Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Dec 24 - कौन सा धर्म तुम्हें, तुम्हारे लक्ष्य तक पहुँचा सकता है? मन कैसे ठहरेगा? गीता का ज्ञान!
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- 0:05प्रदीप कौशल बाबा जी प्रणव कृपया एक बार फिर से बताइए, हम भूल जाते
- 0:19हैं, मन ठहरता नहीं। मन भागता रहता है उसको ठहराने का
- 0:29सरल उपाय क्या है? भूल जाते हो तुम बहुत बार?
- 0:44तो मैं स्पष्ट शब्दों में भी समझाया, सरल शब्दों में भी
- 0:48समझाया। उदाहरण देकर भी समझाया और ध्यान
- 0:55से फिर सुन लो, अब जितनी बार भी पूछोगे।
- 1:04मेरा यह कर्तव्य है मन के बारे में मैं आपको अवश्य उत्तर दूंगा
- 1:20मन। और आपका स्वभाव यही प्रसंग चल रहा
- 1:26है। गीता का दुखी और सुखी दो व्यक्ति
- 1:38दिखावा करते हैं। आनंदित व्यक्ति दिखावा नहीं करता
- 1:45है, क्योंकि सुख और दुख दोनों उत्तेज नहीं हैं और जब व्यक्ति
- 1:58उत्तेजित होता है। तो वो जल्दी से दिखाने की कोशिश
- 2:02करता है कि देखो मैं सुखी हो गया। दुखी व्यक्ति भी अपना रोना रोता
- 2:11है कि मैं दुखी हूँ, वो भी दिखावा है लेकिन आनंदित व्यक्ति।
- 2:20दिखाता नहीं, मीरा कभी नहीं दिखाती कि वह नाचती क्यों है?
- 2:28नानक कभी नहीं बताते कि वह गाती क्यों है?
- 2:33कबीर कबीर नहीं बताते कि वह क्यों गाते हैं।
- 2:38क्यों इतना प्रफुल्लित? और खुश होते हैं।
- 2:41उनके पास कुछ है तो है नहीं और आपके मन की सोच सदा यही रही है कि
- 2:50जिसके पास सब कुछ होता है वो सुखी होता है।
- 2:59देखिए हम प्रश्न पे आते हैं सीधा सा प्रश्न है स्पष्ट फिर समझा
- 3:06देता हूँ इसको अपनी दीवारों के ऊपर चपका के रख लेना।
- 3:15मन ठहरेगा कैसा मन ठहरेगा, उससे छेड़छाड़ न की जाए, ठहराव में तुम
- 3:32आ जाओ। तो मन भी ठहराव में आ जाएगा।
- 3:37जैसे मैंने उदाहरण दिया कि गंदला पानी अगर उसको एक तरफ रख दो, कंच
- 3:47के ग्लास में डाल कर रात भर उसको छेड।
- 3:54सुबह आप पाओगे कि साफ पानी ऊपर आ गया जो मिट्टी थी, धूल थी वो नीचे
- 4:04बैठ गई, मन ठहर गया रात भर के विश्राम में आपको प्रकृति क्यों
- 4:12लेके जाती है? दिन भर के थके मादेय आपका मन
- 4:20दूषित हो जाता है, गजौर मिश्रित हो जाता है मिट्टी से आपका शीतल
- 4:30जल? और आप दुःखित मन से टूटे फूटे घर
- 4:41आकर गरते रहो। प्रकृति आपको विश्राम में ले जाती
- 4:47है। प्रकृति आपको बड़े सरल उपाय रोज़
- 4:51बताती है। पर तुम समझ नहीं पाते, प्रकृति
- 4:58कहती है कि तुम छोड़ दो अब मेरे पे मैं अपने आप तुम्हें शांत कर
- 5:06दूंगी और तुम उसको छोड़ देते हो। प्रकृति में सुसक्ति में ले जाती
- 5:16है ठहराव जैसे हमने गंदले पानी को कंच के ग्लास में डालकर एक तरफ रख
- 5:27दिया है, उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की।
- 5:33तो वह मिट्टी नीचे बैठ गई। पानी ऊपर आ गया।
- 5:38ऐसे ही रात भर तुम्हें प्रकृति विश्राम में ले जाती है और सुबह
- 5:46जब तुम उठते हो उस वक्त। मिट्टी अलग होती है, जल अलग होता
- 5:54है इसलिए तुम इतना फ्रेश महसूस करते हो।
- 6:00शीतल जल अलग हो गया लेकिन वो फ्रेशनेस थोड़ी देर की होती है।
- 6:10तुम फिर उसे दूषित करना शुरू कर देते हो, यही तुम्हारी गलती है
- 6:19तुम्हारा मन फिर व्याकुल हो जाता है तुम्हारा मन फिर बजकने लगता
- 6:27है। भटकन अभी शब्द को ठीक से समझ
- 6:34लेना, भटकन ठहराव को पा लेने का छटपटाहट है।
- 6:48तुम भटकते हो, इसीलिए भटकते हो की तुम ठहराव को पाने के लिए छटपटाते
- 6:58हो किसी तरह वो ठहराव फिर मिल जाए ठहरोगे कैसे?
- 7:07कुछ न करो पानी का गलास दूषित जल का गलास उसको रखे ही रहने दो,
- 7:21उसको बार बार गज़ल मत करो। उसमें हाथ मत गचोलो अन्यथा रात भर
- 7:29अगर तुम हाथ गचोलते रहे तो सुबह पानी तुम्हें शीतल नहीं मिलेगा।
- 7:39बोही मिक्स जल बोही गंधला जल। और उसी को दूषित मन कहते हैं।
- 7:48भागता हुआ मन दूषित मन होता है। ठहरा हुआ मन शुद्ध जल अलग और
- 7:58मिट्टी अलग इसे ठहरा हुआ मन कहते हैं।
- 8:05लेकिन अफसोस है कि तुम्हारे मार्गदर्शकों ने तुम्हें सुन्दर
- 8:15सुन्दर नाम देकर बहका दिया है। राधे राधे चप्पल।
- 8:23हे राम राम जपना, ये राधे राधे जपना उस ठहरे हुए पानी में या
- 8:30ठहरते हुए पानी में छटपटाट है। तुम हाथ फेरते हो उसमें?
- 8:40तुम घजोल मारते हो हाथों की फिर फिर जितना की नीचे बैठता है माटी
- 8:48का कण वो फिर बीच में आ जाता है, फिर मन गंधा हो जाता है, ठहराव।
- 9:00पानी के भीतर गजोल न मारने का नाम है पानी को ठहर जाने दो, तुम कहते
- 9:13हो, मैं मन के भागने से पीड़ित हूँ और बाबा?
- 9:19आपकी बात मैं बार बार भूल जाता हूँ किस को ठहराव कैसे मिले बस
- 9:25तुम ठहर जाओ तुम कुछ ना करो जैसे जल का ग्लास तुमने एक तरफ रख दिया
- 9:32कुछ नहीं किया अगर उसमें घचोल मारोगे?
- 9:37कोई राधे राधे करोगे ऊँगली मारोगे हाथ मारोगे?
