Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Apr 25-आज का प्रवचन बाबा जी से नहीं सीधा परमात्मा से सुनिए! सुनने से/ध्यान से रोगों का नाश होता है!
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- 0:29विकास मलिक, आप अक्षर। नास्तिकता बढ़ाने की बात करते
- 0:46हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है।
- 1:03आप जो लिखते हैं प्रश्न आप अंग्रेजी में लिखते हैं, टाइप और
- 1:15लिखते हैं, हिंदी में तो आपको मैं कोई चुटकुला सुनाऊंगा, तो फिर?
- 1:22वो थोड़ा सा अभद्र हो जाती। कृपा करके आप हिंदी भाषा लिखती
- 1:28है। आपको जब हमारे यहाँ हिंदी भाषा
- 1:34बनाये बात तो हिंदू राष्ट्र बनाने की करती।
- 1:40सवाल अभी भी अंग्रेजी कीबोर्ड पे लिख रहे हैं वैसे आगे से मैं
- 1:53प्रश्न मैं सूचना से आपके प्रश्न कागज़ पे लिखते थे, आपको मेरे पते
- 2:03पर भेज दिया तो? लोग अक्सर खुजली उठती है तो पूछ
- 2:08लेती हूँ तो प्रश्न उनकी अंतरात्मा से नहीं आया करते।
- 2:15बस खुजली उठती और ऐसी खुजला दिया तो ये व्हाट्सएप पर ही संभव है।
- 2:25जब हम चिठ्ठी का बना देंगे, ये एक ढंग तो खुजली उठेगी तब तक क्षण
- 2:35वहल एक नहीं पाया और जब तक लिखेगा तब तक खुजली जा चूके हो।
- 2:44खैर, जैसा समझता है, मैं पढ़ देता हूँ और वैसा ही जवाब दे देता हूँ,
- 2:51लेकिन कृपा करके प्रश्न बिल्कुल पहली बात तो प्रश्न देखिए, मेरी
- 2:59परेशानी में देखिए। पहली बात तो प्रश्न और दूसरी बात
- 3:06प्रश्न भाभी अंग्रेजी भाषा में चलो कोई नहीं अंग्रेजी लिख दो आप
- 3:12लेकिन लिखते हो हिंदी मुश्किल होता फिर आप लिखते हो घड़ा?
- 3:20मैं समझता हूँ गधा फिर क्या करें यहाँ आपने लिखा है जी एडी एचए गथा
- 3:34आप लिखते हो गधा? अंग्रेजी भाषा कोई इतनी समृद्ध
- 3:41भाषा नहीं है, ठीक है मीडिया का प्रसार प्रचार हो गया, दो तिहाई
- 3:53संसार पे राज़ किया ना अपनी भाषा छोड़ गए।
- 3:59कोई बड़ी बात नहीं हुई थी। जो जहाँ पर राज़ करेगा वो कुछ
- 4:05संस्कार भी छोड़ के जाएगा। अपने संस्कार भी छोड़ गए ये
- 4:14कॉनवेंट स्कूल्स कॉलेजस। जी अंग्रेजी भाषा आज सभी कहते
- 4:21अंग्रेजी भाषा सीखो बिल्कुल सीखो भाई क्योंकि सारे विषयों में एक
- 4:29दूसरे की भाषा को समझने के लिए मात्र एक विकल्प अंग्रेजी।
- 4:40मतलब कोई क्या करें? लेकिन आप या तो अंग्रेजी भी लिख
- 4:48दिया करें, थोड़ा समय इतना सा तो जानकारी दीजिए या फिर शुद्ध हिंदी
- 4:55लिखा करो। ताकि आपका प्रश्न ठीक ठीक समझ आ
- 5:01जाए। समझ नहीं आएगा तो मैं जवाब कैसे
- 5:06दूँ? खैर, आज जैसे कैसे जैसा मुझे समझ
- 5:12आएगा, मैं प्रश्न समझ लूँगा और बोल।
- 5:17आप अक्सर नासिकता बढ़ने या बढ़ाने कुछ भी लिखा की बात करते हैं
- 5:28नहीं, मैं ये बात। समझने में फर्क हो जाता है बच्चों
- 5:41आप मेरे शब्दों को पकड़ लेते हैं, शब्दों को पकड़ना नहीं होता
- 5:50शब्दों को उसके अर्थ। हृदय में उतारनी होती है।
- 5:56जवाब करने की बातें इसलिए आपको समझा नहीं, शब्दों से कुछ थोड़ा
- 6:03सा समझा जा सकता है, पूरा नहीं समझा जा सकता।
- 6:15मैंने कभी नहीं कहा कि आस्तिक बन सीधा सी समझो, मैं सजा कहता हूँ
- 6:27झूठे आस्तिक बनने से बजाए। सच्चे नास्तिक बंद अच्छी तरह से
- 6:38संदर्भ में क्या कहते मंदिर चले गए गुरुद्वारा मस्जिद चर्च।
- 6:52अगर झूठे आस्थी को हो न परमात्मा देखा, न परमात्मा जानू, न
- 7:02परमात्मा के बारे में कुछ और गए। वहाँ जो भी कुछ मिला, कोई मूर्ति
- 7:11मिली। दंडवत हो गया, अच्छा में
- 7:15मूर्तियाँ नहीं मूर्तियाँ खाली सन में दंडवत हो जाती हैं।
- 7:22गिरजा घर में ईसा होते हैं, वह दंडवत हो जाती हो लेकिन आपने
- 7:30परमातों को। बिल्कुल सबसे बड़ा झूठ है
- 7:35परमात्मिक जीस रूप में आप उसे मानते हैं पर यहाँ तो रूप आपने
- 7:47विकृत किया। 33,00,00,000 तो यहाँ भगवान हैं
- 7:53देव देवताओं का और भगवान एक है शास्त्र कहते हैं एको का शास्त्र,
- 8:04कहते हैं एको का। अहम वह एक है लेकिन आप
- 8:16₹33,00,00,000 मन की इर्जाते हैं, इसको छोड़िए यह प्रसंग बहुत ओके।
- 8:27मैं नास्तिकता को फैलने या फैलाने के लिए नहीं होता, मैं शक्ति को
- 8:37फैलने या फैलाने इस बात में फर्क बहुत बड़ा फर्क है।
- 8:45मैं कहता हूँ झूठे। आस्तिक होने की वजह है सच्चे
- 8:51नास्तिक हो जाओ और नास्तिक भी झूठे न रहो, ये भी दो होते हैं।
- 9:02मार्क्स नास्तिक तो हैं लेकिन झूठे हैं।
- 9:07चारवां के नास्तिक तो हैं लेकिन झूठे हैं।
- 9:10नीच से झूठे नास्तिक हैं। अब बड़े मज़े की बात तुम्हें इतनी
- 9:16सी बात समझी नहीं आती ना तुम सच्चे आस्तिक हो?
