Latest / Baba ji Vijay Vats / 7 Jul 25 - अगर स्त्री मोक्ष नहीं पा सकती तो आप दीक्षा क्यों देते हो? चेतना और शरीर की व्याख्या!
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- 0:14प्रणाम बाबा। जी।
- 0:22जैन धर्म के अनुसार स्त्रियों को मोक्ष नहीं मिल सकता।
- 0:28लेकिन मुझे इस बात की कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 0:33कि मैं एक स्त्री हूँ, मुझे बस इतना विश्वास है कि आपने हमें
- 0:41दीक्षित किया, हम मुक्त ही हैं। आपकी सारी वीडियो सुनते हुए अक्सर
- 0:50सो जाती हूँ। गुड़गांव से कुछ स्त्रियों के
- 1:07कपड़े पहनने से स्त्री नहीं हो जाता।
- 1:13और कोई स्त्री पुरुषों के कपड़े पहनने से पुरुष नहीं हो जाती।
- 1:21शायद मेरे दिए गए प्रवचन का ठीक से असर नहीं होगा।
- 1:30यह बड़ा सुनर नहीं गिरा। जैन धर्म कहता है स्त्रियों को
- 1:44मोक्ष नहीं मिलता, मैंने एक बहुत लंबा पर्वचन इसके बारे में दिया
- 1:53था। उसका सार्थ तो यही था कि कपड़ों
- 2:00को स्वयं मत समझो। यही अक्सर शिष्यगण मूर्ता करते
- 2:09हैं। यही कारण था।
- 2:17कि कहा गया ऋषियों के द्वारा जागृत संत के पास पहुँच जाना, वो
- 2:24तुम्हें उलझायेगा नहीं अन्यथा हजारों लाखों लाखों उलझने
- 2:31मान्यताएँ उन लोगों के द्वारा दे दी जाएंगी।
- 2:39जो खुद नहीं पहुंचे वो तुम्हें पहुंचने भी नहीं देंगे।
- 2:45हम तो डूबे हैं सनम आपको के लिए डूबेंगे।
- 2:56कोई स्त्रियों के कपड़े पहनने से स्त्री हो जाता है, नहीं होता और
- 3:08ये शरीर हमारे कपड़े। कृष्ण कहते हैं वासांक्षी घृणानि
- 3:17यथा विहाय नवानि घृणा ति नरोपराणि।
- 3:23तथा श्री रानी विहाय जीणा अनन्याणी संयाति नवानि दे।
- 3:31यह वस्त्र कट फट जाते हैं, गल जाते हैं, येरन से रंग हो जाते
- 3:35हैं तो प्रकृति तुम्हें नया शरीर दे देती है, कपड़े पर देती है
- 3:42तुम्हारे बात चिपका तुम की है पुत्री।
- 3:50मैं बार बार बोलेंगे, तुम समझो या ना समझो, मेरे बैठे बैठे समझो या
- 3:58मेरे जाने की बात समझो। हर थोपी हुई मान्यता को तोड़
- 4:07जाऊंगा। अभी सुन लो या बाद में सुन लो,
- 4:12कोई फर्क नहीं पड़ता। स्त्रियों के कपड़े पहने हैं
- 4:19तुमने, तुम स्त्री नहीं हो। तुमने बेटी प्रश्न पूछा जैन धर्म
- 4:33के अनुसार स्त्री मोक्ष को प्राप्त नहीं होती, लेकिन हमें
- 4:41विश्वास है कि हम दीक्षित हैं बाबा के द्वारा बिलकुल।
- 4:52जब कोई दीक्षा लेने आता वह किसी भी चक्र पर बैठा मैं उसको
- 4:59विशुद्धि चक्र पर ले आता हूँ और विशुद्धि चक्र के बाद आपको कुछ
- 5:06नहीं करना होता। यार नथ्थिंग टु डू सब जो करता है
- 5:14वह होता है परमात्मा के द्वारा, प्रकृति के द्वारा यही तो
- 5:26तुम्हारी भ्रांति है कि मैं एक स्त्री हूँ, यही मैंने तोड़नी है।
- 5:35मैं शरीर हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं ट्रांसजेंडर
- 5:46हूँ, ये सब हमारी मान्यताएँ हैं, बेटे।
- 5:59और मैंने जो इसके ऊपर प्रवचन डाला था वो जीत डाला था के महावीर को
- 6:08जानते हैं। स्त्री भी पहुँच सकती है अन्यथा
- 6:13दीक्षित क्यों करते हैं? बुद्ध भी जानते हैं।
- 6:21कृष्ण भी जानते हैं। कृष्ण अच्छे से जानते हैं, वे तो
- 6:28राजबीर चाहते हैं। गोपियों के साथ, लेकिन आज के गुरु
- 6:36रास रचानी योग क्षमता रखते हैं कि नहीं रास रचानी के नाम पे
- 6:49उन्होंने गुफाएं बना लीं। और न जाने तुम में कितनी मूर्ताएं
- 6:57कूट कूट के भरी पड़ी है कि तुम उनका दाम नहीं छोड़ते।
- 7:09कृष्ण रास रह जाती थी, तुने बाहर से देख लिया।
- 7:17कृष्ण भीतर से क्या थे ये तुम जानते हो?
- 7:21यहीं आकर द्वंद खड़ा होता है। तुम कृष्ण की भारी कृत्यों को
- 7:30अनुकरण कर लेते हो और कृष्ण बनने की चेष्टा करते हो।
- 7:36उस स्थल पर तुम कृष्ण होते नहीं, यहीं से फैलते हैं अण्डबरता यहाँ
- 7:50से फैलते हैं कुशंस्कार। कृष्ण उस गहरे तल पे बैठे हैं
- 8:00जहाँ वो मात्र सुपरकन्शन्स है, परम चेतन है, कृष्ण शरीर है।
- 8:13कृष्ण का शरीर कृष्ण का वस्त्र है, उसके वस्त्र रास्र जाते हैं,
- 8:24कृष्ण तो सदा ही रास्र जाते रहते हैं, उसकी तो बात ही मत करो।
- 8:34जो एक बार उस अनंत के क्षेत्र के साथ एकाकार हो जाता है।
- 8:47बहना स्त्री रहता है न पुरुष रहता है।
- 8:52वह कपड़े नहीं रहता, वह विचार नहीं रहता, संस्कार नहीं रहता,
- 9:01उसकी कोई आदत नहीं है, उसका कोई आकार नहीं है।
- 9:11यद्यपि शरीर का आकार है, वस्त्रों का भी आकार होता है, लेकिन तुम जो
- 9:19वास्तव में हो पुत्री पूरे शरीर से पार।
- 9:30तो मैं उन मूर्खों की मूर्खता को उजागर कर रहा था।
- 9:37वो प्रश्न जैन धर्म की किसी साधिका ने पूछा था?
