शाखा, लेखनी, पत्रम्र भी
- 20:04और सभी थपेड़ों की कलमें बना ली जाए।
- 20:11सुरतर्व शाखा लेखनी पत्र सभी पहाड़ों को समुद्र में घोर दिया
- 20:21जाए, उसकी स्याही बना दी जाए और सभी वृक्षों की कलमें बना दी जाए।
- 20:32लेखनी पत्र मुर्वी लिखत यदिग्रहीत का शारदा सर्वकालम शारदागर
- 20:40सर्वकालम अनंतकाल तक लिखती रहे। सदा ही लिखती रहे, सदा ही लिखती
- 20:47रहे। लिखती ही रहे।
- 20:49कौन सरस्वती लिखती अधिग्रहीत व शारदा सर्वकारम तदपी तव गणना में
- 21:01स्वरम न याद तयदपी। तब गुणों ना परम तो भी उसकी महिमा
- 21:14को, उसके पसारे को, उसके होने को, उसके अस्तित्व को उसकी अखंडता को,
- 21:24उसकी वैरायता को। लिखा नहीं जा सकता।
- 21:30तुम विचार मत कर लो क्योंकि वह विचारों से मरने का वह करण विचार
- 21:40कितना ही विचार करो। कभी विचार करने से बुद्धि की पकड़
- 21:45में वह असीम आया। कागज का लम्बन आलिखन हाँ सुरतर्व
- 22:02शाखा अलेखनी पत्र मुरवे असतगिरिष्णम स्यात का जलम।
- 22:08सिंधु पात्र सुर तरवर शाखा लेखनी पत्र मुर्गी लिखती अधिग्रहीत वह
- 22:17शारदा सर्वकालम तदपि तब गुणा न हो स्वरक न याद।
- 22:28का अगर जो मनाली खनहार अगर धरती को कागिज बना लिया जाए, सारी धरती
- 22:34को कागिज बना लिया जाए, सारी धरतियों को कागिज बना लिया जाए।
- 22:49कागज कलम न लिखणहार कोई नहीं लिख सकता।
- 22:57सरस्वती भी सर्वकाल के लिए लिखती रहे।
- 23:04शारदा सर्वकालम तो भी लिखना पाओगे तो बाबा कहते हैं मरने का वह कर्ण
- 23:16विचार, उसका विचार मत करने, बैठ जाना।
- 23:23क्योंकि बुद्धि की पकड़ में वह आएगा और तुम्हारा विचार करने में
- 23:31जो समय व्यतीत होगा, वह तुम पाओगे, अंत में के व्यर्थ हो गया
- 23:39उसका कोई अर्थ न लगा। इसलिए मरने की गति कहीं न जाए, न
- 23:46तो कहीं जाती है, न लिखी जाती है। तुम सारी धरती को कागज बना दो
- 23:55सारे सागरों को पर्वतों को शाही बनाकर।
- 24:01थपेड़ों की लेखनी बनाकर खुद शारदा सरस्वती लिखनी शुरू कर दे, सदा
- 24:08लिखती ही रहे, लिखती ही रहे तद पीता गुणा नाम इस पारवना याद फिर
- 24:17भी उसके गुणों की वरन नहीं हो सकती।
- 24:23यही बात बाबा। कहते हैं बड़े संक्षेप में कहते
- 24:26हैं, लेकिन इसका अर्थ बढ़ गया है। देखिए कहीं उसके बारे में विचार
- 24:32मत करने लग जाना, शास्त्र मत करने लग जाना, शंकराचार्य की भांति मूड
- 24:39मत हो जाना। शंकराचार्य की भांति शास्त्रार्थ
- 24:43मत करने लग जाना वह शास्त्रार्थ करने में आता।
- 24:51कागज कितने ही कागज ले लो, धरती को ही कागज बना लो कलम थपेड़ों को
- 24:58ही कलम बना। लो।
- 25:01न लिखण हार सरस्वती खुद ही लिखने शुरू कर दे एक छोटी सी कहानी है
- 25:10बड़ी प्यारी कहानी महाभारत लिखना शुरू किया वेध व्यास ने।
- 25:20तो वेद व्यास कहने लगे किस को बोलो, कौन करेगा यह असंभव
- 25:27कार्यपूर्ण तो किसी ने कहा गणेश जी को बुला गणेश जी बुद्धिमान
- 25:36हैं। अग्रगणी हैं, प्रथम पूजनीय हैं,
- 25:43उनको बुला लो, समझदार हैं। इस कार्य को वो सम्पन्न कर देंगे
- 25:48बड़ी अच्छी तरह से। शिव पुत्र गणेश को बुलाए अवाहनो
- 25:58घर के आ गए वक्तृथौण देय महाकार गणेश सिंह ने कहा पुत्र कैसे
- 26:13बुलाए? वेधव्यास ने आज जो लिए प्रभु मैं
- 26:20एक ग्रंथ की रचना करना चाहता हूँ। महाभारत उस रचना को कोई नहीं लिख
- 26:29सकता आपके शो। आप निर्भिकन निर्भिकनम गुरु में
- 26:36देव सर्व कार्य शु सर्बदा बकर चुंडे माहकार सूर्य कोटी समप्रवाह
- 26:44निर्भिकनम गुरु में एक सर्व कार्य शु सर्बदा आप निर्भिकन आप ही कर
- 26:51सकते हो इस कार्य को सम्पूर्ण। इसलिए मैं ये जो मैं आपको सौंपू
- 27:00विनेश के अंदर के बोला शक सोंको, लेकिन मेरी एक शर्त है प्यारा
- 27:11संवाद है सुनना कहानी है वैसे। वेधव्यास ने दिमाग लड़ाया, समतास
- 27:25पराशर के पुत्र थे। छोटी मोटी बातों से वेधव्यास कहने
- 27:34लगे हे घणार्थी हे गणनायक। हे ब्राह्मण के स्वामी अगर पूज्य
- 27:46आपको नमन एक छोटी सी अर्ज प्रस्तुत करो कि मैं जो भी कुछ
- 27:56बोलेंगे, मैं रुकूंगा नहीं। गणेश ने कहा, अगर तुम रुक गए तो
- 28:06मैं फौरन कलम छोड़ दूंगा और चला जाऊंगा।
- 28:10मैं इस शर्त पर लिखूंगा। महाभारत के तुम कहीं रुकोगे नहीं,
- 28:15विश्राम नहीं करोगे। निरंतर धारा ज्ञान का प्रवाह
- 28:19तुम्हारा बेहतर है। मैं लिखता रहूंगा जहाँ तुम क्षण
- 28:24भर के लिए वह रुक गए, वह मैं कदम छोड़कर चला जाऊंगा।
- 28:32डिग्यास ने का प्रभु मेरी एक। बात को सुनिए।
- 28:36यद्यपि मैं मतीमंद हूँ। आप महान हैं, आप जितनी बुद्धि
- 28:42मेरे में नहीं है, फिर भी मैं थोड़ी सी अर्ज करता हूँ कि मैं जो
- 28:48बोलूं आप तब तक नहीं लिखेंगे जब तक कि उसका अर्थ नहीं समझेगा।
- 28:56अब एक शर्त लगा दी गणेश ने। और एक शर्त लगा दी
- 29:16गणेश हंसकर बोले तथा। ऐसा ही होता है।
- 29:21मस्त गणेश समझ गए। यह व्यक्ति योग्य है इसलिए जब आप
- 29:31महाभारत पढ़ोगे। मैं महाभारत पढ़ रहा था तो बीच
- 29:35बीच में से ऐसे स्लोक आए। जिनका तालमेल नहीं खाता था।
- 29:40कहानी से तो मैं समझ गया ये तालमेल जो नहीं खाता वहाँ अटक गया
- 29:50हूँ के कहानी भूल गया हूँ। बुद्धि हैं हर वक्त।
- 29:58इसमें सप्लाई नहीं होता। ब्लड किसी किसी वक्त भूल जाता है।
- 30:04तो फिर जब भूल गया कहानी को फिर क्या किया फिर एक शलोक को?
