Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Oct 25 - भगवान राम ने इन्द्रियों को क्यों त्याग दिया? मजा तो मैं ही हूँ! Myself is Ananda! Baba Ji Vijay Vats Satsang
Transcript
- 0:00भगवान राम ने इंद्रियों को झांक दिया।
- 0:06बड़ा गंभीर और आखिरी प्रश्न है पुत्र जब तुम्हें पता चल जाएगा।
- 0:18कि मज़ा तो तुम ही हो फिर सुन जब तुम्हें पता चल जाएगा कि मज़ा तो
- 0:31तुम ही हो फिर इन्द्रियां। बेकार हो जाएंगे।
- 0:42इंद्रियों से मज़ा लेना बंद कर दो और जब इंद्रियों बेकार हो जाएंगे
- 0:50तो इंद्रियों को रखना उसका कोई औचित्य नहीं रह जाता।
- 0:59इसे फिर समझ लेना ये आखिर शब्द है, ये एक्सट्रैक्ट है अध्यात्म
- 1:05का। यद्यपि तुम्हें ये सोसाइटी ऐसा
- 1:09लगेगा लेकिन यह दर्शन है। और दर्शन भी ऐसा बिल्कुल स्पष्ट
- 1:20साफ सुथरा जब तुम्हें पता चल गया कि मज़ा तुम्हें ही।
- 1:32इंद्रियों से मुझे मेरा ही दर्शन होता है और मैं ही मज़ा हूँ तो
- 1:38तुम इंद्रियों से मज़े लेने बंद कर दोगे।
- 1:44इंद्रों से इंद्रियों से काम लोगे।
- 1:50इन्द्रियों से कर्तव्य निर्वहन करोगे और फिर जब व्यर्थ हो जाएगा
- 1:59सब कुछ, इन्द्रियों से मज़ा लेकर मन भर जाएगा राम राजा।
- 2:10भोग के सब सामान मौजूद और राम को अच्छी तरह से पता है कि मज़ा तो
- 2:21मैं स्वयं ही हूँ। फिर इंद्रियों से मज़ा लेना
- 2:30मूर्खता नहीं मुड़ता नहीं, बिल्कुल मुड़ता है, मज़ा में हूँ
- 2:39और जब इंद्रियों से मज़ा तुम लेते हो तो दर्शन करते हो अपने आप के
- 2:44उस क्षण में। उन इन्नर मोस्ट क्षणों में उन पीक
- 2:51प्वाइंट में तुम दर्शन करते हो स्वयं के और तुम ही मज़ा हो तो
- 3:01फिर राम इंद्रियों से कर्तव्य निर्वहन करते हैं।
- 3:07काम लेते हैं। वो इन्द्र हैं, उनकी इन्द्रियां
- 3:12उनके वश में हैं। पता चल गया जिसे भी तुम ही चल
- 3:19गया, तुम भी राम ही हो जाओगे। और फिर इंद्रियां बेकार हो जाती
- 3:30हैं। किसी वक्त जब काम धाम सारे, पूरे
- 3:33हुए कर्ज, फर्ज सब पूरे हुए तो इंद्रियों को त्याग करना एक धर्म
- 3:45हो जाता है। अब रखना भी क्या है रखकर करना भी
- 3:55क्या है कर्तव्य कोई बचा नहीं कर्ज फर्ज कोई बचा नहीं, सब कर
- 4:05दिया। और तुम इंद्रियों को बरकरार रखते
- 4:12हो मज़ा लेने के लिए, लेकिन राम का यह भ्रम टूट गया।
- 4:18इसलिए राण इन इंद्रियों को त्याग देते हैं।
- 4:26इससे सुसाइड की तरह मत लेना। सुसाइड करने वाला व्यक्ति यह
- 4:31निचोड़ नहीं निकाल पाया कि मज़ा में उसे तो बल्कि मज़े की चाहत
- 4:36है। उसकी कोई अपेक्षा पूरी नहीं हुई।
- 4:41किसी काम में वो मज़ा चाहता था, यश ही चाहता था, मिला अब यश लाभ
