Latest / Baba ji Vijay Vats / 22 Jul 25 - क्या प्रेम से परमात्मा प्रकट हो जाते हैं? वो “1 दान” जो आपको सीधे परमात्मा से जोड़ देगा!
Transcript
- 0:04बाबा जी प्रणाम हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
- 0:15प्रेम से प्रकट हुई मैं जाना। इन शब्दों का गहरा रहस्यत्मक अर्थ
- 0:24समझाने का कष्ट करें ये शब्द तुलसीदास के।
- 0:47तुलसी कहते हैं, हरि व्यापक सर्वत्र समानु।
- 1:00ईशा वासु परिषद में भी यही लिखा है।
- 1:04ईशा वास्मिदम सर्वम यतकेच जगतयाम जगत जगत में भी है।
- 1:20परमात्मा और अपनी चेतना में भी है, परमात्मा जड़ में भी है, चेतन
- 1:32में भी है। परमात्मा को बहुत से नामों से
- 1:43परमात्मा को बहुत से शब्दों से नवाजा गया है।
- 1:52उसमें एक शब्द है प्रेम। उसमें एक शब्द है रहीम।
- 2:05उसमें एक शब्द है करीम जो कर्म करता है, प्रहम करता है, जो प्रेम
- 2:17करता है। तो तुलसी कहते हैं ऊहि ईशा वासे
- 2:25उपनिषद की बात तुलसी कहते हैं वह प्रेम है।
- 2:40वह प्रेम का स्वरूप है और सब जगह बोहिबो है सर्वत्र समाना सब जगह
- 2:53समाया हुआ है। ऐसा कौन सा ऋषि है?
- 3:01जिसने ये बात नहीं कही सबने कही वह एक है, सभी जगह है, अत्यंत
- 3:13दयालु है, क्षमाशील है, न्यायकारी है?
- 3:18आनंदित है। शांति से भरा बुरा है उसके गुण
- 3:34हरि व्यापक सर्वत्र समान समान रूप से विद्यमान।
- 3:40कहीं ऐसा नहीं कि यहाँ कुछ कम है, वहाँ कुछ ज्यादा है, बाकी सब
- 3:47सुनिए, तरीका क्या है पानी का, अब तुलसी कहते हैं अभी तो तुम नहीं
- 3:57बस को। प्रेम मत से प्रकट हो मैं जानूं
- 4:09अभी तो आपने देखा दूध होता है, दूध में माखन नजर आता है लेकिन
- 4:19माखन को प्रकट करना पड़ता है, मथना पड़ता है।
- 4:26दही ज़माना पड़ता है, जाग लगाना होता है, पहले उससे पहले गर्म
- 4:33करना होता है, उबालना होता है, दूध को उबालकर ठंडा करके, जाग
- 4:39लगाके दही जमाके। फिर उसको मथना होता है।
- 4:48मत कर जो निकलता है वो निकलता है अम्माखन ऐसा ही परमात्मा तो सब
- 4:55जगह है बा बनाने के लिए मैं कहा। बैनानामे नाहीं कोठा जेता कित्ता
- 5:07कित्ता आह ये जो पसारा तुम्हें नजर आ रहा है चारों ओर जो कुछ भी
- 5:14तुम देख रहे हो व्हाटएवर इट इस। इसमें वो ही तो छुपा है, उसी की
- 5:30खुशबू है, उसी की सुगंध है। लेकिन तुम्हे नजर नहीं आता, तुम
- 5:43कहोगे दिखता नहीं। इसलिए अक्सर बुद्धिवादी लोग कहते
- 5:50हैं कि जो दिखाई नहीं पड़ता वो होता नहीं, ठीक है उनका कसूर।
- 6:01क्योंकि बुद्धि के तल पर जो व्यक्ति रहेगा वो यही कुछ कह
- 6:05सकेगा। अंधा व्यक्ति कैसे कह सकता है कि
- 6:08यह रंग गेरुआ है? यह रंग पीला है।
