Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Jul 25 - श्रवण कुमार की गाथा: तुम्हारा अंधापन कैसे दूर हो? तीर्थ स्थानों पर जाने से क्या होता है?
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- 0:00भोलेनाथ बाबा श्रवण कुमार की आप बहुत प्रशंसा करते हैं, क्यों?
- 0:21श्रवण कुमार ने अपने माता पिता की इतनी सेवा क्यों की?
- 0:32थोड़ा सा रहस्यत्मक विवेचना के द्वारा हमें उत्तर देने का कष्ट
- 0:42करें। श्रवण कुमार के माता पिता शांतनु।
- 0:55और माता ज्ञानवंते किसी अरण्य प्रदेश में रहा करते थे, उन्हें
- 1:05भगवान पे बड़ा भरोसा था और दिन भर रात।
- 1:14नारायण नारायण पुकार करते रहते हैं, ज़िन्दगी में सब कुछ था,
- 1:26चाहते ज्यादा न थी और जरूरतें कभी ज्यादा होती है।
- 1:34चाहतें ज्यादा न थी, जरूरतें कभी ज्यादा होती ही नहीं।
- 1:41इन शब्दों को इंटरलिंक जरूरतें जब चाहत में बदल जाती हैं तो फिर
- 1:51उनका परवार नहीं रहता। जरूरतों को जरूरतों तक ही सीमित
- 1:57रहने को तो पहला सूत्र तुम खुशहाल रहोगे।
- 2:04तुम्हारे चेहरे पर ये मर गट की मृदानदी नायक है।
- 2:14बड़े प्रेम से परमात्मा का श्रवण करते हुए अपने दिन व्यतीत कर रहे
- 2:21थे, लेकिन जिंदगी में एक कमी थी। कमी ये थी कि उनके कोई संतान में
- 2:33थे, कहानी है और जब मैं कहानी कह लूँ तो समझ लेना कि सुन ही सुनाई
- 2:50है। मैं जानता नहीं हूँ।
- 2:55सुनी सुनाई है तो अवश्य ही इसके भीतर कुछ जलेबी का रस होगा।
- 3:02हाँ वो है कहानी कभी झूठी से चुनती है।
- 3:12कहानी के भीतर कुछ ऐसा रहस्य छिपा होता है।
- 3:17जो तुम्हें कहानी के जरिए बताना होता है जैसे बच्चों को कहानियों
- 3:22अच्छी लगती है, कभी इतने मेच्युर नहीं हुए हैं कि सत्य को समझ सके
- 3:32बुद्धि से विवेक अभी जागरण नहीं हुआ है।
- 3:411 दिन नारायण नारायण को पुकार रहे थे और वहाँ से नारद गुजरे।
- 3:56नारद को नारायण शब्द बड़ा प्यारा है।
- 4:00मैंने कहा देखें तो। ये अरण्य प्रदेश में कौन रहता है?
- 4:09आकाश मंडल से नीचे आए देखा ज्ञाण मंत्री और शांतनु दोनों गुहार लगा
- 4:21रहे थे। पपीह की तरह नारायण?
- 4:24न राय थोड़ी सी इकतारे की धुंध छेड़ी और
- 4:40शांतनु की आँखें खलीं शांतनु ने देखा, नारद को तो प्रणाम किया, उठ
- 4:47खड़े हुए हैं ज्ञानवन्ती भी उठ गई।
- 4:53चारण स्पर्श किए पुत्रवती भाव नारद ने कहा पुत्रवती भाव
- 5:08ज्ञानवंती ने उसकी चरण स्पर्श किए।
- 5:13संतों का आशीर्वाद गाहिब गाहिब ले लेना चाहिए।
- 5:21यही अमूल्य धरोहर है जो पैसे सिख के नहीं जाते इसलिए पुराने जमाने
- 5:28में अक्सर। गृहस्थ व्यक्ति संत को पदार्थ
- 5:34महिया भ्राता और उसके फलस्वरूप सिर्फ संत आशीर्वाद के था और
- 5:41आशीर्वाद से अमूल्य को ही ध्यान रखना आशीर्वाद दिखता है।
- 5:51और इस संसार में सत्य देखोगे तो जो चीजें दिखती नहीं, जैसे आइटम
- 5:55दिखता है वो चीजें ज्यादा प्रभावी होती हैं, शक्ति संपन्न होती हैं,
- 6:04जो अदृश्य है। उससे ज्यादा शक्ति संपन्न और कुछ
- 6:09भी नहीं परमात्मा भी तो दृश्य है कहाँ दिखाई पड़ता है इन चरम
- 6:15शिक्षकों से दिखाई नहीं पड़ता है। ज्ञानवंती ने स्पर्श किया नार्ग
- 6:23में कहा पुत्रवती। नारद का शब्द व्यर्थ नहीं होता,
- 6:39संत का शब्द व्यर्थ नहीं होता, नारद की बात फिर सुन लो, नारद
- 6:54शब्द का अर्थ न अर्थ जहाँ पर अर्थ नहीं अर्थ स्वर में तुम्हारा मन।
- 7:02दुख ही नहीं होता जहाँ कोई दुखड़ा नहीं है, न अर्थ, न अर्थ, न अर्थ
- 7:09नॉर्थ बिगड़ के नारद हो गया जहाँ पर कोई तकलीफ नहीं वहाँ जो पहुँच
- 7:16गया, वह नारद हो गया। इसलिए नरद सर्व भूलोक में,
- 7:33त्रियलोक में और सर्वलोक में घूमते रहते हैं।
- 7:40वो कहीं भी जा सकता है। अखंड ईश्वर की इस सृजना में वो
- 7:48कहीं भी विचरण कर सकता है। मैं दुखी नहीं होता, न अर्थ नर्थ
- 8:02इन चित्रों में डालती है ये सारी चीजें।
- 8:05जैसे हमने अन्य देवी देवताओं को शक्ति स्वरूपण और चैतन्य सुर,
- 8:16भगवान कृष्ण और माँ दुर्गा को चित्रों में डाल दिया।
- 8:24लेकिन ये देशवर्ती रिप्रेसेंटेड ऑफ़ सिम्बोलिक रिप्रेसेंटेड ये
- 8:33सिर्फ प्रतीक चन्ह से जैसे शिवलिंग बना लिया हमने और चित्रों
- 8:40की। भाषा?
