Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 Feb 26 - परमात्मा की लीला का अंतिम प्रवचन: परमात्मा की लीला और खेल!! मृत्यु और संसार का भ्रम!!
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- 0:14सब कुछ परमात्मा है और सब कुछ परमात्मा का है।
- 0:27कुछ भी तुम्हारा नहीं। और तुम भी नहीं हो आइए इससे आगे
- 0:42चलते हैं। जब संत ऐसा सत्य जान लेता है, न
- 0:57किसी के कहने से, न शास्त्र के पड़ने से, न गुरु के अपने आँखों
- 1:09से, अपने अनुभव से। यह सत्य जान लेता है तो बिल्कुल
- 1:18उसी वक्त यह सत्य भी जान लेता है कि जब वह है सब कुछ तो मैं नहीं
- 1:26हूँ जब उसका ही है सब कुछ। तो मेरा कुछ नहीं है।
- 1:35फिर जब मैं ही नहीं हूँ तो मैं करता भी नहीं हूँ और जब मैं ही
- 1:42नहीं हूँ, तो मैं भौंकता भी नहीं हूँ, इसलिए थोड़ा भक्त है।
- 1:50बा मुश्किल यह जामा मिला है और बा मुश्किल।
- 1:54ऐसा माहौल जमा है, ऐसी महफिल जमेगी कहाँ?
- 2:00सब साज साज तैयार हैं। सुराही भरी पड़ी जाम रखे हैं।
- 2:09खारा सोडा भी है, नमकीन भी है, खानी पड़ी है महफिल जमाली थोड़ी
- 2:24सी गटक रहे मदहोसी के उसालम में खो जाएं जिसकी सजा से ही।
- 2:32व्यक्ति की अंतष्कोपकार जरूरत रही है, माहौल बना हुआ है।
- 2:48आदमी का शरीर मानव का शरीर परमात्मा ने हमें दे दिया, हमसे
- 2:54कुछ नहीं मांगा। वह अपना खेल खेल रहा है।
- 2:59है। यही सब देखकर कि वह अपना खेल खेल
- 3:05रहा है, हम क्यों भगवान डालें? इसलिए संत कहते हैं वह जो करता
- 3:12है, अच्छा करता है क्योंकि अपने लिए करता है न न कभिक सह कर विचार
- 3:19वह खुश होता है मरना, जीना रेत हत्या कतलो गारत चोरी तुम्हारे
- 3:29लिए है भाई उसके लिए नहीं, तुम उसको गाली निकालो।
- 3:35तुम उसको पूजो लेकिन ये सब तुम्हारे लिए यह है बुद्धि की
- 3:42वाइफरकेशन मल्टीफर्केशन उसके लिए जो हो रहा है वो ठीक हो रहा है और
- 3:51इसलिए संत का जब सुर। परमात्मा के सुर में बढ़ जाता है।
- 3:57किसे ही कहते हैं सुर से सुर साध जब सुर से सब सता नहीं तो सब सोना
- 4:09होता है अभी तुम लाचार हो बेजार हो।
- 4:13दुखी हो। सुर न सदे कैसे गाम सुर न सजे
- 4:26कैसे गाम सुर के बिना? जीवन सोना।
- 4:36सुर न सजे, कैसे गाँव सुर न सजे। तुम जी नहीं सकते क्योंकि सुर
- 4:47सजता नहीं, सुर सज। वह जो चाहता है अपनी जिंदगी को
- 4:56खेलना उसके लिए खेल है, वह जैसे खेल खेलना चाहता है, उसकी रजा में
- 5:04राजी हो जाओ, उससे लड़ो मत। उसका खेल है।
- 5:10और मैंने कल भी समझाया था यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं और तुम फिर
- 5:16भी नहीं समझे। तुम कहते हो है ये देखो मैं
- 5:19तुम्हें बुरा बहुत देखो धरती मेरे नाम बोलती यह प्रमाण तो हैं यह
- 5:25कागजी प्रमाण मोदी जी जैसे? वो देखो सामने ऐम जो बना हुआ है
- 5:32खाली जमीन, बढ़िया भाई तुम कहते हो बैंक बैलेंस है।
- 5:41जी देखो मैं कहता हूँ बिलकुल है लेकिन कागज़ी है।
- 5:50कागजी है के नहीं है आज है कल खो जाएगा कि नहीं वह तत्व ढूंढो
- 5:58जिसका कभी कुछ खोता नहीं इस शब्द को हम इसको सर को मैडम उस तत्व को
- 6:06खोजो जिसका कभी कुछ खोता नहीं। जीसको कभी हानि नहीं होती और
- 6:13जीसको कभी लाभ नहीं होता। उस तत्व को खोज लो, उस तत्व को
- 6:27खोज लो जीसको कभी कोई नुकसान नहीं होता और कभी कोई फायदा नहीं होता।
- 6:39ओम पूर्णमदः पूर्णमदं पूर्णमद पूर्णमद पूर्णमद पूर्णमद पूणमदश्य
- 6:52से पूर्णमदश्य पूर्ण को भी निकाल लो।
- 6:58तो पूर्ण ही शेष वचता है। उस सतत्व को खोजो वह कौन सत्य है
- 7:07देखिए शब्दों की अपनी सीमा है और शब्द शुद्र।
- 7:16शब्द पूर्ण नहीं है। शब्दों से इशारा समझ जाओ तो आप
- 7:22भाग्यशाली अगर शब्दों से इशारा न समझो तो तुम अभागे हो, तुम आज तक
- 7:29इस धरती पर बैठे हो तो इसका मतलब तुम शब्द को इशारों की तरह नहीं
- 7:34पकड़ पाए। इसलिए अभागे हूँ काश जैसे चक
- 7:39गणराज्य के लड़के का भाग्य कल जग गया, उससे पहले बहुतों का भाग्य
- 7:44जगा, बुद्ध का भाग्य जगा, महावीर का भाग्य जगा, कबीर का जग नानक का
- 7:51जग तुम्हारा भी जग है। और यह सबके भीतर है मंजिल यह किसी
- 8:00एक ब्राह्मण के भीतर नहीं होती, यह तो सड़ी हुई खोपड़ियों का
- 8:05फरमान है के ब्राह्मण ही पहुँच सकता है, नहीं नहीं।
- 8:12तो मैं मैं कहता हूँ, जो सताई हुई जातियां हैं, सब एक मंच के तले आ
- 8:19जाओ, पहले बाहर की व्यवस्था को ठीक करो ताकि तुम भीतर की
- 8:25व्यवस्था में चले जा सको ये कांवड़ उठाने के योग्य रह जाओ के
- 8:29पीछे। और को उठाने में कुछ नहीं रखा है।
- 8:34कभी शंकर को पानी की जरूरत नहीं है।
- 8:37शंकर तो शंकर के तो शीत में से गंगा निकलती है, उसको पानी की
- 8:41जरूरत क्या है? भला?