- 30:07बोल दिया। उस शलोक का अर्थ जब तक समझेगा
- 30:13नहीं, गणेश तब तक देखेगा नहीं। यह बंधन था अगर बंधन वेदव्यास भी
- 30:23था के तुम रुकोगे नहीं तो बंधन गणेश जी जब तक तुम मेरी बातों का
- 30:28सही अर्थ नहीं समझोगे तब तक तुम इसे मारोगे नहीं, लिखोगे नहीं।
- 30:37ऐसे महाभारत संपन्न ताकत का समना लिख्खन हाथ मरने का वह करण विचार,
- 30:52कोई कागज़ काम नहीं आएगा, पृथ्वी को कागज़ बना लूँ।
- 30:58कोई कलम काम नहीं आयेगी। तर्वर शाखा, लेखनी, पत्रमर्भे
- 31:05सारे वृक्षों को काट लो कल में बना लो न लिखण आहार सरस्वती खुद
- 31:13भी लिखनी शुरू हो जाए। अब सरस्वती से बड़ी विद्या दात्री
- 31:18और कौन हम विद्या मांगते ही सरस्वती से का गत कलम, न लिखन भार
- 31:26लिखने वाला भी कोई नहीं खुद सरस्वती भी लिखे उसकी महिमा का सद
- 31:32भीत गुणाना भी इस परम। फिर भी न लिखा जाए और हर वक्त
- 31:38लिखती रहे। शारदा सर्वकालम लिखती ही रहे,
- 31:45लिखती ही रहे, कभी ठहरें कागज कलम न लिखनहार।
- 31:54धरती को काबिज बना लो, तरूवर को लेखनी बना लो, सिंधु को और
- 32:03पर्वतों को शाही बना लो लिखने वाली खुद हो।
- 32:08शारदा लेकिन उस विराट की? उस सृजन हार की, उस सृष्टी करता
- 32:16की उस सर्वव्यापक की उस नाम की जिसे नाम कहते जेता तित्ता तित्ता
- 32:28नाम ये सारा पसारा इसको नाम कहते। शब्दों को नाम मत समझ लेना यहीं
- 32:37उलझ जाओगे, कहीं नहीं पहुँच पाओगे शब्दों से तुम चिपक जाते हो,
- 32:44शब्दों की सबसे बड़ी कमी यही तुम शब्दों से चिपक जाते।
- 32:49हो? और चिपकाहट तुम्हें मुक्त नहीं
- 32:52होने देते चिपकाहट तुम्हारी पर बोझ बन जाती है इसलिए नाम का मतलब
- 33:02बाबा ने साफ कर दिया। जेता पीता तेता नाम।
- 33:12बिना न ही कोठा देर इस नो प्लेस विदाउट हाउ मैनी पोर्टेंट ईशा वास
- 33:27में हम सर्वबंजात। ईश्वर से जगत के कण कण में
- 33:34विद्यमान है। उसको नाम कहते हैं राधा राम
- 33:39अल्लाह, वह गुरु। सतनाम इनको नाम नहीं कहते, यह
- 33:43शाब्दिक नाम है और ये मन का हिस्सा है।
- 33:49और बाबा कहते हैं, इस मन के हिस्से को क्रॉस करना टाइमलैसनेस
- 33:54में जाना है, मन से पार जाना है, उसी को बाबा कहते हैं मन में मन
- 34:04ही काल है, मन ही समय है। मन ही व्यवधान है मन से ही तुम
- 34:12बंधे हो, मन को ही तुम मैं कहते हो इसको क्रॉस कर जाना है, इसको
- 34:20लांघ जाना है। इसकी सेवाओं को लांघ जाना है और
- 34:25मन के। पार हो जाना है।
- 34:30फिर जो मन के पार हो गया उसकी महिमा कहीं नहीं जा सकती।
- 34:37तद भी तब गुणा ना ईश्वर में याद है, मनने का वह कर्ण भी चार्ज।
- 34:46तो बाबा कहते हैं बड़े स्याने स्याने लोग हैं बुद्धि से उसे
- 34:51पकड़ना चाहते हैं, पकड़ न पाएंगे क्यों पकड़ न पाएंगे जैसे गागर
- 34:59में सागर समता नहीं तो बुद्धि एक गागर है।
- 35:06और वह विराट सागरों का सागर इतना बड़ा सागर है लिमिट लेस वह कैसे
- 35:13सुना पाएगा लिमिटेड गागर के भीतर लिमिट लेस कैसे आ पाएगा?
- 35:26मन ने का वह कर्ण विचार जो मन से पार हो गया, जो टाइमलेसनेस में आ
- 35:32गया, जो मन की बाउंड्रीज़ को क्रॉस कर गया उसके बारे में विचार
- 35:38करते हैं विचार फिलोसोफर दार्शनिक लेकिन काश।
- 35:44वह विचार कर पाता है ना तो लिखा जाता।
- 35:51है। ना उसको लिखने वाला कोई है, ना
- 35:54उसको लिखने वाली कोई कलम बनी ना उसको लिखने वाली मांडने वाली कोई
- 36:00शाही बनी लिखते रहो। तो बाबा कहते हैं मूर्ख लोग मूर्ख
- 36:09लोग उस परमात्मा का विचार करते हैं, समझदार लोग उस परमात्मा लीन
- 36:19होने के लिए उपाय करते हैं, यात्रा करते।
- 36:26बैठे बैठे विचार करते हैं। दार्शनिक इसे ही शास्त्रार्थ कहा।
- 36:37गया तो बाबा कहते हैं देखो। वह इतना फिराट है, तुम उसका एक कण
- 36:52खोज भी नहीं सकते और बना भी नहीं सकते।
- 36:55ये बना कैसे ये जान नहीं सकते तुम इसके भीतर के अणुम।
- 37:01इलेक्ट्रान प्रोटन न्यूट्रॉन, तो तुम खोज लोगे, लेकिन क्या बनावे
- 37:09पाओ? हाँ बेटर कैन नीदर बी कैर्री ऑर
- 37:17कैन बी डिस्ट्रॉइड। क्या कहते हैं बाबा?
