Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Dec 25 - आप गांधी के नाम पर वोट क्यों माँग रहे हो? तुम्हारी आंतरिक इच्छा क्या है और पूरी कैसे होगी? Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:10सुदेश कुमार बाबा जी प्रणाम आप गाँधी के नाम पर वोट मांग रहे
- 0:22हैं, क्या आप गाँधी हैं? नहीं, मैं गाँधी नहीं हूँ, मैं
- 0:41गाँधी था। आज मैं विजय वत्स पंजाब में रहे,
- 0:54आज मैं गाँधी नहीं हूँ, लेकिन गाँधी था ऐसे तो मैं गधा भी था।
- 1:06चेतना का विस्तार होता होता कभी मैं गधा भी हुआ कभी गाँधी भी हुआ
- 1:16लेकिन आज मैं विजय। और आपने कहा कि आप गाँधी के नाम
- 1:28पर वोट मांग रहे हैं ना गाँधी के नाम?
- 1:37पर वोट मांग रहा हूँ। ना गाँधी अपने लिए वोट मांगते थे।
- 1:48मैं आग के लिए वोट मांगता हूँ, जनता के लिए वोट मांगता हूँ,
- 1:53क्यों उसका कारण जनता अपने आप को जीस संबन्धन से हम।
- 2:03सात से 10,00,000 लोगों की कुर्बानी देकर आजाद हुए जनता को
- 2:09महसूस होता है कि कोई उसका गला दबा रहा है और उस गले दबाने से
- 2:16तुम्हारी सांस फूलती है। हमें लगता है कि तुम मर जाओगे।
- 2:23जीस आजादी के लिए शहादत दी आपके पुश्तों में उस आजादी का आपको
- 2:32लगता है कि गला घूँट रहा है आप की आजादी को स्थापित रखने के लिए?
- 2:42दायित्व देने के लिए ही मैं आपके लिए ही वोट मांग रहा हूँ यहाँ तक
- 2:52मेरा संबंध है, मैं स्वतंत्र था पर मैं स्वतंत्र हुआ।
- 3:0228 अक्टूबर 1985 को मेरे पे कोई बंधन नहीं है, ना ही मुझे बांधा
- 3:11जा सकता है। मेरे शरीर को आप बांध सकते हो,
- 3:16मेरे शरीर को जेल की कोठणियों में डाल सकते हो, लेकिन मुझे तुम कैद
- 3:21नहीं कर सकते। मैं वो करता हूँ जो सभी बंधनों से
- 3:29पार हूँ ना मैं कभी बंधा हूँ, ना बंध सकता हूँ इसलिए मुझे।
- 3:43ना आजादी की फिक्र है, ना शरीर की फिक्र है, ना शरीर मेरे लिए बंधन
- 3:52है, ना किसी भी प्रकार का नियम मेरे लिए बंधन है क्योंकि मैं
- 3:58नियमों से पार। शुरू में चला था तब अच्छे दिन थे
- 4:11तब मैंने बोलना शुरू किया। देखते देखते देखते देखते मैंने
- 4:18पाया कि समाज में अच्छे दिन का वायदा करने वाले और और ज्यादा
- 4:26आपका गला घोंट रहे हैं और आप निरंतर शिकायत कर रहे थे।
- 4:35तो मैंने फिर अपनी रहती जिंदगी के कुछ जो शेष दिन बचे वो आपके लिए
- 4:47गुजार देने का मन बनाया, वो ही काम कर रहा हूँ।
- 4:59न मैं गाँधी हूँ, न मैं गाँधी वादी हूँ मैं गाँधी था जीसको आपने
- 5:12मार दिया, मैं वह गाँधी था। आज जो आपके सम्मुख बोल रहा है, वह
- 5:22गाँधी नहीं है, गाँधी को गोडसे ने मार दिया, जीसको आप महिमा मंडित
- 5:30कर रहे हो। गाँधी मेरा अनुभव है गधा होना भी
- 5:43मेरा अनुभव है कभी पेड़ था कभी दो पाया, कभी चार पाया जानवर भी था।
- 5:54यह मेरी जर्नी ऑफ कान्शस्नस है और यह मेरा अनुभव है।
- 6:00आपको मानने की कोई आवश्यकता भी नहीं है।
- 6:07आपको मानने को बाध्य भी कोई नहीं कर सकता।
- 6:12मैं मानु तो आपकी मर्जी मानो तो आपकी मर्जी।
- 6:18इससे गाँधी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, सिर्फ मैं गाँधी था, यह
- 6:28मेरा अनुभव है और मैं अपने पिछले जन्मों में जाकर।
- 6:33साक्षी हूँ इस बात का कि मैं गाँधी था हूँ नहीं हूँ तो मैं
- 6:38विजय बस आज फिर वो ही। वो ही दूर दिन आ गए, वो ही गले के
- 7:03फांस, वो ही गुलामी अब के गुलामी कुछ और तरह के है।
- 7:15गाँधी के वक्त गुलामी किसी और प्रकार के थे।
- 7:19आज गुलामी किसी और प्रकार के हैं। गुलामी ने अपना रूप रंग गिर गिर
- 7:25की तरह बदल लिया। गुलामी अलग रूप में आई है।
- 7:40किस रूप में आई है? धन के रूप में आई है धन की
- 7:51असमानता आपने बड़ी कोशिश की धर्म की असमानता के लिए?
- 8:06धर्म की असमानता आपके रासनाई अभी आप कोशिश कर रहे हो धन की
- 8:17असमानता। देखते चलिए धन की असमानता का क्या
- 8:29नतीजा निकलता है। मैं तो यही संदेश देने आया हूँ।
- 8:38दूसरा संदेश तो परोक्ष है। वह तो सिर्फ इसकी छाया मात्र है।
- 8:46मेरा सही संदेश असली संदेश है। टू नो दायसेल्फ रिमेम्बर
- 8:52योरसेल्फ, रिकॉग्नाइज योरसेल्फ, हू आर यू?
