Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 Aug 25 - जब अर्जुन का मोह टूटा, फिर भी धनुष क्यों नहीं उठाया? दीक्षा के भीतरी रहस्य! गीता का ज्ञान!
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- 0:21अर्जुन का मोह ग्यारहवें अध्याय से पहले समाप्त हो गया।
- 0:32जब मोह समाप्त हो गया तो अर्जुन ने ततक्षण।
- 0:39अपना धनुष क्यों नहीं उठाया? यार में न्याय का पहला श्लोक हे
- 0:49केशव आप ने मुझ पर कृपा करके मेरे लिए जो परम गोपनीय।
- 0:57आध्यात्मिक विषय वचन कहे उससे मेरा मोह नष्ट हो गया, मोह नष्ट
- 1:10हो गया। बिलकुल ठीक है तुम्हारी बात।
- 1:16नो द सेल्फ। उसने खुद को जान लिया, दूसरे
- 1:27अर्थों में अगर कहे कि उसने खुद को मान लिया कि मैं शरीर नहीं
- 1:35हूँ, यहाँ तक जाना नहीं हुआ। मैंने पहले भी बहुत बार कहा दर्शन
- 1:45के बिना जान न कैसा सो जाने हू, जीस दे हू जन आई।
- 1:58दर्शन के बिना जानना नहीं होता वो मानना होता है और अर्जुन ठीक कहते
- 2:04हैं, क्या आपने जो बातों से मुझे बहुत अति गोपनीय अध्यात्मिक
- 2:11जानकारी दी, उससे मेरा मोह नष्ट हो गया?
- 2:21लेकिन जानकारी से मोह नष्ट हुआ। दर्शन से नहीं हुआ इसलिए उसने
- 2:28धनुष बाण गाढ़ी जो फेंक दिया था वो उठाया नहीं तो किस तलाश में
- 2:35है? दर्शन की तलाश में हे वासुदेव ये
- 2:51जो आप कह रहे हैं हे कमल। ये जो आप अपने आप को कह रहे हैं
- 3:09सारी धरती पर सिर्फ एक प्रश्न है जो मैं शब्द का इस्तेमाल अस्तित्व
- 3:21के लिए। अक्सर मय शब्द का इस्तेमाल
- 3:29अहंकारी व्यक्ति करता है। धरती पर अकेले कृष्ण हैं जो मय
- 3:36शब्द का इस्तेमाल। एग्ज़िस्टन्स के लिए करते हैं,
- 3:42अस्तित्व के लिए करते हैं। कोई भी संत जब बोलता है दो तल
- 3:51बोलने के होते हैं एक मैं का तल शरीर।
- 4:01एक मैं का तल खुद का होना अस्तित्व दो तलों पे वह मैं कह
- 4:09सकता है अज्ञानी व्यक्ति शरीर के तल से बोलेंगे।
- 4:19मैं कहेगा ज्ञानी व्यक्ति दोनों तोलों से बोल सकता है क्योंकि वह
- 4:26कभी शरीर था, आज शरीर में है तो वह शरीर को भी मैं कह सकता है
- 4:38उसने अस्तित्व को। देख लिया वह अस्तित्व को मैं कह
- 4:43सकता है और कृष्ण अस्तित्व के लिए मैं का इस्तेमाल करता है हे कमल
- 4:52नयन, आप जो कहते हैं मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ।
- 5:00बड़े समयदार हैं। अर्जुन जैसा शिष्य मिलना दुर्लभ
- 5:07नहीं, असंभव है। ऐसी विनम्र भाषा में अर्जुन सवाल
- 5:15पूछ लेता है। जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते
- 5:20हैं। अब पूरी सर्जरी कर देता है।
- 5:25कृष्ण का कहता है कमल नयन। ये जो आप कहते हैं कि मैं ये हूँ,
- 5:37मैं वो हूँ, मैं वो हूँ, मैं वो हूँ, इसे मैं देखना चाहता हूँ
- 5:50संदेह मिटाने और अगर। अर्जुन आत्मदर्शन करके सिर्फ
- 6:02शब्दों के द्वारा आत्मदर्शन करके धनुष को उठा लेते हैं।
- 6:08वह कच्चा कच्चा था। तीरों में वह जान न होती, वह बल न
- 6:12होता। और अर्जुन जीतना पाता अर्जुन
- 6:24कानों का कच्चा रह जाता, दर्शन ने उसे पक्का बना दिया।
- 6:30हे कमल नैन जो तुम कहते हो मैं ये हूँ, मैं वो हूँ।
- 6:35मैं उसको देखना चाहता हूँ। प्रभु गुरु की परीक्षा का अंतिम
- 6:43छोर कृष्ण के लिए ये घड़ी निर्णायक भी है अंतिम भी है।
- 7:00और सबूत पेश करने के भी हैं। यही कलयुग में घटा।
- 7:14नरेंद्र दत्त ने सबसे पूछा परमात्मा है?