- 8:43ज्यादा देर तक टिकती है। चित्रों की भाषा विकृति नहीं होती
- 8:47है। चित्रों की भाषा जल्दी ही समझ में
- 8:54आ जाती है। इसीलिए हम बच्चे को पढ़ाते हैं।
- 8:58वह एप्पल से नहीं समझेगा। वह सेब से समझेगा उसके सामने सेब
- 9:05लाकर रख दो। ये है कैट दिखा दो सी कैट ये है
- 9:13बिल्ली चित्रों की भाषा को समझता है बच्चे और जो चित्र कभी देखे
- 9:20नहीं वो उसके समझे नहीं आता। बच्चे ने कभी हाथी नहीं देखा।
- 9:26तो बच्चा कहेगा आती क्या होता है? उसे तस्वीर दिखानी पड़ती है कि
- 9:30ऐसा होता है। हाथी चित्रों की भाषा इसलिए चीनी
- 9:36भाषा चित्रों की भाषा ज्यादा है। सभी भाषाओं में से चीनी भाषा
- 9:42सर्वोत्तम है। चित्रों की भाषा है ज्ञान मंत्री
- 9:52ने हाथ जोड़े। शांतनु ने हाथ छोड़े, प्रभु आपने
- 9:56हमारे मन की व्यथा छीन ली, आपने मन की व्यथा हल कर दी, यही कमी थी
- 10:05हमारी संतान। और आपने हमें पुत्र रत्न का वरदान
- 10:12देके निहार कर दिया मैं कृतगृत भय हूँ कृतगृत हो क्या मान कल्याण
- 10:23मुस्तुक कह के न? नार्द अखंड अखंड धान या जो
- 10:33परमात्मा की संरचना है, यहाँ तक कहीं भी जा सकते हैं।
- 10:44यह मंत्र तुम्हारा नार्द है। नारद की तरह विस्तीर भी हो सकता
- 10:51है ये और क्षीण भी हो सकता है मन तुम जो तो स्वरुप है अपना मूल
- 11:01पहचान ये मन ही है। जिसके खोने से तुम पहुँच ही जाओगे
- 11:12अखंड में और ये मन ही है जिसके होने से तुम दुख को संभालोगे।
- 11:20अपने हत्या में मन ही के कारण ही सब उपद्रव हैं और मन ही के कारण
- 11:26सब शांति। मन खो जाए तो तुम हो जाओ और मन हो
- 11:32जाए तो तुम खो जाओ, इस सिद्धांत को आप अंडरट्रेंड करो, मन खो जाए
- 11:43तो तुम हो जाओगे और मन हो जाए तो तुम खो जाओगे।
- 11:50ये छोटा सा सिद्धांत तुम्हें उस असीम में धकेल सकता है नार चले गए
- 12:05जाते जाते बोल रहे है शांतम। एक बात सुनो, मेरे मैं तुम्हें
- 12:17आशीर्वाद तो दे दिया तुम्हारे मुकद्दर में था, लेकिन तुम्हें
- 12:27पुत्र रत्न तो मिलेगा। संत के गहरे अंशों से निकला हुआ
- 12:37प्रसाद व्यर्थ नहीं, लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
- 12:43बोलिए भगवान क्या कीमत होगी? तुम्हें अपनी आँखें खोनी होंगी।
- 12:50तुम अंधे हो जाओगे। प्रभु अगर हम अंधे हो गए तो बच्चे
- 12:59को पाल कैसे? शिक्षक ने कहा जब तक वह संभल ना
- 13:05जाएगा, तुम ठीक रहोगे आठ वर्ष। आठ वर्ष के बाद तुम अंधे हो जाओगे
- 13:14ठीक है तो आपको शास्त्रों में ये कहानी मिलेंगे के बाद में अंधे हो
- 13:22गए। कोई कहेगा जनमान तो अंधे को लेकिन
- 13:27सत्य ये है। के जन्मान्त अंधे हुए बच्चे के
- 13:34कर्ण शांतनु को ज्ञानवंती को अंधाव न पड़ा, श्रवण कुमार के
- 13:44कर्ण और ये बाखुशी था। उन्होंने कोई गिला नहीं किया, कुछ
- 13:51शिकवा नहीं किया। उन्होंने कहा, ठीक तुम भी अगर
- 13:55बच्चे ऐसा पैदा करते हो के दांत में कुछ भी लग जाए, हमें हमारा
- 14:01वारिस मिल जाए तो फिर फिर वह बच्चा और बच्चे के लिए तुम एक
- 14:09वरदान। बच्चे को अगर तुम ऐसे ही पैदा
- 14:14कराओ कि तुम्हारे पास जो है तुम उससे लुटा सको।
- 14:24फिर बच्चे का दायित्व भी बनता है कि बच्चा भी तुम्हारे लिए सब लुटा
- 14:29सक है। आज घरों में यही झगड़े जिनके एक
- 14:34से ज़्यादा बच्चे हैं, बड़ी मुश्किल में होते हो क्योंकि
- 14:40बराबर बांटा नहीं जाता। जब दो हुए तो तुमने फर्क किया,
- 14:47कौन सेवा करता कौन नहीं करता? जब बेशर्त बच्चे ने जन्म लिया है,
- 14:59उसके हाथ में नहीं था, जन्म लेना तो तुम्हें भी बेशर्त बांकड़ना
- 15:03होगा अगर ऐसी तुम्हारे भीतर प्रज्ञा है, सोच है तो तुम ज्यादा
- 15:10बच्चों को जन्म दे सकते हो। छोटी सी कहानी अपने जीवन की सुना
- 15:18दो, मैंने एनलाइटनमेंट के बाद शादी की जो मेरे प्रति कभी थी एक
- 15:29बच्चा प्रश्न पुत्र। मैं अपने चेचा के पास बैठा था,
- 15:46मैंने चेचा से कहा बस चेचा एक ही बच्चा कब है चेचा पूछ रहे थे
- 15:57खुशखबरी कब दोगे? मैंने कहा तुम मिठाई करो।
- 16:01बस मिठाई ही है तो तुम्हारे लिए खुशखबरी तुमने पेड़ कितने है या
- 16:08आम खाने नहीं? पुत्र हमने पेड़ भी कितने है?
- 16:17हम तो ख नहीं है। मैंने कहा च च एक पुत्र बहुत होता
- 16:23है, अगर सेवा करें तो श्रवण कुमार एक ही था कई बार ब्राह्मण बोला
- 16:35करता है व्यक्ति के भीतर से। ज्यादा पढ़ा लिखा ना हो कोई बात
- 16:39नहीं, ज्यादा समझदार ना हो, कोई बात नहीं, उम्र छोटी हो बड़ी हो
- 16:47तुमसे कोई बात नहीं लेकिन ब्राह्मण पूरा करता है।
- 16:55उसने एक शब्द आज तक मेरे हृदय में गूंज रहा है।
- 17:00मैं भी तुमसे कहता हूँ, मेरी चर्चा ने मुझसे कहा बेटा एक आंख
- 17:09का क्या मिचेना और क्या खोला? अरे भाई एक आंख का के खोलना और के
- 17:24मीचणा एक आंख तो मीछी ओर गयी और एक आंख खुली तो सब जान दिखा भैया
- 17:37उगती मुझे समझा के। भरोसा तो एक का नहीं, दो का नहीं।
- 17:451000 का महाभारत में कितने मारेंगे?
- 17:51100 थे, 100 मारेंगे लेकिन ये कहानी मेरे मित्र।
- 17:59उतर गई एक आंख के मिशन और की खोलना।
- 18:10दूसरा बच्चा पैदा हुआ, दूसरा पुत्र हुआ और वही हुआ।
- 18:15कई बार ब्राह्मण और मैंने ब्राह्मण की आवाज को पकड़ लिया।
- 18:26तुम भी ब्राह्मण की आवाज को पकड़ लिया करो, कभी कभी ब्राह्मण सी
- 18:30देने किसी के जरिए से आवाज देता है।
- 18:41ये प्रश्न भी लेते ही चलें आपने कहा लासानी तिरंगे और आसानी
- 18:45तिरंगे, आसानी तिरंगे तो हम समझ गए कि संत के भीतर से आती वहाँ
- 18:50बैठने को दिल करती लासानी तरंगे तुम कहते बाहर होती हैं, वो
- 18:55ब्रह्मण्ड से आती है तो ब्रह्मण्ड से आई हुई बातें?