- 8:44हाँ तुम वहाँ से दो छोटी छोटी मटकियां भर के ले आते हो।
- 8:49और यहाँ शंकर की पिंडी पर चढ़ा देते हो।
- 8:52उसको गंगाजल की कमी है क्या? यही तो समझाया चित्रों में
- 8:57तुम्हें के शंकर के तू शीर से गंगा प्रकट होती है, उसको
- 9:02तुम्हारी मटकियों की जरूरत क्या है?
- 9:05क्यों जाते हो वहाँ से? लेके जाते?
- 9:08पागल हुए हो? क्या ये सब?
- 9:10ब्राह्मणों ने तुम्हें गलत रीतिरिवाज सिखाए हैं।
- 9:20किस लिए बहकाने के लिए ध्यान रखना जो बहकाएगा वह खुद भी दुखी हो
- 9:26जाएगा। आज देख लो ब्राह्मणों के हाथ में
- 9:28घंटा है, है न? ब्राह्मणों के हाथ में एक घंटा
- 9:35है, लेकिन दूसरी तरफ ब्राह्मण थोड़े से तिजर्बेकार भी थे तो
- 9:41ब्राह्मणों ने घंटा भी अपने हाथ में रख और ब्राह्मणों ने सत्ता
- 9:48में अपने हाथ में रखा। है तुम्हारी पल्ले तो सिर्फ गरीबी
- 9:54मुफलत से दुख दर्द, अभाव धीरद्रता, लताड़ हुक्मे की पालना
- 10:08करना। जो ठीक हो या गलत ये तुम्हारे
- 10:12भाग्य में आया नसीब में जिसके जो लिखा।
- 10:22था नसीब में। जिसके जो लिखा था वो तेरे में है
- 10:36में काम। आया?
- 10:39किसी के हिस्से में प्यास। किसी के हिस्से में जाम।
- 10:50आया? नसीब में जिसके जो लिखा तुम्हारे
- 11:01हिस्से में प्यास आई। और ब्राह्मण समझते हैं कि हमारे
- 11:05हिस्से में जाम आया गलत है वो उनके हिस्से में तुमसे ज्यादा दुख
- 11:11है क्योंकि कागजी हैं इनके सुख तुम अगर सुखी होते हो तो असली
- 11:18असली तो होते हो। सब उसके लिए लाये।
- 11:27वह जो जानता है क्योंकि सब उसने बनाया है, गॉड मेड मैन मेड उसका
- 11:39ही माल है इसलिए मालिक वो ही है और वह कभी मरता नहीं।
- 11:46इसलिए सत्य आपके सामने कि उसका कुछ घटता नहीं, उसका कुछ बढ़ता
- 11:52नहीं पूर्ण से पूर्ण मागाएं पूर्ण मेवा बशीर दे पूर्ण में से पूर्ण
- 11:59को भी निकाल लो तो पूर्ण ही की स्वच्छता है तुम्हारे हिस्से में
- 12:02कुछ नहीं। टल्ला बजा दिया तुमने हाथ में
- 12:12मिट्टी के तुम्हारे देवता हैं, पाथर की तुम्हारी मूर्ति है, दिल
- 12:23तुम्हारा शिष्य का है। कहाँ जाओगे तुम इनको इनके हाल पर
- 12:36छोड़ दो इनको मान्यताओं में ये उलझना चाहते हो तो उलझें।
- 12:44तुम संभलो तुम इनका बहिष्कार करो, मूर्तियों में कभी कुछ नहीं रखा
- 12:50है। पथरों के साथ टकराओगे तो पथरा हो
- 12:54जाओगे। पत्थर के देवता मिले।
- 13:04पत्थर के आश। साथ ही ना कोई मंजिल दिया है ना
- 13:28कोई महफिल चला मुझे ले के। है दिल अकेले।
- 13:40कहाँ साथी नकोई मन? इनको मारने दो टक्करें जिनको ये
- 13:57भगवान मानते हैं। वो पाथर हैं, सब एक्टिंग हैं, ये
- 14:04ये साइंटिफिक चीजें हैं, मैं करके दिखा देता हूँ जिनको ये प्राण
- 14:11प्रतिष्ठा कहते हैं, मैं आपको करके दिखा देता हूँ शीशा दम से
- 14:15चोर हो जायेगा। अज्ञानता दुख की जननी है, तुम
- 14:30ज्ञानी बनो, यहीं अंबेडकर बाबा साहब तुम्हें सिखाते गए उनकी
- 14:41बातों को श्रीमर्त्यम दुर्ग। ये आयेंगे ये भी बाबा साहब को
- 14:50पूजने का, लेकिन करेंगे बा घंटा असल ही नहीं हुआ तुम्हारे तो
- 14:56हर्दैसी आयेगी क्योंकि तुम्हारे तो जाति को बचा लिया इन्होंने ये
- 15:02भी आएँगे ये भी पूजेंगे लेकिन राज़ करने की मंशा से आएँगे
- 15:05तुम्हारे पास? तुम समझे हो कि परमात्मा हमारे
- 15:09हिसाब से चले, तुम गलती में हो, परमात्मा ने सारी सृजना की है,
- 15:14तुम्हारे लिए नहीं, अगर तुम्हारे लिए की होती?
- 15:19तो तुम कभी दुखी। न होती।
- 15:24वह कभी दुखी नहीं होता क्यों? क्योंकि उसने सजना सारी की ही
- 15:29अपने लिए है। इसी तल पर जाकर लाउजे बोलता है।
- 15:36ईश्वर जो कुछ करता है, अच्छा करता है और भले के लिए करता है।
- 15:43लेकिन तुम्हारी भली के लिए तुम तो हो ही नहीं।
- 15:511 दिन आएगा और ईश्वर क्रियाबवा बड़ा प्यारा क्षण होता है, तुम
- 15:58जान लो कि मैं नहीं हूँ। और जैसे ही तुम्हें पता चला कि
- 16:03मैं नहीं हूँ, वैसे ही तुम्हें पता चलेगा कि मेरा कुछ नहीं है और
- 16:09यह ठीक भी है या तुम साइंटिफिक ढंग से भी एनालायसिस करके देख
- 16:16लेना, जो तुमने बनाया नहीं, वह तुम्हारा होता है।
- 16:20जो तुमने कमाया है वो तुम्हारा नहीं होता, जो कमाया है कमाया तो
- 16:28इधर से उधर पलेदारी है तुम जो तुमने बनाया नहीं, वो जिसने बनाया
- 16:34उसका होता है और वह जिसने बनाया उसे मैं जानता हूँ।
- 16:40मैं कहता तुम कहते कागज़ की लेखी तुम शास्त्रों को बटोर के पढ़ के
- 16:50बोलते हो, लेकिन मैं साक्षात प्रमाणिक मैं कहता हूँ मैं जानता
- 16:57हूँ उस तत्वों को। उस शक्ति को जिसने यह बनाया सारा
- 17:04और एक बात और भी कहता हूँ उसने तुम्हारे लिए नहीं बनाया शिकायत
- 17:08मत किया करो अरदास मत किया करो, तुम्हारी सब शिकायतें बेयर थी?
- 17:17क्योंकि तुम्हारे लिए उसने बनाया ही नहीं बुनियादी रूप से गलत है,
- 17:22तुम समति हो के हमारे लिए बनाया बनाया ही अपने लिए है, तो क्या वह
- 17:27इतना लोभी है? नहीं लोभी तो तो हो?