- 9:25अपना चारवाक मार्कर्स, झूठे, सच्चे, नास्तिक, वो सच्चा नास्तिक
- 9:35तुम सच्चे आस्तिक नहीं, दोनों झूठे हैं।
- 9:44और देखिए सच्चा आजतक तो कभी बना भी जा सकता है क्यों?
- 9:50क्योंकि वह है अब यहाँ बड़ा करंट लगता है जब संत कहता है कि वह है,
- 10:02मैंने देखा। तो यहाँ धराशायी हो जाते हैं
- 10:08मार्कर्स और उनके सब शिष्यगण आंधी, दुनिया नास्तिक है प्रकट
- 10:16रूप में और बाकी की आंधी दुनिया भी नास्तिक है, अप्रकट रूप।
- 10:24फिर आस्तिक हूँ, आस्तिक कोई एक बरला आस्तिक कोई एक बिरला, जो
- 10:37ज्यादा कदा उस मुकाम पर पहुँच जाता है।
- 10:40इस मुकाम पे बुल्लेच्छा हो चुकी है इस मुकाम पे अदरक पहुँच जाते
- 10:49हैं मोहम्मद जीस मुकाम पे गुरु नानक पहुँच जाते हैं कबीर दादू।
- 11:00पल्ट कृष्णन जीस मुकाम पर गुरु अर्जुन देव पहुंचा।
- 11:12नानक ऊर्जा हुए एक वर्लो। संत होता है, बहुत ही शिक्षा
- 11:27कास्तिक होता है, उसकी नास्तिकता मर जाती है, नास्तिकता शुरू होती
- 11:41है। मरनी।
- 11:43जब पहली बार कोई भी व्यक्ति सतौरी की झलक देखता है, सतौरी की झलक
- 11:51देखते ही उसे पता चलता है कि मैं कुछ नहीं करता करने वाला कोई और।
- 12:00कौन है यह नहीं पता, लेकिन उसका मैं हिच करना शुरू हो जाता है।
- 12:08पिघलना शुरू हो जाता है। सत्तोरी की यह घटना अमोल चूल पर
- 12:14वस्तित कर देती है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ किसी भी
- 12:18तरह। एक बार सतोरे की चलतबाजी और उसके
- 12:25लिए सबसे बड़ी आज्ञा है। जो तर्क की बात करें उसे न
- 12:31सुनाएं, क्योंकि वह तुम्हारी खोपड़ी को सूचनाएं देती।
- 12:41जीतने तुम्हारे निलौंज भरे होंगे, उतना ही तुम भौजल हो जाओगे।
- 12:48पहले से ही बहुत तुम्हारा अवचेतन अचेतन और चेतन बराबर है।
- 13:00हाउसफुल है कई जन्मों से हाउसफुल है और तुम इसी हाउसफुल को लेकर
- 13:08घूम रहे हो? तुम इस मेमोरी को कभी एम्प्टी
- 13:14करने की चेष्टा ही नहीं दिए, न ही तुम्हें ऐसा कोई मार्गदर्शक मिले।
- 13:23आज बहुत से ऐसे लोग हैं जो ऐसा हाउसफुल के कारण हो रहे हैं कि
- 13:29तुम सिर मार रहे हो। बहुत से रोग ऐसे होते हैं, बहुत
- 13:39से नहीं करीब करीब 99% रोग इसी कारण से हाउसफुल मेमोरीफुल।
- 13:54चौंक मचा। मैं कल ही बात कर रहा था जो
- 14:06एडिटिंग करते हैं। अपनी वीडियो के हरप्रीत हैं और
- 14:19रोहित हरप्रीत से बात हो रही थी। मैंने कहा मुझे याद करवा दे अक्सर
- 14:29भूल। ध्यान से रोगों का नाश होता है।
- 14:53अब इस पर संघ को ध्यान से सुनें, नया है आपके लिए।
- 15:00और आप नए प्रश्नों को बड़े ध्यान से सुनिए क्योंकि आपकी पहले
- 15:06स्मृति में आए सूचना में आए लेकिन ये सूचनाओं की देन हुई।
- 15:14ये मेरा स्वयं का अनुभव है। ध्यानी व्यक्ति को रोग सताता तुम
- 15:33कहोगे कुमार रामकृष्णा परमहंस जीतू कृष्ण।
- 15:40महर्षि रमन इनके तो सभी के टेंशन हाँ हुआ बिल्कुल क्या ये धयानक
- 15:52नहीं है सर बिल्कुल तो क्यों रोब हुआ?