- 9:41दिगंबर जैन अगर महावीर होते तो दिगंबर और श्वेताम्बर दो संप्रदाय
- 9:52बन जाते हैं। नहीं बनते थे और दो नहीं 20
- 9:58संप्रदाय बनें जिनका आपको पता भी है।
- 10:00ये सब घटनाएं घटती हैं बायफरकेशन की मल्टीफ्लिकेशन की।
- 10:10जब संत चला जाता है उसके होते होते यह सब कुछ नहीं होता, वो
- 10:17होने नहीं देता। अभी दीपक जिंदा है, जल रहा है
- 10:26उसकी रौशनी कहीं गई नहीं। उसका दिया टूटा नहीं और सलामत
- 10:40पहली बात तो ये समझ लेना मैंने दिगंबरों की श्वेतांबरों की इस
- 10:48मान्यता को समाप्त किया। कि वो शरीर है, वो मन है, मैंने
- 10:59देखे जैन धर्म के लोग अभी पढ़ रहे हैं।
- 11:02बहुत से धर्मो के लोग अभी पढ़ रहे हैं।
- 11:05ये बीके के अंदर पीएचडी की डिग्री थी।
- 11:11इनका जोड़ना अभी छूटा नहीं। तुम झड़ तुम धन जोड़तें हो या
- 11:19डिग्री जोड़तें हो। ये सलमान जोड़तें हैं।
- 11:26कोई इनके पांव के हाथ लगा दे, कोई इनकी प्रेस कर दे, कोई प्रशंसा कर
- 11:30दे, श्रेय दे दे कहीं कुछ कमी रह गई है जो इनको भटकने पे भागने पे
- 11:48वी वश रखते हैं। और मैं बिल्कुल उल्टी बात कहता
- 11:56हूँ। वो प्रश्न किसी शादी का का द्वारा
- 11:58था और दिगम्बर साधिका का द्वारा था मन ही मन में वो पुलिस रहे थे
- 12:05तो मैंने सारा विज्ञान समझाया। अगर तुम छोड़ना नहीं चाहती तो भी
- 12:17जीवंत गुरु इतना डिक्टेटर नहीं होता कि तुम्हें कहे कि छोड़ दो,
- 12:22ठीक है, अपना ही रखो, फिर मैंने विधि भी बता दिया कि तुम बाया
- 12:27करो, मौसम के सनित में रहो। वह अपने अपने उपाय हैं, लेकिन वह
- 12:33तुम्हारे लिए नहीं है। तुम्हारा रसता दिगंबर जैन का
- 12:41रास्ता नहीं है। जैन जो कहते हैं, उनसे जैन ही
- 12:45निपटेंगे। वह अपनी समस्याएं लेकर आते हैं।
- 12:50मैं उनका निवारण कर देता हूँ लेकिन तुम्हारी समस्या वो नहीं
- 12:55है। तुमने जैन धर्म की इन बातों को न
- 12:58जाने कब अपनी सूचनाओं का हिस्सा बना लिया।
- 13:09मेरे इस बात को ध्यान में रखना स्त्रियों के कपड़े पहनने से कोई
- 13:14स्त्री नहीं हो जाता। पुरुषों के कपड़े पहनने से कोई
- 13:18पुरुष नहीं हो सकता, जो उस असीम विस्तार के साथ एकाकार हो जाता
- 13:24है। एक एक शब्द को ध्यान से समझना।
- 13:29उसके लिए सारे भेद मच जाते हैं। भेद स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर
- 13:37सुख, दुख, सुख, प्रसन्नता, रोग। सवस्थ सब असमानताएँ हैं, सच पूछो
- 13:55तो विपरीतताएँ अस्मानता ही नहीं है विपरीत चीजें है कोई महा गरीब
- 14:01है, कोई महा अमीर है। मैं बोलेंगे इस असमानता को खत्म
- 14:10कर दो ताकि प्रत्येक व्यक्ति बहो के घर जान सके के भोगों में कुछ
- 14:15नहीं। इसलिए कहूंगा मैं इसलिए नहीं
- 14:20बोलूँगा। कि सबको धन बराबर बांट दो के सभी
- 14:27भोगें और भोग में कुछ है नहीं। मैं इसलिए कहूंगा धन में धन को
- 14:33बांट दो के सभी भोग को भोगें और जान सकें कि भोग में कुछ नहीं है।
- 14:47लेकिन तुम किसी भी बात को पकड़ सकते हो, इसलिए किसी गहरे क्षणों
- 14:56में जीस बात के साथ तुम चिपट गए वो तुम्हारे गहरे जहन में उतर गई।
- 15:06वो तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ते फिर कब से तुम मान रही हो कि मैं
- 15:12स्त्री हूँ यह मान्यता ही तुम्हारे लिए ज़ंगीर बन गया आज के
- 15:22धर्मों का मंतव्य। सत्य को बताना नहीं बताएंगे कि
- 15:29कैसे जब जानते हैं लेकिन जागृत पुरुष का काम जो उसने जान लिया।
- 15:43और उस जानने से जो उसकी जंजीरें टूटी, जो वह बंधा हुआ महसूस कर
- 15:52रहा था, अब आजाद खेल रहा है, मैं तुम्हें भी बताता है सत्य क्या
- 16:00है। बहुत से लोग मुझे कह देते हैं हम
- 16:06बंधे हुए हैं, बाबा मुक्त होना चाहते हैं, मैं यही कहता हूँ कि
- 16:14तुम बंधे हुए तो नहीं हो, जैसे तुमने कहा कि तुम स्त्री तो नहीं
- 16:20हो। तुम स्त्री के शरीर से पार कुछ
- 16:27ऐसा चेतन तत्व हो जिसके कारण तुम्हारा ये स्त्री का शरीर जीवत
- 16:32है अगर वह चेतनता निकल जाए, जोकि आखिर में निकल ही जाती है।
- 16:40तो फिर ये शरीर इस थ्री का कोई काम नहीं करेगा।
- 16:48कौन था भीतर तुम्हारे, जिसके रहने से तुम्हें ये एहसास होता है
- 16:56तुम्हें? और कौन है जो निकल गया और निकल
- 17:03जाने के बाद एहसास नहीं होता कि मैं स्त्री हूँ या मैं पुरुष हूँ,
- 17:09मैं कौन हूँ कुछ पता नहीं और यह भ्रम जीते जी तो रहता ही है।
- 17:19जो मुझे सूक्ष्म आत्माएं कितनी सुन रहे हैं?
