Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Oct 25 - सतोरी से आगे क्या होता है? मौन तक कैसे पहुंचें? क्या कॉन्फेशन से पाप मिट जाते हैं? Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:12बाबा क्या हमारी कोई स्वतंत्र सत्ता है और दूसरा प्रश्न है कि
- 0:27आप किसी भी बात को? इतनी ज्यादा बारीकी से पर विस्तार
- 0:34से क्यों समझाया करते हो? जबकि थोड़े से भी समझाने से आप
- 0:43समझाए जाते हो? मैं ज्यादा विस्तार से इसलिए
- 0:51बोलता हूँ क्योंकि मैं जड़ों में सराह चाहता हूँ, उपदेशक तुम्हें
- 1:02डाल डाल पात पात टहनी टहनी से जवाब देगा।
- 1:10मैं जड़ों में उतर जाऊंगा, इसलिए तुम मुझे कहते हो, तुम्हारे जवाब
- 1:18निराले होते हैं, निराले होंगे। उन्होंने जवाब दिया, डाल डाल पात
- 1:28पात टहनियों से श्रद्धाओं से मैंने इन सबको छोड़ दिया।
- 1:42और मैं वहाँ चला गया जहाँ से ये डाल डाल पात पात सींच ही जाती है
- 1:48जहाँ से हँस आता है जिसके बिना ये जीवत नहीं रह सकती और निश्चित ही
- 1:59जड़ों पे जाने वाला व्यक्ति। जो भाषा बोलेंगे, वह डाल डाल पात
- 2:06पात की भाषा से बिल्कुल अलग होगी। इसलिए आपको मेरे प्रश्न के उत्तर
- 2:15लोगों से बहुत निराले मिलेंगे। ज्यादा स्ट्रिक्ट भी है और सत्य
- 2:24भी है। सत्य हमेशा जड़ों में होता है।
- 2:36आपने पूछा। क्यों बोलते हो आप इतने ज्यादा जब
- 2:43थोड़े से समझ आ जाता है इतना बोलने से भी तुम्हें समझ आ जाए तो
- 2:53शुक्र है। उपनिषद कितना बोल के गए, सूत्रों
- 3:01में बोल के गए, अब्रीविएशन में बोल के गए मंत्रों में बोल के गए।
- 3:11लेकिन आपको कहाँ समझाया? इसलिए विस्तार में बोलना है
- 3:19क्योंकि मैंने देखा कि आप मंत्रों से सूत्रों से समझनी पाता है,
- 3:24थोड़ा विस्तार लाजिम है, इसलिए विस्तार करता हूँ अगर एक।
- 3:35मंत्र को पकड़ लिया जाए तो उसका अर्थ बहुत हो जायेगा।
- 3:40कोई कुछ अर्थ करेगा, कोई कुछ अर्थ करेगा, लेकिन मेरे विस्तार से
- 3:44बोलने में ज्यादा अर्थ नहीं तुम कर पाओगे, बस उसका एक ही अर्थ
- 3:52निकलेगा। हित में उलझने से बचा के।
- 4:01इसलिए मैं ज्यादा गहरा जाके संक्षिप्त में नहीं ठहरता विस्तार
- 4:06में चला जाता हूँ। विस्तार में जाने से आने वाली
- 4:13पीढ़ियों तक की तुम्हारी मान्यताओं तो खंडित करता हैं, आने
- 4:19वाली पीढ़ियों तक की मान्यताओं को खत्म करने की चेष्टा करता हूँ।
- 4:31जब तुम्हें पता चल गया कि वह मौन है, पर मौन है इतने से बात बनेगी
- 4:39नहीं, मैं इसका विस्तार करूँ। क्योंकि बोलने से जपने से राधे
- 4:52राधे करने से राम राम करने से यह बोलना हो गया और वह मौन है तुम
- 5:02मौन होना चाहते हो। ये तुम्हें बुलाना चाहते हैं
- 5:07पहुंचोगे कैसे? उस सम्मान के पास शब्दों को लेकर
- 5:13कैसे जाओगे? इसलिए मैं विस्तार करता हूँ।
- 5:22मुझे यह फिक्र नहीं। कि मुझे कितने सुनती हैं, कौन
- 5:27सुनता है, नहीं सुनता है क्यों यह मेरा उद्देश्य भी नहीं।
- 5:35मेरा उद्देश्य है कि जो भटके हुए लोग हैं, सत्य की तलाश में हैं
- 5:40बहुत भटक लिए। उन्हें पथ प्रदर्शन दे दो एक और
- 5:51क्वेश्चन आया है बाबा मेरे नौ गुरु मैंने बदल लिए, डरता हूँ
- 5:58आपसे कहने में कि आप मुझे दीक्षा दे दोगे?
- 6:06बिल्कुल दीक्षा दे दूंगा। एक शर्त में शर्त ये है कि नौ
- 6:12गुरुओं से तुमने कुछ पाया नहीं पाया तो मेरे पास है।
- 6:20फिर तुम काम के हो अगर नौ गुरुओं का कूड़ा कबड़ा ले के दिमाग में
- 6:28मेरे पास पहुँच गए तो मत आना बिल्कुल मत आना, क्योंकि फिर मैं
- 6:35जो बोलेंगे वो तुम उसे मेल करोगे। कंपैरिजन करोगे और भीतर ही भीतर
- 6:45मैं बोलता जाऊंगा, तुम कंपैरिजन करते जाओगे?
- 6:52तुम्हारा दिमाग सेंसरशिप में उलझा होगा।
- 6:55मैं बोलने में तुम मुझे कहाँ सुन पाओगे?
- 7:00कभी कोई गुर फंस जाएगा, कभी कोई गुर फंस जाएगा।
- 7:04यही तो आज हो रहा है। मैं बोलता हूँ मुझे पांच वर्ष बाद
- 7:11पता चलता है कि अरे ये तो ओशो से चिपटा हुआ है।
- 7:18ओके बोलता बोलता? जब मैं उसी का विरोध करता हूँ तो
- 7:23विरोध सत्य करता हूँ, वो विरोध नहीं करता, वो मैं सत्य बताता हूँ
- 7:31तो इसको आग लग जाती है। जब आग लग जाती है तो मैं समझ जाता
- 7:34हूँ के भाई चेपकाहट तो यहाँ बड़ी है।
- 7:38तुम कहीं और उखाड़ने की चेष्टा कर रहे थे, चिपके तो यहाँ पड़े हैं
- 7:43जनाब जिसके लिए जो चिपका हट है वो उसके काम आये थे तुम किसी शास्त्र
- 7:57से किसी गीता से। किसी कुरान, पुराण, बाइबल से किसी
- 8:04ग्रंथ साहब से किसी उपनिश्चित से किसी भेद से किसी से भी चिपके
- 8:11पड़े हो और मुक्त होने की कामना करते हो, ये तुम्हारी कामना
- 8:19व्यर्थ है। ऐसी कामना करना और चिपकाहट को
- 8:27बरकरार रखना, ये दोनों चीजें संभव नहीं है अगर।
- 8:38मुक्त होने की इच्छा जगी मौमुक्षु हो तो मुझे सुनने के लिए आ जाओ,
- 8:48लेकिन एक बात को ध्यान में रखना जो अब तक सीखा।
- 8:56अगर तू उससे कुछ पाया तो मत आना मेरे पास जरूरत भी क्या है?