- 18:59तरंगें तो शुभ होनी चाहिए, शुभ तो हैं लेकिन कठिन में इतनी
- 19:06कॉम्प्लिकेटेड हैं वो कि तुम्हारा मन भोख ला जाएगा।
- 19:11लासानी तरंगें बड़ी गहरी तरंगें हैं, उन्हें तुम पी नहीं पाओगे।
- 19:19उन्हें पीने के लिए उनके पीने के योग्य होना पड़ेगा।
- 19:22जैसे घी पचाने के लिए हाजमे का दुरुस्त होना ज्यादा जरूरी है।
- 19:27लासानी तरंगें बुरी नहीं है, लासानी तरंगें भ्रमण से आती हैं।
- 19:41अन्यथा तिरंगे कहाँ से आती हैं? लाशहानी तिरंगे बाहर हैं क्योंकि
- 19:48बाहर से सीधे तुम्हारे ऊपर पड़ते हैं और उनको तुम पचा नहीं पाओगे,
- 19:53वो तुम्हारा हज में है। इसलिए 1 दिन के बच्चे को अगर तो
- 20:01हम गृहस्थ चीज़ पे रखोगे वह बीमार हो जाएगा और जिंदगी भी दाम में लग
- 20:09सकती है इसलिए छोटे बच्चे को। तुम गृष्ठ भोजन पीने के योग्य
- 20:21नहीं हो, इसलिए लाजवानी तरंगे तुम यहाँ लेके आते हो तो पजल हुए आते
- 20:27हो इसलिए यहाँ आना तो थोड़ी देर हमने बैठने की व्यवस्था की है
- 20:35तुम्हारी एक 2 घंटे बैठ जाओ। आरंभ से जो तुमने पिया वो वातावरण
- 20:45में खो जाएगा एक्सक्रीट हो जाएगा फिर तुम योग्य हो जाओगे, फिर तुम
- 20:54आसानी तिरंगों के संपर्क में बड़े आसानी से आ सकते हो।
- 20:59फिर तुम्हें पीने की क्षमता हुई, तुम्हारा हजमा दुरुस्त होगा।
- 21:07यहाँ आकर तुम्हें आसानी तरंगों से बड़ी जल्दी भरा जा सकता है।
- 21:14ये आसानी तरंगे में है, जो संत के भीतर से हर वक्त निपटा करती हैं।
- 21:18चौबीसों घंटे। आसानी तिरंगे वो नहीं जो आप बिखेर
- 21:24रहे हो नहीं आसानी तिरंगे ब्राह्मण से आती है और ज्यादा
- 21:30कीमती, लेकिन बात की मत घी ज्यादा कीमती है पानी से।
- 21:40लेकिन बात कीमत की नहीं है। बात तुम्हारे पचाने की तुम पचा
- 21:44नहीं सको। इसलिए जब भी दीक्षा लेने आओ, 2
- 21:50घंटे बैठ जाओ। आराम से हमने आपके लिए इंतजाम कर
- 21:54रखा है। मैं एक दम से नहीं यहाँ आने देता,
- 22:00थोड़ी देर बैठो, उनको एक्सक्रीट होने दो, कोई बच नहीं सकता।
- 22:08इन तरंगों से लासानी तरंगों से कोई बच नहीं सकता।
- 22:20कि जब तुम इनको एक्सक्रीट करके यहाँ रहोगे तो तुम्हे आसानी रंगों
- 22:25को पीने में सुविधा आएगी पर मुझे दीक्षा देने में बड़ी सुविधा है।
- 22:31तुम सारी की सारी पावर को जज कर लोगे, तुम्हारे अंतरंग कोनों तक
- 22:38बिखर जाएंगे। बहुत से लोग कह देते हैं बाबा
- 22:44हमें पता नहीं लगा बहुत से लोग कहाँ अपने लग जाते हैं, प्रति
- 22:47व्यक्त करते हैं। बहुत से लोग कहते हैं बड़ा आनंद
- 22:50आया, इस चीज़ का ख्याल मत करना कि कुछ होगा के नहीं होगा।
- 23:04चीज़ सबको बराबर में बंटती है। मैं कभी किसी से छुपाकर नहीं
- 23:11रखता। सभी को बराबर में बंटती हूँ।
- 23:15क्यों मेरे लिए कोई दूसरा नहीं रहा मेरे लिए सभी में?
- 23:25वो किसी भी रूप में तुम मेरे पास आ जाओ सभी मैं और जो व्यक्ति उन
- 23:33अनंत फैलाव में फैल गया उसी के लिए सब मेरा।
- 23:43जब सब मेरा हो जाता है तो तुम परिसीम अप्रेहसीम ब्राह्मण हो
- 23:50जाता है। तुम्हारी कोई सीमा नहीं रहती बस
- 23:56उस असीमत फैलाव में। अपने आप को जोड़ देना है।
- 24:00इसी को योग कहते हैं। इसी को शब्द श्रुति का मिलान कहते
- 24:07हैं। तुम अपने आप को कैसे उस अप्रियसी
- 24:12में मिला दो? इसलिए मैं अक्सर उदाहरण देता हूँ
- 24:23के समुद्र को किसी भी कोने से वहाँ से पानी निकाल के तुम किया
- 24:26होगा तो उसका स्वाद कैसा होगा? नमकीन नाम की तमक दिखता है, नहीं
- 24:32दिखता है। ऐसे ही तुमको जो परमात्मा है।
- 24:38सिर्फ समुद्र को देखकर कह देते हो नहीं है नमक जबकि नमक इसके
- 24:44कणिकर्ण में गहरे तक बिखरा हुआ है।
- 24:51नमक पानी की बूंद बूंद में नमक है।
- 24:58समुद्र को कहीं से भी चक्र नमकीन हो, बिलकुल इसी तरह वो जरे जरे
- 25:06में है लेकिन नमक की नजर नहीं आती।
- 25:09उसको अलग करने की कोशिश है थाली में भरो सूरज के सामने रखो वाष्प,
- 25:16बन जाएगा पान। लेकिन नमक पानी में था ये तब पता
- 25:22चलेगा जब पानी इवैपरेट हो गया और एनएसीएल इवैपरेट नहीं होता।
- 25:31ध्यान रखना तुम्हारा अहंकार गल जाएगा, वाष्पी भूत हो जाएगा।
- 25:37एनएसीएल बच जाएगा। वह कभी मरता नहीं।
- 25:42वह पानी के वाष्प की भूत होने से कहीं नहीं जाता।
- 25:49वह वाष्प की कारण नहीं होता। उसका वह बच जाएगा, थाली में बच
- 25:54जाएगा। तब तुम्हें पता चलेगा कि हाँ,
- 25:58पानी में नमक था। हर झर्रे में समुद्र के हर झर्रे
- 26:11में नमक की मौजूदगी है, नमक का अस्तित्व है लेकिन तुम कहोगे हमें
- 26:21नेत्रों से दिखता नहीं तो दिखेगा। इसके लिए किसी विशेष प्रोसेसर की
- 26:27आवश्यकता होती है। नमक और पानी अलग अलग हो जाएगा
- 26:35लेकिन है वो कणकण समुद्र के कणकण में नमकीन पानी है और नमक के बिना
- 26:41जिंदगी का स्वाद भी नहीं। ये परमात्मा ने तुम्हारा शरीर
- 26:46बनाया बिना नमक के नहीं बनाया तुम शरीर के खून का विश्लेषण करोगे तो
- 26:56हर झरे में तुम नमक की मात्रा नमक जीवन है इस हिसाब से।
- 27:02जैसे परमात्मा जीवन हैं। सृष्टि का नारे चले गए, श्रवण
- 27:13कुमार बड़ा हो गया। उसके माता पिता अनथे थे।
- 27:19सभी छ से अनधे हुए। चाहते तो नारियल को कह सकते थे
- 27:26नहीं, हमें अंधापन स्वीकारना है। औलाद के लिए, स्वेच्छा से अंधे
- 27:33हुए 1 दिन राजा के पास गए। दशरथ के दरबार में थे।
