Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Apr 26 - अंतिम छलांग: कैसे चेतना के उस पार उतरें जहाँ से कोई लौटकर नही आता? होने और परम ठहराव का अर्थ
Transcript
- 0:23आनंद के रस में केवल शुद्ध चेतना की अवस्था में आता जाता रहता हूँ
- 0:37केवल। होना ही रह जाता है।
- 0:43क्या इस अवस्था में श्रद्धा के लिए सिद्ध हुआ जा सकता है?
- 0:51आपका मार्गदर्शन यहाँ तक तो ले आया है।
- 0:58कृपया आदित्य मार्गदर्शन का अभिलाषी है, मेरे बाबा मेरे गरीब
- 1:07नवाज ने जाने कौन सी खुशबू से बनाया है तुझे खुदा ने।
- 1:21न जाने कौन सी खुशबू से बनाया है खुदा ने तुझे तेरी महक तेरी
- 1:27तस्वीर से भी आती है राकेशवती। गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से
- 1:52कहते हैं कि तू स्थिति प्रज्ञा हो जा ये वो अवस्था है।
- 2:07जहाँ एकबारगी जायजा सकता है और फिर वहाँ से लौटा भी जा सकता है
- 2:19रस भरी है, आनंद की झूमर है। सुगंध की फिजाओं की हवा है, माधक
- 2:33नशा है, वक्त ठहर जाता है और यहाँ से आने का मन तो नहीं करता।
- 2:50लेकिन फिर भी कोई कांटा अभी चुभदा रहता है।
- 2:58इस कांटी को निकालना भी आवश्यक है।
- 3:04जब तक यह कांटा न निकलेगा तब तक यह स्थिति निरंतर अखंड धारा की
- 3:13तरह नहीं बन पाएगी। एक बार की ऐसी स्थिति में दाखिल
- 3:23हो जाना ही। अपने आप में वृहद काम है।
- 3:31फिर इसमें आया जाया जा सकता है और जब आया जाया जा सकता है तो ध्यान
- 3:40रखना पुत्र ठहरा भी जा सकता है। और ठहरा भी जा सकता है तो ख्याल
- 3:50रखना वहाँ सदा के लिए भी लेन हो जा सकता है।
- 3:58वो ही मेरा अंतिम टारगेट है मानवता का।
- 4:09इन्सर्ट कंप्लीट्ली यूर सेल्फ पूरे के पूरे अपने आप को समाहित
- 4:21कर दो उस शून्य चेतना में। जहाँ रोग, शोक, भ्रम, दुख, दर्द,
- 4:38तनाव, उलझन, अभाव कुछ भी तो नहीं। जहाँ तुम विराट होते हो, जहाँ
- 4:57तुम्हारा कोई और शोर नहीं होता। जहाँ दूसरा नहीं होता भेद नहीं
- 5:07होता मात्र तुम्हें होता उसी अवस्था में पहुंचा हुआ संत उदघोष
- 5:18करता है अहम ब्रह्मस्व एको अं? द्वितीय नष्ट बस मैं ही हूँ अनलहक
- 5:32मैं खुद खुदा। यह वही झांजर की झंकार है जो
- 5:51तुम्हें अनंतनाग में सुर सुर में दिखाई पड़ते हैं।
- 5:58अब तुमने उस धागे को पकड़ के। अनहद का मूल उद्गम स्रोत जान लिया
- 6:07पुरुष में समाहित हो गया। पूछा है पुत्र कि क्या श्रद्धा के
- 6:17लिए इस अखंड धारा को? बरकरार रखा जा सकता है।
- 6:30यही तो ध्येय है यही तो लक्ष्य है यही तो टारगेट ऑफ लाइफ।
- 6:47सब अभ्रमों का वाष्प विभूत होकर अट्मोसफियर में उठ जाना और तुम
- 6:57अपने अस्तित्व के क्षेत्र में रसास्वादन को पीते हो।
- 7:03उसमें एकाकार हो जाओ, बूंद सामान्य समुद्र में एकवार्ध
- 7:13व्यक्ति इस स्थिति में आ गया। वो भेद से पार हो गया।
- 7:32अब एक मरहला और है तुम्हें क्रॉस करने के लिए इस अभेद बुद्धि को।
- 7:43निरंतर अखंड रस की धार में तब्दील करना तुम सदा के लिए इस भेद विहीन