- 9:03जो हो गया वो लंगर में बैठी और अगर नौ गुरुओं से कुछ नहीं मिला।
- 9:15तो फिर तुम आ जाओ, लेकिन शर्त ये है कि मैं जो उधेड़ हूँ तुम्हें
- 9:24तुमने चिल्लाना नहीं मैं चुटकी भरूंगा काम ही मेरा, मेरा तो गंदा
- 9:31है। ना कोई शिवर लगाता हूँ ना कोई
- 9:36पाखंड ढक लारता हूँ ना कोई बाहर बड़े से तंबू लगाता हूँ ना लोगों
- 9:41को आमंत्रित करता हूँ बस मैं तो बैठा हूँ तुम ही खींचे चले आते हो
- 9:48तो आते हो और अगर तुम तैयार हो। जो तुमने चिपकाटे बना ली, जो पहले
- 9:57गुरु से के पास जाने से पहले तुम्हारे पास चिपकाटे थी वो पहले
- 10:04गुरु ने तोड़ने की चेष्टा की, दूसरे ने सभी ने की होगी, लेकिन
- 10:11तुमने? कंपैरिजन किया, सिर्फ तुम
- 10:16चिपकाहटों को छोड़ नहीं पाए? यही कारण है कि आज तुम्हें दसवें
- 10:21ग्रुप की तलाश है। ज़रा सोच लो अच्छी तरह से वक्त
- 10:28बहुत है, आ जाना। लेकिन ये पूरी तैयारी करके है ना
- 10:38कि मैं तुम्हारे जो चिपके हुए पोस्टर हैं इनको दीवार से हटाऊंगा
- 10:50इनको खंड विखंड करूँगा। अगर उस आनंद की वक्त वास्तव में
- 10:59तलाश हो गई है तो तुमने चिल्लाना नहीं है?
- 11:09नरेंद्रनाथ की तरह विवेकानंद की तरह मेरे माँ बाप भी हैं।
- 11:12मेरे भाई बहन भी हैं। अगर ऐसा कुछ है तो फिर बने रहो,
- 11:18जहाँ भी हो क्या आवश्यकता है और अगर बिलकुल दुखी हो गए हो।
- 11:29इनको छोड़ने को तैयार हों अपनी पूर्व की आग्रहों को पूर्वाग्रह
- 11:36पूर्व मान्यताएँ ये उड़े हुए नकाब मैं सब हटाऊंगा।
- 11:46और इनके हटाने पे अगर तुम चलाओगे तो फिर वैसे ही छोड़ दूंगा जैसे
- 11:52राम कृष्ण ने कहा ठीक है, अगर माँ बाप हैं तो फिर जाओ फिर क्या कर
- 11:57रहे हो तो आ जाना सोच समझ के आ जाओ।
- 12:07मेरा काम ही है, तुम जिससे जहाँ भी चिपके बड़े हो, कोई एक चिपकाट
- 12:13नहीं है तुम्हारी बस तुम उसे उखाड़ तो नहीं पाते की तुम उसे
- 12:21देख नहीं पाते। गुरु देख पाता है कि तुम यहाँ
- 12:28चिपके पड़े हो। विस्तार से क्यों बोलते हो?
- 12:39दूसरा कर्मी है। कि अब मैं लौट के नहीं आऊंगा, बस
- 12:51जो भूल गया वो आखिर उसके बाद मैं बोलने के लिए फिर नहीं आऊंगा।
- 13:01निश्चित है, पर मैं नहीं आऊंगा और जब तक कोई दूसरा इन मान्यताओं को
- 13:11तोड़ने के लिए नहीं आएगा, पता नहीं कितनी देर तक जाए।
- 13:18तब तक के लिए ये पाखंडी लोग तुम्हारे दिमाग को इतनी गंदगी से
- 13:24भर देंगे, कूड़े से भर देंगे, गलत सूचनाओं से भर देंगे कि उनको
- 13:36हटाना मुश्किल हो जाएगा। नए संत।
- 13:40उस बेचारी ने तुम्हारा क्या बिगड़ रहा है?
- 13:45वह तुम्हारी धूल दमा से पूछने के लिए आया है और तुम उसको गाली
- 13:50निकालना शुरू कर देते हो। तुम इतनी अत्या जारी हो जाते हो,
- 13:57ईसा को कृष दे देते हो। मनसूर के हाथ पांव काट देते हो?
- 14:03सुकृति को जहर का प्यारा बना देते हो कि संत पुरुष के साथ तुमने
- 14:10बद्र व्यवहार किया क्यों? क्योंकि वो तुम्हारी मान्यताओं से
- 14:18विपरीत बढ़ता था और तुम तुम्हारी मान्यताओं को छोड़ने को राजी नहीं
- 14:24हो। पहले भी राजी नहीं थे इसलिए चूक
- 14:28गए सभी को आज अगर तुम इस धरा पे मौजूद हो तो इसका और कोई दूसरा
- 14:34कारण है। मातृ कारण है कि तुम तुम्हारी चुक
- 14:39काहटों को छोड़ने को राजी है और अगर अब राजी हो तो आ जाओ, मैं तो
- 14:48बिल्कुल फरी हूँ, मैंने कुछ नहीं कर।
- 14:59मैं जो बोल जाऊंगा विस्तार में इसलिए बोलना चाहता हूँ कि फिर ये
- 15:05गंदे लोग तुम्हारी दिमाग में गंदगी न बढ़ें, राधा राधा करते
- 15:14रहो, मुक्ति मिल जाएगी, राम राम करते रहो।
- 15:21ये कल ही मैंने देखा जीवा को तालु के साथ लगा दो।
- 15:26जीवा को तालु के साथ लगा दो मुक्ति मिल जाएगी।
- 15:32अब इन पागलों का क्या किया जाए? क्या हाल है इनका?
- 15:43एक फटे पुराने कपड़े पहने बैठा था।
- 15:46यह भी एक प्रकार का श्रृंगार है, तो मैं समझाता हूँ जीस चीज़ से
- 15:52तुम खिंच जाते हो, वह श्रृंगार होता है।
- 15:57वो फिर तुम फेसबुक फेस पाउडर की लाली से खींचो या फटे कपड़ों से
- 16:08खींचो? वह जयंती महाराणा से खींचो या
- 16:12काली पीली दाढ़ी से खिंचो। जिससे तुम खिंचो वह है श्रृंगार
- 16:18तो किसी ने कहा और तो कोई है नहीं।
- 16:20श्रृंगार अब कपड़ों को ही पढ़ लेते हैं तो उसका कुर्ता फटा हुआ
- 16:27है और वृक्ष के नीचे बैठा हुआ प्रदेश कर रहा है।
- 16:36कोई मोक्षु आ गया जिग्गासू आ गया वो कहता बाबा मेरे कान में आवाज
- 16:40आती है नाध जैसे नाग नाग वो कहता अनक न तोलते।
- 16:51तो मानसिक उपचार कराओ, पागल हो गए हो?
- 16:57किसी ईएनटी स्पेशलिस्ट को दिखाओ। तुम्हारे कानों में टाइनीटस हो
- 17:02गया है। मैंने कहा फिर ऐसे सारे अस्तित्व
- 17:13को टाइनीटस हो गया है। अस्तित्व तो यही आवाज निकालता है।
- 17:17ज़रा रात के सन्नाटे में देखो यही तो आवाज होती है जंगल की
- 17:25अनस्ट्रिक्टेड सॉन्ग तो क्या सारे अस्तित्व को टेनेंटिस हो गया?
