Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Jul 25 - इतना पाठ किया फिर भी वाहेगुरु नहीं सुनता, वह है भी कि नहीं? छलांग लेते समय गुरु का महत्व!
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- 0:00बाबा जी गण आप के दरबार में कुछ दिन पहले मैंने अरदास लगाई।
- 0:13थी। मैंने कहा था कि मैं पाठ करती
- 0:24हूँ। सवेरे नृत्य नेम 5:00 बजे पांच
- 0:31बाणियों का पांच पाठ जफजी साहब। शुभमणि साहब के 100, 101 पाठ करके
- 0:47बेटी के लिए अरदास करती हूँ। अब भी डेली।
- 0:58यह करती हूँ मूल मंत्र वह गुरु स्मरण करती हूँ बाबा जी, प्लीज़
- 1:12बताएं कि पाठ करने का। कोई फल मिलता है या नहीं?
- 1:23बेनती भगवान सुनते है या की किस्मत में है, जो वही मिलता है
- 1:32किस तरह पाठ करें? ताकि हमारी अरदास वह गुरु के पास
- 1:39पहुँच जाए और सुन ले। क्या आपने मेरी अरदास, मेरी तकलीफ
- 1:48वह गुरु से पहुंचाई थी? हाँ, पुतरे मैंने पहुंचाई थी, मैं
- 2:00गया था और तुम्हारी अरदास मैंने परमात्मा की आग लगाई थी फिर क्या
- 2:12बोले परमात्मा? परमात्म बोले अभी करने दो से जो
- 2:21करती है अभी जो करती है उसे करने पांच वणियों के पांच पाठ मूल
- 2:41मंत्र। सुखमणि साहब के जपजी साहब के 101
- 2:55पाठ मूल मंत्र के पाठ बह गुरु का सिमरा।
- 3:15रोज़ जाता हूँ पुत्री और तुम्हारी अरदास वैने की परमात्मा बोले अभी
- 3:26उसे कर ले जो वो करती है। मैं वापस इसका अर्थ मुझे नहीं
- 3:43पता, लेकिन आज अफसोस में जरूर मन वैराग से भर गया।
- 4:01डिटैचमेंट मैं सदा मंगता ही बना रहा हूँ, उसके तर्क का पहले अपने
- 4:14लिए मांगता था, अब के लिए मांगता हूँ, लेकिन मेरा मंगतापन कभी खत्म
- 4:21नहीं हुई। तो मेरी भी आँखें छलका गईं पर
- 4:30मुझे तरस आया तुम पे नहीं उन संतो पे फूल तो 2 दिन बाहर है।
- 4:42जाफिजा के हसरत तो उन वंशों पे है जो बिन के लिए मुरझा गए।
- 4:52आज प्रथम बार उनपे तरसाया क्यों तरसाया?
- 4:59कितने लाचार हो के बेबसी में इस संसार को अलविदा कहें होंगे।
- 5:18ये सब तुम्हारे भीतर कचरा किसने कर दिया?
- 5:22है। ये गिनतियाँ 101 पाठ से पांच
- 5:30बाणियों के ये गिनती किसने सिखाती तुम्हें?
- 5:41आज मुझे पहली बार सच मुझे संतो पे जस है।
- 5:49और दुख झर झर आँखों से आंसू भरने लगे।
- 5:55क्या कहा था वह बना? और आज की पीढ़ी जेनरेशन क्या
- 6:02समझेंगे? सुनिए दो अक्षर आज ज्यादा बोलने
- 6:13का मन भी नहीं करेगा नानक दुखिया सब संसार तो भगवान उससे बोलें ये
- 6:29दुखी तो तुम्हारे पास सुखी तुम्हारे पास आते ही नहीं।
- 6:35इनका कोई परवार नहीं, कोई अधियंत्र नहीं तुम पुत्र मेरे पास
- 6:46चले आओ, मैं तो तुम्हारे पास ही आता हूँ।
- 6:59और कहीं जाते ही नहीं बताओ कहाँ जाते हो?
- 7:03पिछले वर्ष में बाजार घूमू कहीं मेरी तमन्ना कुछ हुई कहीं जाने
- 7:11की, आने की, कुछ खाने की, पीने की, टहलने की घूमने की?
- 7:16कुछ पाने की कुछ खोने का डराए। मैं तो सिर्फ आपके ही पास आता हूँ
- 7:25और तुम्हें तो मालूम है मैं आपके पास ही रहता हूँ, भूसा आते होंगे,
- 7:33कभी कभी चले जाते होंगे। लेकिन मैं तो कभी कभी नहीं।
- 7:40मैं तो कभी कभी संसार में जाता हूँ।
- 7:44बाकी वक्त आपके ही तो पास गुजर जाता है।
- 7:51आज मुझे प्रथम भारत संतो के दर्शन।
- 7:57कितना मजबूर होके उन्होंने ये संसार छोड़ा, काश उन्हें कोई समझ
- 8:07पाता। काश उनके शब्दों का कोई सही अर्थ
- 8:14ले लेता। काश उनके शब्दों को न पकड़ के तुम
- 8:19शब्दों की गहराइयों में रहस्यों में उतर जाते।
- 8:26भावना नानक ने कहा नानक दुखिया सब संसार।
- 8:32सारा संसार दुखी है तो कारण क्या है?
- 8:37उसकी खुद की पैदा की हुई वासनाएँ आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, कल्पनाएं।
- 8:48मानव दुखी है और दुखी ही रहेगा। नानक दुखिया सब सहसा और तुम्हें
- 8:57एक फॉर्मूला भी बता दे, लेकिन तुम्हारी समझ कौन है?
- 9:01अगर समझ आ जाता तो ये 101 पार्ट? सुखमणि साहब के मूल मंत्र बागुरु
- 9:08का जाप ये बाणियां पांच बाणियां ये कहाँ बोल पाती तुमने मुझसे
- 9:18पूछा कर गए थे परमात्मा के पास बिल्कुल किया था बेटा।
- 9:22झूठ नहीं बोलते। गया क्या था?
- 9:25मैं तो रहता ही हूँ मेरा निवासियों मैं तो कभी कभी आता हूँ
- 9:35बाहर बाजार में नहीं संसार तुम्हारा दुखड़ा सुनने के लिए कभी
- 9:43कभी आ जाता हूँ। अन्यथा मेरा परमानेंट ठिकाना तो
- 9:53वही है लेकिन आज ही पहले है मोहब्बत तेरे खला के रोना।
- 10:09आज मुझे संतों की बात पे रोना, आज संतों की हालत पे रोना किस मजबूरी
- 10:18में वो गए? होंगे।
- 10:20पिता दर्द लेके गए। होंगे।
- 10:26इतना कहने के बाद भी तुम्हारी सोच में कुछ नहीं आएगा।
- 10:35कपुत्रि ये लोग ही ये लालची लोग रुमाले लेने वाले लोग ये संसार से
- 10:44कभी विदा नहीं। संत विदा हो जाएगा।
- 10:49संत तो कभी कभी एकाध आता है, थोड़ी देर के लिए रहता है, लेकिन
- 10:59आज मुझे पहली बार संतों पे तरस है।
- 11:05तुम पे तो सदा ही तरसता। है।
- 11:10लेकिन बा कमाल आज मुझे संतों पे हो के मजबूत मुझे उसने बुलाया
- 11:19होगा। कैसे त्याग होगा उन्होंने इस स्तर
- 11:27को? इतनी मजबूरियों में पड़े लोग,
- 11:32इतने अंधविश्वासों में पड़े लोग इतनी गुलामियों को झेलते हुए
- 11:35जंजीरों में जकड़े हुए लोग उनको छोड़ के जा रहा।
- 11:41हूँ। और इतना बोल दो पूरा ग्रह साहब
- 11:54बराबर है तुमने क्या उठाया अपनी वासनाओं को पूरा करने का तरीका?
- 12:06और भी बड़े अच्छा करते 1430 पन्ने हैं श्रीगुरकर लेकिन तुमने ढूंढा
- 12:14भी तो क्या ढूंढा अपनी वासनाओं को पूरा करने की?
- 12:23बाबा कहते हैं दुखी तो सारित और उस दुख का कारण खुद दुनिया स्वयं
- 12:31ही है। तुम्हारी वासनाएँ ही तुम्हारे दुख
- 12:36का कारण है, बस मेरी बेटी काम में लग जाए।
- 12:45सब ठीक हो जाएगा। तुम कहो कि थोड़ा सा अंगूठा कर अब
- 12:52जाती जाती है, वो ठीक है, चले तो हो तुमने मालिक को गुलाम की तरफ
- 12:59के हो? उसने तुम्हें संसार क्या दिया
- 13:10तुमने मालिक को गुलाम बना लिया। और मालिक की ये हालत मुझसे में
- 13:17देखी गई आज। आज दिल बड़ा रोया आज नैन बड़े
- 13:23वर्ष से बिना सावन के आज झरा आँखों से पान।
- 13:41काश तुम इसका अगला शब्द भी सुन लेती।
- 13:47अगला शब्द तुमने सोना नहीं और किसी ने समझाया नहीं, समझाया
- 13:53क्यों नहीं? क्योंकि वो खुद ही नहीं काम रही,
- 13:57तुम्हें का ख्वाब समझा? जीस व्यक्ति के गुर्दे राधा राधा
- 14:04कहने से ठीक हो जाते हैं और मेरे पास लोग हैं जो 35 वर्ष से
- 14:11डायलीसिस पे जिंदा। हैं 35।
- 14:15वर्ष। और भ्रमप्रचार इस बात का हो रहा
- 14:20है कि राधा राधा ने मेरी किड ने इसको ठीक कर दिया और ठीक कहाँ हुआ
- 14:33अबे डायलीसिस ही करवाना पड़ गया। तो ठीक क्या खाक हुआ?
- 14:38क्यों मूर्ख बनाती हो क्यों बुद्धू ने?
- 14:47लेकिन आज प्रथम बार मैं मजबूर आज प्रथम बार पहले तुम्हें देख के
- 14:53रहो ना। आज संतों की हालत पे रोना आया ए
- 15:02मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आ जा। चलो अगला शब्द भी सुन लो, सुन ही
- 15:15लो बाबा तो बहुत पहले बोल गए। लेकिन ये तुम्हारे रुमाली इकट्ठे
- 15:24करने वाले आदमी अगर तुम्हें ना भटकाते तो तुम्हारी आवाज दरगाह
- 15:30में पहुँच जाती है। बात बिचौलियों की है जो जटाधारी
- 15:40हों। जब वह बोधीधारी हों, चुटियाधारी
- 15:44हों, इससे कोई। फर्क नहीं पड़ेगा उन्होंने सिर
- 15:52मुड़वा लिया हो या केस लंबे रख दी हो, ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता।
- 15:59बात तो इनके बहकाने की है ये अपना स्वार्थ साधना चाहते हैं।
- 16:09और। तुमने कहा, पुत्री, वह गुरु के
- 16:18आगे मेरी अरदास लगाई। बिलकुल अलग अच्छी।
- 16:24अब अर्थ तुम निकाल लेना। वह बोले।
- 16:26ऐसे कर लेना तो बाबा का अगला शब्द समझ ले अगला शब्द समझ नानक दुखिया
- 16:41सुख समझ तुम सुखी होने की? इमारतें बनाते, महल करते और
- 16:50तुम्हें पता ही नहीं के इस शब्द के बिल्कुल अगले चार शब्द।
- 17:02इसका इलाज है माणक दुखिया सब संसार।
- 17:11ये तो तथ्य है ये तो सत्य है कि सारी दुनिया दुखी है, दुखी है
- 17:20अपनी वासनाओं के कारण, वासनाएँ जन्मीं तुम्हारे कारण।
- 17:27परमात्मा ने वासनाओं को नी पैदा किया, तुमने वासना को, परमात्मा
- 17:32ने शुद्ध ऊर्जा दी थी, तुमने ऊर्जा को काम बना लिया, तुमने
- 17:39ऊर्जा को क्रोध बना लिया, लोभ बना लिया, मोह बना लिया, अहंकार बना
- 17:44लिया। इस शब्द तुम्हारी कर्म, उसने तो
- 17:52शुद्ध ऊर्जा दी थी तुम्हारी चलो इसका इलाज भी देख लेते हैं।
- 18:01100 सुखिया जो ना। सुखी कौन?