- 7:59मुद्रा में। कैसे स्थिर हो जाओ अकंप आनंद
- 8:07सुगंध से बिल्कुल सही रास्ता है, ज़रा भी कोई वर्ण फिरने बिल्कुल
- 8:29सीधे चलते चले जाओ। इसमें कोई तरमीन की आवश्यकता
- 8:35नहीं। यही है वो पॉइंट जहाँ से गंगोत्री
- 8:49का आगाज होता है। गोह मुखी और फिर उसका अलग अलग
- 8:59शाखाओं में बन जाना, लेकिन खुश नसीब हो मैं ऐसे शुभ वचन बहुत से
- 9:21लोगों के प्रिय वचनों से सुन चुका हूँ।
- 9:27लेकिन इस देश में गिनती के लोग हैं।
- 9:33पांच सात विदेशों में 4035 प्रयासरत है।
- 9:46बिल्कुल उस स्थिति में प्रज्ञा में चौकड़ी मारकर बैठ जाने वाली
- 10:0024 लोग हैं। जिन्होंने उस अंतःस्थल के अंतिम
- 10:09छोर को पाल लिया है परिणाम बताते हैं, मंजिल बताती है से।
- 10:27मुझे हर्ष होता है। उस विराट ने इस खंडहर का सहारा
- 10:36लिया। तुम जैसे प्रियजनों को उस प्रीतम
- 10:47का स्वाद चखाने के लिए यह उसकी लीला का नाटक का एक बड़ा मधुर।
- 11:04पहलू भाई मुझे उसका धन्यवाद भी नहीं करना चाहिए क्योंकि धन्यवाद
- 11:18बेगानों का होता है, वह तो मैं ही हूँ मेरा ही सांचा।
- 11:30पंचभौतिक रूप में जब ढल जाता है तो उसमें से मैं ही बोलता हूँ।
- 11:37वृहद रूप में थोड़े शब्द टेढ़े पड़ेंगे।
- 11:44बार बार रिपीट करके सुन लेना। बस यही मुकाम है जिसने जीसको
- 12:01तुमने ना जाने किस गली गूंजो में द्वार द्वार पर खटखटाया,
- 12:09धर्मस्थलों पे गए, तीर्थों पे गए, हज कावा किया।
- 12:15मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च तुमने ही छान मारी लेकिन वो कहीं
- 12:24नहीं मिला। मुर्दा शास्त्रों में तुमने खोजा।
- 12:34मुर्दा मूर्तियों में तुमने खोजा मुर्दा पदार्थों में तुमने खोजा
- 12:49मुर्दा पूजा पाठ मान सम्मान में। तुमने खोजा लेकिन वो नहीं मिला।
- 13:01पुत्र पुत्रादि में तुमने खोजा, मित्र परिवार में तुमने खोजा।
- 13:15वो कहीं नहीं मिला और मिलता भी नहीं मिलता भी अपने ही भीतर से है
- 13:36तो अच्छा किया, तुम्हारी भ्रांत धार नहीं टूटे।
- 13:43तुमने जप पाठ शास्त्र को पढ़ना, धार्मिक कर्म कांड, माला फेरना,
- 13:56आरती उतारना, मंदिर मस्जिद, गुरुद्वारा में माथा टेकना।
- 14:05और शास्त्रों के बोझे को सिर के ऊपर ढोना ये सब भार तुमने फेंक
- 14:13दिया निर्भार होकर तुम अपने ही भीतर उतरे।
- 14:22बाहर के बाहर जो लगावों के रूप में क्लिंगिंग नेसेस के रूप में
- 14:29तुम्हें बांधे हुए थे तुमने एक एक करके सारे त्याग दिया।
- 14:39ऐसे ही मिला करता है। ऐसे ही मिला तुने इस अवस्था को
- 14:52अखंडता में जब चाहो बदलो, मंजिल दूर नहीं।
- 14:59मंजल बिल्कुल सामने है और सही पूछो तो समंदर की चौखट पर तुम
- 15:06खड़े हो जो मंदिर तुम्हारे भीतर है।
- 15:12ईंटो, गारा, सरिया, रेत, मट्टी, सीमेंट।
- 15:18पत्थर से बना हुआ भगवान का मंदिर कभी हुआ ही नहीं।
- 15:32यह कुछ आनंद को तरस गए लोग। मनगढंत बातों को कर लिया करते हैं
- 15:41दिल के बहलाने को ये क्या हमने देखी है जन्नत की हकीकत?