- 37:26जप जी को मैं सभी शास्त्रों से ऊपर रखता हूँ।
- 37:32जप जी को मैं सभी शास्त्रों से ऊपर रखता हूँ काश।
- 37:37तुमने जब जीके से ही अर्थ समझे। ओके लेकिन जब जी का अर्थ बाबा ही
- 37:50जानते हैं। मन्ने शब्द मैंने शुरू किया,
- 37:57मन्ने की गति कहीं न जाए। उसकी परिभाषा नहीं की जा सकती।
- 38:05जे को कह पच्छे पच्छताये क्योंकि उसकी परिभाषा इतनी विराट इतनी
- 38:13बराठ तुम लिखोगे फिर भी कम पड़ जाएगी।
- 38:20तो बाद में पछताओगे तुम मन्ने की गति कहीं ना जाए, जो को कहे पीछे
- 38:30पछताए कागद, कल मने लिखन हाथ मने। मुल्ख लोग।
- 38:40स्याने विचार नहीं करते स्याने तो यात्रा करते हैं, स्याने डग भरते
- 38:47हैं, स्याने वहाँ तक जाने का प्रयास करते।
- 38:53हैं। जाने वहाँ तक जाने का उपाय करते
- 38:57हैं और जो शास्त्रार्थ करने वाले लोग।
- 39:02हैं। वो शास्त्रार्थ करते हैं, बहसबाजी
- 39:08करते हैं, विचार करते हैं। कागज कल मना लिख्खनभार मनने का
- 39:17वहकरण विचार जो मन की सेवाओं को लांघ गया, सही मालिक वहीं है,
- 39:29बाकी तो सभी को। जैसे ही तुम मन की सीमाओं को लांघ
- 39:36गए मान इंद्रियों का राजा तो मन तो तुम्हारे वश में आ ही जाएगा,
- 39:43इन्द्रियां भी तुम्हारे वश में आ जाएंगे और इतना आनंद है।
- 39:50जहाँ मन में इस शब्द को आप अंडरलाइन करना।
- 39:56है। बार बार मन में शब्द बोलेंगे मैं
- 39:59परिभाषा मैंने एकदम से बड़ी लंबी चौड़ी परिभाषा आपको।
- 40:02समझा। जो मन न हो गया, जिसने मन की
- 40:16सेवाओं को पार कर लिया, मन एक कोलाहल है।
- 40:19हलचल है। शोर।
- 40:21है जो उसकी बाउंड्रीज़ को पार कर दिया लांघ गया वह क्या?
- 40:31वह शोर से पार हो गया। मैं रोज़ कहता हूँ, तुम्हारा राम,
- 40:38तुम्हारा अल्लाह, तुम्हारा सतनाम वाह गुरु तुम्हारी राधा, तुम्हारा
- 40:46कृष्ण सब शो। ओके शब्द है।
- 40:51शब्द शोर जो मरने हो गया वह शोर से पार हो गया, शोर की बाउंड्री
- 41:01को उसने लांघ लिया। शोर टाइम में है।
- 41:06और जो मन में है वह टाइमलैसनेस में वह मौन हो गया।
- 41:13वह परम मौन हो गया। इतना परम हो गया साँसों वो आ रहे
- 41:26हैं। साँसों ज़रा धीमे चलो वो आ रहे
- 41:38हैं साँसों ज़रा धीमे चलो दिल की धड़कनों से हुई इबादत में खलल
- 41:46पड़ती है। जब दिल धड़कता है तो थोड़ा सा सो
- 41:56कितना ही पेन कर जाए। तुम कहते हो पेन ड्रॉप साइलेंस,
- 42:00लेकिन उसका पता चलता है अगर इतनी ज्यादा सन्नाटा हो।
- 42:07इतनी ज्यादा सुनी तो हो इतना भर मून हो तो पिन भी गिरेगा, सुई पिन
- 42:14ऑल पिन तो उसका शोर भी तुम्हें सुनेगा?
- 42:19पिंटर ऑफ साइलेंस ही सही कहते हैं।
- 42:28तो बाबा कहते हैं मन मन के बाहर जो चला गया, वह परमात्मा की रजा
- 42:36में रहना शुरू हो गया। क्यों हो गया?
- 42:41बड़ी प्यारी बात है। अब इसको ध्यान से सुन।
- 42:50मन की बाउंडरीज़ को जो लांघ गया, वह हो गया, बिलकुल होंठ खिल गए।
- 43:06मन ने बोलना बंद कर दिया हरयाणवी भाषा में कहें तो मन ने बकवाद
- 43:13करने बंद कर। दिया।
- 43:19चक चक, चक चक करता है मन हर। तो उस बकवास से तुम पार मैंने कल
- 43:32भी कहा था परमात्मा का नाम शोर है ये बात से भी।
- 43:47इबादत ही शो है, मौन में खलल पड़ती है।
- 43:58तुम साँस भी लोगे ना, उसका भी शोर?
- 44:04जब तुम परम ठहराव में आ जाओगे तो मैं अपना ही श्वास।
- 44:08सुनेगा? उसकी भी एक शोरगुल की ध्वनि है,
- 44:16लेकिन तुम इतने शोर से गुजर रहे हो।
- 44:20कि यह सूक्ष्म शोर तुम्हें सुनाई नहीं।
- 44:22पड़ता। ये थोड़े से डेसीबल तुम्हारे
- 44:27कानों को आवाज का प्रभाव दे नहीं पाते।
- 44:31है, आवाज नहीं करा पाते है। जो मन की बाउंड्री से पार हो गया।
- 44:45कल एक प्रश्न आया था बाबा मैं आपकी वीडियो को थोड़ा तेज सुनता
- 44:52हूँ, डेढ़ पे सुनता हूँ, दो पे सुनता हूँ मुझे पता नहीं ये भाई
- 44:56ये हिसाब साहब आपको ही पता? है।
- 44:59तो जल्दी जल्दी निपटा देता हूँ। क्या वो शब्दों के साथ ले?
- 45:03बढ़ते बढ़ते? जो बात आती है फिर क्या मैं उससे
- 45:08चूक जाता हूँ? बिल्कुल चूक जाता हूँ।
- 45:12अगर ऐसा होता तो मैं ही डेढ़ और दो के ऊपर बोलना शुरू कर देता।
- 45:22ठहराव कहाँ कर लेता और तुम्हें मैंने शब्द नहीं सुनाने हैं ध्यान
- 45:30रखना दो शब्दों के बीच का जो मौन है वो सुनाना है और वो तुमने
- 45:37सुना। तो तुम्हारा सारा सुना बेकार।
- 45:42है। सुनने की कला बाबा ने बताया सुनिए
- 45:47दुख पाप का नाश महावीर ने कहा श्रावक बन जाओ, श्रावक होने की
- 45:53कला यही है ठहराव को सुनो तुम। शब्दों को बेशक करना सुन शब्द तो
- 46:02तुम्हारे बनाए हुए हैं, ठहराव तुम्हारा बनाया हुआ नहीं, वह जो
- 46:08भीतर से परम ठहराव परमों से उठ रही है हुंकार के ध्वनि।
- 46:18और चुप जाते हो तुम वही तो रस है। तो शब्दों को चाहे तुम चूक जाना,
- 46:28लेकिन शब्दों के भीतर जो ठहराव है जब तुमने डेढ़ या दो के ऊपर सुनना
- 46:34शुरू कर दिया। तो तुम ठहराव को भी चुककर, इसलिए
- 46:40मैं किस गति से बोलता हूँ उसी गति से सुनो दो बार सुन लेना नहीं
- 46:51वक्त है चार वीडियो मत सुनना। ये गलत काम है।
- 46:56तुम्हें तुम एक ही वीडियो को प्रमाणिक रूप से सुन लेना नॉर्मल
- 47:02इसमें जैसा मैंने बोला वैसा तुम भी ठहर जाना।
- 47:09बात तो ठहराने की है और तुमने ठहरा कुछ सुना नहीं तो तुम ठहरोगे
- 47:14फिर कल प्रश्न आया था, मैंने कहा मैं जवाब दे दिया जैसे मैंने
- 47:25बोला। अंतःस्तर से जो लिपटते बढ़ के बात
- 47:30आए, वो उस मौन में थी, शब्दों में नहीं थी, और मौन में थी और मौन ही
- 47:39तुमने गुम कर दिया तो फिर तुम पूरे तो नहीं सुन पाए?