- 17:35अगर मैं ना बोलूं तो तुम ऐसी वृहद चीजों को सूख जाओ।
- 17:45अब ये फटा कुर्ता पहन के बैठा है। यह भी एक श्रृंगार का ढंग है।
- 17:53तुमने देखा अच्छी भली पैंट पहनते थे बच्चे और इस बोथे वाले गुरु
- 18:01रामदेव जी ने आके कह दिया ये क्या तुम रोम को बंद कर लेते हो रोम को
- 18:06सांस नहीं आता रोम रो को सांस नहीं आता।
- 18:10घुटके मर जाता है। अरे खुला बोथब पैरा करो ना लेकिन
- 18:21कृष्ण सही कहते हैं अलफाजों पे मत जाना, लक्षणों पे जाना।
- 18:29ये लक्षण क्या करते हैं? लक्षण ये कि वो बोथे वाला भाई आज
- 18:39जीन्स बेच रहा है। क्या हुआ उसका बोथे काम?
- 18:52साँस अब नहीं रुकता। क्या तुम्हारी जीन पहनने से जीन
- 19:01के भीतर कोई ऑक्सीजीनेटेड फॉर्मूला है?
- 19:04क्या? क्यों लोगों को बेवकूफ बनाते हो?
- 19:12कैसे संत हो तुम अगर तुम्हें ये नहीं पता धोखाधड़ी से तुम हजारों
- 19:17करोड़ो के मालिक हो जाओगे बिलाशक लेकिन ये मलकियत कितनी देर ठहरेगी
- 19:26आय दाढ़ी काली है, कल को सफेद भी होगी।
- 19:33और फिर जलने में सहायता भी करेगी। देखो आग पकड़ती है पहले बालों ये
- 19:40लंबी दाढ़ी जलने में सहायता भी तो जल्दी करती है धू धू करके जल हो
- 19:47गए हैं। क्या इस दिन के लिए लोगों से
- 19:51ठगियाँ मारी थीं? कौन सा विचार ठीक है?
- 19:58तुम्हारा सत्य क्या है? वह जो भौता पहनने से सब रोम रोम
- 20:04को श्वास आता है वो। या फिर अब ये जीन बेच रहे हो?
- 20:10अब इससे श्वास नहीं गुटता यह सत्य क्या है?
- 20:16तुम दोगलेपंथी क्यों हो जाते हो, क्यों तुम्हारी जमीर मर जाती है?
- 20:26इन डालरों की चमक और खन का देख के देखिये एक वो बाबा है क्या सतगुरु
- 20:37क्या नामन का कल मैंने देखा पुलिस वाले उनको पकड़े ने कहा इसको
- 20:43क्यों पकड़ लिया? देखा तो नीचे अडटाइज़्मन्ट है
- 20:50क्या तमाशे कर रहे हैं क्या तमाशे और नीचे लिखा पैसे को कैसा कैसे
- 21:02बढ़ाओ जल्दी से। तो तुम चेतना को बढ़ाने का काम
- 21:10करने आए हो, इस धरती पे या पैक्सी को बढ़ाने का काम करने आए अगर तुम
- 21:18में इतनी भी समझ नहीं है। तो तुम अपने शिष्यों को समझाओगे
- 21:23क्या खाक? और इन्हें हम संत कहते हैं?
- 21:31सद्गुरु कहते हैं बातों में एकात्मता नहीं है, बात करते हैं।
- 21:45अल्फाज़ इनके ठीक होते हैं खूब बहू मेल खाते हैं कृष्ण से भी,
- 21:51अष्टावक्र से भी उपनिषद से भी लेकिन अगर इनसे पूछो की क्या तुम
- 21:57उस मुकाम पे गए जिसकी बात कृष्ण करते हैं, अष्टावक्र करते हैं,
- 22:03उपनिषद करते हैं? क्या तुम उस मुकाम पे कभी गए?
- 22:06सच बताओ सच ये बोल ना पाएंगे क्योंकि कभी गए नहीं, झूठ ही बोल
- 22:21सकेंगे। क्योंकि निहित स्वार्थ है और क्षय
- 22:26का है या किसी भी चीज़ का है, निहित स्वार्थ है, इसीलिए संस्था
- 22:33के हाथ मजबूत करो, इसको खोलिया हो गया है।
- 22:41क्या किया जाए, मैं अगर व्याख्या से ना बोलेंगे।
- 22:45सूत्रों को बोल के छोड़ दूंगा तो सूत्र को अष्टावक्र भी बोल के गए।
- 22:53फिर आज जरूरत पड़ रही है गीता के सूत्रों को समझाने की, अष्टावक्र
- 23:00के उपनिषित के सूत्रों को समझाने की।
- 23:04आज जरूरत तो पड़ी है ना कौन करेगा इसका खुलासा गुरु करेगा क्यों?
- 23:12क्योंकि ये किताबें नहीं कर सकती। ये ग्रंथ नहीं कर सकते, खुद से
- 23:16नहीं बोल सकते। इसलिए कीमत गुरु की जरूरत ही
- 23:20पड़ेगी। और जीवंत गुर भी वो चाहिए जो नीम
- 23:27हकीम कतराए जान न हो जीस चीज़ का मास्टर हो वही तो बता पाएगा
- 23:36मास्टर कोण जिसने स्वयं वो तर्क छू लिया जीस पे कृष्ण जाके बोले।
- 23:44जिसपे अष्टवक्र जाके बोले जिसपे उपनिषद के ऋषि यज्ञ बल के जाके
- 23:49बोले ही मास्टर कहलाने के योग्य है और वो ही मास्टर होने की
- 23:57क्षमता भी रखता है। लेकिन गए तो ये है नहीं क्योंकि
- 24:06बड़ा भारी विस्क है नहीं तो स्वार्थ को त्यागना पड़ेगा, अपने
- 24:15इल्ल्यूश़न को तोड़ना पड़ेगा। और अपने इलूशन को तोड़ना इनके लिए
- 24:22मरने के समान है। अपने इलूशन को अगर कोई तोड़ पाए,
- 24:31उसे ही महावीर की उपाधि दी जाती है।
- 24:35वर्धमान ने अपने इलूशन को तोड़ दिया।
- 24:39इल्यूजन क्या है तुम वास्तव में क्या हो पसीजे जान लेना ही सत्य
- 24:46और उसके विपरीत जो है वह असत्य वह इल्यूजन तो सत्य में तुम क्या हो।
- 25:02व्हाटस युअर ऑथेंटिसिटी? शब्दता क्या है?
- 25:11हू अरे यू अगर तुमने यह नहीं जाना।
- 25:21इसी में मैं रोज़ हाथ मानता हूँ। कृपा करो कृपा करो मत उलझाओ इन
- 25:29लोगों को ये बेचारे और देखो अभी तुम भी तो नहीं पहुंचे, ज़रा सब
- 25:38ख्याल रखो। जो दूसरों के घरों पर पत्थर
- 25:42फेंकता है जिनके घर शीशों के होते हैं याद रखना उनके अपने मुकाम भी
- 25:49शीशे के हैं, मर जाओगे, अंधकार में मर जाओगे।
- 25:59कल को दूसरे तुम्हें मूर्ख बनाएंगे जैसी संपदा छोड़ के चले
- 26:03हो वही तो तुम पे बरसेगी, बुधू ही छोड़ के गए हो, बुधू ही पैदा
- 26:10होंगे तुम्हें बताने के लिए कैसे तोड़ पाएंगे तुम्हारा ब्रह्मा?
