Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Jan 25 - महात्मा बुद्ध, बुद्धत्व को पाकर भी क्यों कहते हैं कि जीवन दुःख है! सुखी होने का सूत्र!
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- 0:12वैशाली डनखर महात्मा बुद्ध कहते हैं कि जीवन दुख है बाबा क्या
- 0:30यहाँ कोई सुखी भी है? और अगर कोई सुखी है तो वह कौन
- 0:39कैसे सुखी हुआ जा सकता है? मानवता का मूलभूत प्रश्न है।
- 0:55वैशाली तुमने यह पूछकर मानवता के उपर एक उपकार किया है
- 1:16शहर के बाहर नगर के बाहर बहुत दूर तलक।
- 1:25आबादी नहीं थी वहाँ पर एक छोटी सी कुटी का ढल का है, एक संत मगन
- 1:35बैठे रहते थे। दो 4 दिन बैठे रहे।
- 1:44उसके बाद लोगों ने देखा यहाँ एक व्यक्ति संत बैठा है, ना तो किसी
- 1:51से कुछ मांगता है, ना किसी के द्वार पे जाता उन्होंने करुणा वश।
- 2:02उसे भोजन पहुंचाना शुरू कर दिया। ये बाबा भोजन ले लो बहुत दिन हो
- 2:12गए हमें देखते हुए तुम मांगने भी नहीं जाते।
- 2:15करीब ही है गांव। बाबा ने भोजन कर लिया, सुबह से
- 2:27शाम वहीं बैठा रहता हूँ लोगों ने छोटी सी चार पाई एक रजाई।
- 2:40एक बिस्तर ला दिया, उस पर सो जाता हूँ।
- 2:45एक घड़ा पानी का भर के रख जाता, कोई ऐसे गुजर बसर चलता रहा।
- 3:00बहुत साल बीत गए, अब तो लोग उसके दर्शनों को आने लगे थे।
- 3:09कोई कहता बाबा के दर्शन करने से हमें मनोवांछित फल मिल जाते हैं।
- 3:17कोई कहता हमें देखते ही शांति हो जाती है।
- 3:22कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता कुछ ऐसे लोग भी आते हैं जो कहते डोंगी
- 3:31हैं हिस्ट पुष्ट है मस्टिंडा है काम कर सकता है।
- 3:39आलसी है, काम नहीं करता सभी अपनी अपनी भाषा में बोल के चले जाते
- 3:48हैं, कुछ सेवा करके चले जाते हैं, कुछ गाली निकाल के चले जाते हैं।
- 3:58काफी देर बीत गई, फिर तो लोग आने लगे।
- 4:06फिर तो थोड़ा बहुत चढ़ावा भी चढ़ने लगा।
- 4:10जरूरत की चीजें भी आने लगी। उस छोटी सी झोपड़ी में लोग आते,
- 4:21प्रणाम करते चले जाते जीसको अच्छा लगता, बैठ जाता, काफी देर हो गई
- 4:32थी एक ही जगह पर बैठे हुए। संत की एक आदर थी कि जो कुछ कोई
- 4:41लेके आता कोई दान दक्षिणा सब स्वीकार कर लेता मांगता कुछ।
- 4:551 दिन वहाँ पर एक नौजवान भिक्षुक गुजर रहा था, छोटी सी झोंपड़ी
- 5:05देखी, वहाँ पर बैठे लोग देखे, मन में कुतूहल हुआ।
- 5:12कि अपन भी देख ले। जाके कौन है?
- 5:18सत्य की चाह में सुख की चाह में वह भी घर छोड़ रहा था।
- 5:27घर में उसे कुछ घुटन महसूस होते थे।
- 5:38घर से भाग आया था गया जाके देखा संत बैठे हैं, उसके आसपास पांच
- 5:47सात लोग बैठे हैं, वह भी बैठ गया जाके।
- 5:56उसके हाथ में भी एक भिक्षा पत्र था, चोला पहने हुए था, गैर बे रंग
- 6:07का और हाथ में एक बैरागन थी। उसने पूछा गुरूजी क्या मैं यहाँ
- 6:21एक 2 दिन विश्राम कर सकता हूँ? मुझे यहाँ अच्छा लगता है।
- 6:31संत ने मूख स्वर में सिर हिला दिया ठीक है, रुक जाओ।
- 6:39और वह जवान सन्यासी वहाँ रुक गया। वह देखता लोग आते हैं, कोई
- 6:54दानदक्षिणा दे देता, कोई नगदी दे जाता, पुरानी बात है कोई हेरे
- 7:00ज्वारा दे जाता। कोई सोना, चांदी भेंट कर जाता
- 7:07किसी को इंकार नहीं किया था। सब रख लेता और फिर तो उसको एक
- 7:15सिंधूक भी दे गया। कोई रखने के लिए की बाबा इसमें
- 7:18कीमती चीजें रख लिया तो? फिर तो वह वैसे ही करने लगा, कोई
- 7:27नगदी दे गया, कोई सोना, चांदी, हीरे जो हराते थे, उसने उस संदूक
- 7:33में रखना शुरू कर दिया। लोग रोटी पानी दे जाते हैं।
- 7:39कोई खाने पीने की वस्तुएं दी जाते, पानी के घड़ा रोज़ बदल
- 7:43जाता, बुहारी मार जाता, कोई आ के बिकती साफ सफाई रहती है, संत अपनी
- 7:56मस्ती में शांत चित्त। अब तो उस नव युवक को भी आए हुए कई
- 8:09महीने बीत गए थे। बैठा था एक 2 दिन के लिए तो
- 8:17विश्राम कर लूँ, मुझे अच्छा लगता है।
- 8:22तो उस नौजवान को अच्छा लगने लगा, वहीं रहने लगा।
- 8:29फिर तो वह सब गतिविधि देखने लगा। लोग आते हैं जाते हैं और वो देखने
- 8:36लगा कि लोग अच्छा खासा धन माल दे जाते हैं।
- 8:44खाने पीने को अच्छा सामान दे जाते हैं, मिठाइयां दे जाते हैं, कपड़े
- 8:50दे जाते हैं, कम्बल, सर्दी, गर्मी का और भैस सब रख लेता हूँ।
- 9:08उसने सुना था अपने बुजुर्गों से पुराने साधु संतों से कि संत किसी
- 9:19चीज़ का परिग्रह नहीं करते हैं फिर धीरे धीरे उसके प्रति।
- 9:28संवेदनाएँ बदली यह कैसे सुनते हैं?
- 9:35यह किसी को कुछ कहता नहीं है, सब रख लेता है, सब हड़प जाता है।
- 9:44कोई कीमती चीज़ दे गया, संदूक में रख लिया, कोई खाने पीने की चीज़
- 9:49दे गया, बाहर रख लिया, आए गए व्यक्ति को बाँट दिया।
- 9:55फिर तो जलपान की भी व्यवस्था होने लगी।
- 10:01थोड़ी सी भीड़ ज्यादा होनी शुरू हो गयी।
- 10:03कतारिया लगनी की चढ़ावा ज्यादा जड़ने लगा तो वह नव आगंतुक
- 10:16सन्यासी सोचने लगा। इससे तो मैं अच्छा हूँ।
- 10:25बस मेरे पास एक बैरागन और एक का कमांडर यही कुछ तो है मेरी
- 10:32संपत्ति भला ये कैसा साधू हुआ इससे तो मैं अच्छा हूँ।
- 10:43और ये तो संचय करता है और उसने सुना था कि संचय करने वाला
- 10:51व्यक्ति सुख ही नहीं होता। सुख की तलाश में वह भी निकला था।
- 11:02पूर्वाग्रह जो आपने पहले सुन लिए और उससे चिपट गए पूर्वाग्रह आपको
- 11:10दुःखी करते हैं, तो सुना था उसने कि इकट्ठा करने वाले, संचय करने
- 11:18वाले। संत नहीं होते, अप्रग्रह ही संत
- 11:24होते हैं, लेकिन यहाँ तो बात उलटी थी, यहाँ तो जो कोई भी आता उसका
- 11:34स्वागत है, जो कुछ भी दे जाता उसका भी स्वागत है।
- 11:40और वह अपने संदूक में रख लेता। कई वर्ष बीत गए।
- 11:52अब तो उस साधु के पास सन्यासी के पास संत के पास ढेरों अम्बार लग
- 11:57गए थे। सोने, चांदी के हीरे जवाहरात के।
- 12:02नगदी के भर गया था सिंदूक और वह नब आगुन तक भिक्षुक हैरान था, देख
- 12:18देख कर अब तो ये भी सोचने लगा था कि सेत मैं क्षम हूँ।
- 12:31मैं सुखी हूँ, मेरे पास कुछ नहीं है, बस एक जोगा बहना हुआ हूँ, एक
- 12:39छोटा सा कंबल है, सर्दी के लिए सिर के ऊपर छोटी पगड़ी है, हाथ
- 12:47में बैरागन है कमंडल है। यही तो कुल मेरी सम्पदा है, लेकिन
- 12:58संत के पास खाने पीने की सुविधा थी, सोने की सुविधा थी।
- 13:06यद्यपि कुटिया छोटी थी, पांच चार लोग ही सो सकते थे।
- 13:14तो इस आराम को देखकर रुका रहा, लेकिन मन में लगातार चलता रहता
- 13:20हूँ। यह संत नहीं है और संत ही सुखी
- 13:27होता है। और संत कभी परिग्रह नहीं करता।
- 13:32पूर्वाग्रह पूर्व मान्यताएँ आदमी को बांध लेती है।
- 13:42बस ये सारे दिन उसके मन में लहरों की तरह उठता रहता आवेग।
- 13:48समुद्र में लहरों की तरह शोर मचा रहता।
- 13:53हालांकि उसका कुछ लेना देना नहीं था।
- 13:56एक 2 दिन के लिए विश्राम करने हेतु यहाँ आया था।
- 14:02अब तो बहुत कुछ मन में चलने लगा, बेचैन होने लगा।
- 14:10संत जब संदूक को खोलता तो वह ऊपर तक लबालब भरा हुआ था और उसमें यही
- 14:17कीमती समान था। सर सोना चांदी सिक्के।
- 14:23अशर्फियाँ गन्नियाँ, हीरे जवाहरात, नगदी, सब सामान, कीमती
- 14:31सामान, बाकी वस्त्र, आभूषण, अर्घ रखे हुए थे।
- 14:43उसे समझ में न आता। यह व्यक्ति तो इकट्ठा ही किया
- 14:48जाता है, यह तो सुख नहीं हो सकता। यह संत भी नहीं हो सकता क्योंकि
- 14:57संत ही सुख ही होता है। और संत परिग्रह नहीं करता।
- 15:01ये उसका पूर्वग्रह था। बहुत कुछ इकट्ठा हो गया।
- 15:08वर्षों में बीत गए 1 दिन जब वो सुबह उठा।
- 15:20तो देखा कि संत वाहन ही थे। उसने आसपास दृष्टि डाली।
- 15:31संत वाहन ही दिखे, कहीं गए होंगे। कभी कभी ग्राम में निकल जाते थे,
- 15:41वैसे फेरी डालने के लिए कोई बुला लेता।
- 15:43प्रेम से आप घर पे आ जाना, अपने चरण डाल देना अच्छे लगते हो,
- 15:52हमारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। आपके दर्शन करने मात्र से तो सोचा
- 15:59किसी के घर गए होंगे, इधर उधर गए होंगे, आ जाएंगे।
- 16:06पहले भी कभी कभी ऐसा होता था लेकिन आज तो सांझ हो गई।
- 16:13और फिर रात हो गई वह है संत आयी। उसने ग्रामवासियों को कहा क्योंकि
- 16:25लोग तो दर्शनार्थ आते कहा है, गुरुदेव पूछा उन्होंने?