- 16:03ध्यान के बावजूद ध्यान जितना काट सकता है उतना काठ इसलिए इतना हो
- 16:15हल्ला नहीं बचाया तुम बड़ा हो हल्ला भी छत पे।
- 16:22ध्यान में जब तुम जाते हो पहली बात तो ध्यान करने वाला इस आनंद
- 16:30रात को ठीक से सुनने वाला ये बात आपको सिर्फ बाबा ने बताई।
- 16:40सुनिए दुख प कंश अगर आप मेरी आवाज को जहाँ से ये आती।
- 16:54वहाँ तक पहुंचने में समर्थ हो जाते हो यानी ठीक से सुन लेते हो,
- 17:04जिसे महावीर सम्यक श्रवण कहते हो। सम्यक श्रवण का अर्थ है कि संत
- 17:11यहाँ से बोलता है उसकी आवाज को। अपने भीतर के उसी स्तर तक पहुंचे
- 17:22थोड़ा और खुल जाए। संत अपने अंतर से वहाँ से आती हैं
- 17:30तरंगें। अनंत के समुद्र से आती है बुरा
- 17:37सरदार वह शब्दों के साथ मिलकर लिवड़ तिवड़ के आपको सुनाई पड़ती
- 17:47है, आपके कान श्रवण करती है। अगर आप सिर्फ ये भी सुनते रहें,
- 17:59सिर्फ कुछ भी करें, सिर्फ ये भी सुनते रहें।
- 18:10तो आपका परोप आधा तो पक्का समाप्त हो जाएगा और अगर आपने बहुत गहराई
- 18:22से सुन लिया तो आपका वो पूरा फिल्मों हो सकता है।
- 18:34एक शब्द है बाबा नानक दुख पर हर सुख कार्यालय जा के अभाव के दुख,
- 18:49रोग और पीड़ा के दुख। अगर आप उसके स्मरण में खो गए दुःख
- 19:08पर हर सुख का रल चार। तो यह ऐसी कला है, ऐसा जादू है,
- 19:16ऐसा चमत्कार है। ये आपके सारे दुखों का हरण करते
- 19:25और आप घर जो लेके जाओगे और दुःख विहीन स्थिति लेके जाओगे सुख से।
- 19:37इसलिए संतो ने समूह के शर्मों पर इतनी जॉब दी वो चाहे सत्संग का
- 19:44नाम दिया हो। सत्संग का मतलब संत व्यक्ति के
- 19:50भीतर से आए हुए वचन। या उसके संग बैठ जाओ।
- 19:57सिर्फ उनके भीतर से निकलती हुई तरंगों को पीओ, वो परमात्मा की
- 20:05दरगाह से आई हुई तरंगें किसी विरले को नसीब होती।
- 20:14आज सारा संसार बाबा हम सत्संग करती है, लेकिन चैन नहीं पर थोड़ी
- 20:28देर के लिए मन संगीत में खो जाते हैं।
- 20:32चैन नहीं आती। मैंने कहा पूछा आप सत्संग में गए,
- 20:39क्योंकि सत्संग में अगर गए होते तो उसका नशा देर साँझ तक चढ़ता
- 20:48देर रात तक। इतना सब तो होता ही है, मैंने
- 20:55शायद एक शिष्य की बात कही थी जो जैपनीज़ से हिंदी नहीं जानते
- 21:00लेकिन उसको आवाज पड़ी वो कहने लगा चाहे मुझे समझाये ना।
- 21:12बराबर के जो सुनने वाले हिंदी जानते हैं वो कहते हैं, हम आपको
- 21:15तर्जमा करके बता देते हैं कीतान कोई हो सकता है क्योंकि मुझे इसी
- 21:22से इतना लुत्फ आ रहा है। क्या बोल रहे हैं ये कोई मैटर
- 21:26नहीं करता, ये ज्यादा अच्छा है। मैं ये समझता हूँ अगर आप।
- 21:30मेरे शब्दों को खंगाले में मैंने बोला क्या तो काम तो जिसने करना
- 21:37है उसका तत्व अपने लिए बिना जाने के ये संतरे का रस है।
- 21:44संतरा संतरे का रस गटक गए क्या वो भीतर जाकर?
- 21:50डाइजेस्ट मेटाबोलिज़ है ना वहाँ पे आपको आपको सारे वैट मिनल है ना
- 21:58देगा। मेरी बात तो सिर्फ और जाने के
- 22:06लिए। मेरे शब्द सिर्फ आपको उलझाने के
- 22:11लिए, लेकिन बात तो वो शराब पिलाने के लिए मैं बहुत जो उन शब्दों के
- 22:22साथ चिपकी चिपकी सी आ जाते हैं। और आपके गहने गहने को प्रभावित
- 22:31करके आप उसी भी जाते हो गठक भी उसका प्रभाव काफी देर तक रहता है
- 22:40शब्दों को सुनाने का मैं आशिक नहीं मैं चाहता हूँ।
- 22:49कि किसी तरह आप शब्दों के बहाने से इस धुर से आई हुई आवाज को आवाज
- 22:58के रहस्य को दी गई बस काम त्रिशूल करना ये है और।
- 23:13लोग कहते हैं ये सर्द दर्द की दवा है।
- 23:20ये पेट दर्द की दवा है, इससे फला रोग ठीक होता है।
- 23:28इससे कैंसर के दूर होता है। की यह है भीतर से आई हुई खुदा के
- 23:38कलक से जो आवाज दिखती है बांगी इलाज।
- 23:54अगर आप इसको बजाएं, अपनी बुद्धि के सुनने के बुद्धि एक्सटेंशन
- 24:02बुद्धि को हटा लेते तो भाग्यशाली आप अपना भाग्य निर्माण खुद कर लिए
- 24:12अगर आप अपनी बुद्धि को हटा दे। सर आप मेरे शब्दों को कोई ऐसा तो
- 24:20मैं बोलता भी नहीं जिससे आपको कुछ एतराज हो, बस मैं बोलता हूँ,
- 24:29बहाना है। सिर्फ बोलने के बहाने यह जो शराब
- 24:37चिपट गई, साथ में अलफाज़ के साथ में अलफाज़ को तो चाहे तो ना समझो
- 24:45और चलेगा और नहीं समझो तो ज्यादा चलेगा।
- 24:51इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ रात सोते वक्त ये रख लेते हो काम जब
- 24:59कानो भी लगते हैं सुनाई पढ़ने के लिए वीडियो चलाके सो जाओ नींद भी
- 25:05अच्छी आएगी और ये आपके चेतन मन में जाकर।
- 25:10बहुत कुछ कूड़ा बड़ा तोड़ दे। यह ऐसी औषधि है जो किसी एक रोग की
- 25:22नहीं उन सभी लोगों का इलाज कर सके।
- 25:29वो छोटा हो, वो बड़ा हो, भारी भरकम रोको सभी पापों का नष्ट करती
- 25:36है और पापों से ही रोकती है। सुनिए दुख पाप का।
- 25:47दुख पर हर सुख का रलेय जाय तुम्हारे दुख का कारण तुम यहीं
- 25:54छोड़ जाते हो। क्या है दुख का कारण?