- 47:43सुन तो पाओगे लेकिन अनसी सुन पाओगे?
- 47:48पूर्ण नहीं सुन पाओगे, इसलिए मैं कहता हूँ तुम कहते हो मैं चार
- 47:54वीडियो रोज़ सुनता हूँ मत सुनो, चार वीडियो मुझे किसी व्यूस की
- 48:00जरूरत नहीं है, मुझे चाहिए तुम्हारा आनंद मेरा लक्ष्य।
- 48:07तुम्हारे हृदयों को तृप्त कर तुम्हारे हृदयों को वो कल्प पुरूष
- 48:12की छांव दे देना, तुम्हारा हृदय शान तृप्ति की उसमें आभा छलकने
- 48:26लगा। तुम ठहर जाओ और ठहर का वही है जो
- 48:31तृप्त हो जाता है तो मत सुनना दो चार वीडियो उसमें सुनना बस एक ही
- 48:39सुन लेना आंधी आंधी करके सुन लेना अगर वक्त लेकिन सुनना ओरिजिनल
- 48:45फॉर्म में। बिल्कुल ओरिजिनल स्पीड को मत चेंज
- 48:52करना, यह तो तुमने काम की तरह ले लिया।
- 48:56ध्यान को श्रवण को भी तुमने काम बना लिया कि निपटाना है जल्दी
- 49:04जल्दी। लेकिन याद रखो, यह तरीका गलत जैसे
- 49:13बोला गया हो, बिल्कुल वैसा ही अगर एक अंश का लाखों में सभी तुम चूक
- 49:22गए। ये खुद परमात्मा बोल रहा है
- 49:31आहुंतों सर्व पापे ब्यो मोक्ष में महासूचा मैं तुम्हें सभी प्रकार
- 49:39के पापों से यानी दुखों से मुक्त। तो जीस शैली में बोला क्या जीस
- 49:50स्पीड में बोलेंगे बिलकुल उसी स्पीड में सुन लो जल्दी मत करो
- 49:593000 वीडियो है 2000 वीडियो है लंबी लंबी वीडियो है।
- 50:05तुम कैसे सुन जल्दी मत करो, ये जल्दी तुम्हें मार डालेगी जल्दी
- 50:13में हड़पड़ाहट होती है जल्दी में ठहराव नहीं होता, पर मैंने
- 50:21तुम्हें सीखाना है ठहराव। तुम तो फिर सुनने में भी गड़बड़
- 50:27करने लग गए, इसीलिए तो महावीर ने कहा कि सम्यक श्रावक बन जाओ, बहुत
- 50:34बड़ी कड़ा है, कहा कि कलम न लिखन है, मरने का वहकरण की इच्छा।
- 50:47जो लोग उस विराट को बैठकर विचार करते हैं, शास्त्रार्थ करते हैं,
- 50:54वह। मने को समझने पर वह मने जो समय और
- 51:02मन। की बाउंड्री से पार हो गया।
- 51:06मान और इंद्रियों का मालिक हो गया, उसका विचार नहीं हो सकता,
- 51:14उसका एनालिसिस नहीं हो सकता उसका। द्रव्यों का परिवार नहीं लिखा जा
- 51:23सकता, उसको तो पिया जा सकता है, पियो तो बाबा नानक नहीं।
- 51:35मैंने कहा पहला शब्द पिपेह से लिया पियो, पियो।
- 51:49दो कुट पीला दे साकिया, दो कुट पीला दे साकिया बाकी।
- 52:08मेरे ते रोड दे दो, कुट पिला दे साकी, बाकी मेरे ते रोड दे।
- 52:26दो कुट पीला देसा ये दो बूट पीनी होती है।
- 52:32उसको ही तुम काम की तरह निपटाने लगे पियोज जल्दबाजी में काम
- 52:42समझकर। निबेटने की कोशिश मत करो ठहरों
- 52:50बड़े आनंद से सुनो सभी काम धाम जब खत्म होते हैं तब आराम से सुनो।
- 52:58मैंने कहा रात्रि को विश्राम करना होता है।
- 53:02सब काम धाम दिन के आपाधापी खत्म हो गए।
- 53:07अब कोई दफ्तर नहीं जाना, कोई दुकान नहीं खोलना।
- 53:12अभी तो बस तुमने खाना खा लिया और सोना अब मेरी वीडियो को लगा ले।
- 53:22जब कुछ न करना वाकई है उन्हीं परम ठहराव के लम्हों में, मेरे तत्व
- 53:32की बात तुम्हारे भीतर। कहा कि तू कलम न लेखन हार, मन्नी
- 53:44का वह कर्ण विचार उसके ऊपर विचार मत करना।
- 53:49बाबा कहते हैं वो लोग मूर्ख हैं जो मन्नी के ऊपर विचार करते हैं।
- 54:00जो समय सीमाओं को लांघ गया वर्म चुप्पी में चला गया पर मौन में
- 54:06उतर गया उसका शास्त्रार्थ कभी मत करना, उसकी बहस, डिस्कशन कभी मत
- 54:14करना। उसकी डेफिनिशन कभी मत लिखना,
- 54:24क्योंकि ही कैनट डिफाइन एट ऑल। तुम चूक जाओगे।
- 54:33अगर उसकी डेफिनिशन्स में पड़ेगा तो बड़ा बड़ा उसका परिवान ही नहीं
- 54:39मापा जा सकता। वो कितना कहाँ तक फैला, कभी
- 54:46वैज्ञानिक जान नहीं पाए और कभी वैज्ञानिक जान नहीं।
- 54:54वह विराट ही क्या हुआ जीसको सूत्र ने माप दिया सूत्र जिसे माप न सके
- 55:02वो विराट और उसे ही मरने कहते। है।
- 55:08बाबा। इतने सीधे शब्द नहीं है जीतने तुम
- 55:14शब्दों की अर्थ करते थे। हो?