- 15:52ना जन्नत है, ना भूरे हैं, ना शराब के चश्मे रहते हैं, ना
- 15:56स्वर्ग है, ना वहाँ पर कुम्भे पाप नर्क है, ना कोई इंद्र है, ना
- 16:04सरायें है, ना मेनका है, ना विष्णु है, ना ब्रह्मा है ना जो
- 16:14है वो तुम्हारे हृदय के गहराइयों में छिपा है और वो कहीं दूर
- 16:31निकलने से नहीं मिलता। और स्मृतियों में गुजरा गया।
- 16:41वक्त उसमें उतरने से नहीं मिलता, भविष्य की योजनाओं में वो नहीं
- 16:48मिलता। ये सब उलझने के बहाने हैं उस आनंद
- 17:00से चूकने के बहाने मनुष्य बुद्धि की समझदारी से।
- 17:13अपने ही मन में ये धारणाएं बना लेता है कि मैंने परमात्मा को
- 17:21धोखा दे दिया और वह जानता नहीं कि उसे धोखा दिया नहीं जा सकता।
- 17:39जो विराट समस्त में कण कण में हुआ है और हर पल का साक्षी है, हर
- 17:49स्थिति का साक्षी है। हर देश, काल और परिस्थिति में
- 17:53समान रूप से विद्यमान रहता है। उसे धोखा कैसे दिया जा सकता है?
- 18:04इसलिए बाबा ने कहा सह से श्रेणु पलख हो गया पैंकना चल लेना।
- 18:14मनुष्य ने प्रशाद बाँटा, थोड़ा सा बाँट दिया, बाकी गोदामों में रख
- 18:24लिया, मनुष्य ने दान किया, थोड़ा सा दान कर दिया।
- 18:35बाकी बैंकरों में रख दिया। बड़े संदूक भर लिए बड़े गोदाम भर
- 18:41लिए जमीनें खरीद ली। दिन भर रात छल प्रपंच करने के
- 18:50उपाय किए, लेकिन। सब बेकार हो गए।
- 19:02अब तुम्हें ये स्थिति मिली है पुत्र अब यह टूटे हुए नहीं, तुम
- 19:12बिलकुल उस तन को पार कर चुका हो। पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न जहाँ से तुम
- 19:22वापस मार नहीं सकते बस अब एक अंतिम छलांग है, वो छलांग इस बात
- 19:34की है जो तुमने प्रश्न में पूछा है।
- 19:39तुम किनारे पे आ गए हो कश्ती किनारे पे लग गई है, अब अंतिम
- 19:50छलांग लेना बाकी है। वहीं तुम्हारे आज के प्रश्न में
- 20:01बिरहा की आंख है मैं क्या सदा के लिए उस स्थिति में अवस्थित हो
- 20:07सकता हूँ? बिलकुल अवस्थित हो सकते हो अंतिम
- 20:12छलांग। बिल्कुल तुम प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न
- 20:20के किनारे पर एज़ बिगड़ गया। अब तुम जब भी चाहो छलांग ले सकते
- 20:30हो और इस छलांग लेने में मैं तुम्हारी इम्ताज करूँगा।
- 20:46यहाँ से वापस नहीं आया जा सकता यहाँ से अगर कोई वापस आता है बह
- 20:58थोड़ी देर मुड़कर वापस चला तो जाता है।
- 21:03लेकिन संसार के गर्म लूमे थपेड़े दुख दर्द को सहन नहीं कर पाता फिर
- 21:14फिर वापस लौट जाता है। मनुष्य आगे की बात को सोचता है
- 21:29जानता है पीछे जो गुजर गया उसका पक्षार्थ तो करता है लेकिन होता
- 21:39कुछ नहीं है। एक ऐसी घड़ी आएगी जब तुम गुरु के
- 21:48सांनिध्य में एज प्वाइंट के ऊपर खड़े हुए हैं।
- 21:55इस आनंद के सागर में कूद जाओगे। और वो प्रेसेंट का क्षण होगा, जीस
- 22:14घड़ी तुमने थोड़ा इधर उधर खिसकना बंद कर दिया।
- 22:18पेंडुलम की तरह मध्य में शिथर हो गए।
- 22:22ना बाय गए ना दाय गए। एक जगह मध्य में ठहर गए वो आज का
- 22:30तल वो प्रेसेंट का तल तुम्हें छलांग लेने पर विवश कर देगा।
- 22:39वह तुम्हें कब से खींच रहा है? तुम पैंट की भांति कभी दायें कभी
- 22:46बाएं तुम थोड़ा मध्य में ठहर अभी दूर नहीं है, मंजल मंजिल तो
- 22:57सामने। महावीर ने अंतिम क्षण में अपने
- 23:02शिष्य गौतम को जो कहा था, वही मैं तुमसे कहूंगा कस्ती किनारे से अब
- 23:17देर। तुम्हारे पास्ट और फ्यूचर में बटन
- 23:24से दोनों को छोड़ दो, तुम वर्तमान में आ जाओगे।
- 23:38और जब तुम जैसे ही तुम वर्तमान में उतरे, जैसे ही तुम उतरे, वो
- 23:45ही क्षण तुम्हारा संबोधि का क्षण बन जाएगा नुष्यमूर्ख है।
- 23:59आगे भी। जाने न दो पीछे भी जाने न दो।
- 24:21जो भी है बस यही एक पल है आगे। भी?