- 25:59तुम्हारी मान्यताएँ तो तुम्हारी जप का हक है और तुम अपने घर जाते
- 26:04हो सुख को साथ। तो उसे जैपनीज़ ने कहा नहीं कोई
- 26:10समझता रहा, पुरातन जन्मों का खिलाड़ी रहा उसको आवाज ही आवाज की
- 26:27खंड के। उसने कहा, बस यह पीने का कुछ छोड़
- 26:39दो, मैं भाषा को नहीं जानना चाहता, आप तो भाषाओं के नाम पर कट
- 26:48मर जाते हो। आप भी ऐसा कर लो बहुत से व्यक्ति
- 27:01कहते हैं समझ नहीं आता मैं कहा तुम आप सुन लो, छोड़ दो या नहीं
- 27:06बस चल रही है जो कानों में पढ़ता हूँ उसको पढ़ने दो।
- 27:17समझ आए ना आए कोई परवाह ना करो ये है सब मैं कैसे हूँ क्यूँ बड़े
- 27:24समझदार है हम वहाँ पे चाँदते है कि काम किस ने करना शब्द नहीं काम
- 27:31करे। तुम्हारी सैकड़ों जगत कर लिया था।
- 27:35शब्द काम करते पागल हो मेरे वो टक्करें मार रहे हो वहाँ तो शब्द
- 27:42समझा लिकन ये रोग कुछ गहरा है। ये रोग कुछ गहरा तुम्हारे अंत से
- 27:52आता है और ये तो अंतस के बुनियाद के ऊपर प्रहार करना होता है और
- 28:00संत भरी भाँति जानता है कि मैंने प्रहार करना।
- 28:11इसे भी आजमाना नहीं इसे करना वीडियो को चलने देना, चलने देना,
- 28:21कुछ समझाए तो उठी न समझाये तो उठी।
- 28:27मुख्य बात तो इस रस को भी यह तुम्हारे सभी रोगों को दूर करते
- 28:33हैं। शारीरिक रोगों, मानसिक आध्यात्मिक
- 28:43रोगों। दैहिक, दैविक, भौतिक तपा रामराज
- 28:58नहीं काहे व्यापम, वह जो आपके भीतर रामराज है, वहाँ से आती हुई
- 29:05खनक। आपके तीनों प्रकार के तपों को हर
- 29:09लेती है त्रिवेदता हम अर्थों के शब्द गलत लगा देते हैं, अर्थ
- 29:19अर्थों को नहीं। हम जानते शब्दों से चिपकाहट बना
- 29:23लेते हैं। मैं तुम्हें यह कहता हूँ कि
- 29:27शब्दों से चिपका हट न बनाओ। शब्दों के रस को भीतर उतरने तो बस
- 29:32काफी है, हमारा परियोजन भी यही है।
- 29:36हम नहीं चाहते की आप शब्दों को सुनें।
- 29:42और अगर शब्दों को ही ना सुनेंगे तो यहाँ भी चुप जाओ क्योंकि फिर
- 29:48शब्दों के साथ चुप के आई हुई वो मैं उससे भी वंचित न चाऊगी स्किप
- 29:56भी मत करो नहीं समझ आता। कोई बात नहीं, नहीं, आपके विचारों
- 30:06से मेल खाता कोई बात नहीं, लेकिन एक बात पक्की है।
- 30:14मैं 100% करण की करता हूँ कि आपके रूप में शोज तीनों प्रकार की।
- 30:22डैविका डैविका भौतिक रिश्ते हैं, कैसे हो जाएंगे ज्यादा विस्तार तो
- 30:35मैं भी नहीं दे सकूँ। ईश्वर की सृष्टि इतनी वृहद है?
- 30:44इसका हर कोना नहीं खंगाला जा सकता।
- 30:51यहीं यहीं तो आदमी आकर नष्ट हो गया जब तर्क पहली दफ़े उठा।
- 31:01कि इतनी प्यारी षष्ठी इसको किसे तो जुबाब मिला किस को फरमात में
- 31:07अच्छा ठीक मान लिया गया। सहज बुद्धियां होती थीं, सरल
- 31:12बुद्धि होती थी। आज कंप्लीटली जड़ बुद्धि हो गई।
- 31:17और कॉम्प्लिकेटेड बुद्धि हर बात का जवाब चाहती है, तो फिर आगे
- 31:22प्रश्न कि फिर परमात्मा को कृष्ण अब लकीर के फकीर तो यहाँ कब है?
- 31:39मतलब ठीक है? सृष्टि को ईश्वर बन गया और ईश्वर
- 31:49से भम है ईश्वर को वेताओं के तो फिर प्रश्न उठा, बुद्ध ने कहा
- 31:57ईश्वर तो स्वयं बन गया। क्या हम ईश्वर को निकाल ले?
- 32:02देर इस नो नीड ऑफ गॉड, लार्ज और सफीशिएंट कानून ही पर्याप्त है,
- 32:10भगवान नहीं होगा, बड़े मज़े की बात बता रहे हैं।
- 32:18भगवान नहीं होगा तो क्या ये कानून काम नहीं करेंगे?