- 9:42वह जल कभी स्वच्छ नहीं होता, लाख साल कोशिश करते रहो आप तुम्हारा
- 9:50फॉर्मूला गलत है और जब फॉर्मूला गलत होता है।
- 9:55तो रिज़ल्ट सही नहीं करता तुम्हारा मन भटकता है, बिल्कुल
- 10:05सही है, सभी का मन भटकता है, ठहरते हैं जो।
- 10:15कुछ नहीं करते जो उस भटकते हुए मन को उस बोलते हुए मन को उसे शोर
- 10:24मचाते हुए मन को रोकने के लिए शांत हो जाने के लिए जो कुछ नहीं
- 10:31करते उनका मन ठहर जाता है। कुछ भी किया, कुछ भी किया तो वह
- 10:44भटका। फिर तुम्हें सुंदर शब्द दिए जाते
- 10:49हैं। ये तो भगवान का नाम है सुंदर का।
- 10:55हनुमान चालीसा पढ़ लूँ, मन ठहर जाएगा ये गजौर है ज़रा ठहरे हुए
- 11:03पानी में हाथ फेर के देखो सोने की छड़ी फेर के देखो।
- 11:12हीरा फेंक के देखो वह गजोल है, सोने की छड़ी भी गजोल है, आपके
- 11:22हाथ भी गजोल है, वो उसको नीचे बैठने नहीं देगा।
- 11:27आपका मन शांत नहीं होगा। और तुम्हारा उद्देश्य है मन को
- 11:34शांत करना तुम चाहते हो मन ठहर जाए क्योंकि तुम मन की बकवाद से
- 11:45थक गया। जन्मो।
- 11:48जन्मो से ये बोले जा रहा है और बोले जा रहा है, उसका कारण तुम
- 11:58हो, क्योंकि तुम इस बोलते हुए मन को ठहराने के लिए फॉर्मूला लगाते
- 12:06हैं। तुम खुद ठहरते नहीं, एक तरफ बैठते
- 12:14नहीं, कुछ ना कुछ करते ही रहते हो और नई नई तरकीबें, नए नए शब्द
- 12:21तुम्हारे तथा कथित विद्वान तुम्हें सौंपते रहते हैं।
- 12:26खाली मन शैतान का घर ऐसी ऐसी शपथ दे देते हैं गीता का पाठ कर लो
- 12:37रामायण का पाठ कर लो, सुन्दर काठ का पाठ कर लो, कुछ भी पाठ कर लो।
- 12:45भजन, गारो या गालियां निकाल लो, झील के पानी में ईंट का टुकड़ा
- 12:58फेंक दो या हीरा फेंक दो। लहरें उठेंगी वो नहीं देखता, पानी
- 13:14गिरने वाला पत्थर का टुकड़ा याहीरा नहीं।
- 13:23ये तुमने ठहरे हुए पानी को छेड़ दिया चाहे हीरा गराया चाहे ईंट
- 13:31गराया ठहरे हुए पानी को छेड़ दिया तरंग उठेगी और वह तरंग ही
- 13:40तुम्हारा वडकाव है। यही शोर है जो मन पैदा करता है,
- 13:48तुम मन को ठहरने नहीं देते, सुंदर सुंदर शब्दों से फिर उसको बटका
- 13:53देते हो तो मैं तो आरती कहूंगा, मैं तो अरदास करूँगा।
- 14:02और कुछ नहीं तो मैं तो लोक कल्याण हेतु विश्व कल्याण हेतु फरियाद
- 14:07करूँगा। अरे भाई क्या फरियाद करोगे
- 14:14तुम्हारी औकात ही क्या है? ब्राह्मण का रच ही था।
- 14:23जिसने रचना की है, वह हर पल साक्षी है।
- 14:31साक्षी का अर्थ वह हर वक्त ख्याल रखता है।
- 14:35तुम्हारा साक्षी का से ही मतलब यह होता है।
- 14:41ईशा वास मिदं सर्वं यतकेन्द्र जगतयाम जगत इस कण कण में व्यापक
- 14:50वो ईश्वर हर वक्त साक्षी है। बाबा ने भी कहा है।
- 14:58जेता कित्ता तेता नाम? जितना पसारा किया हुआ है जगतगा
- 15:06उसे नाम कहते हैं बाबा तुम जपने को नाम कहते हो?
- 15:13बाबा पसारे को नाम कहते हैं अब देखो कौन ठीक है?
- 15:19तुम पुनरुक्ति को रेपेटिशन को नाम कहते हो और बाबा इस फैलाव को नाम
- 15:28कहते हैं। जेता केता तेता।
- 15:30नाम और बाबा वही शब्द बोलते हैं अपने सिक्का।
- 15:37ईशा वस्त्र में तुम सर्वम जगत या आम जगत बिना ना में ना ही कोठा
- 15:45नाम के बिना कोई जगह नहीं कोई ठान नहीं सभी जगह वो ही वो है नाम ही
- 15:53नाम है और तुम नाम को जापते हो। जबकि सब जगह वो है कैसे?
- 15:59जब होगे उसको तुम्हारे मूर्ख पंखियों ने गलत गलत तर्क दे के
- 16:07तुम्हें उलझा दिया है, तुमने कहा बाबा भूल जाता हूँ।
- 16:15कोई बात नहीं, स्वभाव है आदमी का भूलना भूल जाते हो फिर फिर से याद
- 16:23कर लिया हो, लिख के रख लो इस प्रवचन को संभाल के रख लो और अगर।
- 16:33मैं संभल पाई तो मुझसे पूछ लूँ, जब तक मैं हूँ लेकिन क्या करोगे
- 16:38चना मैं तो 1 दिन चला जाऊंगा। सभी संत आए चले गए, कौन ठहरा?