- 26:19फिर तुम कहते हो दुनिया दुनिया, मूर्खता का दूसरा नाम ये जी ये
- 26:34नहीं सोचते इसलिए मैं इन्हें नास्तिक कहता हूँ।
- 26:42इसलिए मैं सबसे पहले ये बात कहता हूँ कि देखिए अगर आप अध्यात्म में
- 26:46चले हो तो सबसे पहले सतोरी की झलक देखना जीसको पानी चले हो,
- 26:55परमात्मों को पानी चले हो, सारी शक्ति लगा दो क्या वो है भी कि
- 27:00नहीं? तुम व्यापार करने में इतनी शक्ति
- 27:06लगाते हो क्या? वास्तव में इसमें मुनाफा आएगा कि
- 27:09नहीं और जीस परमात्मा को खोजने चले हो उसका ज़रा भी तुम प्रमाण
- 27:16नहीं मानते। इसे ही मैं मुड़ता कहता हूँ, मैं
- 27:25कहता हूँ जीसको खोजने चले हो और सर्वस्व न्योछावर कर दोगे, उसके
- 27:29ऊपर उसका प्रमाण तू जान लो, क्या वो है भी, इतने संत कहते हैं वो
- 27:38नहीं है, मर के केता को नहीं। नीच से कहता है मर गया है वो चार
- 27:47बार कहती हूँ उसने कोई नियम ही नहीं बनाए जब वो है ही नहीं।
- 27:52ज़रा इनकी तरफ भी ध्यान कर ना कहीं ऐसा तो नहीं है, सत्य बोल
- 27:57रहे हैं। छोड़ दो एक बार सभी संतों को तुम
- 28:04सीधे सीधे संतों को मत सुनो। मुझे लोग कहते हैं बाबा आपकी
- 28:10बातें मैं सुनता हूँ, बड़ी श्रद्धा से मैंने कहा छोड़ दो
- 28:15क्योंकि श्रद्धा से पहले तर्क आना।
- 28:22जिसने तर्क नहीं किया, जो नास्तिक नहीं हुआ उसकी आस्तिकता भी कोई
- 28:29मायने नहीं रखते। कोई मूल्य नहीं रखते।
- 28:34बड़ी सस्ती आस्तिकता को तुम। आस्तिकता जन्मी तुम्हारी शीष देनी
- 28:41से जी तो। जा मुझे तो प्रेम मिलन की।
- 29:15शी सुतलीधर शी सुतलीधर गर मेरे आ जे तो प्रेम मिलन।
- 29:43अगर तुमने अपना शीष सतली पे नहीं रखा सच में मत रख के आना ये तुम
- 29:49हो नहीं ये शीष, तुम नहीं वह जो झूठा अहंकार तुमने पाल लिया।
- 29:57उसको दिल्ली पर रख लेना कुछ मूड मुझे रोज़ कहते हैं बाबा आज हम
- 30:07शीश बाबा दीप सिंह की तरह हाथ पर रखते है।
- 30:13मैंने कहा फिर तुम समझे नहीं मुझे।
- 30:17मैं क्या बोलता हूँ ये तुम समझे इस चीज़ की तो कोई बात नहीं इसलिए
- 30:25क्या बिगाड़ते हैं? मैं बात उस चीज़ की करता हूँ जो
- 30:32तुमने जाली बना लिया नकली क्रिएट कर।
- 30:39खेल ही खेल में जो तुमने इजाद कर लिया उस बनावटी सीस को काट दो।
- 30:49इसलिए पहले तर्क आवश्यक था। वह आस्तिकता ही क्या जो
- 30:57परमनास्तिकता की आग से ना निकली? पहले इंकार करो नहीं है कुछ कुछ
- 31:06नहीं है और फिर स्वीकार तब करो। जब तुम्हारा रूआ रूआ उस अदृश्य
- 31:18शक्ति को देखकर चमत्कृत रह जाए। आस्तिक तो वो बना लेगा, उसकी
- 31:24दुनिया है तुम्हें आस्तिक बनने की आवश्यकता क्या है?
- 31:31जिमनदार मस्जिद गुरुद्वारे चार चीजें सब तुम्हारी क्रिएशन।
- 31:36उसने तो कोई मंदिर नहीं बनाया, उसने तो तुम्हारा मन बनाया इस मन
- 31:43के अंदर तुम कभी गाय नहीं, परमात्मा का बनाया हुआ मंदिर
- 31:48तुमने कभी खंगाला नहीं गुरुद्वारा तो तुमने बनाया।
- 31:54तुम सच्चे गुरु के द्वार पे कब गए हो ज़रा मुझे बताओ कभी गए हो
- 32:04सच्चे गुरु के द्वार पे कभी गए हो तुम वो द्वार तुमने खंगाला जो
- 32:10प्रेम से अटपटा भरा पड़ा है। जिसका रोवा रोवा अटापटा है उस
- 32:18द्वार पे कभी खड़े हुए जहाँ प्रेम की ही सुगंध बरसती है।
- 32:31नवाज तो तुम पढ़ लेते हो? लेकिन क्या तुम्हारा अहंकार भी
- 32:36कभी नमन हुआ? कभी गिरा कभी मिट्टी में मिला
- 32:44तुम्हारा अहंकार नहीं तुम गर्दन को नीचे लगा लेती हो बस धरती के
- 32:50साथ। नमाज़ अदा हो गई।
- 32:57तुम्हारा अहंकार धरती से लगे धूल, चांटे तुम्हारा ये नकली बनाया हुआ
- 33:04सेल्फ क्रिएटेड में इगो यह धरती में खाक हो जाए।
- 33:13तो मिलेगा अल्लाह ऐसे नहीं मिलेगा, हज करने से नहीं मिलेगा।
- 33:22तुमने बात किया और ईशा कहती है कैफेस कर लो।
- 33:29उस विराट के दरबार में कन्फेशन अफेयर्स इज़ लाइक ए ब्रोम दैट
- 33:35स्वीप्स ऑफ अडल्ट एंड मेक्स दी सर्फेस क्लीनर दैन बिफोर।
- 33:43तुम कन्फेशन करते हो, लेकिन इधर पादरी होता है इधर तुम होते हो
- 33:51तुमने जो अच्छा बुरा किया सब बता देते हो पर भय रहता है।
- 33:57कहीं ये प्रचार ना करते तो कन्फेशन का खाक हुआ।
- 34:03कल फैशन करना तो महावीर की तरह करो, कल फैशन करना तो गाँधी की
- 34:09तरह करो, जो लिख के चले जाते हैं, मैंने ये बात किया समाज की दृष्टि
- 34:16में जो हे माना जाता है वो मैंने कृत्य किया।
- 34:22जो लिख के चले जाते हैं। तुम कन्फेशन कहाँ करते हो?
