Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Jan 26 - आखिर अपने भीतर उतरें कैसे? वैज्ञानिक ढंग से समझें! | बाबाजी का सबसे गहरा प्रवचन
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- 0:14बाबा जी परम देवकी नंदन सहगल बाबा जी, मैंने पहली वीडियो मत ढूंढो
- 0:33भगवान को। से लेकर आज तक की आपकी सभी वीडियो
- 0:42को दो दो बार सुना है। सारे शॉट्स मैंने देखे हैं इससे
- 0:52पहले। मैं किसी अन्य गुरु के शरण में
- 0:55था, लेकिन जीस दिन से मैंने आपको सुनना शुरू किया बस सिर्फ और किसी
- 1:05को नहीं सुना आप अक्सर कहते हैं। अगर थीम रूप ने समझा जाए तो आप
- 1:17कहते हैं बाहर से नाता तोड़ो अपने भीतर उतरो, बस यही नहीं समझाता अब
- 1:30एक बात। चित को उलझाई खड़ी है।
- 1:36यह अपने भीतर ही कैसे उतरे, अपनी ही भीतर कैसे उतरे, यह नहीं
- 1:42समझाता। कृपा करके आप मेरा ये।
- 1:50पहला और अंतिम प्रश्न सुलझाने का कष्ट करें।
- 2:00कई प्रश्न हैं। इसी तरह के सभी संतों ने कहा वह
- 2:07भीतर से मिलेगा। बाहर मत ढूँढो काहे रे?
- 2:21बन को जन जा होय। काहे रे बन खो जन जार सर्ब व्यापी
- 2:45सदा अल पा आ सर्ब व्यापी। सदा अले तोहे संग समा का ए रे बन
- 3:09को जन जा। सभी संतों ने भी कहा है जीतने भी
- 3:19मैंने ग्रंथ पढ़े, उन सब में यही बात लिखी है, लेकिन आज तक किसी
- 3:29व्यक्ति ने। किसी संत ने यह नहीं बताया कि
- 3:36अपने भीतर उतरे कैसे हैं? बस एक अड़चनें यही है।
- 3:47हमारी सभी मान्यताएँ टूट गई। भ्रम टूट गए, भय टूट गए, अब एक ही
- 3:58बात जो दिमाग में फंसी हुई है, अपने भीतर जाए तो कैसे जाए?
- 4:08तो लीजिए। आज हम इसी के ऊपर आपका आखिरी
- 4:15प्रवचन कर देते हैं। देवकी नल समझना जैसे एक जहाज है।
- 4:34एक जहाज हमारी धरती से ऊपर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के भीतर
- 4:41घूमता है, चक्कर लगाता है, रोटेट करता है, वह धरती पे नहीं करता।
- 4:54रोज़ वायु दान उड़ते हैं, रोज़ देश विदेशों की लोग सैर करते हैं,
- 5:03काम धंधा करते हैं। लेकिन यह वायु जान नीचे क्यों
- 5:12नहीं करता? थोड़ी देर के लिए ठहरी है सोचे के
- 5:25वायु जान अगर धरती का चक्कर लगाना शुरू कर दे।
- 5:31पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के भीतर लेकिन वह गिरेगा नहीं, ऐसा क्यों
- 5:45होता है? ऐसा होता है कि पृथ्वी का
- 5:55गुरुत्वाकर्षण बल थोड़ा है और आपके वायुयान की स्पीड ज्यादा है।
- 6:02गति ज्यादा है। ज्यादा गति से वह आगे बढ़ जाता
- 6:07है। गुरुत्वाकृष्ण बल उसे नीचे तो
- 6:11खींचना चाहता है। मैं तो हर वक्त अपने काम में जुटा
- 6:20हुआ है, लेकिन फिर भी भाई जन नीचे क्यों नहीं करता?
- 6:29वायु जान की स्पीड ज्यादा होती है अगर वायु जान का बाइ लॉट स्विच को
- 6:45ऑफ कर दे, जो स्विच कल तक हुआ तो वायु जान।
- 6:55चलेगा नहीं। अब फिर क्या हुआ?
- 7:05पृथ्वी का गुरुत्वा कृष्ण बल जो पहले भी खींच रहा था, अब उसे
- 7:09खींचेगा और वह वायु जान। धरती पर आण गिरेगा होगा की नहीं
- 7:18होगा क्यों नहीं गिरा हुआ एकदम क्योंकि वह अपनी ही गति से चल रहा
- 7:27था उसका ईंधन। उसे चला जा रहा था ईंधन खत्म हो
- 7:40जाए या पायलट जानबूझ के या किसी कारणवश जहाज को बंद कर दे।
- 7:53जहाज रुक जाए आगे जाने रुक जाए गुरु तो आकर्षण बल तो उसे नीचे
- 8:01खींच ही रहा है। जहाज का क्या होगा, नीचे गिर जाए
- 8:09यही आपके साथ हो रहा है। ऐसा टीवी आप एक बड़ी सी चट्टान को
- 8:29ऊपर ले जाइए। 100 किलोमीटर ऊपर ले जाइए बड़ी सी
- 8:37चट्टान। और उसके ऊपर से सारे बल हटा
- 8:44लीजिए, पत्थर को बेसहारा छोड़ दीजिए आसमान में।
- 8:57100 किलोमीटर ऊपर धरती से वह पत्थर ऊपर खड़ा है और आप उसे
- 9:07सहारा दे रहे थे। आप उस सहारे को हटा लो, व्हाट विल
- 9:15हैपन? क्या होगा वह पत्थर धम से नीचे आ
- 9:24के पृथ्वी पर गिर जाएगा, ये दो धारणा मैंने नहीं।
- 9:35आपका अहंकार आपको इतने ज़ोर से पकड़े रहता है।
- 9:42अहंकार की पकड़ मजबूत है। परमात्मा तो हर वक्त अपने प्यारे
- 9:50बच्चे को। आलिंगन वध करना चाहता है, अपनी
- 9:57गोद में सुलाना चाहता है, लेकिन तुम हो तुम अपने अहंकार को पकड़े
- 10:07ही रहते हो, पूरा ज़ोर लगा देते हो कि कहीं हमारा अहंकारण टूट
- 10:13जाए। सारी धरती इसी दुख के कारण दुखी
- 10:19है। दूसरे धारण मैंने जहाज के फ्यूल
- 10:31खत्म हो जाये या पायलट खुद से बंद कर दे।
- 10:38तो जहाज जो आगे बढ़ रहा था, जो उड़ रहा था, रुकना बंद हो जाएगा,
- 10:42उड़ना बंद हो जाएगा। थीम क्या हुआ?
- 10:50जब भी कोई चीज़ बेसहारा ठहरती है इसको कोर्स से सुन।
- 10:58जब भी कोई चीज़ बेसहारा ठहरती है पत्थर के एग्जाम्पल में आपने
- 11:07पत्थर को सहारा दिया हुआ था, जैसे ही सहारा हटाया पत्थर जमीन पर
- 11:15करके। वायुजान के एग्ज़ैम्पल वायुजान को
- 11:23पायलट से हरा रहा था। पायलट ने स्विच ऑफ कर दिया, जहाज
- 11:28ठहर गया और जहाज नीचे कर गया ये दोनों।
- 11:34घटनाएं कब घटी? जब दोनों चीजें बेसहारा थीं और
- 11:44दोनों चीजें ठहराव में थीं। परमात्मा तो तुम्हें अंतश में
- 11:57बैठा हुआ। कब कब खींचे जा रहा है?