- 18:09दुखिया तो सारी धरती तो सुखी कौन देखिये एक ही शब्द में बायफरकेट
- 18:20करके। शक्ति भी कह गए और उसका हल भी कह
- 18:26गए। नानक दुखिया सब शमशा ये शक्ति है
- 18:32तुम सभी दुखियो सो सुखिया जो नाम आजवाद तुम्हारे लोगों ने नाम के
- 18:44अर्थवल्प को। नाम पर महात्मा की पसारे को
- 18:49परमात्मा के वृहद रूप को विराट रूप को विशाल रूप को आदि अंत नहीं
- 18:57मध्य नहीं, जो कहीं जन्मता नहीं, जो मरता नहीं, जो सदा।
- 19:03है आद सच जुगाद सच। हेवी सच नानक हो से उसको नाम कहते
- 19:11हैं प्रभु सो सुखिया जो नाम अधार। जो परमात्मा के आश्रित हो, जिसने
- 19:30अपने नाव की पतवार अपने जीवन के नैया की पतवार परमात्मा के हाथों
- 19:39में दे दिया सो सुखिया। वह सुखी हो।
- 19:50द्रौपदी की कहानी मैं रोज़ कहता हूँ, जब तक उसके आधार नाम नहीं
- 19:58हुए तब तक वो सुखी नहीं, तब तक वो दुखी रहे।
- 20:06आधार के पांच पति। और सारे वनशाली सर्वगुण संपन्न
- 20:14सभी में कोई ना कोई गुण था जो पूर्ण संपन्नता से था नकुल से
- 20:23लेकर युद्धिस्थ तक। पाँचों पति सर्वपूर्ण सम्पन्न और
- 20:32बड़ी आशा थी। उनसे निगाहें थी कि वो ऐसा कुछ तो
- 20:44नहीं होने देंगे, लेकिन जैसे ही। द्रौपदी ने देखा भूखी आँखों से
- 20:55ललचाई आँखों से लाचार आँखों से असहाय, मेरा लंब आँखों से,
- 21:07बेसहारा हुई आँखों से। पाँचों पत्तियों को देखा तो
- 21:14पाँचों पत्तियों ने गर्द नीचे क्या करें?
- 21:22खुद को हार चूके और बड़े मज़े की बात है।
- 21:30ये कहानी कुछ अटपटी सी लगती है। मुझे।
- 21:35मैंने भगवान कृष्ण से पूछा आप महाभारत में सारथी थे, आपने इस
- 21:47दृश्य से कहा ना की जब तू खुद को ही हार गया तो तेरा बाकी क्या?
- 21:52है। फिर दांव लगाने को बचा क्या था?
- 21:57फिर द्रौपदी कहाँ तुम्हारी रह गई? जब तुम एक एक करके पाँचों भाई
- 22:07दांव पे लगा दिए गए तो द्रौपदी किसकी रह गई?
- 22:13तो भगवान कृष्ण हास्य। कहते तुम्हारी बात तो ठीक है बाबा
- 22:22विश्व हार गए, भीम हार गए, नकुल हार गए, सहदेव हार गए, अर्जुन हार
- 22:27गए, एक एक करके सारे हार गए जब जी खुद को हार गए।
- 22:36इंद्रप्रस्थ पहले ही है। तो फिर द्रोपदी किसकी रही?
- 22:46बा कमाल कृष्ण और कभी जिंदाची। का मालिक को हुआ करता है।
- 22:54द्रौपदी के मालिक को खुद द्रौपदी द्रौपदी खुद जुए पे लगती है आपके
- 23:02ये। तो मेरे पति तो हार गए।
- 23:04इंद्रप्रस्थ भी हार गए हम अब मैं खुद को दांप पे लगाती हूँ तो बात
- 23:08ठीक थी। तो तुम्हारे होते ये अन्याय क्यों
- 23:13हो? ये अनाचार क्यों हो?
- 23:21द्रौपदी किसी की नहीं थी क्योंकि सभी हार चूके थे।
- 23:24अपने आप को द्रौपदी इंद्रप्रस्थ की भी नहीं थी।
- 23:31भला किसी चेतन का मलक जड़ हुआ करता है द्रौपदी चेतन है और
- 23:38इंद्रप्रस्थ जड़ तो चेतन का माल्क जड़ कैसे?
- 23:46फिर जब सब उजहार गए तो द्रौपदी किसकी मल्कियत रह गई?
- 23:52कहती किसी की भी नहीं द्रौपदी खुद की मिलती है मैं कैसे रुक्मणी को
- 23:57दांव पे लगा। सकता हूँ कृष्ण कृष्ण?
- 24:05बात से रे की कह गए पते की। रुकमणि अपनी माल की सत्यभामा अपनी
- 24:15जमावंती अपनी लक्ष्मण अपनी ये सभी अपनी अपनी मालिक मेरी मालिक को।
- 24:21मैं तो नहीं मानती। हाँ द्रोपदी तब हारी जाती।
- 24:29जैसे युधिष्ठिर खुद को भीम हार के अर्जुन हार के सहदेव हार के अब
- 24:37दांप पे तो लगा रहे थे युधिष्ठिर, युधिष्ठिर भीम को नहीं हार।
- 24:42सकते थे क्योंकि दांव खेल रहे थे युधिष्ठ ये सब गलत था, परपंच था।
- 24:49तुमने रोके युधिष्ठिर मान, इंद्रप्रस्थ व राजा के
- 25:02इंद्रप्रस्थ उनकी माल की अर्थ लेकिन युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव,
- 25:10अर्जुन, भीम। इनके मालिक तो नहीं खुद के मालिक
- 25:15तो खुद को दांव पे। लगा।
- 25:18लेकिन चारों को दांव पे क्यों लगाया?
- 25:21चारों को भी दांव पे लगाया और वो कुछ बोले लेकिन द्रोपदी?
- 25:24को दांव पे मिलता है। उसको जो आप कृष्ण वाले ये गलत गलत
- 25:37था तभी तो मैं। आया उसकी एक पुकार द्रोपदी की
- 25:45नहीं तो मैं नहीं आता अगर द्रोपदी खुद लगी होती दांव पे।
- 25:50बड़ा प्यारी बात कही अगर द्रोपदी खुद दांव पे लगी होती तो मैं नहीं
- 25:56आता क्योंकि उसने दांव पे लगा दिया और ये हार गई अपने आप को
- 26:02लेकिन ना तो द्रोपदी हारी थी खुद को, ना भीम, ना नकल, ना सहदेव ना
- 26:08अर्जुन। ये चारों तो अपने आपको हारे ही
- 26:10नहीं और जीवंत व्यक्ति जीवंत चीज़ का मालिक कोई अनन्य हुआ करता।
- 26:19युधिष्ठिर की कोई मल्कीयत नहीं है।
- 26:21युधिष्ठिर की मल्कियत थी, सिर्फ वो राजा थे इंद्रप्रस्थ।
- 26:25के इंद्रप्रस्थ को हार सकते थे वो हार्दिक।
- 26:29इन चारों का हारना गलत। था।
- 26:33जब द्रौपदी को लेकर आए तो ये चारों उठ सकते थे धनुष खींच सकता
- 26:40था गाढ़ी अर्जुन गदा उठा सकते थे भीम अपनी।
- 26:48लेकिन ये चारों में से कोई नहीं है।
- 26:52कहीं अज्ञानता इनके ऊपर बादल बनके, प्रकोप की तरेक्षा की,
- 27:00लेकिन द्रौपदी समिता थी। द्रौपदी ने कहा मैं तुम्हारी
- 27:05मल्कियत हूँ, मैं इनकी भी मल्कियत में हूँ, मैं स्वयं भू हूँ, मैं
- 27:14स्वयं की मालक को खोदूं मुझे कौन सा ऊपर लगा?
- 27:18सकता है। इन्होंने गलत किया है।
- 27:23मैं इनकी बात को नहीं मानती, पर मैं तुम्हारी।
- 27:26बात को नहीं मानती। जब उन्होंने अत्याचार करना शुरू
- 27:30कर दिया तो फिर बुलाया पुकारना द्रोपदी ने भगवान कृष्ण तुम कहाँ
- 27:41गए? करो मत देर दुःख हरो द्वार का नाम
- 27:48शरणमति द्रोपदी का दुख हर लिया गया।
- 27:58लेकिन हरा कैसे? द्रोपदी का दुख कैसे दूर किया
- 28:04गया? यह पुत्री ग्रंथी यह रुमाला
- 28:10चिढ़ाने वाले तुम्हारा दुख नहीं दूर कर सकेंगे इन इनसे खुद के
- 28:14दुखी नहीं दूर हमने देखी है जन्नत की हकीकत, लेकिन हमने देखी है
- 28:27जन्नत की हकीकत लेकिन। दिल के बहलाने को गाली भी ये
- 28:31ख्याल अच्छा कि तुम्हें ख्यालों में उलझा देते हैं।
- 28:42इन्होंने सीखा दिया 101 पाठ करो सुखमणी साहेब का पाठ करो, वह गुरु
- 28:52का जाप करो। अच्छी अच्छी बात है।
- 28:57नाम जब करो सब करो लेकिन मैं पूछता हूँ तुम्हारा दुःख दर्द दूर
- 29:04क्यों नहीं होता? मैं तो प्रेमानंद से भी पूछता हूँ
- 29:10तुम तो सारे दिन करते हो राधे राधे तुम्हारे बुर्दे के।
- 29:13नहीं थे रोज़ रोज़ और राइट सर जवाब।
- 29:22तो इसी ने तो ठीक किया। मैंने कहा फिर तुम।
- 29:27दूसरी राणी को बंद। कर दो, डायलीसिस।
- 29:30राणी को फिर जीके दिखा दो ना। क्यों भर मारे लोगों को इतनी सी
- 29:36बात? सीधी, सीधी, सरल, स्पष्ट मूर्खों
- 29:40के समझे। अगर राधा रानी।
- 29:45ने तुम्हें जीवन दिया। तो डायलीसिस रानी?
- 29:49को बंद करो। दूध का दूध और पानी।
- 29:52का पानी हो ही जाना चाहिए। पता चल जाएगा।
- 30:00कौन सी रानी के। प्रभाव से तुम ठीक हुए।
- 30:03राधा रानी के प्रभाव से ठीक हुए या डायलीसिस रानी के प्रभाव से
- 30:07ठीक हुए? दो महीने नहीं।
- 30:14काट पाओगे पुत्र यह समझ लेना तुम कहाँ करते हो?