- 4:55चाहिए था, मिली हनी। शौर्य जांच तथा मतलब दुख
- 5:07दुर्बलता। इसलिए व्यक्ति सुसाइड करता है।
- 5:15उसकी मनोदशा बिल्कुल अलग है। उसके लिए इन्द्रियां भी काम की
- 5:19हैं, लेकिन उसकी कोई वासना पूरी नहीं हुई, इन्द्रियों ने की नहीं,
- 5:25प्रकृति ने की, नहीं सर कमस से उसके फेवर में नहीं आए तो जलाकर
- 5:32उसने इन्द्रियों को छोड़ दिया। यह इन्द्रियों को छोड़ने का
- 5:35निकृष्टतम मार्ग है, एक उत्कृष्टतम मार्ग है।
- 5:43वो राम ने किया, इन्द्रियां बेकार होगा।
- 5:49इंद्रियों से जो कर्म करना था, कर्तव्य निर्वहन करना था, कर्ज
- 5:53फर्ज से और सब पूरे हो गए और सब समेटने के योग्य हो गया।
- 6:03काम बाहर का वातावरण सब समेटने के योग्य हो गया।
- 6:12और पता चल गया कि मज़ा तो मैं ही हूँ आई माइसेल्फ मैं ही हूँ इस
- 6:29आनंदा। माइसेल्फ इज़ आनंदा।
- 6:37इसलिए तो संत बार बार कहते हैं हू आर यू नो दायसेल्फ रिमेम्बर
- 6:43यूरसेल्फ, तुम मजाक इन्द्रियों से मजाक फिर क्यों लेते हो?
- 6:50क्यों नहीं अपने ही अस्तित्व में घुस जाते हैं?
- 6:54क्यों नहीं अपने ही अस्तित्व में भीतर उतर जाते हैं?
- 6:59राम का भ्रम खत्म हो गया। राम जानते हैं कि मज़ा तुम्हें
- 7:06इन्द्रियों से कर्ज फर्ज पूरा करने आते हैं।
- 7:10असली फकीरी का मज़ा हो चक्के असली फकीरी का, मज़ा ओह चक्के जेड़ा
- 7:18बेकर्ज़ होवे बे फर्ज होवे बे, मर्ज होवे ते बेकर्ज़ होवे उसे
- 7:27किसी के गर्ज नहीं है। उसे इंद्रियों की गरज नहीं है।
- 7:32मज़ा लेने के लिए अब उसे मर्ज नहीं है।
- 7:36अभी वासना की वासना एक मर्ज है। वे कर्ज होवे उसे अभी कोई कर्तव्य
- 7:44नहीं करना है। बात राज़ तो और भी कर देंगे।
- 7:55बे फर्ज हो गए कोई फर्ज भी नहीं है, सब उत्तरदायित्व पूरे कर दिए,
- 8:04सब कर्तव्यों को पूर्ण कर दिया और जो आखिरी कर्तव्य यानी आखिरी
- 8:12ब्रह्म तो हमारा। मज़ा वो तुम्हें पता चल गया।
- 8:17इसके बिना तो अधूरा है सब सबसे पहले ये पता चलता है कि मज़ा में।
- 8:33हाई मायसैल्फ आ लूँगा, यह रूट है, यह जड़ है, सबसे पहले यह पता
- 8:43चलेगा। उसके बाद इंद्रियों से काम लेना।
- 8:46तुम तब तक जारी रखोगे जब तक उनकी जरूरत है और फिर तुम इंद्र हो।
- 8:54तुम्हारे कहने से हाथ उठेगा तुम्हारे कहने से जीवा बोलेंगे
- 8:59तुम्हारे कहने से लफड फड़ाएंगे तुम्हारे ही इशारे पर ये
- 9:06इन्द्रियां चलेगी तुम इन्द्र हो गए इसलिए राम के लिए।
- 9:12इन्द्रियां बेकार हो गई क्योंकि इन्द्रियां तुम्हारे काम आती हैं
- 9:17मज़ा लेने के लिए और राम को पता लग गया मज़ा तुम्हें ही फिर
- 9:23इन्द्रियों का क्या करना है छोड़ तो?
- 9:40पर वो अपनी अद्रियों को सरियों में छोड़ देते।