- 16:33तो उस नव आगुन तक सन्यासी ने कहा सुबह से ही नहीं है, मैंने भी खूब
- 16:40बाट, जो ही उनका खाना भी पड़ा है मैंने अपना खा लिया लेकिन उनका
- 16:47खाना पड़ा है। कहाँ गए होंगे?
- 16:55सारे ग्रामवासी आते बैठते, निराश होकर वापस चले जाते।
- 17:01आज वह संत वहाँ पर थे कहाँ गए हैं पता नहीं?
- 17:11सारे ग्राम में ढिंढोरा पिट गया कि संत आज कोठिया में नहीं है।
- 17:24वह सन्यासी भिक्षुक भी देखता कि आज कहाँ चले गए गुरुज आज मन का
- 17:32तूफान थोड़ा शांत था। उसने जल्दी से अकेले में संदूक
- 17:40खुला भरा पड़ा था। हीरे, गहरात, सोना, चांदी सब
- 17:47सामान वहीं था। नगदी गनियाँ अचर्पियाँ सब बहा था।
- 17:58हैरान चार के आज गुरु कहाँ के हैं?
- 18:071 दिन बीता, 2 दिन बीते हैं। सारे ग्राम में ढिंढोरा पिट गया,
- 18:17सन्यासी कहाँ से रह के गायब हैं? कुछ अफसोस मनाने लगे।
- 18:24उनके दर्शन करने से शांति मिलते हैं।
- 18:28उनके पास बैठने से मनोकामनाएं पूर्ण होती।
- 18:32उनके पास बैठने से मनोकामनाएं करने मात्र से पूरी हो जाती।
- 18:38उनके दर्शनों से बड़ा लाभ मिलता, घर से क्रुद्ध हुए जाते और उनका
- 18:43शीतल मुखड़ा देख कर शांत हो जाते। कुछ भेंट करने का मन भी होता,
- 18:51लेकिन गुरु जी तो थे नहीं, वापस चले जाते फिर उस नव सन्यासी को ही
- 19:02जो थोड़ा बहुत ले के आते उसको भेंट कर जाते बहुत दीन।
- 19:10गुरु का कुछ पता न चला वक्त बीतता गया, एक वर्ष बीत गया, संत वापस
- 19:25से न आए। सभी परेशान थे।
- 19:32ग्रामवासी सोचने लगे कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई लेकिन
- 19:40अनहोनी हो जाती। उसके पास जो इतना सामान पड़ा था
- 19:46माल पड़ा था कीमती वह लूट जाता, लूट के ले जाते हैं लेकिन सामान
- 19:56वैसे ही था इसका मतलब कोई डाका भी नहीं पड़ा, कोई चोरी भी नहीं।
- 20:04कोई अनहोनी घटना भी नहीं हुई। फिर गुरुदेव कहाँ है ज़िन्दगी
- 20:12चलती रही, ज़िन्दगी चलती ही रहती है।
- 20:17किसी के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 20:21जो लोग सोचते है कि जब हम ना रहेंगे तो ये चाँद तारे दम तोड़
- 20:31देंगे। नहीं, ये गलतफहमी है।
- 20:35सूरज न उगेगा चंद्रमा ना छिपेगा। ग्रह नक्षत्र अपनी दिशा बदल
- 20:43देंगे। हम न रहेंगे तो कुछ न रहेगा, ये
- 20:47सोच गलत है। व्यक्ति के होने या न होने से
- 20:54अस्तित्व पे कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- 20:58ऐसा ही हुआ। संत चले गए धीरे धीरे सामान्य हो
- 21:04गई जिंदगी लोग संत की जगह उस नव सन्यासी के पास आते रहे।
- 21:12उसको प्रणाम कर जाते, उस कुटिया को प्रणाम कर जाते, लेकिन संत वह
- 21:17नहीं थे, वो शांति नहीं थे। अब इच्छाएं पूरी ना होती थीं, अब
- 21:27वहाँ जाकर मन को शांति नहीं मिलती थी।
- 21:30अब घर से कूद हुए लोग वहाँ जाकर उनकी बेचैनी समाप्त नहीं होती थी
- 21:36क्योंकि वो तरंगें न थीं। तो शांत मुद्रा में बैठा हुआ शांत
- 21:47न होता नब आगुन तक सिन्हयाशी होता भिक्षुक होता?
- 21:55लेकिन वह अभी अनजान था। उसने तो कोई साधना भी नहीं की थी,
- 22:02अपने भीतर भी नहीं गया था। अभी नया नया घर से भाग के आया था।
- 22:15लोग बाहर आते जाते रहते हैं। 1 दिन किसी ने ग्राम बासी ने।
- 22:21बहुत दूर करीब 4050 मील दूर उस सन्यासी को बैठे हुए देखा।
- 22:32एक कोटिया के भीतर वह अकेला बैठा था।
- 22:37एक दो व्यक्ति उसके पास बैठे थे। तो उसने जब देखा उसे तो बहुत खुश
- 22:46हुआ। उस सन्यासी को देखकर उसके मन की
- 22:53व्यथा शांत हुई, उसने दंडवत प्रणाम किया।
- 22:57श्रद्धा वत् आँखों में सुर धारा बोला गुरुदेव आप वहाँ से क्यों आ
- 23:08गए? आप यहाँ क्यों आ गए?
- 23:14वहाँ कुछ आपको कमी थी? वहाँ कुछ आपको तकलीफ थी, सारे
- 23:22ग्राम की श्रद्धा पर थी, सभी आपके पास होकर आपके दर्शन करके सुख की
- 23:33अनुभूति आनंद लिया करते थे। तुम्हारे पास मन्नतें पूरी होती
- 23:39थी। तुम्हारे पास लोग आते थे लेकिन अब
- 23:42वह से सोना क्यों पड़ा पड़ा है? वह भिक्षु वहाँ बैठे हैं, लोग आते
- 23:50हैं, वहाँ से चले जाते हैं, लेकिन जैसे अकेला दिया रह गया हो और
- 24:02प्रकाश हो गया हो मिट्टी का दिया भर रह गया प्रकाश हो गया अब वो
- 24:09झोपड़ा ऐसा हो गया अब वो कुटिया कुटिया ना रहे जैसे उजाड़ हो गया
- 24:16है। वह संत कुछ न बोला, आशीर्वाद दिया
- 24:28कल्याण मस्त बाबा। उसने कहा गुरुदेव चलो अभी वो
- 24:38कुटिया वैसी ही है। उसको संभाल रहे हैं आपके छोटे
- 24:44सन्यासी, सारा ग्राम दुखी है, आपके बिना चलो वहाँ चले मेरे साथ
- 24:54चलो, मेरे पास वाहन है। इस छोटी बैल गाड़ी पे बैठ के हम
- 25:01चले जाएंगे, आपको परेशानी भी नहीं होगी।
- 25:09संत बोले कोई बात नहीं यहाँ क्या वहाँ क्या यहाँ आ जाया करो।
- 25:19क्या फर्क पड़ता है? अब यहाँ के लोगों को भी कुछ हो
- 25:25गया है। मेरे से यहाँ के लोग परेशान हो
- 25:28जाएंगे तो आप यहाँ आ जाया करो, आपको पता तो चल ही गया।
- 25:37बहुत गहने पे भी वो सन्यासी साथ न गए।
- 25:44उस ग्रामवासी ने जाकर सारे गांव में डाँढोरा बिठा दिया के सन्यासी
- 25:50मिल गए। फलाने ग्राम में इस जगह पर बैठे
- 25:54हैं। यहाँ से 50 मील दो क्यों गए?