- 34:31महावीर नग्न हो गए, नग्न होने का मतलब शरीर से बढ़ना भी था और नग्न
- 34:39होने का मतलब चित को भी नग्न करना था।
- 34:42ये देख लो खुली किताब मैंने क्या बात की है, मैंने किस किस से
- 34:48रिश्वत खाई, किस किस को मारा, किस किस को मारने का षड्यंत्र किया और
- 34:55कैसे कैसे किया अब तो तुम्हें। टेस्ट करके बुलाना पड़ता है
- 35:02नार्को फिर बिना नार्को के तुम खुद ही कन्फेस कर लो कि मैंने
- 35:08किया और इन लाशों के ढेर के ऊपर बैठा मैं इतनी ऊंची गद्दी तक
- 35:13पहुंचा। यह होगा कन्फेशन और जितनी ऊंची
- 35:17गद्दियाँ तुम ले लोगे। और तुम भी जानते हो और हम भी
- 35:22जानते हैं ये लाशों के ढेर की स्टीयर्स बनाकर तुम चढ़े हो ऊपर
- 35:27कौन नहीं जानता सब जानते हैं, लेकिन ये भी जानते हैं कि जो पाप
- 35:35करता है उसका भार तुम्हारे क्षेत्र पर सदा पड़ा रहता है।
- 35:40मैं तुम्हें भोजन भी कर जाता है ज़रा एक पाप करके देखना रात को
- 35:47ठीक से नींद नहीं आएगी, ठीक से सोना पाओगे।
- 35:57शुरू शुरू में आत्मा इतनी स्वच्छ होती है।
- 36:01बच्चा अगर झूठ बोल देगा तो माँ बाप को आके बता दिया कि माँ
- 36:09पिताजी मैंने ये झूठ बोल आपके सामने वह छोटी सी लकील इतनी भारी
- 36:13हो जाती है नाज़ुक मन पे? कि बच्चा बोल देता है, लेकिन जैसे
- 36:20जैसे तुम उम्र दराज होते हो, तुम शैतान हो जाते हो, फिर तो तुम कतल
- 36:30भी करते हो लेकिन चर्चा नहीं होती।
- 36:34फिर चर्चा लोग करते हैं और तुम कहते हो नहीं नहीं, कोई बात नहीं
- 36:37है, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, बस तुम भूल जाते हो दो आँखें तुम्हें
- 36:44लगातार निहार रही हैं सब से बच जाओगे।
- 36:52उससे कैसे बचोगे? प्यारे हम्म, उससे नहीं बचता इसका
- 37:01सिद्धांत बड़ा अजीब बकरी में बड़ा सूक्ष्म अरे जो कण नहीं बना सकता
- 37:06तुम वो उसके बारे में बात करेगा विराट।
- 37:12धरती से भी हजारों गुणा बड़े एस्ट्रॉयड आवारा घूमते हैं उसकी
- 37:17इस रचना में और वह जो 20 अप्रैल 2138 में गिरेगा शाम 4:00 बजे
- 37:25जापान और दक्षिण एशिया के बीच में।
- 37:30ये 3500 किलोमीटर के व्यास वाला वह आवारा ही घूम रहा है।
- 37:36कहीं और प्रलय की शुरुआत हो जाएगी, 40,00,00,000 लोग बचेंगे।
- 37:49तुम कितना ही बचा लो अपने आप को, लेकिन जाओगे कहाँ?
- 37:56क्योंकि सब जगह बल्कि है तो उसकी और मालिक जरे जरे में बैठा है, बस
- 38:05तुम्हें ये नहीं पता तुम कहते हो कि इस घर में।
- 38:08कतल करके दूसरे घर में चले जाएंगे, पता नहीं लगेगा, भूल जाते
- 38:12हो तुम्हें पता नहीं वह खोज लेगा जैसे आज का मोबाइल खोज लेता है ना
- 38:21तुम? मुझे टेक्नोलॉजी का पता नहीं था,
- 38:23यद्यपि उसने संसार में पहले से गढ़ दी थी, तुम आज इंवेंट कर पाए
- 38:28हो। तुम नंबर डायल करो, उसका कोड तुम
- 38:31जहाँ भी बैठे हो ये तुम्हें ढूंढ लेगा हाँ जी, हीरो ठकर अब।
- 38:45कहाँ जाएगा अजी रूठकर अब कहाँ जाएगा।
- 39:01जहाँ जाइएगा हमें पहिएगा अजीब उठकर अब कहाँ जाइएगा?
- 39:22जहाँ जाएगा हमें पाइएगा, अजी रूठ कर संत क्यों नहीं पाप कर पाता?
- 39:42संत वह जो जान गया वह घरे घरे में है, उससे जो होगा वह पुण्य ही
- 39:50होगा और संत होने से पहले वो जो भी करेगा वह पाप ही होगा।
- 40:01तुम पुण्य समझ लोगी, लेकिन तुम्हारे मन में अहम आ जाएगा कि
- 40:06मैंने पुण्य किया और जीस पुण्य में मैं आ जाए और लहु से लपड़ा
- 40:14हुआ पुण्य होता है वह पाप ही होता है।
- 40:23संत से पाप नहीं होता क्योंकि संत जानता है आई कैनट टू एनी मैं
- 40:29असमर्थ हूँ मैं, मैं कुछ कर ही नहीं सकता अगर चाहूँ भी तो कुछ कर
- 40:37नहीं सकता। छोटा सा प्रश्न है, क्या हमारी
- 40:41स्वतंत्रता नहीं है? निजी क्या हमारी निजी स्वतंत्रता
- 40:48नहीं है, क्या ज़रा शक्ति को समझिए और खुद ही खोजिए?
- 40:58क्या तुम्हारी निजी स्वतंत्रता है?
- 41:04मैं ये कहता हूँ कि सारा ब्राह्मण एक शरीर है, इसको छोड़ दो, अब तुम
- 41:12एक बार ये देख लो कि तुम एक शरीर हो।
- 41:18यह ढांचा तुम हो यहाँ से शुरू कर लेना बेहतरी से जवाब दिया जा
- 41:25सकेगा। तुम्हारे प्रश्न का यह एक शरीर है
- 41:33और यह तुम हो, तुम मानते हो? तुम्हारे लिए ये सत्य भी तुम मुझे
- 41:42जानते हो ये एक शरीर इस एक शरीर के भीतर 37,00,000 करोड़ 37
- 41:54टिलियन। 37,00,000 करोड़ 37 ट्रिलियन सेल
- 42:04सेल और हर सेल के भीतर एक न्यूक्लियस है।
- 42:12और अगर एक सेल में कोई बगाड़ पड़ जाए जो तुम्हें पता भी नहीं
- 42:19चलेगा, तो तुम स्वतंत्र कहाँ रहे? वह थोड़ा सा बिगाड़ तुम्हारी
- 42:29क्षमता को थोड़ा कम कर देगा। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा,
- 42:36तुम्हारे भीतर इतने कारखाने हैं, उनमें से कोई एक कारखाना बंद हो
- 42:42जाए तो जल्दी जल्दी तुम्हें पता ही नहीं सर कि हमारा कौन सा
- 42:46कारखाना बंद हो गया। कौन सी फैक्टरी में लेबर ने काम
- 42:51करना बंद कर दिया, कौन सी फैक्टरी में हड़ताल हो गई?
- 42:56कितनी फैक्टरीस है हमारे उधर तुम इसको समूह समझते हो, अपना होना
- 43:01समझते हो लाख करोड़? 37 ट्रिलियन इसका समूह है
- 43:14तुम्हारा शरीर और इसके शेल। अगर दूषित होने शुरू हो जाए, गलने
- 43:27शुरू हो जाए। तुम्हें जल्दी जल्दी पता ही नहीं
- 43:29लगता, फिर जो सवस्थ शरीर था, बिल्कुल 37 ट्रिलियन शायद बिल्कुल
- 43:37सवस्थ जब तुम काम करोगे उस वक्त और जब बहुत तेरे शैल जी तुम्हारे
- 43:44गल जाएंगे जब तुम काम करोगे उस वक्त।
- 43:49तो स्वतंत्र तो तुम दोनों बार ही होगे और दूसरी बार जो गल गए
- 43:56तुम्हारे सेल उनका तुम्हें पता ही नहीं होगा और वो गले हुए सेल
- 44:03तुम्हारे काम करने की क्षमता पर इफेक्ट डालेंगे।
- 44:09इसका तुम्हें पता भी नहीं चलेगा तो अब मुझे बताओ क्या तुम आजाद
- 44:16हो? तुमने जानबूझ के सर खराब नहीं
- 44:20किया? कोई बिमारी आई, कोई कोरोना फैल
- 44:24गया, कुछ हो गया, कुछ हो गया, कुछ हो गया उसके संसार में इतनी बड़ी
- 44:29सृष्टि को बनाने वाला इतना मूर्ख है क्या?