- 17:22इनमें बहुत सी स्त्रियाँ हैं, बहुत सी पुरुष हैं लेकिन मान्यता
- 17:26है ना ये स्त्री हैं ना ये पुरुष, इनका देय ही जो शरीर को छोड़ते
- 17:34वक्त के साथ चला गया। वो मान्यताएँ हैं।
- 17:38इनकी कि मैं स्त्री हूँ और मान्यताएँ हैं।
- 17:42इनकी कि मैं पुरुष हूँ तो ये अभी भी अपने आप को स्त्री समझते हैं।
- 17:52अभी भी अपने आप को पुरुष समझते हैं।
- 17:54यद्यपि मुझे सुन रहे हैं। और जब इन्हें पता चल गया कि मैं
- 18:02स्त्री और पुरुष के पार एक चेतन तत्व हूँ जो इस शरीर में ही बैठा
- 18:11था या बैठी थी। इस शरीर से निकलने के बाद यह शरीर
- 18:17जड़ जड़ था। जड़ ही हो जाता है।
- 18:21अब ये शरीर काम नहीं करता, जिसके कारण यह चेतन था।
- 18:27वह चेतना गई, लेकिन भ्रम न रहा। एक कहावत सुनी, रस्सी जल गई मगर
- 18:37बल ना गया तुम देखना, रस्सी को जलाकर देखना, उसको छेड़छाड़ मत
- 18:43करना, देखना उसके बल वैसे ही हो गए।
- 18:47जली हुई रस्सी के बल वैसे ही हो गए, यद् भी जल गए।
- 18:55ऐसे ही शरीर मुर्दा हो गया जैसे ये स्त्री समझते थे कि मैं स्त्री
- 19:03हूँ, मैं पुरुष हूँ, वह जल गया लेकिन ये जो बाहर निकल के आये।
- 19:10ये संस्कार साथ लेके आया वो संस्कार मान्यताएँ होती है और वो
- 19:15झूठी होती है। रस्सी जल गई, बल नहीं गया, अब कभी
- 19:25रस्सी को जला कर देखना ये रस्सा होता है ना जो पशुओं के बांटी।
- 19:31और उसे थोड़ा सा काट लेना और जलाना रस्सी जल जाएगी।
- 19:37सारी उसके भीतर के बल बिलकुल साफ दिखेंगे।
- 19:40तुम्हें जल जाने के बाद भी इन्हें ही संस्कार कहते हैं।
- 19:53महावीर कभी नहीं चाहते कि मैं भ्रम फैलाऊं महावीर ब्रह्मों को
- 20:00तोड़ना चाहते हैं। कहाँ लिखा महावीर के स्त्री नहीं
- 20:08पहुँच सकते कहाँ कहाँ? ऐसा कुछ भी तो नहीं बस महावीर की
- 20:19दुकानदारी नहीं दिगम्बरों की श्वेताम्बरों की और अन्य अन्य जो
- 20:26शाखाएं हैं उनकी दुकानदारी। इसलिए संतों ने ठीक कहा, जागृत
- 20:37व्यक्ति को पहचान लेना और जागृत व्यक्ति की पहचान है, जिसे तुम
- 20:44डरते हो। बहुत से लोग मुझे कमेंट करके गाली
- 20:48भी निकालते थे। फिर मैं कहता हूँ भाई मुझे तो
- 20:54गाली नहीं आई हूँ, मैं तो गाली जीसको निकाली से अछूता भीतर बैठा
- 21:00आनंद मग्न तुम्हारी गाली मेरे तक कहाँ पहुंचेगी, जहाँ तक शस्त्र
- 21:06नहीं पहुंचता। नय न मुख्यधंती शस्त्र में जहाँ
- 21:11तक आग नहीं पहुंचती नय नंदाहती पांव का जहाँ पानी की बाड़ नहीं
- 21:18पहुंचती न चैनम प्ले जहाँ पर कोई तूफान नहीं पहुंचता, न सोचती
- 21:26मारू। तो तुम्हारी गाली कैसे पहुँच
- 21:30जाएगी? मेरे ऊपर मैं तुम्हारे इन सभी
- 21:35निंदा सुतियों से पार हूँ मैं बहुत सोती हूँ जीसको गाली निकाली
- 21:46वो मैंने। इसलिए शांत पुरुष गुस्सा नहीं
- 21:51करता है। जो जानता है वह गुस्सा नहीं करता।
- 21:57जो नहीं जानता वो हाथापाई करेगा, भीड़ पड़ेगा आपके साथ फिर कुश्ती
- 22:03होगी, महिलाओं की झगड़ा होगा। कोर्ट के चैरिक स्थानीय होंगे।
- 22:09एक छोटी सी बात जो सत्य नहीं है उसको तुमने सत्य मान लिया, उसके
- 22:16लिए तुम झगड़े करोगे कतल गारथ भी हो जाएगी और सारी जिंदगी तुम छोटी
- 22:21सी बात के लिए जो झूठ थी उसके लिए बर्बाद कर ली।
- 22:25जेलों में बंद हो जाओगे, यातनाएं गुप्त होगे।
- 22:30बस यही भ्रमों के कारण तो मुझे हो गया और भ्रम चाहे ये हो कि तुमको
- 22:37किसी ने गाली में तुम्हारे ऊपर किसी ने थूक दिया।
- 22:42कोई भी भ्रम हो सकता है। जागृत पुरुष व्यापार नहीं करता है
- 22:51यहाँ इसको जागृत पुरुष काम करता है, व्यापार नहीं करता।
- 23:03व्यापार करेगा उसका शिष्य आज किसी भी धर्म में देख लो, सभी धर्मों
- 23:09में ऐसा ही कुछ हो रहा है जो बातें कभी शास्त्रों में लिख कर
- 23:18गए ज्ञान। लोभ के कारण उसका दुरुपयोग हो रहा
- 23:25है। कुंभ में लोग मर रहे हैं जहाँ
- 23:35व्यवस्था की बात नहीं है, ज़रा भी बात नहीं है।
- 23:38व्यवस्था की व्यवस्था नहीं थी। होर्स थोड़ी थी, स्वयंसेवक कम थे,
- 23:53ऐसा कुछ नहीं है। असल बात है तुम्हारी मानें तो गलत
- 23:59है। तुम तीर्थों पे स्नान ही क्यों
- 24:05करने जाते हो? इसका मूल कारण तुमने समझाना जो
- 24:14पाप करता है वह कुंभ श्रम करता है बस सीधा सा।
- 24:20इसलिए अब के 50,00,00,000 पहुंचे आने वाले वक्त में 100,00,00,000
- 24:25पहुंचेगा क्योंकि 100,00,00,000 व्यक्तियों को अहसास होगा कि हम
- 24:30पाप करते हैं और जब कोई व्यक्ति पाप करता है।
- 24:36उसका मन प्रायश्चित से भर जाता है।
- 24:41उसका मन मैंने पाप क्यों किया? दुखी होता है रातों को जागता है
- 24:51तुम निश्चय लोग ही है पाप भी कर दिया।
- 24:59तो नए भोग ना पड़े इसके लिए सस्ते साधन ढूंढता है।
- 25:06मन का यह स्वभाव है और सस्ता साधन क्या है?