- 16:52कौन ठहरेगा? मैं भी नहीं ठहरूंगा मैं भी चला
- 16:58जाऊंगा फिर क्या करोगे इसको रिकॉर्ड कर लूँ जब मन तुम्हारा।
- 17:10आप ही से बाहर हो जाए सबका होता है तो तुमने क्या करना है तुमने
- 17:18ठहर जाना है यही बेकारों के लिए मैं रोज़ कहता हूँ, तुम कहते हो
- 17:24पापा काम बड़ा तंग करता है। मैं तुम्हें कहता हूँ तो फिर तुम
- 17:29उसका संघ क्यों देते हो? काम आया स्वभाव है।
- 17:37जैसे विचार आया वैसे काम का विचार आया।
- 17:42जैसे अन्य विचार आते हैं, वैसे काम की वासना भी आई।
- 17:49लेकिन अन्य विचार जैसे चलते रहते हैं, वैसे ही काम के विचार भी
- 17:55चलने दो। बस तुम उसमें फंसोना ये शिकारी
- 18:03जाल फैलाता है। तुम इसके शिकार मत बनो, शिकार बने
- 18:10के उलझे तुम कितना खो देते हो और फिर तुम कहते हो बाबा भीतर नहीं
- 18:19जाया जाता। इसी शक्ति से तुम भीतर जागते हो।
- 18:25इसी शक्ति से तुम भीतर जा सकते हो जो तुम अन्न खाते हो।
- 18:35ये बहुत सी प्रोसेसेस होंगे। डाइजेस्ट अबसॉर्ब असिमिलेट।
- 18:44कितनी प्रोसेसेस होती हैं फिर उन प्रोसेसेस के बाद काम ऊर्जा बनती
- 18:53है वो काम ऊर्जा परिवर्तित होती है ओज में।
- 19:02लेकिन तुम ओज बनने से पहले ही उसको बाहर फेंक देते हो।
- 19:08क्यों मैं जानता हूँ सुख के कारण क्षणिक सुख मिलता है तुम्हें और
- 19:16तुमने कोई माध्यम तराशा नहीं आज तक।
- 19:20जो तुम्हें क्षण के सुख भी देते हैं।
- 19:23बस कुछ इंद्रियों के द्वारा टेस्ट वर्ष अच्छी सी चीज़ खा ली, क्षण
- 19:30का स्वाद आया और तुम बार बार वही भल्ले, पकोड़े, पिज़्ज़ा, बर्गर
- 19:37खाते रहोगे, चाओ मुन चुंगे। तुम्हारे पास तरीका इंद्रियों के
- 19:44सिवा, सुख लेने का और कोई माध्यम और तरीका है नहीं।
- 19:51यही तरीके हैं तुम्हारे पास जो प्रकृति ने तुम्हें प्रदान किए।
- 19:58ये फाइव सेंसटीओन्स अच्छी सुगंध लेना चाहते हो तुम कहते हो क्या
- 20:07सुंदर गंध है कानों से सुंदर भजन सुनते हो आवाज सुनते हो तुम कहते
- 20:15हो बड़ा मीठा भजन है। मीठा गायन है, आँखों से सुंदर
- 20:22दृश्य देखते हो, सुकून मचता है जीवा से सुंदर पदार्थ से चक्र हो
- 20:33और इन्द्र से। सुख भोग बस ये तुम्हारे पास,
- 20:41इन्द्रियों के साधन ही मात्र बचे हैं सुख के लिए और कोई साधन इसके
- 20:49अतिरिक्त तुम्हें पता नहीं है इसलिए तुम चूख चूख जाते हो।
- 20:57तुम्हें कोई बताता नहीं कि इसके अलावा भी कोई और माध्यम है जिससे
- 21:05तुम क्षणिक सुख नहीं बल्कि परम आनंद अखंड आनंद भी प्राप्त कर
- 21:13सकते हो। भगवान कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन
- 21:21तुक क्षत्रिय धर्म का पालन करें, क्योंकि यही तेरा धर्म है।
- 21:29इस वक्त लड़ना ही तेरा धर्म है। लेकिन एक बात साफ कर दूँ जहाँ से
- 21:38मैंने कल का प्रवचन शुरू किया था। यह कर्तव्य कर्म की बात कर रहे
- 21:46हैं। दो धर्म हैं।
- 21:50मैंने बताया। शायद आपको आय तक न बताया हो
- 21:55व्याख्याकारों ने, क्योंकि व्याख्याकार तो व्याख्याकार ही
- 21:59होते हैं, आपके दो धर्म हैं स्वय धर्म सबका एक है ध्यान से सुनते
- 22:08जनो स्वय धर्म। और कर्तव्य, धर्म, स्वधर्म सबका
- 22:14एक है और तुम्हारा भी वही है, मेरा भी वही है, किसी का भी वही
- 22:20है। स्वधर्म दो नहीं होते हैं और आखिर
- 22:26व्यक्ति को स्वधर्म में जाना होता है।
- 22:29यह उसका अंतिम गंतव्य है। लक्ष्य है, स्वधर्म में आनंद ही
- 22:37आनंद है। अब इन बातों को ध्यान से सुनते
- 22:41रहना तो आपको साफ हो जाएगा। स्वधर्म में आनंद ही आनंद है।
- 22:49सुख का नामो निशान नहीं हूँ। अब यहाँ तुम गच्चा मत खा जाना,
- 22:57क्योंकि तुम सुख को ही आनंद समझ लेते हो, मैं कहता हूँ स्वय धर्म
- 23:04में आनंद ही आनंद है वो आनंद। जो आपको मदमस्त कर देता है वो
- 23:14आनंद जो आपको सुरती में ले जाता है, खुमारी में ले जाता है।
- 23:28ठंडी हवाएं बहती हैं, आनंद के झरने प्रसोष्ठित होते हैं जहाँ और
- 23:36वो सबका एक है। वहाँ सुख नहीं होता।
- 23:43यहाँ चौंक जाते हैं लोग। बाबा सुख नियत और क्या होता है
- 23:49क्या करें? विचार है जिन्होंने आनंद की एक
- 23:54बूंद कभी चटकी न हो और इस दुनिया में बहुत थोड़े से गिनती चुनती के
- 24:01लोग हैं, जिन्होंने आनंद का बोरस। एक पल के लिए कभी पिया होगा एक
- 24:09बूंद भी वो क्या जानें कि आनंद होता क्या है, वो सिर्फ सुख जानते
- 24:18हैं और जब मैं कहता हूँ कि वह सुख नहीं है।
- 24:24क्योंकि सुख तो कभी भी दुख में बदल सकता है।
- 24:32सुख का दूसरा पहलू भी है। रात आएगी तो दिन भी आएगा, उजाला
- 24:40होगा तो अंधियारा भी होगा। एक जोड़े हैं दो, लेकिन आनंद का
- 24:48कोई जोड़ा नहीं होता। वो तुम्हारा स्वभाव है।