- 7:19देखा दिखा सकते हो कोई भी इन कसौटियों पर खरा नहीं उतरा।
- 7:28पहले दो सवालों के जवाब थे ईश्वर है, देखा है, दिखा सकते हो नहीं।
- 7:39अकेले रामकृष्णा ने कहा हाँ है देखा है देखना चाहते हो हाँ देखना
- 7:49चाहता हूँ तो देखो, सर पर हाथ रख दिया।
- 7:55और पहली दफ़ा नरेंद्रनाथ हार गया। चीख चिल्लाता जब उस स्तर पर गया
- 8:04क्योंकि नियम तो नियम है एक मरेगा झूठा, दूसरा जन्मेगा सच्चा।
- 8:15झूठे को मरना होगा। उसी से तुम डरते हो जन्म
- 8:21जन्मांतरों से तुम इस झूठ को माने हुए हो, सात धोए हुए हो और यही
- 8:26बोझ है तुम्हारे ऊपर। वहाँ जाके चिल्लाता जब मौत सामने
- 8:39खड़ी थी मरना तो पड़ेगा मैं तुम्हारी दुविधा को बखूबी समझता
- 8:50हूँ डरा तो मैं भी कम न था सूखे पत्ते की तरह कंपन्न होता है
- 8:59वहाँ। जब मिथ्या टूटता है, सत्य सामने
- 9:05आता है तो कंपन होता है सभी डरते हैं।
- 9:18नरेन्द्रनाथ हुई कंपेर और चिल्लाए, स्वामी जी मेरे माँ बाप
- 9:26भी हैं राम कृष्णन समझ गए ठीक फिर बाहर आ जाओ तुमने ही कहा देखना
- 9:36चाहता हूँ। फिर बाहर जाओ अर्जुन कहते हैं,
- 9:46आपने ये जो कहा स्वयं प्रशंसा में अपना मुँह मियाँ मिठू बनना हमारी
- 9:54कहावत है। ये तो तुमने बड़ा कहा मगुन लेकिन
- 10:01मैं उस सब को देखना चाहता हूँ। अंतिम परीक्षा अंतिम घड़ी हे
- 10:11वासुदेव का मिलन ने। मुझे वो अपना विराट वो स्वरूप
- 10:17दखाने की कृपा करें। कृष्ण बोले हे पार्थ तैयार हो जाओ
- 10:31अर्जुन बड़े प्यारे हैं। अर्जुन कहते हैं, योगेश्वर अगर आप
- 10:37समझते हैं उचित मेरे द्वारा वह रूप देखा जा सकता है आई ऍम एबल टु
- 10:45सी दट। अगर मेरे द्वारा उस रूप का अवरोपन
- 10:56हो सकता है तो कृपा कर दीजिये, मुझे अपना वो स्वरूप दिखाइए
- 11:06क्योंकि हे कब मिले नयन? अब तक आपकी उत्पत्ति करने वाला भी
- 11:11मैं हूँ विनाश करने वाला भी मैं हूँ, मैंने ये सब आपके मुख से
- 11:18सुना, खुद देखा बड़े समझदार हैं और जो।
- 11:28तो अर्जुन कहते हैं, अगर कृष्ण अर्जुन की परीक्षा ले रहा है तो
- 11:37अर्जुन भी कमतरण है। अर्जुन कहे कि अब तक आप कहते हो
- 11:43मैंने उत्पत्ति के और मैंने विनाश किया।
- 11:48मैं ही हूँ तो आपके ही मुख से सुना है तो कृपा करके अपना वो मन
- 11:57मोहक रूप मुझे दिखा दीजिए। कृष्ण कहते हैं, ठीक लेकिन।
- 12:07मेरा वो रूप तुम इन चरम जक्सों से नहार न पाओगे फिर संडे कृष्ण कहते
- 12:22हैं, हे पार्थ। मेरा वो रूप तुम इन चरम शिक्षकों
- 12:29से निहार न हो अर्जुन के मन में फिर अविश्वास आ जाता है।
- 12:39कहीं बहानेबाजी तो नहीं कर रहे कृष्ण?