- 12:05तुम ही अपने आप को बजाए चले जा रहे हो तुमने ही अपने आप को छोड़ा
- 12:16नहीं क्या चीज़ है? जो भाई बहन को चलाती हैं, जो इतनी
- 12:28बड़ी चट्टान को नीचे नहीं करने देती, चट्टान को जो नीचे नहीं
- 12:34गिरने देती वो पकड़। आपने कोई अवलंबन दे दिया, कोई
- 12:40सहारा दे दिया, जिससे वह चट्टान 100 किलोमीटर ऊपर होते हुए भी
- 12:50गुरुत्वाकृष्ण बल तो लग रहा है, लेकिन आपकी पकड़ ज्यादा मजबूत है।
- 12:59जैसे ही आपकी पकड़ कम मजबूत हुई, वह चट्टान तत्व क्षण नीचे गिर
- 13:08जाएगा या पायलट स्टॉप कर दिया। फ्यूल बंद कर दे।
- 13:19उसका जहाज को आगे चलने से रोकने में जीस गति का जरूरत था उसे बंद
- 13:34कर दे। तो जहाज ठहर जाएगा।
- 13:38जब भी तुम ठहरे होते हो और बेसहारा होते हो तब तुम उस
- 13:43परमात्मा की गोद में जगते हो। इन अलफाजों को फिर से सुन लेना जब
- 13:52भी तुम बेसहारा होते हो उसे जट्टान की तरह।
- 13:58और ठहरे हुए होते हो उस जहाज की तरह और तत क्षण तुम नीचे करने
- 14:07शुरू हो जाते हो, तुम्हें कोई थामने वाला नहीं होता, तुम्हें
- 14:13कोई आगे चलाने वाला नहीं होता। सब शहरी चुक गए सब बल समाप्त हुआ,
- 14:19सब गति ठहर गई मौन हो गया सब कुछ, बट विल हैपन।
- 14:34जहाज और चट्टान गुरतवाकृष्ण बल तो सदा से ही खींच रहे थे दोनों को,
- 14:42लेकिन न जहाज गिर रहा था, न चट्टान गिर रही थी, फिर उनको
- 14:47गिरने से कौन बचा रहा था पकड़? या जहाज का फ्यूल या फ्यूल आपका
- 14:57अहंकार है अगर जहाज का फ्यूल समाप्त हो जाए या उसके फ्यूल को
- 15:05बंद कर दिया जाए। आप किसी वक्त भी।
- 15:13उस पर म आनंद की सत्ता में डूब सकते हो किसी क्षण भी जीस क्षण भी
- 15:18आप चाहो मैंने कहती बार बार ये दो वरचनें हैं ना तो आप बेसहारा होना
- 15:27चाहते हो। और सभी शास्त्रों में लिखा है सभी
- 15:34सहारों को छोड़ दो और कथाएं कहीं गई।
- 15:40द्रौपदी जब तक का सहारा खाक रही थी तब तक भगवान नहीं आए।
- 15:51जब सहारे समग्र हो गए तो उसने पुकार लगाई तुम कहाँ गए महाराज
- 16:00करो, मत देरी दुखहारों द्वारकानाथ शरण में देरी।
- 16:10तुरंत श्री कृष्ण प्रकट हो गया। ये कथाएँ हैं यह हकीकत है तुम इस
- 16:18पचड़े में बहुत से लोग अपनी शक्ति को इन्हीं पचड़ों के अंदर लगा रहे
- 16:26हैं। क्या महाभारत हुआ था, क्या रामायण
- 16:30हुई थी या सिर्फ उपन्यास है, उपन्यास है या कथा है या सत्य है?
- 16:38इससे तुमने क्या लेना है? इसके भीतर जोरा से है।
- 16:45जो सिम्बोलिक रेफ्रिजरेशन है इसकी अब्रीविएशन के रूप में तुम्हें
- 16:50बतलाई गई है। प्रतीकात्मक चिन्ह के रूप में जो
- 16:53हमें बतलाई गई है, अगर उसको तुमने समझ लिया।
- 17:02तो तुम अपने अहंकार को आगे बढ़ने से रोक दोगे।
- 17:06तुम ठहर जाओगे, तुम दौड़ नहीं लगाओगे।
- 17:14अभी तो सारी दुनिया दौड़ी जा रही है और तुम भी दौड़ी जा रहे हो।
- 17:18यह एक लम्बी। कभी न समाप्त होने वाली मैराथन की
- 17:23दौड़ है। दौड़ कभी खत्म नहीं होती क्योंकि
- 17:32यह दौड़ का दायरा गोल है। गोल गोल तुम घूमते रहोगे?
- 17:39कोलू के बैल की तरह कोलू के बैल की आँखें बंद होती।
- 17:44पट्टी चढ़ा देता है तेली सुबह से शाम तक वह बैल बहुत जगता है और
- 17:54सूरज ढलते ढलते थक जाता है। सोचता है कि मैं बहुत दूर निकल
- 18:00गया होगा लेकिन जब आँखें खोलता है।
- 18:03तो पाता है उसी मकान में हूँ, उसी घर में हूँ।
- 18:07कोलो के साथ बँधा हुआ आपने कहा देवकीननंद?
- 18:24आपने मार्ग दिखाया, आपने बहुत से भ्रम तोड़े, मान्यताएँ और
- 18:31मूढ़ताएँ जो हमने थोक ली थीं, वो तोड़े वासनाएँ स्मृतियाँ
- 18:41कल्पनाएँ। जिनसे हम चिपके हुए थे उनसे अपनी
- 18:48निजात दिलाई, लेकिन फिर भी हम क्यों नहीं पहुंचते?
- 18:53अपने ही भीतर क्यों नहीं उतर पाते?
- 18:56क्या है वो जो अवलंबन बनकर हमें रोकता रहता है?
- 19:03और हम समझते हैं प्रभु अगर आप नहीं समझा पाए तो फिर पक्का यकीन
- 19:10है कि आने वाला कोई भी संत हमें नहीं समझा पाएगा।
- 19:17कृपया उत्तर दीजिये। उत्तर दीजिये उत्तर दीजिये आपकी
- 19:25बड़ी कृपा ओके उत्तर आपको दे दिया है उत्तर मैंने।
- 19:40अज्ञात पर छोड़ दो सभी दौड़ों को समाप्त करके अज्ञात पर छोड़ दो,
- 19:55दौड़ गई संशय मेटा बस तू ठोर की ठोर?