- 24:54स्वयधर्म अब आप ठीक से समझ गए होंगे और थोड़ा सा व्याख्यात कर
- 25:01दो। दो तरह के धर्म है स्वय धर्म और
- 25:05कर्तव्य, धर्म स्वय धर्म। वो जो तुम हो, जो कोई भी है, उसका
- 25:13स्वयधर्म सबका एक है और वो आनंद से भरा हुआ है।
- 25:21वह खजाना ऐसा जिसमें आनंद ही आनंद है और कुछ नहीं, उसमें सुख भी
- 25:29नहीं है और तुम सदा सुख की तलाश करते रहते हो।
- 25:41तुम सुख को मांगते रहते हो भीतर से जब तुम निकलते हो तो आपस में
- 25:53गुत्थम गुत्थ होकर आती है पति पत्नी।
- 25:58जू तो पटांग होकर बाहर निकलेगा लेकिन लोगों को दिखाने के लिए
- 26:04इच्छा से मेकअप कर रही है। बिंदिया लगा ली है लिपस्टिक लगा
- 26:09ली है, लाल रंग के बाल संभा लिए हैं।
- 26:16अच्छे वस्त्र पहन लिए हैं, थोपी हुई मुस्कराहट के लिए बाहर निकल
- 26:23जाते हो, लोग कहते हैं कि ये बहुत सुखी है, ये पाप है।
- 26:35जैसे तुम लोगों को ठग रहे हो वैसे ही लोग तुम्हें ठग रहे हैं।
- 26:42लोग भी जो भीतर है वो तुम्हें दिखाते हैं चले हैं तारीख भुगतने
- 26:49के लिए तलाक के। और निकले हैं जैसे पता नहीं कितने
- 26:55खुश हैं, लड़ते हैं भीतर जा के किसी को पता नहीं चलता और बाहर
- 27:03तुम्हें दिखाते हैं उजले उजले चेहरे, खूबसूरत चेहरे, खुशबुओं से
- 27:10भरे चेहरे। भीतर गंदगी ही गंदगी होती है,
- 27:15लड़ाई झगड़े होते हैं, वो उसपे बेलन फेंक देता है, वो उसके चांटा
- 27:21चढ़ देता है लेकिन लोगों को दिखाने के लिए तुम बाहर बड़े खुश
- 27:28दिखाई पड़ते हो। और अगर तुम लोगों की तरफ देखोगे
- 27:34तो लोग तुम्हें बड़े संतुष्ट नजर आएँगे।
- 27:38वो देखो वह चीफ मिनिस्टर बन गया। वह बड़ा सुखी है, प्राइम मिनिस्टर
- 27:45बन गया, वह बड़ा सुखी है उसके इतनी इतनी।
- 27:49इंडस्ट्रीज चलते है, उसके पास इतनी इतनी बिल्डिंग है, इतनी इतनी
- 27:55बड़ी बड़ी कारें है, बस यही तुम्हें सम्मोहित कर जाती हूँ और
- 28:04तुम अपने मन के भीतर तक बसा लेते हो की कारें।
- 28:08सुख देते हैं, बिल्डिंग सुख देते हैं, स्वर्ण आभूषण सुख देते हैं,
- 28:15यहीं तुम गलती कर जाते हो जो धोखा देते हैं, आपको सोने की पोशाकें
- 28:23पहन के शादी कराते हैं। बड़ा पाप कमाते हैं।
- 28:29मैंने पहले भी कहा है क्योंकि तुम्हें वो आनंदित होने का भ्रम
- 28:36देते हैं। सुखी तो वह हैं।
- 28:38मैंने पहले भी बताया सुख मिलता है पदार्थों के द्वारा, लेकिन।
- 28:48उन तरंगों में और उन तरंगों में जो बाहर वीरान एक कुटिया के भीतर
- 29:00अपनी मस्ती में गुनगुनाता हुआ कोई संत।
- 29:06आनंद के प्रभाव में डूबा डूबा आनंद के रस से सराबोर जो गाता है
- 29:18उसका और आपका पहलू। विपरीत है, इंडस्ट्रियलिस्ट सुख
- 29:26से भरे होते हैं और वह संत जो कुटिया में बैठा एकांत में ईश्वर
- 29:37के गीत गा रहा है, तालियाँ बजा रहा है, नाचता है।
- 29:43प्रसन्न होता है। तुम दोनों को एक समझ लेते हो उतना
- 29:48ही सुखी वो है, उतना ही सुखी वो है।
- 29:51तुम गलत कहते हो। जो सुखी है उसके पास बहुत साधने
- 29:59हैं बाहर के। और जो आनंदित है उसके पास कोई
- 30:04साधन नहीं है सुख का, लेकिन सुख का साधनों से चाहिए भी नहीं होता
- 30:11है जीसको आनंद मिल गया। उसकी एक पहचान भी तुम्हें बता
- 30:18दूँ। वह सुख के साधनों की तलाश नहीं
- 30:22करेगा। इनको लिखते जाया करो फिर बाद में
- 30:27तुम भूल जाते हो। स्वधर्म मूल है, कर्तव्य, धर्म,
- 30:44स्वधर्म से शक्ति लेता है। शब्द बड़े गहरे हैं।
- 30:51भविष्य में जब तुम मेरे शब्दों का पोस्टमॉर्टम करोगे तो शायद एक एक
- 30:57शब्द को पोस्टमॉर्टम करने में महीनों लग जाए।
- 31:04आज तुम्हें बड़े सरल नजर आते हैं। जहाँ उलझ गए वहाँ मुश्किल खड़ी हो
- 31:11जाएगी क्योंकि ये तल आते हैं। उस ये शब्द आते हैं उस तल से जहाँ
- 31:21खुद श्री कृष्ण विद्यमान। वहाँ जाना होगा।
- 31:28इन शब्दों का सही अर्थ जानने के लिए कर्तव्य धर्म, स्वय धर्म से
- 31:37शक्ति लेता है। कर्तव्य धर्म के पास अपनी शक्ति
- 31:43नहीं होती। शक्ति होती है स्वय धर्म की शक्ति
- 31:49का मालिक है स्वय। वह कर्तव्य करने के लिए कर्तव्य
- 31:57धर्म को शक्ति दे देता है कि तुम अपने कर्तव्य कर्म कर।
- 32:06सो धर्मपि चावेक्षण विकम्पी तू मरहसी धर्मय धर्मयध्य।
- 32:22युद्धाक्ष है वो अंतर्क्ष त्रयस्य न विद्युत है, यह क्षत्रिय धर्म
- 32:31है, वह तेरा कर्तव्य धर्म है क्षत्रिय धर्म।
- 32:40निभाने के लिए जो शक्ति लेगा तुम वह लेगा स्वय धर्म से मेरे ख्याल
- 32:46में तुम मेरी बातों से इतनी सरलता से बोल रहा हूँ, मैं कि तुम मेरी
- 32:54बातों से सरलता से समझाओगे कि मैं क्या बोलती हूँ?
- 32:58कर्तव्य धर्म को निभाने के लिए स्वय धर्म से शक्ति लेता है
- 33:02अर्जुन फिर वो पूछता है भगवान फिर स्वय धर्म क्या है?