- 8:57यह मेरा असली मंतव्य है। यह जानने के लिए जो सहायक हो सकता
- 9:05है वो दूसरा है। स्टेप वो है सबको समान भोग के
- 9:14अवसर सबको समान प्रतिस्पर्धा का। अवसर क्योंकि सभी उस एक परम तत्व
- 9:26की संतान है। उस एक ने संकल्प किया एक को अहम
- 9:31भविष्य में तो वह एक ही बहुत में परिवर्तित हो गया।
- 9:40लेकिन आपने एक ही के जो टुकड़े हुए उन टुकड़ों को अलग अलग धर्मों
- 9:48में, जातियों में, वर्णनों में, संप्रदायों में, अमीरों में,
- 9:55गरीबों में बांट दिया। और आपका खरीदा हुआ मीडिया तंत्र
- 10:01बोलना शुरू हो गया कि अगर आप गरीब हैं तो अवश्य ही आपने पिछले
- 10:08जन्मों में कोई पाप किए होंगे। पिछले जन्मों में आपने किसी का
- 10:14धन। छीना होगा तो इस जन्म में आप गरीब
- 10:19हो, लेकिन यह आपकी ही बनाई हुई चालबाजी थी।
- 10:29आपने मीडिया खरीद लिया और मीडिया प्रचार प्रसार करने लगा।
- 10:33तुम भी बुद्धू हो, तुम्हारा मीडिया भी बुद्धू है, मैं तुम्हें
- 10:39कहता हूँ बुद्धू ना रहूँ, बुद्ध हो जाओ, मेरा मंतव्य सिर्फ
- 10:47तुम्हें यथार्थ बताना है, यथार्थ ये है।
- 10:53कि तुम कैसे बुद्धू से बुद्ध हो जाओ, मेरा मंतव्य भी यही है।
- 11:01मैंने शुरू के 5.5 वर्ष अध्यात्म के लिए ही बोला।
- 11:08इसी मंतव्य के लिए बोला कि तुम बुद्धू न रहो।
- 11:12तुम बुद्ध हो जाओ फिर भी तुम अभी बुद्धू हो और बुद्धू क्या अभी और
- 11:20बुद्धू होने की चेष्टा करते हो? बुद्धू श्रेष्ठ अब आपका नाम मैंने
- 11:26रख दिया बुद्धू श्रेष्ठ। तुम ऐसे मुर्ख हो जो डालरों की
- 11:42खनक के लिए अपना वो भीतर का रस बेच देते हो जो अमूल्य है, जिसका
- 11:51एक। बूंद किसी कीमत पर भी नहीं मिलती
- 12:01मैं उस रस की बात करता हूँ रसोब वैसा है वह रस रूप है उपनिषित का
- 12:10यह है प्रसिद्ध वचन। रसो रसम यो व्यायाम लभ दया आनंदी
- 12:22भक्ति जीसको वह रस मिल गया वह। उस परम आनंद को प्राप्त हुआ, वह
- 12:35रस रूप है। रसम व्यवहाय।
- 12:43लब्धया आनन्दों भवतीय जीसको वह रस मिल गया।
- 12:51वह आनंद को प्राप्त हुआ। तुम्हें मैं चेता भी रहा हूँ, सुन
- 13:05लो मेरी पुकार। जागो।
- 13:15सोने वालो सुनो मेरी कान जागो सोने वालो।
- 13:35सुनो मेरी कहानी गणपतियों पर मुझे करोध नहीं आती गद्दी नसीनों पर
- 13:50मुझे क्रोध नहीं आती। सम्मान की चाहत अपूर्व सम्मान की
- 13:58चाहत रखने वालों पर मुझे क्रोध नहीं आता, मुझे दया आती है तरस।
- 14:13काश इसे ढूंढ रहे हैं वो जहाँ है उस तरफ जाना शुरू कर दें।
- 14:31और प्रत्येक की चाहत क्या है आंतरिक यह मैं भलीभाँति जानता
- 14:37हूँ, बस मैं तुम्हें जगाने आया हूँ रसो वैसा है।
- 14:47तुम उस रस की तलाश में आओ, रास्ता भटक गए हो, रास्ता भूल गए हो,
- 15:03अपने घर लौटना चाहते हो? बताने वाला कोई नहीं बताने वाले
- 15:13सभी तुम्हारे जैसे हैं और अगर किसी को वह रस मिल गया रसम, लब्ध
- 15:24व्यास। जीसको मिल गया रस आनंद भवती वह
- 15:33आनंद के खजाने में लूटपाट हो जाएगा लिपटते हो जाएगा ना तो मैं
- 15:44गाँधी हूँ ना कभी गाँधी ने वोट मांगी।
- 15:52न मैं गाँधी के लिए वोट मांगता हूँ, न मैं गाँधी के नाम पर वोट
- 15:56मांगता हूँ, मैं वोट मांगता हूँ इस दुखी जनता के लिए, जिसकी आत्मा
- 16:06चित्त कर रही है। चीतकार करते करते वह चीतकार मुझ
- 16:13तक पहुंचती है, मैं इस प्रयास में हूँ किस तरह तुम भी भटके हुए लोक?
- 16:29जो गतियों की तलाश में कर रहे हैं, वो संभल जाएं, अपना रास्ता
- 16:39सुधार लें। रास्ता सभी का मंजिल सभी के एक ही
- 16:47है। रस्ता भी सभी का एक ही है, लेकिन
- 16:52तुम जब मार्ग भटक जाओ तो कोई क्या करे मंजिल एक रस्ता भी वहाँ तक
- 17:01जाने का एक। लेकिन जब कोई रास्ता भटक जाए तो
- 17:07कोई क्या करे? मैं तुम्हें जगाने आया हूँ, जीस
- 17:17रास्ते पे तुम चल पड़े हो वह रास्ता उस मंजिल को जाता नहीं।
- 17:26जिसकी तुम्हारी जीसको तुम्हारी पुकार है जिससे तुम्हारी आत्मा
- 17:39ढूंढ रही है। ज़रा लोटो उस मार्ग में जीस
- 17:51स्मारक से भटक कर गलियों तक पहुंचे और तुम पाओगे उसकी गद्दी
- 18:03में रास नहीं। जैसे तुम संभोग में रस पाते हो तो
- 18:11बार बार संभोग करने का मन क्यों होता है?
- 18:21क्योंकि संभोग से रस तो मिलता है लेकिन क्षणिक मिलता है।
- 18:29और तुम्हारी अंतः कामना है, इस रस को अखंड कैसे किया जाए?
- 18:36बस इसी चाहत में तुम बार बार अंतरंग लक्षणों में जाने की
- 18:41चेष्टा करते हो। मंतव्य है तुम्हारा उस अखंड रस को
- 18:47पा लेना जिसे दूर से देखा था। अंतरंग क्षणों में चाहत तुम्हारी
- 18:56यही है मैं भी भटक गया था। जन्मो जन्मो तक भटका रहा, तुम भी
- 19:11भटके हुए हो, और जो भटका हुआ था उसने मंजिल पाली तो उसका दायित्व
- 19:21बनता है। कर्तव्य बनता है।
- 19:25भटकों को बता दें कि मैं भी भटक गया था, आज मंजिल मिल गई।
- 19:36तुम्हारा रास्ता गलत है, तुम इस रास्ते को छोड़ दो।
- 19:45तुम दूसरे नस्ते को अपना लो जो मैं तुम्हें बताता हूँ?
- 19:51जन्मजात कोई बुद्ध पैदा नहीं होता।
- 19:56जन्म सेतु सभी बुद्धू पैदा होते हैं।
- 20:00मैं भी बुद्धू ही पैदा हुआ था। जन्म से तो सभी बुद्धू पैदा होते
- 20:07हैं। बुद्ध तो अपना अर्जन है।
- 20:17बुद्ध तुमने वो धत्त्व तुमने कमाना है, वो धत्त्व तुमने गेन
- 20:23करना है लेकिन तुम तो गेन किशोर ही करने लगे, तुम तो आई ए एस की
- 20:32डिग्रीज़ गेन करने लगे। तुम तो उपाधियाँ गेन करने लग गए,
- 20:40तुम तो कागज़ की डिग्रीज़ गेन करने लग गए, भारत रत्न गेन करने
- 20:52लग गए। कहाँ उलझ गए हो तुम?