- 12:46हे भारत वंशोधभव अर्जन। 12 आदित्यों को आठ वसुओं को 11
- 12:58रुद्रों को दो अश्विनी कुमारों को।
- 13:01और 49 मर्द गणों को देख दखाते कुछ भी नहीं होते।
- 13:11अभी सिर्फ बातचीत है और अर्जुन बड़ा पक्का है।
- 13:21अर्जुन कहता है प्रभु आपने जो कहा अब तक वह शांति जीरनानी यथा विहाय
- 13:28नवानी घृणाती नरो प्राणी तथा श्री रानी विहाय।
- 13:41जैसे प्राण वस्त्रों को उतार कर हम नए वस्त्र ग्रहण कर लेते हैं,
- 13:45वैसे ही आत्मा प्राण शरीरों को त्याग कर नए शरीर ग्रहण कर लेती
- 13:52है और बहुत कुछ कहा पत्रम पुष्पम परम स्वयं पत्र चिढ़ा दो।
- 13:59पुष्प चिढ़ा दो। फल चढ़ा दो, फूल चढ़ा दो
- 14:06श्रद्धापूर्वक जो भक्त मुझे है, जो भी अर्पित कर लेते हैं भक्ति
- 14:11भाव से मैं स्वीकार कर लेता हूँ। और भी बहुत कुछ कहा जो देवताओं को
- 14:24स्मृते हैं देवताओं के पास भूतों को स्मृते भूतों के पास पितरों को
- 14:29स्मृते पितरों के पास जो जिसका स्मरण करता है उसके पास पहुँच ही
- 14:36जाता है। और मैं उसी में उसी की श्रद्धा को
- 14:40बढ़ा देता हूँ। अर्जुन कहते हैं, अपनी बातें तो
- 14:44बहुत 10 अध्याय भी चूके। दूसरे अध्याय से शुरू किया था।
- 14:55कृष्ण ने बोला। ग्यारहवां अध्याय आ गया सब सुन
- 15:01यार चुनने अब अर्जुन के पूछने की बारी थे प्रभु मैंने सब सुना।
- 15:17मेरा यह महोतों नष्ट हुआ शाब्दिक महोतों नष्ट हुआ, लेकिन देखा
- 15:30मैंने कुछ नहीं अब तक। ऐसे शानदार मो।
- 15:36मोक्ष हैं अर्जुन सारी मानवता को मुक्त करने में समर्थ शिष्य अगर
- 15:44कोई आयतक हुआ तो अर्जन हुआ। उन्होंने सवालों के बाल की खाल
- 15:51उधेड़ दी। कृष्ण कहते हैं ये 49 मृदगण है,
- 16:08111 है रुद्र दो अश्विनी कुमार आठ वर्षों सब देख।
- 16:18लेकिन अभी दिखाया कुछ और। फिर कृष्ण बोलते हैं यार और भी जो
- 16:30तू देखना चाहता है देख। तुमने पूछा कि अर्जुन में जब मोह
- 16:42नष्ट हो गया दसवीं अध्याय में और ग्यारहवीं अदायी की शुरुआत में
- 16:48अर्जुन कहता है मेरा मोह भंग हुआ, लेकिन शाब्दिक।
- 16:57अब दर्शन भी करवा दो तुम कहते हो मैं ये हूँ मैं बोल बिलकुल वो चोट
- 17:07की हैं लेकिन नहीं अर्जुन जो दर्शन तू करना चाहता हैं मेरे
- 17:15विराट का। अब प्रैक्टिकल के ऊपर कृष्ण आ
- 17:22जाता है क्योंकि देखना चाहता है अर्जुन तो कहते हैं कि इन चरम से
- 17:31इन चमड़ी की आँखों से तुम ना देख पाऊँ।
- 17:36योग्यता है तो मैं दिव्यचक्षु को लेने की इसलिए हे अर्जुन मैं मेरा
- 17:45स्वरूप दिखाने के लिए तुम्हें दिव्यचक्षु पहले प्रदान करता हूँ
- 17:51जैसे हम कह दें। कितनी दूर तक तुम नगन आँखों से तो
- 17:57न देख सकोगे लेकिन ये लो हर्बल टेलीस्कोप वहाँ तक भी नहीं।
- 18:06तो ये लो जेम्स वेव टेलीस्कोप इससे देख पाओगे तुम ब्रह्माण्ड के
- 18:12पार। बस बिलकुल ऐसा ही शब्द बोलते हैं