- 33:12बस इसी चीज़ पे अड़ा रहता है अर्जुन आखिर तक।
- 33:18और बात भी ठीक है क्योंकि अर्जुन अंधविश्वासी नहीं है।
- 33:25अर्जुन जब तक ना देखेगा अपनी आँखों से तब तक ना मानेगा भगवान
- 33:34कृष्ण की बातों पे, यकीन तो हो रहा है उसे।
- 33:38लेकिन प्रत्यक्ष दर्शन अभी बाकी है।
- 33:41शंका की छोटी सी रकीर अभी उसको घेर रही है।
- 33:48किस्में अज्ञान में उसको कर्तव्य कर्म करने से रोक रही है।
- 33:57तो भगवान कृष्ण कहते हैं जो कर्तव्य कर्म है धर्मेंयावधि
- 34:04युद्धाछयो अनन्या क्षत्रिय से न विद्यत्य लोक क्षत्रिय धर्म
- 34:12निभाने के लिए। तू स्वय धर्म से ही शक्ति ले ले
- 34:17और अपना कर्तव्य धर्म निभा, लेकिन एक इशारा कर रहे हैं यहाँ पर
- 34:24कर्तव्य धर्म को निभा कर तू स्वय धर्म के पास जा कर्तव्य धर्म
- 34:32निभाये बिना। स्वय धर्म को ढूंढने की चेष्टा न
- 34:37करें। अर्जुन ऐसा ही चाहता है।
- 34:42वह डर के मारे चाहता है कि मैं भाग जाऊं युद्ध क्षेत्र से पर्वतो
- 34:47निकल जाऊं मैं पहाड़ों के कंधों में से जाऊं वहाँ बैठ के आराम से।
- 34:54तप करूँगा स्वयं को देखूंगा लेकिन कृष्ण कहते हैं वो तो देख स्वयं
- 35:03धर्म को देख लेकिन कर्तव्य धर्म इस सब वक्त दोनों फौजें आमने
- 35:09सामने खड़ी। इस वक्त जो तेरा धर्म है वो
- 35:14कर्तव्य धर्म है ना के स्वधर्म है पहले कर्तव्य धर्म को निभा निभाने
- 35:22के पश्चात तू स्वय धर्म को खोज, यही तो मैं कहता हूँ मैं।
- 35:31अपने जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए फुर्सत के लम्हे
- 35:40बचा लो। उन फुर्सत के लम्हों में अपने
- 35:46स्वय धर्म तक जाने का मार्ग। तलाशो और चलो क्रिया योग करो
- 35:57प्रवचन सुनो जिससे तुम्हारे भीतर एक उत्पन्न होगी अभी सा जागृति।
- 36:14और फिर तुम कुछ नय करने में बैठ जाओ, ध्यान में बैठ जाओ ये तीन
- 36:19अंग मैंने बताया क्रिया योग सबसे पहले करो, क्योंकि वह कैथोर्सेस
- 36:25करेगा तो हमारे अचेतन को खाली करेगा और यह बड़ा जरूरी है।
- 36:33किसी मेहमान को बुलाना है तो हम अपने घर को साफ करते हैं, धोते
- 36:40हैं, पोचा मारते हैं, बिखरी हुई चीजों को एकत्रित करते हैं और फिर
- 36:50बुलाते हैं मेहमानों को। ऐसे ही तुम्हारा मन उबड़ खबर है,
- 36:58ना जाने इसमें क्या कुछ वासनाएँ इच्छाएं अभिपक्षाएं भविष्य की
- 37:04योजनाएं बहुत कुछ भरा पड़ा है। यह सब गंदगी है।
- 37:11और तुम इसके भीतर परमात्मा को भुलाना चाहते हो मुश्किल है वह
- 37:18आएगा नहीं इसके लिए बैठने के लिए जगह बना दो अचेतन को खाली कर दो।
- 37:29अचेतन खाली कैसे होगा क्रियायोग से अब तो मैं थोड़ी सी बात और बता
- 37:34दूँ। जब अचेतन खाली होगा तो कई दिनों
- 37:40तक भी तुम कांपते रह सकते हो, क्योंकि मृत्यु का व्यय तुमने
- 37:46इतना दबा लिया है। वह इतना दबा हुआ है उसकी तहों पे
- 37:53तहों पे तहें तह्यों पे तहें संस्कार पे संस्कार बनते रहे।
- 37:59सभी जन्मों में तुम जसबी जीव की यौणी में रहे, अपने आपको शरीर
- 38:04मानते रहे। और जो शरीर मानेगा, उसे मृत्यु का
- 38:10व्यय सताएगा। अपने आपको जिसने भी शरीर माना
- 38:17उसको मृत्यु के भय ने सताया, फिर मृत्यु का व्यय से वो डरेगा।
- 38:24और मृत्यु के भय को दबा लेगा। लेकिन अब क्योंकि तुम लिबरेशन की
- 38:33तरफ चले हो, सब रस्सियाँ खोलनी हैं, जो गांठें बाँधी थीं वो पुनः
- 38:40वैसी ही खोलनी हैं। और जैसे बांटी थी उसकी विपरीत दशा
- 38:45में वो खुलेंगे। अब जो भरा है तुमने चित्र के
- 38:51भीतर, वो सारा खाली कर देना है और सबसे ज्यादा मैं पहले भी कहता
- 39:00हूँ। मृत्यु का ब्याह ही तुमने भरा हुआ
- 39:03है अचेतन में उसका कारण भी मैं रोज़ बताता हूँ कि तुम अपने आप को
- 39:09शरीर समझते हो और जो भी अपने आप को शरीर समझेगा और प्रत्येक
- 39:14व्यक्ति अपने आप को शरीर ही समझता है क्योंकि प्रत्येक योणी में।
- 39:21उसको शरीर ही अपना लगा है। मैं ही शरीर हूँ अब जब खाली होगा
- 39:31चेतन को करना तो जो भरा है वो ही निकलेगा ना तो मृत्यु का भय सबसे
- 39:37ज्यादा भरा है। मेरे पास रोज़ ऐसे मैसेज आ जाते
- 39:42हैं। बाबा मृत्यु का भय लगातार निकल
- 39:46रहा है। मैं कंपू और घबराओ मत जितना है।
- 39:58जितना तुमने दबाया, उतना ही निकलेगा ध्यान रखना।
- 40:03वह कई दिनों तक भी कैथोरसिस जारी रह सकता है।
- 40:08घबराए मत, क्रोध भी आ सकता है, लेकिन जब क्रोध का वेला है तो
- 40:15किसी एकांत जगह में चले जाना। अपने कमरे में चले जाना, बाग और
- 40:19बगीचे में चले जाना ताकि तुम उस क्रोध को किसी और के ऊपर ना फेंक
- 40:25सको। अगर किसी और के ऊपर तुमने फेंक
- 40:29दिया उस क्रोध को तो फिर वही कर्मों की श्रृंखला शुरू हो
- 40:33जाएगी। और हमने कर्मों की श्रृंखला को
- 40:37बंद करना है। लोभ भी आएगा, महो भी आएगा, अहंकार
- 40:44भी आएगा, सब कुछ आएगा, लेकिन एक बात को ध्यान में रखना कैथार से
- 40:50सजब आने लगे। तो तुम अंडरग्राउंड ही रहना।
- 40:57एकांत का इसीलिए महत्त्व था। जब तुम अध्यात्म की यात्रा पे
- 41:07निकलो तो एकांत हो जाओ। ऋषि ने क्यों कहा है?