- 24:37जाने ना तो पीछे। भी जाने ना।
- 24:48तो जो भी है बस यही। एक फल है, बस यही एक पल ठहरने का
- 25:05परिपूर्ण रूप से ठहरने का तुमने पेंडुलम का पूरा एक्स्ट्रीम पे
- 25:14गाय बाय जाना तो छोड़ दिया। लेकिन अभी मध्य बिंदु पूरा आयन
- 25:25मध्य बिंदु पर तुम सूत भर इधर हो जाते हो और सूत भर उदर हो जाते
- 25:35हो। और इतना फर्क तो बहुत बड़ा होता
- 25:37है बिलकुल जब तुम मध्य बिंदु में स्थिर हो जाओगे तो तुम स्थिति
- 25:47प्रज्ञा हो जाओगे, प्रज्ञा तुम्हे खींच लेगी।
- 25:53खुद में स्थिरति कर लेगी। यह प्रज्ञा की जिम्मेदारी है।
- 26:00उसका काम ही ये है जो उसकी जद में आया उसको उसने खींच लिया।
- 26:07लोग मुझे पूछते हैं बाबा हम क्यों नहीं पहुंचते?
- 26:12बस उसका यही कारण है क्यों? का मतलब है तुम समय की भटकन में आ
- 26:19गए, या तो तुम भविष्य में उतर गए या तुम।
- 26:31पास्ट में उस रखा है ठहरी ठहराव का वृक्षण कभी कभी आता है।
- 26:47वैसे तो तुम दायें गए के भाए गए, वो मध्य बिंदु सदा ही क्रॉस करके
- 26:52गए और उस मध्य बिंदु में तुम्हें आनंद भी बड़ा मिला है जो भी वहाँ
- 27:02से गुजरता है, आनंद की खुशबू उसके नासा पूठों को छूती है।
- 27:15और उसे जीवन जीने की इच्छा होती जीवन से वरी, तेरी आँखें।
- 27:35मजबूर। करें जीने के लिए जीने के लिए।
- 27:52सागर भी तरसते रहते हैं, सागर भी तरसते रहते हैं।
- 28:09तेरे रूप का रस। पीने के लिए पीने।
- 28:18के लिए सागर भी तरसते रहते हैं। तेरे रूप का रस।
- 28:33पीने के लिए पीने। के लिए जीवन से भरी तेरी।
- 28:48आँखें वहाँ जीवन का रस है और जीवन का रस तुम्हें खैचने को लालाई है,
- 29:02तुम गुजरते हो वहाँ से रोड्स। बेंडुलम दायें जाता बाएं जाता
- 29:10यहाँ से गुजर के जाता लेकिन वह तुम्हें खींचता है, वह तुम्हें
- 29:21खींचेगा जब तुम खींचने के लिए पूर्ण तैयारी दिखाओगे।
- 29:30और खींचने की बुरी तैयारी तब होती है जब तुम एम् नमद्य बिंदु वे
- 29:37स्थिर हो के ठहर जाओगे। फिर वह चेतना का पुंज।
- 29:47समझ जाएगा कि यह खींचने के लिए ऐसे तो तुम रोज़ गुजरते हो, लेकिन
- 29:58रहता है ना सानी बड़ा अहिंसक है, बड़ा प्यारा है।
- 30:10तुम जब बिल्कुल तैयार होगे, पके फल की तरह बिल्कुल तैयार होगे।
- 30:20पके फल की तरह तो धरती उस फल को अपनी तरफ खींच लेती है।
- 30:26बस पक गया है। इससे ज्यादा मीठा हो ही नहीं सकता
- 30:31तो धरती अपनी तरफ ग्रैविटेशनल फोर्स से उस पके हुए फल को सेम
- 30:37खींच लेती है। ऐसे ही हो जीवन का रस।
- 30:45जीसको पीने के लिए सारी दुनिया लालायित है और यह दुनिया लालायित
- 30:52है लेकिन मार्ग गलत है। रास्ता बताने वाला कोई उपाय नहीं
- 30:58है। कौन नहीं चाहता उस रूप का रस पीना
- 31:07का? चाहते सभी लेकिन यह मन भटका देता
- 31:19है, मार्गदर्शक भटका देते हैं, वो तुम्हें दौड़ाते हैं।