- 20:04वह बैल समझता है सुबह से शाम तक कोलू का बैल कि मैं ना जानी कितने
- 20:11किलोमीटर चल गया होगा, लेकिन गोल गोल घूम रहा है।
- 20:19दौड़ मिटटी सं सह गया। जब आँखें खुलती हैं पट्टियाँ खोल
- 20:26देता है तो वह पाता है मैं वही हूँ वस्तु ठोर के ठोर, तुम भीतर
- 20:38कैसे जाओ। यह तुम समझ नहीं पाए और कोई संत
- 20:44तुम्हे समझा नहीं पाए सरलतम तरीके से।
- 20:47लेकिन समझाए तो सभी ने बस आप समझ नहीं पाए क्योंकि आपके ढंग से
- 20:54सरलतम व्याख्या नहीं हुआ। इस तरह सही फर्क समझाए।
- 20:59सभी संतो ने किसी ने समर्पण कह दिया।
- 21:03किसी ने प्रेम कह दिया किसी ने पकड़ छोड़ो ये कह दिया किसी ने
- 21:11दान कह दिया छोड़ो, पकड़ छोड़ो, दान करो अपने अपने ढंग से सभी
- 21:18संतों ने बताया लेकिन सरलतम ढंग से किसी ने ने बताया।
- 21:22आपने कहा पुत्र वैज्ञानिक ढंग से मुझे बताओ तो मैंने आज वैज्ञानिक
- 21:28ढंग से आपको बता दिया, पहले तो भागना बंद करो और भागने की
- 21:41परिभाषा सुन लो। दौड़ चाहे संसार की हो, चाहे
- 21:55परमात्मा को पानी की हो, दौड़ तो दौड़ ही होती है, दौड़ में आपका
- 22:04चित भागता है और जब भागता है चित। तो गाड़ी में बैठे हुए आप जब आपको
- 22:12भ्रम हो जाता है कि पेड़, पौधे, सूर्य, सितारे या स्टेशन या खड़े
- 22:17हुए लोग सब भाग रहे हैं, ऐसा भ्रम पैदा होता है।
- 22:22भ्रम पैदा होता है दौड़ से। तुम मन के ऊपर सवार हो गए हो और
- 22:31मन दौड़ रहा है तुम उसके ऊपर सवार हो इसलिए तुम भी दौड़ रहे हो दादू
- 22:39दूजा को नहीं, दूजी मन की दौड़ दौड़ मिट्टी सुन सह गया कह तो रही
- 22:47है। और क्या कहें तुम्हें, लेकिन तुम
- 22:51साइंटिफिक वे से समझना चाहते थे कोई बात नहीं है आज साइंटिफिक
- 22:56ज़माना है, तो साइंटिफिक ढंग से मैं समझा देता हूँ दौड़ में टी सन
- 23:03से दौड़ो मत ठहर जाओ। ठहर जाओ, लेकिन ठहर कर भी अब वह
- 23:13पत्थर तो ठहरा ही हुआ है, चट्टान तो चट्टान तो ठहरी ही हुई है,
- 23:23बाजू जान चल रहा था। उसको तुमने बंद कर दिया तुम पायलट
- 23:30हो, लेकिन चट्टान तो ठहरी हुई है तो पहला सूत्र है ठहरों चट्टान की
- 23:41तरह बजाओ। अब हम सारा फोकस चट्टान पे करते
- 23:46हैं, वायुयान का ऑफ कर दो मोड आओ, चट्टान की तरफ ठहर जाओ सबसे बेदा
- 23:57दूसरा चट्टान क्यों ठहरी हुई है? क्योंकि अवलंबन है।
- 24:05किसी सहारे को पकड़े हुए है या किसी सहारे ने उसे पकड़ा हुआ है।
- 24:10तुम्हारी मान्यताएँ तुम्हारे मोह, तुम्हारी धन, संपत्ति पदवी, मान
- 24:18सम्मान। हज़ारों हज़ारों मान्यताएँ
- 24:22तुम्हें पगड़ी हुई है? लाखों लाखों मान्यताएँ तुमने
- 24:28माननी हैं बिना जाने और यह सब तुम्हें पकड़े हुए हैं तो पत्थर
- 24:37तो है। चट्टान तो ठहरी हुई है आज सामान
- 24:42में और नीचे वह गिरती नहीं वायु या नीचे गिर जाएगा जैसे ही बंद
- 24:55होगा पायलट उसके। चाबी को बंद कर देगा, ईंधन आना
- 25:02बंद हो जाएगा और वायु जान ठहर जाएगा और ठहरते ही नीचे गिरना
- 25:10शुरू हो जाएगा। दम से गिर पड़ेगा लेकिन चट्टान
- 25:15दूसरा उदाहरण मैंने दिया चट्टान। क्योंकि परिपूर्ण आपको परिपूर्ण
- 25:23हाल होना चाहिए, संवेक्षण मिलना चाहिए।
- 25:27परिपूर्ण भाई जान तो गिर गया, ठहरते हैं, लेकिन चट्टान तो नहीं
- 25:35घरी ठहरी हुई है। वो तो कहीं गति नहीं कर रही तो
- 25:40फिर दूसरी चीज़ क्या है? पकड़ तुमने समृतियों को पकड़ा हुआ
- 25:46है। कभी अतीत में चले जाते हो, कभी
- 25:49भविष्य की योजनाओं में छा जाते हो, कल्पनाओं में उलझ जाते हो,
- 25:55इसलिए मैंने कहा। कल्पनाओं से युक्त व्यक्ति कभी
- 26:00नहीं पहुंचेगा। विवाह कुल दशरथ के लगे।
- 26:12रथ के पथ वन, फिरे रामसिया दिन। रे व्याकुल 10 रथ के लगे रथ के
- 26:49विहीन। वेदनाते अय्यम उसकी।
- 27:12सूरत पे आए दशरथ का मोह उसे बांधता है, सुमंत को वह चला देता
- 27:25है। के राम, लक्ष्मण और सीता को तुम
- 27:32ले तो जाओ और थोड़ी दूर जाके कह देना कि बस हम घर से बाहर चले गए।
- 27:44और 14 घड़ी बात वापस आ जाना एक घड़ी को मान लेना कि 1 दिन के
- 27:53बराबर है 24 मिनट को मान लेना कि 1 दिन के बराबर है।
- 28:03सुमंत ने राम जी से ये बात कही। बस 14 घड़ियाँ हो गयी।
- 28:1514 वर्ष बीत गए। एक घड़ी एक वर्ष के बराबर होती
- 28:19है। राम हसे राम कहते माल सुशीन के
- 28:35हक्षमा सामंत कहते हाँ, माल। आपके पिता व्याकुल मन से अधीर
- 28:45होकर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। जब गंगा पार करने लगे तो केवट ने
- 29:12कहा मैं आपके पांव धोलो राम ने कहा नहीं क्या जरूरत है पांव के
- 29:22धूल फिर लग जाएंगे, आगे भी तो हम नहीं जाना।
- 29:31ये केवट कहते हैं, हे प्रभु मैंने सुना है कि आपने पत्थर अहिल्या के
- 29:40ऊपर पांव रख दिया था और वह तो स्त्री बन गई थी।
- 29:47यह नाव तो मेरी रोज़ी रोटी का साधन है।
- 29:50अगर आप इसको छू देते हैं और अगर मेरी नाक स्त्री बन गई तो फिर
- 29:59मेरा रोज़ी रोटी का, मेरे बच्चे भूखे घर जा के रामना से।
- 30:10मिदनाते लेख किसी समझ न आते हैं। आराम, निचरण, झुलवाएं और कैवट ने
- 30:42पांव पखारे, कैवट ने वो जल सभी परिवार में बांटा जल पखार के वो।
- 30:53जल पिया क्योंकि राम जैसे व्यक्ति के चरण में से ऐसी वेव्स सारे
- 31:08शरीर के पोर पोर में से ऐसी वेव्स निकलती हैं।
- 31:13जो डेल्टा वेव से युक्त होते है भरपूर मात्रा में और ये 20 पोर ही
- 31:20हैं। 10 हाथ के 10 पोर के तो चरण पखारी
- 31:34मैं जब राम जी का रोल किया करता था।
- 31:39तो हमारे यहाँ पर मदन लाल जी घड़ी साज थे, घड़ियाँ ठीक करते थे, वो
- 31:47जिद्द पर अड़ गए, बहुत से लोग अड़ गए जिद्द पे कि केवट हम बनेंगे
- 31:53पाम हम पकारेंगे। बस उन्हें इतना पता है कि कल्याण
- 32:00हो जाता है। पंप खर यह भी बहुत है सिम्बोलिक
- 32:06रिप्रजेंटेशन। जो बच गए वो भी काफी है हमने
- 32:11फॉर्मूला और कैसे होता है ये समझ के क्या करना है?