- 6:12यह रंग हरा है, अंधे को कहना भी नहीं चाहिए।
- 6:26प्रेम से प्रकट हुआ है। परमात्मा प्रेम से प्रकट हो जाता
- 6:33है, जैसे दूध को बिलो कर मखन प्रकट होता है होता तो बीच में ही
- 6:42है उसके दूध में। लेकिन करने की कुछ प्रोसेसेस हैं
- 6:50उबालो जाग लगाओ, थोड़ी देर छोड़ दो दही बन जाएगा मत हो, मैं खना
- 7:00गया। प्रेम प्रेम एक कुंजी है।
- 7:13परमात्मा को प्रकट करने के अगर कोई कहे के प्रेम से नहीं मिलता
- 7:24तो वह मूर्ख है। बुद्धि से नहीं मिलता, ये बिलाशक
- 7:32ठीक है। बुद्धि को गंवाना पड़ता है।
- 7:37ये ठीक है लेकिन मिलता है प्रेम से प्रेम का है।
- 7:51आइए हम थोड़ा विस्तार में चले, तुमने पूछा पुत्र रहस्यत्मक
- 7:58विवेचना कीजिए तो जब तक प्रेम की कुंजी न खोलेंगे हम तक।
- 8:07तब तक परमात्मा समझ नहीं आएगा। प्रेम कुंजी अक्सर तुम प्रेम
- 8:17जीसको कहते हो परमात्मा जिसे प्रेम कहते हो प्रेम हैन वह
- 8:28अट्रैक्शन है वह मोर। ऐसा ही कुछ होगा।
- 8:33तुम्हारा अट्रैक्शन हो सकता है तुम्हारा वात्सल्य हो सकता है
- 8:45तुम्हारा हो सकता है उसको मोह कहते है प्रेम कुछ अलग चीज़।
- 8:55जीसको प्रेम हो गया और जब प्रेम हो जाता है ऐसा नहीं कि तुम उसकी
- 9:09अच्छाइयों को वरन करते हो। तुम उसकी बुराइयों को भी भर लो।
- 9:20वो प्रेमी ही क्या जो तुम्हें सर्वांगीण स्वीकार न कर ले, सर्व
- 9:31अंग स्वीकार कर ले? वहीं तो प्रेम जो तुम्हारी अच्छाई
- 9:40भी स्वीकार्य करे, जो तुम्हारी बुराइ भी स्वीकार्य करे, वही
- 9:48प्रेम आज घर में झगड़े हैं। मैं पूछता हूँ शादी अरेंज हुई कि
- 9:57लव मैरिज हुई, बाबा लव मैरिज हुई, ये तो लव मैरिज नहीं हुई बेटा
- 10:04प्रेम परमात्मा को प्रकट करने की कुंजी?
- 10:18प्रेम नहीं तो परमात्मा दिखाई नहीं देखा जैसे आँखें नहीं तो रंग
- 10:24न दिखाई नहीं। तो मैं कहता हूँ पुत्री के प्रेम
- 10:37तो न होगा, यह तो सौदे बाजी प्रेम की आड़ में तुमने नकाब हो रही है
- 10:52तो प्रेम क्या है? प्रेम है फासले का मिटज क्या कहा
- 11:06फासले का मिटज और एक तरफ से नहीं दोनों तरफ से मर जाना मैं मैं ना
- 11:15रहूँ तू तू ना रह। एक तरफ से मर जाना तो शर्त है,
- 11:28तानाशाही है। दोनों तरफ से मटो इधर भी मिटे और
- 11:34उधर भी मिटे। सर्वांगीण क्षय हो जाए, दोनों तरफ
- 11:46से क्षय हो जाए, दोनों लय हो जाए, दोनों विलीन हो जाएं, कोई न बचे
- 11:54कौन बचे शून्य बचे। अगर ऐसा है तो प्रेम हो।
- 12:06अन्यथा थोड़े वर्ष बाद तुम्हें पता चलेगा।
- 12:21जगडराम की घर वाली है जगडराम से कहने लगी तब तो झगड़ा नहीं करते
- 12:29थे, अब क्यों करते हो? जगडराम बोले क्या करूँ, प्रिय?