- 17:31अगर कोई दूसरा हो उसके सिवा कुछ है ही नहीं।
- 17:35दुख भी तो होता है तो उसे ही होता है, सुख भी तो होता है तो उसे ही
- 17:41होता है, दर्द होता है तो उसी को होता है।
- 17:46आनंद पीता है तो वही तो पीता है। मैं उन दिनों में सुवर से गधे मिल
- 17:54लिए। क्या मैं मिला नहीं?
- 17:57वही तो मिला मुझे लोग कहते हैं कि तुम तीन 400 बंदे हैं इनके रात को
- 18:05गला घोंट दो किसका गला घोंटू ये भगवानें हैं कब ये मेरे ही हैं
- 18:13भाई। उस तलपुर जब मैं जाता हूँ तो पाता
- 18:17हूँ के मैं ही तो हूँ जे धर देखता हूँ जे धर देखता हूँ जे धर देखता
- 18:26हूँ उधर तू ही तू है। हर दर्रे में हर दर्रे में हर
- 18:32दर्रे में तू ही तो रूबरू है। इसलिए ये गलती मत करना तो हमारी
- 18:45पहली गलती ही है कि तुम कहते हो उसने ये नहीं किया, उसने ये नहीं
- 18:51किया उसने ये नहीं किया। यू अरे नॉट ऑथेंटिक टु से यू अरे
- 18:56नॉट ऑथेंटिक टु कमेंट। तुम्हें अधिकार क्या किसी ने दिया
- 19:05ये कहने का कि ऐसा क्यों नहीं किया?
- 19:08ऐसा क्यों नहीं किया? ऐसा कर देते तुम्हारा जाता क्या
- 19:12था? मैं तुम्हें कहता हूँ, देखो सत्य
- 19:17को पहचान। सत्य ये है कि उसने तुम्हारे लिए
- 19:24बनाया है, बिल्कुल अटल और अंतिम सत्य है और अंतिम सत्य तुम्हें
- 19:31यही मिलेगा। तुम अभी पहुंचे नहीं।
- 19:36इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ कोई कहता परमात्मा है, नहीं तो भाई उसने
- 19:39देखा नहीं, कोई कहता है हरे रंग की छह टाँगें होती हैं तो साफ है
- 19:46कि उसकी आँखें नहीं हैं। तुम कहते हो कि उसने ये नहीं
- 19:52किया, उसने वो नहीं किया, उसने अपने लिए किया है।
- 19:56नानक भिक्षा कर विचार वह सारे संसार की गति बातें चीते देखकर
- 20:05प्रसन्न होता है क्योंकि उसी का हितों भाई उसी की हितों सजना है,
- 20:13उसी का हितों। संकल्प है एक को हम बोह्शा में
- 20:21फिर तुम कौन हो भाई बीच में तुम हो खाम खा ख्वाम खाओ तुम तुम्हारे
- 20:31यहाँ कुछ नहीं है, तुम ही नहीं हो।
- 20:37ठहर इतना कपड़ा होगे मत, ये हार्ट बीट क्यों दे जाओगे?
- 20:45जो हमने दास्तां अपनी सुनाई। सुनाई?
- 21:16आप क्यों? रोए तबाही तो तबाही तो।
- 21:55आई आप क्यों रोए जो हमने ये उस वक्त की बात है जब बूंद
- 22:24समुद्र में खो जाती है। बूंद जानती है कि मैं नहीं हूँ
- 22:34क्यों क्योंकि बूंद बूंद की तरह खो गई बूंद जानती है कि मेरा कुछ
- 22:45वजूद नहीं न मैं हूँ। ना मेरा कुछ है लेकिन दिल
- 22:55मंतहारिया बूंद तत क्षण पाती है ऐट दी सेम मोमेंट के बूंद समुद्र
- 23:07में घर के समुद्र ही हो गए। तो बूंद एक तरफ जानती है कि मैं
- 23:14नहीं हूँ और मेरा कुछ नहीं है। क्षण दूसरा पहलू सामने आता है तो
- 23:21पाती है कि मैं ही हूँ अहम् ब्रह्मास्त्र।
- 23:28यहाँ उदघोष होता है, ऋषि के द्वारा अहम् ब्रह्मस्म मैं ही हूँ
- 23:36ये दोनों यज्ञ संगठते हैं। एक ही सिक्के के दो पहलू एक पहलू
- 23:41फेंकोगे, दूसरा फिंक जाएगा एक तल पर जानती है।
- 23:48कि मैं नहीं हूँ तो दक्षिण दूसरा पल आता है कि मैं और सब मेरा ही
- 23:57है यह अनंत विस्तार यह विराट विस्तार यह विराट।
- 24:07एक्जिस्टेंस यह मैं ही हूँ और यह मेरा ही है।
- 24:21ये दोनों घटनाएं या केस में घटती हैं।
- 24:25एक ही सिक्के के दो पहर। इसलिए जब मैं कहता हूँ कि
- 24:36तुम्हारे लिए उसने बनाया ही नहीं अपने लिए ही बनाया, तो तुम दुखी
- 24:44तो हो। कि तुम अपने आप को उससे अलग मानते
- 24:51हो बूंद की तरह ज़रा उसमें समा के देखो समुद्र की तरह हो के देखो तो
- 25:01तुम पाओगे, मैं दुखी नहीं। मैं अनंत आनंद का विस्तार मैं
- 25:09विराट समुद्र का रस रूपी आनंद का विस्तार हूँ मेरा कोई और नहीं, ना
- 25:16मध्य है, ना आद है, ना अंत है मैं ही हूँ और मैं ही हूँ।
- 25:29जगत के कण कण में ही मेरा स्वरूप है।
- 25:37जगत के कण कण में ही मैं प्रकट जगत के कण कण ही मैं शो हाय मानु
- 25:45मेरा ही है सब। जहाँ सब भेद खो जाते हैं जहाँ भेद
- 25:52बुद्धियां खो जाती हैं जहाँ बुद्धि ही खो जाती है जहाँ सिर्फ
- 26:00अस्तित्व बचता है, ओनली एक्सिस्टेंस रिमेंस।
- 26:06सिर्फ अस्तित्व में रह जाता है। जब तक तुम पाओगे कि मैं भूल हूँ,
- 26:13तब तक शिकायत करोगे तब तक फरियाद भी करोगे, शिकायत करोगे प्रभु ऐसा
- 26:23क्यों नहीं किया? ऐसा कर देना।
- 26:27फिर याद भी करोगे लेकिन संत देखेगा वो रहस्य का देखो पगला गया
- 26:40बूंद कहती है कर देना है समुद्र गलती इसकी।
- 26:47समुद्र को छोड़ा क्यों था? तो पूछा है कि शांत ने फिर
- 26:58परमात्मा अपनी लीला को कैसा खेलता है?