- 55:18टाइम की बाउंडरी से पार समय की सीमाओं को लांघ गए समय ही बाधा
- 55:24है। मन ही बाधा है।
- 55:27काल ही वादा है इट्स ए बैरियर ह्यूज बैरियर बहुत बड़ी बाधा है
- 55:33और एकमात्र बाधा है क्योंकि इस समय के भीतर इस संबंध के भीतर
- 55:40तुम्हारा सारा कचरा भरा पड़ा है। वो विचार हूँ।
- 55:46वो सूचनाएँ हो, वो कल्पनाएँ हो, वो इच्छाएं हो वो पुराने जन्मों
- 55:52की स्मृतियाँ हो, सब भरा पड़ा है भीतर कचरा और तुम इस समय उलझ गए
- 56:01तो तुम बंद हो गए और यही तो तुम हो आज।
- 56:11तुम समृतियों से बंधे हो, भावनाओं से बंधे हो, कल्पनाओं से हम ये
- 56:18करें, बंधे हुए हो। इच्छाओं से बंधे हुए, वासनाओं से
- 56:28बंधे हुए विचारों से बंधे हुए सूचनाओं से बंधे हुए ये सब बंधन
- 56:34और इन बंधनों से ही मुक्त होना है।
- 56:38ऐसा नाम रंजन और ये नाम कुछ ऐसा। जो आँखों से देखना चाहता है।
- 56:51तुम जपना मत इसको यह ना बोला जाता है ना जुबान से परिभाषित होता है
- 57:02निर अंजन ना आँखों से देखा जाता है।
- 57:07न इस पर विचार किया जा सकता है। तुम इन संतातों में मत पढ़ना, ये
- 57:17प्रयास तुम्हारे संताप में तुम्हारे प्रयास व्यर्थ हो
- 57:22जाएंगे। आखिर में।
- 57:24फिर तुम पछताओगे, जे को कहे पाछ पछताए ऐसा नाम निरंजन हो जे को मन
- 57:40जाने मन को। हर कोई मन से उस मन से पार गए हुए
- 57:48व्यक्ति के बारे में सोचता है विचार करता है।
- 57:56उसको सेवाओं में बांधने की, उसका परिमाण खोजने की, उसका मेज़रमेंट
- 58:02करने की चेष्टा करता है। जे को मन जाने मन को ऐसा नाम
- 58:14निरंजन। यह नाम आपको बड़ी भ्रांतियों में
- 58:18डाला गया। बाबा कहते नाम ये है जो आँखों।
- 58:24से देखा नहीं जाता। जीवा से जिसका उच्चारण नहीं होता
- 58:31कागज कलम न लिखनहार सारी धरती को बना लो तुम कागज।
- 58:38थपेड़ों को बना लो तुम कलम पहाड़ों को बना लो तुम स्याही
- 58:44समुद्रों में गिराके उसे काला कर। दो।
- 58:47और सरस्वती खुद अपने हाथों से सर्बकालम तदपी तप गुणा नमीश परम न
- 58:54याद। फिर भी उसके बारे में कुछ लिखा
- 58:59नहीं जाएगा। लेकिन क्या कर रहे हैं, क्या कर
- 59:03रहे हैं? बहुत से लोग यहाँ उसके बारे में
- 59:07बोलने का प्रयास करते हैं और तुम भ्रमित हो जाती तो उनके पांव
- 59:14छूते। जबकि उन्हें खुद ही पता नहीं और
- 59:18बाबा कहते हैं ऐसी मुर्दा मत कर वह विचार करने योग्य है ही नहीं।
- 59:26वह तो पी नहीं पिया जाता है, सोचा नहीं जाता।
- 59:40विचार का अंश नहीं, यह पीने का मसला है, शास्त्रार्थ का मसला
- 59:51नहीं है, यह पीने का मसला है। और जब तक मद ही नहीं जाते तो
- 59:59मदहोश कैसे हो जाओगे? और होना है मदहोश होना है उस
- 1:00:06मदहोश के आलम में और मदहोश भी इतनी।
- 1:00:12के समुद्रों से समुद्रों जैसे समुद्रों से, समुद्रों से आदि
- 1:00:20नहीं अंत नहीं, जिसका इतनी मस्ती, इतनी मस्ती जिसका कोई परम।
- 1:00:32वहाँ तक जाना शब्दों की डोर से तो कैसे जाओगे?
- 1:00:40ये असंभव कार्य है, इसे छोड़ दो, बाबा कहते हैं ऐसा नाम निरंजन सो।
- 1:00:50जे को मन ना जाने मन को आए। अगर कोई मरने की बात को मन से
- 1:00:59सोचना चाहेगा, मन से डिफाइन करना चाहेगा तो वह फिर मुड़ साहे करे।
- 1:01:13फिर शंकराचार्य की तरह शास्त्रार्थ ही करता करे।
- 1:01:19इसे ही बाबा मूड कहते हैं। मुर्ख कहते।
- 1:01:22हैं तो उसके बारे में विचार मत करना।
- 1:01:28तुम सयाने हो सकते हो, विचार करके दार्शनिक हो सकते हो, फिर हो सकते
- 1:01:34हो लेकिन ज्ञान ही नहीं हो सकता, दार्शनिक हो सकते हो।
- 1:01:42सूचनाएं बहुत भर जाएंगी, लोगों को पढ़ा पाओगे।
- 1:01:48अच्छे से तनख्वाह कमा पाओगे, जोड़ लोगे हिमालय पर्वत जितना पहाड़ों
- 1:01:57का अंबार लगा दोगे धन बड़ा होगा। तुम्हारी शोहरत बड़ी होगी,
- 1:02:03तुम्हारा नाम बिकेगा। लोग तुम्हारे चरणों में नतमस्तकों
- 1:02:07होंगे और आखरी बात बड़ी क्रांतिकारी इसे ध्यान से सुन
- 1:02:19लेना बाबा कहते हैं। मन की बाउंड्री से पार हो के
- 1:02:29तुम्हें ऐसा लुत्फ आएगा, ऐसा लुत्फ आएगा तुम्हें तुम उस तूफान
- 1:02:38के आगोश में घर जाओगे। तुम्हें वो तूफान गलबकड़ी डाल
- 1:02:48लेगा। और।
- 1:02:54तुम उसकी गिरफ्त में ऐसे पकड़े जाओगे, तुम निकलना भी चाहो तो
- 1:03:00निकलना। ऐसा नाम निरंजन जे को मन ना जाने
- 1:03:08मन कोय। जब ऐसा आनंद आएगा तो वह पीकर ही
- 1:03:16मान ना उससे पहले। तुम्हारी दिक्कत ही है तुम्हारी
- 1:03:23वेस कमजोर कमजोर क्या है ही इसलिए मैं उस सृष्टिकर्ता का आभार।
- 1:03:39मुझे शास्त्र ने दिए पहले जीस दिन पहली घटना ट्रेन की घटी।
- 1:03:47मैं तो साइंस एंड गॉड के ऊपर भाषण से क्या और ट्रेन में ये घटना घट
- 1:03:56गई? मुझे पहले बाबा ने शास्त्र नहीं
- 1:04:01दिया। बाबा कहते हैं गर्मी आवे कपड़ा
- 1:04:06नदरी मूक अखबार बस उसकी नजर हो गई।
- 1:04:10वह जानता है व्यक्ति पहुंचेगा कैसे उस पीग पे?
- 1:04:16सुपर एनलाइटनमेंट में कैसे पहुंचेगा परम कॉन्शियसनेस में
- 1:04:22सुपरकॉन्शियसनेस में कैसे जाएगा वह जानता है और क्या जानता है
- 1:04:28किसे सुन यह मोरल है। यह रास है और शास्त्रों में
- 1:04:34उपनिषदों में लिखा है। रसोवैस वह रस है रस क्या रस है
- 1:04:42तुम पहले अच्छी तरह से जान लो जीसको तुम भज रहे हो वह है भी यही
- 1:04:50गड़बड़ है। उखड़ जाएंगे तुम्हारे तंबू।
- 1:04:57यह मेरे शब्दों का तूफान का वेग इतना प्रबल कि तुम्हारी धारणाएँ
- 1:05:02तुम्हारी आस्थाएँ तुम्हारी मान्यताएँ आसमान में उड़ जाएं
- 1:05:10क्योंकि तुमने देखा तो है। और बिना देखे मान ना बहुत बड़ी
- 1:05:20मूडता है। बाबा कहते हैं ऐसे ही मत मान
- 1:05:24लेना। मरने की गति कहीं ना जाए जो कि
- 1:05:33कहे पाछ पछताए पछताना पड़ेगा अगर मान्यताओं के सहारे पर तुमने वो
- 1:05:42विशाल महल खड़ा कर दिया लेकिन नींद तो है नहीं।
- 1:05:49धरती के ऊपर ही तुमने 100 मंजिला महल खड़ा कर लिया, बड़ा आलीशान
- 1:05:57सारी उम्र की कमाई में झोंक दी, लेकिन फाउंडेशन गायब है।
- 1:06:09तुम्हें पता नहीं, वो है के नहीं है मेरी बात को ध्यान से समझ
- 1:06:13लेना, इसलिए तुम्हारी आस्तिकों की आस्तिकता को क्षण भर में नष्ट
- 1:06:22किया जा सकता है। क्यों?