- 30:24शैतान व्यक्ति। शैतान पैदा करता है।
- 30:33आज मुझे प्रथम बार। तुम पे दी।
- 30:38मुझे आज प्रथम। बार संतों पर रोना है कितनी
- 30:44मजबूरी में उन्होंने देह त्याग का भोग?
- 30:48काम तो नहीं पूरा होगा? हमने बोला सब कुछ ये।
- 30:55समझ गए कुछ। बाबा नानक से में अक्सर मिलता है।
- 31:05मैंने बाबा नानक से। कुछ।
- 31:08जी क्या माजरा है अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर?
- 31:19सत्य अनुतर ये। जगह पर मछले न कौन जगह है 10 की
- 31:24कित्ता ज्यादा है मैंने कोई कोर? कसर वाकये नहीं छोड़।
- 31:31लेकिन अब। ये न तो सोएं हैं न ये जागें हैं
- 31:35मछले हो। किसने गृहसरी पालनी?
- 31:39है सब। तनख्वाह में पगार लेते हैं।
- 31:46क्या धर्म क्या राज़ में राष्ट्रपति है?
- 31:50चीफ जुडिशल है, सीजेआई है या छोटे हैं या मिनिस्टर्स हैं या चीफ
- 32:00मिनिस्टर्स हैं? सब वेतनभोगी हैं और कमाल की बात
- 32:05है। धार्मिक व्यक्ति कभी वेतनभोगी
- 32:09नहीं होता। वह तो परमात्मा।
- 32:13की दी हुई खाने वाला होता है। रब्तियां द्वितीय खान वाला।
- 32:19वेतन भोगी थोड़ी। होता है।
- 32:21परमात्मा की सेवा करने का कोई वेतन होता है।
- 32:26और परमात्मा की। सेवा करने का वेतन।
- 32:30यह दुनिया नहीं चुका पाई, यह समझ नहीं परमात्मा की सेवा करने का
- 32:35वेतन होता। ही है।
- 32:39परमात्मा की सेवा करने का फर्ज होता है वेतन नहीं गिना चुना वेतन
- 32:46नहीं होता। उसका फल होता।
- 32:49है और फल इतना होता है कि अनंतगुणा फल होता है।
- 32:54जितनी पगार तुम ले लेते हो। परमात्मा की।
- 33:01सेवा की एक कण के बराबर विनीन का फल।
- 33:07परमात्मा की सेवा। का अनंत था।
- 33:11तुलनता ही। शक्ल मिली जो सुकल्ला वत्सव।
- 33:18तुम वेतनभोगी वेतनभोगी प्राइम मिनिस्टर मालिक बन जाते हैं।
- 33:26वेतनभोगी। राष्ट्रपति मालिक बन जाती।
- 33:31है वेतन भोगी। चीफ जुडिशरी मालिक बन जाती है।
- 33:36और सभी वेतन। भोगी है जो वेतन लेता है।
- 33:39वेतन कहाँ से आती है? वेतन तुम्हारी।
- 33:43चीफ हो। बस सिर्फ तुम परमात्मा।
- 33:47को कुछ और सभी पदाधिकारियों को वो कितनी भी उच्च पदासीन बैठा है,
- 33:57उसको सब तुमसे ही जाता है, तुम्हारी जेबों से जाता है
- 34:01तुम्हारे परिश्रम का, तुम्हारे खून पसीने की तुम्हारी होती होगी।
- 34:08और ये तुम्हारे मालिक। मणिवक्चर।
- 34:14ये इलेक्शन कमीशन। ऑफ इंडिया इस।
- 34:18ये तुम्हें शुद्ध। न्याय देने के लिए था।
- 34:25शुद्ध मतदान करवातें। यह तुम्हारा गुलाम।
- 34:29था। ये तुम्हारा सेवक था।
- 34:33तुम्हारा नौकर था, तुम मालिक थे, लेकिन आज ये।
- 34:40मालिक बन के गलती किसकी? गलती इनकी नहीं।
- 34:47गलती तुम्हारी। ऐसा ही इन्द्रियां।
- 34:54तुम्हारी मालिक हो जाती है है तो सेव।
- 34:59इन्द्रियां तुम्हारी सेवा। करने।
- 35:03जो चीज़। चाहिए जो बा को चाहिए तुम कहो के
- 35:07हेलो ये हेल्ती। कंठ को कहो।
- 35:11कि तुम गाओ, ये गाता है? आंख से कहो तुम।
- 35:16फर्क हो ये फर्कती। हाथ से कहो तुम।
- 35:20उठो, ये उठते हैं। पांच से कहो तुम।
- 35:24चलो ये चलते हैं। तुम मालिक, ये तुम्हारी सेवक,
- 35:33लेकिन आज तुम्हारी इंद्रियाँ तुम्हारी मालिक हो।
- 35:39गई तो मैंने चाह रही। इंद्रिया तुम्हे नहीं।
- 35:43चाहती है। चटपटा भोजन चाहिए बल्ले पकोड़े से
- 35:48मैंने पूछा तुम राधा स्वामी जाते हो सेंटर बड़े भक्त हो, महीने में
- 35:53दो बार जाते हो, सच बताओ। बाबा आपके सामने झूठ तो नहीं बोला
- 36:05जाता, लेकिन वहाँ के बल्ले पर विश्वास है।
- 36:12बस ऐसे ही। छोटे मोटे कारण होते हैं हमारे।
- 36:21इन्हीं कारणों। से तुम जाती हो।
- 36:28तुमने इनको मालिक को, इंद्रियों को तुमने, इंद्र, तुम और वेदों
- 36:37में जीतने। शब्द लिखे गए।
- 36:39परमात्मा को इंद्र का हो हे इंद्र हमारी ये इच्छा पूरी करो हमारे
- 36:46खेत खूब लहला है खूब। अन्न उपज करें।
- 36:51हमारे पशु खूब दूध दें। हमारे घोड़े खूब भागे।
- 36:58हम सदा ही। संपन्न रहे।
- 37:00हे इंद्र, हे भगवान, हे परमात्मा, मैं एक बात करू परमात्मा के बारे
- 37:13में दो, इतने चल रही है छः मेरे संदेश।
- 37:22परमात्मा के बारे। में किसी को कुछ बताना।
- 37:28इसको गांठ के। साथ बांध लेना।
- 37:32चुनरी में बांध। लेना धोती के साथ बांध लेना,
- 37:34कपड़े के साथ बांध लेना गांठ देव। परमात्मा के बारे।
- 37:40में कोई नहीं जानता और कोई जान नहीं सकता।
- 37:46इस नॉट ओनली। अन्नोन बट ऑल्सो अन्नोनो एबल
- 37:51अल्बर्टैन्स्टीन। तुम्हारे वैज्ञानिक।
- 37:55विजय ही कहते हैं। तुम्हारी ऋषि भी।
- 37:59यही है न? जानें तुमको किसने बहका तुम पर ये
- 38:07जादू। कैसे चल गया पता नहीं।
- 38:12यह दुष्टों की। खुद की लीला।
- 38:17राजनीतिज्ञ। और धार्मिक लोग आपस में मिल गए।
- 38:20गिट्टी में टिकट लिए। सब झूठा कारवाँ पर हैं झूठा
- 38:25मीडिया पर एक कहावत है अक्सर मेरी माँ।
- 38:33सुनाया करते थे मुझे। पुत्र कभी याद।
- 38:36कर जब तुम बड़े हो। जाओ मैंने कहा माँ बताओ बड़ी
- 38:42मुश्किल से तुम। उपदेश देती हो अनिथा तो गुस्सा ही
- 38:47करती थी। हमारी माता बड़े गुस्से वाली थी।
- 38:51उपदेश तो कभी। कभी करती थी और लाजवाब उपदेश करती
- 38:54थी। तो मैं कहने लगी।
- 38:59चोर को खाते हुए मुझसे देख। चोर को खाते।
- 39:06हुए मत देखो चोर पर जो पड़ती है ना मार भौतिक।
- 39:17और चोर को कभी न मर चोर की माँ को मर ये दो बातें मुझे याद है आई।
- 39:25चोर को मत मर। चोर की माँ को मर।
- 39:33मत मारो उन्हें। जो धोखे से चुनाव जीत जाते हैं।
- 39:39वो तुम्हारे दुश्मन। हैं, जो धोखे से चुनाव किसी को
- 39:43जिता देते हैं, उनके हाथ में पावर।
- 39:47वो डरे तो क्यों डरे? डरने से पहले।
- 39:51एक व्यक्ति समझदार था, वो त्यागपत्र दे गया, उसने आज तक
- 39:56नहीं बताया वो त्यागपत्र पहुंचेगा।
- 40:02तो इनका कोई किशोर। नहीं, ये तो खरीदेंगे इनके पास
- 40:05पैसे हैं। लेकिन वह खरीदा।
- 40:08क्यों गया? कसूर उसका।
- 40:12है। जज खरीदे क्यों?
- 40:17जाते हैं। कसूरूम का है।
- 40:22क्यों बिक जाता है? मीडिया कसूरूम का है।
- 40:30क्यों दिख जाती हैं सारी संस्थाओं?
- 40:33कसूर किसका खरीदने वाले का कोई कसूर है तो, लेकिन प्रथम दृष्टया
- 40:43कसूर उसका जब। भी जाता है क्योंकि।
- 40:47जनता की निगाहें। तो उसके ऊपर।
- 40:50जनता का विश्वास। तो उसके ऊपर है, यह बिकेगा नहीं।
- 40:54यह डोलेगा नहीं खरीदने वाले तो खरीदने की चेष्टा करें, वह देने
- 41:00वाला तो डर दिखायेगा। धनपति तो धन।
- 41:07को बिखरेगा, लुटाएगा, लेकिन बात तो ये है।
- 41:12कि इसने अपना मूली। डाला क्यों?
- 41:15जबकि इसको जनता पगार देती है। अगर बिक जाए।
- 41:20राष्ट्रपति अगर बिक जाए उपराष्ट्रपति।
- 41:25तो जनता पगार देती है, कोप में से कौन?
- 41:29पसीने की कमाई होती है? तो कसूर किसका कसूर जो खरीद।
- 41:36लेता है उसका नहीं। जो खरीदा जाता।
- 41:40है, उसका कसूर है। शायद मेरी बातों को।
- 41:44समझ के हो गए। लेकिन हम फिर से अपने मुकाम पे आ
- 41:49जाये। लाचार?
- 41:56अवस्था में जब उठती है भीतर से लहर पुकार की तुम कहाँ गए महाराज,
- 42:05करो, मत देरी बस और दे दे। दुःख हर द्वार।
- 42:11का अनाथ शरण में तेरे पहली बात तो।
- 42:15इस शृष्टि को। लावारिस मत समझ लेना।
- 42:21जब तक हमारे। जैसे दिये जगमगा रहे जो स्टेप
- 42:28लगा। के कहते हैं, वह है और मैंने।
- 42:30देखा है, यही कबीर कहते है तुम कहते कागज।
- 42:37की लेखी तुमने शास्त्र पढ़ी? तुमने रचनाएँ पढ़।
- 42:42ली। संतों को पढ़ लिया संतों की
- 42:44किताबों को कहली अक्षर। तुमने पढ़ ली?