- 27:05अपनी इच्छा से या मौज से या नियमों से प्रश्न महत्वपूर्ण है।
- 27:27जैसे तुम लूडो खेलना शुरू कर दो, कैरम खेलना शुरू कर दो और खेलने
- 27:37वाले सिर्फ तुम ही हो, दूसरा पक्ष में हो यही बा बनाने के लिए कहा।
- 27:47एको का दूसरा जब एक है तो एक ही खेलता है अपनी लीला को दूसरा पाशा
- 28:03खेलने वाला कोई है ही? फिर खेलता भी खुद है, खेल भी खुद
- 28:12है, हारता भी खुद है जीतता खुद है।
- 28:24फिर राजा भी खुद है, कंगाल भी खुद है, पीड़ा भी खुद है, खुशी भी खुद
- 28:34है, आनंद भी खुश सब खुद है। आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा में
- 28:50यह पहली स्टेज है जीस स्टेज पर तुम हो अभी आदम को खुदा मत कहो,
- 28:59आदम खुदा। और दूसरी स्टेज होती है संत के।
- 29:07लेकिन खुदा के नूर से आदमजदान आपके खेले खेल खिलाड़ी आप भी
- 29:19खेलना हरा होगा। खुद ही अपनी लीला को खेलता है
- 29:34उसकी मौज। और खेलना उसका आनंद है और उसे
- 29:48खेलने से कोई रोक भी नहीं सकता क्योंकि दूसरा कोई हो तो रोके
- 29:57दूसरा यह कोई। वह किसी को राजा बना देता, किसी
- 30:08को रंग का बना देता, सब उसका है, संसार भी उसका अध्यात्म भी उसका
- 30:24है। आज वैज्ञानिक कहते हैं।
- 30:30कि मैटर कैन नीदर बी करियरर नॉर कैन बी जस्ट डायरेक्ट यह संसार और
- 30:40आदि काल में कृष्ण ने कहा, नैनं छदन तिशास्त्रण नैनं दाती पाल का।
- 30:49न चनम क्रेदन्त्या को न शोषधि मारूता आत्मा मरती नहीं और जड़ भी
- 31:00कभी मरता नहीं मैटर कैन इधर भी कर नाउ, कैन भी डिस्ट्रॉइड।
- 31:07और ये दोनों का पुंज है। जगत जड़ और चेतन फिर ध्यान से
- 31:16समझियेगा न जड़ मरता है न चेतन मरता है तो फिर मरता कौन है?
- 31:26कोई नहीं मरता। कबीर ने कहा मैं ना मरूँ, मरह
- 31:37संसारा, संसार भ्रम को कह। जैसे तुम स्वप्न देख रहे हो,
- 31:50स्वप्न में तुम किसी वायु जान पे जा रहे हो दुर्घटनाग्रस्त हो गया
- 31:56वायु जान में बैठे हुए सभी लोग मर गए लेकिन तुम्हारी जाख खुल गई।
- 32:03तुमने देखा होगा। ये तो सपना था क्या?
- 32:13आँखें खोलने के बाद उस हवाई जहाज का कोई कल पुर्जा उसके टंकी का
- 32:19कोई आयल बिखरा हुआ मिला तो जो लोग मर गए थे, जहाज में बैठे हैं।
- 32:30उनमें से किसी की लाश, किसी का कोई अंग मिला तो नहीं मिला क्यों?
- 32:41क्योंकि यह सपना था, ब्रह्म था। इसी को संसार कहते हैं कबीर।
- 32:49मैं ना मर्म मैं जो हूँ वास्तव में मैं कबीर भी कहते हैं हमें
- 33:02प्रकशन भी कहते हैं मैं अनन्या चिंतन तो मान।
- 33:08ये जनाना पूरी उपास्थय, तेशा नृत्य, गुप्ता नाम योग, शमां
- 33:15बहामयां आम यह क्या अहंकार है नहीं?
- 33:25जब तुम कहते हो कि मैं वहाँ गया था, तो मैं का प्रयोग करता हूँ
- 33:33क्या यह अहंकार है नहीं, मैं मूवी देखने गया था मैं यात्रा करने गया
- 33:43था मैं तीर्थ यात्रा करने। मैं खाना खाने गया था, मैं सैर
- 33:55करने गया था। तो क्या यह अहंकार है?
- 33:58नहीं, यह सत्य है, एक क्रिया है जो आपने की बस कृष्ण ऐसे ही
- 34:08बोलते। कबीर ऐसे ही बोलते हैं।
- 34:12दल बदल के साधारण जान कहता है, मैं गया था तो वह शरीर को मैं मान
- 34:25रहा है। और कृष्ण कहते हैं सर्वधर्माण
- 34:33प्रतिज्ञा में एकम श्रम माँ एकम मुझे एक की शरण में, आज यह अहंकार
- 34:46नहीं। ना तो जो व्यक्ति सैर करने गया
- 34:53मवे देखने गया उसका भी अहंकार नहीं है।
- 34:57वह शरीर को अपना होना मानता है और उसके लिए यही सत्य है, लेकिन
- 35:06कृष्ण के लिए यही सत्य है जो बोल रहा है।
- 35:11कृष्ण कहते हैं, सिर्फ मेरा शमण कर अनन्या चिंतितों मान बस मैं
- 35:19तुम्हारी सभी जरूरतों को पूरा कर दूंगा हम तो हम सर्प पापे भवमुख
- 35:25श्यामी माँ सूचक। मैं तुम्हारे सभी पापों को समाप्त
- 35:31कर दूंगा कि श्याम नित्या भुक्ता नाम योग विषय में हूँ, मैं
- 35:42तुम्हारी सभी जरूरतों को कर्तव्यों को निर्वहन कर दूंगा।
- 35:48तो कौन है? दूसरा दूसरा कोई नहीं जब कोई
- 35:58दूसरा नहीं है, परमात्मा ही है और लीला है खेल खेलता है।
- 36:05तो फिर वह खेल को बाबा खेलता कैसे?
- 36:09क्या ईमानदारी से खेलता है या बेईमानी से खेलता है?
- 36:16हाँ ये प्रश्न है सुन्दर भला बेईमानी करने की उसे जरूरत क्या
- 36:24है? ज़रा सोचिएगा अगर खेलने वाला खुद
- 36:31ही सिर्फ खेलने वाला है प्रतिपक्ष में कोई है ही नहीं तो कौन हारेगा
- 36:41कौन जीतेगा? फिर बेईमानी किस्से करेगा तो
- 36:51जाएंगे तौर पर ईमानदारी से ही खेलेगा क्योंकि हारेगा भी वही
- 36:58जीतेगा भी वही इसमें बेईमान। शब्द का प्रयोग करना ना जायज है
- 37:08ईमानदारी से ही खेलेगा क्योंकि बेईमानी करने की कोई आवश्यकता
- 37:13नहीं बस यह जानेगा परले वाला धड़ा हार गया, पुरले वाला धड़ा जीत
- 37:20गया। इसलिए उसे कहते हैं न्याय कार्य
- 37:30जीस तरफ परमात्मा खेल रहा है वो ही परमात्मा है।
- 37:40और विपक्ष की तरफ परमात्मा के अलावा भी परमात्मा है तो कोई
- 37:45हारेगा नहीं, कोई जीतेगा नहीं। इसीलिए उसके सभी कर्मों को लीला
- 37:53कहा है। लीला में कोई जीता नहीं।
- 37:57कोई हारता नहीं, कोई कुछ खोता नहीं।
- 38:01कोई कुछ पाता तो ईमानदारी से खेलता है।
- 38:16फिर तुम क्यों कहते हो तुम शिकायत करते हो?