- 18:17कृष्ण के नगन आँखों से ना देख सकोगे इसलिए हे अर्जुन तेरे दर्शन
- 18:28की अभिलाषा जगी यहाँ बड़ा प्यारा शब्द बोला।
- 18:33मो। मोक्षों को समझ लेना चाहता है कि
- 18:41अगर अर्जुन मो मोक्षु हैं और कृष्ण को पता चल जाता है कि मो
- 18:47मोक्षु हैं, मुक्त होना चाहते हैं, दर्शनार्थ आए हैं।
- 18:55तो फिर कोई दुविधा नहीं होती। हम देखेंगे क्या पता तो तब चलता
- 19:01है जब शिशिरण यहाँ आके मस्तकन आते हैं।
- 19:05बात परमात्मा की पूछते हैं लेकिन धीरे धीरे कहते हैं ये तो थोड़े
- 19:09ही मांगा था। हम तो अच्छे गाय का बन जाए, ये
- 19:13मांगा था। हम तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनी
- 19:27बन जाएंगे। ये मांगा था, अपूर्व सौंदर्य और
- 19:32लावन ने छा जाए। ये मांगा था।
- 19:38उच्च पदासीन हो जाएं ये मँगा था ये थोड़ा ही मँगा था पता तब चलता
- 19:46है यहाँ बड़ा कसते हैं 10 अध्यायी तक कसते हैं ऐसे ही गुरु आपको
- 19:55चर्मचक्षों से दिव्येश सुबह नहीं रह के आता।
- 20:00ऐसा ही मैं कहता हूँ मैं कहता हूँ तुम दीक्षा ले जाओ, एक बीज बो
- 20:07दूँ, तुम्हारे भीतर जिन आसानी रंगों की तुमने कभी खुशबू नहीं
- 20:15देखी थी। मैं तुम्हारे भीतर छोड़ दूँ, एक
- 20:20बीज बोलूं, धीरे धीरे पापता रहेगा।
- 20:231 दिन तुम उस सीमा पर आ जाओगे जहाँ तुम्हें दिव्यचक्षु की
- 20:30आवश्यकता पड़ेगी तो फिर तुम्हें दिव्यचक्षु दे दूंगा, मैं कहीं
- 20:35नहीं जाता मैं यहीं। जाएगा, शरीर जाएगा, लेकिन वो
- 20:45दीक्षा देने वाला कभी कहीं नहीं जाता है।
- 20:49वो यहीं रहेगा कहें, संभाल लेगा तुम्हें।
- 20:57एक अर्थव्यव मैं ही संभाल लूँगा, तुम्हें ऐसा समझ लूँ तो अगर कृष्ण
- 21:07खेंचते हैं, प्रश्नों को रबड़ की तरह है, तो अर्जुन भी कम नहीं है।
- 21:16अर्जुन भी प्रश्न से प्रश्न दागे चले जाते हैं।
- 21:21अब बात आ गई सिर्फ दर्शन अब अंतिम छोर आ गया, अब जो कहा तुमने हे
- 21:34कमलेन? मैं ये हूँ मैं वो हूँ मरुधगण हूँ
- 21:40मशवनी कमार हूँ ये सब देखना चाहता हूँ मैं आपके मुख से बड़े प्यारे
- 21:49लगते हैं, अब दिखा तो। कृष्ण कहते हैं ये शब्द खाऊंगा और
- 21:59भी बहुत खाऊंगा जो तुम देखना चाहते हो और अभी तक देखे नहीं,
- 22:08लेकिन इन चर्म जक्ष्यों से नहीं, मैं तुम्हें दिव्य जक्षू देता
- 22:13हूँ। यहाँ तक आते आते इतनी शक्ति फेंक
- 22:19दी गई थी कि अर्जुन देवशिक्ष को ग्रहण करने में समर्थ हो गया था।
- 22:3310 अध्यायी तक लगातार बारिश करते रहना वह व्यक्ति दिव्यचक योग्य हो
- 22:45जाता है इसलिए मैं तुम्हें रोज़ कहता हूँ संतजनों को सुनते रहना
- 22:52सुनते सुनते सुनते सुनते उनकी। अल्फा थीटा रेस आपको पेनिट्रेट
- 23:00करेंगे। मो।
- 23:01मुक्षा को जगाएंगे और 1 दिन तुम योग्य हो जाओगे, अभी नहीं अभी तो
- 23:08तुम चारवाक और मार्क्स से ही रहोगे?