- 26:01कारण क्या था कुछ पता नहीं। कोई परेशानी भी नहीं थी।
- 26:05किसी ने कुछ कह भी नहीं दिया था, फिर भी क्यों गए?
- 26:11कोई कमी भी ना थी, सभी लोग इज्जत करते थे।
- 26:15माथा टेकते थे। मान्यताएँ पूरी होती थीं, कोई
- 26:18भोजन अत्यादि की कोई कमी न थी। सब लोग प्रेम करते थे, फिर संत को
- 26:28क्या दुख था जो चला गया। हम सदा इसी भाषा में सोचते हैं कि
- 26:35अगर कोई चला गया तो उसे कोई तकलीफ होगी, कोई दुख होगा।
- 26:42ये नहीं सोचते कि उसका सहज स्वभाव भी तो है, वह स्वतंत्र भी तो है,
- 26:49जा भी तो सकता है, वह कोई बंधा थोड़ी है।
- 26:58ये खबर उस कुटिया में रह रहे भिक्षुक के पास भी पहुंचे कि
- 27:05गुरुदेव वहाँ बैठे हैं। 50 मील दूर बेहद ही खुश हुआ।
- 27:18उसने कहा अच्छा फिर मेरा यहाँ क्या काम?
- 27:22मैं भी वहाँ चला जाऊंगा तो उसने ग्रामीण वासियों को कहा कि सामान
- 27:30पड़ा है, गुरुदेव का ये साथ ही ले चलें।
- 27:38ग्राम वासु ने कहा ठीक है हम आपको बैल गाड़ी मुहैया करवा देते हैं,
- 27:45आप भी चलो और सारा सामान भी रख कर चले जाते हैं।
- 27:49सारे तंबू उखाड़ लिए गए। वो संदूक और सारा सामान बैलगाड़ी
- 27:56में रख दिया गया। वह छोटा भिक्षुक भी बैठ गया।
- 28:05ग्राम के कुछ लोग ही बैठ गए। दर्शन करके आएँगे।
- 28:09जिनके मन ज्यादा उदास थे, वह सभी बैठ गए।
- 28:13लोग अपनी अपनी बैल गाड़ियां लेकर उस दिशा में चलने लगे।
- 28:19बैल गाड़ियों की कतार लग गए। संत ने देखा कितने लोग कहाँ से आ
- 28:29रहे हैं, ये क्यों आ रहे हैं? और देखा तो वही सन्यासी भिक्षु जो
- 28:35उसके पास आया था। एक दो रात ठहरने के लिए वह भी आ
- 28:40रहा था। वह छोटा भिक्षु गुरुदेव को देखकर
- 28:51कुटिया को देखकर वहाँ दौड़ा। और जाके उसके चरण पकड़ लिए है
- 29:01गुरुदेव आप छोड़कर क्यों आ गए आपकी कुटिया में?
- 29:07मैं रुका रहा हूँ, आपका इंतजार करता रहा कि जब आप वापस आएँगे तो
- 29:14मैं चला जाऊंगा। मैं सुख के मार्ग पर हूँ, मैं
- 29:20ढूंढता हूँ सुख मैं ढूंढता हूँ तृप्ति मेरा मन उथलपुथल होता है,
- 29:29लेकिन आप वहाँ से चले आये तो मजबूरी में मुझे रुकना पड़ा।
- 29:40और गुरुदेव मैं आपकी कुटिया का सारा सामान तंबू, टेंट, समिट,
- 29:47संदूक वगैरह सारा सामान साथ ले के आया।
- 29:52गुरुदेव बोले बच्चे। तुम तो आ गए ठीक लेकिन इस कूड़े
- 30:01की क्या आवश्यकता थी? कूड़ा कूड़ा तो नहीं रहा में कोई
- 30:09मैं तो आपका सारा सामान ले गया हूँ ये टेंट है ये संदूक है, सारे
- 30:15स्वर्ण आभूषण हीरे चौहरात। सोने के सिक्के, चांदी के सिक्के,
- 30:21अशर्फियाँ, गन्नियाँ सब इसमें तो हैं।
- 30:29संत बोले हाँ, यही तो कूड़ा है बच्चे जब तू सोचता था।
- 30:41तो मैं देखता था जब तेरे मन में लहरें उठती थीं, वो मुझसे छिपी ही
- 30:51ना थी, क्योंकि छिपती हैं उससे। जो अपने ही शरीर में बैठा होता
- 30:59है। मैं तो विराट में फैला हुआ
- 31:05अस्तित्व मैं तेरे भीतर भी हूँ मैं मेरे भीतर भी हूँ मैं सब
- 31:13प्राणियों के भीतर गट गट का वासी। सब देखता जानता हूँ तू सोचता था
- 31:23कि जो कुछ इसको देके जाते हैं, ये स्वीकार कर लेता है और जोड़ लेता
- 31:28है और तू सुख को ढूंढने चलाता पुत्र।
- 31:39ये हीरे, जौहरात ये सोना और सर्फ़ी ये सिक्के ये कूड़ा है।
- 31:50पुत्र इनको इनके स्थान पे रहने देते।
- 31:59जहाँ रखे थे लोग ये श्रद्धापूर्वक दे गए थे और मैंने इन्हें संभाल
- 32:05के रख लिया था। लोग दे गए हैं, लोगों का ही है
- 32:13लेकिन मेरे हृदय में कभी ये नहीं बसे।
- 32:16बाहर संदूक में ही पड़े रहे। ये बाहर ही रहे ये मेरा मैं कभी
- 32:24नहीं बने इसलिए मैंने कहा पुत्री ये कूड़ा क्यों लिया और उस
- 32:38भिक्षुक का मुँह उतर गया? वह तो पीला पड़ गया, मुरझा गया
- 32:45चेहरा कांपने लगा, गुरुदेव तो सब जानते हैं, मैंने क्या क्या सोचा
- 32:51अंट शंट उलट बुलेटिन के बारे में सोचा सब जानते हैं और जो व्यक्ति
- 33:00हीरे चौहरातों को। गिन्नी शरसियों को और बाहर के
- 33:08कीमती सामान को कूड़ा बता रहा है। यह कैसा बिकती है और इसके चेहरे
- 33:20पर दमक है? भीतर के आनंदगा लाभन्या इसके रोम
- 33:27रोम से प्रकट होता है। इसकी आवाज़ में शांति है, मधुर
- 33:35झंकार यह तो त्याग की परम मूर्ति है।
- 33:44चुपके से सब छोड़ के चला आया न भिक्षुक को समझा के कि सुख का
- 33:59मार्ग क्या है? बहुत गहरे में बात उतर गई।
- 34:07जो हम अपनी आँखों से निहार लेते हैं वह बात बहुत गहरे में उतर
- 34:12जाती है। किताबों में लिखा हुआ ज्ञान भीतर
- 34:17नहीं उतरा करता इसलिए मैं सदा ही तुमसे कहता हूँ।
- 34:24कि जीवंत गुरु की शरण ले लेना, उसका उठना बैठना चलो बोलो उसकी
- 34:33ज़िन्दगी का जीना का ढंग सब तुम्हें सुख ही और।
- 34:42अग्रसर करेगा। तुम्हें सुख का मार्ग बताएगा।
- 34:49तुमने पूछा पुत्री की ज़िन्दगी में दुख है है ज़िन्दगी में, दुख
- 34:56उनके है। जो इस कूड़े करकट को अपना समझते
- 35:03हैं। कृष्ण के आस पास ये कूड़ा पड़ा
- 35:11रहता है और आस पास नहीं कृष्ण। वह जयंती माला को धारण करते हैं।
- 35:28हीरे, मोती, माणिक, मड़ियाँ जिनको आप ये कहते हो ये बड़े बहुमूल्य
- 35:33हैं, उनको सदा धारण किए रहते हैं उनके हाथों में।
- 35:43इतनी मुद्रकाएँ होती हैं और वो सब हीरे जौहरात बड़े बेशकीमती होती
- 35:48है। सब होते हैं लेकिन एक चीज़ नहीं
- 35:54होती है। क्या नहीं होती पकड़ नहीं होती।
- 36:03पकड़ यह मेरा है जिन उंगलियों में वो धारण करते हैं वो उंगलियां भी
- 36:13मेरी नहीं है। वो भी मैं नहीं हूँ और इन
- 36:20उंगलियों में धारण रत्न जड़ित कीमती बहुमूल्य हीरों से जड़ित ये
- 36:27मुद्रकाएं भी मैं नहीं हूँ यह वैजयंतीमाला जो मैंने गले में
- 36:33धारण कर रखी है यह मणिय मैं नहीं। मेरी नहीं है।
- 36:41दूसरे अर्थों में देखें तो कृष्ण जानते हैं सिर्फ ये ही मेरी नहीं
- 36:48है, बल्कि सारा संसार मेरा है। दो अर्थ हैं किसी ढंग से ले लो
- 36:54तुम्हीं तुम कह लो मैं ही मैं कह लूँ।
- 36:58अच्छा ही कह लो अहम ब्रह्मास्त्र कह लो, मैं ही परमात्मा हूँ, यह
- 37:03कह दो, सब कुछ परमात्मा है, कहने के दो ढंग का मात्र है तो संत माँ
- 37:14से चलाया। संत इस संदूक में रखे हुए
- 37:20बेशकीमती सामान को कोढ़ा कहता है। रावण ने शिव तांडव में क्या कहा
- 37:35भगवान शंकर से? सब था उसके पास, सोने की लंका था
- 37:46हीरे, मोती, माणिक की कोई कमी न थी राजा सब परिवार था।
- 37:54सारी लंका का एक मात्र एक छत्र साम्राज्य उसका था।
- 38:02त्रिक्षित विचित्र तल्प योर भजंग मुक्ति कसरजो अगृष्ट रत्न लोष्ठ्य
- 38:08हो सुहेद्ध पक्ष पक्ष। त्रिनार विंधचक शुशो प्रजामेहि