- 41:15अब इसके अंदर का रहस्य सुनो तुम जब तुम अपने भीतर जाओगे तो भीतर
- 41:26का चेतन मन, बाहर कैथोड से सोभा निकलेगा और वह जो निकलेगा।
- 41:34वह गुलाबों के फूल की खुशबू तो है नहीं यही ईर्ष्या, द्वेष, यही
- 41:42क्रोध, यही लोभ, यही अहंकार, यही मृत्यु का भय यह दबे पड़े हैं
- 41:51भीतर। और यही निकलेगा आर के मेडिस का
- 41:57सिद्धांत तुमने सुना होगा जब हम भरे टब के अंदर कोई बाल्टी डुबोते
- 42:04हैं तो जितना उसका गुणत्व होता है उतना पानी बाहर निकल जाता है।
- 42:13बस उसी तरह से तुम से मिला तुम जीतने भीतर जाओगे, उतना ही
- 42:19तुम्हारा भीतर कथोर से सूखा बाहर निकलेगा उलीचेगा वो पन जो भीतर
- 42:27भरा पड़ा है वह बाहर उलीचेगा। इसे आर्केमेटिक का सिद्धांत कहते
- 42:34हैं। जैसे ही तुम भीतर जाओगे तो तुम
- 42:39जीतने भीतर जाओगे, उतना ही जो भीतर भरा पड़ा है वो बाहर कैथल से
- 42:46होगा। ध्यान से समझे ना बात को
- 42:48वैज्ञानिक भी है। और अध्यात्मिक भी है, जितनी एक
- 42:58बूंद भी कम नहीं निकलेगी। एक बूंद भी ज्यादा नहीं निकलेगी।
- 43:03जितना भरा पड़ा है उतना ही बाहर कच्छरसिस होगा, रेचन होगा।
- 43:12तुमसे होने देना सन्तु ने कहा, उस वेला में तुम अकेले हो जाना,
- 43:19एकांत में हो जाना क्यों कहा? क्योंकि तुम डरोगे तुम्हें क्रोध
- 43:27भी आएगा। क्रोध तुम दूसरे पे फेंक सकते हो।
- 43:32तुम्हें पता नहीं जब तुम्हें क्रोध आता है तो कारण तो कुछ भी
- 43:36नहीं होता कारण से सिर्फ यही होता है कि तुम्हारे भीतर क्रोध भरा
- 43:42पड़ा है। बुध को नहीं आता, बुध के ऊपर थूक
- 43:45जाते हैं, लोग बुध को नहीं आता। क्योंकि भीतर क्रोध है नहीं,
- 43:51तुम्हें अकारण ही आ जायेगा और तुम कारण बना लोगे की ये कारण हुआ।
- 43:57कारण होता होता कुछ नहीं तो क्रोध जब आएगा तुम सामने खड़े व्यक्ति
- 44:03पे फेंकोगे फेंकोगे तो वो भी अज्ञानी है।
- 44:08वह तुम पे फेंकेगा वह कर्मों की श्रृंखला फिर दोबार से शुरू हो
- 44:13जाएगी जिसे तुम मिटाने के लिए चलेगा एकांत इसलिए कहा था वृक्षों
- 44:19ने कि जब भी तुम अध्यात्म की यात्रा पे चलो अकेले हो जाना।
- 44:29संत लोग बाहर कुटिया डाल के क्यों बैठते थे साधना के दौरान?
- 44:37क्योंकि जो भीतर से निकलेगा वह फूलों की खुशबू नहीं होगा।
- 44:42सड़ाम होगी तो अकेले ही रहना ठीक है।
- 44:47कर्मों की श्रृंखला को खत्म करने का सबसे बढ़िया तरीका है अकेले हो
- 44:53जाओ, जो भी कुछ निकलेगा, गंध पंथ निकलता रहेगा।
- 44:57अकेले में ये था कारण और अंत में। तुम कैथोरसिस करते करते जब अकेले
- 45:08होने का तुम्हें अभ्यास पकड़ जाएगा तो एक बात और नोट कर लो।
- 45:14उस अकेले होने के अभ्यास में तुम्हें एकांत का आनंद भी आना
- 45:18शुरू हो जाएगा, जिसे आनंद का रस कहते हैं।
- 45:25जब भी कोई व्यक्ति एकांत में होता है, वह रस में डूब जाता है और जब
- 45:31वो रस तुम्हें घेर लेगा फिर तुम सुख की यात्रा नहीं करोगे, फिर
- 45:39तुम सुख के साधन जरूरत के लिए जोड़ोगे।
- 45:46लेकिन तुम बैठोगे आनंद के लिए हर घड़ी तुम्हारा मन आनंद की तरफ
- 45:52खींचा जाएगा। कब वो पल आए कि मैं अकेला बैठूं
- 46:00क्योंकि अकेला होने में तुम्हें। जो आनंद मिलेगा, वह सुख में नहीं
- 46:04मिलता। सोने की लंका का मालिक रावण है,
- 46:18भगवान शंकर के सामने स्तुति करता है।
- 46:22क्या मांगता है वो? सोने की लंका का मालिक है और
- 46:28मांगता क्या है? सुनिए तुम्हें पता चल जाएगा।
- 46:33सुख और आनंद में क्या फर्क है? कदानिलंप निरझरी।
- 46:43निकुंज कोटरे वसन कथानिलिप निरझरी निकुंज कोटरे वसन वे मुक्त धुरमति
- 47:00सदा। सिरहस्थमंजली वाहन पिलोलो लोचनो
- 47:09ललामभाल लगन का शिवेति मंत्रमोचन। कथा सुखी वहम्या।
- 47:24छोटी सी कुटिया हो, गंगा का तीर हो और छोटी सी कुटिया के भीतर
- 47:32बैठा हे भगवान। शिव शिव करता हुआ मैं सिर के ऊपर
- 47:42अंजलि बंदी हो तुझे याद करता हुआ आँखों में अश्रुधारा टिपक रही हो
- 47:52मैं कब सुखी होऊंगा ऐसा करते करते क्या मानता है देखो?
- 47:59इससे तुम समझ जाओगे कि सुख और आनंद में क्या फर्क है?
- 48:06वेलोल लोल लोचन ले लाम बाल लग्न का श्वेतिमंत्र मुछ्रण कदा सुख।
- 48:14वहाँ में हम वो सुख कब मिलेगा? ये सुख तो मिल गया शेष।
- 48:24विचित्र तल्पजो भुजंगमोक्ति कसरजो कृष्टरत्नलोष्ठ।
- 48:34सुहेद्य पक्ष पक्षियों त्रिनारविन्द चक्षुसो प्रजा में
- 48:41ही महेंद्रयो समप्रवृत का कथा सदाशिवं बजा में।
- 48:55तृणार विंधुचक्षशो प्रजा में ही, महेंद्र मिट्टी के ढेले में और
- 49:04सोने की डेयरी में, शत्रुओं में और मित्रों में।
- 49:13साँप में और स्ण आभूषण हीरे जोहरातों में, मित्रों में और
- 49:25शत्रुओं में, राजा में और प्रजा में।
- 49:31संप्रवृत्त कथा सदाशिवम बजा में हम इसे ही कृष्ण भगवान ने समभाव
- 49:40कहा है। सुख में, दुख में, मृत्यु में,
- 49:43जीवन में ये सभी द्वंदों में जो समभाव रखता है।
- 49:49वो ही योगी है। यही मांगते हैं रावण जिनके तुम
- 49:57पुतले फूंकते हो, रावण के पुतले फूंकने वालों।
- 50:07तुम उसके सिर के एक बाल के बराबर भी गुण नहीं रखते।
- 50:14वह परम प्रकांड पंडित था। किसी किसी का कालचक्र कभी खराब आ
- 50:22जाता है, प्रत्येक व्यक्ति का आता है।
- 50:25ह्यूमनिस्ट एरर्स। यह कालचक्र कुछ गलत काम भी करवा
- 50:30देता है। हम इस डिस्कॅशन में नहीं जाएंगे,
- 50:36यही बात को समाप्त करके मैं मोड़ दे दूंगा।
- 50:43लंका का राजा। मांगता है कदा नीलिम्प निरझरी
- 50:51नेकुंजकोट रे वसन गंगा के किनारे एक छोटी सी कुटिया के भीतर में
- 50:59बैठा हुआ कब शिव शिव करूँगा। वे मुक्त दुर्मती सदा मेरे मन में
- 51:14कोई बुरा विचार ना आएगा श्रीहस्तमंजलि वाहन में सिर के
- 51:21ऊपर अंजलि बांधकर वे लो लो लोचन आँखें मेरी अशुरपुर होंगी।
- 51:28तेरा बिरहा में श्वेति मंत्रमुच्चरण कदा सुखी बाहन में
- 51:39हम मैं तेरी याद करके कब सुखी हूँ वो सुख कब मिलेगा ये सुख तो मिल
- 51:48गया। हीरे जोहरात हैं, प्रजा है, राज़
- 51:54है, साम्राज्य है, सब है, पवन पंखा झेलती है, काल पावे के साथ
- 52:04बंधा हुआ है। अमृत कुंड नाभि में है, लेकिन।
- 52:10और सुख नहीं है। अभी सोने के लंका है, बिलकुल
- 52:22तानाशाह है, कोई दूसरा प्रतिद्वंद्वी नहीं सब है।
- 52:30इसलिए मैं कहता हूँ तानाशाह सब कुछ हो जाएगा तुम्हारे पास रावण
- 52:36को देख लो, सोने की लंका थी, सब कुछ था, लेकिन मांगता क्या है?