- 23:14कहती चाहे कुछ भी रहो तो सिर्फ एक बीज बोना है, मेरा अंगूठा रखना,
- 23:27तुम कहीं फिरते रहो, बस ये तीन चीजों को मत छोड़ो।
- 23:34जितना हो सके क्रिया योग कर लो। ऑक्सीजेनेटेड बॉडी प्रवचन सुन लो,
- 23:45तार न टूटेगी लगातार तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेंगी।
- 23:52तुमने किधर जाना है बुरा मत करना? हो सके तो अच्छा करना, बुरा मत
- 24:04करना और ध्यान न कुछ करना, बस उसमें बैठ जाना जैसे रात्रि को।
- 24:20नींद में 6 घंटे 8 घंटे 5 घंटे गए।
- 24:27उसी तरह बिलकुल शीतल हो के बैठ जाना जो कुछ होता है होने देना,
- 24:36डरना मत। अब कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन
- 24:43बिल्कुल सही चल रहे हैं अर्जुन लेकिन अर्जुन के मन में अभी शंका
- 24:51है लेकिन कृष्ण बिल्कुल सही ही चल रहे हैं।
- 24:55कृष्ण जानते हैं किस स्थल पर आकर ये?
- 25:00क्या प्रश्न पूछेगा? और पूछ लिया वो ग्यारवें अध्याय
- 25:09शुरुआत में हे प्रभु। मेरा भ्रम तो टूट गया, जो आवरण
- 25:24ओढ़े थे मैंने जो भी ठीक गलत माना था मैंने, लेकिन प्रभु देखा खुशी
- 25:32बड़े ईमानदार हैं, अर्जुन और बेईमान व्यक्ति यहाँ पहुँच भी
- 25:36नहीं सकता ध्यान रखना। ईमानदार ही पहुँच सकता है, सत्य
- 25:44ही पहुँच सकता है। झूठ बोलने वाला यहाँ नहीं पहुँच
- 25:48सकता। मुझे लोग कह देते हैं हमारे इतने
- 25:53उच्च पदाशीन झूठ बोलते हैं। मैंने कहा, आप क्या कह लेते हैं?
- 26:01गीता को मानते हो जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा, भगवान बोलने दो, फल
- 26:11भी तो वो ही भुगतेगा। तुम क्यों जलते हो?
- 26:17तुम मौज करो, तुम्हारे लिए तो राजा कोई भी हो जाए, तुम्हें तो
- 26:24करना खाना पड़ेगा। तुम इससे मुक्त नहीं हो सकोगे तो
- 26:30फिर कोई भी राज़ करे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?
- 26:36अच्छा करेगा अच्छा भोंकेगा बुरा करेगा बुरा भोंकेगा तुम क्यूँ
- 26:42नायराइड बीच में अड़ंगा उड़ाते हो तो अर्जुन कहते हैं, हे कृष्ण
- 26:56तुम्हारी सब बातें सुनी तो मैंने। और उसे सुनने से जो मेरा मानना था
- 27:04वो सारा टूट गया जो सिर्फ माना था मैंने जाना नहीं था पर जो हम कहते
- 27:10हैं ठीक ये शब्दों की खेल तो बहुत हो गई है।
- 27:18बात रहेंगी दर्शन। हंसपाया मानसरोवर हंसापाया,
- 27:34मानसरोवर। ताल तलैया क्यों ढोले हंसाया?