- 38:20महेन्द्रो प्रजामेहि महेन्द्रो जैसी विचित्र तल्पयो।
- 38:31भुजंग मुक्ति कसरे जो रजिस्टर रत्न लोष्ठेव रोहिद्र पक्ष पक्षयो
- 38:42त्रिनारविन्द चक्रशु प्रजा में ही महेंद्रयो।
- 38:50समप्रव्वृत का सधा शिवम् पजामा, ये बड़ा सुंदर शब्द है कर्तव्य
- 39:03समप्रवृत्ति है तुम्हारा कर्तव्य कुछ भी नहीं है ध्यान रखना।
- 39:14तुमने सम परवर्ती होना है, सम तुम योग उचित है।
- 39:19सम तुम शम सुखाय दुखाय बराबर है जीवन आय मृत्यु आय बराबर है,
- 39:31मित्र आय, शत्रु आय। बराबर है।
- 39:36हर्ष आए, शोक आए सब बराबर है। कृष्ण भी डालते हैं इन माणिक
- 39:51मुतों को, लेकिन कृष्ण में और अज्ञानी व्यक्ति में यही फर्क है।
- 39:59कि तुम उन मोती माणिक से जड़ित लोलक्के हारों को डालकर तुम्हारी
- 40:11छाती फैल जाती है। कृष्ण से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 40:19कृष्ण जानते हैं माटी के ऊपर माटी चढ़ी ए शरीर माटी है माटी के ऊपर
- 40:31माटी की ही मैंने। ये मोती मणियाँ चढ़ा दी और कृष्ण
- 40:39जानते हैं न तो मैं ये मोती माणिक मणियाँ, ना ही मैं जीस शरीर के
- 40:44ऊपर धारण किया हूँ वो मैं मैं कुछ और हूँ मैं इनसे परे सर्व का
- 40:54मालिक हूँ। ये तो मैं हूँ ही दूसरे अर्थ हमें
- 40:59समझा रहा हूँ, मैं सिर्फ ये नहीं हूँ, ये तो मैं हूँ ही उसके
- 41:08अतिरिक्त अहम ब्रह्मस्व। सारे अस्तित्व में जो भी कुछ है
- 41:14वॉटेवर इट इज़ वॉटेवर एडजस्ट वो मैं और मेरा कोई कर्तव्य नहीं है
- 41:27कोई फर्ज़ नहीं है मेरा। फिर भी भगवान कृष्ण कहते हैं कि
- 41:33मैं कर्म करता हूँ कर्तव्य कोई नहीं मेरा फिर भी मैं कर्म करता
- 41:41हूँ क्या कर्तव्य है सूरज का सूरज नहीं तुम्हारा कुछ देना।
- 41:49क्या कर्तव्य है चंद्रमा को? कलाएं बदलने का ग्रह नक्षत्रों को
- 41:54अपनी चालों में चलने का वकरी मार्गी होने का उदय अस्थ होने का
- 42:03क्या प्रोजन है? उनका कोई कर्तव्य है नहीं।
- 42:08कोई कर्तव्य नहीं लेकिन फिर भी वह कम करते हैं।
- 42:12कर्तव्य नए होते हुए भी वह कर्म करते हैं।
- 42:23संत कहता है यह कूड़ा क्यों नहीं किया है?
- 42:31उसके भीतर के सब जंजाल टूट गए। कल तक जो समझे था वह प्रग्र ही
- 42:37है। आज सब धारणाएं टूट गई।
- 42:43तुम पूर्वाग्रहों से युक्त होकर हर चीज़ का अर्थ कर लेते हो।
- 42:50सब है, शरीर है, महंगे महंगे वस्त्र हैं, शरीर को सुशोभित करने
- 43:00वाली मनिया हैं, मालाएं हैं मुद्रिकाएं।
- 43:10सुन्दर गद्देदार पिलंग हैं सोने के लिए, लेकिन कृष्ण इन सबका
- 43:19उपभोग करते हुए भी जानते हैं। कि जो उपभोग करता है वह मैं नहीं
- 43:30हूँ। मैं इस उपभोग करने वाले शरीर का
- 43:34साक्ष्य हूँ। मैं ये नहीं कहता कि भोग ना करो,
- 43:40बिल्कुल करो। लेकिन भोग ऐसा करो जैसे रतन कूड़ा
- 43:50हो जाए। जब तक रतन मोती, माणिक, मणिय ये
- 43:56कूड़ा नहीं बनते, तब तक तुम्हारे लिए ये कीमती उपहार है।
- 44:03तब तक तुम आबध हो तब तक तुम जकड़े हुए हो, तब तक तुम बंधे हो, यही
- 44:18बंधन है और तुम कहते हो कोई सुखी है, बिल्कुल सुखी है।
- 44:31वही सुखी है जो समभाव में हो जाता है।
- 44:40प्रजा में ही महेंद्र और समप्रवत् का कथा सदाशिवम पंजाब में जिसके
- 44:47लिए प्रजा और राजा बराबर हो जाए, समप्रवृत्ति में जो आ जाए जिसके
- 44:54लिए कर्तव्य कर्म कुछ न रह जाए सब हो लेकिन उसका कुछ भी न हो और कुछ
- 45:03भी न हो तो उसका सब हो। ये बातें थोड़ी सी गहरी पड़ेंगी
- 45:11क्योंकि अनुभव की बातें शब्दों में आती नहीं मजबूर हैं, हम कह
- 45:16नहीं सकते इशारा भर है समझ जाओ तुम्हारा सौभाग्य है, अन्यथा तुम।
- 45:24ज्ञानियों की तरह कमेंट करते रहोगे और कमेंट करने से कुछ
- 45:30मिलेगा रहोगे ज्ञानी के अज्ञानी के अज्ञानी जब ज्ञान हो जाएगा।
- 45:43तो मीन मेघ न कर सकोगे बता सकोगे कौन अंधा कौन आँखों वाला ये बताना
- 45:52कि ये अंधा है ये बताना कि ये आँखों वाला है यह कोई निंदा नहीं
- 45:56होती, यह कोई चुगली नहीं होती, यह तो आलोचना होती है, यह तो दर्शन
- 46:02होता है। संत की जैसे तुम निंदा कहते हो।
- 46:07संत जो बोलता है निंदा नहीं करता, वह सिर्फ जो अनुभव करता है वह
- 46:13बोलता है। तुम चाहे जो कुछ समझ लो, वह
- 46:16तुम्हारी मर्जी है। तुम समझोगे तुम सोचोगे अपने
- 46:25मस्तिष्क से, अपने अनुभव से, अपनी भावनाओं से, अपने पूर्व ग्रहों से
- 46:34संत के लिए, उस संत के लिए। यह कूड़ा था और कूड़ा था तो छोड़
- 46:42के आ गया। भरी रात चुपके से निकल आया भरी
- 46:52रात उसकी एक झलक मिली रस के बुद्ध को।
- 47:04कपिल वस्तु का साम्राज्य छोड़कर आ गया।
- 47:10अभी तुम्हारे लिए शब्द है, काश काश तुम्हारे लिए ये अनुभव बन जा
- 47:19रहा है। अगर तुमने उस रस की एक बूंद पी ली
- 47:25तो ऐसा ही होगा जैसा बुद्ध के साथ हुआ।
- 47:29जैसा महावीर के साथ हुआ, जैसा मीरा के साथ हुआ, नानक के साथ
- 47:34हुआ, कबीर कसत हुआ, लेकिन बात तो उस रस की।
- 47:42एक बूंद पीने की है। अभी तुम भ्रांतियों में हो और
- 47:49भ्रांतियां अपूर्व ग्रहों के कारण और जब तक तुम भ्रांतियों में हो,
- 47:57तुम्हें वो ना मिलेगा। जो तुम्हारी आवश्यकता है बुनियादी
- 48:07जो तुम्हारी बुनियादी आवश्यकता है तुम्हें वो न मिलेगा वो तुम्हें
- 48:14तब मिलेगा। जब तुम उसे पी लोगे, पीने की मुँह
- 48:23मुक्षा करोगे, जब तक पीने की चाहत नहीं तब तक तुम चलोगे नहीं और उस
- 48:38डगर पर चलना। मो।
- 48:40मुक्षा से ही संभव है इन बंधनों से मुक्त होने की इच्छा मो।
- 48:47मुक्षा कहलाती है। अभी तुम बंधे हुए हो, तुम्हे
- 48:51दिखाई पड़े न पड़े। अभी तुम इन हथकड़ियों को इन
- 48:57जंजीरों को आभूषण समझ रहे हो। सोने के आभूषण भी तो होते हैं।
- 49:05मेरे भाई अमेरिका से आये बड़ी मोटी मोटी चैन डाल रखी सोने मैंने
- 49:11कहा भाई तुम सजा यास्ता हो क्या? क्यों भाई ये संगरियां क्यों डाल
- 49:24रखी है? यह तो गले में है, हाथों में
- 49:28थोड़ी है मैंने कहा नहीं, न तो गले में है न ही हाथों में।
- 49:33यह हृदय में है। और ह्रदय में गांठ बन गई है।
- 49:40अगर कोई इनको उतार के भाग जाए तो तुम गुलाम है तुम पीछे पीछे
- 49:46भागोगे, कबीर कह रहे थे नाचो नाचो अमृत बरस रहा है।
- 49:58और सामने से एक व्यक्ति गाय को लेकर सगली डाल कर जा रहा था।
- 50:06कबीर ने कहा बच्चों बताओ तो कौन बंधा तुसी से हंसे।
- 50:13क्योंकि जो साफ दिखता है दिमाग तो ठीक है कबीर का लेकिन ऐसा प्रश्न
- 50:20क्यों? कौन बंदा है, साफ दिखता है, गाय
- 50:26बंदी है बस ऐसे ही तुम्हें लगता है कि सोने की मोटी।
- 50:32जंजीरें ये मेरा आभूषण है, नहीं है तुम्हारा आभूषण कहाँ है?