- 32:23नियम काम नहीं करेंगे, धरती के धरती खींचेगी नहीं, हाँ नहीं, वो
- 32:27तो बहुत कर के हैं। बिलकुल यही बात है अगर परमात्मा
- 32:34नहीं होगा। ए फोर्स ऑफ़ ग्रैविटेशन तत्काल
- 32:38निल हो जाएगा। आज बात आपकी सुन से बाहर होगी,
- 32:45लेकिन ये शक्ति 1 दिन होने वाली है।
- 32:491 दिन यही विज्ञान कहेगा। बिलकुल ठीक वह कोई ऐसी पावर जो
- 32:54अज्ञात है? उसके कारण ही फोर्स ऑफ ग्रेविटेशन
- 32:59इस प्रेसेंट अगर वो खिसक गई तो फोर्स ऑफ ग्रेविटेशन भी खिसक
- 33:05जाएगा। सभी ग्रह नक्षत्र अतारे एक दूसरे
- 33:10में टकरा जाएंगे। और प्रलयाचं आज इस बात का जवाब।
- 33:17बहुत दिनों से बेन्डिंग था मेरे पास, आज आपको जवाब दे दिया।
- 33:29विज्ञान कहता है और विज्ञान के हिसाब से चलने वाला बुद्ध कहता है
- 33:36औषभ। लार्ज और सब कुछ सेठ पौषों की बात
- 33:43कुछ अलग है। वो बुद्ध के कगार पर खेल है स्वयं
- 33:52को जान दिया है, लेकिन उस रहस्यमय प्रवेश के इसलिए।
- 33:58ओशो कभी रहस्य की बात नहीं करेंगे तो पुस्तकों से लेकर करेंगे।
- 34:04खुद के रहस्य की जानी हुई बात नहीं करते क्योंकि रहस्य में वो
- 34:09खुद नहीं होते और इतने बेईमान नहीं हैं जो कहें कि हाँ मैं।
- 34:17ऐसे ईमानदार संतों की जरूरत है। व्यक्ति को नहीं पहुंचे तो कह
- 34:26दिया हम पहुंचे हमें नहीं पता रे ऐसे हम जहाँ तक जानते हैं वहाँ तक
- 34:33बदला दिया। बुध ने भी यही कहा, मैं जो जाना।
- 34:38तो यही जाना और मैंने ये जाना कि लाज आर सबफिशियली और अगर सुखी है
- 34:44व्यक्ति तो बस यही तो कामना है समाज की हम कहते हैं हे ईश सब
- 34:51चुकी कोई न हो दुखा, सब हों निरोग भगवान।
- 34:56धन धान्य के भंडारी सब भद्र भाव देखें।
- 35:03सन्न मार्ग के पथिकों दुखिया न कोई होय।
- 35:08षष्टी में देह हत है यही तो कामना करती है।
- 35:20उस दिन परमात्मा सुमित ना नहीं समित उपनिषद में लिखा है वो कण कण
- 35:30में मौजूद है। देखा नहीं तो यह जो फोर्स ऑफ़
- 35:35ग्रैविटेशन है। वह उस अज्ञात शक्ति की वजह में है
- 35:42वजह से है। जो कण फ़िल्म में है उसे एक ही तो
- 35:48शक्ति फोर्स ऑफ़ ग्रैविटेशन बनकर चीजों को भेजते हैं।
- 35:56लेकिन पढ़ने वाले पड़ गए बांचने वाले बांच गए।
- 36:01व्याख्या करने वाले आज व्याख्या कर रहे हैं।
- 36:05आचार्य यह समझे नहीं क्यों? बस एक एक।
- 36:18जिसने वो अज्ञात देखा नहीं वो इनके लिए होता है और उस अज्ञात के
- 36:27कारण ही सारी संरचना चल रही है क्योंकि वो अज्ञात ही सिर्फ
- 36:34शक्तिमान है, उसी की शक्ति। सारे ब्राह्मण में शायद वो अपनी
- 36:40ही शक्ति से चला रहा है। अपने संसार में वह है मौजूद है हर
- 36:48रे में तो फिर फिर फोर्स हो के ब्रिटिश में काम से जो मौजूद है,
- 36:54उसी से तो आएगा। जो झर्रे झर्रे में मौजूद है,
- 37:00ओमनी प्रेसिडेंट है, वही तो ओमनी पोटेंट हो सकेगा।
- 37:10बस यही मार खा ले। तुम्हारे दर्शकों ने कहा कि संसार
- 37:21को बनाने वाला परमात्मा अलग है। उसने अलग से संसार बना दिया और वो
- 37:31सैर। खुद से पैदा हुआ ये तो बिल्कुल
- 37:36ठीक है लेकिन ये दो नहीं हैं भाई, इस बात को अच्छे से समझो बड़ा
- 37:43भ्रम है दुनिया में अब देखो उपनिषद की व्याख्या को गहरे से
- 37:52खंगालो। ईशा अवश्य में एकदम सर्वम यज्ञ की
- 37:56इंच जगत ए आम जगत जगत के हरकण में वह विद्यमान ठीक अगर वह विद्यमान
- 38:04है तो फोर्थ ऑफ करेविडेशन संसार से कैसे आये?
- 38:14अगर वह जरे जरे में विद्यमान है। ईशा वास्य मिदं सर्वम यत किंच जगत
- 38:22याम जगत अगर जगत के कण कण में ईश्वर है तो फोर्स ऑफ ग्रैविटेशन
- 38:28आएगा कहाँ से उसी से आएगा ना जो जरे जरे में है?
- 38:36कहीं और से टपक पड़ेगा। लोग कहते हैं ईश्वर अलग, जगत अलग।
- 38:54वो ही समझाने के लिए मैं अवतरित हूँ अपनी वह जो उपनिषदों में कहा
- 39:07गया, वह जर्रे जर्रे में है, जर्रे जर्रे में जो है।
- 39:18उसी का तो फोर्स ग्रैविटेशन बनकर काम करेगा क्योंकि और दूसरा कौन
- 39:24है? बताओ तो दो चीजे कैसे होए जगत और
- 39:36ब्रह्म। दो अलग क्यों हो?