- 20:59मैं भी उलझा हुआ था और अगर कोई उलझा हुआ कभी सुलझ जाए तो उसका
- 21:10कर्तव्य बन जाता है कि जो अभी उलझे हुए हैं।
- 21:15उनको बता दें कि मुझे मार्ग मिल गई है, मुझे रास्ता मिल गया है।
- 21:22यू आर ऑन दी रोंग पाथ अपना पाथ बदलो, रास्ता बदलो तुम गलत मार्ग
- 21:32पे हो यही बताने आया। कोई लड़ने झगड़ने नहीं आया।
- 21:41मैं सिर्फ आपको बताने आया हूँ कि यू आर ऑन दी रॉन्ग पाथ तुम भूले
- 21:51हो तुम भट गए हो। जाना चाहते हो उस मंजिल पर जहाँ
- 21:59मैं पहुँच गया तुम्हारी चाहत भी वही रस पीने की है रसोब ऐसा।
- 22:11रस्म हुआयम जिससे रस की प्राप्ति होगी।
- 22:14लब दवा आनंद भक्ति वह आनंद शुरू हो गया, खो गया उस मस्ती में, खो
- 22:29गया उस आनंद में। जहाँ कोई तृष्णा बाकी नहीं रहता,
- 22:42वो ऐसा अमृत कि उसको पीने के बाद तुम कभी मरते नहीं।
- 22:53और तुम अन्य अन्य उपायों से अमृत तत्व को प्राप्त करना चाहते हो तो
- 23:00यह रास्ता गलत है। तुम वैज्ञानिक तरीकों से इस शरीर
- 23:05को अमर करना चाहते हो? घर मजबूत बना लोगे, कच्ची कोठरी
- 23:12की जगह पक्के महल बना लोगे, फिर उसकी अवधि ज्यादा होगी।
- 23:22निश्चित कच्चे मकान ढह जाते हैं, बारिश में पक्के मकान नहीं ढहते।
- 23:28उसकी अवधि ज्यादा होती है। इतना से कर लोगे, बस तुम आज जीस
- 23:37मकान में बैठे हो वह कच्चा जो मकान कल को साइंटिस्ट कुछ नई खोज
- 23:44कर के। इसकी उम्र को बढ़ा लेंगे, 100 साल
- 23:54कर लेंगे 1000, कर लेंगे 10,000 लाख सेल, कर लेंगे तुम्हारी
- 24:03आंतरिक इच्छा। जीसको तुमने अंतरंग क्षणों में
- 24:09दूर से निहारा उसका अखंड स्वरूप होने की है के मैं उसमें जा बसु
- 24:21सदा सदा के लिए यह तुम्हारी आंतरिक सही सही इच्छा है।
- 24:29तुम्हारी आंतरिक इच्छा और जब तक ये ना मिलेंगे तब तलक तुम भटकते
- 24:38ही रहोगे और इन गद्दी से यह मिलती नहीं।
- 24:53धन के अम्बार इकट्ठे कर लो मूर्खों तुम और ज्यादा बुद्धू हो
- 25:01जाओगे क्योंकि वासना कभी किसी की पूरी।
- 25:05हुई है। वासना ऐसा घृणा है जिसके पैदा
- 25:12नहीं होता। नीचे से सुराग होता है।
- 25:14उसका जितना पानी ऊपर से उस में भरोगे वह नीचे से निकल जाएगा।
- 25:24ऐसे बिना पैंदे के खड़े हो तुम वासना कभी तप तो होती नहीं।
- 25:31वास में सदा ही अतिरिक्त रहती है और तुम असंभव को संभव करने के
- 25:39प्रयास में जुटे हो तो फिर क्या मेरा कर्तव्य नहीं बनता कि
- 25:43तुम्हें जगा दूँ? तुम्हें वो घड़ा दिखा दूँ कि
- 25:49देखो, पैदा तो है नहीं इसमें? इसमें सुराख है, ऊपर से पानी
- 25:56फेंकने का क्या फायदा यह कभी भरेगा नहीं।
- 26:01ऐसी ही तुम्हारी वासनाएँ अपूरत हैं कभी पूर्ण नहीं होंगी।
- 26:08और गदियाँ पाना, धन कमाना, प्रशंसा कमाना, नाम कमाना ये सब
- 26:16वासनाएँ वासना कभी पूर्ण नहीं होती, सदा ही अपूर्ण रह जाती हैं।
- 26:27मैं सत्य को प्रचारित करना चाहता हूँ, प्रचारित करना चाहता हूँ
- 26:34क्यों? क्योंकि मैं भी तुम्हारी तरह भटका
- 26:37हुआ था। मैंने भी बहुत से जन्म ऐसे ही गवा
- 26:43दिए। कभी धन इकट्ठा किया, कभी गद्दियाँ
- 26:50बोगीं, कभी बल इकट्ठा किया। मैंने अपनी कहानी सुनाई नेपाल में
- 27:03अंशु भर्मन नाम का। राजा मैं ही था, राज़ में सुख है
- 27:14या जीस अवस्था में? मैं आज हूँ।
- 27:17उसमें सुख है, इस भेद को मैं भलीभाँति जानता हूँ क्योंकि मैंने
- 27:23दोनों पड़ाव देख लिया है और कंपैरिजन तभी होता है, जब कोई
- 27:32दोनों पड़ाव देख लेता है। हम गौशाला में जाया करते थे, वहाँ
- 27:43एक बैंक मैनेजर आया करता था, हमारे पड़ोस में ही रहता था।
- 27:46चुबारे। इधर उधर की बातें करते लोग, मैं
- 27:54आराम से दीवार के साथ अपनी पीठ लगा के बैठ जाता हूँ, सुनता रहता
- 28:04हूँ। तो वह बैंक मैनेजर बोला कि
- 28:12व्हिस्की भी कोई पीने की चीज़ होती है।
- 28:14क्षमा करना बीयर बीयर भी कोई पीने की चीज़ होती है जैसा बीयर पी
- 28:22लिया। या गधे का पेशाब पी लिया।
- 28:26दोनों का बराबर पीना है गधा गधे का पेशाब पी लो या बीयर पी लो
- 28:33दोनों टेस्ट में समान होती है तो सभी हँसे मैंने पूछा मैनेजर साहब?
- 28:45क्या आपने दोनों का स्वाद चख लिया?
- 28:52पीयर तो लोग पीते हैं, लेकिन क्या गधे का पेशाब भी पी के देख लिया
- 28:56की उषा ही टेस्ट होता है? बस वही बात आप करते हो।
- 29:05मैंने दोनों का स्वाद चख लिया, गद्दियाँ भी भोंकीं रस न मिला और
- 29:19फिर भटका, भटका, भटका और भटका और ये भटकन मुझे स्थल पर ले आई।
- 29:26जहाँ भटकन समाप्त हो गई, मैं भटकता, भटकता यहाँ पहुँच गया,
- 29:34जहाँ भटकन नहीं रही, अब आनंद ही आनंद है, अब मस्ती ही मस्ती है,
- 29:41सरूर ही सरूर है। क्या मेरी चाहत, कोई वासना है?
- 29:50नहीं मेरी चाहत तुम्हें बताना है मेरी चाहत तुम्हें आगाह करना है।
- 30:04कि तुम जीस रास्ते पे हो आगाह, अपनी मौत से कोई बशर नहीं हुई,
- 30:11तुम्हे मौत आएगी 1 दिन दान इकट्ठा कर रहा हूँ।
- 30:18गलतियाँ इकट्ठी कर लूँ तुम से पहले कितने आए चले गए अगाह अपनी
- 30:25मुँह से कोई बशर नहीं, सामान सो बरस का बल्कि खबर नहीं मुझे एक
- 30:34बड़ा सेठ कहने लगा। मैंने कहा तुम किस लिए कमाते हो?
- 30:41तुम्हारी उम्र तो बहुत ही ज्यादा हो गई है।
- 30:4390 बार हो गई है हाथ पांव कप रहे हैं मुश्किल चल फिर सकते हो फिर
- 30:53किस लिए कमाते हो, पहले ही बहुत है।
- 30:59मैं कमाता हूँ अपने बच्चों के लिए मैं कमाता हूँ अपने बोतों के लिए
- 31:08बड़ बोतों के लिए आने वाली पुस्तों के लिए मैंने कहा अच्छा।
- 31:17क्या तुम तृकाल दृश्य हो गए? क्या तुम्हें दिव्यदृष्टि मिल गई?