- 52:49आनंद की एक बूंद के पीछे त्राहिमाम, त्राहिमाम करता है
- 52:55श्वेति मंत्र मुच्चरण कथा सुखी वहाँ मैं मैं कब सुखी होऊंगा ये
- 53:01सुखम, मिलके मुझे गद्दी का सुखम तुमने भोग लिया।
- 53:07लेकिन वह कौन सा सुख है जो रावण मांग रहा है?
- 53:10रावण के पास वो कुछ है जो तुम्हारे पास है भी नहीं फिर कौन
- 53:17सा सुख रह गया अशुता रावण से वो सुख तुम्हारे से भी अछूता है, याद
- 53:22रखो 1 दिन। तुम भी उस सुख को तलाशोगे और उस
- 53:29सुख को संत कहते हैं। आनंद उस आनंद की एक बूँद जब तक ना
- 53:35मिलेंगे तुम भटकते ही रहोगे, कोई भी भटकता रहेगा।
- 53:41वह राजा है या रंक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 53:46दोनों की दौड़ एक तरफ है। रंग भी उधर ही दौड़ रहा है।
- 53:53आनंद की तलाश में और राजा भी उधर ही दौड़ रहा है।
- 53:58आनंद की तलाश में और उस वक्त समभाव हो जाता है।
- 54:05जब व्यक्ति अपने अंत में जाता है तो समभाव हो जाता है।
- 54:13त्रिशीद विचित्र तल्प योर जंग मुक्ति कसर्च सर्प में और मोती
- 54:20में। रजिस्टर रत्न लोक स्थ्य हो,
- 54:23सुहद्र पक्षी, पक्षी हो, मिट्टी का ढेला और हीरे चहर रहा था
- 54:32किन्नार विंध्य चक्र सो प्रजा में ही मैं हूँ समान आँखों से मैं कब
- 54:39देखूंगा राजा और प्रजा को? सम पे वृत्त का कदा सदा शिवम
- 54:44पैजाम हम दुश्मन को और मित्र को राजा को और प्रजा को समान भाव से
- 54:51कब देखूंगा कब देखता है व्यक्ति जब उस तल पे पहुँच जाता है।
- 54:59जहाँ जाके भेद मिट जाता है, भेद की दीवारें ढह जाती हैं, वहाँ सम
- 55:08दिखाई देता है, सब सम यानी दूसरा दिखाई नहीं देता।
- 55:14भेद की दीवारें ढह गईं तो रह गया सिर्फ़ एक।
- 55:18वह जाकर उदघोष करता है। संत एको हम द्वितीय, नास्ती एको
- 55:25ब्रह्म द्वितीय नास्ती इस सारे जड़त में वो एक ही है एको मका।
- 55:37सभी ने कहा एक साथ है सब सद है। कबीर ने कहा ईशा वासी मदम
- 55:45सर्वोम्जात कींची जगत आम जगत वह एक ही सब जगत में विद्यमान है।
- 55:51किसने कहा कि दो हैं जब भेद घर जाता है?
- 55:58वेद बुद्धि बिखर जाती है, जो रह जाता है शेष वह एक ही रह जाता है।
- 56:08जो भी समाधि में से निकले वो यही कहेगा वह एक है।
- 56:19वह आनंद स्वरूप है, वह शांति का पुंज है, और उस आनंद की तलाश में
- 56:29ही तुम फिर रहे हो और उसी आनंद की तलाश की बात।
- 56:35इस श्लोक में करते हैं भगवान कृष्ण क्या कहते हैं भगवान कृष्ण
- 56:41कहते हैं तुने स्वय धर्म की तरफ जाना है?
- 56:45वो तो तेरा लक्ष्य है लेकिन कर्तव्य धर्म का पालन करके जाना
- 56:51है। भगोड़ा भणके नहीं जाना।
- 56:55अर्जुन चाहता है कि मैं भाग जाऊं, मुझे युद्ध न लड़ना पड़े, लेकिन
- 57:03कृष्ण कहते हैं भाग तो जानो, आखिर तो स्वयं धर्म में ही जाना होता
- 57:08है, तुम कितना ही छलकपट कर लो। बाहर की दुनिया के सारे ब्राह्मण
- 57:18के मालिक बन जाओ, यद्यपि बन नहीं सकते लेकिन बन जाओ सुभोज तो भी
- 57:27तुम तरफ न हो सको भाई क्यों? ओके, तुम उस एक में प्रविष्टि न
- 57:36हो सकोगे जब तक तब तक तुम तृप्त न हो सकोगे और तृप्ति के बिना संतोष
- 57:43के बिना तुम अधूरे हो। गो धन, गज धन वा ज धन।
- 57:51और रतन धन खान सभी प्रकार के धन हो, तुम्हारे पास गऊ, हाथी, सोना,
- 58:01हीरा, जवरात खदानें सभी बहुमूल्य वस्तुएं लेकिन।
- 58:10जब आवेश, संतोष, धन सब धन दूर समान जब संतोष धन आ जाता है, जब
- 58:21तृप्ति का धन आ जाता है तो सारे धन दूरी के समान हो जाते हैं।
- 58:29ये जैन धर्म के रुपयों को हाथ नहीं लगाते।
- 58:31रुपये कोई डंक नहीं मारते। ध्यान रखना ये दिखावा है जो दूर
- 58:41से रुपयों को इंकार करेगा वह पाखंड से क्योंकि उसको रुपये
- 58:47रुपये लगते हैं। जीसको रुपये लोष्ठ वत लगने लग गए।
- 58:55वह हाथ में मारेगा। कृपया भी लोष्ठ वत है, वह भी
- 59:03मिट्टी का ढेला है और मिट्टी का ढेला भी मिट्टी का ढेला है।
- 59:07दोनों में कोई फर्क न रहा। भेद मिटना चाहिए और भेद मिट जाता
- 59:13है स्वय धर्म में जाकर। लेकिन अर्जुन इसी तल पर बैठे बैठे
- 59:19भेद को मिटाना चाहते हैं। यही दुविधा है।
- 59:24अर्जुन चाहता है कि भेद तो मिटे, तुम भी चाहते हो कि भेद तो मिटे।
- 59:28क्योंकि इस भेद ने तुम्हें तड़पा रखा है।
- 59:32इस भेद ने तुम्हें जितना दुख दिया है, भेद बुद्धि ने इतना किसी ने
- 59:38भी नहीं दिया। तुम इस भेद बुद्धि के कारण तड़पते
- 59:44फिर रहे हो। कौन नहीं चाहता कि ये भेद बुद्धि
- 59:52खत्म हो जाए और मैं उस एक में उतर जाऊं जो रस रूप है सभी चाहते हैं।
- 1:00:01और अर्जुन भी इस वेला में चाहता है।