- 27:43वहीं उसी प्रदेश में वह रहत्य थे। उसके माता पिता अरण्य प्रदेश में
- 27:56उसने जाकर प्रणाम किया है ने पुत्र।
- 28:03किसलिए आए हो? श्रवण कुमार ने सारी व्यथा कह दी
- 28:14मेरे माता पिता अंते हे राजन आपके दरबार में बड़ी सिद्ध योगी
- 28:25देवतुल्य। ऋषि रहते मुझे उनसे पूछ के बताइए
- 28:36कि उनके अंधेपन का क्या इलाज है? कहानी कहती है कि शृंगी ऋषि थे।
- 28:57शृंगी ऋषि ने कहा हे नव युवक तुम्हारे माता पिता जन्मांध नहीं
- 29:06थे, सिर्फ तुम्हारे कारण? उन्होंने आँखों की बलि दे दी अतः
- 29:16तुम सुपुत्र हो अब तुम्हारे माता पिता विरुद्ध हो चूके हैं असहाय
- 29:27देख नहीं सकते। और इस ज़रा ज़रा स्थिति को तुम
- 29:35बर्दाश्त नहीं कर सकते यद्यपि तुम बड़ी सेवा करते हो भिक्षामान के
- 29:41लिए किया तो माता पिता को पहले करते हो फिर आप खाते हो।
- 29:51उनके बुढ़ापे की सचमुच तुम सहारा हो लाठी और ये जो प्रश्न तुमने
- 30:00पूछा, यह औलाद के लिए मायने रखता है, मेरे माता पिता कैसे ठीक हो
- 30:09जाएं? ये तो बाद में ही पता चला श्रवण
- 30:15कुमार को कि ये अंधे शुरू में नहीं के बाद में ही और तुम्हारे
- 30:19कारण जब श्रृंगी ऋषि ने ऐसा बोला कि तुम्हारे कारण?
- 30:29तो श्रवण कुमार का भीतर चीत का कर मेरा दायित्व तो एक पुत्र होने के
- 30:37नाते ही बहुत था लेकिन मेरे कारण ही अदात्व को प्राप्त हुए।
- 30:42फिर तो मेरा ही दायित्व बनता है सिर्फ मैं अपना जीवन भी करवान
- 30:47करता हूँ। कोई बात नहीं।
- 30:54तो श्री गिरीश ने कहा, अगर तुम अपने माता पिता को सभी तीर्थ
- 31:01स्थानों की यात्रा करवा दी गई तो उनका अंधत्व नष्ट हो जाएगा।
- 31:09अब यहाँ समजन बात को। मनुष्य अंधा है, एक सतर्क पे जाके
- 31:21बनता है ज्ञानविहीन व्यक्ति अंधा ही तो हुआ करता है।
- 31:31और श्रृंग्य कहते हैं कि इस अंधेपन का एक ही इलाज तीर्थ तीर्थ
- 31:39से स्नान करो तो इनका अंधापन दूर हो जाएगा।
- 31:44किस तीर्थ की बात करते हैं? श्रृंगी ऋषि जैसे महान?
- 31:50संत उस भीतर के तीर्थ की बात करते हैं जिसे बाबा नानक कहते हैं
- 31:59तीर्थनामा जयते सपाव है बेन पाणि की नाई यहाँ तो बाल्टी से मैं नहा
- 32:07सकता हूँ। लेकिन उस तीर्थ के ऊपर तो उससे
- 32:13स्नान करूँगा, जब उसकी इच्छा हो। तीर्थ नाम ज्योति सपा में है।
- 32:21बिणपाणी की नाई करें अगर वो नहीं चाहता कि मैं उस तीर्थ पे स्नान
- 32:27करूँ। फिर दूसरा स्नान तो मैं रोज़ करता
- 32:30हूँ, उसका कोई फायदा नहीं है। वह तीर्थ का स्नान जो तुम्हें
- 32:37ज्ञान चिक्षु दे जाता है, ये समझना है चर्म चक्शु के लिए नहीं
- 32:43कह रहे है श्रंग। शृंगी ऋषि जैसा महान ऋषि चरम
- 32:49शक्षुओं के लिए कह भी ना पाएगा उसके लिए ज्ञान शक्षु ही
- 32:53महत्वपूर्ण है शृंगी गश्त है, नवयुवक तुम्हारी व्यथा को मैं
- 33:01अच्छी तरह समझता हूँ अपने माता पिता की सेव।
- 33:06तुम्हारे कारण अंधे हो गए है, लेकिन अगर तुम उनका अंधापन में
- 33:12डालना चाहते हो, तो उनको तीर्थों का सेवन करो।
- 33:18तीर्थ को स्नान करने के बाद उनका अंधापन बट जाएगा।
- 33:24तुम भी अगर भीतर चले जाओगे, उस तीर्थ पे स्नान कर लोगे तो
- 33:29तुम्हारा भी ये अंधा पनिष्ट हो जाएगा तुम मंडे तुम मूर्तियां
- 33:37बनाते हो, मंदिर बनाते हो, मस्जिदें बनाते हो उस विराट की।
- 33:44जो सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता उस शक्ति स्वरुप महामाया की नामों
- 33:57में तुम व्याख्या करते हो, बांध लेते हो उस।
- 34:02असीम पर्वती कार को कि कनशरंगी ऋषि कहते हैं, बिना तीर्थ के
- 34:14स्नान किए इनका अंधापन नष्ट नहीं होगा।
- 34:19बात को समझना जाए बड़ा गहरा प्रसंग है।
- 34:26यह हमारी रामलीला में भी हम सबसे पहला नाटक यही खेला करता था,
- 34:32लेकिन किसी को मालूम न था कि सबसे पहले इस नाटक को खेलने का
- 34:38अभिप्राय क्यों है? अभिप्राय आज तुम्हें बता देता
- 34:45हूँ, नाटक तो बहुत खिल है, अभिप्राय ये है कि तीर्थ के ऊपर
- 34:54जब तुम स्नान कर लोगे, तुम्हारे वारे के तीर्थ नहीं, एक तीर्थ
- 34:59तुम्हारे बेतरफी है और वो सच्चा तीर्थ है।
- 35:03तुम्हारे तीर्थ तो यहाँ आज हैं कल मिट जाएंगे और आज हैं पवित्र कल
- 35:13प्रदुषित हो जाएंगे, प्रदुषित हो ही गए एक भेदक का ऐसा तीर्थ जो
- 35:19कभी दूषित नहीं होता। वहाँ जब तक तुम नहीं जाते तब तक
- 35:28ये आंकाक्षा ही मत करना कि मेरा अंधापन नष्ट कैसे हो जाए।
- 35:36अंधापन है, मोहमाया के कारण। ये मेरा ये मेरा, ये तेरा ये मैं
- 35:46ये सब अंधापन है, आर दी एलूसीओन आर दी बेसिक कास्ट ऑर यू अरे
- 35:54ब्लिंडनेस? ऑल दी इल्लुसिओन अरे दी बेसिक
- 36:01कास्ट ऑफ युअर ब्लिंडनेस तुम्हारे अंधापन का कारण तुम्हारे सभी
- 36:08ब्रह्म है, यह शरीर में हूँ, यह पदार्थ मेरे हैं, घर, बंगला, मकान
- 36:17मेरा है। ये पुत्रपोत्रा भी मेरे हैं।
- 36:22यह अंधापन भी तुम्हारा सही अंधापन गिना जाएगा।
- 36:28नेत्रों से मात्र अंधा होना तो कुछ भी नहीं होता, वो तो कर्मफल
- 36:34का प्रण। जो नेत्रों से अंधा है, लेकिन
- 36:44भीतर के ज्ञान शिक्षक खुल गए। उसे अंधा मत जानिए सच में तो तुमन
- 36:53देओ। और इसी अंधेपन को मिटाने की बात
- 37:00करते हैं। शृंगी नवयुवक अगर तुम अपने माता
- 37:06पिता शांतनु और ज्ञानवंती कांधापन मिटाना चाहते हो तो इनको तीर्थ का
- 37:12स्नान करो किस तीर्थ का स्नान? तुम समझ गए हो क्या?