- 39:39कैसे जब जगत में ब्रह्मा जरे जरे में व्याप्त तो ये दो कैसे हो गए?
- 39:49दो नाम हो गए शक्ति एक ही। मौजूदगी एक जगत और छत में दो उसके
- 40:08गुण हैं। आप फिक्स से सुन लेना।
- 40:16बड़े गहरे शब्द हैं कल्याणन आपकी सब भ्रांति मठिया जगत है छेतन।
- 40:32और जैसे चेतना का प्रकाश किसी पत्थर पर पड़ता है, रिफलेक्ट होता
- 40:39है और पत्थर में सब कुछ दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है।
- 40:46ऐसा ही चेतना जब जड़ के ऊपर बरसती है।
- 40:53तो आपको लगता है कि यह जड़ प्रकाशमान है, लेकिन जड़ प्रकाशमन
- 41:05होता है? चेतना के प्रकाश से, चेतना के
- 41:10प्रकाश से? जड़, आलोकित जैसे टॉर्च के प्रकाश
- 41:17से चीजें प्रकाशित होती हैं। वो चीजों का अपना प्रकाश है।
- 41:29बुद्धि ने इसको दो में बांट दी। और फिर न जाने कितने कितने पांत
- 41:38समुदाय बन गए। मुझे लोग कह देते हैं कि परमात्मा
- 41:43कहीं दूर बैठा सृष्ट इको ने चार में।
- 41:50नहीं तो गलती खा जाते हो। जिसने नहीं देखा वो ऐसी ही बेतुकी
- 41:57वे होती बातें करे। कहीं दूर से बैठक क्यों नहीं
- 42:02जाएगा? शास्त्रों को ही चलो प्रमाण मानो।
- 42:10तो उपनिषद व ये निरोल पड़े हैं। इनको तो नहीं छिड़ा, बस एक ही
- 42:18धरोहर थी जो हमारी बच गई हो। उपनिषद और उपनिषदों का ये शब्द ले
- 42:27लो ईशा वासु ईशा वास्य मैडम परमात्मा इसको बड़ा गजब का सूत्र
- 42:37है। परमात्मा का वास सर्वम यक्त किंच
- 42:46हर कहीं जगह। मजबूर है।
- 42:51फिर ये बताओ कि जड़ आया कहाँ से जड़ इसका स्वरूप हो गया।
- 43:01सिर्फ तुम दिन में जागते हो तो रात को जड़ नहीं हो जाती।
- 43:10तुम सारे दिन में बोलते हो बोल रहा हूँ, तुम भी बोलते हो,
- 43:15स्वास्थ्य लेते हो, सारे शरीर की क्रियाएं चलती हैं, दिखती हैं,
- 43:24चलते हो फिरते हो, बोलते हो? काम धाम करते हो, अच्छे कर्म करते
- 43:32हो, होरे भी करते हो यह दिखता है सबको हाँ, लेकिन बताओ तो रात को
- 43:44तुम अचेत नहीं हो जाती? जड़ नहीं हो सकती।
- 43:50तुमने कैसे को रात को सोते हुए देखा?
- 43:56ज़रा उसकी तस्वीर खींचो और ज़रा मुर्दे की खुशी, तुम उसमें कोई
- 44:01फरक नहीं होगा, बिलकुल मुर्दा। और वह सुब्ध हुआ व्यक्ति क्या
- 44:11हुआ? क्या ये वही जिंदा व्यक्ति है, जो
- 44:14दिन में हाँ के फांक रहा था? मैं हूँ तो मुमकिन से इम्पॉसिबल
- 44:21वर्ड इस ए नट क्या ये वही है? आप हैरान हो सकते है।
- 44:35जब संत अपने उस स्तर पर उतरता है तो क्या होता है?
- 44:44सबसे पहले जो ये चर्म चकसू देखते हैं।
- 44:51और देखते हैं पत्थर भगवान में देवतास्य एक एक शब्द को इस पर्वचन
- 44:58के एक एक शब्द को हृदय में उतार लेना संग्रहित कर रही है गुम न
- 45:04भोजन। आज बोला फिर शायद कभी बोलूं लेकिन
- 45:13जब बोलूं तो आज इसको संभाल के रखा गया।
- 45:32आपने कहा पब ब्रह्मा, सत्यम जगत मिर्च यह थोड़ा सा विस्तार कर दो
- 45:47अब आप आयेगी वो तो विस्तार कर। ब्रह्म सत्यम जगत तुम इच्छा जब
- 46:04संत संत ही जा सकता है संसारित तो काम धाम में उछा रहता है, व्यस्त
- 46:10रहता है और जब तक तुम व्यस्त हो। तब तक वह तुम्हारे जीवन में उतरता
- 46:16नहीं, तुम्हारे सब खिड़कियाँ द्वार, दरवाजे बंद कोई ज़रा सुराग
- 46:20भी नहीं छोड़ते तू जहाँ से प्रवेश में कर।
- 46:34जब संत अपने अस्तित्व में उतरना शुरू होता है तो उसका फैलाव शुरू
- 46:45हो जाता है। पहले वो चर्म के क्षुओं से देख
- 46:49रहा था। फिर उसके चरण शिक्षण नहीं देखते
- 46:55जा तो उसकी आँखें मंद होती है। जब खुली आँखों से भी वो देखते
- 47:03हैं, खुली आँखों से भी दिखता वही है जो सत्य।
- 47:11किसी इन्स्ट्रुमेंट का खुले रहे जाना उपकरण का खुले रहे जाना कोई
- 47:17मायने नहीं रखता जब कोई संत फैलता है।
- 47:27अपने अस्तित्व में जो वो साक्ष्य मिल है तो उसे जो चर्म सक्षुओं से
- 47:38नजर आता था, क्या नजर आता था? जैसे बाबा को देखा प्रभूणा वृक्ष।