- 25:15गंगा में डुबकी लगा लो, संगम में डुबकी लगा लो।
- 25:21यह सस्ते साधन है, थोड़ा सा पीसा लगेगा जाना है बस लेकिन ये
- 25:29प्रखंडी बड़े होशियार। हमने देखी है जन्नत की हकीकत लिख
- 25:38दिल के बहलाने को गालिब या ख्याल अच्छा है।
- 25:47मैं एस्ट्रोलॉजी को नहीं चुका रहा।
- 25:50वो तो हैं डिफरेंट बृहस्पति के शुक्र के क्षमा करना बृहस्पति के
- 25:58सूर्य के और चंद्र के किसी विशेष स्थान पर पहुँच जाने से हमें लगता
- 26:05है किसी विशेष स्थान पर। लेकिन ध्यान रखना वो आपको मुक्ति
- 26:11प्रदान नहीं करता, मुक्ति के लिए सुविधा प्रदान करता है बिशर्ते की
- 26:17तुम्हारे अंदर आग भी जली हो, आग जली नहीं तुम स्नान करने चल पड़े,
- 26:28आग जल जाती। तो कुंभ में स्नान करने की
- 26:31आवश्यकता भी कहाँ थी? फिर तो यहीं बजे जाते क्योंकि
- 26:36बजाने वाला तुम्हारे बेहतर ही तो बैठा है।
- 26:41फिर गंगाजल में स्नान करने की कोई भी आवश्यकता नहीं थी।
- 26:48लेकिन एस्ट्रोलॉजी को इन्होंने व्यापार बना लिया जबकि
- 26:54एस्ट्रोलॉजी तुम्हें मार्गदर्शन के लिए एक साधन की तरह उपलब्ध हुई
- 26:59थी। भृगु जी ने एस्ट्रोलॉजी को एक
- 27:04साधन के रूप में आपको प्रदान किया था।
- 27:08आप उसको व्यापार बना ले ये तो नहीं कहा था, लेकिन तुमने हर चीज़
- 27:17को व्यापार बना लिया महावीर हूँ, बुद्ध हूँ, नानक हूँ कबीर हूँ।
- 27:29जागृत पुरुष कभी व्यापार नहीं करता और ये कहानी तुम्हें बताती
- 27:36है कि जागृत पुरुष कभी व्यापार कर नहीं सकता।
- 27:41बाबा नान की कहानी। मोदिखाने में डॉल खान के मोदिखाने
- 27:49में नौकरी करते थे। गृह कहा गया समन तौलने लगे तकड़ी
- 28:02से 1231011 पर। और 1313 के ऊपर आए तो गाड़ी हो
- 28:12गया। ये आपको समझाने के लिए था
- 28:18प्रबुद्ध व्यक्ति व्यापार नहीं कर सकता करता नहीं कर सकता।
- 28:29प्रबुद्ध व्यक्ति तो जीना भी नहीं चाहता।
- 28:32सच में पूछो तुम प्रबुद्ध व्यक्ति के जीवन को अच्छे से जांचना गहरे
- 28:42से जांचना। तो तुम्हें पता चलेगा कि सच में
- 28:49प्रबुद्ध व्यक्ति जीना ही नहीं जाता।
- 28:53क्यों जीना इन कपड़ों को बचाना है और उसको पता चल गया है ये कपड़े
- 29:03मेरा आवरण है। मैं नहीं फिर कब तक पहले रखेगा?
- 29:09इसको जीस व्यक्ति को प्रबुद्धता की झलक मिलनी शुरू हुई।
- 29:20वह व्यापार नहीं कर सकता। प्रबुद्ध हुआ व्यक्ति तो व्यापार।
- 29:25कैसे करे? थोड़ी सी जलक मिली थी पहली सदौरी
- 29:30की जलक मिले नानक तो 13 से आगे नहीं चल सका, ये सिर्फ इस बात की
- 29:40सूचना है। कि जीसको उस मदहोश का एक बुद्ध
- 29:45मिल गया। आनंद का उस सागर का एक बुद्ध मिल
- 29:48गया। व्यापार कैसे करेगा हिसाब?
- 29:53किताब कैसे करेगा जीसको उस अनंत की झलक मिल जाए ये जो सारे
- 30:00शास्त्र लिखे एक और मैं कहता हूँ जला दो।
- 30:04मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि यह असीम की खबर नहीं, यह असीम को
- 30:11सीमित करने का प्रयास है। आपका शर्त इसलिए झगड़े होते है।
- 30:18उनके भीतर जो दिखा हुआ है उनकी बातों पे झगड़े होते है।
- 30:23असीम को शुद्रता के अंदर बांध लेने की कवायद शास्त्र कहलाती है।
- 30:32फिर वह कोई भी हो, गीता हो, पुराण हो, कुरान हो, बाइबल हो, ग्रंथ
- 30:38हो, उपनिश्चित हो। अष्टावक्र गीता हो या गुरु, गीता
- 30:46हो, अवधूत गीता हो, ये सभी शास्त्र उस असीम को सीमा में
- 30:55बांधने का प्रयास मात्र है जो कि गलत है, होना नहीं चाहिए।
- 31:03पहले दो पद्धतियां चलती थी, श्रुतियां और स्मृतियां।
- 31:08गुरु बोलता था, शिष्य श्रवण करता था, गुरु बोलता था, शिष्य श्रवण
- 31:14करके उसे स्मृति में बैठा लेता था।
- 31:19पहले कागज़ नहीं था, ज्यादा बढ़िया वेला था क्योंकि कान से
- 31:32कान तक बात पहुंची स्मृति से स्मृति तक बात पहुंची।
- 31:39कोई व्यापार करने का कारण भी नहीं था, उपाय भी नहीं था।
- 31:45आज शास्त्र सब जगह ये देख लो। सभी प्रैसेस में शास्त्र छप रहे
- 31:51हैं लेकिन ये धंधा है आपको पता है सब धंधा है।
- 31:58किताबों में वो आता ना स्त्री पुत्री वस्त्र और यहाँ तक अभी तुम
- 32:09वस्त्र को ही नहीं छोड़ सकते, मैं स्त्री हूँ, इसी को नहीं छोड़
- 32:15सकते, इससे थोड़ा आगे जाना होगा। मैं स्त्री हूँ कि आगे जाना होगा,
- 32:22मैं शरीर भी नहीं हूँ फिर उससे भी आगे निकलना होगा।
- 32:28मैं इमोशनल भी नहीं, ना मैं ऐसा हूँ, ना द्वेष हूँ, ना प्रेम हूँ।
- 32:39मैं नफरत हूँ, मैं इन सब से पार हूँ, ये सारे कल क्रॉस कर रहे
- 32:45होंगे फिर तुम वाहन पर जाओगे, यहाँ द्वैत नहीं है, अद्वैत है।
- 32:57और जहाँ शांति है, इसलिए जब तक व्यक्ति वृद्धि के स्तर पर रहता
- 33:04है वह दुखी रहता है जंजावाद विचारों के तूफान।
- 33:11यहाँ से नीचे उतरता है प्रेम में पड़ जाता है वहाँ भी थोड़ा द्वस्त
- 33:16है प्रेम में भी बंधन है क्योंकि जिसका विपरीत है।
- 33:34मैं तुम्हें मुक्ति नहीं दे सकता, प्रेम का विपरीत है, ग्रह, मैं
- 33:42तुम्हें मुक्ति नहीं दे सकता, इमोशन्स को भी क्रॉस करना होगा
- 33:48इसे समझना पहले विचारों को क्रॉस करना।
- 33:52क्योंकि ये बुद्धि के दिन हृदय विचार नहीं कर सकता और बुद्धि