- 12:43तब तुम हसती थी, दांत बड़े सुन्दर लगते थे फिर जगडू राम की पत्नी
- 12:50कहने लगी पति देव हसती तो मैं अब भी हूँ तो जगडू राम बोले वो तो
- 12:59ठीक है लेकिन दांत नहीं है। और पहले तो हँसते थे, तुम्हारे
- 13:09गालों में टोय पड़ते थे गड्ढे छोटे छोटे।
- 13:22बस ऐसे ही बातों से तुम सम्मोहित हो जाते हो, इट इस नॉट लव इट।
- 13:31इस अट्रैक्स क्या खिंचाव है? ये प्रेम में भोज्य को हो गई थे।
- 13:49प्रेम सर्वांगीण समाहित कर लेता है।
- 13:56अपने भीतर तुम दोनों को समाहित कर लेता प्रेम प्रेम ऐसी कुंजी।
- 14:06तुम्हें बताऊँ प्रेम में अकेले तुम नहीं मरता है, अच्छा हो गया
- 14:12मत प्रेम में परमात्मा भी मर जाता है।
- 14:19दोनों मरते हैं। और तुम हैरान हो के सुन के जब मैं
- 14:32थर तब हरि न है अब हरि है मैं न दोनों को ही मिटना होता है।
- 14:45में भी मटता है, हरी भी मटता है। अगर तुम सोचो के परमात्मा नहीं
- 14:51मटता तुम गलती में हो। दोनों धर्म मरते हैं तभी तो
- 15:00एकाकार होते हैं। ज़रा सोचो सोचो ज़रा बोंध जब
- 15:11समुद्र में समा जाती हैं तो बोंध मर जाती हैं क्या समुद्र नहीं
- 15:18मरता, समुद्र भी मर जाता है? अगर बहुत सुक्षमता से देखोगे तो
- 15:26दोनों भरे बूंद समुद्र में या समाहित हो गए, समुद्र हो गई और
- 15:39समुद्र ने बूंद को समाहित कर लिया।
- 15:43वह बूंद हो गई, एक प्रकार से बड़ी बूंद हो गई, बूंद विराट समुद्र हो
- 15:51गई और समुद्र क्षुद्र बूंद हो गई। लेकिन तुम्हें समझ नहीं आती
- 16:01बातें। ये बातें थोड़ी गहराई में जाके
- 16:06पता चलती हैं, जीस रहस्य की बातें तुम करते हो बुद्ध ये वहाँ की बात
- 16:14है वहाँ दोनों मर जाते हैं अगरे का बचा रहा, फिर प्रेम का खाक
- 16:19हुआ। तुम ये कभी मत सोचना कि अकेले तुम
- 16:25मरोगे, वह परमात्मा भी मरेगा। तुम्हारे साथ आहू तो दोनों होते
- 16:35हैं, एक नहीं होते। तुम भी भरो, पर महात्मा ही भरेगा,
- 16:44क्योंकि उसने भी तुमको समाहित कर दिया।
- 16:52प्रेम में दोनों ही विलीन हो जाते हैं, लेकिन अगर दोनों विलीन न
- 16:59हुए। तो प्रेम नहीं, वह तो अट्रैक्शन
- 17:04है, वह तो वात्सल्य है, वह तो मो है, वह तो ममत है।
- 17:21जो बच्चन कबीर के भी हैं। कबीर कहते हैं कि मैं नहीं जाना
- 17:25है, इनको प्रेम से प्रकट हुईं मैं जाना।
- 17:31तुलसी भी कहते हैं। जो भी संत ऐसा कहता है।
- 17:39वह वंदनीय है, मुझे लोग खुश रहते हैं।
- 17:47बाबा आप जो शुरू में प्रणाम करते हो, किसको प्रणाम करते हो?
- 17:55कौन है वो तुम्हारे सामने कौन खलल?