- 42:49तुम कहते का गद की लेखी और मैं कहता आँखों देखी यह स्टेम्प।
- 42:55है जिसने देख लिया। वो जब स्टेम्प लगा दे तो निश्चिंत
- 43:01हो जाना चाहिए। यही विवेकानंद।
- 43:06किया करते थे विवेकानंद। जो कोई बोलता पंडाल।
- 43:10लगा के उससे पूछता ठहरों पहले यह बताओ तुमने देखा?
- 43:17परमात्मा है, वो भी तहा है तुमने देखा।
- 43:26मैंने देखा झूठ। बोलने वाला कहीं तक भी जा सकता
- 43:28है। हाँ, मैंने देखा, लेकिन मज़े की
- 43:34बात वह देखा नहीं जा सकता। ज़रा बताओ।
- 43:41थोड़ी सी बात तुमने कभी दर्द को। देखा है।
- 43:48तुमने कभी खुशी को देखा है तुमने कभी सुख को देखा है दुख को देखा
- 43:53है? वैरागी को देखा है?
- 43:57क्रोध को देखा है? वैष्णव को देखा है।
- 44:04आनंद को देखा तुमने परमात्मा तो परम आनंद जब आनंद।
- 44:14तक भी नहीं देखा जा सकता। तुमने शांति देखी।
- 44:19शांति नाम की। किसी महिला को जरूरत देख लिया
- 44:21होगा। शांति को तुमने नहीं।
- 44:24देखा क्रोध तुमने नहीं देखा, वेरा की तुमने नहीं देखा?
- 44:35तुम झूठ बोल रही हो लेकिन जो झूठ से लोग हैं वो झूठ बोलेंगे।
- 44:46क्योंकि उनके पास और कोई हुनर नहीं है।
- 44:48यही हुनर है झूठ बोलने का। हुनर बड़ा हुनर।
- 44:53मुझसे लोग पूछ लेते। हैं।
- 44:56ये भ्रष्टाचार लोग? कब तक राज़ करते रहेंगे?
- 44:59मैंने कहा ये राज़ करते ही रहे। मतलब बाबा जी मतलब ये के ये चले
- 45:07जाएंगे जो दूसरे आ जाएंगे वो कौन सा भ्रष्ट है?
- 45:11अरे, बाबा जी, फिर मुक्ति? कैसे मिलेंगे?
- 45:13मैंने कहा इनसे नहीं। तुम पार्टी बदल दोगे।
- 45:20तो मुखिया बदल दोगे? बदल दो 2 दिन ठीक चलेगा ये सत्ता
- 45:29का नशा। इससे शराब पी के कोई बहकने से बचा
- 45:37है। ये सत्ता का?
- 45:39गुरु ऐसा है। जैसे ही सत्ता।
- 45:44नहीं मिलती उसको सी नहीं बैठता व्यक्ति कहता है बस एक बार सत्ता
- 45:49दे लो, मैं सब ठीक करती हूँ। कहाँ ठीक होता है?
- 45:54हाँ, एक बात है गाँधी की तरह एक तरफ हो जाए सत्ता तुम करो।
- 45:58मेरा मार्गदर्शन। था।
- 46:02लेकिन फिर ये लोग? मार्गदर्शन लेते जहाँ अर्चना काश
- 46:11मार्गदर्शन ले लिया होता। गलती पर बैठने के बाद सब मुकर गए।
- 46:18अब मार्गदर्शन नहीं चाहिए हीरो पायो गांठ बज रहा है।
- 46:24बार बार बापू। क्यों खोले?
- 46:27मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोल रहा?
- 46:31है। ठीक है, ये तो हमारी।
- 46:38किस्मत में था, कोई चरणों में झुक गया, कोई लट्ठ लिए फिरा लेकिन
- 46:43आजादी मिल गई अब राज़ तो हम करेंगे।
- 46:49तुम करते रहो अनशन। उपवास हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 46:54तो मैं कहता हूँ, पुत्र। राजनीतिक व्यक्ति, राजनीतिज्ञ
- 46:58जिसके आगे लग गया वह धोखेबाज होता है।
- 47:03राजनीति में वही जाएगा जो धोखेबाज होगा।
- 47:09जो दुष्ट होगा। जो पापी होगा।
- 47:13जो चोर होगा, जो डाकू होगा, संत को क्या जरूरत पड़ी जीसको इतना
- 47:22बड़ा स्वर्ग मिल गया। मैं तुम्हारे ताल।
- 47:27तलैया में क्यों मौके बा? और अगर भौंकता।
- 47:32है तो इसका अर्थ सीधा है तो उसको मानसरोवर।
- 47:35नहीं मिला। जीसको मानसरोवर?
- 47:42मिल गया वो ताल। कर गया।
- 47:44मैं कभी नहीं चलाएंगे। पर अगर छलांगें।
- 47:49लगाता है। जो तो समझलो नहीं मिला उसे मान
- 47:54सर्व ये दो ही बातें और दोनों में से एक सत्य होती है।
- 48:05तुमने कहा बुदरे मैं 101 पाठ ये किया, वह गुरु का जाप करती हूँ।
- 48:14सब नित्य करम। तुमने किये बिल्कुल किये और फिर
- 48:17पुस्तियों के परमात्मा होता है। क्या ब्रह्मात्मा सुनता?
- 48:22है। पहली बात तो तुम्हें बिना यकीन
- 48:26किये किसको बजा? जब तुम्हें पता ही।
- 48:31नहीं, तुम जीसको बज रहे हो, वो है भी के नहीं है।
- 48:35फिर भला तुम्हारी। पुकार सच्ची होगी।
- 48:40द्रोपदी तो जानती। थी के कृष्ण हैं।
- 48:44और वह जानती। थी, जानती थी क्या उसने देखी थी।
- 48:50इसलिए संत की पुकार सही पुकार होती है।
- 48:56इसलिए मैं रोज़ कहता। हूँ।
- 48:58संत जब पुकार करता है वो सही पुकार करता है।
- 49:04और तुम्हारे लिए वो। पुकार नहीं करता।
- 49:06क्योंकि तुम्हारी वासनाएं आज हैं कल को तुम कहोगे पैर के अंगूठे
- 49:11में दर्द दे ज़रा जभी भगवान से दर्द।
- 49:14तो भगवान हमारे बाप का। बोला कर।
- 49:19बस यही कुछ। करता है तुम भ्रम कब तोड़ोगे?
- 49:23तुम मुख्य भ्रम कब तोड़ोगे के जय श्री तुम नहीं?
- 49:28तुम ही थोड़ा सा। कष्ट कर लो ना।
- 49:32मुख्य भ्रम तुम ही। तोड़ दो कि जिसमें दर्द होता है
- 49:35वो मैं नहीं। जो मन भटकाता।
- 49:40है वो मैं नहीं। तुम कष्ट करने को तैयार और सारी
- 49:48चीजें भगवान के मत्थे मडक लेते अब तुमने बनाया परमात्मा ने बनाया सब
- 49:53कुछ तो तुम्हें ठीक करो। तुमने दर्द दिया और तुम तब आती।
- 50:01दर्द का कण भी। तुमने पैदा किया और दवा भी तुम
- 50:04ही, तो नानक दुखिया सब संसार के तो सब है?
- 50:17सो सुखिया। जो नाम था तुमने यह नहीं पढ़ा।
- 50:23गुरुवाणी का एक शब्द। तुने पढ़ा?
- 50:28अविश्वास? सब पापों।
- 50:30का मूल अः श्रद्धा नास्तिकता है सब पापों के।
- 50:38मूल में अः श्रद्धा और अविश्वास। क्योंकि जब तुम्हें विश्वास।
- 50:43नहीं। तुम करोगी खाना पूछती।
- 50:48तुम ग्रैंड साहब के। पन्ने पलटोगे पढ़ोगे नहीं?
- 50:52मैंने देखी है सिर मैं खुद पलटा। करता था श्रीराम तृतमानस का पाठ
- 51:00रात को मैं अपनी ड्यूटी कह के लगवा लेता हूँ।
- 51:03मज़े से सोता मुझे पता है कौन आएगा।
- 51:065:00 बजे से पहले कोई नहीं आएगा हाँ।
- 51:09सुन सुबह ही जैसे थोड़ी सी आँख खुल जाती।
- 51:19थोड़ा सा, मैंने। एक हल्का सा अलार्म भी लगा रखा।
- 51:24आंख खुल जाती। उठ के मैं पन्ने पड़ रही हूँ सर।
- 51:29हैलो जी रात। में इतने पन्ने पड़ती है।
- 51:34तो फिर रात की। ड्यूटी कोई जागता तो है नहीं।
- 51:37जागना चाहता भी नहीं, आराम से सोना।
- 51:40चाहते हैं सभी? और पाठ भी पूरा।
- 51:44हो जाए और। हमारा नाम भी बन जाए ये सभी चाहते
- 51:47हैं। तो वो मुझे ही सौंप देते कि रात
- 51:54का काम तुम्हारा। ये अयोध्या कांड?
- 51:57से शुरू हो गया। अब तुम लंका कांड तक लिया ना
- 52:01उत्तरकांड हम खुद ही देख लेंगे लेकिन एक बार।
- 52:07एक बार गड़बड़। होगी कि पन्ने पलटने में ज्यादा
- 52:10पलटे गए। ज्यादा पन्ने पलटे गए तो बजे थे
- 52:17अभी पांच। और।
- 52:19भोग पढ़ना 9:00 बजे 4 घंटे पढ़ें। और उत्तरखंड के 108 में दोहे पे
- 52:25आते। कामीनार प्यार जन लोभेप्रेजमे दान
- 52:33तेहि रगो ना ते निरंतर प्रियाला। हाहाकार।
- 52:40कीने गुरु शिव, सुण दारूण शिव साहब, कंपित मोहि बेलोका थी और
- 52:45उपजा परता। आगे भगवान शंकर।
- 52:49की महिमा नमामि शमीशान निर्वाण रोपण में निकारे ये क्या गया?
- 52:57ये तो उत्तरकाण्ड आ। गए तो खत्म हो।
- 52:59इसके बाद तो अभी तो घंटे ही चार पड़े हैं।
- 53:04तो मैंने थोड़ी सी आंख। बचा के पन्ने इधर कर दिए वो।
- 53:08किसी ने देख लिया कहते ये कर मैंने कहा थोड़ी सी ज्यादा पड़े
- 53:13कर। ये दोबारा से ही पढ़ने।
- 53:18गए। कोई बात नहीं सिलेबस पूरा हो
- 53:20जाएगा। ज्यादा रिपीट हो जाए।
- 53:23मैं खुद करता रहा चोर चोर। मौसेरे भाई।
- 53:32हम मुसेरे भाई। ही हैं।
- 53:36मैं तुम्हें कुछ गलत। नहीं कहता हूँ बाल बच्चे तुने भी
- 53:39पाले लेकिन ऐसे मत पालो। ये काम गलत है तुम्हें लोगों को
- 53:45बुर्ख तो। बनाओ लोग हैं ही मूर्ख बनाने के
- 53:48लिए। लेकिन बिल्कुल साफ।
- 53:53तुम्हारी मूडता सामने आ रही। है राधे राधे से।
- 53:57मेरी ठीक होती है तो फिर तुमने डायलीसिस क्यों करवाया भाई?