- 31:26यही मैं रोज़ समझाता हूँ, दौड़ो मत दौड़ो मत वो चाहे नाम का जप
- 31:37हो, वो भी दौड़ोगे ठहरोगे वो चाहे भजन का भागना हो, वो भी दौड़ है।
- 31:47धन पदार्थ की दौड़ तो दौड़ है जैसे ही तुमने दौड़ को अलविदा
- 31:59कहा, ठहराव में आए और ठहराव से परम ठहराव में आए।
- 32:07तुम बिल्कुल वर्तमान के उस क्षण को छू लिए जहाँ सिर्फ एक पल ही
- 32:14बचता है। आके भी।
- 32:22जाने ना तो। पीछे भी जाने ना तो जो भी है बस
- 32:41यही एक फल है। जो भी है बस यही एक फल है आगे भी
- 33:00इस रस को पीना सभी चाहते हैं। लेकिन पी कौन पाता है जो बेंडुरम
- 33:12की तरह इधर उधर भटकना बंद हो जाता है।
- 33:21सागर भी तरसते। रहते हैं सागर भीतर के रहते हैं।
- 33:42तेरा रूप का रस। पीने के लिए पीने के लिए।
- 33:56जीवन से भरे। तेरी।
- 34:02आँखें जिन्होंने ऊंचे ऊंचे मकान छुर गया, हजारों मंजिलें ऊंची
- 34:17सेकड़ों। मंजलों से युक्त बुर्ज खलीफा क्या
- 34:22आसमान की अतल ऊंचाइयों को छुपा है?
- 34:28सागर भीतर से रहते हैं तेरे रूप करस।
- 34:39पिने के लिए पिने के लिए। जीवन से भरी तेरी ही आँखें।
- 34:57मजबूर करें। जीने के लिए जीने के लिए।
- 35:07अगर तुम्हें जीने की इच्छा है, तो सिर्फ इसलिए।
- 35:14कि तुम जब पेंडुलम की तरह इधर उधर दायें बाएं घूमते हो तो तुम एक पल
- 35:19के लिए उस वर्तमान के क्षण में से हो के गुजरते हो, और इतना सा वहाँ
- 35:27से गुजर जाना ही तुम्हें जीवन के लिए जीने की इच्छा को।
- 35:34मजबूत कर देता है। यही उस रस के ऊपर से गुजर जाना।
- 35:44तुम दायें जाओ या बाएं जाओ हर बार वह तो आता ही है राम में।
- 35:52और दो बार तुम उसका स्वाद चखते ही हो, लेकिन रस्ता चुक जाते हो, कुछ
- 36:04पानी की इच्छा भी तो हो, शब्दों को ठीक से समझना कुछ पानी की
- 36:12इच्छा भी। ठहराव ने दौड़ है कुछ खोने की
- 36:21इच्छा भी दौड़ है ठहराव ने दौड़ है तुम्हारी बुद्धि।
- 36:33दुविधा में आ जाए। मैं कहता हूँ परिपूर्ण रूप से ठहर
- 36:41जाओ, तुम इस दौड़ से बाहर हो जाओ, दर्शक की तरह मूक बैठे हुए हैं।
- 36:54इस मैराथन की दौड़ में सम्मिलित लोगों को देखो और तुम पाओगे तुम
- 37:01परिपूर्ण रूप से ठहर गए, यह जो तुम मरते नहीं।
- 37:13यह जो तुम कहते हो कि आशा का कोई तन दिखाई पड़ता है, धूप और छांव
- 37:21का खेल है, वह 1 दिन आएगा वो इसी क्षण से आती है।
- 37:30जिज्ञासा आशा की। क्योंकि तुम दायें जाओ, तुम बाएं
- 37:35जाओ, दो बार तो उसको क्रॉस करते ही हो, जिसके पास से गुज़रने से
- 37:43वह सुगंधी तुम्हारे नासा पुटों में घर कर लेती है और तुम्हारे
- 37:48हृदय के भीतर उतर जाती है। बस यही तुम्हें जीने के लिए मजबूर
- 37:53करता है इसी के कारण तुम जीते हो अन्यथा जीने के लिए संसार में कुछ
- 38:07भी नहीं तुम इस धरती पे आये तुम इस खुशबू को पी न सके।