- 47:49वो छोटी सड़क, फिर बड़ी सड़क फिर वहाँ से मुरा गाये, फिर गाये और
- 48:00फिर बाए ऐसी छोटी सी। और सामनेपूर्ण वृक्ष पर नीचे पड़ी
- 48:12हुई कुछ एटेक जो खंडहर की एटेक उस पर पाम रख लिया और वो घटना घट गई
- 48:22शरदपुर के। 8:42 का वक्त फैलना शुरू हुआ।
- 48:42चर्म चक्षुओं से दिखता था ये ठोस ये गोदाम है ये बोने वृक्ष हैं ये
- 48:50सारे पे होती है ये फसल बीजी हुई है सामने समाधि।
- 49:01बाई मंदिर है कुपशाला और पीछे कांदखड़ी है बड़ी आस पास द्रखती
- 49:17ही द्रक्षस ये सब है। जी चर्म चक्रों से दिखता है और
- 49:30फैलना से होता है। धीरे धीरे धीरे धीरे पर्दा उठना
- 49:39शुरू हुआ। सत्य।
- 49:43झूठ होता गया वेद मचता गया, पर्दा खुला, खुला खुला।
- 50:00और क्या है? देखते ही देखते सारी मटेरियलिस्ट
- 50:12समाप्त होगी भौतिकता सब समाप्त। शुद्ध ऊर्जा, शुद्ध ऊर्जा के वो
- 50:24कण श्वेत का और कण ऐसे गुथे हुए अपस्वे पर कोई जगह नहीं।
- 50:34ऐसे गणत्व से गुथे हुए। ऐसे गनत्व से जुड़े हुए वो श्वेत
- 50:45कण पार्टिकल्स ऐसे गुथे हुए कि कोई हिस्सा नहीं उनके बीच में।
- 50:57पहले दिखता था वो होश, ये सब समाधि थी बोना पेड़ था, दूसरे
- 51:11पेड़ थे पीछे दीवार थी, इधर बदाम था, उधर कोशरना।
- 51:19ये सब ठोस थे। सोजित जी जी चर्म चक्षुओं से
- 51:25दीखते थे हम यहाँ एक बात लिख लो चर्म चक्ष्यों से परमात्मा नहीं।
- 51:36और दिव्य जक्षुओं से संसार ये मेन थीम है तुम चरसते हो तुम्हारे चरम
- 51:50जक्षुओं से परमात्मन तक बस नास्तिक पैदा होंगे और कुछ नहीं।
- 52:01चरम चक्षुओं से परमात्मा नहीं दिखता और दिव जक्ष्यों से संसार
- 52:07नहीं दिखता। इसका मतलब दिव जक्ष्यों से संसार
- 52:11होता नहीं, हाँ संसार तो होते ही है।
- 52:19संसार संसार की तरह दिखता नहीं, लेकिन ये बात इतनी गहरी है कि
- 52:29शंकर वी से शब्दों में नहीं समझा पाए।
- 52:34क्यों? वो शब्दों में समझाया जाता नहीं।
- 52:39कहीं तो चूक होगी, दोनों बातें मिलकर भी उसे तुम समझ न पाओगे,
- 52:50समझ कब पाओगे, समझ पाओगे उसको निहार उसमें उतरकर वो होकर।
- 53:02जब तुम यूनिवर्स खुद ही हो जाओगे, यूनिवर्स को देखने वाले न रहोगे।
- 53:10कोई दूरबीन लगा के कोई टेलीस्कोप लगा के कोई हर्बल लगा के।
- 53:17कोई जेम्स में तुम इस ब्रमंड को देखोगे नहीं वर्ण ब्रमंड ही हो
- 53:25जाओगे यूनिवर्स ही हो जाओगे उसको कहते हैं संबोधि।
- 53:36समाधि अपने आपको जानना है तुम कौन हो, शरीर नहीं हो, इंद्रिया नहीं
- 53:43हो, मन नहीं हो, विचार नहीं हो, भावना ही नहीं हो, लेकिन तुम जो
- 53:48हो वो एक चैतन्य जीव हो। जो किसी काल में मुझसे विलागत नजर
- 53:59आता है। है नहीं, ये भ्रम है।
- 54:06कहने में चूक सुनने में चूक समझने में चूक होगी ही क्योंकि
- 54:13इंद्रियों से। वो समझा जाता है, देखा जाता है,
- 54:23इंद्रियाँ, असमर्थ चरम चिश्छुओं से परमात्मा नजर नहीं आता देखो।
- 54:37आपके सारे विवाद मर जाएंगे। इस सूत्र पदक चरम चछुओं से मैं
- 54:49नहीं दिखता। और देवचक्षुओं से संसार में चरम
- 55:00चक्षुओं से मैं नहीं दिखता। संसार ही दिखता है और देव चक्षुओं
- 55:11से जैसे कृष्ण ने। कृष्ण ने दिया फरवरी को उन
- 55:17चक्षुओं से दिव्य चक्षुओं से संसार नहीं दिखता और तुम चाहते हो
- 55:26चर्म चक्षुओं से परमात्मा को। और दीप सक्षुओं से संसार को देख
- 55:34लेना। ये दोनों ही चीजें संभव हैं न तो
- 55:40चरम चक्षुओं से परमात्मक दिखता है, दिखाई ही नहीं पड़ता असमर्थता
- 55:48है। और दिव्य जिक्षुओं से संसार रहता
- 55:52नहीं, वो संसार दिखाई नहीं होता। ये दोनों चीजें असंभव हैं।
- 56:01कैसे व्याख्या करूँ इसकी? वो एक है, वो दो है और तीन है।
- 56:08कि तुम्हारे शास्त्रों की बकवास है और कुछ भी है, न कोई मेरी
- 56:17व्याख्या है, न कोई मेरा संबोधन है, न तुम मुझे जान सकते हो।
- 56:32तुम्हारी सभी प्रयास बेकार हो जाते हैं।
- 56:41तुम पागल, पागल से हुए संसार की चीजों को कमा लेते हो, जो मेरी ही