- 33:58प्रेम नहीं कर सकते। ये दो तल हैं, अलग अलग तलो पे दो
- 34:05घटनाएं करते हैं, बुद्धि के तल पे विचार आते हैं और उससे थोड़ा सा
- 34:10नीचे उतरोगे। तो हृदय करता रहेगा।
- 34:14वहाँ पर इमोशन्स आती है, भावनाएँ कृष भी है, प्रेम भी है, नौकर भी
- 34:21है, दान भी है, क्रोध भी है, लोग भी है।
- 34:32ये भावना लेकिन इससे भी बाहर निकलना होगा।
- 34:40बुद्धि से पार भावनाओं से पार और गहरे उतरना होगा।
- 34:49शंघ शंघ। विचारों के पार हुए भावनाओं के
- 34:55पार हुए और गहरे उतरे, गहरे उतरे और गहरे उतरे और गहरे उतरे गहरे
- 35:04उतरते उतरते मैं दूर तो नहीं था। लेकिन तुम ही दूर हो गए उससे
- 35:17परमात्मा तो वहीं परमात्मा तो अविचल है, अचल है, अकंप है, वो तो
- 35:24हिलता भी है, वो कहीं जाता आता नहीं।
- 35:29तो दादू ने कहा वस्तु ठोर की ठोक परमात्मा तो वहीं है, वहीं था
- 35:36जहाँ छोड़ के गए थे वहीं पाओगे बड़े शौक से सुन रहा था ज़माना।
- 35:48बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना, अमी खो गए दास्तां कहते कहते बड़े
- 35:57शोक से सुन रहा था ज़माना अमी सो गए दास्तां कहते कहते हम ही ने
- 36:05दामन छुड़ाया था परमाद से। हम ही नहीं अपना स्वयं का प्राप्त
- 36:11किया था, हम ही दूर निकल गए थे और दूर जाते जाते इतने दूर चले गए कि
- 36:18आज वापस उठना मुश्किल हो चला है इतना मुश्किल हो चला है।
- 36:28ख्याज पाखंडियों ने लोग ही व्यक्तियों ने पांडाल लगाकर
- 36:33तुम्हारी इस भटकन का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है।
- 36:45आओ तुम्हें सही मार्ग तो खाये, आओ शिविर लगाएं आओ योग्य नेत्र में
- 36:51सराहना बड़े बड़े होड़ भी मिलेंगे ये तुमको तुमसे मिलाने के जतन
- 37:04करते हैं। और यत्न से वह मिलता नहीं, ज़रा
- 37:13सोचो तुम सोये हुए हो चारपाई पे आनंद से सोये हुए है ठंडी हवा
- 37:20सुबह सुबह। बड़ा प्यारा, खुशहाल मौसम पक्षी
- 37:29गीत गा रहे हैं चाहे चाह रहे सूरज अभी निकला है बाहर भी संगीत बज
- 37:38रहा मंगल गान हो रहे। भीतर भी संगीत बज रहा और तुम बड़े
- 37:46मज़े से सोए। कुछ इन चुलबली सी हवाओं ने
- 37:59तुम्हें लूट लिया। तुम ज्यादा अपने भीतर अन्तशम से
- 38:09ह्रदय प्रसन्न कोई प्यारा सा सपना देख रहे हो, किसी प्रेसि के पास
- 38:16पास बैठे किसी प्रेमी के पास बैठे गुप्त गुम कर रहे हो।
- 38:29तुम कहीं भटक गए हो ज़रा सोच के बताना कुछ कितना प्यारा मौसम है
- 38:37बाहर भी और भीतर भी तुम्हे सुंदर सा सपना आ रहा है।
- 38:45बहुत बड़ी अशोक वाटिका में तुम बैठे प्रेमी प्रेसी आपस में
- 38:51वार्तालाप कर ले, ठंडी हवाएं लहरा के आएं दामन बगोएं आके न जाए।
- 39:09ऐसे में तुम्हें कुछ बुरा नहीं लग रहा, लेकिन कोई आके तुम्हें जला
- 39:17जगाके झंझोर तुम्हारी आँख खुल जाएगी।
- 39:28तुम शिकायत तो करोगे? ये सपना बड़ा सुन्दर था, बस
- 39:35राजाओं की यही तकलीफ होती है, ये सपना कभी टूटना होता है कभी कोई
- 39:40गद्दी मुझसे छीनना बड़ा सुहाना सपना देखा है?
- 39:51तकलीफ राजा के नाम तकलीफ रंक की बहु ही सपना तो बहुत बढ़िया देखता
- 39:59है। और वो राजा से ज्यादा बढ़िया सपना
- 40:02देखता है लेकिन सपना सपना है कोई तुम्हे जगा दे, तुम जाग गए।
- 40:10क्या तुम कहीं भटक गए थे? सोच लो और जवाब दो नहीं तुम कहीं
- 40:18नहीं भटक गए थे। तुम यहीं थे बस इतना सा होना होता
- 40:25है तुम कहीं गए नहीं वो वस्तु ठोर के ठो तुम वहीं बस कहीं खो गए थे
- 40:37महफिल में। मेला ऐसा आया कि बिछु दे गया, यह
- 40:51मेले में मेल नहीं हुआ। इस मेले में बिछुड़न हो गई।
- 41:04ये जो संत कहते हैं जो परवचन देते हैं, लंबे लंबे ये जो कहते हैं के
- 41:13शादी वंदन है, काश इन्होंने स्वयं को दिया।
- 41:23फिर शादी छोड़ो, ये शरीर भी बंदा नहीं बनता था।
- 41:28जो मसला है वो तो ये भी नहीं जानते बेचारे न आचार्य जानता है न
- 41:38सर लोग जानते है। तुम्हें सूचनाओं पे सूचनाएं
- 41:43प्रदान किए जाती हैं। तुम्हें तुम्हारे सपनों को ज्यादा
- 41:47हँसीन किया जाता है। तुम्हारे सपने कैसे ज्यादा हँसीन
- 41:52हो जाएं और देखिए सपने कितने भी हँसीन हो जाएं।
- 42:01जागने पे टूट ही जाया करते है, सपना कितना भी है जी जागने पे टूट
- 42:11जाया करते है और ध्यान रखना तुम कोई भी सपना देखे हो।
- 42:19निर्द्रता का बुरा सपना है जा राजा होने का सुंदर सपना है सुंदर
- 42:33महफिल सजी है जहाँ कोड़ों की मार पड़ रही है, कुछ भी घटित हो रहा
- 42:40है दोनों में से। जागने पे दोनों ही उठ जाया करते
- 42:48हैं, है ना तभी तक रहते हैं जब तक तुम सोये पड़े हो, कुछ सपनों को
- 42:59तुम्हारा छोड़ने का मन नहीं करता। ओह भाई, जो सपने तुम्हारे हसीन
- 43:08होते है, कहाँ मन करता है? प्राइम मिनिस्टर अब ट्रंप का मन
- 43:15करेगा, मैं अमेरिकन गति को छोड़ नहीं मन करेगा।
- 43:20नहीं मन करता इसलिए डिक्टेटर बन के बैठ जाती है तो मन नहीं करता
- 43:28मन डोबी मन लालची मन, चंचल मन, चो।
- 43:36मन लोभी मन लालची मन, चंचल मन चोर मन के मते नच दिए पलक पलक मन ओर
- 43:44स्वप्न हसीन सपनों को तोड़ने का मन नहीं होता, बस डिक्टेटरशिप की
- 43:52मात्र यही कहानी है। अगर कोई समझे तो समझ जाएगा इन
- 43:56बातों से सपने हँसी है लेकिन है। सपने।