- 1:00:03युद्ध की इस वेला में दोनों तरह की तरफ की सेनाएं आमने सामने हैं।
- 1:00:12उदभोष हो चुका है, शंखनाद हो चुका है और अर्जुन चाहता है कि मैं भाग
- 1:00:19जाऊं। अर्जुन चाहता है कि कर्तव्य धर्म
- 1:00:23का पालन किए बिना में स्वयं धर्म में उतर जाऊं।
- 1:00:27कृष्ण कहते नहीं, यह भगोड़ापन है, कृष्ण से ज्यादा बढ़िया है।
- 1:00:38कर्म की फिलॉसोफी और किसी के नहीं हो सकते कर्तव्य कर्म जो कृष्ण
- 1:00:45सीखा सकते हैं उतना कोई नहीं सीखा सकता कृष्ण कहते हैं, शिवधर्म में
- 1:00:51तो तुम्हें जाना ही पड़ेगा। अंत अंत तो गतवा अंतः तुम्हारा
- 1:00:57वही कल्याण है। उसके बिना तो गुज़ारा है नहीं,
- 1:01:03लेकिन अगर तुम कहो कि अपने कर्तव्यकर्म को छोड़कर तुम स्वयं
- 1:01:08धर्म में उतर जाओगे तो ये गलत है। फिर उससे तुम कलंकित होगे।
- 1:01:17भगोड़े कहलाओगे लोग तुम्हारे मुँह पर थूकेंगे तुम्हारा नाम युगों
- 1:01:22युगों तक तुम अभीशब्द होते रहोगे। बताते हैं कृष्ण अलग अलग तरह से,
- 1:01:33अलग अलग डायमेंशन से, लेकिन उनका मतलब यही है।
- 1:01:41अगर तुम संसार में हो तो अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए स्वय
- 1:01:47धर्म में उतर जाओ। कर्तव्य कर्मों को करते हुए स्वय
- 1:01:55धर्म में उतर जाओ। स्वय धर्म में तो उतरना होता ही
- 1:01:59है और ध्यान रखना, जब तक तुम स्वय धर्म में नहीं उतरोगे, तब तक तुम
- 1:02:09इन संसार की बेड़ियों में उलझे ही रहोगे।
- 1:02:14ये गांठें खोल न पाएंगे। ये बेड़ियां तुम्हें झगड़े ही
- 1:02:18रहेंगी। स्वय धर्म में तो जाना ही होगा।
- 1:02:26इसलिए संसार के कतब कर्मों को करते हुए इस श्लोक का निचोड़ यही
- 1:02:34है। संसार के कर्तव्य कर्मों को करते
- 1:02:39हुए जो विधान जो विधि ने विधान तुम्हें कर्तव्य रूप में सौंप
- 1:02:48दिया तुमको करो और उसको करने के उपरांत।
- 1:02:56तुम स्वयं धर्म में उतर जाओ, अपने भीतर उतर जाओ और तुम्हारा अंतिम
- 1:03:04लक्ष्य है अपने भीतर जाना तो तुम्हें पड़ेगा ही देर अवेर।
- 1:03:16तुम्हें उस सुपरम प्यारे के पास जाना ही होगा।
- 1:03:23उसके करीब जाके बैठना ही होगा और उसमें मिलना ही होगा।
- 1:03:29बूंद सामान्य समध में एकाकार होना ही होगा उसके भीतर, लेकिन उससे
- 1:03:35पहले। कर्तव्य कर्मों को निभा जाओ उससे
- 1:03:43आँखें मिला लो मत होश हो जाओ, बेहोश हो जाओ, बेसुध ही हो जाओ।
- 1:03:54सुध बुध खो दो उसके फ्रेम में और कर्तव्य कर्मों को भी करते रहो।
- 1:04:08लोग मुझे कहते हैं बाबा आप गीता के श्लोक का थोड़ा अर्थ बदल देते
- 1:04:16हो बिल्कुल ठीक। वक्त का परिवेश बदल जाता है।
- 1:04:25आज क्षेत्रीय नहीं रहा, आज युद्ध नहीं हो रहा।
- 1:04:31इस परिवेश में जो इस श्लोक का अर्थ हो सकता है।
- 1:04:38वो कृष्ण खुद ही बोल रहे हैं, मैं उसमें कोई तरमीम नहीं कर रहा हूँ।
- 1:04:44आज की गीता अगर इसको शब्द देना होगा शीर्षक तो शीर्षक देना आज की
- 1:04:55गीता है। वक्त के परिवेश में आज जो इस
- 1:05:02श्लोक का अर्थ हो सकता है वह कृष्ण तुम्हें समझा रहे हैं ध्यान
- 1:05:09रखना ये क्या बोला जा रहा है आज के परिवेश में?
- 1:05:17इस शलोक का जो अर्थ हो सकता है वो ही बोल रहे हैं आपसे अपनी ही गीता
- 1:05:26का श्लोक का अर्थ मैं बीच में से हट जाता हूँ।
- 1:05:37क्योंकि आज के परिवेश में कृष्ण क्या अर्थ करेंगे, इसका समय कहीं
- 1:05:42उपलब्ध नहीं होगा, यह कृष्ण ही बता पाएंगे।
- 1:05:48इसलिए मैं कहता हूँ पुराने अर्थों को व्याख्यायों को आग लगाता हूँ।
- 1:05:55आज कृष्ण जो आज के संदर्भ में बोलते हैं वो सुन लो यही आज का
- 1:06:02शब्द अर्थ है हो जाओ उन पुराने अर्थों का थोड़ा बहुत फर्क तो
- 1:06:09आएगा, ज़माना भी तो बदलता है रोज़।
- 1:06:14वक्त का परिवेश बदल जाता है तो अर्थ भी बदलने पड़ेंगे।
- 1:06:22आज मैं वही बोलेंगे जो बोल सकता हूँ।
- 1:06:26आज के जमाने के हिसाब से अन्यथा कुछ नहीं बोलेंगे।
- 1:06:34तू भी बदल ए, फलक ज़माना बदल गया मेरी ही गीता के श्लोकों का अर्थ
- 1:06:45जो आज हो सकता है, वह मैं कृष्ण ही बोल रहा हूँ।
- 1:06:53इसको ध्यान से समझ लेना और अपने भीतर उतार लेना।
- 1:07:01श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरा। नाथ, नारायण, वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:07:24गोविंद हर। अनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:07:46गोविंद हरहे मुरा। हे नाथ नारायण वसुथ।
- 1:08:13सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे है नाथ?
- 1:08:29नारायण वसुदेव, श्रीकृष्ण गोल हर मुरारी।
- 1:08:49हे नाथ नारायण वासु दे।