- 17:59जीसको तुम इतनी देर तक इतनी श्रद्धा से नमन करते हो, मैंने
- 18:08कहा तुम ही हो, तुम सभी को नमन करते हो और यह मत सोचना कि
- 18:16तुम्हें नमन कर पाऊंगा मेरा। मैं जिनके विपरीत वो लूँगा जिनके
- 18:24खाल को उधेड़ूंगा उनसे भी क्षमा यार्चना करता हूँ के प्रभाव मुझे
- 18:29क्षमा करता हूँ, मैं तुम्हारी खाल उधेड़ूंगा।
- 18:38अग्रिम खेमाए जाँच न अग्रिम क्षमा प्रार्थी गुस्सा मत करना, क्यों
- 18:47तुम भी प्रभु हो? अगर गलती से गुस्सा खा गए तो इस
- 18:54नाचीज का क्या होगा? बस ऐसा मत करना, इसीलिए पहले की
- 19:00क्षमा मांग लेता हूँ। बस तुम्हें बताया नहीं तुमने आज
- 19:07पूछ लिया तो मैंने बता दिया तो मैं ये करता हूँ।
- 19:13जिनकी खालों जड़ नहीं होती है, उनसे भी क्षमा मांगता हूँ।
- 19:18और जो जिन को प्रेम से पूजकरना होता है उनके भी चरण वंदन करने
- 19:24होते हैं। तुम भी तो परमात्मा हो, मैं कभी
- 19:32शिष्यों को कह देता हूँ प्रभु ये तो बहुत अच्छा प्रश्न पूछ लिया।
- 19:39शिष्य कहते हैं नहीं, नहीं ये मत कहो आप प्रभु मत कहो और क्या कहूं
- 19:43तुम हो ये प्रभु तो प्रभु को प्रभु ही तो कहना पड़ेगा, क्या
- 19:51एतराज है आपको? मैं देख रहा हूँ तो मैं प्रभु तो
- 19:56मैं क्या एतराज? प्रेम अथव प्रकट हुआ है मैं जाना
- 20:06हमारे मास्टर थे, बचपन में पढ़ा करते थे।
- 20:10उनके पास कोई गलती हो जाती, वो बुलाते हैं।
- 20:20तो हम सोचते है आज बना लिया। खैर, लेकिन पहले वो प्रणाम करता
- 20:27है, हमें समझ नहीं आता, बाद में डंडा उठा लेते, अच्छा रगड़ा
- 20:36चढ़ाते है। हमें समझ नहीं आ रहा।
- 20:40ये कैसा व्यवहार अब जाके कहीं समझाया कि खेल उतारने से उससे
- 20:52पहले क्षमा मांगनी जरूरी है। देखिये मैं आपके लाभ के लिए कर
- 20:58रहा हूँ। मेरे इसमें कोई स्वार्थ नहीं बहुत
- 21:03है। अध्यापक, पूजनीय, अध्यापक और उनकी
- 21:06पढ़ाई हम आज आपके समक्ष बोल रहे हैं आज बच्चों में।
- 21:20वो प्रेम ना रहा वो सत्कार ना रहा तुम्हारी वो आसानी तिरंगे हो गई
- 21:33शिक्षकों किशोर तमर। हमारे वेला के जो शिक्षक थे बड़े
- 21:41ही शानदार त्रंगों से युक्त थे। देखा ऐसा कोई शिक्षक जो पीटने से
- 21:48पहले क्षमा मांगली के प्रभु। अब मैं पिटूँगा तुम्हें ऐसे तुम
- 21:58काबुल नहीं रहते क्या करूँ? लेकिन आज तुम्हें प्रभु तो दिखाई
- 22:07नहीं पड़ता इसलिए तुम पीटते बने। जीसको प्रभु दिखता था, वह पीटने
- 22:19से पहले प्रणाम करता था। एक कारण था प्रेमा के प्रविटा होय
- 22:29मैं जाना मैंने जाना। अपने अनुभव से जाना है।
- 22:36ईशा वास से पढ़कर नहीं जाना कोई शास्त्र या किसी गुरु से सुनकर
- 22:43नहीं जाना। मैंने स्वयं अनुभव से जाना है।
- 22:46कबीर कहते मैं जानता हूँ, मैंने देखा है।
- 22:50तुलसी कहते मैंने देखा है प्रेम से प्रकट होते हो।
- 23:09तो मैं उनको अदालत में देख कर मियाँ बीवी को जी जान जाता हूँ कि
- 23:18प्रेम नहीं था बस ये जगडू राम की घरवल अब हँसते हैं तो दांत में।
- 23:27अब हस्ती है तो गालों में टोई नहीं तुम किसी कारण से खिच गए थे
- 23:37वो खिचाब आज टूट गया वो ट्रैक्शन का पॉइंट आज झड़ गया।
- 23:48तो अट्रैक्शन भी खो गई है लेकिन प्रेम में ऐसा नहीं होता।
- 23:54प्रेम अकारण होता है। मोह वात्सल्य ममतव सहकारण होता
- 24:02है। कोई कारण है?