- 37:17तीरथनमां जयते सुबाब है अब देखिये कहानी कितना सुंदर मूड देखती है
- 37:37कभी कभी इस कहानी का मूड देखकर। मेरी आँखें अशुभ हो जाती हैं,
- 37:48हृदय रोने लगता है। अंधेपन को मिटाने के कारण उसने एक
- 37:56वहंगी बनाई। तुम तो वहंगी बनाते हो, गंगा से
- 37:59पानी भरते हो। पत्थर के ऊपर डाल देते हो।
- 38:02शिवलिंग के ऊपर बम बम भोले कोई फायदा नहीं इसका ये कर्मकांड है
- 38:12महज बहंगी तुम भी बनाते हो। बहंगी श्रवण कुमार ने भी बनाई।
- 38:21उस बेहंगी में एक तरफ माता एक तरफ पिता दोनों को बैठाया नजवान था बल
- 38:29था उस बेहंगी में दोनों को बैठाया तुमने बेहंगी देखी होगी।
- 38:35श्रवण कुमार और तुमने उन मूर्खों की वह हिंदी भी देखी होगी जो
- 38:43गंगाज को लेकर आती है पत्थर के ऊपर चढ़ाते थे, इन सभी चीजों के
- 38:48प्रतीकात्मक चिन्ह थे। अर्थ थे वो तुम समझ नहीं पाए
- 38:53कितनी मूर्ताएं छिपी हैं आपके पिता?
- 38:56कब तोड़ोगे कान तोड़ेगा जो आता है, नई नई मुड़ता है, तुम्हें दी
- 39:00जाता है और मुड़तम का अम्बार लगा है।
- 39:06सुमेरू पर्वत चितनी मुड़ता है तुम्हारी हो गई है मटाएगा कौन?
- 39:11इसमें मैं रोज़ घूर रहाता हूँ तुम्हें मरे।
- 39:15घुर्राने का सबब शब्द नहीं आता, समझे इसीलिए के बुद्धों को आकर
- 39:23मिटाना पड़ता है और बुध रोज़ धमकियों सेंचती हैं तुम उड़ों की
- 39:32तुम्हें मार दी थी पापा। मूर्ख मूर्द्ताओं को फैलाती अभी
- 39:47कल एक मूर्ख कह रही थी नामदेव जी बिना माता पिता बिना पिता के
- 39:52जन्मे कमर आज तक वैज्ञानिक खून का निर्माण नहीं कर सके।
- 40:05तुम्हारे गुर्दे जैसे गुर्दे नहीं बना सके, तुम्हारे जिगर से ऐसा
- 40:08जिगर नहीं बना सकते, खून नहीं बना सके, स्पर्म नहीं बना सके, अंडाणु
- 40:13नहीं बना सके, क्या खाद बना सकते हो?
- 40:15तुम उड़ते हुए जहाज बना सकते हो सिर्फ?
- 40:19वह भी परमात्मा के नियमों के अधीन उनके नियमों के बाहर, बहंगी को
- 40:31उठा लेते हो। तुम गंगाजल को ले आते हो, तुम और
- 40:35तुम खुश हो जाते हो। जिंदगी ऐसे ही इल्लुसिओन में गुजर
- 40:41जाती है। दिल के बहलाने को ये काव्य जी
- 40:44ख्याल अच्छे हैं भाई तुम्हारी जिंदगी का जीना, कल्पनाओं का
- 40:52बहलाना अपने मन का बस इतना सा ही होता है सत्य का दर्शन नहीं होता
- 40:57तुम्हें जिंदगी में। बैंक की उठाई चले तीर्थ यात्रा
- 41:13कराने के लिए कहानी कहती सर यूके किनारे पे आ गए, प्यास लगी माँ
- 41:22बाप कहने लगे पुत्र श्रवण प्यास लगी।
- 41:27हाँ पिताजी ला दो बहन की वहीं रखी जाके पानी भर रहे थे, एक मटकी थी
- 41:34छोटी सी जब सरयू में से पानी भरने लगे तो गड़गड़ाहट।
- 41:45दूर खड़े दर्शक के कान खड़े हो गए।
- 41:48अवश्य ही कोई हिरण है और राजा शिकार करने के शौकीन थे यानी
- 41:59प्राण ऋण के शौकीन हुआ करती थी। तुम मुझसे पूछ लेते हो माँसाहार
- 42:08करना पाप है? जब तुम्हारे तथा कथित भगवान के
- 42:16पिता शिकार करते थे, दशरथ शिकार करने निकले यानी जीव हत्या करने
- 42:23निकले हैं। और तुम मुझसे पूछते हो जीव हत्या
- 42:26करनी पुण्य है जब वहाँ पे रसोई घर में कीड़े मच्छर मकोड़े मर जाते
- 42:35हैं। क्या करें बाबा?