- 50:38ये जंजीरें हैं हतकड़ियाँ है तुम अभी गहरे उतरे नहीं चल आखियाँ मत
- 50:48करो। छह से चार पांच लखोव है।
- 50:59उसकी मल्कियत में जो भी कुछ है उसके ऊपर डाका मत डालो, वह सब
- 51:04उसका है, तुम्हारा कुछ नहीं है, तुम्हारा तब होगा जब तुम उस तल पर
- 51:11जाकर देख लोगे। कि मैं वो अस्तित्व में हूँ फिर
- 51:16तुम्हारा हो जायेगा। जीस वक्त तुम अस्तित्व हो जाओगे
- 51:22उससे पहले तुम्हारा कुछ भी नहीं उससे पहले तुम्हारा जो भी कुछ है
- 51:27वो सब बंधन है जब तुम उस तल पर जाकर देख लोगे।
- 51:33एवं ब्रह्मस्व सारा भ्रमण मैं ही हूँ सारा अस्तित्व मैं ही हूँ
- 51:41सारी मौजूदगी मैं ही हूँ वॉटेवर एग्ज़िस्ट आई ऍम जो भी कुछ मौजूद
- 51:50है वो माम्। लेकिन यह अनुभव का विषय है न
- 51:54शास्त्र का विषय है, न बोलने का विषय है।
- 51:59लिखा लिखी की है, नहीं देखा देखी बात यह नहीं न लिखने में आती है,
- 52:08न बोलने में आती है। यह आती है।
- 52:11देखा देखी बात यह बात कुछ ऐसी है के अनुभव में आए तो जजीरें तड़क
- 52:20से टूट जाती हैं और लिखते रहोगे ब्रह्मास्त्र लिख दोगे, सूत्र लिख
- 52:29दोगे? लिखने से कुछ नहीं होता।
- 52:33बोलने से कुछ नहीं होता। लिखा लिखी की है नहीं देखा दिखी
- 52:40बात संत कहता कूड़ा कहाँ से ले के सब भ्रांतियां टूट गई उसको।
- 52:56सुख की तलाश में निकला था। जो प्रश्न तुमने बिटिया पूछा,
- 53:05बुद्ध कहते हैं दुख है, बिल्कुल दुख है तुम्हारे लिए दुख है।
- 53:14जब घर से निकले तो दुख था, लेकिन अमृत की एक रस की बूंद मजबूर कर
- 53:22गई तत्वों को लात मारने के लिए और आखिर में खोज ही लिया तो तब दुख न
- 53:32रहा। जब खोज लिया दुःख तत क्षण समाप्त
- 53:39हो गया समाधि उसे ही तो कहते हैं समाधि का अर्थ सभी दुखों का नाश
- 53:45हो जाना सभी कष्टों तकलीफों। सभी ब्रह्मों का नाश हो जाना,
- 53:53समाधि सभी समस्याओं का हल हो जाना समाधि सभी समस्याओं का समाधान मिल
- 54:01जाना समाधि फिर भी अगर बुद्ध कहते हैं कि जीवन दुःखी है तो बुद्ध
- 54:07पहुंचे नहीं, लेकिन बुद्ध ऐसा कहते नहीं।
- 54:11बुद्ध ऐसा तभी कहते हैं तुम्हारे लिए कहते हैं तुम भूल जाते हो,
- 54:17बुद्ध तुम्हें मुखातिब हैं क्योंकि तुम अभी जंजीरों में आवत
- 54:22हो। बुद्ध अपने लिए नहीं कहते हैं, वो
- 54:25तो हो चूके हैं, उन्हें तो दिख गया वो।
- 54:29अपना अस्तित्व जो वो हैं उनका समाधान हो गया।
- 54:35उनके रोग, शोक, हर्ष सब गिर गए। लेकिन वो अगर फिर भी कहते हैं कि
- 54:40जीवन दुख है तो वो तुम्हारे लिए कहते हैं, तुम्हारी सच्चाई
- 54:46तुम्हारे रूबरू करते हैं। जीवन दुख है बिल्कुल ठीक लेकिन
- 54:51तुम्हारे लिए है, बुध के लिए नहीं।
- 54:55कृष्ण के लिए जीवन दुख नहीं है, कबीर के लिए जीवन दुख नहीं, नानक
- 55:00के लिए जीवन दुख नहीं है, मेरा के लिए दुख नहीं है तुम्हारे लिए है।
- 55:03अगर बुध बोलते है, जीवन दुख है बस यही बात समझ में नहीं आई।
- 55:09तुमने इसे एक रहस्य की तरह नहीं पकड़ा।
- 55:15बुद्ध के वचनों को तुमने एक सत्य की तरह पकड़ लिया बुद्ध के वचन
- 55:20सत्य नहीं हैं, इंगित करते हैं तुम्हारी तरफ जीवन दुख नहीं है।
- 55:27जीवन दुख है तुम्हारे लिए जब तक पकड़ है तब तक दुख है और तुम
- 55:33पकड़े हुए हो वो ही जिसे कहता है संत के कूड़ा क्यों ले के आए उसे
- 55:40ही ठोकर मारकर इस कूड़े को चले जाते हैं।
- 55:43बुध और पता चल जाता है। रस की वो बूंद क्या उतरे?
- 55:49गले से नीचे बड़े बड़े सिंघासीन छूट जाते हैं और अगर तुम
- 55:56सिंघासनों की अभी डिमांड कर रहे हो इस बात को ध्यान से सुन लेना।
- 56:05अगर तुम अभी भी संघर्षों की डिमॅंड कर रहे हो, एक नंबर के
- 56:12अमीर होना चाहते हो, विश्व के बड़े मान सम्मान की इच्छा रखते हो
- 56:18लोग मेरे पांव पूजे, सारी धरती मेरे पांव पूजे, कोई निंदा न करे
- 56:24कोई उलट न बोले। मैं ही हूँ भगवान ऐसा सभी माने तो
- 56:39समझ लेना अगर तुम अभी सिंहासन मांग रहे हो।
- 56:45धन मांग रहे हो मान सम्मान मांग रहे हो डिग्रीज़ मांग रहे हो
- 56:51सूचनायें मांग रहे हो तो तुम्हें सुख मिला न तुम्हें सूचनाओं से
- 57:00सुख मिला न तुम्हें गद्दी से सुख मिला।
- 57:05लोगों ने पांव पूजे लेकिन सुख नहीं मिला और मिलता भी नहीं।
- 57:11लोगों के पांव पूजने से सुख काम मिलता है।
- 57:15सुख तो तुम्हारे भीतर है और उसका पता चल जाए कि मैं सुख स्वरूप हूँ
- 57:20तो सुख मिलता है। अखंड सुख वहाँ मिलता है जहाँ तुम
- 57:25जान जाते हो कि मैं सुख का ही सागर हूँ।
- 57:31लोग जब पूजा करते हैं तो वह अहंकार को सुख होता है।
- 57:36अहंकार तुम्हारा फूल जाता है, कोपा हो जाता है, क्षणिक सुख होता
- 57:40है अहंकार को। लेकिन वह गया के सुख भी गया जब तक
- 57:47तुम डिमांड करोगे किसी भी चीज़ की, सोने की, धन की, गदियों की,
- 57:58उपाधियों की। सूचनाओं की पावर्स की, तब तक
- 58:07तुम्हें सच्चे सुख का पता नहीं और एक संत होता है एक संत।
- 58:15यह उल्टा मार्ग है। जो सब छोड़कर सब पा जाता है, बड़ी
- 58:23उलट बासी है, ये सब छोड़कर सब पा जाता है।
- 58:28तुम तो छोड़ने से घबराती हो तो चूक जाते हो, संतो ने दान का इतना
- 58:35पुण्य बताया हमारे ऋषियों ने उसका अर्थ क्या था?