- 32:18हमें फल मिल जाए। इतना ही काफी है तो जिद करके वह
- 32:30केवट का रोल ही है। बहुत से लोग नाराज भी हो गए
- 32:34क्योंकि केवट का रोल सारी रामायण में एकमात्र ऐसा रोल है।
- 32:43जो राम के कारण धन्य हो गया क्योंकि उसने पांव पकड़ा है और
- 32:49किसी ने पांव नहीं पकड़ा है। तो मैं रामजी के रोल में था, हम
- 33:04श्वेत बूट डाला करते थे, कपड़े के चमड़ा नहीं पहनते।
- 33:08उन दिनों में उसने बूट उतारे जुराब, श्वेत जुराब और बग्वा।
- 33:22धोती वगैरह जब चर्न पकारने लगा किसी धामा।
- 33:37छोटा सा पात्र था। उसके पास पानी भर के लेके आया था,
- 33:42सिंपल पानी था, बाहर से लेके आया था पर उसने अच्छी तरह से पांव
- 33:49धोए। जीस दिन पांव पखारने होते थे केवट
- 33:58पाले थे उस दिन जब मैं जाता था रमला करने।
- 34:01तो पांव को अच्छी तरह से धो के जाता था कि कहीं को रेत वगैरह न
- 34:05लग जाए। कोई बैक्टीरियल इन्फेक्शन वगैरह
- 34:14ऐसा सोच के जाया करता था और जब उसने चरण पखारे।
- 34:23और मैंने बड़ी श्रद्धा से रोल किया।
- 34:32लीला की शुरुआत में राम और लक्ष्मण पर्दे के पास जाके नमन
- 34:39होते हैं। लक्ष्मण को तो पता नहीं होता।
- 34:45मैं राम जी से आह्वान करता हूँ के हे प्रभुराम मैं इस शरीर को छोड़
- 34:52के थोड़ी देर बाहर हो जाता हूँ जब तक तू अपनी लीला को खेल ले और
- 34:59सचमुच में वो है। लीला श्री राम ने खेली।
- 35:06आप उसे भावनाओं का सैलाब भी कह सकते हो, लेकिन नहीं, मैं एक
- 35:17साइंटिफिक मंथ हूँ। भावनाओं का सैलाब जब होता है वो
- 35:23मुझे पता चलता है, लेकिन उसमें यथार्थ नहीं होता।
- 35:27ये बात ध्यान में रखो भागनाओं का सैलाब दूर रह जाता है मुझसे और
- 35:32यथार्थ दूर रह जाता है यह दोनों में बेलगाव होता है तो उचरण
- 35:41पखारे, उसके बाद और सभी पीते हैं थोड़ा थोड़ा।
- 35:47चुलू भरी पिली चुलू भरी पिली जीतने भी एक्ट्रेस हैं।
- 35:51बाकी कुछ श्रोतागण भी आ जाते हैं। दर्शक दीर्घा में से भी लोग आ
- 35:57जाते हैं तो मदन लाल गढ़ी साधने जब वो वह पानी पिया।
- 36:07थोड़ा सा पीना था उसने लेकिन मैं सारा पी गया किसी को उसने एक मूंद
- 36:18भी नहीं हैरानी की बात सभी उसे कहते ये तुमने क्या किया?
- 36:26ये तो घोर अनर्थ किया तुमने। मदन लाले शब्द बोलते हैं कि
- 36:35तुम्हें पता नहीं ये क्या है? उस धामे को उस पात्र को जीवा से
- 36:45चाटा गया। थोड़ा सा पानी तो रह जाता है ना
- 36:48लगा हुआ बर्तन गीला रह जाता है तो वह पानी शहद की तरफ बैठा था।
- 37:06यह करामत से मैं खुद भी दंग रहे। क्या जब बाद में मुझको बताया क्या
- 37:17कुछ ऐसी बात है जो विज्ञान शायद कभी पकड़ ना पाए?
- 37:24और अगर सत्य में बोलूं तो विज्ञान कभी भी किसी विवाद की तह तक नहीं
- 37:29जा पाएगा। उसके जो निष्कर्ष होंगे वो ऊपरी
- 37:34ऊपरी सत्य ही होंगे, वास्तविक नहीं होंगे।
- 37:39विज्ञान कुछ भी खोजले बना कुछ भी नहीं सकता।
- 37:43ही कैन ओनली इन्वेंट ही कैनट कैरिएट यह लिख लीजिए आप खोज तो
- 37:53विज्ञान से कुछ कर लेगा लेकिन कैरिएट रेत का एक कण भी नहीं कर
- 38:00सकेगा। यही विज्ञान की अक्षमता है।
- 38:21तो दर्शक ने कहा, सामंत से कि इनको वापस लेके आना समझा बुझा के
- 38:28और दशरथ इंतज़ार कर रहे हैं जब थोड़ा सा।
- 38:35शोर होता है और दरवाजे की तरफ देखते है।
- 38:39राम आ गए वापस यह चिपका हटे हैं। हमें बिलाशक राम जैसा व्यक्तित्व
- 38:52पैदा होना असंभव है। राम जैसा मर्यादा पुरुष होतम पैदा
- 39:02होना असंभव है, यद्यपि उसके जीवन में विशेषतया बाद के क्षणों में
- 39:10आप कुछ शत्रुटियां पाओगे। लेकिन वह मर्यादित वृक्ष मर्यादित
- 39:19ही रहा। अंत तक उसने मर्यादा कभी नहीं
- 39:22खोई। कौन पकड़े हैं आपको?
- 39:35दशरथ को कौन पकड़े हो आप मोह पुत्र महू और पुत्र महू क्या करे?
- 39:44राम प्यारे हैं राण? इतने प्रिया है।
- 39:57जन जन के प्रिया राम लखन सिया बन को जाते हैं।
- 40:14हो वेदनाते लेख किसी समझ नाते हैं।
- 40:32विध्ना के लेख को तुम समझ पाओगे नहीं, बहस कर सकोगे सर और विध्ना
- 40:40के लेख बहस से करने के योग्य नहीं।
- 40:44तुम इस पर बहस कर ही नहीं सकते। यह इतना शानदार कृति बना दिया
- 40:50उसने। कि तुम्हें अचंभित होना चाहिए।
- 40:55यू शुड वंडर तुम्हें बहस नहीं करना चाहिए।
- 41:03इट इस नॉट ए डिस्कशन ऑफ मैटर ऑफ डिस्कशन इट इस मैटर ऑफ वंडर।
- 41:11क्या तुम्हे आश्चर्य नहीं होता इतना सब देखकर इतना फैला इतना
- 41:15पसारा इतना विराट इतना घनत्व सूरज 1,33,300 धरतियाँ एक सूरज में आ
- 41:29सकती हैं? 1,33,000 यह पृथ्वीगृह है जिसके
- 41:42ऊपर हम रह रहे है इस धरती के ऊपर रहने वाला मानव कहता है मैं हूँ
- 41:51तो मुमकिन है। और उसका वजूद क्या है?
- 41:57बस उसने कभी इस फैलाव को आँखें खोलकर देखा नहीं।
- 42:01इसे ही अंध कहते हैं अंध मंद बुद्धि मंद बुद्धि ही ऐसी बातें
- 42:10कर सकते हैं बृहस्पति जैसा। ग्रह हमारी पृथ्वी जैसी 1300
- 42:20पृथ्वी को समा सकता है। 1300 1300 पृथ्वी और सूरज में
- 42:3113,00,000। सूरज में 13,00,000 पृथ्वी आ सकते
- 42:38हैं और इस पृथ्वी के ऊपर तो मरक क्या वसूल है ज़रा गणना करके
- 42:47देखो। क्या एक मच्छर के बराबर नहीं
- 42:55मच्छर तो बहुत बड़ा है? पृथ्वी में तुम्हारा वजूद क्या
- 43:00है? भगवान राम को अपने से छोटा दिखाने
- 43:04वाले मूड हो, तुम्हारा वजूद क्या है?
- 43:15ये सब पृथ्वी की बात कर रहा हूँ। मैं इस पृथ्वी का व्यास और जो
- 43:22कहते हैं मैं हूँ तो मुमकिन है उसका व्यास आप मिलाकर देखो।
- 43:31आइए इसको गणितीय रूप से समझने की चेष्टा करते हैं।
- 43:36पृथ्वी की आज कुल आबादी आठ अरब है।
- 43:45एक व्यक्ति का औसत घण होता है 0.07 घनमीटर जीरो पॉइंट।
- 43:5407 आठ अरब की आबादी है और हमारी पृथ्वी के अनुपात से कितना
- 44:09व्यक्ति आ सकता है? इसमें 10।
- 44:13और उसके ऊपर 22 यानी 10 इंटू 22 जीरो लगा दो साथ में आज पृथ्वी पर
- 44:24जन्म संख्या 8000 है। पृथ्वी के आयतन में 10 इंटू 22
- 44:332020 लगा दो। इसमें यानी आज की जनसंख्या से एक
- 44:41ट्रिलियन गुणा जितनी आज की जनसंख्या है।
- 44:50उसे एक ट्रिलियन गुना व्यक्ति समझ सकते हैं तो तुम्हारी औकात कितनी
- 44:57है? मोदी है तो मुमकिन है कहने वालों
- 45:06तुम्हारी औकात क्या रह गई? ये कौन बोलता है?