- 24:07कुछ तुमसे कोई मीठी मीठी बातें करे तुम समय जाते हो कि आज इसने
- 24:19कुछ। ऐसा कुछ कहना होगा, इसका कुछ
- 24:30स्वार्थ होगा, कोई काम धाम आया होगा जो इतनी मीठी मीठी बातें
- 24:36करता है। ये संसार है।
- 24:44प्रेम जा तो होता नहीं होता है तो टूटता नहीं, क्योंकि अहंकार ऐसी
- 24:55चीज़ है ईगो ऐसी चीज़ है जो एक बार टूट जाए, फिर से नहीं जनमती।
- 25:05तो जब दोनों का एको टूट गया और दोनों का एको टूट कर समाहित हो
- 25:12गया, एक हो गया। फिर वह पुनः टूटता नहीं है।
- 25:19फिर वह दो में निहित तकसीम होता। एक हो जाता है सदा के लिए इस
- 25:31मुकाम पर हीर बोलती है तेदोनी मेनू आंखो रंझा हिर न ख।
- 25:47मुझे कोई हीर के नाम से खिताब न करे, मुझे किताब करें, राजा के
- 25:54नाम से तीदो नहीं मैनु आंखो राँझा हिर न ख।
- 26:05रांझन रांझण कर दी कि मैं अबे रांझण हूँ मैंने रंजन रंजन की
- 26:13रिटन का लगाई मैं खुद ही रंझ हो गया फिर मट गई।
- 26:20ऐसे ही रंझ भी मर जाता है। फिर कह देती है रंजा मौन रह जाता
- 26:26है रंजा बोलता नहीं, भक्त कह देता है मैं मिट गया भगवान कहता न वह
- 26:35मिट जाता है तीन अवस्था में। पहली अवस्था में दो होते हैं, फिर
- 26:53समर्पण होता है एक के द्वारा एक बढ़ जाता है फिर अगला पड़ाव है।
- 27:06लास्ट स्टेप पहले दो होते हैं फिर एक मिटता है और फिर दूसरा भी मिट
- 27:20जाता है। जब दोनों मिट जाते हैं तो प्रेम
- 27:28अपनी संपूर्णता को प्राप्त कर सकता है।
- 27:34प्रेम संपूर्ण तुम ये मत सोचना के एक के मट से प्रेम संपूर्ण होता
- 27:42है तुम गलती? वो तानाशाह ये हो जाती है प्रेम
- 27:49में दोनों मरते हैं, सिर्फ तुम ही नहीं मरते।
- 27:56प्रेम में परमात्मा भी बढ़ जाता है।
- 27:58ये बात तुम्हें बड़ी अजीब सी लेकिन सत्य।
- 28:06दोनों का मैटरन होता है फिर फिर एक शून्य रह जाता है, एक नहीं
- 28:17रहता, शून्य रह जाता है। इसलिए संतों ने बड़ा अजीब शब्द
- 28:23इस्तेमाल किया। उन्होंने ये नहीं कहा कि एक रह
- 28:26जाता है। उन्होंने कहा कि अद्वैत रह जाता
- 28:31है दो नहीं तो फिर एक है नहीं, बड़ा अजीब मसला है।
- 28:40यही प्रेम की खूबी है। और यही प्रेम का सीकृत है।
- 28:45यही प्रेम का रहस्य है। अद्वैत दो नहीं तो दो नहीं तो एक
- 28:53है नहीं, ये तो हिसाब में नहीं आया, लेकिन हिसाब में वो आता कहाँ
- 29:00है? यही उपनिषद कहता है पूर्णमय पूर्ण
- 29:08मैदाम पूर्णात पूर्णमदक्ष्यते पूर्ण से पूर्णमादाएं पूर्णमयवा
- 29:13शिष्यते, वह पूर्ण और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल।
- 29:19पूर्ण ही शेष बच जाता है। हिसाब का हर उसको हिसाब से न समझा
- 29:26जाता है, न समझाया जाता है। हिसाब को छोड़ना हिसाब लगाने वाली
- 29:34बुद्धि को छोड़ना पड़ता है। बाहर रख के जाना जहाँ जूती उतारो,
- 29:42वहाँ हिसाब लगाने वाली बुद्धि को भी छोड़ देना, तुम भी यहाँ
- 29:47विश्राम करो, हम मिल के आते हैं भगवान से, फिर आके जूतियों को भी
- 29:54उठा लेंगे, तुमको भी उठा लेंगे। क्योंकि संसार में हिसाब करना
- 30:00होता है। भगवान से कैसा हिसाब होता है
- 30:09जिसने सदा ही तुम पर प्रेम बरसाया हो लुटाया हो दाता दे लैंदा थकपा
- 30:17जुगा जुगांतर खाई खा, उससे क्या हिसाब करोगे?