- 42:44और तुम्हारे राजा का भगवान राम के पिता दशरथ शिकार करने निकलते हैं।
- 42:49शोक राजाओं का शोक होता है, राजा बनते तक मार देती हैं।
- 42:55तुम पशुओं की बात करते हो, राजाओं का शोक है।
- 43:02जिसके हाथ में शक्ति आ जाती है उनका शोक हो जाता है।
- 43:11वो गड गड की आवाज़ सुन मटकी भर रही थी।
- 43:18शब्दवेदीवान था दहशत के पास। चला दिया और श्रवण कुमार की छाती
- 43:28में लगा बिंद गया। एक चित्रकार निकली माताश्री
- 43:37माताश्री। और गिर पड़ा, शर्म को भाई चिरला
- 43:45के गिर पड़ा, तड़पने लगा, आवाज़ सुनी तुझे 10 मिनट भागे देखा
- 43:54नुजवान तड़प रहा है समझाया। कितना बड़ा पाप कर दिया बहन ने
- 44:07मृग को मारने के चक्कर में इन्द्र व्यक्ति की जान लेते मेरी अपनी ही
- 44:12प्रजा है। बड़ा अफसोस हो तड़प रहा था शव।
- 44:28छवन के मार्क के पास बैठ गया, घुटने टेक के बैठ गया क्षमा करता
- 44:34हूँ, उसने कहा जो हो गया उसके लिए क्षमा का कोई अर्थ भी नहीं रह
- 44:40जाता। मैं बचूंगा नहीं, लेकिन मेरा एक
- 44:42काम करता हूँ इस पानी को ले जाओ। मेरे माता पिता को पीला दो, वो
- 44:50प्यासी मैं उनकी प्यास बुझाने के लिए पानी भरने आया था।
- 45:06अचानक तुम्हारा तीर लगा चढ़ा थी। में पर्दों पर का मेहमान।
- 45:27मेहमान यहाँ फल दो बल का मेहमान यहाँ।
- 45:38मालूम नहीं पहचान कहाँ पल दो पल का मेहमान यहाँ।
- 45:55मालूम नहीं। पहचान कहाँ पल धो पल का।
- 46:08बस पता नहीं मैं कहाँ हूँ यह अंधेरा सा छाना लगे आँखों के
- 46:15सामने। कुछ दिखता नहीं।
- 46:18पहचान में कुछ आता नहीं तुम कौन हो?
- 46:22क्या मुझे मारने वाले हो? हाँ पुत्र मैं इसी पर देश का रसा
- 46:32दशरथ तुम्हारा प्रजा पालक। पर मैंने ही तुम्हारा गात किया है
- 46:41उस शमन को हमार बोले कि मेरे प्राण निकल रहे मेरे प्यार से
- 46:47माता पिता को पानी पिला दो और उनको मेरी मृत्यु का समाचार भी
- 46:54सुना। दशरथ कांपने लगे हैं।
- 47:07ओह ये तो घात हो गया, दशरथ की आत्मचित कारकृति महापाप हो गया।
- 47:24दो अंधों का एक सहारा तीर्थ यात्रा के लिए निकला।
- 47:31प्यासे माँ बाप के लिए पानी लेने आया।
- 47:34तुमने यह क्या किया? उसकी अपनी ही आत्मा से दुग्ध
- 47:41काढ़ने लगी ध्यान रखना। जब तानाशाह इतने पाप कमा लेता है
- 47:49तो उसकी आत्मा भी उसे ऐसे ही दुकारती है।
- 47:54उसकी आत्मा भी उसे कहती है तुम मर जाओ, तुम जीने की योग्यता नहीं
- 48:00रखते जीस प्रजा ने तुम्हें। अपने अंग अंग काट के दिए थे तो
- 48:09उन्हीं का घात करने लगे। उसकी आत्मा रोने लगती है, वैकंप
- 48:14नहीं लगता है इसलिए हिटलर रिकमेंटेड सुसाइड यही वेला होता
- 48:23है दुष्ट डिक्टे तानाशाह को उसकी आत्मा रुलाती है बताती है तुने ये
- 48:33ये बात किया, दशरथ ने मटकी उठाई। अंधे थे पद, क्या आपको पहचानते
- 48:47थे? दर्शक बोले आवाज बदल के बोले
- 48:58लेकिन पहचान? श्री पारपि लाओ पद जाप को पहचानने
- 49:12वाली आवाज को कैसे नकार देंगे? ज्ञानवंती और शांतनु यका यक से
- 49:20लादे कौन हो तुम? श्रवण कुमार तो नहीं है आवाज़
- 49:27छोड़ो तुम्हारी बातें क्या को हम पहचानते हैं मेरे पुत्र हैं बरसों
- 49:33से हमारी सेवा कौन हो तुम कहाँ है?
- 49:37श्रवण कुमार। प्यासे माता पिता ने सारी कहानी
- 49:46सुन कहानी सुनने के बाद प्यासे थे पुत्र व्योग में प्राण त्याग दिए
- 50:00और प्राण त्यागना से पहले ही श्राप।
- 50:04इसलिए मैं कहता हूँ। किसी की आँखों को इतना मत सता के
- 50:08नहीं तुलसी कहते हैं बिना जीभ की आहख लोहा बसम हो जाए बिना जीभ के
- 50:27जो आह होती है। लोहे को गला देती है इतना पाप मत
- 50:33कर बैठा जितना तानाशाह करते हैं, कोई कसूर भी नहीं था।
- 50:40प्रजा का क्या कसूर होता है, प्रजा तो राजा चुनती है।
- 50:49फिर राजा अगर अपनी कुछ अहम पूर्ति के लिए इतना तड़पा दे, गला लौटते
- 50:54जनता को फिर जनता कराएगी ना तो और क्या कहेगी?