- 45:12अहंकार बोलता है? आज की जनसंख्या आठ अरब 10 इनटू
- 45:2722। ट्रिलियन लोग अगर हो जाएं तो वह
- 45:34पृथ्वी एक पृथ्वी में सुनाएंगे और 1300 पृथ्वी बृहस्पति में समा
- 45:41जाएंगे। और 13,00,000 पृथ्वी सूरज में समा
- 45:47जाएंगी तो हमारी औकात बताओ क्या है?
- 45:5313,00,000 पृथ्वी सूरज में समा जाएंगी और ऐसे सूरज?
- 46:08जिनकी गणना नहीं की जा सकती। तुम तो कितनी गैलेक्सीज़ हैं इसकी
- 46:19गणना तुम तो ब्रम्हंडों की गणना नहीं कर सकते इसलिए तुम्हें।
- 46:28मंदबुद्धि कहते हैं तुम मंदबुद्धि हो?
- 46:34हर इवेंट को बड़ी ब्लंट करके बताते हो।
- 46:43तुम्हें पता नहीं कबीर कितनी बड़ी बात कहा है।
- 46:51और ये झटका देती है आदमी को, लेकिन तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ
- 46:57इतनी चौड़ी नहीं हैं। कबीर कहते हैं मैं कहता आँखों से
- 47:05तुम कहते कागज़ की लिखे। अगर पृथ्वी खोखली होती और उसके
- 47:18भीतर ईंटों की तरह आदमी भरे होते तो आदमी जगह की कमी के कारण कोई
- 47:26भी आदमी नहीं मरता इतनी बड़ी है। पृथ्वी सिर्फ पृथ्वी की बात करता
- 47:32हूँ। एक ट्रिलियन 100 अरब का होता है
- 47:36100 अरब यानी करीब करीब हमारी भारत की जनसंख्या से 80 गुना
- 47:44चाहता है। भारत की जनसंख्या से 80 गुना
- 47:50चाहता। यह तो सिर्फ पृथ्वी का अनुपात है,
- 47:58आयतन है तो तुम्हारा क्या औकात है इसमें?
- 48:10तो भीतर ये कौन बोलता है? ये अंहकार बोलता है, यह तुम्हारा
- 48:18फ्यूल है, यही तुम्हारे जहाज को नीचे करने से रोकता है यह फ्यूल।
- 48:29को बंद कर दो तो जहाज ठहर जाएगा और पृथ्वी का ग्रैविटेशनल फोर्स
- 48:40तो लगातार खींचे जा रहा है। वह जहाज को अपने पास खेच लेगा।
- 48:46दूसरा महीने का चट्टान को ऊपर रख दो।
- 48:48100 किलोमीटर ऊपर लेकिन वह गति नहीं कर रहा लेकिन फिर भी वह
- 48:55गिरती नहीं। वह इसका कारण है कि आप ने
- 49:02मान्यताएँ इतनी ज़ोर रखी है। देखिये, आपकी मान्यताएँ कितनी
- 49:06गहरी होंगी। इतनी बड़ी चट्टान को नहीं।
- 49:12आपका अहंकार चट्टान से भी ज्यादा बड़ा है।
- 49:17तुम्हारी मान्यताएँ, तुम्हारी मूर्खताएं, तुम्हारी परंपराएं,
- 49:21तुम्हारा स्वाद, समाज। तुम्हारे कायदे कानून कायदे कानून
- 49:28संविधान के नहीं, तुम्हारे कायदे कानून तुम्हारी थोपी हुई
- 49:42मान्यताएँ। इतनी ज्यादा है, कितनी ज्यादा
- 49:49होगी, तुम समझ सकते हो इतनी बड़ी चट्टान को जो 100 किलोमीटर ऊपर
- 49:55उदाहरण दे रहा हूँ ध्यान रखना 100 किलोमीटर ऊपर उस चट्टान को थामे
- 50:01रखता है। अहंकार समाप्त हो जाए और तुम्हारी
- 50:09पकड़ समाप्त हो जाए। मैं रोज़ कहता हूँ लीव द क्लिंग
- 50:15नेसेस पकड़ो को छोड़ो, अब दशरथ एनलाइटन।
- 50:26भगवान राम एनलाइटमेंट वो तो भगवान हैं अवतार बस कलाओं में थोड़ा
- 50:36फर्क रहता है। भगवान राम को 12 या 14 कला माना
- 50:40जाता है और कृष्ण को 16 करो। कलाओं का फर्क रहता है।
- 50:48अन्यथा अवतार दोनों ही दशरथ दशरथ के नैना व्याकुल मन से उस पथ की
- 51:08ओर निहार रहे हैं। जीस शपथ से रथ के ऊपर बैठकर ये
- 51:17तीनों राम लखन सीता वनगमन किए छोड़ने गया था।
- 51:24सुमन हमारी बाउंड्री तक छोड़ आना है।
- 51:29उसके बाद इनको साथ लेना एक बार बाउंड्री पार करा देना कि देखिये
- 51:35तुम्हारा वनवास हो गया और एक घड़ी को एक वर्ष के ब्रह्मा लेना, 24
- 51:43मिनट मान लेना यह हिंदू धर्म की। वे इसे खरीदती है और मैंने आपसे
- 51:53कहा सब पहुँच ही जाएंगे, हिंदू नहीं पहुंचेगा।
- 51:59इसका साइंटिफिक एनालिसिस सुनिए ईसाई पहुँच जाएगा क्योंकि ईसाई के
- 52:07भीतर सेवा भावना है। और कन्फेशन है ध्यान से सुनते रहे
- 52:15ईसाई धर्म में कन्फेशन है मैंने ये बुरा किया मैंने ये बुरा किया।
- 52:21मैंने ये बुरा किया और तुम मान लेते हो यहाँ तो तुम मानने के
- 52:26बजाय दबा देते हो। मीडिया को पैसा देते हो भर भर
- 52:31मुठिया दबाने के लिए और ईशा कहते हैं कन्फेस यू आर एरर्स एरर्स है
- 52:40सिर्फ पाप नहीं है कुछ गलत। वह पहुँच जाएगा क्योंकि दो मुख्य
- 52:54कारण कन्फेशन अपने पापों का बोथ जीसको हो जाता है, वह बदलना शुरू
- 53:02हो जाता है। अब ये प्रसंग गहरा हो गया और आप
- 53:06गहराई से ही सुनते जाइए। जिसने मान लिया कि मैंने प्राप्त
- 53:14किया, तुरंत बदलात शुरू हो गई। रत्नाकर ने मान लिया कि मैंने
- 53:20कत्लोगारत किया, तुरंत बदलना शुरू हो गया और वाल्मीकि हो गया।
- 53:29उलटे नाम जपते जाना वाल्मीक वय ब्रह्म।
- 53:45समना उलटे नाम जब ऐसे जाना बाल में को भैभ में समना जैसे ही
- 53:54तुमने कन्फेस किया वैसा ही बदलाव शुरू हो गया।
- 54:00झगड़ा क्या है कि तुम मानते नहीं? ईसाई पहुँच जाएगा।
- 54:08मैं क्यों कहता हूँ? देखिए मैं साइंटिफिक एनालिसिस
- 54:11करके देता हूँ आपको। क्योंकि ईसाई में सेवा भाव हनुमान
- 54:18जैसा सेवा भाव निष्काम हॉस्पिटल भी जाएंगे।
- 54:22किसी गरीब की जरूरत हो, ईसाई धर्म सबसे आगे पहुँच जाएंगे।
- 54:31कन्फेशन करेंगे तो उनका मार्ग बदल जाएगा, दिशा बदल जाएगी।
- 54:37जो पाप की तरफ अग्रसर थी वो पुण्य की तरफ अग्रसर हो जाए।
- 54:46वह पहुँच ही जाएंगे सेवाभाव दीन दुखियों की सेवा और कन्फेशन।
- 54:56मैंने क्या बुरा किया और कन्फेशन आज होता है।
- 55:01चर्च में लोग पादरी पर लिपार खड़ा होता है।
- 55:04बीच में एक पर्दा जीना सा बल्कि मोटी चादर की होती है।