- 38:29कि मुझे रंग क्यों बना दिया और उसको राजा क्यों बना दिया?
- 38:34तुम गलती में तुमने सत्य जाना नहीं, इसीलिए अभी तुम गलती में
- 38:42हो। यू अरे इन एलोजन तुम ब्रह्म्य हो?
- 38:48जब सत्य को जान जाओगे तो ये शब्द नहीं बोलो, सत्य है कि तुम नहीं
- 38:57हो। सत्य है कि बस एक है और वो
- 39:01परमात्मा है। एक ओम का सत्य नाम।
- 39:07एको ब्रह्मा द्वितीय नास्ति तत्त्व मशी श्वेत के हे श्वेत के
- 39:21तू जो तू है वो ही मैं। इन सभी का अर्थ है कि दूसरा कोई
- 39:31नहीं फिर बेईमानी करेगा तो किस्से करे फिर ईमानदारी भी तो किस्से
- 39:43करे। फिर जहाँ न ईमानदारी है, न
- 39:47बेईमानी है, सिर्फ लीला है, सिर्फ खेल है, इसलिए यहाँ बेईमानी या
- 40:00ईमानदारी शब्द प्रयोग करना उपयुक्त नहीं।
- 40:07क्योंकि ईमानदारी या बेईमानी हमेशा दूसरे के परिपेक्ष्य में
- 40:13होती है। स्वयं के परिपेक्ष्य में न
- 40:17ईमानदारी होती है न बेईमानी होती है।
- 40:20एक ही है जब। उसी ने खेलना तो विपक्ष है ही
- 40:27नहीं, तू हारेगा क्या, वही जीतता है, वो ही हारता है।
- 40:38बस इसी को देखकर संत कहते हैं कि जो करता है।
- 40:43वही करता है और शुभ करता है भला अशुभ किसके लिए होगा अशुभ?
- 40:52हमेशा दूसरे के लिए होगा, जो हारेगा उसके लिए अशुभ होगा और
- 40:58दूसरा यहाँ कोई है ही नहीं हारेगा।
- 41:02इसलिए लव से कहते हैं कि वह भला ही करता है, बुरा करता ही नहीं।
- 41:16तुम इसको और ढंग से समझ लेते। सही अर्थ इसका ये था कि बुरा होगा
- 41:25किसका? जब दूसरा है ही नहीं, अपना ही तो
- 41:29बुरा करेगा और अपना ही तो भला करेगा और बुरा और बुरा तो हो ही
- 41:35नहीं सकता। भला भी किसका होगा?
- 41:41भगवान कृष्ण ने कहा है, मैं जो हूँ उसमें से न तो कुछ घटाया जा
- 41:49सकता है और उसमें न कुछ जोड़ा जा सकता है।
- 41:54मैं ऐसा तत्व। उपनिषद में भी कहा
- 42:10पूर्ण में से पूर्ण को भी निकाल लिया जाए तो पूर्ण ही शेष बचेगा।
- 42:17पूर्णमिदम पूर्णमदाह पूर्णमदक्ष्यते।
- 42:25पूर्ण सय पूर्णमाधार पूर्ण में बाप शिष्य एक ही जब पूर्ण में से
- 42:39पूर्ण निकाल लिया जायेगा तो जो पूर्ण निकाला गया वो जायेगा कहाँ?
- 42:47उसी में ही तो रहेगा फिर पूर्ण ही तो बच जाएगा।
- 42:54सोचिए 1 मिनट आपकी जेब में ₹100। आपने वो जेब में से ₹100 निकाल
- 43:08लिए, लेकिन जेब में से ₹100 निकाल कर आपने अपने हाथ में रख ली है,
- 43:20तो मालिक कौन रहा? जब जेब में थे तो भी मालिक आप थे
- 43:28जब जेब में से निकाल कर आपके हाथ में आ गए तब भी मालिक आप रहे तो
- 43:36फिर शून्य कैसे हो गया? समझाने वालों ने फॉर्मूला गलत
- 43:43समझा लिया और समझाने वालों ने दो के हिसाब से फॉर्मूला समझा लिया।
- 43:50असल में इसका अर्थ यह था जब दूसरा है ही नहीं, जेब में पड़ा था तो
- 43:57भी जिसकी जेब थी वो ही मालिक। जेब में से निकाल लिया तो जिन
- 44:03हाथों ने निकाला वो हाथ भी उसी मालिक है तो सो निकाला जेब में से
- 44:12और हाथ में आ गया तो सो का सो ही रहा ना बस स्थान परिवर्तन हुआ।
- 44:21जैब का स्थान बदलकर हाथों का स्थान हो गया लेकिन सो में से 99
- 44:29नहीं रहा सो का सो ही रह गया। तुम्हारी शिकायतें द्वयत से आती
- 44:43हैं। एक शिकायत करने वाला तुम एक जिससे
- 44:53शिकायत तुम कह रहे हो वो दूसरा। सभी शिकायतें द्वैत से आती हैं।
- 45:02जब तुम मानते हो के दो हैं तो तुम शिकायत करते हो मुझे गोराम क्यों
- 45:13बनाया उसको राजा क्यों बनाया? तो इसका सीधा सा अर्थ ये है कि
- 45:22तुम दो मानते हो, द्वैत मानते हो और सत्य ये है जो लवजे नहीं जाना
- 45:33तो सभी संतों ने जाना। कि दो नहीं हैं।
- 45:36एक हैं संतो के वचन मुनियों के वचन ऋषियों के वचन उपनिषदों के
- 45:48वचन बेतों के वचन यही कहते हैं कि दो नहीं अद्वैतवाद।
- 45:58दो नहीं हैं तो एक है, एक है तो शिकायत किस्से करेगा, एक है तो
- 46:08चोरी किसकी करेगा? एक है तो झूठ किस्से बोलेंगे।
- 46:16एक है तो चोरी किसकी करेगा? एक है तो हिंसा किसकी करेगा?
- 46:25एक है तो शोषण किसका करेगा? और सत्य जैसी है की वो एक है।
- 46:36सत्य यही है कि वह एक ही रहेगा तो परमात्मा खेलता है और उसने सारी
- 46:51रचना। मुझे रोक पूछ लेते हैं बाबा
- 46:58परमात्मा ने ये सृष्टि मैंने कहा मूर्तिकार ने मूर्ति क्यों बनाई
- 47:10क्योंकि ये उसका शोक? और वह मूर्ति बनाने की कला जानता
- 47:16था, इसलिए उसने बना दिया तुम जानते हो तो तुम बना लो।
- 47:27मूर्तिकार जानता था मूर्ति को बनाना उसने मूर्ति को बना दिया।
- 47:37लेकिन तुम कहते हो नहीं बाबा ये जवाब समझ नहीं आया।
- 47:41बस ये नहीं कहने वाला दूसरा है यानी कि तुम इससे अलग कोई जवाब
- 47:50जानते हो, फिर मैं पूछ लेता हूँ तुम बता।
- 47:57बाबा हमें तो पता नहीं इसीलिए तो आपसे पूछा तो मैंने कहा फिर तुम
- 48:03जवाब से संतुष्ट हो जाओ, तुम्हें पता नहीं फिर काहे कमेंट करते हो?