- 44:18कब सदेखा था हमने? जब आँख खुली तो टूट गया जब आँख
- 44:33खुली तो। टूट गया इक ख्वाब सा देखा था हमने
- 44:47जब आंख खुली तो टूट गया जब। आँख खुली तो टूट गया जब आँख खुली
- 45:04तो टूट गया ये प्यार तुम्हें सप न बनकर।
- 45:15ये प्यार तुम्हें स्वप ना बनकर तड़पाये कभी भी तो मत रोना, ये
- 45:29प्यार तुम्हें स्वप ना बनकर। तड़पाय कभी तो मत रोना, हम छोड़
- 45:43चले हैं महफिल को याद आए कभी तो मत रोना।
- 45:53हम छोड़ चले हैं महफिल को। यहाँ से।
- 46:13अरे सुन लो, लेकिन ये बात हमेशा जहन में रखना जहाँ से टकराते यह
- 46:23अलहास आते हैं तुमने वहाँ पहुंचना है।
- 46:28शब्दों में खोले पहुंचाना है। शब्दों से सिर्फ यह अनुमान लगाना
- 46:39है कि कहीं सुन्दर स्थान से टकरा की आवाज आ रही है।
- 46:47इतना सा अंदाजा अनुमान लगा ले। वहीं पहुंचा।
- 46:57जीवन के सफर में तनहाई जीवन के सफर में तनहाई।
- 47:11तुम को तो न जिंदा छोड़ेगी। जीवन के सफर में तनहाई तुम को तो
- 47:27न जिंदा। छोड़ेगी।
- 47:33तुमको तो ना जिंदा छोड़ेगी। मरने की खबर है जाने जिगर।
- 47:53क्या बताये? मरने की खबर एम् जाने जिगर मिल
- 48:01जाए कभी। ओह मत रोना जीवन के सफर में तन
- 48:16हाय, तुमको तो न जिंदा छोड़ेगी। तुमको तो न जिंदा छोड़ेगी मरने की
- 48:33खबर है जाने जिगर मिल जाए कभी भी तो मत रोना।
- 48:44हम छोड़ चले हैं महफिल को याद आए गवी तो मत रोना, इस दिल को तसल्ली
- 49:00दे देना। इस दिल को तसल्ली दे देना घबराई
- 49:11कभी तो मैं फिर हूँ होना। आपकी सारी वीडियो सुनते हुए।
- 49:23अक्सर सो जा। रात को भी सोते हुए मैंने कल एक
- 49:29फॉर्मूलेशन बताया था। दिन में मन थोड़ा थोड़ा कभी कभी
- 49:34सेंसरशिप करता है। कितने भी जागृत हो दिन में भी
- 49:41सुनना। क्योंकि शब्दों को काट दोगे, वह
- 49:48आनंद फिर भी तुम्हारे उस गड़े में पड़ जाएगा, जो तुम्हारे भीतर रस
- 49:53का संचार संग्रह करता है, लेकिन रात को सोते वक्त यह वीडियो।
- 50:02इयरफोन पे लगा लेना किसी को डिस्टर्बेंस भी नहीं होते।
- 50:06कुछ शब्दों के साथ यो लिपटकर आता है आनंद तुम्हें पता भी नहीं
- 50:13चलेगा तुम कुमारी के नींद में डुबे हो गए और तुम्हारा।
- 50:23वह बिल्कुल अस्तित्व के पास बैठा हुआ अचेतन मन उस लिपट के आए हुए
- 50:31रस को जो आनंद से ओतप्रोत है उसको पीता रहेगा सारी रात नींद भी घनी
- 50:39अच्छी आएगी। पर ये शहद भी जुड़ता जाएगा और
- 50:47किन्हीं सौभाग्य सारी क्षणों में हो सकता है।
- 50:50ये गागर भर जाए, गागर भर जाए तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 50:59रस छलकेगा और तुमसे ऐसा ही बुद्ध हो गए और तुम्हें पता भी नहीं चला
- 51:10एक शिखर मेथड मैंने बताया तुम्हें भगवान शंकर की एक और?
- 51:18अपरमपार दांत आपके लिए इस शहद से लिपटे गए अमृत से लिपटे गए शब्द
- 51:28बड़े कीमती हैं इनको संजो के रखना, संभाल के रखना तुम्हारी
- 51:35पुश्तों के काम पर। यहाँ तक आपको समझा गया वो जो
- 51:53रास्ता था वो दंगंबर जैन मुनियों के लिए था।
- 51:57स्त्रियों के लिए आपके लिए सभी के रास्ते अलग अलग हैं।
- 52:05मैंने पांच चार वीडियो पहले बताया भी था और चक्कर के भीतर केंद्र तक
- 52:11जाने वाली सफीर से केंद्र तक जाने वाली सभी रेखाएं मैंने चिन्हित भी
- 52:15की थी। इतने रास्ते है वहाँ तक पहुंचने
- 52:18के लिए। तो रस्ते के सफर पे मतभेद होगा और
- 52:23इन मतभेदों के कारण ही तुम झगड़े करते हो लेकिन किसी ने भी ये नहीं
- 52:29कहा कि केंद्र पर जा के सब सयाने एक मत।
- 52:40परमात्मा एक है सभी कहीं कहीं वहाँ जाकर कोई फर्क नहीं पड़ता और
- 52:47वहाँ पहुंचा हुआ व्यक्ति व्यापार नहीं करता, मिनट में करता वह
- 52:51ज्ञान का भंडार होता है और ज्ञान को बिखेरता है।
- 52:55वह व्यापार नहीं करता, सभी धर्म कहते हैं।
- 53:04गोरी स्वान ईश्वर एक बाबा नान्य कहते हैं, एक ओंकार वह एक है, ऋषि
- 53:14कहते हैं एको ब्रह्मा द्वितीय नष्ट।
- 53:17ए कब्र में ही है, दूसरा नहीं है और इस्लाम कहता है ला इल्ला
- 53:27इल्लाह ला इल्लाह अल्लाह। वह एक है, उसके सिवा कोई नहीं ला
- 53:43एल्लाह कोई नहीं उसके बिना एक ही है और वो कौन है एल्लाह वह अल्लाह
- 53:54है। अल्लाह अल्लाह, अल्लाह के बिना
- 54:07दूसरा कोई नहीं एक अल्लाह सभी धर्म कहते हैं मोहम्मद और रसूल
- 54:16अल्लाह और मोहम्मद। सल अल्लाह अलइ ही बसल्लम अज़र तुम
- 54:27मोहम्मद शहंशाह, वह भगवान के रसूल हैं, अल्लाह के रसूल हैं बेगमपा
- 54:38तुम अवतार के हो? जैन तीर्थंकर कह देते हैं सभी ने
- 54:46अपनी अपनी भाषाएं खोज ली हैं तो भाषाओं के ऊपर कभी झगड़ा मत करना।
- 54:52ये झगड़े सभी के ऊपर होंगे, परिधि के ऊपर होंगे, लेकिन केंद्र के
- 54:58ऊपर कोई झगड़ा नहीं है। केंद्र पे सभी आके कहते हैं वह एक
- 55:03है और उसके सिवा कोई दूसरा है लह लह एल अल्लाह मोहम्मद उर
- 55:14रसूलल्लाह। सल्लल्लाह आलेह वसल्लम अदरक महमूद
- 55:22उसके पैगम्बर एक परमात्मा के सिवा दूसरा कोई नहीं, वही पूज नहीं
- 55:29योग्य वही पूज नहीं योग्य है? लेकिन तुम तो 33,00,00,000 देवी
- 55:37देवताओं की पूजा करते हो, मैंने पहले भी कहा कितने कुम्भ में मारे
- 55:43जाते हैं? तुम बहाने खोज लेते हो?