- 55:09आवाज सुनें सिर्फ पादरी के सान में कन्फेस करता है कि मैंने
- 55:14ज़िन्दगी में ये ये पाप किया और आपको शायद पता न हो।
- 55:19यह अनूठी परम्परा है जो हमारे ऋषियों ने बहुत जगह बोली हुई है
- 55:26स्वीकार कर लो जो तुमने किया स्वीकार कर लो पूर्ण हृदय से जो
- 55:35तुम्हारे में गल जायेगा। और मैं ही वादा है मैं गला, तो वह
- 55:47पाथर की चट्टान नीचे खिसकनी शुरू हो गया।
- 55:55कन्फेस करो मानो किसके आगे मानो बड़ी मुश्किल है परमात्मा के उपर
- 56:02पे यकीन है गुरु आजकल को ही बना लेते हैं।
- 56:09किसके ऊपर विश्वास करें? 8585 साल के बूढ़े आज जेल में और
- 56:18बैल के ऊपर बाहर विश्वास के स्पे करें और हम तो अंधे हैं, हमें पता
- 56:26ही नहीं सामने वाला गुरु उस पार पहुंचा के नहीं पहुंचा।
- 56:34लेकिन है जिसके पास जाकर समर्पण घट जाए वह परमात्मा है।
- 56:47कृष्ण कहते हैं सर्वधर्माण प्रतिज्ञा माँ बेकम शरणं वृक्ष
- 56:53मेरी शरण में आजा। लेकिन मैं थोड़ा सा मेंडमेंट कर
- 56:55दूँ क्योंकि भाषा की बात है, कृष्ण कहते हैं, जहाँ जाकर तुम
- 57:01झुक जाओ समर्पित हो जाओ वहाँ जुग जाना वहाँ पाओगे भगवान के चरण
- 57:09हैं। कृष्ण जानते हैं कि मैं भगवान
- 57:16कृष्ण कहते हैं मेरी शरण में आ जा, मैं तुम्हें सभी पापों से
- 57:20मुक्त कर दूंगा। कन्फेशन एक ऐसी चीज़ है जो
- 57:25तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर सकती है।
- 57:31तुम इसे। वातावरण से भी कन्फेस कर सकते हो
- 57:35लेकिन वातावरण में तुम्हें यकीन नहीं है कि भगवान है, इसलिए मैंने
- 57:41एक बहुत बार पहले भी कहा जीवन में एक ऐसा साथी होना चाहिए जिसके आगे
- 57:49तुम अपने पापों को बदला सको। बतलाने से अपराधबोध समाप्त हो
- 57:55जाता है। इसे प्रैक्टिकल करके देखना और
- 58:02गुरु आज तो है, कल नहीं रहेगा। गुरु तीले माटी का पुतला है।
- 58:15और सेवा भाव हनुमान जी में सिर्फ सेवा भाव था।
- 58:23सिर्फ सेवा भाव से पहुंचा जा सकता है।
- 58:26शूद्रों के हिस्से में सेवा ही तो शूद्र बड़भागी थे।
- 58:33क्योंकि सेवा के द्वारा पहुंचा जा सकता है उस गहरी तलहटी में जहाँ
- 58:43जाकर तुम आनंद से रूबरू होते हो जहाँ जाकर तुम उस आनंद के प्यारे
- 58:49की चुस्कियों को भरते हो। और खिलखिला के हँसते हो जाओ
- 58:56तुम्हारा अंत खिल जाता है तो ईसाई ऐसे पहुँच जाएगा।
- 59:03मुसलमान ने तरकीब को बदल लिया। अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी
- 59:08लेकिन कुर्बानी की जगह वो मेमने की कुर्बानी देने लगे।
- 59:12बात कही थी। मोहम्मद ने ईगो की कुर्बानी
- 59:20कुर्बानी देने से तुम्हारे अहंकार जे तो प्रेम मिलन की चाह, शी स
- 59:28तली धर घर मेरे। ये शीश को ही ईगो कहा जाता है।
- 59:33शीश काटना नहीं है, शीश का अर्थ है ईगो ईगो को समर्पित कर दो हम
- 59:41जब भी किसी को शरण में जाते हैं, अपना सिर उसके पांव में रख देते
- 59:46हैं, काट के नहीं, वैसे ही रख दो। मुसलमान ने इसे विकृत कर लिया।
- 1:00:02इस्लामियत ने इसे विकृत कर लिया। शांति मिलेंगे, शांति और कुर्बानी
- 1:00:11शांत बने रहो कुर्बानी करते रहो कुर्बानी।
- 1:00:18जानवर के ने बेज़ुबान पशुओं के ने धर, बौद्ध मेमनों के ने मासूमियत
- 1:00:28की आँखों में देखना, जीसको खगिल करने चले हो तुम उसकी आँखों में
- 1:00:32बड़ी मासूमत पाओगे। और अगर तुमने सही से उसकी आँखों
- 1:00:36में झाँक लिया तो तुम उस मेमने का कतल कर ही नहीं पाओगे।
- 1:00:41इतने प्यारे होते हैं उनकी आँखें माँ सोन निर्दोष अभी कर ही स्वामी
- 1:00:48अविव मुक्तेश्वरनाथ माँ के शनान पे कहते हैं उनके साथ बड़ी।
- 1:00:56बद्दी व्यवहार की गई प्रताड़ना की गई।
- 1:01:07कौन है प्रताड़ना? करेंगे हमारे लोग यह प्रशासन नहीं
- 1:01:11है, तुम गलती मत समझ लेना। पर शासन को जो हुक्म देता है रगड़
- 1:01:17दो चाहे कोई भी आये वो भक्त हो, वो शंकराचार्य हो, रगड़ दो तो
- 1:01:30जिम्मेदार कौन? जिसने हुक्म दिया।
- 1:01:35हाकम जिम्मेदार है। हर काम के लिए हाकम जिम्मेदार है।
- 1:01:38इसलिए कहते हैं तब से राज़ और राज़ से नरक क्योंकि राज़ से हाकम
- 1:01:45बन जाता है। व्यक्ति और भूकंप मानने से
- 1:01:50परमात्मा हो जाता है व्यक्ति। हुक्म चलाने से गर्क जाता है
- 1:01:56व्यक्ति उसे भ्रम हो जाता है कि मैं ही भगवान हूँ तो ये सलामी से
- 1:02:04भी पहुंचा जा सकता है। बड़े आराम से सिखिज्म से पहुंचा
- 1:02:12जा सकता। से कहते तेरा पाना मीठा रखे जो
- 1:02:17तुद फाव है सुई पली का हर हाल में राजी रहना, किसी भी परिस्थिति में
- 1:02:34राजी रहना। मेरी तो यही अर्जी कर वही जो तेरी
- 1:02:42मर्ज सिख भी पहुंचाएगा, क्योंकि जो उसके हुक्म में चला।
- 1:02:52जो हुकुम नहीं बना, जिसने अपना हुकुम नहीं चलाया, जिसने हुकुम को
- 1:02:58स्वीकार किया, वॉटेवर इज़ ए गोइंग ऑन दैट इज़ राइट जो हो रहा है वो
- 1:03:06परफेक्ट है, ठीक है उसकी दरगाह से आ रहा है।
- 1:03:10इसलिए बाबा जब जी को लिखते हुए कहते हैं जीस ए लिखे तिसे सर न जब
- 1:03:17फरमाए थे थे पापा जो लिख रहा है उसके सिर की ये कार्ड नहीं है।
- 1:03:24उसके दिमाग की खोज नहीं है, जो लिखा रहा है जब फरमाए।
- 1:03:29जैसे जैसे फरमान आया ऊपर से तिब्बतीब पा वैसे वैसे मैं लिख
- 1:03:34रहा हूँ ज़रा भी अंकार में कितनी बड़ी, कितनी शानदार किताब लिख दी
- 1:03:4038 वीडियो में तुम्हारे वेदों को शर्म आ गई?