- 54:03जो राधा राधा। के नाम पर श्रद्धा करता है।
- 54:09वह डायलीसिस पे? श्रद्धा नहीं करता, श्रद्धा एक पे
- 54:12होती। दो चीजों पे श्रद्धा।
- 54:15नहीं होती। तुम पहले ही।
- 54:20दोगले हो गए। इधर डायलीसिस भी करा रहे हो।
- 54:26इधर लोगों को कह रहे हो राधा राधा करते हो, देखो मैं राधा राधा कर।
- 54:32मेरे को 30 वर्षों। मेरे पास 3540 वर्ष के लोग बैठे।
- 54:38जो डायलीसिस करवा। रहे हैं।
- 54:39उन्होंने कुछ नहीं और डॉक्टर ने कहा था तुम मर जाओ।
- 54:43बिल्कुल मर जाओ। जब ये छाननी ठीक से तुम्हारे
- 54:47विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालते नहीं, फॉरिन मैटेरियल्स को तो
- 54:52तुम। मर ही जाओगे।
- 54:53भीतर जहर फ़ैल जायेगा। इसमें वो भी क्या?
- 54:57गलत कहते हैं, लेकिन राधा राधा शब्द कोई छालनी नहीं।
- 55:03राधा राधा शब्द। तुम्हारे भीतर बने हुए मूत्र को
- 55:06साफ नहीं करता है, ये तुम्हारा गुर्दा ही साफ है।
- 55:14ये भगवान ने बनाया। है।
- 55:15इसलिए अरे अगर ये फेल हो गया तो? डायलीसिस।
- 55:20रानी ही काम पड़ेगी, राधा रानी नहीं काम पड़ेगी।
- 55:23परमात्मा के बनाए हुए विधान की रचनाओं के नियमों के भीतर चलो।
- 55:31नियमों को। चबत्कार की तरह व्याख्या मत करो,
- 55:33यह पाप। यह गूढ़ता को।
- 55:37फैलाना है। यह अंधभक्ति का प्रचार है।
- 55:41प्रसारण। करते रहो आज।
- 55:44नहीं कल पोल खोलेंगे। मैं इसीलिए कहता हूँ कि ठीक है
- 55:54तुम्हें दवा के लिए। बूटी के लिए सब कुछ चाहिए तुम काम
- 55:57धाम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कर।
- 56:01सकते हो कि सत्य को फिर? मेरे पास परसों एक का भी है।
- 56:14बाबा आपसे दीक्षा लें, मैंने कल डिक्शन।
- 56:22मुझे तुम में संभावना। ना करनी आती।
- 56:27तो फिर बाबा संख्या। तो बढ़ेगी।
- 56:29मैंने कहा संख्या में बढ़ाना नहीं।
- 56:34जब मैं नहीं। चाहता।
- 56:36मेरी संख्या बढ़े। तो तुम क्यों उतावले?
- 56:40हो नाम दान लेने के लिए तुम दीक्षा के लिए क्यों आ गए?
- 56:48बाबा ऐसे मत कर मैंने कहा देखो बात तुम्हारी इच्छाएं।
- 56:55हैं कुछ और ये बाद में पता चलता है।
- 57:01जब तुम उगुड़ोगे तब पता चलेगा तुम्हारी इच्छाएं क्या थी, यही
- 57:05कुछ नहीं रहेगा। मेरी बेटी काम।
- 57:09धंधा नहीं करती। काम लगा दो।
- 57:11कनाडा में है। ऑस्ट्रेलिया में है, अमेरिका में
- 57:14है। लोग तो यहाँ जाने।
- 57:17के लिए तरस रहे हैं। इतना शुक्र?
- 57:21करो कि तुम्हारी बेटी वहाँ पहुंचोगे।
- 57:26फिर अब काम भी लगवा। दो फिर तुम खुद भी बात कर रही हो।
- 57:35फिर मुझसे भी कह रही तुम्हें किसी पे कोई यकीन नहीं श्रद्धा एक पर्व
- 57:46होती है, पूछती मेरे से। कि क्या भगवान सुनते हैं?
- 57:54मैं तुमसे पूछता हूँ क्या भगवान होते हैं?
- 57:57पहले तो प्रश्न यह। है तुम अपने संतों से पूछा था
- 58:01क्या भगवान होते हैं? सभी कहते हैं, हाँ।
- 58:10होते हैं। विवेकानंद ने पूछा।
- 58:13तुमने देखा है हाँ देख क्या बिगड़ता है, क्या प्रूफ है कि
- 58:17हमने देखा कि नहीं देखा? हम झूठ भी बोल सकते हैं।
- 58:23मुझे दिखा सकते हो बस यही प्रश्न मार्क देते थे।
- 58:30ये था सिरे का प्रश्न नरेंद्र नरेंद्र दत्त मुझे दिखा सकते हो।
- 58:40तुमने देखा है मुझे दिखला सकते हैं बहुत ही बंद हो जाती है,
- 58:48लेकिन आगे पंगा पड़ गया। रामकृष्णा पर मंस रामकृष्णा पर
- 58:55मंस को यही शब्द परमात्मा है। तुमने देखा हाँ देखा, मुझे दिखा
- 59:02सकते हो हाँ तुमने देखना। है।
- 59:05हाँ, देखना है पक्का पक्का तो देखो।
- 59:14कभी कभी मुझे। विवेकानंद के लिखे हुए ये शब्द।
- 59:18थोड़े से मिलावटी भी लगता है। क्योंकि जो अनुभवी।
- 59:23नहीं होता वो आँखें मूद के यकीन करना ही पड़ेगा।
- 59:26उसे तो विवेकानंद के ऊपर हाथ रखा, वह भीतर जाना शुरू हो गए।
- 59:34और एक तल? पर आकर बोले।
- 59:39स्वामी जी मेरे माता पिता भी है भाई बहन के मैं तो गया अब यहाँ
- 59:51आके अगर कुछ ठहर जाएगा। तो वह नमज़ को पकड़।
- 59:56लेगा। हर रमज़ को समझ जाएगा।
- 59:59यहाँ भय तो बहुत लगता है बिलकुल लगता है सूखे पत्ते की तरह को।
- 1:00:07लेकिन भय के। साथ साथ आनंद भी तो गाना होता है।
- 1:00:12और मैं नहीं। सम्यता के विवेकानंद जैसा समझदार
- 1:00:16व्यक्ति सिर्फ भय को ही देखे था, अनंत को नहीं पिए।
- 1:00:22वहाँ दो तरह की। घटनाएं घटती हैं।
- 1:00:25आज तक किसी व्यक्ति। ने इसके उपरतर को नहीं दिया
- 1:00:28क्योंकि। कोई व्यक्ति वहाँ पहुंचा है।
- 1:00:31जंग सेर पॉइंट से नीचे जा के आती है ये चीज़।
- 1:00:36जंग सेर पॉइंट तक। तुम्हारी सब इच्छाएं पूरी हो।
- 1:00:40जब तुम उससे। बिलकुल सीधा चलोगे स्ट्रेट लाइन
- 1:00:44ज़रा। भी इधर उधर नहीं हो गया।
- 1:00:46हजारों श्रृंखलाएं हैं। तुम सीधे चलोगे।
- 1:00:49तो तुम गलना शुरू हो जाओगे और कब होगे मृत्यु तुम्हें साक्षक तांडव
- 1:00:54नृत्य करती हुई दिखाई पड़े। लेकिन दूसरी बात एक और हुई है।
- 1:01:02गुरु क्या समझता है? उस वक्त क्या समझता?
- 1:01:07है। ये तो तुमने सुना कि।
- 1:01:08वह गुरु काम आता है, लेकिन तुमने ये भी कभी सुना कि गुरु काम आता
- 1:01:14कैसे? गुरु क्या कहता है?
- 1:01:17तुम्हें उस वक्त ये तुम्हें मैं बता देता हूँ।
- 1:01:23तुम तो कम्फ हो। तुम मृत्यु को देखो।
- 1:01:27सूखे पत्ते की तरह। खपोगे तुम गलोगे तुम मेल्ट होगे,
- 1:01:34तुम वाष्पु बनोगे, वेपुरेट होगे, तुम्हें लगेगा मेरा वजूद कदम
- 1:01:38बिल्कुल लगेगा बिलाशट्टी ठीक है। वहाँ गुरु की जरूरत।
- 1:01:45क्या होती? राम किशन पर मनुष्य पक्के खिलाड़ी
- 1:01:50थे। कच्चे लगते नहीं मुझे।
- 1:01:55तो राम किशन। परमहंस पास ही मौजूद थे।
- 1:02:00बस एक बात। मुझे आज तक नहीं समझाई।
- 1:02:04कि उन्होंने। विवेकानंद के सिर के ऊपर से हाथ
- 1:02:07उठा क्यों दिया? जबकि गुरु का काम।
- 1:02:10ही वहाँ से शुरू होता है। यहाँ मुझे कुछ।
- 1:02:16गड़बड़ लगता है। रामकिशन परमहंस ने सिरकों पर हाथ
- 1:02:22रखा। पावर फेंकी यहाँ तक बिलकुल की।
- 1:02:26अपने भीतर गए। अपने भीतर उतरे अब चेतन में,
- 1:02:31अचेतन में, अचेतन में गहरे तक गए होंगे वहाँ मृत्यु।
- 1:02:37मैंने बोला भाई आपको। मृत्यु हुई, मृत्यु हुई, मृत्यु
- 1:02:39हुई मृत्यु क्योंकि हमने जो दबाया वही तो आएगा।
- 1:02:44वह कब में होंगे ये? बुजुर्ग।
- 1:02:48लेकिन उस कपती। हुई हालात में गुरु का काम क्या
- 1:02:51होता है? ये तुम्हें शायद।
- 1:02:57किसी ने बताया ये तो बताया होगा कि गुरु की आवश्यकता ही पड़ती है।
- 1:03:02गुरु वहाँ काम आता? है।
- 1:03:03लेकिन गुरु कहता क्या है उसे? चलो, आज मैं तुम्हें बता देता हूँ
- 1:03:08गुरु क्या कहता है। गुरु उसका ध्यान डाइवर्ट।
- 1:03:12करता है। गुरु कहते रहो तुम कब रहे हो, मैं
- 1:03:18जानता हूँ मैं भी कभी इस जगह था। मृत्यु के भय से तुम कंपरे हो,
- 1:03:24मौत तो तुम्हारे सामने खड़ी। तुम्हें कंपा रही है।
- 1:03:28पांडव नृत्य हो रहा है। शंकर भगवान का मौत नंगी नाच रही
- 1:03:32है। बिलकुल ठीक लेकिन ज़रा थोड़ा सा
- 1:03:35इधर भी देख लो, इधर आनंद के झरने भी तो बह रहे हैं, इस संग गसंग
- 1:03:41चलते हैं। पैरेलल तुमने एक लाइन को देख
- 1:03:45लिया। मृत्यु दूसरी लाइन गाड़ी तो दो
- 1:03:48लाइनों पे चली। दूसरी लाइन पे तो।
- 1:03:52देखो पुत्र लेकिन रामकृष्णा परमहंस ने कहा कि।
- 1:03:59और गुरु यही तो कहा। करता है।
- 1:04:03तुम भी जब कहीं। कभी ऐसे तल पे आओ।
- 1:04:08मेरे पास ये दो तीन। व्यक्ति ऐसे आ गए।
- 1:04:13मैंने उनका ध्यान। डायरेक्ट किया।
- 1:04:15ठीक है, मृत्यु तो आएगी। लेकिन मृत्यु उसे आएगी।
- 1:04:20जो तुमने नकली नकली बनाया। और नकली अगर मर?