- 48:14मुझे पता है मूर्तिकार मूर्ति बना सकता है।
- 48:21इसीलिए उसने मूर्ति बना दी। तुम मूर्ति बनाने की कला जानते हो
- 48:27तो तुम मूर्ति बना लो। यही कहते हैं कृष्ण कि मैं जितना
- 48:37हूँ, उसमें बढ़ाया और घटाया जा नहीं सकता और एक और शब्द है।
- 48:45कृष्ण कहते हैं, मैं ही अपना मित्र हूँ।
- 48:49और मैं ही अपना शत्रु हूँ। क्या अर्थ होगा इसका बहुत दूर तलक
- 48:59जाओगे तो पाओगे? मैं ही अपना मित्र हूँ और मैं ही
- 49:03अपना शत्रु हूँ यानी दूसरा कोई नहीं।
- 49:09शत्रु होने के लिए दूसरे का होना जरूरी है और मित्र होने के लिए भी
- 49:15दूसरे का होना जरूरी है। किसके मित्र होगे किस्से, किस्से
- 49:24ईर्ष्या करोगे? कृष्ण द्वेष करोगे।
- 49:30कृष्ण कहते हैं, मैं ही अपना शत्रु मैं ही अपना मित्र, आत्मा
- 49:40ही आत्मा की शत्रु और आत्मा ही आत्मा की मित्र।
- 49:47इसका गहर अर्थ यह है दूसरा कोई दूसरा होगा तो शत्रु होगा और
- 49:56दूसरा होगा तो ही मित्र होगा। जब दूसरा है ही नहीं तो कौन
- 50:03शत्रु? और कौन?
- 50:05मित्रों तुमने पूछा पुत्र, मैं खेल खेलता कैसे है खेल कैसे नहीं
- 50:20खेला जाता बेटे? क्योंकि किस्से करेगा ईमानदारी और
- 50:27किस्से करेगा बेईमानी यह तुम्हारी दुविधा से भरे हुए सत्य के प्रश्न
- 50:33हैं जब तुम सत्य को देख लोगी। और पाओगी?
- 50:43एकों का दूसरा कोई है नहीं, फिर न्याय किस्से और अन्याय किस्से
- 51:02फिर किस पर करुणा और किस पर क्रोध?
- 51:10न किसी पर करुणा और न किसी पर क्रोध।
- 51:13वह स्वयं ही स्वयं पर क्रोध करता है, वह स्वयं ही स्वयं पर करुणा
- 51:21करता है। मुझे लोग कहते हैं आप प्रवचन शुरू
- 51:28करते हो, अंत करते हो, प्रणाम करते हो किसे करते हो?
- 51:33क्या कोई दूसरा है? निका नहीं, मैं अपने ही स्वरूप को
- 51:41प्रणाम करती हूँ। हूँ और आखिर में अपने ही स्वरूप
- 51:49को प्रणाम करके विदा देती हूँ। मैं स्वयं को ही प्रणाम करता हूँ।
- 51:58अष्टभकर ने जब जनक के ऊपर शक्ति बात किया और अष्टभकर जब रहस्य के
- 52:07उस अनंत छोर पे पहुंचे जनक। तो जनक कहते हैं, प्रभु मैं स्वयं
- 52:24को ही प्रणाम करता हूँ तो अष्टावक रहने से।
- 52:36स्पष्ट हो कर ने कहा, बिल्कुल सही जगह पहुँच गए राजन तुम स्वयं को
- 52:43ही प्रणाम कर सकते हो, क्योंकि दूसरा कोई है ही नहीं।
- 52:52प्रणाम करोगे किसको? अगर प्रणाम करोगे तो दूसरा तो कोई
- 52:58है नहीं। स्वयं को ही परिणाम करो, तुम
- 53:04स्वयं को ही दान करते हो और स्वयं ही दान लेते हो।
- 53:16आपके खेले खेल खिलाड़ी आपके खेलन हारा हो।
- 53:32यह मेरी खुद की दास्तां है तुम जब दैत में होते हो और प्रत्येक
- 53:45व्यक्ति अज्ञानी व्यक्ति दैत में होता है।
- 53:51असल में जब तक दैत है तब तक अज्ञात।
- 53:57जब द्वैत मीठा और अद्वैत आया तो अज्ञान, मीठा और ज्ञान आया।
- 54:17जो आप क्यों रोए?
- 54:51तबाही तो। तबाही आई, आप क्यों रोये?
- 55:12तबाही जब हम अपनी दास्तां सुनाते हैं तो
- 55:35तुम क्यों होते हो? क्योंकि तुम्हारे अंदर हम अपनी
- 55:44दास्तां सुनाते हैं स्वयं को। और हम रोते हैं स्वं हम हँसते हैं
- 55:55स्वं हम खुश होते हैं, स्वं हम रोते हैं स्वं, क्योंकि दूसरा
- 56:06यहाँ कोई है नहीं। इसलिए बेईमानी का कोई सवाल नहीं
- 56:15और ईमानदारी का भी कोई सवाल नहीं। लीला न तो ईमानदारी में होती है न
- 56:24ही बेईमानी से होती है क्योंकि। ईमानदारी हो के बेईमानी हो, दूसरे
- 56:31का होना जरूरी है। कृष्ण जानते हैं कि दूसरा यहाँ
- 56:40कोई नहीं है। राम जानते हैं कि दूसरा यहाँ कोई
- 56:47है। इसलिए हमने उनको अवतरण कहा।
- 56:55वह जन्मी नहीं, वह अवतरित हुए। उनका शरीर तो जन्मा, उनका शरीर तो
- 57:05बायोलॉजिकल था। लेकिन उनका स्वयं खुद ही
- 57:12बायोलॉजिकल नहीं थी। नॉन बायोलॉजिकल थी।
- 57:18उनका न कोई पिता था, न कोई माता था, जो सच में राम थे।
- 57:27जो सच में कृष्ण थे उनका न तो कोई माता था, न कोई पिता था क्योंकि
- 57:35वह नॉन बायोलॉजिकल थे और वह अद्वैत थे।
- 57:39दूसरा कोई स्थान नहीं है, अवतरण होता है तो जिसका अवतरण होता है।
- 57:45उसका ना पिता होता है, ना माता होता है।
- 57:47भगवान का कोई माता नहीं, कोई पिता नहीं क्योंकि भगवान अवतरित हुआ
- 57:55मुझसे लोग पूछ लेते हैं कि जिसे आप शिव कहते हो उसके माता पिता
- 58:01कौन? मैंने कहा उसका कोई माता पिता
- 58:04नहीं शंकर के माता पिता हैं, हनुमान के माता पिता हैं, पवण
- 58:10पुत्र हैं, अंजनी माता हैं, शिव के माता पिता नहीं हैं, शंकर के
- 58:21माता पिता हैं। आए तो मैं बताता हूँ।
- 58:32शंकर के पिता हैं प्रिय व्रत और शंकर की माता है उपासना शायद