- 38:20उस रस को चख न सके तो परमात्मा तुम्हें अनुत्तीर्ण कर देता है।
- 38:33तुम उत्तीर्ण नहीं हुए और फिर फिर से भेज देता है जाओ।
- 38:38एक बार फिर जाओ, उसी पाठशाला में यह संसार एक पाठशाला और तब तक तुम
- 38:46इस संसार में आते रहोगे जाते रहोगे जब तक तुम इस केंद्र बिंदु
- 38:54पर मध्य में नहीं ठहरोगे। परमात्मा होने की इच्छा भी इच्छा
- 39:02है। चरणों के दास होने की इच्छा भी
- 39:10इच्छा है। तुम पांव की जूती बनना चाहो या
- 39:16सिर का मोर मुक्त? कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 39:21दोनों इच्छाएं हैं। मैं बात करता हूँ तीसरी चीज़ की
- 39:28जहाँ जाकर व्यक्ति इच्छा विहीन हो जाता है जहाँ जाकर जीने की इच्छा
- 39:36भी नहीं रहती। जी वैष्ण भी खत्म हो जाते हैं।
- 39:42सुन मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाए सुन मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाए
- 39:51ऐसे दीनानाथ को किस वध कहूँ, बकाए शब्दों की व्याख्या में तो नहीं
- 39:56बा सकेगा। मेरे शब्दों के साथ लिपट तेबड़ के
- 40:01भीतर से वो आएगा काश तुम इसको पी लो, काश तुम इस रस की भूत को अपने
- 40:12भीतर संग्रहित कर लो। यह मरती नहीं बूंद, जो तुमने एक
- 40:22बार अपने श्रवनियंत्रों से अपने भीतर उतारे या तुम्हारे भीतर किसी
- 40:29खजाने में इकट्ठी होती जाती है। इसलिए संतों ने कहा सत्संग सुनते
- 40:35रहना। एक एक बूंद करके गड़ा भर ही जाया
- 40:42करता है और 1 दिन भर ही और कुछ न कर सको।
- 40:50ठहर न सको तो मात्र श्रवण ही कर लेना।
- 40:57सुनिए दुःख पाप का नाश इस कल कल करते अनहद नाल के स्वर को प्यार
- 41:16भरी नजरों से सुनते ही रहो है रानी की बात।
- 41:25है कि तुम्हें मौन करने के लिए हमें बोलना पड़ता है और हमें
- 41:39बोलना आनंदपत्र लगता है क्योंकि हम उस अमृत की व्याख्यान।
- 41:49कर तो नहीं हो सकते। व्याख्यान करते करते तुम्हें उसकी
- 41:57याद जब आ जाती है तो तुम्हारे लटके हुए चेहरे की खुशी के आलम
- 42:02में झूमने लग जाते हैं। नाचने लग जाते हैं पांव तुम्हारे।
- 42:09एड़ियाँ थिरक थिरक जाती हैं। पांव के झोंझर बच जाते हैं,
- 42:18घुंघरू खनकने लगते हैं तो हमें तसल्ली होती है।
- 42:31कि हाँ, इसने सही रास्ता पा लिया, मैं बोला तो बहुत तुम्हें ठहराने
- 42:44के लिए तुम्हें ठहराने के लिए मेरे स्वरों में उस आनंद की
- 42:56खुशबू। और लपटे झपट के आई हुई उस आनंद के
- 43:03सागर के माहक तुमने बहुत बार पी होगी।
- 43:12छः वर्ष हो गए। मैं उसी सुराही से तुम्हें चला
- 43:17रहा हूँ, कुछ ठहर गए, कुछ ठहरने वाले हैं, कुछ कूद गए, कुछ कूदने
- 43:35को तैयार हैं। इस दुनिया में सदा नहीं रहना होता
- 43:43है। जय मूडों की दुनिया यह दुनिया
- 43:57नहीं। जागी किसी की?