- 1:04:24भी जाए तो हर जगह है। और तुम निकले हो असली।
- 1:04:28असली पाने के लिए तो फिर थोड़ा सा।
- 1:04:31इधर भी झांक लूँ, मैं इधर असली। असली है कि सायानंद को तुम पाने
- 1:04:37निकले हो। दो लाइनों के ऊपर गाड़ी।
- 1:04:42चले। एक गाड़ी तो तुम।
- 1:04:44देख ली, एक लाइन तो तुमने देख ली। तुम डरे तुम कंपेयर।
- 1:04:50मृत्यु दिखी। ये ठीक है, लेकिन राम किशन
- 1:04:55परमहंस। तो पास बैठे हो रामकृष्णा परमहंस
- 1:05:01का काम क्या था? उसी वक्त तो काम था, रामकृष्णा।
- 1:05:06और उसी वक्त ही। रामकृष्णा चुभ गए।
- 1:05:10यहाँ मुझे गड़बड़। नजर आई श्रद्धा।
- 1:05:14से। और मैं यहाँ आके।
- 1:05:15अतिप्रभ हो जाता हूँ कि रामकृष्णा परमहंस ने हाथ क्यों उठाया?
- 1:05:20उसे याद क्यों। नहीं कराया कि तू मृत्यु की तरफ
- 1:05:24क्यों देखता है? तू दूसरी तरफ अमृत को भी तो देख।
- 1:05:30पहले लल जो चल। रही है।
- 1:05:31रेखा उसको भी तो देख। तू अखंड आनंद है।
- 1:05:37तू आनंद की? मूर्ति होने चला है ये खुशबू भी
- 1:05:40तो देख। तू कितना दुखी।
- 1:05:44था जब तू पूछ रहा। था यहाँ आके सब।
- 1:05:47भटकन मिट गई तुम्हारी। और अब तुम्हें एक।
- 1:05:51चीज़ नजर क्यों आती है? तुम्हें दूसरी क्यों नहीं नजर
- 1:05:53आती, जो पैरेलल है? मृत्यु तो तांडव नृत्य करते हुए
- 1:05:58प्रतीत होती है। तुम्हें तो धरेन्द्र ज़रा दूसरी
- 1:06:04लाइन पे भी देख ले। आनंद भी तो कितना घनी बहुत हुआ
- 1:06:07इतना आनंद के भी संसार में तुने चखा।
- 1:06:12लेकिन नय जाने। को मुझे सदा से ही यहाँ आके
- 1:06:16गड़बड़ महसूस हुई तो रामकृष्णा परमहंस ने जब के रामकृष्णा
- 1:06:22परमहंस। को हाथ नहीं उठाना चाहिए था।
- 1:06:26रामकृष्णा परमहंस का ही तो काम था वहाँ।
- 1:06:31वो उसे कहते। दूसरी तरफ देख आनंद भी तो गहरा हो
- 1:06:35रहा है। नीचे तो ये कुआं।
- 1:06:39खाई दिख रहा है मौत का, लेकिन तू इधर भी तो देख।
- 1:06:43इधर भी तो तू दूर तलक जाता है। अमृत भी तो देख।
- 1:06:48तो मृत्यु को ही देखा है। और विवेकानंद?
- 1:06:54लिखते हैं सारी उम्र। मैं उस लम्हे को।
- 1:06:58तरसता रहता हूँ। मैं आज तक ये।
- 1:07:03निर्णय नहीं कर सका की गलती किसकी?
- 1:07:06देखो कंपने वाला तो कपड़े, मुझे विवेकानंद की तो गलती ही समझ सकती
- 1:07:11है। मैं तो कंपेयर।
- 1:07:13क्योंकि मृत्यु हो देखा। लेकिन रामकृष्णा?
- 1:07:18परमहंस का तो काम था वहाँ। समझाने का कि तुम मौत को ही क्यों
- 1:07:24देखता है तुम अमृत को भी तो देख। इस मृत्यु के।
- 1:07:30कारण ही तुम्हें अमृत मिल रहा है। अगर मरेगा।
- 1:07:36नहीं नकली नकली मरेगा नहीं तो असली असली पैदा कैसे होती?
- 1:07:42ये तेरा ब्रह्म ठेका। नहीं तो सत्य उजागर कैसी हो गई?
- 1:07:47इल्ल्यूज़न कटेगा नहीं। तो फिर सत्य प्रकट।
- 1:07:51कैसे हो गया? मुझे आज तक नहीं समझा।
- 1:07:55है और राम किसी नया नहीं तो उनसे पूछ और संतो से पूछा?
- 1:08:01लाजवाब हो गया। मेरे प्रश्न का जवाब उनके पास था।
- 1:08:06बस यही बोले। ये तो रामकृष्णा ही जानते हैं।
- 1:08:10कि उन्होंने दूसरी। तरफ अंग्रेज़ क्यों नहीं किया?
- 1:08:13के पुत्र उस तरफ भी तो देख ले। यहाँ तक तो।
- 1:08:18कोई व्यक्ति अचांचक खुद से भी तो पहुँच सकता है।
- 1:08:25वहाँ गुरु की। जरूरत पड़ती है जब तुम।
- 1:08:27खपोगे। मृत्यु का वह तुम्हें सताएगा रोम
- 1:08:31रोम तुम्हारे डर। से।
- 1:08:33व्याकुल होगा। और तुम्हारे रोम।
- 1:08:36रोम में छा जाएगी मौत। जरूरत तो उस।
- 1:08:41वक्त होती है गुरु की और गुरु तो पास बैठा है।
- 1:08:46गुरु के कारण ही वो इस पॉइंट पे पहुंचा।
- 1:08:50रामकृष्णा ने क्या? किया।
- 1:08:54इस गड़बड़ का। मुझे जवाब आज क्यों?
- 1:08:58क्यों उठाया उसने? हाथ से ये ठीक ये ये शब्द।
- 1:09:03ठीक है, मैं समझ गई। मेरे ही बोले।
- 1:09:08हुए ये शब्द हैं कि संत डिक्टेटर नहीं होता ये तो ठीक है।
- 1:09:12लेकिन यहाँ डिक्टेटरशिप कहाँ है? अगर किसी को।
- 1:09:16आनंद के कुएं में धकेल ना हो तो डिक्टेटरशिप भारी के आनंद भारी
- 1:09:24अरे पहुँच ही गया है ये व्यक्ति तो।
- 1:09:27यहाँ तो थोड़ी सी। तानाशाही भी दिखा देते तो कोई
- 1:09:30बुरी बात। इसलिए मुझे आज।
- 1:09:34तक ये बात समझ नहीं आई के रामकृष्णा पर मंच ने हाथ को उठा
- 1:09:41लिया। खैर जब तक तुम लाचार हो के
- 1:09:45परमात्मा को नहीं काटते, पाठ कितना ही 101 कर रही हो पुतली।
- 1:09:51तुम 1100 कुछ कुछ नहीं होते शब्द पुकार नहीं है इन शब्दों में एक
- 1:10:03बड़ा। ऊंचा गहरा चला गया है।
- 1:10:06फसल बड़ी ऊंची हो। गई है, लेकिन फल नहीं लगा।
- 1:10:12और किसान की कहानी में। बहुत बार सुनाया था।
- 1:10:16बलिया नहीं लगी हैं। इसमें दाने नहीं हैं गेहूं के।
- 1:10:20दाने नहीं हैं इसमें। चावल के धान के।
- 1:10:24झीरे के फल नहीं हैं इसमें। तो ये जिसने भी तुम्हें।
- 1:10:31सिखाया। लोभी व।
- 1:10:34लालची और चंचल हो चोर इनके पीछे मत रख।
- 1:10:43वह गुरु का जाप भी। करती करती रही।
- 1:10:47और मुझसे पूछती हो की? परमात्मा होता है परमात्मा सुनता
- 1:10:51है तुम्हारी सुनली तुम मुझसे क्या पूछती हो हाँ तो कंगन?
- 1:10:58को आर सी क्या जब तुम कर ही रही हो 101 पार्ट?
- 1:11:02बैंकरों का जाप तुम। करती हो, दिन भर रात करती हो?
- 1:11:07या कोई भी। कोई भी करता है राम राम करता है
- 1:11:10राधे राधे करता है वह गुरु करता है सभी से कहता हूँ।
- 1:11:16जब तुम खुद ही। कर रही हो।
- 1:11:18तुमने ही बताया कि 101 पार्ट में उसके।
- 1:11:23पांच बाणियां पढ़ती हैं। जब भी करती हूँ मूलमंत्र करती
- 1:11:30हूँ। क्या परमात्मा सुनता है तुम्हारी
- 1:11:33सुनी गई मुझसे क्या पूछती मुझसे तो यह पूछो कि मेरी क्यों नहीं
- 1:11:40सुनेंगी? यह मत पूछो कि।
- 1:11:43परमात्मा सुनता है। परमात्मा तो हर जगह मौजूद है।
- 1:11:49बिन पाग चले। सुने बिन कान।
- 1:11:54उसके कान नहीं। है बारी दिखाने के लिए, लेकिन
- 1:11:57सुनता है। मुझसे मत पूछो।
- 1:12:00पुत्री कि वह सुनता है। मैं तुमसे पूछता हूँ तुम्हारी
- 1:12:04सुनी गई जो विधियों तुम्हें बताई गई कि इस तरह तुम्हारी बात को वो
- 1:12:09सुन लेगा क्या? उन विधियों के करने से उसने
- 1:12:13तुम्हारी बात सुनी? फिर कहीं ऐसा तो।
- 1:12:16नहीं कि तुम्हारी विधियों में गड़बड़ है।
- 1:12:20बिल्कुल तुम्हारी विधियों में। और तुम, बाबा नानक।
- 1:12:25की शिक्षाओं पे चलने। वालो तुम कहीं भटक गए हो या थोड़ा
- 1:12:30ठहरों और अपने मार्ग को फिर से तलाशो।
- 1:12:40बाबा कहते हैं। नानक दुखिया सब संसार है?
- 1:12:45100। सुखिया जो नाम आधार तुम अपनी
- 1:12:49इच्छा को। पूरी करना चाहते हो तुम सुखी
- 1:12:51होना। चाहिए संत की फरियाद?
- 1:12:55क्यों पूरी हो जाती है? क्योंकि वह निष्काम।
- 1:12:59होता है। लोभ ही नहीं होता।
- 1:13:02निर्लोभ ही होता है। यही जवाब मैंने उसके।
- 1:13:07बाबा आप मुझे इसे क्यों नहीं बनाते?