- 1:06:29सर फाउंडेशन है, नीम में नहीं है और कायदा ये कहता है कि जितनी
- 1:06:36उचाई महलों की इमारत की जानी चाहिए, उतनी ही निचाई डोंगाई भी
- 1:06:44होनी चाहिए। वृक्ष जितना ऊंचा जाएगा, उतनी ही
- 1:06:48गहरी जड़ें भी तो होनी ही चाहिए। छोटे से पौधे की जड़ कोई ज्यादा
- 1:06:56बड़ी नहीं होती, लेकिन विशाल वट वृक्ष और पीपल की जड़ें देखना तुम
- 1:07:03कई कई घरों तक। फैली होती है।
- 1:07:08जितनी ऊँचाई को छुएगा, पेड़ उतनी ही गहराई में होना चाहिए, और
- 1:07:14तुम्हारी तो गहराई है ही क्योंकि तुम मन से पार नहीं।
- 1:07:22हुए। आज वे मन के स्वाला मेरे सामने
- 1:07:29मुँह पाए खड़े होते हैं तुम्हारे बाबा ये क्या है कैसे तुम हाथ लगा
- 1:07:36दोगे अंगूठा और कैसे हम तो हो जाएंगे जो उतरते नहीं बात?
- 1:07:43नहीं उतरेंगे बेटा क्योंकि तुम कच्चे कच्चे चल और अगर कुम्हार ये
- 1:07:54गलती कर दे घड़े को पकाने से पहले घड़े को आग देने से पहले।
- 1:08:05अगर उसको पानी मत बो दे, पानी भरना शुरू कर दे तो क्या हाल
- 1:08:10होगा? कच्चे घड़े को बिना औ में पकाए।
- 1:08:20टन टन करता। जब तक पक ना जाए और तुम समुद्र
- 1:08:25में उसमें पानी भरने की चेष्टा करोगे तो होगा क्या?
- 1:08:30कभी नहीं डुबोया तो डुबो के दबे कच्चा गड जैसे ही तुम पानी में
- 1:08:37डुबोओगे। जल भरने के लिए वह घड़ा समुद्र
- 1:08:45में ही व्यस्त हो जाए। टुकड़े टुकड़े हो जाए, बस ऐसे ही
- 1:08:51तुम्हारी मान्यताएँ हैं तुमने उसका जाप किया जीसको तुमने कभी
- 1:08:58देखा? और क्यों किया इन पथ भ्रष्ट मूड
- 1:09:11गुरुओं के कारण जिन्होंने कहा बस तुम जब हो?
- 1:09:23एक व्यक्ति मुझे कह रहा था। नाम जपोजी ऐसे ऐसे।
- 1:09:39द्रव प्रहला जब यो हर जैसे नामजभोजी हैं से।
- 1:09:56ऐसे ध्रुव पहला जब वो हर जैसे। अब तुम गा तो देते।
- 1:10:15लेकिन बाबा कहते हैं जब तक ना देखूं अपनी नैनी तब तक ना बाबा कह
- 1:10:26देते कि ठीक नाम जपूँ ये शब्द कहने की क्या जरूरत है?
- 1:10:32ध्रुव प्रहलाद जप्यो हर इज्जत से क्या हुआ अब यहाँ से बस ये प्रसंग
- 1:10:40अंतिम है थोड़ा सा शांति रखो, सुनने की भी जल्दी होती है भागने
- 1:10:49की भी जल्दी कहाँ जाओगे? क्या करोगे ध्रुव प्रहलाद जप्यो
- 1:11:01हरि जैसे सबसे पहला काम जो करना है श्रद्धा विश्वास।
- 1:11:12हो? और मन से नहीं दर्शन बड़ा मुश्किल
- 1:11:21काम, लेकिन तुमने इसे आसान समझ लिया।
- 1:11:25क्या करें तुम्हारे राधे राधे कहने वाले लोगों ने?
- 1:11:30इसे घोषित ही कर दिया और राम राम करते रहो, तुमने कहा ये तो आसान
- 1:11:39मसला है लेकिन प्रहलाद नहीं क्यूँ जप हो?
- 1:11:46प्रहलाद ने जीस खम्भे के साथ प्रहलाद ने नीचे पटना था।
- 1:11:53उस लाल आग में जलते हुए खम्भे के ऊपर एक कीड़ी देख ली।
- 1:11:57जलती हुई चींटी, प्रत्यक्ष दर्शन ही तुम्हारी श्रद्धा को।
- 1:12:08असीम ऊंचाइयों को लेके वो टूटेगा। प्रहलाद ने जब दर्शन किये है तो
- 1:12:22कहानी। लेकिन तुम्हें समझाने की चेष्टा
- 1:12:26है संत पुरुषों की ऐसे ही मत शब्दों का उच्चारण करने लग जाना
- 1:12:35जरूरी है। श्रद्धा तो ये जो पूछने वाले लोग
- 1:12:41हैं ये गलत नहीं है, ठीक है। श्रद्धा नहीं आ गई है कि चलो
- 1:12:48अंगूठा लगवाने क्या फर्क पड़ता है तो ऐसे मत आ जाना भाई श्रद्धा
- 1:12:56विश्वास अगर नहीं है तो अपना भी वक्त खराब करोगे।
- 1:13:02और मेरी मस्ती में भी खलल डालोगे? इबादत में भी से भी आनंद में खलल
- 1:13:11पड़ती। है।
- 1:13:17मत खराब करना, अपना समय मत खराब करना मेरी मस्ती।
- 1:13:25मुझे पीर नहीं है, वह ऐसी कि कितनी भी पीते जाओ जियरा बर्तन जब
- 1:13:36देखा प्रहलाद ने यह चींटी जा रही है और यह जलती नहीं।
- 1:13:46और मुझे हुक्म हुआ कि से जलते हुए खम्बे को लिपट जाओ।
- 1:13:51डर राहत स्वाभावित है, जलता हुआ खंभा उससे चिपटेगा।
- 1:14:03तो चिपक ही जाएगा, लेकिन जब ये करामात देखी छीटी जा रही है और वो
- 1:14:11जल नहीं रही, इसे क्या कहते हैं? नदरी मोक द्वास नजर हो गई।
- 1:14:22परमात्मा जब तक तुम्हें नजर नहीं देता और नजर किस रूप में आती है,
- 1:14:28विश्वास के रूप में, श्रद्धा के रूप में और इतनी गहरी श्रद्धा के
- 1:14:32रूप में तुम भी चाहो तो भी न तोड़ पाओगे।
- 1:14:36कैसे भूल पाऊंगा मैं? 50 साल से भी ज्यादा प्राणी हो
- 1:14:42गया मेरे हृदय की गहराइयों में सदा ही छूती कौन था वो अस्तव्यस्त
- 1:14:53हो गया सब कुछ डॉक्टर बनने की ख्वाहिश थी धराशायी हो गई चकनचूर।
- 1:15:01कौन वो जिसने एक लोथ को उठाकर नास्तकों को थोड़ा सा मुश्किल
- 1:15:11लगेगा? आज अमन तुम सुना मत करो भाई
- 1:15:17वोमिटिंग आ जाएगी। देखा प्रहलाद नास्तिक व्यक्ति
- 1:15:28किसी भी बात को मान नहीं सकता और यही उसका दुर्भाग्य है मार्ग के
- 1:15:35स्वाधिशाली ने। प्रहलाद ध्रुव भाग्य सर कुकी इतनी