- 1:03:47सारे उपनिषेय तुम्हारे धरे के धरे रह जाएंगे इन अर्तश में वो बोल
- 1:03:53दिया गया, लेकिन काश तुम इनका अर्थ हृदय में उतारने की चेष्ट
- 1:03:59ठगते तुम तो इनको रटना चाहते हो? तुम तो दिमाग के न्यूरोज़ को भर
- 1:04:07लेते हो, इनके शब्दों से नहीं, इनसे अपना अहंकार मटाओ जो तो
- 1:04:13दुपावे सोइपलिकार कोई बुरा हो जाए तो छाती मत पीटना।
- 1:04:22समझौता ठीक है। समझौता गमों से कर लो समझौता गमों
- 1:04:39से कर लो। ज़िन्दगी में गम भी मिलते हैं।
- 1:04:49वो समझौता गमों से कर लो ज़िन्दगी में गम्भीर मिलते हैं वो।
- 1:05:07राजी हैं हम उसमें जिसमें तेरी राजा है अपनी तो यूँ भी वह वह है
- 1:05:14अपनी तो गूँ भी वह है सिख भी पहुँच जाएगा, ईसाई भी पहुँच जाएगा
- 1:05:24इस सलामयत में भी। मुसलमान भी पहुंचेगा ये भी तुम
- 1:05:27कहोगे हम तो सुना तुम्हे हम क्यों ना पहुँचेंगे जाने भी पहुँच
- 1:05:31जाएगा, बोध भी पहुँच जाएगा बोध तो पहुंचा ही हुआ है बोध ने तो।
- 1:05:45श्रेय को देखकर बस सह से थोड़ा सा आगे चल रहा है।
- 1:05:54आत्मा बोझ से परमात्मा बोझ वह तो पहुंचा पहुंचाया है।
- 1:06:00जैन भी पहुंचायेगा अहिंसा परमो धर्म।
- 1:06:10जब तुम हिंसा करते हो तो तुम आक्रामक होते हो।
- 1:06:18जब तुम हिंसा नहीं करते, कोई हिंसा करे, उसे स्वीकार कर लेते
- 1:06:22हो तो तुम रिसेप्टर हुए। और जैसे ही व्यक्ति रिसेप्टर हो
- 1:06:29जाता है, वह समर्पित हो जाता है। यह इसका भीतर का विज्ञान है तो
- 1:06:37जैन भी पहुँच जाएगा, क्योंकि वह रिसेप्टर है, परमात्मा के हुक्म
- 1:06:43को रिसेप्ट करता है, एक्सेप्ट करता है।
- 1:06:49हो जायेगा हिंदू कोियों ने पूछा था ये सुनिए इस बात को गहरे से
- 1:06:57जैसे तुम्हें स्वपन आया। और जैसे दर्शक ने कहा किसी न किसी
- 1:07:05तरह से अपनी बाउंड्री क्रॉस करके कहना देखो तुम्हें वनवास हुआ था,
- 1:07:14तुम वन में आ गए अपने क्षेत्र की सीमाओं को ला अब 14 वर्ष का
- 1:07:21वनवास? एक घड़ी को एक वर्ष मान लो, लेकिन
- 1:07:28राम हिन्दुओं की तरफ पागल छोड़ो राम अवतार राम कहते ऐसे कैसे मान
- 1:07:37लो कहते मान लो? एक घड़ी को 1 साल के बराबर मान
- 1:07:44लो, तुमने अपना क्षेत्र तो छोड़ ही दिया ना, वो तो छोड़ दिया
- 1:07:51लेकिन ये घड़ी एक घड़ी 24 घंटे की और 24 घंटे के बराबर कैसे हो
- 1:07:57जाएगी वो तो इसे मान लो। लेकिन सत्य पुरुष की समझ में
- 1:08:09कल्पनाएं आया नहीं करतीं। सत्य पुरुष कल्पनाओं को सदा ही
- 1:08:15नकारते हैं। वो कहते हैं ये तुम्हारी थोपनाएँ।
- 1:08:19ये तुम्हारी मान्यताएँ हैं, तुमने मान लिया है, लेकिन यह सत्य नहीं
- 1:08:24है। तुमने मान लिया है कि 24 मिनट 24
- 1:08:28घंटे के बराबर होते हैं, ठीक है, मान लो, लेकिन 24 मिनटों में सारा
- 1:08:32दिन और रात नहीं गुजर जाएगा। विधना अपने ढंग से ही चलेगी।
- 1:08:39विद ना तू ना? तेरे लेख किसी के समझ ना आते हैं।
- 1:08:58कल्पनाओं से कभी यथार्थ नहीं मिला करता तुम कल्पना किया जाओ या गदा
- 1:09:06घोड़ा बन जाए या गदा घोड़ा बन जाए गदा घोड़ा बन जाए तो तुम कल्पना
- 1:09:13करो। यह शेर के ऊपर बैठी हुई माँ जीवंत
- 1:09:17हो जाए, जीवंत हो जाए तुम्हारे पंडित पुरोहित मंत्राभिषेक करके
- 1:09:21प्राण प्रतीक्षा कर तो देते हैं लेकिन फिर यह हेल्ती क्यों नहीं?
- 1:09:28फिर यह शेर माँ से क्यों नहीं मांगता?
- 1:09:33फिर यह तुम्हारी प्रतिमा दुर्गा की खेलती क्यों नहीं है?
- 1:09:36तुमने कहानियों सुनी होंगी सिर्फ लेकिन ध्यान रखना वो कहानियों
- 1:09:41किसी तल पर जाकर घटित होती हैं। मैंने व्याख्या किया था जब
- 1:09:46व्यक्ति दो डेल्टा के ऊपर आ जाता है तो ऐसी कहानियों हुआ करती हैं,
- 1:09:52लेकिन वो सत्य नहीं है। तुम्हे लगेगा कृष्ण आ गया और
- 1:09:57बिलकुल हाथ पकड़ोगे तुम उसका सूर्यदास कृष्ण बाल रूप में कोलोल
- 1:10:06करने है और सूर्यदास उस तल पर पहुँच गए।
- 1:10:110.5 से नीचे 0.2 पे पहुँच गए और वहाँ ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो होती
- 1:10:20कल्पनाएँ लगेंगी सत्य बिलकुल आप उसके हाथ को पकड़ोगे हाथ हाथ पर
- 1:10:25तलके का हाथ है ऐसे घटनाएँ घटित होती हैं।
- 1:10:31लेकिन वो सत्य नहीं होती। कृष्ण बार बार छुड़ा लेते हैं उस
- 1:10:39हाथ को सूर्यदास होते हैं बांह छुडाई जात हो निरबल जान के मोह।
- 1:10:50ह्रदय से जो जाओ तो मर्द कहूँ, मैं तो मेरे ह्रदय से निकल के
- 1:10:56दिखाओ, वहाँ तो छुड़ा दो कि क्योंकि मुझे दिखता नहीं तो ये
- 1:11:03घटनाएँ घटती हैं 0.2 के ऊपर 0.5 पे नहीं।
- 1:11:140.5 पर तुम्हारी वैज्ञानिकता का अंत आ जाता है, लेकिन उससे पार भी
- 1:11:20है। मैं कहता हूँ तुम जीरो के साथ
- 1:11:21बिल्कुल चिपक जाओ तो तुमने डेल्टा की क्रॉस कर ली सारी हदूतें।
- 1:11:30फिर उसके बाद तुमने जीरो में मर्ज होना है, थोड़ा सा वैज्ञानिक है,
- 1:11:35बार बार सुनने की चेष्टा करना तो जहाज चल रहा था।
- 1:11:43ईंधन से ईंधन आपका अंकार है, आपने ईंधन बंद कर दिया।
- 1:11:48लेकिन फिर भी गिरा नहीं। पत्थर तो नहीं करा पत्थर क्यों
- 1:11:54खड़ा है अविलम्बन से और दशरथ की मैंने उदाहरण तो दी दशरथ से
- 1:12:02बढ़िया अविलम्बन हो ही नहीं सकता किसी का जो राम के साथ उसका सहारा
- 1:12:06था। जो राम के साथ उसका मोह था और ऐसे
- 1:12:10प्रिय व्यक्ति से मोह हो ही जाया करते हैं।