- 44:35अगर तुम ज्यादा समझदार बनते हो तो ऐसी बिमारी को इजाद कर दे जिसका
- 44:40तुम्हारे पास उपचार ही नहीं है। उसने कर ही दिया पवित्र गंगा में
- 44:47लाशें बहती मैंने देखी हैं, तुमने भी देखी होंगी और ये सब उनकी
- 44:57लाशें थीं। जब तुम्हारी ही तरह सोचते थे सब
- 45:04की, मैं करता हूँ क्या हमारी निजी स्वतंत्रता ही है कहाँ स्वतंत्रता
- 45:10है की सर जब बाहर से कुछ से लाया उसने तोड़ दिया तुम्हारा
- 45:16स्वतंत्र। तो तुम्हारी स्वतंत्रता कहाँ गई?
- 45:20कहाँ गई स्वय तंत्र तुम्हारा तंत्र तोड़ दिया उसने तो स्वय का
- 45:27तंत्र कहाँ रह गया तुम्हारा। बेटे तुम सर्कमस्टैंसेस के अधीन
- 45:40हो। बस यही दुखद विषय है कि संत
- 45:48तुम्हें मूल नजर आते हैं, अशिक्षित नजर आते हैं।
- 45:54संत अगर कुछ बोलता है वो बोलता है अनुभव से और तुम सुनते हो खोपड़ी
- 46:01से अनुभव आता है भीतर से अस्तित्व से और इनका कोई मेलजोल नहीं है।
- 46:07बड़ी दूर बैठे हैं। दोनों अस्तित्व खोपड़ी से बहुत
- 46:11दूर बैठा है। और खोपड़ी अस्तित्व से बहुत दूर
- 46:14बैठे हैं। अस्तित्व के बाद खोपड़ी तक नहीं
- 46:19पहुंचती और खोपड़ी के बाद अस्तित्व तक नहीं पहुंचती।
- 46:24अगर कृष्ण कहते हैं कि वहाँ कोई आग नहीं जाती।
- 46:29नैनमदाहती पाव का? कोई बाढ़ नहीं जाती, कोई तूफान
- 46:35नहीं जाता, ना ही चैनम के लिए दिनता को ना ही सोच कहती है मारो
- 46:40ताहा कोई पिस्टल, कोई बम वहाँ नहीं पहुँचता तुम्हारा एटोमिक
- 46:46हाइड्रोजन बम। नैनं छेदन तीशस्त्रण।
- 46:57फिर बुद्धि बुद्धि की सोच वहाँ तक कैसे पहुंचेगी?
- 47:02तुमने कब ख्याल किया? तुम रात भर जागे?
- 47:08सोए नहीं, दिमाग पर बोझ है, कोई भी है, किसी अभाव का है कोई
- 47:15क्राइम कर लिया कुछ और और बातें जिसका दिमाग पर बोझ रात को सो
- 47:20नहीं पाए। एंटी डिप्रेशन लेनी पड़ गई।
- 47:32या इन सोमनिया की कोई दवाई लेनी पड़ गई?
- 47:35नींद आ जाए ठीक से और नींद फिर भी नहीं आती तो क्या तुम स्वतंत्र
- 47:45हो? गौर से देख तुम्हारे शरीर के इतने
- 47:53सेल मर गए, तुम्हें पता भी नहीं चला जब तुम स्वतंत्र थे, सवस्थ थे
- 48:03तब का काम और जब तुम्हारे आधे सेल गल गए और तब का काम।
- 48:08क्या दोनों कामों की दक्षता समान होगी?
- 48:14नहीं होगी क्योंकि जब तुम पूर्ण सवस्थ हो तब काम उसी प्रकार का
- 48:20होगा जब तुम आधे ही सवस्थ हो। आधे बीमार हो तो काम उसी प्रकार
- 48:25का हो। और तुम्हें पता ही नहीं है कि तुम
- 48:27बीमार हो कि तुम सवस्थ हो, तुम बीमार हो।
- 48:32अगर कृष्ण कहते हैं कि तू स्वस्थित हो जा तो इसका मतलब तू
- 48:37सवस्थ हो जा, इसका मतलब तू बीमार है।
- 48:47तुम कैसा सोचते हो? अगर कृष्ण कहते हैं तू सवस्थ हो
- 48:54जा तो इसका मतलब तुम बीमार हो दे। अरे गोइंग टु इंटीग्रेट यू।
- 49:02कि तुम अपने आप को सवस्थ मत समझो, सवस्थ तो कहीं भीतर जाके होना
- 49:07पड़ेगा, अभी तो तुम बिमारी के भीतर उजगड़े हो।
- 49:10खोपड़ी एक बिमारी और तुम चौबीसों घंटे खोपड़ी में बने रहते हो
- 49:18तुमने कभी तलब बदला। तुम्हें गैर बदलना आता ही नहीं
- 49:24जिसके पास जाते हो। गुरु तुम्हें भ्रम में डाल देता
- 49:29है। फिर ज़रा सोचो जब मार्गदर्शक गलत
- 49:34मिल जाए, ये नौ गुरुओं वाले की बात मैं कर रहा हूँ ध्यान रखना।
- 49:39क्यों नहीं मिला नौ गुरुओं से? क्योंकि तुमने जाना है जहाँ से
- 49:45गीदड़ बहा से दिल्ली जाना बॉम्ब पे जाना और कोई तुम्हें रास्ता
- 49:52बता दे जाना है दिल्ली बॉम्ब पे तुम्हें रास्ता बता दे।
- 49:58पाकिस्तान का बाघा बोर्ड का लिखा तुम दिल्ली पहुँच जाओगे, बॉम्बे
- 50:10पहुँच जाओगे, पहुँचते जाओगे लेकिन एक बार पाकिस्तान को।
- 50:22बस ऐसे ही गुरु है तुम्हारे राधे राधे करते रहे।
- 50:27मार्गदर्शक होना बहुत बड़ी बात है।
- 50:36इनका कोई निहित स्वार्थ होता है। वो निहित तो सार्थ क्या है?
- 50:43तुम भी अंदाजा लगा सकते हो और मैं तो बखूबी अंदाजा लगा ही बैठा हूँ,
- 50:53कोई करोड़ की गाड़ी में बैठकर तुम सुखी हो जाते हो तुमने सोचा कभी?
- 51:02शरीर की सुविधा है। गद्दों के ऊपर सोओ, लेकिन शरीर
- 51:07ही। अगर रोगी है तो गद्दी क्या करें?