- 30:26तो परमात्मा से मिलने जाना हो तो जहाँ जूतियां उतारो वहाँ खोपड़ी
- 30:32को भी उतार देना, दोनों को उतार देना दोनों का स्थान वहीं पे
- 30:42खत्म। बस यहीं तक बुद्धि आ सकती है।
- 30:47परमात्मा का क्षेत्र शुरू होते ही बुद्धि को अपना आपा छोड़ना होता
- 30:54है। हाँ, ये सर्कल में थे, परमात्मा
- 31:01का सफायर आते ही। क्षेत्र आते ही बुद्धि को अपना बस
- 31:06छोड़ना पड़ता है। जे तो प्रेम मिलन की चाह प्रेम न
- 31:17गली मैं अगर चाहता है तो आना। अगर चावल है तो शी से तली था घर
- 31:30में रह ये साफ साफ करने वाला शीश ये तलीफ रखे ये शीष ही करता है
- 31:41सब। इसको छोड़ के जाना होता है वहाँ
- 31:54इसका कोई काम नहीं वहाँ बिना शीष के चलेगा शीष की वहाँ कोई
- 32:04आवश्यकता नहीं शीष को तो तली के ऊपर रख लो ये गैर जरूरी है।
- 32:10वहाँ इसकी कोई कीमत नहीं। इसलिए कृष्ण ने बरबरीक का शीश
- 32:18मांगा सिर दे दे मुझे बिना शीश का हो जाएगा जब तू तभी देख पाएगा।
- 32:29ज्ञान तभी उत्पन्न होता है जब तू बिना शीष का रहेगा।
- 32:34जब तक शीष है तब तक गड़बड़ है। शीष न रहेगा तो गड़बड़ करने वाला
- 32:43न रहेगा इसलिए शीष दे जा मुझे। वह शीश का दान बरबरीक आज महान
- 32:54दानी हो गया। होना भी चाहिए, जिसने शीश दान कर
- 33:01दिया उससे बड़ा दानी और कौन हो सकता है?
- 33:06तुम भी अगर प्रेम को पाना चाहते हो, प्रेम की गली में तुम भी
- 33:13झूमना चाहते हो तो सब तैयार महफिल तैयार सजी हुई है।
- 33:20सुराही है, जाम डले पड़े। कुर्सियां बिचार की साज तैयार,
- 33:30गाने बजाने वाले तैयार मुजरा करने वाले तैयार बस तुम सीस को रख लो,
- 33:37तेरी यही कमी है। बाकी सब सीन तैयार है, दृश्य सब
- 33:46तैयार है, तुम्हारी शीश की जरूरत है यही भगवान कृष्ण ने कहा बाकी
- 33:53तो सब ठीक है, चलेगा तुम महावीर भी हो, मैं जानता हूँ।
- 34:01लेकिन महादानी बनना पड़ेगा, अकेले महावीर बनने से काम नहीं चलेगा,
- 34:08महादानी बनना पड़ेगा और जो भी महादानी हुआ उसको ज्ञान शिशु मिल
- 34:16गए। बड़े से बड़ा दान है अपने अहंकार
- 34:21का दान है। बाकी सभी दान तुम करते हो, अच्छे
- 34:29शुभ हैं, लेकिन शीष का दान महादान है।
- 34:39बाकी दानों से दूसरे का कल्याण होता है, तुम्हारा भी होता है
- 34:45लेकिन ये कैसा दान है सीस का दान के इसमें सिर्फ तुम्हारा ही
- 34:50कल्याण होता है। यह बड़ी ही अजीब सी बात है।
- 34:54सीस का दान है ऐसा दान के इसमें सिर्फ।
- 34:59तुम्हारा ही लाभ है और किसी का लाभ नहीं है।
- 35:03परमात्मा का कोई लाभ नहीं है। परमात्मा को इससे कोई लाभ नहीं
- 35:09होता। तुम शीष को दान करोगे।
- 35:14यही एक दान ऐसा जो एक तरफ़ा लाभ होता है।
- 35:19कौन सा दान शीश का दान शीश के दान में सिर्फ तुम्हें ही लाभ पहुंचता
- 35:25है जो शीश देता है वही लाभान्वित होता है।
- 35:32ये बात थोड़ी सी अड़चन देती मालूम नहीं पड़ेगी तुम्हें ये बहुत बड़ी