- 55:47अच्छा है मोक्ष मिल गया। कभी इस तरह से मरने पर मोक्ष
- 55:52मिलता है। इस तरह से मरने पे कभी मोक्ष
- 55:57मिलता है अगर तुम्हारे तीर्थों पे जाके कोई सुसाइड कमिट कर ले तो
- 56:04उसे मोक्ष मिल गया। परमात्मा का रसूल आपको नहीं
- 56:12भटकाता? परमात्मा के तीर्थंकर तो मैं नहीं
- 56:17भटकाती परमात्मा के अवतार तो मैं नहीं भटकाती तीर्थंकर पैगंबर
- 56:26अवतार संत। ये तुम्हें नहीं भटकाते, भटकाते
- 56:40हैं तुम्हारे अंत मूर्ख लोग जो नाम देव को बिना बात का बताते
- 56:48हैं। बिना बाप के कौन होता है बताने
- 56:51ज़रा कल ही मैं एक मुर्ख को सुन रहा था और ऐसे मूर्खों की बातें
- 56:58आपको अच्छी लगती हैं क्योंकि आप मुर्ख हो, हम दिमाग मिल गया।
- 57:09तो आपको अच्छी लगेंगी बातें जो संत थोड़े से कड़वे वचन बोलेंगे,
- 57:15उससे तुम कहोगे तो निंदा करता है आज गलत मान्यताओं को
- 57:29दुःस्मान्यताओं को तोड़ना। अपराध हो गया अभी जगन्नाथ पुरी हर
- 57:39साल देखता हूँ बहुत बार दुर्घटनाएँ रथ को कौन खींचेगा
- 57:47इसके लिए और कितने लोग मारे जाते हैं?
- 57:54क्या तुम एक ज़िन्दगी के बदले जिनके मारे गए क्या उसकी एक
- 57:59ज़िन्दगी के बदले और कुंभ में मारा गया यह जगन्नाथपुरी का रत्न
- 58:04रत्गणिषा हुआ मारा गया उस एक ज़िन्दगी?
- 58:08के बदले मैं 1000 रक्त में दे देता हूँ क्या तुम जिंदगी वापस कर
- 58:13पाओगे? वो लौटा नहीं तुम्हारे हाथ में ये
- 58:18प्रखंड करने तुम्हारे हाथ में मेकअप कर लो जिंदिया लगा लो मेकअप
- 58:25कर लो। काजल लगा लो आँखों में कोई कुछ
- 58:33बने बैठा कोई कुछ बने बैठा होने की कोई फिक्र नहीं बनने की फिक्र
- 58:41कोई राम बनेगा कोई सुभद्रा बनेगा कोई बलराम बनेगा।
- 58:47होने की फिक्र किसी को बनाने की फिक्र सबको है।
- 58:53मैं राजा बन जाऊं, मैं गद्दी नशीन बन जाऊं।
- 59:02मैं पटवारी बन। जाऊं?
- 59:07बनने की फिक्र सभी को है। होने की फिक्र इसी को नहीं बनने
- 59:15में दौड़ लगती है। कौन बनेगा बलराम, कौन बनेगी
- 59:20सुभद्रा? ये झगड़े होते हैं हमें तो पता है
- 59:22हम तो देखते रहे हैं सारे अखिलेश। लेकिन क्या तुम मुझे एक जिंदगी
- 59:37वापस दे सकोगे? ऐसे रथ में तुम्हें 1000 दे देता
- 59:43हूँ। जगन्नाथपुरी के रक्त में तुम्हें
- 59:501000 क्या तुम तुम मुझे एक ज़िन्दगी वापस करोगे जो मर के जो
- 1:00:01मर गए कुंभ के मेले में क्या उनको एक को भी लूटा सकोगे?
- 1:00:06किसी भी कीमत पर चाँद तारे तुम्हारे हवाले कर देंगे बोलो
- 1:00:15नहीं तुम्हारे वश में नहीं फिर तुम्हारे वश में क्या है तुम्हारे
- 1:00:19वश में घंटा है वह बजाते जाओ। यह घंटा बजाने वाले आज गलियों पर
- 1:00:27बैठे राज़ करने आता जाता है, ना व्यवस्था को संभाल पाते हैं, बस
- 1:00:39झूठ बोलना आता है और कुछ नहीं आता।
- 1:00:46बाबा जी, मुझे अच्छे से प्रश्न पूछना आता है, फिर भी यह पूछना
- 1:00:52चाहती है कि आपके जाने के बाद हम आपको याद करेंगे तो आप आ जाएंगे,
- 1:01:00जैसे आप कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को याद करो तो वह आ जाते
- 1:01:04हैं। या फिर हमें आपके दिल की बात करने
- 1:01:12के लिए आपके स्थान के गर्भ पर आकर ही कहना पड़ेगा।
- 1:01:19प्लीज़ इस बात पर रौशनी जरूर डालें और कोई गलती हो गई।
- 1:01:24तो क्षम करने से कोई गलती नहीं हुई।
- 1:01:28मैं तो खुद ही कह रहा हूँ मरने की खबर ऐजाने जगह मिल जाए तभी तो मत
- 1:01:35रो। मेरे स्थान की तरफ अगर तुम वो
- 1:01:43करके भी कुछ कह दो श्रद्धा और से अश्रुपुरत आँखों से।
- 1:02:00शर्ल हृदय से कोमल चित्त अति दीन दयाला।
- 1:02:09कारण विन रमनाथ कृपाला तुम जहाँ भी हो बस तुम्हें पता नहीं।
- 1:02:20तुम सोए जब जागोगे तो पाओगे जिनके वास्ते हम लड़ रहे थे वो सभी एक
- 1:02:36थे। कबीर को पुकारो तो नानक आ जाएं
- 1:02:42नानक को। पुकारो तो हजरत आ जाएंगे।
- 1:02:46हजरत को पुकारो तो ईसा आ जाएंगे। ईसा को पुकारो तो कृष्ण शायद
- 1:02:54तुम्हें पता नहीं अभी अभी तुम समझ नहीं पाओगे क्योंकि भीतर की चेतना
- 1:03:00समाये जो खो गए उस समुद्र में। वह समुद्र ही तो हो गए फिर तुम उस
- 1:03:11समुद्र में खो गए कबीर को, नानक को, कृष्ण को किसी को भी पुकार
- 1:03:18लेना आएगा वह समुद्र ही सारे का सारे।
- 1:03:23और तुम्हें पता भी न चलेगा, ऐसे ही ऐसे ही मैं भी खो जाऊंगा लेकिन
- 1:03:32जाऊंगा कहीं अस्तित्व से कहीं नहीं जाऊंगा अस्तित्व से मैं यहीं
- 1:03:40रहूंगा। शारदा रोने लगी।
- 1:03:46रामकृष्णा ने कहा था, जीस दिन तुम थाली ले के आओ और मैं नाक मोड़
- 1:03:50रहा हूँ, बस 72 घंटे बाद मैं प्राण छोड़ दूंगा और वो दिन भी आ
- 1:03:59गया। शारदा खाने की थाली लेकर आई
- 1:04:06रामकृष्णा ने देखा और मुँह फिर शारदा को याद आई बात शारदा उम्र
- 1:04:14में काफी छोटी थी, रामकृष्णा। कंप गई बात याद आई, थाली गिर गई,
- 1:04:24बिखर गया सब कुछ छाती पीटने लगी तो रामकृष्णा ने कहा नहीं ऐसा मत
- 1:04:31करो स्वामी आप चले जाओगे मैं कहाँ जाऊंगा, मैं तो यहीं रहूंगा।
- 1:04:39मैं कहीं नहीं जाने वाला, तुम बस पुकार भर लेना पर अभी तो यही कहते
- 1:04:46हैं कि तुम पुकार भर लेना। पुकार ही तो उठती नहीं तुम्हारे
- 1:04:50भीतर से अर्धसियां उठती। तुम्हारे भीतर से स्मरण उठता है,
- 1:04:58स्मरण नहीं, तुम्हें याद नहीं आती उसे तुम याद करते हो।
- 1:05:03उसे यही चूक हो गई और यही एक गुंडी फंसी हुई है।
- 1:05:11और आँख में पड़ा हुआ छोटा सा किनका भी सारे संसार को देखने में
- 1:05:16बाधा बन जाया करता है। वैसे छोटा सा किनका आँख में पड़ा
- 1:05:23तुम निकाल सरल हृदय से निर्मल लक्षित?