- 51:13शरीर अगर निरोग है, सवस्थ है तो तुम पत्थरों के ऊपर भी सो सकते
- 51:21हो। मैंने लोग पत्थरों के ऊपर सोते
- 51:23हुए देखे हैं, इतनी गहरी नींद सोते हुए देखे हैं।
- 51:28शायद अकबर जैसे सम्राटों को भी उसकी नींद से तीरशा हो जाती है कि
- 51:34मेरे पास इतना है मैं ऐसी गहरी नींद सो नहीं पाता।
- 51:45तुम्हारी मुड़ताएं जिसका भ्रम मिट गया, वो तो एक है कोटिन में कोई?
- 51:56एक चलत है। बाबा कहते हैं करोड़ों में से कोई
- 51:59एक चलता है उस रास्ते पे, क्योंकि वह रास्ता अज्ञात है और तुम इतने
- 52:06समझदार हो कि तुम अज्ञात की तरफ चलते हो।
- 52:12मुझे पांच 4 दिन पहले कोई कमेंट आ गया।
- 52:16मैं वहाँ उस कॉलेज में जाना चाहता हूँ, पिताजी उस कॉलेज में भेजना
- 52:20चाहता हूँ, मैंने कहा, जहाँ तुम्हारे पिताजी कहते हैं वहाँ
- 52:29उनके पास है, तो वहाँ से तो कभी कोई व्यक्ति ओलंपिक में गया है।
- 52:35क्योंकि जरूरी बात है, तुम भी तो हो सकते हो, तुम पहले ओलंपियन
- 52:40नहीं हो सकते, वहाँ जाने वाले ये कोई तुक थोड़ी है?
- 52:45मेज़रमेंट का पैमाना थोड़ी है तो मैंने उसका जवाब कुछ नहीं दिया,
- 52:51लेकिन मैं जानता हूँ के शीशत्व। तर्क में कैसे बदल जाता है?
- 52:59फिर जब तुमने सुनना है मुझे और माननी है अपने आप मन की बात तो
- 53:06फिर गुरु की आवश्यकता क्या? इसे ही तो मनमुखी कहते हैं, तुम
- 53:11गुरमुखी कभी हो नहीं पाते। तुम मनमुखी ही रहोगे, सुनोगे?
- 53:18मेरे को नौ गुरुओं के को सुन आए तुम तुम्हें पता ही नहीं कि तुम
- 53:24उस आनंद का रस क्यों नहीं पी सके, क्योंकि तुमने गुरुओं को सुना?
- 53:29लेकिन कहाँ सुना माना अपने मन का? तो गुर मुखी नहीं हुए तो मनमुखी
- 53:36हुए ऐसे ही अगर मेरे साथ करोगे तो मत आओ क्योंकि फिर मेरे से भी
- 53:43प्यासी प्यासे लूट जाओगे। मैं कुछ न कर सकूंगा क्योंकि गुरु
- 53:49कभी डिक्टेटर नहीं होता तानाशाना। गुरु कहता तुम्हारी मर्जी, तुम
- 53:56दुखी रहना चाहते हो तो भी तुम्हारी इच्छा है, तुम सुखी होना
- 54:02चाहते हो तो भी तुम्हारी इच्छा है मैंने तुम्हें फॉर्मूलेशन बता
- 54:06दिया अब देखो तुम कौन सा मानते हो?
- 54:11पूषा स्वतंत्र इच्छा? अब तुम देख रहे हो स्वतंत्र इच्छा
- 54:14है तुम जो भी कुछ करते हो अंडर सर्कमस्टैंसेस करते हो, तुम पढ़ना
- 54:26चाहते हो। केम्ब्रिज में हार वार्ड में।
- 54:31लेकिन घर खाने के लिए पैसे नहीं है।
- 54:33तो क्या करोगे सर तुम्हारी इच्छा जरी के जरिए रह जाएगी ना अंडर
- 54:40सर्कमस्टैंसेस तुम्हारी इच्छा दब जाएगी तुम्हारी इच्छाओं का फिर
- 54:46मुरली क्या हुआ? तुम मुझसे पूछते हो कि हमारी कोई
- 54:53स्वतंत्र इच्छा है, स्वतंत्र सत्ता है, तुम मुझे बताओ, मैं
- 54:58तुमसे पूछता हूँ, क्या तुम्हारी स्वतंत्र इच्छा है?
- 55:02स्वतंत्र सत्ता है अगर कल को सरकार फरमान जारी कर दे कोई भी।
- 55:10तुम बंद कर एक व्यक्ति जिसे तुमने चुना था मैं तुम्हारे ऊपर ही
- 55:16बेरियाँ लेके खड़ा हो गया तुम्हारी कोई स्वतंत्र इच्छा
- 55:25नहीं। कि मैं मैंने तुम्हें बाहर से
- 55:30समझाने की चेष्टा की लेकिन अब आ जाओ, तुम संतो की दृष्टि में अब
- 55:36हम भीतर चलें थोड़ा सा दो क्षण के लिए हम डुबकी लगा ले अपने भीतर।
- 55:46जब लॉस से अपने तल पे पहुंचते हैं आखिरी तल पे तो क्या पात सतौरी की
- 55:56झलक में जो देखा था उसका वृहद रूप पात सतौरी की झलक में तुम देखते
- 56:02हो कि मैं कुछ नहीं करता। जो करता है वही करता है।
- 56:10यह झलक तुम्हारा विश्वास बन जाता है।
- 56:13झलक इतनी साफ होती है जैसे तुमने खुली आँखों से सूरज को देख लिया
- 56:18हो। कैसे भूल पाओगे तुम?
- 56:22इसी सी झलक एक पल भर की झलक तुमने सूरज को देखा और विश्वास तुमने
- 56:31किया नहीं विश्वास हो गया कि सूरज है और वो ही झलक तुम्हें ले
- 56:40जाएगी। ये जो लोग कहते हैं नहीं होता, बस
- 56:46इनके लिए का फॉर्मूला है। वैसे के जरिए पहुंचना पड़ा शुभमय
- 56:54ये एक धागा है जिसकी लड़ी पकड़ के तुम ऊपर तक की यात्रा कर सकते हो।
- 56:59इसका एक छोर पकड़ लो। और जहाँ से ये मूल रूप से उदगम
- 57:05होता है वहाँ तक पहुँच जाओगे और पाओगे वह परमात्मा है जहाँ पहुँच
- 57:09गए। इसका उदगम सतल स्वयं परमात्मा है,
- 57:16तो अगर तुम कहती हो, यह नहीं होता तो नुकसान किसका कर रहे हो?
- 57:23बताओ किसका जो तुम्हारे पास आया उसको तुम निर्दोष गलत हो गए जबकि
- 57:31जाना तुमने तुमने नहीं ठीक और तुमने जो जाना वही तुम बताओगे।
- 57:41और इतनी तुम तीव्रता से बताओगे कि मेरी जसज्ञानी कोई नहीं और वह
- 57:46बेचारा भटक जाएगा तो उसकी जिंदगी को भटकाने का श्रेय तुम्हें
- 57:54क्योंकि तुम्हें। तुम कहोगे ये इट इस ए मेंटल डिजीज
- 58:08तुम्हें उपचार की हो सकता है यू शुड बी ट्रीटेड मेंटली कसूर किसका
- 58:16तुम्हारा तुम्हारे भीतर। जन्मा नहीं और तुम जो तुम्हारे
- 58:25जन्मा नहीं वो मैं रोज़ बोलता हूँ जो तुमने देखा नहीं वो तुम कहोगे
- 58:29होता है क्योंकि तुम ज्ञान के भीख पे रहना चाहते हो हमेशा, इसलिए
- 58:38मैं रोज़ कहता हूँ संसार में तो दौड़ चलो बाली।
- 58:43लेकिन परमात्मा में दौड़ अच्छी नहीं होती और आज परमात्मा में
- 58:48दौड़ लगनी शुरू हुई। वह मूर्ख व्यक्ति जो आप उस तल पे
- 58:52नहीं उतरा, मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।
- 58:55देखिये कितने विश्वासपूर्वक मैं कह रहा हूँ कि वह मूर्ख है, वह
- 59:00नहीं उतरा बेहतर। क्यों?