- 1:13:11आपकी तो संख्या बढ़ती है मैंने? कहा मुझे संख्या नहीं चाहिए, मैं
- 1:13:15लोभी नहीं। लोभी व्यक्ति।
- 1:13:19संख्या को बढ़ाएगा। मुझे संख्या की कोई वक्त मुझे तो
- 1:13:23प्यासे चाहिए प्यासे। मेरे पास पानी है शीतल, अगर
- 1:13:34तुम्हें प्यास लगी है तो आ जाओगे। अगर तुम्हें प्यास।
- 1:13:39नहीं लगी है तो मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, तुम बातें ही भगा
- 1:13:43दोगे। शेख चिली की तरह फिर तो मैं दूर
- 1:13:48से ही में। ब्लॉक कर देता हूँ।
- 1:13:50मत आओ, मत वक्त खराब। करो अपना और मेरा भी तो वक्त खराब
- 1:13:57होता है। किसी और की।
- 1:14:01बात को सुनता। किसी और को समझाने की चेष्टा करते
- 1:14:05बा मुश्किल घंटा दो घंटा। मैं अपने से बाहर।
- 1:14:09आ पाता हूँ अन्यथा वो कहा नहीं देता है मैं उसके ग्रस्त में रहता
- 1:14:15हूँ 2400 घंटे। कभी कभार मैं।
- 1:14:20तुमसे वार्तालाप करती हूँ। मैं हर वक्त बाहर।
- 1:14:25रहता हूँ लेकिन कभी कभार तुम्हारे पास आती हूँ।
- 1:14:30तुम्हारी बात तो मैंने। की थी, लेकिन परमात्मा बोले कि
- 1:14:35उससे पहले कर ही लेने से तो करती है।
- 1:14:41पर मैं तुम्हें समझा दूँ, पुत्र जब तक ये पुकार द्रौपदी की पुकार
- 1:14:47की तरह अंत से नहीं आएगी, लाचारी से नहीं आएगी।
- 1:14:52अभी तुम लाचारी। से पुकारना नहीं तुम अरदास किए हो
- 1:14:56शार्दिक तुम प्रार्थना किए हो शार्दिक।
- 1:15:01तुम्हारी। आत्मा ने गुहार नहीं की, चलाई
- 1:15:05नहीं तुम्हारी आत्मा आत्मा क्राई नहीं कर रही।
- 1:15:10आत्मा चीख नहीं रही, उसमें उसके कर्ण हृदय से पुकार नहीं उठ रही
- 1:15:16बस यही। फिर तुम पाठ तो कितने?
- 1:15:20किये जाओ कोई फर्क नहीं ये तो धंधे हैं, फिर कुछ साथ में सभी
- 1:15:28धनतेर कोई राम चरित्र मानस। का कर लो, कोई भागवत सत्ता का कर
- 1:15:37लो। कोई भागवत पुराण।
- 1:15:39का कर लो कोई किसी किताब का कर लो, कोई किसी ग्रंथ का कर लो,
- 1:15:43किसी शास्त्र का कर लो, कोई वैध पढ़ लो कोई उपनिषद पढ़ लो पढ़ने
- 1:15:48से कुछ। लिखा लिखी की।
- 1:15:51है। नहीं देखा सिखी।
- 1:15:53ये अनुभव की बात है। और वह जो परम।
- 1:15:57है, वह अनुभव में ही आता है। चर्म चक्षुओं से।
- 1:16:04देखा नहीं जाता। अनुभव के ज्ञान चक्षुओं से दिव्य
- 1:16:08चक्षुओं से दिखता है। है तो आनंद है तो।
- 1:16:14बिल्कुल डंके की चोट पर कहते हैं संत कि वो है, मैं भी गयी हूँ, वो
- 1:16:20है देखा है। मैंने देखा है हाँ, बिल्कुल
- 1:16:28तुम्हें दिखा सकता हूँ। लेकिन अगर गटर?
- 1:16:35लेके आ जाओगे ना मेरे पास गटर और तुम्हें बखूबी पता है कि हम घट
- 1:16:40रहे हैं। जिसका मन विक्षिप्त?
- 1:16:43हुआ। हर वक्त मन चलता है, ठहर नहीं
- 1:16:45पाता। तुम क्या समझते हो?
- 1:16:49उसके भीतर में देसी घी फट दूंगा। नहीं तो गटर साथ?
- 1:16:54होगा और देसी की बरपात हो जाएगी। अमृत है तो अमृत भी खत्म हो
- 1:17:00जाएगी। बिलकुल दिखा सकता।
- 1:17:03हूँ। पर मैंने वो सब मर हले तय किये।
- 1:17:13जिन गलियों कोंचों। में तुम गुजरना चाहते हो?
- 1:17:17मैं उन सब को क्रॉस करके आ गया। इसीलिए बड़ी बारीकी।
- 1:17:22से चीज़ को परखता हूँ देखता हूँ समझता हूँ।
- 1:17:25जानता हूँ पहचानना। तो यहाँ आके गलती किसकी थी पता
- 1:17:31नहीं विवेकानंद की गलती तो नहीं, वह तो डरेगा बिल्कुल।
- 1:17:37शिष्य तो डरता। है।
- 1:17:38मौत से मुझे कहीं गलती नजर आती है।
- 1:17:43तो गड़बड़ नजर। आती है मुझे, रामकृष्णा।
- 1:17:48गुरु को पुकारा जाता। है उस पॉइंट पे जब व्यक्ति परम
- 1:17:53आपदा की स्थिति में होता है। उसने मार्गदर्शन करना था, वो पास
- 1:18:00बैठा था। उसने कहना था, पुत्र।
- 1:18:04दूसरी तरफ देखो। आनंद।
- 1:18:06के झरने भी तो बह रहे हैं। तुम मृत्यु की तरफ देखो ही मत।
- 1:18:11तुम देखो उस। अखंड आनंद की खुशबू की तरह जहाँ
- 1:18:16लहरा रही हैं फिजाएं खुशबू वाली आनंद ही आनंद है कुमारी ही
- 1:18:22कुमारी। लेकिन उसने क्यों नहीं?
- 1:18:26कहा, मुझे नहीं पता। मैं तो खुद ही पूछता हूँ लोगों
- 1:18:29से। तुमने कहा, पुत्री।
- 1:18:33परमात्मा से कहो, हाँ कहो। बस उसने यही।
- 1:18:37कहा कि इसे कर लेने तो वो करती है।
- 1:18:42जब बाबा खुद। ये कहते हैं ज़ोर न जुगती छोटे
- 1:18:45संसार। तुम्हारी किसी।
- 1:18:49युवती में कोई ज़ोर है? जिससे तुम तुम्हारी।
- 1:18:53जंजीरों से मुक्त हो जाओ। और फिर भी तुम।
- 1:18:59युगती लड़ाते हो 101 वाट करते हो। मूलमंत्र करते हो?
- 1:19:04ये जपने के लिए है। ये उसके लक्षण हैं मूलमंत्र उसके
- 1:19:11लक्षण हैं एक ओंकार, वह एक है। सत्य नाम उसका नाम सत्य है एक
- 1:19:21ओंकार सत्य कर्तपुरक वह ही करता है।
- 1:19:25तुम कुछ नहीं करती। ये उसकी सब।
- 1:19:31लक्षणता है। बुध मंत्र के नौ।
- 1:19:39शब्द ध्यान से सुन ये नौ शब्द जपने के लिए नहीं।
- 1:19:47यह नो शब्द उनके लक्षण हैं उनके गुण हैं उनकी होन की पहचान है तुम
- 1:19:59जब वहाँ पहुँच। जाओगे, तुम कैसे हो जाओगे?
- 1:20:03अब देखो इसको गहरे। से समझने की।
- 1:20:06एक कोंकार वह एक। सत्य नाम उसका।
- 1:20:11नाम सत्य है कभी मरतन करता कुरख वह ही करता है तुम नहीं करते
- 1:20:21निरपो वहाँ जाकर तुम निर्भय हो जाओगे।
- 1:20:26यह परमात्मा के लक्षण बताए हैं। निरपो निर्भय वहाँ कोई भय नहीं
- 1:20:33होता, निर्भय। वहाँ किसी से बैर नहीं रहता।
- 1:20:38क्योंकि सब कुछ तुम हो बैर किस से करो।
- 1:20:41बैर किस से खाओ अर्जुन? वह योनी में।
- 1:20:46आता जाता नहीं भटकता नहीं यह भी कह सकते हो।
- 1:20:50दूसरा अर्थ यह भी है वह सभी योनियों में है।
- 1:20:55ईशाबाशय में दम? सर्वमजात, किनची जगत या जगत।
- 1:21:00ही इस प्रेसेंट एव्रीवन। इन थिस यूनिवर्स।
- 1:21:04इसके हो सकते हैं। वह जन्म मरण से मुक्त है।
- 1:21:07वह किसी जोनियों से किसी विशेष युनियों से मुक्त किसी विशेष से
- 1:21:13बनता हुआ नहीं। वह सभी योनियों।
- 1:21:17में बराबर है या तो ये कह दो। यह कह दो वो किसी।
- 1:21:21भी योनी से संबंध नहीं। जी कह दो मछली में भी है, कछुए
- 1:21:26में भी है। वरहा में भी।
- 1:21:29है मनुष्य में भी है। बोने व्यक्ति में भी है लंबे
- 1:21:33व्यक्ति में भी है राजा में भी है फकीर में भी है रंक में।
- 1:21:39एक कुंकार सत। नाम कर्त।
- 1:21:43निर्भय, निर्भय। अकाल मूरत वह काल का भक्ष नहीं
- 1:21:57बनता। काल से भक्ष।
- 1:21:59नहीं। कर सकता।
- 1:22:03सहपन अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है।
- 1:22:09जैसे तुम बल्लभ की। रौशनी में बैठे हो?
- 1:22:13तुम, बल्लभ की रोशन। से प्रकाशित हो।
- 1:22:15तुम स्वयं प्रकाशित नहीं। हो लेकिन वह।
- 1:22:19खुद की रोशन से प्रकाशित है सैपन खुद से ही प्रकाश मानधव गुर
- 1:22:26प्रसाद यह बड़ा प्यारा शौत है अब ये नौ हो गए एक ओंकार सत्यनाम
- 1:22:34कर्तापुरुख निरपोक निर्वय। अकाल मुहूर्त अजोनी सैपन
- 1:22:44गुरप्रसाद न हो गए गुरप्रसाद हमारे कुछ करने से नहीं मिलेंगे,
- 1:22:53शेष श्रेण पर लखा होए तो एक न चले।
- 1:22:58तुम लाख किए जाओ, असल में तुम्हारी दुविधा क्या है?
- 1:23:05तुम्हारी दुविधा एक ही है। सन्तों ने तो बहुत कहा, लेकिन
- 1:23:12तुम्हें समझ नहीं आई। तो हमारी दुविधा ये।
- 1:23:17है कि तुम दो नावों पे खड़े हो एक मत तुम्हारा ये कहता है तुमने
- 1:23:24देखा तो है नहीं, जिसने देख लिया उस दिन तो दंड मुख जाएगा उस दिन
- 1:23:28तो। अद्वयत आ जाएगा अद्वंद में आ
- 1:23:30जाओगे। द्वंदा ती तो हो जाओगे?
- 1:23:34अभी तक देखा नहीं तब तक तुम। दो नौ में नहीं, 1009 में सवा।
- 1:23:41कभी कुछ कह देते हो? कभी कुछ कह देते हो, तुम्हें पता
- 1:23:44है ही नहीं, पक्का पक्का तो क्या है तो कुछ भी कह।
- 1:23:48सकते हो गुरप्रसाद? तुम्हारी कैसे नहीं।
- 1:23:58मिलती बस यही आकर सारा आखिरी शब्द क्यों है?