- 56:46बनाई हुई है। शात्रियों को कमा लेते हो,
- 57:00प्रसिद्धियों को कमा लेते हो, हम बार लगा देते हो दान धान्य के।
- 57:11शैक्षणिक योग्यताएं तुम ले लेते हो उनके प्रमाणी का स्वरूप तुम ले
- 57:18लेते हो डिग्रीज़ तुम ले लेते हो सब ले लेते हो, लेकिन समझ नहीं
- 57:28पाता। इन कागजों का खूब तुम कुछ भी, कुछ
- 57:44भी जो कुछ भी भोग सदा एक कसक तुम्हारे भीतर बाकी।
- 57:57क्यों? क्या है वो कसक कसक ही है जब तक
- 58:04मैं ना बोलेंगे तड़पना जागी रहेंगी और चाहे कोई।
- 58:17में तुम्हारे बड़े से बड़े महात्मा महान पुरूष कोई महत्त्व
- 58:25नहीं रखते। मेरी सृष्टि में सिर्फ एक काहे
- 58:41हुए कि तुम अपना विस्तार अगर अस्तित्व तक कर लेते हो तो तुम ही
- 58:51महान। जिसने भी अपना विस्तार अस्तित्व
- 58:57किया, वह मोहम्मद होता है, उसके शिक्षक से हैं, उसकी संख्या कितनी
- 59:10है, उसके स्थानक कितने बड़े हैं? यह महत्त्व नहीं है क्योंकि वो तो
- 59:18सब उनके हैं, नहीं तो सब मेरे परम सत्यम जगत मिथ्या।
- 59:36अब इसका भेद आज मैंने सुना। कृपया दिव्य चक्षुओं से ब्रह्म
- 59:44सत्य होता है, जगत होता है और चर्म चक्षुओं से।
- 59:57जगत ही होता है। ब्रह्म होता ही इसलिए तुम्हारी
- 1:00:07उलझने कभी नहीं मिटेली क्योंकि तुम चर्म चक्षों से दिखोगे हमेशा।
- 1:00:19और समझ में आता नहीं क्योंकि समझ मैंने नहीं तो बनाया तुम्हारे हाथ
- 1:00:29का बनाया हुआ उपकरण तुमसे बड़ा। ऐसे
- 1:00:44फिर समझ लो इसको नहीं हुई जॉब ये दो चक्षु, एक चक्षु सभी को मिले
- 1:00:55चक्षु तो दूसरा भी सभी को मिले। लेकिन वो किसी शत पुरुष की संगत
- 1:01:03से अक्टिवेट होगा। इन आवाजों का भीतर है सिर्फ इनका
- 1:01:15मतलब में दुकान। कोई मतलब नहीं होता।
- 1:01:17किसी अर्थ का भी शब्दों के इधर उधर है।
- 1:01:23तुम जानकर हैरान ना हूँ एक भाषा में जीस शब्द के मतलब तुम अच्छे
- 1:01:30समझते हो तुम्हें नहीं पता दूसरी किसी भाषा में शब्द के अर्थ गाली
- 1:01:35होती है। तो शब्द शुद्ध इनको जहाँ छोड़
- 1:01:44दोगे अच्छे लोग घर बार के कामधम यह जो मैंने ऑर्गन दिए।
- 1:01:56इनकी बरापूर्ति करने के लिए इनका इस्तेमाल करो लेकिन परिग्रह पर
- 1:02:08क्योंकि परिग्रह तो मेरा है तुम कैसे करो।
- 1:02:15एक चीज़ के दो दावेदार करूँ जो मेरा है वो तुम्हारा कैसे होगी
- 1:02:24तुम्हारा हो सकता है अगर तुम मुझमें समझ जाओ तो फिर तुम्हारा
- 1:02:31हो जाएगा। ये एक संभावना है सिर्फ़ एक
- 1:02:35संभावित अन्यथा मेरा ही है तुम्हारा मात्र दावा है और जब तक
- 1:02:45मेरा है, तब तक तेरा बस उसका एक ही उपाय है कि तुम ही मेरे हो
- 1:02:52जाओ। तुम ही मुझ में समाहित हो जाओ तो
- 1:02:55फिर सब तेरा हो जायेगा। अगर ऐसा करने में तुम समस्त हो
- 1:03:02जाते हो तो फिर सब तुम्हारा हो जाता है मुझसे दूर होकर अगर तुम
- 1:03:10कहोगे सब मेरा है। वह भ्रमित करने का एक तरीका है
- 1:03:15लोगों को हाँ जी सा होगा तुम्हारा कुछ एक ज़रा भी तुम्हारा यहाँ कभी
- 1:03:23हुआ नहीं। तुम्हारे अंत में आने वाली मृत्यु
- 1:03:34तो यह सूचना देने के लिए थी कि तुम्हारा यह कुछ नहीं है, यह अटल
- 1:03:43सत्य है। अचल सत्य है, बतला में अच्छा
- 1:03:52अपरवर्त। विकास मलिक जी हम कर लेंगे आपके
- 1:04:24प्रश्न को अगर हो सके तो हिंदी में लिख दीजिए, मुझे समझ आया
- 1:04:33नहीं। जहाँ वो नए है, जो जाते जाते हैं
- 1:05:04मध्भुश कर जाते हैं, फिर यह बोला जाता है मैं चुप रह के जा सकता
- 1:05:17हूँ। श्रीकृष्ण गोविंद हर हे मराज़ हे
- 1:05:33नाथ नारा यन वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:06:18सखा हमार हे नाथ नारायण वासुबेय पितुमात स्वामी।
- 1:06:37सखा हमार हे नारायण? श्री कृष्ण गोबिंद हरे मुड़ा के
- 1:07:24नात नारायण वासु है पितु मात स्वामी।
- 1:07:35शका हमार पितुमात स्वामी शका हमारे।
- 1:07:53नारायण, वासुदेव के कृष्ण गोविंद हरे मदारी ए नाथ नारायण वासु।