- 31:27कहता नहीं उसका तो मुझे कुछ मालूम नहीं मैंने कहा पक्का पता है कि
- 31:33तुम्हारे पोता होगा। बढ़ पोता होगा तुम्हारे ये वंश
- 31:39आगे चला चलेगा पक्का पता है ओह खामोश हो गया, खामोश होंगे वो?
- 31:51लेकिन ये खामोशी बड़ा रंग लाई। किन्हीं खास घड़ियों में इसी की
- 31:58बात आपके भीतर उतर जाया करती है। किन्हीं खास लम्हों में किसी
- 32:08साधारण व्यक्ति की बात भी तुम्हारे अंतर को छेद देती है।
- 32:15उस घड़ी में मेरा कह हुआ ये शब्द उसको उसके अंतश को चीर गया, हृदय
- 32:22में फंस गया और अगले दिन उसका न्योता मेरे पास आया।
- 32:32कि आप मुझे मिली है पंडित जी मेरे पास उसका मुलाजिम आया, आपको सेठ
- 32:44जी ने बुलाया है, मैं वहाँ गया। बैठ किया।
- 32:54मैंने कहा आप कहने लगा आप कुर्सी पे बैठो, मैंने कहा नहीं सेठ जी
- 33:01आपसे ऊंचा मैं नहीं बैठता हूँ, कहते नहीं आप ऊंचे ही बैठो, आपकी
- 33:07बात मुझे लड़ गई। वह अपनी गद्दी पर बैठे थे और
- 33:13कुर्सी ऊंची थी। मैंने कहा मैंने कुछ गलत कहा,
- 33:20कहते नहीं आपने बिल्कुल सही कहा कौन जाने आपकी नस्ल आगे चलेगी
- 33:28नहीं चलेगी। आपको शायद पता न हो भगवान राम की
- 33:41नस्ल कुश की संतान के रूप में चली लभ की संतान के रूप में खत्म हो
- 33:48गयी। लभ के आगे जाकर दसवीं, बारहवीं
- 33:52पीढ़ी खत्म हो गयी, नहीं चली। लेकिन कुश की संतांजलि यह जो शैल
- 34:00था कर्ण का सार्य थी। यह कुश का पचासवां वंशज था।
- 34:09पचासवां। जाने कुछ पचासवें पूर्वज थे उसके
- 34:21शाल के, जिसके कारण करण हार कौन जाने?
- 34:33तुम्हारी पुश्त आगे चलेगी नहीं चलेगी।
- 34:41क्यों? इन भ्रमों में अपने जीवन को नष्ट
- 34:44गया और मैं क्यों अपना वक्त तुम पर लगा रहा?
- 34:55क्या मुझे कोई पगार मिलती है? अब मेरी ये दुविधा है कि मैं
- 35:03मानता तो उन्हें और अगर आप मुझे कुछ दे जाते हो।
- 35:09और मैं उसको लौटा दूँ तो आपकी श्रद्धा को ठेस पूछती है तो बताओ
- 35:16मेरे लिए रास्ता क्या है? मांगता मैं कुछ नहीं अगर आप
- 35:24श्रद्धा से कुछ दे देते हो। देखिए मेरे पास ₹15 आए हैं, उस
- 35:32बच्चे के, जो मैंने मांगे, क्या मैं उसको वापस कर दूं?
- 35:40तो उस बच्चे के मन को कितनी ठेस लगेंगी?
- 35:43कितनी श्रद्धा से उसने रुपए बेचा अब मेरे लिए?
- 35:49ये दुविधा की बात है तो फिर एक ही रास्ता बजता है, दूसरा कोई रास्ता
- 35:56नहीं के मांगू ना? जो आप श्रद्धा से दे दो उसे
- 36:02स्वीकार करो बस और दूसरा रास्ता ही कोई नहीं।
- 36:07आपकी श्रद्धा भी परिपूर्ण हो जाएगी।
- 36:11आपकी श्रद्धा के फूल भी स्वीकृत हो गए और मैं जाचक भी न बना,
- 36:18मैंने मांगा भी कुछ। अगर मेरे पास ज़्यादा इकट्ठा हो
- 36:26जाएगा तो हिंदुस्तान में बड़ी गरीबी है, मैं गरीबों में बांट
- 36:33दूंगा। क्या मुसीबत है?
- 36:38लेकिन अगर कोई श्रद्धा से श्रद्धा के फूल अर्पित करता है।
- 36:43तो उसको ठुकराना बिल्कुल उचित नहीं है।
- 36:47मैं इसलिए स्वीकार करता हूँ, लोभ वश के स्वीकार नहीं करता, लोभ वश
- 36:52तो मांगा जाता है। लोभ वश तो चैनलों पे लिखना होता
- 36:58है कि संस्था के हाथ मजबूत करें, दान करें।
- 37:04ऐसा कुछ कभी ना मैंने किया मैं कभी करूँगा तो आपने पूछा पुत्र
- 37:20तुम गाँधी के नाम पर वोट मांगते हो कहाँ भाई?
- 37:26कहाँ वोट मांगा? किस क्षेत्र में मैंने नामांकन भर
- 37:32दिया, किस क्षेत्र में मैंने चुनाव लड़ने की घोषणा की?
- 37:42नहीं, मेरी बात पर सुन लो। तुम आंधी बात समझते हो क्योंकि
- 37:50आंधी ही सुनते हो पूरी बात सुनु तो पूरी बात समझ में आएगी, मैं
- 38:00शपथ ले के कहता हूँ। कि मैं तुम्हें इस पूंजी वा से
- 38:12निजात करने का संकल्प लेता हूँ और उसके लिए जो भी प्रयास बना पड़ा
- 38:24मैं करूँगा। लेकिन करूँगा तो अगर आप चाहोगे
- 38:29तुम ये बात मेरे ध्यान में रख लेना अगर तुम अभी कह दो कि हमें
- 38:37जरूरत नहीं है। यू अरे हैप्पी वे प्लीज़्ड।
- 38:46हम प्रसन्न हैं तो मैं प्रयास अभी छोड़ दूंगा, मैं प्रयास।
- 38:59किसी कारणवश नहीं कर रहा क्योंकि मुझे प्रयास करने का कोई कारण शेष
- 39:04बचा ही नहीं है। मैंने वो पा लिया।
- 39:09इसको पाने के बाद कुछ और पाना बाकी रह नहीं जाता।
- 39:21मैं आप पर कोई उपकार भी नहीं कर रहा हूँ।
- 39:26भटके हुए को मार्ग दिखाना कोई उपकार नहीं हुआ करता।
- 39:33अब मेरी इस बात को ध्यान से समझ लेना।
- 39:38भटक को मार्ग दिखाना कोई उपकार नहीं हुआ करता।
- 39:45वर्ण कर्तव्य हुआ करता है, यह मेरा फर्ज है।
- 39:53तुमने मुझसे रास्ता पूछा हो न पूछा।
- 39:58मेरा कर्तव्य है क्योंकि मैं भी भटका हुआ था मैंने भी गद्दियो की
- 40:06खाक क्षण मैंने भी धन की खाक क्षण मैं भी इंद्रियों का गुलाम रहा।
- 40:18मैं भी भोगों में आशक्त रहा। मैंने भी पुत्र पुत्र पढ़ पुत्र
- 40:27शड़ पुत्र कमाई मैं भी स्त्री पुरुष।
- 40:35संयोग करता रहा। कभी श्री बना, कभी पुरुष बना जो
- 40:49कल्पना आपके भीतर जची जाती है। कुछ आदमी ये सोचते हैं की
- 40:56स्त्रियाँ ठीक होती हैं, उन्हें ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी होती।
- 41:00घर में आराम से बैठे रहती हैं। मज़े से कुछ स्त्रियाँ सोचती हैं
- 41:07के पुरुष मज़े में बाहर पता नहीं कहाँ कहाँ घूम के आते हैं।
- 41:12कुछ लोगों को घूमने की आदत होती है फिर वो घूमने के लिए स्त्रियों
- 41:19तक को छोड़ देते हैं। यह कोई ढोंट नहीं है, सत्य हैं
- 41:30कुछ लोग घूमने के लिए, संसार को घूमने के लिए।
- 41:34स्त्रियों को छोड़ देते हैं। वायदों को निभाते नहीं भूलोहुओं
- 41:44को राह दिखाना बटकुहुओं को उनकी लाठी का सहारा बनना।
- 41:54और उनकी लाठी पकड़ के गंतव्य तक छोड़ देना कर्तव्य होता है।
- 42:02उपकारण भटकों को राह दिखाने के दो फायदे हैं।
- 42:12एक फायदा यह। के भटका हुआ अगर सही मंजिल पे
- 42:19पहुँच गया तो वह आनंद को प्राप्त हो जाएगा वह उस रस को प्राप्त हो
- 42:27जाएगा जो उपनिश्चित कहते हैं। के उस रस में बड़ा आनंद है और
- 42:40दूसरा। भटके हुए को अगर।
- 42:44राह दिखा दी जाए सही मंजिल पे पहुँच जाने के बाद।
- 42:51वो दूसरों को भटकाना बंद कर देंगे।
- 42:55जैसे आज गुरु तथा कथित। गुरु स्व निर्मित गुरु।
- 43:02लोगों को भटकार रहे हैं, इनका कसूर नहीं है।
- 43:08इनकी कमी है, कसूर कोई नहीं। कमी है कि इन्होंने उस आनंद का
- 43:14दर्शन किया और आनंद का दर्शन किए बिना उस आनंद को बखान होंगे कैसे?