- 58:39किसी तरह तुम छोड़ना सीख जाओ तुम पकड़ने में इतने दक्ष हो गए तुम
- 58:46लिप्त होने में इतने ज्यादा दलिन हो गए कि तुम्हें छोड़ना आता है
- 58:53और अगर छोड़ते भी हो तो उससे तुम्हारे अहंकार को।
- 58:57कुप्पा होने में देर नहीं लगती, छोड़ो ऐसे छोड़ो जैसे मल मूत्र को
- 59:03छोड़ते क्या हो छोड़ने का गुमान न आये जैसे तुम्हारा पसीना बह जाता
- 59:13है शरीर से। वो त्याग नहीं है भलो भयो हरि भी
- 59:20सरो सर से ठनी पला, अच्छा हुआ पसीना निकल गया जैसे थे जैसे भय
- 59:29आह क्या प्यारा शब्द है जैसे थेत तैसे भय।
- 59:37जैसे तुम हो अगर वैसे ही हो जाओ, अब कुछ कहा न जाये पर बोलती बंद
- 59:42हो जाती है पर शोर नहीं मचाओगे फिर गलियों में राधे राधे राम राम
- 59:47नहीं करोगे? यह शोर है पर मौन में पहुंचना है।
- 59:54तो जैसे थे वैसे हो जाओ, शोर मत मचाओ, शोर मचाने से वो नहीं
- 1:00:07मिलता। शोर मचाने से सिर दर्द हो जाया
- 1:00:10करते है। शोर मचाने से शक्तियां हराश होती
- 1:00:16है। जितना शोर ज्यादा मचाओगे उतने
- 1:00:21शक्ति को गंवाओगे उतने दुखी हो जाओगे, यह ओरट बात कहते हैं,
- 1:00:33तुम्हारे संत तुम्हें कहते हैं। नाम जपो मैं कहता हूँ जितना नाम
- 1:00:39जपोगे दुखी हो जाओगे, ये उरब की बात कहता हूँ क्यों?
- 1:00:45क्योंकि जितना नाम जपोगे जपोगे किसी कारण है तू मुझे यह मिल जाए,
- 1:00:52मुझे यह मिल जाए, मुझे यह मिल जाए।
- 1:00:55और वासनाएँ बढ़ती ही जाएंगी और दुख भी बढ़ता ही जाएगा, क्योंकि
- 1:01:04सब कुछ नहीं मिला करता। वस्तुएं मिल जाएंगी, पदार्थ मिल
- 1:01:09जाएगा, गद्दियाँ मिल जाएंगी, तुम्हारी मनोकामनाएं पूरी हो
- 1:01:12जाएंगी। लेकिन जरूरतें पूरी नहीं होंगी।
- 1:01:18अब ये उलट सी बात है। समझने में बड़ी मुश्किल पड़ेगी,
- 1:01:23जरूरत पूरी नहीं होगी। तुम्हारे भीतर के अंतर की
- 1:01:27वास्तविक आवश्यकता जरूरत वह पूरी नहीं होगी।
- 1:01:32वह तो जब एक बार ही पूरी होती है, बाहर की जरूरतें रोज़ पूरी करनी
- 1:01:39पड़ती हैं। रोज़ खाना खाना पड़ता है, रोज़
- 1:01:41नहाना पड़ता है। भीतर की जरूरत एक बार पूरी करनी
- 1:01:46पड़ती है और उसके लिए। दांव पे लगाना पड़ता है सब कुछ एक
- 1:01:54कहावत है सस्ता रोवे, बार बार महंगा रोवे, एक बार बड़ी महंगी
- 1:02:02कुर्बानी है, ये फिर मिल हो जाता है, जो अखंड है।
- 1:02:07अखंड धारा सुख की प्रवाहित होती है।
- 1:02:11और फिर तुम्हें कुछ नहीं खोना पड़ता क्योंकि तुम सब कुछ खो देते
- 1:02:14हो और जब सब कुछ खो दिया, कुछ बचा ही रहे सब तुम्हारे लिए कूड़ा हो
- 1:02:22गया, तो फिर तुम कहीं भी जा सकते हो आराम से।
- 1:02:32शिष्य कहने लगे गुरुदेव स्पर्श दिखता है कि गाय बंधी है।
- 1:02:39उसने कहा अच्छा कबीर पास में गया भईया ये संगली देना।
- 1:02:46संगली दी तो उसने गाय को हड़का दिया।
- 1:02:49गाय तो भाग गई, गाय भाग गई और मालिक उसके पीछे पीछे हाय मेरी
- 1:02:55गाय दे अरे पकड़ो पकड़ो इसको ये मेरी गाय दी रोने से नहाने लगा
- 1:03:04शीशो से बोले कबीर अब बताओ कौन बंधा कौन बंधा ये आभूषण जो तुमने
- 1:03:16मोटेमोटे डाल लिए हैं? ऐसी ही तो हथकड़ियाँ होती हैं, बस
- 1:03:22फर्क क्या होता है? यह तुम्हारे मन के भीतर यह मेरा
- 1:03:27है इसको कोई छीन के ले जाए तुम पीछे दौड़ोगे तो भईया तुम मुक्त
- 1:03:33कहाँ हो गए, तुम तो अटके रह गए, फिर तुम सुख की कामना मत करो।
- 1:03:42आराम मिलेगा सुविधाएँ मिलेंगी। जिसे तुम सुख कहते हो वो तो न
- 1:03:46मिलेगा तुम कहते हो सुख क्या कोई सुख भी है?
- 1:03:59बिलकुल तुम ही सुखी हो सकते हो, बाकियों की बात छोड़ो, दूसरों का
- 1:04:04फिक्र न करो, अपनी फिक्र करो। लेकिन अहंकार बड़ा तेज़ तरार है।
- 1:04:14अहंकार बड़ा स्याना है और स्याना होने से सुख नहीं मिलता।
- 1:04:19इसलिए बाबा ने एक शब्द में सारा खत्म कर दिया कि 1000 स्यानवे हो
- 1:04:23तुम्हारे पास लाख स्यानवे हो तुम्हारे पास।
- 1:04:27सहज से स्याण प वहाँ लाखो हुए एक करना चल रहा है नाल, लेकिन
- 1:04:31तुम्हारे साथ तो एक भी नहीं जाती क्यों?
- 1:04:33क्योंकि सुख नहीं मिलता सुख कहाँ मिलता है?
- 1:04:43पूछा तुमने क्या कोई सुखी भी है? बिल्कुल सुखी है।
- 1:04:51जो पदार्थों से सुखी नहीं होता, जो पदार्थों को इकट्ठा करके सुखी
- 1:04:57नहीं होता, जो पदार्थों को छोड़कर सुखी नहीं होता।
- 1:05:01दोनों समान हैं उसके लिए जैसे बच्चे के लिए सर्प और मोती।
- 1:05:10बृजंगम मुक्ति कशर जो हो कृष्ण रत्न अलोस्ट हो सुहर्द पक्षी पक्ष
- 1:05:14हो त्रिनार विन्ध्यचक्ष सो प्रजामे महेन्द्र हो संप्रवत् कथा
- 1:05:20सदाशिवम प्रजापियों विरोधों में जब तुम्हें समानता प्रतीत हो
- 1:05:27मान्यता न हो। मान्यता और प्रतीति में बड़ा
- 1:05:32मान्यता तुम्हारी खोपड़ी के लिए जाद है प्रतीति तुम्हारे अनुभव से
- 1:05:38आती है, ये तुम्हारी मान्यता न हो तुम्हारी प्रतीति हो, तो तुम सुखी
- 1:05:48हो जाओगे। फिर तुम्हें लगेगा लोग यहाँ दुखी
- 1:05:57जानबूझकर हैं और यह सच भी है। तुम दुखी हो तुम जानबूझकर दुखी हो
- 1:06:05तो मैं कोई दुखी करता हूँ सच बोलूं।
- 1:06:10तुम अपने ही कारण दुखियो। जीतों प्रेम मिलाने की चाह?
- 1:06:32जेतों प्रेम मिलन की चार शी शतलीधर।
- 1:06:48घर मेरे आऊं जे तो प्रेम मिलन की चा जे तो प्रेम मिलन।
- 1:07:07शी तलीधर शी तलीधर। शीश तलीधरु शीश तलीधरु घर मेरे आ
- 1:07:40घर मेरे आ। जे।
- 1:07:46तुम प्रेम मिलन की चा शीश को तरीके पर रख लो फिर मेरा घर
- 1:07:59तुम्हारे लिए खोला है उससे पहले नहीं।
- 1:08:04मैं कहता हूँ तुम अपने कारण दुखी हो जीस दिन तुम अपने आपा जिसे शीश
- 1:08:11से कहते हैं कभी के ऊपर रख लिया उस दिन कहाँ दुख रहा है क्या?