- 27:50मानसरोवर? ताल तलैया क्यों ढोलें हंसा पाया,
- 28:06मानसरोवर ताल तलैया। क्यों रोले जब।
- 28:20हंस ने मानसरोवर पा लिया तो तार तलैया क्यों रोले तालाबों के
- 28:28चक्कर क्यों लगाए? यही लक्षण बताते हैं कृष्ण।
- 28:39जब तुम जान गए, मैं सिर्फ व्यापक हूँ तो संकीर्ण बुद्धि समाप्त हो
- 28:48जाती है और कृष्ण कहते हैं, मैं विराट हूँ।
- 28:56और अर्जुन अभी संकीर्ण होते हैं। अर्जुन कहते हैं, हे प्रभु आपकी
- 29:04बातें तो समझाइए। सारे थोपे हुए आवरण अनावरण हुए।
- 29:13टूट गए, लेकिन सत्य तो अभी भी नहीं दिखा।
- 29:21बिल्कुल जायज पर्सन तब कृष्ण कहते हैं, कृष्ण जानते हैं 10 अध्याय
- 29:29तक आते आते यह बीज। टूट गया, पानी मिला, खाद मिली,
- 29:39कोंपलें उगी सूरज की रौशनी पड़ी बढ़ना शुरू हुआ अपना मुख, बाहर
- 29:50निकाला धरती का। बस अब ये योग हुआ वृक्ष बनने का
- 29:57बीज बो दिया अब वृक्ष बन जाएगा, फल भी लगेंगे, फूल भी रखेंगे।
- 30:14कृष्ण कहते हैं कि मैं तुझे चर्म चक्षु के बजाय वो चक्षु देता हूँ
- 30:21जिससे मेरा तू स्वरूप देख सके। बिल्कुल एक्यूरेट जा रहे हैं।
- 30:27स्पष्ट दिशा में ऐसा ही तुम्हें भी करना होगा।
- 30:35गुरु उन्हें भी मिले तो तुम भी जब उतरोगे तो दर्शन के तल पर जाकर ही
- 30:45समझाएगी। दर्शन के तल से पहले तो सिर्फ
- 30:50मान्यता होगी। जोठी मानी हुई थॉपी हुई और उनसे
- 30:55भर्म नाश नहीं होता। तुम्हारे आचरण में कोई फर्क नहीं
- 31:01पड़ेगा, लक्षणों में कोई फर्क नहीं होगा, लक्षण वहीं रहेंगे।
- 31:11कृष्ण कहते हैं मैं तुझे देवचक्षु देता हूँ, तू तैयार हो जा।
- 31:18अर्जुन ने कहा जी देवचक्षु दीजिए। और कृष्ण ने अर्जुन को देव शक्षु
- 31:27देने शुरू कर दिए हैं। अर्जुन पक्का खिलाड़ी है।
- 31:35यहाँ हार जीत की बात नहीं है। यहाँ मरने मारने की बात है।
- 31:44ये बात तो प्रणव पर आयी है। शब्दों से कृष्ण लुभाना पाएंगे तो
- 31:54अवश्य ही कुछ ऐसा दिखाना पड़ेगा जो हम जैसा चमत्कार कह देते हैं।
- 32:02कुछ चमत्कार तुम्हारे जीवन में किसी संत के आने से कोई चमत्कार
- 32:08घटित हुआ तुम जैसे ही ये ख्याल करोगे तुम्हें समझाना शुरू होगा
- 32:19जैसे फूल के करीब जाने से सुगंध आती।
- 32:23और गंदे नाले के करीब जान से दुर्गन्ध आती हैं।
- 32:29तुम्हारी इन्द्रियां उसे अनुभूत करेंगे।
- 32:35दिव्य जक्षु दे देते हैं और सब दिखाते हैं।
- 32:40आगे प्रसंग चलता है। चिता है प्रश्न चिता है कृष्ण
- 32:47बोलते चले जाते हैं अर्जुन पूछते चले जाते हैं ये क्या है, ये क्या
- 32:52है? थर्राने लग जाते हैं ये देख मेरा
- 32:55काल रूप और एक तल पर। कृष्ण कहते हैं, अर्जुन मैं
- 33:05इन्हें मार चुका हूँ, तू सिर्फ होठ और मारने का श्रेय ले ले, तू
- 33:16ये सेहरा सजा ले अपने सर के ऊपर मैं इन्हें मार चुका हूँ।
- 33:24यहाँ से ये कहावत उठती है ऑल दी इवेंट्स आर फ्री डिटरमाइन्ड जिसने
- 33:30इस स्थल से देखा वो ये बात कहें का लियो टेलर स्टाई इस स्थल से
- 33:39बोलेंगे। ऑल दी इवेंट्स आर प्रीडिटरमाइन्ड
- 33:44कमिंग इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज बिफोर प्रसंग चलता है चलता है।