- 43:28उस आनंद का गुणगान कैसे करोगे? शलाका कैसे करोगे?
- 43:34उसकी उसकी महत्त्व को कैसे बताओगे?
- 43:39क्योंकि तुमने अभी पिया है तो दो फायदे हैं एक तो जीसको भटके हुए
- 43:45को राह दिखाओगे तुम? वह आनंद मगन हो जाएगा और दूसरा
- 43:55आनंद मगन होने के बाद दूसरों को भटकाना बंद कर देगा।
- 44:00ये दो फायदे हैं आज दुनिया अगर भटकार ही है यहाँ नकली गुरु बैठे।
- 44:07अगर दुनिया को गुमराह कर रहे हैं तो उसका एक ही कारण है कि वो खुद
- 44:15उस रस को पिए नहीं है, बस मात्र और मात्र ही कारण है अगर उन्होंने
- 44:22उस रस को पी लिया होता। तो वह दूसरों को भटकाते ना मात्र
- 44:28एक ही कारण है, इसलिए वो दूसरों को भटकाते हैं, उन्हें सम्मान
- 44:35चाहिए, उन्हें धन चाहिए, वो लोग ही हैं, वो लालची हैं, वो चंचल
- 44:42हैं, वो चोर हैं। अपराधी मन रोभी मन लालची मन, चंचल
- 44:52मन चोर मन के मते नचा लिए पलक पलक मन हो भीमसेन ने पूछा है बाबा?
- 45:08अब धीमा बहुत बोलते हैं, क्या आपकी वीडियो को मैं थोड़ा सा
- 45:15फास्ट करके सुन लिया करो, पुत्र अर्थ ही हो जाएगा?
- 45:23तुम समझे ही नहीं, मैं धीमा बोलता हूँ।
- 45:28तुम्हें ठहराने के लिए फिर मेरा मंतव्य हो गया तेज तो मैं भी बोल
- 45:35सकता हूँ मैं कभी कभी इतना तेज बोलता हूँ कि तुम कहोगे बाबा रुक
- 45:42जाओ, समझ में नहीं आता इतना तेज बोलते हो?
- 45:48बस तुम्हे समझाने के लिए धीमा बोलता हूँ ताकि तुम्हारी दौड़
- 45:58खत्म हो जाए, तुम दौड़ना बंद कर दो।
- 46:07फिर मेरा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। मेरा धीमा बोलना बेकार हो जाएगा
- 46:14अगर तुम इसको स्पीड पे करके सुन लोगे क्योंकि मेरा मतलब है तुमको
- 46:21ठहराना। तुम दौड़ रहे हो वो दौड़ चाहे धन
- 46:27की हो, पदवी की हो, माँ की हो या किसी मेडल को प्राप्त करने की,
- 46:33मैराथन की दौड़ हो, तुम सदा दौड़ रहे हो और दिन में ही नहीं
- 46:40दौड़ते, तुम रात को भी दौड़ते हो। सपनों में भी दौड़ते हो तुम
- 46:45दौड़ते ही रहते हो और मैं तुम्हें ठहराने के लिए आया हूँ ठहर जाओ
- 46:52दौड़ने से भ्रम पैदा होता है दौड़ती हुई गाड़ी पर बैठने से
- 46:58तुम्हें वृक्ष, पृथ्वी, चाँद, तारे, नक्षत्र।
- 47:02आदमी स्टेशन से घूमते हुए भागते हुए नजर आएँगे।
- 47:10दौड़ती हुई गाड़ी पर तुम बैठोगे और मन दौड़ती हुई गाड़ी है देश तो
- 47:17मैं भी बोलना जानता हूँ पुत्र लेकिन यह विषय?