- 1:05:30से मुझे मैं कहीं नहीं जाऊंगा, न कहीं कृष्ण गए, न कहीं राम गए, न
- 1:05:41कबीर गए, न नानक गए, कोई भी तो नहीं गया सब यहीं।
- 1:05:51उसी समुद्र में है ज़रा देखो समुद्र को क्या कह के पुकारो।
- 1:05:58ब्लैकबोर्ड पे लिखा हुआ एच टू ओह कह के पुकारो गे तो सारा समुद्र
- 1:06:04ही तो एच टू हुआ है। उसका केमिकल फॉर्मूलेशन रसायनिक
- 1:06:11संरचना ही यह है। एच टू ओह को पुकारोगे तो कौन
- 1:06:15आएगा? पानी की बूंद आएगी एच टू ओह को
- 1:06:19पुकारोगे तो सारा समुद्र आएगा, क्योंकि समुद्र एच टू ओह का भंडार
- 1:06:24है। कबीर को पुकारोगे तुम्हें पता
- 1:06:28नहीं चलता सारा अस्तित्व आ जाता है।
- 1:06:33उसके पुकारने से किसी को पुकारना तू चला गया, वह मिल जाता है, मिट
- 1:06:43नहीं जाता, ध्यान रखें। जो चला गया वह समुद्र में मिल
- 1:06:49जाता है, मिट नहीं जाता, जो मिटता है वो तो वो था नहीं, थोड़ी गहरी
- 1:06:56बात है जो तुम समझे बैठे हो अभी अपने आप को।
- 1:07:04वह नहीं रहेगा, वह मिट जाएगा और जो तुम सच में हो वो चेतना की
- 1:07:09बूंद वह मिल जाएगी। पोषण में और एकाकार हो जाएगी।
- 1:07:16फिर तुम कृष्ण न रहे, फिर सारा समुद्र ही कृष्ण नहीं हो गया, फिर
- 1:07:22तुम कबीर न रहे। फिर सारा समुद्र ही कबीर में ही
- 1:07:26हो गया इसलिए कबीर के पुजारी मानने वाले कहते हैं कबीर भगवान
- 1:07:32हो गए, बिल्कुल हो गया कबीर सारा समुद्र ही हो गया क्योंकि जब वो
- 1:07:38बूंद समुद्र में समा गई तो समुद्र ही तो हो गई।
- 1:07:43तो ठीक कहते हैं कबीर भगवान हो गए बिलकुल ठीक कहते हैं, ज़रा भी तो
- 1:07:47गलती नहीं इसमें और सभी भगवान हो गए, नानक भगवान हो गए, मीरा भगवान
- 1:07:55हो गए, दया भगवान हो गई, राबिया भगवान हो गए।
- 1:08:02वो स्त्री थी। वस्त्र रिकग्निशन का कारण न बने
- 1:08:13तुम्हारे वस्त्र तो टूट जाते हैं, फट जाते हैं, मैले हो जाते हैं,
- 1:08:19छोड़ने पड़ते हैं। लेकिन वस्त्र तुम हो नहीं, तुम
- 1:08:24वस्त्रों से पार जिसने ओढ़ रखे यह वस्त्र शरीर, वो भी तो तुम नहीं
- 1:08:30हो उसके भीतर भी ले रहे हैं विचारों की, उसके भीतर भी ले रहे
- 1:08:35हैं भावनाओं की वो भी तो तुम नहीं हो उन सबसे पार जाना है।
- 1:08:42और उन सब से पार जाके जो आएगा अस्तित्व वहाँ सिर्फ एक ही बचेगा
- 1:08:49जिसे कहते हैं ला। मोहम्मदुर रसूलाल वह एक है ईशा
- 1:09:10वास समितम् सर्वम यत्नगंज जगतयाम जगत एको परम नृत्य नास्त।
- 1:09:18दूसरा नहीं, एकों का उसी की बात कर रहे हैं।
- 1:09:25सभी उसी के आनंद में उसको पुकार रहे हैं सब और कोई दूसरा नहीं है
- 1:09:36और उसी को याद करना बनता है। छोड़ो इन देवी देवताओं को
- 1:09:42इन्होंने बहुत सी जवानियों को निगर लिया और तुम्हें पता भी नहीं
- 1:09:47चला तुम्हारी मूड मान्यताओं जिंदगियों को हड़प गई और तुम्हें
- 1:09:51पता भी न चला कैसे दुष्ट हैं? के मान्यताओं को भी शुगर कोटेड कर
- 1:09:59देते। हैं जमाने में मारे जमा कैसे
- 1:10:14कैसे? जमी।
- 1:10:19खा गई आसमान कैसे कैसे जमाने में मारे?
- 1:10:38जमा कैसे कै जमीन खा गई आसमान कैसे कै से?
- 1:10:56इन तुम्हारी मूल मान्यताओं में न जाने कितनी जिंदगियां हड़पनी
- 1:10:59निकलनी और इनमें एक भी जिंदगी वापस लौटाने का कैपेसिटी रही है।
- 1:11:09एक भी जीवंत तुम्हें वापस नहीं दे सकते।
- 1:11:12हड़प सकते हैं ये दुष्ट। मूड मान्यताओं को छोड़ दो, जितनी
- 1:11:17शीघ्र हो सके और सभी धर्मों में है कोई एक धर्म इस बात को न सुने
- 1:11:28सभी धर्मों में है। सभी धर्म आज विकृत करती है
- 1:11:32क्योंकि अज्ञानियों के हाथ लग गए। बंदर के हाथ में अगर तुम पिस्तौल
- 1:11:39दोगे, मैं या तो खुद को मार लेगा या किसी दूसरे को मारेगा, वह
- 1:11:46संहार क्यों करेगा? आज दुष्टों के हाथ में शस्त्र पड़
- 1:11:51गया। संतो के वचन ऋषियों के वचन
- 1:11:57पैगम्बरों के वचन मसीहों के वचन गुरुओं के वचन आज मूड़ों के हाथ
- 1:12:07में पड़ गए और मूड सर्फी नाश कर सकते हैं।
- 1:12:15मूड सिर्फ विनष्ट कर सकते हैं। दे कैन ओनली डिस्ट्रक्ट दे कैनट
- 1:12:23कंस्ट्रक्ट।