- 1:15:45बड़ी सृष्टि के ऊपर तुम मन्नी का वे कर्ण विचार तुम विचार करते हो
- 1:15:54कैसे बनी किसने बनाई फिर उसको? बनाया।
- 1:15:58फिर उसको किसने बनाया? ये महज़ शास्त्र के अलावा और कुछ
- 1:16:02नहीं है तो प्रहलाद चिपट गया उस खम्ब के।
- 1:16:13साथ। ऐसे जपना कब जपना, पहले श्रद्धा,
- 1:16:20विश्वास, रोपणी या व्यायाम बिना न पशंती उसके बिना तुम शुरू ही मत
- 1:16:26करना अपना सफर बेकार जाएगा ये सब। कितना ही वक़्त तुमने कराया मुझे
- 1:16:34कह देते हैं लोग 35 वर्ष हो गए मेरे को पांच नाम जब देखो बाबा
- 1:16:38कैसे छोड़ के आ जाऊं आपकी परवेशन तो बड़े प्यारे हैं, सुन लेता हूँ
- 1:16:44लुत्फ के लेकिन करूँ का 35 वर्ष बेकार हो जाएंगे।
- 1:16:50मैंने कहा फिर? तुम बने रहो ठेके रहो जहाँ 35
- 1:16:55खराब हो गए वहाँ 50 खराब हो जाएंगे क्या फर्क होता है तब खराब
- 1:17:01हो ही गए हैं तो वह जन्म तुम्हारे लेखे इनके लेखे।
- 1:17:1235 खराब हो गए। अगर तुम में इतना साहस नहीं के
- 1:17:17तुम इन 35 को बलिदान कर सको और रहते बंदरों का उपयोग कर सको तो
- 1:17:24फिर 50 को ही तुम चले जाने दो, शायद।
- 1:17:30गुरु कहेंगे रुको, रुको ठहरों हो जाएगा, मन भी कहेगा क्या हुआ है?
- 1:17:37दुख छाओं का खेल आज नहीं कल हो जाए, कल नहीं, परसों परसों नहीं
- 1:17:45नर्सों कभी तो होगा ही। लेकिन जब राह गरित हो, पथ गरित हो
- 1:17:53तो पति कब कैसे पहुंचेगा, अपनी मंजिल तक नहीं?
- 1:17:59पहुंचे तो ठीक लेकिन प्रथम बात से।
- 1:18:05मन ने मन ने शब्द। बड़े प्यार है।
- 1:18:09जो मन से पार हो गया उसने देख लिया और अभी तो तुम मन के गुलाम
- 1:18:14है अभी तो मन तुम्हें सताता है दिन भर रात मन चलता है और तुम मन
- 1:18:20के आगोश। में छाये मन तुमसे नचवाता है
- 1:18:27विचार करवाता है। मने का वह करण विचार भोग भगवाता
- 1:18:34है, दौड़ाता है। कठपुतली की तरह तुम मने के गुलाम
- 1:18:42तुम इंद्रियों के गुलाम हो, लेकिन मने।
- 1:18:48जब मन से पार हो गया वह मन का गुलाम नहीं रहता।
- 1:18:54बंजरों का गुलाम नहीं रहता। एक आखिरी शब्द तुम्हें बताता हूँ।
- 1:19:00तब तक तुम भ्रम में रहोगे। तुम शब्द बांच लेते हो, शब्दों के
- 1:19:05अर्थ भी बांच लेते हो। लेकिन अर्थों के रहस्यमय नहीं
- 1:19:09प्रवेश करते। बस यही दुविधा है।
- 1:19:12यही आचार्यों की दुविधा यही सब लोगों की दुविधा यही मार्क्स की
- 1:19:17दुविधा और यही चार बात की दुविधा है।
- 1:19:22तुमने शब्द जाना बेकबिलरी बहुत है।
- 1:19:26शब्दगा अर्थ जाना और अर्थ लोगों को समझा भी दिया क्यों?
- 1:19:31क्योंकि भाई पाप भी पेट का सवाल, लेकिन मसला हल हो नहीं हल हो।
- 1:19:45मसला उस दिन हल होगा। जीस दिन तुम्हें इच्छाएं।
- 1:19:50तृप्त हो जाएगा हृदय शीतल हवाएं बहने लगेंगी सुगंधें बहने लगेंगी
- 1:20:02उस बगीचे में तुम बैठ जाओगे आनंद मग्न होकर कल्प वृक्ष के नीचे।
- 1:20:11तो बाबा का एक शब्द और मैं विश्राम लूँगा।
- 1:20:14बारहवीं फोड़ीस में 131415 बाकी रहे।
- 1:20:19अच्छा है तुमने इजाद करा दिया इजाद करा दिया उत्तर आपको मिल
- 1:20:25जाएगा। अगर मैंने जाना होगा।
- 1:20:32तो? नहीं जाना होगा तो मैंने मैं कह
- 1:20:35दूंगा भाई मुझे नहीं मालूम ही इस नॉट ओनली अननोन बटाल सो अननोन हूँ
- 1:20:40ये बात कुछ नहीं। अब सुनिए आप शब्द को।
- 1:20:50पुरस्कार से निकाली। वो कहते हैं, तब तक मैं संसे में
- 1:20:56था जो भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं।
- 1:20:58अर्जुन संसे से महाराजा संसे आत्मा विनिष्य भी जो संसे में
- 1:21:04रहता है। उसका विनाश हो ही जाया करता या तो
- 1:21:08सस्ती तरकीब में खोज लेना, किसी पर विश्वास कर लेना, किसी पर भी
- 1:21:18विश्वास कर लेना। यूट्यूब बराबर।
- 1:21:21है। जिन्होंने खुद नहीं जाना वह
- 1:21:26तुम्हें समझाने की में संलग्न है कि नहीं, नहीं, हमने जान लिया तो
- 1:21:35उनकी बातों पर यकीन कर लेना, मान लेना।
- 1:21:42पता चल जायेगा। सुकून मिला, नहीं मिला तो मैं
- 1:21:47पूछता हूँ डेढ़ वर्ष 35 वर्ष हो गए, जब अब तक नहीं मिला तो 15
- 1:21:54वर्ष है, मिल जाएगा। मैंने कहा ठीक कह रहा हूँ, ठीक कह
- 1:21:59रहा हूँ। जहाँ 35 गए जीथेगा वाणिया उथेगा
- 1:22:03बाजार क्या बात खत्म हो गई जहाँ 35 गवां दिए वहाँ 85 कमा दिए ये
- 1:22:11जन्म तुम्हारे लिखे बात तो समझ में आएगी ना हमने एक पद्धति के
- 1:22:18पीछे। पूरा जन्म कमाते हैं।
- 1:22:28उतर गए हो, उतार गए हो? मेरे मन का संशय इस।
- 1:22:51संशय को ही खत्म करना तुम किसी की भी बात को मानकर संशय खत्म हो गया
- 1:23:00ऐसा समझ लेते हो, लेकिन संशय बना ही रहता।
- 1:23:06अर्जुन का भी बना रहा जब तक उसने विराट नहीं दिखाया।
- 1:23:11कृष्ण ने जब तक कृष्ण ने अर्जुन को अपना आपा नहीं दिखाया, उसका
- 1:23:17संशय बना ही रहा तो बाबा कहते हैं कब उतरेगा संशय?