- 47:27आराम का है, मैं तुम्हें ठहराने आया हूँ भगाने नहीं भाग तो तुम
- 47:36पहले से रह जाओ 1 दिन तुम पाओगे। यह दौड़ व्यस्त है।
- 47:50दौड़ के तुम कुछ पाओगे बिलाश्रक वो पाना धन का हो, मान सम्मान का
- 47:57हो, पदवियों का हो, डिग्रीज़ का हो, उपाधियों का हो, तुम भारत
- 48:03रत्न बन सकते हो। लेकिन मैं तुम्हें यह कुछ भी बनने
- 48:11के लिए नहीं कहता, न धावक, न पहलवान, न राष्ट्रपति, न
- 48:18प्रधानमंत्री, न धनी, न ही कुछ। मैं कहता हूँ तुम जो हो वही हो
- 48:27जाओ तो इसके लिए खुद को खोजना पड़ेगा।
- 48:33तुम हो कौन हू आर यू तुम जो हो इन शब्दों को सुन लो, तुम जो हो वही
- 48:41हो जाओ। और वही होने के लिए ठहरना पड़ता
- 48:45है और ठहर के तुम पाओगे यह जो मैंने कमाया वह एक सपना था।
- 49:00मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा? तुम राजनीति की बातें करते हो और
- 49:06फिर तुम अध्यात्म का उपदेश देते हो।
- 49:08दोनों बातों चलेंगी कैसे या किसान ये दोनों ही चलेंगे।
- 49:15पुत्र जैसे दिन में श्रम और रात को विश्राम।
- 49:22दो पहियों के बिना कभी गाड़ी चली गई।
- 49:30वो पैरेलल हूँ या आगे पीछे हूँ, लेकिन होंगे तो दो, मैं तुम्हें
- 49:41भगाता हूँ राजनीति में। और मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि
- 49:47तुम भाग तो पहले ही रहे हो परिश्रम तुम दिन में करते हो, फिर
- 49:55तुम मैं तुम्हें ठहराने की व्यवस्था कर लेता हूँ अध्यात्म
- 50:00भक्त। यही मेरा फॉर्मूला है।
- 50:10यही मेरा तरीका है भाग तो तुम रहे हो थोड़ा और दौड़ाना और जब तुम
- 50:18मैराथन की दौड़ प्रबल रूप में कर लेते हो तो फिर मैं धीरे से।
- 50:23एक प्रवचन शांति का उपदेश दे देता हूँ अध्यात्म का उस मंजिल पे
- 50:33पहुँच जाने पर सब व्यर्थ हो जाता है।
- 50:38न तो मेरा कोई मित्र है न कोई शत्रु।
- 50:44ना मेरा कोई सगा है, ना संबंधी क्यों, क्योंकि मेरे सिवा और कुछ
- 50:56है ही नहीं। जब मेरे सिवा कुछ है ही नहीं।
- 51:03तो किसका तो मैं शत्रुता करूँगा और किस्से मैं मित्रता करूँगा और
- 51:10किस्से मैं द्रोह करूँगा। एक हो अहम द्वितीय नाश्ती मैं
- 51:15सिर्फ एक हूँ, दूसरा हो तो उससे मैं वह भी करू।
- 51:20दूसरा हो तो मैं उससे भय भी मानू। मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है।
- 51:27अहं ब्रह्मस्म और मैं ही ब्रह्म हूँ एको।
- 51:31अहं द्वितीय, नाश्ते दूसरा नहीं है जहाँ कोई दूसरा भ्रम है और आज
- 51:40का आखिरी शब्द। तुम्हारा कुछ भी बनने की इच्छा
- 51:46परमात्मा से सीधी सीधी जंग छेड़ना है।
- 51:52तुम्हारा कुछ भी बनने की इच्छा परमात्मा से सीधी सीधी जंग छेड़ना
- 51:59है। इस शब्द को ध्यान से सुनें।
- 52:04और परमात्मा से जंग करके कभी कोई जीता है वह इतना विराट वह इतना
- 52:14विशाल जिसका और छोर नहीं जिसका बार बार कोई।
- 52:22ना आदि है ना अंत है ना मद्य है इसलिए तू छोड़ दे कुछ बनने की
- 52:30इच्छा, प्रधानमंत्री बनने की इच्छा, राष्ट्रपति बनने की इच्छा
- 52:36ये सब तेरी चालाकियां कुछ काम न पड़ेंगी।
- 52:43छोड़ दे जाने दे तकदीर से तकराज न कर।
- 52:59छोड़ दे जाने दे तकदीर से तकरार न कर मैं तो एक ख्वाब हूँ।
- 53:18इस ख्वाब से तुम प्यार न कर प्यार हो जाए तो फिर प्यार का इजहार न
- 53:36कर। मैं तो इक खा हूँ इस खाव से तुम
- 53:46प्यार न कर। ये धन।
- 53:53ये पद्मियां, ये मान सम्मान, ये डिग्रीज़, ये तुम्हारी कुर्सियां
- 54:02सब ख्वाब हैं ख्वाब और ख्वाब का क्या भरोसा कब टूट जाए?
- 54:12कोई भरोसा नहीं होता। तेरे हाथ में रहने वाली नहीं है।
- 54:20ये हवाएं कभी चुपचाप चली जाएंगी? लौटकर फिर कभी गुलशन में नहीं
- 54:41आएंगी ये हवाएं कभी चुपचाप। चली जाएंगी।
- 54:56लौटकर फिर कभी गुलशन में नहीं आएंगी ने हाथों।
- 55:09में। अपने हाथों में हवाओं को गिरफ्तार
- 55:20न कर अपने हाथों में हवाओं को। गिरफ्तार न कर मैं तो एक ख्वाब
- 55:37हूँ इस खास से तुम प्यार न। कर इन गद्दियों का लाल छोड़ दें
- 55:47ये हवाएं हैं। इन हवाओं को मठियों में बांधने की
- 55:55कोशिश मत कर ये मठियों में कभी बनती नहीं, ये व्यर्थ के प्रयास
- 56:02है 1 दिन। तुम्हें इस असत्य का पता चल
- 56:11जाएगा, जश्न कभी किसी संत के करीब आएगा तेरे।
- 56:21दिल में हैं मोहब्बत के। भड़कते शोले तेरे दिल में मोहब्बत
- 56:39भड़कते शोले अपने सीने में। छुपा ले ये धड़कते शोले, इस तरह
- 56:57प्यार को रुसवा सरेबाजार न कर इस तरह प्यार को और रुसवा सरबकार न
- 57:17कर मैं तो एक ख्वाब हूँ। अपने जुलूस निकाल लिया।
- 57:24बंद कर दो जी याद है? सुरजीत सिंह, बरनाला हमारे पंजाब
- 57:31के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो बिजली वालों ने बिजली के
- 57:38कर्मचारियों ने। रोष प्रदर्शन करना था, हड़ताल
- 57:42करना था, जुलूस निकालना था, अब कहाँ कुछ जाता है।
- 57:50कई बार बातों के अर्थ बदल जाते हैं तो हाथ जोड़ के कहने लगा।
- 58:00हे विद्युत कर्मचारियों आप कृपया अपना जुलूस न निकालो।
- 58:08अब इसके दो अर्थ होते हैं लोग रोड शो करते हैं।
- 58:15मेरी दृष्टि में वो अपना जुलूस निकालते हैं, खुद का जुलूस
- 58:21निकाला, शोभा देता है क्या बंद करो?
- 58:26इस तरह प्यार को रुसवासरे। बाजार न करे इस तरह प्यार को
- 58:44रुसवासरे बाजार न करे। मैं तो इक ख्वाब हूँ इस ख्वाब से
- 59:00तू प्यार न कर। धन दौलत माँ समा गदिया चाहते।
- 59:16ये ख्वाब हैं और मुश्किलात ये है कि जो रात को स्वप्न आया उसको तुम
- 59:26डिनै कर सकते हो। ये खुली आँखों से देखा हुआ सपना
- 59:30है। तुमसे नज़रअन्दाज़ हुई तो नहीं कर
- 59:38सकते, यही तुम्हारी मुसीबत है इसलिए गुरु की आवश्यकता होती है।
- 59:46तुम कहोगे मैं देख रहा हूँ जागते जीते जागते देख रहा हूँ?
- 59:53ये गद्दियाँ हैं भाई ये धन है नहीं, ये तुम्हारी मान्यता है आज
- 1:00:01सोने की कीमत जीरो कर दी जाए तो तुम्हारी मान्यताएँ क्या होगी?