- 34:02धीरे धीरे मोह तो नष्ट हो गया, दिखलाते रहते हैं अपना विराट
- 34:07विराट देखता रहता है, बड़ा कंपन भी होता है देखिए जैसे जैसे
- 34:13मान्यताएँ टूटे कंपन आना स्वभाविक है।
- 34:22जैसे जैसे तुम्हारी मान्यता जो तुमने देखी नहीं थी मानने थी, वह
- 34:29टूटेगी तुम कम अब मैं बोलता हूँ तो बहुत से लोग मुझे कहते हैं
- 34:38बाबा हमें तो बड़ा डर लगता है तुम्हें सुनते सुनते।
- 34:43मैंने कभी ऐसा होता है मान्यताएँ टूटेंगी तो तुम कम हो गए क्योंकि
- 34:50तुम मान्यताओं को अपना होना समझ बैठे हो।
- 34:55ये इलूशन तुम्हारा जीवन बन गए हैं।
- 35:00तो इल्लुसिओन टूटेंगे तो तुम्हारा जीवन भी टूटा लगेगा, टूटेगा नहीं
- 35:07तो तुम ठहरे रहना अगर उस परम सुशोभित तत्व के पास जाना चाहते
- 35:16हो। अर्जुन डटे रहते हैं, कम्पते हैं
- 35:23सब देखते हैं। आखिर में 18 में अध्याय है 73 में
- 35:35शलोक। पूर्ण रूप से मोह नष्ट हो जाता
- 35:39है, संतुष्ट हो जाते हैं, तृप्ति आ जाती है तब अर्जुन कहते हैं,
- 35:45तृप्त हुए नष्ट मोहा समृ तरलब्धा तत प्रशादा आपकी कृपा से।
- 35:59पोत प्रसाद ना मयाचवत आपकी कृपा से हे अच्युत हे ना कंपनी वाले
- 36:09कृष्ण मेरा मोहनिष्ठ हो गया। अट्ठारहवीं अध्याय के तिहत्तरवें
- 36:16श्लोक कहाँ से चलेगी? तुम?
- 36:22तुम भी जब तक मोह नष्ट न हो जाए तब तक मुझे पता है।
- 36:32तुम्हें मानना भी नहीं चाहिए और सच में तुम मानोगे भी नहीं, बार
- 36:41बार खोपड़ी में मान लोगे और खोपड़ी का क्या है?
- 36:43खोपड़ी तो यहीं धरी रह जाएगी अगर लिबरेट होगे तुम वह लिबरेशन।
- 36:53तुम्हारे देही शरीर को भूँक देंगे देही को भूँकना है, देही से तादाद
- 37:05में हट जाए, देही जल जाए, बीज नाश हो जाए और बूंद।
- 37:13समुद्र में समा जाए ये तुम्हारा लक्ष्य तब तक चलते ही रहना है जब
- 37:19तक सच में मोह नष्ट न हो जाए और याद न आ जाए नष्ट मोह समृद्धि
- 37:26लबदा तो प्रसाद आज मया चु। हे अच्युत तेरी कृपा से मेरा मोह
- 37:34नष्ट हुआ तो पूछा है कि मोह तो नष्ट हो गया, दसवें में नष्ट हो
- 37:52गया लेकिन धनुष क्यों नहीं उठाया? धनुष इसलिए नहीं उठाया।
- 37:58के शब्द का मोह नष्ट हुआ था, दर्शन नहीं हुए थे और दर्शन के
- 38:03बिना मोह नष्ट हुआ नष्ट होता नहीं।
- 38:10शब्दों को शब्दों से काटना होता है।
- 38:13तर्कों को तर्कों से काटना होता है, लेकिन तुमने तो तर्क का तीर्थ
- 38:18होना है जो तर्कों से पार जाता है।
- 38:24जहाँ वो विराजमान है जिसके बारे में कृष्ण कहते हैं कि तीर नहीं
- 38:31कटता, जल नहीं। गलता वायु नहीं, सुखाते आग नहीं
- 38:37जलाती, वहाँ पहुंचना है और वो तर्कों से परे है।
- 38:44तर्क बुद्धि के दिन तर्क बितर्क बुद्धि के दिन।
- 38:52लेकिन तर्कों से पार तुम खुद हो तुम खुद हो और अर्जुन खुद को
- 39:07शब्दों से जान लिए दर्शन से नहीं जाने।
- 39:12दर्शन से अब जानें जब शब्द दिखाया उसको मैं जेभी हूँ मैं जेभी हूँ
- 39:18ये भी मैं ये भी में दर्शन से नष्ट होता है मोह इल्ल्यूज़न सच
- 39:29में? अन्यथा शब्दों से मोह को नष्ट हुआ
- 39:34जानो तब वो नष्ट हुआ नहीं, वो तुम्हारी कल्पना है।
- 39:53तुम सरनाई आया ठाकुर, तुम सरनाई आया?