- 44:06ये दुनिया ने। जागीर किसी के।
- 44:17ये दुनिया ने। जागीर किसी के।
- 44:28राजा होया रंक यहाँ पर सब है चौकीदार राजा होया रंक यहाँ पर सब
- 44:41है चौकीदार। कुछ तो आकर चले गए कुछ जाने को
- 44:49तैयार। खबरदार खबरदार ये दुनिया ने।
- 44:59जागी किसी की? ये दुनिया ने।
- 45:06जागीर की से। राजा हो यह रंक यहाँ पर सब है
- 45:13चौकीदार कुछ तो आकर चले गए कुछ जाने को तैयार।
- 45:22खबरदार खबरदार खबरदार खबरदार यह दुनिया में।
- 45:35जागीर किसी की। फिर अगर यहाँ पर आए हैं तो मंतव्य
- 45:49क्या है? बहुत से जानने वालों ने बताया है।
- 46:01कि तुम यहाँ क्यों आये हो, लेकिन ध्यान रखना।
- 46:08उन्होंने बुद्धि के तर्कों से बताया एक सत्य संत भी बताया करता
- 46:17है। सत्य जो संत बताता है वह वो ही है
- 46:30जो मैंने तुम्हें पहले बताया तुम जन्मो जन्मो से दूर रहे हो।
- 46:38मैराथन की दौड़ बड़ी लंबी खिंच गई।
- 46:48अमर तो न मिला ज़िन्दगी फिसल गई जीस दिन तुम इस दौड़ से बाहर निकल
- 47:02जाओगे। उस दिन तुम परिपूर्ण रूप से ठहर
- 47:07जाओ तो मैं तुम्हें तुम्हारे आने का मंतव्य बता दूँ।
- 47:22फॉर कंप्लीट रिस्क तुम कहोगे ये तो लेजीनेस है नहीं।
- 47:32मेरे शब्दों को ध्यान से सुन फार कंप्लीट रेस्ट परिपूर्ण आराम करने
- 47:46के लिए आए। वैसे एक तो निद्रा होती है, रात
- 47:52को सोते हो तुम रोज़ सुबह उठ जाते हो, एक तो निद्रा होती है, एक चिर
- 48:06निद्रा होती है और तुम कब्रगाह में चिर निद्रा में समा जाते हो।
- 48:17निद्रा में मधुर बिछनों के ऊपर सोते हो सुबह जाग जाते हो चेर
- 48:23निद्रा में, तुम माटी की रेती ली, कब्रगाह में रेत के भीतर दफन सोए
- 48:31रहते हो, सदा के लिए सो जाते हो। ऐसे ही एक तो आराम है जिसे तुम
- 48:51रेस्ट करते हो। मैंने शब्द पर्व किया परिपूर्ण
- 48:57आराम, आराम कर करके तो तुम। फ्रेश में जब होगे तो उठ जाओ फिर
- 49:07अपना काम धंधा शुरू कर दो, मैंने तुम्हें कहा कम पलूट रेस्ट ऐसा
- 49:16आराम जहाँ से तुम फिर कभी न उठो। एक शून्य होता है उसको उसके तो
- 49:34साथ बढ़कर तुम वापस आ जाते हो एनर्जीफुलनेस में और एक शून्य के
- 49:42भीतर ही लीन हो जाते हो, लीन हो जाते हो, मर्ज हो जाते हो, विलय
- 49:48हो जाती हो। फिर तुम बाहर ऐसी स्थिति को पीने
- 49:58के लिए तुम्हारे सारे प्राण आतुर हैं जन्मो जन्मो से, लेकिन यह
- 50:05दौड़ तुम्हें वहाँ पहुंचने नहीं देते।
- 50:12परवाह से रोज़ गुजरते हो जब तुम दौड़ते हो, एण्डूलम की तरह दायें
- 50:16बाएं तुम्हारा लक्ष्य है यह दायें बाएं जाते हुए एक पल के लिए तुम।
- 50:31जब उस कंप्लीट रेस्ट के तत्व से गुजरे थे तो तुम्हें जीने की
- 50:37तमन्ना उठी थी? वह तुम्हें खींचता ही रहता है और
- 50:43जब तक तुम परिपूर्ण उसमें खींचे नहीं जाओगे, मर्ज नहीं हो जाओगे,
- 50:49एकाकार नहीं होगे। बूंद समान्य समंद में ऐसी स्थिति