- 1:00:07लोहे की कीमत सोने के बराबर कर दी जाए।
- 1:00:11तो तुम्हारी मान्यता कहाँ जाएगी? ये तुम्हारी जेबों में पड़े हुए
- 1:00:17कहा कि के टुकड़े मात्र मान्यताओं से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
- 1:00:22ये तुम्हारी सबकी सामूहिक मान्यता है कि ये ₹500 है।
- 1:00:28ये सामूहिक मान्यता है। लेकिन है तो कागज़ छपा हुआ कागज़
- 1:00:36प्रिंटिंग प्रेस में छपा हुआ कागज़।
- 1:00:39रिज़र्व बैंक में छपा हुआ कागज़ इस मान्यता को।
- 1:00:45छोड़ दे जाने दे तकदीर से तकरार न कर अल्लाह पाबे सो पला ता लगबे
- 1:00:54दरबार तू शांति की तलाश में है, लेकिन निकल पड़ा धनकमान।
- 1:01:05तो आनंद की तलाश में है निकल पड़ा गद्दियाँ का मन तो रस की तलाश में
- 1:01:13है निकल पड़ा शोहरत कमाने ये सब ख्वाब है इस ख्वाब से तू प्यार न
- 1:01:24कर। प्यार हो जाए तो इस प्यार का
- 1:01:30इजहार न कर मत सोने की पुशाकें डालकर दूसरों को भरमा सोने की
- 1:01:39पुशाकें डालने से कभी सुख नहीं मिला करता।
- 1:01:43सोन की पुषाकें तुम्हें और ज्यादा गर्वोन्मित कर देती हैं तुम्हें
- 1:01:51और ज्यादा अहंकार ही बना देती हैं।
- 1:01:54यह तुम्हारे अहंकार को बढ़ा देती हैं।
- 1:01:57कनक कनकते 100 गुना मात्रकता आदिकाय।
- 1:02:01वो खाये बहुराय हैं वो पाये बहुराय कणब को खाने से गेहूं को
- 1:02:08खाने से सुस्ती आती है और सोने को पहनने से अहंकार बढ़ता है।
- 1:02:24ये सब तुम्हारी मान्यताएँ हैं। अगर सोनी की वैल्यू मान्यता शुरू
- 1:02:31कर दी जाए तो क्या तुम सोना पहनोगे नहीं?
- 1:02:36तुम लोहा पहनोगे? तुम्हारी जेब में पड़ा हुआ कागज़
- 1:02:41तुम्हारी मान्यता है ये डॉलर मान्यता है इनकी कोई कीमत नहीं।
- 1:02:52इनकी कीमत तुम्हारी मान्यताओं ने डाली परमात्मा ने नहीं डाली।
- 1:03:00यह मनुष्य की देन है। मान्यताएँ हैं तुम्हारी मनुष्यता
- 1:03:04की और मनुष्यता ही यह पागलपन करता है किसी पशु को आप ₹1000 दो किसी
- 1:03:13पशु को भूख लगी है। उसको गुठिया फेंक ₹2,00,00,000 की
- 1:03:19वो नहीं खायेगा जैसे गधा नहीं खाता, उसको आदमी तैयारियों में
- 1:03:26बंद रखता है। तुम सोना फेंक दो, कुत्ते नहीं
- 1:03:32खायेंगे। आदमी के भी खाने के काम नहीं आता
- 1:03:39लेकिन आदमी पहनकर गौरवान्वित हो जाता है।
- 1:03:43उसका अंकार बढ़ जाता है और अहंकार ही तो मिटाना है।
- 1:03:49यही तो भ्रम ही तो मिटाना है हमने तुम भ्रमित हो सदा से।
- 1:03:55इस भ्रम को जीस दिन मिटा दोगे? उस दिन वह रस मिल जाएगा जिसकी बात
- 1:04:00उपनिश्चित करता है। ये हवाएं कभी चुप चाप चली जाएंगी।
- 1:04:14ये हवाएं कभी चुपचाप चली जाएंगी? ये सोना, ये गदियाँ ये मान
- 1:04:30प्रतिष्ठा। यह तुम्हारे लिए जो मान्यताएँ थी,
- 1:04:34वो चुपचाप 1 दिन खिसक जाएँगी और तुम धर्म से घर जाओ।
- 1:04:39धरती के ऊपर तुम्हें उठाने के लिए चार रोग आएँगे।
- 1:04:44ये हवाएं कभी चुपचाप। चली जाएंगी लौट कर फिर कभी गुलशन
- 1:05:01में नहीं आएंगी। ट्रंप 1 दिन मरेगा पुतिन, 1 दिन
- 1:05:15मरेगा हिटलर, मर गया मसोलनी मर गया, स्टालिन मर गया।
- 1:05:25कभी किसी ने लौटकर आकर देखा, इसी सिद्धांत पे तो चार बाग का
- 1:05:30सिद्धांत बनाओ, चार बाग कहता कर्ज उठा लो और घी पी लो, ऋणम कृतवा
- 1:05:37ग्रितम पीवेत यदा जीवेत, सुखी जीवेत।
- 1:05:41लेकिन यहाँ चूक गए। जारबा कहते हैं जब तक जियो सुख ही
- 1:05:48होकर जियो, ठगी मारो, पैसा लूटो बाहर भाग जाओ, प्राइम मिनिस्टर को
- 1:05:54आधा दे दो, जब तक जियो सुख पुरो के जियो चाहे तुम्हें छल कपट,
- 1:06:02बेईमानी, तूफान। कफर कुछ भी तो न पड़े चारवाक
- 1:06:07मूर्ख संत की दृष्टि में तुम भी महामूर्ख हो।
- 1:06:15ये हवाई कभी चुपचाप। चली जाएंगी लौट कर फिर कभी गुलशन
- 1:06:32में नहीं आएंगी। इन हवाओं को इन हवाओं को हाथों
- 1:06:50में गिरफ्तार न कर मैं तो एक। डाक से टूट के गुंचे भी कहीं
- 1:07:09खिलते हैं। साख से टूट के गुंचे भी?
- 1:07:20कहीं खिलते हैं। तो परमात्मा से अलग हुआ, परमात्मा
- 1:07:28से बेमुख हुआ बेमुख होए रामते नहीं काबूक उठाव।
- 1:07:41कहीं तुझे ठिकाना नहीं मिलेगा? साख से टूट के गुंचे भी कहीं
- 1:07:51खिलते हैं रात और दिन भी। जमाने में कहीं मिलते हैं।
- 1:08:05लगता है ये आसमान जब तुम जाते हो गाड़ी लगता है, बस थोड़ी दूर है
- 1:08:13अभी गाड़ी इस आसमान जो धरती को छू रहा है वहाँ तक पहुँच जाएगी।
- 1:08:20लेकिन कहीं भी आसमान धरती को छूता नहीं, किसी को मृग मारी सीखा।
- 1:08:26कहते है यह आसमान कहीं भी धरती को नहीं छूता।
- 1:08:30तुम्हें लगता है कि सोना, धन, पदवी, प्रतिष्ठा?
- 1:08:36ये सब कमाने से आनंद मिल जाएगा, लेकिन नहीं मैं कहता हूँ आनंद
- 1:08:43नहीं मिलता रात और दिन भी जमाने में कहीं मिलता है।
- 1:08:47साख से टूट के गुंचे भी कहीं खिलते हैं।
- 1:08:52भूल जा जाने दे। तकदीर से तकरा न कर भूल जा जाने
- 1:09:08से छोड़ दे भूल जा तकदीर से। तकरार न।
- 1:09:17कर क्यों परमातों से तकरार करता है वह वृहद विराट विशाल तुने देखा
- 1:09:25नहीं तो इसका मतलब ये नहीं कि वो है नहीं तो।
- 1:09:30सीधी सीधी बात समझ। तेरी खोपड़ी गागर की तरह छोटी और
- 1:09:35वो समुद्र की तरह विराट तेरी खोपड़ी उसको जान लेगी ये भूल जा
- 1:09:42भूल। जा जाने दे तकदीर से तकरा न कर।
- 1:09:52उस परमात्मा से ठकरार मत कर उससे टकरा मत चूर चूर हो जाएगा।
- 1:10:00खंड खंड हो जाएगा। वॅन डे यूर विश स्कैटर्ड तुम
- 1:10:07छिन्न विछिन्न हो जाओगे 1 दिन भूल जाओ।
- 1:10:12जाने दे तकदीर से तकरार न कर उस परमात्मा से विराट से विशाल से
- 1:10:21तकरार न कर उसके आगे झुक जा नतमस्तक हो जा मिट्ठत नीम नान का
- 1:10:29गुण चंगेय तट। यही एक फार्म रहा है।
- 1:10:35झुकने से मिलता है, खुदा अकादमी से मिलता है आलम अब इसको याद कर
- 1:10:46लेना। झुकने से मिलता है खुदा अकड़ने से
- 1:10:55मिलता है आलम, संसार मिलता है अकड़ने से।
- 1:11:01इसलिए देखना तुम्हें बड़ी गददियों पर बैठने वाले लोगों की छाती।
- 1:11:1064 इंच होती है 56। तो कहते हैं जी सिर्फ अकड़ के
- 1:11:19चलते हैं भूल जा तेरी औकात क्या है?