- 1:08:20तुम दुखी हो अपने कारण इस सूत्र को बांध लेना जब तक तुम हो तब तक
- 1:08:25दुख है तुम हो दुखों का मूल कारण तुम अपने ही कारण दुखी हो दूसरा
- 1:08:33कोई कारण नहीं है। यह ठीक है, तुम दूसरों के कारण
- 1:08:38मढ़ देते हो। उसके कारण मैं दुखी हूँ लेकिन
- 1:08:43दूसरा कारण नहीं होता। सच पूछो तो तुम्हारा कोई मोड़ा भी
- 1:08:48लगा जाये, कंधा भी मर जाये तो तुम दुखी हो जाते हो और बुध के ऊपर
- 1:08:54थोक भी जाये, कोई दुखी नहीं होता। तो फिर तुम अपने कारण दुखी हुए
- 1:09:02क्योंकि बुद्ध के तो कंधा नहीं, बुद्ध के तो गाली मार दी, थूक
- 1:09:09दिया उसके ऊपर, लेकिन क्रोध नहीं है, उनका बटन उसके हाथ में है,
- 1:09:15बुद्ध के हाथ में अपनी जिंदगी का बटन है।
- 1:09:19तुम्हारी ज़िन्दगी का बटन किसी के हाथ में है तुमने पकड़ा रखा है
- 1:09:23दूसरों के हाथों में है, तुम्हारी ज़िन्दगी का बटन तुम तुम्हारे
- 1:09:29कारण दुखी हो, अपनी ज़िन्दगी का बटन संचालन अपने हाथों में लेना
- 1:09:36फिर तुम स्वतंत्र हो पाओगे। तुम स्वतंत्र होने की मात्र
- 1:09:40कल्पना और इच्छा करते हो, लेकिन बटन तुम लोगों को दे देते हो यही
- 1:09:47गलती खा जाते हो तुम अपनी ज़िन्दगी के जीने के बटन अपने
- 1:09:51हाथों में रखो अपनी स्वतंत्रता तभी तुम कायम रख पाओगे।
- 1:09:55तुम इच्छा करते हो कि मैं लाइबरेट हो जाऊं।
- 1:09:58मैं आजाद हो जाऊं लेकिन बटन तो तुमने लोगों के हाथों में पकड़ा
- 1:10:02रखा है, वो जब चाहें तुम्हें क्रोध दिला दे, वो जब चाहें
- 1:10:07तुम्हें कहीं किसी के लिए जाये, तुम तुम्हारे मालिक नहीं हो,
- 1:10:15इसलिए मैं कहता हूँ तुम अपने कारण दुखी हो।
- 1:10:19अपना आपा अपने आपे में रखो, अपना बटन अपने हाथ में रखो, फिर तुम
- 1:10:28सुखी हो जाओगे। ये एक सूत्र है।
- 1:10:39एक भिक्षु को किसी संत ने शिक्षा पूर्ण करके कहा, बस मैं इतना
- 1:10:47जानता था, इससे आगे मेरे पास कुछ नहीं।
- 1:10:52भिक्षु को बोला, प्रभु अब मैं कहाँ जाऊं?
- 1:10:58अब इतना मैंने सीख लिया कुछ थोड़ा थोड़ा रस आने लगा।
- 1:11:04आगे फिर मुझे कोई राह दिख रहा तो संत ने कहा तुम जनक के पास चले
- 1:11:12जाओ, आगे की राह तुम्हें जनक दिखाएंगे।
- 1:11:17जनक यहाँ के राजा हाँ उसके पास जाओ, तुम उपाधियों से सोच लेते
- 1:11:26हो। महंगे महंगे वस्त्र भूषण डालने
- 1:11:31वाले यह व्य जयंती माला डालने वाले इकोनॉमिक।
- 1:11:37कुंडल और हाथों में स्वर्ण मुद्राएं ये तो लालची लोग हैं, ये
- 1:11:45क्या सिखाएंगे मुझे मेरे पास तो कोबीन है अकेली चलो गुरु आज्ञा
- 1:11:55मान के चले गए जाके देखा शांत हो चुकी थी सूरज ढलने वाला था, डाल
- 1:11:59ही गया था। देखा महफिल जमीं, शाम का वेला जनक
- 1:12:06ने महफिल सजा ली थी, सुरैया भर दी गई थीं, प्यारे छनक रहे थे, भरे
- 1:12:14जा रहे थे, नृत्यकीय नाच कर रहे थे।
- 1:12:19सुगंधित इत्र छिड़क दिए गए थे। माहौल बड़ा खुशनुमा था और दरवाजे
- 1:12:30पे आकर देखा भिक्षुक ने अरे गुरु ने मजाक कर दिया, इसके पास भेजा।
- 1:12:39इस परम भोगी के पास भेजा इससे तो मैं अच्छा हूँ।
- 1:12:46मेरे पास तो मात्रकोपिन है यार ये भिक्षा पत्र है, बैठने के लिए
- 1:12:53वैरागण है बस और कुछ भी तो नहीं है इसके पास तो किता कुछ है।
- 1:12:59और ये तो शराब पीता है, ये तो इतनी महफिल हो जाता है, यहाँ तो
- 1:13:04जान खड़क रहे हैं और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और।
- 1:13:16और ज़रा सीधे से साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही
- 1:13:26क्या है, होश भी तक है बाकी और ज़रा सीधे दे साखी।
- 1:13:35और ज़रा सी और जाम पे जाम झलक रहे हैं अलग से नीचे उतर रहे हैं ऐसा
- 1:13:44शानदार माहौल लेकिन भिक्षुक ने आँखें बंद कर लीं।
- 1:13:48राम राम, राम, राम, राम। एक गड़बड़ हो गया, गलत जगह दिया
- 1:13:55गुरू ने, अब क्या करें? तो भागो यहाँ से लेकिन जनक की
- 1:14:02पैनी दृष्टि से कोई बच सका है। जनक ने कहा अपने सिपाही सलारों से
- 1:14:08जाओ उसको पकड़ के ले के आओ। और खुद भी उठे सिंहासन से बाहर आ
- 1:14:12गए, बोले उस भिक्षुक से क्या बात चले हो?
- 1:14:20हाँ हाँ चला हूँ, गुरु ने मजाक कर दिया, कोई बात नहीं फिर कह ठंडी
- 1:14:28रात है। बदन पे कपड़ा नहीं मात्रकोपिन है
- 1:14:34सर्द रात है कि नहीं रात है रुको रात मेरे कमरे में अलग से सो जाना
- 1:14:42तुम्हारे लिए सारी व्यवस्था कर दूंगा, सुबह होते ही चले जाना
- 1:14:47कहाँ जाओगे रात को? रास्ते में बण है, हिंसक पशु
- 1:14:55जानवर हैं, साँप सम्पौले हैं, जीवन का खतरा है, रात यहीं रुको,
- 1:15:02अपना खाना खाओ, जो भी खाते हो वैसा ही मिल जायेगा, लेकिन रुको
- 1:15:08कोई बात नहीं। सुबह मैं तुम्हें जगा लूँगा, मैं
- 1:15:11सुबह उठता हूँ 5:00 बजे और तुम्हें जगा लूँगा, भिक्षु को रुक
- 1:15:19गया, रात को कमरे में रुका महफिल खत्म हुई जनक जा के सो गए।
- 1:15:28सुबह उठे सुबह उठ कर सुबह की सैर के लिए जाते थे, दरवाजा खटखटाया,
- 1:15:42बिग सुख ने दरवाजा खोला आओ चलो थोड़ा सा सैर घूम आओ मेरा चल।
- 1:15:49अनमने से भाव से चलाओ, मन में सोच रहा है, इसमें मेरे में क्या फर्क
- 1:15:56है? इतना कुछ इकट्ठा किए हैं, इतना
- 1:16:01कुछ भोगी है और मेरे सामने मैंने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख
- 1:16:06लिया। जाम पे जाम ढल रहे हैं, नर्तकीया
- 1:16:11नाच रही हैं, इसे शर्म नहीं आती ये कैसा संत हुआ और मेरे गुरु ने
- 1:16:20मजाक कर दिया। चलते चले गए, चलते चले गए, दूर
- 1:16:28चले गए, काफी दूर चले गए। काफी दूर चले गए।
- 1:16:35शहर से बहुत दूर अपना एरिया खत्म हो गया।
- 1:16:39चलते ही चले जाते हैं। भिक्षुक ने देखा।
- 1:16:46कहाँ जाके रुकेंगे? यह तो दूसरा देश आ गया है ने पीछे
- 1:16:55मुड़ के देखा महलों की आग लगी है, बड़ी ऊंची ऊंची लपटें।
- 1:17:04घबराए वो तो उसने कहा राजा हाँ महलों की आग लगी बागो जल्दी करो
- 1:17:17तुम्हारे महलों को देखो ज़रा लपटे पीछे घुमाके मुख।
- 1:17:23आँखें तो गुमाओ ये गगन चुम्भी, लपटें सब स्वाहा कर देंगे
- 1:17:30तुम्हारे साम्राज्य को लेकिन जैसे सोना ना हो, जनक के चले ही जाते
- 1:17:37हैं। भिक्षुक बोले तुम बोले हो पहरे
- 1:17:43हो, सुनता नहीं तुम्हे महलों को आग लगी है, जाओ बचा लो जनक न कोई
- 1:17:54बात नहीं है। जल जाएगा, जल जाएगा।
- 1:18:00चलो हम सैर का मज़ा क्यों चूके थोड़ी दूर और बस फिर वापस चले
- 1:18:07जाएंगे, लेकिन भिक्षिक तो भागा वो कहता आप तो पागल हुए रखते हो?