- 1:24:05जी? आखिरी नहीं है।
- 1:24:07ये सबका निजोड़ हैरा से है। ये तुम्हारे कुछ करने से नहीं
- 1:24:12मिलता वो। और कैसे कैसे सुनेगा पुकार अब
- 1:24:18तुम्हारे प्रश्न का पुत्र है, पुत्री।
- 1:24:25तुम व्यथित हो। के जब भीतर से पुकार लगाओ।
- 1:24:34जब आग तुम्हें। इतना जलादे की विवाह थी जब अभाव
- 1:24:41तुम्हें इतना तड़पा देगा। कि तुम्हारे पूरे।
- 1:24:46प्राण चीतकार कर उठेंगे। तो उसका प्रसाद बरसता है, उसे
- 1:24:59गुरु प्रसाद कहते हैं। सिख धर्म में गुरु।
- 1:25:05परमात्मा को कहते हैं। इसलिए दशम पाशा गुरु गोविन्द सिंह
- 1:25:13ने कहा। के बाहर के।
- 1:25:17गुरु को मत करना गुरु तो तुम्हारे भीतर में होता है, काहे रे बन को
- 1:25:30जन जा? उसकी प्रतिलिपी।
- 1:25:36बाहर है। श्री गुरु ग्रंथ साह लिखा हुआ है,
- 1:25:39उसमें इससे मार्गदर्शन ले लो और अपने भीतर कोज लो किसी।
- 1:25:45गुरु की कोई? जरूरत नहीं सब पखंडी।
- 1:25:50गुरु कोविंद से मैं ये। कहते हूँ और ठीक हूँ।
- 1:25:56फिर तुम से। ग्रुप से सर मार्क ले रोज़ मेरे
- 1:26:03पास मैसेज आते है, आप आपके पास आके बैठना चाहते है आधा घंटा
- 1:26:08मैंने? कहा कुछ नहीं आओ।
- 1:26:11एक बार देख जाओ कि वह व्यक्ति जो पहुँच गया उस मुकाम पर होता कैसा
- 1:26:17है बस? वह इमेज तुम्हारे।
- 1:26:22प्राणों में उतर जाए। ललक जग जाए।
- 1:26:27तड़प उठ जाए बिरहा की आग जल जाए। तो वह कि यार तुम्हें पहुंचा देती
- 1:26:32है, प्यास पहुंचाती है तुम्हें। लेकिन जब तुम्हें प्यास।
- 1:26:38नहीं जगी तो नाम लेते जाओ, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
- 1:26:45ना उस दिन? पानी बनेगा।
- 1:26:47जीस दिन तुम्हें प्यास लगेंगी, प्यास तुम्हें है नहीं ना तुम
- 1:26:50झबते जाओ। बैंक बैलेंस कर।
- 1:26:53दोगे तुम? हमने एक अरब झब कर दिया कर दिया
- 1:26:56लेकिन प्यास कहाँ लगी? जाप का उपयोग।
- 1:27:02पानी की तरह होता है, पहले प्यास पैदा करनी पड़ती है।
- 1:27:09फिर जाप नाम पानी का काम करता है। तुम्हारी प्यास को बचा।
- 1:27:16देती है। और ये तुम्हारे फौके।
- 1:27:20संत प्यास नहीं पैदा करते। नाम दे देते हैं।
- 1:27:27तुम ज़रा गौर से देखना। भीतर क्या तुम प्यासी भी हो इतनी
- 1:27:33प्यास लगी जितनी मीरा को लगी। मीरा तड़पी इतनी।
- 1:27:38प्यास लगी, इतनी नानक को लगी तुम बात तो नानक की कर देते।
- 1:27:42नानक को रात रात। भर जागते हैं।
- 1:27:47नानक तो। पपीहे के साथ होठ लगाते।
- 1:27:52पपीहा गाता। पीहू, पीहू, पीहू, नानक।
- 1:27:56भी गाता। सारी रात ननकगत सारी रात वो भी
- 1:28:06हगाते और सुबह हो। जाती, भोर का तारा निकल जाता।
- 1:28:13मैं कहती पुत्र सो। जाओ।
- 1:28:17हम तो सो के जाग भी गए। तुम।
- 1:28:20अभी तक अभी तक गार कहते माँ ऍम मैं कैसे सो जाऊं जब पपीहे ने।
- 1:28:31अपनी प्रेसी को पुकारना भी छोड़ा ना?
- 1:28:35तो मैं कैसे छोड़ दूं? जब पी है की प्यास नहीं बुझी तो
- 1:28:42प्यास मेरी कहाँ बुझी मैं क्यों पुकारना छोडूं?
- 1:28:46मेरी होड़ लगी है इसे मैं नहीं छोडूंगा।
- 1:28:57जब तक ये प्रपीहा। नहीं छोड़ भोर भाई प्रपीहा हट
- 1:29:03गया, नानक ने भी बंद कर दी। तो काफ सोय।
- 1:29:13तुम्हारी आफत ये। है कि तुम्हें प्यास नहीं जगी।
- 1:29:18पानी तुम्हारे सामने। उपलब्ध है पानी तो सरोवर भरे पड़े
- 1:29:24पानी तो समुद्र भरे पड़े। पानी उपलब्ध है या।
- 1:29:28कोई रेगिस्तान थोड़ी। जिसकी तलाश में।
- 1:29:31तुम हो वो तो झरे झरे में है। बात तो प्यास की।
- 1:29:36है प्यास ही तो तुम्हें लगी नहीं, अभी तो प्यास तुम्हें किसी और
- 1:29:41चीज़ की अभी तो प्यास ही है कि बेटी को कहाँ मिल जाए, सेट हो
- 1:29:46जाए। फिर तुम समझे हो।
- 1:29:49कि शायद उसके पास प्यास बूझ जाएगी।
- 1:29:51नहीं बूझी तुम गलती? हो संसार की प्यास।
- 1:29:56कभी बूझती है। फिर कभी कुछ।
- 1:29:59कभी कुछ, कभी कुछ, कभी कुछ। होता ही चला।
- 1:30:03जाएगा। तुम्हारी प्यास कभी नहीं बूझेगी।
- 1:30:10तुम्हारी प्यास। संसारिक है।
- 1:30:12सांसारिक प्यास कभी नहीं बुझती। तुम्हारी प्यास द्रव्यों को पानी
- 1:30:19की है। बाहर का सब सेटल।
- 1:30:23कर लें, हो भी जाएगा तो क्या हो? भीतर का सेटल करो, अपने भीतर के
- 1:30:32उस। अंश में समाहित हो जाओ जिसे कृष्ण
- 1:30:36कहते हैं स्त्री प्रज्ञा हो जा अर्जुन।
- 1:30:42जिसे बाबा कहते हैं उसमें विराजमान होजा।
- 1:30:48गुरु के द्वार से। चल गुरुद्वारा से चल।
- 1:30:53और उसमें उतर। जा जो गुरु का प्रसाद है गुरु का
- 1:30:57प्रसाद कह। यह समझाने में नहीं आएगा, यह तो
- 1:31:02चखना पड़ेगा प्रसाद कभी समझ। में आता है।
- 1:31:09तुम्हें प्रसाद रोज़। मिलता है गुरुद्वारा में तुम उसको
- 1:31:13देख के पहचान सकते हो क्या है? जब खाओगे।
- 1:31:19तभी जीवा कहेगी बड़ा स्वाद है। प्रसाद को खाना।
- 1:31:24पड़ता है, निकलना पड़ता है, उसका स्वाद लेना होता है, परमात्मा
- 1:31:30देखने के लिए नहीं है, वह गुरु प्रसाद है, उसको चखना पड़ेगा।
- 1:31:36वो तुम्हारी भूख को। तृप्त करेगा।
- 1:31:38तुम्हारी प्यास को बजाएगा तुमने पुचा पुत्री परमात्मा से पूछा,
- 1:31:45बिल्कुल पूछा। परमात्मा ने यही कहा।
- 1:31:49उसे करने का जो कर दिया है। जब तुम कर कर।
- 1:31:54के हार जाओ। थक जाओ द्रोपदी की तरह तो पुकार
- 1:31:59उठेगी भीतर से और उस घणित में पता भी नहीं चलेगा जब पुकार उठती है
- 1:32:04ना सच्ची तो व्यक्ति को पता नहीं चलता और वेह्त तक क्षण सुन ली
- 1:32:10जाती है। तुम ढूंढ़ते हो?
- 1:32:13कराए वाड़े के लोग बिकाऊ। माल ये पंडित ये।
- 1:32:19पुजारी या ग्रंथी ये पाठी के थोड़ा बहुत दान दक्षणा दे दें और
- 1:32:25फरियाद करवातें हैं। फरियाद करवाने के लिए बड़ा शुद्ध
- 1:32:29हृदय चाहिए। अति दीन दयाला, कारण विन रघुनाथ
- 1:32:38कृपाण बिना कारण के कृपाण। हो जाता है।
- 1:32:44वहाँ पहुंचना। पड़ता है।
- 1:32:46जो वहाँ पहुँच गया वह हो गया सच्चा अरदास करने वाला।
- 1:32:51अरदास उसकी सुनी जाएगी। तुम्हारे ग्रंथों की पंडितों की
- 1:32:56मूंड बढ़ाने से नहीं सुनी जाती या केश रखने से नहीं सुनी जाती?
- 1:33:01हृदय की पवित्रता, सरलता। निर्मल मन जन।
- 1:33:06सोई मोहि भावा मोहि कपाट चर क्षेत्रर।
- 1:33:11मन में 1000 तरह के। कपट हैं, चल रहे हैं छित्र रहे
- 1:33:14बेईमानी करे हो व्यापार व्यापार ही अपने आप में बेईमानी।
- 1:33:231000 बार तुम कस। में उठाते हो?
- 1:33:28तुम्हें झूठे होने। की आदत होगी।
- 1:33:31गुरू प्रसाद जीस। दिन प्रसाद के रूप में तुम्हें
- 1:33:34मिलता है। वो वेला धने हो जाती है तो।
- 1:33:40अगर तुम करके। कुछ पाना चाहती हो तो करके ही।
- 1:33:45जब तुम कुछ करने। से थक जाओगी?
- 1:33:48तुम दो पेड़ियों के पांव मत रखो। तुम खुद भी बात कर।
- 1:33:52रही हो मुझसे भी कह रही हो हम पर याद कर।
- 1:33:57और सही दो। नहीं, तुम्हारी तो 1000 नाव के।
- 1:34:01ऊपर फँस तुम ना जाने कहाँ। कहाँ से उम्मीदवार हो?
- 1:34:09और बस नहीं। घी डालने।
- 1:34:14से बुझती नहीं भड़कती। सर्दी।
- 1:34:24झांकों से धड़कते हैं। बदन।
- 1:34:32में। छोले सर्द जौकों से धधकते हैं बदन
- 1:34:45में शोले। जान ले लेगी ये बरसात।
- 1:35:00जान? ले लेगी ये बरसात?
- 1:35:10करी। बाजा दूर रहकर न करो बात कर बाजा।
- 1:35:29दूर रहकर न करो बात करी बाजू सर्द झोंकों से धधकते हैं बदन में सो
- 1:35:37ले। जान ले लेगी।
- 1:35:39यह बरसात करी बाजू। जब गुरू प्रसाद।
- 1:35:44की बरसात बरसती है। तो तुम निहार हो जाते हो वहाँ से
- 1:35:53जो गुंजार उठती है एकोंका सप्तनाम कर्तक निरपौह निर्वय अकाल मूरत
- 1:36:04अजोनी से। वह है मूल मंत्र तुम्हारे जपने
- 1:36:11करने से। कुछ नहीं।
- 1:36:24धन्यवाद, सर।