- 50:54नहीं बनेगी। तब तक तुम दाएं बाएं घूमते ही
- 50:57रहो, बस यही तुम्हारा पर्पस है, भटकना हो तो खोपड़ीधारी।
- 51:15सर लोगों के पास चले जाओ भटकना देखिए तुम स्वतंत्र हो भटकने के
- 51:26लिए और तुम स्वतंत्र हो ठहरने के लिए ठहरना हो।
- 51:35तो कम परिट रेस्ट और अगर फ्यूल को भराना हो तो फिर पेट्रोल पंप पर
- 51:46थोड़ी देर के लिए रेस्ट तुम्हारी निद्रा पेट्रोल पंप के रेस्ट जैसी
- 51:51है। और तुम्हारी संभोधि तुम्हारी
- 51:56समाधि चिरनित्रा की तरह वो परम ठहराव हैं वह तुम्हें कोई जगाना
- 52:09भी चाहे तो तुम जागते। लेकिन ये दोनों अवस्थाएं शरीर की
- 52:16हैं। मैं मजबूर हूँ शरीर के उदाहरण दे
- 52:26देकर ही तुम्हें समझा सकता हूँ वो ही मैं कर रहा हूँ, लेकिन मेरा
- 52:32इशारा बड़ा दूर का है। मैं तुम्हें ठहरने की बात करता
- 52:41हूँ तो वह जो भीतर तुम्हें तुम्हारे भीतर जो आग लगी है विराह
- 52:54उसमें मरने की तकलीफ तो आएगी जलन तो होगी यह जो जन्मो जन्मो से,
- 53:01तुमने। अहंकार इकट्ठा किया।
- 53:05ईगो यह जलेगा बसु में होगा, इसकी राख भी न बचेगी।
- 53:11शरीर की राख तो बच जाती है लेकिन इससे ईगो की तो राख भी न बचेगी,
- 53:17क्योंकि यह तो मात्र कल्पना है। यह है नहीं
- 53:33सर लोगों के पास चले जाना, वो शरीर की बात बताएंगे, मेरे शब्दों
- 53:39को तुम आचार्यों से व्याख्यायित मत करवाना, कभी भी मैं चला
- 53:45जाऊंगा। व्याख्यायित आचार्य न कर सकेंगे।
- 53:52ये उनके बस की बात है। ये कोई अष्टावक्र, कोई कृष्ण, कोई
- 54:01दादू, कोई नान, कोई पलटू ही इस उलझी हुई पहेली को हल कर।
- 54:14तो मरण मुकाम रो जाता है, लेकिन क्षण भर के लिए तुम वहाँ से गुजर
- 54:21जाते हो, पर मैं तुम्हें वहाँ क्षण भर के लिए जहाँ तुम्हें जीने
- 54:29की तमन्ना पैदा होती है। उस क्षण भर के क्षण में उतर जाने
- 54:36को प्रेरित करता हूँ। प्रेम में ऐसा ही होता है।
- 54:52तुम परिपूर्ण रूप से ठहरों कंप्लीट्ली रेस्ट टोटली रेस्ट।
- 55:02और इसका आगाज करना होगा। शरीर के ऐसे योग निद्रा में जाओ।
- 55:09योग निद्रा से आकर फिर निद्रा के भीतर गहरे ठहराव में उतर जाओ शब्द
- 55:17तो ऐसे ही बोलने पड़ेंगे मजबूर होना।
- 55:21लेकिन उस निःशब्द की तरफ इशारा जो मैं कर रहा हूँ, उसकी तरफ आँखें
- 55:29उठा के देखने की चेष्टा करो, फिर तुम को ऐसा रसीला आनंद का रस
- 55:40किओगे। जीसको सागर भी तरसते हैं जीवन से
- 55:50वरी। तेरी आँखें।
- 56:00मजबूर करें जीने के लिए भी जीने के लिए।
- 56:15साग भी तरसते। रहते हैं तेरा रूप का रस।
- 56:27पीने के लिए यह पीने के लिए। सागर।
- 56:39भी तरसते रहते हैं। तेरे रूप करस।
- 56:49पीने के लिए पीने के लिए। जी वन से भरी तेरी आँखें मजबूर।
- 57:09करें करें जीने के लिए। जीने के लिए।
- 57:23सागर भी तरह से रहते हैं तेरे रोग का रस।
- 57:35पीने के लिए। जीवन से भरी तेरी आँखें।
- 57:55धन्यवाद।