- 1:12:13अक्सर सारी अयोधा बिलख बिलख के रोने लगी।
- 1:12:21जैसे ही। रस आगे बढ़ता सुसेन श्रमण करना रस
- 1:12:33आगे बढ़ता सुमंत का जनता लेट गई। रास्ते में नहीं जाओ मत जाओ।
- 1:12:45ऐसे ही कृष्ण के साथ भी हुआ था। कृष्ण जब छोर छोर चले थे मथुरा
- 1:12:51जाने के लिए गोकुल को तो वहाँ के सभी निवासी गोपिकाएँ रास्ते में
- 1:12:57बिछ गए थे तो अकरूर जी ने समझाया कि देखो ये किसी महत पर्पस के
- 1:13:03कारण चले हैं। तुम इनको इनके उद्देश्य से बडगाओ
- 1:13:10मत समझाने बुझाने के बाद वो माने। ऐसे ही समझाने बुझाने के साथ कुछ
- 1:13:17लोग माने। कुछ लोग साथ ही चले गए।
- 1:13:20राम के कहते हम तो साथ जाएंगे। अगर राम बनवास जाएगा तो हम
- 1:13:24भिजायेंगे कितना प्यारा चरित्र होगा वह जिसके साथ जनता की आदि
- 1:13:35अयोध्या की आदि जनता होगी कितना प्यारा।
- 1:13:43होगा, उसका व्यक्तित्व तुम कल्पना ही कर सकते हो तो राम का मोह नहीं
- 1:13:54है। दशरथ दशरथ का इतना मोह है।
- 1:14:00बस ये मोहित में लगातार नैन लगे रहते हैं, रात होती है पता है आप
- 1:14:06भी नहीं आएँगे लेकिन फिर भी नैन तो द्वार पे लगे रहते हैं न जाने
- 1:14:13कब न जाने कब। थोड़ा सा।
- 1:14:24ज़रा सी आहट है।
- 1:14:41ज़रा सी आहट होती है तो दिल सोचता है।
- 1:14:53डैशर्स होता है। थोड़ा सा हवा का जोंगा ज्यादा
- 1:14:57आया। मुख्य द्वार खटखटाया।
- 1:15:01उधर सोचता है कहीं ये वो तो नहीं कहीं मेरे प्यारे राम तो नहीं आ
- 1:15:08गए कहीं? ये वो तो नहीं कहीं ये वो तो
- 1:15:22नहीं? ना दिन, ना रात, दशरथ की निगाहें
- 1:15:29नींद तो है ही नहीं। जैसे आँखों में मुख्य द्वार की
- 1:15:35तरफ लगे थोड़ा सा जरो का हवा का भी का पा जाता है।
- 1:15:41और गौर से देखते हैं मेरे राम आ गया, मेरा पुत्र आ गया।
- 1:15:47यह मोहित में नीचे नहीं उतरने देता।
- 1:15:51यह चट्टान को बांधे रखता है और ऐसे बहुत से मोह थोप नय।
- 1:15:56मान्यताएँ मूड़ताएँ आपने थोप ली हैं।
- 1:16:02ये जैसे परमात्मा बनाया, आपने कोई चूहे के ऊपर बिठा दिया, वैज्ञानिक
- 1:16:06नहीं है, ये सत्यमय नहीं है। वैज्ञानिक तो है ही नहीं, सत्यमय
- 1:16:12नहीं है कोई भी संत इसको कहेगा नहीं यह बकवास है, यह कल्पना है।
- 1:16:22शंकर को 60 दे दिया कार्तिक को और सरस्वती को हंस दे दिया।
- 1:16:34कार्तिक को मोर दे दिया। लक्ष्मी को उल्लू बेचारी के हाथ
- 1:16:43उल्लू गाया अब करे क्या बेचारी तुमने दिया है?
- 1:16:49उसने मांगा तोड़ी विष्णु को। शेषनाग की सैय्या पे सुला दिया
- 1:16:59सुलाओ भाई अभी बहुत से यहाँ लड्डू गोपाल नया अरवा चला है जैसे कि
- 1:17:04इससे पहले लड़के होते ही नहीं थे तो लड्डू गोपाल ही लड़के देते
- 1:17:10हैं। अरे कृष्ण तो लड़के ही देता है।
- 1:17:13कृष्ण के खुद के लाख से ज्यादा लड़के थे।
- 1:17:17पता है 1,00,000 से अधिक लड़के ही थे, एक ही बेटी थी चारुमती बाकी
- 1:17:34सभी लड़के थे। लड्डू को पा लड़ के कहता है कमर्ष
- 1:17:39की बात है इन्हें ही मैं मंद बुद्धि करता हूँ और यही कल्पना है
- 1:17:47कल्पना तुम्हें कभी नहीं पहुंचाती इसलिए मैं कहता हूँ बकायदा
- 1:17:51साइंटिफिक हैना लाइसेंस करके मैंने तुम्हें समझा दिया।
- 1:17:56कैसे पहुंचेगा इस्लाम? कैसे पहुंचेगा ईसाईत विकृत कर
- 1:18:00लिया इस्लाम ने बाद विकृत आज देखिये सिख धर्म ज्यादा पुराना
- 1:18:08नहीं है, लेकिन सेवा भाव आज भी है।
- 1:18:15देखिए जगह जगह लंगर लगें, आज भी चले जाइए किसी गुरुद्वारा में, हो
- 1:18:21सकता है किसी मंत्र से आप भूखे वापस लौट आओ, लेकिन गुरुद्वारा से
- 1:18:26वापस नहीं लौटोगे तो आज भी वो लंकर सड़े, 500 साल के बाद।
- 1:18:34चल रहा है वो ₹2030 खत्म होने में नहीं आते बांटना बांट देना छोड़
- 1:18:51देना धीरे धीरे धीरे धीरे छोड़ते छोड़ते तुम उस अहंकार को भी छोड़
- 1:18:57दोगे। क्योंकि छोड़ने का संस्कार गहरा
- 1:19:00होता जायेगा। रोज़ और खालसा खरस बनो, शुद्ध
- 1:19:04बनो, झूठ मत बोलो, ईसाई कहते है कन्फेस करो और सेवा करो।
- 1:19:12सेवा तो लट्ठों से होती है, कर एवी मुक्तेश्वरानंद जीके लट्ठों
- 1:19:16से सेवा हुई करो। उनके भक्तों को बुलाया जाता है कि
- 1:19:22कम बर्फ़ में बड़ा पुण्य मिलता है।
- 1:19:24आप अवश्य ना और लकड़े जाते हैं लोग तो उनका नाम ही नहीं आता, कुछ
- 1:19:28नहीं, संख्या ही नहीं आती। यह मंदबुद्धि नहीं तो और क्या है,
- 1:19:36कोई समझाएगा मुझे? हिंदू हिंदू राष्ट्र पर काबिज हैं
- 1:19:46और हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं।
- 1:19:55अजीब मूड़ता है। यही ये इसी को ही मैं मंद बुद्धि
- 1:20:02कहता हूँ मूर्ख बुद्धि, मूर्ख बुद्धि जिसमे बुद्धि।
- 1:20:07है इन्हें वेदनाते। लेख किसी के वेदनाते रे लेख किसी
- 1:20:34के। समझ न आते हैं हद न तेरे लेख किसी
- 1:20:51के समझ न आया। ते हैं, जन जन के प्रिय राम लखन
- 1:21:08सी बन को जाते हैं। हो हो वेदनाते लेख किसी समझ न आते
- 1:21:31हैं। इक राजा के राजदूला, इक राजा के।
- 1:21:50राजदूला रे बन बन फिरते मारे माँ इक राजा के राजदूला।
- 1:22:09बन बन फिरते मारे कर्मगति टरई ना काबू के तार टरई
- 1:22:39ना काबू के। सबके कष्ट, सबके कष्ट मिटाने वाले
- 1:22:59कष्ट उठा। सबके कष्ट मिटाने पर।
- 1:23:13कष्ट उठाते हैं। जन जन शिव बन को जाते हैं।
- 1:23:38बिदना। तेरे लेख किसी के समझ न आते हैं।
- 1:23:58धन्यवाद।