- 51:01इसलिए राजाओं का आदमी बेहद कोई ज्यादा अच्छा नहीं होती।
- 51:04इस जन्म में नहीं तो किसी और जन्म में भक्त लेते हैं।
- 51:07भुगतना तो पड़ता ही। तुम जेल की सजा, फांसी की सजा,
- 51:13किसी भी फांसी घर में दे दो, कोई फर्क पड़ता है, फांसी लटका न हो,
- 51:22अम्बाला में लटकाओ, फिरोजपुर में लटकाओ, इटावा में लटकाओ।
- 51:28आग्रा में लटकाओ, कहीं भी लटकाओ फांसी तो फांसी है, तुम किसी भी
- 51:33शरीर में चले जाना। अभी मैंने कहानी बताई जो नेपाल के
- 51:38राजा ने बात किया इस जन्म में अभी अभी।
- 51:46तो फांसी किसी भी घर में लगा दो, कोई फर्क नहीं होता है, बात फांसी
- 51:54से होता होगा, दर्द चटपटा है, वो तो समान नहीं होगी कहीं भी लग
- 51:59जाये तो? शराब पिया के हे राजन जैसे हम आज
- 52:12पुत्रवियोग में तड़प रहे हैं तू भी किसी दिन आएगा एक ऐसा धन के तू
- 52:17भी पुत्रवियोग में तड़पे, का पुत्रवियोग में तड़प तड़प के अपना
- 52:22प्राण पे देखा। वो दिन आया, राम को वनवास हुआ,
- 52:30राम प्राणों से प्यारे से दहशत और उनके अंतिम शब्द सुनिए, तुम्हारी
- 52:36एक अभ्रांति और नष्ट हो जाएगा जीसको तुम जपते हो वो दशरथ पुत्र
- 52:43राम कैसे मरे? यह पुकार थी या जप था खुद ही
- 52:50अंदाजा लगाना राम राम कह राम कह राम राम कह राम।
- 53:03कह कह राम और राम सम कह कह राम और राम सम चलो राम पद धाम, कह कह राम
- 53:18और राम सम चलो राम पद धाम। दर्शक भी राम राम कहते हैं, राम
- 53:26राम कह राम कह राम कह राम यह पकारती है, जप था ये बताओ और इस
- 53:34राम राम को कहते कहते यह हृदय से कहा गया था।
- 53:43राम राम कह राम उर चलो राम पदु धाम।
- 53:50उसके पद राम के धाम की तरफ हो गए। यह जात था या बुका था।
- 53:58बस इस दोहे को पढ़ लिया करो, जब तुम जाओ, जाप करो, ये जपने होता,
- 54:05रेपुटेशन होती पुकार होती है, करुणो पुकार होती है।
- 54:12यह की थी दशरथ ने अंतिम बेला ने ऐसे ही द्रोपदी ने की।
- 54:18कृष्ण कृष्ण तुम तो जगते हो और रिपीट करते हो राधा राधा राधा राम
- 54:40राम कह राम कह चलो राम उरधाम तो हृदय से पुकार उठी।
- 54:52वो सब है व्याकुल की पीड़ा से वह जप नहीं था, रेपेटिशन नहीं थी, वो
- 55:02व्याकुलता थी, राम के बरहा में व्याकुलता थी, राम चले गए।
- 55:09उर्से पुकारी गई और हृदय से हृदय से पुकारी गई।
- 55:16जो ध्वनि है पुकार है वह पहुंचाती है तुम्हें याद रखना।
- 55:28इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ, इन मूर्खों ने तुम्हें हरे हाथ में
- 55:31माला देकर उसे गिणती योग्य उस असंख्य को गिणती योग्य बना दिया
- 55:37उस असंख्य को संख्या में ला दिया कह तह राम।
- 55:45उर राम सुम कहें कहें राम उर राम सुम चलो राम पदु धाम उसके धाम पे
- 55:59चले तुम भी धाम पे जाते हो धाम यात्रा करते हो।
- 56:04लेकिन वो धान की यात्रा नहीं देखिए और कोई याद नहीं किया और
- 56:14कोई याद नहीं आया तो यहाँ मुझे कृष्ण की एक बात याद आती है
- 56:19अनन्या चिंतन तो माँ। बस दूसरा याद ना है अनन्या बाप से
- 56:25मैं ही याद हूँ। कृष्णा कृष्णा।
- 56:39कृष्णा। अरे, अरे?
- 56:48यह पुकार तुम्हें पहुँच जाती है, यह पुकार तुम्हें ले जाती है उस
- 56:54अज्ञात लोक में जहाँ उसका निवास है ऐसे ही राम राम पुकारा दशरथ
- 57:02ने। राम राम तुम भी करते हो रोज़
- 57:10कृष्ण कृष्ण तुम भी करते हो रोज़ राधा राधा तुम भी करते हो रोज़
- 57:15लेकिन द्रौपदी की बकार में करूणा बेहतर थी।
- 57:19उसकी पगार करण गाथा का एक गायक था।
- 57:26जो अंतस के प्राणों से प्रस्फुटित हो, निर्बल को ना सताइए ताकि मोटी
- 57:41अप निरबल को ना सताइए जो निर्बल है।
- 57:47कोना सताइए ता की मोटी आह बिना जीव के आह के लोहा भस्म हो अच्छा
- 57:55तुम कितने ही फौलाद के हो कितनी ही छिप्ज़ा इंच हो 100 छिप्ज़ा
- 58:02इंच हो याद रखना। अगर तुम गरीबों की आहर ले लोगे,
- 58:06जिन्होंने अपना खून हमने ही अपने खून से बक्सा, गुलों को रंग हम ही
- 58:12शरीर के जश्न वह न हो सके, उन्हीं के साथ अन्याय करोगे तो तुम्हें
- 58:20भुगतान नहीं पड़ेगा। निर्मल को न सताएगी ताकि मोटी आह
- 58:27बिना जीभ के आह के लोहा बसम हो जाए।
- 58:33ये संतों का गहन निष्कर्ष है। उन्होंने जाना ऐसा जाना।
- 58:44माना नहीं, उन्होंने किसी शास्त्र से नहीं पढ़ा।
- 58:50तुम बाहरी आवरणों को बदल लेते हो। हमारे बड़े भाई थे एक सत्य घटना
- 58:54कह के दुखद घटना है, कभी कभी याद करके रो लेता हूँ।
- 59:04उनका नाम था किशोर चंद डॉक्टर थे यहाँ से दूर भटिंडा में रहते थे।
- 59:15धर्म तब्दील कर दिया, सब कुछ ज्यादा धर्म तब्दील कर दिया।
- 59:21हिंदू से सिख को सिख धर्म अपना लिया, सिख धर्म अच्छा भी है।
- 59:28सिख धर्म में एक बात तो ठीक है वड्डे झको, किरत करो, नाम झको।
- 59:40यही उसे महान बनाती है। आज कहीं गुरुद्वारा में चले जाओ
- 59:45आपको हर जगह गुरुद्वारा मिलेगा, तुम भूखे नहीं सोख तुम्हें सोने
- 59:56की जगह मिलेंगे तुम्हें खाने को भोजन मिलेगा, कुछ लेना जहाँ भी
- 1:00:03जाओ जहाँ कोई गुरुद्वारा है। बेहिचक रुक जा तुम भूगो न शोक,
- 1:00:11यही नानक का धर्म कहता है और मेरे भाई किशोर चाँद डॉक्टर थे, नाम
- 1:00:17बदल लिया तेसर सिंह रख लिया किशोर चाँद पहले हिंदू थे।
- 1:00:25किशोर चंद थे सिख हो गए, केसर सिंह रख लिए उनका एक पित्र हो
- 1:00:33पुत्र हो बड़ा सुन्दर सुशील मूर्ति भगवान बुद्ध जैसा सुन्दर
- 1:00:41नूर चेहरे से शरकता था। बड़ी बड़ी आँखें, सुंदर कृष्ण
- 1:00:50जैसी आँखें जब वो अपने जूड़े को बांध लेते।
- 1:01:03तो कोई भी नजर लगा देता हूँ इतना सुंदर ये मूर्खों के चक्कर में
- 1:01:12फंस गया सत्य घटना है, हृदय रो रहा है लेकिन बताओ।
- 1:01:25कावड़ के लिए क्या हरिद्वार कावड़ भर के लेके यानी भगवान शंकर के
- 1:01:35ऊपर चढ़ाएंगे? जब बठिंडा से चला बहुत दूर चला
- 1:01:41गया, ज्यादा दूर न था अब तो हरिद्वार पास ही था।
- 1:01:47रास्ते में एक सर्वर पड़ता है। ये काबड़ दो तरह की होती है एक
- 1:01:55खड़ी काबड़, एक सोई काबड़ खड़ी काबड़ में दो दो व्यक्ति जाते
- 1:02:00हैं, एक रात को सो जाता है। एक काबड़ को लेके खड़ा रहता है ये
- 1:02:05है तो सर्कस और कुछ नहीं तो खड़ी काबड़ लेके गया था साथ में एक
- 1:02:16बंधु था उसको काबड़ पकड़ाई मैं नित्यक्रम कर लूँ, स्नान ध्यान कर
- 1:02:24ठीक है। तैरब था बड़ा तगड़ा तैरब था,
- 1:02:35वस्त्र उतारे और कूद गया सरोवर में, लेकिन करोवर सरोवर के नीचे
- 1:02:42झाड़ फूंस पड़े थे। कंटीले झाड़ फूंस गहरा था।
- 1:02:46सरोवर लेकिन तराक भी बड़ा तगड़ा था।
- 1:02:52तैराक भी नंबर 1 लेकिन डूबते हैं। वो तैराक जो ज्यादा होते हैं,
- 1:03:06पूरा मनोबल था, गोता लगा दिया, केस खोल गया।
- 1:03:14लंबे लंबे केस थे। घुटनों तक आती है और पानी के भीतर
- 1:03:25गया तो जुड़ा खुल गया। केस खुल गए और वो केस उस जाल में
- 1:03:38फंस गए जो भीतर कांटो को। सारा इकट्ठा हुआ पड़ा था कांटो की
- 1:03:53झाड़ी बन गई थी भीतर लोगों ने फेंक दिया था कांटो पता नहीं था
- 1:03:57कल किसी की जान भी ले लेगा तुम तो पता नहीं सीजेआई होकर भी।
- 1:04:06गणेश बनाते हो और उसकी पूजा करके पटक देते हो।
- 1:04:10तुम कैसे न्यायाधीश हो तुम्हें पता नहीं यह विकृत करेगा।
- 1:04:15यह रंग सेहत के लिए हानिकारक है। विदेशों में ऐसा करके दिखाओ।
- 1:04:23तुम अगर चीफ युडिक्शन हो गए तो मालिक तो नहीं हो गए?