- 1:18:14आप को शॉक लगा है महलों की आँख का समाचार आप बचा नहीं पाए पागल हो
- 1:18:20गए हो शॉक लगा है तुम्हें लेकिन मैं तो चला अरे कहाँ चले हो,
- 1:18:30रुको? मेरी लंगोटी है वहाँ जल जाएगी दो
- 1:18:38ही तो लंगोटिया है एक मैंने डाल रखी है एक को तीन मैंने धोके सुखा
- 1:18:42दी। सुबह स्नान करते वक्त जानक ने कहा
- 1:18:50तुम रात सोच रहे थे कि तुम्हारे में और राजा जनक में क्या फर्क
- 1:18:56है? बस यही फर्क है।
- 1:19:01मेरा सब जल गया, लेकिन मैं भागा नहीं हूँ तुम्हारा कुछ भी नहीं
- 1:19:08जला, लेकिन तुम भागे बस भिक्षु। तुम्हारे में और मेरे में यही
- 1:19:17फर्क है, जोड़ो जोड़ना कोई बुरा नहीं प्रग्रह कोई बुरा नहीं,
- 1:19:30लेकिन आयु का मंत्र जोड़ो। ऐसे जोड़ों जब चाहे तुम संत की
- 1:19:40तरह छोड़कर किसी और जगह जा सको, वो जो छोड़ के आये क्लैश मात्र भी
- 1:19:49तुम्हें उसकी याद न आये अगर याद आ गया।
- 1:19:54तो फिर तुमने छोड़ा नहीं जोड़ो, जोड़ने में कोई बुरा नहीं है
- 1:20:02रिग्रह करो जितना कर सकते हो करो लेकिन इस तरह करो जब वहाँ से उठ
- 1:20:12गए। तो फिर पीछे मुड़ कर झांकों न कुछ
- 1:20:19छोड़ के आए हो ये मन के भीतर रेखा ना खिची जाए तिल मात्र में।
- 1:20:28हर कदम पे उन्हें। मुड़ के देखा हर कदम पे उन्हें
- 1:20:47मुड़ के देखा। उनकी महफिल से हम उठ तो आए आंसू
- 1:21:06चार तो आंसू। भराएं मुद्दतें हो गईं,
- 1:21:19मुस्कुराएं आसूचा तो आंसू। बरार तुम कहती हो बेटी कोई सुखी
- 1:21:34है, बिल्कुल है तुम हो सकते हो मेरे इस सूत्र को पहले बांध लो,
- 1:21:41हृदय में उतार लो, जो है उसको ऐसे छोड़ दो।
- 1:21:53उसका पता न चले, संत कहते हैं दान करो, दायें से दान करो, बाएं को
- 1:22:00पता न चले जैसे तुम मल मूत्र को त्याग देते हो, कभी याद करते हो,
- 1:22:08बस ऐसे ही दान करते हो? दान ऐसा होना चाहिए, वह कूड़ा है,
- 1:22:20यह संत जो छोड़ गया था वह कूड़ा है, जीस दिन तुम इस स्थिति में
- 1:22:26पहुँच जाओ। उस दिन संत का लुत्फ तुम उठा
- 1:22:31सकोगे। उसके बिना संत का लुत्फ नहीं उठा
- 1:22:36पाओगे। उससे पहले दुख ही दुख है इसलिए
- 1:22:43बुध वापस तो आए लेकिन वापस कहाँ आए?
- 1:22:51कपिल वस्तु लौटे लेकिन कहाँ लौटे? उन्हें कुछ याद नहीं आया कि यहाँ
- 1:22:59मेरा कुछ है, मेरा पुत्र है, मेरी धर्मपत्नी है, मेरा राज़ है, मेरा
- 1:23:05पिता है। छोड़ो, ऐसे छोड़ो कि जैसे
- 1:23:13तुम्हारा नहीं हो, अगर तुम ऐसी अवस्था में आ जाते हो और जब चाहे
- 1:23:20उठ के चल सकते हो और याद रखो यह ड्रामा नहीं होना चाहिए।
- 1:23:26यह सर्कस नहीं होना चाहिए। मन में तिल मात्र भी लेस मात्र भी
- 1:23:34वह जो छूट गया उसकी स्मृति न माने।
- 1:23:42फिर तुम सुखी हो जाओगे। अन्यथा तुम दुखी ही रहोगे।
- 1:23:45बेटी बस सुख का मूल मंत्र तुम्हें बता दिया सब कर्म करो सब बोगो
- 1:23:52खाओ, पियो मोज करो, लेकिन एक स्मृति बनी रहे और जब छोड़कर तुम
- 1:24:01चाहो तब जा सको। मौत तुमसे धक्के से छुड़ाई और तुम
- 1:24:06रोते रोते छोड़ो ये कोई छोड़ना न हुआ तुम अपनी इच्छा से छोड़ो।
- 1:24:13जब मौत आये तो मैं तैयार पाई और तुम स्वागत कहो मौत को धन्यवाद
- 1:24:19तुम आए मैं इंतजार में था। मैं इंतजार में थी चलो चले एक
- 1:24:27सिंहासन चढ़ चले तो ऐसा व्यक्ति सिंहासन पर चढ़ के चलता है एक बंध
- 1:24:34है जात ज़ंजीर और जिसे मौत कहती है चलो खींच के ले जाना पड़ता है।
- 1:24:42जाने को तैयार नहीं होते। जैसे ही अड़ियल बच्चा होता है, ना
- 1:24:45स्कूल नहीं जाता। एक छोटे कचरे को गणेश के लेके जा
- 1:24:51रहे थे, उसके मालिक वहाँ से एक माता पिता और बच्चा जा रहा था और
- 1:24:59वह कट्टा आगे नहीं चल रहा था। कचरा होता है ना भैस का बच्चा तो
- 1:25:07वह बच्चा बोला पिताजी क्या इसको स्कूल ले के जा रहे है?
- 1:25:18अगर तुम ऐसे गए तो फिर पढ़ नहीं पाओगे।
- 1:25:24क्योंकि उसे एक ही अनुभव था। जब वो स्कूल जाता है तो कट्टे की
- 1:25:28तरह अड़ाता जाता है और तुम भी जब शरीर छोड़ते हो तो कट्टे की तरह
- 1:25:36अड़ाते हो, यह तुम्हें अच्छा नहीं लगता।
- 1:25:44शरीर को छोड़ना इतनी आसक्ति हो गई है इतना जोगड़ा बच्चे थे बच्चे से
- 1:25:51तुम जवान हो गए, बूढ़े हो गए, अब छोड़ने का जीव नहीं करता, इतना
- 1:25:54जोगड़ा है पदार्थ और इतनी। तुम्हारी मान्यता है लोग तुम्हें
- 1:26:04पूज रहे हैं इतनी गद्दियाँ यहीं तो दुख है सारी उम्र भाग दौड़ के
- 1:26:15हम एक छोटी सी गद्दी कमाते हैं। हाय रे मो।
- 1:26:22वो भी तो छीन के ले जाती है, तभी रोते हो।
- 1:26:25तुम दुखी है। संसार बिलकुल है, लेकिन बुद्ध ने
- 1:26:33तुम्हारे लिए कहा, ऐसा नहीं कहा कि तुम सुखी नहीं हो सकते।
- 1:26:39नहीं फिर तो उनका बोलना व्यर्थ था।
- 1:26:42फिर तो न बोल दे, अगर सुखी नहीं हो सकते तो तू ना बोल दे।
- 1:26:46बुद्ध कहते संसार दुख है लेकिन तुम दुख हो और जैसे मैं सुखी हो
- 1:26:51गया ऐसे तुम भी सुखी हो सकते हो, ऐसे हो जाओ कि तुम्हारा इकट्ठा
- 1:27:01किया हुआ सब धन धन न रहे। कूड़ा बन जाए, माटी बन जाए बजरंग
- 1:27:13मुक्ति कसरजोव कृष्ण रत्न लोक्ष्य हो सुहिद पक्ष पक्षियों त्रनार
- 1:27:19विन्ध्य जक्षसो प्रजा में ही महिन्द्रयो संप्रवृत्त काय कथा?
- 1:27:23सदाशिवम बजा में हम श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:27:39हेनाथ नारायण वसुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:27:54हेनाथ नारायण वसुदेवा तुमात स्वामी सखा हमारे।
- 1:28:08हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:28:26हे नाथ नारायण वसुदेव व श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:28:40ना? श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारें हे
- 1:29:11नाथ नारायण वासुदेववा पितुमात स्वाम।
- 1:29:19सखा हमारें पितुमात स्वामी सखा हमारें हे नात नारां यन वासुदेववा
- 1:29:34श्री कृष्ण गोविंद। हरे मुरारे ये नाथ नारायण वासुदेव
- 1:29:51ओं धन्यवाद।