- 1:11:30जो सृष्टि तू अपनी आँखों से देख कोई अंधा नहीं है अंधा राम
- 1:11:38भद्राचार्य कहे तो कहे क्योंकि उसकी आँखें नहीं तुम सभी के
- 1:11:46आँखें। इन खुली हुई आँखों से देखो
- 1:11:52परपोर्शनेट रूप से तुम्हारी औकात है क्या?
- 1:11:57इन ब्राह्मणों से आगे ब्राह्मण ब्राह्मण के आगे ब्राह्मण,
- 1:12:01जिन्हें तुम्हारी जेम्स वेव टेलीस्कोप भी नहीं देख सकते।
- 1:12:06किसी दूरी तक जाकर वह भी जवाब दे देते कि बस और आगे नहीं देखा
- 1:12:11जाता, लेकिन वह है और भी आगे राहतें और भी हैं वसल की राहत के
- 1:12:19सिवा लेकिन तुम्हारी दृष्टि और तुम्हारी दूर बीने।
- 1:12:25उनकी जद खत्म हो जाती है। परमात्मा के भ्रमणों की जद खत्म
- 1:12:30नहीं होती एंड ही इस कट इनीशियली एक्सपैंडिंग एवेरी मोमेंट।
- 1:12:37हर क्षण वो लगातार फैल रहा है। कैसे पाओगे तुम उसका और छोड़?
- 1:12:46इसलिए संत कहते है तू छोड़ दे अल्लाह पा वे सो पला कर मने वाद
- 1:12:55का रिश्ते तू सिर्फ कर्म कर। कर्म कर प्रयास कर पुरुषार्थकर
- 1:13:03अपने जीवन यापन के लिए प्रशाद कर छोड़ दें।
- 1:13:07इन गदियों के पाने के लालच ये मूढ़ता के सिवा और कुछ भी नहीं।
- 1:13:14ये हवाएं हैं इन हवाओं को हाथों में गिरफ्तार न करें।
- 1:13:28भूल जा के तुने कुछ बनना? है।
- 1:13:31भूल जा जाने दे तकदीर से तकरा न कर।
- 1:13:48भूल जा जाने दे भूल जा जाने दे तकदीर से।
- 1:14:03तकरार न कर मैं तो इक ख्वाब हूँ इस ख्वाब से तुम प्यार न कर।
- 1:14:18ये जो दिख रहा है तुझे। ये तुझे आनंद न दे पाएगा ये तेरे
- 1:14:27बहू मनजला इमारतें हैं, तुम्हारे अंगार को बढ़ाएंगी बेशक तू सोने
- 1:14:38की पुशाके डाले फिरता है। ये तुम्हारे अहंकार को मजबूत
- 1:14:42करेंगे। विराशक लोगों ने मान्यता कर ली कि
- 1:14:47तुम प्रधानमंत्री है, तुम्हारे अहंकार में बढ़ोतरी होगी।
- 1:14:51विराशक लेकिन याद रख ये कुत्ते की हड्डी का स्वाद है तुमने अड्डा
- 1:14:58रोड़ी का कुत्ता देखा। वह हड्डियों होती हैं, हड्डियों
- 1:15:03को चबाता है और हड्डियों को चबाने से उसके मसूड़े छिल जाते हैं और
- 1:15:11मसूड़े छिल जाने से भीतर से आता है।
- 1:15:14उसका अपना ही खून और खून होता है। नमकीन।
- 1:15:18वो उससे स्वाद लगता है, वो और ज़ोर से चबाता है और ज्यादा बड़ा
- 1:15:24जख्म हो जाता है। खून ज्यादा निकलता है और 1 दिन
- 1:15:29खून रिसने से उसकी मौत हो जाती है।
- 1:15:36भूल जा जाने दे ये। कुत्ते की हड्डी का स्वाद है असली
- 1:15:47रस गोपी अपने ही खून से। तू साथ ले रहा है अपनी ही शक्ति
- 1:15:59को बर्बाद करके तू स्वाद ले रहा है ये अड्डा रोड़ी के कुत्ते का
- 1:16:04स्वाद है अपने ही खून का और वह फिर एनीमिया के कारण ही मर जाता
- 1:16:11है। तुम भी ऐसे ही मर जाओगे।
- 1:16:15हड्डा रोड़ी के कुत्तों की तरह एनीमिया की शिकायत?
- 1:16:22हो गया भूल। जा जाने दे जाने दे कुल जे फिर
- 1:16:28रहा है। तकदीर से परमात्मा से तकरार न कर।
- 1:16:39चोर चोर हो जाएगा मत ठकरा मत ठकरा तकदीर से तकरार न कर।
- 1:16:50मैं तो एक खाब हूँ ये गल्दियाँ ये खजानें ये बहु मंजिला इमारतें
- 1:16:59यहीं धरी के धरी रह जाएंगी छोड़ ये हाड्डा रोड़ी के कुत्ते का
- 1:17:06अपने ही खून का स्वाद है। तुम इसे पीकर निर्जीव हो जाओगे,
- 1:17:16हमने ही अपने खून से बक्सा, गुलों को रंग हमने ही अपने खून से
- 1:17:23बक्सा, गुलों को रंग। हम ही शरीर के जश्न से बहारा न हो
- 1:17:29सके, हम ही शरीर के जश्न से बहारा न हो सके, तुम भूल जाओ कि तुम इस
- 1:17:40बाहर के जश्न के भीतर। आनंद मान लोगे?
- 1:17:48इसमें आनंद है ही नहीं। भूल जा जाने दे।
- 1:18:00तकदीर देखो बार बार कह रहा हूँ। तुम सोचोगे कि मैं क्यों कह रहा।
- 1:18:11हूँ भूल जा जाने दे भूल जा जाने दे तकदीर से।
- 1:18:25तकरार ना कर मैं तो एक ख्वाब हूँ इस ख्वाब से तुम प्यार ना कर।
- 1:18:40इस गद्दी पर तुमसे पहले भी कोई और?
- 1:18:44उससे पहले भी कोई औरत उससे पहले भी कोई औरत, औरत, औरत, औरत, औरत
- 1:18:51तेरे बाद ही कोई और होगा भूल? जा भूल जा जाने दे।
- 1:19:01तुम्हें ताज्जुब होगा। मैं इतनी बार क्यों बोल रहा हूँ?
- 1:19:11तकदीर से तकरार न कर मैं तो एक ख्वाब से।
- 1:19:26तू प्यार न कर मैं तो एक खाब हूँ धन्यवाद।