- 1:04:31थोड़ा समझ है कि नहीं है और गणेश की पूजा करते हुए अपना।
- 1:04:37दृश्य दिखाती हैं। देखो कितने महान हैं हम गणेश की
- 1:04:40पूजा कर रहे हैं और पूजा करने के उपरांत इन्हें पटक देओ के बाहर हर
- 1:04:45साल तुम देखते हो सरस्वती विसर्जन, गणेश विसर्जन ये क्या
- 1:04:50है? इन पाखण्डियों ने हिंदुस्तान का
- 1:04:54बिड़ा गर्क कर दिया। बेतहा भारतीय उसके केस फंस गए।
- 1:05:05झाड़ में निकलना चाहा होगा, बाहर नहीं आ सका, बस दो 4 मिनट 5 मिनट
- 1:05:13के बाद स्वास्थ्य खत्म हो जाता है।
- 1:05:18मैं जब नहर भीग रहा 9.5 मिनट तक नहर में रहा डूब गया था, लेकिन
- 1:05:23मुझे प्राणायाम की आदत थी। इस क्रिया योग के कारण मैं 12
- 1:05:29मिनट तक स्वास्थ्य रोक सकता था बिना स्वास्थ्य के जिंदा रह सकता
- 1:05:35और व्यास की बात है कोई स्वचमित कारण?
- 1:05:42नैहर मैं घर गया 9.5 मिनट तक मैंने बाबा से पूछा 9.5 मिनट तक
- 1:05:47तुम्हारे बाबा ने रस्सी भेजी मुझे निकालना बाला कहता मैंने निकाला,
- 1:05:55मैंने बचाया। क्योंकि मैं ही तो तुम्हें मार
- 1:05:58देती हूँ इस धरती पर अच्छा बुरा सब तुम करते हो बुरा नहीं करती
- 1:06:04अच्छा अच्छा तुम करते हो इसी के कारण तुम दुखी रहते हो, बड़े बड़े
- 1:06:13सपने पालते हो। और परमाद तो हमने पूरा नहीं होने
- 1:06:17देता, क्यों? क्योंकि ये मैं मरे तो पूरा हूँ,
- 1:06:22मैं मरती हूँ और भगवान शंकर कहते हैं की मैंने रस्सी भेजी और
- 1:06:29ट्रैक्टर की रस्सी दो से आदमी भागा।
- 1:06:35ले के आए रस्सी पकड़ा दी। जल्दी से चार पांच लोग खड़े थे और
- 1:06:39भी थे रस्सी बांधी एक व्यक्ति उतरा, एक बच्चा मेरा शिष्य था,
- 1:06:49उसने अंदाजे से हाथ पर दिख तो रहा नहीं था।
- 1:06:53डूबे काफी देर हो गए। अंदाज़े से हाथ पांव हिलाई, हाथ
- 1:06:59हिलाई और अचानक मेरा ये माया गंधा उसके हाथ में उसने पकड़ लिया।
- 1:07:15और उसने निकाल लिया, जो बाहर खड़े हुए लोग थे।
- 1:07:20उन्होंने दो व्यक्तियों को निकाला और और भी लोग आ गए।
- 1:07:25सभी ने रस्सी को खींचा। वह व्यक्ति, वह बच्चा जिसने मुझे
- 1:07:29बचाया वो भी और मैं भी साथ में आ गया।
- 1:07:31पानी से भरा हुआ सर वैसे भी भारी हो जाती है डेड बॉडी क्योंकि पानी
- 1:07:41भी हो जाता है जितना भार है उतने तो भार है ही।
- 1:07:48मेरी हाइट बीट बंद थी, लेकिन अचानक शुरू हो गया और वहाँ पर
- 1:07:54खड़े हुए सैकड़ों लोग आसमान की तरफ हाथ उठाए एक पर्वत दिखा।
- 1:08:03तो रहम हो करी, तेरी दांत असीम है।
- 1:08:13लेकिन वो बच्चा निकल नहीं सका तो कोई में कोई तलाक नहीं था।
- 1:08:19कोई आसपास इमत हुई ना जुटा पाए, मर गया।
- 1:08:27इसलिए मैं कहता हूँ तुम मूड़ मतियों ने ऐसे नहीं बोलता हूँ,
- 1:08:31मेरी आत्मा होती है तो बोलता हूँ मेरा वो प्यारा भतीजा सदा सदा के
- 1:08:39लिए गाय। जिसे हमारे फ़ोन चूमने चाहिए थे,
- 1:08:52उसने चिता की अग्नि चूमी धर्म तो बदला लेकिन मान्यता कहाँ बदली?
- 1:09:06काश ये मान्यताएँ भी बदले के बाबा ने 100 बार कहा।
- 1:09:10तीर्थ स्नानों पे मत जाना मत लेके आना इन कांगड़ों को पत्थरों पे
- 1:09:19पानी गिराने का कोई फायदा नहीं वो गंगा जल हो या सर धर्म जल हो।
- 1:09:27इनके कारणों को समझो इनके भितर कुछ रहस्य छिपे पड़े हैं जलेबी के
- 1:09:32रस की तरह लेकिन तुम मूर्ख बने ही रहोगे मैं जानता हूँ तुम्हें
- 1:09:39उवारने वाले मर जाएं, चले जाएं विदा हो जाएंगे कितनों को तुमने
- 1:09:42विदा कर दिया कितने और विदा हो जाएं लेकिन तुम?
- 1:10:31भैया मरोरी मैं बोली तो मेरी मटकी फोरी, मैं बोली तो मेरी।
- 1:10:47मृत की को। पैंया परूँ मैं विनती परूँ।
- 1:11:09मैं भी की पर एक न मानी वो मोरी रे।
- 1:11:44इक बांसुरी वाला वो कला इक बांसुरी वाला।
- 1:11:59सुध विसरा गयो मोरी रे, सुध विसरा गयो।