- 59:03क्योंकि उसकी आवाज में मिठास नहीं है, उसकी आवाज में ऑथेंटिसिटी
- 59:09नहीं है। तर्क है सिर्फ तर्क वो तर्क आता
- 59:13है बुद्धि से मिठास नहीं है शहद जैसी।
- 59:23जो अपने उस अस्तित्व में उतर गया उसके भीतर उनके शब्दों में लेवड़ी
- 59:29तेवड़ी हुई उस शहद की मात्रा भी जरूर होगी।
- 59:34बस इसकी आवाज़ से ही समझा जाता है और दूसरा।
- 59:38इनका औरा जो इन्हें पता ही नहीं होता भी है कि नहीं, वो भी नहीं
- 59:41होता। संत बड़ी अच्छी तरह से ओरे को देख
- 59:45लेता है कि बैठा मूर्ख का बातचीत तो कर रहा है।
- 59:52गीता की अष्टावक्र गीता की उपनिषद की, लेकिन पहुंचा कौन?
- 59:58बस दो चार चैनल ने तुम्हें बना लिया इंटरव्यू ले लिया, वो भी तो
- 1:00:03खुद मुर्ख अन्य सर धंधा क्यों करते झूठ बोलने का?
- 1:00:09आज सर मूडिया झूठ बोल रहा है क्यों ज़माना आ गया है जो जितना
- 1:00:14झूठ बोलने में? प्रथम होगा, उसको पुरस्कार
- 1:00:17मिलेगा, उसकी पदोन्नती हो जाएगी। आज वक्त कुछ निराला आ गया है।
- 1:00:31नाग नहीं होता, परमात्मा नहीं होता, एनलाइटनमेंट नहीं होता।
- 1:00:38कर्मों का फल वगैरह नहीं होता तो लूटपाट करते रहो कतलोगार्त करते
- 1:00:44रहो यही समझाते हैं ना फिर चारवाक और क्या समझाते हैं तुम्हें?
- 1:00:53लेकिन इनकी आवश्यकता है, मैं तुम्हें कहती हूँ।
- 1:00:58इन्हें थोड़ा शक कर रहा हूँ। भाव से देखो अगर तुम किसी से टंकी
- 1:01:06मारोगे, किसी को लूटोगे किसी से तुमने उधार ले लिया।
- 1:01:14वह मांगेगा, तो तुम कहोगे नहीं ये तो मैंने लेना है क्या तुम रात को
- 1:01:20ठीक से सो पाए, क्योंकि प्रकृति भी तो है किसी को दुख देके तुम
- 1:01:32रात को ठीक से सो पाते हो। बुद्ध के ऊपर थूकने वाला व्यक्ति
- 1:01:38सारी रात सो नहीं पाता। पर वो तो मज़े से अपना अंगूठा
- 1:01:44निकालते है और पूछ लेते है और बुद्ध कहते है उसे ये तो मैं समझ
- 1:01:51क्या बनते? और भी कुछ कहना चाहते हो वह पांव
- 1:01:59पटकता हुआ वापस चला जाओ और सारी बात सुन नहीं सकू मैं क्या तुमने
- 1:02:07दंड नहीं दिया? लेकिन प्रकृति कहाँ छोड़ दी?
- 1:02:12लेकिन चार वर्क्स को नहीं मानेंगे तो नहीं मानेंगे, लेकिन उसके नहीं
- 1:02:18मानने से प्रकृति अपने नियम नहीं बदल लेगी।
- 1:02:22नियमों को समाप्त नहीं कर देगी ये बात समझ लेना मार्क्स के परमात्मा
- 1:02:28नहीं कहने से। परमात्मा बिदा नहीं हो जायेगा
- 1:02:32संसार से, लेकिन वह नाम मानना उसकी उस खुशी के समुद्र के भीतर
- 1:02:43उसके लिए जंजाल बन जायेगा जाना वह कभी नहीं जा पायेगा क्योंकि ईश्वर
- 1:02:48होते हैं। एनलाइटनमेंट नहीं होता नहीं होता
- 1:02:53फिर तुम क्रिया जो क्यों करोगे, के लिए होता ही नहीं, जब तो सब
- 1:03:00उल्लुओं का बस हीरा इकट्ठा हो गया है।
- 1:03:07जो दिमाग से पैदल हैं, बिल्कुल पैदल हाँ दिमाग से पैदल हैं।
- 1:03:12ये लोग ज्यादा सही शब्द है के अनुभव से पैदल अनुभव से पैदल हैं।
- 1:03:24ये लोग अनुभव नहीं है। एक शब्द को सर्कल में ले लो, सभी
- 1:03:39बातों का समाधान तुम्हारे न मानने से।
- 1:03:48प्रकृति अपने नियम नहीं बदलती, प्रकृति निर्बाध चलती रहती है।
- 1:03:58तुम्हारे न मानने से प्रकृति अपने नियम बदलती नहीं है, यथावत चलती
- 1:04:05रहती है। अगर तुम कह दो कि सुबह सूर्य नहीं
- 1:04:08निकलेगा, तुम्हारे कहने से कुछ नहीं होगा, सुबह सूर्य निकलेगा।
- 1:04:18इस बात को दिमाग में बता देना कोई मानता है या नहीं मानता है।
- 1:04:26इससे कोई फर्क प्रकृति को नहीं पड़ता क्योंकि तुम खिलौने हो उसके
- 1:04:32हाथ ये पेरियार जैसे मूड लोग हैं। इन्हें ये पता नहीं है के जीस
- 1:04:43जुबां से ये बोलता है। और जीस जुबां से बोलने में कॉन्शस
- 1:04:50और एनर्जी वेस्ट होती है लगती है। वह दी किसने है ये कहेगा वो तो है
- 1:04:58ही नहीं, बस यहाँ ये बात खत्म कर देगा।
- 1:05:01इन्हें जवाब देने की ओछी आदत है। ये उचित शब्द मैंने प्रयोग इसलिए
- 1:05:07किया है कि तुम्हें ठीक से समझा जाए।
- 1:05:11जवाब देने की ओछी आदत बस जवाब देना है, क्योंकि तुम अपने आप को
- 1:05:17महा तार्किक सिद्ध कर सको, महाज्ञानी सिद्ध कर सको, यही
- 1:05:22तुम्हारी मंशा है। यद्यपि तुम्हारे जवाब देने से कुछ
- 1:05:27भी तो नहीं बदलता। सत्य बदलता नहीं तुम्हारे कहने से
- 1:05:34कि सत्य है या नहीं झूठ बोलने से कभी सत्य बदला है क्या?
- 1:05:46इस महावाक्य को हृदय की पंक्तियों पर लिख लेना पुरुषार्थ से अर्थ
- 1:05:57मिलता है पुरुष अर्थ पुरुषार्थ और आराम से राम मिलता है।
- 1:06:07राम की चाहत है तो आराम करो, अर्थ की चाहत है तो पुरुष अर्थ करो।
- 1:06:25धन्यवाद।