- 35:38अड़चन देगी तुम्हें। क्योंकि यही तो एक अरचन है, यही
- 35:45तो एक पत्थर है विशाल चिट्टान की तरह जीसको तुम लांघ नहीं पाए आज
- 35:50तक? और लाख शास्त्र पढ़ लो लाख गुरु
- 36:06बना लो, लाख मार्ग खोज लो, बुद्धि में सूचनाओं का जमावड़ा कर लो।
- 36:19जब तक शीश का दान नहीं करोगे तब तक ज्ञान चक्छु नहीं खुलेगा।
- 36:29अगर ज्ञान चक्छु को खोलना है तो एक ही दान जरूरी है बस।
- 36:36वही दान होता है। दूसरा कोई दान होता भी नहीं।
- 36:39उसके बिना ज्ञान चक्षु के लिए दिव्य चक्षु के लिए एक ही दान
- 36:46होगा वो है शीष का दान और बरबरी ने किया महान हो गया।
- 36:53जो भी शीष को दान करेगा महान हो जाएगा।
- 36:58तुम देखो, सीर स्नान करके सिर को काटना नहीं है, अहंकार को रीना कर
- 37:04देना, बूंद में समुद्र की तरह समां जाना है और तुम पाओगे समुद्र
- 37:11भी तुम्हारे में समा गया। यह अनोखा मिलन है।
- 37:18जिसका तमाशा सारी सृजना देखती है। प्रेमी कभी भी एक तरफ़ा मिटने की
- 37:31गुंजाइश की बात नहीं। प्रेमी सदा ही दोनों तरफ के मिटने
- 37:38की बात करता है। सच्चा प्रेमी और प्रेमी कभी अदालत
- 37:45तो मेरी भड़का करता है इसने प्रेम को।
- 37:54उसके लिए पाने को कुछ बचा ही नहीं।
- 37:57वह विराट हो गया, असीम हो गया। फिर पाने को क्या बचा?
- 38:02असीम होने के बाद भी कुछ पाने को शीश रह जाता है नहीं।
- 38:13फिर तुम्हें ना कुछ पाना है ना तुम्हें कुछ खोने का भय क्योंकि
- 38:18भेद मटक तो प्रेमी जन मेरी बात को नोट कर कुछ प्रेमियों के प्रश्नों
- 38:26का जवाब दे रहा है। एक दूसरे में समाहित होना पड़ेगा।
- 38:36कौन छोटा, कौन बड़ा बूंद और समुद्र की तरफ देखना नहीं होगा।
- 38:42समुद्र समाहित करेगा, चाहे कितना ही विराट हो और बूंद अपने आपको
- 38:50विलीन कर देगी, चाहे सुद्र ही क्यों ना हो।
- 38:57फिर जश्न बनेगा सारा विराट, अस्तित्व नाचेगा गायेगा मी।
- 39:09पर है मिलन। आज की रात दो सितारों का जमीन पर
- 39:23है मिलन आज की रात। सारी दुनिया नजर आती है।
- 39:37दुल्हन आज के रात दो सितारों का जमीन पर है मिलन।
- 39:51आज की रात सारी दुनिया नजर आती है दुल्हन आज की राह दो सितारों का।
- 40:13दो सितारों का जमीन पर है मिलन आज की रात सारी दुनिया नजर आती है
- 40:20दुल्हन आज की रात सारा अस्तित्व नाचेगा, अगर तुम शीश के दानी हुए
- 40:27तो। इतना बड़ा बलिदान है तुम सभी
- 40:33चीजों को दान कर देते हो, लेकिन शेष का दान नहीं कर पाओगे सबसे
- 40:41बड़ी अड़चन है और जीस दिन तुम इस। अड़चन के पात्र को हटा दिया।
- 40:49बीच में से चट्टान को हटा दिया। उस दिन तो महाज्ञानी हुए।
- 40:55उस दिन तो महादानी भी हुए। महादानी ही महाज्ञानी हो सकता है,
- 41:04वहीं झूम सकता है। वही गा सकता है वही नाच सकता है
- 41:14उसे ही सारी सजना दुल्हन नजर। आएँगे।
- 41:20सारी दुनिया नजर आती है। दुल्हन।
- 41:29आज कीरा दो सितारों का जमीन पर है मिलन, आज कीरा, आज, कीरा।
- 41:55धन्यवाद।