- 58:48प्रथम बार। प्रथम व्यक्ति से आपने सुना होगा
- 58:54शंकर जिसकी मैं बात करता हूँ जो कैलाश में रहते हैं और उनका ये
- 59:05ढांचा है जो कैलाश में। बुशंकर उनकी माता का नाम उपासना
- 59:15है। उनके पिता का नाम प्रिय व्रत है,
- 59:24लेकिन जीस शिव की मैं बात करता हूँ उसके कोई माता पिता नहीं।
- 59:31स्वयं से ही प्रकट हुआ। स्वयं से ही अवतरित हुआ नॉन
- 59:36बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल आनंद होता है।
- 59:43आनंद किसी से पैदा नहीं होता है। आनंद का कोई माँ बाप नहीं है।
- 59:49आनंद का कोई भाई बहन नहीं, आनंद का कोई दुश्मन और दोस्त नहीं आनंद
- 59:58तो रस है और आनंद तुम्हारा अंत सस्वरूप।
- 1:00:11जैसे हनुमान की माता अंजना और हनुमान के पिता को बनाएं वैसे ही
- 1:00:21व्रत और उपासना शंकर के। लेकिन ये शिव की मैं बात करता
- 1:00:28हूँ। वह नोन वायलेजिकल है, उसकी न माता
- 1:00:34है, न पिता है और वह किसी के घर से नहीं उत्पन्न होता, वह अवतरित
- 1:00:41होता है कहाँ से अवतरित होता है बस अवतरित होता है।
- 1:00:50कहाँ से होता है इसका कोई सवाल नहीं क्योंकि सभी जगह वो है ईशा
- 1:00:57वासुमितम सर्वम यत के नीचे जगत एवं जगत जगत के कोण कोण में वही
- 1:01:03तो बुद्धिमानी फिर कहाँ का सवाल कहाँ?
- 1:01:07कहाँ का मतलब तो कोई और छोर हो गया जो उससे परे हो गया बिना ना
- 1:01:12में नाहीं को था जेता किता किता नाम नाम की परिभाषा करते हैं बाबा
- 1:01:24तुम चूक चूक जाते हो? तुम नाम को जपते हो, नाम जपने
- 1:01:29जैसी चीज़ नहीं। नाम तो वो शराब है जो पीने जैसी
- 1:01:34चीज़ है, नाम को पियो, पियो, पियो और जियो।
- 1:01:45तुम नाम को जागते हो रिपीट करते हो नो इट इस नॉट ए सिलेबस यह रस
- 1:01:54है रस पीने के लिए है दोहराने के लिए तुम दोहराते हो।
- 1:02:05यही मार खा जाते हो अगर पिया होता है सरब तो फिर उसका नशा न होता
- 1:02:14उसका खुमार न चढ़ता उसका शोर हो रहा था उसकी मदहोसी न आती।
- 1:02:25उसकी मिठाई से न प्रकट होती, जब तुम फूलते बोलते तो फूल झरते आनंद
- 1:02:43शैभम है इसलिए बाबा नन्द करें। कुछ अल्फाज़ कहे नौ अल्फाज़ कहे
- 1:02:53एकों का सतनाम कर्तापुरक निरपुम क्योंकि भय किसे करे कब वो दूसरा
- 1:03:00कोई है नहीं एक है। निर्वैर वैर किस से करेगा?
- 1:03:07वैर करने के लिए दूसरा होना चाहिए अकाल मूरख वह मरता नहीं, क्योंकि
- 1:03:13जन्म दिन ही अवतरित हुआ है। ध्यान रखना पांच तत्व का पुतला
- 1:03:22मरता है। चेतना कभी नहीं मरते।
- 1:03:38अर्जुन किसी विशिष्ट योनी में नहीं है।
- 1:03:44सब वही है तो फिर सभी योनियों में वो ही है वराह भी वो ही है हमने
- 1:03:52इसीलिए वराह को भी अवतार कहा। मछली को भी अवतार कहा।
- 1:03:59क्रोधी परशुराम को भी अवतार कहा। बोने व्यक्ति को भी अवतार कहा।
- 1:04:09कृष्ण को भी अवतार कहा और राम को भी अवतार कहा।
- 1:04:22अकाहम व्रत शैपन किसी माता पिता से जन्म नहीं हुआ, खुद प्रकट हुआ
- 1:04:35यानी अवतरित हुआ कहाँ से हुआ? कहीं से भी नहीं हुआ।
- 1:04:46वह कोई अण्डज योनिज उधभोज नहीं है।
- 1:04:55वह स्वयं से प्रबुद्ध हुआ क्योंकि सब जगह है।
- 1:05:01और कोई भी स्थान ऐसा नहीं जहाँ बने ज़ाहिर शराब पीने के मस्तिष्क
- 1:05:08में बैठकर जब वो जगह पता जहाँ खुदा का गर्ण हो तुम्हारी बुद्धि।
- 1:05:21दैतवादी है तुम कहते हो नहीं के मंदिर ये मस्जिद है यहाँ शराब मत
- 1:05:28पीओ जबकि मस्जिद होती ही मंदिर होती ही शराब पीने के लिए मदहोशी
- 1:05:36का वो स्थान है। जहाँ शराब का वो सुरूर पिया जाता
- 1:05:43है वही तो सही स्थान और वहीं तुम कह देते हो नहीं यहाँ शराब नहीं
- 1:05:52पीने को है, बस वहाँ शराब पीने को है।
- 1:05:58मैन मेड नहीं ओमनी, पोटेंट, मर्क, ओमनी, शिएंट, ओमनी, प्रेसेंट ने
- 1:06:08जो शराब बनाई वो पीने के लिए मंदिर हैं, गुरुद्वारा है, चर्च
- 1:06:14हैं, मस्जिदें हैं। फिर वह जो करता है वह न्यायकारी
- 1:06:27है, करूणावान भी भूल तुम कहोगे अगर न्यायकारी है तो करूणावान
- 1:06:39कैसे? क्षमाशील कैसे?
- 1:06:43अगर क्षमाशील है तो न्यायकारी कैसे दूसरा नहीं है जिसे क्षमा
- 1:06:49करें और दूसरा नहीं जीस पर रहम करे।
- 1:06:56यहाँ रहमत और रहम दोनों एक हो जाते हैं।
- 1:07:05यहाँ खेल और खिलाड़ी दोनों मिल जाते हैं यहाँ दृष्टा और दृश्य
- 1:07:14दोनों मिल जाते हैं। जहाँ दृश्य और दृश्य दोनों मिल
- 1:07:29जाएं, वहाँ लीला होती है, द्वैत मिटता है, अद्वैत आता है, अद्वैत
- 1:07:38की सही डेफिनिशन यही है। वह परख के रह रहे हैं रस रूप है
- 1:07:47रसो व्यवसा इसलिए मत पूछो कि वह रेहम दिल है या न्यायकारी है?