- 40:13उतर गयो, मेरे मन का संसा उतर गयो।
- 40:31मन का संसार जब तेरा दर्शन पायो ठाकुर तुम सरना।
- 40:52आया ठाकुर तुम सरनाई उतर गयो मेरे।
- 41:09मन का संसा उतर गयो मेरे मन का संसा जब तेरा दर्शन पायो।
- 41:29जब तेरा दर्शन पाया बस यहाँ आके बात खत्म हो जाती है दर्शन के
- 41:36बिना संशय निर्मकता नष्टो मोह स्मरित लग्धात तप्रसाद आज न मैं
- 41:42आज होता है तेरे दर्शन के बिना मोह नष्ट नहीं होता था।
- 41:49अब दर्शन हुआ तो मौका नष्ट हो गया।
- 41:54सत्य देखा क्या है? सत्य को देखे बिना झूठ खत्म हुआ
- 42:01मान मत लेना, ये भी इसी को भी एक मान्यता मत बना लेना।
- 42:07सत्य को देखना, नग्न आँखों से देखना और तुम खिल जाओगे फूल की
- 42:13तरह इसे ही 1000 दल कमल का खेलना कहते हैं।
- 42:17हजारों पखड़ियाँ खुल जाएंगी तुम्हें कल ही अपना मुख खोल लगी
- 42:23सुगंधें बिखरने शुरू हो जाएंगी। नाद चलने शुरू हो जाएंगे।
- 42:28जिथे वाजे नाद अनेक अनुशंखा हजारों अशंख नाद बजते हैं, वहाँ
- 42:41पहुँच ही जाओ। दर्शन होगा देखोगे, नाद सुनोगे
- 42:48जहाँ से उदघम सतल होता है तो भ्रम मिटेगा उसके बिना भ्रम निमृत
- 42:56शास्त्र को पढ़ने से, गुरु को सुनने से।
- 43:03कल्पनाओं से कल्पनाएं टूटेंगी, तर्कों से तर्कों का वरान होगा।
- 43:09जैसे एक तीर से दूसरा तीर कट जाता है लेकिन एक तीर से दूसरा तीर कट
- 43:17जाता है, युद्ध नहीं जीता जाता। युद्ध जीता जाता है जब दुश्मन ढेर
- 43:26हो जाता है दुश्मन कौन तुम्हारा सनश और सनश नष्ट हो दर्शन से उतर
- 43:37गए हो मेरा मन का सनश। जब तेरा दर्शन पाया हो ठाकुर तुम
- 43:45सर नहीं आया हो तेरी शागनिया श्री कृष्ण।
- 43:54गोविन्दु हरे मुरारी। हे।
- 44:04नाथ नारायण, वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 44:14भवन हरे मोरार। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 44:29श्री? कृष्ण गोविन्द करे मुरारी हे नाथ
- 44:40नारा। आयन वासुदेव पितुमात स्वामी सखा
- 44:51हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे। हे नाथ नारायण वसुदेव।
- 45:11श्री कृष्ण। गोविंद हरे मुरारी।
- 45:20हेनाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 45:28गोविंद हरे ब्लारी हेनाथ नारायण वासुदेव।
- 45:39श्री कृष्ण। गोविन्द हरे मुरारी ए नाथ नारायण
- 45:48वासुदेव। धन्यवाद।