- 1:23:24कब मिटेगा सं से? अब अगर इस बात को आपने ध्यान से
- 1:23:30समझ लिया सुन लिया, गुण लिया, मनन कर लिया और इसके ऊपर तुमने प्रयोग
- 1:23:40कर दिया। सन सा मन का सन सा।
- 1:24:13कब उतर गया? जब तेरा दर सन का?
- 1:24:21प्रहलाद का संशय खत्म हो जाता है जब चींटी को देखता है, जलते हुए
- 1:24:30खम्बे के ऊपर बेकार है तुम्हारी सुविधा।
- 1:24:35अगर तुम्हारी फाउंडेशन है ही नहीं मान्यताओं के आधार पर जो फाउंडेशन
- 1:24:42तुमने खड़ी कर ली याद रखो, हल्का सा तूफान का झोंका और खंड विखंड
- 1:24:48हो जाएगा सब धूल दूषित हो जाएगा रोज़ तुम्हारी।
- 1:24:52मान्यताएँ तुम्हारी भावनाओं खंडित होती हैं।
- 1:24:55उसका कारण कारण फाउंडेशन जितनी फाउंडेशन गहरी होगी, उतना ही तुम
- 1:25:05तो बाबा विराट बड़ी क्षमता। उन्होंने मुझे शास्त्र नहीं दिए,
- 1:25:12पहले उन्होंने पहले मुझे विश्वास किया, पहले मुझे श्रद्धा दी और
- 1:25:19श्रद्धा दी वो कि चारों खाने, चित्त, बुद्धि, बुद्धि ने बड़ी
- 1:25:25चेष्टा की छटपटाई निकलने की लेकिन बुद्धि निकल नहीं पाई।
- 1:25:30कौन था? वो कौन था?
- 1:25:35वो वो चल गए। ओह मेरे मन कहाँ संस्कार?
- 1:25:51मन का संसा मन का संसा वो दर गए हों।
- 1:26:07उतर गयो उतर गयो, उतर गयो मेरे मन का संसार।
- 1:26:28इस शब्द को ठीक से जब तें धरे सन आँखों से देखना जब तक है ना देखूं
- 1:26:39अपनी नैनी तब तक ना मानो। गुरु की कहनी पे विश्वास तो थोड़ा
- 1:26:49सकता है लेकिन प्रमाण आवश्यक है। मैं तो इस राह पे चला नहीं था।
- 1:26:58मैंने बहुत बार कहा, मैं तो खरगोश।
- 1:27:00काट के आ रहा हूँ। और कोई पुण्य कर्म नहीं किया।
- 1:27:04अपनी ज़िन्दगी में 16 साल का बच्चा कर भी कर सकता है, 18 वर्ष
- 1:27:10का बच्चा कर भी कर सकता। है।
- 1:27:121970 की घटना और 52 का जन्म जैसा सिखाया गया वैसा खरगोश काटे।
- 1:27:23फराक काटे का कर्ज काटे बड़े डॉक्टर?
- 1:27:29बनने की तमन्ना थी, लेकिन सब धूल दूषित हो गई।
- 1:27:38इसे कहते हैं कृपा गुरप्रसाद। ये प्रसाद तो मुझे कहोगे बहुत से
- 1:27:47लोग पूछ रहे थे बाबा आप पर ही कहो भाई ये तो परमात्मा सोचो, क्योंकि
- 1:27:52कृपा करने वाले थे कृपा निदान से ही तो कुछ है कि उसने कृपा क्यों
- 1:27:59की? यह वह जानता है।
- 1:28:02मैं तो नहीं जाता। वो थिर गए हो मेरे मन का संसार?
- 1:28:20उतर गए हो मेरे मन का संसार जब तेन्द्र सन का ठाकुर।
- 1:28:35फिर सर में जाओ। उससे पहले समर्पण होता भी नहीं
- 1:28:40उससे पहले शरण में तुम जा भी न पाओगे हारोगे, हारोगे सत्य के आगे
- 1:28:48दर्शन करोगे भ्रांतियां टूटेंगी फिर तुम सही समर्पण कर पाओगे।
- 1:28:55तुम्हारे सभी समर्पण झूठे हैं, जो दर्शन से पहले तुम कर देते हो वो
- 1:29:03कृत्य है। समर्पण ने तुम्हारा किया हुआ
- 1:29:08कृत्य है तुमने कोई काम किया, कर्म किया समर्पण कोई कर्म नहीं
- 1:29:14है। समर्पण हो जाता है किया नहीं जाता
- 1:29:19जब तै दर्शन पायो ठाकुर तुम सर नाई आयो ठाकुर।
- 1:29:33तुम सर नाई ये पूछ रहे हैं सूक्ष्म वाले ये तो हिलादी जड़े
- 1:29:42नहीं जड़े नहीं है लाइन में। सत्य और झूठ का फैसला किया।
- 1:29:49जिसने जाना होगा वह शास्त्रों की इधर उधर की बातें इमिटेट करके
- 1:29:55तुम्हें दोहराया करें। वह अपने भीतर जाएगा और भीतर की
- 1:30:02खोज को आपको बताएगा और उसकी वाणी में खोज होगा।
- 1:30:08उसकी वाणी में ओज होगा, उसके जीने का ढंग और रंग अलग।
- 1:30:13होगा। बस ये लक्षण है जो भगवान कृष्ण ने
- 1:30:17बताए इन लक्षणों को देख लेना और उस व्यक्ति के कहवे के अनुसार
- 1:30:23चलते। हर कोई शोहरत पाना चाहता है,
- 1:30:30विश्व का चक्कर लगाना चाहता है, सुंदर दृश्यों को देखना चाहता है,
- 1:30:35स्वादिष्ट पदार्थों को खाना चाहता है, सुंदर भोगों को भोगना चाहता
- 1:30:42तो फिर उसे विराट। रस मिलान ये इसी बात का सबूत है।
- 1:30:50विराट रस को पाने वाला व्यक्ति छोटे रसों को छोड़ देगा।
- 1:30:58ऐसा नहीं जैसे हीरों को देखने वाला हीरो की खदानों को देखने
- 1:31:03वाला। हीरो के ढेरों को देखने वाला
- 1:31:06व्यक्ति जिसके हाथ में कंकड़ पत्थर होते हैं, वो छोड़ने नहीं
- 1:31:11पड़ते। छूट ही जाते हैं कंकड़ पत्थर कब
- 1:31:18छूट गए तुम्हें पता नहीं चला। तुम तो झट से जाओगे और।
- 1:31:24हीरे मोतियों को झोली में भर लो हीरो पायो गांठ कर जाओ, बार बार
- 1:31:35बापू क्यों खोल रहे हैं? बस फिर तुम मस्त हो जाओगे और ये
- 1:31:40मस्ती ही तुम्हारा। मस्ती ही तुम्हारा पजेशन मस्ती ही
- 1:31:48तुम्हारी संपत्ति मस्त हुआ फिर क्यों बोल?
- 1:32:01मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल धन्यवाद।