- 1:08:00न्याय करेगा तो किस्से करेगा जब दूसरा है नहीं, वो रहम करेगा तो
- 1:08:07किस्से करेगा। जब दूसरा है ही नहीं वह ही है।
- 1:08:17ओमनी प्रेसिडेंट है तो उसके अलावा और कौन है?
- 1:08:22अगर कोई दूसरा होता तो वह ओमनी प्रेसेंट न होता।
- 1:08:26सर्व व्यापक नय होता। अगर कोई दूसरा होता क्योंकि दूसरा
- 1:08:32भी तो स्थान घेरेगा? वह सर्वव्यापी है, ऑम्नी प्रेसेंट
- 1:08:42है, इसलिए दूसरा कोई नहीं किस पर करेगा रहम, वो किस्से करेगा न्याय
- 1:08:49वो न्याय करने के लिए और रहम करने के लिए दूसरे का होना जरूरी होता
- 1:08:55है। इसलिए न तो वो रहम कर्म, न वो
- 1:09:03न्यायकारी कुछ भी नहीं है। वो बस है, नीला खेलता है।
- 1:09:13लीला में कोई रहम नहीं होता, कोई न्याय नहीं होता, कोई बेईमानी
- 1:09:17नहीं होती, कोई ईमानदारी नहीं होती, किस्से करेगा, किस किस साथ
- 1:09:24करेगा, कौन करेगा, यह द्वैत का मसला ही नहीं है।
- 1:09:30यह अद्वैत का मसला है। बस वही है।
- 1:09:33एकोनकार एको ब्रह्म द्वितीय, नाश्ते एको ब्रह्म द्वितीय,
- 1:09:45नाश्ते। नहीं।
- 1:09:50मंसूर ने कहा अनल हक मैं हूँ और मैं ही हूँ मैं ही खुद खुदा खुदा
- 1:10:00यानी सर्व सब में ही यही मंसूर ने कहा उज्जैन के कहा देख के कहा।
- 1:10:09अंधेपन से नहीं कहा नकल से नहीं कहा समझ उस दिन आया जब जीस दिन
- 1:10:17उसने अपनी नग्न आँखों से सत्य को देखा।
- 1:10:25दूसरा यहाँ कोई नहीं। जिसके साथ अन्याय होगा।
- 1:10:36दूसरा जहाँ कोई नहीं जीस पर रहम होगा इसलिए न तो वो रहम और करीम
- 1:10:43है, न वो न्यायकारी या फिर उसे कुछ भी कह लो उसे कोई संज्ञा।
- 1:10:52दो तो भी वो अकेला। अगर उसे कोई संज्ञा न दो तो भी वो
- 1:10:57अकेला बस एक ही है। फिर मैं बोलता क्यों है?
- 1:11:08अगर दूसरा नहीं है तो देखिये। जैसे चुप कराने के लिए बोलने की
- 1:11:18आवश्यकता होती है कि चुप हो जाओ, वैसे ही दूसरा कोई नहीं यह बताने
- 1:11:28के लिए। बोलना तो पड़ेगा ही, तुम्हारी
- 1:11:38भ्रांति तोड़नी तो पड़ेगी ही क्योंकि तुम समझे बैठे हो।
- 1:11:48कि मैं भी हूँ और मेरा कोई वालिद भी है।
- 1:11:54मेरा कोई मालिक भी है तो यह समझाने के लिए कि एक मालिक ही है
- 1:12:03या एक तुम ही हो। बस एक है उसे मालिक मान लो या उसे
- 1:12:11खुद मान लो, आदम को खुदा मत कहो आदम खोदान, लेकिन खुदा के नुश से
- 1:12:21आदम जोदान है। सब जगह तेरे नूर की रोशनाई है, एक
- 1:12:38घुल। से
- 1:13:07क्या हुआ? क्या हुआ उन्हें बुझा डाला मेरे
- 1:13:22घर का चिरा, एक गुल से तो। उजड़ जा से नहीं, क्या हुआ तुने
- 1:13:45मिटा डाला मेरे? घर का जिया कम नहीं है, रौशनी कम
- 1:13:59नहीं है क्या हुआ एक क्या हुआ घर का चिराग एक कुल से
- 1:15:12तो उजड़ जाते नहीं। लों के वह?
- 1:15:21कम। नहीं है रौशनी हर श में तेरा नूर
- 1:15:30है सामने। तेरे तेरा बंदा बहुत मजबूर।
- 1:15:41है। ये वो अवस्था है जब व्यक्ति उस एक
- 1:15:48को देख लेता है। बस एक ही है, उसकी ही लीला है।
- 1:16:00फिर कहते है तुम भी कुछ भी कर मुझे वो मंजूर।
- 1:16:08है। कम नहीं है रौशनी हर क्षय में
- 1:16:18तेरा। सामने तेरे तेरा बंदा बहुत मशहूर
- 1:16:26है है। खुदा हर फैसला अगर ऐसा।
- 1:16:32चलोगे तो जीवन परम संतोष तृप्त। और आनंद से सर्प हो जाएगा।
- 1:16:44एम् खुदा खुदा हर फैसला तेरा। मुझे।
- 1:16:56मंजूर है। तू जो करे वो ठीक तू जो करे वो
- 1:17:04ठीक तेरा पाना मीठा रख। है।
- 1:17:15ए खुदा हर फैसला तेरा मुझे। मंजूर है, द्वैत मर जाता।
- 1:17:28है। जब उसका फैसला मंजूर हो जाता है
- 1:17:32तो द्वैत मर जाता है, अद्वैत आ जाता है, अद्वैत में तृप्ति होती
- 1:17:37है और अद्वैत में नफरत घृणा। समाप्त हो जाती है, प्रेम बरसता
- 1:17:44है, पुलक बरसती है, आनंद बरसता है।
- 1:17:51सामने तेरे तेरा बंदा बहुत मजबूर है।
- 1:18:20श्रोता का 1 दिन था। जब मेरा ग्रंथ पूर्ण हुआ था, वह
- 1:18:30था अध्यात्मिक का ग्रंथ। उसके बाद मेरा लीला का ग्रंथ शुरू
- 1:18:37हुआ। रहस्य का ग्रंथ।
- 1:18:43मैं आज मानवता के भारत से मुक्त हुआ।
- 1:18:48मैं आज देव ऋण से मुक्त हुआ। मैं आज मानवता के ऋण से मुक्त
- 1:18:57हुआ। यह भी एक ऋण था मेरे सर पे इसलिए
- 1:19:02मुझे इतनी बार बचाया गया उस एक तत्व के द्वारा आज मेरा लीला का
- 1:19:11ग्रंथ भी संपूर्ण हुआ। आपने इतने प्यार से सुन।
- 1:19:19आपने इतने सत्कार से सुना आपने इतना आनंद बरसाया, आपने इतने
- 1:19:27प्यार से पिया, इस रस को, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूँ।
- 1:19:39धन्यवाद।